एक डॉक्टर का प्रायश्चित
यांग फ़ैन, चीनजब मैं एक डॉक्टर बना तो मैं हमेशा विनम्र और पेशेवर रहने की कोशिश करता था। और तो और, मैं अच्छा काम करता था और मैंने बहुत-से...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
2019 में बहन ग्वान शिन तबादले के बाद हमारी कलीसिया के कार्य की देखरेख के लिए आई थी। मैं दो साल पहले उससे मिली थी, इस बार उससे संवाद करते हुए मैंने पाया कि वह ठीक वैसी ही थी। सभाओं में, परमेश्वर के वचन की अनुभवजन्य समझ के बजाय, वह हमेशा शब्द और धर्म-सिद्धांत बोला करती थी। जब वह दूसरों को काम में संघर्ष करते देखती, तो मुश्किलें हल करने के लिए सत्य पर संगति न करके उन्हें डांटती-फटकारती थी। इससे भाई-बहनों को अभ्यास का मार्ग मिलना तो दूर, उनका दम घुटने लगा। जब कुछ लोग अपनी नकारात्मक स्थितियों को तुरंत नहीं बदल पाते थे तो ग्वान शिन उन पर फैसले देती और डाँटती थी, जिससे भाई-बहन बंधन में आ जाते थे और कुछ कर्तव्य निभाने का आत्मविश्वास खो देते थे। वह अक्सर दिखावा करती थी कि कैसे उसने अपनी नौकरी और परिवार छोड़ दिया था, कष्ट सहे थे और कीमत चुकाई थी, और कलीसिया के बहुत-से नए सदस्य जिनमें भेद पहचानने की कमी थी, सचमुच उसे आदर से देखते थे। उस दौरान, कलीसिया-कार्य ठीक नहीं चल रहा था, भाई-बहनों की दशा भी ठीक नहीं थी। बाद में मैंने देखा कि सुसमाचार उपयाजिका ली शाओ अपने कर्तव्य की जिम्मेदारी नहीं उठा रही थी और वास्तविक कार्य तो बिल्कुल नहीं कर रही थी। कई बार संगति और काट-छाँट के बाद भी वह बदली नहीं, नकारात्मक और प्रतिरोधी हो गई। इससे सुसमाचार कार्य रुक गया, उसकी जगह किसी और को रखना जरूरी था। मैंने इन मसलों के बारे में ग्वान शिन से चर्चा की। लेकिन उसे लगा कि उस पद के लिए कोई अच्छा उम्मीदवार मिलना मुश्किल था, इसलिए उसने जोर दिया कि उसे न बदला जाए। वह मुझसे ऊँची आवाज में भी बोली, “ली शाओ की समस्या जानकर तुमने कितनी बार प्रेम से उसकी मदद करने की कोशिश की? क्या तुमने जिम्मेदारी निभाई? इतनी घमंडी न बनो और दूसरों के बारे में इतनी सहजता से निष्कर्ष न निकालो!” मैंने सोचा, “प्रेमपूर्ण मदद सत्य स्वीकारने वालों के लिए है। जो इंसान संगति स्वीकार नहीं करता और नहीं बदलता, उसे फौरन बदल देना चाहिए। यह सिद्धांतों के अनुरूप है।” शुरू-शुरू में मैं अपने नजरिए पर अड़ी रही, मगर ग्वान शिन के राजी न होने पर मैं बेचैन हो गई और हम दोनों में बहस छिड़ गई। दूसरे कुछ भाई-बहनों ने मुझे हावी होने की कोशिश न करने की सलाह दी, और मैं उससे कुछ बाधित हो गई। उसकी बात का भेद कोई नहीं समझ रहा था तो अगर मैं ली शाओ की बर्खास्तगी पर अड़ी रही तो शायद वे कहें कि मैं घमंडी और आत्म-तुष्ट थी, कि मैं कलीसिया के कार्य में गड़बड़ और बाधा पैदा कर रही थी। यह सोचकर मैं कुछ नहीं बोली।
इसके बाद हमें एक उच्च अगुआ का चुनाव करना था तो हमसे उपयुक्त उम्मीदवार सुझाने को कहा गया। कुछ भाई-बहन ग्वान शिन की सिफारिश करना चाहते थे। मैं सोचने लगी, वह सिद्धांत खोजे बिना, अपने ही ढंग से काम करती है और वह बस शब्द और धर्म-सिद्धांत ही बोलती है और दूसरों की असली समस्याएँ हल नहीं करती। वह अच्छी उम्मीदवार नहीं है। मुझे संगति करनी चाहिए ताकि दूसरे भेद पहचान सकें। लेकिन ग्वान शिन और मुझमें सुसमाचार उपयाजिका की बर्खास्तगी को लेकर मतभेद था, दूसरों को लगता था कि मैं हावी होना चाहती थी। अब अगर मैं कहती कि ग्वान शिन अच्छी उम्मीदवार नहीं थी तो क्या वे कहेंगे कि मैं उससे बदला लेने और उसे दबाने के लिए ऐसा कर रही थी? मैंने सोचा, “ठीक ही है, परेशानी जितनी कम हो उतना अच्छा है। वे चाहें तो ग्वान शिन को चुन लें—मेरा वोट न देना ही काफी है।” लेकिन जब आकलन लिखने का समय आया तो मुझे फिक्र हुई। बाकी सबके पास ग्वान शिन के बारे में कहने को काफी अच्छी बातें थीं। तो अगर मैं अपनी सच्ची राय लिखूँ तो अगुआ जान जाएगी कि मैं पूरी तरह जानती थी कि वह एक अच्छी उम्मीदवार नहीं थी, लेकिन मैं दूसरों के साथ सत्य पर संगति नहीं कर रही थी और सिद्धांतों के अनुरूप उम्मीदवारों के नाम नहीं सुझा रही थी। क्या अगुआ कहेंगी कि मैं कलीसिया के कार्य को बनाए नहीं रख रही थी? क्या वह मुझे विकसित करना रोक देंगी? इधर कुआँ उधर खाई। मैंने सबके साथ होने का फैसला किया। इसलिए अपने आकलन में, मैंने सिर्फ ग्वान शिन के सकारात्मक पहलुओं के बारे में ही लिखा, झूठ लिखा कि वह सत्य का अनुसरण करती थी, उसमें अच्छी मानवता थी, वह स्नेहिल थी। और जब वह हममें भ्रष्टता देखती तो हमारी मदद करने के लिए परमेश्वर के प्रासंगिक वचन ढूँढ़ती थी। यह आकलन लिखने के बाद, मुझे लगा कि मेरी आत्मा डूब रही है, मेरे जमीर ने दोषी महसूस किया। इसके बाद जब मैं परमेश्वर के वचन पढ़ती तो मुझे कोई प्रबुद्धता प्राप्त नहीं होती और मेरा कर्तव्य मुझे बोझिल और कठिन महसूस होता था। फिर भी मैंने आत्म-चिंतन नहीं किया। साथ ही, मैं भाग्य के विचार से चिपकी हुई थी। इतने उम्मीदवार थे, शायद उसे चुना ही न जाए। अगर वह नहीं चुनी गई तो मेरे झूठे आकलन का खुलासा नहीं होगा। बाद में पता चला कि ग्वान शिन को सच में उच्च अगुआ चुन लिया गया था। मुझे झटका लगा, बहुत बेचैनी महसूस हुई। क्या लोग हमारी सभी सकारात्मक समीक्षाओं से गुमराह हो गए थे? मुझमें अब भी अगुआ को सच बताने की हिम्मत नहीं थी और मैं खुद को सांत्वना देती रही कि अगर ग्वान शिन सच में अगुआई के लायक नहीं थी तो परमेश्वर उसे बेनकाब करेगा। मेरे मन में यह ख्याल तो था, मगर मेरी बेचैनी दूर नहीं हुई।
करीब महीने भर बाद एक अगुआ ने पत्र लिखकर हमसे ग्वान शिन का आकलन फिर से लिखने को कहा। मुझे एहसास हुआ कि उच्च अगुआ के रूप में उसके कर्तव्य में कुछ समस्याएँ जरूर आई होंगी। मैं डरी हुई थी, और मैंने यह भी देखा कि अगुआ ने अपने पत्र में परमेश्वर के कुछ वचन भी उद्धृत किए थे। परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर के मार्ग पर चलने का मतलब है परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलना। ‘परमेश्वर का मार्ग’ किसे संदर्भित करता है? इसका मतलब है परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। और परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना क्या है? उदाहरण के लिए, तुम किसी व्यक्ति का मूल्यांकन कैसे करते हो, इसमें परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना शामिल है। तुम उनका मूल्यांकन कैसे करते हो? (हमें ईमानदार, निष्पक्ष और न्यायपूर्ण होना चाहिए और हमारे शब्द हमारी भावनाओं पर आधारित नहीं होने चाहिए।) तुम जो सोचते हो वही कहते हो और जो तुमने देखा है वही कहते हो—ईमानदार होने का यही मतलब है। सबसे पहले, ईमानदार होने का अभ्यास परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने के अनुरूप होता है। परमेश्वर लोगों को यही सिखाता है; यह परमेश्वर का मार्ग है। परमेश्वर का मार्ग क्या है? परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। क्या ईमानदार होना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का अंग नहीं है? क्या यह परमेश्वर के मार्ग पर चलना नहीं है? (हाँ, है।) यदि तुम एक ईमानदार व्यक्ति बनने की कोशिश नहीं करते तो तुम्हारे मुँह से जो निकलेगा वह वैसा नहीं होगा जैसा तुमने देखा है और जैसा तुम अपने दिल में सोचते हो। मान लो कि कोई तुमसे पूछता है, ‘उस व्यक्ति के बारे में तुम्हारी क्या राय है? क्या वह कलीसिया के कार्य के प्रति जिम्मेदार है?’ और तुम जवाब देते हो, ‘वह बहुत अच्छा है। वह मुझसे ज्यादा जिम्मेदार है, उसकी काबिलियत मुझसे बेहतर है और उसकी मानवता भी अच्छी है। वह परिपक्व और स्थिर है।’ लेकिन, क्या तुम अपने दिल में यही सोच रहे हो? वास्तव में, तुम देख सकते हो कि यद्यपि इस व्यक्ति में काबिलियत है, वह भरोसेमंद नहीं है, बल्कि धोखेबाज है और बहुत जोड़ने-घटाने वाला है। तुम अपने दिल में वास्तव में यही सोच रहे हो। लेकिन जब बोलने का समय आता है तो तुम्हें लगता है : ‘मैं सच नहीं बता सकता, मुझे किसी को नाराज नहीं करना चाहिए।’ और इसलिए, तुम जल्दी से कुछ और कहने के लिए बात मोड़ देते हो और उसके बारे में कहने के लिए अच्छी बातें चुनते हो; तुम जो कुछ भी कहते हो वह तुम वास्तव में अपने दिल में नहीं सोचते हो, यह सब झूठे शब्द हैं, सब कुछ बनावटी है। क्या यह तुम्हारे परमेश्वर के मार्ग पर चलने की अभिव्यक्ति है? नहीं। तुम जिसका अनुसरण कर रहे हो वह शैतान का मार्ग है, दानवी मार्ग है। परमेश्वर का मार्ग क्या है? यह सत्य है, यह मनुष्य के स्व-आचरण का आधार है और यह परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है। यद्यपि तुम लोगों से बात कर रहे हो, परमेश्वर भी सुन रहा है; वह तुम्हारे दिल को देख रहा है और उसकी पड़ताल कर रहा है। लोग वह सुनते हैं जो तुम कहते हो, लेकिन परमेश्वर तुम्हारे दिल की पड़ताल करता है। क्या कोई दूसरे व्यक्ति के दिल की पड़ताल करने में सक्षम है? ज्यादा से ज्यादा, लोग यह असलियत जान सकते हैं कि तुम सच नहीं बोल रहे हो; वे वह देख सकते हैं जो सतह पर है, लेकिन केवल परमेश्वर ही तुम्हारे दिल की गहराइयों की असलियत जान सकता है। केवल परमेश्वर ही देख सकता है कि तुम क्या सोच रहे हो, तुम क्या योजना बना रहे हो और तुम्हारे दिल के भीतर क्या क्षुद्र गणनाएँ, कपटी साजिशें और सक्रिय विचार हैं। जब परमेश्वर देखता है कि तुम सच नहीं बोल रहे हो तो तुम्हारे बारे में उसकी राय और मूल्यांकन क्या होता है? यह कि तुम इस मामले में परमेश्वर के मार्ग पर नहीं चल रहे हो क्योंकि तुम सच नहीं बोल रहे हो। यदि तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास कर रहे हो तो तुम्हें सच बोलना चाहिए : ‘इस व्यक्ति में काबिलियत है, लेकिन वह भरोसेमंद नहीं है।’ चाहे यह मूल्यांकन इस व्यक्ति की वास्तविक स्थिति का पूरी तरह से सटीक प्रतिबिंब हो या न हो, यह वही है जो तुम अपने दिल में सोच रहे हो, यह सच्चा है, यही वह दृष्टिकोण और रुख है जिसे तुम्हें व्यक्त करना चाहिए। लेकिन तुम ऐसा नहीं कर रहे हो—तो क्या तुम परमेश्वर के मार्ग पर चल रहे हो? (नहीं।) लोगों का मूल्यांकन करते समय तुम सच्चाई से नहीं बोलते, केवल ऐसे शब्द कहते हो जो उनकी चापलूसी करते हैं या उन्हें लेकर राय बनाते हैं, फिर भी तुम इस बात पर जोर देते हो कि तुम परमेश्वर के मार्ग पर चल रहे हो और परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हो—क्या इसका कोई उपयोग है? परमेश्वर इस बात की परवाह नहीं करता कि तुम कितने जोर से नारे लगाते हो, न ही इसकी कि तुम उसमें विश्वास करने के बारे में कितने उत्साही हो, इससे भी कम इसकी कि तुम कितने धर्म-सिद्धांतों के बारे में बात कर सकते हो। परमेश्वर इन चीजों पर विचार नहीं करता। वह केवल इस पर विचार करता है कि क्या तुम सत्य को स्वीकार कर सकते हो और क्या तुम सत्य समझने के बाद उसे अभ्यास में ला सकते हो। वह बस इस पर विचार करता है कि जब तुम्हारे साथ कुछ होता है तो तुम कैसे चुनते हो—क्या तुम सत्य की तलाश कर सकते हो और उसे स्वीकार कर सकते हो। यदि तुम अपने पारस्परिक संबंधों की रक्षा करना चुनते हो, अपने हितों और अभिमान की रक्षा करना चुनते हो—यदि यह सब आत्म-संरक्षण के बारे में है—और परमेश्वर देखता है कि जब तुम्हारे साथ कुछ होता है तो तुम यही दृष्टिकोण और रवैया अपनाते हो तो वह यह कहते हुए तुम्हारा मूल्यांकन करेगा कि तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो उसके मार्ग पर चलता है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन पढ़ने से मेरे मन में भावनाएँ जगीं। आकलन-लेखन को मैंने कभी बहुत अहम नहीं माना था, न ही खोजा था कि इस मामले में मुझे कौन-से सत्य पर अमल करना चाहिए। मैंने सच में यह चिंतन नहीं किया कि जब मैंने वह आकलन लिखा तो क्या मेरे मंसूबे गलत थे या मैंने भ्रष्टता प्रकट की थी, क्या मैं परमेश्वर का भय मानने वाला दिल रखती थी, क्या मैं उसका निष्पक्ष रूप से आकलन कर रही थी। उस मुकाम पर मुझे एहसास हुआ कि आकलन लिखने का संबंध इससे है कि क्या व्यक्ति में परमेश्वर का भय मानने वाला दिल है और क्या वह कलीसिया के कार्य को बनाए रखता है। हम एक उच्च अगुआ का चुनाव कर रहे थे, जिससे अनेक कलीसियाओं का कार्य और भाई-बहनों का जीवन-प्रवेश जुड़ा हुआ था। असत्य बातों वाला पक्षपाती आकलन लिखने से लोग गुमराह हो सकते हैं, अनुपयुक्त इंसान का चुनाव कलीसिया के कार्य को गड़बड़ कर सकता है और भाई-बहनों के जीवन प्रवेश को हानि पहुँचा सकता है। मुझे पता था कि ग्वान शिन उच्च अगुआ पद के लिए सही नहीं थी, लेकिन अपना नाम और रुतबा बनाए रखने के लिए और दूसरों के यह कहने के डर से कि मैं उससे बदला ले रही थी, उसे दबा रही थी, मैंने कुछ नहीं कहा। मैं सच्चा आकलन लिख सकती थी और ग्वान शिन के असली हालात की रिपोर्ट कर सकती थी, लेकिन मुझे डर था कि अगुआ कहेगी कि मुझमें भेद पहचानना था लेकिन मैंने इसे दूसरों के साथ साझा नहीं किया और मैंने कलीसिया के कार्य को बनाए नहीं रखा, जिससे उनके मन में मेरी छवि खराब हो जाती। इसलिए मैंने पैंतरेबाजी की, मैंने तथ्यों के विपरीत आकलन लिखा। मैंने लिखा कि ग्वान शिन ने सत्य का अनुसरण किया और वास्तविक काम किया। मैंने जो लिखा वह जरा भी सच नहीं था। मैं बहुत कपटी और धोखेबाज थी। परमेश्वर हमसे ईमानदार होने, तथ्यों के अनुरूप और उचित ढंग से बोलने की अपेक्षा रखता है। लेकिन मैंने अगुआ के चुनाव जैसे अहम मसले में झूठ बोला। मेरे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बिल्कुल नहीं था। मैं एक शैतानी और दानवी प्रकृति के साथ जी रही थी। शैतान ने झूठ बोलकर इसी तरह शुरुआत की थी, मैं तथ्यों के विरुद्ध जा रही थी, झूठ बोल रही थी, वास्तव में यह दानवी प्रकृति थी! मैंने कलीसिया के कार्य का ध्यान न रखकर तथ्यों के विपरीत आकलन लिखा, भाई-बहनों को बहकाया, इसलिए उन्होंने एक गलत इंसान को चुन लिया। यह कलीसिया के कार्य में गड़बड़ करना और बाधा डालना था। इसका एहसास डरावना था।
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा : “एक बार जब सत्य तुम्हारा जीवन बन जाता है, यदि तुम किसी को परमेश्वर की ईशनिंदा करते, परमेश्वर का भय नहीं मानते, अपना कर्तव्य करते समय लापरवाही से काम करते या कलीसिया के काम में गड़बड़ करते और बाधा डालते हुए देखते हो, तो तुम उसके साथ सत्य सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करने में सक्षम होगे, जिनका भेद पहचानना चाहिए, उनका भेद पहचानोगे और जिन्हें उजागर करना चाहिए और उन्हें उजागर करोगे। यदि सत्य तुम्हारा जीवन नहीं बना है और तुम अभी भी अपने शैतानी स्वभावों के भीतर रहते हो, तो जब तुम बुरे लोगों और दानवों को कलीसिया के काम में गड़बड़ करते और बाधाएँ डालते हुए देखोगे, तो तुम आँखें मूँद लोगे, कान बंद कर लोगे और इसे नजरअंदाज कर दोगे, बिना अपनी अंतरात्मा से कोई धिक्कार महसूस किए। तुम यह भी सोचोगे कि चाहे कोई भी कलीसिया के काम में बाधा डाले, इसका तुमसे कोई लेना-देना नहीं है। चाहे कलीसिया के काम और परमेश्वर के घर के हितों को कितना भी नुकसान पहुँचे, तुम परवाह नहीं करोगे या इसके बारे में नहीं पूछोगे या अपनी अंतरात्मा से कोई धिक्कार महसूस नहीं करोगे। उस स्थिति में, तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसमें कोई अंतरात्मा या विवेक नहीं है, तुम एक छद्म-विश्वासी, एक श्रमिक हो। तुम परमेश्वर का खाते हो, परमेश्वर का पीते हो और परमेश्वर से आने वाली हर चीज का आनंद लेते हो, फिर भी महसूस करते हो कि परमेश्वर के घर के हितों को होने वाले किसी भी नुकसान से तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं है—यह तुम्हें एक ऐसा गद्दार बनाता है जो अपने लोगों का नुकसान करके बाहरी लोगों का पक्ष लेता है, यह कुछ ऐसा है जो अपने खिलाने वाले हाथ को ही काटता है। यदि तुम परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं करते, तो क्या तुम इंसान भी हो? तुम एक दानव हो जिसने कलीसिया में घुसपैठ की है। तुम परमेश्वर में विश्वास करने का ढोंग करते हो, परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से एक होने का नाटक करते हो और परमेश्वर के घर में मुफ्तखोरी करना चाहते हो—तुम एक इंसान जैसे नहीं दिखते और तुम स्पष्ट रूप से एक छद्म-विश्वासी हो” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों का प्रकाशन दिल में चुभने वाला था। मैं ऐसी गद्दार थी, जिसका परमेश्वर ने जिक्र किया था, जिसने उसी थाली में खाया उसी में छेद किया। मैं परमेश्वर के वचनों को खा और पी रही थी और उसके संपूर्ण पोषण का आनंद ले रही थी, मगर कलीसिया के कार्य को बनाए नहीं रख रही थी। इसके बजाय मैं पूरी तरह से अपने ही हितों के लिए काम कर रही थी। उस सत्य का अभ्यास नहीं कर रही थी, जिसे अच्छे से जानती थी, जिससे आखिर दूसरों ने बहक कर एक झूठे अगुआ का चुनाव किया। क्या यह कलीसिया के कार्य और दूसरे भाई-बहनों को नुकसान पहुँचाना नहीं था? मैंने जितना सोचा उतनी ही घृणा हुई, मैं बेहद धोखेबाज और नीच थी। मैं खुद को बचाना चाहती थी, कलीसिया के कार्य को नहीं। मैं किसी भी किस्म की सच्ची विश्वासी नहीं थी। मैंने अपने दिल में अंधेरा और उदासी महसूस की। मुझे परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता नहीं मिल रही थी, न कर्तव्य में कुछ हासिल हो रहा था। परमेश्वर ने मुझसे मुँह मोड़ लिया था। अगर मैं पश्चात्ताप न करने वाली गद्दार बनी रही तो परमेश्वर मुझे जरूर ठुकरा कर हटा देगा। मैंने सच में परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का अनुभव किया जो मनुष्य के अपराध को सहन नहीं करता और सत्य का अभ्यास न करने तथा अपने पीछे अपराध छोड़ जाने के कारण स्वयं से घृणा की। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और प्रायश्चित्त करने और सत्य का अभ्यास करने और अपने अपराध की भरपाई करने के लिए तैयार थी!
बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा : “अपने कर्तव्य को निभाने वाले सभी लोगों के लिए, चाहे सत्य को लेकर उनकी समझ कितनी भी उथली या गहरी क्यों न हो, सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने का सबसे सरल अभ्यास यह है कि हर मोड़ पर परमेश्वर के घर के हितों के बारे में सोचा जाए, अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं, व्यक्तिगत मंशाओं, उद्देश्यों, इज्जत और रुतबे का त्याग किया जाए और परमेश्वर के घर के हितों को सबसे आगे रखा जाए—कम से कम इतना तो उन्हें करना ही चाहिए। अपना कर्तव्य निभाने वाला कोई व्यक्ति अगर इतना भी नहीं कर सकता, तो उस व्यक्ति को कर्तव्य निभाने वाला कैसे कहा जा सकता है? यह अपना कर्तव्य निभाना नहीं है। तुम्हें पहले परमेश्वर के घर के हितों के बारे में सोचना चाहिए, परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना चाहिए और कलीसिया के कार्य का ध्यान रखना चाहिए। इन चीजों को पहले स्थान पर रखना चाहिए; उसके बाद ही तुम अपने रुतबे की स्थिरता या दूसरे लोग तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं, इसकी चिंता कर सकते हो। इसे दो चरणों में बाँटो, थोड़ा-सा समझौता कर लो—क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि इससे चीजें थोड़ी आसान हो जाती हैं? यदि तुम कुछ समय तक इस तरह अभ्यास करते हो, तो तुम्हें महसूस होने लगेगा कि परमेश्वर को संतुष्ट करना कोई मुश्किल काम नहीं है। इसके अलावा, यदि तुम अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर सकते हो; अपने दायित्वों और कर्तव्य को पूरा कर सकते हो; अपनी स्वार्थी इच्छाओं, मंशाओं और उद्देश्यों को एक तरफ रख सकते हो; परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हो सकते हो; और परमेश्वर के घर के हितों, कलीसिया के कार्य और उस कर्तव्य को जिसे तुम्हें निभाना चाहिए, सबसे पहले रख सकते हो, तो कुछ समय तक इस तरह अनुभव करने के बाद, तुम्हें महसूस होगा कि इस तरह से आचरण करना अच्छा है, लोगों को ईमानदारी और स्पष्टवादिता से जीना चाहिए और उन्हें नैतिक साहस से विहीन, घिनौना, नीच अस्तित्व नहीं जीना चाहिए, बल्कि उन्हें ईमानदार और न्यायसंगत होना चाहिए। तुम्हें महसूस होगा कि यही वह छवि है जिसे व्यक्ति को जीना चाहिए। धीरे-धीरे, अपने हितों को तुष्ट करने की तुम्हारी इच्छा घटती चली जाएगी” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। परमेश्वर के वचनों से मुझे अभ्यास का एक मार्ग मिला। हमें हमेशा कलीसिया के कार्य को सबसे आगे रखना होगा और जब हमारे निजी हित कलीसिया के कार्य से टकराएँ तो हमें अपने खिलाफ विद्रोह करना होगा, अपने निजी हित छोड़ने होंगे, अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियों की प्राथमिकता तय करनी होगी। इस बार मुझे आकलन दोबारा लिखने को कहा गया था और मैं परमेश्वर से प्रायश्चित्त करने की इच्छुक थी। मैं यह सोचती नहीं रह सकती थी कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचेंगे या खुद को बचाती नहीं रह सकती थी। मुझे सत्य लिखना था और ईमानदार रहना था। इसके बाद मैंने भाई-बहनों से खुलकर बात की। मैंने उन्हें अपनी भ्रष्टता दिखाने, आत्म-चिंतन और जो सीखा उसके बारे में बताया। मैंने अगुआओं के चयन के सिद्धांतों के बारे में भी संगति की, कि हमें सत्य का अनुसरण करने वालों को चुनना चाहिए, जिनमें अच्छी मानवता हो, जो वास्तविक कार्य कर सकते हों। ग्वान शिन के व्यवहार के साथ इसकी तुलना करके सभी में भेद पहचानना आ गया और वे नए आकलन लिखने के लिए इच्छुक हो गए थे। मैंने भी ग्वान शिन के निरंतर व्यवहार के आधार पर एक सच्चा आकलन लिखा। इस पर अभ्यास करने से मुझे सुकून मिला।
बाद में अगुआ ने मुझे एक पत्र भेजा, जिसमें कहा गया था कि ग्वान शिन को बर्खास्त कर दिया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि ग्वान शिन जब उस पद पर थी तो वह घमंडी, तानाशाह और असहयोगी थी, जिससे कलीसिया की कई परियोजनाओं में रुकावट पैदा हुई थी। उसने अपने पद का दूसरों को बेबस और उनका दमन करने के लिए भी इस्तेमाल किया था, जिससे वे नकारात्मक हो गए थे...। पत्र में लिखी बातें मेरे गाल पर एक के बाद एक तमाचे जैसी थीं। मेरा चेहरा तमतमा गया था, मेरा दिमाग सुन्न पड़ गया था। मैंने बस अभी-अभी जाना कि मैंने सच में परमेश्वर का अपमान किया था और कि एक झूठी अगुआ के बुरे कामों में मेरी भी भागीदारी थी। उसने पहले भी ऐसा बर्ताव किया था और मैं इसका भेद पहचान चुकी थी, मगर न सिर्फ मैंने उसे उजागर कर उसकी शिकायत नहीं की, बल्कि दूसरे भाई-बहनों को उच्च अगुआ के रूप में उसकी सिफारिश भी करने दी। मुझे एहसास हुआ कि मैंने कलीसिया के कार्य के लिए कोई जिम्मेदारी महसूस नहीं की थी। मैं बुरे काम कर चीजें बिगाड़ने में, चोरी-छिपे एक झूठी अगुआ की मदद कर रही थी। मैं सत्य का अभ्यास न करने के लिए अपने लिए बहाने भी ढूँढ़ रही थी। मुझे लगा कि भले ही मैं जो जानती थी उसे रिपोर्ट न करूँ, परमेश्वर उसे प्रकट करेगा। परमेश्वर निश्चय ही सारी चीजें प्रकट कर देगा, मगर मुझे अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए, झूठे अगुआओं को उजागर कर कलीसिया के कार्य को बनाए रखना चाहिए। लेकिन मैं निष्क्रिय होकर किनारे बैठी रही और मैंने अपना कर्तव्य और अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की। इससे कलीसिया के कार्य और भाई-बहनों के जीवन प्रवेश को गंभीर नुकसान हुआ। इस बारे में मैंने जितना सोचा, उतना ही बुरा महसूस किया। मैं जानती थी कि मेरे अपराध ठीक नहीं किए जा सकते। अपनी पीड़ा में, मैंने फिर से परमेश्वर के सामने आकर उससे प्रार्थना कर प्रायश्चित्त किया। मैं यह भी जानना चाहती थी कि किसी समस्या से सामना होते ही मैं अपने हितों की रक्षा क्यों करने लगती थी। इस समस्या की जड़ क्या थी? अपनी भक्ति के दौरान मैंने यह अंश पढ़ा : “इससे पहले कि लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करें और सत्य को समझें, शैतान की प्रकृति नियंत्रण सँभाल लेती है और उन पर भीतर से प्रभुत्व जमाती है। उस प्रकृति में विशिष्ट रूप से क्या शामिल होता है? उदाहरण के लिए, तुम स्वार्थी क्यों हो? तुम अपने रुतबे की रक्षा क्यों करते हो? तुम अपनी भावनाओं से इतने प्रभावित क्यों होते हो? तुम उन अधार्मिक और बुरी चीजों को क्यों पसंद करते हो? तुम्हें ऐसी चीजें पसंद आने का आधार क्या है? ये चीजें कहाँ से आती हैं? तुम इन्हें पसंद और स्वीकार क्यों करते हो? अब तक, तुम सब लोगों ने यह समझ लिया है : मुख्य कारण यह है कि मनुष्य के भीतर शैतान के जहर भरे हैं। तो शैतान के जहर क्या हैं? इन्हें कैसे व्यक्त किया जा सकता है? उदाहरण के लिए, यदि तुम पूछते हो, ‘लोगों को कैसे जीना चाहिए? लोगों को किसलिए जीना चाहिए?’ तो सभी जवाब देंगे, ‘हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।’ बस यह अकेला वाक्यांश समस्या की जड़ को व्यक्त करता है। शैतान का फलसफा और तर्क लोगों का जीवन बन गए हैं। लोग चाहे जिसका भी अनुसरण करें, वास्तव में वे यह अपने लिए ही करते हैं—और इसलिए वे सभी अपने लिए जीते हैं। ‘हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए’—यही मनुष्य का जीवन-दर्शन है, और इंसानी प्रकृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। ये शब्द पहले ही भ्रष्ट इंसान की प्रकृति बन गए हैं, और वे भ्रष्ट इंसान की शैतानी प्रकृति की सच्ची तस्वीर हैं। यह शैतानी प्रकृति पूरी तरह से भ्रष्ट मानवजाति के अस्तित्व का आधार बन चुकी है। कई हजार सालों से वर्तमान दिन तक भ्रष्ट मानवजाति ने शैतान के इस जहर के अनुसार जीवन जिया है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे दिखाया कि विश्वासी होने के बावजूद मैं परमेश्वर के वचनों के सत्य को स्व-आचरण और कार्य-कलापों के मानक के रूप में नहीं ले रही थी। मैं अब भी शैतान के विचारों के अनुसार आचरण और कार्य कर रही थी, जैसे कि “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” “लाभ सबसे पहले आता है,” और “समझदार लोग आत्म-रक्षा में अच्छे होते हैं, वे बस गलतियाँ करने से बचते हैं।” मैं शैतान के इसी जहर के सहारे जी रही थी। मुझे लगा कि लोगों को जीवन में खुद का ध्यान रखकर अपने हितों की रक्षा करना सीखना होगा ताकि उन्हें हानि न पहुँचे। चतुर होने का यही एक रास्ता है ताकि हमें नुकसान न हो। लेकिन इस सबक से मैंने देखा कि इन शैतानी जहरों के अनुसार जीने से थोड़े समय के लिए मेरे हितों की रक्षा तो हुई, लेकिन इससे मैंने अपने आचरण की आधाररेखा छोड़ दी। मैं स्वार्थी, धोखेबाज और नीच हो गई और अपने जमीर के खिलाफ जाकर बेईमान हो गई। मैं चरित्र और गरिमा से रहित हो गई और भरोसे के योग्य नहीं रही और अंततः भाई-बहनों के जीवन को नुकसान पहुँचाया और कलीसिया के कार्य में गंभीर रूप से बाधा डाली और ऐसा अपराध किया जिसकी भरपाई मैं कभी नहीं कर सकती थी। मुझे घृणा हुई कि शैतान ने मुझे इतनी गहराई से भ्रष्ट किया था, कि मुझमें जमीर नहीं रहा, मैं परमेश्वर के सामने जीवन जीने योग्य नहीं रही। और इस अनुभव ने मुझे दिखाया कि मैं परमेश्वर को बिल्कुल नहीं समझती थी और मुझे विश्वास नहीं था कि वह सभी चीजों की पड़ताल करता है। मुझे फिक्र थी कि अगर मैंने ग्वान शिन के बारे में अपने भेद पहचानने पर दूसरों के साथ संगति की तो उन्हें लगेगा कि मैं बदला लेने की कोशिश कर रही थी और जानबूझकर उसे दबा रही थी। लेकिन, परमेश्वर के घर में, सत्य का बोलबाला होता है और परमेश्वर सब चीजों की पड़ताल करता है। अगर मेरा दिल सही जगह हो, मैं सत्य सिद्धांतों के अनुरूप कर्म करती रहूँ तो दूसरे सत्य समझ लेने पर मेरा साथ देंगे। कुछ लोग शुरुआत में मुझे गलत समझ भी लें, परमेश्वर मेरे दिल की पड़ताल करेगा और मेरा जमीर साफ होगा। यह बात समझ लेने पर मुझे बड़ा सुकून मिला और मैंने ठान लिया कि भविष्य में मैं निश्चित रूप से सिद्धांतों का पालन करूँगी।
इसके बाद मैंने सुसमाचार उपयाजिका ली शाओ के बारे में सोचा, जिसने कभी सत्य नहीं स्वीकारा था और अपने कर्तव्य की जिम्मेदारी नहीं उठाती थी। सिद्धांतों के आधार पर उसे बर्खास्त कर देना चाहिए था। मैंने कुछ दूसरे उपयाजकों से अपने विचार साझा किए। उपयाजकों ने कहा, “अगर हम उसे अभी बर्खास्त करेंगे तो उसकी जगह कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिलेगा। फिलहाल उसकी मदद कर उसका साथ देना चाहिए।” मैं सोचने लगी कि मैंने पहले ही कई बार उसकी मदद कर उसका साथ दिया था, मगर वह कुछ सुनती नहीं थी। अगर वह सुसमाचार उपयाजिका बनी रही तो काम में और ज्यादा रुकावट डालती रहेगी। मगर यह भी सच था कि सुसमाचार उपयाजक के लिए कलीसिया में कोई अच्छे उम्मीदवार नहीं थे। और अगर बाकी सभी असहमत होते लेकिन मैं इस पर जोर देती तो क्या वे नहीं कहते कि मैं बहुत घमंडी और आत्मतुष्ट हूँ? थोड़ी देर मुझे समझ नहीं आया कि क्या करूँ तो मैंने खोजने के लिए परमेश्वर के सामने आई और उससे प्रार्थना की। प्रार्थना के बाद, मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से अपने हितों की रक्षा करने लगी थी। मुझे अपने कर्तव्य में सत्य सिद्धांतों का पालन करना चाहिए—सही गलत को मिलाना नहीं चाहिए। सिद्धांतों के आधार पर सोचें तो ली शाओ का खुलासा एक झूठी कर्मी के रूप में हुआ। अगर हमने उसे उसी पद पर बनाए रखा तो सुसमाचार कार्य पर असर पड़ेगा। दूसरे मुझे घमंडी कहेंगे, इस डर से मैं हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती थी—मुझे सिद्धांतों का पालन करना होगा। इसलिए मैंने संगत सत्यों पर अपने सहयोगियों के साथ संगति की और वे सुसमाचार उपयाजिका को बर्खास्त करने को राजी हो गए। इसके बाद, उच्च अगुआ ने हमारा सुसमाचार कार्य सँभालने के लिए एक दूसरी कलीसिया से एक बहन की व्यवस्था की। उसे अपने कर्तव्य की जिम्मेदारी का भान था और उसने कुछ सिद्धांत समझ लिए थे। हमारा सुसमाचार कार्य धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। मुझे यह भी महसूस हुआ कि आखिरकार मैं कुछ सत्य को अभ्यास में ला पाई और मैंने शांति और सहजता महसूस की।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
यांग फ़ैन, चीनजब मैं एक डॉक्टर बना तो मैं हमेशा विनम्र और पेशेवर रहने की कोशिश करता था। और तो और, मैं अच्छा काम करता था और मैंने बहुत-से...
वेनीला, फ़िलीपीन्समैंने 2017 में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों का कार्य स्वीकारा। भाई-बहनों के साथ सहभागिता में मेरा समय बहुत अच्छा...
आन रान, चीननवंबर 2024 में, मैं कलीसिया में अनुभवजन्य गवाही लेखों की जाँच कर रही थी। एक दिन, हमारी पर्यवेक्षक हमारी टीम की सभा में आई और कहा...
मार्था, इटलीमैं अपनी कलीसिया में वीडियो कार्य के लिए जिम्मेदार हूँ। एक दिन मेरी एक बहन ने जल्दबाजी में मुझे फोन किया। उसने एक वीडियो ठीक से...