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बाईसवें और तेईसवें कथन की व्याख्या

आज, सभी परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर के स्वभाव को जानने के इच्छुक हैं, फिर भी किसी को भी इस बात का कारण नहीं पता है कि क्यों वे अपनी इच्छाओं का पालन करने में अक्षम हैं, वे नहीं जानते हैं कि क्यों उनके हृदय हमेशा उनके साथ विश्वासघात करते हैं, और वे जो चाहते हैं उसे प्राप्त करने में क्यों असमर्थ रहते हैं। परिणामस्वरूप, वे एक बार फिर कुचलने वाली हताशा से घिर जाते हैं, फिर भी वे डरते भी हैं। इन परस्पर विरोधी भावनाओं को अभिव्यक्त करने में असमर्थ, वे केवल दुःख में अपने सिर को लटका सकते हैं और स्वयं से पूछते रह सकते हैं: क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर ने मुझे प्रबुद्ध नहीं किया है? क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर ने मुझे चुपके से त्याग दिया है? शायद हर कोई ठीक है, और परमेश्वर ने मुझे छोड़कर सभी को प्रबुद्ध कर दिया है। जब मैं परमेश्वर के वचनों को पढ़ता हूँ तो मैं हमेशा विक्षुब्ध क्यों महसूस करता हूँ, मैं कभी भी किसी चीज़ को क्यों नहीं समझ पाता हूँ? यद्यपि लोग मन ये बातें सोचते हैं, फिर भी कोई भी उन्हें व्यक्त करने का साहस नहीं करता है; वे केवल अंदर संघर्ष में लगे रहते हैं। वास्तव में, परमेश्वर के अलावा अन्य कोई भी उसके वचनों को समझने या उसकी सच्ची इच्छा को समझने में समर्थ नहीं है। फिर भी परमेश्वर हमेशा कहता है कि लोग उसकी इच्छा को समझें—क्या यह किसी को उस तरीके से करने के लिए बाध्य करने की कोशिश करने जैसा नहीं है जो उसकी क्षमता से परे हो? क्या परमेश्वर मनुष्य की असफलताओं से अनजान है? यह परमेश्वर के कार्य का चौराहा है, यही है जो लोगों की समझ में नहीं आता है, और इसलिए परमेश्वर कहता है, "मनुष्य प्रकाश के बीच जीता है, फिर भी वह प्रकाश की बहुमूल्यता से अनभिज्ञ है। वह प्रकाश के सार तथा प्रकाश के स्रोत से, और इसके अतिरिक्त, वह इस बात से अनजान है कि यह किस का है।" परमेश्वर के वचनों और वह मनुष्य से जो कहता है उसके अनुसार, कोई भी जीवित नहीं बचेगा, क्योंकि मनुष्य की देह में ऐसा कुछ भी नहीं है जो कि परमेश्वर के वचनों को स्वीकार कर रहा हो, इसलिए यदि लोग परमेश्वर के वचनों का पालन करने, परमेश्वर के वचनों की लालसा करने और उन्हें सँजोने, और परमेश्वर के कथनों के उन वचनों को जो मनुष्य कि स्थितियों की ओर इशारा करते हैं, उन्हें स्वयं के हालातों पर क्रियान्वित करने में समर्थ हैं और इस प्रकार स्वयं को जानते हैं, तो यह सर्वोच्च मानक है। जब राज्य अंततः साकार रूप लेता है, तो जो लोग शरीर में रहते हैं वे तब भी परमेश्वर की इच्छा को समझने में असमर्थ होंगे, और उन्हें तब भी परमेश्वर के व्यक्तिगत मार्गदर्शन की आवश्यकता होगी। यह सिर्फ इतना ही है कि लोग शैतान के हस्तक्षेप के बिना होंगे, और मनुष्य के सामान्य जीवन से सम्पन्न होंगे, जो कि शैतान को पराजित करने में परमेश्वर का उद्देश्य है, और मुख्य रूप से मनुष्य, जिसे परमेश्वर द्वारा सृजित किया गया था उसके मूल सार को पुनर्प्राप्त करने के लिए है। परमेश्वर के मन में, "देह" निम्नलिखित के संदर्भ में है: परमेश्वर के सार को जानने में अयोग्यता, आध्यात्मिक क्षेत्र के मामलों को देखने में अयोग्यता, और इसके अलावा, शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने किन्तु परमेश्वर के आत्मा द्वारा निर्देशित होने की भी योग्यता। यह परमेश्वर द्वारा सृजित देह का सार है। स्वाभाविक रूप से, यह उस अराजकता से बचने के लिए भी है जो मानवजाति के जीवन में व्यवस्था के अभाव के कारण है। परमेश्वर जितना अधिक बोलता है, और जितने अधिक तीक्ष्ण उसके वचन बन जाते हैं, लोग उतना ही अधिक उसके वचनों को समझते हैं। लोग अनजाने में परिवर्तित हो जाते हैं, और अनजाने में रोशनी में रहते हैं, और इस प्रकार "प्रकाश की वजह से, सभी लोग बढ़ रहे हैं, और उन्होंने अँधेरे को छोड़ दिया है।" यह राज्य का सुंदर दृश्य है, और उस तरह का है जो अतीत में प्रायः बोला गया था: "प्रकाश में रहना, मृत्यु से बचना"। जब पृथ्वी पर सिनिम साकार हो जाता है—जब राज्य साकार हो जाता है—तो पृथ्वी पर और युद्ध नहीं होगा, कभी भी, सूखा, महामारियाँ और भूकंप नहीं होंगे, लोग हथियारों का उत्पादन करना रोक देंगे, सभी शांति और स्थिरता में रहेंगे, और लोग और देश दोनों एक-दूसरे के साथ सामान्य रूप से बातचीत करेंगे। फिर भी वर्तमान की इससे कोई तुलना नहीं है। स्वर्ग के नीचे सब कुछ अराजकता में है, प्रत्येक देश में धीरे-धीरे तख़्तापलट की शुरूआत हो रही है। जैसे-जैसे परमेश्वर अपने कथनों को कहता है तो लोग धीरे-धीरे बदलते जा रहे हैं, और, आंतरिक रूप से, हर देश धीरे-धीरे तोड़ा जा रहा है। बेबीलोन की स्थिर नींव हिलना शुरू हो जाती है, जैसे कि कोई महल आकाश में पहुँच रहा हो, और जैसे ही परमेश्वर की इच्छा में बदलाव होता है, दुनिया में अचानक भारी बदलाव होते हैं, और किसी भी समय हर तरह के चिह्न प्रकट होते हैं, जो लोगों को दर्शाते हैं कि दुनिया के अंत का दिन आ गया है! यह परमेश्वर की योजना है, ये वे कदम हैं जिनके द्वारा वह कार्य करता है, और प्रत्येक देश निश्चित रूप से टुकड़ों में तोड़ दिया जाएगा, पुराने सदोम का दूसरी बार सर्वनाश किया जाएगा, और इस प्रकार परमेश्वर कहता है "संसार का पतन हो रहा है! बेबीलोन गतिहीनता में है!" स्वयं परमेश्वर के अलावा और कोई भी इसे पूरी तरह से समझने में सक्षम नहीं है; आख़िरकार, लोगों की जागरूकता की एक सीमा है। उदाहरण के लिए, आंतरिक मामलों के मंत्रियों को पता हो सकता है कि वर्तमान परिस्थितियाँ अस्थिर और अराजक हैं, किन्तु वे उनका समाधान करने में असमर्थ हैं। वे केवल धारा के संग बह सकते हैं, अपने हृदय में उस दिन की आशा करते हुए जब वे अपने सिर को ऊँचा रख पाएँगेहैं, लालसा करते हैं कि एक दिन आएगा जब सूर्य एक बार फिर से पूर्व में उगेगा, देश भर में चमकेगा और इस दुःखद हालत की कायापलट कर देगा। हालाँकि, उन्हें पता नहीं है कि जब सूर्य दूसरी बार उगता है, तो यह पुरानी व्यवस्था को बहाल करने के लिए नहीं है, बल्कि हालत को सुधारने और आद्योपांत परिवर्तन लाने के लिए है। पूरे ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर की योजना ऐसी ही है। वह एक नई दुनिया उत्पन्न करेगा, किन्तु सर्वोपरि, वह पहले मनुष्य को नया करेगा। आज, लोगों को परमेश्वर के वचनों में लाना ही महत्वपूर्ण है, ना कि केवल उन्हें हैसियत के आशीषों को प्राप्त करने की सिर्फ़ अनुमति देना। इसके अलावा, जैसा कि परमेश्वर कहता, "राज्य में, मैं राजा हूँ—किन्तु मेरे साथ अपने राजा के रूप में व्यवहार करने के बजाए, मनुष्य मेरे साथ ऐसे उद्धारकर्ता के रूप में व्यवहार करता है जो स्वर्ग से उतरा है। फलस्वरूप, वह लालसा करता है कि मैं उसे भीख दूँ, और मेरे बारे में ज्ञान की खोज नहीं करता है।" सभी लोगों की सच्ची स्थितियाँ ऐसी ही हैं। आज, जो महत्वपूर्ण है, वह है मनुष्य के तृप्त न होने वाले लालच को पूरी तरह से दूर करना, इस प्रकार बिना कुछ माँगे लोगों को परमेश्वर को जानने देना है; कोई आश्चर्य नहीं कि, तब परमेश्वर कहता है, "बहुत से लोगों ने मेरे सामने एक भिखारी की तरह पुकारा है; बहुत से लोगों ने मेरे सामने अपने "थैलों" को खोला है और उन्हें जीवित रहने हेतु भोजन देने के लिए मुझसे याचना की है।" ये विभिन्न स्थितियाँ लोगों के लालच को इंगित करती हैं, और ये दर्शाती हैं कि लोग परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हैं बल्कि परमेश्वर से माँग करते हैं, या अन्यथा उन चीजों को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं जिनकी वे लालसा करते हैं। लोगों की किसी भूखे भेड़िये जैसी प्रकृति है, ये सभी चालाक और लालची हैं, और इसलिए परमेश्वर बार-बार उनसे अपेक्षाएँ रखता है, उन्हें अपने हृदय के लालच को छोड़ने और ईमानदारी से परमेश्वर से प्यार करने के लिए बाध्य करता है। वास्तविकता में, आज तक, लोगों ने अभी तक अपना संपूर्ण हृदय परमेश्वर को नहीं दिया है, वे दो नावों की सवारी करते हैं, कभी-कभी स्वयं पर निर्भर होते हैं, कभी-कभी परमेश्वर पर पूरी तरह से भरोसा किए बिना परमेश्वर पर निर्भर होते हैं। जब परमेश्वर का कार्य एक निश्चित स्थिति तक पहुँचता है, तो सभी लोग सच्चे प्रेम और विश्वास के बीच रहेंगे, और परमेश्वर की इच्छा पूरी हो जाएगी; इस प्रकार, परमेश्वर की अपेक्षाएँ ऊँची नहीं हैं।

स्वर्ग और पृथ्वी के बीच जल्दी से चलते हुए और हर दिन आध्यात्मिक क्षेत्र में लौटने के बाद मानव दुनिया में उतरते हुए, स्वर्गदूत लगातार परमेश्वर के पुत्रों और लोगों के बीच गतिमान हो रहे हैं। यह उनका कर्तव्य है, और इस प्रकार हर दिन परमेश्वर के पुत्र और लोग चरवाही पाते हैं, और उनका जीवन धीरे-धीरे बदलता है, जिस दिन परमेश्वर अपना रूप बदलेगा, उस दिन पृथ्वी पर स्वर्गदूतों का कार्य आधिकारिक रूप से समाप्त हो जाएगा और वे स्वर्ग के क्षेत्र में लौट जाएँगे। आज, परमेश्वर के सभी पुत्र और लोग एकही स्थिति में हैं। जैसे-जैसे पल गुज़रते हैं, सभी लोग बदल रहे हैं, और परमेश्वर के पुत्र और लोग धीरे-धीरे अधिक परिपक्व हो रहे हैं। इसकी तुलना में, सभी विद्रोही भी बड़े लाल अजगर के सामने बदल रहे हैं: लोग बड़े लाल अजगर के प्रति अब और वफ़ादार नहीं हैं, और शैतान अब इसकी व्यवस्था का पालन नहीं करते हैं। इसके बजाय, सभी "चीज़ें अपने तरीके से कार्य करती हैं और उस मार्ग को चुनती हैं जो उनके लिए सबसे अनुकूल है।" इस प्रकार जब परमेश्वर कहता है, "पृथ्वी के राष्ट्रों का विनाश कैसे नहीं हो सकता है? पृथ्वी के राष्ट्रों का पतन कैसे नहीं हो सकता है?" तो स्वर्गलोग एक झटके में दबाते हुए नीचे आ जाता है। ... ऐसा लगता है मानो कि कोई अमंगलकारी भावना मानवजाति का अंत पहले से महसूस करवा रही हो। यहाँ भविष्यवाणी में कहे गए विभिन्न अमंगलसूचक निश्चित रूप से वही हैं जो बड़े लाल अजगर के देश में हो रहे हैं, और पृथ्वी पर रहने वाले लोगों में से कोई भी बच निकलने में सक्षम नहीं है। परमेश्वर के वचनों में ऐसी ही भविष्यवाणी की गई है। आज लोगों के पूर्वाभास में, वे महसूस करते हैं कि समय कम है, और ऐसा लगता है कि वे महसूस कर रहे हैं कि कोई आपदा उन पर पड़ने वाली है—मगर उनके पास बच निकलने का कोई साधन नहीं है, और इस प्रकार वे सभी बिना आशा के हैं। परमेश्वर कहता है, "जब मैं दिन प्रतिदिन अपने राज्य के 'भीतरी कक्ष' को सजाता हूँ, तो कोई भी कभी भी अचानक मेरी "कार्यशाला" में मेरे कार्य में बाधा डालने नहीं आया है।" वास्तव में, परमेश्वर के वचनों का अर्थ केवल लोगों को वचनों में परमेश्वर को ज्ञात करवाने में ही निहित नहीं है। सर्वोपरि, वे संकेत करते हैं कि परमेश्वर अपने कार्य के अगले हिस्से को पूरा करने के लिए विश्व भर में प्रत्येक दिन सभी तरह के घटनाक्रमों की व्यवस्था करता है। उसका "कोई भी कभी भी अचानक मेरी "कार्यशाला" में मेरे कार्य में बाधा डालने नहीं आया है" कहने का कारण यह है कि परमेश्वर दिव्यता में कार्य करता है, और भले ही लोग चाहते हैं, किन्तु वे उसके कार्य में सम्मिलित होने में अक्षम हैं। मैं पूछना चाहूँगा : क्या तुम समस्त ब्रह्मांड के घटनाक्रमों की व्यवस्था कर सकते हो? क्या तुम पृथ्वी पर लोगों से उनके पूर्वजों का अनादर करवा सकते हो? क्या परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए तुम विश्व भर में लोगों को निपुणता से संचालित कर सकते हो? क्या तुम शैतान से उपद्रव करवाने का कारण बन सकते हो? क्या तुम लोगों को महसूस करवा सकते हो कि दुनिया उजाड़ और खोखली है? लोग ऐसी चीज़ों को करने में असमर्थ हैं। अतीत में, जब शैतान के "कौशल" अभी पूरी तरह से क्रियान्वित किए जाने थे, तो शैतान परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में हमेशा हस्तक्षेप करता था; इस चरण में, शैतान की चालें चुक गई हैं, और इस प्रकार परमेश्वर शैतान को उसके सच्चे रंगों को दिखाने की अनुमति देता है ताकि सभी लोग उसे जान सकें। यही "किसी ने कभी भी मेरे कार्य में बाधा नहीं डाली है" वचन की सच्चाई है।

प्रत्येक दिन, चर्च के लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, हर दिन वे ऑपरेशन की मेज पर विश्लेषित किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, उपहास के वचन जैसे कि "अपना पद खोने," "बर्खास्त किए जाने," "उनका भय हल्का हो जाता है और मानसिक संतुलन पुनर्स्थापित हो जाता है," "परित्याग," "भावना" से शून्य इत्यादि उन्हें शर्म से गूँगा कर देते हैं; ऐसा लगता है मानो कि उनके पूरे शरीर का कोई भी अंग—सिर से पैर तक, अंदर से बाहर तक—परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं है। क्यों परमेश्वर के वचन लोगों की ज़िंदगी को उघाड़ कर इतना नग्न कर देते हैं? क्या परमेश्वर जानबूझकर लोगों के लिए चीजें मुश्किल कर रहा है? ऐसा लगता है मानो कि सभी लोगों के चेहरे कीचड़ से सने हों जिन्हें धोया नहीं जा सकता है। उनके सिर झुके हुए, हर दिन वे अपने पापों का विवरण देते हैं मानो कि वे घोटालेबाज़ हों। लोगों को शैतान ने इस हद तक भ्रष्ट कर दिया है कि उन्हें अपनी सच्ची स्थिति की पूरी जानकारी नहीं है। किन्तु परमेश्वर के लिए, शैतान का जहर उनके शरीर के हर अंग में है, यहाँ तक ​​कि उनकी अस्थि मज्जा में भी; परिणामस्वरूप, परमेश्वर का प्रकटन जितना अधिक होता है, लोग उतना ही अधिक भयभीत हो जाते हैं। इस प्रकार, सभी लोग शैतान को जान सकते हैं और मनुष्य में शैतान को देख सकते हैं, क्योंकि वे शैतान को अपनी नग्न आँखों से देखने में अक्षम हैं। और चूँकि सारी चीज़ों ने वास्तविकता में प्रवेश कर लिया है, इसलिए परमेश्वर मनुष्य के स्वभाव को उजागर करता है—जिसका अर्थ है, वह शैतान की छवि को उजागर करता है—और इस प्रकार मनुष्य को वास्तविक, मूर्तरूप शैतान को देखने की अनुमति देता है, जो उन्हें व्यावहारिक परमेश्वर को बेहतर ढंग से जानने में सहायता करता है। परमेश्वर देह में अपने को जानने की मनुष्य को अनुमति देता है, और शैतान को रूप देता है, इस प्रकार मनुष्य को सभी लोगों की देह में वास्तविक, मूर्तरूप शैतान को जानने की अनुमति देता है। ये विभिन्न स्थितियाँ शैतान के कर्मों की अभिव्यक्ति हैं। और इसलिए, यह कहना उचित है कि वे सभी जो देह के हैं शैतान की छवि के मूर्तरूप हैं। क्योंकि परमेश्वर अपने शत्रुओं के साथ असंगत है, क्योंकि वे एक दूसरे के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं, और दो अलग-अलग ताक़तें हैं, दुष्टात्माएँ दुष्टात्माएँ हैं, परमेश्वर परमेश्वर है, वे इतने असंगत हैं जैसे कि आग और पानी, और हमेशा इतने पृथक हैं जैसे स्वर्ग और पृथ्वी। जब परमेश्वर ने मनुष्य को सृजित किया, तो एक प्रकार के लोग स्वर्गदूतों की आत्माएँ थे; एक प्रकार के पास कोई आत्मा नहीं थी, इसलिए उन पर दुष्टात्माओं का अधिकार हो गया, और इसलिए उन्हें दुष्टात्माएँ कहा जाता है। अंततः, स्वर्गदूत स्वर्गदूत हैं, दुष्टात्माएँ दुष्टात्माएँ हैं—और परमेश्वर परमेश्वर है। प्रत्येक को प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किये जाने का यही अर्थ है, और इसलिए जब स्वर्गदूत पृथ्वी पर राज्य करते हैं और आशीषों का आनंद लेते हैं, तो परमेश्वर अपने निवास स्थान पर लौट जाता है, और बाकी—परमेश्वर के शत्रु—राख में बदल दिए जाते हैं। वास्तव में, बाह्यरूप से, सभी लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं—किन्तु इसका मूल उनके सार में रहता है; कैसे वे जिनकी प्रकृति स्वर्गदूतों वाली है परमेश्वर के हाथ से बच निकल सकते हैं और अथाह गड्ढे में गिर सकते हैं? और कैसे वे जिनकी प्रकृति दुष्टात्माओं वाली है कभी भी परमेश्वर को सचमुच प्यार कर सकते हैं? सार रूप में, ये लोग परमेश्वर से सचमुच प्यार नहीं करते हैं, इसलिए उन्हें राज्य में प्रवेश करने का अवसर कभी भी कैसे प्राप्त हो सकता है? दुनिया के सृजन के समय से ही सब कुछ परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित किया गया था, ठीक वैसे ही जैसे कि परमेश्वर कहता है, "मैं आँधी और बारिश के बीच आगे बढ़ता हूँ, और मैंने लगातार कई वर्ष मनुष्यों के बीच बिताए हैं, और इसका आज तक पालन किया जाता है। क्या ये मेरी प्रबंधन योजना के कदम नहीं हैं? किसने कभी मेरी योजना में वृद्धि की है? कौन मेरी योजना के चरणों से छूट कर अलग हो सकता है?" देह बनने के बाद, परमेश्वर को मनुष्य के जीवन का अनुभव अवश्य करना चाहिए, और क्या यह व्यावहारिक परमेश्वर का वास्तविक पक्ष नहीं है? मनुष्य की कमजोरी की वजह से परमेश्वर मनुष्य से कुछ भी नहीं छुपाता है; इसके बजाय, वह मनुष्य के लिए सत्य को प्रकट करता है, ठीक वैसे ही जैसे कि परमेश्वर कहता है, "मैंने लगातार कई वर्ष मनुष्यों के बीच बिताए हैं।" परमेश्वर के देहधारी परमेश्वर होने के कारण उसने पृथ्वी पर लगातार कई वर्ष बिताए हैं; तदनुसार, सभी तरह की प्रक्रियाओं से गुज़रने के बाद ही उसे देहधारी माना जा सकता है, केवल उसके बाद ही वह देह के भीतर दिव्यता में कार्य करने में सक्षम होता है। और फिर, केवल सभी रहस्यों को प्रकट करने के बाद ही वह अपने रूप को बदलेगा। यह "गैर-अलौकिक होने" का एक वैकल्पिक स्पष्टीकरण है, और सीधे परमेश्वर द्वारा निर्देशित किया जाता है।

लोगों को, बिना किसी बेपरवाही के, परमेश्वर के वचनों में से हर एक वचन की परीक्षा उत्तीर्ण करनी ही चाहिए—यह परमेश्वर का आदेश है!

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