10.10. परमेश्वर से प्रेम करने का अनुसरण कैसे करें पर
436. परमेश्वर का सार सिर्फ यह नहीं कहता है कि मनुष्य उसमें विश्वास करे, इससे अधिक यह कहता है कि मनुष्य उससे प्रेम करे। परंतु परमेश्वर में विश्वास करने वालों में से बहुत-से लोग यह “रहस्य” खोज पाने में अक्षम हैं। लोग परमेश्वर से प्रेम करने का साहस नहीं करते, न ही वे उसे प्रेम करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कभी खोजा ही नहीं कि परमेश्वर के विषय में प्रेम करने लायक कितना कुछ है; वे कभी यह पता ही नहीं लगा पाए कि परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मनुष्य से प्रेम करता है, और परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मनुष्य द्वारा प्रेम किए जाने के लिए है। परमेश्वर की सुंदरता उसके कार्य में अभिव्यक्त होती है : लोग उसकी सुंदरता को तभी खोज सकते हैं जब वे उसके कार्य का अनुभव करते हैं; केवल वास्तविकता में ही वे परमेश्वर की सुंदरता का अनुभव कर सकते हैं; और वास्तविक जीवन में इसका अनुभव और अवलोकन किए बिना कोई परमेश्वर की सुंदरता को नहीं खोज सकता। परमेश्वर के बारे में प्रेम करने के लिए इतना कुछ है, परंतु लोग उसके साथ वास्तव में जुड़े बिना इसे खोज पाने में अक्षम हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि परमेश्वर देहधारी नहीं हुआ होता, तो लोग वास्तव में उसके साथ जुड़ने में असमर्थ होते, और यदि वे उसके साथ वास्तव में नहीं जुड़ पाते, तो वे उसके कार्य को अनुभव भी नहीं कर पाते—और इसलिए परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम अनेक झूठों और कल्पनाओं से दूषित होता। स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति लोगों का प्रेम उतना व्यावहारिक नहीं है जितना कि पृथ्वी के परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम है, क्योंकि स्वर्ग के परमेश्वर के विषय में लोगों का ज्ञान उनकी कल्पनाओं पर आधारित है, बजाय उस पर आधारित होने के, जो उन्होंने अपनी आँखों से देखा है और जो उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तब लोग उसके व्यावहारिक कर्मों और उसकी सुंदरता को देख पाते हैं, और वे उसके व्यावहारिक और सामान्य स्वभाव का सब कुछ देख सकते हैं, जो पूरा का पूरा स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति उनके ज्ञान की तुलना में हजारों गुना अधिक व्यावहारिक है। स्वर्ग के परमेश्वर से लोग चाहे जितना भी प्रेम करते हों, इस प्रेम के विषय में कुछ भी व्यावहारिक नहीं है, और यह पूरी तरह मानवीय विचारों से भरा हुआ है। पृथ्वी पर परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम चाहे जितना भी कम क्यों न हो, यह प्रेम व्यावहारिक है; अगर यह बहुत थोड़ा-सा भी है, तो भी यह व्यावहारिक है। परमेश्वर व्यावहारिक कार्य के माध्यम से लोगों को स्वयं को जानने में सक्षम बनाता है, और इस ज्ञान के माध्यम से वह उनका प्रेम प्राप्त करता है। यह पतरस के समान है : यदि वह यीशु के साथ नहीं रहा होता, तो उसके लिए यीशु को चाह पाना असंभव होता। इसी तरह, यीशु के प्रति उसकी वफादारी भी यीशु से उसके जुड़ाव पर ही आधारित थी। चूँकि परमेश्वर मनुष्य से कहता है कि वह उससे प्रेम करे, इसीलिए वह स्वयं मनुष्यों के बीच आया है और मनुष्य के साथ रहता है, और वह मनुष्य को जो भी दिखाता और अनुभव कराता है, वही परमेश्वर की व्यावहारिकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे
437. “प्रेम,” जैसा कि कहा जाता है, ऐसे स्नेह को कहते हैं जो शुद्ध और निष्कलंक है, जहाँ तुम अपने हृदय का उपयोग प्रेम करने, महसूस करने और विचारशील होने के लिए करते हो। प्रेम में कोई शर्त, कोई बाधा और कोई दूरी नहीं होती। प्रेम में कोई संदेह, कोई कपट और कोई चालाकी नहीं होती। प्रेम में कोई लेन-देन नहीं होता और इसमें कोई मिलावट नहीं होती। यदि तुम प्रेम करते हो, तो तुम धोखा नहीं दोगे, शिकायत, विश्वासघात, विद्रोह नहीं करोगे, कुछ माँग रखने, कुछ पाने या किसी चीज की एक निश्चित मात्रा पाने की कोशिश नहीं करोगे। यदि तुम्हारे पास प्रेम है, तो खुशी-खुशी खुद को समर्पित करोगे और खुशी-खुशी कष्ट सहोगे, मेरे अनुरूप हो जाओगे और मेरे लिए अपना सर्वस्व त्याग दोगे, तुम अपना परिवार, अपनी संभावनाएँ, अपनी जवानी और अपना विवाह त्याग दोगे। वरना तुम्हारा प्रेम, प्रेम बिल्कुल नहीं होगा, बल्कि कपट और विश्वासघात होगा! तुम्हारा प्रेम किस प्रकार का है? क्या वह सच्चा प्रेम है? या वह झूठा प्रेम है? तुमने कितना त्याग किया है? तुमने कितना अर्पित किया है? मुझे तुमसे कितना प्रेम प्राप्त हुआ है? क्या तुम जानते हो? तुम लोगों का हृदय बुराई, विश्वासघात और कपट से भरा हुआ है—तो तुम लोगों के प्रेम में कितनी अशुद्धता है? तुम लोग सोचते हो कि तुमने पहले ही मेरे लिए पर्याप्त त्याग कर दिया है; तुम लोग सोचते हो कि मेरे लिए तुम लोगों का प्रेम पहले से ही पर्याप्त है। लेकिन फिर तुम लोगों के वचन और कार्य में हमेशा विद्रोहशीलता और कपट क्यों शामिल होते हैं? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, लेकिन तुम मेरे वचन को स्वीकार नहीं करते। क्या यह प्रेम है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, लेकिन फिर भी मुझे अस्वीकार कर देते हो। क्या इसे प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, लेकिन मुझ पर संदेह रखते हो। क्या इसे प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, लेकिन तुम मेरे अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पाते। क्या इसे प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी मेरे साथ मेरे अनुरूप व्यवहार नहीं करते और हर मोड़ पर मेरे लिए चीजें मुश्किल कर देते हो। क्या इसे प्रेम कहा जा सकता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, लेकिन मुझे मूर्ख बनाने और हर मामले में धोखा देने का प्रयास करते हो। क्या इसे प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरी सेवा करते हो, लेकिन तुम्हें मेरा खौफ नहीं है। क्या इसे प्रेम माना जाता है? तुम लोग हर तरह से और हर चीज में मेरा विरोध करते हो। क्या इनमें से कुछ भी प्रेम है? तुम लोगों ने बहुत-कुछ समर्पित किया है, यह सच है, लेकिन तुम लोगों ने उसका अभ्यास कभी नहीं किया, जो मैं तुम लोगों से चाहता हूँ। क्या यह प्रेम हो सकता है? ध्यानपूर्वक किया गया आकलन दर्शाता है कि तुम लोगों में मेरे लिए प्रेम का जरा-सा भी संकेत नहीं है। इतने वर्षों के कार्य और मेरे द्वारा आपूर्ति किए गए बहुत सारे वचनों के बाद, तुम लोगों ने वास्तव में कितना प्राप्त किया है? क्या यह सावधानी से पीछे मुड़कर देखने लायक नहीं है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बुलाए बहुत जाते हैं, पर चुने कुछ ही जाते हैं
438. परमेश्वर से प्रेम करने के सबक से ज्यादा गहरा कोई सबक नहीं है, और यह कहा जा सकता है कि जीवन भर के विश्वास से लोग जो सबक सीखते हैं, वह है परमेश्वर से प्रेम करना। कहने का अर्थ यह है कि यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें उससे प्रेम अवश्य करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर पर केवल विश्वास करते हो परंतु उससे प्रेम नहीं करते, और तुमने परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं किया है, और कभी भी अपने हृदय के भीतर से आने वाले सच्चे प्रेम से परमेश्वर से प्रेम नहीं किया है, तो परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ है; यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में तुम परमेश्वर से प्रेम नहीं करते, तो तुम व्यर्थ ही जी रहे हो, और तुम्हारा संपूर्ण जीवन सबसे अधम है। यदि अपने संपूर्ण जीवन में तुमने कभी परमेश्वर से प्रेम नहीं किया या उसे संतुष्ट नहीं किया, तो तुम्हारे जीने का क्या अर्थ है? और परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का क्या अर्थ है? क्या यह प्रयासों की बरबादी नहीं है? कहने का अर्थ है कि, यदि लोगों को परमेश्वर पर विश्वास और उससे प्रेम करना है, तो उन्हें एक क़ीमत अवश्य चुकानी चाहिए। बाहरी तौर पर किसी खास तरीके से कार्य करने का प्रयास करने के बजाय उन्हें अपने हृदय की गहराइयों में असली अंतर्दृष्टि की खोज करनी चाहिए। यदि तुम ढेर सारी ऊर्जा के साथ गा और नाच सकते हो, परंतु सत्य को अभ्यास में लाने में अक्षम हो, तो क्या तुम्हारे बारे में यह कहा जा सकता है कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो? परमेश्वर से प्रेम करने के लिए आवश्यक है सभी चीजों में उसके इरादों को खोजना, और जब तुम्हारे साथ कुछ घटित हो जाए, तो तुम अपने भीतर गहराई में खोज करो, परमेश्वर के इरादे समझने की कोशिश करो और देखो कि इन मामलों में वे क्या हैं, परमेश्वर तुमसे क्या हासिल करने के लिए कहता है और कैसे तुम्हें परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहना चाहिए। उदाहरण के लिए : कोई ऐसी चीज होती है जिसमें तुम्हें कष्ट उठाने की जरूरत पड़ती है, तो उस समय तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर का इरादा क्या है और कैसे तुम्हें उसके इरादों के प्रति विचारशील रहना चाहिए। तुम्हें स्वयं को संतुष्ट नहीं करना चाहिए : पहले अपने आप को छोड़ दो। देह से अधिक अधम कोई और चीज नहीं है। तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास करना चाहिए और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। ऐसे विचारों के साथ इस मामले के संबंध में परमेश्वर तुम्हें खास तौर से प्रबुद्ध करेगा और तुम्हारे हृदय को भी आराम मिलेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है
439. आज, तुम सभी लोग यह जानते हो कि परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास सिर्फ आत्मा के उद्धार और दैहिक कल्याण के लिए नहीं है, और न ही यह परमेश्वर से प्रेम करने के माध्यम से अपने जीवन को समृद्ध बनाने इत्यादि के लिए है। वर्तमान स्थिति में, यदि तुम परमेश्वर से प्रेम दैहिक कल्याण या क्षणिक आनंद के लिए करते हो, तो भले ही अंत में परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम अपने शिखर पर पहुँच जाए और तुम इससे ज्यादा और कुछ न माँगो, लेकिन तुम जिस प्रेम के लिए प्रयास करते हो वह अभी भी मिलावटी प्रेम ही है और परमेश्वर के लिए प्रसन्नतादायक नहीं है। जो लोग परमेश्वर से प्रेम करने का उपयोग अपने नीरस जीवन को समृद्ध बनाने और अपने हृदय के खालीपन को भरने के लिए करते हैं, वे उस तरह के लोग हैं जो आराम के लिए लालायित रहते हैं, न कि वे जो सच में परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार का प्रेम जबरदस्ती का प्रेम है, यह मानसिक सुख की खोज है और परमेश्वर को इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। तो फिर, तुम्हारा प्रेम किस तरह का है? तुम परमेश्वर से किसलिए प्रेम करते हो? अभी तुम्हारे भीतर परमेश्वर के लिए कितना सच्चा प्रेम है? तुम लोगों में से अधिकांश का प्रेम उपर्युक्त प्रकार का है। इस प्रकार का प्रेम सिर्फ यथास्थिति बरकरार रख सकता है; यह अपरिवर्तनीयता प्राप्त नहीं कर सकता, न ही यह मनुष्य में जड़ें जमा सकता है। इस प्रकार का प्रेम सिर्फ ऐसे फूल की तरह होता है, जो खिलता है पर फल दिए बिना ही मुरझा जाता है। दूसरे शब्दों में, जब तुम एक बार परमेश्वर से इस तरीके से प्रेम कर लेते हो, तब अगर तुम्हें इस मार्ग पर आगे ले जाने वाला कोई नहीं है तो तुम ढह जाओगे। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम करने के समय ही परमेश्वर से प्रेम कर सकते हो, लेकिन बाद में तुम्हारा जीवन स्वभाव अपरिवर्तित रहता है, तो फिर तुम अंधकार के प्रभाव के आवरण में रहोगे, इससे निकलने में असमर्थ रहोगे, और तुम शैतान के बंधन और उसके द्वारा मूर्ख बनाए जाने से खुद को मुक्त करने में असमर्थ रहोगे। इस तरह का कोई भी व्यक्ति परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त नहीं किया जा सकता; अंततः उसकी आत्मा, प्राण और शरीर शैतान के ही रहेंगे। इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता। जो लोग परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त नहीं किए जा सकते, वे सभी अपने मूल स्थान लौट जाएंगे, अर्थात् शैतान के पास लौट जाएंगे, और वे परमेश्वर के दंड का अगला चरण स्वीकार करने के लिए आग और गंधक की झील में उतर जाएंगे। परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने वाले वे होते हैं, जो शैतान के खिलाफ विद्रोह करते हैं और उसकी सत्ता से बच निकलते हैं। उन्हें राज्य के लोगों में आधिकारिक रूप से गिना जाता है। यहीं से राज्य के लोगों का प्रारंभ हुआ। क्या तुम इस प्रकार का व्यक्ति बनना चाहते हो? क्या तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाना चाहते हो? क्या तुम शैतान की सत्ता से बच निकलना और परमेश्वर के पास लौटना चाहते हो? क्या तुम अब शैतान के हो या राज्य के लोगों में से एक हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए
440. मनुष्य सदा अंधकार के प्रभाव के आवरण में रहा है, शैतान के प्रभाव में कैद रहा है, बच निकलने में असमर्थ रहा है और शैतान द्वारा संसाधित उसका स्वभाव उत्तरोत्तर भ्रष्ट होता जाता है। कहा जा सकता है कि मनुष्य सदा ही अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभाव के बीच रहा है और परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करने में असमर्थ है। ऐसे में, यदि मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, तो उसे अपनी आत्मतुष्टता, अभिमान, अहंकार, दंभ इत्यादि, वह सब कुछ उतार फेंकना चाहिए जो शैतान के स्वभाव का है। अन्यथा, उसका प्रेम मिलावटी प्रेम है, शैतानी प्रेम है और ऐसा प्रेम है जो कदापि परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सकता है। पवित्र आत्मा द्वारा प्रत्यक्ष रूप से पूर्ण बनाए जाने, तोड़े जाने, काट-छाँट किए जाने, अनुशासित किए जाने, ताड़ना दिए जाने और शोधन किए जाने बिना कोई भी परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करने में समर्थ नहीं है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है
441. जब लोग परमेश्वर से जुड़ने के लिए अपने हृदय का इस्तेमाल करते हैं, जब उनके हृदय पूरी तरह से उसकी ओर मुड़ने में सक्षम होते हैं, तो यह परमेश्वर के प्रति मानव के प्रेम का पहला कदम होता है। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हो, तो तुम्हें सबसे पहले उसकी ओर अपना हृदय मोड़ने में सक्षम होना होगा। परमेश्वर की ओर अपना हृदय मोड़ना क्या है? ऐसा तब होता है जब तुम अपने हृदय में जो कुछ भी खोजते हो, वह परमेश्वर से प्रेम करने और उसे पाने के लिए होता है। इससे पता चलता है कि तुमने पूरी तरह से अपना हृदय परमेश्वर की ओर मोड़ लिया है। परमेश्वर और उसके वचनों के अलावा तुम्हारे हृदय में लगभग कुछ नहीं होता (परिवार, धन, पति, पत्नी, बच्चे आदि)। यहाँ तक कि अगर है भी तो ऐसी चीजें तुम्हारे हृदय पर कब्जा नहीं कर सकतीं, और तुम अपने भविष्य की संभावनाओं के बारे में नहीं सोचते, केवल परमेश्वर से प्रेम का अनुसरण करने की ही सोचते हो। उस समय तुमने पूरी तरह से अपना हृदय परमेश्वर की ओर मोड़ दिया होगा। मान लो, तुम अब भी अपने हृदय में अपने लिए योजना बना रहे हो और हमेशा अपने निजी लाभ के लिए प्रयास करते रहते हो, और हमेशा सोचते हो कि : “मैं कब परमेश्वर से कुछ माँग सकता हूँ? कब मेरा परिवार धनी बनेगा? मैं कैसे कुछ अच्छे कपड़े प्राप्त कर सकता हूँ? ...” यदि तुम उस अवस्था में रह रहे हो, तो यह दर्शाता है कि तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ा है। यदि तुम्हारे हृदय में केवल परमेश्वर के वचन हैं और तुम हर समय परमेश्वर से प्रार्थना कर पाते हो और उसके करीब हो सकते हो—मानो वह तुम्हारे बहुत करीब हो, मानो परमेश्वर तुम्हारे भीतर हो और तुम उसके भीतर हो—यदि तुम उस तरह की अवस्था में हो, तो इसका मतलब है कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर की उपस्थिति में है। यदि तुम हर रोज़ परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और उसके वचनों को खाते और पीते हो, हमेशा कलीसिया के कार्य के बारे में सोचा करते हो, यदि तुम परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाते हो, अपने हृदय का उपयोग उससे सच्चा प्रेम करने और उसके हृदय को संतुष्ट करने के लिए करते हो, तो तुम्हारा हृदय परमेश्वर का होगा। यदि तुम्हारा हृदय अन्य कई चीजों में लिप्त है, तो उस पर अभी भी शैतान का कब्ज़ा है और वह सच में परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ा है। जब किसी का हृदय वास्तव में परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, तो उसमें परमेश्वर के लिए सच्चा, स्वाभाविक प्रेम होगा और वह परमेश्वर के कार्य पर विचार करने में सक्षम होगा। यद्यपि वे अज्ञानता और विवेकहीनता की अवस्थाओं में पड़ सकते हैं, फिर भी वे परमेश्वर के घर के हितों, उसके कार्य, और अपने स्वभाव में बदलाव के संबंध में विचार करने में सक्षम होंगे और उनका हृदय सही ठिकाने पर होगा। कुछ लोग हमेशा यह दावा करते हैं कि वे जो कुछ भी करते हैं, वह कलीसिया के लिए होता है; लेकिन वास्तव में वे अपने फायदे के लिए कार्य कर रहे हैं। ऐसे लोगों के इरादे गलत होते हैं। वे कुटिल और धोखेबाज हैं और वे जो अधिकांश चीज़ें करते हैं, वे उनके निजी लाभ के लिए होती हैं। इस तरह के व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास नहीं करते; उनका हृदय अब भी शैतान का है और वह परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ सकता। इसलिए परमेश्वर के पास ऐसे व्यक्ति को प्राप्त करने का कोई उपाय नहीं है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है
442. परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर किए जाने वाले कार्य का हर कदम बाहर से लोगों के बीच मेलजोल प्रतीत होता है, मानो यह मानवीय व्यवस्थाओं द्वारा या मानवीय विघ्न से उत्पन्न हुआ हो। किंतु, कार्य के प्रत्येक कदम, और घटित होने वाली हर चीज के पीछे शैतान द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई शर्त है और इनमें अपेक्षित है कि लोग परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब का परीक्षण हुआ : पर्दे के पीछे शैतान परमेश्वर के साथ शर्त लगा रहा था और अय्यूब को जिन चीजों का सामना करना पड़ा, वे लोगों के क्रियाकलाप और विघ्न थे। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों पर किए गए कार्य के हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ शर्त होती है—इसके पीछे एक लड़ाई होती है। उदाहरण के लिए, यदि तुम अपने भाइयों और बहनों के प्रति पूर्वाग्रह रखते हो, तो तुम्हारे पास ऐसे वचन होंगे जो तुम कहना चाहते हो—ऐसे वचन, जो तुम्हें परमेश्वर को अप्रसन्न करने वाले लगते हैं—किंतु अगर तुम उन्हें न कहो तो तुम्हें भीतर से बेचैनी महसूस होगी, और उस क्षण तुम्हारे भीतर एक संघर्ष शुरू हो जाएगा : “मैं बोलूँ या नहीं?” यही संघर्ष है। इस प्रकार तुम जिस भी चीज का सामना करते हो, उसमें एक लड़ाई होती है। जब तुम्हारे भीतर कोई लड़ाई होती है तो परमेश्वर तुम्हारे वास्तविक सहयोग और वास्तविक कष्ट के माध्यम से तुम पर कार्य करता है और तुम अंततः आंतरिक रूप से मामले को अलग रखने में सक्षम होगे और तुम्हारा क्रोध स्वाभाविक रूप से शांत हो जाएगा। यह परमेश्वर के साथ तुम्हारे सहयोग का परिणाम भी है। हर चीज जो लोग करते हैं, उसमें उनके हृदय के रक्त की निश्चित मात्रा की आवश्यकता होती है। बिना असली पीड़ा के वे परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर सकते; वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के करीब तक भी नहीं पहुँचते और केवल खोखले नारे लगा रहे होते हैं! क्या ये खोखले नारे परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं? जब परमेश्वर और शैतान आध्यात्मिक क्षेत्र में लड़ाई करते हैं, तो तुम्हें परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करना चाहिए और किस प्रकार उसके लिए गवाही में अडिग रहना चाहिए? तुम्हें यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है वह एक महान परीक्षण है और वह समय है जब परमेश्वर को गवाही के लिए तुम्हारी आवश्यकता है। हालाँकि ये बाहर से मामूली लग सकती हैं, किंतु जब ये चीजें होती हैं तो ये दर्शाती हैं कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो या नहीं। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, तो तुम उसके लिए अपनी गवाही में अडिग रह पाओगे और यदि तुमने परमेश्वर के प्रति प्रेम का अभ्यास नहीं किया है, तो यह दर्शाता है कि तुम वह व्यक्ति नहीं हो जो सत्य को अभ्यास में लाता है, तुम सत्य से रहित हो और जीवन से रहित हो, तुम भूसा हो! लोगों के साथ होने वाली हर बात में परमेश्वर चाहता है कि लोग उसके लिए अपनी गवाही में अडिग रहें। भले ही इस क्षण में तुम्हारे साथ कुछ बड़ा घटित न हो रहा हो, और तुम बड़ी गवाही नहीं देते, किंतु तुम्हारे जीवन का प्रत्येक विवरण परमेश्वर के लिए गवाही से जुड़ा है। यदि तुम अपने भाइयों और बहनों, अपने परिवार के सदस्यों और अपने आसपास के सभी लोगों की प्रशंसा प्राप्त कर सकते हो; यदि किसी दिन अविश्वासी आएँ और जो कुछ तुम करते हो उसकी तारीफ करें, और देखें कि जो कुछ परमेश्वर करता है वह अद्भुत है, तो यह तुम्हारी गवाही होगी। यद्यपि तुम्हारे पास कोई अंतर्दृष्टि नहीं है और तुम्हारी क्षमता कमज़ोर है, फिर भी परमेश्वर द्वारा तुम्हारी पूर्णता के माध्यम से तुम उसे संतुष्ट करने और उसके इरादों के प्रति विचारशील होने में समर्थ हो जाते हो और दूसरों को दर्शाते हो कि सबसे खराब क्षमता के लोगों पर उसने कितना महान कार्य किया है। जब लोग परमेश्वर को जान जाते हैं और शैतान के सामने विजेता और परमेश्वर के प्रति अत्यधिक वफादार बन जाते हैं, तब इस समूह के लोगों से अधिक दृढ़ता किसी में नहीं होती और यही सबसे बड़ी गवाही है। यद्यपि तुम महान कार्य करने में अक्षम हो, लेकिन तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम हो। अन्य लोग अपनी धारणाओं को एक ओर नहीं रख सकते, लेकिन तुम रख सकते हो; अन्य लोग अपने वास्तविक अनुभवों के दौरान परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते, लेकिन तुम परमेश्वर के प्रेम को चुकाने और उसके लिए ज़बर्दस्त गवाही देने के लिए अपने असल आध्यात्मिक कद और कार्यकलापों का उपयोग कर सकते हो। केवल इसी को परमेश्वर से वास्तव में प्रेम करना माना जाता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है
443. जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे सत्य से प्रेम करते हैं, और सत्य से प्रेम करने वाले इसे जितना अधिक अभ्यास में लाते हैं, उतना ही अधिक सत्य उनके पास होता है; वे उसे जितना अधिक अभ्यास में लाते हैं, उतना ही अधिक परमेश्वर का प्रेम उनके पास होता है; और वे जितना अधिक उसे अभ्यास में लाते हैं, उतना ही अधिक परमेश्वर उन्हें आशीष देता है। यदि तुम हमेशा इसी तरह अभ्यास करते हो, तो तुम्हारे प्रति परमेश्वर का प्रेम तुम्हें ठीक वैसे ही उत्तरोत्तर उसे देखने में सक्षम बनाएगा, जैसे पतरस परमेश्वर को जानने लगा था : पतरस ने कहा कि परमेश्वर के पास न केवल स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों का सृजन करने की बुद्धि है, बल्कि इससे भी बढ़कर, उसके पास लोगों पर व्यावहारिक कार्य करने की बुद्धि है। पतरस ने कहा कि परमेश्वर लोगों का प्रेम पाने के योग्य है तो केवल इसलिए नहीं कि उसने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ें बनाई हैं, बल्कि इससे भी बढ़कर इसलिए कि वह मनुष्य को सृजित करने, मनुष्य को बचाने, मनुष्य को पूर्ण बनाने और मनुष्य को अपना प्रेम प्रदान करने में सक्षम है। इसलिए, पतरस ने यह भी कहा कि परमेश्वर में बहुत कुछ है जो मनुष्य के प्रेम के योग्य है। पतरस ने यीशु से कहा : “क्या स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों का सृजन करना ही एकमात्र कारण है कि तुम लोगों के प्रेम के अधिकारी हो? तुममें और भी बहुत कुछ है, जो प्रेम करने के योग्य है। तुम वास्तविक जीवन में कार्य करते हो और कदम उठाते हो, तुम्हारा आत्मा मुझे भीतर तक स्पर्श करता है, तुम मुझे अनुशासित करते हो, तुम मुझे डाँट-फटकार लगाते हो—ये चीजें प्रेम पाने के और भी अधिक योग्य हैं।” यदि तुम परमेश्वर के प्रेम को देखना और अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें वास्तविक जीवन में टटोलना और तलाशना होगा और अपनी देह को एक तरफ रखने के लिए तैयार होना होगा। तुम्हें यह संकल्प अवश्य लेना चाहिए। तुम्हें एक ऐसा संकल्पबद्ध व्यक्ति होना चाहिए जो आलसी हुए बिना या देह के आनंदों की अभिलाषा किए बिना सभी चीजों में परमेश्वर को संतुष्ट कर पाए, जो देह के लिए न जिए बल्कि परमेश्वर के लिए जिए। शायद तुम परमेश्वर को इस बार संतुष्ट न करो, क्योंकि तुम परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते हो; अगली बार, भले ही तुम्हें थोड़ा प्रयास करना पड़े, तुम्हें उसे अवश्य संतुष्ट करना चाहिए, न कि तुम्हें देह को संतुष्ट करना चाहिए। जब तुम इस तरह अनुभव करोगे, तब तुम परमेश्वर को जानने लगे होगे। तुम देखोगे कि परमेश्वर स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजें बना सकता है, उसने देह धारण किया है ताकि लोग उसे वास्तविक और मूर्त तरीके से देख सकें और वह उनके साथ वास्तविक और मूर्त तरीके से जुड़ता है; तुम देखोगे कि वह मनुष्य के बीच चलने में सक्षम है और उसका आत्मा वास्तविक जीवन में लोगों को पूर्ण बना सकता है; तुम देखोगे कि यह सब लोगों को उसकी मनोहरता देखने और उसके अनुशासन, उसकी ताड़ना और उसके आशीषों का अनुभव करने की अनुमति देता है। यदि तुम हमेशा इसी तरह अनुभव करते रहते हो, तो तुम वास्तविक जीवन में परमेश्वर से अविभाज्य रहोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं रह जाता है, तो तुम धिक्कार और पश्चात्ताप महसूस कर पाओगे। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होगा, तो तुम परमेश्वर को कभी छोड़ना नहीं चाहोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर कहे कि वह तुम्हें त्याग देगा, तो तुम भयभीत हो जाओगे, और कहोगे कि परमेश्वर द्वारा त्यागे जाने के बजाय तुम मर जाना पसंद करोगे। जैसे ही तुम्हें इसका बोध होता है, तुम महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर को छोड़ पाने में असमर्थ हो, और इस तरह तुम्हारे पास एक नींव होगी, और तुम परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद लोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे
444. आखिर आज तुम परमेश्वर से कितना प्रेम करते हो? और जो कुछ भी परमेश्वर ने तुम पर किया है, उस सबके बारे में तुम आखिर कितना जानते हो? ये वे सबक हैं जो तुम्हें सीखने चाहिए। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है तो जो कुछ वह मनुष्य पर कर चुका है और मनुष्य को देखने दे चुका है वह सब इसलिए होता है ताकि मनुष्य उससे प्रेम करे और वास्तव में उसे जाने। मनुष्य परमेश्वर के लिए कष्ट सह पाता है और यहाँ तक आ पाया है तो यह एक ओर परमेश्वर के प्रेम के कारण है और दूसरी ओर परमेश्वर के उद्धार के कारण है; इससे भी अधिक, यह उस न्याय के कारण और ताड़ना के कार्य के कारण है जो परमेश्वर ने मनुष्य पर कार्यान्वित किया है। यदि तुम लोग परमेश्वर के न्याय, ताड़ना और परीक्षणों से रहित हो और यदि परमेश्वर ने तुम लोगों को कष्ट सहन नहीं कराया है तो तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम नहीं करोगे। मनुष्य पर परमेश्वर का कार्य जितना बड़ा होता है, उतनी ही बड़ी मनुष्य की पीड़ा होती है, उतना ही अधिक यह दिखाता है कि परमेश्वर का कार्य कितना अर्थपूर्ण है और उतना ही अधिक मनुष्य का हृदय परमेश्वर से सचमुच प्रेम कर पाता है। परमेश्वर से प्रेम करने का सबक कैसे हासिल होता है? कठिनाई और शोधन के बिना, पीड़ादायक परीक्षणों के बिना—और इसके अलावा, यदि परमेश्वर ने मनुष्य को बस अनुग्रह, प्रेमपूर्ण दयालुता और दया ही प्रदान की होती—तो क्या तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने के मुकाम तक पहुँच पाते? एक ओर, परमेश्वर के परीक्षणों के दौरान मनुष्य अपनी कमियाँ जान पाता है और देख पाता है कि वह तुच्छ, घृणित और निकृष्ट है, कि उसके पास कुछ नहीं है और वह कुछ नहीं है; तो दूसरी ओर, परीक्षणों के दौरान परमेश्वर मनुष्य के लिए कुछ परिवेशों का इंतजाम करता है ताकि उनमें मनुष्य परमेश्वर की मनोहरता का बेहतर अनुभव कर सके। यद्यपि पीड़ा अधिक होती है और कभी-कभी तो इससे उबरना असंभव हो जाता है—यहाँ तक कि यह हृदय-विदारक दुख तक पहुँच जाती है—परंतु इसका अनुभव करने के बाद मनुष्य देखता है कि उस पर परमेश्वर का कार्य कितना मनोहर है, और केवल इसी नींव पर मनुष्य में परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम का जन्म होता है। आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर के अनुग्रह, प्रेमपूर्ण दयालुता और उसकी दया मात्र से वह स्वयं को सही मायने में जान सकने में असमर्थ है, मनुष्य के सार को जानने में सक्षम तो वह बिल्कुल भी नहीं है, और केवल परमेश्वर के न्याय और शोधन दोनों के माध्यम से, और शोधन की प्रक्रिया के दौरान ही व्यक्ति अपनी कमियाँ जान सकता है, और यह जान सकता है कि उसके पास कुछ नहीं है। इस प्रकार, परमेश्वर के प्रति मनुष्य का प्रेम परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले शोधन और न्याय की नींव पर निर्मित होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो
445. आज अधिकतर लोगों के पास यह ज्ञान नहीं है। वे मानते हैं कि कष्ट सहने का कोई मूल्य नहीं है और दुनिया उन्हें ठुकरा देती है, उनका पारिवारिक जीवन अशांत रहता है, परमेश्वर उनसे प्रसन्न नहीं होता और उनका भविष्य अंधकारमय है। कुछ लोग तो एक निश्चित सीमा तक कष्ट सहते हुए मर ही जाना चाहते हैं। यह परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम नहीं है; ऐसे लोग कायर होते हैं, उनमें दृढ़ता नहीं होती है, वे रीढ़विहीन और अक्षम होते हैं! परमेश्वर उत्सुक है कि मनुष्य उससे प्रेम करे, परंतु मनुष्य जितना अधिक उससे प्रेम करता है, उसके कष्ट उतने अधिक बढ़ते हैं और जितना अधिक मनुष्य उससे प्रेम करता है, उसके परीक्षण उतने अधिक बढ़ते हैं। यदि तुम उससे प्रेम करते हो तो तुम्हारे ऊपर हर प्रकार के कष्ट आ पड़ेंगे—और यदि तुम उससे प्रेम नहीं करते, तब शायद सब कुछ तुम्हारे लिए सुचारु रूप से चलता रहेगा और तुम्हारे चारों ओर सब कुछ शांतिपूर्ण होगा। जब तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो तो तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर बहुत-कुछ अजेय है। और चूँकि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, इसलिए तुम्हारा शोधन किया जाएगा और तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ रहोगे—तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि परमेश्वर के इरादे बहुत ही ऊँचे हैं और वे मनुष्य की पहुँच से बाहर हैं। इन सबकी वजह से तुम्हारा शोधन किया जाएगा—क्योंकि तुममें बहुत कमजोरी है और तुम कई मायनों में परमेश्वर के इरादे पूरे करने में असमर्थ हो, इसलिए तुम्हारा भीतर से शोधन किया जाएगा। फिर भी तुम लोगों को यह स्पष्ट देखना चाहिए कि शुद्धिकरण केवल शोधन के द्वारा ही प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार, इन अंत के दिनों में तुम लोगों को परमेश्वर के लिए गवाही देनी चाहिए। चाहे तुम्हारे कष्ट कितने भी बड़े क्यों न हों, तुम्हें बिल्कुल अंत तक चलना चाहिए, यहाँ तक कि अपनी अंतिम साँस तक तुम्हें परमेश्वर के प्रति वफादार होना चाहिए और खुद को परमेश्वर के आयोजन की दया पर छोड़ देना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही सशक्त और गुंजायमान गवाही है। जब शैतान तुम्हें लुभाए, तो तुम्हें कहना चाहिए : “मेरा हृदय परमेश्वर का है, और परमेश्वर ने मुझे पहले ही प्राप्त कर लिया है। मैं तुम्हें संतुष्ट नहीं कर सकता—मुझे परमेश्वर को सही ढंग से संतुष्ट करना चाहिए।” तुम जितना अधिक परमेश्वर को संतुष्ट करोगे, परमेश्वर तुम्हें उतना ही अधिक आशीष देगा और परमेश्वर से प्रेम करने की तुम्हारी प्रेरणा उतनी ही अधिक हो जाएगी; तुम्हारे पास आस्था और संकल्प भी होंगे और तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर से प्रेम करने में बिताया गया जीवन सबसे मूल्यवान और सार्थक जीवन है। यह कहा जा सकता है कि जैसे ही तुम परमेश्वर से प्रेम करोगे, तुम दुख से मुक्त हो जाओगे। यद्यपि ऐसे समय होते हैं जब तुम्हारी देह कमजोर होती है और तुम्हें कई वास्तविक कठिनाइयाँ होती हैं, फिर भी यदि इन समयों के दौरान तुम वास्तव में परमेश्वर पर भरोसा करते हो तो तुम्हें सांत्वना मिलेगी और तुम अपनी आत्मा के भीतर सहज और समर्थित महसूस करोगे। इस तरह तुम कई स्थितियों से पार पाने में सक्षम होगे और तुम अपने द्वारा सहे जाने वाले कष्ट के कारण परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं करोगे। इसके बजाय तुम भजन गाना, नाचना और प्रार्थना करना, इकट्ठे होकर संगति करना और परमेश्वर को याद करना चाहोगे और तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे आस-पास के सभी लोग, घटनाएँ और चीजें, जिनकी परमेश्वर ने व्यवस्था की है, उपयुक्त हैं। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम नहीं करते, तो तुम जो कुछ भी देखोगे वह तुम्हारी पसंद का नहीं होगा और कुछ भी तुम्हारी आँखों को नहीं भाएगा; तुम्हें कोई रिहाई नहीं मिलेगी और तुम अपनी आत्मा के भीतर दबा हुआ महसूस करोगे और तुम हमेशा परमेश्वर के बारे में शिकायतें पालोगे और हमेशा महसूस करोगे कि तुम जो कष्ट सहते हो वह बहुत बड़ा है और तुम्हारे साथ बहुत बड़ा अन्याय हुआ है। यदि तुम खुशी की खातिर अनुसरण नहीं करते बल्कि परमेश्वर को संतुष्ट करने और शैतान द्वारा दोषी न ठहराए जाने के लिए अनुसरण करते हो, तो ऐसा अनुसरण तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने की एक बड़ी प्रेरणा देगा। जब तुम उस सबका अभ्यास करने में सक्षम होते हो जो परमेश्वर द्वारा बोला जाता है, और तुम जो कुछ भी करते हो वह परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम होता है, तो इसे वास्तविकता से युक्त होना कहा जाता है। परमेश्वर की संतुष्टि का अनुसरण करना अपने परमेश्वर-प्रेमी दिल का उसके वचनों को अभ्यास में लाने के लिए उपयोग करना है। चाहे जो भी समय हो, यहाँ तक कि जब दूसरे शक्तिहीन होते हैं तब भी तुम्हारे पास हमेशा एक परमेश्वर-प्रेमी दिल होता है और तुम अपने दिल की गहराई में परमेश्वर के लिए तरसते हो और उसे याद करते हो। यह वास्तविक आध्यात्मिक कद है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो
446. कड़वे शोधन के दौरान मनुष्य सबसे ज्यादा आसानी से शैतान के प्रभाव में आ सकता है, इसलिए ऐसे शोधन के दौरान तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? तुम्हें अपना हृदय परमेश्वर के समक्ष रखते हुए और अपना अंतिम समय परमेश्वर को समर्पित करते हुए अपना संकल्प जगाना चाहिए। परमेश्वर चाहे कैसे भी तुम्हारा शोधन करे, तुम्हें परमेश्वर के इरादों को पूरा करने के लिए सत्य को अभ्यास में लाने योग्य बनना चाहिए, और परमेश्वर को खोजने और संगति की कोशिश करने की जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए। ऐसे समय में जितने अधिक निष्क्रिय तुम होओगे, उतना ही आसान तुम्हारे लिए नकारात्मक बनना होगा और तुम्हारे लिए पीछे हटना उतना ही अधिक आसान हो जाएगा। जब तुम्हें अपनी भूमिका निभाने की जरूरत होती है, चाहे तुम उसे अच्छी तरह से न निभाओ, पर तुम वह सब करते हो जो तुम कर सकते हो, और तुम उसे पूरा करने के लिए अपने परमेश्वर-प्रेमी हृदय के अलावा और किसी चीज का प्रयोग नहीं करते; भले ही दूसरे कुछ भी कहें—चाहे वे यह कहें कि तुमने अच्छा किया है या यह कि तुमने खराब किया है—कुल मिलाकर, तुम्हारे इरादे सही हैं, और तुम आत्मतुष्ट नहीं हो, क्योंकि तुम परमेश्वर के लिए कार्य कर रहे हो। जब दूसरे तुम्हें गलत समझते हैं, तो तुम परमेश्वर से प्रार्थना करने और यह कहने में सक्षम होते हो, “परमेश्वर! मैं यह नहीं कहता कि दूसरे मुझे माफ कर दें या मुझसे अच्छा व्यवहार करें, न ही यह कि वे मुझे समझें और स्वीकार करें। मैं केवल यह माँगता हूँ कि मैं अपने हृदय से तुझसे प्रेम कर सकूँ, कि मैं अपने हृदय में शांत हो सकूँ, और कि मेरा जमीर शांत हो। मैं यह नहीं माँगता कि दूसरे मेरी प्रशंसा करें, या मेरा बहुत आदर करें; मैं केवल तुझे अपने हृदय से संतुष्ट करने का प्रयास करना चाहता हूँ। मैं वह सब करके, जो मैं कर सकता हूँ, अपनी भूमिका निभाता हूँ। यद्यपि मैं मूर्ख हूँ, और मुझमें काबिलियत की कमी है और मैं अंधा हूँ, फिर भी मैं जानता हूँ कि तू प्यारा है, और मैं वह सब कुछ तुझे अर्पित करने के लिए तैयार हूँ जो मेरे पास है।” जैसे ही तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो, तुम्हारे परमेश्वर-प्रेमी हृदय का उदय होता है, और तुम अपने हृदय में कहीं अधिक सहज महसूस करते हो। परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करने का यही अर्थ है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल शोधन का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है
447. शोधन के दौरान मनुष्य को परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? उसके शोधन को स्वीकार करने के लिए उससे प्रेम करने के संकल्प का प्रयोग करके : शोधन के दौरान तुम्हें भीतर से यातना दी जाती है, जैसे कोई चाकू तुम्हारे हृदय में घुमाया जा रहा हो, फिर भी तुम अपने परमेश्वर-प्रेमी हृदय का प्रयोग करके परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तैयार हो, और तुम देह की चिंता करने को तैयार नहीं हो। परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करने का यही अर्थ है। तुम भीतर से आहत हो, और तुम्हारी पीड़ा एक ख़ास बिंदु तक पहुँच गई है, फिर भी तुम यह कहते हुए परमेश्वर के समक्ष आने और प्रार्थना करने को तैयार हो, “परमेश्वर! मैं तुझे नहीं छोड़ सकता। यद्यपि मेरे भीतर अंधकार है, फिर भी मैं तुझे संतुष्ट करने के लिए तैयार हूँ; तू मेरे हृदय को जानता है और तू मुझमें अपना और अधिक प्रेम गढ़।” यह शोधन के समय का अभ्यास है। यदि तुम परमेश्वर-प्रेमी हृदय को नींव की तरह इस्तेमाल करोगे, तो शोधन तुम्हें परमेश्वर के और निकट लाकर परमेश्वर के साथ तुम्हारी घनिष्ठता बढ़ा सकता है। चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष सौंप देना चाहिए। यदि तुम अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित कर दो और उसे उसके सामने रख दो, तो शोधन के दौरान तुम निश्चित रूप से परमेश्वर को नहीं नकारोगे या छोड़ोगे। इस तरह परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध ज्यादा से ज्यादा घनिष्ठ और सामान्य हो जाएगा, और परमेश्वर के साथ तुम्हारी संगति ज्यादा बार-बार हो जाएगी। यदि तुम सदैव ऐसे ही अभ्यास करोगे तो तुम परमेश्वर की रोशनी में अधिक समय बिताओगे, और उसके वचनों के मार्गदर्शन में और अधिक समय व्यतीत करोगे, तुम्हारे स्वभाव में भी अधिक से अधिक बदलाव आएँगे, और तुम्हारा ज्ञान दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाएगा। जब वह दिन आएगा, जब परमेश्वर के परीक्षण अचानक तुम्हारे ऊपर आ जाएँगे, तो तुम न केवल परमेश्वर की ओर खड़े रह पाओगे, बल्कि परमेश्वर के लिए गवाही भी दे पाओगे। उस समय तुम अय्यूब और पतरस के समान होगे। जब तुमने परमेश्वर के लिए गवाही दी होगी, तो इसका अर्थ यह होगा कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो वास्तव में उससे प्रेम करता है, ऐसा व्यक्ति जो खुशी-खुशी उसके लिए अपना जीवन दे देगा और कि तुम परमेश्वर के गवाह हो और ऐसे व्यक्ति हो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है। जिस प्रेम ने शोधन का अनुभव किया है वह मजबूत होता है, नाज़ुक नहीं। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर तुम्हें कब या कैसे अपने परीक्षणों के अधीन करता है, तुम अपने जीवन का अनादर करने में सक्षम होते हो, परमेश्वर के लिए खुशी-खुशी सब कुछ त्याग देते हो और परमेश्वर के लिए खुशी-खुशी कुछ भी सह लेते हो, इस प्रकार तुम्हारा प्रेम शुद्ध होगा और तुम्हारी आस्था में वास्तविकता होगी। केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति बनोगे, जिसे सचमुच परमेश्वर द्वारा प्रेम किया जाता है, और जिसे सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल शोधन का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है
448. परमेश्वर मनुष्य का न्याय करता है और उसे ताड़ना देता है क्योंकि यह उसके कार्य की माँग है, और इससे भी बढ़कर, मनुष्य को इसकी आवश्यकता भी है। मनुष्य को ताड़ना दिए जाने और उसका न्याय किए जाने की आवश्यकता है, तभी वह परमेश्वर से प्रेम कर सकता है। आज, तुम लोग पूरी तरह से आश्वस्त हो चुके हो, लेकिन जैसे ही थोड़ी-सी मुश्किल आती है, तो तुम परेशान हो जाते हो; तुम्हारा आध्यात्मिक कद अभी भी बहुत छोटा है, और गहरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए तुम लोगों को अभी भी ऐसी ताड़ना और न्याय का अधिक अनुभव करने की आवश्यकता है। आज, तुम लोगों के पास थोड़ा-बहुत परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय है, और तुम परमेश्वर से डरते हो, और जानते हो कि वह सच्चा परमेश्वर है, परंतु तुम लोगों में उसके लिए ज्यादा प्रेम नहीं है, और तुमने उससे शुद्ध प्रेम तो किया ही नहीं है; तुम लोगों का ज्ञान बहुत ही सतही है, और तुम्हारा आध्यात्मिक कद अभी भी कम है। जब तुम लोग सचमुच किसी माहौल का सामना करते हो, तो तुम अब तक गवाही नहीं दे सके हो, तुममें सकारात्मक प्रवेश बहुत कम है, और तुममें अभ्यास करने की कोई समझ नहीं है। अधिकतर लोग नकारात्मक और निष्क्रिय होते हैं; वे केवल गुप्त रूप से अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम करते हैं, किंतु उनके पास अभ्यास का कोई तरीका नहीं होता, न ही वे अपने लक्ष्यों को लेकर स्पष्ट होते हैं। पूर्ण बनाए गए लोगों में न केवल सामान्य मानवता होती है, बल्कि उनमें ऐसे सत्य होते हैं जो अंतरात्मा के मापदंडों से बढ़कर होते हैं, और जो अंतरात्मा के मानकों से ऊँचे हैं। वे परमेश्वर के प्रेम का प्रतिफल देने के लिए न केवल अपनी अंतरात्मा का इस्तेमाल करते हैं, बल्कि, वे परमेश्वर को जान चुके होते हैं, यह देख चुके होते हैं कि परमेश्वर प्रिय है, कि वह मनुष्य के प्रेम के योग्य है और परमेश्वर में प्रेम करने योग्य बहुत कुछ है और मनुष्य उसे प्रेम किए बिना नहीं रह सकता। वे लोग जिन्हें पूर्ण बनाया जा चुका है उनका परमेश्वर के लिए प्रेम उनके व्यक्तिगत संकल्प को पूरा करने के लिए है। उनका प्रेम स्वैच्छिक है, एक ऐसा प्रेम जो बदले में कुछ भी नहीं चाहता, और जो सौदेबाज़ी नहीं है। परमेश्वर से उनके प्रेम का कारण उसके बारे में उनके ज्ञान को छोड़कर और कुछ भी नहीं है। ऐसे लोग यह परवाह नहीं करते कि परमेश्वर उन पर अनुग्रह करेगा कि नहीं, और वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के सिवा और किसी भी चीज से तृप्त नहीं होते हैं। वे परमेश्वर से शर्तों पर मोल-भाव नहीं करते, न ही वे परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को अंतरात्मा से मापते हैं : “तुमने मुझे दिया है, तो उसके बदले में मैं तुमसे प्रेम करता हूँ; यदि तुम मुझे कुछ नहीं देते, तो बदले में मेरे पास भी तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है।” जिन्हें पूर्ण बनाया गया है, वे हमेशा यह विश्वास करते हैं : “परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, और वह हम पर यह कार्य करता है। चूँकि मेरे पास पूर्ण बनाए जाने का यह अवसर, परिस्थिति और योग्यता है, इसीलिए एक अर्थपूर्ण जीवन बिताना ही मेरा लक्ष्य होना चाहिए, और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए।”
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
449. अपने जीवनकाल में पतरस ने सैकड़ों बार शोधन का अनुभव किया और वह बहुत-सी कष्टदायक तपन से होकर गुजरा। यह शोधन परमेश्वर के लिए उसके सर्वोच्च प्रेम की नींव बन गया और उसके संपूर्ण जीवन का सबसे अर्थपूर्ण अनुभव हो गया। वह परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखने में समर्थ हो पाया, एक अर्थ में यह परमेश्वर से प्रेम करने के उसके संकल्प के कारण था परंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह उस शोधन और पीड़ा के कारण था, जिससे होकर वह गुजरा। यह पीड़ा परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग पर उसकी मार्गदर्शक बन गई और ऐसी चीज बन गई जो उसके लिए सबसे अधिक यादगार थी। यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करते हुए शोधन की पीड़ा से नहीं गुजरते तो उनका प्रेम अशुद्धियों और अपनी स्वयं की पसंद से भरा होता है; ऐसा प्रेम शैतान के विचारों से भरा होता है और मूलतः परमेश्वर के इरादे पूरे करने में असमर्थ होता है। परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प रखना परमेश्वर से सच में प्रेम करने के समान नहीं है। भले ही वे अपने दिलों में जो सोचते हैं, वह सब परमेश्वर से प्रेम करने और उसे संतुष्ट करने की खातिर ही होता हो—वह किसी मानवीय विचार से रहित प्रतीत होता है, ऐसा प्रतीत होता है कि सब परमेश्वर की खातिर है—फिर भी जब परमेश्वर से प्रेम करने का ऐसा अभ्यास उसके सामने लाया जाता है तो वह उसे स्वीकृति या आशीष नहीं देता। भले ही लोग समस्त सत्यों को पूरी तरह से समझ लें और जान जाएँ तो भी इसे परमेश्वर से प्रेम करने की निशानी नहीं कहा जा सकता, यह नहीं कहा जा सकता कि इन लोगों में परमेश्वर से प्रेम करने की वास्तविकता है। शोधन से गुजरे बिना अनेक सत्यों को समझ लेने के बावजूद लोग इन सत्यों को अभ्यास में लाने में असमर्थ होते हैं; केवल शोधन के दौरान ही लोग इन सत्यों का वास्तविक अर्थ समझ सकते हैं, केवल तभी लोग वास्तव में उनके आंतरिक अर्थ का अनुभव कर सकते हैं। उस समय जब वे इन सत्यों का अभ्यास करते हैं, तब वे ऐसा सटीकता से और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप कर पाने में समर्थ होते हैं; उस समय उनके अभ्यास में उनके अपने विचार कम हो जाते हैं, उनकी भ्रष्टता घट जाती है और उनकी मानवीय भावनाएँ कम हो जाती हैं। केवल उसी समय उनका अभ्यास परमेश्वर के प्रति प्रेम की सच्ची अभिव्यक्ति होता है। परमेश्वर के प्रति प्रेम के सत्य का प्रभाव मौखिक ज्ञान या मानसिक इच्छा से हासिल नहीं होता है और न ही इसे केवल उस सत्य को समझने से हासिल किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि लोग एक मूल्य चुकाएँ, वे शोधन के दौरान बहुत पीड़ा से होकर गुजरें, केवल तभी उनका प्रेम शुद्ध और परमेश्वर के इरादों के अनुसार बनेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल शोधन का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है
450. पूर्ण बना दिए जाने के बाद, अपने जीवन का अंत निकट आने पर पतरस ने कहा, “परमेश्वर! अगर मैं कुछ वर्ष और जीवित रहता, तो मैं तेरा और ज्यादा शुद्ध और गहरा प्रेम हासिल करने की कामना करता।” जब वह क्रूस पर चढ़ाया जाने वाला था, तब उसने अपने दिल में प्रार्थना की, “परमेश्वर! अब तेरा समय आ गया है; तूने मेरे लिए जो समय तय किया था वह आ गया है। मुझे तेरे लिए क्रूस पर चढ़ना चाहिए, मुझे तेरे लिए यह गवाही देनी चाहिए और मुझे उम्मीद है कि मेरा प्रेम तेरी अपेक्षा पूरी करेगा और यह और ज्यादा शुद्ध बन सकेगा। आज तेरे लिए जान दे पाना और तेरे लिए क्रूस पर चढ़ाया जाना मुझे सुकून और शांति देता है, क्योंकि मैं तेरे लिए क्रूस पर चढ़ सकता हूँ और तेरी इच्छाएँ पूरी कर सकता हूँ। खुद को तुझे सौंपना और अपना जीवन तुझे अर्पित करना मुझे पूरी तरह से तृप्त कर रहा है। परमेश्वर! तू कितना प्यारा है! अगर तू मुझे जीने देता तो मैं तुझसे और भी अधिक प्रेम करना चाहता। जब तक मैं जीवित हूँ, मैं तुझसे प्रेम करता रहूँगा। मैं तुझसे और गहराई से प्रेम करना चाहता हूँ। तू इसलिए मेरा न्याय करता है, मुझे ताड़ना देता है और मेरा परीक्षण करता है क्योंकि मैं धार्मिक नहीं हूँ, क्योंकि मैंने पाप किया है। और तेरा धार्मिक स्वभाव मेरे लिए और अधिक स्पष्ट होता जाता है। यह मेरे लिए एक आशीष है, क्योंकि मैं तुझे और भी अधिक गहराई से प्रेम करने में सक्षम हूँ। अगर तू मुझसे प्रेम न भी करे तो भी मैं तुझसे इसी तरह से प्रेम करने को तैयार हूँ। मैं तेरा धार्मिक स्वभाव देखने का इच्छुक हूँ, क्योंकि यह मुझे अर्थपूर्ण जीवन जीने के और ज्यादा काबिल बनाता है। मुझे हमेशा लगता है कि अब मेरा जीवन और भी अधिक सार्थक है, क्योंकि मैं तेरी खातिर क्रूस पर चढ़ा हूँ और तेरे लिए मरना सार्थक है। लेकिन मैं अभी भी संतुष्टि महसूस नहीं करता, क्योंकि मैं तेरे बारे में बहुत थोड़ा जानता हूँ, मैं जानता हूँ कि मैं तेरी इच्छाएँ पूर्ण रूप से पूरी नहीं कर सकता और मैंने बदले में तुझे बहुत कम लौटाया है। अपने जीवन में मैं तुझे पूरी तरह से लौटाने में असमर्थ रहा हूँ; मैं उससे बहुत दूर हूँ। इस घड़ी पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मैं तेरा बहुत ऋणी महसूस करता हूँ और अपनी सारी गलतियों की भरपाई करने और सारे बकाया प्रेम को चुकाने के लिए मेरे पास यही एक घड़ी है।”
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
451. सभी लोगों को अर्थपूर्ण जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए और उन्हें अपनी वर्तमान परिस्थितियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। उन्हें पतरस की छवि को जीने की स्थिति में आना चाहिए और उनमें पतरस का ज्ञान और उसके अनुभव होने चाहिए। लोगों को उन चीजों का अनुसरण करना चाहिए जो उच्चतर और अधिक गहन हैं। उन्हें परमेश्वर के प्रति एक अधिक गहरे एवं अधिक शुद्ध प्रेम का अनुसरण करना चाहिए और एक ऐसे जीवन का अनुसरण करना चाहिए जिसका कोई मूल्य और अर्थ हो। सिर्फ यही जीवन है; केवल तभी वे पतरस के समान होंगे। तुम्हें सक्रिय रूप से सकारात्मक पक्ष में प्रवेश करने पर ध्यान देना चाहिए और तुम्हें इस कारण नकारात्मक नहीं हो जाना चाहिए और खुद को पीछे नहीं हटने देना चाहिए कि तुम अस्थायी आराम से संतुष्ट हो; साथ ही, तुम्हें अधिक गहन, अधिक विस्तृत और अधिक व्यावहारिक सत्यों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। तुम्हारे पास व्यावहारिक प्रेम होना चाहिए और तुम्हें इस पतनशील और बेपरवाह जीवन से खुद को मुक्त करने के लिए हर संभव उपाय ढूँढ़ना चाहिए, जो जानवरों के जीवन से अलग नहीं है। तुम्हें एक सार्थक जीवन, एक मूल्यवान जीवन जीना चाहिए और तुम्हें अपने-आपको मूर्ख नहीं बनाना चाहिए या अपने जीवन को कोई खिलौना नहीं समझना चाहिए, जिसके साथ खेला जा सके। हर उस व्यक्ति के लिए, जिसमें संकल्प है और जो परमेश्वर से प्रेम करता है, कोई भी सत्य अप्राप्य नहीं है और कोई ऐसा न्याय नहीं है जिसके लिए वह मजबूती से खड़ा न हो सके। तुम्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए और कैसे इस प्रेम का उपयोग उसके इरादे पूरे करने के लिए करना चाहिए? तुम्हारे जीवन में इससे बड़ा कोई मामला नहीं है। सबसे बढ़कर, तुममें इस तरह का संकल्प और दृढ़ता होनी चाहिए और तुम्हें रीढ़विहीन निर्बल नहीं होना चाहिए। तुम्हें सीखना चाहिए कि एक अर्थपूर्ण जीवन का अनुभव कैसे किया जाए और अर्थपूर्ण सत्यों का अनुभव कैसे किया जाए और उस तरह से अपने साथ लापरवाही से पेश नहीं आना चाहिए। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम्हारा जीवन गुजर जाएगा; उसके बाद भी क्या तुम्हारे पास परमेश्वर से प्रेम करने का ऐसा अवसर होगा? क्या मनुष्य मरने के बाद परमेश्वर से प्रेम कर सकता है? तुम्हारे अंदर वैसा ही संकल्प और जमीर होना चाहिए जैसा पतरस में था; तुम्हें एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए और अपने साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। एक मनुष्य के रूप में और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो परमेश्वर का अनुसरण करता है, तुम्हें सावधानीपूर्वक अपने जीवन पर विचार करना और उससे निपटना चाहिए—इस बात पर विचार करना चाहिए कि तुम्हें अपने-आपको परमेश्वर को कैसे अर्पित करना चाहिए, तुममें परमेश्वर के प्रति और अधिक अर्थपूर्ण आस्था कैसे होनी चाहिए और चूँकि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, इसलिए तुम्हें उससे कैसे उस तरीके से प्रेम करना चाहिए जो ज्यादा शुद्ध, ज्यादा सुंदर और ज्यादा अच्छा हो।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
452. यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, तो उन्हें परमेश्वर की सुंदरता का अनुभव करना चाहिए और परमेश्वर की सुंदरता को देखना चाहिए; केवल तभी उनमें एक परमेश्वर-प्रेमी हृदय और ऐसा हृदय जागृत हो सकता है जिससे वे स्वयं को लगन से परमेश्वर के लिए खपाने को प्रेरित हों। परमेश्वर लोगों को वचनों के माध्यम से या उनकी कल्पनाओं के माध्यम से अपने से प्रेम नहीं कराता, और न ही वह अपने से प्रेम करने के लिए उन्हें बाध्य करता है। इसकी बजाय वह उन्हें उनकी इच्छा से अपने से प्रेम करने देता है, और वह अपने कार्य और वचनों में उन्हें अपनी सुंदरता को देखने देता है, जिसके बाद उनमें परमेश्वर के प्रति प्रेम जन्म लेता है। केवल इसी तरह लोग सच्चे अर्थों में परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं। लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं तो इसलिए नहीं कि दूसरों ने उनसे ऐसा करने का आग्रह किया है, न ही यह कोई क्षणिक भावनात्मक आवेग होता है। वे परमेश्वर से इसलिए प्रेम करते हैं, क्योंकि उन्होंने उसकी सुंदरता देखी है, उन्होंने देखा है कि उसमें कितना कुछ है जो लोगों के प्रेम के योग्य है, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर का उद्धार, बुद्धि और आश्चर्यजनक कर्म देखे हैं—और परिणामस्वरूप, वे सचमुच परमेश्वर का गुणगान करते हैं, और सचमुच उसके लिए तड़पते हैं, और उनमें ऐसा जुनून उत्पन्न हो जाता है कि वे परमेश्वर को प्राप्त किए बिना जीवित नहीं रह सकते। जो सच्चे अर्थों में परमेश्वर की गवाही देते हैं, वे जबरदस्त तरीके से ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि उनकी गवाही परमेश्वर के सच्चे ज्ञान और उसके लिए सच्ची तड़प की नींव पर टिकी होती है। ऐसी गवाही किसी भावनात्मक आवेग के अनुसार उत्पन्न नहीं होती, बल्कि परमेश्वर और उसके स्वभाव के उनके ज्ञान के अनुसार दी जाती है। चूँकि वे परमेश्वर को जानने लगे हैं, इसलिए उन्हें लगता है कि उन्हें परमेश्वर की गवाही निश्चित रूप से देनी चाहिए, और उन सबको जो परमेश्वर के लिए तड़पते हैं, परमेश्वर को जानने, और परमेश्वर की सुंदरता एवं उसकी व्यावहारिकता से अवगत होने का अवसर मिलना चाहिए। परमेश्वर के प्रति लोगों के प्रेम की तरह उनकी गवाही भी स्वतः स्फूर्त होती है, उसमें वास्तविकता होती है और उसका वास्तविक महत्व एवं मूल्य होता है। वह निष्क्रिय या खोखली और अर्थहीन नहीं होती। जो परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हैं केवल उन्हीं के जीवन में सर्वाधिक मूल्य और अर्थ होता है और केवल वही लोग परमेश्वर में सचमुच विश्वास करते हैं, ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये लोग परमेश्वर के प्रकाश में रह पाते हैं और परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन के लिए जी पाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अंधकार में नहीं जीते, बल्कि प्रकाश में जीते हैं; वे अर्थहीन जीवन नहीं जीते, बल्कि परमेश्वर द्वारा धन्य किया गया जीवन जीते हैं। केवल वे जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, परमेश्वर की गवाही दे पाते हैं, केवल वे ही परमेश्वर के गवाह हैं, केवल वे ही परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाते हैं और केवल वे ही परमेश्वर के वादे विरासत में प्राप्त कर पाते हैं। वे जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, परमेश्वर के अंतरंग हैं; वे परमेश्वर के प्रिय लोग हैं और वे परमेश्वर के साथ आशीषों का आनंद ले सकते हैं। केवल ऐसे लोग ही अनंत काल के लिए जीवित रहेंगे और केवल वे ही हमेशा के लिए परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहेंगे। परमेश्वर लोगों द्वारा प्रेम किए जाने के लिए है और वह सभी लोगों द्वारा प्रेम किए जाने योग्य है, परंतु सभी लोग परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम नहीं हैं, न सभी लोग परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं और न ही परमेश्वर के साथ राज कर सकते हैं। चूँकि परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने वाले लोग परमेश्वर की गवाही दे पाते हैं और परमेश्वर के कार्य के लिए अपने सभी प्रयास समर्पित कर पाते हैं, इसलिए वे स्वर्ग के नीचे कहीं भी घूम सकते हैं और कोई उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं कर सकता, वे पृथ्वी पर राज कर सकते हैं और परमेश्वर के सभी लोगों पर शासन कर सकते हैं। ये लोग दुनिया भर से एक साथ आए हैं। वे दुनिया भर से आए लोग हैं जो अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं और उनकी त्वचा के रंग भिन्न-भिन्न हैं, परंतु उनके अस्तित्व का अर्थ एक ही है; उन सबके पास एक परमेश्वर-प्रेमी हृदय है, वे सब एक ही गवाही देते हैं और उनका एक ही संकल्प और एक ही इच्छा है। जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे पूरे संसार में निर्बाध घूम सकते हैं और जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, वे संपूर्ण ब्रह्मांड में यात्रा कर सकते हैं। वे परमेश्वर के प्रिय लोग हैं, वे परमेश्वर द्वारा धन्य किए गए लोग हैं और वे सदैव उसके प्रकाश में रहेंगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे