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मैं परमेश्वर को जानने का मार्ग पाता हूँ

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शिआओकाओ चांग्ज़ी सिटी, शांक्ज़ी प्रदेश

एक दिन, मैंने एक निबंध में परमेश्वर के वचन का निम्न अवतरण पढ़ा "पतरस ने यीशु को कैसे जाना": "यीशु का अनुसरण करने के दौरान, पतरस ने उसके जीवन के बारे में हर चीज़ का अवलोकन किया और उसे हृदय से लगाया: उसके कार्यों को, वचनों को, गतिविधियों को, और अभिव्यक्तियों को। ...यीशु के साथ सम्पर्क के दौरान, पतरस ने यह भी महसूस किया कि उसका चरित्र किसी भी साधारण मनुष्य से भिन्न था। उसने हमेशा स्थिरता से कार्य किया, और कभी भी जल्दबाजी नहीं की, किसी भी विषय को बढ़ा-चढ़ा कर नहीं बताया, न ही कम करके आँका, और अपने जीवन को इस तरह से संचालित किया जो सामान्य और सराहनीय दोनों था। बातचीत में, यीशु शिष्ट, आकर्षक, स्पष्ट और हँसमुख मगर शान्त था, और अपने कार्य के निष्पादन में कभी भी गरिमा नहीं खोता था। पतरस ने देखा कि यीशु कभी-कभी अल्प-भाषी रहता था, जबकि किसी अन्य समय में लगातार बात करता था। कई बार वह इतना प्रसन्न होता था कि वह कबूतर की तरह चुस्त और जीवंत बन जाता था, और कभी-कभी इतना दुःखी होता था कि वह बिल्कुल भी बात नहीं करता था, मानो कोई दुखियारी माँ हो। कई बार वह क्रोध से भरा होता था, जैसे कि कोई बहादुर सैनिक शत्रुओं को मारने के लिए मुस्तैद हो, और कई बार तो एक गरजने वाले सिंह की तरह होता था। कभी-कभी वह हँसता था; फिर कभी वह प्रार्थना करता और रोता था। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि यीशु का आचरण कैसा था, पतरस का उसके प्रति प्रेम और आदर असीमित रूप से बढ़ता गया। यीशु की हँसी उसे खुशी से भर देती थी, उसका दुःख उसे दुःख में डुबा देता था, उसका क्रोध उसे डरा देता था, जबकि उसकी दया, क्षमा, और सख़्ती, उसके भीतर एक सच्ची श्रद्धा और लालसा को बढ़ाते हुए, उसे यीशु से सच्चा प्यार करवाने लगते थे। निस्संदेह, पतरस को इस सब का एहसास धीरे-धीरे तब हुआ जब एक बार वह कुछ वर्षों तक यीशु के साथ रह लिया था" (वचन देह में प्रकट होता है)। इस अवतरण को पढ़ने के बाद मैंने सोचा: कोई आश्चर्य नहीं कि पतरस परमेश्वर के ज्ञान को हासिल कर सका! ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि जब वह दिन और रात यीशु के साथ रहा करता था, उस दौरान वह व्यक्तिगत तौर पर यीशु के प्रत्येक वचन और प्रत्येक गतिविधि का गवाह बना था, और इस तरह से उसने परमेश्वर की पूजनीयता के बारे में और भी जाना था। अब भी वह काल है जब कार्य करने हेतु मनुष्य की दुनिया में व्यक्तिगत तौर पर अवतरित होने के लिए परमेश्वर देहधारी हुआ है। अगर मैं भी पतरस की ही तरह परमेश्वर के संपर्क में आने और उसके साथ समय बिताने में सक्षम होने जितना भाग्यशाली बन सकूं, तो क्या परमेश्वर को और भी बेहतर तरीके से नहीं जान जाउंगा? ओह! कितने शर्म की बात है कि अब मैं केवल परमेश्वर के वचन को पढ़ सकता हूं लेकिन मसीह के चेहरे को नहीं देख सकता हूं। तो कैसे परमेश्वर का सच्चा ज्ञान पाने में सक्षम हो पाउंगा?

जब मैं इसे लेकर दुखी व निराश था तब परमेश्वर के वचनों ने मुझे प्रबुद्ध किया: "परमेश्वर के वचन को पढ़कर और समझकर, परमेश्वर के वचन का अभ्यास और अनुभव करके ही परमेश्वर को जानना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं: 'मैंने देहधारी परमेश्वर को नहीं देखा है, तो मैं परमेश्वर को कैसे जान सकता हूँ?' परमेश्वर का वचन वास्तव में परमेश्वर के स्वभाव की एक अभिव्यक्ति है। आप परमेश्वर के वचन से मानवजाति के लिए परमेश्वर के प्रेम और उनके उद्धार के साथ-साथ यह भी देख सकते हैं कि वे किस तरह से उन्हें बचाते हैं...। क्योंकि परमेश्वर का वचन, स्वयं परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किया जाता है, उसे लिखने के लिए किसी मनुष्य का उपयोग नहीं किया जाता है। यह व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के द्वारा व्यक्त जाता है। यह स्वयं परमेश्वर है जो अपने स्वयं के वचनों और अपने भीतर की आवाज़ को व्यक्त कर रहा है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि वे दिल से महसूस किए जाने वाले वचन हैं? क्योंकि वे बहुत गहराई से निकलते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव, उनकी इच्छा, उनके विचारों, मानवजाति के लिए उनके प्रेम, उनके द्वारा मानवजाति के उद्धार, तथा मानवजाति से उनकी अपेक्षाओं को व्यक्त कर रहे हैं। परमेश्वर के वचनों में कठोर वचन, शांत एवं कोमल वचन, कुछ विचारशील वचन हैं, और कुछ प्रकाशित करने वाले वचन भी हैं जो इंसान की इच्चों के अनुरूप नहीं हैं। यदि आप केवल प्रकाशित करने वाले वचनों को देखेंगे, तो आप महसूस करेंगे कि परमेश्वर काफी कठोर हैl यदि आप केवल शांत एवं कोमल वचन को देखेंगे, तो आप महसूस करेंगे कि परमेश्वर के पास ज़्यादा अधिकार नहीं हैl इसलिए इस विषय में आपको सन्दर्भ से बाहर होकर नहीं समझना चाहिए, आपको इसे हर एक कोण से देखना चाहिए। कभी-कभी परमेश्वर शांत एवं करुणामयी दृष्टिकोण से बोलता है, और लोग मानवजाति के लिए परमेश्वर के प्रेम को देखते हैं; कभी-कभी वह कठोर दृष्टिकोण से बोलता है, और लोग परमेश्वर के अपमान न सहन करने वाले स्वभाव को देखते हैं। मनुष्य बुरी तरह से गंदा है और परमेश्वर के मुख को देखने के योग्य नहीं है, और परमेश्वर के सामने आने के योग्य नहीं है। लोगों का परमेश्वर के सामने आना अब पूरी तरह परमेश्वर के अनुग्रह से ही संभव है। जिस तरह परमेश्वर कार्य करता है और उसके कार्य के अर्थ से परमेश्वर की बुद्धि को देखा जा सकता है। भले ही लोग परमेश्वर के सीधे सम्पर्क में न आएँ, तब भी वे परमेश्वर के वचनों में इन चीज़ों को देखने में सक्षम होंगे" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "देहधारी परमेश्वर को कैसे जानें")। परमेश्वर के वचनों ने अचानक ही मुझे प्रकाश दिखा दिया। हां! अंत के दिनों की देह में परमेश्वर ने मनुष्य को अपना सारा स्वभाव व्यक्त करने के लिए पहले ही अपने वचन का प्रयोग किया है, और मनुष्य को परमेश्वर के वचनों के माध्यम से उसकी महान शक्ति, उसकी महत्ता, उसकी विनम्रता व दीनता, और उसकी पूजनीयता को देखने, एवं इसके साथ ही उसका आनंद व दुख समझने, और उसके पास क्या है एवं वह क्या है यह जानने देता है। वह दिखाने के लिए यह पर्याप्त है कि परमेश्वर के वचनों को पढ़ना और परमेश्वर के वचनों को अनुभव करना परमेश्वर को जानने का एकमात्र मार्ग है। अगर मैं परमेश्वर के वचनों से विमुख हो जाऊं, तो फिर चाहे मैं देह में परमेश्वर को देख भी लूं तो क्या हो? क्या तब फरसियों ने भी यीशु को नहीं देखा था? तो फिर उन लोगों ने यीशु को सलीब पर नहीं लटाकाया था? क्या ऐसा इसलिए नहीं हुआ था क्योंकि वे लोग यीशु के वचनों को नहीं सुनते थे, वे घमंडी थे और जिद्दी स्वभाव के साथ अपनी खुद की अवधारणाओं व कल्पनाओं के साथ चिपके हुए थे, और वे ग्रंथों को थोड़ी-बहुत जो समझते थे उसी के आधार पर उन्होंने यीशु का विरोध किया व निंदा की थी? दूसरी तरफ, पतरस यीशु को जानने में सक्षम हुआ था क्योंकि उसने अपनी खुद की अवधारणाओं व कल्पनाओं को त्याग सका था, प्रभु यीशु के वचनों को निकटता से सुनता था, और यीशु द्वारा दिए गए प्रत्येक वचन व वाक्य पर ध्यानपूर्वक विचार करने में अच्छा था। प्रभु यीशु के कथनों व कार्य के माध्यम से, उसने परमेश्वर का स्वभाव और उसके पास जो भी है एवं वह जो है, उसे जाना और अंतत: परमेश्वर के सच्चे ज्ञान को हासिल किया। क्या यह बख्तरबंद तथ्य इस बात की व्याख्या करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि मनुष्य परमेश्वर के वचन के माध्यम से ही परमेश्वर को जान सकता है? इसके अलावा, यह जानते हुए कि अंत के दिनों की देह में परमेश्वर का मुख्य कार्य वचनों का कार्य है, तो क्या परमेश्वर को जानने में मुझे कोई फायदा नहीं मिलेगा?

मैं अपने तर्कसम्मत विचारों पर वापस जितना ज्यादा सोचता, उतना ही ज्यादा मुझे अपनी दयनीयता, मूर्खता और बचपने का अहसास होता था। हर रोज मैं परमेश्वर के वचनों को अपने हाथों में लेता था, परमेश्वर के वचनों को खाता व पीता, परमेश्वर के वचन को पढ़ता, और परमेश्वर के वचन को अनुभव करता था, लेकिन मैं पूरे दिल से परमेश्वर के वचनों को प्रेम नहीं करता था, यह सोचता था कि मैं केवल मसीह का चेहरा देखकर ही परमेश्वर को जान सकता हूं। मैं एक भाग्यवान जिंदगी जी रहा था, वह भी उसकी प्रशंसा किए बिना! हे परमेश्वर! जानने के मेरे गलत तरीके को उजागर करने व उसे बदलने और मुझे परमेश्वर को जानने का मार्ग दिखाने के लिए तुम्हारा धन्यवाद। अब से, मैं लगातार तुम्हारे वचन पढूंगा, तुम्हारे वचनों पर विचार करूंगा, तुम्हारे वचनों के माध्यम से तुम्हारे आनंद व दुखों को समझने की कोशिश करूंगा, और तुम्हारी पूजनीयता के बारे में और ज्यादा जानकर तुम्हें और भी गहराई से जानूंगा।

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