3. जेल में बिताए साढ़े तीन सालों से मैंने क्या पाया
सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि वह अपने भाग्य और भविष्य की संभावनाओं के सिवाय और कुछ नहीं सोचता, और उनसे बहुत प्रेम करता है। मनुष्य अपने भाग्य और भविष्य की संभावनाओं के वास्ते परमेश्वर का अनुसरण करता है; वह परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम की वजह से उसकी आराधना नहीं करता। और इसलिए, मनुष्य पर विजय में, मनुष्य के स्वार्थ, लोभ और ऐसी सभी चीजों को काट-छाँटकर मिटा दिया जाना चाहिए, जो उसके द्वारा परमेश्वर की आराधना में सबसे अधिक व्यवधान डालती हैं। ऐसा करने से मनुष्य पर विजय के परिणाम प्राप्त कर लिए जाएँगे। परिणामस्वरूप, मनुष्य पर विजय के पहले चरणों में यह जरूरी है कि मनुष्य की अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं और सबसे घातक कमजोरियों को शुद्ध किया जाए, और इसके माध्यम से मनुष्य का परमेश्वर-प्रेमी हृदय उजागर किया जाए, और मानव-जीवन के बारे में उसके ज्ञान को, परमेश्वर के बारे में उसके दृष्टिकोण को, और उसके अस्तित्व के अर्थ को बदल दिया जाए। इस तरह से, मनुष्य के परमेश्वर-प्रेमी हृदय की शुद्धि होती है, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य के हृदय को जीत लिया जाता है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना)। परमेश्वर के वचनों के इस अंश को पढ़कर, मुझे अपनी गिरफ्तारी का एक अनुभव याद आता है। इसने मुझे सचमुच एहसास कराया कि परमेश्वर के वचन कितने व्यावहारिक हैं। अगर कोई इंसान अपने भविष्य और नियति की परवाह छोड़कर, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और उससे प्रेम करने में सक्षम होना चाहता है, तो उसे अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, परीक्षणों और शोधन का अनुभव करना ही होगा।
2012 के अंत में, सुसमाचार का प्रचार करते समय मुझे सीसीपी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। पुलिस की बार-बार की पूछताछ और जबरन जुर्म कबूल करवाने की कोशिशों के दौरान, यह परमेश्वर के वचन ही थे जिन्होंने मेरा मेरा मार्गदर्शन किया जिससे मैं यहूदा बने बिना अपनी गवाही में अडिग रही। पुलिस को कलीसिया के बारे में जो जानकारी चाहिए थी, वह नहीं मिली और अंत में, उन्होंने मुझे “कानून के कार्यान्वयन को कमजोर करने” के आरोप में साढ़े तीन साल की जेल की सज़ा सुनाई। हालाँकि गिरफ्तारी के बाद मैंने खुद को कैद के लिए तैयार कर लिया था, लेकिन फैसला पढ़ने पर मेरा दिल फिर भी उथल-पुथल में था। मैंने मन ही मन दिनों को गिना, “साढ़े तीन साल—यह तो एक हज़ार से ज़्यादा दिन और रातें हैं! मैं यह समय कैसे काटूँगा?” जब मैंने एक पूर्व कैदी को यह कहते हुए सुना तो मैं सचमुच चिंतित हो गया, “जेल में बहुत अंधेर है और अगर काम खत्म नहीं हुआ या ठीक से नहीं किया गया, तो तुम्हें पीटा जाएगा। कमजोर लोग अंदर ही मर जाते हैं और वहाँ मरने वाला किसी कुत्ते की तरह मरता है—जेल के गार्डों को बिल्कुल भी परवाह नहीं होती।” मैं थोड़ा डर गया और मन ही मन सोचने लगा, “हिरासत घर में बिताए महीनों में, मेरी पेट की बीमारी और भी बदतर हो गई थी और पेट से खून बहने लगा था। हर बार जब मैं शौचालय जाता हूँ, तो खून के थक्के निकलते हैं। मेरे पैर और पंजे भी कुछ सूज गए हैं। मेरे ऐसे शरीर के साथ, क्या मैं उस अमानवीय जेल में इतने साल बिताने के बाद ज़िंदा बाहर आ पाऊँगा? जेल में मरा तो क्या मैं उस दिन को देखने से चूक नहीं जाऊँगा जब परमेश्वर का राज्य साकार होगा?” इन बातों के बारे में सोचकर, मैं अपने भविष्य के बारे में चिंता किए बिना नहीं रह सका और मेरे दिल में परमेश्वर के प्रति कुछ गलतफहमी थी : क्या परमेश्वर मुझे प्रकट करने और हटाने के लिए इस स्थिति का उपयोग कर रहा था? हालाँकि मैं जानता था कि मुझे परमेश्वर को गलत नहीं समझना चाहिए और उसने जिस स्थिति की व्यवस्था की थी, वह मेरी ज़रूरत थी, फिर भी कई दिनों तक मेरे दिल में उथल-पुथल मची रही और मैं रात को सो नहीं सका। अपनी पीड़ा में, मैंने बार-बार परमेश्वर से पुकारकर कहा, “परमेश्वर, मैं जानता हूँ कि तुझे गलत समझना सही नहीं है, लेकिन मैं इस समय बहुत कमज़ोर हूँ। कृपया मुझे आगे के हालात का सामना करने के लिए आस्था और शक्ति दे।” प्रार्थना करने के बाद, मुझे पुराने नियम का एक वचन याद आया, जहाँ यहोवा परमेश्वर ने यहोशू से बात की थी : “हियाव बाँधकर दृढ़ हो जा; भय न खा, और तेरा मन कच्चा न हो; क्योंकि जहाँ जहाँ तू जाएगा वहाँ वहाँ तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे संग रहेगा” (यहोशू 1:9)। मैंने यह भी सोचा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर क्या कहता है : “ब्रह्मांड में समस्त चीजों में से ऐसी कोई चीज नहीं है, जिसमें मेरी बात आखिरी न हो। क्या कोई ऐसी चीज है, जो मेरे हाथ में न हो?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 1)। परमेश्वर हर चीज़ पर संप्रभु है और सब कुछ नियंत्रित करता है, तो सीसीपी की जेल में भी, क्या मेरी किस्मत अभी भी परमेश्वर के हाथों में नहीं है? यह सोचकर, मेरे दिल में मुक्ति का एहसास हुआ।
अक्टूबर 2013 में एक दिन, मुझे अपनी सज़ा काटने के लिए जेल भेज दिया गया। चीनी जेलों में, कैदी उनके लिए बस पैसा कमाने वाले मुफ्त के मजदूर होते हैं। कैदी दिन में 16 से 17 घंटे काम करते हैं और कभी-कभी जिस काम को तत्काल खत्म करना होता है उसमें ज्यादा समय लग जाता है; जो लोग अपने काम पूरे नहीं कर पाते, उन्हें शारीरिक दंड दिया जाता है। उस समय मेरा काम इस्त्री करना था। मुझे दिन में दस घंटे से ज़्यादा एक ही स्थिति में इस्त्री पकड़नी पड़ती थी और मुझे तेज़ी से काम करना पड़ता था। क्योंकि जेल एक असेंबली लाइन की तरह काम करती थी, अगर एक व्यक्ति धीमा होता, तो इसका असर पूरी प्रोडक्शन लाइन की गति पर पड़ता था और अगर किसी के कारण देरी होती, तो उसे सज़ा दी जाती थी। इतनी देर तक इस्त्री को कसकर पकड़ने से मेरी दो उंगलियाँ सीधी नहीं हो पाती थीं और मुझे उन्हें सीधा करने के लिए ज़ोर लगाना पड़ता था। जैसा कि कहा जाता है, “उंगलियाँ दिल से जुड़ी होती हैं,” और कभी-कभी मेरे हाथ का दर्द इतना बढ़ जाता था कि मैं रात को सो नहीं पाता था। बहुत ज़्यादा काम का बोझ, साथ ही मेरे पेट से खून बहना जो अभी तक पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ था, इन सबसे मेरा शरीर बेहद कमज़ोर हो गया और जेल में तीन महीने के अंदर ही मुझे पीठ दर्द, सीने में जकड़न और साँस लेने में तकलीफ होने लगी। आगे की लंबी सज़ा के बारे में सोचकर ही, मुझे डर लगता था कि अगर ऐसा ही चलता रहा, तो भले ही मैं मरूँ नहीं, पर अपाहिज ज़रूर हो जाऊँगा। अगर मैं अपाहिज हो गया, तो जेल के बाद की ज़िंदगी मुश्किल हो जाएगी, तो मैं अपने कर्तव्य कैसे निभाऊँगा? अगर मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा पाया, तो क्या मेरे उद्धार पाने का मौका चला नहीं जाएगा? मैं बेसब्री से चाहता था कि परमेश्वर जल्द ही बड़े लाल अजगर को दंड दे, क्योंकि अगर बड़ा लाल अजगर गिर गया, तो मुझे ये मुश्किलें नहीं सहनी पड़ेंगी। उस दौरान, मैं बाहर की खबरों पर बहुत ध्यान देता था और जब नए कैदी आते, तो मैं यह जानने की कोशिश करता कि बाहर के हालात कैसे हैं, पूछता कि क्या कोई विनाश या उथल-पुथल हो रही है। लेकिन दिन-ब-दिन, बाहर के हालात शांत ही बने रहे और मैं कुछ निराश हो गया। परमेश्वर बड़े लाल अजगर को दंड क्यों नहीं दे रहा था? अगर मैं इस तरह बहुत लंबे समय तक जेल में रहा, तो भले ही मैं मरूँ नहीं, पर अपाहिज ज़रूर हो जाऊँगा! इन बातों को सोचकर, मेरा दिल अंधकार और हताशा से भर गया। अपनी पीड़ा में, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, बस यह सोचकर कि मेरा हाथ अपाहिज हो जाएगा, मैं बहुत हताश हो जाता हूँ और मुझे चिंता रहती है कि अगर मैं अपाहिज हो गया, तो ज़िंदगी में मेरा कोई सहारा नहीं रहेगा। मुझे यह भी चिंता है कि मैं अपने कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगा और इसलिए उद्धार नहीं पा सकूँगा। परमेश्वर, कृपया मुझे इस गलत दशा से बाहर निकाल।”
एक दिन बाहर घूमने के समय, मैंने देखा कि दूर के पहाड़, जो कभी पीले और बंजर थे, न जाने कब हरे-भरे हो गए थे। जब मैं पहाड़ों पर खिले फूलों और घास को देख रहा था, तो परमेश्वर के कुछ वचन मेरे मन में कौंध गए : “ढलानों पर फूलों और घास का तो फैलाव होता है, लेकिन वसंत ऋतु के आने से पहले कुमुदिनी पृथ्वी पर मेरी महिमा को चार चाँद लगा देती है—क्या मनुष्य ऐसी चीज़ें हासिल कर सकता है? क्या वह पृथ्वी पर मेरी वापसी से पहले मेरी गवाही दे सकता है? क्या वह बड़े लाल अजगर के देश में मेरे नाम की खातिर खुद को समर्पित कर सकता है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 34)। मैं परमेश्वर के इन वचनों पर बार-बार विचार करने लगा, यह सोचते हुए कि फूल और घास, हालाँकि साधारण और सादे हैं, पर वे सृष्टिकर्ता से कुछ नहीं माँगते। चाहे वे जमा देने वाली सर्दियों का अनुभव करें या चिलचिलाती गर्मियों का, वे फिर भी साल-दर-साल उन नियमों के अनुसार उगते और खिलते हैं जो परमेश्वर ने उनके लिए निर्धारित किए हैं, परमेश्वर द्वारा बनाई गई पृथ्वी की सुंदरता बढ़ाते हैं और परमेश्वर के कर्मों के आश्चर्य की गवाही देते हैं। परमेश्वर कहता है : “ढलानों पर फूलों और घास का तो फैलाव होता है, लेकिन वसंत ऋतु के आने से पहले कुमुदिनी पृथ्वी पर मेरी महिमा को चार चाँद लगा देती है” मैं साफ-साफ समझ गया कि परमेश्वर मुझे मेरी हताशा से बाहर निकालने के लिए इन वचनों का इस्तेमाल कर रहा है, और यह सोचकर मेरा मन छू गया और मैं शर्मिंदा भी हुआ। फूलों और घास की तरह, मैं भी एक छोटा-सा सृजित प्राणी हूँ, लेकिन मैं लगातार यह माँग कर रहा था कि परमेश्वर मेरी इच्छा के अनुसार काम करे और जब परमेश्वर ने मेरी माँगें पूरी नहीं कीं और बड़े लाल अजगर को दंड नहीं दिया, तो मेरा दिल उससे दूर हो गया। मुझमें सचमुच विवेक की कमी थी! जब परमेश्वर अपना कार्य करता है, तो उसकी अपनी योजना होती है और परमेश्वर बड़े लाल अजगर को नष्ट करने का सही समय जानता है। मुझे सब कुछ परमेश्वर के आयोजन पर छोड़ देना चाहिए। इसके अलावा, मैं अपाहिज होऊँगा या नहीं, मैं जीवित रहूँगा या नहीं और मैं अपने कर्तव्य निभा पाऊँगा या नहीं, यह सब परमेश्वर के हाथों में था। मेरी चिंताएँ अनावश्यक थीं। इन बातों को सोचकर, मेरा दिल पहले से अधिक शांत हो गया।
बाद में, मैंने एक दूसरे कैदी के पास ‘प्रसिद्ध लोगों की आस्था’ नाम की एक किताब देखी, जिसमें कई जाने-माने चीनी और विदेशी मिशनरियों के वृत्तांत शामिल थे, जैसे कि हडसन टेलर, रॉबर्ट मॉरिसन, और वांग मिंगदाओ, वॉचमैन नी और अन्य। मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि मुझे सीसीपी की कड़ी निगरानी वाली जेल में ऐसी किताब मिलेगी, इसलिए मैंने उत्सुकता से उसे पढ़ने के लिए उधार ले लिया। किताब में युगों-युगों के संतों की सुंदर गवाहियों से मैं बहुत प्रोत्साहित हुआ और मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “अब जो कुछ मैं तुम लोगों को देता हूँ, वह मूसा से बढ़कर और दाऊद से बड़ा है, अतः उसी प्रकार मैं कहता हूँ कि तुम्हारी गवाही मूसा से बढ़कर और तुम्हारे वचन दाऊद के वचनों से बड़े हों। मैं तुम लोगों को सौ गुना देता हूँ—अतः उसी प्रकार मैं तुम लोगों से कहता हूँ मुझे उतना ही वापस करो। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि वह मैं ही हूँ, जो मनुष्य को जीवन देता है, और तुम्हीं लोग हो, जो मुझसे जीवन प्राप्त करते हो और तुम्हें मेरी गवाही अवश्य देनी चाहिए। यह तुम लोगों का वह कर्तव्य है, जिसे मैं नीचे तुम लोगों के लिए भेजता हूँ और जिसे तुम लोगों को मेरे लिए अवश्य निभाना चाहिए। ... तुम लोग यशायाह और यूहन्ना की अपेक्षा स्वर्ग के मेरे रहस्यों को कहीं ज़्यादा समझते हो; पिछली पीढ़ियों के सभी संतों की अपेक्षा तुम लोग मेरी मनोरमता और पूजनीयता को कहीं ज़्यादा जानते हो। तुम लोगों ने जो प्राप्त किया है वह केवल मेरा सत्य, मेरा मार्ग और मेरा जीवन नहीं है, बल्कि यूहन्ना के दर्शन और प्रकाशन से भी बड़े दर्शन और प्रकाशन को प्राप्त किया है। तुम लोग और भी बहुत सारे रहस्य समझते हो और तुमने मेरा सच्चा चेहरा भी देख लिया है; तुम लोगों ने मेरे न्याय को और अधिक स्वीकार किया है और तुम मेरे धार्मिक स्वभाव को और अधिक जानते हो। और इसलिए, यद्यपि तुम लोग इन अंत के दिनों में जन्मे हो, फिर भी तुम लोग पूर्व की और पिछली बातों की भी समझ रखते हो, और तुम लोगों ने आज की चीजों का भी अनुभव किया है, और यह सब मेरे द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया था। जो मैं तुम लोगों से माँगता हूँ, वह बहुत ज्यादा नहीं है, क्योंकि मैंने तुम लोगों को इतना ज़्यादा दिया है और तुम लोगों ने मुझमें बहुत-कुछ देखा है। इसलिए, मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि सभी युगों के संतों के लिए मेरी गवाही दो, और यह मेरे हृदय की एकमात्र इच्छा है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम आस्था के बारे में क्या जानते हो?)। मैंने पिछली पीढ़ियों के संतों के बारे में सोचा। उन्हें परमेश्वर के इतने वचनों का सिंचन और प्रावधान नहीं मिला था, जितना मुझे मिला है, लेकिन उन्होंने प्रभु यीशु के उद्धार की गवाही देने के लिए अपनी जान दे दी। कुछ को पत्थर मारकर मार डाला गया, कुछ को घोड़ों से चीर दिया गया, कुछ को आरी से काट दिया गया और दूसरों को उल्टा सूली पर चढ़ा दिया गया, लेकिन उन सभी ने परमेश्वर के लिए एक सुंदर और ज़ोरदार गवाही दी। मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इतने सारे वचनों का सिंचन और प्रावधान मिला है, इसलिए मुझे परमेश्वर के लिए एक सुंदर और ज़ोरदार गवाही देनी चाहिए जैसी पिछली पीढ़ियों के संतों ने शैतान को शर्मिंदा करने के लिए दी थी। यह हम लोगों के लिए भी परमेश्वर की अपेक्षा है, जिन्होंने उसके अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार किया है। इस बारे में सोचकर, मैंने पिछली पीढ़ियों के संतों के उदाहरण का अनुसरण करने का संकल्प पाया। मैं अपनी देह से विद्रोह करने और परमेश्वर से अपनी अनुचित माँगें छोड़ने, अपने भविष्य और मंज़िल को परमेश्वर के हाथों में सौंपने और खुद को उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं की दया पर छोड़ने को तैयार हो गया। भले ही मैं सचमुच अपाहिज हो जाऊँ, फिर भी मैं अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करूँगा। इसके अलावा, भले ही मैं सीसीपी द्वारा जेल में सचमुच तड़पा-तड़पा कर मार डाला जाऊँ, तो यह धार्मिकता की खातिर उत्पीड़न होगा। यह एक गौरवशाली बात है और मुझे दुखी नहीं होना चाहिए। इसके बजाय, मुझे अपनी गवाही में अडिग रहने के लिए परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए। आने वाले दिनों में, मैंने सचेत रूप से परमेश्वर के उन वचनों पर विचार किया जो मुझे याद थे, मैंने सीखे हुए भजन गाए और अपनी मुश्किलें भी परमेश्वर को सौंप दीं, उसकी ओर देखते हुए। धीरे-धीरे, मेरी दशा में सुधार हुआ।
मैंने सोचा कि इस अनुभव के ज़रिए, मैं अपने भविष्य और मंज़िल के बारे में सोचना छोड़ पाया हूँ, लेकिन मुझपर आ पड़े एक नए हालात ने मुझे प्रकट कर दिया और मुझे स्पष्ट समझा दिया कि ऐसा करना इतना आसान नहीं होगा। 2014 की सर्दियों में, मेरी कमज़ोरी और जेल के बेहद खराब हालात के कारण, जहाँ मुझे कड़ाके की ठंड में भी ठंडे नल के पानी से बाल धोने और नहाने पड़ते थे, मैं लगभग हमेशा सर्दी-जुकाम और बहती नाक से परेशान रहता था। समय के साथ, बार-बार नाक साफ करने से मेरी नाक की केशिकाएँ फट गईं। शुरू में तो बस रुक-रुक कर थोड़ा-थोड़ा खून बहता था, लेकिन समय के साथ खून बहना और भी गंभीर हो गया, आखिरकार, कई बार तो मेरी नाक से नल के पानी की तरह लगातार खून बहने लगा। गार्डों ने देखा कि मेरा बहुत ज़्यादा खून बह रहा है और उन्हें डर था कि मैं वर्कशॉप में ही मर जाऊँगा, इसलिए उन्होंने मुझे जेल के अस्पताल भेज दिया। हालाँकि, जेल के अस्पताल में चिकित्सा सुविधाएँ बहुत खराब थीं और डॉक्टर ने मुझे बस एक आईवी लगा दी और खून रोकने के लिए कोई उपाय नहीं किया। उसने मेरे सामने एक प्लास्टिक की बाल्टी भी रख दी और बेरुखी से कहा, “अगर खून बहना ही है, तो बाल्टी में बहाओ। फर्श पर खून बहाकर उसे गंदा मत करना।” यह कहकर, वह मुड़ा और चला गया। मेरी नाक से रुक-रुक कर खून बहता रहा, इसलिए मैंने खून रोकने के लिए अपनी नाक में टिश्यू पेपर ठूँस लिए। लेकिन नाक बंद होने से, मेरे मुँह से खून बहने लगा। बहुत ज़्यादा खून बहने से, मैं महसूस कर सकता था कि मेरे शरीर से गर्मी धीरे-धीरे निकल रही है। मेरी नाक से रुक-रुक कर खून बहता रहा और कुछ ही देर में, मैंने टिश्यू पेपर का पूरा एक पैकेट इस्तेमाल कर लिया। मेरी सारी ताकत खत्म हो गई थी और मैं अपने मुँह और नाक से खून को अपने कपड़ों पर बहने से नहीं रोक सकता था। कुछ ही देर में, मेरी छाती पर एक बड़ा लाल धब्बा बन गया और मुझे और भी ठंड लगने लगी। मैं बस कमज़ोरी से ठंडी दीवार के सहारे झुक गया और मुझे लगा जैसे मैं अपनी आखिरी साँसें गिन रहा हूँ। छत को घूरते हुए, मैंने मन ही मन सोचा, “अगर ऐसा ही चलता रहा, तो ज़्यादा समय नहीं लगेगा और खून बह जाने से मैं मर जाऊँगा। अगर मैं इस तरह यहाँ जेल में मर गया, तो किसी को पता भी नहीं चलेगा। मैं अपने भाई-बहनों को फिर कभी नहीं देख पाऊँगा, परमेश्वर की महिमा का दिन देखना तो दूर की बात है।” मैंने यह भी सोचा कि कैसे, परमेश्वर को पाने के बाद, मैंने सीसीपी द्वारा पीछा किए जाने के कारण अपना करियर छोड़ दिया था और अपना घर छोड़ दिया था और कैसे मैं लगातार कलीसिया में अपना कर्तव्य निभा रहा था। मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि आशीष पाने के बजाय मैं जेल में ही मर जाऊँगा। मैं जितना ज़्यादा सोचता, उतना ही बुरा महसूस करता और मेरा दिल वीरानी से भर गया। अपनी पीड़ा में, मैंने चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, जो मुझ पर बीत रही है, उसमें तेरी इच्छा शामिल है, लेकिन मेरी हैसियत बहुत छोटी है और यह देखकर कि मैं मरने वाला हूँ, मेरा दिल दर्द और निराशा से भर गया है। परमेश्वर, कृपया मुझे आस्था और सामर्थ्य दे, ताकि मैं तेरे जरिये मजबूत बन सकूँ।” प्रार्थना करने के बाद, मैंने सोचा कि अय्यूब ने अपने परीक्षणों के दौरान क्या कहा था : “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (अय्यूब 1:21)। जब अय्यूब पर शैतान की परीक्षा आई, तो उसने अपनी सारी संपत्ति और बच्चे खो दिए और उसका पूरा शरीर दर्दनाक फोड़ों से ढक गया। ये बातें किसी के लिए भी असहनीय आघात होतीं, लेकिन अय्यूब के दिल में परमेश्वर का भय था। उसने परमेश्वर के खिलाफ़ शिकायत नहीं की, न ही उसने अपने मुँह से पाप किया, बल्कि उसने इसे परमेश्वर से ग्रहण किया, यह विश्वास करते हुए कि उसकी सारी दौलत और बच्चे उसे परमेश्वर ने ही दिए थे और हालाँकि यह लुटेरों की लूटपाट जैसा लग रहा था, पर इसकी अनुमति परमेश्वर ने दी थी। इसलिए, अय्यूब ने परमेश्वर द्वारा वापस लिए जाने के प्रति समर्पण किया और स्वेच्छा से अपनी हर चीज़ परमेश्वर को लौटा दी, फिर भी परमेश्वर के पवित्र नाम की स्तुति की। शैतान के प्रलोभनों के बीच, अय्यूब की आस्था, समर्पण और परमेश्वर के भय ने उसे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रहने और शैतान को शर्मिंदा करने की अनुमति दी और उसे परमेश्वर की स्वीकृति और आशीष मिली। अय्यूब की गवाही पर मनन करते हुए, मुझे एहसास हुआ कि मेरे पास जो कुछ भी है, यहाँ तक कि मेरी ज़िंदगी भी, परमेश्वर की ही दी हुई है, और परमेश्वर का इसे वापस लेना सही है, और मुझे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए। लेकिन मौत का सामना करते हुए, मैंने खुद को दर्द और निराशा में पाया और मेरा दिल तैयार नहीं था। मैंने देखा कि मुझमें परमेश्वर के प्रति कोई समर्पण नहीं था और मेरी आस्था सचमुच दयनीय थी। यह महसूस करते हुए, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं अपनी ज़िंदगी तेरे हाथों में सौंपने को तैयार हूँ। मैं जीऊँ या मरूँ, मैं तेरी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने को तैयार हूँ।” प्रार्थना करने के बाद, मेरा दिल कहीं अधिक शांत हो गया और मैंने महसूस किया कि परमेश्वर ही मेरा मज़बूत और शक्तिशाली सहारा है। अप्रत्याशित रूप से, जब मैंने अपनी ज़िंदगी और मौत पूरी तरह से परमेश्वर को सौंप दी, तो मैंने उसके कर्मों को देखा और परमेश्वर ने एक ऐसे कैदी को खड़ा किया जिसे मैं नहीं जानता था, वह जेल अस्पताल के निदेशक के पास गया और यह कहते हुए कि मैं निदेशक के ही शहर का हूँ, उससे मेरी मदद करने के लिए कहा। सच तो यह है कि मैं निदेशक के शहर का नहीं हूँ। जब निदेशक आया और उसने मुझे खून से लथपथ देखा तो उसने जल्दी से कहा, “चिंता मत करो, मैं तुम्हें खून चढ़ाने और आपातकालीन इलाज के लिए शहर के अस्पताल ले जाने के लिए किसी को भेजता हूँ।” लेकिन जेल के गार्ड द्वारा मुझे शहर के अस्पताल ले जाने के बाद, खर्च बचाने के लिए, मुझ पर सिर्फ खून रोकने की सर्जरी की गई और मुझे खून नहीं चढ़ाया गया। मैंने सोचा कि चूँकि मेरा इतना खून बह चुका है, गार्ड निश्चित रूप से मुझे कुछ दिनों के लिए आराम करने की व्यवस्था करेंगे। लेकिन अप्रत्याशित रूप से, जैसे ही मैं ऑपरेशन टेबल से उतरा, गार्डों ने मुझे सीधे वर्कशॉप में काम पर वापस भेज दिया। मुझे चक्कर आ रहा था और दुनिया मेरे चारों ओर घूम रही थी। इंसानी जीवन के लिए जो सीसीपी की घृणा है उससे मुझे दिल से नफरत हो गई। मैं परमेश्वर में विश्वास करके और सुसमाचार का प्रचार करके ज़िंदगी में सही रास्ते पर चल रहा था, फिर भी मैं सीसीपी से ऐसी क्रूरता झेल रहा था! नफरत के अलावा, मेरा दिल दुख से भर गया और मैंने सोचा, “लगता है कि इस बार मैं सचमुच जेल में ही मर जाऊँगा और मैं उस दिन को कभी नहीं देख पाऊँगा जब परमेश्वर का राज्य आएगा।” मुझे एहसास हुआ कि मेरी दशा गलत थी, पिछले अनुभवों को याद करूँ तो मैं जानता था कि इस बीमारी से परमेश्वर मेरा परीक्षण कर रहा था। मैं परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने और उसका इरादा खोजने को तैयार था। बाद में, जब मैंने समर्पण किया, तो मैंने फिर से परमेश्वर के कर्मों को देखा। मेरे गृहनगर के एक जेल गार्ड ने मेरी स्थिति के बारे में सुना और वर्कशॉप के अगुआ से मेरे लिए सिफारिश की, जिससे मुझे कुछ दिनों के लिए आराम करने को मिला और मैं आखिरकार ठीक हो गया। मैंने परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और संप्रभुता को देखा और उसमें मेरी आस्था और बढ़ गई और मैं समझ गया कि मैं जीऊँ या मरूँ, यह परमेश्वर पर निर्भर है। बड़ा लाल अजगर कितना भी दुष्ट क्यों न हो या वह मुझे मारने की कितनी भी कोशिश क्यों न करे, परमेश्वर की अनुमति के बिना, कोई भी मेरी जान नहीं ले सकता।
मैंने सोचा कि इन सभी मौकों पर जब मैंने इन हालात का सामना किया था, तो मैं अपने भविष्य और मंज़िल के बारे में चिंतित था, हमेशा यह चिंता करता था कि अगर मैं मर गया, तो मैं उद्धार नहीं पा सकूँगा और मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर ने जो हालात बनाए थे, वे सिर्फ मुझे सीसीपी की दुष्टता दिखाने के लिए नहीं थे, बल्कि इसलिए भी थे ताकि मुझे अपने ही भ्रष्ट स्वभाव का एहसास हो। मैंने परमेश्वर के वचन याद किए : “परमेश्वर पर विश्वास करते हुए लोग भविष्य के लिए आशीष पाने में लगे रहते हैं; यही उनके विश्वास का लक्ष्य होता है। सभी लोगों की यही मंशा और आशा होती है, लेकिन उनकी प्रकृति की भ्रष्टता परीक्षणों और शोधन के माध्यम से जरूर दूर की जानी चाहिए। लोग जिन-जिन पहलुओं में शुद्ध नहीं होते और भ्रष्टता दिखाते हैं उन पहलुओं में उन्हें परिष्कृत किया जाना चाहिए—यह परमेश्वर की व्यवस्था है। परमेश्वर तुम्हारे लिए एक परिवेश बनाता है, तुम्हें उसमें परिष्कृत होने के लिए बाध्य करता है जिससे तुम अपनी भ्रष्टता को जान जाओ। अंततः तुम उस मुकाम पर पहुँच जाते हो जहाँ तुम अपने मंसूबों और इच्छाओं को छोड़ने और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करना चाहते हो, भले ही इसका मतलब मृत्यु हो” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए और उनकी तुलना अपने अनुभवों से करते हुए, मुझे एहसास हुआ कि केवल शोधन के माध्यम से ही कोई व्यक्ति अपने वास्तविक आध्यात्मिक कद को स्पष्ट रूप से देख सकता है और अपनी भ्रष्टता को समझ सकता है। पहले, मैं हमेशा सोचता था कि अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपने परिवार और करियर को त्यागना, बड़े लाल अजगर की गिरफ्तारी और उत्पीड़न का सामना करना और परमेश्वर के साथ विश्वासघात न करना, मुझे एक सच्चा विश्वासी बनाता है। लेकिन इस स्थिति में, मैंने आखिरकार देखा कि मैं सिर्फ एक अच्छे भविष्य और मंज़िल के लिए परमेश्वर में विश्वास कर रहा था और मैं ईमानदारी से परमेश्वर को संतुष्ट नहीं करना चाहता था। इसलिए जैसे ही मैंने देखा कि मैं आशीषें नहीं पा सकता, मैं निराश और दुखी हो गया। जब मुझे पहली बार अपनी साढ़े तीन साल की सज़ा के बारे में पता चला, तो मैंने सोचा कि मेरे पेट से खून बहना कितना गंभीर था और मेरा शरीर कितना कमज़ोर था और मुझे डर था कि मैं जेल में ही मर जाऊँगा और राज्य के साकार होने का दिन कभी नहीं देख पाऊँगा। इस वजह से, मैं इतना अधिक परेशान था कि सो नहीं पाता था और मैंने यह भी गलत समझ लिया था कि परमेश्वर मुझे हटाने के लिए इस स्थिति का उपयोग कर रहा है। जेल में आने के बाद, बहुत ज़्यादा मेहनत के कारण, मैं अपनी उंगलियाँ सीधी नहीं कर पाता था और मुझे चिंता थी कि अगर मैं अपाहिज हो गया, तो ज़िंदगी में मेरा कोई सहारा नहीं रहेगा। मुझे यह भी चिंता थी कि मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगा और इसलिए उद्धार नहीं पा सकूँगा, इसलिए मैं चाहता था कि परमेश्वर जल्द से जल्द बड़े लाल अजगर को नष्ट कर दे और मैं हताशा की दशा में जी रहा था। बाद में, मेरी नाक से लगातार खून बहने के कारण, मुझे डर था कि मैं मर जाऊँगा और मैं दर्द और दुख महसूस करता था, यहाँ तक कि अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ने पर भी पछतावा होता था। तभी मैंने देखा कि अपनी आस्था बनाए रखने और अपना कर्तव्य निभाने में, मैं सत्य का अभ्यास या परमेश्वर के प्रति बिल्कुल भी समर्पण नहीं कर रहा था, न ही मैं परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाने की कोशिश कर रहा था। इसके बजाय, मैं परमेश्वर के अनुग्रह और आशीषों के बदले में सौदा करने और एक अच्छा परिणाम और मंज़िल पाने के लिए अपने कर्तव्य निभाने का इस्तेमाल कर रहा था। हालाँकि मैं परमेश्वर के लिए खुद को खपाने का दिखावा कर रहा था, लेकिन सार रूप में, मैं आशीष पाने की अपनी इच्छा को पूरा करने की कोशिश कर रहा था। इस तरह से अपना कर्तव्य निभाकर, मैं परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश कर रहा था और मैं उसका उपयोग करने और उसे धोखा देने की कोशिश कर रहा था। मुझमें किस तरह से कोई अंतरात्मा या विवेक था? अगर परमेश्वर ने मुझे प्रकट करने और मेरा शोधन करने के लिए बड़े लाल अजगर के उत्पीड़न का उपयोग न किया होता, तो मैं आशीष पाने के इरादे से परमेश्वर में विश्वास करता रहता और अपना कर्तव्य निभाता रहता। आखिरकार, मैं पौलुस की तरह हो जाता, जिसने परमेश्वर से अनुग्रह माँगने के लिए अपने खपने और बलिदानों को पूँजी के रूप में लिया, बेशर्मी से कहा, “मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है” (2 तीमुथियुस 4:7-8)। इस तरह से अंत तक विश्वास करते हुए, मैं सत्य प्राप्त करने और उद्धार पाने में असमर्थ होता और मैं बस खुद को बरबाद कर लेता। मैं आखिरकार परमेश्वर का श्रमसाध्य इरादा समझ गया—वह मुझे मेरा शोधन करने और मेरी भ्रष्टता और अशुद्धियों को शुद्ध करने के लिए इस तरह की स्थिति का उपयोग कर रहा था। मैंने सचमुच महसूस किया कि हालाँकि परमेश्वर के कार्य मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं थे, पर वे सभी मेरे लिए प्रेम और उद्धार थे। उसी समय, मैंने अपने लिए परमेश्वर की दया और रक्षा को भी महसूस किया। जब फैसला आया और मैं चिंतित था कि मैं जेल से ज़िंदा नहीं निकलूँगा, तो यह परमेश्वर ही था जिसने मुझे अपने वचनों के माध्यम से प्रबुद्ध और मार्गदर्शन किया और मुझे जेल के कठोर वातावरण का अनुभव करने के लिए आस्था दी। जब मैं अपाहिज होने और जीवित न रह पाने की चिंता कर रहा था, तो परमेश्वर ने मुझे फूलों और घास के माध्यम से और किताब में पिछली पीढ़ियों के संतों के कर्मों के माध्यम से मार्गदर्शन किया, मुझे आगे बढ़ते रहने का संकल्प रखने के लिए प्रोत्साहित किया। जब मेरा खून बेकाबू होकर बह रहा था और मेरी जान को खतरा था, तो परमेश्वर ने एक अनजान कैदी को खड़ा किया जो निदेशक के पास गया और मैं बच गया और जीवित रहा। मैं अक्सर “सर्वशक्तिमान की आह” में उन वचनों के बारे में सोचता था जहाँ परमेश्वर कहता है : “वह तुम्हारी बगल में पहरा दे रहा है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य)। मैंने गहराई से महसूस किया कि संकट के समय में, केवल परमेश्वर ही मेरा सहारा है और मेरी एकमात्र शरणस्थली है। मैंने सोचा कि कैसे, परमेश्वर में विश्वास करने के इन सभी वर्षों में, मैंने कभी भी अपना सच्चा दिल उसे नहीं दिया था। मैं अपने थोड़े-बहुत कर्तव्यों को निभाने में परमेश्वर के साथ सौदा करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन परमेश्वर ने मेरे विद्रोह के अनुसार मेरे साथ व्यवहार नहीं किया और मुसीबत के समय में, जब मैंने परमेश्वर को पुकारा, तो वह फिर भी मेरे साथ था। उसने अपने वचनों के माध्यम से मेरी अगुआई की और मार्गदर्शन भी दिया, मेरी मदद करने के लिए विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों को खड़ा किया। उस पल, मेरा दिल पछतावे और खुद को कोसने की भावना से भर उठा और मैंने चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैंने ठीक से सत्य का अनुसरण नहीं किया है और मैंने केवल अपने भविष्य और मंज़िल के लिए कीमत चुकाई है। अगर मैं जीवित बचकर निकल सका, तो मैं निश्चित रूप से ठीक से सत्य का अनुसरण करूँगा और तेरे द्वारा मुझे दिए गए उद्धार को व्यर्थ नहीं जाने दूँगा। भले ही मेरी कोई अच्छी मंज़िल न हो, फिर भी मैं अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाऊँगा और तेरे प्रेम का बदला चुकाऊँगा!”
इस अनुभव से गुज़रने के बाद, मैं इस बात के मायने बेहतर ढंग से समझ गया कि परमेश्वर बड़े लाल अजगर का इस्तेमाल सेवा करवाने के लिए क्यों करता है। अगर मैंने व्यक्तिगत रूप से बड़े लाल अजगर के उत्पीड़न का अनुभव न किया होता, तो मैं उसके असली शैतानी चेहरे को इतनी स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता, न ही परमेश्वर में मेरी आस्था और उसके प्रति समर्पण बढ़ता और न ही मुझे अपने भ्रष्ट स्वभाव की सच्ची समझ हासिल होती। मैंने सचमुच अनुभव किया कि लोगों को बचाने का परमेश्वर का कार्य कितना व्यावहारिक और कितना बुद्धिमानी भरा है! मैं यह भी समझ गया कि बड़ा लाल अजगर इस तरह उन्मादी तरीके से परमेश्वर का प्रतिरोध करता है और परमेश्वर के चुने लोगों को नुकसान पहुँचाता है और परमेश्वर लंबे समय से उसे नष्ट करना चाहता था, लेकिन चूँकि हम, लोगों का यह समूह, अभी तक पूर्ण नहीं हुए हैं, इसलिए परमेश्वर को अभी भी उसे सेवा में इस्तेमाल करने की ज़रूरत है। एक बार जब वह ऐसा कर चुकेगा, तो उसका अंत आ जाएगा।
9 नवंबर, 2015 को, मैं अपनी सज़ा पूरी करने के बाद रिहा हो गया। दो गार्ड मुझे जेल के गेट तक ले गए और एक गार्ड ने मुझसे पूछा, “क्या तुम बाहर निकलने के बाद भी परमेश्वर में विश्वास करोगे? अगर तुम ऐसा करते हो, तो तुम फिर यहीं आ जाओगे!” मैंने दृढ़ता से कहा, “परमेश्वर में विश्वास करना मेरी आज़ादी है!” दोनों गार्डों ने मुझे आश्चर्य से देखा और फिर बस अपना सिर हिला दिया। रिहा होने के दस दिन बाद ही, मेरे भाई-बहनों ने मुझसे संपर्क किया और मैं फिर से राज्य के सुसमाचार का प्रचार करने वालों की श्रेणी में शामिल हो गया।
बाद में, मैंने सोचा, “जब भी मेरे भविष्य और मंज़िल की बात आती है, तो मैं इतना दुखी और परेशान क्यों हो जाता हूँ, यहाँ तक कि मैं परमेश्वर से बहस करने लगता हूँ और उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति सचमुच समर्पण करने में असमर्थ हो जाता हूँ? वास्तव में मुझे क्या नियंत्रित कर रहा है?” अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “लोगों द्वारा परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने और सत्य को समझने से पहले, यह शैतान की प्रकृति है जो भीतर से उन्हें नियंत्रित कर लेती है और उन पर हावी हो जाती है। उस प्रकृति में विशिष्ट रूप से क्या शामिल होता है? उदाहरण के लिए, तुम स्वार्थी क्यों हो? तुम अपने रुतबे की रक्षा क्यों करते हो? तुम अपनी भावनाओं से इतने प्रभावित क्यों होते हो? तुम उन अधार्मिक और बुरी चीजों को क्यों पसंद करते हो? तुम्हें ऐसी चीजें पसंद आने का आधार क्या है? ये चीजें कहाँ से आती हैं? तुम इन्हें पसंद और स्वीकार क्यों करते हो? अब तक, तुम सब लोगों ने यह समझ लिया है : मुख्य कारण यह है कि मनुष्य के भीतर शैतान के जहर भरे हैं। तो शैतान के जहर क्या हैं? इन्हें कैसे व्यक्त किया जा सकता है? उदाहरण के लिए, यदि तुम पूछते हो, ‘लोगों को कैसे जीना चाहिए? लोगों को किसलिए जीना चाहिए?’ तो सभी जवाब देंगे, ‘हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।’ बस यह अकेला वाक्यांश समस्या की जड़ को व्यक्त करता है। शैतान का फलसफा और तर्क लोगों का जीवन बन गए हैं। लोग चाहे जिसका भी अनुसरण करें, वास्तव में वे यह अपने लिए ही करते हैं—और इसलिए वे सभी अपने लिए जीते हैं। ‘हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए’—यही मनुष्य का जीवन-दर्शन है, और इंसानी प्रकृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। ये शब्द पहले ही भ्रष्ट इंसान की प्रकृति बन गए हैं, और वे भ्रष्ट इंसान की शैतानी प्रकृति की सच्ची तस्वीर हैं। यह शैतानी प्रकृति पूरी तरह से भ्रष्ट मानवजाति के अस्तित्व का आधार बन चुकी है। कई हजार सालों से वर्तमान दिन तक भ्रष्ट मानवजाति ने शैतान के इस जहर के अनुसार जीवन जिया है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें)। परमेश्वर के वचनों के इस अंश को पढ़ने के बाद, मैं समझ गया कि अपनी आस्था और कर्तव्यों में हमेशा अपने भविष्य और मंज़िल के बारे में चिंतित रहना एक भ्रष्ट स्वभाव का साधारण खुलासा नहीं था, बल्कि मुख्य रूप से इसलिए था क्योंकि मेरे अंदर एक शैतानी प्रकृति थी। मैं “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए” और “बिना पुरस्कार के कभी कोई काम मत करो” जैसे शैतानी फलसफों के अनुसार जी रहा था और मैं जो कुछ भी करता था, उसमें मैं स्वार्थ के सिद्धांतों का पालन करता था। मैं सचमुच स्वार्थी और नीच था। मैंने अपने कर्तव्य निभाने के लिए सब कुछ छोड़ दिया था, लेकिन वास्तव में, मैं व्यक्तिगत लाभ की तलाश में था और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की आशीष पाने के लिए एक सौदा करने की कोशिश कर रहा था। मुझे याद है जब किसी ने पहली बार मुझे प्रभु यीशु के सुसमाचार का प्रचार किया था। मैंने सुना था कि प्रभु में विश्वास करने से अनुग्रह और आशीषें मिलेंगी और मेरी आत्मा बचाई जाएगी और मृत्यु के बाद स्वर्ग जाएगी। इसलिए, मैंने प्रभु में विश्वास किया। अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने के बाद, मैंने जाना कि परमेश्वर लोगों को पूरी तरह से शुद्ध करेगा और बचाएगा और उन्हें अगले युग में ले जाएगा और इसलिए मैं बेहद उत्साहित था। भविष्य की आशीषें पाने के लिए, मैंने दृढ़ता से अपने परिवार और करियर को छोड़ दिया और पूर्णकालिक रूप से अपने कर्तव्य निभाने का फैसला किया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर में एक साल से ज़्यादा विश्वास करने के बाद, मुझे सुसमाचार का प्रचार करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया। जमानत पर रिहा होने के बाद, पुलिस ने मेरी आवाजाही पर रोक लगा दी और मुझे स्थानीय क्षेत्र छोड़ने से मना कर दिया, यह माँग करते हुए कि मैं किसी भी समय उपलब्ध रहूँ, वरना मुझे जेल में डाल दिया जाएगा। हालाँकि, मैंने फिर भी कहीं और अपने कर्तव्य निभाने का फैसला किया, क्योंकि मैंने सोचा कि ऐसा करने से, मैं परमेश्वर द्वारा याद रखा जा सकता हूँ और उसकी आशीषें पा सकता हूँ। लेकिन जब मुझे फिर से गिरफ्तार किया गया, साढ़े तीन साल की सज़ा दी गई और जेल में अपाहिज होने या मरने का सामना करना पड़ा, तो मुझे लगा कि आशीष पाने की मेरी उम्मीदें टूट गई हैं और इसलिए मैं दर्द और वीरानी से भर गया और मुझे कहीं और जाकर अपने कर्तव्य निभाने पर भी पछतावा हुआ। मैंने सोचा कि इतनी कीमत चुकाने के बाद, परमेश्वर को मुझे मरने नहीं देना चाहिए और उसे मुझे एक अच्छी मंज़िल देनी चाहिए। मुझे एहसास हुआ कि इन शैतानी विषों के अनुसार जीने से मैं बहुत स्वार्थी हो गया था, हमेशा केवल अपने लाभ के लिए काम करता था। मुझमें परमेश्वर का कोई भय या उसके प्रति कोई समर्पण नहीं था। एक सृजित प्राणी के रूप में, परमेश्वर में विश्वास करना और अपने कर्तव्य निभाना मेरी एक ऐसी ज़िम्मेदारी है जिससे मैं मुँह नहीं मोड़ सकता और फिर भी मेरे सभी विचार और इच्छाएँ मेरे अपने लिए थीं। मैं आशीष पाने का अपना सपना साकार करने और परमेश्वर के साथ सौदा करने की कोशिश के अवसर के रूप में अपने कर्तव्यों का उपयोग करना चाहता था। ऐसा करके मैं वास्तव में स्वार्थी और घृणित हो रहा था! मैंने सोचा कि कैसे परमेश्वर ने मानवता को बचाने के लिए दो बार देहधारण किया है, दुनिया से अस्वीकृति और बदनामी का सामना किया है और परमेश्वर में विश्वास करने वालों से गलतफहमी, शिकायतें और यहाँ तक कि शोषण भी सहा है। फिर भी परमेश्वर ने लोगों से कभी कुछ नहीं माँगा, और न ही उसने किसी से बदला चुकाने के लिए कहा है। वह केवल लोगों को सींचने और उनका भरण-पोषण करने के लिए सत्य व्यक्त करता है और चुपचाप उनके लौटने का इंतजार करता है। परमेश्वर का प्रेम वास्तव में निस्वार्थ है। मैंने सोचा कि मैंने परमेश्वर के कितने वचन खाए और पिए हैं और परमेश्वर से कितना कुछ पाया है, फिर भी मैंने कभी अपने कर्तव्यों को ठीक से निभाकर परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाने के बारे में नहीं सोचा। मैं केवल इस पर ध्यान देता रहा कि परमेश्वर मुझे एक अच्छी मंज़िल दे और जब मुझे यह नहीं मिली, तो मैं निराश और दुखी हो गया और मैंने जो कीमत चुकाई थी, उस पर भी पछतावा किया। मुझे खुद से बहुत घृणा और ग्लानि महसूस हुई, और मैं खुद से नफरत करने लगा कि मुझमें ज़रा भी जमीर और इंसानियत नहीं है!
परमेश्वर के मार्गदर्शन में, मैंने फिर परमेश्वर के वचनों के एक अंश के बारे में सोचा : “तुम सृजित प्राणी हो—तुम्हें निस्संदेह परमेश्वर की आराधना और सार्थक जीवन का अनुसरण करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की आराधना नहीं करते हो बल्कि अपनी अशुद्ध देह के भीतर रहते हो, तो क्या तुम बस मानव भेष में जानवर नहीं हो? चूँकि तुम मानव प्राणी हो, इसलिए तुम्हें स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाना और सारे कष्ट सहने चाहिए! आज तुम्हें जो थोड़ा-सा कष्ट दिया जाता है, वह तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक और दृढ़तापूर्वक स्वीकार करना चाहिए और अय्यूब तथा पतरस के समान सार्थक जीवन जीना चाहिए। ... तुम वे लोग हो जो सही मार्ग का अनुसरण करते हो, जो सुधार की खोज करते हो। तुम वे लोग हो जो बड़े लाल अजगर के देश में उठ खड़े होते हो, वे हो जिन्हें परमेश्वर धार्मिक कहता है। क्या यह सबसे सार्थक जीवन नहीं है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (2))। परमेश्वर के वचनों ने मुझे आगे बढ़ने की दिशा दी। मैं समझ गया कि एक सृजित प्राणी होने के नाते, मुझे सत्य का अनुसरण करना चाहिए, परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए, और एक सृजित प्राणी होने का अपना फर्ज़ पूरा करना चाहिए, और एक सार्थक जीवन जीना चाहिए। यही ज़िंदगी का सही मार्ग है! मैंने संकल्प लिया कि मैं अब परमेश्वर के साथ सौदा करने की कोशिश नहीं करूँगा और मैं एक सृजित प्राणी की हैसियत से, अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाऊँगा और परमेश्वर से प्रेम करने और उसे संतुष्ट करने की कोशिश करूँगा।
मुझे अब जेल से बाहर आए नौ साल हो गए हैं और जब भी मैं जेल के इस अनुभव को याद करता हूँ, तो मेरे मन में कई तरह के भाव उमड़ आते हैं। अगर मैंने इस स्थिति का अनुभव न किया होता, तो यह एहसास नहीं होता कि आध्यात्मिक कद से मैं कितना अपरिपक्व था या परमेश्वर में मेरी आस्था कितनी कम थी, और न ही मैं अपने स्वार्थी और घृणित भ्रष्ट स्वभाव और अपने गलत अनुसरण को समझ पाता। साथ ही, मैं यह भी समझ गया कि परमेश्वर बड़े लाल अजगर का उपयोग सेवा प्रदान करवाने के लिए कर रहा था, ऐसा करके वह मुझे प्रकट कर रहा था और मेरे शैतानी स्वभाव को शुद्ध कर रहा था, इसके द्वारा मेरी आस्था में आशीषें पाने के मेरे गलत नज़रिये को बदल रहा था, और मुझे प्रेरित कर रहा था कि मैं अपने भविष्य और मंज़िल की चिंता करना छोड़ दूँ। ये ऐसी चीजें हैं जो मैं एक आरामदायक माहौल में हासिल नहीं कर सकता था। अब, विश्वासियों की सीसीपी की गिरफ्तारियाँ और भी गंभीर होती जा रही हैं और मैं अक्सर भाई-बहनों के गिरफ्तार होने और सज़ा सुनाए जाने के बारे में सुनता हूँ और यहाँ तक कि कुछ के पीट-पीट कर मार डाले जाने के बारे में भी सुनता हूँ। कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि मैं बूढ़ा हो रहा हूँ और मेरी सेहत पहले जैसी नहीं रही। मुझे पहले ही दो बार गिरफ्तार किया जा चुका है और अगर मुझे फिर से गिरफ्तार किया गया, तो मुझे निश्चित रूप से भारी सज़ा मिलेगी। बहुत संभावना है कि मैं जेल में ही मर जाऊँगा और उस दिन को नहीं देख पाऊँगा जब राज्य साकार होगा। लेकिन जब मैं परमेश्वर के मार्गदर्शन और कर्मों के बारे में सोचता हूँ जो मैंने अनुभव किए हैं, तो मेरा दिल बहुत ज़्यादा शांत और सहज महसूस करता है। मुझे कलीसिया का एक भजन याद आता है जिसे मैं अक्सर गाता हूँ जिसने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया, “मसीह का अनुसरण करते हुए मैं कभी पीछे नहीं हटूँगा, मृत्यु तक भी नहीं” : “शैतान, बड़ा लाल अजगर परमेश्वर के चुने हुए लोगों को बुरी तरह सताता और गिरफ्तार करता है। मसीह का अनुसरण करने वाले अपने कर्तव्य निभाने के लिए जान जोखिम में डालते हैं। परमेश्वर की गवाही देने के लिए किसी दिन मैं गिरफ्तार किया और सताया जा सकता हूँ। अपने दिल में मैं स्पष्ट रूप से समझता हूँ कि यह धार्मिकता की खातिर अत्याचार है। शायद मेरा जीवन किसी क्षणभंगुर पटाखे की तरह खत्म हो जाएगा। इस जीवन में मसीह का अनुसरण करना और उसकी गवाही देना मेरे दिल को गर्व से भर देता है। भले ही मैं राज्य के विस्तार के अभूतपूर्व नजारे को नहीं देख सकता, फिर भी मुझे कोई पछतावा या शिकायत नहीं होगी और मैं अपनी शुभकामनाएँ दूँगा। अगर मैं वह दिन न भी देख सकूँ जब राज्य साकार होगा, आज शैतान को अपमानित करने की गवाही दे पाना मेरे लिए काफी है” (मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ)। मैं जानता हूँ कि आगे का रास्ता कई कठिनाइयों और बाधाओं से भरा है, लेकिन चाहे मैं किसी भी परीक्षण और क्लेश का अनुभव करूँ, या मेरा भविष्य या मंज़िल अच्छी हो या न हो, मैं परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करूँगा, अपना कर्तव्य पूरा करूँगा और अपने रोज़ के जीवन में इस गीत के इन बोलों को जीने की कोशिश करूँगा।