11.3. परमेश्वर की पवित्रता पर
569. सबसे पिछड़े और मलिन स्थान पर देहधारी होकर ही परमेश्वर अपने पवित्र और धार्मिक स्वभाव की समग्रता को प्रकट कर सकता है। और उसका धार्मिक स्वभाव किस चीज के जरिए प्रकट होता है? वह उसके द्वारा मनुष्य के पापों का न्याय करने, शैतान का न्याय करने, पाप से घृणा करने और उन शत्रुओं से उसकी घृणा के जरिए प्रकट होता है जो उसका प्रतिरोध और उसके खिलाफ विद्रोह करते हैं। मैं आज जो वचन बोलता हूँ, वे मनुष्य के पापों का न्याय करने के लिए, मनुष्य की अधार्मिकता का न्याय करने के लिए और मनुष्य के विद्रोहीपन को और मनुष्य की कुटिलता और धोखेबाजी को शाप देने के लिए हैं। मनुष्य के शब्दों और कर्मों में जो कुछ भी परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं है उस सबका न्याय होना चाहिए और मनुष्य का समस्त विद्रोहीपन पाप के रूप में ठहराया जाता है। उसके वचन न्याय के सिद्धांतों के इर्द-गिर्द घूमते हैं; वह अपने धार्मिक स्वभाव को प्रकट करने के लिए मनुष्य की अधार्मिकता के न्याय, मनुष्य की विद्रोहशीलता के शाप और मनुष्य के सभी कुरूप चेहरों को उजागर करने का उपयोग करता है। पवित्रता उसके धार्मिक स्वभाव का निरूपण है और दरअसल उसकी पवित्रता उसका धार्मिक स्वभाव है। तुम लोगों के भ्रष्ट स्वभाव आज के वचनों के प्रसंग हैं—मैं उनके अनुसार बोलता हूँ, न्याय करता हूँ और विजय के कार्य को कार्यान्वित करता हूँ। मात्र यही व्यावहारिक कार्य है और केवल इसी तरह से परमेश्वर की पवित्रता पूरी तरह से प्रमुखता पा सकती है। अगर तुममें भ्रष्ट स्वभाव का कोई निशान नहीं है तो परमेश्वर तुम्हारा न्याय नहीं करेगा, न ही वह तुम्हें अपना धार्मिक स्वभाव दिखाएगा। चूँकि तुममें भ्रष्ट स्वभाव हैं, इसलिए परमेश्वर तुम्हें छोड़ेगा नहीं और इसी के जरिए उसकी पवित्रता दिखती है। अगर परमेश्वर देखता कि मनुष्य की मलिनता और विद्रोहशीलता बहुत भयंकर हैं, लेकिन वह न तो बोलता, न तुम्हारा न्याय करता, न तुम्हारी अधार्मिकता के लिए तुम्हें ताड़ना देता, तो इससे यह साबित हो जाता कि वह परमेश्वर नहीं है, क्योंकि उसे पाप से कोई घृणा न होती; वह मनुष्य जितना ही मलिन होता। आज मैं तुम्हारी मलिनता के कारण ही तुम्हारा न्याय कर रहा हूँ, और तुम्हारी भ्रष्टता और विद्रोहशीलता के कारण ही तुम्हें ताड़ना दे रहा हूँ। मैं तुम लोगों के सामने अपने सामर्थ्य की अकड़ नहीं दिखा रहा या जानबूझकर तुम लोगों का दमन नहीं कर रहा; मैं ऐसा इसलिए कर रहा हूँ, क्योंकि इस मलिन धरती पर पैदा हुए तुम लोग मलिनता से बुरी तरह दूषित हो गए हो। तुम लोगों ने गंदी जगहों पर रहने वाले सूअर की तरह अपनी सत्यनिष्ठा और मानवीयता खो दी है। तुम्हारी मलिनता और भ्रष्टता की वजह से ही तुम्हारा न्याय किया जाता है और मैं तुम पर अपना क्रोध बरसाता हूँ। ठीक इन वचनों के न्याय की वजह से ही तुम यह देख पाए हो कि परमेश्वर धार्मिक परमेश्वर है और परमेश्वर पवित्र परमेश्वर है; ठीक अपनी पवित्रता और धार्मिकता की वजह से ही वह तुम लोगों का न्याय करता है और तुम लोगों पर अपना क्रोध बरसाता है; ठीक मानवजाति की विद्रोहशीलता को देखने की वजह से ही वह अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करता है। मानवजाति की मलिनता और भ्रष्टता उसकी पवित्रता को प्रकट करती है। यह दिखाने के लिए यह पर्याप्त है कि वह स्वयं परमेश्वर है, जो पवित्र और निष्कलंक है और फिर भी मलिनता की धरती पर रहता है। यदि कोई व्यक्ति दूसरों के साथ कीचड़ में लोटता है और उसके बारे में कुछ भी पवित्र नहीं है, और उसके पास कोई धार्मिक स्वभाव नहीं है तो वह मनुष्य की अधार्मिकता का न्याय करने के योग्य नहीं है, न ही वह मनुष्य पर न्याय को कार्यान्वित करने के योग्य है। जो लोग एक-दूसरे के समान ही मलिन हैं, वे अपने जैसे लोगों का न्याय करने के योग्य कैसे हो सकते हैं? केवल स्वयं पवित्र परमेश्वर ही पूरी मलिन मानवजाति का न्याय कर सकता है। मनुष्य के पापों का न्याय मनुष्य कैसे कर सकता है? मनुष्य के पाप मनुष्य कैसे देख सकता है और मनुष्य किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के योग्य कैसे हो सकता है? अगर परमेश्वर मनुष्य के पापों का न्याय करने योग्य न होता, तो वह स्वयं धार्मिक परमेश्वर कैसे हो सकता था? चूँकि लोग भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं, इसलिए उनका न्याय करने के लिए परमेश्वर बोलता है और केवल तभी वे देख पाते हैं कि वह एक पवित्र परमेश्वर है। परमेश्वर मनुष्य के पापों के कारण उसका न्याय करता है और उसे ताड़ना देता है और इन पापों को उजागर करता है। इस न्याय से न कोई व्यक्ति बच सकता है, न ही कोई चीज। जो कुछ भी मलिन है, उस सबका वह न्याय करता है। केवल इसी तरह से प्रकट होता है कि परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है। अगर इससे अलग कुछ होता, तो यह कैसे कहा जा सकता था कि तुम लोग नाम और तथ्य दोनों से विषमता हो?
... परमेश्वर की पवित्रता मलिनता की धरती से आए लोगों के माध्यम से स्पष्ट होती है; आज वह मलिनता की धरती के इन लोगों में प्रकट होने वाली मलिनता का इस्तेमाल करता है, वह न्याय करता है और ऐसा करते समय उसके न्याय में उसका स्वरूप प्रकट होता है। वह न्याय क्यों करता है? वह न्याय के वचन इसलिए बोल पाता है, क्योंकि वह पाप से अत्यधिक घृणा करता है; अगर वह मनुष्य की विद्रोहशीलता से घृणा न करता, तो वह इतना क्रोधित कैसे हो सकता था? अगर उसके अंदर अत्यधिक घृणा न होती, कोई नफरत न होती, अगर वह लोगों की विद्रोहशीलता की ओर कोई ध्यान न देता, तो इससे वह मनुष्य जितना ही मलिन प्रमाणित हो जाता। वह मनुष्य का न्याय और उसकी ताड़ना इसलिए कर सकता है, क्योंकि उसे मलिनता से घृणा है, और जिस मलिनता से वह अत्यधिक घृणा करता है, वह उसके अंदर नहीं है। अगर उसके अंदर भी प्रतिरोध और विद्रोहशीलता होती, तो वह प्रतिरोधी और विद्रोही लोगों से अत्यधिक घृणा न करता। अगर अंत के दिनों का कार्य अभी भी इस्राएल में किया गया होता, तो उसका कोई मतलब न होता। अंत के दिनों का कार्य सबसे अंधकारमय और सबसे पिछड़े स्थान चीन में ही क्यों किया जा रहा है? यह सब परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता प्रकट करने के लिए है। संक्षेप में, स्थान जितना अधिक अंधकारमय होता है, परमेश्वर की पवित्रता उतनी ही अधिक प्रकट की जा सकती है। दरअसल, यह सब परमेश्वर के कार्य के लिए है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय-कार्य के दूसरे चरण के प्रभावों को कैसे प्राप्त किया जाता है
570. मैंने लंबे समय से दुष्ट आत्माओं के विभिन्न दुष्कर्मों को स्पष्ट रूप से देखा है। और दुष्ट आत्माओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले लोगों (गलत इरादों वाले लोग, जो देह-सुख या धन की लालसा करते हैं, जो खुद को ऊंचा उठाते हैं, जो कलीसिया को बाधित करते हैं, आदि) की असलियत भी मैं स्पष्ट रूप से जान गया हूँ। यह मत समझो कि दुष्ट आत्माओं को बाहर निकालते ही सब कुछ खत्म हो जाता है। मैं तुम्हें बता दूँ! अब से, मैं इन लोगों का एक-एक करके निपटारा करूँगा, कभी उनका उपयोग नहीं करूँगा! कहने का तात्पर्य है, दुष्ट आत्माओं द्वारा भ्रष्ट किसी भी व्यक्ति का उपयोग मेरे द्वारा नहीं किया जाएगा, और उसे बाहर निकाल दिया जाएगा! ऐसा मत सोचना कि मैं भावनाविहीन हूँ! जान लो! मैं पवित्र परमेश्वर हूँ, और मैं एक गंदे मंदिर में नहीं रहूँगा! मैं केवल ईमानदार और बुद्धिमान लोगों का उपयोग करता हूँ जो मेरे प्रति पूरी तरह वफ़ादार और मेरे बोझ के प्रति विचारशील हो सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों को मेरे द्वारा पूर्वनिर्धारित किया गया था। कोई भी दुष्ट आत्मा उनपर बिलकुल काम नहीं करता है। मुझे यह बात स्पष्ट करने दो : अब से, जिन सब लोगों के पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, उनके पास दुष्ट आत्माओं का काम है। मैं एक बार फिर बता दूँ : मैं एक भी ऐसे व्यक्ति को नहीं चाहता जिसपर दुष्ट आत्माएँ काम करती हैं। वे सभी अपनी देह के साथ नरक में डाल दिए जाएँगे!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 76
571. परमेश्वर के आत्मा द्वारा धारण की हुई देह परमेश्वर की अपनी देह है। परमेश्वर का आत्मा सर्वोच्च है; वह सर्वशक्तिमान, पवित्र और धार्मिक है। इसी तरह, उसकी देह भी सर्वोच्च, सर्वशक्तिमान, पवित्र और धार्मिक है। इस तरह की देह केवल वह करने में सक्षम है जो मानवजाति के लिए धार्मिक और लाभकारी है, वह जो पवित्र, महिमामय और प्रतापी है; वह ऐसी किसी भी चीज को करने में असमर्थ है जो सत्य का उल्लंघन करती हो, नैतिक न्याय का उल्लंघन करती हो, वह ऐसी किसी चीज को करने में तो और भी समर्थ नहीं है जो परमेश्वर के आत्मा के साथ विश्वासघात कर दे। परमेश्वर का आत्मा पवित्र है और इसलिए उसकी देह शैतान द्वारा भ्रष्ट नहीं की जा सकती; उसकी देह का सार मनुष्य की देह के सार से भिन्न है। क्योंकि यह परमेश्वर नहीं बल्कि मनुष्य है जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया है और शैतान का स्वयं परमेश्वर की देह को भ्रष्ट करना संभव नहीं हो सकता। इस प्रकार, इस तथ्य के बावजूद कि मनुष्य और मसीह एक ही स्थान में रहते हैं, वह केवल मनुष्य ही है जिसे शैतान कब्जे में कर सकता है, जिसका वह उपयोग कर सकता है और जिसे शैतान की चालों से नुकसान होता है। इसके विपरीत, मसीह शैतान की भ्रष्टता के प्रति शाश्वत रूप से अभेद्य है, क्योंकि शैतान कभी भी उच्चतम स्थान तक आरोहण करने में सक्षम नहीं होगा और कभी भी परमेश्वर के निकट नहीं पहुँच पाएगा। आज, तुम सभी लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि यह केवल शैतान द्वारा भ्रष्ट मानवजाति ही है जो मेरे साथ विश्वासघात करती है। विश्वासघात ऐसा मुद्दा कभी नहीं होगा जिसमें मसीह थोड़ा-भी शामिल हो।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2)
572. स्वयं परमेश्वर में विद्रोहीपन के तत्व नहीं होते; उसका सार अच्छा है। वह समस्त सुंदरता और अच्छाई की और साथ ही समस्त प्रेम की अभिव्यक्ति है। यहाँ तक कि देह में भी परमेश्वर ऐसा कुछ नहीं करता जो परमपिता परमेश्वर से विद्रोह का सूचक हो। यहाँ तक कि अपने जीवन का बलिदान करने की क़ीमत पर भी वह ऐसा करने को पूरे मन से तैयार रहेगा और कोई दूसरा मन नहीं बनाएगा। परमेश्वर में आत्मतुष्टि और ख़ुदगर्ज़ी के या दंभ या घमंड के तत्व नहीं हैं; उसमें कुटिलता का कोई तत्व नहीं है। जो कुछ भी परमेश्वर से विद्रोह का सूचक है, वह शैतान से आता है; शैतान समस्त कुरूपता और बुराई का स्रोत है। इसका कारण कि मनुष्य में वही गुण हैं जो शैतान में हैं, यह है कि मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट और संसाधित किया गया है। मसीह को शैतान द्वारा भ्रष्ट नहीं किया गया है, अतः उसके पास केवल परमेश्वर के गुण हैं तथा शैतान का एक भी गुण नहीं है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है
573. “परमेश्वर की पवित्रता” का अर्थ है कि परमेश्वर का सार दोषरहित है, परमेश्वर का प्रेम निस्स्वार्थ है, जो कुछ परमेश्वर मनुष्य को प्रदान करता है वह निस्स्वार्थ है, और तुम लोग जान लोगे कि परमेश्वर की पवित्रता की आलोचना करना असंभव और पहुँच से बाहर की बात है। परमेश्वर के सार के ये पहलू ऐसे शब्द नहीं हैं जिन्हें वह अपनी पहचान का दिखावा करने के लिए उपयोग करता हो, बल्कि परमेश्वर हर एक व्यक्ति के साथ शांत और सच्चे ढंग से व्यवहार करने के लिए अपने सार का उपयोग करता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का सार खोखला नहीं है, न ही यह कोई सिद्धांत या धर्म-सिद्धांत है, यह किसी प्रकार का ज्ञान तो और भी नहीं है। यह मनुष्य के लिए किसी प्रकार की शिक्षा नहीं है; बल्कि यह परमेश्वर के अपने कार्यकलापों का सच्चा प्रकाशन और जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है का सार है जो उससे प्रकट हुआ है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
574. परमेश्वर की जिस पवित्रता की मैं बात कर रहा हूँ, उसका क्या अर्थ है? एक पल के लिए इस बारे में सोचो। क्या परमेश्वर की पवित्रता उसकी सच्चाई है? क्या परमेश्वर की पवित्रता उसकी विश्वसनीयता है? क्या परमेश्वर की पवित्रता उसकी निस्स्वार्थता है? क्या यह उसकी विनम्रता है? क्या यह मनुष्य के लिए उसका प्रेम है? परमेश्वर मनुष्य को मुक्त रूप से सत्य और जीवन प्रदान करता है—क्या यही उसकी पवित्रता है? ये सभी हैं। यह सब कुछ, जिसे परमेश्वर प्रकट करता है, अद्वितीय है और यह भ्रष्ट मानवजाति में मौजूद नहीं होता, न ही इसे मानवजाति में देखा जा सकता है। इसका जरा-सा भी नामोनिशान शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट किए जाने की प्रक्रिया के दौरान नहीं देखा जा सकता, न ही शैतान के भ्रष्ट स्वभाव में और न ही शैतान के सार या उसकी प्रकृति में देखा जा सकता है। परमेश्वर का स्वरूप अद्वितीय है; केवल स्वयं परमेश्वर के स्वरूप में ही इस प्रकार का सार होता है। ... पवित्रता का सार सच्चा प्रेम है, लेकिन इससे भी अधिक यह सत्य, धार्मिकता और प्रकाश का सार है। “पवित्र” शब्द केवल तभी उपयुक्त है, जब उसे परमेश्वर के लिए लागू किया जाता है; सृष्टि में कुछ भी “पवित्र” कहलाने के योग्य नहीं है। मनुष्य को यह समझना चाहिए।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
575. जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह संसार का नहीं होता है और संसार का आनंद लेने के लिए वह देह नहीं बनता है। जहाँ कहीं भी उसका कार्य उसके स्वभाव को प्रकट करता है और सबसे अधिक सार्थक होता है, वह उसी स्थान पर जन्म लेता है, फिर चाहे वह भूमि पवित्र हो या गंदी। वह चाहे कहीं भी कार्य करे, वह पवित्र है। दुनिया में सारी चीजें उसके द्वारा बनाई गई थीं, बात बस इतनी है कि वे शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी हैं। लेकिन सभी चीजें अभी भी परमेश्वर की हैं; वे सभी चीजें उसके हाथों में हैं। वह अपनी पवित्रता प्रकट करने के लिए एक गंदी भूमि में आता है और वहाँ कार्य करता है; वह केवल अपने कार्य की खातिर ऐसा करता है, अर्थात् वह ऐसा कार्य करने के लिए अत्यधिक अपमान सहता है, केवल इस गंदी भूमि के लोगों को बचाने के लिए। यह गवाही की खातिर, पूरी मानवजाति की खातिर किया जाता है। ऐसा कार्य लोगों को जो दिखाता है वह है परमेश्वर की धार्मिकता और यह बेहतर ढंग से दिखा पाता है कि परमेश्वर सर्वोच्च है। उसकी महानता और सत्यनिष्ठा उन नीच लोगों के एक समूह के उद्धार में सटीक रूप से प्रकट होती हैं, जिनका अन्य लोग तिरस्कार करते हैं। एक गंदी भूमि में पैदा होना यह साबित नहीं करता कि वह निम्न है; यह तो बस सभी सृजित प्राणियों को उसकी महानता और मानवजाति के लिए उसका सच्चा प्यार देखने देता है। जितना अधिक वह ऐसा करता है, उतना ही अधिक यह मनुष्य के लिए उसके शुद्ध प्रेम, उसके दोषरहित प्रेम को प्रकट करता है। परमेश्वर पवित्र और धार्मिक है, भले ही वह एक गंदी भूमि में पैदा हुआ था और भले ही वह उन लोगों के साथ रहता है जो गंदगी से भरे हुए हैं, ठीक वैसे ही जैसे अनुग्रह के युग में यीशु पापियों के साथ रहता था। क्या उसके कार्य का हर अंश संपूर्ण मानवजाति के जीवित रहने की खातिर नहीं किया जाता? क्या यह सब इसीलिए नहीं है ताकि मानवजाति महान उद्धार प्राप्त कर सके? दो हजार साल पहले, वह अनेक वर्षों तक पापियों के साथ रहा। यह छुटकारे के वास्ते था। आज, वह घिनौने, निम्न लोगों के एक समूह के साथ रह रहा है। यह उद्धार के वास्ते है। क्या उसका सारा कार्य तुम मनुष्यों के लिए नहीं है? यदि मानवजाति को बचाने की बात न होती, तो वह एक चरनी में पैदा होने के बाद इतने वर्षों तक पापियों के साथ क्यों रहता और कष्ट सहता? और यदि मानवजाति को बचाने की बात न होती तो वह क्यों दूसरी बार देह में लौटता, क्यों इस भूमि पर जन्म लेता जहाँ दानव इकट्ठे होते हैं और क्यों इन लोगों के साथ रहता जो शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट किए गए हैं? क्या परमेश्वर निष्ठापूर्ण नहीं है? उसके कार्य का कौन-सा हिस्सा मानवजाति के लिए नहीं रहा है? कौन-सा हिस्सा तुम्हारी नियति के लिए नहीं रहा है? परमेश्वर पवित्र है—यह अपरिवर्तनीय है! वह गंदगी से अदूषित है, भले ही वह एक घिनौनी भूमि में आया है; इस सब का केवल यही अर्थ हो सकता है कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम अत्यंत निःस्वार्थ है और वह जो पीड़ा और अपमान सहता है वह अत्यंत महान है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ
576. तुम्हारे विचार, तुम्हारा चिंतन, तुम्हारा व्यवहार, तुम्हारे शब्द और कर्म—क्या ये सभी अभिव्यक्तियाँ परमेश्वर की धार्मिकता और पवित्रता के लिए विषमता के तुल्य नहीं हैं? क्या तुम लोगों की अभिव्यक्तियाँ परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर किए गए भ्रष्ट स्वभाव की अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं? परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव, साथ ही उसकी पवित्रता, तुम्हारी सोच और विचारों, तुम्हारी प्रेरणाओं और तुममें प्रकट होने वाली भ्रष्टता के माध्यम से प्रकट होती है। परमेश्वर भी गंदगी की भूमि में पैदा हुआ था, फिर भी वह गंदगी से अछूता रहता है। वह तुम्हारी तरह ही गंदी दुनिया में रहता है लेकिन उसके पास विवेक और अंतर्दृष्टि है और वह गंदगी से घृणा करता है। यहाँ तक कि जब तुम्हारे शब्दों और कर्मों की बात आती है, तो तुम उनके भीतर की गंदी चीजों का पता लगाने में सक्षम नहीं हो सकते हो, लेकिन वह पता लगा सकता है और वह उनके बारे में तुम्हें बताता है। तुम्हारी वे पुरानी बातें—तुम्हारे अंदर व्यक्तिगत शोधन, अंतर्दृष्टि और विवेक का अभाव और जीने के तुम्हारे पिछड़े तरीके—उन सबका खुलासा आज के प्रकाशन से किया जा चुका है; केवल परमेश्वर के धरती पर आकर इस तरह काम करने से ही लोग उसकी पवित्रता और धार्मिक स्वभाव का अवलोकन करते हैं। वह तुम्हारा न्याय करता है और तुम्हें ताड़ना देता है, जिससे तुम समझ हासिल कर पाते हो; कभी-कभी तुम्हारी दानवी प्रकृति अभिव्यक्त हो जाती है, और वह उसकी ओर तुम्हारा ध्यान दिलाता है। वह मनुष्य के सार को अच्छी तरह से जानता है। वह तुम लोगों के बीच रहता है, वही खाना खाता है जो तुम खाते हो और वह उसी परिवेश में रहता है—लेकिन फिर भी, वह तुमसे ज़्यादा जानता है; वह तुम्हें उजागर कर सकता है और मानवता के भ्रष्ट सार की असलियत देख सकता है। उसे मनुष्य के सांसारिक आचरण के फलसफों और कुटिलता और धोखेबाजी से ज्यादा किसी चीज़ से घृणा नहीं है। वह लोगों के दैहिक मेलजोल से विशेष रूप से घृणा करता है। वह मनुष्य के सांसारिक आचरण के फलसफों से शायद परिचित न हो, लेकिन वह उन भ्रष्ट स्वभावों को साफ तौर पर देख और उजागर कर सकता है जिन्हें लोग प्रकट करते हैं। वह इन चीज़ों के ज़रिये बोलने और मनुष्य को सिखाने का कार्य करता है; वह इन चीज़ों का इस्तेमाल लोगों का न्याय करने और अपने धार्मिक और पवित्र स्वभाव को प्रकट करने के लिए करता है। इस तरह लोग उसके कार्य के लिए विषमताएँ बन जाते हैं। केवल देहधारी परमेश्वर ही मनुष्य के विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों और शैतान के सभी कुरूप चेहरों को बेनकाब कर सकता है। भले ही वह तुम्हें दंडित नहीं करता, और तुम्हें अपनी धार्मिकता और पवित्रता के लिए बस एक विषमता के रूप में इस्तेमाल करता है, फिर भी तुम शर्मिंदा महसूस करते हो और खुद को छिपाने की जगह नहीं पाते हो, क्योंकि तुम बहुत घिनौने हो। वह उन चीज़ों का इस्तेमाल करते हुए बोलता है, जो मनुष्य में उजागर होती हैं, और केवल इन चीज़ों को उजागर किए जाने पर ही लोग जान पाते हैं कि परमेश्वर कितना पवित्र है। वह लोगों में ज़रा-सी भी अशुद्धता को नज़रंदाज़ नहीं करता है, यहाँ तक कि उनके दिलों के ज़रा-से मलिन विचारों को भी नहीं; अगर लोगों के शब्द और कर्म उसके इरादों के अनुरूप नहीं हैं, तो वह उन्हें माफ नहीं करता। उसके वचनों में मनुष्यों की मलिनता या ऐसी किसी और चीज़ की कोई जगह नहीं है—इन सबको उजागर किया जाना जरूरी है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय-कार्य के दूसरे चरण के प्रभावों को कैसे प्राप्त किया जाता है
577. तुम परमेश्वर को चीज़ों के संबंध में मनुष्यों जैसे विचार रखते नहीं देखोगे, और इतना ही नहीं, उसे तुम चीज़ों को सँभालने के लिए मनुष्य के दृष्टिकोणों, ज्ञान, विज्ञान, दर्शन या कल्पना का उपयोग करते हुए भी नहीं देखोगे। इसके बजाय, परमेश्वर जो कुछ भी करता है और जो कुछ भी वह प्रकट करता है, वह सत्य से जुड़ा है। अर्थात्, उसका कहा हर वचन और उसका किया हर कार्य सत्य से संबंधित है। यह सत्य किसी आधारहीन कल्पना की उपज नहीं है; यह सत्य और ये वचन परमेश्वर द्वारा अपने सार और अपने जीवन के आधार पर व्यक्त किए जाते हैं। चूँकि ये वचन और परमेश्वर द्वारा की गई हर चीज का सार सत्य हैं, इसलिए हम कह सकते हैं कि परमेश्वर का सार पवित्र है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक बात जो परमेश्वर कहता और करता है, वह लोगों के लिए जीवन-शक्ति और प्रकाश लाती है; वह लोगों को सकारात्मक चीजें और उन सकारात्मक चीजों की वास्तविकता देखने में सक्षम बनाती है, और मनुष्यों को राह दिखाती है, ताकि वे सही मार्ग पर चलें। ये सब चीजें परमेश्वर के सार और उसकी पवित्रता के सार द्वारा निर्धारित की जाती हैं।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
578. जब तुम परमेश्वर की पवित्रता को समझने लगते हो, तब तुम वास्तव में परमेश्वर में विश्वास कर सकते हो; जब तुम परमेश्वर की पवित्रता को समझने लगते हो, तब तुम वास्तव में “स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है” शब्दों के सच्चे अर्थ को समझ सकते हो। तब तुम यह कल्पना नहीं करोगे कि चलने के लिए इसके अलावा भी मार्ग हैं जिन्हें तुम चुन सकते हो, और तुम उस हर चीज के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहोगे जिसकी परमेश्वर ने तुम्हारे लिए व्यवस्था की है। चूँकि परमेश्वर का सार पवित्र है, इसलिए इसका अर्थ है कि केवल परमेश्वर ही तुम्हें जीवन के सही, उज्ज्वल मार्ग पर चलने में सक्षम बना सकता है; केवल परमेश्वर ही तुम्हें जीवित रहने का अर्थ समझने में सक्षम बना सकता है; केवल परमेश्वर ही तुम्हें वास्तविक मानवता को जीने में और सत्य को धारण करने और समझने दोनों में सक्षम बना सकता है। केवल परमेश्वर ही तुम्हें सत्य से जीवन प्राप्त करने में सक्षम बना सकता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही तुम्हें बुराई से दूर रहने में सहायता कर सकता है और तुम्हें शैतान की भारी क्षति और नियंत्रण से बचा सकता है। परमेश्वर के अलावा कोई भी और कुछ भी तुम्हें कष्ट के सागर से नहीं बचा सकता, जिससे तुम और कष्ट न सहो। यह परमेश्वर के सार द्वारा निर्धारित किया जाता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही इतने निस्स्वार्थ भाव से तुम्हें बचाता है; केवल परमेश्वर ही बिल्कुल अंत तक तुम्हारे भविष्य के लिए, तुम्हारी नियति के लिए और तुम्हारे जीवन के लिए जिम्मेदार है, और केवल वही तुम्हारे लिए सभी चीजों की व्यवस्था करता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई भी सृजित या गैर-सृजित प्राणी हासिल नहीं कर सकता। चूँकि कोई भी सृजित या गैर-सृजित प्राणी परमेश्वर के सार जैसा सार धारण नहीं कर सकता, इसलिए किसी भी व्यक्ति या चीज में तुम्हें बचाने या तुम्हारी अगुआई करने की क्षमता नहीं है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के सार का यही महत्व है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
579. मैंने पूरे समय मनुष्य के लिए बहुत कठोर मानक रखा है। अगर तुम्हारी वफादारी इरादों और शर्तों के साथ आती है, तो मैं तुम्हारी तथाकथित वफादारी के बिना रहना चाहूँगा, क्योंकि मैं उन लोगों से बेहद घृणा करता हूँ, जो मुझे अपने इरादों से धोखा देते हैं और शर्तों द्वारा मुझसे जबरन वसूली करते हैं। मैं मनुष्य से सिर्फ यही चाहता हूँ कि वह मेरे प्रति पूरी तरह से वफादार हो और सभी चीजें एक ही शब्द—आस्था—की खातिर और इसे साबित करने के लिए करे। मैं तुम्हारे द्वारा मुझे प्रसन्न करने की कोशिश करने के लिए की जाने वाली खुशामद से नफरत करता हूँ, क्योंकि मैंने हमेशा तुम लोगों के साथ सच्चाई से व्यवहार किया है, और इसलिए मैं तुम लोगों से भी यही चाहता हूँ कि तुम भी मेरे प्रति एक सच्ची आस्था के साथ कार्य करो।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम सचमुच परमेश्वर के विश्वासी हो?
580. तुम्हें जानना ही चाहिए कि मैं किस प्रकार के लोगों को चाहता हूँ; वे जो गंदे हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, वे जो गंदे हैं उन्हें पवित्र भूमि को अपवित्र करने की अनुमति नहीं है। तुमने भले ही बहुत कार्य किया हो, और कई सालों तक कार्य किया हो, किंतु अंत में तुम अब भी बुरी तरह मैले हो और यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय है कि तुम मेरे राज्य में प्रवेश करना चाहते हो! संसार की रचना से लेकर आज तक, मैंने अपने राज्य में उन्हें कभी ऐसा आसान प्रवेश नहीं दिया जो मेरी चापलूसी करते हैं। यह स्वर्गिक नियम है, और कोई इसे तोड़ नहीं सकता है! तुम्हें जीवन का अनुसरण करना ही चाहिए। आज, जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा वे उसी प्रकार के हैं जैसा पतरस था : ये वे लोग हैं जो स्वयं अपने स्वभाव में बदलाव लाने का अनुसरण करते हैं और जो परमेश्वर के लिए गवाही देने और सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के लिए तैयार रहते हैं। केवल ऐसे लोगों को ही पूर्ण बनाया जाएगा। यदि तुम केवल पुरस्कारों की प्रत्याशा करते हो और स्वयं अपने जीवन स्वभाव को बदलने का अनुसरण नहीं करते, तो तुम्हारे सारे प्रयास व्यर्थ होंगे—यह अटल सत्य है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है
581. स्वयं परमेश्वर के पास अपने गुण और अस्तित्व है। जो कुछ वह व्यक्त और प्रकट करता है, वह उसके अपने सार और उसकी अपनी पहचान को दर्शाता है। परमेश्वर के पास जो है और जो वह स्वयं है, उसके साथ ही यह सार और पहचान ऐसी चीजें हैं, जिनका स्थान कोई मनुष्य नहीं ले सकता है। उसके स्वभाव में मानवजाति के प्रति उसका प्रेम, मानवजाति के प्रति उसकी दिलासा, मानवजाति के प्रति उसकी नफरत और इससे भी बढ़कर, मानवजाति के बारे में उसकी संपूर्ण समझ शामिल है। जबकि मनुष्य का व्यक्तित्व उल्लासपूर्ण, जीवंत या निष्ठुर हो सकता है। परमेश्वर का स्वभाव वह है जो सभी चीजों और जीवित प्राणियों के संप्रभु के पास होता है; यह वह है जो सृष्टिकर्ता के पास होता है। उसका स्वभाव सम्माननीयता, सामर्थ्य, कुलीनता, महानता और सबसे बढ़कर, सर्वोच्चता को दर्शाता है। उसका स्वभाव अधिकार का प्रतीक है, उस सबका प्रतीक है जो न्यायोचित है, उस सबका प्रतीक है जो सुंदर और अच्छा है। इससे भी बढ़कर, उसका स्वभाव अंधकार या किसी शत्रु-बल से परास्त होने या आक्रमण होने के विरुद्ध सुरक्षा का प्रतीक है, साथ ही यह किसी सृजित प्राणी से अपमानित होने (और अपमान न सहने) के प्रति सुरक्षा का प्रतीक है। उसका स्वभाव सर्वोच्च सामर्थ्य का प्रतीक है। कोई एक या अधिक व्यक्ति उसके कार्य या उसके स्वभाव को बाधित नहीं कर सकते। किंतु मनुष्य का व्यक्तित्व पशुओं से थोड़ा बेहतर होने के प्रतीक से अधिक कुछ नहीं है। मनुष्य के पास या उसका अपना कोई अधिकार नहीं है, कोई स्वायत्तता नहीं है, अपना अतिक्रमण करने की योग्यता नहीं है, बल्कि अपने सार में वह ऐसा है जो हर प्रकार के व्यक्तियों, घटनाओं और वस्तुओं के नियंत्रण में निर्बलतापूर्वक रहता है। परमेश्वर का आनंद न्याय और प्रकाश की उपस्थिति और आविर्भाव के कारण है; अंधकार और बुराई के विनाश के कारण है। उसका आनंद उसके द्वारा मानवजाति के लिए प्रकाश और अच्छा जीवन लाने के कारण है; उसका आनंद न्यायसंगत आनंद है, वह हर सकारात्मक चीज के अस्तित्व का प्रतीक है, और इससे भी बढ़कर, वह मंगल का प्रतीक है। परमेश्वर का क्रोध उसकी मानवजाति को नुकसान पहुँचाने वाली अन्यायपूर्ण चीजों के अस्तित्व और विघ्न-बाधा के कारण है; बुराई और अंधकार के अस्तित्व के कारण है, और ऐसी चीजों के अस्तित्व के कारण है जो सत्य को निकाल बाहर करती हैं, और इनसे भी बढ़कर, उन चीजों के अस्तित्व के कारण है जो अच्छे और सुंदर का विरोध करती हैं। उसका क्रोध इस बात का प्रतीक है कि सभी नकारात्मक चीजें अब अस्तित्व में नहीं हैं, और इससे भी बढ़कर, यह उसकी अंतर्निहित पवित्रता का प्रतीक है। उसका दुःख मानवजाति के कारण है, जिसके लिए उसकी आशाएँ हैं, किंतु जो अंधकार में गिर गई है, ऐसा इसलिए है कि जो कार्य वह मनुष्यों पर करता है, वह उसके इरादों पर खरा नहीं उतर रहा है, जिस मानवजाति से वह प्रेम करता है, उसके सभी मनुष्य रोशनी में नहीं जी सकते। वह मासूम मानवजाति के लिए, ईमानदार किंतु अज्ञानी मनुष्य के लिए, उस मनुष्य के लिए जो अच्छा तो है लेकिन जिसमें अपने स्वतंत्र दृष्टिकोणों की कमी है, दुःख अनुभव करता है। उसका दुःख उसकी अच्छाई और दया का प्रतीक है, सुंदरता और दयालुता का प्रतीक है। उसकी प्रसन्नता बेशक अपने शत्रुओं को हराने और मनुष्यों का सच्चा विश्वास प्राप्त करने से आती है। इससे भी बढ़कर, यह सभी शत्रु शक्तियों के निष्कासन और विनाश से आती है और मनुष्यों द्वारा अच्छा और शांतिपूर्ण जीवन प्राप्त करने से उत्पन्न होती है। परमेश्वर की प्रसन्नता मनुष्य के आनंद के समान नहीं है; बल्कि यह अच्छे फल प्राप्त करने का एहसास है, ऐसा एहसास जो आनंद से भी बढ़कर है। उसकी प्रसन्नता अब से मानवजाति के कष्ट मुक्त होने की प्रतीक है और मानवजाति के प्रकाश के संसार में प्रवेश करने की प्रतीक है। दूसरी ओर, मनुष्यों की समस्त भावनाएँ उनके अपने हितों की खातिर उपजती हैं, न कि न्याय, प्रकाश, या उसके लिए जो कि सुंदर है, और स्वर्ग द्वारा प्रदत्त अनुग्रह के लिए तो और भी नहीं। मानवजाति की भावनाएँ स्वार्थी हैं, वे अंधकार के संसार में रहती हैं और वे परमेश्वर की इच्छा की खातिर नहीं पैदा होतीं; परमेश्वर की योजना के लिए तो बिल्कुल नहीं होतीं। इसलिए मनुष्य और परमेश्वर की तुलना कभी नहीं की जा सकती। परमेश्वर हमेशा सर्वोच्च और हमेशा आदरणीय है, जबकि मनुष्य हमेशा नीच और हमेशा निकम्मा है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर हमेशा खुद को मनुष्यों के लिए समर्पित करता है और खपाता है, जबकि मनुष्य हमेशा अपने लिए माँगता और प्रयास करता है। परमेश्वर सदा से मानवजाति के अस्तित्व के लिए कठिन प्रयास कर रहा है, लेकिन मनुष्य कभी भी न्याय या प्रकाश की खातिर कोई योगदान नहीं करता, और अगर मनुष्य कोई क्षणिक प्रयास करता भी है, तो भी वह हलके-से झटके का भी सामना नहीं कर सकता, क्योंकि मनुष्य का प्रयास हमेशा अपने लिए होता है, दूसरों के लिए नहीं; मनुष्य हमेशा स्वार्थी होता है, जबकि परमेश्वर हमेशा निस्स्वार्थ होता है। परमेश्वर उस सबका स्रोत है जो न्यायसंगत, अच्छा और सुंदर है, जबकि मनुष्य वह है जो सारी कुरूपता और बुराई विरासत में पाता और अभिव्यक्त करता है। परमेश्वर अपने न्याय और सुंदरता के सार को कभी नहीं बदलेगा, जबकि मनुष्य किसी भी समय और किसी भी स्थान पर न्याय से विश्वासघात कर सकता है और परमेश्वर से दूरी बना सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के स्वभाव को समझना बहुत महत्वपूर्ण है
582. अपमान के प्रति परमेश्वर की असहिष्णुता उसका अद्वितीय सार है; परमेश्वर का कोप उसका अद्वितीय स्वभाव है; परमेश्वर का प्रताप उसका अद्वितीय सार है। परमेश्वर के क्रोध के पीछे का सिद्धांत उस पहचान और हैसियत का प्रतिनिधित्व है, जिसे सिर्फ वही धारण करता है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर के सार का एक प्रतीक भी है। परमेश्वर का स्वभाव उसका अपना अंतर्निहित सार है, जो समय के साथ बिल्कुल भी नहीं बदलता है और न ही यह भौगोलिक स्थान के बदल जाने के साथ बदलता है। उसका अंतर्निहित स्वभाव उसका मौलिक सार है, वह चाहे जिस पर भी अपना कार्य करे, उसका सार नहीं बदलता और न ही उसका धार्मिक स्वभाव बदलता है। जब कोई परमेश्वर को क्रोधित करता है, तो वह अपना अंतर्निहित स्वभाव प्रकट करता है; इस समय उसके क्रोध के पीछे का सिद्धांत नहीं बदलता, और न ही उसकी अद्वितीय पहचान और दर्जा बदलते हैं। वह अपने सार में परिवर्तन के कारण या अपने स्वभाव में विभिन्न तत्त्वों के उत्पन्न होने के कारण क्रोधित नहीं होता, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि उसके विरुद्ध मनुष्य का विरोध उसके स्वभाव को ठेस पहुँचाता है। मनुष्य द्वारा परमेश्वर को खुले तौर पर उकसाना परमेश्वर की अपनी पहचान और दर्जे के लिए एक गंभीर चुनौती है। परमेश्वर की नजर में, जब मनुष्य उसे चुनौती देता है, तब मनुष्य उससे संघर्ष कर रहा है और उसके क्रोध की परीक्षा ले रहा होता है। जब मनुष्य परमेश्वर का विरोध करता है, जब मनुष्य परमेश्वर से संघर्ष करता है, जब मनुष्य लगातार उसके क्रोध की परीक्षा लेता है, ठीक उसी समय पाप बेकाबू होकर फैल जाता है—ऐसे ही अवसरों पर परमेश्वर का कोप स्वाभाविक रूप से अपने आपको प्रकट और प्रस्तुत करेगा। इसलिए, परमेश्वर के कोप का प्रकट होना इस बात का प्रतीक है कि समस्त बुरी शक्तियाँ अस्तित्व में नहीं रहेंगी और यह इस बात का प्रतीक है कि सभी विरोधी शक्तियाँ नष्ट कर दी जाएँगी। यह परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव और उसके कोप की अद्वितीयता है। जब परमेश्वर की गरिमा और पवित्रता को चुनौती दी जाती है, जब न्याय की ताकतों को बाधित किया जाता है और मनुष्य द्वारा नहीं देखा जाता है, तो यह ठीक वही समय होता है जब परमेश्वर अपना क्रोध प्रकट करेगा। परमेश्वर के सार के कारण, पृथ्वी पर वे सभी ताकतें जो परमेश्वर से संघर्ष करती हैं, उसके प्रति शत्रुतापूर्ण हैं और उसके साथ प्रतिस्पर्धा करने की कोशिश करती हैं, वे बुरी, भ्रष्ट और अन्यायपूर्ण हैं; वे शैतान से आती हैं और शैतान की हैं। चूँकि परमेश्वर न्यायसंगत, प्रकाश का और पवित्र और निष्कलंक है, इसलिए जब परमेश्वर का क्रोध प्रकट होगा तो सभी चीजें जो बुरी, भ्रष्ट और शैतान की हैं, वे गायब हो जाएँगी।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II