20. मैंने परमेश्वर की वाणी सुनी है
मेरा नाम मैथ्यू है और मैं फ्रांस के लियॉन में एक कैथलिक परिवार में पैदा हुआ। मैंने दो साल से अधिक समय पहले सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकारा। सच कहूँ तो इससे मैंने उतना नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक हासिल किया है जितना मैं धार्मिक समाज में विश्वासी रहकर पिछले करीब दस सालों में कर पाया था। बचपन में, मेरी परवरिश एक पारंपरिक कैथलिक की तरह हुई जिसमें बपतिस्मा होना, मिस्सा में भाग लेना, सिर पर हाथ रखकर आशीष दिया जाना और तीर्थयात्रा पर जाना शामिल था। बड़े होने पर मुझे एहसास हुआ कि कैथलिक याजक हमेशा वही पुराने सिद्धांतों का प्रचार किया करते थे, कभी कोई नई बात नहीं बताते थे। माहौल ठंडा पड़ा रहता था और बहुत-से विश्वासियों की आस्था कमजोर पड़ चुकी थी। मुझे लगा कि इस जगह पवित्र आत्मा के कार्य का अभाव है, मुझे यहाँ जीवन प्राप्त नहीं हो सकता। ये मेरे लिए हताश करने वाली बात थी। मैं पवित्र आत्मा के कार्य वाली ऐसी कलीसिया के लिए तरस रहा था जहाँ मुझे प्रभु के होने का एहसास हो। ऐसी कलीसिया ढूँढ़ने के लिए मैंने कैथलिक धर्म छोड़ने का फैसला किया। उसके बाद मैं जिनेवा चला गया जहाँ मैंने यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की और एक स्थानीय ईसाई इंजील कलीसिया से जुड़ गया। मगर मुझे पता चला कि वहाँ पादरी केवल बाइबल के कुछ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का उपदेश देते हैं, कुछ नारे लगाते हैं, आध्यात्मिक गुणों और धर्मशास्त्र के सिद्धांतों की बातें करते हैं जो वास्तविकता से अलग होते हैं। इनसे मुझे प्रभु को जानने में न तो कोई प्रेरणा मिली और न ही मदद मिली। जिस बात ने मुझे और भी हैरान किया वह थी कि वहाँ प्रतिमा की पूजा होती थी। मुख्य पादरी की तस्वीर उपदेश मंच के पास ही थी, जब भी कोई नया सदस्य कलीसिया में आता तो स्थानीय पादरी उससे मुख्य पादरी की तस्वीर को नमस्कार करवाता था। पादरी हर दिन बाइबल की अपनी व्याख्याएँ विश्वासियों को भेजा करता था और भाई-बहन उन व्याख्याओं को अपनी रोजाना की रोटी की तरह देखते थे, मानो वे परमेश्वर के वचन पढ़ रहे हों। वे उनका अभ्यास भी परमेश्वर के वचनों की तरह ही करते थे। इससे मैं बहुत असहज हो जाता था। ये मुझे ठीक नहीं लगता था। मैं समझ गया कि इस कलीसिया में प्रभु नहीं है, इसलिए मैंने वह कलीसिया भी छोड़ दी। मैंने खुद से पूछा, “आखिर प्रभु है कहाँ?” मुझे आध्यात्मिक खालीपन महसूस होने लगा, मैंने सोचा कहीं प्रभु ने मुझे ठुकरा तो नहीं दिया। तब से मैं घर पर रहकर खुद बाइबल पढ़ने लगा। मैंने प्रकाशित-वाक्य के तीसरे अध्याय को खूब पढ़ा, जहाँ फिलाडेल्फिया की कलीसिया की बात हुई है उस अंश का मुझ पर बहुत गहरा असर पड़ा। “तू ने मेरे धीरज के वचन को थामा है, इसलिए मैं भी तुझे परीक्षा के उस समय बचा रखूँगा जो पृथ्वी पर रहनेवालों के परखने के लिए सारे संसार पर आनेवाला है। मैं शीघ्र ही आनेवाला हूँ; जो कुछ तेरे पास है उसे थामे रह कि कोई तेरा मुकुट छीन न ले। जो जय पाए उसे मैं अपने परमेश्वर के मन्दिर में एक खंभा बनाऊँगा, और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा” (प्रकाशितवाक्य 3:10-12)। इन पदों ने सच में मुझे खुश कर दिया क्योंकि ये रहस्य और वादों से भरे हुए थे। मैंने पाया कि प्रभु साफ-साफ कहता है कि परमेश्वर केवल एक कलीसिया को स्वीकृति देगा और वह फिलाडेल्फिया की कलीसिया है। मुझे लगा मानो प्रभु कह रहा हो, “मैं इस कलीसिया में हूँ।” इससे मेरे मन में यह सवाल आया : ये कलीसिया कहाँ है? आगे पढ़ने पर मैंने ये देखा : “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ” (प्रकाशितवाक्य 3:20)। मैं यह पढ़कर और भी रोमांचित हो गया कि प्रभु ने साफ-साफ कहा है कि वह दरवाज़े पर दस्तक देगा। मैं सोचने लगा कि वह वास्तव में कैसे दस्तक देगा और क्या इसका मतलब यह तो नहीं कि वह जल्द वापस आने वाला है। इससे मुझे काफी प्रबोधन मिला, मेरी खोजने की इच्छा और बढ़ गई।
1 मई 2018 की शाम को मैंने फिर से मन लगाकर परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मुझे प्रबुद्ध करो। मैं जानता हूँ तुम जल्द आ रहे हो। मेरी मदद करो ताकि मैं तुम्हारा इरादा समझ सकूँ।” अगले दिन मैं हमेशा की तरह काम पर निकल गया। दोपहर के खाने के समय मैं जिनेवा झील के किनारे जाकर एक बेंच पर बैठ गया। वहाँ थोड़ी दूर मुझे कोई दिखाई दिया तो मैं उसे सुसमाचार का प्रचार करने के इरादे से सीधे उसके पास चला गया। मुझे हैरानी हुई जब उसने मुझसे कहा, “भाई, पता है? प्रभु लौट आया है और उसने लाखों वचन व्यक्त किए हैं।” यह सुनकर मैं चौंक गया और सोचने लगा, “ये भाई ऐसा क्यों कह रहा है? क्या प्रभु वाकई लौट आया है?” जैसे-जैसे हमारी संगति बढ़ती गई, एक के बाद एक मेरे मन में सवाल उठने लगे, “क्या प्रभु लौट आया है? प्रभु कैसे वापस आया?” उसने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की वेबसाइट का पता दिया और कहा, “तुम इस बारे में यहाँ और जाँच कर सकते हो।”
दफ्तर में वापस आते ही मैंने सबसे पहले सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की वेबसाइट खोली। वेबसाइट खुलते ही मैंने पहली चीज यह देखी कि “अंत के दिनों का मसीह चीन में प्रकट हो चुका है।” इस खबर ने मुझे चौंका दिया, इससे भी बड़ी हैरानी की बात यह थी कि वेबसाइट पर सभी तरह की किताबें मौजूद थीं, इनमें वो दो किताबें भी थीं जिनका मुझ पर वाकई असर पड़ा था : “वचन देह में प्रकट होता है” और “अंत के दिनों के मसीह के कथन।” मैं इनके बारे में सब कुछ समझना चाहता था, इसलिए मैंने पहली किताब “वचन देह में प्रकट होता है” पर क्लिक कर उसका एक अंश पढ़ा : “मेरे सभी लोगों को जो मेरे सम्मुख सेवा करते हैं, अतीत के बारे में सोचना चाहिए कि क्या मेरे लिए तुम्हारे प्रेम में अशुद्धता थी? क्या मेरे प्रति तुम्हारी निष्ठा शुद्ध और सम्पूर्ण थी? क्या मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान सच्चा था? तुम लोगों के हृदय में मेरा स्थान कितना था? क्या मैंने तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से भर दिया? मेरे कितने वचन तुम लोगों के भीतर पूरे हुए? मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश मत करो! मैं ये सब बातें अच्छी तरह समझता हूँ! आज, जब मेरे उद्धार की वाणी व्यक्त होती है, तो क्या मेरे प्रति तुम लोगों के प्रेम में कुछ वृद्धि हुई है? क्या मेरे प्रति तुम लोगों की निष्ठा का कुछ भाग शुद्ध हुआ है? क्या मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान अधिक गहरा हुआ है? क्या अतीत की प्रशंसा ने तुम लोगों के आज के ज्ञान की एक मजबूत नींव डाली है? तुम्हारे भीतर मेरे आत्मा का कितना स्थान है? तुम लोगों के भीतर मेरी छवि को कितना स्थान दिया गया है? क्या मेरे कथनों ने तुम लोगों के मर्मस्थल पर चोट की है? क्या तुम लोग सचमुच महसूस करते हो कि अपनी लज्जा को छिपाने के लिए तुम लोगों के पास कोई स्थान नहीं है? क्या तुम्हें सचमुच लगता है कि तुम मेरे लोग होने के अपात्र हो? यदि तुम उपरोक्त प्रश्नों के प्रति पूर्णतः अनजान हो, तो यह दिखाता है कि तुम मौकापरस्त हो, तुम केवल संख्या बढ़ाने के लिए हो, मेरे द्वारा पूर्वनियत समय पर, तुम्हें निश्चित रूप से हटा दिया जाएगा और दूसरी बार अथाह कुंड में डाल दिया जाएगा। ये मेरे चेतावनी भरे वचन हैं, और जो कोई भी इन्हें हल्के में लेगा, उस पर मेरे न्याय की चोट पड़ेगी, और, नियत समय पर उस पर आपदा टूट पड़ेगी। क्या ऐसा ही नहीं है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 4)। ये वचन मुझे काफी अधिकारपूर्ण लगे, मानो खुद परमेश्वर मेरे सामने आकर बात कर रहा हो, मुझसे पूछ रहा हो : “क्या तुम मुझसे सच्चा प्रेम करते हो? क्या मेरे प्रति तुम्हारा समर्पण सच्चा है?” मैं थोड़ा असहज हो गया, क्योंकि मैं प्रेम के कारण नहीं बल्कि केवल कोई काम पूरा करने के लिए परमेश्वर की सेवा करता था। अपनी प्रार्थनाओं में मैं लगातार प्रभु के सामने अपनी माँगें रखता था, “हे परमेश्वर, मुझे ऐसी गाड़ी चाहिए, मुझे ऐसा घर चाहिए, मुझे ऐसी नौकरी चाहिए, मुझे ऐसी पत्नी चाहिए...।” मुझे एहसास हुआ कि यह सब अविवेकपूर्ण था। इससे भी बुरी बात, अगर प्रभु मेरी इन असंयत माँगों को पूरा नहीं करता, तो मैं उसके बारे में शिकायत करने लगता। इस तरह उजागर किए जाने पर मैं बहुत शर्मिंदा हुआ, इतना कि मैं कहीं जाकर छिप जाना चाहता था, उस बच्चे की तरह जो खराब बर्ताव के कारण अपने माँ-बाप की डाँट खाने से छिपता फिरता है। लेकिन मैं बहुत खुश भी था, क्योंकि मुझे लगा मानो परमेश्वर खुद सामने आकर मुझसे बात कर रहा हो। मैंने महसूस किया कि यह परमेश्वर की वाणी है, क्योंकि परमेश्वर ही इंसान के दिलों में झाँक सकता है। ये वचन मेरी असलियत उजागर कर रहे थे, मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मेरे पास बस पढ़ते जाने के सिवाय कोई चारा नहीं था। मैंने परमेश्वर के वचनों के बहुत-से अंश पढ़े। उनमें से एक अंश मुझे याद है जिसका मुझ पर वास्तव में गहरा असर पड़ा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मैं ऊपर से सारी चीजों को देखता हूँ, और ऊपर से सभी चीजों पर अपने प्रभुत्व का प्रयोग करता हूँ। ठीक इसी तरह, मैंने अपना उद्धार कार्य पृथ्वी पर किया है। ऐसा एक भी क्षण नहीं होता है जब मैं अपने गुप्त स्थान से, इंसान की हर गतिविधि और सब कुछ जो वे कहते और करते हैं उस पर नजर नहीं रखता हूँ। इंसान मेरे लिए एक खुली किताब है : मैं उन सभी को देखता और जानता हूँ। गुप्त स्थान मेरा निवास है और स्वर्ग का संपूर्ण विस्तार वह जगह है जहाँ मैं रहता हूँ। शैतान की शक्तियाँ मुझ तक नहीं पहुँच सकती हैं, क्योंकि मैं प्रताप, धार्मिकता और न्याय से ओतप्रोत हूँ” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 5)। मुझे लगा मानो ये वचन परमेश्वर के अधिकार से परिपूर्ण थे। परमेश्वर के सिवाय और कौन हमारे दिलों में झाँक सकता है? परमेश्वर के सिवाय कौन इतने अधिकार और सामर्थ्य के साथ हमसे सीधे बात कर सकता है? परमेश्वर ने इंसान को बनाया, और केवल परमेश्वर ही हमारे दिलों की गहराई में छिपी बातों को जान सकता है। मुझे यकीन था कि ये परमेश्वर के वचन हैं और मैं इससे बहुत रोमांचित था। मैंने पहले कभी ऐसा महसूस नहीं किया था। उस दिन मैंने बहुत-से वचन पढ़े और सामान्य से तीन घंटे देरी से घर पहुंचा। मुझे लगा ये वचन बहुत खास थे। घर लौटते वक्त मैं बार-बार यही कह रहा था, “परमेश्वर, तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद! मैं तुम्हारी वाणी पहचान गया हूँ, मैं जानता हूँ तुम लौट आए हो। मैंने तुम्हारे अधिकार को देखा है। सारी महिमा तुम्हारी हो!” मैं बहुत उत्साहित था। मैं उस प्रार्थना के बारे में सोचने लगा जो मैंने पिछली रात परमेश्वर से की थी, कि अपने लौटकर आने को लेकर वह अपने इरादे को समझने में मेरी मदद करे। मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर ने मेरी प्रार्थना सुन ली थी और उसका जवाब दिया था। ये मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी! लेकिन साथ ही मन में कई सवाल भी उठ रहे थे, जैसे : प्रभु कैसे वापस आया? वह क्या कार्य कर रहा है? अपने सवालों के जवाब ढूँढ़ने के लिए मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के भाई-बहनों से संपर्क किया।
उन्होंने मुझे बताया कि प्रभु ने मनुष्य के पुत्र के रूप में देहधारण किया है, वह गुप्त रूप से आया है। उन्होंने बताया कि उसने सत्य व्यक्त किए हैं और वह नया कार्य कर रहा है यानी मानवजाति को पूरी तरह शुद्ध करने और बचाने के लिए अंत के दिनों का न्याय, जो परमेश्वर के घर से शुरू होता है जिसकी भविष्यवाणी बाइबल में है। उन्होंने बाइबल के कुछ पदों पर मेरे साथ संगति भी की जो मेरे लिए बहुत प्रबोधक थी, जैसे प्रकाशितवाक्य 16:15, “देख, मैं चोर के समान आता हूँ।” मत्ती 24:44 भी, “तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी के विषय में तुम सोचते भी नहीं हो, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा।” “मनुष्य का पुत्र” का मतलब साफ तौर पर परमेश्वर का आत्मा या उसकी आध्यात्मिक देह नहीं है, बल्कि इसका मतलब है मनुष्य से पैदा हुआ, जिसमें सामान्य मानवता और परमेश्वर का सार है। यह वैसा ही है जैसा दो हजार साल पहले प्रभु यीशु के साथ हुआ था। वह आम इंसान जैसा दिखता था, पर वह सार रूप में परमेश्वर था। उसके बाद उन्होंने प्रकाशितवाक्य 3:20 पर भी संगति की, जिसमें प्रभु के दरवाजे पर दस्तक देने का जिक्र है। मैंने जाना कि “दस्तक देने” का मतलब प्रभु का लोगों के दिलों के दरवाजों पर दस्तक देने के लिए अंत के दिनों में नए वचन व्यक्त करना है। जब सच्चे विश्वासी प्रभु के वचन सुनते हैं तो वे उसे परमेश्वर की वाणी के रूप में पहचान लेते हैं, वे परमेश्वर के सामने उठाई गईं बुद्धिमान कुंवारियाँ हैं, जो प्रभु की वापसी का स्वागत करती हैं। इससे प्रभु यीशु की यह भविष्यवाणी पूरी होती है : “मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं; मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं” (यूहन्ना 10:27)।
मैं बहुत प्रभावित हो गया। मैंने सोचा कि कैसे दूसरी बार परमेश्वर देहधारण कर इस धरती पर कार्य करने आया है, वह भी तब जब मैं दुनिया में जीवित हूँ, इसी हवा में साँस ले रहा हूँ और वह ठीक किसी आम इंसान जैसा दिखता है। मैं अवाक रह गया, यह अद्भुत था! क्योंकि मैं हमेशा यही सोचता था कि परमेश्वर आकाश में होना चाहिए, मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि अंत के दिनों में परमेश्वर वचन बोलने और कार्य करने के लिए इस धरती पर देहधारण करेगा। फिर भाई-बहनों ने परमेश्वर के देहधारण से जुड़े उसके वचनों के कुछ अंश मुझे पढ़कर सुनाए : “‘देहधारण’ परमेश्वर का देह में प्रकट होना है; परमेश्वर सृष्टि के मनुष्यों के मध्य देह की छवि में कार्य करता है। चूँकि वह देहधारी परमेश्वर है, तो वह सबसे पहले देह बनेगा, सामान्य मानवता वाली देह बनेगा; यह सबसे मौलिक पूर्वापेक्षा है। वास्तव में, परमेश्वर के देहधारण का निहितार्थ यह है कि परमेश्वर देह में रहकर कार्य करता है, परमेश्वर अपने सार में देह बन जाता है, वह एक व्यक्ति बन जाता है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार)। “देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है और मसीह परमेश्वर के आत्मा द्वारा धारण की गई देह है। यह देह किसी ऐसे मनुष्य से भिन्न है जो देह का है। यह भिन्नता इसलिए है क्योंकि मसीह दैहिक होने के बजाय आत्मा का देहधारण है। उसके पास सामान्य मानवता भी है और पूर्ण दिव्यता भी है। उसकी दिव्यता किसी भी मनुष्य के पास नहीं है। उसकी सामान्य मानवता का उद्देश्य देह में उसकी समस्त सामान्य गतिविधियों को बनाए रखना है, जबकि उसकी दिव्यता स्वयं परमेश्वर के कार्य को कार्यान्वित करती है। चाहे यह उसकी मानवता हो या दिव्यता, दोनों स्वर्गिक परमपिता की इच्छा को समर्पित हैं। मसीह का सार आत्मा, यानी दिव्यता है। इसलिए, उसका सार स्वयं परमेश्वर का है; यह सार उसके स्वयं के कार्य में गड़बड़ी नहीं करेगा और वह कुछ भी ऐसा कतई नहीं कर सकता है, जो उसके अपने ही कार्य को नष्ट करता हो, न ही वह कभी ऐसे वचन कहेगा जो उसके अपने संकल्प के विरुद्ध जाते हों” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है)। परमेश्वर के वचनों के इन अंशों से मैंने जाना कि देहधारी परमेश्वर वास्तव में परमेश्वर का आत्मा है जो देहधारण कर वचन बोलने और कार्य करने धरती पर आया है ताकि मानवजाति को बचा सके। ऊपर से मसीह एक आम इंसान जैसा दिखता है, इंसान की तरह खाना खाता, कपड़े पहनता, जीता और सोता है, पर उसमें दिव्य सार है। वह परमेश्वर की पहचान और स्थिति से सारी मानवता से बात कर सकता है, वह ऐसे सत्य व्यक्त कर सकता है जो कोई इंसान कभी नहीं कर सकता। वह स्वयं परमेश्वर का कार्य कर सकता है और परमेश्वर की इच्छा पूरी कर सकता है। बाहर से तो हम नहीं कह सकते कि वह परमेश्वर है, पर उसकी वाणी सुनकर हमें पता चलता है कि उसके वचन इस दुनिया के नहीं हैं। वह ऐसे सत्य और रहस्य समझा सकता है जो किसी ने कभी देखे या सुने नहीं हैं। वह मानवजाति की आंतरिक भ्रष्टता को बेनकाब कर सकता है। वह वही व्यक्त करता है जो स्वयं परमेश्वर व्यक्त करता है। इसी वजह से हमें यकीन है कि वह परमेश्वर है। उसी तरह जैसे प्रभु यीशु उस समय कार्य करने आया था, वह बाहर से एक आम इंसान जैसा दिखता था, पर वह पूरी मानवजाति के लिए पाप-बलि बनने में सक्षम था, ताकि हमें पापों से छुटकारा दिला सके। वह हमें शांति और खुशी के साथ ही भरपूर अनुग्रह दे सकता था। उसके अलावा कोई और ऐसा कार्य नहीं कर सकता था, क्योंकि इंसान तो इंसान ही है, उसमें परमेश्वर का सार नहीं है।
भाई-बहनों ने संगति करते हुए यह भी कहा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ठीक प्रभु यीशु जैसा है। वह बाहर से एक आम इंसान दिखता है, पर उसमें परमेश्वर का सार है। वह परमेश्वर के घर से शुरू कर न्याय कार्य कर रहा है, वह सभी सत्य व्यक्त कर रहा है जो मानवजाति को शुद्ध करते और बचाते हैं, वह ऐसे रहस्य खोल रहा है जिन्हें कोई इंसान कभी नहीं खोल सकता। खास तौर पर परमेश्वर की छह-हजार साल की प्रबंधन योजना के रहस्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के रहस्य, कैसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है, कैसे परमेश्वर चरण-दर-चरण मानवजाति को बचाता है, किसे बचाया जाएगा और कौन स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेगा, किसे हटाया और दंड दिया जाएगा, और साथ ही उसके द्वारा लोगों की शैतानी प्रकृति को उजागर करना—परमेश्वर के सिवाय कोई और ये सत्य नहीं व्यक्त कर सकता। कोई इंसान ऐसा नहीं कर सकता। इससे साबित होता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर में दिव्य सार है और वह अंत के दिनों का मसीह है। यह सब सुनकर मुझे देहधारण के कुछ सत्य समझने में मदद मिली, मैंने जाना कि मसीह में सामान्य मानवता और दिव्य सार, दोनों हैं। परमेश्वर के बारे में मेरी कुछ धुंधली कल्पनाओं और धारणाओं का समाधान हो गया। देहधारी परमेश्वर को देखा और छुआ जा सकता है, वह लोगों से आमने-सामने बात कर सकता है। अंत के दिनों में परमेश्वर के देहधारी होने और पूरी मानवता को बचाने के लिए वचन व्यक्त करने के लिए स्वयं पृथ्वी पर आने के बारे में सोचकर मैं बहुत उत्साहित भी हुई और भाव-विभोर भी हो गई। मगर जब मैंने सुना कि परमेश्वर ने न्याय का कार्य करने के लिए दूसरी बार देहधारण किया है, तो मुझे थोड़ी चिंता हुई, थोड़ा डर लगा। क्योंकि मैं अब भी पाप में जी रहा था, मैंने सोचा कि जब प्रभु मानवजाति का न्याय करने लौटेगा, तो कहीं वह मेरी निंदा और मुझे दंडित तो नहीं करेगा। लेकिन भाई-बहनों के साथ संगति करने के बाद मैंने जाना कि परमेश्वर का न्याय कार्य हमारी निंदा और हमें दंडित करने के लिए नहीं, बल्कि हमें शुद्ध करने और बचाने के लिए है। वास्तव में, प्रभु यीशु ने उद्धार के कार्य का सिर्फ एक हिस्सा पूरा किया था। उसने केवल हमारे पापों को क्षमा किया था। मगर हमारी पापी प्रकृति अभी भी मौजूद है। भले ही हम परमेश्वर के लिए खुद को खपा सकते हैं, प्रत्यक्ष रूप से कुछ अच्छे काम कर सकते हैं, फिर भी हमारी प्रकृति अहंकार, धोखेबाजी और दुराग्रह जैसे शैतानी स्वभाव से भरी है। हम अक्सर दूसरों से ईर्ष्या करते हैं और सब कुछ सिर्फ अपने लिए करते हैं। हम बेहद स्वार्थी हैं। हम पूरी तरह अपने शैतानी स्वभाव के काबू में और उससे बंधे होते हैं, हमें पाप के बंधनों से बच निकलने का कोई अंदाजा नहीं होता। यह ऐसा तथ्य है जो हम हर दिन देख सकते हैं। परमेश्वर ने कहा था : “इसलिए तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ” (लैव्यव्यवस्था 11:45)। इस पद से साफ पता चलता है कि हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने लायक नहीं हैं। यही कारण है कि परमेश्वर अंत के दिनों में हमें शुद्ध करने और बचाने के लिए न्याय कार्य करता है, ताकि हम पाप के बंधनों से पूरी तरह मुक्त हो सकें और ऐसे इंसान बन सकें जो परमेश्वर का भय मानकर उसके प्रति समर्पित हों, जो और पाप न करें और परमेश्वर का विरोध न करें। यही परमेश्वर के न्याय कार्य का लक्ष्य है, जो प्रभु यीशु की भविष्यवाणियों को पूरा करता है : “सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर : तेरा वचन सत्य है” (यूहन्ना 17:17)। “तुम सत्य को जानोगे, और सत्य तुम्हें स्वतंत्र करेगा” (यूहन्ना 8:32)।
फिर हमने कुछ और वचन पढ़े। परमेश्वर के वचन कहते हैं : “यूँ तो यीशु मनुष्यों के बीच आया और उसने बहुत-सा कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा किया और मनुष्य की पाप-बलि के रूप में काम किया; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभाव से मुक्त नहीं किया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह बचाने के लिए केवल यीशु का पाप-बलि बनना और मनुष्य के पापों को वहन करना ही आवश्यक नहीं था, बल्कि मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए उसके स्वभाव से पूरी तरह छुटकारा दिलाने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करना आवश्यक था। और इसलिए मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद परमेश्वर देह में लौटा कि उसे नए युग में ले जाए और उसने ताड़ना एवं न्याय का कार्य आरंभ कर दिया। यह कार्य मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में ले आया है। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में प्रकाश में जिएँगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना)। “अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों का गहन-विश्लेषण करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर के प्रति समर्पण किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता जीनी चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभावों पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर को अस्वीकार करता है, इस पर और भी अधिक निर्देशित हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर कुछ वचनों में मनुष्य की प्रकृति को पूरी तरह नहीं समझाता है; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर और काट-छाँट करने की इन विभिन्न विधियों को साधारण वचनों से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है; बल्कि उजागर और काट-छाँट करने के इस कार्य को करने में उस सत्य का उपयोग किया जाता है जो मनुष्य के पास बिल्कुल भी नहीं होता है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य की समझ पैदा करने का काम करता है। न्याय के कार्य ने मनुष्य को परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों के बारे में काफी समझ प्राप्त करने में सक्षम बनाया है जो उसकी समझ से परे होते हैं। इसने मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार और अपनी भ्रष्टता की जड़ को समझने और जानने, साथ ही अपने कुरूप चेहरे का पता लगाने में सक्षम बनाया है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन को उन सभी के लिए उद्घाटित करने का कार्य है जो उसमें आस्था रखते हैं। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है)। उसके बाद एक भाई ने संगति की, “अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर मानवजाति का न्याय करने और उसे शुद्ध करने के लिए सत्य व्यक्त करता है। परमेश्वर के वचन हमारी शैतानी प्रकृति को और हमारी भ्रष्टता के सत्य को उजागर और हमारा न्याय करते हैं, परीक्षणों और शोधन के जरिये वह हमारे भ्रष्ट स्वभावों और पापी प्रकृति का समाधान करता है, ताकि हम समझ सकें कि शैतान ने मानवजाति को कितनी गहराई तक भ्रष्ट किया है, साथ ही हम अपनी प्रकृति में निहित अहंकार, कुटिलता और धोखेबाजी को जान सकें। सबसे बड़ी दुखी करने वाली बात है कि भले ही हम परमेश्वर में विश्वास करें, उसके लिए खुद को खपाएँ, प्रत्यक्ष रूप से कुछ अच्छे काम करें, फिर भी ये सारे काम परमेश्वर के प्रति प्रेम या समर्पण के भाव से नहीं, बल्कि आशीष और इनाम पाने के लिए और केवल परमेश्वर के साथ लेनदेन करने के लिए किए जाते हैं। जैसे ही परमेश्वर का कार्य हमारे विचारों और धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, हम परमेश्वर को नकारते और ठुकरा देते हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसा फरीसियों ने किया था। परीक्षणों और क्लेशों के सामने हम परमेश्वर को लेकर शिकायत करते हैं। यह सब दिखाता है कि हम अभी भी भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के साथ जी रहे हैं और हम अभी भी शैतान के हैं। ऐसा इंसान परमेश्वर के राज्य में कैसे प्रवेश कर सकता है? परमेश्वर के वचनों का न्याय और उजागर करना ही हमें हमारी भ्रष्टता की सच्चाई से अवगत कराता है, यह दिखाता है कि हम परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में असमर्थ हैं, हमारा कोई भी कर्म या क्रियाकलाप उसे संतुष्ट नहीं कर पाता। फिर हम पछतावे से भरकर, परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप करते हैं, और परमेश्वर के वचनों के अनुसार आचरण करने और चीजों को करने को तैयार होते हैं। परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से गुजरकर हम देखते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव केवल प्रेम और दया से नहीं बना है, बल्कि उसमें धार्मिकता, प्रताप, क्रोध और अभिशाप भी निहित है। हम परमेश्वर का भय मानने वाला दिल रखने लगते हैं, सचेत होकर देह के खिलाफ विद्रोह और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कर पाते हैं। हमारे अंदर परमेश्वर के प्रति थोड़ा समर्पण विकसित होता है और हमारा जीवन स्वभाव बदलने लगता है। तब हम सचमुच अनुभव कर पाते हैं कि परमेश्वर का न्याय, ताड़ना, परीक्षण और शोधन हमारे लिए उसका सबसे बड़ा उद्धार और सबसे बड़ा प्रेम है।”
भाई की बातें सुनकर मैं समझ सका कि अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय कार्य कितने गहन रूप से अर्थपूर्ण है। अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय का अनुभव किए बिना हम अपनी भ्रष्टता की सच्चाई को कभी नहीं समझ सकते या सच्चा पश्चात्ताप नहीं कर सकते। ठीक मेरी तरह, मैं हर दिन प्रभु से प्रार्थना करके अपना अपराध कबूल करता, उसके बाद भी फिर से वही पाप करता था। मैं पूरी तरह से अपनी भ्रष्ट प्रकृति के काबू में था और ऐसी हालत में मैं कैसे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता था, कैसे परमेश्वर की स्वीकृति पा सकता था? पहले मैं हमेशा यही सोचता था कि अगर मैं अच्छा बर्ताव करता दिखूँगा तो परमेश्वर मुझे स्वीकृति देगा। मगर अब मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर हमारे अंदर की शैतानी चीजों में बदलाव चाहता है। तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि न्याय का कार्य हमारे लिए कितना अहम है, कार्य के इस चरण के बिना कोई भी नहीं बचाया जा सकता। अंत के दिनों में परमेश्वर हमारे भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करने के लिए सत्य व्यक्त करता है और न्याय का कार्य करता है ताकि हम परमेश्वर के अनुरूप बन सकें और उसके राज्य में प्रवेश कर सकें। परमेश्वर का प्रेम इतना सच्चा और इतना वास्तविक है!
सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़कर मुझे पूरा यकीन हो गया कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही लौटकर आया प्रभु यीशु है। वही अंत के दिनों का मसीह है। इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है। तब से मैं कलीसिया जीवन में हिस्सा लेने लगा, हर दिन भाई-बहनों के साथ संगति करके परमेश्वर को जानना सीखने लगा। अब मैं पहले की तरह अपनी कल्पना में बसे अज्ञात परमेश्वर पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक देहधारी परमेश्वर में विश्वास करता हूँ, जो इंसानों के बीच चलता-फिरता और कार्य करता है, जो कभी भी, कहीं भी सत्य व्यक्त कर सकता है। मैंने परमेश्वर की वाणी सुनी है, उसके वचनों के प्रचुर सिंचन और पोषण का आनंद उठाया है और पवित्र आत्मा के कार्य का स्वाद चखा है। मैं सचमुच प्रभु की ओर आ गया हूँ। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के उद्धार के लिए धन्यवाद!