सभी चीज़ों व प्राणियों पर सृष्टिकर्ता के नियन्त्रण और प्रभुत्व का तथ्य सृष्टिकर्ता के अधिकार के सच्चे अस्तित्व के विषय में बोलता है

06 अगस्त, 2018

उसी प्रकार से, अय्यूब के ऊपर यहोवा की आशीष अय्यूब की पुस्तक में दर्ज है। परमेश्वर ने अय्यूब को क्या दिया था? "यहोवा ने अय्यूब के बाद के दिनों में उसके पहले के दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छ: हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं" (अय्यूब 42:12)। मनुष्य के नज़रिए से, अय्यूब को दी गई ये चीज़ें क्या थीं? क्या वे मनुष्य की सम्पत्ति थी? इन सम्पत्तियों के द्वारा क्या अय्यूब उस युग में बहुत अधिक धनी नहीं रहा होगा? उसे ऐसी सम्पत्तियाँ कैसे प्राप्त हुईं थीं? उसे धन कैसे मिला? कहने की आवश्यकता नहीं कि अय्यूब को ये सम्पत्ति परमेश्वर के आशीष से प्राप्त हुई थी। अय्यूब इन सम्पत्तियों को किस नज़रिए से देखता था और वह परमेश्वर की आशीषों को किस प्रकार महत्व देता था, हम इन सब बातों पर यहाँ चर्चा नहीं करेंगे। जब भी परमेश्वर की आशीषों की बात होती है, सभी लोग दिन और रात परमेश्वर से आशीषित होने की लालसा करते हैं, फिर भी मनुष्य का नियन्त्रण इन बातों पर नहीं होता है कि वह अपने जीवनकाल में कितनी सम्पत्ति प्राप्त कर सकता है या वह परमेश्वर से आशीषों को प्राप्त करेगा भी कि नहीं—यह एक निर्विवादित सत्य है! परमेश्वर के पास अधिकार है और उसके पास मनुष्य को किसी भी प्रकार की सम्पत्ति देने की सामर्थ्‍य है, जिससे वह मनुष्य को किसी भी प्रकार के लाभ को प्राप्त करने की स्वीकृति दे सके, फिर भी परमेश्वर की आशीषों का एक सिद्धांत है। परमेश्वर किस प्रकार के लोगों को आशीष देता है? निश्चय ही ऐसे लोगों को जिनको वह पसंद करता है! अब्राहम और अय्यूब दोनों को परमेश्वर के द्वारा आशीषित किया गया था, फिर भी वे आशीषें जिन्हें उन्होंने प्राप्त किया था एक समान नहीं थी। परमेश्वर ने अब्राहम को रेत और तारों के समान अनगिनत वंशजों से आशीषित किया था। जब परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दी तो उसने एक मनुष्य के वंशजों, एक जाति को सामर्थी और समृद्ध किया। इसमें, परमेश्वर के अधिकार ने मानवजाति पर शासन किया, जो सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों में परमेश्वर की श्वास से श्वसन करती थी। परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता के अधीन, यह मानवजाति परमेश्वर के द्वारा निर्धारित दायरे के अंतर्गत उस गति से तेजी से बढ़ी और अस्तित्व में आ गई जिसे परमेश्वर ने निर्धारित किया था। विशेष रूप से, इस जाति की जीवन योग्यता, फैलाव की गति और जीवन-प्रत्याशा सब कुछ परमेश्वर के इन्तज़ामों के भाग थे और इन सब का सिद्धांत पूर्णतया उस प्रतिज्ञा पर आधारित था जिसे परमेश्वर ने अब्राहम को दिया था। कहने का तात्पर्य है कि परिस्थितियों से परे, परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ बिना किसी बाधा के आगे बढेंगी और परमेश्वर के अधिकार की दूरदर्शिता के अधीन वे साकार होंगी। उस प्रतिज्ञा में जो परमेश्वर ने अब्राहम से की थी, संसार की उथल-पुथल से निरपेक्ष, उस युग से निरपेक्ष, मानवजाति के द्वारा झेली गई महाविपत्तियों से निरपेक्ष, अब्राहम का वंश सम्पूर्ण विनाश के जोखिम का सामना नहीं करेगा और उनकी जाति कभी खत्म नहीं होगी। लेकिन अय्यूब के ऊपर परमेश्वर की आशीषों ने उसे बहुत ज़्यादा धनी बना दिया था। जो परमेश्वर ने उसे जो दिया वह जीवित और साँस लेते हुए जीवधारियों का संग्रह था—उनकी संख्या, विस्तार की उनकी गति, जीवित रहने की दशाएँ, उनके ऊपर चर्बी की मात्रा, इत्यादि—भी परमेश्वर के द्वारा नियन्त्रित था। यद्यपि इन जीवित प्राणियों के पास बोलने की योग्यता नहीं थी, परन्तु वे भी सृष्टिकर्ता के प्रबन्धन के भाग थे और परमेश्वर के प्रबन्धन का सिद्धांत उस आशीष के अनुसार था जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने अय्यूब से की थी। उन आशीषों के अंतर्गत जिन्हें परमेश्वर ने अब्राहम और अय्यूब को दिया था, हालाँकि जिसकी प्रतिज्ञा की गई थी वह अलग थी, फिर भी वह अधिकार जिसके द्वारा सृष्टिकर्ता सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों पर शासन करता है वह एक समान था। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य का प्रत्येक विवरण, अब्राहम और अय्यूब को दी गई उसकी अलग-अलग प्रतिज्ञाओं और आशीषों में प्रकट है, और यह एक बार फिर से मानवजाति को दिखाता है कि परमेश्वर का अधिकार मनुष्य की कल्पनाओं से अत्यधिक परे है। ये विवरण एक बार फिर मानवजाति को बताते हैं कि यदि वह परमेश्वर के अधिकार को जानना चाहता है तो यह केवल परमेश्वर के वचनों के द्वारा और परमेश्वर के कार्यों को अनुभव करने के द्वारा ही हो सकता है।

सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता मनुष्य को एक तथ्य देखने की अनुमति देती है : परमेश्वर का अधिकार, "परमेश्वर ने कहा कि उजियाला हो और उजियाला हो गया और आकाश बन जाए और आकाश बन गया और भूमि दिखाई दे और भूमि दिखाई देने लगी," न केवल इन वचनों में समाविष्ट है बल्कि, इसके अतिरिक्त, वह इस बात से भी प्रकट होता है कि उसने किस प्रकार उजियाले को कायम रखा, आकाश को विलुप्त होने से बचाए रखा और भूमि को हमेशा जल से अलग रखा, साथ ही साथ उस विवरण में भी है कि उसने किस प्रकार सृजित की गई चीज़ों : उजियाला, आकाश और भूमि के ऊपर शासन किया और उनका प्रबन्ध किया। परमेश्वर के द्वारा मानवजाति को दी गई आशीषों में तुम सब और क्या देखते हो? स्पष्ट रीति से, परमेश्वर के द्वारा अब्राहम और अय्यूब को आशीष दिए जाने के बाद परमेश्वर के कदम नहीं रुके, क्योंकि उसने तो बस अपने अधिकार का उपयोग करना प्रारम्भ ही किया था और वह अपने हर एक वचन को वास्तविकता बनाना चाहता था और इस प्रकार, आने वाले सालों में अपने हर एक विवरण को जिसे उसने कहा था साकार करने के लिए, वह लगातार सब कुछ करता रहा जिसकी उसने इच्छा की थी। क्योंकि परमेश्वर के पास अधिकार है, कदाचित् मनुष्य को ऐसा प्रतीत हो कि परमेश्वर को तो केवल बोलने की आवश्यकता है और बिना एक उंगली तक उठाए सब बातें और चीज़ें पूरी हो जाती हैं। इस प्रकार कल्पना करना काफी बकवास है! यदि तुम वचनों के इस्तेमाल से परमेश्वर द्वारा मनुष्यों के साथ ठहराई गई वाचा और वचनों के उपयोग से परमेश्वर द्वारा सभी चीज़ों की पूर्णता का केवल एक पक्षीय दृष्टिकोण लेते हो और तुम विभिन्न चिह्नों और तथ्यों को देखने में असमर्थ हो कि परमेश्वर का अधिकार सभी चीज़ों के अस्तित्व के ऊपर प्रभुता रखता है तो परमेश्वर के अधिकार की तुम्हारी समझ कहीं ज़्यादा खोखली और हास्यास्पद है! यदि मनुष्य परमेश्वर की इस प्रकार कल्पना करता है तो ऐसा कहना होगा कि परमेश्वर के विषय में मनुष्य का ज्ञान आखिरी पड़ाव में चला गया है और अंतिम छोर तक पहुँच चुका है, क्योंकि वह परमेश्वर जिसकी मनुष्य कल्पना करता है वह एक मशीन के सिवाए और कुछ नहीं है जो बस आदेश देता है और ऐसा परमेश्वर नहीं है जिस के पास अधिकार है। तुमने अब्राहम और अय्यूब के उदाहरणों के द्वारा क्या देखा है? क्या तुमने परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य का सच्चा पहलू देखा है? परमेश्वर के द्वारा अब्राहम और अय्यूब को आशीष देने के बाद, परमेश्वर वहाँ खड़ा न रहा जहाँ पर वह था, न ही उसने अपने सन्देशवाहकों को काम पर लगाकर यह देखने के लिए इन्तज़ार किया कि इसका परिणाम क्या होगा। इसके विपरीत, जैसे ही परमेश्वर ने अपने वचनों को कहा, तो परमेश्वर के अधिकार के मार्गदर्शन के अधीन, सभी चीज़ें उस कार्य के साथ मेल खाने लगीं जिसे परमेश्वर करना चाहता था और लोगों, चीज़ों और तत्वों को तैयार किया गया जिनकी परमेश्वर को आवश्यकता थी। कहने का तात्पर्य है कि जैसे ही परमेश्वर के मुख से वचन बोले गए, परमेश्वर के अधिकार पूरी भूमि पर इस्तेमाल होने लगा और उसने अब्राहम और अय्यूब से की गई प्रतिज्ञाओं को प्राप्त करने और उन्हें पूरा करने के लिए एक क्रम ठहरा दिया, इसी बीच उसने सब के लिए हर प्रकार की उचित योजना बनाई और तैयारियाँ की जिसे पूरा करने की उसने योजना बनाई थी जो हर एक कदम और हर एक मुख्य चरण के लिए जरूरी था। इस दौरान, परमेश्वर ने न केवल अपने दूतों को कुशलता से इस्तेमाल किया, बल्कि सभी चीज़ों को भी कुशलता से इस्तेमाल किया जिन्हें उसके द्वारा बनाया गया था। कहने का तात्पर्य है कि वह दायरा जिसके भीतर परमेश्वर के अधिकार को इस्तेमाल किया गया था उसमें न केवल दूत शामिल थे, वरन, वे सभी चीज़ें भी शामिल थीं, जिन्हें उस कार्य से अनुपालन करने के लिए कुशलता से उपयोग किया गया था जिसे वह पूरा करना चाहता था; ये वे विशेष रीतियाँ थीं जिनके तहत परमेश्वर के अधिकार का इस्तेमाल किया गया था। तुम लोगों की कल्पनाओं में, कुछ लोगों के पास परमेश्वर के अधिकार की निम्नलिखित समझ हो सकती है : परमेश्वर के पास अधिकार है, सामर्थ्‍य है और इस प्रकार परमेश्वर को केवल तीसरे स्वर्ग में रहने की ज़रूरत है या एक ही स्थिर जगह में रहने की जरूरत है और किसी विशेष कार्य को करने की जरूरत नहीं है, परमेश्वर का सम्पूर्ण कार्य उसके विचारों के भीतर ही पूरा होता है। कुछ लोग यह भी विश्वास कर सकते हैं कि यद्यपि परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दी थी, फिर भी परमेश्वर को और कुछ करने की जरूरत नहीं थी, और उसके लिए मात्र अपने वचनों को कहना ही काफी था। क्या ऐसा वास्तव में हुआ था? साफ तौर पर ऐसा नहीं हुआ था! यद्यपि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्‍य है, फिर भी उसका अधिकार सच्चा और वास्तविक है, खोखला नहीं। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की प्रामाणिकता और वास्तविकता धीरे-धीरे उसकी बनाई सभी चीज़ों कि उसके द्वारा सृष्टि, सभी चीज़ों पर उसके नियन्त्रण और उस प्रक्रिया में प्रकाशित और साकार हो रहे हैं, जिनके द्वारा वह मानवजाति की अगुवाई और उनका प्रबंधन करता है। हर पद्धति, हर दृष्टिकोण और मानवजाति और सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता का हर विवरण और वह सब कार्य जो उसने पूरा किया है, साथ ही सभी चीज़ों की उसकी समझ—उन सभी ने अक्षरश: यह साबित किया है कि परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य खोखले शब्द नहीं हैं। उसका अधिकार और सामर्थ्‍य निरन्तर और सभी चीज़ों में प्रदर्शित और प्रकाशित होते हैं। ये प्रकटीकरण और प्रकाशन परमेश्वर के अधिकार के वास्तविक अस्तित्व के बारे में बात करते हैं, क्योंकि वह अपने कार्य को जारी रखने और सभी चीज़ों को आज्ञा देने, हर घड़ी सभी चीज़ों पर शासन करने के लिए अपने अधिकार और सामर्थ्‍य का इस्तेमाल कर रहा है; उसके अधिकार और सामर्थ्‍य का स्थान स्वर्गदूत या परमेश्वर के दूत नहीं ले सकते। परमेश्वर ने निर्णय लिया कि वह किस प्रकार की आशीषों को अब्राहम और अय्यूब को देगा—यह परमेश्वर पर निर्भर निर्णय था। भले ही परमेश्वर के दूतों ने व्यक्तिगत रूप से अब्राहम और अय्यूब से मुलाकात की, फिर भी उनकी गतिविधियाँ परमेश्वर के आदेश अपर आधारित थीं, परमेश्वर के अधिकार के अधीन थीं और इसके समान ही दूत भी परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन थे। यद्यपि मनुष्य परमेश्वर के दूतों को अब्राहम से मिलते हुए देखता है, यहोवा परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से बाइबल के लेखों में कुछ करते हुए नहीं देखता है, वास्तव में, यह परमेश्वर स्वयं ही है जो अधिकार और सामर्थ्‍य का सचमुच में उपयोग करता है और यह किसी मनुष्य से कोई सन्देह बर्दाश्त नहीं करता! यद्यपि तुम देख चुके हो कि स्वर्गदूतों और दूतों के पास बड़ी सामर्थ्‍य होती है, उन्होंने चमत्कार किए हैं या परमेश्वर के आदेशानुसार कुछ चीज़ों को किया है, उनके कार्य मात्र परमेश्वर के आदेशों को पूरा करने के लिए होते हैं, किसी भी अर्थ में परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन नहीं हैं—क्योंकि किसी भी मनुष्य या वस्तु के पास सभी चीज़ों को बनाने और सभी चीज़ों पर शासन करने के लिए सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं है, न ही वे उन्हें धारण करते हैं। इस प्रकार कोई मनुष्य और वस्तु सृष्टिकर्ता के अधिकार का इस्तेमाल या उसे प्रकट नहीं कर सकता है।

सृष्टिकर्ता का अधिकार अपरिवर्तनीय है और उसका अपमान नहीं किया जा सकता है

तुम सबने पवित्र-शास्त्र के इन तीन अंशों में क्या देखा है? क्या तुम लोगों ने देखा कि परमेश्वर एक सिद्धांत के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है? उदाहरण के लिए, परमेश्वर ने मनुष्य के साथ वाचा बाँधने के लिए इंद्रधनुष का इस्तेमाल किया—उसने बादलों में एक इंद्रधनुष रखा जिससे मनुष्य को बता सके कि वह संसार को नाश करने के लिए फिर से जलप्रलय का इस्तेमाल कभी नहीं करेगा। जिस इंद्रधनुष को लोग आज देखते हैं क्या वह वही इंद्रधनुष है जो परमेश्वर के मुँह से निकला था? क्या उसका स्वभाव और अर्थ बदल चुका है? बिना किसी सन्देह के, यह नहीं बदला है। परमेश्वर ने इस कार्य को करने के लिए अपने अधिकार का इस्तेमाल किया था, वह वाचा जिसे उसने मनुष्य के साथ ठहराया था वह आज तक जारी है और इस वाचा को बदलने का समय निश्चय ही सिर्फ परमेश्वर के ऊपर निर्भर है। परमेश्वर के ऐसा कहने के बाद, "बादल में अपना धनुष रखा है," परमेश्वर ने आज तक इस वाचा को निभाया है। तुम इस में क्या देखते हो? यद्यपि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्‍य है, फिर भी वह अपने कार्यों में बहुत अधिक कठोर और सैद्धांतिक है और अपने वचनों का पक्का बना रहता है। उसकी कड़ाई और उसके कार्यों के सिद्धांत, सृष्टिकर्ता के अधिकार का अपमान न किए जाने की क्षमता को और सृष्टिकर्ता के अधिकार की अजेयता को दर्शाता है। यद्यपि उसके पास सर्वोच्च अधिकार है, सब कुछ उसके प्रभुत्व के अधीन है और यद्यपि उसके पास सभी चीज़ों पर शासन करने का अधिकार है, फिर भी परमेश्वर ने कभी भी अपनी योजना को नुकसान नहीं पहुँचाया है और न ही बाधा पहुँचाई है, जब भी वह अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है तो यह कड़ाई से उसके अपने सिद्धांतों के अनुसार होता है, ठीक उसके अनुसार होता है जो कुछ उसके मुँह से निकला था, वह अपनी योजना के चरणों और उद्देश्य का अनुसरण करता है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि जिन चीज़ों पर परमेश्वर शासन करता है वे भी सिद्धांतों का पालन करती हैं, उसके अधिकार के प्रबंधों से कोई मनुष्य या चीज़ छूटी नहीं है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल किया जाता है। परमेश्वर की निगाहों में, जिन्हें आशीषित किया जाता है वे उसके अधिकार द्वारा लाए गए अच्छे सौभाग्य को प्राप्त करते हैं और जो शापित हैं वे परमेश्वर के अधिकार के कारण दण्ड भुगतते हैं। परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता के अधीन, कोई मनुष्य या चीज़ उसके अधिकार के इस्तेमाल से बच नहीं सकती है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल किया जाता है। किसी भी कारक में परिवर्तन की वजह से सृष्टिकर्ता का अधिकार बदलता नहीं है और उसी प्रकार वे सिद्धांत जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल लिया जाता है किसी भी वजह से परिवर्तित नहीं होते हैं। भले ही स्वर्ग और पृथ्वी किसी बड़े उथल-पुथल से गुज़रें, परन्तु सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं बदलेगा; सभी चीज़ें विलुप्त हो सकती हैं, परन्तु सृष्टिकर्ता का अधिकार कभी गायब नहीं होगा। यह सृष्टिकर्ता के अपरिवर्तनीय और अपमान न किए जा सकने वाले अधिकार का सार है और यही सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

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