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"एक मृत व्‍यक्ति के पुनरुत्‍थान" का रहस्‍य

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ली चेंग

भाइयो और बहनो, आप सबको शांति मिले! प्रभु की तैयारियों के लिए उनका आभार, जिनकी वजह से हम बाइबल के सत्यों पर यहाँ संवाद करने आए हैं। प्रभु हमारा मार्गदर्शन करें। आज, मैं सभी से "एक मृत व्‍यक्ति के पुनरुत्‍थान" विषय पर चर्चा करना चाहूँगा।

जैसा कि प्रभु में विश्‍वास करने वाले सभी लोग जानते हैं, "एक मृत व्‍यक्ति का पुनरुत्‍थान" यीशु के लौटने के समय से संबंध रखता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसे देखने का हम सभी ईसाई बेताबी से इंतज़ार कर रहे हैं। तो फ़िर, एक "मृत इंसान" का पुनरुत्‍थान किस तरह हो सकता है? कई लोग यहेजकेल की पुस्‍तक के अध्‍याय 37, पद 5-6 के बारे में विचार करेंगे: "परमेश्वर यहोवा तुम हड्डियों से यों कहता है: देखो, मैं आप तुम में साँस समाऊँगा, और तुम जी उठोगी। मैं तुम्हारी नसें उपजाकर मांस चढ़ाऊँगा, और तुम को चमड़े से ढाँपूँगा; और तुम में साँस समाऊँगा और तुम जी जाओगी; और तुम जान लोगी कि मैं यहोवा हूँ।" यूहन्‍ना के सुसमाचार, अध्‍याय 6, पद 39 में यीशु ने कहा था: "और मेरे भेजनेवाले की इच्छा यह है कि जो कुछ उसने मुझे दिया है, उस में से मैं कुछ न खोऊँ, परन्तु उसे अंतिम दिन फिर जिला उठाऊँ।" 1 कुरिन्थियो की पुस्‍तक के अध्‍याय 15, पद 52-53 में यह पढ़ने में आता है: "और यह क्षण भर में, पलक मारते ही अन्तिम तुरही फूँकते ही होगा। क्योंकि तुरही फूँकी जाएगी और मुर्दे अविनाशी दशा में उठाए जाएँगे, और हम बदल जाएँगे। क्योंकि अवश्य है कि यह नाशवान् देह अविनाश को पहिन ले, और यह मरनहार देह अमरता को पहिन ले।" इसके अलावा, यदि लोग बाइबल का शाब्दिक अर्थ समझें तो, वे यह मानेंगे कि: अंत के दिनों में, जब प्रभु के अव‍तरित होने की घड़ी निकट आएगी, उस समय कई महान और चमत्‍कारिक चीज़ें घटित होंगी। अपनी सर्वशक्तिमत्‍ता से, वे कई पीढ़ियों से सोए हुए संतों के शरीरों को पुनर्जीवित करेंगे। वे उन्‍हें उनकी कब्रों में से, धरती या समंदर के नीचे से उठाएँगे। जमीन के नीचे या सागर की तलहटी में जो हज़ारों कंकाल पहले ही सड़ चुके हैं, उन्हें तत्‍काल एक नया जीवन दिया जाएगा। सड़न जादुई तरीके से लुप्‍त हो जाएगी और वे सभी महिमा में प्रवेश करेंगे। कितना भव्‍य होगा वह दृश्‍य! ... "एक मृत व्‍यक्ति के पुनरुत्‍थान" को लेकर हमारे दृष्टिकोण और कल्‍पनाएं भी ऐसी ही हैं। यह भविष्‍यवाणी आख़िर किस तरह पूरी होगी? क्‍या यह वाकई वैसी ही चमत्‍कारिक होगी जैसी होने की हम कल्‍पना करते हैं? क्‍या प्रभु इस घटना को हमारी कल्‍पनाओं के अनुरूप अंजाम देंगे?

हम सभी जानते हैं कि परमेश्‍वर की बुद्धिमत्‍ता स्‍वर्ग से भी उच्‍चतर है। परमेश्‍वर जो करते हैं वह हमारे विचारों और कल्‍पनाओं से भी कहीं अधिक है। बाइबल में यह दर्ज़ किया गया है: "क्योंकि यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं हैं, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है। क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है" (यशायाह 55:8-9)। परमेश्‍वर के सृजन के रूप में, उनके समक्ष हम धूल के समान तुच्‍छ और क्षुद्र हैं। हम परमेश्‍वर के कार्य की थाह कभी न ले पाएँगे। यह बाइबल में यीशु के नीकुदेमुस से पुनर्जीवन के सत्‍य की चर्चा करने के अभिलेख के समान है। "मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्‍वर का राज्य देख नहीं सकता" (यूहन्‍ना 3:3)। नीकुदेमुस ने यीशु के वचनों को शब्‍दश: समझा। उसका मानना था कि "पुनर्जन्म" का अर्थ अपनी माँ के गर्भ से दोबारा पैदा होना है। अपने दिमाग और कल्‍पना का उपयोग कर, उसने एक आध्‍यात्मिक विषय को ऐसा समझा मानो वह एक भौतिक विषय हो। इस प्रकार की स्‍वीकृति बहुत गलत है। साथ ही, जब यीशु सामरी स्‍त्री से बात कर रहे थे, तब उन्‍होंने कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा" (यूहन्‍ना 4:14)। उस समय, वह सामरी स्‍त्री प्रभु की बात का अर्थ नहीं समझी। उसने समझा कि प्रभु जिस जल की पेशकश कर रहे हैं वह वही पानी है जो लोग पीते हैं। नतीजतन उसने कहा, "हे प्रभु, वह जल मुझे दे ताकि मैं प्यासी न होऊँ और न जल भरने को इतनी दूर आऊँ" (यूहन्‍ना 4:15)। वस्‍तुत: जिस "जल" का यीशु ज़िक्र कर रहे थे उनका संबंध प्रभु के वचन से था। वे जीवन जल का हवाला दे रहे थे। सामरी स्‍त्री ने यीशु के कथन का सिर्फ़ शाब्दिक अर्थ समझा, और इस तरह उसने उसका गलत मतलब निकाला। इससे हम समझ सकते हैं कि परमेश्‍वर के वचन सत्‍य हैं। उससे परमेश्‍वर के कार्य का रहस्‍य छुप जाता है। अगर परमेश्‍वर इन रहस्‍यों को प्रकाशित न करें, तो हमारी समझ बहुत सीमित रहेगी। इसी तरह, अगर हम "मृत व्‍यक्ति के पुनरुत्‍थान" की भविष्‍यवाणी का सिर्फ़ शाब्दिक अर्थ समझें तो क्‍या हम भी वही गलती नहीं करेंगे जो निकुदेमुस और सामरी स्‍त्री ने की थी? इसलिये, जब भविष्‍यवाणियों की बात आती हे, तो हमें आदर बनाये रख कर और अधिक खोज करनी चाहिए, शब्दों की अक्षरश: व्‍याख्‍या नहीं करनी चाहिए, निर्णय लेने के लिए हमारी अपनी कल्‍पनाओं और अवधारणाओं पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, और इसका वर्णन करने में हमारे निजी अर्थ पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

तो फ़िर "मृत व्‍यक्ति के पुनरुत्‍थान" का क्या अर्थ है? "मृत व्‍यक्ति" और "जीवित व्‍यक्ति" का संदर्भ किस बात से है? हज़ारों सालों से, कोई भी इंसान इस सवाल का साफ़-साफ़ जवाब नहीं दे पाया है। केवल परमेश्‍वर ही इन भेदों को खोल सकते हैं। अब, परमेश्‍वर पहले ही देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के रूप में लौट आए हैं। उन्‍होंने लाखों की संख्‍या में वचन व्‍यक्‍त किए हैं और बाइबल में वर्णित सभी रहस्‍यों को उजागर किया है। आइए, हम सभी साथ मिल कर सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों पर एक नज़र डालें। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर कहते हैं: "परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की, जिसके बाद मनुष्य शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया, और इस भ्रष्टाचार ने मनुष्यों को मृत देह बना दिया - और परिणामस्वरूप आपके बदलने के बाद, आप इन मृत देहों से भिन्न हो जाएंगे। वह परमेश्वर के वचन हैं जो लोगों की आत्मा को जीवन देते हैं और उन्हें नया जन्म देते हैं, और जब लोगों की आत्माएं नया जन्म लेंगी वे जाग उठेंगे। "मृतक" का उल्लेख यहां शव की ओर इशारा करता है जिसमें आत्मा नहीं होती है, तथा उन लोगों की ओर जिनकी आत्मा मर चुकी है। जब लोगों की आत्मा को जीवन दिया जाता है तो वे जीवित हो जाते हैं। जिन संतों की बात पहले की गई थी, ये वे लोग हैं जो जीवित हो चुके हैं, जो शैतान के अधिकार में तो थे परंतु उन्होंने शैतान को हराया है। …पहले परमेश्वर द्वारा बनाया गया मनुष्य जीवित था, परंतु शैतान की भ्रष्टता के कारण मनुष्य मृत्यु के मध्य रहता है, और शैतान के प्रभाव में रहता है, और इसलिए जो मनुष्य बिना आत्मा के हैं, वे मृत हो चुके हैं, वे परमेश्वर के शत्रु बन गए हैं जो उसका विरोध करते हैं, वे शैतान के हथियार बन गए हैं, और वे शैतान के कैदी बन गए हैं… मृतक वे हैं जिनमें आत्मा नहीं होती, जो चरमसीमा तक सुन्न और परमेश्वर विरोधी होते हैं। साथ ही, ये वे लोग होते हैं जो परमेश्वर को नहीं जानते। इन लोगों में परमेश्वर की आज्ञा मानने की थोड़ी सी भी इच्छा नहीं होती, वे केवल उससे विद्रोह कर उसका सामना करते हैं और इन में थोड़ी भी निष्ठा नहीं होती है। जीवित वे हैं जिनकी आत्मा ने नया जन्म पाया है, जो परमेश्वर कि आज्ञा मानना जानते हैं, और जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हैं। ये लोग सत्य और गवाही धारण करते हैं और केवल यही हैं जो परमेश्वर के घर में उसे अच्छे लगते हैं। परमेश्वर उन्हें बचाता है जो जीवित हो सकते हैं, जो परमेश्वर के उद्धार को देख सकते हैं, जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हैं और जो परमेश्वर को खोजने के इच्छुक हैं। परमेश्वर उन्हें बचाता है जो परमेश्वर के अवतरण में विश्वास करते हैं और उसके प्रकटन में विश्वास करते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "क्या आप जाग उठे हैं?")।

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों ने हमें "मृत व्‍यक्ति" और "जीवित व्‍यक्ति" का अर्थ स्‍पष्‍ट किया है। प्रांरभ में, परमेश्‍वर ने मानवजाति के पूर्वज, आदम और हव्‍वा का सृजन किया। वे आत्‍मवान जीवित मनुष्‍य थे। वे शुद्ध अंत:करण वाले बुद्धिमान लोग थे। वे परमेश्‍वर का प्रत्यक्ष रूप देख पाने में सक्षम थे और उनका सम्‍मान करते थे। बाद में, उन्हें शैतान द्वारा भले-बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाने का प्रलोभन दिया गया। फलस्‍वरूप, वे शैतान के विष से भर गए। अब वे परमेश्‍वर के प्रति निष्‍ठापूर्ण नहीं रहे और न ही उन्‍होंने परमेश्‍वर का आज्ञापालन किया। उन्‍होंने मनुष्‍य की उस छवि को खो दिया जो परमेश्‍वर ने आरंभ में बनाई थी। हालाँकि उनके शरीर तब भी ज़िंदा थे, मगर परमेश्‍वर की निगाह में वे पहले ही आत्माहीन मुर्दे बन गए थे। वर्तमान में हम शैतान द्वारा अधिक-से-अधिक गहराई से भ्रष्‍ट किए जा रहे हैं। हम अहंकार, स्‍वार्थ, कपट, द्वेष, लालच जैसे शैतानी दूषित स्‍वभाव से लबालब भरे हुए हैं। यह इस हद तक पहुँच गया है कि जब हमारा सामना किसी ऐसी बात से होता है जो हमारी धारणाओं के अनुरूप नहीं होती, तो हम परमेश्‍वर के शिकायत करते हुए, उनका आकलन और विरोध करते हैं तथा उनके साथ विश्‍वासघात करते हैं। परमेश्‍वर की नज़रों में, हम आत्माहीन मृत लोग हैं। इससे हम समझ सकते हैं कि "मृत व्‍यक्ति" का संबंध उन लोगों से है जो शैतान के प्रभाव में जी रहे हैं, जिनके भ्रष्‍ट स्‍वभाव परमेश्‍वर का विरोध करते हैं तथा जो परमेश्‍वर से शत्रुता रखते हैं। इसी प्रकार, "जीवित व्‍यक्ति" का संबंध उनसे है जो अपने शैतानी भ्रष्ट स्‍वभाव को त्याग चुके हैं, जिनकी अंतरात्‍मा और विवेक पुन: स्‍थापित हो चुके हैं, जो परमेश्‍वर को समझते हैं, उनका आज्ञापालन और उनसे प्रेम करते हैं। इन लोगों के दिलों में परमेश्‍वर के लिए जगह है। हर विषय में वे सत्‍य का अनुसरण कर पाते हैं, परमेश्‍वर के इरादों को समझ पाते हैं, परमेश्‍वर के वचनों के सत्‍य पर अमल कर सकते हैं और अब शैतान के जीवन नियमों पर निर्भर नहीं रहते। वे ऐसे लोग हैं जो शैतान के प्रभाव पर विजय प्राप्‍त कर परमेश्‍वर के पास वापिस लौट चुके हैं। ये आत्मावान जीवित लोग हैं और वे सचमुच काल के गाल से निकलकर पुनर्जीवित हो चुके हैं।

"मृत व्‍यक्ति" और "जीवित व्‍यक्ति" के बीच का अंतर जानने के बाद, कुछ भाई-बहनों को यह जिज्ञासा हो सकती है कि "मृत व्‍यक्ति के पुनरुत्‍थान" की भविष्‍यवाणी किस तरह पूरी होगी? इस सवाल का जवाब देने से पहले, आइए हम एक उदाहरण देखते हैं। भले ही यीशु ने हमारे पापों का प्रायश्चित करके उन्हें क्षमा कर दिया है, तो भी हमारे पाप की जड़ का समाधान नहीं हुआ है। हम अभी भी शैतानी भ्रष्‍ट स्‍वभाव की अधीनता में जीते हैं। हम दिन-प्रतिदिन पाप करते हैं और उनको कबूल करते रहते हैं। मिसाल के तौर पर: हम परमेश्‍वर की आज्ञाएं मानने और प्रभु के वचनों को अपने कृत्‍यों में ढालने में असमर्थ रहते हैं। हम लौकिक जगत के ऐसे लोगों के समान हैं जो धन और दैहिक सुख की लालसा जैसे सांसारिक उतार-चढ़ावों का अनुसरण करते हैं। हम अहंकारी, मगरूर, कुटिल, धूर्त, स्‍वार्थी और नीच हैं। हमारा शैतानी स्‍वभाव हमें उसके काबू में रखता है। हम अक्सर परमेश्‍वर के विपरीत जाकर उनका विरोध करते हैं। हम स्‍वयं को भीड़ से अलग होने का दिखावा करना चाहते हैं। हम ख़ुद की ही गवाही देते हैं ताकि दूसरे हमें उनसे बेहतर समझें और हम परमेश्‍वर के समतुल्‍य होने की कोशिश करते हैं। अपने निजी फायदे के लिए, हम कुटिलता के काम कर सकते हैं, लोगों को धोखा देने के लिए झूठ बोल सकते हैं, दूसरों से खुल कर झगड़ा और गुपचुप छल कर सकते हैं। हम प्रभु के सामने झूठी शपथ लेने और खाली वादे करने जैसे कृत्‍य भी कर सकते हैं। भले हमारे मुख यह कहें कि हम प्रभु से प्रेम करते हैं, मूल रूप में हम प्रभु के साथ सौदेबाजी कर रहे होते हैं। बाहर से हम कड़ी मेहनत, त्‍याग और खर्च करते हैं, परन्‍तु हम यह सब लेन-देन के रूप में परमेश्‍वर की इनायत और आशीष पाने की आशा में कर रहे हैं। हम परमेश्‍वर में विश्‍वास करते हैं, फ़िर भी हम उन्‍हें महान मान कर उनका सम्‍मान नहीं करते। प्रभु के लिए हमारे दिलों में कोई जगह ही नहीं है। उसकी जगह, हम मशहूर हस्तियों, महान लोगों, पादरियों और एल्‍डर्स वगैरह की इबादत करते हैं। अगर हम अपने भ्रष्‍ट स्‍वभावों को शुद्ध करने में असमर्थ हैं, तो हम जीवित इंसान कैसे बन सकते हैं और किस तरह हम परमेश्‍वर की स्‍वीकृति पाकर स्‍वर्ग के राज्‍य में प्रवेश कर सकते हैं? इसका नतीजा यह है कि हमें अभी भी परमेश्‍वर द्वारा उद्धार का एक और चरण पूरा किए जाने की ज़रूरत है।

यीशु ने कहा था: "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्‍ना 16:12-13)। साफ़ तौर पर, अंत के दिनों में परमेश्‍वर सत्‍य को व्‍यक्‍त करने और मनुष्‍य को जीवन की सौगात देने के अपने कार्य के अंतिम चरण को पूरा करने वापिस आएंगे। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन कहते हैं: "अगर लोग जीवित प्राणी बनना चाहते हैं, और परमेश्वर के गवाह बनना चाहते हैं, और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करना होगा, उन्हें आनंदपूर्वक उसके न्याय व ताड़ना के प्रति समर्पित होना होगा, और आनंदपूर्वक परमेश्वर की काट-छांट और बर्ताव को स्वीकार करना होगा। केवल तब ही परमेश्वर द्वारा जरूरी तमाम सत्य को अपने आचरण में ला सकेंगे, और तब ही परमेश्वर के उद्धार को पा सकेंगे, और सचमुच जीवित प्राणी बन सकेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "क्या आप जाग उठे हैं?")। अंत के दिनों में, शैतान के असर से हमें बचाने के आशय से, परमेश्‍वर ने एक बार फ़िर देहधारण की है। वे अपने घर से शुरू होने वाले न्‍याय के कार्य को प्रकट करने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के नाम का प्रयोग करते हैं। हम परमेश्‍वर के वचनों के न्‍याय, ताड़ना, परीक्षण, काट-छाँट और शुद्धिकरण का अनुभव कर चुके हैं। हम सही मायनों में परमेश्‍वर के प्रति अपने स्‍वयं के प्रतिरोध, विरोधाभास, शैतानी स्‍वभाव और सार के तथ्‍य को समझते हैं। साथ ही, हमें परमेश्‍वर के धार्मिक और पवित्र स्‍वभाव की भी थोड़ी-बहुत समझ है। हम देखते हैं कि परमेश्‍वर का उद्धार बहुत ही व्‍यावहारिक है। इसके अलावा, हम अपने ही शैतानी स्‍वभाव से घृणा करते हैं और उससे नाता तोड़ देते हैं। हम सत्‍य पर अमल करने, मनुष्‍य के रूप में रहने के आशय से परमेश्‍वर के वचनों पर भरोसा करने, अपने भ्रष्ट स्‍वभाव से पीछा छुड़ाने और परमेश्‍वर के इरादों को संतुष्‍ट करने के लिए तैयार हैं। परमेश्‍वर जो सत्‍य व्‍यक्‍त करते हैं, उन्‍हें हमने अपने जीवन आचरण में ढाल लिया है। हमने परमेश्‍वर के प्रति सच्‍ची आज्ञाकारिता और प्रेम पा लिया है और हम एक सच्‍चे इंसान के रूप में रहते हैं। इस प्रकार कोई "मृत व्‍यक्ति" एक "जीवित व्‍यक्ति" में परिवर्तित हो सकता है। यही मृत्‍यु के मुख से पुनरुत्‍थान है। यह यीशु के वचनों को भी पूरा करता है: "और मेरे भेजनेवाले की इच्छा यह है कि जो कुछ उसने मुझे दिया है, उस में से मैं कुछ न खोऊँ, परन्तु उसे अंतिम दिन फिर जिला उठाऊँ" (यूहन्‍ना 6:39)। यह स्पष्ट है कि "पुनरुत्‍थान" अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के न्‍याय कार्य से सिद्ध होता है और यह ऐसा अलौकिक नहीं है जैसा कि लोग इसके होने की कल्‍पना करते हैं। भाइयो और बहनो, परमेश्‍वर को जीवित लोगों की आवश्‍यकता है, मृत लोगों की नहीं। केवल जीवित लोग ही परमेश्‍वर का सम्‍मान कर सकते हैं और उनकी गवाही दे सकते हैं। सिर्फ़ जीवित लोग ही स्‍वर्ग के राज्‍य में प्रवेश करने - परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा को पूरा कर पाने के योग्‍य हैं। अगर हम अंत के दिनों के परमेश्‍वर के कार्य को स्‍वीकार करते हैं, परमेश्वर के न्‍याय के वचनों और ताड़ना का अनुभव करते हैं, और सत्‍य को अपने जीवन के रूप में स्‍वीकार करते हैं, तो हम मौत के मुँह से निकलकर पुनर्जीवित हो सकते हैं।

परमेश्‍वर का धन्‍यवाद! सब महिमा परमेश्‍वर की है!

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