सृष्टिकर्ता का अधिकार समय, स्थान, या भूगोल के बंधन में नहीं है और उसका अधिकार गणना के परे है

06 अगस्त, 2018

आओ हम उत्पत्ति 22:17-18 को देखें। यह यहोवा परमेश्वर के द्वारा बोला गया एक और अंश है, जिसमें उसने अब्राहम से कहा, "इस कारण मैं निश्‍चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्‍चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।" यहोवा परमेश्वर ने अब्राहम को कई बार आशीष दी कि उसके वंश के लोग बहुगुणित होंगे—परंतु वे किस सीमा तक बहुगुणित होंगे? उस सीमा तक जितना पवित्र-शास्त्र में लिखा है : "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान।" कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर अब्राहम को आकाश के तारों के समान अनगिनत और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान बहुसंख्यक वंशज देना चाहता था। परमेश्वर ने अलंकृत भाषा का इस्तेमाल करते हुए बात कीऔर इस अलंकृत भाषा से यह देखना कठिन नहीं है कि परमेश्वर अब्राहम को मात्र एक, दो, या हज़ारों वंशज नहीं देगा, बल्कि असंख्य तादाद देगा, इतना कि वे जातियों का एक समूह बन जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर ने अब्राहम से प्रतिज्ञा की थी कि वो बहुत-सी जातियों का पिता होगा। और क्या उस संख्या का निर्धारण मनुष्य द्वारा किया गया था या परमेश्वर के द्वारा? क्या मनुष्य यह तय कर सकता है कि उसके पास कितने वंशज हों? क्या यह उस पर निर्भर है? यह मनुष्य के बस की बात नहीं है कि वह इस बात का निर्धारण कर सके कि उसके पास अनेक वंशज होंगे या नहीं, "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान" वंशज होने की तो बात ही छोड़ो। कौन ऐसी इच्छा न करेगा कि उसके संतान तारों के समान अनगिनत हों? दुर्भाग्यवश, चीज़ें वैसी घटित नहीं होती हैं जैसा तुम चाहते हो। चाहे मनुष्य कितना भी कुशल और योग्य हो, यह उस पर निर्भर नहीं करता है; कोई भी उस सीमा से बाहर खड़ा नहीं हो सकता है जिसे परमेश्वर द्वारा ठहरा दिया गया है। जितना वह तुम्हें अनुमति देता है, उतना ही तुम्हारे पास होगा : यदि परमेश्वर तुम्हें थोड़ा देता है, तब तुम्हारे पास कभी भी बहुत ज़्यादा नहीं होगा और यदि परमेश्वर तुम्हें बहुत ज़्यादा देता है तो तुम्हारे पास कितना अधिक है, इससे चिढ़ने का कोई फायदा नहीं। क्या ऐसा ही नहीं है? यह सब कुछ परमेश्वर पर है, मनुष्य पर नहीं! मनुष्य पर परमेश्वर द्वारा शासन किया जाता है और इससे कोई छूटा नहीं है।

जब परमेश्वर ने कहा, "मैं तेरे वंश को अनगिनत करूँगा" तो यह वह वाचा थी जो परमेश्वर ने अब्राहम के साथ बाँधी थी और इंद्रधनुष की वाचा के समान, इसे अनंतकाल के लिए पूरा किया जाएगा और यह परमेश्वर द्वारा अब्राहम को दी गई प्रतिज्ञा भी थी। केवल परमेश्वर ही ऐसी प्रतिज्ञा को पूरा करने में योग्य और सक्षम है। मनुष्य इस पर विश्वास करे या न करे, मनुष्य इसे स्वीकार करे या न करे, मनुष्य चाहे इसे किसी भी नज़रिए से देखे और इसे कैसे भी समझे, यह सब कुछ परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के अनुसार अक्षरशः पूरा हो जाएगा। मनुष्य की इच्छा और शरणा में हुए परिवर्तन के कारण परमेश्वर के वचन नहीं बदलेंगेऔर न ही किसी व्यक्ति, घटना, या वस्तु में हुए बदलाव के कारण ये बदलेंगे। सभी चीज़ें विलुप्त हो सकती हैं, परन्तु परमेश्वर के वचन सर्वदा बने रहेंगे। इसके विपरीत, जिस दिन सभी चीज़ें विलुप्त हो जाएँगी यह बिलकुल वही दिन होगा जब परमेश्वर के वचन सम्पूर्ण रीति से पूरे हो जाएँगे, क्योंकि वह सृष्टिकर्ता है, उसके पास सृष्टिकर्ता का अधिकार है, सृष्टिकर्ता की सामर्थ्‍य है, वह सब वस्तुओं और सम्पूर्ण जीवन शक्ति को नियन्त्रित करता है; वह शून्य से कुछ भी बना सकता है या किसी को भी शून्य बना सकता है और वह जीवित वस्तुओं से लेकर मृत वस्तुओं तक, सभी चीज़ों के रूपान्तरण को नियन्त्रित करता है; परमेश्वर के लिए, किसी व्यक्ति के वंश को बहुगुणित करने से अधिक आसान कुछ भी नहीं हो सकता है। यह सुनने में मनुष्य को परियों की कहानी के समान काल्पनिक लगता है, परन्तु जब परमेश्वर किसी कार्य को करने का निर्णय ले लेता है और उसे करने की प्रतिज्ञा करता है, तो यह काल्पनिक नहीं है और न ही यह परियों की कहानी है। बल्कि यह एक तथ्य है जिसे परमेश्वर ने पहले से ही देख लिया है और वह निश्चय घटित होगा। क्या तुम लोग इसे सराहते हो? क्या तथ्य प्रमाणित करते हैं कि अब्राहम के वंशज अनगिनत थे? और कितने अनगिनत थे? "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान" अनगिनत थे, जैसा कि परमेश्वर के द्वारा कहा गया था? क्या वे संसार में सब जातियों और प्रदेशों में फैल गए थे? और इस तथ्य को किसके द्वारा पूरा किया था? क्या यह परमेश्वर के वचनों के अधिकार के द्वारा पूरा किया गया था? परमेश्वर के वचनों के कहे जाने के सैकड़ों और हज़ारों सालों बाद भी परमेश्वर के वचन लगातार पूरे होते गए और निरन्तर तथ्य बनते रहे; यह परमेश्वर के वचनों की शक्ति और परमेश्वर के अधिकार की पहचान है। जब परमेश्वर ने आरंभ में सब वस्तुओं की सृष्टि की, परमेश्वर ने कहा उजियाला हो और उजियाला हो गया। यह बहुत जल्द हो गया और बहुत कम समय में ही पूरा हो गया और उसकी प्राप्ति और पूरे होने में कोई देरी नहीं हुई थी; परमेश्वर के वचन के प्रभाव तात्कालिक थे। दोनों ही परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन थे, परन्तु जब परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दी तो उसने मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार के सार के अन्य पहलू को देखने की मंजूरी दी और उसने मनुष्य को यह तथ्य देखने की अनुमति दी कि सृष्टिकर्ता का अधिकार गणना के परे है, और इसके अतिरिक्त, मनुष्य को सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक अधिक वास्तविक, अत्‍युत्तम पहलू देखने का अवसर प्रदान किया।

जब एक बार परमेश्वर के वचन बोल दिए जाते हैं तो परमेश्वर का अधिकार इस कार्य की कमान अपने हाथ में ले लेता है और वह तथ्य जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर के मुँह से की गई थी धीरे-धीरे वास्तविक होने लगता है। परिणामस्वरूप सभी चीज़ों में परिवर्तन होना शुरू हो जाता है, जैसे बसंत के आगमन पर घास हरी हो जाती है, फूल खिलने लग जाते हैं, पेड़ों में कोपलें फूटने लग जाती हैं, पक्षी गाना शुरू कर देते हैं, कलहँस लौट आते हैं, मैदान लोगों से भर जाते हैं...। बसंत के आगमन के साथ ही सभी चीज़ें नई हो जाती हैं और यह सृष्टिकर्ता का आश्चर्यकर्म है। जब परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है तो स्वर्ग और पृथ्वी में सब वस्तुएँ परमेश्वर के वचन के अनुसार नई हो जाती हैं और बदल जाती हैं—कोई भी इससे अछूता नहीं रहता है। जब परमेश्वर के मुँह से प्रतिबद्धता या प्रतिज्ञा के वचनों को बोल दिया जाता है, तो सभी चीज़ें उसे पूरा करने के लिए कार्य करती हैं, और उसकी पूर्णता के लिए कुशलता से कार्य करती हैं; सभी जीवधारियों को सृष्टिकर्ता के शासन के अधीन सावधानी से आयोजित और व्यवस्थित किया जाता है और वे अपनी-अपनी भूमिकाओं को निभाते हैं और अपने-अपने कार्य को करते हैं। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का प्रकटीकरण है। तुम इसमें क्या देखते हो? तुम परमेश्वर के अधिकार को कैसे जानते हो? क्या परमेश्वर के अधिकार का एक दायरा है? क्या कोई समय सीमा है? क्या इसे एक निश्चित ऊँचाई या एक निश्चित लम्बाई तक कहा जा सकता है? क्या इसे किसी कहा जा सकता है कि इसका कोई निश्चित आकार या शक्ति है? क्या इसे मनुष्य के आयामों के द्वारा नापा जा सकता है? परमेश्वर का अधिकार जलता-बुझता नहीं, ना ही वह आता-जाता है और कोई नहीं माप सकता कि उसका अधिकार कितना विशाल है। चाहे कितना भी समय बीत जाए, जब परमेश्वर किसी मनुष्य को आशीष देता है, तो यह आशीष बनी रहती है और इसकी निरन्तरता परमेश्वर के अपरिमेय अधिकार की गवाही देगीऔर मानवजाति को परमेश्वर के पुनः प्रकट होने वाले और कभी न बुझने वाली जीवन शक्ति को बार-बार देखने की अनुमति देगी। उसके अधिकार का प्रत्येक प्रकटीकरण उसके मुँह से निकले वचनों का पूर्ण प्रदर्शन है और इसे सब वस्तुओं और मानवजाति के सामने प्रदर्शित किया गया है। इससे अधिक, उसके अधिकार के द्वारा हासिल किया गया सब कुछ तुलना से परे उत्कृष्ट है और उस में कुछ भी दोष नहीं है। यह कहा जा सकता है कि उसके विचार, उसके वचन, उसका अधिकार और सभी कार्य जो वो पूरा करता है, वे अतुल्य रूप से एक सुन्दर तस्वीर हैं, जहाँ तक जीवधारियों की बात है, मानवजाति की भाषा उसके महत्व और मूल्य को बताने में असमर्थ है। जब परमेश्वर एक व्यक्ति से प्रतिज्ञा करता है तो चाहे वे जहाँ भी रहते हों या जो भी करते हों, प्रतिज्ञा को पूरा करने के पहले या उसके बाद की उनकी पृष्ठभूमि या उनके रहने के वातावरण में चाहे जितने बड़े उतार-चढ़ाव आए हों, यह सब कुछ परमेश्वर के लिए उतने ही चिरपरिचित हैं जितना उसके हाथ का पिछला भाग। परमेश्वर के वचनों को कहने के बाद कितना ही समय क्यों न बीत जाए, उसके लिए यह ऐसा है मानो उन्हें अभी-अभी बोला गया है। कहने का तात्पर्य है कि, परमेश्वर के पास सामर्थ्‍य है और उसके पास ऐसा अधिकार है, जिससे वह हर एक प्रतिज्ञा की जो वह मानवजाति से करता है, उनकी लगातार सुधि ले सकता है, उन पर नियन्त्रण कर सकता है और उन्हें पूरा कर सकता है, इससे निरपेक्ष कि प्रतिज्ञा क्या है, इसे सम्पूर्ण रीति से पूरा होने में कितना समय लगेगा, उसका वो दायरा कितना व्यापक है जिस पर उसकी परिपूर्णता असर डालती है—उदाहरण के लिए, समय, भूगोल, जाति, इत्यादि—इस प्रतिज्ञा को पूरा किया जाएगा और इसे साकार किया जाएगा और उसके पूरा होने या साकार होने में उसे ज़रा-सी भी कोशिश करने की आवश्यकता नहीं होगी। इससे क्या साबित होता है? यह साबित करता है कि परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की व्यापकता सम्पूर्ण विश्व और सम्पूर्ण मानवजाति को नियन्त्रित करने के लिए काफी है। परमेश्वर ने उजियाले को बनाया, इसका मतलब यह नहीं कि वह केवल उजियाले का ही प्रबन्धन करता है या यह कि वह जल का प्रबन्धन सिर्फ इसलिए करता है क्योंकि उसने जल बनाया और बाकी सब कुछ परमेश्वर से संबंधित नहीं है। क्या यह ग़लतफहमी नहीं होगी? यद्यपि सैकड़ों सालों बाद अब्राहम के लिए परमेश्वर की आशीषें धीरे-धीरे मनुष्य की यादों में धूमिल हो चुकी थीं, फिर भी परमेश्वर के लिए वह प्रतिज्ञा जस-की-तस बनी रही। यह तब भी पूरा होने की प्रक्रिया में था और कभी रूका नहीं था। मनुष्य ने न तो कभी जाना और न सुना कि परमेश्वर ने किस प्रकार अपने अधिकार का इस्तेमाल किया था और किस प्रकार सभी चीज़ों को आयोजित और व्यवस्थित किया था और इस दौरान परमेश्वर द्वारा सब वस्तुओं की सृष्टि के बीच कितनी ढेर सारी कहानियाँ घटित हुईं थीं, किन्तु परमेश्वर के अधिकार के प्रकटीकरण और उसके कार्यों के प्रकाशन के प्रत्येक बेहतरीन अंश को सभी चीज़ों तक पहुँचाया गया और उनके बीच गौरवान्वित किया गया था, सब वस्तुएँ सृष्टिकर्ता के अद्भुत कर्मों को दिखाती और उनके बारे में बात करती थी और सभी चीज़ों के ऊपर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता की प्रत्येक लोकप्रिय कहानी को सभी चीज़ों के द्वारा सदा-सर्वदा घोषित किया जाएगा। जिस अधिकार के तहत परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है और परमेश्वर की सामर्थ्‍य, सभी चीज़ों को दिखाते हैं कि परमेश्वर हर काल में हर जगह उपस्थित है। जब तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की सर्वउपस्थिति के साक्षी बन जाते हो तो तुम देखोगे कि परमेश्वर हर काल में, हर जगह उपस्थित होता है। परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य समय, भूगोल, स्थान, या किसी व्यक्ति, घटना या वस्तु के बंधन से परे है। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की व्यापकता मनुष्य की कल्पनाओं से परे हैः मनुष्य इसकी थाह नहीं पा सकता, यह मनुष्य के लिए अकल्पनीय है और मनुष्य इसे कभी भी पूरी तरह से नहीं जानेगा।

कुछ लोग अनुमान लगाना और कल्पना करना पसंद करते हैं, परन्तु एक मनुष्य की कल्पनाएँ कहाँ तक जा सकती हैं? क्या वह इस संसार के परे जा सकती है? क्या मनुष्य परमेश्वर के अधिकार की प्रामाणिकता और सटीकता का अनुमान लगाने और कल्पना करने में सक्षम है? क्या मनुष्य के अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त करने की अनुमति दे सकते हैं? क्या उनके ज़रिये मनुष्य परमेश्वर के अधिकार को समझकर सचमुच उसके प्रति समर्पण कर सकता है? तथ्य इस बात को साबित करते हैं कि मनुष्य के अनुमान और कल्पना मात्र मनुष्य की बुद्धिमत्ता की उपज हैं और मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार को जानने में ज़रा-सी भी मदद या लाभ नहीं पहुँचाते। विज्ञान की कल्पनाओं को पढ़ने के बाद, कुछ लोग चन्द्रमा और तारे किस प्रकार दिखते हैं उसकी कल्पना कर सकते हैं। फिर भी इसका मतलब यह नहीं है कि मनुष्य के पास परमेश्वर के अधिकार की कोई समझ है। मनुष्य की कल्पना बस ऐसी ही है : कोरी कल्पना। इन वस्तुओं के तथ्यों के विषय में, अर्थात, परमेश्वर के अधिकार से उनके संबंध के विषय में, उसके पास बिलकुल भी कोई समझ़ नहीं है। क्या हुआ यदि तुम चन्द्रमा तक गए भी हो तो? क्या इससे यह साबित हो जाता है कि तुम्हारे पास परमेश्वर के अधिकार की बहुआयामी समझ है? क्या यह दिखाता है कि तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य की व्यापकता की कल्पना करने में सक्षम हो? चूँकि मनुष्य का अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार को जानने देने में असमर्थ है तो मनुष्य को क्या करना चाहिए? अनुमान और कल्पना न करना ही सबसे उत्तम विकल्प होगा, कहने का तात्पर्य है कि जब परमेश्वर के अधिकार को जानने की बात आती है तो मनुष्य को कभी भी कल्पना पर भरोसा और अनुमान पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। मैं असल में यहाँ पर तुम सब से क्या कहना चाहता हूँ? परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान, परमेश्वर की सामर्थ्‍य, परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर के सार को अपनी कल्पनाओं पर भरोसा करके प्राप्त नहीं किया जा सकता है। जबकि तुम परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए कल्पनाओं पर भरोसा नहीं कर सकते हो, तो तुम किस रीति से परमेश्वर के अधिकार के सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकते हो? परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से, संगति से और परमेश्वर के वचनों के अनुभवों से यह किया जा सकता है। इस प्रकार, तुम्हारे पास परमेश्वर के अधिकार का एक क्रमिक अनुभव और प्रमाणीकरण होगा और इस प्रकार तुम उसकी एक क्रमानुसार समझ और निरन्तर बढ़ने वाले ज्ञान को प्राप्त करोगे। यह परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है; और कोई छोटा रास्ता नहीं है। तुम लोग कल्पना न करो कहने का अर्थ यह नहीं है कि तुम सबको शिथिलता से विनाश के इन्तज़ार में बैठा दिया गया है या तुम सबको कुछ करने से रोका गया है। सोचने और कल्पना करने के लिए अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल न करने का मतलब अनुमान लगाने के लिए अपने तर्क का इस्तेमाल न करना, विश्लेषण करने के लिए ज्ञान का इस्तेमाल न करना, विज्ञान को आधार के रूप में इस्तेमाल न करना, बल्कि समझना, जाँच करना और प्रमाणित करना है कि जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो उसके पास अधिकार है और प्रमाणित करना है कि वह तुम्हारी नियति के ऊपर प्रभुता रखता है और उसकी सामर्थ्‍य हर समय यह साबित करती है कि परमेश्वर के वचनों के द्वारा, सत्‍य के द्वारा, उन सबके द्वारा जिसका तुम अपने जीवन में सामना करते हो, वह स्वयं सच्चा परमेश्वर है। यही एकमात्र तरीका है जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की समझ को प्राप्त कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि वे इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक सरल तरीके की खोज करना चाहते हैं, किन्तु क्या तुम लोग ऐसे किसी तरीके के बारे में सोच सकते हो? मैं तुम्हें बताता हूँ, सोचने की आवश्यकता ही नहीं है : और कोई तरीके नहीं हैं! एकमात्र तरीका है कि हर एक वचन जिसे वह प्रकट करता है और हर एक चीज़ जिसे वह करता है उसके जरिए सचेतता और स्थिरता से जो परमेश्वर के पास है और जो वह है उसे जानो और प्रमाणित करो। यह परमेश्वर को जानने का एकमात्र तरीका है। क्योंकि जो परमेश्वर के पास है और जो वह है और परमेश्वर का सब कुछ, वह सब खोखला या खाली नहीं है, बल्कि वास्तविक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

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