“विशेषज्ञ” न रहकर मिली बड़ी आजादी

24 जनवरी, 2022

झांग वेई, चीन

मैं एक अस्पताल के हड्डी रोग विभाग में उपप्रमुख हुआ करती थी। चार दशकों तक मैं अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित थी और मेरे पास व्यापक नैदानिक अनुभव था। मरीज और साथी सभी मेरी चिकित्सा विशेषज्ञता को स्वीकारते थे और मैं जहाँ भी जाती थी मुझे सम्मान मिलता था और मेरा आदर होता था। मुझे लगता था कि मैं भीड़ से अलग हूँ और अन्य लोगों से बेहतर हूँ। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकारने के बाद मैंने देखा कि कुछ भाई-बहन कलीसिया के अगुआ और उपयाजक के रूप में सेवा करते थे और अक्सर समस्याएँ सुलझाने के लिए दूसरों के साथ सत्य के बारे में संगति करते थे। कुछ भाई-बहन पाठ-आधारित काम कर रहे थे या वीडियो बना रहे थे। मुझे उनसे वाकई ईर्ष्या होती थी और लगता था कि ऐसे कर्तव्य करने के लिए लोग जरूर उनका सम्मान करते होंगे। मैं मेजबानी या सामान्य मामले सँभालने को नीची नजरों से देखती थी क्योंकि मुझे लगता था कि वे कर्तव्य साधारण और गुमनाम हैं। मैं सोचती थी, “मैं कभी भी उस तरह का कर्तव्य नहीं कर सकती। मेरी सामाजिक प्रतिष्ठा है और मैं खूब पढ़ी-लिखी हूँ। मेरा कर्तव्य मेरी पहचान और रुतबे से मेल खाना चाहिए।”

2020 में चीनी नववर्ष के बाद एक कलीसिया अगुआ ने मुझसे कहा, “कुछ बहनें पाठ-आधारित कार्य कर रही हैं जिनके पास रहने के लिए सुरक्षित जगह नहीं है। परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास के बारे में ज्यादा लोग नहीं जानते, इसलिए तुम्हारा घर अपेक्षाकृत सुरक्षित होना चाहिए। क्या तुम इन बहनों की मेजबानी कर सकती हो?” मैंने सोचा, “मैं अपना कर्तव्य करने को तैयार हूँ, लेकिन मेरे जैसी प्रतिष्ठित उप-प्रमुख, अपने क्षेत्र की विशेषज्ञ को भाई-बहनों की मेजबानी करने, बर्तन-भांडे सँभालने और हर दिन चूल्हा-चौका करने के लिए कैसे सीमित किया जा सकता है? क्या यह कामवाली होने जैसा नहीं है?” मैं इच्छुक नहीं थी और सोच रही थी, “कोई भी कर्तव्य मेजबानी से अधिक सम्मानजनक है। चाहे कुछ भी हो, तुम्हें मेरे लिए एक ऐसे कर्तव्य की व्यवस्था करनी है जिसमें रुतबा हो या जिसके लिए किसी कौशल की जरूरत हो। इस तरह मैं अपनी गरिमा नहीं खोऊँगी! क्या बहनों की मेजबानी करना मेरी प्रतिभा की बर्बादी नहीं है? अगर मेरे दोस्तों और परिवार को पता चले कि मैंने घर पर रहने और दूसरों के लिए खाना बनाने के लिए विशेषज्ञ होने का अपना रुतबा छोड़ दिया है तो क्या वे हँसते-हँसते लोटपोट नहीं हो जाएँगे?” जितना मैंने इसके बारे में सोचा, मैं उतनी ही खिन्न हो गई। लेकिन उस समय कलीसिया को तत्काल एक मेजबान घर की जरूरत थी। इसलिए भले ही वह कर्तव्य मुझे पसंद न हो, ऐसे महत्वपूर्ण समय पर मैं इनकार नहीं कर सकती थी—यह मानवता की कमी दर्शाता। बाद में मुझे लगा कि मेरा आध्यात्मिक कद छोटा है और मुझे सत्य की बहुत कम समझ है। लेकिन अगर मैं हमेशा उन बहनों के साथ बातचीत करूँ जो पाठ-आधारित काम करती हैं तो मैं उनसे सीख सकती हूँ। तब शायद कलीसिया मुझे पाठ-आधारित काम में भी लगा दे। बहनों की मेजबानी करना अस्थायी होगा। इसके अलावा उस समय अस्पताल में काम करने के आर्थिक लाभ बहुत अच्छे नहीं थे और मैं काम पर नहीं जाना चाहती थी। इसलिए मैंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और सहज रूप से मेजबानी का कर्तव्य सँभाल लिया।

पहले मैं हमेशा काम में व्यस्त रहती थी और शायद ही कभी खाना बनाती थी। लेकिन यह सुनिश्चित करने के लिए कि बहनों को स्वादिष्ट भोजन मिले, मैंने खुद को खाना बनाना सीखने में झोंक दिया। लेकिन खाना पकाने के बाद मैं इसे मेज पर नहीं ले जाना चाहती थी क्योंकि मुझे हमेशा लगता था कि यह दूसरों की सेवा करने का काम है। जब मैं अस्पताल में काम करती थी तो दूसरे लोग मेरे लिए खाना बनाते थे, हर विभाग में सहकर्मी मेरे आने पर खड़े होकर मुझसे बात करते थे और मैं जहाँ भी जाती थी, मुझे अहमियत दी जाती थी। लेकिन अब हर दिन मैं एप्रन और तेल से सने कपड़े पहनती थी और चिकने बर्तन-भांडे साफ करती थी, जबकि बहनें साफ कपड़े पहनती थीं और कंप्यूटर के सामने बैठती थीं। मुझे दिल में तकलीफ होती थी और मैं खिन्न रहती थी, सोचती थी, “‘जो लोग अपने दिमाग से परिश्रम करते हैं, वे दूसरों पर शासन करते हैं और जो अपने हाथों से परिश्रम करते हैं, वे दूसरों के द्वारा शासित होते हैं’ और ‘एक जैसे लोग साथ ही रहते हैं।’ खाना बनाना और मेजबान बनना शारीरिक काम है और इन बहनों के काम के समान स्तर का नहीं है।” जितना मैंने इसके बारे में सोचा, उतना ही बुरा लगा। यह एक भारी बोझ उठाने जैसा था जिसे मैं उतार नहीं सकती थी और मैं लंबे समय तक यह कर्तव्य नहीं करना चाहती थी। मैंने सोचा, “मैंने चिकित्सा शोधपत्र लिखे हैं और अपने क्षेत्र में मेरी प्रशंसा की जाती है, इसलिए मेरा लेखन कौशल इतना बुरा नहीं हो सकता। अगर मैं कुछ अच्छे अनुभवजन्य गवाही लेख लिख सकूँ तो शायद अगुआ देखेगा कि मुझमें प्रतिभा है और मुझे पाठ-आधारित काम में लगा देगा।” इसलिए मैंने अनुभवात्मक लेख लिखने के लिए सुबह जल्दी उठना और देर तक जागना शुरू कर दिया। बहनों ने उन्हें पढ़ा और कहा कि मेरा लेखन बहुत अच्छा है। मैं बहुत खुश हो गई और लेख अगुआ को भेज दिए। मैं इंतजार पर इंतजार करती रही लेकिन अगुआ ने फिर भी मुझे पाठ-आधारित काम में नहीं लगाया। मैं बहुत निराश हो गई और धीरे-धीरे लेख लिखने के लिए मेरा उत्साह खत्म हो गया।

कुछ दिनों बाद मैंने सुना कि कलीसिया को वीडियो बनाने के लिए कर्मियों की जरूरत है और मैंने सोचा, “वीडियो प्रोडक्शन एक ऐसी भूमिका है जिसके लिए कुछ कौशल की जरूरत होती है। यह एक अवसर है और अगर मैं वीडियो बनाना सीख जाती हूँ तो मेरे पास विशेष कौशल होगा।” इसलिए मैंने सुबह जल्दी उठना और फिर देर तक जागना शुरू कर दिया और वीडियो प्रोडक्शन का कौशल सीखने के लिए काम करने लगी। लेकिन चूँकि मैं बूढ़ी हूँ, इसलिए मैं युवा लोगों की रफ्तार के साथ कदम नहीं मिला सकी। इसलिए वह उम्मीद भी टूट गई। मैं निराश हो गई। ऐसा लग रहा था कि मुझे और अधिक “उच्च-स्तरीय” कर्तव्य नहीं मिलने वाला था और मैं शारीरिक श्रम में ही फँस गई थी। मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी उपेक्षा की जा रही है और कुछ दिनों तक मैंने न तो ठीक से खाना खाया और न ही सो पाई। मैं खाना बनाते समय यह भी भूल जाती थी कि मैं क्या कर रही हूँ और किसी भी चीज पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाती थी। कभी-कभी मैं सब्जियाँ काटते समय अपना हाथ काट या जला बैठती थी। मेरे हाथों से कटोरे, चम्मच और ढक्कन फर्श पर गिरते रहते थे, जिससे भयानक शोर होता था जिससे मैं चौंक जाती थी। जब बहनें शोरगुल सुनती थीं तो वे अपना काम छोड़कर सफाई में मेरी मदद करने के लिए दौड़ पड़ती थीं। जब मैं देखती थी कि मैं बहनों को उनके कर्तव्य के दौरान किस तरह प्रभावित कर रही थी तो मुझे बहुत अपराध बोध होता था। अपनी पीड़ा के बीच मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! इन बहनों की मेजबानी करना हमेशा मुझे दूसरों से कमतर महसूस कराता है। मुझे लगता है कि मेरे साथ अन्याय हुआ है और मैं समर्पण नहीं कर पाती। मुझे नहीं पता कि इससे कैसे पार पाऊँ। मेरा मार्गदर्शन करो।”

बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “तुम्हारा चाहे जो भी कर्तव्य हो, उसमें ऊँचे और नीचे के बीच भेद न करो। मान लो तुम कहते हो, ‘हालाँकि यह काम परमेश्वर का आदेश और परमेश्वर के घर का कार्य है, पर यदि मैं इसे करूँगा, तो लोग मुझे नीची निगाह से देख सकते हैं। दूसरों को ऐसा काम मिलता है, जो उन्हें विशिष्ट बनाता है। मुझे यह काम दिया गया है, जो मुझे विशिष्ट नहीं बनाता, बल्कि परदे के पीछे मुझसे कड़ी मेहनत करवाता है, यह अनुचित है! मैं यह कर्तव्य नहीं करूँगा। मेरा कर्तव्य वह होना चाहिए, जो मुझे दूसरों के बीच खास बनाए और मुझे प्रसिद्धि दे—और अगर प्रसिद्धि न दे या खास न बनाए, तो भी मुझे इससे लाभ होना चाहिए और शारीरिक आराम मिलना चाहिए।’ क्या यह कोई स्वीकार्य रवैया है? मनमर्जी से चुनना परमेश्वर से आई चीजों को स्वीकार करना नहीं है; यह अपनी पसंद के अनुसार विकल्प चुनना है। यह अपने कर्तव्य को स्वीकारना नहीं है; यह अपने कर्तव्य से इनकार करना है, यह परमेश्वर के खिलाफ तुम्हारी विद्रोहशीलता की अभिव्यक्ति है। इस तरह मनमर्जी से चुनने में तुम्हारी निजी पसंद और इच्छाओं की मिलावट होती है। जब तुम अपने अभिमान और रुतबे, अपने हितों और ऐसी अन्य चीजों पर विचार करते हो, तो अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा रवैया समर्पण का नहीं होता(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने कर्तव्‍य का मानक स्तर का निर्वहन क्‍या है?)। परमेश्वर के वचनों ने जो उजागर किया, वह मेरी अपनी दशा का एकदम सही प्रतिबिंब था। मैं खुद को उच्च दर्जे की विशेषज्ञ मानती थी जिसे अहमियत दी जाती थी और जहाँ भी मैं जाती थी मुझे सम्मान मिलता था। उस आधार पर मुझे लगता था कि मैं भीड़ से अलग हूँ। जब मुझे बहनों की मेजबानी करने के लिए नियुक्त किया गया था तो मुझे लगा कि मैंने अपना “विशेषज्ञ” का दर्जा गँवा दिया है और यह अन्याय है। परमेश्वर के वचनों के न्याय और प्रकाशन के माध्यम से मुझे एहसास हुआ कि मैं मेजबानी के काम को इतना तुच्छ इसलिए समझती थी क्योंकि मैं हमेशा एक अविश्वासी के नजरिए से कर्तव्यों को देखती थी। मैं कर्तव्यों को उच्च या निम्न के संदर्भ में देखती थी, उन्हें पदानुक्रम में रखती थी। मैं कोई भी ऐसा कर्तव्य करने में खुश थी जो मुझे पहचान और प्रसिद्धि दिला सकता था, लेकिन ध्यान आकर्षित न करने वाले कर्तव्यों को हीन समझती थी। चूँकि मैं उन दृष्टिकोणों से बँधी हुई थी, इसलिए मैं अनिच्छा से अपना कर्तव्य निभाती थी और यहाँ तक कि इसे पूरी तरह से छोड़ने के बारे में सोचती थी। मैंने देखा कि अपने कर्तव्य निर्वहन में मैंने परमेश्वर के इरादों पर जरा भी विचार नहीं किया था। इसका सारा संबंध साफ तौर पर भीड़ से अलग दिखने और प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे भागने से था। यह परमेश्वर का अनुग्रह ही था जिससे मुझे अपना कर्तव्य करने का अवसर मिला, लेकिन मैं अपनी पसंद-नापसंद के आधार पर चुन-चुनकर काम कर रही थी। मेरे पास वाकई विवेक की कोई भावना नहीं थी। यह एहसास होने पर मैंने परमेश्वर के प्रति बहुत ऋणी महसूस किया और चुपचाप अपना मन शांत करने का संकल्प लिया ताकि मैं अपना कर्तव्य निभाने की पूरी कोशिश कर सकूँ।

उसके बाद मैंने सचेत होकर परमेश्वर के वचनों को खाया और पिया और अपनी दशा के बारे में उससे प्रार्थना की और मैं शांत होकर बहनों की मेजबानी करने में सक्षम रही। लेकिन उसके बाद जो हुआ उसने मुझे फिर से झकझोर कर रख दिया। जिन बहनों की मैं मेजबानी कर रही थी, उनमें से एक को कलीसिया अगुआ चुना गया। मुझे उससे वाकई ईर्ष्या हुई और मैंने सोचा, “मैं देख सकती हूँ कि जो लोग पाठ-आधारित काम करते हैं, उन्हें अहमियत दी जाती है। उनका सम्मान किया जाता है और वे दूसरों से अलग दिखते हैं और वे कलीसिया अगुआ भी बन सकते हैं। लेकिन बहनों की मेजबानी करते हुए मुझे देखो, मेरे पास नाम कमाने का क्या कोई मौका है? हर दिन मैं एप्रन पहनती थी और लगातार खाना पकाने से मुझसे तेल और धुएँ की गंध आती थी। हर बार जब मैं खाने का सामान खरीदने के लिए बाहर जाती थी तो मुझे डर लगता था कि कहीं कोई मुझे पहचान न ले और पूछ न ले कि मेरे जैसी बेहतरीन चिकित्सा कौशल वाली अच्छी डॉक्टर काम क्यों नहीं कर रही है। इसलिए हर बार जब भी मैं बाहर जाती थी तो मैं अपना सिर झुकाए रखती थी, दीवार के साथ चलती थी और चुपके से निकल जाने की कोशिश करती थी। घर पहुँचकर ही मैं आखिरकार राहत की साँस ले पाती थी। पहले किसी भी अवसर पर मैं सबसे आगे खड़ी होती थी और अक्सर बोलने के लिए मंच पर जाती थी। और जहाँ भी मैं जाती थी, हर कोई मुझसे हाथ मिलाने की पहल करता था। लेकिन अब मैं नहीं चाहती थी कि कोई मुझे देखे और जब मैं सब्जियाँ खरीदती थी तो मुझे ऐसा लगता था कि मैं छिपकर घूम रही हूँ।” जितना मैं इसके बारे में सोचती थी, मुझे अंदर से उतनी ही तकलीफ होती थी। मैं लौकिक समाज में अपनी पुरानी प्रतिष्ठा के बारे में सोचने से खुद को रोक नहीं पाती थी और मुझे खासकर “विशेषज्ञ,” “निदेशक” और “प्रोफेसर” जैसे खिताब याद आते थे। न चाहते हुए भी मुझे याद आता था कि वरिष्ठ मुझे बहुत सम्मान देते थे, सहकर्मी मेरी प्रशंसा करते थे और मरीज मुझे धन्यवाद कहने के लिए घेरे रहते थे, मुझे एहसास दिलाते थे कि मैं एक बेहतर और गरिमामय जीवन जी रही हूँ। मुझे लगा कि मैं अर्श से फर्श पर पहुँच गई हूँ और मैंने सोचा कि मेरा वर्तमान कर्तव्य कब खत्म होगा। मैं न चाहते हुए भी उदास हो गई। मैंने देखा कि बहनें भोजन का आनंद लेती थीं लेकिन मेरा खाने का मन ही नहीं करता था और जल्द ही मेरा वजन काफी कम हो गया। फिर मुझे अस्पताल के निदेशक से एक अप्रत्याशित कॉल आया जिसमें मुझे काम पर वापस आने के लिए आमंत्रित किया गया। इससे मैं फिर डगमगा गई और मैंने सोचा, “काम पर वापस जाना और ऐसा जीवन जीना बेहतर होगा जहाँ लोग मेरा सम्मान करें और मैं एक विशेषज्ञ के रूप में अपनी प्रतिष्ठा फिर से हासिल करूँ। लेकिन मेजबानी करना बहुत महत्वपूर्ण है। मुझे घर पर रहना है और बहनों की सुरक्षा करनी है और अगर मैं काम पर वापस गई तो मैं यह कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगी।” मैंने जल्दी से परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! मैं अपने अतीत का रुतबा और गौरव नहीं छोड़ पाती हूँ। मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं खुद को जानूँ और समर्पण करूँ।”

खोज के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “इस बारे में सोचो—तुम्हें मनुष्य के मूल्य, सामाजिक रुतबे और पारिवारिक पृष्ठभूमि के प्रति क्या रवैया अपनाना चाहिए? तुम्हारा सही रवैया क्या होना चाहिए? सबसे पहले तो तुम्हें परमेश्वर के वचनों से यह देखना चाहिए कि वह इस मामले से कैसे पेश आता है; केवल तभी तुम सत्य समझ पाओगे और ऐसा कुछ भी नहीं करोगे जो सत्य के खिलाफ हो। तो, परमेश्वर किसी की पारिवारिक पृष्ठभूमि, सामाजिक रुतबे, उनके द्वारा प्राप्त शिक्षा और समाज में उनके पास मौजूद धन को कैसे देखता है? अगर तुम परमेश्वर के वचनों के आधार पर चीजों को नहीं देखते और परमेश्वर के पक्ष में खड़े नहीं हो सकते और परमेश्वर की ओर से चीजों को स्वीकार नहीं करते, तो तुम चीजों को जैसे देखते हो वह निश्चित रूप से परमेश्वर के इरादे से कुछ हटकर होगा। अगर यह बहुत हटकर नहीं है और केवल थोड़ा-सा ही अंतर है, तो यह कोई बड़ी समस्या नहीं है; लेकिन अगर तुम्हारा चीजों को देखने का तरीका पूरी तरह से परमेश्वर के इरादे के खिलाफ है, तो यह चीज सत्य के विपरीत है। जहाँ तक परमेश्वर का सवाल है, वह लोगों को जो कुछ भी देता है और जितना देता है, यह उसी पर निर्भर करता है और समाज में लोगों का जो रुतबा होता है वह भी परमेश्वर द्वारा नियत किया जाता है और यह किसी व्यक्ति द्वारा रचित बिल्कुल भी नहीं होता है। अगर परमेश्वर किसी को पीड़ा और गरीबी भुगतवाता है तो क्या इसका यह अर्थ है कि उस व्यक्ति के पास बचाए जाने की कोई आशा नहीं है? अगर वह कम मूल्य और कम सामाजिक स्थिति का है तो क्या परमेश्वर उसे नहीं बचाएगा? अगर समाज में उसका रुतबा कम है तो क्या परमेश्वर की नजर में उसका दर्जा कम है? जरूरी नहीं है। यह किस चीज पर निर्भर करता है? यह निर्भर करता है उस पथ पर जिस पर यह व्यक्ति चलता है, उसके अनुसरण पर और सत्य और परमेश्वर के प्रति उसके रवैये पर। अगर किसी का सामाजिक रुतबा बहुत कम है, उसका परिवार बहुत गरीब है और उसके पास शिक्षा का स्तर कम है, फिर भी वह व्यावहारिक ढंग से परमेश्वर में विश्वास रखता है, और वह सत्य और सकारात्मक चीजों से प्रेम करता है तो क्या परमेश्वर की नजर में उसका मूल्य ऊँचा है या नीचा, श्रेष्ठ है या तुच्छ? वह इंसान मूल्यवान है। अगर इसे इस परिप्रेक्ष्य से देखा जाए तो किसी व्यक्ति का मूल्य—यह चाहे ऊँचा हो या नीचा, श्रेष्ठ हो या तुच्छ—किस चीज पर निर्भर करता है? यह इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर तुम्हें कैसे देखता है। अगर परमेश्वर तुम्हें किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में देखता है जो सत्य का अनुसरण करता है तो फिर तुम्हारा मूल्य है और तुम मूल्यवान हो—तुम एक बहुमूल्य पात्र हो। अगर परमेश्वर यह देखता है कि तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते हो और तुम खुद को उसके लिए सच्चे दिल से नहीं खपाते हो तो फिर तुम मूल्यहीन हो और मूल्यवान नहीं हो—तुम एक तुच्छ पात्र हो। चाहे तुम कितने ही उच्च शिक्षित हो या समाज में तुम्हारा रुतबा कितना ही ऊँचा हो, अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते हो या इसे समझते नहीं हो तो तुम्हारा मूल्य कभी भी ऊँचा नहीं हो सकता है; भले ही बहुत-से लोग तुम्हारा समर्थन करते हों, तुम्हारा उत्कर्ष करते हों और तुम्हारी पूजा करते हों, फिर भी तुम एक कचरा ही हो। तो आखिर परमेश्वर लोगों को इस नजर से क्यों देखता है? ऐसे ‘कुलीन’ व्यक्ति को जिसका समाज में इतना ऊँचा रुतबा है, जिसकी इतने लोग बड़ाई और सराहना करते हैं, जिसकी प्रतिष्ठा इतनी ऊँची है, उसे परमेश्वर निम्न क्यों समझता है? परमेश्वर लोगों को जिस नजर से देखता है वह दूसरों के बारे में लोगों के विचार से बिल्कुल विपरीत क्यों है? क्या परमेश्वर जानबूझकर खुद को लोगों के विरुद्ध खड़ा कर रहा है? बिल्कुल भी नहीं। ऐसा इसलिए है कि परमेश्वर सत्य है, परमेश्वर धार्मिकता है, जबकि मनुष्य भ्रष्ट है और उसके पास कोई सत्य या धार्मिकता नहीं है और परमेश्वर मनुष्य को अपने मानक के अनुसार मापता है और उसके मापन का मानक सत्य है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद सात : वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (भाग एक))। परमेश्वर के वचनों ने मेरा हृदय उज्ज्वल कर दिया। मेरे दुख का मूल कारण यही था कि मैं परमेश्वर के वचनों और सत्य के आधार पर चीजें नहीं देखती थी। इसके बजाय मैं कर्तव्यों को उच्च या निम्न और पदों के पदानुक्रम के रूप में रखने के लिए शैतान के नजरिए का इस्तेमाल करती थी और सफलता के मानकों के रूप में सामाजिक रुतबे, प्रतिष्ठा, शिक्षा और पेशेवर उपलब्धियों का इस्तेमाल करती थी। इन नजरियों के वश में आकर मैं खुद को एक श्रेष्ठ और महान व्यक्ति के रूप में देखती थी। मुझे लगता था कि मैं एक विशेषज्ञ हूँ, जिसके पास रुतबा और अच्छा ओहदा है, मैं भीड़ से अलग हूँ और अन्य लोगों से बेहतर हूँ। यहाँ तक कि परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी मेरा यही दृष्टिकोण बना रहा। इसलिए मैंने अगुआ और कार्यकर्ता जैसे कर्तव्यों को और उच्च कौशल की जरूरत वाले कर्तव्यों को अहमियत दी। लेकिन मेजबानी या सामान्य मामलों को सँभालना मेरे लिए महत्वहीन था और मुझे लगता था कि वे नीचे के रुतबे वाले पद थे जो मेरी सामाजिक स्थिति से मेल नहीं खाते। जब अगुआ चाहते थे कि मैं बहनों की मेजबानी करूँ तो मैं समर्पण नहीं कर सकी। अपना कर्तव्य निभाते समय मुझे अपनी पुरानी प्रतिष्ठा की कमी खल रही थी, इसलिए मैं ठीक से खा या सो नहीं पाती थी। मैं परेशान रहती थी और मेरा वजन बहुत कम हो गया था। यह असहनीय रूप से दर्दनाक था। लेकिन परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन और न्याय के माध्यम से मैंने उसकी धार्मिकता देखी। उसे इस बात की परवाह नहीं है कि किसी का रुतबा ऊँचा है या नीचा या उसकी योग्यताएँ या शैक्षिक उपलब्धियाँ क्या हैं। परमेश्वर इस बात की परवाह करता है कि लोग सत्य का अनुसरण करते हैं या नहीं और वे किस मार्ग पर हैं। चाहे उनका रुतबा कितना भी ऊँचा हो या उनकी शैक्षणिक उपलब्धियाँ और प्रतिष्ठा कितनी भी बढ़िया क्यों न हो, अगर वे सत्य से प्रेम नहीं करते हैं और सत्य से विमुख हैं तो वे परमेश्वर की नजर में नीच हैं। परमेश्वर उन लोगों को महत्व देता है जो सत्य का अनुसरण करते हैं और उसे प्राप्त करते हैं, भले ही उनका कोई रुतबा न हो। मैंने सीखा कि चाहे कितने भी लोग मेरा समर्थन करें और मेरी प्रशंसा करें और चाहे मेरा रुतबा कितना भी ऊँचा क्यों न हो, अगर मैं परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं हो सकती और सृजित प्राणी का कर्तव्य नहीं निभा सकती तो मैं पूरी तरह से बेकार हूँ।

बाद में मैंने सोचा कि स्पष्ट रूप से यह जानते हुए भी कि मेरा दृष्टिकोण गलत है, फिर भी मैं उन अधिक प्रतिष्ठित कर्तव्यों के पीछे भागने से खुद को क्यों नहीं रोक पाई, जो मुझे दूसरों से अलग दिखा सकते थे। मैंने खोज के दौरान परमेश्वर के वचनों का एक अंश देखा जिसमें कहा गया था : “शैतान लोगों के विचारों को नियंत्रित करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का इस्तेमाल करता है, उनसे और कुछ नहीं, बस इन दो ही चीजों के बारे में सोच-विचार करवाता है और उनसे प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए कष्ट उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपमान सहन करवाता है और भारी बोझ उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करवाता है और उनसे प्रसिद्धि और लाभ की खातिर हर फैसला या निर्णय करवाता है। इस तरीके से शैतान लोगों पर अदृश्य बेड़ियाँ डाल देता है और इन बेड़ियों के रहते उन बंधनों से मुक्त होने की न तो क्षमता होती है, न ही साहस। अनजाने में वे बड़ी ही कठिनाई से कदम-दर-कदम आगे घिसटते हुए ये बेड़ियाँ ढोते रहते हैं। इस प्रसिद्धि और लाभ की खातिर मानवजाति भटककर परमेश्वर से दूर हो जाती है, उसके साथ विश्वासघात करती है और अधिकाधिक दुष्ट होती जाती है। इस तरह, एक के बाद एक पीढ़ी शैतान की प्रसिद्धि और लाभ के बीच नष्ट होती जाती है(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन के माध्यम से मैंने देखा कि शैतान मुझे प्रसिद्धि और लाभ के माध्यम से सता और जकड़ रहा था, मुझ पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा था। जब मैं छोटी थी तभी से मैंने अपने माता-पिता द्वारा सिखाई गईं, स्कूलों में पढ़ाई गईं और लौकिक समाज द्वारा बताई गईं बातें स्वीकार कर ली थीं जैसे कि “आदमी ऊपर की ओर जाने के लिए संघर्ष करता है; पानी नीचे की ओर बहता है,” “एक व्यक्‍ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज करता जाता है,” और “जो लोग अपने दिमाग से परिश्रम करते हैं, वे दूसरों पर शासन करते हैं और जो अपने हाथों से परिश्रम करते हैं, वे दूसरों के द्वारा शासित होते हैं।” बहुत पहले से ही ये शैतानी फलसफे और भ्रांतियाँ मेरे दिल में समा चुकी थीं। इसी के कारण मैं जीवन में प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे को सही लक्ष्य मानने लगी और मुझे लगा कि अगर मैं उन्हें पा लूँगी तो दूसरे लोग मेरे बारे में ऊँचे विचार रखेंगे और मेरा समर्थन करेंगे। इसलिए चाहे स्कूल हो, समाज हो या कलीसिया, मैंने पद और रुतबे को महत्व दिया। मैंने विशेषज्ञ कौशल विकसित करने के लिए कड़ी मेहनत की, समूह के भीतर ऊँचा रुतबा और प्रतिष्ठा पाने की उम्मीद की। मुझे लगा कि यही एकमात्र ऐसा जीवन है जो मेरे अस्तित्व का मूल्य दर्शाता है। जब मैं प्रसिद्धि, लाभ और रुतबा नहीं पा सकी तो मुझे लगा कि भविष्य अंधकारमय, दयनीय है और मैं अपना कर्तव्य निभाने के प्रति उदासीन हो गई। रुतबा, प्रसिद्धि और लाभ बेड़ियों की तरह थे, जो लगातार मुझे नियंत्रित कर रहे थे, इसलिए मैं परमेश्वर से दूर रहने और उससे विश्वासघात करने से खुद को नहीं रोक पाई। मुझे यह एहसास भी हुआ कि भले ही बहनों की मेजबानी करना बहुत साधारण लगता था, लेकिन उस परिवेश ने मुझे यह जानने में मदद की कि अनुसरण के पीछे मेरा दृष्टिकोण भ्रांतिपूर्ण था और मैं अपने कर्तव्य निभाते हुए सत्य का अनुसरण करने और प्रसिद्धि और लाभ की बेड़ियाँ तोड़ने में सक्षम रही। एक बार जब मैंने परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे समझ लिए तो मैंने अपने दिल की गहराई से उसका धन्यवाद किया और मैं पश्चात्ताप से भर गई। मैंने उससे प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, अनुसरण के पीछे मेरे भ्रामक दृष्टिकोण को बेनकाब करने के लिए ऐसा परिवेश बनाने के वास्ते तुम्हारा धन्यवाद। मैं पश्चात्ताप करना चाहती हूँ और रुतबे और प्रतिष्ठा के पीछे भागना बंद करना चाहती हूँ। मैं समर्पण करना चाहती हूँ और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहती हूँ।” फिर मैंने अस्पताल का प्रस्ताव विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया और घर पर रहना और अपना कर्तव्य निभाना जारी रखा।

उसके बाद मैंने परमेश्वर के वचनों के दो और अंश पढ़े : “परमेश्वर किस प्रकार का व्यक्ति चाहता है? क्या वह ऐसा व्यक्ति खोजता है जो महान हो, मशहूर हो, उत्कृष्ट हो या संसार को हिला देने वाला हो? (नहीं।) तो फिर परमेश्वर को किस प्रकार का व्यक्ति चाहिए? (एक ऐसा व्‍यक्ति जो अपने पैर मजबूती से जमीन पर टिकाते हुए एक मानक-स्तरीय सृजित प्राणी की भूमिका निभाता हो।) हाँ, और क्या? (परमेश्वर एक ईमानदार व्यक्ति को चाहता है जो उसका भय मानता हो और बुराई से दूर रहता हो और उसके प्रति समर्पण करता हो।) (एक ऐसा व्‍यक्ति जो सभी मामलों में परमेश्वर के पक्ष में खड़ा हो और जो परमेश्वर के प्रति प्रेम का अनुसरण करे।) ये उत्‍तर भी सही हैं। ये ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के साथ एकदिल और एकमन हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भ्रष्‍ट स्‍वभावों का समाधान केवल सत्य स्वीकार करके ही किया जा सकता है)। “कोई व्यक्ति अंततः उद्धार प्राप्त कर सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह कौन-सा कर्तव्य करता है, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वह सत्य को समझ और प्राप्त कर सकता है, और अंततः परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण प्राप्त कर सकता है और खुद को उसके आयोजन की दया पर छोड़ सकता है, अब अपने भविष्य और नियति पर विचार नहीं करता और एक मानक स्तर का सृजित प्राणी बन जाता है। परमेश्वर धार्मिक और पवित्र है, वह पूरी मानवजाति को मापने के लिए इस मानक का उपयोग करता है और यह मानक कभी नहीं बदलेगा—तुम्हें यह याद रखना चाहिए। इस मानक को अपने मन में दृढ़ता से रखो और उन अवास्तविक चीजों का अनुसरण करने के लिए सत्य का अनुसरण करने का मार्ग छोड़ने के बारे में कभी मत सोचो। बचाए जाने वाले सभी लोगों के लिए परमेश्वर का अपेक्षित मानक हमेशा अपरिवर्तनीय है। तुम कौन हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, यह वही रहता है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर को ऐसे लोग नहीं चाहिए जो अभिजात हों। वह ऐसे लोगों को चाहता है जो जमीन से जुड़े रहकर सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छे से निभा सकें। भले ही लौकिक संसार में मेरी कुछ पहचान और रुतबा था, लेकिन सत्य के बारे में मेरी समझ बहुत उथली थी। अगुआ और कार्यकर्ता होने या पाठ-आधारित काम करने के लिए सत्य की समझ की जरूरत होती है, और सिर्फ रुतबा, ज्ञान और शिक्षा होने से ऐसा नहीं हो सकता। मुझे विवेकशील होना चाहिए और जो भी कर्तव्य मैं कर सकती हूँ, उसे करना चाहिए। चूँकि मेरा घर मेजबानी के लिए उपयुक्त था, इसलिए मुझे बहनों की मेजबानी व्यावहारिक तरीके से करनी चाहिए और सत्य का अनुसरण करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। मेरे पास यही विवेक होना चाहिए। चाहे हम कोई भी कर्तव्य करें, भले ही पदनाम और कार्य अलग-अलग हों, सृजित प्राणी की पहचान और सार अपरिवर्तित रहता है। मेरी अपने बारे में अतिरंजित राय हुआ करती थी और मैं सोचती थी कि मैं बहुत अभिजात हूँ। मैं हमेशा खुद को एक विशेषज्ञ और प्रसिद्ध चिकित्सक के रूप में देखती थी, मानो मैं बाकी सभी से बेहतर हूँ। मुझे लगता था कि भाई-बहनों की मेजबानी करने वालों का रुतबा कम है और मैं ज्यादा प्रतिष्ठित और प्रमुख कर्तव्य के लिए लालायित रहती थी। मुझे लगा कि दूसरे की थाली में लड्डू हमेशा बड़ा होता है और मैं जमीन से जुड़कर अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं कर पाई। यहाँ तक कि अपने दिल में मैंने परमेश्वर का विरोध भी किया। मैं पूरी तरह से अविवेकी होने की हद तक अहंकारी थी। मैंने अय्यूब के बारे में सोचा, जो पूरब के सभी लोगों में सबसे महान था। उसका रुतबा ऊँचा था और उसकी बहुत प्रसिद्धि थी, लेकिन वह खुद को रुतबे के चश्मे से नहीं देखता था या इससे मिलने वाली प्रतिष्ठा की परवाह नहीं करता था। अय्यूब के पास चाहे रुतबा हो या न हो, वह परमेश्वर का भय मानने और परमेश्वर को महान मानकर उसका आदर करने में सक्षम था। अय्यूब तार्किक था। भले ही मैं अय्यूब से अपनी तुलना नहीं कर सकती, लेकिन मैं उसके उदाहरण का अनुसरण करना चाहती हूँ और मानक स्तर का सृजित प्राणी बनने का प्रयास करना चाहती हूँ। एक बार जब मैंने प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के पीछे भागना बंद कर दिया तो मेरा रवैया भी बदल गया। मैंने देखा कि हर कर्तव्य महत्वपूर्ण है और यहाँ तक कि अपरिहार्य है। अगर कोई मेजबानी नहीं करेगा तो भाई-बहनों को ऐसा उपयुक्त परिवेश नहीं मिल पाएगा, जहाँ वे सहज महसूस कर सकें और अपना कर्तव्य निभा सकें। इसके बाद मैंने खुद के खिलाफ विद्रोह करने का सचेत प्रयास किया और अच्छा भोजन तैयार करने और बहनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में अपने प्रयास समर्पित कर दिए ताकि वे शांति से अपना कर्तव्य निभा सकें। धीरे-धीरे मुझे हमारे बीच रुतबे का कोई अंतर महसूस होना बंद हो गया और खाना बनाते समय मैं चुपचाप मन ही मन भजन गाती रहती थी। अपना काम पूरा करने के बाद मैं परमेश्वर के वचनों का प्रार्थना-पाठ करती थी, अपना दिल शांत रखती थी और इस बात पर चिंतन करती थी कि मुझे अपने अनुभवों से क्या मिला और फिर अपने अनुभवात्मक लेख लिखती थी। हर दिन मैं एक अच्छा-खासा संतुष्ट जीवन जीती हूँ। मुझे लगता है कि यह जीने का एक शांतिपूर्ण तरीका है और मेरा दिल मुक्त हो गया है।

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