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पैंतीसवे कथन की व्याख्या

आजकल, सभी मनुष्य, विभिन्न मात्रा में, ताड़ना की स्थिति में प्रवेश कर चुके हैं। जैसे परमेश्वर ने कहा, "मैं मनुष्यों के साथ आगे बढ़ता हूं।" यह बिल्कुल सही है, लेकिन लोग अभी भी इस तथ्य को अच्छी तरह समझने में असमर्थ हैं। नतीजतन, उन्होंने जो काम किया है उसका कुछ हिस्सा अनावश्यक है। परमेश्वर ने कहा, "मैं उनकी कद-काठी के अनुसार उन्हें समर्थन देता हूँ और उनकी आवश्यकताएं पूरी करता हूं। क्योंकि मनुष्य मेरी संपूर्ण प्रबंधन योजना के मुख्य पात्र हैं, मैं "मानवता" की इस भूमिका में उन लोगों के लिए अधिक मार्गदर्शन प्रदान करता हूं ताकि वे तहेदिल से और अपनी सर्वोत्तम क्षमता के अनुसार अपनी भूमिका निभा सकें," और यह भी कहा, "लेकिन, मैं सीधे उनके अंतःकरण की आलोचना करने से इंकार करता हूं; बल्कि, मैं उन्हें धैर्यपूर्वक और व्यवस्थित तरीके से मार्गदर्शित करना जारी रखता हूं। आखिरकार, मनुष्य कमज़ोर और किसी कार्य को पूरा करने में असमर्थ है।" परमेश्वर की सोच कुछ इस प्रकार है: भले ही वह इन सभी मनुष्यों को नष्ट कर दे, पृथ्वी पर उसका कार्य उसकी मूल योजना के अनुसार फिर भी जारी रहेगा। परमेश्वर बेकार कार्य नहीं कर रहा है; वह जो कुछ करता है अच्छा करता है। जैसा कि पतरस ने कहा था, "अगर परमेश्वर मनुष्य के साथ खिलौने की तरह भी खेलता है, तो भी मनुष्य शिकायत कैसे कर सकेगा? उन्हें क्या अधिकार होगा?" क्या परमेश्वर ने आज मानवता के साथ यही नहीं प्राप्त करना चाहा है?[क] क्या मनुष्य वास्तव में यह विचार रख सकता है? कुछ हज़ार साल पहले का पतरस ऐसी बात क्यों कह सका, जबकि आज के उच्च-तकनीक, आधुनिक युग के "पतरस" यह नहीं कह सकते? मैं यह सुनिश्चित तरीके से कहने में असमर्थ हूँ कि इतिहास प्रगति कर रहा है या पीछे जा रहा है। चाहे विज्ञान ने एक कदम आगे बढ़ाया या पीछे हटाया है, अभी तक, एक ऐसा प्रश्न है जिसका कोईउत्तर नहीं दे सकता। मानवता में परमेश्वर ने जो कुछ किया है, वह सब कुछ उसे सकारात्मक बनाने के लिए और जीवन में विकसित करने के लिए किया है। क्या लोग इसे समझ नहीं सकते हैं? जो कुछ भी तुम्हें नकारात्मक बनाता है वह तुम्हारा कमज़ोर पहलू है; यह भेद्यता का एक महत्वपूर्ण बिंदु है, जो शैतान के हमलों के लिए खुला है। क्या तुम इस बात को समझे? परमेश्वर ने ऐसा क्यों कहा? "मैं उनसे पूरी ईमानदारी और सच्चाई से मिन्नत करता हूँ।" इन वचनों का क्या अर्थ है? परमेश्वर ने यह प्रश्न क्यों पूछा? इससे पता चलता है कि मानवता के कई नकारात्मक पहलू हैं, और केवल एक प्रकार का नकारात्मक कारक मनुष्यों को ठोकर दिलवाने के लिए पर्याप्त है। बेहतर होगा कि तुम देखो कि अपने नकारात्मक तरीके से जारी रखना तुम्हारे लिए क्या लेकर आएगा। परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह मानवता को परिपूर्ण करने के उद्देश्य से करता है। क्या इसके लिए अधिक स्पष्टीकरण की आवश्यकता है? मुझे ऐसा नहीं लगता! यह कहा जा सकता है कि मनुष्यों पर शैतान ने कब्ज़ा कर लिया है, लेकिन यह कहना बेहतर होगा कि मनुष्यों पर नकारात्मकता ने कब्ज़ा कर लिया है। इस तरह से मनुष्य स्वयं को अभिव्यक्त करते हैं; यह उनके शरीर का एक अंग है। इसलिए, वे सब अनजाने में नकारात्मकता में गिर चुके हैं, और इसके साथ ही, ताड़ना में। यह परमेश्वर द्वारा मानवता के लिए तैयार एक जाल है, और यही समय होता है जब मनुष्यों को चीज़ें सबसे अधिक परेशान करती हैं। क्योंकि लोग नकारात्मकता में रहते हैं, उनके लिए ताड़ना से दूर होना मुश्किल होता है। क्या इन दिनों चीज़ें ऐसी ही नहीं हैं? परन्तु मनुष्य परमेश्वर के वचनों को कैसे अनदेखा कर सकते हैं: "आजकल, शैतान ने बड़े पैमाने पर उधम मचा रखी है। क्यों नहीं मैं इस अवसर का लाभ उठाकर अपनी शक्ति को प्रकट करने के लिए अपने कार्य के केंद्र-बिंदु को दिखाऊँ?" जैसे ही मैं उन्हें याद दिलाने के लिए कुछ कहता हूं, कलीसियों के लोग तुरंत ताड़ना में पड़ जाते हैं। इसका कारण यह है कि परमेश्वर के कार्य के दो महीने बाद भी लोगों में कोई भी महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं आता है। वे केवल परमेश्वर के वचनों का अपने मन से विश्लेषण करते हैं। परंतु, वास्तविकता में, उनकी स्थिति में बिल्कुल परिवर्तन नहीं आया है; वे अभी भी नकारात्मक हैं। क्योंकि स्थिति यह है, जब परमेश्वर कहता है कि ताड़ना का समय आ गया है, तो लोग तुरंत परेशान हो जाते हैं, सोचते हैं:[ख] "मुझे नहीं पता है कि मैं परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत हूँ या नहीं, न ही मुझे पता है कि मैं उसकी ताड़ना में दृढ़ता से खड़ा हो पाऊँगा या नहीं। इससे भी कठिन है उन विधियों को जानना जिसका उपयोग करके परमेश्वर लोगों को ताड़ना देगा।" सभी मनुष्य ताड़ना से डरते हैं, फिर भी वे बदल नहीं पाते। वे केवल ख़ामोशी में पीड़ा सहते हैं, लेकिन इस बात से भी डरते हैं कि वे दृढ़ नहीं रह पाएंगे। ताड़ना और वचनों की यातना की अनुपस्थिति में, सभी मनुष्य अनजाने में ताड़ना की ओर फिसल चुके हैं। इसलिए, वे सभी घबराए हुए और अशांत हैं। इसे "जो बोया है वही काटोगे" कहा जाता है, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के कार्य को बिल्कुल भी नहीं समझते हैं। वास्तव में, इन लोगों पर किसी भी अन्य वचन को बर्बाद करने का परमेश्वर का कोई इरादा नहीं है; ऐसा लगता है कि परमेश्वर ने इनसे निपटने का एक अलग तरीका अपना लिया है, जो वास्तव में ताड़ना नहीं है। यह कुछ ऐसा है जैसे कोई व्यक्ति किसी मुर्गी के बच्चे को यह देखने के लिए उठाये कि यह मुर्गी है या मुर्गा; हो सकता है कि यह कोई बड़ी बात न लगे, लेकिन वह मुर्गी का बच्चा इतना डरा हुआ होगा कि वह भाग निकलने के लिए संघर्ष करेगा, मानो वह डरा हुआ हो कि मनुष्य उसे मारकर उसका मांस खा लेगा, क्योंकि मुर्गी के बच्चे को स्वयं के विषय में कोई ज्ञान नहीं है। कोई कैसे किसी ऐसे मुर्गी के बच्चे को मारकर खा सकता है जिसका वज़न कुछ ही ग्राम हो? क्या है यह बकवास नहीं है? यही बात परमेश्वर ने कही है: "लोग मुझसे लगातार क्यों बचते हैं? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि मैं उनके साथ मुर्गी के बच्चों की तरह व्यवहार करूंगा, जिसे पकड़े जाते ही मार दिया जाएगा?" इसलिए, मानव दुख सभी "निस्वार्थ" भक्ति है, और इसे भुगतान करने के लिए एक बेकार मूल्य कहा जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे स्वयं नहीं जानते कि उन्हें डर लगता है; नतीजतन, वे चेतावनी नहीं दे सकते। यह मानवता की कमज़ोरी है। परमेश्वर के कहे वचन, "अंत में, मनुष्य को स्वयं को जानने दो। यही मेरा अंतिम लक्ष्य है," क्या पुराने हो चुके हैं? वास्तव में कौन है जो स्वयं को जानता है? अगर कोई स्वयं को नहीं जानता, तो कौन उन्हें ताड़ना सहने का अधिकार देता है? उदाहरण के लिए, भेड़ के बच्चे को ले लो। अगर वे भेड़ नहीं बनते, तो उन्हें कैसे मारा जा सकता है? एक ऐसा पेड़ जिसने फल नहीं दिया हो, उसका आनंद मनुष्य कैसे ले सकते हैं? हर कोई "टीकाकरण" को बहुत महत्व देता है। इसलिए, सभी लोग उपवास का कार्य कर रहे हैं, और फिर उन्हें भूख लगने लगती है। जो बोया वही पाया का यह एक उदाहरण है; वे स्वयं विनाशकारी हैं। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर क्रूर या अमानवीय है। अगर एक दिन ऐसा आए जब मनुष्य अचानक स्वयं को जान जाएं और परमेश्वर के सामने भय से कांपने लगें, तो परमेश्वर उन्हें ताड़ना देना शुरू कर देगा। केवल इस तरह ही मनुष्य विनम्रतापूर्वक और स्वेच्छा से कठिनाइयों को गले लगाएंगे। परंतु, आज क्या होगा? लोगों को उनकी इच्छा के विरुद्ध ताड़ना प्राप्त होती है, जैसे बच्चों से खाना पकवाया जाता है। ऐसा कैसे हो सकता है कि लोग असहज महसूस नहीं करते हैं? हर कोई सोचता है, "अच्छा! जब तक मुझ पर ताड़ना की जा रही है, बेहतर होगा कि मैं तब तक अपने सिर को झुकाऊं और दोष स्वीकार कर लूँ! मैं क्या कर सकता हूँ? अगर मैं रो भी रहा हूं, तो भी मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करना है, तो मैं क्या कर सकता हूं? किसने मुझे सीधे इस रास्ते पर चलने के लिए कहा? ओह अच्छा! मैं स्वयं को अशुभ दुर्भाग्यपूर्ण मान लेता हूँ!" क्या लोग ऐसा नहीं सोचते हैं?

जैसा कि परमेश्वर ने कहा, "हर कोई अच्छा व्यवहार करता है, और कोई ऐसा नहीं जो विरोध करने की हिम्मत करता है। सभी मेरे मार्गदर्शन में हैं, उन कार्यों को करते हुए जो मैंने उन्हें सौंपे हैं।" निस्संदेह, एक भी ऐसा मनुष्य नहीं जो स्वेच्छा से ताड़ना प्राप्त करता है, और इसके अलावा, यह परमेश्वर से आता है, क्योंकि सभी मनुष्य अशांति और अराजकता के बजाय आराम से जीना चाहते हैं। परमेश्वर ने कहा, "कौन है जो मृत्यु से भयभीत नहीं? क्या लोग स्वयं का बलिदान करने के लिए सचमुच तैयार हैं?" यह बिल्कुल सही है; हर कोई मरने से डरता है, जब तक कि वह क्रोध या निराशा से भस्म न हो रहा हो। मानव का यही सार है, और यही है जिस पर नियंत्रण पाना सबसे कठिन है। आज परमेश्वर इसी दुर्दशा को हल करने के लिए आया है। सभी मनुष्य शक्तिहीन हैं, इसलिए परमेश्वर ने बहुत मेहनत करके उनके बीच आकर इस बीमारी के इलाज के लिए एक विशेषज्ञ अस्पताल स्थापित किया है। लोग इस फँसा देने वाली बीमारी से स्वयं को निकाल नहीं सकते हैं, यही कारण है कि वे इतने चिंतित रहते हैं कि उनके मुंह में सूजन हो जाती है, और उनके पेट बढ़ जाते हैं। समय के साथ उनके भीतर उपस्थित गैस की मात्रा बढ़ती रहती है, जिसके परिणामस्वरूप दबाव बढ़ जाता है। अंत में, उनका पेट फट जाता है और वे सभी मर जाते हैं। इसलिए, उस समय, परमेश्वर ने इस गंभीर मानवीय बीमारी का इलाज किया है, क्योंकि सभी की मृत्यु हो गई। क्या यह मानव स्थिति का इलाज नहीं है? परमेश्वर जानबूझकर इस कार्य को करने के लिए आया है। क्योंकि लोग मृत्यु से अत्यंत डरते हैं, परमेश्वर स्वयं उसी कार्य को मनुष्य की तरह करने के लिए आया है; क्योंकि उनमें बहुत कम साहस है, वह एक प्रदर्शन करने आया है ताकि वे देख सकें। इस मिसाल को देखने के बाद ही कोई व्यक्ति आज्ञा का पालन करने के लिए तैयार होता है। इस कारण से, परमेश्वर ने कहा, "क्योंकि कोई भी मेरा कार्य नहीं कर सकता था, मैंने युद्ध के मैदान में स्वयं पैर रखा है ताकि मैं शैतान के साथ जीवन और मृत्यु का संघर्ष कर सकूँ।" यह एक निर्णायक युद्ध है, तो या तो मछली मर जाएगी या जाल टूट जाएगा।[ग] यह निश्चित है। क्योंकि आत्मा अंत में जीत जाएगा, मौत का लक्ष्य देह होनी चाहिए। क्या तुम लोग इसका निहितार्थ समझते हो? परंतु, अतिसंवेदनशील मत बनना। शायद यह वाक्य सरल है, या शायद यह जटिल है। चाहे कुछ भी हो, मनुष्य अभी भी इसे नहीं समझ सकते। यह निश्चित है। मनुष्य, अपनी पीड़ा में, परमेश्वर के वचन का शोधन स्वीकार करते हैं; तो यह कहा जा सकता है कि उनका भाग्य अच्छा है। फिर भी यह उनके लिए दुर्भाग्यपूर्ण भी कहा जा सकता है। मैं फिर भी प्रत्येक व्यक्ति को याद दिलाना चाहूंगा, कि आखिरकार परमेश्वर का इरादा सही है, मनुष्यों के इरादों के विपरीत, जो हमेशा योजनाओं और स्वयं के लिए व्यवस्था करने के बारे में होते हैं। तुम्हें इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए, और अंतहीन चिंतन में नहीं डूबना चाहिए। क्या यह मनुष्यों की कमज़ोरी नहीं है? वे सभी इस तरह हैं; एक निश्चित हद तक परमेश्वर से प्रेम करने के बजाय, वे स्वयं से एक निश्चित हद तक प्रेम करते हैं। क्योंकि वह एक ऐसा परमेश्वर है जो मनुष्यों से ईर्ष्या करता है, वह हमेशा उनके सामने माँगें रखता है। जितना अधिक लोग स्वयं से प्यार करते हैं, उतना ही परमेश्वर चाहता है कि वे उससे प्रेम करें, और उनसे उसकी आवश्यकताएं उतनी ही सख्त बनती जाती हैं। ऐसा लगता है जैसे परमेश्वर इरादतन लोगों को चिढ़ा रहा है। अगर लोग वास्तव में उससे प्यार करते हैं, तो ऐसा लगता है कि उसे इसकी परवाह नहीं है। इस वजह से, जैसे-जैसे लोग चिंतन में पड़ते हैं, वैसे-वैसे वे सोच में पड़ जाते हैं और उनके कान खड़े हो जाते हैं। यह परमेश्वर के स्वभाव की कहानी है, केवल एक या दो चीज़ों का संक्षिप्त विवरण। यह परमेश्वर की इच्छा है। परमेश्वर चाहता है कि लोग यही जानें; यह आवश्यक है। यह एक नया कार्य है जिसके लिए तुम लोगों को मेहनत से कार्य करने की आवश्यकता है ताकि दीवार को तोड़ा जा सके और कुछ नई प्रगति की जा सके। क्या तुम इस बात को समझे? क्या तुम लोग चाहते हो कि इस विषय पर मैं कुछ अधिक कहूँ?

जहाँ तक पिछले युगों का प्रश्न है, परमेश्वर ने कहा, "मेरे द्वारा कभी भी किसी भी व्यक्ति को नहीं चुना गया; सभी को मेरी चुप्पी द्वारा ठुकराया गया। इसका कारण यह है कि अतीत में इन लोगों ने एकचित्त भक्ति के साथ मेरी सेवा नहीं की थी; इसलिए मैंने भी उन्हें विशेष रूप से प्रेम नहीं किया। उन्होंने शैतान के "उपहार" ले लिए और फिर मेरी तरफ़ पलटकर मुझे प्रस्तुत कर दिए; ऐसा करना क्या मेरे लिए निंदात्मक नहीं था?" इन वचनों को कैसे समझाया जा सकता है? जैसे परमेश्वर ने कहा: "सभी उपहार शैतान से उत्पन्न होते हैं।" प्रेरितों और नबियों की पिछली पीढ़ियां अपना कार्य करते हुए पूरी तरह से उनके उपहार पर निर्भर थीं, और सभी युगों में परमेश्वर ने अपने कार्यों का संचालन करने के लिए अपने उपहारों का उपयोग किया है। यही कारण है कि यह कहा जाता है कि उपहार वाले सभी लोगों की सेवा शैतान से आती है। परंतु, जैसा कि अपने ज्ञान के कारण परमेश्वर कहता है,[घ] "मैं शैतान की चाल को विफल करने के अवसर का इस्तेमाल कर रहा हूं"। इस प्रकार, परमेश्वर ने लोगों की सेवा को शैतान के उपहार के रूप में नाम दिया है। क्योंकि वे शैतान से संबंधित हैं, परमेश्वर उन्हें निंदात्मक कहता है। यह मनुष्यों के विरुद्ध एक आधारहीन आरोप नहीं है; यह एक अच्छी तरह स्थापित और उचित व्याख्या है। इसी कारण से उसने कहा है, "मैंने अपनी घृणा प्रकट नहीं की; बल्कि, मैंने उनकी चालाकियों को अपने लिए इस्तेमाल करते हुए अपने प्रबंधन के लिए उपयोग की जाने वाली सामग्रियों में उनकी "भेंटों" को जोड़ दिया। बाद में, जब मशीन द्वारा उन्हें संसाधित कर दिया जाता था, तो मैं सभी उत्पन्न कचरे को जला देता था।" परमेश्वर के कार्य के बारे में यही बात अद्भुत है। यह बात मानवीय विचारों के बहुत ही कम अनुरूप है, क्योंकि कोई नहीं सोचता कि राजा की तरह राज करने वाले उपहार वाले व्यक्ति नहीं होते हैं, बल्कि परमेश्वर उन्हें प्रेम करता है जो उपहार के बिना होते हैं। जैसा कि देखा जा सकता है, विटनेस ली और वॉचमैन नी के विचार या उम्मीदें आज राख बन गई हैं—और आज के दिन उपहार वाले लोग कोई अपवाद नहीं है। अब परमेश्वर ने अपना कार्य शुरू कर दिया है, और वह धीरे-धीरे उन मनुष्यों में से पवित्र आत्मा के कार्य को वापस ले रहा है जो उसके कार्य को विफल करते हैं। जब परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा, तो ये सभी लोग अपने मूल स्थान पर वापस लौट जाएंगे। परंतु, मैं मनुष्यों से आग्रह करता हूँ कि मैं जो कुछ कहूँ उसके परिणामस्वरूप अंधाधुंध कार्रवाई न करें। तुम्हें परमेश्वर के कार्यों के चरणों का अनुसरण करते हुए प्रवाह के साथ जाना चाहिए, ताकि तुम उसमें बाधा न डालो। क्या तुम इस बात को समझे? क्योंकि यह परमेश्वर के कार्य का चरण और तरीका है। जब परमेश्वर इन "उपहारों" को "तैयार उत्पादों" में "संसाधित" करता है, तो उसके सभी इरादे स्पष्ट हो जाएंगे, और वे सभी उपहार जो उसके लिए काम करते हैं, उन्हें हटा दिया जाएगा; परंतु, परमेश्वर के पास आनंद लेने के लिए तैयार उत्पाद होंगे। क्या तुम इस बात को समझे? परमेश्वर को तैयार उत्पाद चाहिए, न कि मनुष्यों द्वारा प्रदान किए गए कीमती उपहार। जब हर कोई अपनी टिकट संख्या के अनुसार एक सीट पर बैठ जाएगा, जिसका अर्थ है कि जब परमेश्वर अपनी मूल स्थिति में लौट जाएगा और शैतान भी अपनी सीट पर बैठ जाएगा, और फ़रिश्ते भी बैठ जाएंगे, बिना किसी अपवाद के—तभी एक प्रसन्न मुस्कान परमेश्वर के चेहरे पर दिखाई देगी, क्योंकि उसके इरादे संतुष्ट हो चुके होंगे, उसका लक्ष्य हासिल कर लिया गया होगा। परमेश्वर अब "शैतान" से "सहायता" नहीँ लेगा, क्योंकि परमेश्वर के इरादे खुले तौर पर मनुष्यों के सामने प्रकट हो चुके होंगे, और मनुष्यों को उन इरादों को फिर से बताने की आवश्यकता नहीं होगी। इस समय, उनका दैहिक शरीर उनके आत्माओं के साथ एक बन जाएगा। यही है जो परमेश्वर मनुष्यों के समक्ष प्रकट करता है; यह रूह, आत्मा और शरीर का अंतिम गंतव्य स्थल है। यह "मानवता" के मूल विचार का संक्षिप्तीकरण है। इसके लिए विस्तार से शोध की आवश्यकता नहीं है; इसके बारे में एक या दो बातें जानना काफ़ी है। क्या तुम समझे?

पादटीका:

क. मूल पाठ कुछ ऐसे है, "क्या यही नहीं है जो आज परमेश्वर ने मानवता के साथ प्राप्त किया है?"

ख. मूल पाठ में "सोचना" शब्द उपस्थित नहीं है।

ग. या तो मछली मर जाएगी या जाल टूट जाएगा: एक चीनी मुहावरा है, जिसका अर्थ है "जीवन और मृत्यु का संघर्ष"।

घ. मूल पाठ में "जैसा परमेश्वर कहता है" उपस्थित नहीं है।

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