79. मेरे परिवार की बर्बादी का कारण कौन है?

वांग झिइंग, चीन

शुरुआती वर्षों में मैं एक सरकारी कर्मचारी के रूप में काम करती थी, मेरा पति हाई स्कूल में शिक्षक था और हमारी प्यारी बेटी होशियार बच्ची थी जिसे अच्छे ग्रेड मिलते थे, हर कोई हमसे जलता था कि हमारा परिवार देखने में इतना आदर्श और सुसंगत है। फिर 2005 के अंत के करीब मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार करने का सौभाग्य मिला और मुझे पता चला कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही लौटकर आया हुआ प्रभु यीशु है और वह मनुष्य को शुद्ध करने, बचाने और परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कराने का न्याय का कार्य करने के लिए सत्य व्यक्त करता है। मैंने यह अद्भुत समाचार अपने पति और सास को भी सुनाया और मेरी सास ने भी जल्दी ही परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार लिया। खुद नहीं स्वीकारने के बावजूद मेरे पति ने हमारी आस्था पर आपत्ति नहीं जताई। उन दिनों मैं रोज परमेश्वर के वचन पढ़ती थी, अपने भाई-बहनों के साथ सत्य पर संगति करती थी और अपना कर्तव्य निभाती थी—वे समृद्ध, फायदेमंद और खुशहाल दिन थे। मैंने कभी नहीं सोचा था कि सीसीपी के उत्पीड़न के कारण वे दिन जल्दी ही खत्म हो जाएँगे।

2006 में एक दिन दोपहर को जब मैं एक सभा से घर लौटी तो मेरे पति ने गुस्से में मुझसे कहा, “मैं सोचता था कि परमेश्वर में आस्था रखना अच्छी बात है, लेकिन मैंने अभी-अभी इंटरनेट पर देखा है कि सरकार विश्वासियों पर कठोर कार्रवाई कर रही है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया सरकार की कार्रवाई का प्रमुख निशाना है और अगर तुम्हें गिरफ्तार कर लिया गया तो गंभीर अपराधी मानकर तुम्हें जेल की सजा सुना दी जाएगी। जिस किसी भी सरकारी कर्मचारी के परिवार के सदस्य सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करते हैं उसे कड़ी सजा दी जाएगी, उसकी नौकरी छीन ली जाएगी, उसकी सामाजिक कल्याण सुविधाएँ रद्द कर दी जाएंगी और उसके बच्चे विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए आवेदन नहीं कर पाएँगे, सेना में सेवा नहीं कर पाएँगे या सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन नहीं कर पाएँगे। आज से तुम्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने की अनुमति नहीं है!” अपना विषवमन कर चुकने के बाद वह दनदनाते हुए घर से बाहर निकल गया। मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने मन ही मन सोचा, “हमारी आस्था में हम सिर्फ परमेश्वर के वचन खाते और पीते हैं, सत्य का अनुसरण करते हैं और सही मार्ग पर चलते हैं, हम कोई भी गैरकानूनी काम नहीं करते। इसके बावजूद सीसीपी का लक्ष्य हमें गिरफ्तार करना और हम पर अत्याचार करना है—वह कितनी दुष्ट है! वह चाहे कैसे भी मेरा उत्पीड़न करे, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करना जारी रखूँगी!”

अगले दिन अपना कर्तव्य निभाकर घर लौटने पर मेरी सास ने मुझसे सख्ती से पूछा, “तुमने घर आने में इतनी देर क्यों लगा दी? क्या तुम सच में विश्वास करना जारी रखोगी, भले ही ऐसा करना अब इतना खतरनाक हो? मैंने आज इंटरनेट पर पढ़ा कि परमेश्वर में विश्वास करने के लिए तुम्हें गिरफ्तार किया जा सकता है, जेल की सजा दी जा सकती है, तुम्हारे बच्चे कॉलेज के लिए आवेदन नहीं कर पाएँगे और तुम्हें और तुम्हारे पति दोनों को अपनी सरकारी नौकरी से हटा दिया जाएगा। अपनी पोती के भविष्य के लिए मैंने परमेश्वर में विश्वास करना बंद करने का फैसला किया है।” कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए मेरे पति ने कहा, “देखो, मेरी माँ को कुछ तो होश है! जैसे ही उसने सुना कि तुम आस्था का अभ्यास करने के लिए गिरफ्तार हो सकती हो तो उसने इसे तुरंत छोड़ दिया—तुम्हें भी विश्वास करना बंद कर देना चाहिए! अगर तुम विश्वास करते हुए गिरफ्तार हो जाती हो तो हमारा पूरा परिवार मुश्किल में फँस जाएगा और यह सब तुम्हारी वजह से होगा। तुम्हें इस बारे में सोचना चाहिए!” यह सुनकर मैं थोड़ी चिंतित हो गई और मन में सोचने लगी, “अगर मैं आस्था का अभ्यास और अपना कर्तव्य निर्वहन करती रहती हूँ और पकड़ी जाती हूँ और गिरफ्तार हो जाती हूँ तो मेरे पति को नौकरी से निकाल दिया जाएगा और मेरी बेटी पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा। अगर ऐसा होता है तो वे दोनों इसके लिए जरूर मुझसे नफरत करेंगे। शायद मैं अपने परिवार को परेशानी में पड़ने से बचाने के लिए कुछ समय सभाओं में जाना टाल सकती हूँ।” लेकिन जैसे ही मेरे मन में यह विचार आया तो मैं अंदर से बहुत बेचैन हो गई। मैंने सोचा, “अगर मैं सीसीपी के हाथों गिरफ्तारी से बचने के लिए सभाओं में नहीं जाती हूँ और अपना कर्तव्य नहीं निभाती हूँ तो क्या मैं तब भी विश्वासी बनी रहूँगी? क्या मैं तब भी सत्य पा सकूँगी?” मैंने जल्दी से परमेश्वर को पुकारा। तभी मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आए : “ब्रह्मांड में समस्त चीजों में से ऐसी कोई चीज नहीं है, जिसमें मेरी बात आखिरी न हो। क्या कोई ऐसी चीज है, जो मेरे हाथ में न हो? जो कुछ मैं कहता हूँ, वह पूरा होता है, मनुष्यों के बीच ऐसा कौन है, जो मेरा संकल्प बदल सकता है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 1)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करने से मुझे साफ समझ मिली। मनुष्य के रूप में हमारा भाग्य परमेश्वर के हाथों में है। परमेश्वर पहले ही पूर्वनियत कर चुका है कि मुझे और मेरे पति को नौकरी से निकाला जाएगा कि नहीं और मेरी बेटी का क्या भविष्य होगा। ये ऐसी चीजें नहीं हैं जिनका फैसला मनुष्य कर सके। इसका एहसास होने के बाद मैंने उनसे कहा, “इस बारे में अंतिम निर्णय परमेश्वर का होगा कि मुझे गिरफ्तार किया जाएगा या नहीं और हमारे बच्चे का भविष्य प्रभावित होगा या नहीं। मनुष्य परमेश्वर का सृजन है और हमारा परमेश्वर में विश्वास करना और उसकी आराधना करना पूरी तरह स्वाभाविक और न्यायोचित है। मुझे पता है कि मुझे यही करना चाहिए, इसलिए मैं सच्चा मार्ग छोड़ने में तुम्हारा साथ नहीं दूँगी।” मेरा पति गुस्से में आ गया और मुझे नीचा दिखाने और ताने मारने लगा, “हकीकत में आओ! हमने इतने साल तक सीसीपी की प्रणाली में काम किया है और तुम फिर भी उसकी नीतियों को नहीं समझती हो? चीन में सच्ची धार्मिक स्वतंत्रता हो ही नहीं सकती है। चीन में तुम सिर्फ पार्टी में ही अपनी आस्था रख सकती हो। पार्टी जो भी फैसला करती है, वह कानून है और तुम उसके खिलाफ नहीं जा सकती। तियानमेन चौक की घटना को ही ले लो : वे छात्र केवल लोकतंत्र और स्वतंत्रता पाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्हें सीसीपी ने क्रूरता से दबाया और यहाँ तक कि दंगे और क्रांति भड़काने का झूठा आरोप भी लगाया, जिसके लिए उनमें से कई को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। कुछ छात्रों को तो टैंकों से कुचल दिया गया था। इसके बारे में सोचते ही मैं सिहर उठता हूँ। इसके बारे में सोचो : अगर वे छात्रों के साथ इतनी क्रूरता से पेश आ सकते हैं तो क्या तुम्हें वाकई लगता है कि वे तुम जैसे विश्वासियों को आसानी से छोड़ देंगे? साफ दिख रहे खतरे को समझो, तुम चीनी नागरिक हो और इसलिए तुम सिर्फ सीसीपी में विश्वास कर सकती हो और परमेश्वर में तो बिल्कुल भी विश्वास नहीं कर सकती।” अपने पति की दलील सुनकर मैंने मन में सोचा, “सीसीपी वाकई बहुत क्रूर, उग्र और शैतानी है। अगर मैं परमेश्वर में विश्वास करने पर जोर देती हूँ और पकड़ी जाती हूँ तो वे मुझे पक्का मार डालेंगे।” मुझे थोड़ा डर लगने लगा। तभी मुझे प्रभु यीशु के ये वचन याद आए : “जो शरीर को घात करते हैं, पर आत्मा को घात नहीं कर सकते, उनसे मत डरना; पर उसी से डरो, जो आत्मा और शरीर दोनों को नरक में नष्‍ट कर सकता है(मत्ती 10:28)। परमेश्वर के वचनों से मुझमें आस्था भर गई—सभी घटनाएँ और चीजें परमेश्वर के हाथों में हैं और परमेश्वर की अनुमति के बिना सीसीपी मेरा बाल भी बांका नहीं कर सकती। अगर मुझे बाद में गिरफ्तार कर लिया जाता है और पीट-पीटकर मार डाला जाता है या अपंग कर दिया जाता है तो यह भी परमेश्वर की अनुमति से ही होगा। अगर मैं अपनी गवाही में अडिग रहकर शैतान को अपमानित कर पाई तो मेरा जीवन बेकार नहीं जाएगा। मेरे पति ने अभी-अभी जो कहा था उससे मैं बँधी नहीं रह सकती थी और उसकी तरह शैतान की सत्ता के अधीन अपमानजनक जीवन नहीं जी सकती थी। मुझे अपनी गवाही में अडिग रहने के लिए परमेश्वर पर भरोसा करना था।

जब मेरे पति ने देखा कि मैंने अभी भी अपनी आस्था नहीं छोड़ी है तो वह अक्सर मुझमें कमियाँ निकालता, मुझे नीचा दिखाता और फटकारता और यहाँ तक कि मेरी बेटी के सामने मेरी आलोचना करता कि मैं वह काम नहीं कर रही हूँ जो मुझे करना चाहिए। मेरी सास ने भी मुझे गंदी नजरों से देखना और डाँटना शुरू कर दिया, वह कहती थी कि मेरे पास बहुत खाली समय है, मैं बेकार की चीजों में अपना वक्त गँवा रही हूँ और अपनी आस्था की खातिर अपनी बच्ची और परिवार के भविष्य की अनदेखी कर रही हूँ। मेरी बेटी के अलावा कोई भी मुझसे बात नहीं करता था—ऐसा लग रहा था मानो इस परिवार में मेरे लिए कोई जगह नहीं बची है। समय के साथ मैं थोड़ी कमजोर पड़ने लगी, इसलिए मैंने परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना और खोज की और परमेश्वर के वचनों का यह अंश देखा : “बड़ा लाल अजगर परमेश्वर का उत्पीड़न करता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसीलिए इस देश में लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने के कारण अपमान और उत्पीड़न सहना पड़ता है...। परमेश्वर के लिए बड़े लाल अजगर के देश में अपना कार्य कार्यान्वित करना अत्यंत कठिन है, परंतु इसी कठिनाई के माध्यम से परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण करता है, ताकि वह अपनी बुद्धि और अपने अद्भुत कर्मों को प्रकट कर सके, और परमेश्वर इस अवसर का उपयोग लोगों के इस समूह को पूर्ण करने के लिए करता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?)। परमेश्वर के वचनों से मैंने जाना कि सीसीपी शासन दरअसल शैतान का शासन है। सीसीपी परमेश्वर और सत्य से बहुत नफरत करती है और इसलिए चीन में परमेश्वर में विश्वास करने वाले सभी लोग अनिवार्य रूप से सीसीपी द्वारा सताए जाते हैं। हालाँकि परमेश्वर की बुद्धि शैतान की साजिशों के आधार पर काम करती है और परमेश्वर हमारी आस्था पूर्ण बनाने के लिए सीसीपी की गिरफ्तारियों और उत्पीड़न से बने कठिन वातावरण का उपयोग करता है। मेरा पति मुझे सताने में सीसीपी का साथ दे रहा था और मेरे परिवार ने मुझे अस्वीकार कर दिया था; मैं कष्ट सह रही थी और थोड़ा अपमानित महसूस कर रही थी, लेकिन यह वही पीड़ा थी जो सत्य का अनुसरण करने और सही मार्ग पर चलने के साथ आती है और इसलिए इसे सहना उचित था। मुझे नकारात्मक और कमजोर नहीं पड़ना चाहिए, जिससे परमेश्वर को ठेस पहुँचती है। मुझे उसके लिए अपनी गवाही में अडिग रहना था! इसका एहसास होने पर मुझे अब उतना दुख नहीं हुआ और मुझमें आस्था का नया संचार हो गया।

उसके बाद मेरा पति और सास बारी-बारी से मेरी निगरानी करते और वे मुझे सभाओं में जाने या परमेश्वर के वचन पढ़ने नहीं देते थे। लेकिन मैंने खुद को उनसे बेबस नहीं होने दिया और जब उन्हें पता नहीं चलता तो मैं चुपके से सभाओं में भाग लेने चली जाती और रात में कंबल के नीचे टॉर्च की रोशनी में परमेश्वर के वचन पढ़ती। लेकिन फिर एक दिन जब मैं एक सभा के लिए बाहर जा रही थी तो मेरी सास ने मुझे पकड़ लिया और रोते हुए बोली, “बेटी, कृपया, कृपया परमेश्वर पर विश्वास करना बंद कर दो। अगर तुम पकड़ी गई तो हमारे परिवार का क्या होगा? मेरा बेटा कहता है कि अगर तुम ऐसा करती रही तो वह तुम्हें तलाक दे देगा। तुम एक अच्छी बहू हो, मैं तुम्हें गँवाना नहीं चाहती और मैं अपने परिवार को बिखरते हुए नहीं देख सकती।” अपनी सास को इस तरह रोते हुए देखना वाकई बहुत मुश्किल था। पहले उसने हमेशा मुझे अपनी बेटी की तरह माना था और मैं उसे ऐसे कष्ट सहते हुए नहीं देख सकी, इसलिए मैंने उसके साथ संगति की, “माँ, तुमने खुद परमेश्वर के वचन पढ़े हैं, इसलिए तुम जानती हो कि परमेश्वर ने मानवजाति, स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का सृजन किया है। हमारा जीवन और हर वह चीज जिसका हम आनंद लेते हैं, वह सब उसी से आता है और परमेश्वर में विश्वास करना और उसकी आराधना करना पूरी तरह से स्वाभाविक और उचित है। अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने हमें पाप से बचाने के लिए कई सत्य व्यक्त किए हैं। अगर हम गिरफ्तार होने के डर से अपनी आस्था छोड़ देते हैं तो हम बचाए जाने का मौका गँवा देंगे। साथ ही मैं परमेश्वर में अपने विश्वास के साथ जीवन के सही मार्ग पर चल रही हूँ, अगर हमारा परिवार टूट जाता है तो क्या इसका दोष सीसीपी पर नहीं होगा? यहाँ सीसीपी असली खलनायक है। हमें इस मुश्किल समय में अपनी गवाही में अडिग रहना चाहिए और परमेश्वर को धोखा नहीं देना चाहिए।” मेरी सास ने गुस्से में जवाब दिया, “मुझे पता है कि परमेश्वर में विश्वास करना अच्छा है, लेकिन अब जबकि सीसीपी गिरफ्तारियाँ कर रही है तो मैं विश्वास रखने की हिम्मत कैसे कर सकती हूँ? अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करने पर जोर देती रहोगी तो मेरे पास परिवार बचाने के लिए अपने बेटे के पक्ष में खड़े होने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।” मैं बस इतना ही कह पाई, “अगर तुम अपनी आस्था छोड़ना चाहती हो तुम्हारी मर्जी, लेकिन कृपा करके मुझे परमेश्वर में विश्वास रखने से रोकने और इसके कारण सताने के लिए सीसीपी का साथ मत दो। तुम जानती हो कि मैं सच्चे परमेश्वर में विश्वास करती हूँ और सच्चे मार्ग पर चलती हूँ। भले ही मुझे गिरफ्तार कर लिया जाए और जेल भेज दिया जाए, मैं अंत तक परमेश्वर में विश्वास करती रहूँगी।” यह सुनकर वह गुस्से में भनभनाते हुए गई और अपने बेडरूम में जाकर जोर से दरवाजा बंद कर दिया।

जब मेरा पति घर लौटा और उसने सुना कि मैं किसी सभा में गई थी तो उसने गुस्से में मुझसे पूछताछ की, “तुम्हारी मरने की इच्छा है या कुछ और? क्या तुम्हें लगता है कि इंटरनेट पर जो कुछ कहा जा रहा है वह मजाक है? यह राष्ट्रीय सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो की वेबसाइट पर है। क्या तुम जानती हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कई विश्वासियों को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है और कुछ को जेल की सजा दी जा चुकी है, उन्हें पीट-पीटकर मार डाला गया है या अपंग बना दिया गया है? अपनी आस्था से हमारा परिवार बर्बाद मत होने दो!” आग बबूला होकर वह हमारे शयनकक्ष में परमेश्वर के वचनों वाली मेरी पुस्तकें ढूँढ़ने लगा और मैं जिस टॉर्च की रोशनी में पढ़ती थी वह उसने जमीन पर फेंक दी और चिल्लाया, “अगर तुम अपनी आस्था नहीं छोड़ोगी और परमेश्वर पर विश्वास करना जारी रखोगी तो तुम इस परिवार का हिस्सा नहीं रह पाओगी! परमेश्वर पर तुम्हारी आस्था के कारण मैं हर दिन भयभीत और बेचैन रहता हूँ। क्या तुम्हें पता है कि अगर तुम गिरफ्तार हो गई तो हमारी नौकरियाँ छिन सकती हैं? मेरे सहकर्मी की पत्नी मेरे सामने हमेशा यह बात उठाती रहती है कि तुम एक विश्वासी हो और यह मेरे लिए काम के दौरान बहुत अजीब बात हो गई है। तुमने मुझे पूरी तरह से बदनाम कर दिया है! मुझे आज तुमसे एक जवाब चाहिए : तुम अपनी आस्था को चुन रही हो या हमारे परिवार को? अगर तुम हमारे परिवार को चुनती हो तो घर पर ठीक से सामान्य जीवन जियो, तुम पर कोई दायित्व नहीं होगा और मैं तुम्हें हर महीने महजोंग खेलने के लिए पैसे भी दूँगा। तुम्हें जो भी चाहिए मैं दूँगा। अगर तुम परमेश्वर पर विश्वास करते रहने पर जोर दोगी तो मैं तलाक दे दूँगा, तुम्हें हमारी संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं मिलेगा और बेटी से भी नहीं मिलने दिया जाएगा।” यह देखकर मैं टूट गई कि मेरा पति कितना निर्दयी और क्रूर हो गया है, मेरी आँखों में आँसू आ गए और मुझे बहुत दुख हुआ। मैंने अपने परिवार के लिए पैसे कमाने के लिए बहुत मेहनत की थी, हमने अभी-अभी घर का नवीनीकरण कराया था और अब मेरा पति सिर्फ अपनी छवि और भविष्य की संभावनाएँ बचाने के लिए दस साल से भी ऊपर के खुशहाल वैवाहिक जीवन के बाद मुझे निकालने जा रहा था। अब तक स्पष्ट हो गया था कि हमारा वैवाहिक संबंध सिर्फ नाम का था। मैंने उसे जवाब दिया, “भले ही तुम तलाक के बाद मुझे कुछ भी न दो, मैं फिर भी परमेश्वर का अनुसरण करना चुनूँगी।” एक डरावनी, घृणित आवाज में उसने जवाब दिया, “अगर तुम परमेश्वर का अनुसरण करना चुनोगी तो मैं तुम्हारी जिंदगी नरक बना दूँगा। मैं तुम्हें सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो भेज दूँगा, वे जानते हैं तुम्हारा क्या करना है!” इसके साथ ही उसने मुझे एक पत्र दिखाया जिसे उसने प्रिंट किया था जिसमें लिखा था, “मेरी पत्नी सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करती है और नियंत्रण से बाहर हो चुकी है। मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की, लेकिन वह मेरी बात नहीं सुनती, इसलिए मेरी पत्नी से निपटने के लिए सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो से मदद माँगने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं है। अगर किसी भी मदद की जरूरत होगी तो मैं पूरा सहयोग करूँगा।” वह पत्र देखकर मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने सोचा, “यह कैसा पति है? वह निरा राक्षस है! वह साफ जानता है कि सीसीपी ने परमेश्वर में विश्वासियों के साथ कितनी क्रूरता की है, लेकिन फिर भी वह मुझे सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो में भेजना चाहता है। क्या वह वाकई मुझे मरने के लिए नहीं भेज रहा है?” यह देखकर मुझे बहुत चिंता हुई कि मेरे अपने पति ने अपनी मानवता पूरी तरह गँवा दी है और अब वह कुछ भी कर सकता है। “अगर वह वाकई मुझे सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो में ले जाता है तो मैं क्या करूँगी? वे वहाँ विश्वासियों को नुकसान पहुँचाने और यहाँ तक कि उन्हें मारने में माहिर हैं।” जितना अधिक मैंने इसके बारे में सोचा, मैं उतनी ही भयभीत हो गई और इसलिए मैंने लगातार परमेश्वर से प्रार्थना की और उससे आस्था व शक्ति माँगी। प्रार्थना के बाद मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया जो मैंने भक्ति के दौरान पढ़ा था : “तुम्हें इस या उस चीज से नहीं डरना चाहिए; चाहे तुम्हें कितनी भी मुसीबतों या खतरों का सामना करना पड़े, तुम्हें किसी भी अड़चन से बाधित हुए बिना मेरे सम्मुख अडिग रहने में सक्षम होना चाहिए ताकि मेरी इच्छा बेरोक-टोक कार्यान्वित हो सके। यह तुम्हारा कर्तव्य है...। डरो मत; तुम्हारे सहारे के रूप में मेरे रहते कौन कभी इस मार्ग को अवरुद्ध कर सकता है? यह याद रखो! याद रखो!(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 10)। परमेश्वर के वचनों से मुझे आस्था और शक्ति मिली—परमेश्वर मेरी ढाल है और इसलिए मुझे किसी बात से डरने की जरूरत नहीं है। दृढ़ विश्वास के साथ मैंने अपने पति से कहा, “भले ही तुम मुझे सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो को सौंप दो, मैं परमेश्वर में विश्वास करती रहूँगी। तुम्हें पता होना चाहिए कि सीसीपी केवल मेरी देह को प्रताड़ित कर यातना दे सकती है, लेकिन वे परमेश्वर का अनुसरण करने की मेरी इच्छा को कभी नष्ट नहीं कर सकते। चाहे वे मुझे कैसे भी सताएँ, मैं परमेश्वर में विश्वास करती रहूँगी, भले ही इसका अंजाम मेरी मौत ही क्यों न हो!” यह देखकर कि मेरी आस्था कितनी अडिग है, मेरे पति ने हार मानते हुए अपना सिर हिलाया और कहा, “अरे नहीं, अरे नहीं, इसे तो सुधारा ही नहीं जा सकता!” यह देखकर कि मेरे पति के पास अब कहने को कुछ नहीं है, मैंने अपने दिल की गहराई से परमेश्वर को धन्यवाद दिया कि उसने मुझे अपनी बात पर टिके रहने की आस्था दी।

रात में खाना खाने के बाद मैं अपने बिस्तर पर बैठकर दिन में जो भी हुआ था, उसके बारे में सोचने लगी और मुझे एहसास हुआ कि अब मैं इस घर में नहीं रह सकती। जब मैंने इस बारे में सोचा तो मैं थोड़ी उदास हो गई और अलग होने के लिए अनिच्छुक होने लगी और मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। मुझे रोता देख मेरे पति ने मुझे फिर लुभाने की कोशिश की और कहा, “अगर तुम वादा करो कि तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं करोगी तो मैं तुम्हें तलाक नहीं दूँगा और तुम्हें सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो में नहीं भेजूँगा। तब हमारा परिवार पहले की तरह ही मधुरता से रहेगा।” मैंने जवाब दिया, “सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने मानवजाति का न्याय और उसे शुद्ध करने का कार्य करने के लिए सत्य व्यक्त किए हैं। हम सभी को सत्य को स्वीकारना चाहिए और पश्चात्ताप के साथ परमेश्वर के सामने आना चाहिए ताकि हमें उसके द्वारा बचाया जा सके। हमारे पास यही एकमात्र रास्ता है। इन दिनों पहले से कहीं बड़े पैमाने पर आपदाएँ आ रही हैं—अगर तुम परमेश्वर में मेरे विश्वास को बाधित करने और सताने में सीसीपी का साथ देते रहोगे तो तुम महा आपदाओं का शिकार हो जाओगे और सजा पाओगे!” मेरा पति मेरी बात सहन नहीं कर पाया और गुस्से में पलटकर बोला, “मेरे सामने अपनी आस्था का जिक्र मत करो। भले ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर वाकई सच्चा परमेश्वर हो, फिर भी मैं उस पर विश्वास नहीं करूँगा। अगर तुम अब भी परमेश्वर पर विश्वास करने पर अड़ी रही तो मैं कल सबसे पहले तुम्हें सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो ले जाने का काम करूँगा!” यह देखकर कि मैं उसकी बात नहीं सुन रही हूँ, वह आग बबूला हो गया, उसने मुझे बिस्तर पर गिरा दिया, थप्पड़ मारा और मेरा गला घोंटते हुए कहने लगा, “तुम्हारी आस्था ने न केवल हमारे परिवार को नुकसान पहुँचाया है, बल्कि मेरे लिए भी परेशानी पैदा कर रही है। देखते हैं कि क्या तुम्हें पीट-पीटकर मार डालने के बाद भी तुम परमेश्वर में विश्वास रखती हो!” जब मैं खुद को छुड़ाने के लिए छटपटा रही थी तो शोर सुनकर मेरी सास हमारे बेडरूम में आ गई। उसने मुझे डाँटा, कहा, “तुम्हारी आस्था ने इस परिवार को छिन्न-भिन्न कर दिया है और यह अब मेरे बेटे के लिए भी परेशानी पैदा कर रही है।” इससे मैं बिफर गई और मैंने सोचा, “हमारे परिवार में कलह का असली कारण यह है कि तुम दोनों ने सीसीपी की निराधार अफवाहों पर विश्वास किया और मेरे धार्मिक अभ्यास के कारण मेरा उत्पीड़न शुरू कर दिया। यह बिल्कुल अविवेकपूर्ण है कि तुम सीसीपी से नफरत करने के बजाय कह रहे हो कि यह सब मेरी गलती है। मैं इस तरह नहीं जी सकती।” मुझे इतना गुस्सा आया कि मैं भागकर खिड़की के पास गई और बाहर कूदने और अपनी जान देने के लिए तैयार हो गई। जैसे ही मैं बाहर कूदने वाली थी तो मेरी सास ने मेरी तरफ इशारा किया और कहा, “आगे बढ़ो और कूद जाओ। खिड़की से बाहर कूदो, कोई भी तुम्हारे लिए अपनी जान कुर्बान नहीं करेगा!” जब उसने ऐसा कहा तो मुझे अचानक होश आ गया और मुझे परमेश्वर के वचन याद आ गए जो कहते हैं : “इन अंत के दिनों में तुम लोगों को परमेश्वर के लिए गवाही देनी चाहिए। चाहे तुम्हारे कष्ट कितने भी बड़े क्यों न हों, तुम्हें बिल्कुल अंत तक चलना चाहिए, यहाँ तक कि अपनी अंतिम साँस तक तुम्हें परमेश्वर के प्रति वफादार होना चाहिए और खुद को परमेश्वर के आयोजन की दया पर छोड़ देना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही सशक्त और गुंजायमान गवाही है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो)। जब मैंने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया तो मेरे चेहरे पर आँसू बहने लगे। भले ही मेरा परिवार मुझे नहीं समझता था और मुझे सताता भी था, फिर भी परमेश्वर मेरा प्रबोधन और मार्गदर्शन करता रहा और उसने मुझे दिखाया कि उसका इरादा क्या था। मुझे पता था कि ऐसे वातावरण में मुझे परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए, उस पर अपनी आस्था बनाए रखनी चाहिए और शैतान को नीचा दिखाने के लिए अपनी गवाही में अडिग रहना चाहिए। फिर भी मैंने परमेश्वर का इरादा नहीं खोजा और थोड़े-से उत्पीड़न का सामना होने पर अपनी जान देकर इससे बचना चाहा। क्या मैं शैतान की साजिश में नहीं फँस गई थी? मैं बहुत मूर्ख थी और गवाही देने में नाकाम रही थी। मैं खुद को शैतान के हाथों मूर्ख नहीं बनने दे सकती थी, मुझे जीना था, परमेश्वर पर विश्वास करना था और अपना कर्तव्य निभाना था चाहे मेरा परिवार मुझे कैसे भी सताए।

जब मेरे पति को एहसास हुआ कि वह मुझे नहीं रोक सकता तो उसने अपने चाचा को बुलाया। चाचा ने मुझसे कहा, “सुना है कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते रहने पर अड़ी हुई हो। तुम्हें पता है कि अगर तुम पकड़ी गई तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ेगा और मेरा भतीजा तुम्हें तलाक दे देगा। अगर तुम आज की रात एक प्रतिज्ञा लिखो कि तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं रखोगी तो यह परिवार एकजुट रह सकता है।” फिर मेरे पति ने मुझे कागज-कलम दिया और प्रतिज्ञा लिखने को कहा। मेरे दिमाग में कई विचार उमड़ रहे थे, “अगर हम वाकई तलाक ले लेते हैं तो हमारी बच्ची का क्या होगा? वह अभी बहुत छोटी है और उसकी देखभाल करने के लिए मेरे नहीं रहने पर दूसरे उसे परेशान कर सकते हैं। अगर मेरे पति ने दोबारा शादी कर ली तो क्या सौतेली माँ उसके साथ दुर्व्यवहार करेगी? क्या वह अच्छी सेहत के साथ बड़ी होगी? अगर मैं बाहरी तौर पर प्रतिज्ञा लिखने और अपनी आस्था गुप्त रखने के लिए सहमत हो जाती हूँ तो परिवार एक साथ रहेगा और मैं विश्वास करती रह सकती हूँ। क्या इससे मेरे दोनों हाथों में लड्डू नहीं होंगे?” लेकिन ऐसा करने के विचार ने मुझे बेचैन कर दिया और इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि मैं उसके इरादे के अनुरूप होकर कैसे चलूँ। प्रार्थना के बाद मुझे लगा कि प्रतिज्ञा लिखना परमेश्वर के साथ विश्वासघात होगा। मुझे लगा कि मैं एक बार फिर शैतान की चालों में लगभग फँस गई हूँ। अगर मैंने प्रतिज्ञा लिखी तो मैं परमेश्वर को धोखा दूँगी और गवाही देने में नाकाम हो जाऊँगी, इसलिए मैं इसे तो बिल्कुल नहीं लिख सकती। जब मैंने अभी तक प्रतिज्ञा लिखना शुरू नहीं किया तो मेरे पति के चाचा ने दाँत पीसते हुए कहा, “क्या तुम परमेश्वर में विश्वास रखना बंद करने से सचमुच मर जाओगी? अगर मेरी पत्नी तुम्हारी तरह व्यवहार करती तो मैं उसके हाथ-पैर तोड़ देता। फिर देखता कि क्या वह तब भी आस्था का अभ्यास करती!” उसके शब्दों से मुझे घिन हुई और मुझे हैरानी हुई कि कोई इंसान इतनी भद्दी बातें कैसे बोल सकता है। क्या वह शैतान की तरह नहीं बोल रहा था? मैंने गुस्से में जवाब दिया, “मैं यह प्रतिज्ञा हरगिज नहीं लिखूँगी!” मेरे इतना कहते ही मेरे पति ने गुस्से में तलाक का अनुबंध उठाया जो उसने लिखा था और बिना किसी हिचकिचाहट के अपने नाम के आगे हस्ताक्षर कर दिए। अनुबंध में लिखा था कि घर और हमारी बच्ची सब कुछ उसके पास रहेगा, जबकि मुझे कोई संपत्ति या हमारी बेटी से मिलने का अधिकार नहीं मिलेगा। भले ही मैंने तलाक के लिए खुद को पहले ही मानसिक रूप से तैयार कर लिया था, लेकिन असल जिंदगी में जब ऐसा हुआ तो मैं भी थोड़ी कमजोर पड़ने लगी। अपने परिवार को इस मुकाम तक पहुँचाने के लिए मैंने कड़ी मेहनत की थी और अब मैं अपने घर से और अपनी बेटी से मिलने के अधिकार से वंचित हो जाऊँगी। मैं इस परिवार और अपनी बेटी को छोड़कर जाने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी, लेकिन मेरा पति मुझ पर दबाव डाल रहा था और मैं अपना मन नहीं बना पा रही थी। तभी मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तुम्हें सत्य के लिए कष्ट उठाने होंगे, तुम्हें सत्य के लिए खुद को बलिदान करना होगा, तुम्हें सत्य के लिए अपमान सहना होगा और तुम्हें और अधिक सत्य प्राप्त करने की खातिर और अधिक कष्ट सहना होगा। यही तुम्हें करना चाहिए। पारिवारिक सामंजस्य का आनंद लेने के लिए तुम्हें सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए और तुम्हें अस्थायी आनंद के लिए जीवन भर की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए। तुम्हें उस सबका अनुसरण करना चाहिए जो खूबसूरत और अच्छा है और तुम्हें जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तुम ऐसा साधारण और सांसारिक जीवन जीते हो और तुम्हारे पास अनुसरण का कोई लक्ष्य नहीं है, तो क्या इससे तुम्हारा जीवन बर्बाद नहीं हो रहा है? ऐसे जीवन से तुम्हें क्या हासिल हो सकता है? तुम्हें एक सत्य के लिए देह के सभी सुखों का त्याग करना चाहिए, और थोड़े-से सुख के लिए सारे सत्यों का त्याग नहीं कर देना चाहिए। ऐसे लोगों में कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं होता!(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि सत्य पाने के लिए कष्ट सहना मूल्यवान और सार्थक है। केवल अपनी आस्था में सत्य का अनुसरण करते हुए बिताया गया जीवन ही सार्थक है। मुझे आरामदायक जीवन मिल सकता था क्योंकि इसके लिए मैं सामंजस्यपूर्ण पारिवारिक जीवन और देह के सुख चुन सकती थी लेकिन ऐसा करने पर परमेश्वर द्वारा बचाए जाने का अवसर गँवा देती तो मुझे जीवन भर इसका पछतावा होता। जहाँ तक मेरी बेटी के भविष्य और उसके जीवन में आने वाले कष्टों का संबंध है, वह सब परमेश्वर पहले ही पूर्वनियत कर चुका है। भले ही मैं उसके साथ रहूँ तो भी मैं सुनिश्चित नहीं कर सकती कि हर दिन उसकी सेहत अच्छी रहेगी, उसका भाग्य बदल पाना तो दूर की बात है। मुझे उसका भाग्य परमेश्वर पर छोड़ना था और उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना था। एक बार जब मैंने परमेश्वर का इरादा समझ लिया तो मुझे एहसास हुआ कि मुझे आगे का रास्ता मिल गया है और मुझे उतनी परेशानी नहीं हुई। फिर मुझे परमेश्वर के वचनों का एक और अंश याद आया जिसमें कहा गया है : “जो कोई परमेश्वर को नहीं पहचानता, शत्रु है; यानी जो कोई भी परमेश्वर के देहधारण को नहीं पहचानता—चाहे वह इस धारा के भीतर है या बाहर—एक मसीह-विरोधी है! परमेश्वर पर विश्वास न रखने वाले प्रतिरोधियों के सिवाय भला शैतान कौन हैं, राक्षस कौन हैं और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं?” “विश्वासी और अविश्वासी अंतर्निहित रूप से एक दूसरे के प्रति सुसंगत नहीं हैं; बल्कि वे परस्पर विरोधी हैं(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करने पर मैंने सोचा कि कैसे जब मेरे पति ने सुना था कि सीसीपी द्वारा परमेश्वर के विश्वासियों को गिरफ्तार किया जाएगा और उन पर अत्याचार किया जाएगा तो उसने मेरा उत्पीड़न शुरू कर दिया, मुझे परमेश्वर के वचन पढ़ने नहीं दिए, मुझे भाई-बहनों से मिलने से रोका, मेरी आस्था के अभ्यास में बाधा डालने के लिए हर संभव साधन का इस्तेमाल किया और यहाँ तक कि मुझे सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो में भेजने की धमकी भी दी जहाँ मेरा सामना निश्चित खतरे से होता। अब वह मुझे एक प्रतिज्ञा लिखने के लिए मजबूर कर रहा था कि मैं आस्था का अभ्यास नहीं करूँगी, मेरे नहीं लिखने पर मुझे तलाक देने और बाहर निकालने और कुछ भी नहीं देने की कसमें खा रहा था, मैंने देखा कि मेरा पति परमेश्वर का विरोध करने वाले, सत्य से घृणा करने वाले राक्षस से ज्यादा कुछ नहीं था। यह देखकर कि उसने परमेश्वर का विरोध करने में सीसीपी का साथ दिया है जबकि मैंने परमेश्वर का अनुसरण करने और सही मार्ग पर चलने की कोशिश की है, हम स्पष्टता से अलग-अलग रास्तों पर चल रहे थे और अगर हम साथ रहे तो हमें सिर्फ कष्ट ही मिलेगा। इसका एहसास होने पर मैं शांति से स्थिति का सामना कर पाई और तलाक के कागजों पर अपने हस्ताक्षर करने का फैसला लिया।

इस उत्पीड़न के अनुभव के जरिए मैंने सीसीपी की घृणित, विकर्षणकारी, परमेश्वर-विरोधी प्रकृति पहचान ली। जैसा कि परमेश्वर के वचन कहते हैं : “कौन-सी धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के कौन-से वैध अधिकार और हित? ये सब बुराई को छिपाने की चालें हैं! ... परमेश्वर के कार्य को इतनी पूरी तरह क्यों बाधित करना? परमेश्वर के लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न चालें क्यों चलना? वास्तविक स्वतंत्रता और वैध अधिकार एवं हित कहाँ हैं? निष्पक्षता कहाँ है? आराम कहाँ है? गर्मजोशी कहाँ है? परमेश्वर के जनों को छलने के लिए धोखे भरी चालों का उपयोग क्यों करना? परमेश्वर के आगमन को दबाने के लिए बल का इस्तेमाल क्यों करना? क्यों नहीं परमेश्वर को उस धरती पर स्वतंत्रता से घूमने दिया जाए जिसे उसने बनाया? क्यों परमेश्वर को इस हद तक खदेड़ा जाए कि उसके पास सिर रखने के लिए जगह भी न रहे?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (8))। सीसीपी का शासन ही शैतान का शासन है। अपने निरंकुश शासन की स्थिरता सुदृढ़ करने के लिए सीसीपी परमेश्वर का घोर विरोध करती है और मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के कार्य को बाधित और नष्ट करने के लिए पूरी ताकत लगाती है। वे मीडिया का इस्तेमाल परमेश्वर के बारे में अफवाहें फैलाने, बदनाम, निंदा और ईशनिंदा करने के लिए करते हैं, वे ईसाइयों को गिरफ्तार करने और उन पर अत्याचार करने के लिए हर प्रकार की साजिशें करते हैं और उन्हें सताने और हमला करने के लिए ईसाइयों के परिवारों को गुमराह कर उकसाते हैं, जिससे उनके परिवार बिखर जाते हैं। फिर भी वे सत्य को उलट देते हैं और दावा करते हैं कि विश्वासी अपने परिवार त्याग रहे हैं—वे कितने घृणित और बुरे हैं! इस उत्पीड़न का अनुभव करने पर मैंने अपने पति की सत्य से घृणा करने की वास्तविक प्रकृति पहचान ली। मुझे यह भी समझ आया कि मैं एकमात्र परमेश्वर पर ही भरोसा कर सकती हूँ। जब मैं सबसे कमजोर और परेशान थी तो परमेश्वर के वचनों ने मुझे बार-बार प्रबुद्ध किया और मेरा मार्गदर्शन किया, मुझमें आस्था और शक्ति भर दी और शैतान की बुरी साजिशों को समझने में मेरी मदद की ताकि मैं उत्पीड़न का सामना करने में दृढ़ रह सकूँ। अब से मैं सत्य का अनुसरण करना जारी रखूँगी और परमेश्वर का ऋण चुकाने के लिए अपने कर्तव्य ठीक से निभाऊँगी।

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