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वचन देह में प्रकट होता है

विषय-वस्तु

जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य (1)

मनुष्यजाति, जो शैतान के द्वारा अत्यधिक भ्रष्ट कर दी गई है, नहीं जानती है कि एक परमेश्वर भी है और इसने परमेश्वर की आराधना करना भी समाप्त कर दिया है। आरम्भ में, जब आदम और हव्वा को रचा गया था, यहोवा का प्रताप और साक्ष्य सर्वदा उपस्थित था। परन्तु भ्रष्ट होने के पश्चात, मनुष्य ने उस प्रताप और साक्ष्य को खो दिया, क्योंकि सभी ने परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया और उसका सम्मान करना पूर्णतया बन्द कर दिया। आज का विजय कार्य उस सम्पूर्ण साक्ष्य और उस सम्पूर्ण प्रताप को पुनः प्राप्त करने, और सभी मनुष्यों से परमेश्वर की आराधना करवाने के लिए है, जिससे सृष्ट वस्तुओं में साक्ष्य हो। कार्य के इस पड़ाव में यही किए जाने की आवश्यकता है। मनुष्यजाति को किस प्रकार जीता जाए? मनुष्य को सम्पूर्ण रीति से कायल करने के लिए यह वचनों के इस कार्य का प्रयोग कया जायेगा; उसे पूर्णत: अधीन बनाने के लिए, न्याय, ताड़ना, निर्दयी श्राप और प्रकटीकरण का प्रयोग किया जायेगा; और मनुष्य के विद्रोहीपन को ज़ाहिर करने और उसके विरोध का न्याय करने के द्वारा किया जाएगा; जिससे वह मानवता की अधार्मिकता और अशुद्धता को जान सके, जिसका प्रयोग परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की विशिष्टता दर्शाने के लिए किया जाएगा। मुख्यतः, यह इन वचनों का प्रयोग होगा, जो मनुष्य को जीतते और उसे पूर्णत: कायल करते हैं। शब्द मनुष्यजाति को अन्तिम रूप से जीत लेने के साधन हैं, और वे सभी जो इस जीत लिए जाने को स्वीकार करते हैं, उन्हें इन वचनों के प्रहार और न्याय को भी स्वीकार करना आवश्यक है। बोलने की वर्तमान प्रक्रिया, जीतने की प्रक्रिया है। लोगों को किस प्रकार उपयुक्त सहयोग देना चाहिए? इन वचनों को प्रभावशाली रीति से खाने और पीने से और उन्हें समझने के द्वारा। लोगों को उन्हीं के द्वारा जीता नहीं जा सकता। उन्हें, इन वचनों को खाने और पीने के द्वारा, अपनी भ्रष्टता और अशुद्धता, अपने विद्रोहीपन और अधार्मिकता को जानना है, और परमेश्वर के समक्ष दण्डवत हो जाना है। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हो और इसे अभ्यास में ला सकते हो, और आगे, दर्शन प्राप्त कर सकते हो, और यदि तुम इन वचनों का पूरी तरह से पालन कर सकते और अपनी ओर से कोई चुनाव नहीं करते हो, तब तुम्हें जीत लिया जाएगा। और ये वह शब्द होंगे, जिन्होंने तुम्हें जीता है। मनुष्यजाति ने वह साक्ष्य क्यों खो दिया? क्योंकि कोई भी अब परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता और परमेश्वर को अपने हृदय में कदाप नही रखता। मनुष्यजाति को जीतने का अर्थ लोगों में इस विश्वास को पुनर्स्थापित करना है। लोगों का ध्यान सर्वदा संसार, अनेक आशाएँ रखने, अपने भविष्य के लिए बहुत अधिक चाहने और अनेक अनावश्यक मांग करने की ओर रहता है। वे सर्वदा अपने शरीर के विषय में सोचते और योजना बनाते रहते हैं और कभी परमेश्वर में विश्वास करने के मार्ग की खोज में रुचि नहीं रखते हैं। उनके हृदयों को शैतान के द्वारा कब्ज़े में कर लिया गया है, उन्होंने परमेश्वर के लिए अपने सम्मान को खो दिया है, और वे अपना हृदय शैतान को समर्पित कर रहे हैं। परन्तु मनुष्य की सृष्टि परमेश्वर के द्वारा की गई थी। मनुष्य परमेश्वर के साक्ष्य को खो चुका है, अर्थात वह परमेश्वर के प्रताप को खो चुका है। मनुष्य को जीतने का उद्देश्य परमेश्वर के लिए मनुष्य के सम्मान के प्रताप को पुनः प्राप्त करना है। इसे इस प्रकार रखा जा सकता है: अनेक लोग हैं जो जीवन की खोज नहीं करते हैं, और यदि कुछ हैं भी तो, उनकी संख्या को ऊँगलियों पर गिना जा सकता है। लोग सबसे अधिक अपने भविष्य के विषय में चिन्तित रहते हैं और जीवन की ओर ज़रा सा भी ध्यान नहीं दे रहे हैं। कुछ लोग परमेश्वर का विद्रोह और विरोध, दोनों कर रहे हैं, उसकी पीठ पीछे उस पर दोष लगाते हैं और सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं। मैं अभी के लिए इन लोगों को अनदेखा करता हूँ, और अभी के लिए इस वर्ग के विद्रोह के इन पुत्रों का निपटारा करने से भी दूर ही रहता हूँ। भविष्य में तुम विलाप करते और दांत पीसते हुए अन्धकार में रहोगे। तुम ज्योति की बहूमूल्यता का अनुभव नहीं करते हो, जब तुम इसमें रह रहे होते हो, परन्तु एक बार जब तुम अन्धेरी रात में रह रहे होगे, तब तुम इसकी बहुमूल्यता को पूर्णत: जान जाओगे। तब तुम्हें अफसोस होगा। अभी तुम्हें अच्छा अनुभव होता है, परन्तु वह दिन आएगा जब तुम्हें अफसोस होगा। जब वह दिन आता और अन्धकार नीचे उतरता है और ज्योति फिर कभी नहीं होगी, तब तुम्हार अफसोस करने में बहुत देर हो जाएगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम अभी भी वर्तमान कार्य को नहीं समझते हो, इसलिए तुम अभी अपने समय का आनन्द उठाने में असफल हो। एक बार जब सम्पूर्ण आकाशमण्डल का कार्य आरम्भ होता है अर्थात जो कुछ मैं आज कह रहा हूँ, जब वह पूर्ण हो चुका होगा, अनेक लोग अपने सिर पकड़ कर फूट-फूटकर रो रहे होंगे। क्या वह रोने और दांत पीसते हुए अन्धकार में गिरना नहीं है? वे लोग जो वास्तव में जीवन की खोज करते हैं और जिन्हें पूर्ण बना दिया गया है, वे ही उपयोगी होंगे, जबकि विद्रोह के समस्त पुत्र, जो उपयोग किए जाने के लिए अनुपयुक्त हैं, अन्धकार में गिरेंगे, उन्हें पवित्र आत्मा का कोई भी कार्य प्राप्त नहीं होगा, और किसी भी बात का अर्थ निकालने में असमर्थ बने रहेंगे। इसलिए वे बिलखते और रोते रहने के लिए दण्डित किए जाएंगे। कार्य के इस चरण में यदि तुम अच्छी तरह से प्रशिक्षित हो और तुम्हारा जीवन परिपक्व हो चुका है, तब तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो उपयोग किए जाने के लिए उपयुक्त है। यदि तुम अच्छी तरह से प्रशिक्षित नहीं हो, तब चाहे तुम्हें कार्य के अगले चरण के लिए आगे भेज दिया गया है, तुम अनुपयोगी ही रहोगे। उस समय, यदि तुम स्वयं को तैयार करना भी चाहोगे, तो वह अवसर निकल चुका होगा। परमेश्वर जा चुका होगा; तब तुम इस प्रकार का अवसर प्राप्त करने के लिए कहाँ जाओगे, जो अभी तुम्हारे समक्ष है, और तब तुम उस अभ्यास को प्राप्त करने कहाँ जाओगे, जो परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से उपलब्ध करवाया गया है? उस समय, परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से बात नहीं करेगा, और न ही परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपना स्वर प्रदान करेगा। तुम मात्र वही पढ़ने के योग्य होगे, जो आज कहा जा रहा है; इसे सरलता से समझने के लिए तुम किस प्रकार योग्य होगे? बाद का जीवन किस प्रकार आज के जीवन के समान बन पायेगा? उस समय, क्या तुम्हारा रोना और दांत पीसना एक जीवित मृत्यु की पीड़ा उठाना नहीं होगा? अभी तुम्हें आशीष प्रदान की जा रही है; परन्तु तुम नहीं जानते कि इसका आनन्द कैसे उठाना है; तुम आनन्द में जीवनयापन कर रहे हो; फिर भी तुम इसे समझते नहीं हो। यह प्रमाणित करता है तुम पीड़ा उठाने के लिए ही अभिशप्त हो! वर्तमान समय में कुछ लोग विरोध करते हैं, कुछ विद्रोह करते हैं, और कुछ यह या वह करते हैं। मैं बस तुम्हें अनदेखा करता हूँ; यह मत सोचना कि मैं तुम सब के उन कार्यों से अनभिज्ञ हूँ। क्या मैं तुम सब के सारतत्व को नहीं समझता हूँ? मेरे विरोध में ही क्यों जाते रहते हो? क्या यह तुम्हारे लिए ही नहीं है कि तुम जीवन और आशीष को खोज रहे हो? तुम में जो विश्वास है क्या वो तुम्हारे अपने लिए नहीं है? मैं अपने वचनों के साथ अभी मात्र जीतने का कार्य कर रहा हूँ। एक बार जब यह जीतने का कार्य पूर्ण हो जाता है, तब तुम्हारा अन्त प्रकट हो जाएगा। क्या मुझे स्वयं को और स्पष्ट करने की आवश्यकता है?

वर्तमान जीतने वाला कार्य यह स्पष्ट करने के लिए अभीष्ट है, कि मनुष्य का अन्त क्या होगा। मैं क्यों कहता हूँ कि आज की ताड़ना और न्याय अन्तिम दिनों के श्वेत सिंहासन के सामने का महान न्याय है ? क्या तुम यह नहीं देखते हो? जीतने वाला कार्य अन्तिम चरण क्यों है? क्या यह निश्चित रूप से वह प्रकट करने के लिए नहीं है कि मनुष्य के प्रत्येक वर्ग का अन्त कैसे होगा? क्या यह प्रत्येक व्यक्ति को, ताड़ना और न्याय के जीतने वाले कार्य के मार्ग में, अपना वास्तविक स्वभाव दिखाने और उसके पश्चात उसी स्वभाव के अनुसार वर्गीकृत किया जाने के लिए नहीं है। यह कहने की बजाय, कि यह मनुष्यजाति को जीतना है, यह कहना बेहतर होगा कि यह उस बात को दर्शाना है कि मनुष्य के प्रत्येक वर्ग का अन्त कैसे होगा। अर्थात, यह उनके पापों का न्याय करना और फिर मनुष्यों के विभिन्न वर्गों को प्रदर्शित करना और इस प्रकार निर्णय करना कि वे दुष्ट हैं या धर्मी। जीतने वाले कार्य के पश्चात धर्मी को प्रतिफल देने और दुष्ट को दण्ड देने का कार्य आता है: वे लोग जो पूर्णत: आज्ञापालन करते हैं अर्थात जो पूर्ण रूप से जीत लिए गए हैं, उन्हें सम्पूर्ण आकाशमण्डल में कार्य को फैलाने के अगले चरण में रखा जाएगा; जिन्हें जीता नहीं जा सका उन को अन्धकार में रखा जाएगा और उनकी भेंट महाविपत्ति से होगी, इस प्रकार मनुष्य को उसके स्वभाव के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, दुष्कर्म करने वालों को फिर कभी सूर्य का प्रकाश पुनः न देखने के लिए दुष्टों के साथ रखा जाएगा, और धर्मियों को ज्योति प्राप्त करने और सर्वदा ज्योति में रहने के लिए भले लोगों के साथ रखा जाएगा। सभी बातों का अन्त निकट है, मनुष्य का अन्त उसकी दृष्टि में स्पष्ट रीति से दिखा दिया गया है, और सभी वस्तुओं का वर्गीकरण उनके स्वभाव के अनुसार किया जाएगा। तब लोग इस प्रकार वर्गीकरण किए जाने में पीड़ा से किस प्रकार बच सकते हैं। जब सभी बातों का अन्त निकट हो तो मनुष्य के प्रत्येक वर्ग के अन्त को प्रकट कर दिया जाता है, और यह सम्पूर्ण आकाशमण्डल (इसमें समस्त जीतने वाला कार्य सम्मिलित है जो वर्तमान कार्य से आरम्भ होता है) को जीतने के कार्य के दौरान पूर्ण किया जाता है। समस्त मनुष्यजाति के अन्त का प्रकटीकरण, न्याय के सिंहासन के सामने, ताड़ना देने में और अन्तिम दिनों के जीतने वाले कार्य में किया जाता है। लोगों को उनके स्वभाव के अनुसार वर्गीकृत करना, उन्हें उनके वास्तविक वर्ग में लौटाना नहीं है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जब संसार की रचना की गई थी, वहाँ एक ही वर्ग के मनुष्य थे, पुरुष और स्त्री। वहाँ विभिन्न प्रकार के अनेक वर्ग नहीं थे। यह हज़ारों वर्षों की भ्रष्टता के पश्चात ही हुआ, कि मनुष्य के अनेक वर्ग उत्त्पन्न हुए, कुछ अशुद्ध दुष्टात्माओं के अधीन आते हैं, और कुछ, जो जीवन के मार्ग को खोजते हैं, सर्वशक्तिमान के अधीन आते हैं। इसी रीति से धीरे-धीरे लोगों के मध्य वर्ग अस्तित्व में आते हैं और लोग मनुष्य के विस्तृत परिवारों में से वर्गों में विभाजित होते हैं समस्त लोग विभिन्न "पिता" को स्वीकार करते हैं; ऐसा नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति सर्वशक्तिमान के अधिकार के पूर्णत: अधीन आता है, क्योंकि लोगों का विद्रोहीपन बहुत अधिक है। धर्मी न्याय प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति के वास्तविक स्वभाव को प्रकट करता है, और कुछ भी छिपा रहने नहीं देता है। ज्योति में प्रत्येक व्यक्ति अपना वास्तविक मुखमण्डल दिखाता है। इस बिन्दु पर, मनुष्य वैसा नहीं है जैसा वह वास्तविक रूप में था और उसके पूर्वजों की वास्तविक समानता बहुत पहले ही अन्तर्धान ह चुकी है, क्योंकि आदम और हव्वा के अनगिनत वंशज बहुत पहले से स्वर्ग की ज्योति को पुनः कभी न जानने के लिए शैतान के द्वारा वश में कर लिए गए हैं, और लोग हर प्रकार से शैतान के विष से भर दिए गए हैं। इसीलिए, लोगों के लिए उनकी उपयुक्त मंजिलें हैं। और तो और, उनके विभिन्न प्रकार के विषों पर आधार पर उन्हें उनके स्वभाव के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है, अर्थात आज उन्हे जिस हद तक जीता गया है उसके अनुसार अलग-अलग किया जाता है। मनुष्य का अन्त कुछ ऐसा नहीं है, जिसे संसार की सृष्टि से ही पूर्वनिर्धारित कर दिया गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पहले मात्र एक ही वर्ग था, जिसे सामूहिक रूप से "मनुष्यजाति" पुकारा जाता था, और इसलिए कि मनुष्य पहले शैतान के द्वारा भ्रष्ट नहीं किया गया था, और वे सभी परमेश्वर की ज्योति में जीवनयापन करते थे, और उन पर किसी भी प्रकार का अन्धकार नहीं था। परन्तु बाद में जब मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया, सभी प्रकार और स्वभाव के लोग सम्पूर्ण पृथ्वी पर फैल गए-सभी प्रकार और स्वभाव के लोग, जो उस परिवार से आए थे, जिसे सामूहिक रूप से "मनुष्यजाति" कहा जाता था, जो पुरुष और स्त्री से बनी थी। अपने सबसे पुराने पूर्वज- मनुष्यजाति, जो पुरुष और स्त्री से बनी थी (अर्थात मूल आदम और हव्वा, जो उनके सबसे पुराने पूर्वज थे) से भटकने के लिए उन सभी का मार्गदर्शन उनके पूर्वजों के द्वारा किया गया था। उस समय, एकमात्र लोग, जिनका मार्गदर्शन पृथ्वी पर जीवनयापन के लिए यहोवा के द्वारा किया जा रहा था, वे इस्राएली लोग थे। विभिन्न प्रकार के लोग, जो सम्पूर्ण इस्राएल (अर्थात वास्तविक पारिवारिक कुल से) से अस्तित्व में आए थे, बाद में उन्होंने यहोवा की अगुवाई को खो दिया। ये आरम्भिक लोग, जो मानव संसार के मामलों से पूरी तरह से अनभिज्ञ थे, वे उन क्षेत्रों में रहने के लिए अपने पूर्वजों के साथ हो लिए, जिन क्षेत्रों पर उन्होंने अधिकार किया, और आज तक वे ऐसा ही कर रहे हैं। इस प्रकार वे इस विषय में अभी भी अन्धकार में ही हैं, कि वे यहोवा से कैसे भटक गए और आज तक अशुद्ध प्रेतों और दुष्टात्माओं के द्वारा किस प्रकार भ्रष्ट किए गए हैं। वे जो अब तक अत्यधिक भ्रष्ट और विष से भरे गए हैं, अर्थात वे जिन्हें अन्तत: बचाया नहीं जा सकता, उनके पास अपने पूर्वजों के साथ-उन अशुद्ध प्रेतों के साथ, जिन्होंने उन्हें भ्रष्ट किया, जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होगा। वे लोग जिन्हें अन्तत: बचाया जा सकता है, वे मनुष्यजाति की उपयुक्त मंजिल पर पहुँच जाएँगे, अर्थात उस अन्त पर, जो बचाए गए और जीते गए लोगों के लिए संरक्षित रखा गया है। उन सभी को बचाने के लिए सब कुछ किया जाएगा, जिन्हें बचाया जा सकता है, परन्तु उन असम्वेदनशील, असाध्य लोगों के लिए उनका एकमात्र विकल्प अपने पूर्वजों के पीछे-पीछे ताड़ना के अथाह गड्ढ़े में जाना होगा। यह विचार न करो कि तुम्हारा अन्त, आरम्भ में ही पूर्वनिर्धारित कर दिया गया था और इसे अब प्रकट किया गया है। यदि तुम इस प्रकार विचार करते हो, तब क तुम भूल गए हो कि मनुष्य की आरम्भिक रचना के दौरान, किसी भी अलग शैतानी वर्ग की रचना नहीं की गई थी? क्या तुम भूल चुके हो कि आदम और हव्वा से मात्र एक ही मनुष्यजाति को रचा गया था (अर्थात मात्र पुरुष और स्त्री ही बनाए गए थे)? यदि तुम आरम्भ में ही शैतान के वंशज होते, तो क्या उसका अर्थ यह न होता कि जब यहोवा ने मनुष्य की रचना की, तब उसने एक शैतानी समूह को भी सम्मिलित किया? क्या वह ऐसा कुछ कर सकता था? उसने मनुष्य को अपने साक्ष्य के लिए बनाया; उसने मनुष्य को अपनी महिमा के लिए रचा। उसने जानबूझ कर अपने विरोध के लिए शैतान की सन्तान के एक वर्ग को स्वेच्छा से क्यों बनाया होता? क्या यहोवा यह कर सकता था? यदि हाँ, तो कौन यह कहने के योग्य होता कि वह एक धर्मी परमेश्वर है? यदि मैं अभी यह कहता हूँ कि तुम सब में से कुछ लोग अन्त में शैतान के साथ जाएँगे, इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम आरम्भ से ही शैतान के साथ थे; अपितु इसका अर्थ यह है कि तुम इतना गिर चुके हो, कि परमेश्वर तुम्हें बचाने का प्रयास किया है, तब भी तुम वह उद्धार पाने में असफल हो गए हो। तब तुम्हें शैतान के साथ वर्गीकृत किए जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। ऐसा सिर्फ इसलिए है क्योंकि तुम बचाए जाने योग्य नहीं हो, इसका कारण यह नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे प्रति अधर्मी है, अर्थात ऐसा नहीं है कि परमेश्वर ने स्वेच्छा से तुम्हारी नियति को शैतान की एक अभिव्यक्ति के रूप में रख दिया है, और फिर तुम्हें शैतान के साथ वर्गीकृत कर देता है और जानबूझ कर तुम्हें पीड़ित करना चाहता है। यह जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य नहीं है। यदि यही वह बात है जिस पर तुम विश्वास करते हो, तब तुम्हारी सोच बहुत ही एक पक्षीय है! जीते जाने के अन्तिम चरण का उद्देश्य लोगों को बचाना और लोगों के अन्त को भी प्रकट करना है। यह न्याय के द्वारा लोगों की विकृति को भी प्रकट करना है और इस प्रकार उन्हें पश्चाताप करवाना, उन्हें ऊपर उठाना और जीवन और मानवीय जीवन के सही मार्ग की खोज करवाना है। यह सुन्न और मन्दबुद्धि लोगों के हृदयों को जगाना और न्याय के द्वारा उनके भीतरी विद्रोहीपन को प्रदर्शित करना है। परन्तु, यदि लोग अभी भी पश्चाताप करने के लिए अयोग्य हैं, अभी भी मानवजीवन के सही मार्ग को खोजने में असमर्थ हैं और अपनी भ्रष्टताओं को उतार फेंकने में अयोग्य हैं, तब वे शैतान द्वारा निगल लिए जाने के लिए बचाई न जा सकने योग्य वस्तुएँ बन जाएँगे। लोगों को बचाना और उनका अन्त भी दिखाना-यह बचाए जाने की महत्त्वपूर्णता है। अच्छे अन्त, बुरे अन्त-वे सभी जीतने वाले कार्य के द्वारा प्रकट किए जाते हैं। लोग बचाए जाएँगे या शापित होंगे, यह सब जीतने वाले कार्य के दौरान प्रकट किया जाएगा।

अन्तिम दिन तब हैं जब सभी वस्तुएँ जीतने के द्वारा स्वभाव के अनुसार वर्गीकृत की जाएँगी। जीतना, अन्तिम दिनों का कार्य है; दूसरे वचनों में, प्रत्येक व्यक्ति के पापों का न्याय करना, अन्तिम दिनों का कार्य है। अन्यथा, लोगों का वर्गीकरण किस प्रकार किया जाएगा? तुम सब के मध्य किया जा रहा वर्गीकरण का कार्य सम्पूर्ण आकाशमण्डल में ऐसे कार्य का आरम्भ है। इसके पश्चात, समस्त राष्ट्रीयताओं के लोग भी हर कहीं से इस जीते जाने वाले कार्य के अधीन किये जायेंगे। इसका अर्थ है कि सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति स्वभाव के अनुसार न्याय करवाने के लिए न्याय के सिंहासन के समक्ष आने के द्वारा वर्गीकृत किया जाएगा। कोई भी व्यक्ति और कोई भी वस्तु इस ताड़ना और न्याय को सहने से बच नहीं सकता और कोई भी व्यक्ति और कोई भी वस्तु स्वभाव के द्वारा इस वर्गीकरण को टाल नहीं सकती; प्रत्येक को श्रेणीबद्ध किया जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि समस्त वस्तुओं का अन्त निकट है और समस्त स्वर्ग और पृथ्वी अपने निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं। मनुष्य अपने अस्तित्व के अन्त से कैसे बच सकता है? इसलिए, तुम सब और कितनी देर तक अपनी अनाज्ञाकारिता के कार्य को जारी रख सकते हो? क्या तुम सब नहीं देखते कि तुम्हारे अन्तिम दिन सन्निकट हैं। वे जो परमेश्वर का सम्मान करते और उसके प्रकट होने की प्रतीक्षा करते हैं, वे परमेश्वर के धर्मी आविर्भाव के दिन को कैसे नहीं देखेंगें? उनकी भलाई के लिए उन्हें अन्तिम प्रतिफल कैसे प्राप्त नहीं हो सकता? क्या तुम वह व्यक्ति हो, जो भला करता है, या वह जो बुरा करता है? क्या तुम वह हो, जो धर्मी न्याय को स्वीकार करता है और फिर आज्ञापालन करता है, और फिर शापित किया जाता है? न्याय के सिंहासन के समक्ष क्या तुम ज्योति में जी रहे थे, या अधोलोक के अन्धकार में? क्या तुम वह नहीं हो, जो बहुत ही स्पष्ट रीति से जानता और बहुत ही गहन रीति से समझता है कि परमेश्वर धर्मी है? अत:, वास्तव में, तुम्हारा आचरण कैसा है, और तुम्हारा हृदय कहाँ है? आज जब मैं तुम्हें जीतना आरम्भ करता हूँ, क्या तुम्हें वास्तव में यह बताने के लिए मेरी आवश्यकता है, कि तुम्हारा आचरण बुरा है या भला है? तुम ने मेरे लिए कितना कुछ त्याग दिया है? मेरी आराधना तुम कितनी गहराई से करते हो? तुम स्वयं बहुत ही स्पष्ट रीति से जानते हो कि तुम मेरे प्रति कैसे हो-क्या यह सत्य नहीं है? तुम्हें किसी और से अधिक अच्छी रीति से ज्ञात होना चाहिए कि अन्तत: तुम्हारा अन्त क्या होगा! मैं वास्तव में तुम्हें बता रहा हूँ कि मैंने ही मनुष्यजाति को सृजा है और मैंने ही तुम्हें सृजा है; परन्तु मैंने तुम लोगों को शैतान के हाथों में नहीं दिया; और न ही मैंने जानबूझकर तुम्हें मेरे विरुद्ध होने या मेरा विरोध करने और इस प्रकार मुझ से दण्डित होने के लिए बाध्य किया। क्या तुम सब ने ही ये विपत्तियाँ नहीं कमाई हैं, क्योंकि तुम्हारे हृदय अत्यधिक कठोर और तुम्हारा आचरण अत्यधिक निन्दा के योग्य हो गया था। अत:, क्या यह सत्य नहीं है, कि तुम सब अपना अन्त निर्धारित कर सकते हो? क्या यह सत्य नहीं है कि तुम सब अपने हृदयों में किसी और से अधिक अच्छी रीति से जानते हो, कि तुम सब का अन्त कैसा होगा? जिस उद्देश्य से मैं लोगों को जीत रहा हूँ, वह उन्हें प्रकट करना और सर्वोत्तम रीति से तुम्हारे उद्धार को भी आश्वस्त करना है। यह तुम से बुरा करवाने या जानबूझकर तुम्हें विनाश के नरक में भेजने के लिए नहीं है। जब वह समय आएगा, तुम्हारी समस्त अत्यधिक पीड़ाएँ, तुम्हारा रोना और दांत पीसना- क्या यह सब तुम्हारे पापों के कारण नहीं होगा? इसप्रकार, क्या तुम्हारी अपनी भलाई या तुम्हारी अपनी बुराई तुम्हारा सर्वोत्तम न्याय नहीं है? क्या यह उसका सर्वोत्तम प्रमाण नहीं है, कि तुम्हारा अन्त क्या होगा?

अभी मैं चीन में लोगों पर उनके समस्त विद्रोही स्वभाव को प्रकट करने और उनकी समस्त कुरूपता को बेनकाब करने के लिए कार्य का प्रयोग कर रहा हूँ। जो मुझे कहने कि आवश्यकता है, वह सब कहने के लिए यह उसकी पृष्ठभूमी है। तत्पश्चात, मैं सम्पूर्ण आकाशमण्डल को जीतने के कार्य के अगले चरण को करूँगा। मैं तुम सबके लिए मेरे न्याय का प्रयोग सम्पूर्ण आकाशमण्डल के प्रत्येक व्यक्ति की अधार्मिकता का न्याय करने के लिए करूँगा, क्योंकि मनुष्यजाति में तुम सब लोग ही विद्रोहियों के प्रतिनिधी हो। वे लोग, जो आगे नहीं आ सकते, वे सिर्फ विषमता और सेवा करने वाले बन जाएँगे, जबकि वे जो आगे सकते हैं, उन्हें प्रयोग किया जाएगा। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि वे जो आगे नहीं आते वे केवल विषमता के रूप में कार्य करेंगे? क्योंकि मेरे वर्तमान वचन और कार्य, तुम लोगों की पृष्ठभूमि को निशाना बनाते हैं और इसलिए कि तुम सब समस्त मनुष्यजाति में विद्रोही लोगों के प्रतिनिधी और साक्षात मूर्त बन चुके हो। बाद में मैं इन वचनों को, जो तम सबको जीतते हैं, विदेशों में ले जाऊँगा और वहाँ लोगों को जीतने के लिए उन्हें प्रयोग करूँगा, फिर भी तुम उसे नहीं प्राप्त करोगे। क्या वह तुम्हें एक विषमता व्यक्ति नहीं बनाएगा? समस्त मनुष्यजाति का भ्रष्ट स्वभाव, मनुष्य के विद्रोही कार्य, मनुष्य की भद्दी प्रतिमाएँ और मुखमण्डल, आज ये सभी उन वचनोंवचनों में प्रदर्शित होते हैं, जिनसे तुम सब को जीता करते थे। मैं इन वचनोंवचनों का प्रयोग प्रत्येक राष्ट्र और सम्प्रदाय के लोगों को जीतने के लिए करूँगा, क्योंकि तुम सब आदर्श और उदाहरण हो। मैंने तुम्हें जानबूझकर नहीं त्यागा; यदि तुम तुम्हारे अनुसरण में असफल होते हो और इस प्रकार तुम असाध्य होना प्रमाणित करते हो, तो क्या तुम सब मात्र सेवा करने वाली वस्तु और वषमता नहीं होगे? मैंने एक बार कहा था कि शैतान की युक्तियों के आधार पर मेरी बुद्धि प्रयुक्त की जती है। मैंने वह क्यों कहा था? क्या वह उसके पीछे का सत्य नहीं है, जो मैं अभी कह और कर रहा हूँ? यदि तुम कदम नहीं उठा सकते, यदि तुम्हें सिद्ध नहीं किया गया है, परन्तु उसके स्थान पर दण्डित किया गया है, तो क्या तुम एक विषमतानहीं बन जाओगे? हो सकता है तुम ने अपने समय में अत्यधिक पीड़ा सही हो, परन्तु तुम अभी भी कुछ नहीं समझते; तुम जीवन की प्रत्येक बात के विषय में अज्ञानी हो। यद्यपि तुम्हें ताड़ना दी गई और तुम्हारा न्याय किया गया; तुम बिलकुल भी नहीं बदले और तुम ने भीतर तक जीवन ग्रहण ही नहीं किया। जब तुम्हारे कार्य को जाँचने का समय आता है, तुम अग्नि जैसे भयंकर परीक्षण और उस से भी अधिक क्लेश को अनुभव करोगे। यह अग्नि तुम्हारे सम्पूर्ण अस्तित्व को राख में बदल देगी। ऐसे व्यक्ति के समान, जिसके पास जीवन नहीं है,ऐसा व्यक्ति जिसके भीतर एक रत्ती भी शुद्ध स्वर्ण नहीं है, एक ऐसा व्यक्ति जो अभी भी पुराने भ्रष्ट स्वभाव में फंसा हुआ है, और ऐसा व्यक्ति जो विषमता होने का काम भी अच्छे से नहीं कर सकता,तो तुम्हें क्यों निकाला नहीं जा सकता? किसी ऐसे व्यक्ति के लिए जीतने वाले कार्य का क्या उपयोग, जिसका मूल्य एक पैसे से भी कम है और जिसके पास जीवन नहीं है? जब वह समय आएगा, तो तुम सब के दिन नूह और सदोम के समय से अधिक कठिन होंगे! तब तुम्हारी प्रार्थनाएँ भी तुम्हारे लिए कुछ भला नहीं करेंगी। एक बार जब उद्धार का कार्य समाप्त हो गया, तुम पश्चाताप करना पुनः कैसे आरम्भ कर सकते हो? एक बार जब उद्धार का सम्पूर्ण कार्य कर लिया गया, तो उद्धार का और कार्य नहीं होगा। जो होगा, वह मात्र बुराई को दण्ड देने के कार्य का आरम्भ होगा। तुम विरोध करते हो, तुम विद्रोह करते हो, और तुम वे बातें करते हो, जो तुम जानते हो कि बुरी हैं। तो क्या तुम कठोर दण्ड के लक्ष्य नहीं हो? मैं आज यह तुम्हारे लिए बोल रहा हूँ। यदि तुम अनसुना करना चुनते हो, इसलिए वह विपत्ति बाद में तुम पर पड़ती है, यदि तुम तब विश्वास और पछतावा करना आरम्भ करोगे, तो क्या इसमें तब बहुत देर नहीं हो गई होगी? मैं तुम्हें आज पश्चाताप करने का एक अवसर प्रदान कर रहा हूँ, परन्तु तुम ऐसा करने के लिए अनिच्छुक हो। तुम और कितनी प्रतीक्षा करना चाहते हो? ताड़ना के दिन तक? मैं आज तुम्हारे पिछले उल्लंघन स्मरण नहीं रखता हूँ; मैं तुम्हें बार-बार क्षमा करता हूँ, मात्र तुम्हारे सकारात्मक पक्ष को देखने के लिए मैं तुम्हारे नकारात्मक पक्ष को अनदेखा करता हूँ, क्योंकि मेरे समस्त वर्तमान वचन और कार्य तुम्हें बचाने के लिए हैं, और तुम्हारे प्रति मैं कोई बुरा इरादा नहीं रखता हूँ। फिर भी तुम प्रवेश करने से इन्कार करते हो; तुम भले से बुरा नहीं बता सकते और नहीं जानते कि दयालुता की प्रशंसा कैसे की जाती है। क्या इस प्रकार का व्यक्ति उस दण्ड और उस धर्मी प्रतिफल की प्रतीक्षा नहीं कर रहा है?

जब मूसा ने चट्टान पर मारा, तो जो पानी यहोवा ने उण्डेला था वह फूट पड़ा, यह उसके विश्वास के कारण था। जब आनंद से भरे दिल के साथ दाऊद ने मेरी, यहोवा की स्तुति में संगीत बजाया, यह उसके विश्वास के कारण था। जब अय्यूब ने पर्वतों पर अपना पशुधन खो दिया, अमूल्य पारिवारिक सम्पत्ति खो दी, और उसका शरीर फफोलों से भर गया था, यह उसके विश्वास के कारण था। जब वह मेरे, यहोवा के स्वर को सुन और मेरे, यहोवा, के प्रताप को देख सका, यह उसके विश्वास के कारण था। कि पतरस यीशु मसीह का अनुगमन कर सका, यह उसके विश्वास के कारण था। कि वह मेरे लिए क्रूस पर कीलों से ठोंका जा सका और प्रभावशाली साक्ष्य दे सका, यह उसके विश्वास के कारण था। जब यूहन्ना ने मनुष्य के पुत्र के महिमामय स्वरूप को देखा, यह उसके विश्वास के द्वारा था। जब उसने अन्तिम दिनों के दर्शन को देखा, यह पूर्ण रूप से उसके विश्वास के कारण था। जब गैरयहूदी राष्ट्र और यह जान कर कि मैं देह में लौट चुका हूँ और मनुष्य के मध्य अपना कार्य कर रहा हूँ, मेरा प्रकाशन प्राप्त करते हैं, यह भी उनके विश्वास के कारण ही है। क्या उन सभी ने, जो मेरे कड़े वचनोंवचनों के द्वारा दण्डित किए और बचाए गए, ऐसा अपने विश्वास के कारण नहीं किया? लोग विश्वास के द्वारा अनेक वस्तुएँ प्राप्त कर चुके हैं। वे जो प्राप्त करते हैं, सर्वदा आशीष नहीं होती है-उस प्रकार की प्रसन्नता और आनन्द को अनुभव करना, जो दाऊद ने अनुभव किया था, या यहोवा के द्वारा उण्डेला गया पानी प्राप्त करना, जैसा मूसा ने किया था। उदाहरण के लिए, अय्यूब की घटना में, विश्वास के द्वारा उसे यहोवा की आशीष के साथ-साथ एक महामारी भी प्राप्त हुई थी। चाहे तुम्हें एक आशीष प्राप्त हो या तुम एक महामारी से पीड़ित हो, दोनों ही आशीषमय अवसर हैं। विश्वास के बिना, तुम यह जीतने वाला कार्य प्राप्त करने में समर्थ नहीं होगे, आज अपनी दृष्टि के समक्ष यहोवा के कार्य देख पाना तो दूर की बात है। तुम देखने के योग्य नहीं होगे, और उससे भी कम प्राप्त करने के योग्य होगे। ये महामारियाँ, ये आपदाएँ, और ये समस्त न्यायदण्-यदि ये तुम पर न गिरते, क्या तुम आज यहोवा के कार्य देखने में समर्थ होते? यह विश्वास ही है, जो तुम्हें जीत लिए जाने देता है, और जीता जाना ही तुम्हें यहोवा के प्रत्येक कार्य पर विश्वास करने देता है। यह मात्र विश्वास के कारण ही है कि तुम इस प्रकार की ताड़ना और न्याय प्राप्त करते हो। इन ताड़नाओं और न्याय के द्वारा तुम जीत लिए और सिद्ध किए गए हो। आज, जिस प्रकार की ताड़ना और न्याय तुम प्राप्त कर रहे हो, उसके बिना तुम्हारा विश्वास व्यर्थ होगा। क्योंकि तुम परमेश्वर को नहीं जानते, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम उसमें कितना विश्वास करते हो, तुम्हारा विश्वास फिर भी वास्तविकता म एक निराधार खाली अभिव्यक्ति ही होगी। यह उसके पश्चात ही है, जब तुम इस प्रकार के जीत लिए जाने के कार्य को प्राप्त करते हो, जो तुम्हें पूर्णत: आज्ञाकारी बनाता है, जिससे तुम्हारा विश्वास वास्तविक और विश्वसनीय बन जाता है और तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर फिर जाता है। चाहे तुम्हारा न्याय किया गया या तुम्हें शापित किया गया, यह एक अच्छी बात है, इस शब्द "विश्वास" के कारण तुम्हारा विश्वास वास्तविक है और तुम सबसे सच्ची, सबसे वास्तविक और सबसे बहुमूल्य वस्तु प्राप्त करते हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि न्याय के इस मार्ग में ही तुम परमेश्वर की सृष्टि की अन्तिम मंजिल को देखते हो; इस न्याय में ही तुम देखते हो कि उस सृष्टिकर्ता से प्रेम करना है; इस प्रकार के जीत लिए जाने के कार्य में तुम परमेश्वर के हाथ को देखते हो; यह वह जीत लिया जाना ही है जिसमें तुम मानव जीवन को पूर्ण रीति से समझते हो; यह वह जीत लिया जाना ही है, जिसमें तुम मानवजीवन के सही मार्ग को प्राप्त करते हो, और "मनुष्य" के वास्तविक अर्थ को समझ जाते हो; मात्र इस जीत लिए जाने के कार्य में ही तुम सर्वशक्तिमान के धर्मी स्वभाव और उसके सुन्दर, महिमामय मुखमण्डल को देखते हो; इस जीत लिए जाने के कार्य में ही तुम मनुष्य की उत्पत्ति के विषय में सीखते और समस्त मनुष्यजाति के "अनश्वर इतिहास" को समझते हो; इस जीत लिए जाने के कार्य में तुम मनुष्यजाति के पूर्वजों और मनुष्यजाति के भ्रष्टाचार के उद्गम को पूर्ण रीति से समझते हो; इसी जीते जाने के कार्य में तुम आनन्द और आराम के साथ-साथ अनन्त ताड़ना, अनुशासन और उस मनुष्यजाति के लिए सृष्टिकर्त्ता की ओर से फटकार के शब्द प्राप्त करते हो, जिस मनुष्यजाति को उसने बनाया है; इसी जीते जाने वाले कार्य में तुम आशीष प्राप्त करते हो और तुम वे आपदाएँ प्राप्त करते हो, जो मनुष्य को प्राप्त होनी चाहिए.... क्या यह सब तुम्हारे थोड़े से विश्वास के कारण नहीं है? इन वस्तुओं को प्राप्त करने के पश्चात क्या तुम्हारा विश्वास बढ़ा नहीं है? क्या तुम ने बहुत अधिक मात्रा प्राप्त नहीं की है? तुम ने मात्र परमेश्वर के वचन को ही नहीं सुना और परमेश्वर की बुद्धि को ही नहीं देखा, अपितु तुम ने इस कार्य के प्रत्येक चरण को भी व्यक्तिगत रीति से अनुभव किया है। हो सकता है तुम कहोगे कि यदि तुम्हारे पास विश्वास नहीं होता, तो तुम इस प्रकार की ताड़ना और इस प्रकार के न्यायदण्ड से पीड़ित न होते। परन्तु तुम्हें जानना चाहिए कि बिना विश्वास, न केवल तुम इस प्रकार की ताड़ना और सर्वशक्तिमान से इस प्रकार की देखभाल प्राप्त करने में अयोग्य होते, अपितु तुम सृष्टिकर्ता को देखने के सुअवसर को भी सर्वदा के लिए खो देते। तुम मनुष्यजाति के उद्गम को कभी भी नहीं जान पाते और न ही मानवजीवन की महत्ता को कभी समझ पाते। चाहे तुम्हारे शरीर की मृत्यु हो जाती, और तुम्हारी आत्मा अलग हो जाती, फिर भी तुम सृष्टिकर्ता के समस्त कार्यों को नहीं समझ पाते। इससे भी कम तुम्हें इस बात का ज्ञान हो पाता कि मनुष्यजाति को बनाने के पश्चात सृष्टिकर्ता ने इस पृथ्वी पर कितने महान कार्य किए। उसके द्वारा बनाई गई इस मनुष्यजाति के एक सदस्य के रूप में, क्या तुम इस प्रकार बिना-सोचे समझे अन्धकार में गिरने और अनन्त दण्ड की पीड़ा उठाने के इच्छुक हो। यदि तुम स्वयं को आज की ताड़ना और न्यायदण्ड से अलग करते हो, तो वह क्या है, जो तुम्हें प्राप्त होगा? क्या तुम सोचते हो कि वर्तमान न्यायदण्ड से एक बार अलग हो कर, तुम इस कठिन जीवन से बचने में समर्थ हो जाओगे? क्या यह सत्य नहीं है कि यदि तुम "इस स्थान" को छोड़ते हो, तो जिस से तुम्हारा सामना होगा, वह शैतान के द्वारा दी जाने वाली पीड़ादायक यातना और क्रूर घाव हैं? तुम्हारा सामना असहनीय दिन और रात से हो सकता है? क्या तुम सोचते हो कि सिर्फ इसलिय कि आज तुम इस न्यायदण्ड से बच जाते हो, तो तुम भविष्य की उस यातना को सदा के लिए टाल सकते हो? वह क्या होगा जो तुम्हारे मार्ग में आएगा? क्या यह वास्तव में वही शांगरी-ला हो सकता है, जिसकी तुम आशा करते हो?

क्या तुम सोचते हो कि वास्तविकता से तुम्हारे इस रीति से भागने के द्वारा तुम बाद में आने वाली उस अनन्त ताड़ना से बच सकते हो? आज के बाद, क्या तुम कभी इस प्रकार का सुअवसर और इस प्रकार की आशीष पुनः प्राप्त करने के योग्य हो पाओगे? क्या तुम उन्हें खोजने के योग्य होगे, जब घोर विपत्ति तुम पर आ पड़ेगी? क्या तुम उन्हें खोजने के योग्य होगे, जब सम्पूर्ण मनुष्यजाति विश्राम में प्रवेश करेगी? तुम्हारा वर्तमान प्रसन्न जीवन और तुम्हारा छोटा सा मिला-जुला परिवार-क्या वे तुम्हारी भविष्य की अनन्त मंजिल का प्रतिस्थापन कर सकते हैं? यदि तुम सच्चा विश्वास रखते हो, और तुम्हारे विश्वास के कारण यदि तुम्हें एक उत्तम सौदा प्राप्त होता है, तो यह वही सबकुछ है जो तुम्हें-एक सृष्ट प्राणी-को प्राप्त होना चाहिए और यही तुम्हें प्राप्त भी होना चाहिए था। इस रीति से जीता जाना तुम्हारे विश्वास और तुम्हारे जीवन के लिए अत्यन्त लाभकारी है।

आज तुम्हें समझने की आवश्यकता है कि परमेश्वर उनसे क्या कह रहा है, जो जीते जा रहे हैं और उनके प्रति उसका क्या दृष्टिकोण है, जो सिद्ध बनाए जा रहे हैं और तुम्हें तुरन्त किस में प्रवेश करना चाहिए। कुछ बातों को तुम्हें कम ही समझने की आवश्यकता है। कुछ रहस्यमयी बातों को खोजने की तुम्हें चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। वे जीवन के लिए अधिक सहायक नहीं हैं, और उनकी ओर मात्र एक बार ही देख लेना पर्याप्त है। उदाहरण के लिए, आदम और हव्वा के विषय में रहस्यों पर तुम्हें ध्यान देने की आवश्यकता है। उस बीते समय में आदम और हव्वा कैसे कार्य करते थे और आज क्या करने की आवश्यकता है-तुम्हें ये सब जानने की आवश्यकता है। [क] तुम्हें समझने की आवश्यकता है कि मनुष्य को जीतने और सिद्ध बनाने में, परमेश्वर मनुष्य को वहीं लौटा ले जाना चाह रहा है, जैसे आदम और हव्वा थे। परमेश्वर के मानकों पर खरा उतरने के लिए सिद्ध लोगों को कैसा होना चाहिए-तुम्हें इसका अच्छे से आभास और इस तक पहुँचने की अत्यधिक चाह होनी चाहिए। यह तुम्हारे अभ्यास और जो तुम्हें समझना चाहिए उसके विषय में है। तुम्हें इन मसलों के विषय में वचनों के अनुसार प्रवेश करने की खोज करने की आवश्यकता है। जब तुम अध्ययन करते हो कि "मनुष्यजाति के विकास का इतिहास दसों हज़ार वर्ष पीछे जाता है", तो तुम जिज्ञासु हो जाते हो, और तुम भाइयों और बहनों के साथ इसे जानने का प्रयत्न करते हो। परमेश्वर कहता है कि मनुष्यजाति का विकास छह हज़ार वर्ष पुराना है, ठीक है? "यह दसों हज़ार वर्ष क्या हैं?" इसे जानने का प्रयास करने का क्या लाभ है? चाहे परमेश्वर दस हज़ार वर्षों से कार्य कर रहा हो या दस लाख वर्षों से-क्या उसे आवश्यकता है कि तुम यह जानो? यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे एक सृष्ट व्यक्ति के रूप में तुम्हें जानने की आवश्यकता है। तुम इस प्रकार की वार्तालाप पर दृष्टि डाल सकते हो; इसे एक दर्शन के समान समझने का प्रयत्न न करो। जो तुम्हें जानने की आवश्यकता है, वह यह है कि अभी तुम्हें किस में प्रवेश करना और किसकी स्पष्टता प्राप्त करनी चाहिए।

मनन करो और इनके विषय में स्पष्ट हो जओ। मात्र तभी तुम्हें जीता जा सकेगा। उपरोक्त लेख के अध्ययन के पश्चात, तुम्हारी एक सामान्य प्रतिक्रिया हो सकती है: परमेश्वर अत्यधिक उत्सुक है। वह हमें जीतना, और महिमा और साक्ष्य प्राप्त करना चाहता है। हमें उसका सहयोग कैसे करना चाहिए? उसके द्वारा पूरी तरह जीत लिए जाने और उसका साक्ष्य बनने के लिए हमें क्या करना चाहिए? परमेश्वर को महिमा प्राप्त करने के योग्य बनने के लिए हमें क्या करना चाहिए? हमें स्वयं को शैतान के अधिकार के अधीन नहीं बल्कि परमेश्वर के अधिकार के अधीन जीने में समर्थ बनाने के लिए क्या करना चाहिए? यही वह बात है जिसके विषय में लोगों को सोचना चाहिए। तुम सब में से प्रत्येक जीते जाने की महत्ता के विषय में सुस्पष्ट होना चाहिए। यह तुम्हारा उत्तरदायित्व है। मात्र इस सुस्पष्टता को प्राप्त करने के पश्चात ही, तुम्हें प्रवेश प्राप्त होगा, तुम सब इस चरण के कार्य को समझोगे, और तुम पूर्णत: आज्ञाकारी बन जाओगे। अन्यथा, तुम सब सच्ची आज्ञाकारिता प्राप्त नहीं कर पाओगे।

पादटीका:

क. मूललिपि में "तुम्हें ये सब जानने की आवश्यकता है।" शामिल नहीं है।