वचन देह में प्रकट होता है

विषय-वस्तु

परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए

तुम परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? अधिकांश लोग इस प्रश्न से हैरान हैं। उनके पास व्यावहारिक परमेश्वर और स्वर्ग के परमेश्वर के बारे में हमेशा से बिलकुल दो भिन्न दृष्टिकोण रहे हैं, जो दिखाता है कि वे आज्ञापालन के लिए नहीं, बल्कि कुछ निश्चित लाभों को प्राप्त करने, या विपत्तियों के कष्ट से बच निकलने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। केवल तभी वे थोड़ा बहुत आज्ञाकारी होते हैं, किन्तु उनकी आज्ञाकारिता सशर्त है, यह उनकी स्वयं की व्यक्तिगत भावी संभावनाओं के वास्ते है, और जो उन पर जबरदस्ती डाली जाती है। इसलिए: तुम परमेश्वर पर विश्वास क्यों करते हो? यदि यह केवल तुम्हारी संभावनाओं, और तुम्हारे भाग्य के लिए है, तो बेहतर है कि तुम विश्वास ही मत करो। इस प्रकार का विश्वास आत्म-वंचना, आत्म-आश्वासन, और आत्म-प्रशंसा है। यदि तुम्हारा विश्वास परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की नींव पर नहीं बना है, तो अंततः तुम्हें परमेश्वर का विरोध करने के परिणामस्वरूप दण्डित किया जाएगा। वे सभी जो अपने विश्वास में परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की खोज नहीं करते हैं परमेश्वर का विरोध करते हैं। परमेश्वर कहता है कि लोग सत्य की खोज करें, कि वे परमेश्वर के वचन के लिए प्यासे हों, और परमेश्वर के वचनों को खाएँ एवं पीएँ, और उन्हें अभ्यास में लाएँ, ताकि वे परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता को प्राप्त कर सकें। यदि तुम्हारी प्रेरणाएँ सचमुच में इस प्रकार की हैं, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें उठाएगा, और वह निश्चित रूप से तुम्हारे प्रति अनुग्रहपूर्ण होगा। कोई भी इस पर सन्देह नहीं कर सकता है, और कोई भी इसे बदल नहीं सकता है। यदि तुम्हारी प्रेरणाएँ परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता के वास्ते नहीं हैं, और तुम्हारे अन्य लक्ष्य हैं, तो जो कुछ भी तुम कहते और करते हो—परमेश्वर के सामने तुम्हारी प्रार्थनाएँ, और यहाँ तक कि तुम्हारे प्रत्येक कार्यकलाप—परमेश्वर के विरोध में होंगे। तुम मृदुभाषी एवं विनम्र-व्यवहार वाले हो सकते हो, तुम्हारा हर कार्यकलाप और अभिव्यक्ति सही दिखायी दे सकती है, तुम एक ऐसा व्यक्ति दिखाई दे सकते हो जो कि आज्ञाकारी है, किन्तु जब परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रेरणाओं एवं परमेश्वर में विश्वास के बारे में तुम्हारे दृष्टिकोण की बात आती है, तो जो कुछ भी तुम करते हो वह परमेश्वर के विरोध में, तथा बुरा होता है। जो लोग भेड़ों के समान आज्ञाकारी प्रतीत होते हैं, परन्तु जिनके हृदय बुरे इरादों को आश्रय देते हैं, वे भेड़ की खाल में भेड़िए हैं, वे प्रत्यक्षत: परमेश्वर का अपमान करते हैं, और परमेश्वर उन में से एक को भी नहीं छोड़ेगा। पवित्र आत्मा उन में से प्रत्येक को प्रकट करेगा, ताकि सभी यह देख सकें कि उन में से प्रत्येक से जो पाखण्डी हैं पवित्र आत्मा के द्वारा निश्चित रूप से घृणा की जाएगी एवं उनका तिरस्कार किया जाएगा। चिंता मत करो: परमेश्वर बारी-बारी से उन में से प्रत्येक के साथ निपटेगा और उनका समाधान करेगा।

यदि तुम परमेश्वर के नए प्रकाश को स्वीकार करने में असमर्थ हो, और वह सब कुछ नहीं समझ सकते हो जिसे आज परमेश्वर करता है, और उसकी खोज नहीं करते हो, या अन्यथा उस पर सन्देह करते हो, उसकी आलोचना करते हो, या उसका अध्ययन एवं विश्लेषण करते हो, तो तुम्हारा आज्ञा मानने का मन नहीं है। यदि, जब वर्तमान समय का प्रकाश दिखाई देता है, तुम तब भी बीते हुए कल के प्रकाश को सँजोकर रखते हो और परमेश्वर के नए कार्य का विरोध करते हो, तो तुम एक मज़ाक से बढ़कर और कुछ भी नहीं हो, तुम उन में से एक हो जो जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करता है। नए प्रकाश की सराहना करना, उसे स्वीकार करने में समर्थ होना और उसे अभ्यास में लाना ही परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की कुंजी है। केवल यही सच्ची आज्ञाकारिता है। जो लोग परमेश्वर के लिए प्यासे होने की इच्छा नहीं रखते हैं वे परमेश्वर की आज्ञा मानने का मन रखने वाला होने में असमर्थ हैं, और वे केवल यथास्थिति के साथ अपनी संतुष्टि के फलस्वरूप केवल परमेश्वर का विरोध ही कर सकते हैं। मनुष्य परमेश्वर का आज्ञापालन इसलिए नहीं कर सकता है क्योंकि वह उसके द्वारा ग्रस्त है जो पहले आया था। ऐसी चीज़ें जो पहले आई थीं उन्होंने परमेश्वर के बारे में लोगों को हर प्रकार की धारणाएँ एवं भ्रांतियाँ दी हैं जो उनके मनों में परमेश्वर की छवि बन गई हैं। इस प्रकार, जिन में वे विश्वास करते हैं वे उनकी स्वयं की धारणाएँ, और उनकी स्वयं की कल्पनाओं के मानक हैं। यदि तुम अपनी कल्पनाओं के परमेश्वर के विरूद्ध उस परमेश्वर को मापते हैं जो आज वास्तविक कार्य करता है, तो तुम्हारा विश्वास शैतान से आता है, और तुम्हारी स्वयं की प्राथमिकताओं के अनुसार है—और परमेश्वर इस तरह का विश्वास नहीं चाहता है। इस बात की परवाह किए बिना कि उनके परिचय पत्र कितने उत्कृष्ट हैं, और उनके समर्पण की परवाह किए बिना—भले ही उन्होंने उसके कार्य के लिए जीवन भर के प्रयासों का समर्पण किया हो, और अपने आपको शहीद कर दिया हो—परमेश्वर इस तरह के विश्वास वाले किसी को भी स्वीकार नहीं करता है। वह उन्हें मात्र थोड़ा सा अनुग्रह दिखाता है, और थोड़े समय के लिए उन्हें उसका आनन्द उठाने देता है। इस तरह के लोग सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ हैं, पवित्र आत्मा उनके भीतर काम नहीं करता है, और परमेश्वर बारी-बारी से उन में प्रत्येक को हटा देगा। इस बात की परवाह किए बिना कि वे बुजुर्ग हैं या जवान, जो लोग अपने विश्वास में परमेश्वर का आज्ञापालन नहीं करते हैं और जिनके पास ग़लत प्रेरणाएँ हैं, ये ऐसे लोग हैं जो विरोध और हस्तक्षेप करते हैं, और ऐसे लोग निर्विवाद रूप से परमेश्वर द्वारा हटा दिए जाएँगे। ऐसे लोग जिनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ी सी भी आज्ञाकारिता नहीं है, जो केवल परमेश्वर के नाम को स्वीकार करते हैं, और जिनमें परमेश्वर की प्रीति एवं सुंदरता का थोड़ा सा भाव है फिर भी वे पवित्र आत्मा के कदमों के साथ समगति से नहीं चलते हैं, और पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य एवं वचनों का पालन नहीं करते हैं—ऐसे लोग परमेश्वर के अनुग्रह के बीच रहते हैं, और परमेश्वर द्वारा प्राप्त नहीं किए जाएँगे पूर्ण नहीं बनाए जाएँगे। परमेश्वर लोगों को उनकी आज्ञाकारिता के माध्यम से, परमेश्वर के वचन को उनके द्वारा खाए, पीए एवं उसका आनन्द उठाए जाने के माध्यम से, और उनके जीवन में कष्ट एवं शुद्धिकरण के माध्यम से पूर्ण बनाता है। केवल इस तरह के विश्वास के माध्यम से ही लोगों का स्वभाव परिवर्तित हो सकता है, केवल तभी वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान को धारण कर सकते हैं। परमेश्वर के अनुग्रहों के बीच रह कर सन्तुष्ट न होना, सत्य के लिए सक्रियता से प्यासे होना, और सत्य की खोज करना, और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने खोज करना—सचेतनता से परमेश्वर की आज्ञा मानने का यही अर्थ है; यह ठीक उसी प्रकार का विश्वास है जो परमेश्वर चाहता है। जो लोग परमेश्वर के अनुग्रहों का आनन्द उठाने से अधिक और कुछ नहीं करते हैं वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते हैं, या परिवर्तित नहीं किए जा सकते हैं, और उनकी आज्ञाकारिता, धर्मनिष्ठता, और प्रेम तथा धैर्य सभी सतही हैं। जो लोग केवल परमेश्वर के अनुग्रहों का आनन्द लेते हैं वे वास्तव में परमेश्वर को नहीं जान सकते हैं, और यहाँ तक कि जब वे परमेश्वर को जान जाते हैं, तब भी उनका ज्ञान उथला होता है, और वे ऐसी बातें कहते हैं जैसे कि परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है, या परमेश्वर मनुष्य के प्रति करूणामय है। यह मनुष्य के जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करता है, और यह नहीं दिखाता है कि लोग सचमुच में परमेश्वर को जानते हैं। यदि, जब परमेश्वर के वचन उन्हें शुद्ध करते हैं, या जब परमेश्वर के परीक्षण उन पर आते हैं, तो लोग परमेश्वर की आज्ञा मानने में असमर्थ होते हैं—उसके बजाए, यदि वे सन्देहास्पद हो जाते हैं, और नीचे गिर जाते हैं—तो वे न्यूनतम आज्ञाकारी भी नहीं रहते हैं। उनके भीतर, परमेश्वर के विश्वास के बारे में बहुत सारे नियम और प्रतिबंध हैं, पुराने अनुभव हैं जो कई वर्षों के विश्वास के परिणामस्वरूप हैं, या बाईबल पर आधारित विभिन्न सिद्धांत हैं। क्या इस प्रकार के लोग परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं? ये लोग मानवीय चीज़ों से भरे हुए हैं—वे परमेश्वर का आज्ञापालन कैसे कर सकते हैं? वे सभी अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार आज्ञापालन करते हैं—क्या परमेश्वर इस तरह की आज्ञाकारिता की इच्छा कर सकता है? यह परमेश्वर का आज्ञापालन करना नहीं है, बल्कि सिद्धांतों पर अटल रहना है, यह अपने आपको सन्तुष्ट करना और सांत्वना देना है। यदि तुम कहते हो कि यह परमेश्वर का आज्ञापालन है, तो क्या तुम उसके विरुद्ध ईशनिंदा नहीं करते हो? तुम एक मिस्री फिरौन हो, तुम दुष्टता करते हो, तुम स्पष्ट रूप से परमेश्वर का विरोध करने के काम में संलग्न रहते हो—क्या परमेश्वर इस तरह की सेवा चाह सकता है? तुम्हारे लिए सबसे अच्छा होगा कि शीघ्रता करो और पश्चाताप करो और कुछ आत्म-जागरूकता रखो। यदि नहीं, तो तुम्हारे लिए घर चले जाना बेहतर होगा: परमेश्वर के प्रति तुम्हारी "सेवा" की अपेक्षा यह तुम्हारे लिए अधिक अच्छा होगा, तुम हस्तक्षेप नहीं करोगे और विघ्न नहीं ड़ालोगे, तुम अपनी जगह को जानोगे, और—अच्छी तरह से रहोगे—और क्या यह बेहतर नहीं रहेगा? इस तरह से तुम परमेश्वर का विरोध करने और दण्डित किए जाने से बच जाओगे!