जब बीमारी फिर से आए

24 जनवरी, 2022

यांग यी, चीन

1998 में मैंने अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकारा और प्रभु के लौटने का स्वागत किया। परमेश्वर के वचन पढ़कर मैंने जाना कि कैसे परमेश्वर इंसान को शुद्ध करने और बचाने के लिए सत्य व्यक्त करता और अंत के दिनों में न्याय का कार्य करता है और लोगों को सुंदर मंजिल की ओर ले जाता है। मैंने सोचा, परमेश्वर का आशीष पाकर अच्छी मंजिल पर पहुँचना है तो मुझे उसके लिए खुद को खपाना, कष्ट उठाना कीमत चुकानी और अच्छे कर्म करने चाहिए। तो मैं सुसमाचार का प्रचार और कभी-कभी भाई-बहनों की मेजबानी करने लगी और जो भी संभव था, वह सब करने लगी। मैंने तो अपनी बचत तक भी मुश्किल हालात में जी रहे भाई-बहनों की सहायता के लिए त्याग दी। एक बार सुसमाचार का प्रचार करते समय मुझे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, यातना दी और अदालत द्वारा जेल की सजा सुनाकर मुझे जेल भेज दिया। तब भी परमेश्वर को धोखा देकर मैं यहूदा नहीं बनी। मुझे लगा मैंने इतने अच्छे कर्म किए हैं तो यकीनन मुझे परमेश्वर का आशीष मिलेगा। फिर 2018 में अचानक बीस साल पुरानी दिल की बीमारी फिर उभर आई, मुझे हाई ब्लड-प्रेशर हो गया और मैं दो बार अस्पताल में भर्ती हुई। मैंने सोचा, कुछ भी हो जाए, मैं शिकायत नहीं करूँगी। मुझे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना चाहिए। हैरत की बात थी कि मैं दो हफ्तों में ही ठीक होकर घर आ गई। मैं परमेश्वर की बहुत आभारी थी। मैंने सोचा, इतनी बीमार होकर भी मैंने शिकायत नहीं की, बल्कि ठीक होकर अपना कर्तव्य करने में भी लग गई, मैं परमेश्वर के प्रति सच में निष्ठावान और समर्पित हूँ। फिर फरवरी 2019 में मेरी दिल की बीमारी और हाई ब्लड-प्रेशर अचानक फिर उभरे और ये पहले से ज्यादा गंभीर थे। जल्द ही पता चला कि मुझे डायबिटीज भी है और स्लिप डिस्क की गंभीर समस्या भी हो गई थी। मैं कुछ करने लायक नहीं बची थी, लेटे-लेटे ही खाती थी, बाथरूम जाने के लिए भी बहू को मुझे उठाकर ले जाना पड़ता था। मैं पूरे दिन बिस्तर पर लेटी रहती थी और बड़ी मुश्किल से बोल पाती थी और अपनी आँखें खोल पाती थी।

एक रात मेरी हालत ज्यादा बिगड़ गई और दिल में इतना दर्द होने लगा कि मुझे साँस लेने से भी डर लगने लगा—मानो साँस लेते ही दम निकल जाएगा। वो दर्द आधे घंटे रहा, लगा किसी भी पल प्राण निकल सकते हैं। इतनी पीड़ा में मैंने सोचा, “इतनी बीमार हूँ कि पलक भी नहीं झपक सकती, क्या मेरा समय आ गया? अगर मैं मर गई तो राज्य में प्रवेश कैसे करूँगी? मुझे स्वर्ग के राज्य के आशीषों में कभी हिस्सा नहीं मिलेगा, न मैं इसका शानदार दृश्य देख पाऊँगी। क्या मेरे लिए सब कुछ समाप्त हो गया? ...” जितना सोचती, मुझे उतना बुरा लगता। प्रार्थना करने पर भी परमेश्वर का इरादा न समझ पाई। समय बीतने के साथ, लगातार हो रहे बीमारी के दर्द ने मेरी जीने की इच्छा ही छीन ली। लेकिन मैं यह भी जानती थी कि मेरी मृत्यु परमेश्वर का इरादा नहीं था। समझ नहीं आ रहा था क्या करूँ, मैं अनजाने में परमेश्वर से माँग करने लगी : “मैं कब ठीक होऊँगी? मेरी उम्र की सभी परिचित बहनें तंदुरुस्त हैं, लेकिन मैंने खुद को उनसे कम नहीं खपाया या मेरा योगदान कम नहीं है। मैंने परमेश्वर के लिए इतना कुछ दिया है—मितव्ययी होकर खर्च चलाया ताकि जरूरतमंद भाई-बहनों को दान कर सकूँ। मैंने अपना हर कर्तव्य सक्रिय रूप से निभाया है। जब मैं गिरफ्तार हुई, जेल गई और बहुत कष्ट उठाए, तो भी मैंने परमेश्वर से इनकार नहीं किया या उसे धोखा नहीं दिया। क्या मैंने पर्याप्त अच्छे कर्म नहीं किए? परमेश्वर ने मुझे आशीष क्यों नहीं दी, मेरी रक्षा क्यों नहीं की और मुझे तंदुरुस्त शरीर क्यों नहीं दिया?” मैं लगातार शिकायतें कर रही थी और मेरा दिल अंधकार में डूब गया था। उसके बाद जब मेरे दिल में और भी ज्यादा दर्द होने लगा, तभी मैं परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना करने और उसे खोजने लगी। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना में कहा, “हे परमेश्वर, अचानक मेरी दिल की बीमारी और बढ़ गई है। मैं तेरा इरादा समझ नहीं पा रही, जान नहीं पा रही हूँ कि इसे अनुभव कैसे करूँ। प्रिय परमेश्वर, मैं तुझसे विद्रोह या तेरा विरोध नहीं करना चाहती। मुझे प्रबुद्ध कर, राह दिखा कि मैं इस अनुभव से सीख सकूँ।” प्रार्थना के बाद मेरे मन में परमेश्वर के वचनों का यह अंश आया : “अगर बीमारी आ जाए तो तुम्हें इसका अनुभव कैसे करना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर के समक्ष आकर प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर का इरादा खोजना और समझना चाहिए; तुम्हें अपनी जाँच करनी चाहिए कि तुमने ऐसा क्या कर दिया जो सत्य के विरुद्ध है, और तुम्हारे कौन-से भ्रष्ट स्वभावों का समाधान नहीं हुआ है। कष्ट भोगे बिना तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान नहीं हो सकता। कष्टों की आँच से तपकर ही लोग स्वच्छंद नहीं बनेंगे और हर घड़ी परमेश्वर के समक्ष रह सकेंगे। जब कोई कष्ट भोगता है तो वह हमेशा प्रार्थना में लगा रहता है। उनका मन भोजन, वस्त्र और अन्य सुखों पर ध्यान केंद्रित करने का नहीं होता; वे अपने हृदय में लगातार प्रार्थना करते हैं, यह देखने के लिए खुद की जाँच करते हैं कि क्या उन्होंने हाल ही में कुछ गलत किया है या किसी तरह से सत्य के खिलाफ गए हैं। आम तौर पर, जब तुम किसी गंभीर बीमारी या अजीब बीमारी का सामना करते हो जो तुम्हें भयानक पीड़ा देती है, तो यह संयोग से नहीं होता है। तुम्हारी बीमारी और तुम्हारे अच्छे स्वास्थ्य दोनों में परमेश्वर का इरादा है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर पर विश्वास करने में सत्य प्राप्त करना सबसे महत्वपूर्ण चीज है)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करके मैं उसके इरादे स्पष्टता से समझ पाई। परमेश्वर इस बीमारी के जरिए मेरे प्राण नहीं ले रहा था, न ही वह अकारण मुझे कष्ट दे रहा था। बल्कि मेरी बीमारी भ्रष्ट स्वभाव को बेनकाब करने का उसका एक तरीका था, वह मुझे सबक सीखने में मेरी मदद कर रहा था—ये मुझे बचाने का परमेश्वर का तरीका था। मुझे परमेश्वर को गलत नहीं समझना चाहिए या उसके बारे में शिकायत नहीं करनी चाहिए, मुझे तो आत्म-चिंतन करने की जरूरत है।

परमेश्वर के वचनों के कुछ ऐसे अंश थे जिनसे मुझे उस समय की अपनी दशा को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिली। परमेश्वर के वचन कहते हैं : “बहुत सारे लोग मुझ में सिर्फ इसलिए विश्वास करते हैं कि मैं उन्हें चंगा कर दूँ। बहुत सारे लोग मुझ में सिर्फ इसलिए विश्वास करते हैं कि मैं उनके शरीर से अशुद्ध आत्माओं को निकालने के लिए अपनी सामर्थ्य का इस्तेमाल करूँ और बहुत-से लोग मुझसे बस शांति और आनंद प्राप्त करने के लिए मुझमें विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझसे सिर्फ और अधिक भौतिक संपदा माँगने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझ में सिर्फ इसलिए विश्वास करते हैं कि इस जीवन को शांति से गुजार सकें और आने वाले संसार में सुरक्षित और हानिरहित रह सकें। बहुत-से लोग केवल नरक की पीड़ा से बचने के लिए और स्वर्ग के आशीष प्राप्त करने के लिए मुझ में विश्वास करते हैं। बहुत सारे लोग केवल अस्थायी आराम के लिए मुझ में विश्वास करते हैं, फिर भी आने वाले संसार में कुछ भी हासिल करने का प्रयास नहीं करते। जब मैं लोगों पर अपना क्रोध उतारता हूँ और कभी उनके पास रही सारी सुख-शांति छीन लेता हूँ, तो मनुष्य शंकालु हो जाता है। जब मैं मनुष्य को नरक का कष्ट देता हूँ और स्वर्ग के आशीष वापस ले लेता हूँ, वे क्रोध से भर जाते हैं। जब लोग मुझसे खुद को चंगा करने के लिए कहते हैं और मैं उन पर ध्यान नहीं देता और उनके प्रति घृणा महसूस करता हूँ तो वे मुझे छोड़कर चले जाते हैं, इलाज के दुष्ट तरीके और जादू-टोने का मार्ग खोजने लगते हैं। जब मैं मनुष्य द्वारा मुझसे माँगी गई सारी चीजें वापस ले लेता हूँ, तो वे बिना कोई निशान छोड़े गायब हो जाते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि लोग मुझमें आस्था इसलिए रखते हैं क्योंकि मेरा अनुग्रह अत्यंत विपुल है, और क्योंकि बहुत अधिक लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम आस्था के बारे में क्या जानते हो?)। “परमेश्वर के साथ मनुष्य का संबंध केवल नग्न स्वार्थ पर आधारित है। यह आशीष लेने वाले और देने वाले के मध्य का संबंध है। स्पष्ट रूप से कहें तो यह एक कर्मचारी और एक नियोक्ता के मध्य का संबंध है। कर्मचारी केवल नियोक्ता द्वारा दिए जाने वाले प्रतिफल प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम करता है। इस प्रकार के स्वार्थ आधारित संबंध में कोई आत्मीय स्नेह नहीं होता, केवल लेन-देन होता है। प्रेम करने या प्रेम पाने जैसी कोई बात नहीं होती, केवल दान और दया होती है। कोई समझ नहीं होती, केवल असहाय दबा हुआ आक्रोश और धोखा होता है। कोई अंतरंगता नहीं होती, केवल एक अगम खाई होती है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है)। “मैंने पूरे समय मनुष्य के लिए बहुत कठोर मानक रखा है। अगर तुम्हारी वफादारी इरादों और शर्तों के साथ आती है, तो मैं तुम्हारी तथाकथित वफादारी के बिना रहना चाहूँगा, क्योंकि मैं उन लोगों से बेहद घृणा करता हूँ, जो मुझे अपने इरादों से धोखा देते हैं और शर्तों द्वारा मुझसे जबरन वसूली करते हैं। मैं मनुष्य से सिर्फ यही चाहता हूँ कि वह मेरे प्रति पूरी तरह से वफादार हो और सभी चीजें एक ही शब्द—आस्था—की खातिर और इसे साबित करने के लिए करे(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम सचमुच परमेश्वर के विश्वासी हो?)। परमेश्वर के न्याय के वचन दिल में चाकू की तरह घुस गए। मुझे बड़ी शर्म आई और मैं तुरंत होश में आ गई। मैं आत्मचिंतन करने लगी, मेरी इतने बरसों की आस्था का लक्ष्य आखिर क्या था? मैंने सोचा कि विश्वासी बनने के बाद जब-जब मैं भाई-बहनों को मुश्किलों में देखती, तो उनकी मदद करती थी, कलीसिया का हर जरूरी कर्तव्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार निभाती थी और यहाँ तक कि सीसीपी द्वारा गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने और यातना दिए जाने पर भी मैंने परमेश्वर से विश्वासघात नहीं किया। मुझे लगा कि मैंने सच में बहुत सारे अच्छे कर्मों की तैयारी कर ली है। लेकिन परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन और तथ्यों के जरिए खुलासे से मुझे एहसास हुआ कि मैंने परमेश्वर के अधीन होकर उसे संतुष्ट करने के लिए खुद को खपाया या त्याग नहीं किया था, बल्कि मैंने उसका अनुग्रह और आशीष पाने, अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने और सुंदर मंजिल पाने के लिए यह सब किया था। तो जब मैं पहली बार बीमार पड़ी, मैंने सोचा चूँकि मैंने परमेश्वर के लिए खुद को इतना खपाया है, तो मेरी बीमारी के बावजूद वह मुझे मरने नहीं देगा और इसलिए मैंने परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं की। दूसरी बार हालत ज्यादा खराब हो गई, मैं अपना ख्याल रखने लायक न रही, लंबी बीमारी से जूझते हुए सिर पर मौत का खतरा मँडराने लगा, मुझे आशीष पाने और स्वर्ग के राज्य में जाने के आसार धुँधले दिखे, तब मुझे खुद को खपाने का पछतावा हुआ। यहाँ तक कि मैंने अपने पिछले बलिदानों और परमेश्वर के लिए खुद को खपाने का उपयोग परमेश्वर से बहस करने और उसका विरोध करने के लिए किया। मैं परमेश्वर के साथ लेन-देन करने, उसे धोखा देने और उसका उपयोग करने का प्रयास कर रही थी—जो उसके लिए खुद को खपाने से एकदम विपरीत था! मैंने विचार किया कि मैं इतनी अनुचित क्यों थी। परमेश्वर के वचनों ने बताया कि मेरी यह सोच भ्रामक थी कि परमेश्वर के लिए खुद को खपाने और त्याग करने के कारण वह मुझे आशीष देगा, मुझे स्वस्थ शरीर और एक अच्छा गंतव्य देगा, जैसे कि लौकिक जगत में किसी व्यक्ति के काम के आधार पर उसे पारिश्रमिक देना उचित समझा जाता है। मैंने अपने कष्टों और त्याग को पूँजी समझा जिससे मैं अच्छी मंजिल के लिए परमेश्वर से सौदेबाजी कर सकती थी और जब यह सब नहीं मिला, तो मैं शिकायत करने और विरोध करने पर उतर आई। मुझमें मानवता और विवेक नहीं था! परमेश्वर पवित्र और धार्मिक है—वो चाहता है हम निष्ठा से त्याग करें। लेकिन मेरी घृणित मंशा परमेश्वर से सौदेबाजी करने की थी। मैं उससे कपट और उसका विरोध कर रही थी। अगर मैंने जल्द पश्चात्ताप नहीं किया, तो परमेश्वर मुझसे घृणा करने लगेगा और मुझे हटा देगा।

मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और परमेश्वर के वचनों के जरिए समस्या की जड़ को खोजने की कोशिश की। फिर मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “सभी भ्रष्ट मनुष्य अपने लिए जीते हैं। हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए—यह मानव प्रकृति का सार है। सभी लोग अपनी खातिर परमेश्वर में विश्वास करते हैं; वे आशीष पाने के लिए चीजों को त्यागते हैं और खुद को खपाते हैं, जो कष्ट वे सहते हैं और जो कीमत वे अपना कर्तव्य करने में चुकाते हैं, वह भी पुरस्कृत होने के लिए होता है। संक्षेप में, यह सब आशीष पाने, पुरस्कृत होने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के उद्देश्य से है। दुनिया में, लोग अपने लाभ के लिए काम करते हैं और परमेश्वर के घर में, वे आशीषें प्राप्त करने के लिए कर्तव्य करते हैं। आशीषें प्राप्त करने के लिए, लोग सब कुछ त्याग देते हैं और बहुत कष्ट सह सकते हैं। यह सब इस बात का सबसे स्पष्ट प्रमाण है कि लोगों में एक शैतानी प्रकृति होती है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। “शैतान के जहर क्या हैं? इन्हें कैसे व्यक्त किया जा सकता है? उदाहरण के लिए, यदि तुम पूछते हो, ‘लोगों को कैसे जीना चाहिए? लोगों को किसलिए जीना चाहिए?’ तो सभी जवाब देंगे, ‘हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।’ बस यह अकेला वाक्यांश समस्या की जड़ को व्यक्त करता है। शैतान का फलसफा और तर्क लोगों का जीवन बन गए हैं। लोग चाहे जिसका भी अनुसरण करें, वास्तव में वे यह अपने लिए ही करते हैं—और इसलिए वे सभी अपने लिए जीते हैं। ‘हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए’—यही मनुष्य का जीवन-दर्शन है, और इंसानी प्रकृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। ये शब्द पहले ही भ्रष्ट इंसान की प्रकृति बन गए हैं, और वे भ्रष्ट इंसान की शैतानी प्रकृति की सच्ची तस्वीर हैं। यह शैतानी प्रकृति पूरी तरह से भ्रष्ट मानवजाति के अस्तित्व का आधार बन चुकी है। कई हजार सालों से वर्तमान दिन तक भ्रष्ट मानवजाति ने शैतान के इस जहर के अनुसार जीवन जिया है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें)। परमेश्वर के वचनों ने मेरे प्रकृति सार को उजागर कर दिया। परमेश्वर के साथ मेरे सौदेबाजी करने, उसे धोखा देने और अपने स्वार्थ के लिए उसका उपयोग करने की वजह यह थी कि शैतान मुझे बुरी तरह भ्रष्ट कर चुका था। मेरे विचार और धारणाएँ शैतान के विष से ही प्रभावित थीं। मैं इस तरह के शैतानी तर्क और सिद्धांतों के अनुसार जी रही थी कि “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” और “कभी भी घाटे का सौदा मत करो,” हमेशा अपने हित के लिए काम करते हुए केवल परमेश्वर से सौदेबाजी करने के लिए ही खुद को खपाती थी। मैं परमेश्वर से कुछ न कुछ हासिल करने और छोटे-छोटे खर्चों के बदले उससे आशीष पाने की ताक में रहती थी। मैं शैतान के जहर के सहारे जी रही थी और स्वार्थी और नीच बनकर केवल निजी हित साधना चाहती थी। यहाँ तक कि आशीष और लाभ न मिलने पर मैं परमेश्वर के खिलाफ शिकायत करती थी। मेरे अंदर मानवता नाम की चीज नहीं थी! मैंने विचार किया कि किस तरह समस्त मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर अपने पहले देहधारण में उनके छुटकारे के लिए सूली पर चढ़ा, अपने दूसरे देहधारण में वह बड़े लाल अजगर के देश में आया, सीसीपी ने उसका उत्पीड़न किया, धार्मिक जगत ने उसकी निंदा कर उसे नकारा। परमेश्वर ने भयंकर कष्ट और अपमान सहा, फिर भी हमारे सिंचन और पोषण के लिए सत्य व्यक्त किया। परमेश्वर ने हमसे कभी कुछ नहीं माँगा, बल्कि वह हमेशा मानवजाति के लिए चुपचाप बलिदान देता रहा है। लेकिन मैंने परमेश्वर का प्रेम चुकाने की कभी नहीं सोची, बल्कि उससे शांति, आशीष और अच्छी मंजिल की माँग की। और इच्छा पूरी न होने पर मैंने परमेश्वर के खिलाफ शिकायत की। मेरा जमीर आखिर कहाँ था? मैं तो इंसान कहलाने लायक भी नहीं थी, उसके राज्य में प्रवेश करने की तो बात ही छोड़ दो। जब सब समझ आया तो मुझे खुद से नफरत हो गई और मैंने परमेश्वर का आभार माना। अगर मैंने बीमारी से बिस्तर न पकड़ा होता और मृत्यु का भय अनुभव न किया होता, तो मैं कभी आत्म-चिंतन न करती और गलत रास्ते पर ही चलती रहती, परमेश्वर मुझे त्याग देता और निकाल देता और मुझे इसका पता भी न चलता। मैंने भावुक होकर परमेश्वर से प्रार्थना की : “प्रिय परमेश्वर! अब मुझे समझ में आया कि यह बीमारी मेरे लिए तेरे प्रेम और उद्धार का अंग है। मैं समर्पण करने के लिए तैयार हूँ। केवल इस प्रकार के न्याय, ताड़ना, परीक्षण और शोधन के द्वारा ही मैं एक विश्वासी के रूप में अपनी गलत मंशाओं को पहचान सकती हूँ और अपने भ्रष्ट स्वभाव में परिवर्तन का अनुभव कर सकती हूँ। मैं अपने अनुसरण के पीछे निहित गलत दृष्टिकोण को बदलने और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने को तैयार हूँ।” फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा : “मनुष्य के कर्तव्य और उसे आशीष होंगे या हाय का सामना करना होगा, इन दोनों के बीच कोई सह-संबंध नहीं है। कर्तव्य वह है, जो मनुष्य के लिए निभाना आवश्यक है; यह उसकी स्वर्ग द्वारा प्रेषित वृत्ति है, उसे प्रतिफल खोजे बिना, और बिना शर्तों या बहानों के इसे करना चाहिए। केवल इसे अपना कर्तव्य निभाना कहा जा सकता है। आशीष प्राप्त होना उन आशीषों को संदर्भित करता है जिनका कोई व्यक्ति तब आनंद लेता है जब उसे न्याय का अनुभव करने के बाद पूर्ण बनाया जाता है। हाय का सामना करना उस सज़ा को संदर्भित करता है जो एक व्यक्ति को तब मिलती है जब ताड़ना और न्याय से गुजरने के बाद भी लोगों का स्वभाव नहीं बदलता—अर्थात् जब उन्हें पूर्ण नहीं बनाया जाता। लेकिन इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उन्हें आशीष प्राप्त होते हैं या हाय का सामना करना पड़ता है, सृजित प्राणियों को अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए; वह करते हुए, जो उन्हें करना ही चाहिए और वह करते हुए, जिसे करने में वे सक्षम हैं। यह तो कम से कम व्यक्ति को, परमेश्वर का अनुसरण करने वाले व्यक्ति को करना ही चाहिए। तुम्हें अपना कर्तव्य आशीष प्राप्त करने की खातिर नहीं निभाना चाहिए और तुम्हें हाय का सामना करने के भय से अपना कर्तव्य निभाने से इनकार भी नहीं करना चाहिए। मैं तुम लोगों को यह बात बता दूँ : मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य का निर्वाह ऐसी चीज है, जो उसे करनी ही चाहिए और यदि वह अपना कर्तव्य नहीं निभाता है, तो यह उसकी विद्रोहशीलता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर)। मैं समझ गई कि मैं एक सृजित प्राणी हूँ। परमेश्वर के लिए त्याग करना और खुद को खपाना बिल्कुल स्वाभाविक और उचित है और यह मेरा कर्तव्य है। मुझे परमेश्वर से कुछ माँगना नहीं चाहिए, लेकिन मैं अपनी घृणित मंशाओं के तहत अपने खर्च के बदले परमेश्वर से आशीष और अच्छी मंजिल चाहती थी। मैं कितनी गलत थी! चाहे मेरे पास स्वस्थ शरीर और अच्छा गंतव्य हो या न हो, मुझे तब भी अपने कर्तव्य में परमेश्वर का अनुसरण करना और उसके लिए खुद को खपाना चाहिए, जैसे किसी बच्चे को हमेशा अपने माता-पिता का सम्मान करना चाहिए, भले ही वे उसके साथ कैसा भी व्यवहार करें और उसे उनकी संपत्ति मिले या न मिले। क्योंकि ये जिम्मेदारियाँ और दायित्व हैं। भले अभी मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं हुआ था और हालत खराब थी, लेकिन अब मैं परमेश्वर को न तो गलत समझती थी और न ही उनके खिलाफ शिकायत करती थी। चाहे मैं ठीक हो पाऊँ या नहीं, मैं परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होने को तैयार थी।

दरअसल, जहाँ तक यह सवाल है कि अच्छे कर्म कौन-से हैं और किस तरह से खुद को खपाने और त्याग करने से परमेश्वर की स्वीकृति मिलती है, पहले मैं इन्हें अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर परखती थी, लेकिन यह परमेश्वर के इरादे के अनुरूप नहीं है। फिर परमेश्वर के वचनों में न्याय का मानक पता चलने पर मैं समझ गई कि अच्छे कर्म क्या होते हैं। परमेश्वर के वचन कहते हैं : “वह मानक क्या है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति के कर्मों को अच्छे या बुरे के रूप में आँका जाता है? वह यह है कि वह अपने विचारों, खुलासों और क्रियाकलापों में सत्य को अभ्यास में लाने और सत्य वास्तविकता को जीने की गवाही रखता है या नहीं। यदि तुम्‍हारे पास यह वास्तविकता नहीं है या तुम इसे नहीं जीते, तो बेशक, तुम एक कुकर्मी हो। परमेश्वर कुकर्मियों को कैसे देखता है? परमेश्वर के लिए, तुम्हारे विचार और बाहरी क्रियाकलाप परमेश्वर की गवाही नहीं देते, न ही वे शैतान को शर्मिंदा करते या उसे हराते हैं; बल्कि वे परमेश्वर को शर्मिंदा करते हैं और उसके अपमान के निशानों से भरे हुए हैं। तुम परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दे रहे, न ही तुम परमेश्वर के लिए खुद को खपा रहे हो, तुम परमेश्वर की खातिर अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को भी पूरा नहीं कर रहे; बल्कि केवल अपनी खातिर काम कर रहे हो। ‘केवल अपनी खातिर’ का क्या मतलब है? इसका सही-सही मतलब है, शैतान की खातिर। इसलिए अंत में परमेश्वर यही कहेगा, ‘हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।’ परमेश्वर की नजर में तुम्‍हारे कार्यों को अच्‍छे कर्मों के रूप में नहीं देखा जाएगा, बल्कि उन्‍हें बुरे कर्म माना जाएगा। उन्‍हें न केवल परमेश्वर की स्वीकृति हासिल नहीं होगी—बल्कि उनकी निंदा भी की जाएगी। परमेश्वर में ऐसे विश्‍वास से कोई क्‍या हासिल करने की आशा कर सकता है? क्या इस तरह का विश्‍वास अंततः व्‍यर्थ नहीं हो जाएगा?(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। “चूँकि तुम निश्चित हो कि यह मार्ग सच्चा है, इसलिए तुम्हें अंत तक इसका अनुसरण करना चाहिए; तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी कायम रखनी चाहिए। चूँकि तुमने देखा है कि परमेश्वर तुम्हें व्यक्तिगत रूप से पूर्ण करने के लिए पृथ्वी पर आया है, इसलिए तुम्हें अपना दिल पूरी तरह से उसे दे देना चाहिए। चाहे परमेश्वर कुछ भी करे—भले ही अंत में तुम्हें प्रतिकूल परिणाम ही क्यों न दे—तुम फिर भी उसका अनुसरण करो, तो इसका मतलब है कि तुमने परमेश्वर के सामने अपनी शुद्धता बनाए रखी है। परमेश्वर को एक पवित्र आध्यात्मिक शरीर और एक शुद्ध कुँवारी की भेंट, जिसके बारे में कहा गया है, इसका मतलब है परमेश्वर के सामने एक निष्कपट दिल रखना। मनुष्य की निष्कपटता ही शुद्धता है और जो परमेश्वर के प्रति निष्कपट हो सकते हैं, उन्होंने शुद्धता बनाए रखी है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी कायम रखनी चाहिए)। इन्हें पढ़कर मुझे समझ आया कि परमेश्वर चाहता है, हम सच्चे बनें, बिना किसी अपेक्षा के उसके लिए त्याग करने को तैयार हों, सत्य का अभ्यास करें और अपने कर्तव्यों में परमेश्वर की गवाही दें। असल में अच्छे कर्मों का यही अर्थ है। पहले अच्छे कर्मों की मेरी समझ एकतरफा थी। मुझे लगता था कि अगर मैं खुद को खपाती, कष्ट सहती और कीमत चुकाती, तो मैं अच्छे कर्म तैयार कर रही थी और परमेश्वर मुझे याद रखेगा। फिर मुझे याद आया कि किस तरह अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु ने भेंट देने के लिए एक गरीब विधवा को स्वीकृति दी थी। ज्यादातर लोगों को लगा कि उसके दिए कुछ सिक्कों की कोई खास कीमत नहीं थी, लेकिन परमेश्वर यह नहीं देखता कि किसी ने कितना दान दिया है, वह उनकी नीयत देखता है। मैंने खुद को खपाया था, उस विधवा से कई गुना ज्यादा दिया था, तो परमेश्वर ने मुझे स्वीकृति क्यों नहीं दी? परमेश्वर को मेरे व्यय से घृणा नहीं थी, उसे मेरी कपटी मंशाओं और कपट से घृणा थी। मैं परमेश्वर के साथ ईमानदार नहीं थी; मेरा खुद को खपाना सौदेबाजीपूर्ण और अशुद्ध था। इस तरह से मैंने चाहे जितना दिया होता, वो कभी भी अच्छा कर्म न कहलाता। परमेश्वर के इरादे का एहसास होने पर मैंने उससे प्रार्थना की कि अब मुझे चाहे स्वास्थ्य-लाभ और अच्छी मंजिल मिले या न मिले, लेकिन मैं अब भी सच्चाई के साथ परमेश्वर के प्रेम के प्रतिदान के लिए खुद को खपाऊँगी। मेरी स्लिप डिस्क और दिल की बीमारी बार-बार लौटती रही, लेकिन अब मैं न तो अपनी बीमारी को लेकर बाधित थी, न ही आशीषों के लिए अपनी ख्वाहिश से बँधी थी—मैं निरंतर परमेश्वर के वचनों को खा-पी सकती थी, सभाओं में जा सकती थी और यथासंभव अपने कर्तव्य निभा सकती थी।

मुझे अपने जीवन में अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को स्वीकारने का मौका और उसकी वाणी सुनने का सौभाग्य मिला है—यह सब उसने मेरे उत्कर्ष के लिए अपवाद स्वरूप किया है। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन और न्याय के जरिए मैंने जान लिया है कि शैतान ने मुझे इतना भ्रष्ट कर दिया कि मैं मुश्किल से ही मानव के समान हूँ। अब जाकर मैंने थोड़ा-बहुत विवेक और परमेश्वर के प्रति समर्पण हासिल किया है। अब चूँकि मुझमें बदलाव आ गया है, मैं अगर मर भी जाऊँ, तो मेरा जीवन व्यर्थ नहीं जाएगा। आशीषों की इच्छाओं का त्याग करके और बीमारी से बेबस न होकर मैं बहुत स्थिर महसूस करती हूँ। फिर मैंने अपनी बीमारी का कोई इलाज तलाश नहीं किया, धीरे-धीरे मेरी सेहत अपने आप ही सुधरने लगी। अब मैं बैठकर कंप्यूटर पर काम कर सकती हूँ और परमेश्वर की गवाही देने के लिए लेख लिखने का अभ्यास कर रही हूँ। मैं अब अपना ध्यान भी रख सकती हूँ। मैं तहे-दिल से परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ कि उसने मेरी बीमारी के जरिए मुझे सबक सीखने में मदद की और मैं अपने लिए उसका उद्धार और प्रेम देख पाई। मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया : “परमेश्वर में अपने विश्वास में लोग भविष्य के लिए आशीष पाने का अनुसरण करते हैं; यही उनके विश्वास का लक्ष्‍य होता है। सभी लोगों की यही मंशा और आशा होती है, लेकिन उनकी प्रकृति की भ्रष्टता परीक्षणों और शोधन के माध्यम से जरूर दूर की जानी चाहिए। लोग जिन-जिन पहलुओं में शुद्ध नहीं किए जाते और अभी भी भ्रष्टता दिखाते हैं उन पहलुओं में उनका शोधन किया जाना चाहिए—यह परमेश्वर की व्यवस्था है। परमेश्वर तुम्हारे लिए परिवेशों का इंतजाम करता है, तुम्हें उनमें शोधन से गुजरने के लिए बाध्य करता है जिससे तुम अपनी भ्रष्टता को जान जाओ। अंततः तुम उस मुकाम पर पहुँच जाते हो जहाँ तुम अपने मंसूबों और इच्छाओं को छोड़ने और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करने के लिए इच्छुक होगे, भले ही इसका मतलब मृत्यु हो। इसलिए अगर लोग कई वर्षों के शोधन से न गुजरें, अगर वे एक हद तक पीड़ा न सहें, तो वे अपनी सोच और अपने दिलों में देह की भ्रष्टता की बाधाओं से मुक्त होने में सक्षम नहीं होंगे। जिन किन्हीं पहलुओं में लोग अभी भी अपनी शैतानी प्रकृति की बाध्यताओं में जकड़े हैं और जिन भी पहलुओं में उनकी अपनी इच्छाएँ और माँगें बची हैं, उन्हीं पहलुओं में उन्हें कष्ट उठाना चाहिए। केवल कष्ट झेलकर ही लोग सबक सीख सकते हैं, जिसका अर्थ है कि वे सत्य पा सकते हैं और परमेश्वर के इरादों को समझ सकते हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)

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