11.4. सभी चीज़ों के लिए जीवन के स्रोत के रूप में परमेश्वर पर
583. जीवन का मार्ग कोई ऐसी चीज नहीं है जो हर व्यक्ति के पास हो, न ही यह कोई ऐसी चीज है जिसे हर व्यक्ति आसानी से प्राप्त कर सके। ऐसा इसलिए है क्योंकि जीवन केवल परमेश्वर से आ सकता है, कहने का तात्पर्य यह है कि केवल स्वयं परमेश्वर के पास जीवन का सार है और केवल स्वयं परमेश्वर के पास जीवन का मार्ग है। और इसलिए केवल परमेश्वर ही जीवन का स्रोत है और जीवन के जीवंत जल का सदा बहने वाला झरना है। संसार के सृजन के समय से ही परमेश्वर ने बहुत सारा कार्य किया है जो अपने साथ जीवन की प्राणशक्ति लेकर चलता है, उसने मनुष्य को जीवन प्रदान करने वाला काफी सारा कार्य किया है और उसने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है जो मनुष्य को जीवन प्राप्त करने में सक्षम बनाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि स्वयं परमेश्वर ही अनंत जीवन है और स्वयं परमेश्वर ही वह मार्ग है, जिससे मनुष्य पुनर्जीवित हो सकता है। परमेश्वर मनुष्य के हृदय से कभी अनुपस्थित नहीं होता और हर समय लोगों के बीच रहता है। वह मनुष्य के जीवन की प्रेरक शक्ति, मनुष्य के जीवित रहने का मूल और जन्म लेने के बाद मनुष्य के जीवित रहने के लिए समृद्ध संसाधन रहा है। वह लोगों को पुनः जन्म लेने में समर्थ बनाता है और उन्हें अपनी हर व्यक्तिगत भूमिका में दृढ़तापूर्वक जीने में समर्थ बनाता है। उसके सामर्थ्य और उसकी अविनाशी जीवन-शक्ति के सहारे मनुष्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहा है जबकि परमेश्वर के जीवन का सामर्थ्य मनुष्यों के बीच निरंतर सहारा देता रहा है, और परमेश्वर ने वह कीमत चुकाई है जो किसी साधारण मनुष्य ने कभी नहीं चुकाई। परमेश्वर की जीवन-शक्ति किसी भी सामर्थ्य पर भारी है; इससे भी अधिक, यह किसी भी सामर्थ्य से बढ़कर है। उसका जीवन अनंत है, उसका सामर्थ्य असाधारण है और उसकी जीवन-शक्ति को कोई भी सृजित प्राणी या शत्रु शक्ति दबा नहीं सकती। परमेश्वर की जीवन-शक्ति हर समय और हर स्थान पर विद्यमान रहती है और तेज चमक बिखेरती है। स्वर्ग और पृथ्वी में जबरदस्त बदलाव हो सकते हैं, परंतु परमेश्वर का जीवन हमेशा एक-समान रहता है। हर चीज का अस्तित्व समाप्त हो सकता है, परंतु परमेश्वर के जीवन का अस्तित्व फिर भी रहेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर सभी चीजों के जीवित रहने का स्रोत और मूल है जिस पर सभी चीजें जीवित रहने के लिए निर्भर करती हैं। मनुष्य का जीवन परमेश्वर से उत्पन्न होता है, स्वर्ग का अस्तित्व परमेश्वर के कारण है और पृथ्वी का बचे रहना भी परमेश्वर के जीवन के सामर्थ्य से उत्पन्न होता है। कोई भी जीवित वस्तु परमेश्वर की संप्रभुता से परे नहीं जा सकती और जीवन शक्ति से युक्त कोई भी वस्तु परमेश्वर के अधिकार क्षेत्र के दायरे से नहीं बच सकती। इस प्रकार से सभी लोगों को, चाहे वे कोई भी हों, परमेश्वर के प्रभुत्व के आगे आत्मसमर्पण कर देना चाहिए, सभी लोगों को परमेश्वर के नियंत्रण के अधीन रहना चाहिए, और उनमें से कोई भी उसके हाथों से बच नहीं सकता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है
584. जब से परमेश्वर ने सभी चीजों का सृजन किया है, तब से वे उसके द्वारा स्थापित व्यवस्थाओं के अनुसार सुव्यवस्थित तरीके से काम कर रही हैं और आगे बढ़ रही हैं। परमेश्वर की दृष्टि और उसकी संप्रभुता के अधीन, सभी चीजें मानवजाति के अस्तित्व के साथ-साथ सुव्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ रही हैं। ऐसी कोई भी चीज नहीं है जो इन व्यवस्थाओं को बदल सके या नष्ट कर सके। परमेश्वर की संप्रभुता के कारण ही सभी चीजें फल-फूल सकती हैं, और उसकी संप्रभुता और प्रबंधन के कारण ही सभी चीजें जीवित रह सकती हैं। इसलिए, परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सुव्यवस्थित तरीके से उत्पन्न होती हैं, फलती-फूलती हैं, गायब हो जाती हैं और फिर से उभर आती हैं। जब बसंत का आगमन होता है, रिमझिम बारिश ताजे मौसम का एहसास लेकर आती है और पृथ्वी को गीला कर देती है। जमीन नर्म पड़ने लगती है, मिट्टी के भीतर से घास निकल आती है और अंकुरित होना शुरू कर देती है, और वृक्ष धीरे-धीरे हरे हो जाते हैं। ये सभी जीवित चीजें पृथ्वी पर नई जीवन-शक्ति लेकर आती हैं। ऐसा ही दिखता है, जब सभी प्राणी अस्तित्व में आते और फलते-फूलते हैं। सभी तरह के जानवर बसंत की गर्माहट महसूस करने के लिए अपनी माँदों से बाहर निकल आते हैं और एक नए वर्ष की शुरुआत करते हैं। ग्रीष्म ऋतु में सभी प्राणी धूप सेंकते हैं और मौसम द्वारा लाई गई गर्माहट का आनंद लेते हैं। वे तेजी से बढ़ते हैं। पेड़, घास और सभी तरह के पौधे तब तक तेजी से बढ़ते हैं, जब तक अंततः उन पर फूल नहीं खिल जाते और फल नहीं लग जाते। ग्रीष्म ऋतु के दौरान मनुष्य समेत सभी प्राणी बहुत व्यस्त रहते हैं। पतझड़ में बारिश शरद ऋतु की ठंडक लेकर आती है, और सभी प्रकार के जीव फसलों की कटाई के मौसम का आगमन महसूस करने लगते हैं। सभी जीव फल उत्पन्न करते हैं, और मनुष्य शीत ऋतु की तैयारी में भोजन की व्यवस्था करने के लिए इन विभिन्न प्रकार के फलों की तुड़ाई करना शुरू कर देते हैं। शीत ऋतु में ठंड आने के साथ सभी जीव धीरे-धीरे शांत होकर आराम करने लगते हैं, और लोग भी इस मौसम के दौरान विराम ले लेते हैं। एक मौसम से लेकर दूसरे मौसम तक, बसंत से ग्रीष्म में, ग्रीष्म से शरद में और शरद से शीत में जाना—ये सभी बदलाव परमेश्वर द्वारा स्थापित व्यवस्थाओं के अनुसार होते हैं। वह इन व्यवस्थाओं का उपयोग करके सभी चीजों और मानवजाति की अगुआई करता है और उसने मानवजाति के लिए एक समृद्ध और खुशनुमा जीवन-शैली ईजाद की है, उसके अस्तित्व के लिए एक ऐसा परिवेश तैयार किया है जिसमें अलग-अलग तापमान और ऋतुएँ हैं। इसलिए, इस जीवित रहने के इस सुव्यवस्थित परिवेश के अंतर्गत मनुष्य व्यवस्थित तरीके से जीवित रह सकते हैं और वंश-वृद्धि कर सकते हैं। कोई भी व्यक्ति इन व्यवस्थाओं को बदल नहीं सकता और न ही कोई व्यक्ति या चीज इनसे अलग हो सकती है। दुनिया में चाहे कितनी भी बड़ी उथल-पुथल या उलटफेर क्यों न हों, ये व्यवस्थाएँ हमेशा मौजूद रहती हैं। उनका अस्तित्व परमेश्वर के अस्तित्व, परमेश्वर की संप्रभुता और परमेश्वर के प्रबंधन के कारण है। ऐसे सुव्यवस्थित समग्र परिवेश के साथ, लोगों का जीवन इन व्यवस्थाओं और नियमों के भीतर चलता है। लोगों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन व्यवस्थाओं के अधीन पली-बढ़ी है, और लोगों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी इनके अधीन जीवित रही है। लोगों ने सभी चीजों और जीवित रहने के इस सुव्यवस्थित परिवेश का आनंद लिया है, जिसे परमेश्वर ने मानवजाति की पीढ़ी-दर-पीढ़ी के लिए सृजित किया है। भले ही लोग सोचते हैं कि ये व्यवस्थाएँ स्वाभाविक रूप से मौजूद हैं और वे उन्हें उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं, और भले ही वे यह महसूस नहीं कर पाते कि परमेश्वर इन व्यवस्थाओं का आयोजन कर रहा है, परमेश्वर इन व्यवस्थाओं पर संप्रभु है, चाहे जो भी हो, परमेश्वर हमेशा इस अपरिवर्तनीय कार्य में लगा हुआ है। इस अपरिवर्तनीय कार्य को करने का उसका उद्देश्य मानवजाति का जीवित रहना और मानवजाति की निरंतरता है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
585. परमेश्वर उन नियमों का स्वामी है, जो सभी चीज़ों के संचालन को नियंत्रित करते हैं; वह उन नियमों का स्वामी है, जो सभी प्राणियों के अस्तित्व को नियंत्रित करते हैं; वह सभी चीज़ों को नियंत्रित करता है और उन्हें इस तरह रखता है कि वे एक-दूसरे को मजबूत भी करें और परस्पर निर्भर भी बनाएँ, ताकि वे नष्ट या विलुप्त न हों। केवल इसी तरह मनुष्य जीवित रह सकते हैं; केवल इसी तरह वे परमेश्वर के मार्गदर्शन में ऐसे परिवेश में रह सकते हैं। परमेश्वर संचालन के इन नियमों का संप्रभु है, और कोई भी इनमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता, न कोई इन्हें बदल ही सकता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही इन नियमों को जानता है और केवल वही इनका प्रबंध करता है। पेड़ कब अंकुरित होंगे; बारिश कब होगी; धरती कितना जल एवं कितने पोषक तत्त्व पौधों को देगी; किस मौसम में पत्ते गिरेंगे; किस मौसम में पेड़ों पर फल लगेंगे; कितने पोषक तत्त्व सूर्य का प्रकाश पेड़ों को देगा; सूर्य के प्रकाश द्वारा पोषित किए जाने के बाद पेड़ उच्छ्वास के रूप में क्या छोड़ेंगे—इन सभी चीज़ों को परमेश्वर ने पहले ही तब निश्चित कर दिया था, जब उसने सभी चीज़ों को बनाया था, उन नियमों के रूप में जिन्हें कोई नहीं तोड़ सकता। परमेश्वर द्वारा बनाई हुई चीज़ें—चाहे वे जीवित हों या मनुष्य की दृष्टि में निर्जीव, उसके हाथ में रहती हैं, जहाँ वह उन्हें नियंत्रित करता है और उन पर संप्रभुता रखता है। इन नियमों को कोई बदल या तोड़ नहीं सकता। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों का निर्माण किया था, तब उसने पूर्वनिर्धारित किया कि धरती के बिना पेड़ अपनी जड़ें नीचे नहीं फैला सकता, अंकुरित नहीं हो सकता और बढ़ नहीं सकता; कि यदि धरती पर कोई पेड़ न होता, तो वह सूख जाती; कि पेड़ को चिड़ियों का आशियाना भी होना चाहिए, और एक ऐसी जगह, जहाँ वे हवाओं से बचने के लिए आश्रय ले सकें। क्या कोई पेड़ धरती के बिना जी सकता है? बिल्कुल नहीं। क्या वह सूरज या बारिश के बिना जी सकता है? वह इनके बिना भी नहीं जी सकता। ये सब चीज़ें मानव-जाति के लिए, उसके अस्तित्व के लिए हैं। पेड़ से मनुष्य ताजी हवा प्राप्त करता है, और वह धरती पर रहता है, जिसकी पेड़ों द्वारा रक्षा की जाती है। मनुष्य सूर्य की रोशनी और विभिन्न प्राणियों के बिना नहीं रह सकता। हालाँकि ये संबंध जटिल हैं, फिर भी तुम्हें यह याद रखना चाहिए : परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों का नियम यह है कि वे एक-दूसरे को मजबूत करती हैं, एक-दूसरे पर निर्भर रहती हैं, और एक-साथ मौजूद रहती हैं। दूसरे शब्दों में, उसके द्वारा बनाई गई हर-एक चीज़ का अपने अस्तित्व में मूल्य और महत्व है। यदि परमेश्वर ने कोई चीज़ बिना किसी महत्व के बनाई होती, तो परमेश्वर उसे लुप्त होने देता। यह उन तरीकों में से एक है, जिसे परमेश्वर सभी चीज़ों को पोषण प्रदान करने में इस्तेमाल करता है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
586. जब परमेश्वर ने सभी चीजों की सृष्टि की, तो उसने उन्हें संतुलित करने के लिए, पहाड़ों और झीलों, पौधों और सभी प्रकार के पशुओं, पक्षियों, कीड़ों-मकोड़ों के निवास की स्थितियाँ संतुलित करने के लिए सभी प्रकार की पद्धतियों और तरीकों का उपयोग किया। उसका लक्ष्य सभी प्रकार के प्राणियों को उन व्यवस्थाओं के अंतर्गत जीने और वंश-वृद्धि करने देना था, जिन्हें उसने स्थापित किया था। सृष्टि की कोई भी चीज इन व्यवस्थाओं के बाहर नहीं जा सकती, और व्यवस्थाएँ तोड़ी नहीं जा सकतीं। केवल इस प्रकार के आधारभूत परिवेश के अंतर्गत ही मनुष्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रूप से जीवित रह सकते हैं और वंश-वृद्धि कर सकते हैं। अगर कोई प्राणी परमेश्वर द्वारा स्थापित मात्रा या दायरे से बाहर जाता है, या वह उसके द्वारा निर्दिष्ट वृद्धि-दर, प्रजनन-आवृत्ति या संख्या पार कर जाता है, तो मानवजाति का जीवन-परिवेश विभिन्न मात्राओं में विनाश भुगतेगा। और साथ ही, मानवजाति का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। अगर किसी एक प्रकार का प्राणी संख्या में बहुत अधिक हो जाता है, तो वह लोगों का भोजन छीन लेगा, उनके जल-स्रोत नष्ट कर देगा, और उनके निवास-स्थान बरबाद कर देगा। इस तरह, मनुष्य का प्रजनन या उसके अस्तित्व की स्थिति तुरंत प्रभावित होगी। ... अगर केवल एक या फिर अनेक प्रकार के प्राणी अपनी उपयुक्त संख्या से आगे बढ़ जाते हैं, तो मानवजाति के अस्तित्व के स्थान के भीतर की हवा, तापमान, आर्द्रता, यहाँ तक कि हवा की संरचना भी विभिन्न मात्राओं में विषाक्त और नष्ट हो जाएगी। इन परिस्थितियों में मनुष्यों का अस्तित्व और उसकी नियति भी इन पारिस्थितिक कारकों से उत्पन्न खतरों में पड़ जाएगी। इसलिए, अगर ये संतुलन बिगड़ जाते हैं, तो वह हवा जिसमें लोग साँस लेते हैं, खराब हो जाएगी, वह जल जो वे पीते हैं, दूषित हो जाएगा, और वह तापमान जिसकी उन्हें जरूरत है, वह भी विभिन्न मात्राओं में परिवर्तित और प्रभावित होगा। अगर ऐसा होता है, तो वे जीवन-परिवेश, जो स्वभावतः मानवजाति के हैं, बहुत बड़े प्रभावों और चुनौतियों के अधीन हो जाएँगे। मनुष्यों के आधारभूत जीवन-परिवेशों के नष्ट हो जाने के इस प्रकार के परिदृश्य में मानवजाति की नियति और भविष्य की संभावनाएँ क्या होंगी? यह एक बहुत गंभीर समस्या है! चूँकि परमेश्वर जानता है कि किस कारण से सृष्टि की प्रत्येक चीज मानवजाति के लिए अस्तित्व में है, उसके द्वारा सृजित हर प्रकार की चीज की क्या भूमिका है, हर चीज लोगों पर कैसा प्रभाव डालती है, और वह मानवजाति को कितना लाभ पहुँचाती है, चूँकि परमेश्वर के हृदय में इस सबके लिए एक योजना है और वह स्वयं द्वारा सृजित सभी चीजों के हर पहलू का प्रबंधन करता है, इसलिए हर चीज जो वह करता है, मनुष्य के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण और जरूरी है। इसलिए अब से जब तुम परमेश्वर द्वारा सृजित चीजों के मध्य कोई पारिस्थितिक घटना घटित होते देखो या परमेश्वर द्वारा सृजित चीजों के मध्य किसी प्राकृतिक नियम को कार्य करते देखो, तो परमेश्वर द्वारा सृजित किसी भी चीज की अनिवार्यता के बारे में कोई संदेह मत करना। अब तुम सभी चीजों के बारे में परमेश्वर की व्यवस्थाओं पर और मानवजाति का पोषण करने के उसके विभिन्न तरीकों पर मनमानी आलोचना करने के लिए अज्ञानता भरे शब्दों का उपयोग नहीं करोगे। न ही तुम परमेश्वर की सृष्टि की सभी चीजों के लिए उसकी व्यवस्थाओं पर मनमाने ढंग से निष्कर्ष नहीं निकालोगे।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
587. अगर सृष्टि की सभी चीजें अपनी व्यवस्थाएँ खो दें, तो उनका अस्तित्व नहीं रहेगा; अगर सभी चीजों की व्यवस्थाएँ लुप्त हो जाएँ, तो सभी चीजों के बीच जीव बचे नहीं रह पाएँगे। मानवजाति भी अपना वह परिवेश गँवा देगी, जिस पर वह जीवित रहने के लिए निर्भर है। अगर मनुष्य यह सब गँवा दें, तो वे जीवित नहीं रह पाएँगे, जैसे कि वे रहते आए हैं, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी फल-फूल नहीं पाएँगे और वंश-वृद्धि नहीं कर पाएँगे। मनुष्य आज तक जिंदा बचे हुए हैं, तो उसका कारण यह है कि परमेश्वर ने उनका पोषण करने, मनुष्यों का विभिन्न तरीकों से पालन-पोषण करने के लिए उन्हें सृष्टि की सभी चीजें प्रदान की हैं। परमेश्वर द्वारा विभिन्न तरीकों से मानवजाति का पालन-पोषण करने के कारण ही वह आज तक जीवित बची हुई है। जीवित रहने के ऐसे निश्चित परिवेश के कारण, जो कि अनुकूल हैं और जिसमें प्राकृतिक व्यवस्थाएँ सुव्यवस्थित हैं, पृथ्वी पर सभी प्रकार के लोग, सभी प्रकार की नस्लें अपने निर्धारित क्षेत्रों के भीतर जीवित रह सकती हैं। कोई भी इन क्षेत्रों या अपने बीच की इन सीमाओं से बाहर नहीं जा सकता, क्योंकि यह परमेश्वर है, जिसने इन्हें खींचा है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
588. आध्यात्मिक क्षेत्र एक महत्वपूर्ण स्थान है, जो भौतिक संसार से भिन्न है। मैं क्यों कहता हूँ कि वह महत्वपूर्ण है? हम उसके बारे में विस्तार से बात करने जा रहे हैं। आध्यात्मिक क्षेत्र का अस्तित्व मनुष्य के भौतिक संसार से अभिन्न रूप से जुड़ा है। सभी चीजों के ऊपर परमेश्वर के प्रभुत्व में वह मनुष्य के जीवन और मृत्यु के चक्र में एक बड़ी भूमिका निभाता है; यह उसकी भूमिका है, और यह उन कारणों में से एक है जिससे उसका अस्तित्व महत्वपूर्ण है। क्योंकि वह एक ऐसा स्थान है, जो पाँच इंद्रियों के लिए अगोचर है, कोई भी सही-सही अनुमान नहीं लगा सकता कि आध्यात्मिक क्षेत्र का अस्तित्व है या नहीं। इसके विभिन्न गत्यात्मक पहलू मनुष्य के अस्तित्व के साथ घनिष्ठता से जुड़े हैं, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य के जीवन की व्यवस्था भी आध्यात्मिक क्षेत्र से बेहद प्रभावित होती है। इसमें परमेश्वर की संप्रभुता शामिल है या नहीं? शामिल है। जब मैं ऐसा कहता हूँ, तो तुम लोग समझ जाते हो कि मैं क्यों इस विषय पर चर्चा कर रहा हूँ : ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह परमेश्वर की संप्रभुता से और साथ ही उसके प्रशासन से संबंधित है। इस तरह के संसार में—जो लोगों के लिए अदृश्य है—उसकी हर स्वर्गिक आज्ञा, आदेश और प्रशासनिक प्रणाली भौतिक संसार के किसी भी देश की व्यवस्थाओं और प्रणालियों से बहुत ऊपर है, और उस संसार में रहने वाला कोई भी प्राणी उनकी अवहेलना या उल्लंघन करने का साहस नहीं करेगा। क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता और प्रशासन से संबंधित है? आध्यात्मिक क्षेत्र में स्पष्ट प्रशासनिक आदेश, स्पष्ट स्वर्गिक आज्ञाएँ और स्पष्ट विधान हैं। विभिन्न स्तरों पर और विभिन्न क्षेत्रों में सेवक सख्ती से अपने कर्तव्यों का निर्वाह और नियमों-विनियमों का पालन करते है, क्योंकि वे जानते हैं कि किसी स्वर्गिक आज्ञा के उल्लंघन का क्या परिणाम होता है; वे स्पष्ट रूप से अवगत हैं कि किस प्रकार परमेश्वर दुष्टों को दंड और भले लोगों को इनाम देता है, और किस प्रकार वह सभी चीजों को चलाता है, और उन पर शासन करता है। इसके अतिरिक्त, वे स्पष्ट रूप से देखते हैं कि किस प्रकार परमेश्वर अपने स्वर्गिक आदेशों और विधानों को कार्यान्वित करता है। क्या वे उस भौतिक संसार से भिन्न हैं, जिसमें मानवजाति रहती है? वे दरअसल बहुत ज्यादा भिन्न हैं। आध्यात्मिक क्षेत्र एक ऐसा संसार है, जो भौतिक संसार से पूर्णतया भिन्न है। चूँकि वहाँ स्वर्गिक आदेश और विधान हैं, इसलिए यह परमेश्वर की संप्रभुता, प्रशासन, और इसके अतिरिक्त, उसके स्वभाव और स्वरूप को स्पर्श करता है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X
589. परमेश्वर ने आध्यात्मिक क्षेत्र में विभिन्न स्वर्गिक आज्ञाएँ, आदेश और प्रणालियाँ स्थापित की हुई हैं, और एक बार इनकी घोषणा हो जाने के बाद, आध्यात्मिक क्षेत्र के विभिन्न आधिकारिक पदों के प्राणियों द्वारा उन्हें परमेश्वर द्वारा निर्धारित किए अनुसार बहुत कड़ाई से कार्यान्वित किया जाता है, और कोई उनका उल्लंघन करने का साहस नहीं करता। इसलिए, मनुष्य के संसार में मनुष्य के जीवन और मृत्यु के चक्र में, चाहे कोई पशु के रूप में पुनर्जन्म ले या इंसान के रूप में, दोनों के लिए नियम हैं। चूँकि ये नियम परमेश्वर से आते हैं, इसलिए कोई उन्हें तोड़ने का साहस नहीं करता, न ही कोई उन्हें तोडने में समर्थ है। यह केवल परमेश्वर की इस संप्रभुता और ऐसे नियम होने के कारण ही है कि यह भौतिक संसार, जिसे लोग देखते हैं, नियमित और व्यवस्थित है; यह केवल परमेश्वर की इस संप्रभुता के कारण ही है कि मनुष्य उस दूसरे संसार के साथ शांति से रहने में समर्थ हैं, जो उनके लिए पूर्ण रूप से अदृश्य है, और वे इसके साथ समरसता से रहने में सक्षम हैं—जो पूर्ण रूप से परमेश्वर की संप्रभुता से अभिन्न है। व्यक्ति के दैहिक जीवन की मृत्यु के बाद भी आत्मा में जीवन रहता है, और इसलिए अगर वह परमेश्वर के प्रशासन के अधीन न होती तो क्या होता? आत्मा हर जगह भटकती रहती, हर जगह घुसपैठ करती, यहाँ तक कि मनुष्य के संसार में जीवित प्राणियों को भी हानि पहुँचाती। यह हानि केवल मनुष्यों को ही नहीं, बल्कि पौधों और पशुओं को भी पहुँचाई जा सकती थी—लेकिन पहले हानि लोगों को पहुँचती। अगर ऐसा होता—अगर वह आत्मा प्रशासन-रहित होती, वाकई लोगों को हानि पहुँचाती, और वाकई बुरी चीजें करती—तो उस आत्मा से भी आध्यात्मिक क्षेत्र में ठीक से निपटा जाता : अगर चीजें गंभीर होतीं, तो शीघ्र ही आत्मा का अस्तित्व समाप्त हो जाता और उसे नष्ट कर दिया जाता। अगर संभव होता, तो उसे कहीं रख दिया जाता और फिर उसका पुनर्जन्म होता। कहने का आशय है कि आध्यात्मिक क्षेत्र में विभिन्न आत्माओं का प्रशासन व्यवस्थित होता है, और उसे चरणों और नियमों के अनुसार किया जाता है। यह केवल ऐसे प्रशासन के कारण ही है कि मनुष्य के भौतिक संसार में अराजकता नहीं आई है, कि भौतिक संसार के लोगों में एक सामान्य मानसिकता, सामान्य तर्कशक्ति और एक व्यवस्थित दैहिक जीवन है। मनुष्यों में ऐसा सामान्य जीवन होने के बाद ही देह में रहने वाले जीव पीढ़ियों तक पनपते और प्रजनन करते रह सकते हैं।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X
590. किसी जीवित प्राणी की मृत्यु—दैहिक जीवन का अंत—यह दर्शाता है कि वह जीवित प्राणी भौतिक संसार से आध्यात्मिक क्षेत्र में चला गया है, जबकि एक नए दैहिक जीवन का जन्म यह दर्शाता है कि जीवित प्राणी आध्यात्मिक क्षेत्र से भौतिक संसार में आ गया है और उसने अपनी भूमिका ग्रहण करनी और निभानी शुरू कर दी है। चाहे प्राणी का प्रस्थान हो या आगमन, दोनों आध्यात्मिक क्षेत्र के कार्य से अविभाज्य हैं। जब तक कोई व्यक्ति भौतिक संसार में आता है, तब तक परमेश्वर द्वारा आध्यात्मिक क्षेत्र में उचित व्यवस्थाएँ और परिभाषाएँ पहले ही तैयार की जा चुकी होती हैं, जैसे कि वह व्यक्ति किस परिवार में आएगा, किस युग में आएगा, किस समय आएगा, और क्या भूमिका निभाएगा। इसलिए इस व्यक्ति का संपूर्ण जीवन—जो काम वह करता है, और जो मार्ग वह अपनाता है—जरा-से भी विचलन के बिना, आध्यात्मिक क्षेत्र में की गई व्यवस्थाओं के अनुसार चलेगा। इसके अतिरिक्त, दैहिक जीवन जिस समय, जिस तरह और जिस स्थान पर समाप्त होता है, वह आध्यात्मिक क्षेत्र के सामने स्पष्ट और प्रत्यक्ष होता है। परमेश्वर भौतिक संसार पर शासन करता है, और वह आध्यात्मिक क्षेत्र पर भी शासन करता है, और वह किसी आत्मा के जीवन और मृत्यु के साधारण चक्र को विलंबित नहीं करेगा, न ही वह उस चक्र की व्यवस्थाओं में कभी कोई त्रुटि कर सकता है। आध्यात्मिक क्षेत्र के आधिकारिक पदों के सभी परिचारक अपने-अपने कार्य करते हैं, और परमेश्वर के निर्देशों और नियमों के अनुसार वह करते हैं, जो उन्हें करना चाहिए। इस प्रकार, मनुष्य के संसार में, मनुष्य द्वारा देखी जाने वाली हर भौतिक घटना व्यवस्थित होती है, और उसमें कोई अराजकता नहीं होती। यह सब कुछ सभी चीजों पर परमेश्वर के व्यवस्थित शासन की वजह से है, और साथ ही इस तथ्य के कारण है कि उसका अधिकार प्रत्येक वस्तु पर शासन करता है। उसके प्रभुत्व में भौतिक संसार, जिसमें मनुष्य रहता है, के अलावा मनुष्य के पीछे का अदृश्य आध्यात्मिक क्षेत्र भी शामिल है। इसलिए, अगर मनुष्य अच्छा जीवन चाहते हैं, और अच्छे परिवेश में रहने की आशा करते हैं, तो संपूर्ण दृश्य भौतिक संसार प्रदान किए जाने के अलावा उसे वह आध्यात्मिक क्षेत्र भी प्रदान किया जाना चाहिए, जिसे कोई देख नहीं सकता, जो मानवजाति की ओर से प्रत्येक जीवित प्राणी को नियंत्रित करता है और जो व्यवस्थित है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X
591. जिस क्षण तुम रोते हुए इस दुनिया में आते हो उसी पल से तुम अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना शुरू कर देते हो। परमेश्वर की योजना और उसके विधान की खातिर तुम अपनी भूमिका निभाते हो और अपनी जीवन यात्रा शुरू करते हो। तुम्हारी पृष्ठभूमि जो भी हो और तुम्हारी आगे की यात्रा जैसी भी हो, किसी भी स्थिति में कोई भी स्वर्ग के आयोजनों और व्यवस्थाओं से बच नहीं सकता और कोई भी अपनी नियति को नियंत्रित नहीं कर सकता, क्योंकि जो सभी चीजों का संप्रभु है सिर्फ वही ऐसा करने में सक्षम है। मनुष्य के अस्तित्व में आने की शुरुआत से ही परमेश्वर अपने कार्य को हमेशा से इसी ढंग से करता आ रहा है, ब्रह्मांड को सँभाल रहा है और सभी चीजों के लिए परिवर्तन के नियमों और उनकी गतिविधियों के पथ को संचालित कर रहा है। सभी चीजों की तरह मनुष्य भी चुपचाप और अनजाने में परमेश्वर से मिठास, बारिश और ओस से पोषित हो रहा है; सभी चीजों की तरह मनुष्य भी अनजाने में परमेश्वर के हाथ के आयोजन के अधीन रहता है। मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर की मुट्ठी में होते हैं और उसके जीवन की हर चीज परमेश्वर की दृष्टि में रहती है। चाहे तुम यह सब मानो या न मानो, एक-एक चीज, चाहे वह सजीव हो या निर्जीव, परमेश्वर के विचारों के अनुसार ही हरकत करेगी, बदलेगी, नई बनेगी और लुप्त हो जाएगी। परमेश्वर इसी तरह सभी चीजों पर संप्रभु है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है
592. परमेश्वर ने इस संसार की रचना की और इसमें एक जीवित प्राणी, मनुष्य को लेकर आया, जिसे उसने जीवन प्रदान किया। क्रमशः मनुष्य के माता-पिता और परिजन हुए और वह अकेला नहीं रहा। जब से मनुष्य ने पहली बार इस भौतिक दुनिया पर नजरें डालीं, तब से वह परमेश्वर के विधान के भीतर विद्यमान रहने के लिए नियत था। यह परमेश्वर से प्राप्त जीवन की साँस ही है जो हर एक प्राणी के पल-बढ़कर वयस्क होने के पूरे दौरान सहयोग देती है। इस प्रक्रिया के दौरान कोई भी महसूस नहीं करता कि मनुष्य परमेश्वर की देखरेख में अस्तित्व में रहता है और बड़ा होता है, बल्कि यह मानता है कि मनुष्य अपने माता-पिता की परवरिश के अनुग्रह में बड़ा होता है और यह उसकी अपने जीवन की सहज-प्रवृत्ति है जो उसके विकास को संचालित करती है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य नहीं जानता कि उसे जीवन किसने प्रदान किया है या यह कहाँ से आया है, और यह तो वह बिल्कुल भी नहीं जानता कि जीवन की प्रवृत्ति किस तरह से चमत्कार करती है। वह केवल इतना ही जानता है कि भोजन ही वह आधार है जिस पर उसका जीवन चलता रहता है, कि अध्यवसाय ही उसके जीवन के अस्तित्व का स्रोत है, और उसके मन का विश्वास वह पूँजी है जिस पर उसका अस्तित्व निर्भर करता है। परमेश्वर के अनुग्रह और भरण-पोषण के प्रति मनुष्य पूरी तरह से बेखबर है और यही वह तरीका है जिससे वह परमेश्वर द्वारा प्रदान किया गया जीवन गँवा देता है...। जिन मनुष्यों की परमेश्वर दिन-रात निगरानी करता है उनमें से एक भी व्यक्ति उसकी आराधना करने की पहल नहीं करता है। परमेश्वर बस अपनी बनाई योजना के अनुसार उस मनुष्य पर कार्य करता है जिससे कोई अपेक्षा नहीं है। वह ऐसा इस आशा में करता है कि एक दिन मनुष्य अपने सपने से जागेगा और अचानक जीवन के मूल्य और अर्थ को समझेगा, परमेश्वर ने उसे जो कुछ प्रदान किया है, उसके लिए परमेश्वर द्वारा चुकाई गई कीमत और परमेश्वर की उस उत्सुकता को समझेगा जिसके साथ परमेश्वर मनुष्य के वापस अपनी ओर मुड़ने के लिए बेसब्री से लालायित रहता है। ...
इस दुनिया में आने वाले सभी लोगों को जीवन और मृत्यु से गुजरना होता है, और उनमें से अधिकतर मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से गुजर चुके हैं। जो जीवित हैं, वे शीघ्र ही मर जाएँगे और मृत शीघ्र ही लौट आएँगे। यह सब परमेश्वर द्वारा प्रत्येक जीवित प्राणी के लिए व्यवस्थित जीवन यात्रा है। फिर भी यह यात्रा और यह चक्र ठीक वही तथ्य है जिसे परमेश्वर चाहता है कि मनुष्य देखे कि परमेश्वर द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया जीवन निरंतर अविराम रूप से प्रवाहित होने वाला है और भौतिकता, समय या स्थान से मुक्त है। परमेश्वर द्वारा मनुष्य को प्रदान किए गए जीवन का रहस्य ऐसा है और इस बात का प्रमाण है कि जीवन उसी से आया है। यद्यपि हो सकता है कि बहुत-से लोग यह न मानें कि मनुष्य का जीवन परमेश्वर से आया है, फिर भी मनुष्य अनिवार्य रूप से उस सब का आनंद लेता है जो परमेश्वर से आता है, फिर चाहे वह परमेश्वर के अस्तित्व को मानता हो या नकारता हो। यदि किसी दिन परमेश्वर का अचानक मन बदल जाए और वह पृथ्वी पर विद्यमान हर वस्तु को पुनः अपने अधिकार में लेना चाहे और अपना दिया जीवन वापस लेने की इच्छा करे तो कुछ भी नहीं रहेगा। परमेश्वर अपने जीवन का उपयोग सभी चीजों, जीवित और निर्जीव दोनों की आपूर्ति करने के लिए करता है और अपनी सामर्थ्य और अधिकार के बल पर सभी को सुव्यवस्थित करता है—यह एक ऐसा तथ्य है जिसकी कल्पना कोई भी नहीं कर सकता है या जिसे कोई भी समझ नहीं सकता है। ये अबूझ तथ्य परमेश्वर की जीवन-शक्ति की सटीक अभिव्यक्ति और प्रमाण हैं। अब मैं तुम्हें एक रहस्य बताता हूँ : परमेश्वर के जीवन की महानता और उसके जीवन के सामर्थ्य की थाह कोई भी सृजित प्राणी नहीं पा सकता है। यह अभी भी वैसा ही है जैसा अतीत में था और आने वाले समय में भी यह ऐसा ही रहेगा। दूसरा रहस्य जो मैं बताऊँगा वह यह है : सभी प्राणियों के लिए जीवन का स्रोत परमेश्वर से आता है; चाहे वे जीवन-रूप या संरचना में कितने ही भिन्न हों और चाहे वे किसी भी प्रकार के जीव हों, कोई भी प्राणी उस जीवन-पथ का उल्लंघन नहीं कर सकता जिसे परमेश्वर ने निर्धारित किया है। हर हाल में, मेरी बस यह इच्छा है कि मनुष्य इसे समझे : परमेश्वर की देखभाल, सुरक्षा और आपूर्ति के बिना मनुष्य वह सब कुछ प्राप्त नहीं कर सकता जो उसे प्राप्त होना था, फिर चाहे वह कितनी भी तत्परता से कोशिश क्यों न करे या कितना भी कठिन संघर्ष क्यों न करे। परमेश्वर से जीवन की आपूर्ति के बिना मनुष्य जीने का मूल्य और जीवन का अर्थ गँवा देता है। परमेश्वर उस मनुष्य को इतना बेफिक्र कैसे होने दे सकता है, जो लापरवाही से परमेश्वर द्वारा दिए गए जीवन के मूल्य को व्यर्थ गँवा देता है? जैसा कि मैंने पहले कहा है : मत भूलो कि परमेश्वर तुम्हारे जीवन का स्रोत है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है
593. एकमात्र परमेश्वर ही है, जो सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है, और सभी चीजों का संचालन करता है। जो कुछ है वह उसी ने रचा है, और जो कुछ है उसे वही चलाता है; और साथ ही, जो कुछ है उस सब पर वही संप्रभुता रखता है, और जो कुछ है उस सबका भरण-पोषण वही करता है। यह परमेश्वर की हैसियत है और यही उसकी पहचान है। सभी चीजों के लिए और जो कुछ भी है उस सबके लिए, परमेश्वर की असली पहचान सृष्टिकर्ता और संपूर्ण सभी चीजों के संप्रभु की है। परमेश्वर की ऐसी पहचान है और वह सभी चीजों में अद्वितीय है। कोई भी प्राणी—चाहे वह मनुष्यों के बीच हो या आध्यात्मिक क्षेत्र में—परमेश्वर की पहचान और हैसियत का रूप धरने या उसका स्थान लेने के लिए किसी भी साधन या बहाने का उपयोग नहीं कर सकता, क्योंकि सभी चीजों में वही एक है जिसके पास यह पहचान, सामर्थ्य, अधिकार और सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है : हमारा अद्वितीय स्वयं परमेश्वर। वह सभी चीजों के बीच रहता और चलता है; वह सभी चीजों से ऊपर सर्वोच्च स्थान तक भी उठ सकता है। वह स्वयं को दीन बना सकता है और मनुष्य बन सकता है, मांस और लहू से बने मनुष्यों में से एक बन सकता है, लोगों के आमने-सामने आ और उनके सुख-दुःख बाँट सकता है, जबकि साथ ही, वह उस सबको नियंत्रित करता है जो है, और उस सबका भाग्य और वह दिशा निर्धारित करता है, जिस ओर उसे जाना है। इसके अलावा, वह संपूर्ण मानवजाति की नियति का मार्गदर्शन करता है, और मानवजाति जिस दिशा में आगे बढ़ेती है उसे निर्देशित करता है। इस तरह के परमेश्वर की सभी जीवित प्राणियों को आराधना करनी चाहिए, उसके प्रति समर्पित होना चाहिए और उन सभी लोगों द्वारा जाना जाना चाहिए जिनके पास जीवन है। इस प्रकार, चाहे तुम मानवजाति में से जिस भी समूह या जिस भी प्रकार से संबंधित हो, परमेश्वर में विश्वास करना, परमेश्वर का अनुसरण करना, परमेश्वर का भय मानना, उसकी संप्रभुता को स्वीकार करना, और अपनी नियति के लिए उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करना ही किसी भी व्यक्ति के लिए और किसी भी जीवन युक्त प्राणी के लिए एकमात्र विकल्प—आवश्यक विकल्प—है। परमेश्वर की अद्वितीयता में लोग देखते हैं कि उसका अधिकार, उसका धार्मिक स्वभाव, उसका सार, और वे साधन जिनके द्वारा वह सभी चीजों का भरण-पोषण करता है, सभी पूरी तरह से अद्वितीय हैं; यह अद्वितीयता स्वयं परमेश्वर की असली पहचान निर्धारित करती है, और यह उसकी हैसियत भी निर्धारित करती है। इसलिए, सभी प्राणियों के बीच, अगर आध्यात्मिक क्षेत्र में या मनुष्यों के बीच कोई जीवित प्राणी परमेश्वर की जगह खड़ा होने की इच्छा करता है, तो सफलता वैसे ही असंभव होगी, जैसे कि परमेश्वर का रूप धरने का कोई प्रयास। यह तथ्य है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X
594. मेरा अंतिम कार्य केवल मनुष्यों को दंड देने के लिए ही नहीं है, बल्कि मनुष्य की मंजिल की व्यवस्था करने के लिए भी है। इससे भी अधिक, यह सभी लोगों से मेरे कर्म और कार्य स्वीकार करवाने की खातिर है। मैं हर एक मनुष्य को दिखा दूँगा कि जो कुछ मैंने किया है, वह सही है, और वह मेरे स्वभाव की अभिव्यक्ति है, कि यह मनुष्य का कार्य नहीं है, और प्रकृति तो वह बिल्कुल भी नहीं है जिसने मानवजाति की रचना की है, और इसके बजाय यह मैं हूँ जो सभी चीजों में हर जीव का पोषण करता है। मेरे अस्तित्व के बिना मानवजाति केवल नष्ट होगी और आपदा का दंड भोगेगी। कोई भी मानव फिर कभी सुंदर सूर्य और चंद्रमा या हरे-भरे संसार को नहीं देखेगा; मानवजाति केवल काली, शीत रात्रि और मृत्यु की छाया की निर्मम घाटी देखेगी। मैं ही मानवजाति का एकमात्र उद्धार हूँ। मैं ही मानवजाति की एकमात्र आशा हूँ, और इससे भी बढ़कर, मैं ही वह हूँ जिस पर संपूर्ण मानवजाति का अस्तित्व निर्भर करता है। मेरे बिना मानवजाति तुरंत अवरुद्ध हो जाएगी, मेरे बिना मानवजाति केवल बर्बाद कर देने वाला विनाश झेलेगी और सभी प्रकार के भूतों द्वारा कुचली जाएगी, इसके बावजूद कोई मुझ पर ध्यान नहीं देता। मैंने वह काम किया है जो किसी दूसरे के द्वारा नहीं किया जा सकता, और मैं केवल यह आशा करता हूँ कि मनुष्य कुछ अच्छे कर्मों से मुझे प्रतिफल दे सके। यद्यपि कुछ ही लोग मुझे प्रतिफल दे पाए हैं, फिर भी मैं मनुष्यों के संसार में अपनी यात्रा पूरी करूँगा और अपने उस कार्य का अगला कदम आरंभ करूँगा जो अभी खुलने वाला है, क्योंकि इन अनेक वर्षों में मनुष्यों के बीच मेरे आने-जाने की सारी भागदौड़ फलदायक रही है, और मैं अति प्रसन्न हूँ। मैं जिस चीज की परवाह करता हूँ, वह मनुष्यों की संख्या नहीं, बल्कि उनके अच्छे कर्म हैं। किसी भी स्थिति में, मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करोगे। तभी मुझे संतुष्टि होगी; अन्यथा तुम लोगों में से कोई भी उस आपदा के हमले से नहीं बचेगा। आपदा मेरे द्वारा शुरू की जाती है और निश्चित रूप से मेरे द्वारा ही आयोजित की जाती है। यदि तुम लोग मेरी नजरों में अच्छे दिखाई नहीं दे सकते, तो तुम लोग आपदा भुगतने से नहीं बच सकते।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो