सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ऐप

परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

जरूरी नहीं कि निष्कपट लोग ईमानदार भी हों

2

चेंग मिंगजी शिआन सिटी, शांज़ी प्रदेश

मैं खुद को एक निवर्तमान और निष्कपट व्यक्ति की तरह मानती हूं। मैं लोगों के साथ बहुत ही सरल तरीके से बात करती हूं; जो भी मैं कहना चाहती हूँ, मैं बस कह देती हूं—मैं बातें इधर-उधर घुमाने वाले लोगों में से नहीं हूं। लोगों के साथ बातचीत करने के दौरान मैं एक बहुत ही सीधा बोलने वाला रुख अपनाती हूं। प्रायः, दूसरों पर बहुत आसानी से भरोसा करने के कारण से मुझे धोखा या उपहास मिलता है। मेरे कलीसिया जाना शुरू करने के बाद ही, मुझे लगा कि मुझे एक जगह मिल गई है, जिसे मैं अपना कह सकती हूं। मैंने मन ही मन खुद से कहा: "पिछली बार मेरी निष्कपटता की वजह से मुझे नुकसान हुआ था और मैं दूसरों के कपट का शिकार बन गई थी; लेकिन कलीसिया में परमेश्वर ईमानदार लोगों को चाहता है, इसलिए मुझे निष्कपटी होने को लेकर चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।" जब मैंने सुना कि परमेश्वर ईमानदार और सरल व्यक्ति को प्यार करता है, और केवल ईमानदार को ही परमेश्वर का उद्धार प्राप्त होगा तो मुझे विशेष रूप से सहजता महसूस हुई। जब मैंने देखा कि मेरे भाई और बहन अपने अधर्मी स्वभाव को पहचानना शुरू करने के बाद भी उसे बदल न पाने के कारण कितने व्यथित रहने लगे थे, तो मुझे और अधिक राहत मिली कि ईमानदार और निष्कपट होने के नाते, मुझे इस तरह के संकट से गुज़रना नहीं पड़ेगा। हालांकि, एक दिन परमेश्वर से एक प्रकाशन प्राप्त करने के बाद, मुझे अंतत: यह एहसास हुआ कि मैं वैसी ईमानदार व्यक्ति नहीं थी, जैसा मैं खुद को सोचा करती थी।

एक दिन, मैंने परमेश्वर को उसकी सहभागिता में कहते हुए सुना: "जो लोग ईमानदार होते हैं उनके पास सत्य होता है, वे दयनीय, निकम्मे, मूर्ख या भोले नहीं होते हैं। ... और इसलिए, इस ताज को अपने सिर पर मत पहनो, यह सोचते हुए कि तुम इसलिए ईमानदार हो क्योंकि तुम समाज में पीड़ित हो, तुम्हारे खिलाफ भेदभाव होता है, और तुम जिससे मिलते हो वह तुम पर धौंस जमाता है और तुम्हें धोखा देता है। यह पूरी तरह से गलत है। ...ईमानदार होना ऐसा नहीं है जैसा लोग कल्पना करते हैं: लोग बस इसलिए ईमानदार नहीं हैं क्योंकि वे निष्कपट हैं और स्पष्ट-व्यवहार करते हैं। यह वैसा नहीं है। कुछ लोग बोलने में स्वाभाविक रूप से बहुत बेबाक़ हो सकते हैं, लेकिन बेबाक़ होने का यह मतलब नहीं कि उनमें कपट नहीं है। कपट लोगों की अभिप्रेरणा, और उनका स्वभाव है। इस दुनिया में रहते हुए, शैतान के भ्रष्टाचार के प्रभाव में रहते हुए, उनका ईमानदार बने रहना असंभव है; वे केवल और अधिक कपटी बन सकते हैं" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास")। परमेश्वर के वचन मेरी स्थिति का एक पूर्ण चरित्र-वर्णन थे। दरअसल, मैं हमेशा सोचती थी कि चूंकि मैं घुमा-फिराकर बात नहीं करती हूं और दूसरों से धोखा खा जाती हूँ, इसलिए इसका मतलब है कि मैं किसी भी तरह से धोखेबाज या चालाक नहीं हूं। नतीजतन, मैं परमेश्वर द्वारा मनुष्य में अधर्म और कपट के पर्दाफाश से व्यक्तिगत रूप से नहीं जुड़ पाई, बल्कि खुद को ईमानदारी के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण मानती रही। मैं सोचती थी कि मेरे अलावा हर कोई अधर्मी है और मैं किसी तरह से अलग थी, कि मेरा जन्म ही स्वाभाविक ईमानदारी के साथ हुआ था। मेरी सोच परमेश्वर का विद्रोह कर रही थी। इस समय, मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अन्य अवतरण याद आया: "ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; किसी भी चीज़ में उससे ढकोसला नहीं करना; सभी चीजों में उसके प्रति निष्कपट होना, सत्य को कभी भी नहीं छुपाना; कभी भी ऐसा कार्य नहीं करना जो उन लोगों को धोखा देता हो जो ऊँचे हैं और उन लोगों को भ्रम में डालता हो जो नीचे हैं; और कभी भी ऐसा काम नहीं करना जो केवल परमेश्वर की चापलूसी करने के लिए किया जाता है। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और वचनों में अशुद्धता से परहेज करना, और न तो परमेश्वर को और न ही मनुष्य को धोखा देना। ...यदि तुम्हारे वचन बहानों और अपने महत्वहीन तर्कों से भरे हुए हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने का अत्यधिक अनिच्छुक है। यदि तुममें ऐसे बहुत से आत्मविश्वास हैं जिन्हें साझा करने के लिए तुम अनिच्छुक हो, और यदि तुम अपने रहस्यों को—कहने का अर्थ है, अपनी कठिनाइयों को—दूसरों के सामने प्रकट करने के अत्यधिक अनिच्छुक हो ताकि प्रकाश का मार्ग खोजा जा सके, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और जो आसानी से अंधकार से नहीं निकलेगा। यदि सत्य का मार्ग खोजने से तुम लोगों को प्रसन्नता मिलती है, तो तुम उसके समान हो जो सदैव प्रकाश में जीवन व्यतीत करता है। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवा करने वाला और काम करने वाला बन कर प्रसन्न हो, गुमनामी में कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण के साथ काम करते हो, हमेशा अर्पित करते हो और कभी भी लेते नहीं हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक वफादार संत हो, क्योंकि तुम किसी प्रतिफल की खोज नहीं करते हो और तुम मात्र एक ईमानदार मनुष्य बने रहते हो। यदि तुम निष्कपट बनने के इच्छुक हो, यदि तुम अपना सर्वस्व खर्च करने के इच्छुक हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन बलिदान करने और उसका गवाह बनने में समर्थ हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम केवल परमेश्वर को प्रसन्न करना जानते हो, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे लोगों में से हो जो प्रकाश में पोषित हैं और सदा के लिए राज्य में रहेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "तीन चेतावनियाँ")। परमेश्वर के वचनों ने मुझे यह अहसास कराया कि ईमानदारी से परमेश्वर का असल में तात्पर्य क्या है, वह जो अपने निर्जी लाभ या भविष्य की योजनाओं के बारे में सोचे बिना अपना ह्रदय परमेश्वर को दे दे। यहां परमेश्वर के साथ व्यापार नहीं करना है, भुगतान पर कोई मांग नहीं करना है: एक ईमानदार व्यक्ति परमेश्वर की संतुष्टि के लिए जीता है। एक ईमानदार व्यक्ति परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से निष्ठावान होता है और उसे धोखा देने की कोशिश कभी नहीं करता है। अपने कर्तव्यों को पूरा करने में वे परिश्रमी होते हैं और कभी भी बातों से बाहर या लापरवाही से कुछ करके धोखा देने की कोशिश नहीं करते हैं। ईमानदार व्यक्ति परमेश्वर के समक्ष अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है, और साथ ही अपने भाइयों व बहनों के साथ अपनी निजी बातों व निजी समस्याओं को साझा करने की इच्छा भी रखता है। ईमानदार लोग कहानी का परिवर्तित संस्करण नहीं देते हैं, बात जैसी होती है वह वैसी ही बताते हैं। ईमानदार लोग सत्य को थामे रखते हैं और दयालु होते हैं। अगर मेरी बात करें तो, मैं यह बिल्कुल नहीं समझ पाई कि ईमानदार व्यक्ति होने का अर्थ क्या है। बातों को लेकर मेरे प्रपंची नजरिए में, परमेश्वर का "ईमानदार व्यक्ति" वह था जिसे इस धर्मनिरपेक्ष दुनिया में "निष्कपट व्यक्ति" कहा जाता है। मुझे यह नहीं पता था कि परमेश्वर के "ईमानदार व्यक्ति" और मेरे "ईमानदार व्यक्ति" में न के बराबर समानता थी। मैं कितनी मूर्ख थी, कितनी बेतुकी!

शैतान ने मनुष्य को हजारों सालों तक भ्रष्ट किया है: हम सभी एक ऐसे वातावरण में पले-बढ़े हैं जो शैतान की घृणा व बुराई से व्याप्त है। हमारी बातें व व्यवहार, हम समाज में जिस तरह से आचरण करते हैं, वह सबकुछ शैतान के आदेश का विषय है। "एक स्थिर जबान व्यक्ति को समझदार बनाती है," "हर किसी को खुद के हितो का ख्याल रखना चाहिए," "विरोधाभासी स्थिति कायम रखने के लिए दोनों तरफ की बातें करना," शैतान के ये कुछ प्रसिद्ध वक्तव्य मनुष्य के सामूहिक अवचेतन में खुद को स्थापित कर चुके हैं: ये हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा हैं इसके बावजूद कि ये हमें अधर्म व कपट की ओर ले जाते हैं। यह देखते हुए कि पूरी मानवता अधर्म व कपट से पीड़ित है, ऐसा क्या था जिसने मुझे यह सोचने दिया कि मैं किसी तरह से इससे बच गई थी, या स्वाभाविक रूप से ईमानदार थी? मैं इधर-उधर की बात किए बिना, जो भी होता है वह सीधे-सीधे बोल देती हूं क्योंकि मैं एक निष्कपट व स्पष्ट व्यक्ति हूं। मैं अक्सर ही दूसरों से धोखा खा जाती हूं क्योंकि मैं अज्ञानी व मूर्ख हूं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मैं वाकई एक ईमानदार व्यक्ति हूं। जब मैं बीते कल की ओर देखती हूं, तो पता चलता है कि न जाने कितनी ही बार मैंने अपनी प्रतिष्ठा और पद को बचाने के लिए कपट किया था और झूठ बोला था? शुद्ध और एकल ह्रदय से परमेश्वर में विश्वास करने की जगह कितनी ही बार मैं अपने भविष्य की संभावनाओं पर चिंता करते हुए लड़खड़ाई थी? मुझे डर था कि परमेश्वर के लिए सबकुछ त्याग देने पर, मुझे पास कुछ भी नहीं बचेगा, इसीलिए मैं हमेशा ही परमेश्वर से एक वादा चाहती थी, इस बात की गारंटी कि एक दिन मैं उनके राज्य में प्रवेश करूंगी। केवल ऐसा होने पर ही मैं किसी चिंता के बिना पूरे दिल के साथ सत्य पाने में सक्षम हो पाउंगी। कितनी ही बार मैंने परमेश्वर से विश्वासघात किया था, अपने कर्तव्यों को पूरा करने की प्रक्रिया में छोटे-छोटे नुकसानों व लाभों में ही परेशान हो जाया करती थी? और कितनी ही बार मैंने परमेश्वर का सान्निध्य पाने के लिए संकल्प किए और उन्हें तोड़ा, "बड़ी बड़ी लेकिन खोखली बातें" बोली? कितनी ही बार मैंने अपने भाइयों और बहनों के समक्ष खुलने और अपने व्यक्तिगत परेशानियों और निजी मामलों को उनके साथ साझा करने से परहेज किया क्योंकि मुझे डर था कि कहीं वे मुझे तुच्छ न समझने लगें? कितनी ही बार मैं केवल वह कहा करती थी जिससे मुझे लगता था कि मेरा निजी फायदा होगा, मेरा बचाव मजबूत होगा और दूसरे संदिग्ध बनेंगे? पीछे मुड़कर देखने पर, ऐसा लग रहा था कि मेरे विचार, बातें और कार्य सबकुछ अधर्म व कपट से भरे हुए थे। नतीजतन, विश्वास की मेरी अवधारणा, मेरे योगदान, दूसरों व परमेश्वर के साथ मेरी बातचीत और मेरे कर्तव्यों की पूर्ति सबकुछ कपट से संक्रमित हो गई थी। आप कह सकते हैं कि मैं अपना हर पल अधर्म के सार के अनुसार जी रही थी। मैं एक ईमानदार इंसान तो ज़रा-भी नहीं हूँ।

मुझे प्रबुद्ध करने के लिए, मुझे यह दिखाने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद कि ईमानदार लोग सिर्फ स्पष्ट बोलने वाले और निष्कपट ही नहीं होते, बल्कि सत्य और मानवता का साथ देने वाले भी होते हैं। मुझे यह दिखाने के लिए भी धन्यवाद कि मैं परमेश्वर की परिभाषा से ईमानदार नहीं हूं, बल्कि शैतान की अधर्मी प्रकृति से पीड़ित व्यक्ति हूं, एक अधर्मी जिसे परमेश्वर ने उजागर किया है। प्रिय परमेश्वर, अब से मैं एक ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए खुद को समर्पित करूंगी। मैं याचना करती हूं कि तुम मुझे उजागर करो और मुझे अपनी अधर्मी प्रकृति को अच्छी तरह से समझने दो, ताकि मैं अपना तिरस्कार कर सकूं, अपनी देह को त्याग सकूं, और जल्द से जल्द सत्यता और मानवता धारण करने वाली व्यक्ति बन सकूं।

सम्बंधित मीडिया

  • सत्‍य को सचमुच स्‍वीकार करना क्‍या है?

    अतीत में, हर समय जब मैं परमेश्‍वर द्वारा प्रकट उस वचन के बारे में पढ़ता था कि कैसे लोग सत्‍य को स्‍वीकार नहीं करते हैं, तो मैं यह विश्‍वास नहीं करता था कि वे वचन मुझ पर भी लागू होते हैं।

  • मैं परमेश्वर को जानने का मार्ग पाता हूँ

    मैं अपने तर्कसम्मत विचारों पर वापस जितना ज्यादा सोचता, उतना ही ज्यादा मुझे अपनी दयनीयता, मूर्खता और बचपने का अहसास होता था।

  • एक ईमानदार व्यक्ति होना आसान नहीं है

    सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के समय के कार्य को स्वीकार करने के बाद, परमेश्वर के वचनों को पढ़ने और उपदेशों को सुनने के माध्यम से, मुझे अपने विश्वास में एक ईमानदार व्यक्ति होने का महत्व समझ में आया, और मैं जान पाई कि केवल एक ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई परमेश्वर का उद्धार पा सकता है। इसलिए मैंने वास्तविक जीवन में एक ईमानदार व्यक्ति बनने का अभ्यास करना शुरू किया। कुछ समय के बाद, मैंने पाया कि मुझे इसमें कुछ प्रवेश मिला है।

  • ईमानदारी में बहुत ज्यादा खुशी है

    अंत के दिनों में मेरे परमेश्वर का कार्य स्वीकार कर लेने के बाद भी, दूसरों के साथ व्यवहार में मेरा यही उसूल रहता था।