खतरे की घड़ी में चुनाव करना

05 फ़रवरी, 2023

किन मो, चीन

कई साल पहले सर्दी के मौसम में एक उच्च अगुआ ने मुझे बताया कि एक पड़ोसी कलीसिया के अगुआओं और कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। कलीसिया में देखरेख का कुछ काम निपटाना था और वहाँ भाई-बहनों का सहारा बनने वाला कोई नहीं था। उनमें से कुछ लोग डरपोक, निराश और कमजोर महसूस कर रहे थे, कलीसिया जीवन में भाग नहीं ले पा रहे थे। उन्होंने पूछा कि क्या मैं उस कलीसिया के कार्य की जिम्मेदारी लेने को तैयार हूँ। उनके यह पूछने पर मुझे थोड़ी दुविधा हुई, “उस कलीसिया में कुछ भाई-बहनों को हाल ही में गिरफ्तार किया गया था। अगर मैंने वहाँ का काम सँभाला और मैं भी गिरफ्तार हो गई तो मेरा क्या होगा? इस बुढ़ापे में क्या मेरा शरीर सच में बड़े लाल अजगर की यातना और पिटाई बर्दाश्त कर सकेगा? अगर यातना न झेल सकूँ और यहूदा बनकर परमेश्वर को धोखा दे दूँ, तो क्या इतने वर्षों की मेरी आस्था बेकार नहीं हो जाएगी?” मगर फिर मैंने सोचा कि मौजूदा हालात के संकट को देखते हुए इस अहम घड़ी में कलीसिया के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए किसी की जरूरत थी, इसलिए मैं बेमन से राजी हो गई।

कलीसिया पहुँचने पर बहन वांग शिन्जिंग ने मुझे बताया कि अगुआओं, कार्यकर्ताओं और कुछ भाई-बहनों को गिरफ्तार कर लिया गया था, पूरी कलीसिया में वह सिर्फ कुछ ही भाई-बहनों से संपर्क कर पाई थी। कलीसिया के ज्यादातर सदस्यों से उसका संपर्क नहीं हो पाया था इसलिए वे सभा नहीं कर पाए थे। यह सुनकर मैंने मन-ही-मन सोचा, “यह कितनी भयानक स्थिति है। अब बड़ा लाल अजगर हम पर निगरानी के लिए हमारे पड़ोसियों का इस्तेमाल कर रहा है। अगर मैं वहाँ जाकर इन भाई-बहनों का साथ दूँ और यह देख उनके पड़ोसी पुलिस में मेरी रिपोर्ट कर दें तो क्या होगा? बहुत-से भाई-बहन गिरफ्तार हो चुके हैं—अगर इनमें से कोई भी यातना न सह पाए और दूसरे भाई-बहनों को धोखा दे दे, तो पुलिस उनकी निगरानी करेगी। फिर क्या इन भाई-बहनों से मिलने जाकर मैं सीधे उनके फंदे में नहीं फँस जाऊँगी? अगर मैं गिरफ्तार हो गई, यातना बर्दाश्त न कर यहूदा बन गई तो कहीं विश्वासी के रूप में मेरे दिन समाप्त नहीं हो जाएँगे? तब निश्चित रूप से मुझे उद्धार नहीं मिलेगा।” मैंने जितना सोचा, उतना ही ज्यादा डर गई—मुझे लगा कि वहाँ अपना कर्तव्य निभाना ज्यादा ही खतरनाक था। यह बारूद की खान में चलने जैसा लगा—एक गलत कदम और सब कुछ खत्म। तब इस कलीसिया में काम का प्रबंध करने जाने पर मुझे पछतावा होने लगा, मैं अपना कर्तव्य निभाने को प्रेरित नहीं हो सकी। फिर मैंने सोचा कि वांग शिन्जिंग इस कलीसिया की सदस्य थी और वहाँ के पूरे हालात से ज्यादा परिचित थी, इसलिए भाई-बहनों से मिलने जाना उसके लिए ज्यादा सुविधाजनक होगा। मैं तो अभी-अभी आई थी और काम की रफ्तार से तालमेल भी नहीं बिठा पाई थी। भाई-बहनों से मिलने के लिए मैं वांग शिन्जिंग को भेज सकती थी, इस तरह मुझे खुद जोखिम मोल लेने की जरूरत नहीं होगी। मगर फिर मैंने सोचा, “वांग शिन्जिंग को अनेक सिद्धांतों की अच्छी समझ नहीं है, वह अनुभवी नहीं है। ये सब देखते हुए क्या वह सच में देखरेख का काम कर सकेगी? क्या वह भाई-बहनों के मसले सुलझा सकेगी? दूसरी तरफ, अगर मैं खुद गई तो क्या खुद को विपत्ति में नहीं झोंक दूँगी?” सोच-विचार के बाद मैंने वांग शिन्जिंग से काम करवाने का फैसला लिया। मगर कुछ दिन बाद भी उसने कोई तरक्की नहीं की थी। यह देखकर मैं जान गई कि भाई-बहनों का साथ देने मुझे ही जाना होगा। वरना उनकी समस्याएँ दूर नहीं होंगी और उनके जीवन प्रवेश को नुकसान होगा। लेकिन मौजूदा हालात के खतरे देखते हुए भाई-बहनों से संपर्क करते ही मुझ पर गिरफ्तारी का खतरा मंडराने लगेगा। इसलिए मैंने यह काम खुद करने की हिम्मत ही नहीं की। नतीजतन, एक महीने से ज्यादा गुजर जाने पर भी हमने कलीसिया कार्य में ज्यादा प्रगति नहीं की। वांग शिन्जिंग निराशा की मनोदशा में जी रही थी। लेकिन मैं बुजदिली और डर में जी रही थी, इसलिए मैंने काम में उसके साथ मिलकर काम करने की हिम्मत नहीं की।

एक दिन मैं अचानक बीमार पड़ गई और बीमारी का कारण समझ नहीं आया। तब एहसास हुआ कि शायद परमेश्वर मुझे अनुशासित कर रहा है, मैंने उससे प्रार्थना की, मुझे प्रबुद्ध करने की विनती की ताकि मैं उसका इरादा जान सकूँ। बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा : “उसका दुःख मानवजाति के कारण है, जिसके लिए उसकी आशाएँ हैं, किंतु जो अंधकार में गिर गई है, ऐसा इसलिए है कि जो कार्य वह मनुष्यों पर करता है, वह उसके इरादों पर खरा नहीं उतर रहा है, जिस मानवजाति से वह प्रेम करता है, वह समस्त मानवजाति रोशनी में नहीं जी सकती। वह मासूम मानवजाति के लिए, ईमानदार किंतु अज्ञानी मनुष्य के लिए, उस मनुष्य के लिए जो अच्छा तो है लेकिन जिसमें अपने स्वतंत्र दृष्टिकोणों की कमी है, दुःख अनुभव करता है। उसका दुःख उसकी अच्छाई और दया का प्रतीक है, सुंदरता और दयालुता का प्रतीक है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के स्वभाव को समझना बहुत महत्वपूर्ण है)। परमेश्वर के वचनों का मुझ पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। खासतौर से जब मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “उसका दुःख मानवजाति के कारण है, जिसके लिए उसकी आशाएँ हैं, किंतु जो अंधकार में गिर गई है,” मैंने बहुत दोषी महसूस किया। बड़े लाल अजगर की गिरफ्तारियों के कारण भाई-बहन सामान्य कलीसिया-जीवन नहीं जी पा रहे थे, वे हताशा और अँधेरे में डूब गए थे और उनके जीवन को नुकसान हुआ था। यह देखकर परमेश्वर चिंतित और व्यथित हो गया। उसे तात्कालिक रूप से यह आशा थी कि कोई उसके इरादे को समझे और तुरंत आकर भाई-बहनों की सहायता करे और उन्हें सहारा दे, ताकि वे सामान्य कलीसिया जीवन जी सकें। लेकिन अपनी बात कहूँ तो मैंने अपनी सुरक्षा के लिए अपना काम बहन को सौंप दिया और एक नीच जिंदगी जीना चुनकर अपने कवच में दुबक गई। मैं साफ तौर पर जानती थी कि भाई-बहन सामान्य कलीसिया जीवन नहीं जी पा रहे थे और उनके जीवन को नुकसान हुआ था, लेकिन मैंने वह मसला सुलझाने के लिए कदम नहीं बढ़ाए। मैं बेहद स्वार्थी और घिनौनी हो गई थी! मैंने सोचा कि आमतौर पर खतरनाक हालात में न होने पर मैं मानती थी कि मैं वफादार हूँ और त्याग कर खुद को खपाने में समर्थ हूँ। मैं अक्सर दूसरों से इस बारे में संगति भी करती थी कि परमेश्वर से प्रेम कर उसे संतुष्ट कैसे करें। लेकिन इस हालात का सामना करते हुए मैं बस अपनी सुरक्षा के बारे में ही सोच पा रही थी। मैंने परमेश्वर के इरादे या इस बात पर बिल्कुल विचार नहीं किया कि क्या भाई-बहनों के जीवन को नुकसान पहुँचा है। मैंने देखा कि मैं सिर्फ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों की बातें कर रही थी—मैं परमेश्वर और लोगों दोनों से छल कर रही थी। इसका एहसास होने पर मुझे गहरा पछतावा हुआ और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की : “प्रिय परमेश्वर, मैं हमेशा अपने ही हितों को बचाती हूँ, तुम्हारे इरादे का ख्याल रखने में नाकाम हुई हूँ। मुझमें सचमुच जमीर और विवेक नहीं है। हे परमेश्वर, मैं तुम्हारे इरादे पर विचार करने और भाई-बहनों का साथ देने के लिए अपना पूरा प्रयास करने को तैयार हूँ।” इसके बाद, मैं भाई-बहनों की समस्याएँ और कठिनाइयाँ हल करने की कोशिश में उनकी मदद करने और उन्हें सहारा देने गई।

एक दिन मैंने एक बहन को कहते हुए सुना : “दो साल पहले इस कलीसिया के दस से ज्यादा भाई-बहन गिरफ्तार हो गए थे। अभी भी, उनमें से कुछ को रिहा नहीं किया गया है। पुलिस ने धमकी भी दी है कि वे हमारी कलीसिया को मिट्टी में मिला देंगे।” यह सुनकर मैं गुस्से से भर गई—ये दानव इतने अत्याचारी थे! लेकिन मैं यह सोचकर भीतर से भयभीत भी हो गई, “दो साल बाद ही उन्होंने आकर और भी बहुत-से सदस्यों को गिरफ्तार किया था। उन्होंने कलीसिया को मिट्टी में मिलाने की धमकी तक दी थी। अगर पुलिस को पता चल गया कि मैं कलीसिया अगुआ हूँ तो क्या मैं उनका पहला निशाना नहीं बन जाऊँगी?” गिरफ्तारी के बाद भाई-बहनों को कैसी यातना दी गई इस विचार से ही मैं डर से सिहर उठी, “अगर मुझे सच में गिरफ्तार कर लिया गया तो क्या मैं वह यातना सह सकूँगी? अगर मुझे पीट-पीटकर मार डाला गया या मैं यहूदा बन गई तो क्या यह मेरा अंत नहीं होगा?” उस समय मैंने सुना कि और भी ज्यादा भाई-बहन गिरफ्तार हो चुके थे और लगा कि ऐसे माहौल में अपना कर्तव्य निभाना कुछ ज्यादा ही खतरनाक है। लगा जैसे किसी भी पल पुलिस मुझे गिरफ्तार कर सकती है, मैंने बेहद डरपोक और भयभीत महसूस किया। मैंने प्रार्थना की और उसके वचन पढ़े : “शैतान चाहे कितना ही ‘अत्यधिक शक्तिशाली’ क्यों न हो, चाहे वह कितना ही ढीठ और महत्वाकांक्षी क्यों न हो, चाहे उसमें नुकसान पहुँचाने की कितनी ही बड़ी क्षमता क्यों न हो, मनुष्य को भ्रष्ट करने और लुभाने की उसकी क्षमताएँ कितनी ही व्यापक क्यों न हों, मनुष्य को डराने-धमकाने की उसकी चालें और साजिशें कितनी ही चतुर क्यों न हों, या उसके अस्तित्व के रूप कितने ही विविध क्यों न हों, वह कभी एक भी सजीव वस्तु बनाने, सभी चीजों के अस्तित्व के लिए नियम या कानून बनाने, या किसी भी वस्तु पर, चाहे वह सजीव हो या निर्जीव, शासन करने या संप्रभुता रखने में सक्षम नहीं हुआ है। ब्रह्मांड और आकाशमंडल में, एक भी ऐसा व्यक्ति या ऐसी वस्तु नहीं है जो उसके द्वारा अस्तित्व में लाई गई हो या जो उसके कारण अस्तित्व में हो; एक भी ऐसा व्यक्ति या ऐसी वस्तु नहीं है जो उसकी संप्रभुता में हो या उसके द्वारा शासित हो। इसके विपरीत उसे न केवल परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन रहना पड़ता है, बल्कि उसे परमेश्वर की सभी आज्ञाओं और आदेशों का पालन भी करना पड़ता है। परमेश्वर की अनुमति के बिना, शैतान जमीन पर पानी की एक बूँद या रेत के एक कण को भी आसानी से छू नहीं सकता; परमेश्वर की अनुमति के बिना, शैतान जमीन पर चींटियों का भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता, मानवजाति की तो बात ही छोड़ दो, जिसे परमेश्वर ने बनाया था। परमेश्वर की नजरों में, शैतान पहाड़ पर उगे सोसन के फूलों, हवा में उड़ते पक्षियों, समुद्र की मछलियों और धरती पर रेंगती इल्लियों से भी तुच्छ है। सभी चीजों के बीच उसकी भूमिका सभी चीजों की सेवा करना, मानवजाति की सेवा करना और परमेश्वर के कार्य और उसकी प्रबंधन योजना की सेवा करना है(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I)। परमेश्वर के वचनों से एहसास हुआ कि सारी चीजें परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं। शैतान चाहे जितना भी क्रूर क्यों न हो, वह अब भी परमेश्वर के हाथों में है। परमेश्वर की अनुमति के बिना शैतान में कोई गलत कदम उठाने की हिम्मत नहीं होगी। मुझे याद आया कि जब अय्यूब का परीक्षण हुआ था तो परमेश्वर की अनुमति के बिना शैतान उसके शरीर को ही जख्मी कर पाया था, मगर अय्यूब का जीवन छीनने की हिम्मत नहीं कर सका था। मैं जिन हालात में हूँ, उनमें मेरी गिरफ्तारी क्या पूरी तरह परमेश्वर के हाथ में नहीं है? शैतान चाहे जितना भी क्रूर और खूंखार क्यों न हो, परमेश्वर की अनुमति के बिना भले ही बड़ा लाल अजगर मुझे पकड़ने की कोशिश करे, वह अपनी मनमानी नहीं कर सकता। अगर परमेश्वर हामी भरता है तो कोशिश करने के बाद भी मैं भाग नहीं सकती। मेरा जीवन परमेश्वर के हाथ में है और उस पर शैतान का कोई काबू नहीं है। परमेश्वर के वचनों पर मनन कर मुझे उसके अधिकार और संप्रभुता का थोड़ा ज्ञान हासिल हुआ और मैंने कम डरपोक और काफी ज्यादा आजाद महसूस किया। मैं ऐसी व्यवस्था करना चाहती थी कि भाई-बहन यथाशीघ्र अपना कलीसिया जीवन फिर से जी सकें। उस दौरान, वांग शिन्जिंग और मैंने प्रार्थना की और परमेश्वर पर भरोसा किया। हमने भाई-बहनों से संपर्क करने के तरीकों पर विचार किया और फिर उन्हें सहारा दिया। नतीजतन, वे धीरे-धीरे सभाओं में आने लगे, अपना कलीसिया जीवन जीने लगे और अपनी पूरी क्षमता से अपने कर्तव्य निभाने लगे।

बाद में गिरफ्तार होने के बाद रिहा की गई एक बहन ने मुझे सूचित किया कि मुझे धोखा दे दिया है। पुलिस पहले से जानती थी कि मैं एक अगुआ हूँ और किस गाँव में रहती हूँ, उन्होंने यह भी कहा कि वे सुरक्षा ब्यूरो से मेरे खिलाफ वारंट जारी करवा देंगे। यह जानकर मेरा कलेजा मुँह को आ गया; मैं बुरी तरह बेचैन और भयभीत हो गई। पुलिस के पास पहले से मेरी इतनी सारी जानकारी थी कि मैं कभी भी और कहीं भी गिरफ्तार हो सकती थी। अगर मैं गिरफ्तार हो गई तो मुझे जरूर यातना दी जाएगी। मैंने जितना ज्यादा सोचा, उतना ही भयभीत हो गई, अस्थायी रूप से कमजोरी में डूब गई। लगा जैसे बड़े लाल अजगर के देश में परमेश्वर में विश्वास रखना आग के दरिया से गुजरने जैसा था; हर कदम पर मौत का खतरा मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। तब मैंने सोचा : “मैं अपने रिश्तेदारों के यहाँ थोड़े समय के लिए छिप सकती हूँ। यहाँ मामला थोड़ा ठंडा पड़ जाए तो कर्तव्य निभाती रह सकती हूँ।” मगर फिर मुझे याद आया कि कुछ भाई-बहन डरपोक, निराश और कमजोर महसूस कर रहे थे, उन्हें सिंचन और सहारे की सख्त जरूरत थी। अगर इस अहम घड़ी में मैंने अपना पद छोड़ दिया तो क्या मैं परमेश्वर से विद्रोह कर उसका दिल नहीं दुखाऊँगी? मैंने बहुत दुखी और संतप्त महसूस किया, नहीं जान सकी कि क्या करना चाहिए तो मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, कर्तव्य निभाते रहने की शक्ति और आस्था देने की विनती की। बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश देखा : “मुख्यभूमि चीन में, बड़े लाल अजगर ने अक्सर परमेश्वर के विश्वासियों को खतरनाक परिवेशों में रखते हुए लगातार और क्रूरता से उनका दमन किया, उन्हें गिरफ्तार करके उनका उत्पीड़न किया है। उदाहरण के लिए, सरकार विश्वासियों को पकड़ने के लिए तमाम तरह के बहाने बनाती है। जब भी उन्हें किसी मसीह-विरोधी के ठिकाने का पता चलता है, तो मसीह-विरोधी सबसे पहले किस बारे में सोचता है? वह कलीसिया के काम को ठीक से व्यवस्थित करने के बारे में नहीं, बल्कि इस खतरनाक परिस्थिति से बच निकलने के बारे में सोचता है। जब कलीसिया को दमन और गिरफ्तारियों का सामना करना पड़ता है, तो मसीह-विरोधी कभी भी बाद की स्थिति को सँभालने और मामलों को समेटने में नहीं लगते। वे कलीसिया के लिए जरूरी संसाधनों या कर्मियों की व्यवस्था नहीं करते हैं। बल्कि अपने लिए एक सुरक्षित जगह पक्की करने और इससे निपटने के लिए बहाने और तर्क ढूँढ़ते हैं और उससे पल्ला झाड़ लेते हैं। ... मसीह-विरोधियों के दिलों की गहराई में, उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा हमेशा सबसे ऊपर होती है। यह मुद्दा उनके दिलों में लगातार चिंता का विषय बना रहता है। वे मन-ही-मन सोचते हैं, ‘मुझे मुसीबत में नहीं पड़ना चाहिए। चाहे कोई भी पकड़ा जाए, बस मैं न पकड़ा जाऊँ—मुझे जिंदा रहना है। मैं अभी भी परमेश्वर का कार्य पूरा होने पर परमेश्वर की महिमा में हिस्सा पाने का इंतजार कर रहा हूँ। अगर मैं पकड़ा गया, तो यहूदा की तरह बन जाऊँगा, और मेरे लिए सब खत्म हो जाएगा। मेरा परिणाम अच्छा नहीं होगा। मुझे दंडित किया जाएगा।’ ... अपना डेरा जमाने और यह महसूस करने के बाद कि वे हानि से दूर हैं, और खतरा टल गया है, मसीह-विरोधी कुछ सतही काम करने में लग जाते हैं। मसीह-विरोधी अपनी व्यवस्थाओं में काफी सावधानी बरतते हैं, मगर यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे किन लोगों से कैसे निपटते हैं। वे अपने हितों से जुड़े मामलों के बारे में बहुत सावधानी से सोचते हैं, मगर जब बात कलीसिया के कार्य या उनके अपने कर्तव्यों की आती है, तो वे अपनी स्वार्थपरता और नीचता दिखाते हैं और कोई जिम्मेदारी नहीं उठाते, उनमें जरा भी जमीर या विवेक नहीं होता है। ठीक इन्हीं व्यवहारों के कारण उन्हें मसीह-विरोधियों के रूप में निरूपित किया जाता है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग दो))। परमेश्वर ने उजागर किया कि मसीह-विरोधी किस तरह से विशेष रूप से स्वार्थी, नीच और मानवता-विहीन होते हैं। वे सिर्फ अपने हितों और निजी सुरक्षा के बारे में सोचते हैं, कलीसिया के कार्य को लेकर कोई चिंता नहीं दिखाते। शांति के समय, वे लोगों के सामने झूठा दिखावा करते हैं कि उनमें कर्तव्य निभाने का जुनून है, लेकिन खतरे या निजी सुरक्षा पर जोखिम के हालात की जरा-सी निशानी दिखते ही, वे अपने कवच में दुबक जाते हैं और गायब हो जाते हैं। इससे कलीसिया के कार्य या भाई-बहनों के जीवन का चाहे जितना भी नुकसान हो, इन मसीह-विरोधियों को जरा भी परवाह नहीं होती। मुझे एहसास हुआ कि मेरे कर्म भी मसीह-विरोधी से कुछ अलग नहीं थे। जब कोई खतरा सामने न होता तो बाहर से लगता कि मैं अपने कर्तव्य में कष्ट झेलकर खुद को खपा सकती हूँ, लेकिन जब चीजें खतरनाक हो गईं तो मैं दुबक गई, सिर्फ खुद की रक्षा करने और जोखिम वाला कर्तव्य अन्य बहन को सौंप देने की सोचने लगी। कलीसिया के कार्य में तरक्की नहीं हुई, मैं निष्क्रियता से देखती रही और भाई-बहन कलीसिया के जीवन से वंचित रह गए। मैंने मौके पर खरा उतरकर कलीसिया का कार्य नहीं किया और केवल अनुशासित किए जाने पर ही मुझे होश आया। यह सुनकर कि मुझे धोखा दे दिया गया था और पुलिस मेरी तलाश कर रही थी, मैंने अपना पद छोड़ देना चाहा, कलीसिया के कार्य पर जरा भी विचार नहीं किया। मैं बहुत स्वार्थी और घिनौनी थी, उस हालात की वास्तविकता ने खुलासा किया कि मैं एक मसीह-विरोधी जैसी स्वार्थी थी जब भी मुझे खतरा महसूस होता, मैं कर्तव्य निभाना छोड़ कर अपनी सुरक्षा का रास्ता ढूँढ़ लेना चाहती थी। मुझमें परमेश्वर के प्रति जरा भी वफादारी नहीं थी और यह उसके लिए घिनौनी बात थी। अपने बारे में यह एहसास करके मुझे बहुत पछतावा और अपराध-बोध हुआ। मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “परमेश्वर के लिए बड़े लाल अजगर के देश में अपना कार्य कार्यान्वित करना अत्यंत कठिन है, परंतु इसी कठिनाई के माध्यम से परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण करता है, ताकि वह अपनी बुद्धि और अपने अद्भुत कर्मों को प्रकट कर सके, और परमेश्वर इस अवसर का उपयोग लोगों के इस समूह को पूर्ण करने के लिए करता है। लोगों की पीड़ा के माध्यम से, उनकी काबिलियत के माध्यम से और इस गंदे देश के लोगों के समस्त शैतानी स्वभावों के माध्यम से ही परमेश्वर शुद्धिकरण और विजय का अपना कार्य करता है, ताकि इससे वह महिमा प्राप्त कर सके और उन लोगों को प्राप्त कर सके जो उसके कर्मों की गवाही देते हैं। परमेश्वर ने इस समूह के लोगों के लिए जो समस्त कीमत चुकाई है, उसका सम्पूर्ण महत्व यही है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?)। परमेश्वर के वचनों पर मनन करके मुझे समझ आया कि यह अनिवार्य और परमेश्वर द्वारा पूर्व-निर्धारित था कि सीसीपी के शासन के अधीन रहने वाले हम विश्वासियों को उत्पीड़न और क्लेशों का सामना करना ही होगा। परमेश्वर बड़े लाल अजगर के उत्पीड़न का इस्तेमाल हमारी आस्था और प्रेम को पूर्ण करने के लिए करता है। लेकिन खतरनाक हालात का सामना होने पर मैंने परमेश्वर का इरादा नहीं खोजा, सिर्फ अपनी सुरक्षा की परवाह करने वाली डरपोक और भयभीत बन गई और अपना कर्तव्य भी नहीं निभाना चाहा। मैंने देखा कि मेरी आस्था सच में कमजोर थी और परमेश्वर के सामने गवाही देने के बजाय मैं शैतान की हँसी की पात्र बन गई थी। इसका एहसास होने पर मुझे बहुत पछतावा हुआ, मैंने ऋणी महसूस किया, मैं अब अपना पद छोड़कर नीच जीवन नहीं जीना चाहती थी। मैं समर्पण कर खुद को परमेश्वर के हाथों सौंप देना चाहती थी। मैं गिरफ्तार हो जाऊँगी, जिऊँगी या मरूँगी, इसका आयोजन परमेश्वर के हाथों सौंपकर मैं खुश थी। अगर मुझे बड़े लाल अजगर ने गिरफ्तार कर लिया तो यह परमेश्वर की अनुमति से होगा, अगर इसमें मेरी मृत्यु भी हुई तो भी मैं उसके लिए अडिगता से गवाही दूँगी। अगर उन्होंने मुझे गिरफ्तार नहीं किया तो यह परमेश्वर की दया और रक्षा के कारण होगा और मैं कर्तव्य को सही ढंग से निभाने को और भी ज्यादा दृढ़ संकल्पी हो जाऊँगी। इसका एहसास होने पर मुझे थोड़ा और सुकून मिला, मेरी पहले की चिंता और डर गायब हो गए।

इसके बाद, मैंने आत्म-चिंतन किया कि खतरे का सामना होने पर परमेश्वर के इरादे पर विचार करने के बजाय मैं अपने ही हितों का विचार क्यों करती हूँ? एक दिन मेरा ध्यान परमेश्वर के वचनों के एक अंश पर गया : “सभी भ्रष्ट मनुष्य अपने लिए जीते हैं। हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए—यह मानव प्रकृति का सार है। सभी लोग अपनी खातिर परमेश्वर में विश्वास करते हैं; वे आशीष पाने के लिए चीजों को त्यागते हैं और खुद को खपाते हैं, जो कष्ट वे सहते हैं और जो कीमत वे अपना कर्तव्य करने में चुकाते हैं, वह भी पुरस्कृत होने के लिए होता है। संक्षेप में, यह सब आशीष पाने, पुरस्कृत होने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के उद्देश्य से है। दुनिया में, लोग अपने लाभ के लिए काम करते हैं और परमेश्वर के घर में, वे आशीषें प्राप्त करने के लिए कर्तव्य करते हैं। आशीषें प्राप्त करने के लिए, लोग सब कुछ त्याग देते हैं और बहुत कष्ट सह सकते हैं। यह सब इस बात का सबसे स्पष्ट प्रमाण है कि लोगों में एक शैतानी प्रकृति होती है। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं, वे अलग हैं। वे सोचते हैं कि लोगों के लिए सत्य के अनुसार जीना ही सार्थक है, उन्हें परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए, परमेश्वर का भय मानना चाहिए और बुराई से दूर रहना चाहिए, यही इंसान होने का आधार है। वे सोचते हैं कि परमेश्वर का आदेश स्वीकार करना एक पूरी तरह से स्वाभाविक और न्यायोचित जिम्मेदारी है, केवल वे जो एक सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छे से पूरा करते हैं, इंसान कहलाने के लायक हैं, यदि वे परमेश्वर से प्रेम करने और उसके प्रेम का आभार व्यक्त करने में सक्षम नहीं हैं, तो वे इंसान कहलाने के योग्य नहीं हैं। वे सोचते हैं कि अपने लिए जीना वास्तव में खाली और अर्थहीन है, लोगों को परमेश्वर को संतुष्ट करने और अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से करने के लिए जीना चाहिए, सार्थक जीवन जीना चाहिए, ताकि यदि वे मर भी जाएँ, तो वे संतुष्ट महसूस करें, उन्हें जरा-सा भी पछतावा न हो और उन्होंने व्यर्थ में जीवन नहीं जिया हो(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ सकी कि खतरनाक हालात में लगातार मेरे खुद को बचाने और अपना कर्तव्य छोड़ देने की इच्छा रखने और एक अधम अस्तित्व में रहने की वजह शैतानी फलसफों का मेरी सोच पर हावी होना था, जैसे कि “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” “चीजों को वैसे ही चलने दो अगर वे किसी को व्यक्तिगत रूप से प्रभावित न करती हों,” “बिना पुरस्कार के कभी कोई काम मत करो,” आदि-आदि। ये फलसफे मेरी प्रकृति का हिस्सा बन गए थे और चाहे जो हो, मैं हमेशा अपना स्वार्थ देखकर ही कर्म करती थी। जब कभी मेरे निजी हितों पर खतरा मंडराता, मैं परमेश्वर को धोखा देती थी। मैंने सोचा कि जब से मैं इस कलीसिया में आई थी, खतरनाक हालात में रखे जाने पर मैंने सिर्फ अपनी सुरक्षा की ही सोची। यह जानकर भी कि मुझे जल्द-से-जल्द उन भाई-बहनों को सहारा देना था, ताकि वे अपना कलीसिया जीवन जी सकें, मैं दूर छुपी रही क्योंकि गिरफ्तार होने और यातना झेलने से डरती थी, मैंने कलीसिया के कार्य या अपनी बहन की सुरक्षा का जरा भी विचार किए बिना अपना काम बहन को सौंप दिया था। यह देखकर भी कि बहन के लिए अकेले काम करना बहुत मुश्किल था और भाई-बहन कलीसिया जीवन नहीं जी पा रहे थे, मैंने अपना कर्तव्य निभाने के लिए कदम आगे नहीं बढ़ाया। मैं शैतान के फलसफों के अनुसार जी रही थी। मैंने स्वार्थ और घिनौनेपन से काम किया, मुझमें जरा भी मानवता, जमीर और समझ नहीं थी। परमेश्वर उन्हें बचाता है जो उसके प्रति वफादार और समर्पित होते हैं, जो अहम घड़ियों में अपने निजी हितों का त्याग कर कलीसिया के कार्य की सुरक्षा पर ध्यान देते हैं; ऐसे ही लोग परमेश्वर की स्वीकृति पाते हैं। लेकिन अहम घड़ियों में मैंने जहाज को मँझधार में छोड़ दिया, मुझमें परमेश्वर के प्रति सच्ची निष्ठा नहीं थी। अगर मैं पुलिस से बचकर नीच जीवन भी जीती रहती तो मुझे इतनी स्वार्थी और घिनौनी देखकर परमेश्वर मुझे क्यों बचाने की सोचता? मैंने सोचा कि परमेश्वर ने मानवता को बचाने के लिए किस तरह चीन में देहधारण किया, बेहद अपमान और कष्ट सहे, अपने वचन बोलने और कार्य करने के लिए भयंकर खतरे का सामना किया, बड़े लाल अजगर ने लगातार उसका पीछा किया और सताया, धार्मिक दुनिया ने उसे ठुकराया और बदनाम किया, लेकिन परमेश्वर ने हमें बचाना कभी नहीं छोड़ा। मानवजाति को बचाने के अपने एकचित्त प्रयास में परमेश्वर ने अपना सब कुछ लगा दिया। परमेश्वर का सार अत्यंत निःस्वार्थी, नेक और सुंदर है। अपनी बात कहूँ तो मुझमें परमेश्वर के प्रति जरा भी सच्ची निष्ठा नहीं थी, मैं अब भी शैतान के फलसफे के अनुसार जी रही थी और स्वार्थी, नीच, दगाबाज और कपटी थी। अपना कर्तव्य निभाते समय मैंने सिर्फ अपनी सुरक्षा पर ही विचार किया, कलीसिया के कार्य की जरा भी रक्षा नहीं की। अगर मैंने प्रायश्चित्त नहीं किया तो परमेश्वर मुझसे घृणा कर मुझे हटा देगा।

अपनी आध्यात्मिक भक्ति में मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, वे परमेश्वर के अंतरंग होने चाहिए, वे परमेश्वर को प्रिय होने चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के प्रति परम निष्ठा रखने में सक्षम होना चाहिए। चाहे तुम निजी रूप से कार्य करो या सार्वजनिक रूप से, तुम परमेश्वर के सामने परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने में समर्थ हो, तुम परमेश्वर के सामने अडिग रहने में समर्थ हो, और चाहे अन्य लोग तुम्हारे साथ कैसे भी पेश आएँ, तुम हमेशा उसी मार्ग पर चलते हो जिस पर तुम्हें चलना चाहिए, और तुम परमेश्वर के बोझ पर विचार करते हो। केवल इसी तरह के लोग परमेश्वर के अंतरंग होते हैं। परमेश्वर के अंतरंग सीधे उसकी सेवा करने में इसलिए समर्थ हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर का महान आदेश और परमेश्वर की जिम्मेदारी दी गई है, वे परमेश्वर के हृदय को अपना हृदय बनाने और परमेश्वर की जिम्मेदारी को अपनी जिम्मेदारी की तरह लेने में समर्थ हैं, और वे अपने भविष्य की संभावनाओं को होने वाले लाभ या हानि पर कोई विचार नहीं करते—यहाँ तक कि जब संभावना हो कि उनके पास कुछ नहीं होगा और उन्हें कुछ भी नहीं मिलेगा, तब भी वे हमेशा एक परमेश्वर-प्रेमी हृदय से परमेश्वर में विश्वास करते हैं। और इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अंतरंग होता है। परमेश्वर के अंतरंग उसके विश्वासपात्र भी हैं; केवल परमेश्वर के विश्वासपात्र ही उसकी बेचैनी और उसके विचार साझा कर सकते हैं, और यद्यपि उनकी देह पीड़ायुक्त और कमजोर होती है, फिर भी वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए पीड़ा सह पाते हैं और उस चीज को छोड़ पाते हैं जिससे वे प्रेम करते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को और अधिक जिम्मेदारी देता है, और जो कुछ परमेश्वर करना चाहता है, वह ऐसे लोगों की गवाही से प्रकट होता है। इस प्रकार, ये लोग परमेश्वर को प्रिय हैं, ये परमेश्वर के सेवक हैं जो उसके इरादों के अनुरूप हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के साथ मिलकर शासन कर सकते हैं। जब तुम वास्तव में परमेश्वर के अंतरंग बन जाते हो तो बिल्कुल यही वह समय है जब तुम परमेश्वर के साथ मिलकर शासन करोगे(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के इरादों के अनुरूप सेवा कैसे करें)। परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर अपने इरादों का विचार करने वालों और उसका बोझ उठाने वालों से प्रेम करता है। हालात कैसे भी क्यों न हों, कैसे भी कष्ट क्यों न झेलने पड़ें, आगे का रास्ता अंधकारमय क्यों न दिखे, वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उसका त्याग कर सकते हैं जिसे वे चाहते हैं और अपने हितों के बारे में नहीं सोचते। परमेश्वर आखिरकार ऐसे ही लोगों को हासिल करेगा। उस अहम घड़ी में जब भाई-बहन गिरफ्तार किए गए, मैं जानती थी कि मुझे परमेश्वर के इरादे का विचार करना चाहिए, परमेश्वर की बेचैनी और उसके विचारों को साझा करना चाहिए, कलीसिया के कार्य की रक्षा करनी चाहिए और अपनी जिम्मेदारियाँ और कर्तव्य निभाने चाहिए। इसका एहसास होने पर मैंने एक संकल्प लिया : आगे जो भी खतरे हों, मैं परमेश्वर के दिल को सुकून पहुँचाने के लिए अपना कर्तव्य अच्छे से निभाऊँगी।

एक दिन मैंने सुना कि पड़ोसी कलीसिया का एक अगुआ गिरफ्तार कर लिया गया था। मुझे एहसास हुआ कि कलीसिया की किताबें फौरन किसी और जगह पहुँचानी थीं, वरना वे बड़े लाल अजगर के हाथ लग जातीं। तो मैंने किताबों को वहाँ से दूसरी जगह ले जाने में मदद के लिए बहन झांग यी से तुरंत संपर्क किया। जब मैं हमारे बैठक स्थल पर पहुँची तो वह घबराया हुआ चेहरा लेकर फौरन मेरे पास आई और बोली कि उसका पीछा किया गया था। आखिरकार उनसे पीछा छुड़ाना बहुत मुश्किल था और उसने मुझसे किताबों को जल्द-से-जल्द कहीं और ले जाने को कहा। यह सुनकर मेरा कलेजा मुँह को आ गया, मैं घबराकर डर गई। मैंने सोचा : “पुलिस हमारी ताक में कहीं छिपी हुई है जबकि हम पूरी तरह उजागर हैं। अगर पुलिसवालों ने टोह लेकर मुझे गिरफ्तार कर लिया तो वे यकीनन मुझे पीट-पीट कर मार ही डालेंगे!” मैंने जितना ज्यादा सोचा उतना ही ज्यादा भयभीत हो गई, चाहा कि किताबें हटाने का काम कोई और करे। लेकिन फिर मुझे याद आया कि झांग यी ने उन भाई-बहनों के साथ हमारी मुलाकात का समय तय कर रखा था जिनके पास पुस्तकें सुरक्षित रखी थीं और किसी और को ढूँढ़ने का समय था ही नहीं। फिर किताबें कहीं और पहुँचाने में जितनी देर होगी, खतरा उतना ही बढ़ेगा। इस दिमागी उथल-पुथल के बीच मुझे एहसास हुआ कि मैं डरपोक बन रही थी, आस्था और शक्ति पाने के लिए मैंने मन ही मन परमेश्वर को निरंतर पुकारा। तभी, मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया : “जब वे लोग जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं, स्पष्ट रूप से जानते हैं कि परिवेश खतरनाक है, तब भी वे गिरफ्तारी के बाद का कार्य सँभालने का जोखिम उठाते हैं और खुद वहाँ से निकलने से पहले वे परमेश्वर के घर को होने वाले नुकसान को न्यूनतम कर देते हैं। वे अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं देते। मुझे बताओ, बड़े लाल अजगर के इस दुष्ट राष्ट्र में कौन यह सुनिश्चित कर सकता है कि परमेश्वर में विश्वास करने और कर्तव्य करने में कोई भी खतरा न हो? चाहे व्यक्ति कोई भी कर्तव्य निभाए, उसमें कुछ जोखिम तो होता ही है—लेकिन कर्तव्य का निर्वहन परमेश्वर द्वारा सौंपा गया आदेश है और परमेश्वर का अनुसरण करते हुए व्यक्ति को अपना कर्तव्य निभाने का जोखिम उठाना ही चाहिए। इसमें व्यक्ति को बुद्धि का इस्तेमाल करना चाहिए और अपनी सुरक्षा के इंतजाम करने की भी आवश्यकता होती है, लेकिन उसे अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा को पहला स्थान नहीं देना चाहिए। उसे पहले परमेश्वर के इरादों पर विचार करना चाहिए, उसके घर के कार्य और सुसमाचार के प्रचार को सबसे ऊपर रखना चाहिए। परमेश्वर ने तुम्हें जो आदेश सौंपा है, उसे पूरा करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और यह सबसे पहले आता है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग दो))। जो परमेश्वर के प्रति वफादार होते हैं, वे उसके इरादों का ख्याल रख सकते हैं। हालात जितने भी खतरनाक क्यों न हों, वे जरूरी देखरेख का काम पूरा करने के लिए सारे जोखिम उठा सकते हैं, अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर सकते हैं। मैंने सोचा कि इतने वर्षों की आस्था में, मैंने परमेश्वर के वचनों के सिंचन और पोषण का काफी आनंद उठाया था तो अब कर्तव्य निभाने का समय आ चुका है। अब जबकि कलीसिया के हितों से समझौता हो रहा था तो मैं अपने जमीर को धोखा देकर अलग नहीं रह सकती थी। हालात जितने भी खतरनाक क्यों न हों, मुझे किताबों को वहाँ से दूसरी जगह ले जाने का मार्ग ढूँढ़ना होगा। मैं उन्हें बड़े लाल अजगर के हाथों नहीं पड़ने दे सकती। मैंने प्रभु यीशु के उन वचनों को याद किया जो कहते हैं : “जो कोई अपना प्राण बचाना चाहेगा वह उसे खोएगा, परन्तु जो कोई मेरे लिए अपना प्राण खोएगा वही उसे बचाएगा(लूका 9:24)। यहाँ तक कि कर्तव्य निभाते हुए मेरा गिरफ्तार हो जाना और पीट-पीट कर मार डाला जाना भी सार्थक होगा और परमेश्वर इसे स्वीकृति देगा। मुझे याद आया कि परमेश्वर के लिए पतरस को कैसे क्रूस पर उल्टा लटका दिया गया था, पर उसने अपने जीवन की कोई फिक्र न कर, परमेश्वर की जबरदस्त और शानदार गवाही दी थी। मैं जानती थी कि मुझे पतरस के कदमों पर चलना चाहिए, कैसे भी हालात आएँ, परमेश्वर के प्रति वफादार होना चाहिए, परमेश्वर के दिल को सुकून देने के लिए अच्छे से कर्तव्य निभाना चाहिए। परमेश्वर के वचनों ने मुझे आस्था और ताकत दी ताकि मैं अब भय में न जियूँ। मैंने दूसरे भाई-बहनों के साथ साझेदारी की, हमने पुलिस से बचने के लिए दिमाग लड़ाया और परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा के साथ किताबों को सफलतापूर्वक दूसरी जगह पहुँचा दिया। परमेश्वर का धन्यवाद!

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