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देहधारण का रहस्य (3)

जब परमेश्वर अपना कार्य करता है, तो वह किसी भी निर्माण या आंदोलनों में शामिल होने नहीं आता है; वह अपनी सेवकाई को पूरा करने के लिए आता है। हर बार जब वह देह बनता है, तो यह केवल कार्य के किसी चरण को पूरा करने और एक नए युग का मार्ग प्रशस्त करने के लिए होता है। अब राज्य के युग का आगमन, और प्रशिक्षण की शुरूआत हो चुकी है। कार्य का यह चरण मनुष्य का कार्य नहीं है, यह मनुष्य पर कुछ हद तक कार्य करने के लिए नहीं है; यह केवल परमेश्वर के कार्य के एक हिस्से को पूरा करने के लिए है। जो वह करता है, वो मनुष्य का कार्य नहीं है, यह पृथ्वी को छोड़ने से पहले एक निश्चित अंश तक मनुष्य में कार्य करने के लिए नहीं है; यह उसकी सेवकाई को पूर्ण करने और उस कार्य को समाप्त करने के लिए है जो उसे करना चाहिए, जो कि पृथ्वी पर उसके कार्य के लिए उचित व्यवस्थाएँ करना, परिणामस्वरूप महिमान्वित बन जाना है। देहधारी परमेश्वर का कार्य उन व्यक्तियों के समान नहीं है जिन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया था। जब परमेश्वर पृथ्वी पर अपना काम करने आता है, तब वह केवल अपनी सेवकाई को पूरा करने की परवाह करता है। जहाँ तक अन्य मुद्दों की बात है जो उसकी सेवकाई से सम्बन्धित नहीं हैं, तो वह उसमें कोई भाग नहीं लेता, यहाँ तक कि वह उसे अनदेखा कर देता है। वह मात्र उस कार्य को करता है जो उसे करना चाहिए, और वह उस कार्य के विषय में तो बिलकुल परवाह नहीं करता जो मनुष्य को करना चाहिए। जिस कार्य को वह करता है वह केवल उस युग से सम्बन्धित है जिसमें वह है और उस सेवकाई से सम्बन्धित है जिसे उसे पूरा करना चाहिए, मानो कि अन्य सभी मुद्दे उसके दायरे से बाहर हैं। वह एक मनुष्य के रूप में जीवन जीने के बारे में अधिक मूलभूत ज्ञान अर्जित नहीं करता, न तो वह और अधिक सामाजिक कौशल और न ही अन्य कोई बात सीखता है जिसे मनुष्य समझता है। वह उन तमाम बातों की ज़रा भी परवाह नहीं करता है जो इंसान में होनी चाहिये और वह मात्र उस कार्य को करता है जो उसका कर्तव्य है। और इस प्रकार, जैसा कि मनुष्य इसे देखता है, देहधारी परमेश्वर में इतनी बातों का अभाव है कि जो बातें इंसान में होनी चाहिये, उन्हें वह अनदेखा कर देता है, और उसे ऐसी बातों की समझ नहीं है। जीवन का सामान्य ज्ञान, और साथ ही व्यवहार के सिद्धान्त और दूसरों के साथ सम्बद्ध होने जैसे मामले मानो उससे कोई संबंध नहीं रखते है। इसके बावजूद, तुम्हें देहधारी परमेश्वर का व्यवहार जरा-सा भी असामान्य नहीं लगेगा। कहने का अभिप्राय है कि उसकी मानवता बस उसके जीवन को एक साधारण इंसान का जीवन और उसके मस्तिष्क के सामान्य विवेक को बनाकर रखती है ताकि वह सही और गलत का फैसला कर सके। लेकिन उसके अंदर उन बातों में से कोई भी बात नहीं है जो सिर्फ़ इंसानों (सृजित प्राणियों) में होनी चाहिये। परमेश्वर केवल अपनी सेवकाई को पूरा करने के लिए देहधारी बनता है। उसका कार्य पूरे युग के लिये है न कि किसी विशेष व्यक्ति या स्थान के लिये, समूचे विश्व के लिये है। यही उसके कार्य की दिशा और वह सिद्धान्त है जिसके द्वारा वह कार्य करता है। इसे किसी के द्वारा बदला नहीं जा सकता, और इंसान की इसमें कोई भूमिका नहीं है। जब भी परमेश्वर देह बनता है, तो वह अपने साथ उस युग के कार्य को लेकर आता है, और बीस, तीस, चालीस या यहाँ तक कि सत्तर, अस्सी वर्षों तक मनुष्य के साथ रहने के इरादे से नहीं आता जिससे कि इंसान उसे बेहतर ढंग से समझ सके और उसमें अंतर्दृष्टि प्राप्त कर सके। इसकी कोई आवश्यकता नहीं है! ऐसा करना उस ज्ञान को बिल्कुल भी गहरा नहीं करेगा जो परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव के बारे में मनुष्य को है; इसके बजाए, यह केवल उसकी अवधारणाओं में वृद्धि करेगा और उसकी अवधारणाओं और विचारों को प्राचीन बना देगा। इसलिए तुम सभी को समझ लेना चाहिए कि वास्तव में देहधारी परमेश्वर का कार्य क्या है। यकीनन तुम लोग मेरे कहे वचनों: "मैं एक साधारण मनुष्य के जीवन का अनुभव करने के लिए नहीं आया हूँ", को समझ गये होगे? क्या तुम लोग इन वचनों: "परमेश्वर पृथ्वी पर एक साधारण मनुष्य का जीवन जीने के लिए नहीं आता है" को भूल गए हो? तुम लोग परमेश्वर के देह बनने के उद्देश्य को नहीं समझते, और न ही तुम लोग इसका अर्थ जानते हो कि "परमेश्वर एक रचे गए प्राणी के जीवन का अनुभव करने के इरादे से पृथ्वी पर कैसे आ सकता है"? परमेश्वर पृथ्वी पर केवल अपना काम पूरा करने आता है, और इसलिए पृथ्वी पर उसका कार्य थोड़े समय का होता है। वह पृथ्वी पर इस अभिप्राय के साथ नहीं आता है कि परमेश्वर का आत्मा उसके देह को कलीसिया के एक श्रेष्ठ अगुवे के रूप में विकसित करे। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो यह वचन का देह बनना है; हालाँकि, मनुष्य उसके कार्य को नहीं जानता और ज़बरदस्ती चीज़ों को उस पर थोपता है। किन्तु तुम सब लोगों को यह एहसास करना चाहिए कि परमेश्वर "देह बना वचन" है, न कि अस्थायी रूप से परमेश्वर की भूमिका निभाने के लिए पवित्र आत्मा के द्वारा विकसित किया गया एक देह है। परमेश्वर स्वयं, विकसित नहीं किया गया है, बल्कि "देह बना वचन", है और आज वह तुम सब लोगों के बीच अपने कार्य को आधिकारिक रूप से कर रहा है। तुम सभी लोग जानते और मानते हो कि परमेश्वर का देहधारण एक वास्तविकता है, लेकिन तुम लोग ऐसी समझ का ढोंग करते हो जो कि वास्तव में तुम्हारी क्षमता के बाहर है। देहधारी परमेश्वर के कार्य से लेकर उसके देह बनने के सार और मायने तक, तुम लोग इन्हें बिल्कुल ग्रहण नहीं कर पाते हो, और बस दूसरों के द्वारा बोले गए वचनों को रटे-रटाये ढंग से दोहराते हो। क्या तुम मानते हो कि देहधारी परमेश्वर वैसा ही है जैसा तुम सोचते हो?

केवल युग की अगुवाई करने और एक नए कार्य को गतिमान करने के लिए परमेश्वर देह बनता है। तुम लोगों को इस बिन्दु को समझना होगा। यह मनुष्य के काम से बहुत अलग है, और दोनों एक साँस में उल्लेख किये जाने योग्य नहीं हैं। इससे पहले कि कार्य करने के लिए मनुष्य का उपयोग किया जाए, मनुष्य को विकसित होने एवं पूर्ण किये जाने की एक लम्बी समयावधि की आवश्यकता होती है और एक विशेष रूप से उच्च-स्तर की मानवता की आवश्यकता है। मनुष्य को न केवल अपनी सामान्य मानवीय समझ को बनाए रखना चाहिए, बल्कि उसे दूसरों के सामने व्यवहार के अनेक सिद्धान्तों और नियमों को भी अधिक समझना चाहिए, और इसके अतिरिक्त उसे मनुष्य की बुद्धि और नैतिकता को और अधिक सीखना चाहिए। इंसान के अंदर ये तमाम बातें होनी चाहिये। लेकिन, देहधारी परमेश्वर के लिए ऐसा नहीं है, क्योंकि उसका कार्य न तो मनुष्य का प्रतिनिधित्व करता है और न ही मनुष्यों का है; बल्कि, यह उसके अस्तित्व की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है और उस कार्य का प्रत्यक्ष कार्यान्वयन है जो उसे करना चाहिए। (स्वभाविक है कि उसका कार्य उपयुक्त समय पर किया जाता है, न कि यूँ ही बेतरतीब तरीके से किया जाता है। और उसका कार्य तब शुरू होता है जब उसकी सेवकाई को पूरा करने का समय होता है।) वह मनुष्य के जीवन में या मनुष्य के कार्य में भाग नहीं लेता है, अर्थात्, उसकी मानवता में इनमें से कुछ भी नहीं होता (हालाँकि इससे उसका कार्य प्रभावित नहीं होता है)। वह अपनी सेवकाई को केवल तब पूरा करता है जब उसके लिए ऐसा करने का समय होता है; उसकी हैसियत कुछ भी हो, वह बस उस कार्य को करने के लिए आगे बढ़ता है जो उसे करना चाहिए। मनुष्य उसके बारे में जो कुछ भी जानता है या उसके बारे में उसकी जो भी राय रखता है इससे उसके कार्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। मिसाल के तौर पर, जब यीशु ने अपना काम किया था; तब कोई नहीं जानता था कि वह कौन है, परन्तु वह अपने काम में आगे बढ़ता गया। इसमें से किसी ने भी उसे जो कार्य करना था, उसमें बाधा नहीं डाली। इसलिए, उसने पहले अपनी पहचान को स्वीकार या घोषित नहीं किया, और उसने लोगों को अपना अनुसरण करने दिया। स्वाभाविक है कि यह केवल परमेश्वर की विनम्रता नहीं थी; यह वह तरीका भी था जिससे परमेश्वर ने देह में काम किया था। वह केवल इसी तरीके से काम कर सकता था, क्योंकि मनुष्य उसे खुली आँखों से नहीं पहचान सकता था। यदि मनुष्य पहचान भी लेता, तब भी वह उसके काम में सहायता नहीं कर पाता। इसके अतिरिक्त, वह इसलिए देहधारी नहीं हुआ कि मनुष्य उसकी देह को जान जाए; यह कार्य को करने और अपनी सेवकाई को पूरा करने के लिए था। इसी कारण से, उसने अपनी पहचान ज्ञात करवाने को कोई महत्व नहीं दिया। जब उसने सारा कार्य पूरा कर लिया जो उसे करना चाहिए था, तब उसकी पूरी पहचान और हैसियत स्वभाविक रूप से मनुष्य की समझ में आ गई। देहधारी परमेश्वर मौन रहता है और कभी कोई घोषणाएँ नहीं करता। वह न तो मनुष्य पर, न ही इस बात पर कोई ध्यान नहीं देता है कि इंसान उसका अनुसरण किस तरह कर रहा है, बस अपनी सेवकाई पूरी करने और उस कार्य को करने के लिये आगे बढ़ता जाता है जो उसे करना चाहिए। कोई भी उसके कार्य के मार्ग में बाधा नहीं बन सकता है। जब उसके कार्य के समापन का समय आता है, तब इसे निश्चित रूप से पूरा किया जाएगा। कोई भी अन्यथा आदेश नहीं दे सकता है। अपने कार्य की समाप्ति के बाद जब वह मनुष्य से विदा होकर चला जाएगा, तभी मनुष्य उसके द्वारा किए गए कार्य को समझेगा, यद्यपि अभी भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं समझेगा। और जिस इरादे से पहली बार उसने अपना कार्य किया, उसे समझने में इंसान को बहुत समय लग जाएगा। दूसरे शब्दों में, देहधारी परमेश्वर के युग के कार्य को दो भागों में विभाजित किया जाता है। एक भाग वह है जिसे स्वयं देहधारी परमेश्वर करता है और दूसरा वे वचन हैं जिन्हें स्वयं देहधारी परमेश्वर बोलता है। एक बार जब उसके देह की सेवकाई पूरी तरह से सम्पन्न हो जाती है, तो कार्य का दूसरा भाग पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोगों के द्वारा किया जाना शेष रह जाता है। इस समय इंसान को अपना काम पूरा करना चाहिये, क्योंकि परमेश्वर ने पहले ही मार्ग प्रशस्त कर दिया है, और अब उस पर मनुष्य को स्वयं चलना चाहिए। कहने का अभिप्राय है कि कार्य के एक भाग को देहधारी परमेश्वर करता है, और इसके बाद पवित्र आत्मा और पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किए गये लोग इस काम में सफल होंगे। अतः मनुष्य को पता होना चाहिये कि इस चरण में देहधारी परमेश्वर को सबसे पहले कौन-सा कार्य करना है। उसे समझना चाहिये कि परमेश्वर देहधारी होने के सही मायने क्या हैं और उसे कौन-सा कार्य करना चाहिये। बजाय इसके कि वह परमेश्वर से भी वैसी ही अपेक्षा करे जैसी इंसानों से की जाती है। इसी में इंसान की गलती, अवधारणा और अवज्ञा छिपी है।

परमेश्वर इसलिये देह धारण नहीं करता कि इंसान उसे जाने, या देहधारी परमेश्वर की देह और मनुष्य की देह में भेद करने की अनुमति देने के लिए नहीं है; न ही मनुष्य के विवेक की योग्यता को प्रशिक्षित करने के लिए परमेश्वर देह बनता है, इस अभिप्राय से तो परमेश्वर ऐसा बिलकुल नहीं करता कि मनुष्य परमेश्वर के देहधारी देह या शरीर की आराधना करे, जिससे उसे बड़ी महिमा मिले। इसमें से कुछ भी परमेश्वर के देह बनने के पीछे की मूल इच्छा नहीं है। न ही परमेश्वर मनुष्य की निन्दा करने के लिए, जानबूझकर मनुष्य को प्रकट करने के लिए, या चीज़ों को मनुष्य के लिए कठिन बनाने के लिए देहधारण करता है। इनमें से कोई भी परमेश्वर की मूल इच्छा नहीं है। हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तो कार्य का वह स्वरूप है जो अपरिहार्य होता है। वह अपने और भी महान कार्य और प्रबंधन के कारण ऐसे कार्य करता है न कि उन कारणों से जो इंसान सोचता है। परमेश्वर पृथ्वी पर केवल तभी आता है जब उसके कार्य के द्वारा अपेक्षित होता है, और जब आवश्यकता होती है। वह पृथ्वी पर घूमने-फिरने के इरादे से नहीं आता है, बल्कि उस कार्य को करने लिए आता है जो उसे करना चाहिए। अन्यथा वह इतने भारी उत्तरदायित्व को क्यों ग्रहण करेगा और इस कार्य को करने के लिए इतना बड़ा जोखिम क्यों लेगा? केवल तभी परमेश्वर देह बनता है जब उसे ऐसा करना है, और वह हमेशा एक अद्वितीय महत्व के साथ देह बनता है। यदि यह सिर्फ मनुष्य को उसे नज़र भर देखने और उनके ज्ञान के दायरे को बढ़ाने के लिये होता, तो वह यों ही लोगों के बीच कभी नहीं आता। वह पृथ्वी पर अपने प्रबंधन, महान कार्य के लिए आता है, और इसलिये आता है ताकि बहुत से लोगों को प्राप्त कर सके। वह युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए और शैतान को पराजित करने के लिए आता है, और वह शैतान को पराजित करने के लिए देह धारण करता है। इसके अतिरिक्त, समस्त मानवजाति को अपनी ज़िन्दगी किस प्रकार जीनी है, इसमें उनका मार्गदर्शन करने के लिए आता है। इन सबका संबंध उसके प्रबंधन और पूरे विश्व के कार्य से है। यदि परमेश्वर मनुष्य को मात्र अपनी देह को जानने देने और मनुष्य की आँखें खोलने के लिए देह बना होता, तो वह हर देश की यात्रा क्यों नहीं करता? क्या उसके लिये ऐसा करना अत्यधिक आसान नहीं होता? परन्तु उसने ऐसा नहीं किया, इसके बजाए वह बसने और उस कार्य को आरंभ करने के लिए जो उसे करना चाहिए, एक उपयुक्त स्थान को चुनता है। केवल यह अकेला देह ही अत्यधिक महत्व का है। वह संपूर्ण युग का प्रतिनिधित्व करता है, और संपूर्ण युग के कार्य को भी करता है; वह पुराने युग का समापन और नए युग का सूत्रपात करता है। ये तमाम बातें, एक महत्वपूर्ण मामला हैं जो परमेश्वर के प्रबंधन से संबंधित हैं, और यह कार्य के उस एक चरण के मायने हैं जिसे सम्पन्न करने परमेश्वर पृथ्वी पर आता है। जब यीशु पृथ्वी पर आया, तो उसने केवल कुछ वचन बोले और कुछ कार्य किया; उसने स्वयं को मनुष्य की जिंदगी के साथ नहीं जोड़ा, और अपना कार्य पूरा करने के बाद तुरंत लौट गया। आज जब मैं बोलना समाप्त कर दूँगा और अपने वचनों को तुम लोगों को सौंप दूँगा, और तुम सभी लोग समझ चुके होगे उसके बाद, मेरे कार्य का यह चरण समाप्त हो गया होगा, चाहे उस समय तुम लोगों की ज़िंदगी कैसी भी हो। भविष्य में, कार्य के इस कदम को जारी रखने और पृथ्वी पर इन वचनों के अनुसार कार्य करने के लिए कुछ लोग अवश्य होने चाहिए; तब मनुष्य का कार्य और मनुष्य का निर्माण शुरू होगा। किन्तु अभी, परमेश्वर केवल अपनी सेवकाई को पूरा करने और कार्य के एक चरण पूरा करने के लिए कार्य करता है। परमेश्वर के कार्य करने का तरीका इंसान से अलग है। मनुष्य धार्मिक-सभाओं और मंचों को पसंद करता है, और अनुष्ठान को महत्व देता है। जबकि परमेश्वर मनुष्यों की धार्मिक-सभाओं और बैठकों से सबसे अधिक घृणा करता है। परमेश्वर मनुष्य के साथ अनौपचारिक रूप से बातचीत करता और बोलता है; यह परमेश्वर का कार्य है, जो विशेष रूप से स्वतंत्र है और तुम लोगों को भी मुक्त करता है। हालाँकि, मैं तुम लोगों के साथ धार्मिक-सभा करने से बेहद घृणा करता हूँ, और मैं तुम लोगों की तरह अनुशासित जीवन का अभ्यस्त नहीं हो सकता। मुझे नियमों से नफ़रत है; वे मनुष्य को कार्यवाही करने, बोलने और गाने से डरने तक की स्थिति तक सीमित कर देते हैं और उसकी आँखें सीधे तुम्हें घूरती हैं। मैं तुम लोगों की बड़ी धार्मिक-सभा और धार्मिक-सभाओं के तरीके से अत्यधिक घृणा करता हूँ। मैं तुम लोगों के साथ इस तरह से धार्मिक-सभा करना बिल्कुल नहीं चाहता, क्योंकि इस तरह का जीवन एक व्यक्ति को बेड़ियों से बँधा हुआ महसूस करवाता है। तुम लोग बहुत अधिक अनुष्ठान और बहुत सारे नियमों का पालन करते हो, इसलिए अगर तुम्हें अगुवाई करने की अनुमति दे दी जाये तो तुम लोग सभी मनुष्यों को नियमों के दायरे में ले आओगे। तुम लोगों की अगुवाई के अधीन मनुष्य के पास नियमों को टालने का कोई भी उपाय नहीं होगा, और बल्कि धार्मिकता का भाव बहुत अधिक तीव्र हो जाएगा, और मनुष्य के अभ्यास संख्या में अत्यधिक बढ़ते जाएँगे। कुछ लोग धार्मिक-सभा करते हुए प्रचार करते और बोलते रहते हैं और कभी नहीं थकते हैं, जबकि कुछ लोग दसियों दिन तक लगातार बोल सकते हैं। ये सभी मनुष्यों की बड़ी धार्मिक सभाएँ और बैठकें मानी जाती हैं; इनका खाने-पीने, आनंद या आत्मा की मुक्ति के जीवन से कोई लेना-देना नहीं है। ये सभी बैठकें हैं! तुम लोगों की सह-कार्यकर्ता बैठकें और छोटी-बड़ी धार्मिक-सभाएँ, सभी मेरे लिए घृणित हैं, और मुझे कभी भी उन में कोई रुचि नहीं रही है। यही वह सिद्धांत है जिसके अनुसार मैं कार्य करता हूँ: मैं धार्मिक सभाओं के दौरान उपदेश देने का इच्छुक नहीं हूँ, न ही मैं सार्वजनिक रूप से किसी चीज की घोषणा करना चाहता हूँ, तुम सभी लोगों को किसी विशेष सम्मेलन में कुछ दिनों के लिए बुलाना तो बिल्कुल भी नहीं चाहता हूँ। मुझे तुम सब लोगों का एक साथ सभा में बैठना और सलीके से नियमों का पालन करना स्वीकार्य नहीं है; तुम लोगों को किसी भी अनुष्ठान की सीमाओं में रहता देख कर मुझे घृणा होती है, और इसके अलावा, मैं तुम लोगों के किसी भी ऐसे अनुष्ठान में हिस्सा लेने का इच्छुक नहीं हूँ। जितना अधिक तुम लोग ऐसा करते हो, मुझे यह उतना घृणित लगता है। तुम लोगों के अनुष्ठान और नियमों में मेरी थोड़ी-सी भी रुचि नहीं है; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम लोग इसे कितने अच्छे से करते हो, मैं उन सब को घृणित पाता हूँ। ऐसा नहीं है कि तुम लोगों की व्यवस्थाएँ अनुपयुक्त हैं या कि तुम लोग अत्यधिक अधम हो; इसका कारण यह है कि मैं तुम लोगों के जीने के तरीके से घृणा करता हूँ, और मैं इसका अभ्यस्त नहीं हो सकता। तुम लोग उस कार्य को बिल्कुल नहीं समझते जो मैं करना चाहता हूँ। उस समय, जब यीशु एक स्थान-विशेष में अपना कार्य करता और वहाँ धर्मोपदेश समाप्त करता था, तो उसके बाद वह अपने चेलों की अगुवाई करते हुए शहर छोड़ दिया करता था; भीड़-भाड़ से दूर जाते हुए, वह अपने प्यारे चेलों की अगुवाई करता और उनके साथ मार्गों के बारे में इस ढंग से बात करता था कि वे समझ जाते थे। वह अक्सर इस तरीके से कार्य करता था। जन-साधारण के बीच उसका कार्य बहुत कम होता था। तुम लोग उससे जो चाहते हो, उसके अनुसार, देहधारी परमेश्वर के पास एक साधारण व्यक्ति का जीवन नहीं होना चाहिए; उसे अपना कार्य अवश्य करना चाहिए और चाहे वह बैठा हो, खड़ा हो, या चल रहा हो, उसे बोलना चाहिए। उसे अवश्य हर समय कार्य करते रहना चाहिए और वह कभी भी "निष्क्रिय" नहीं हो सकता है, अन्यथा वह अपने कर्तव्यों में लापरवाही करेगा। क्या मनुष्य की ये माँगें मनुष्य की समझ के अनुसार हैं? तुम लोगों की ईमानदारी कहाँ है? क्या तुम लोग बहुत ज्यादा की माँग नहीं करते हो? क्या मेरे कार्य की तुम्हारे द्वारा जाँच किए जाने की आवश्यकता है? जब मैं अपनी सेवकाई पूरी करता हूँ तो क्या मुझे आवश्यकता है कि तुम पर्यवेक्षण करो? मुझे अच्छी तरह पता है कि मुझे कौन-सा कार्य कब करना चाहिए; मुझे दूसरों के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। शायद तुम्हें ऐसा प्रतीत हो सकता है कि मैंने बहुत कुछ नहीं किया है, किन्तु तब तक मेरा कार्य समाप्त हो चुका होता है। उदाहरण के लिए चार सुसमाचारों में यीशु के वचनों को लो। क्या वे भी सीमित नहीं थे? उस समय, यीशु ने आराधनालय में प्रवेश किया और धर्मोपदेश दिया; उसने इसे अधिक से अधिक कुछ ही पलों में समाप्त कर दिया। बोलने के बाद, वह बिना कोई स्पष्टीकरण दिये, अपने शिष्यों के साथ नाव में बैठकर चला गया। अधिक से अधिक, आराधनालय के भीतर लोगों ने आपस में चर्चा की होगी, लेकिन इस मामले का कोई संबंध यीशु से नहीं रह गया था। परमेश्वर वही कार्य करता है जो उसे करना चाहिए, उसके अलावा कुछ नहीं करता। आजकल, बहुत से लोग मुझे अधिक बोलने और बात करने के लिए कहते हैं, दिन में कई घंटों तक। जैसा कि तुम लोग समझते हो, अगर परमेश्वर बोलेगा नहीं तो वह परमेश्वर नहीं रहेगा, और केवल जो परमेश्वर होगा, वही बोलेगा। तुम लोग सब अंधे हो! सभी नीच हो! सभी अज्ञानी हो जिन्हें कोई समझ नहीं है! तुम लोगों की अवधारणाएँ बहुत अधिक हैं! तुम लोगों की माँगें बहुत अधिक हैं! तुम लोग अमानवीय हो! तुम लोग बिल्कुल भी नहीं समझते कि परमेश्वर क्या है! तुम लोग मानते हो कि सभी भाषण देने वाले और वक्ता परमेश्वर हैं, कि जो कोई भी तुम लोगों की वचनों से आपूर्ति करने का इच्छुक है वह तुम लोगों का पिता है। मुझे बताओ, क्या सुनिर्मित विशिष्टताओं और "असाधारण" रूप-रंग वाले तुम सभी लोगों को अभी भी रत्ती भर भी समझ है? क्या तुम लोग अब तक स्वर्गसूर्य को जान पाए हो! तुम में से प्रत्येक भ्रष्ट और कंजूस अधिकारियों की तरह है, तो तुम लोगों में अक्ल कहाँ से होगी? तुम लोग कैसे सही और गलत के बीच भेद कर सकते हो? मैंने तुम लोगों को बहुत कुछ दिया है, किन्तु तुम लोगों में से कितनों ने इसकी कीमत को समझा? किसने इसे पूरी तरह से हासिल किया है? तुम लोग नहीं जानते कि जिस मार्ग पर तुम लोग आज चल रहे हो, उसे किसने खोला है, इसलिए तुम लोग मुझसे अनुचित माँगें करते रहते हो, मुझसे हास्यास्पद और बेतुकी माँगें करते रहते हो। क्या तुम लोगों का चेहरा शर्मिंदगी से लाल नहीं है? क्या मैं काफ़ी नहीं बोल चुका? क्या मैंने पर्याप्त नहीं किया है? तुम लोगों में से कौन सचमुच मेरे वचनों को खजाने के रूप में सँजो सकता है? तुम लोग मेरी उपस्थिति में मेरी चापलूसी करते हो, किन्तु मेरी पीठ पीछे झूठ बोलते और धोखा देते हो! तुम लोगों के कार्य बहुत नीच और घृणास्पद हैं और उनसे मुझे नफ़रत है! मैं जानता हूँ कि तुम लोग केवल अपनी आँखों को सुख देने और अपने ज्ञान की सीमा को विस्तृत करने के लिए मुझसे बोलने और कार्य करने को कहते हो, न कि अपने जीवन को रूपान्तरित करने के लिए। मैं पहले ही तुम लोगों से कितना बोल चुका हूँ? तुम लोगों का जीवन बहुत पहले ही बदल जाना चाहिए था, तो फिर तुम लोग क्यों आज पूर्वावस्था में लौटना जारी रखते हो? क्या ऐसा हो सकता है कि मेरे वचनों को तुम लोगों से लूट लिया गया है और तुम लोगों ने उन्हें प्राप्त नहीं किया? सच कहूँ तो, मैं तुम लोगों जैसे पतितों से और अधिक कुछ नहीं कहना चाहता हूँ। यह व्यर्थ होगा! मैं ऐसा व्यर्थ कार्य नहीं करना चाहता हूँ! तुम लोग केवल अपने ज्ञान की सीमा को विस्तृत करना या अपनी आँखों को सुख देना चाहते हो, जीवन प्राप्त करना नहीं चाहते हो! तुम सब लोग अपने आप को धोखा दे रहे हो! मैं तुम लोगों से पूछता हूँ, मैंने तुम लोगों के साथ आमने-सामने जितनी बातें की हैं उनमें से कितनी बातों को तुम लोग अभ्यास में लाए हो? तुम लोग जो कुछ भी करते हो वह सब दूसरों को धोखा देने की चाल है। मैं तुम लोगों में से उन से घृणा करता हूँ जो देखते रहने में आनंद लेते हैं, और मुझे तुम लोगों की जिज्ञासा बहुत घृणित लगती है। यदि तुम लोग यहाँ सच्चे मार्ग की तलाश करने या सत्य के लिए लालायित होने हेतु नहीं हो, तो तुम लोग उनमें से हो जिनसे मैं घृणा करता हूँ! मैं जानता हूँ कि तुम लोग केवल अपनी जिज्ञासा को संतुष्ट करने या अपनी इच्छाओं में से एक को पूरा करने के लिए मुझे बोलते हुए सुनते हो। तुम लोगों का सत्य के अस्तित्व की तलाश करने या जीवन के सही मार्ग में प्रवेश का पता लगाने का विचार नहीं है; ये माँगें तुम लोगों में बिल्कुल भी विद्यमान नहीं हैं। तुम लोग परमेश्वर को केवल अध्ययन करने और प्रशंसा करने के लिए एक खिलौने के रूप में देखते हो। तुम्हारे अंदर जीवन की तलाश करने वाला जुनून बहुत कम है, मगर तुम लोगों की जिज्ञासु इच्छा कम नहीं है! ऐसे लोगों से जीवन के मार्ग के बारे में बात करना वास्तव में व्यर्थ में बात करना है; इससे तो नहीं बोलना बेहतर होगा! मैं तुम लोगों को बता दूँ: यदि तुम लोग केवल अपने हृदय के भीतर के शून्य को भरना चाह रहे हो, तो अच्छा होगा कि तुम लोग मेरे पास न आओ! तुम लोगों को अपने जीवन पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए! अपने आप को मूर्ख मत बनाओ! अच्छा रहेगा कि तुम लोग अपनी जिज्ञासा को अपने जीवन की खोज की नींव के रूप में ना समझो, या तुम लोगों से बात करने की मुझसे माँग करने के बहाने के रूप में इसका उपयोग मत करो। यह सब प्रवंचना है, जिसमें तुम लोग बहुत कुशल हो! मैं तुमसे फिर पूछता हूँ: जिनमें प्रवेश करने के लिए मैं तुमसे कहता हूँ उसमें से कितने में तुमने वास्तव में प्रवेश किया है? क्या तुम वह सब समझ गये हो जो मैंने तुमसे बोला है? क्या तुम उन तमाम बातों को अभ्यास में लाने में समर्थ हुए हो जो मैंने तुमसे कही हैं?

प्रत्येक युग के कार्य की शुरुआत परमेश्वर द्वारा ही की जाती है, परन्तु तुम्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर के काम का अंदाज़ कुछ भी हो, वह कोई आन्दोलन शुरू करने के लिए, या विशेष सम्मेलन आयोजित करने या तुम लोगों की ओर से किसी प्रकार की संस्था की स्थापना करने के लिए नहीं आता है। वह केवल उस कार्य को करने के लिए आता है जो उसे करना चाहिए। उसका कार्य किसी मनुष्य के द्वारा बाधित नहीं किया जाता है। वह अपने कार्य को जैसा चाहता है वैसा करता है; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य क्या सोचता या जानता है, वह केवल अपने कार्य को करने पर ध्यान केन्द्रित करता है। संसार की सृष्टि से लेकर आज तक, कार्य के तीन चरण पहले ही हो चुके हैं; यहोवा से यीशु तक, व्यवस्था के युग से अनुग्रह के युग तक, परमेश्वर ने कभी भी मनुष्य के लिए किसी विशेष सम्मलेन को आयोजित नहीं किया है, न ही उसने कभी अपने कार्य के क्षेत्र को फैलाने हेतु कोई विशेष वैश्विक कार्यशील सम्मलेन आयोजित करने के लिए समस्त मानवजाति को इकट्ठा किया है। जब समय और स्थान सही होता है तब वह संपूर्ण युग के प्राथमिक कार्य को करता है, और इस तरह, नये युग का सूत्रपात करता है और जीने के लिये, मानवजाति की अगुवाई करता है। विशेष सम्मेलन मनुष्य की मण्डलियाँ हैं; छुट्टियों का उत्सव मनाने के लिए लोगों को एकत्रित करना मनुष्य का काम है। परमेश्वर छुट्टियाँ नहीं मनाता बल्कि उनसे घृणा करता है; वह विशेष सम्मेलनों का आयोजन नहीं करता है, बल्कि उनसे घृणा करता है। अब तुम्हें ठीक-ठीक समझ जाना चाहिए कि देहधारी परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य क्या है!

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वचन देह में प्रकट होता है अंत के दिनों के मसीह के कथन (संकलन) मेमने ने पुस्तक को खोला न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है राज्य के सुसमाचार पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के उत्कृष्ट वचन -संकलन परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) राज्य के सुसमाचार पर उत्कृष्ट प्रश्न और उत्तर (संकलन) मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना अंत के दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह, के उत्कृष्ट वचन