देहधारण
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 99
“देहधारण” परमेश्वर का देह में प्रकट होना है; परमेश्वर सृजित मनुष्यों के मध्य देह की छवि में कार्य करता है। इसलिए, चूँकि वह देहधारी परमेश्वर है, तो उसे सबसे पहले देह होना होगा, सामान्य मानवता वाली देह होना होगा; यह सबसे मौलिक पूर्वापेक्षा है। वास्तव में, परमेश्वर के देहधारण का निहितार्थ यह है कि परमेश्वर देह में रहता और कार्य करता है, परमेश्वर अपने सार में देह बन जाता है, वह एक व्यक्ति बन जाता है। उसके देहधारी जीवन और कार्य को दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है। पहला वह जीवन है जो वह सेवकाई प्रारम्भ करने से पहले जीता है। वह साधारण मानवीय परिवार में, एकदम सामान्य मानवता में रहता है, मानवीय जीवन की सामान्य नैतिकताओं का पालन और मानवीय जीवन की सामान्य व्यवस्थाओं का पालन करता है, उसकी सामान्य मानवीय आवश्यकताएँ होती हैं (भोजन, कपड़ा, आवास, निद्रा), उसमें सामान्य मानवीय कमजोरियाँ और सामान्य मानवीय भावनाएँ होती हैं। दूसरे शब्दों में, इस पहले चरण में वह सभी सामान्य मानवीय क्रियाकलापों में शामिल होते हुए, बिना दिव्यता के, पूरी तरह से सामान्य मानवता में रहता है। दूसरा चरण वह जीवन है जो वह अपनी सेवकाई को आरंभ करने के बाद जीता है। वह अब भी सामान्य मानव-आवरण के साथ, साधारण मानवता में रहता है, और किसी तरह की अलौकिकता का कोई बाहरी चिह्न नहीं देता। फिर भी वह पूरी तरह से अपनी सेवकाई के लिए ही जीता है, और इस दौरान उसकी सामान्य मानवता पूरी तरह से उसकी दिव्यता के सामान्य कार्य को बनाए रखने के लिए अस्तित्व में रहती है, क्योंकि तब तक उसकी सामान्य मानवता उसकी सेवकाई के कार्य को करने में सक्षम होने की स्थिति तक परिपक्व हो चुकी होती है। तो उसके जीवन का दूसरा चरण सामान्य मानवता में अपनी सेवकाई को करना है, जब यह सामान्य मानवता और पूर्ण दिव्यता दोनों का जीवन होता है। अपने जीवन के प्रथम चरण में वह पूरी तरह से साधारण मानवता का जीवन क्यों जीता है, उसका कारण यह है कि उसकी मानवता अभी तक दिव्य कार्य की समग्रता को सँभालने लायक नहीं हो पायी है, अभी तक वह परिपक्व नहीं हुई है; जब उसकी मानवता परिपक्व हो जाती है—यानी, जब वह उसकी सेवकाई का बीड़ा उठा सकती है—तब ही वह जो सेवकाई उसे करनी चाहिए, उसे करने की शुरुआत कर सकता है। चूँकि वह देह है, उसे विकसित होकर परिपक्व होने की आवश्यकता होती है। इसलिए, उसके जीवन का पहला चरण सामान्य मानवता का जीवन होता है, जबकि दूसरे चरण में, उसकी मानवता उसके कार्य का बीड़ा उठाने और उसकी सेवकाई को करने में सक्षम होती है, और इसलिए अपनी सेवकाई के दौरान देहधारी परमेश्वर जिस जीवन को जीता है वह मानवता और पूर्ण दिव्यता दोनों का जीवन होता है। यदि अपने जन्म के समय से ही परमेश्वर का देहधारी शरीर, औपचारिक रूप से अपनी सेवकाई आरंभ कर देता, और वह जो करता उस सबमें अलौकिक चिह्न और चमत्कार शामिल होते, तो उसमें कोई भी दैहिक सार नहीं होता। इसलिए, उसकी मानवता उसके दैहिक सार के लिए अस्तित्व में रहती है; मानवता के बिना कोई देह नहीं हो सकती है और एक मानवता रहित व्यक्ति मनुष्य नहीं होता है। इस तरह, परमेश्वर की देह की मानवता, परमेश्वर के देहधारण का अंतर्भूत गुण है। यह कहना कि “जब परमेश्वर देहधारी होता है तो उसके पास केवल दिव्यता होती है, कोई मानवता नहीं,” ईशनिंदा है, क्योंकि यह वक्तव्य टिक ही नहीं सकता है, और यह देहधारण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। अपनी सेवकाई आरंभ करने के बाद भी, अपना कार्य करते हुए वह बाह्य मानवीय आवरण के साथ ही अपनी दिव्यता में रहता है; बात सिर्फ़ इतनी ही है कि उस समय, उसकी मानवता उसकी दिव्यता को सामान्य देह में कार्य करने देने के एकमात्र प्रयोजन को पूरा करती है। इसलिए कार्य की अभिकर्ता उसकी मानवता में रहने वाली दिव्यता है। कार्य उसकी दिव्यता करती है, न कि उसकी मानवता, मगर यह दिव्यता उसकी मानवता में छिपी रहती है; सार रूप में, उसका कार्य अब भी उसकी संपूर्ण दिव्यता द्वारा ही किया जाता है, न कि उसकी मानवता द्वारा। परन्तु कार्य को करने वाली उसकी देह है। कह सकते हैं कि वह मनुष्य भी है और परमेश्वर भी, क्योंकि परमेश्वर देह में रहने वाला परमेश्वर बन जाता है; उसके पास मानवीय आवरण और मानवीय सार होता है, और उससे भी अधिक उसमें परमेश्वर का सार होता है। चूँकि वह परमेश्वर के सार वाला मनुष्य है, इसलिए वह सभी सृजित मानवों से ऊपर है, ऐसे किसी भी व्यक्ति से ऊपर है जो परमेश्वर का कार्य कर सकता है। तो, उसके समान मानवीय आवरण वाले सभी लोगों में, जिन लोगों में मानवता है, उनमें, एकमात्र वही स्वयं देहधारी परमेश्वर है—अन्य सभी सृजित मानव हैं। यद्यपि उन सभी में मानवता है, किन्तु सृजित मानव में केवल मानवता ही है, जबकि देहधारी परमेश्वर भिन्न है : उसकी देह में न केवल मानवता है, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उसमें दिव्यता भी है। उसकी मानवता उसके देह के बाहरी रूप-रंग में और उसके दिन-प्रतिदिन के जीवन में देखी जा सकती है, किन्तु उसकी दिव्यता को देख पाना मुश्किल है। क्योंकि उसकी दिव्यता केवल तभी व्यक्त होती है जब उसमें मानवता होती है, और यह वैसी अलौकिक नहीं होती जैसी लोग कल्पना करते हैं, इसलिए लोगों के लिए इसे देख पाना बहुत कठिन होता है। आज भी, लोगों के लिए इसकी थाह पाना बहुत कठिन है कि देहधारी परमेश्वर का सार आखिर क्या है। मेरे इतने सारे वचन बोलने के बाद भी, मुझे लगता है कि तुम लोगों में से अधिकांश के लिए यह एक रहस्य ही है। वास्तव में, यह मामला बहुत सरल है : चूँकि परमेश्वर देहधारी बन जाता है, उसका सार मानवता और दिव्यता का संयोजन है। यह संयोजन स्वयं परमेश्वर, पृथ्वी पर स्वयं परमेश्वर कहलाता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 100
पृथ्वी पर यीशु ने जो जीवन जिया वह देह में एक सामान्य जीवन था। वह अपनी देह की सामान्य मानवता में जिया। उसके अधिकार—अपना कार्य करना, वचन बोलना, या बीमार को चंगा करना और राक्षसों को निकालना, ऐसे असाधारण कार्य करना—ने मूलभूत रूप से स्वयं को तब तक प्रकट नहीं किया जब तक कि उसने अपनी सेवकाई आरंभ नहीं की। उनतीस वर्ष की उम्र से पहले, अपनी सेवकाई आरंभ करने से पहले उसका जीवन, इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि वह बस एक सामान्य देह था। क्योंकि वह एक सामान्य दैहिक शरीर था और क्योंकि उसने अभी तक अपनी सेवकाई आरंभ नहीं की थी, लोगों को उसमें कुछ भी दिव्य नहीं दिखाई दिया, एक सामान्य व्यक्ति, एक साधारण मनुष्य से अधिक कुछ नहीं दिखाई दिया—ठीक जैसे कि उस समय कुछ लोग उसे यूसुफ का पुत्र ही मानते थे। लोगों को लगता था कि वह एक साधारण मनुष्य का पुत्र है, उनके पास यह बताने का कोई तरीका नहीं था कि वह देहधारी परमेश्वर की देह है; यहाँ तक कि जब, अपनी सेवकाई करने के दौरान, उसने कई चिह्न दिखाए, तब भी अधिकांश लोगों ने यही कहा कि वह यूसुफ का पुत्र है, क्योंकि वह सामान्य मानवता के बाह्य आवरण वाला मसीह था। उसकी सामान्य मानवता और कार्य दोनों पहले देहधारण की महत्ता को पूर्ण करने के लिए थे, यह सिद्ध करने के लिए थे कि परमेश्वर पूरी तरह से देह में आया है, कि वह एक अत्यंत साधारण व्यक्ति बन गया है। अपना कार्य शुरु करने के पहले उसके पास सामान्य मानवता का होना इस बात का प्रमाण था कि वह एक साधारण देह था; और बाद में उसने कार्य किया इससे भी यह प्रमाणित हो गया कि वह एक साधारण देह था, यह सामान्य मानवता की देह ही थी जिसमें उसने चिह्न और चमत्कार किए, बीमार को चंगा किया और राक्षसों को निकाला। वह इसलिए चिह्न दिखा सका क्योंकि उसकी देह परमेश्वर के अधिकार से युक्त थी, वह देह थी जिसे परमेश्वर के आत्मा ने पहना था। उसके पास यह अधिकार परमेश्वर के आत्मा के कारण था, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि वह देह नहीं था। बीमार को चंगा करना और राक्षसों को निकालना ही वह कार्य था जिसे उसे अपनी सेवकाई में करना था, यह उसकी मानवता में छिपी दिव्यता की अभिव्यक्ति था, भले ही उसने कोई भी चिह्न दिखाए हों या अपने अधिकार को कैसे भी प्रदर्शित किया हो, लेकिन तब भी वह सामान्य मानवता में रहने वाला सामान्य देह ही था। सलीब पर जान देने और पुनर्जीवित होने तक, वह सामान्य देह में ही रहा। अनुग्रह प्रदान करना, बीमार को चंगा करना, और राक्षसों को निकालना, ये सब उसकी सेवकाई का हिस्सा थे, ये सारे कार्य उसकी सामान्य देह में किए गए थे। चाहे वह कोई भी कार्य कर रहा हो, लेकिन क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले, वह कभी भी अपने सामान्य मानव देह से अलग नहीं हुआ। वह स्वयं परमेश्वर था, परमेश्वर का अपना कार्य कर रहा था, लेकिन चूँकि वह देहधारी परमेश्वर था, इसलिए वह खाना भी खाता था, कपड़े भी पहनता था, उसकी आवश्यकताएँ सामान्य इंसानों जैसी थीं, उसमें सामान्य मानवीय विवेक और सामान्य मानवीय मन था। यह सब इस बात का प्रमाण है कि वह एक सामान्य व्यक्ति था, इससे सिद्ध होता है कि देहधारी परमेश्वर की देह सामान्य मानवता से युक्त देह थी, न कि कोई अलौकिक देह। उसका कार्य परमेश्वर के पहले देहधारण के कार्य को पूरा करना था, उस सेवकाई को पूरा करना था जो परमेश्वर को अपने पहले देहधारण में पूरा करना चाहिए। देहधारण की महत्ता यह है कि एक साधारण, सामान्य व्यक्ति स्वयं परमेश्वर का कार्य करता है; अर्थात्, परमेश्वर मानवता में अपना दिव्य कार्य करके शैतान को हरा देता है। देहधारण का अर्थ है कि परमेश्वर का आत्मा देह बन जाता है, अर्थात्, परमेश्वर देह बन जाता है; देह के द्वारा किया जाने वाला कार्य आत्मा का कार्य है, जो देह में साकार होता है, देह द्वारा अभिव्यक्त होता है। परमेश्वर के देह को छोड़कर अन्य कोई भी देहधारी परमेश्वर की सेवकाई को पूरा नहीं कर सकता; अर्थात्, केवल परमेश्वर का देहधारी देह, यह सामान्य मानव दिव्य कार्य को व्यक्त कर सकता है। इसमें कोई मनुष्य उसकी जगह नहीं ले सकता। यदि, परमेश्वर के पहले आगमन के दौरान, उनतीस वर्ष की उम्र से पहले उसमें सामान्य मानवता नहीं होती—यदि जन्म लेते ही वह चिह्न दिखा और चमत्कार कर सकता, बोलना आरंभ करते ही वह स्वर्ग की भाषा बोलने लगता, यदि जन्म से वह सभी सांसारिक मामलों को समझने लगता, हर व्यक्ति के विचारों और जो उसके हृदय में है, उसे देखने लगता—तो ऐसे इंसान को सामान्य मनुष्य नहीं कहा जा सकता था, और ऐसी देह को मानवीय देह नहीं कहा जा सकता था। यदि मसीह के साथ ऐसा ही होता, तो परमेश्वर के देहधारण का कोई अर्थ और सार ही नहीं रह जाता। उसका सामान्य मानवता से युक्त होना इस बात को सिद्ध करता है कि वह शरीर में देहधारी हुआ परमेश्वर है; उसका सामान्य मानव विकास प्रक्रिया से गुज़रना और भी दिखाता है कि वह एक सामान्य देह है; इसमें उसके कार्य को भी जोड़ दें तो यह इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि वह परमेश्वर का वचन है, परमेश्वर का आत्मा है जिसने देहधारण किया है। अपने कार्य की आवश्यकताओं की वजह से परमेश्वर देहधारी बनता है; दूसरे शब्दों में, कार्य का यह चरण देह में पूरा किया जाना चाहिए, अर्थात सामान्य मानवता में पूरा किया जाना चाहिए। यही “वचन के देह बनने” के लिए, “वचन के देह में प्रकट होने” के लिए पूर्वशर्त है, और यही परमेश्वर के दो देहधारणों की असली कहानी है। हो सकता है लोग यह मानते हों कि यीशु ने जीवनभर चिह्न दिखाए, और पृथ्वी पर अपने कार्य की समाप्ति तक उसने सामान्य मानवता का कोई चिह्न प्रकट नहीं किया, उसकी सामान्य मानवीय आवश्यकताएँ नहीं थीं, या उसमें मानवीय कमजोरियाँ या मानवीय भावनाएँ नहीं थीं, उसे जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं की ज़रूरत नहीं थी और वह सामान्य मानवीय विचार नहीं रखता था। वे यही कल्पना करते हैं कि उसका मन अतिमानवीय है, उसके पास श्रेष्ठ मानवता है। वे मानते हैं कि चूँकि वह परमेश्वर है, इसलिए उसे उस तरह से रहना और सोचना नहीं चाहिए जैसे सामान्य मानव रहते और सोचते हैं, कोई सामान्य व्यक्ति, एक वास्तविक इंसान, ही सामान्य मानवीय सोच-विचार रख सकता और एक सामान्य मानवीय जीवन जी सकता है। ये सभी मनुष्य के विचार, और मनुष्य की धारणाएँ हैं, और ये धारणाएँ परमेश्वर के कार्य के मूल इरादों के प्रतिकूल हैं। सामान्य मानव सोच, सामान्य मानव सूझ-बूझ और सामान्य मानवता को बनाए रखती है; केवल सामान्य मानवता देह के सामान्य कार्यों को बनाए रख सकती है; और केवल देह के सामान्य कार्य, यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि देह के जीवन के सभी भाग सामान्य हैं। ऐसे देह में कार्य करके ही परमेश्वर अपने देहधारण के उद्देश्य को पूरा कर सकता है। यदि देहधारी परमेश्वर केवल देह के बाहरी आवरण को ही धारण किए रहता, लेकिन उसमें सामान्य मानवीय विचार न आते, तो उसके देह में मानवीय सूझ-बूझ न होती, वास्तविक मानवता तो बिल्कुल न होती। ऐसी मानवता रहित देह उस सेवकाई को कैसे पूरा कर सकती है जिसे देहधारी परमेश्वर को करना चाहिए? सामान्य मन मानव जीवन के सभी पहलुओं को बनाए रखता है; बिना सामान्य मन के, कोई व्यक्ति मानव नहीं हो सकता। दूसरे शब्दों में, कोई व्यक्ति जो सामान्य ढंग से सोच-विचार नहीं करता, वह मानसिक रूप से बीमार है, और एक मसीह जिसमें मानवता न होकर केवल दिव्यता हो, उसे परमेश्वर का देहधारी शरीर नहीं कहा जा सकता। इसलिए, ऐसा कैसे हो सकता है कि परमेश्वर के देहधारी शरीर में कोई सामान्य मानवता न हो? क्या ऐसा कहना ईशनिंदा नहीं होगी कि मसीह में कोई मानवता नहीं है? ऐसे सभी क्रियाकलाप जिनमें सामान्य मानव शामिल होते हैं एक सामान्य मानव मन की कार्यशीलता के भरोसे होते हैं। इसके बिना, मानव स्वाभाविक व्यवस्था के विरुद्ध चले जाते; यहाँ तक कि वे सफेद और काले, अच्छे और बुरे में अंतर भी न कर पाते; उनमें कोई भी मानवीय आचरण न होता, और नैतिक सिद्धांत न होते। इसी प्रकार से, यदि देहधारी परमेश्वर एक सामान्य मानव की तरह न सोचता, तो वह एक प्रामाणिक देह, एक सामान्य देह न होता। सोच-विचार न करने वाला ऐसा देह दिव्य कार्य का बीड़ा बिल्कुल न उठा पाता। वह सामान्य रूप से सामान्य देह की गतिविधियों में शामिल न हो पाता, पृथ्वी पर मनुष्यों के साथ रहने की तो बात ही छोड़ दो। और इस तरह, परमेश्वर के देहधारण की महत्ता और परमेश्वर के देह में आने का वास्तविक सार ही खो गया होता। देहधारी परमेश्वर की मानवता देह में सामान्य दिव्य कार्य को बनाए रखने के लिए मौजूद रहती है; उसकी सामान्य मानवीय सोच उसकी सामान्य मानवता को बनाए रखती और उसकी समस्त सामान्य दैहिक गतिविधियों को सहारा देती है। ऐसा कहा जा सकता है कि उसकी सामान्य मानवीय सोच देह में परमेश्वर के समस्त कार्य को बनाए रखने के उद्देश्य से विद्यमान रहती है। यदि इस देह में सामान्य मानवीय मन न होता, तो परमेश्वर देह में कार्य न कर पाता और जो उसे देह में करना था, वह कभी नहीं किया जा सकता था। यद्यपि देहधारी परमेश्वर में एक सामान्य मानवीय मन होता है, किन्तु उसके कार्य में मानवीय विचारों की मिलावट नहीं होती; वह सामान्य मन के साथ मानवता में कार्य करता है, मन-युक्त मानवता के होने की पूर्वशर्त के तहत, न कि सामान्य मानवीय विचारों को प्रयोग में लाकर। उसकी देह के विचार कितने भी उत्कृष्ट क्यों न हों, लेकिन उसके कार्य में तर्क या सोच की मिलावट नहीं होती। दूसरे शब्दों में, उसके कार्य की कल्पना उसकी देह के मन के द्वारा नहीं की जाती, बल्कि वह उसकी मानवता में दिव्य कार्य की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। उसका समस्त कार्य उसकी वह सेवकाई है जिसे उसे पूरा करना है, उसमें से कुछ भी उसके मस्तिष्क की कल्पना नहीं होता। उदाहरण के लिए, बीमार को चंगा करना, राक्षसों को निकालना, और क्रूसीकरण उसके मानवीय मन की उपज नहीं थे, उन्हें किसी भी मानवीय मन वाले मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता था। उसी तरह, आज का विजय-कार्य ऐसी सेवकाई है जिसे देहधारी परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए, किन्तु यह व्यक्ति की इच्छा नहीं है, यह ऐसा कार्य है जो उसकी दिव्यता को करना चाहिए, ऐसा कार्य जिसे करने में कोई भी रक्त-मांस का मानव सक्षम नहीं है। इसलिए देहधारी परमेश्वर में सामान्य मानव मन होना चाहिए, सामान्य मानवता से संपन्न होना चाहिए, क्योंकि उसे अवश्य एक सामान्य मन के साथ मानवता में कार्य करना चाहिए। यही देहधारी परमेश्वर के कार्य का सार है, देहधारी परमेश्वर का वास्तविक सार है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 101
कार्य आरंभ करने से पहले, यीशु मात्र सामान्य मानवता में रहता था। कोई नहीं कह सकता था कि वह परमेश्वर है, किसी को भी पता नहीं चला कि वह देहधारी परमेश्वर है; लोग उसे बस एक सर्वाधिक साधारण व्यक्ति के रूप में जानते थे। उसकी सामान्य मानवता—जो उतनी साधारण थी जितना कि संभव है—इस बात का प्रमाण थी कि परमेश्वर ने शरीर में देहधारण किया है, और अनुग्रह का युग देहधारी परमेश्वर के कार्य का युग है, न कि आत्मा के कार्य का युग। यह इस बात का प्रमाण था कि परमेश्वर का आत्मा पूरी तरह से देह में साकार हुआ है और परमेश्वर के देहधारण के युग में उसकी देह आत्मा का समस्त कार्य करेगी। सामान्य मानवता वाला मसीह ऐसी देह है जिसमें आत्मा साकार हुआ है, जिसमें सामान्य मानवता है, सामान्य समझ है और मानवीय विचार हैं। “साकार होने” का अर्थ है परमेश्वर का मानव बनना, आत्मा का देह बनना; इसे और स्पष्ट रूप से कहें, तो यह तब होता है जब स्वयं परमेश्वर सामान्य मानवता वाली देह में वास करके उसके माध्यम से अपने दिव्य कार्य को व्यक्त करता है—यही साकार होने या देहधारी होने का अर्थ है। अपने पहले देहधारण के दौरान, परमेश्वर के लिए बीमारों को चंगा करना और राक्षसों को निकालना आवश्यक था, क्योंकि उसका कार्य छुटकारा दिलाना था। पूरी मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए, उसका दयालु और क्षमाशील होना आवश्यक था। सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले उसने बीमार को चंगा करने और राक्षसों को निकालने का कार्य किया, जो उसके द्वारा मनुष्य के पाप और मलिनता से उद्धार के पूर्वलक्षण थे। चूँकि वह अनुग्रह का युग था, इसलिए बीमारों को चंगा करके चिह्न और चमत्कार दिखाना परमेश्वर के लिए आवश्यक था, जो उस युग में अनुग्रह के प्रतिनिधि थे—क्योंकि अनुग्रह का युग अनुग्रह प्रदान करने के आस-पास केन्द्रित था; शान्ति, आनंद और भौतिक आशीष अनुग्रह के युग की और उस समय यीशु में लोगों की आस्था की निशानियाँ थीं। अर्थात् बीमार को चंगा करना, राक्षसों को निकालना, और अनुग्रह प्रदान करना, अनुग्रह के युग में यीशु की देह की सहज क्षमताएँ थीं, ये देह में साकार हुए आत्मा के कार्य थे। किन्तु जब वह ऐसे कार्य कर रहा था, तब वह देह में रह रहा था, देह से परे नहीं गया था। उसने चंगाई का चाहे कैसा भी कार्य क्यों न किया हो, तब भी उसमें सामान्य मानवता ही थी, तब भी वह एक सामान्य मानव जीवन ही जी रहा था। परमेश्वर के देहधारण के युग में देह ने आत्मा के सभी कार्य किए, मेरा ऐसा कहने का कारण यह है कि चाहे उसने कोई भी कार्य किया हो, उसने वह कार्य देह में रहकर ही किया था। किन्तु उसके कार्य की वजह से, लोगों ने उसकी देह को पूरी तरह से दैहिक सार धारण करने वाला नहीं माना, क्योंकि वह देह चिह्न दिखा सकती थी, और किसी विशेष समय में ऐसे कार्य कर सकती थी जो देह से परे के होते थे। बेशक, ये सारी घटनाएँ उसकी सेवकाई आरंभ करने के बाद हुईं, जैसे कि चालीस दिनों तक उसका ललचाया जाना या पहाड़ पर रूपान्तरित होना। तो यीशु के साथ, परमेश्वर के देहधारण का अर्थ पूर्ण नहीं हुआ था, बल्कि केवल आंशिक तौर पर पूर्ण हुआ था। अपना कार्य आरंभ करने से पहले उसने देह में जो जीवन जिया वह हर तरह से एकदम सामान्य था। कार्य आरंभ करने के बाद, उसने केवल अपनी देह के बाहरी आवरण को बनाए रखा। क्योंकि उसका कार्य दिव्यता की अभिव्यक्ति था, इसलिए यह देह की सामान्य क्षमताओं से बढ़कर था। आख़िरकार, परमेश्वर की देहधारी देह रक्त-मांस वाले मानव से भिन्न थी। बेशक, अपने दैनिक जीवन में उसे भोजन, कपड़ों, नींद और आश्रय की आवश्यकता पड़ती थी। उसकी रोज़मर्रा की आवश्यकताएँ हर तरह से सामान्य थीं, और उसके पास सामान्य इंसान की समझ थी और वह एक सामान्य इंसान की तरह ही सोचता था। लोग अभी भी उसे एक सामान्य व्यक्ति ही मानते थे, लेकिन वह जो कार्य करता था वह गहन रूप से अलौकिक था। वास्तव में, उसने चाहे जो भी किया हो, वह एक साधारण और सामान्य मानवता में रहा और जितना अधिक उसके कार्य करने का समय था, उतना ही अधिक उसका विवेक सामान्य था और उसके विचार उतने ही अधिक स्पष्ट थे; उसकी समझ और विचार किसी भी सामान्य मनुष्य से बढ़कर थे। इस प्रकार की सोच और समझ एक देहधारी परमेश्वर के लिए सटीक रूप से आवश्यक थी, क्योंकि दिव्य कार्य को ऐसी देह के द्वारा व्यक्त किए जाने की आवश्यकता थी जिसकी समझ जितनी हो सके उतनी सामान्य हो और जिसके विचार सर्वाधिक सुस्पष्ट हों—केवल इसी प्रकार से उसकी देह दिव्य कार्य को व्यक्त कर सकती थी। यीशु पृथ्वी पर साढ़े तैतीस साल रहा, इस पूरे दौरान उसने अपनी सामान्य मानवता बनाए रखी, किन्तु उसकी इस साढ़े तीन साल की सेवकाई के दौरान लोगों ने सोचा कि वह अति-असाधारण है, पहले की अपेक्षा साधारणता से बहुत ही परे है। जबकि असलियत में, यीशु की सामान्य मानवता सेवकाई आरंभ करने से पहले और बाद में अपरिवर्तित रही; पूरे समय उसकी मानवता एक-सी थी, किन्तु जब उसने अपनी सेवकाई आरंभ की उससे पहले और उसके बाद के अंतर के कारण, उसकी देह को लेकर, दो भिन्न-भिन्न मत उभरे। लोगों की राय कुछ भी रही हो, लेकिन देहधारी परमेश्वर ने पूरी अवधि में, अपनी मूल सामान्य मानवता बनाए रखी, क्योंकि जबसे परमेश्वर देहधारी हुआ था, तब से वह देह में ही रहा, ऐसी देह में जिसमें सामान्य मानवता थी। चाहे वह अपनी सेवकाई कर रहा हो या न कर रहा हो, उसकी देह की सामान्य मानवता को मिटाया नहीं जा सकता था, क्योंकि मानवता देह का मूल सार है। अपनी सेवकाई से पहले, सभी सामान्य मानवीय क्रियाकलापों में संलग्न रहते हुए यीशु की देह पूरी तरह से सामान्य रही; वह जरा-सा भी अलौकिक नज़र नहीं आया, उसने कोई भी चिह्न नहीं दिखाए। उस समय, वह एक निहायत ही आम इंसान था जो परमेश्वर की आराधना करता था, लेकिन उसकी खोज अधिक ईमानदार थी, किसी भी व्यक्ति से अधिक निष्ठापूर्ण थी। इस प्रकार उसकी मानवता ने, जो जितनी हो सके उतनी सामान्य थी, स्वयं को अभिव्यक्त किया। चूँकि सेवकाई का कार्य शुरू करने से पहले उसने कोई कार्य नहीं किया था, इसलिए कोई उसकी पहचान से अवगत नहीं था, कोई नहीं बता सकता था कि उसकी देह बाकी लोगों से अलग है, क्योंकि उसने एक भी चिह्न नहीं दिखाया था, स्वयं परमेश्वर का ज़रा-सा भी कार्य नहीं किया था। लेकिन, सेवकाई का कार्य प्रारंभ करने के बाद, उसने सामान्य मानवता का बाहरी आवरण बनाए रखा और तब भी सामान्य मानवीय सूझबूझ के साथ ही जीता रहा, लेकिन क्योंकि उसने स्वयं परमेश्वर का कार्य करना, मसीह की सेवकाई अपनाना, और उन कार्यों को करना आरंभ कर दिया था जिन्हें करने में नश्वर प्राणी, रक्त-मांस से बने प्राणी अक्षम थे, इसलिए लोगों ने मान लिया कि उसकी सामान्य मानवता नहीं है, उसकी देह पूरी तरह से सामान्य नहीं है बल्कि अपूर्ण देह है। उसके द्वारा किए गए कार्य की वजह से लोगों ने कहा कि वह देह में परमेश्वर है जिसके पास सामान्य मानवता नहीं है। ऐसी समझ भ्रामक है, क्योंकि लोगों ने देहधारी परमेश्वर की महत्ता को नहीं समझा। यह भ्रामक समझ इस तथ्य से पैदा हुई थी कि परमेश्वर द्वारा देह में व्यक्त कार्य दिव्य कार्य है, जो ऐसी देह में व्यक्त किया जाता है जिसकी एक सामान्य मानवता है। परमेश्वर देह के आवरण में था, उसका वास देह में था, परमेश्वर की मानवता में उसके कार्य ने उसकी मानवता की सामान्यता को धुँधला कर दिया था। इसी कारण से लोगों ने विश्वास कर लिया कि परमेश्वर में मानवता नहीं है केवल दिव्यता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 102
अपने पहले देहधारण में परमेश्वर ने देहधारण के कार्य को पूरा नहीं किया; उसने उस कार्य के पहले चरण को ही पूरा किया जिसे करना देह में रह रहे परमेश्वर से अपेक्षित था। इसलिए देहधारण के कार्य को पूरा करने के लिए परमेश्वर एक बार फिर देह में वापस आया है, और देह की समस्त सामान्यता और व्यावहारिकता को जी रहा है, अर्थात् उस देह में परमेश्वर के वचन को प्रकट कर रहा है जो उतनी सामान्य और साधारण है जितना संभव है, इस प्रकार उस कार्य का समापन कर रहा है जिसे देह में पूरा होना बाकी है। दूसरी देहधारी देह का सार पहले वाली के ही समान है, लेकिन यह पहली से और भी अधिक व्यावहारिक है, और भी अधिक सामान्य है। परिणामस्वरूप, दूसरी देहधारी देह पहले देहधारण से भी अधिक पीड़ा सहती है, किन्तु यह पीड़ा देह में उसकी सेवकाई का परिणाम है, जो कि एक भ्रष्ट मानव की पीड़ा से भिन्न है। यह भी उसकी देह की सामान्यता और व्यावहारिकता से उत्पन्न होती है। क्योंकि वह अपनी सेवकाई का कार्य उस देह में करता है जो सर्वाधिक सामान्यता और व्यावहारिकता वाली है, इसलिए उसकी देह को अत्यधिक कष्ट सहना होगा। उसकी देह जितनी अधिक सामान्य और व्यावहारिक होगी, उतना ही अधिक वह अपनी सेवकाई में कष्ट उठाएगा। परमेश्वर का कार्य एक बहुत ही आम देह में अभिव्यक्त होता है, जो बिल्कुल अलौकिकता से रहित है। चूँकि उसकी देह सामान्य है और उसे मनुष्य को बचाने के कार्य का दायित्व भी लेना है, इसलिए वह अलौकिक देह की अपेक्षा और भी अधिक पीड़ा भुगतता है—और ये सारी पीड़ा उसकी देह की व्यावहारिकता और सामान्यता से उत्पन्न होती है। सेवकाई का कार्य करते समय जिस पीड़ा से दोनों देहधारी देह गुजरी हैं, उससे देहधारी देह के सार को देखा जा सकता है। देह जितनी अधिक सामान्य होगी, उसे कार्य करते समय उतना ही अधिक कष्ट सहना होगा; कार्य करने वाली देह जितनी अधिक व्यावहारिक होती है, लोगों की धारणाएँ उतनी ही अधिक मजबूत होती जाती हैं, और वह उतने ही जोखिम उठाता है। फिर भी, देह जितनी अधिक व्यावहारिक होती है, और उसमें सामान्य मानव की जितनी अधिक आवश्यकताएँ और पूर्ण विवेक होता है, वह उतना ही अधिक परमेश्वर के कार्य का देह में बीड़ा उठाने में सक्षम होती है। यीशु को देह के जरिए सलीब पर चढ़ाया गया था और वह देह के जरिए पापबलि बना, यानी उसने सामान्य मानवता वाली देह के जरिए ही शैतान को हराया और सलीब से मनुष्य को पूरी तरह से बचाया था। पूर्ण देह के जरिए ही दूसरा देहधारी परमेश्वर विजय का कार्य करता है और शैतान को हराता है। केवल ऐसी देह जो पूरी तरह से सामान्य और व्यावहारिक है, अपने पूर्ण अर्थ में विजय का कार्य कर सकती और एक सशक्त गवाही दे सकती है। अर्थात् देह में रह रहे परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता के माध्यम से मानव पर विजय पाने में सफलता मिलती है, न कि अलौकिक चमत्कारों और प्रकाशनों के माध्यम से। यह देहधारी परमेश्वर बोलकर सेवकाई करता है और बोलकर ही वह मनुष्य को जीतता और पूर्ण बनाता है; दूसरे शब्दों में, देह में साकार हुए आत्मा का कार्य बोलना है और देह का कार्य बोलना है, और इसके फलस्वरूप मनुष्य को पूरी तरह से जीतने, प्रकाशित करने, पूर्ण बनाने और निकाल देने का उद्देश्य पूरा करना है। इसलिए विजय के कार्य में देह में परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से सम्पन्न होगा। मनुष्य के पापों के लिए प्रायश्चित का कार्य जो पहली बार किया गया था, वह देहधारण के कार्य का आरंभ मात्र था; विजय का कार्य करने वाली देह ही देहधारण के समस्त कार्य को पूरा करती है। लिंग रूप में, एक पुरुष है और दूसरा महिला; यह परमेश्वर के देहधारण की महत्ता को पूर्णता देकर, परमेश्वर के बारे में मनुष्य की धारणाओं को दूर करता है : परमेश्वर पुरुष और महिला दोनों बन सकता है, सार रूप में देहधारी परमेश्वर स्त्रीलिंग या पुल्लिंग नहीं है। उसने पुरुष और महिला दोनों को बनाया है, और उसके लिए कोई लिंगभेद नहीं है। कार्य के इस चरण में, परमेश्वर चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता, ताकि कार्य वचनों के माध्यम से अपने परिणाम प्राप्त करे। इसके अलावा, क्योंकि देहधारी परमेश्वर का इस बार का कार्य बीमार को चंगा करना और राक्षसों को बाहर निकालना नहीं है, बल्कि बोलकर मनुष्य को जीतना है, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर के इस देहधारण की स्वाभाविक क्षमताएँ वचन बोलना और मनुष्य को जीतना हैं, न कि बीमार को चंगा करना और राक्षसों को बाहर निकालना। सामान्य मानवता में उसका कार्य चिह्न दिखाना नहीं है, बीमार को चंगा करना और राक्षसों को बाहर निकालना नहीं है, बल्कि बोलना है, और इसलिए दूसरी देहधारी देह लोगों को पहले वाले की तुलना में अधिक सामान्य लगती है। लोग जैसे देखते हैं, परमेश्वर ने वास्तव में देह धारण किया है। हालाँकि, यह देहधारी परमेश्वर यीशु के देहधारण से भिन्न है, हालाँकि दोनों ही परमेश्वर के देहधारण हैं, फिर भी वे पूरी तरह से एक नहीं हैं। यीशु में सामान्य और साधारण मानवता थी, लेकिन उसमें अनेक चिह्न और चमत्कार दिखाने की शक्ति थी। जबकि इस देहधारी परमेश्वर में मानवीय आँखों को न तो कोई चिह्न दिखाई देगा, और न कोई चमत्कार, न तो बीमार चंगे होते हुए दिखाई देंगे, न ही दुष्टात्माएँ बाहर निकाली जाती हुई दिखाई देंगी, न तो समुद्र पर चलना दिखाई देगा, न ही चालीस दिन तक उपवास रखना दिखाई देगा...। वह उसी कार्य को नहीं करता जो यीशु ने किया, इसलिए नहीं कि उसकी देह सार रूप में यीशु से भिन्न है, बल्कि इसलिए कि बीमार को चंगा करना और राक्षसों को निकालना उसकी सेवकाई नहीं है। वह अपने ही कार्य को ध्वस्त नहीं करता, अपने ही कार्य में विघ्न नहीं डालता। चूँकि वह मनुष्य को अपने व्यावहारिक वचनों से जीतता है, इसलिए उसे चिह्नों से वश में करने की आवश्यकता नहीं है, और इसलिए यह चरण देहधारण के कार्य को पूरा करने के लिए है। आज तुम जिस देहधारी परमेश्वर को देखते हो वह पूरी तरह से देह है, और उसमें कुछ भी अलौकिक नहीं है। वह दूसरों की तरह ही बीमार पड़ता है, उसी तरह उसे भोजन और कपड़ों की आवश्यकता होती है; वह पूरी तरह से देह है। यदि इस बार भी देहधारी परमेश्वर अलौकिक चिह्न और चमत्कार दिखाता, बीमारों को चंगा करता, राक्षसों को निकालता, या एक वचन से मार सकता, तो विजय का कार्य कैसे हो पाता? कार्य को अन्य-जाति राष्ट्रों में कैसे फैलाया जा सकता था? बीमार को चंगा करना और राक्षसों को निकालना अनुग्रह के युग का कार्य था, छुटकारे के कार्य का यह पहला चरण था, और अब जबकि परमेश्वर ने लोगों को सलीब से बचा लिया है, इसलिए अब वह उस कार्य को नहीं करता। यदि अंत के दिनों में यीशु के जैसा ही कोई “परमेश्वर” प्रकट हो जाता, जो बीमार को चंगा करता और राक्षसों को निकालता, और मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ाया जाता, तो वह “परमेश्वर,” बाइबल में वर्णित परमेश्वर के समरूप तो अवश्य होता और उसे मनुष्य के लिए स्वीकार करना भी आसान होता, लेकिन तब वह अपने सार रूप में, परमेश्वर के आत्मा द्वारा नहीं, बल्कि एक दुष्टात्मा द्वारा धारण की गई देह होता। क्योंकि जो परमेश्वर ने पहले ही पूरा कर लिया है, उसे कभी नहीं दोहराना, यह परमेश्वर के कार्य का सिद्धांत है। इसलिए परमेश्वर के दूसरे देहधारण का कार्य पहले देहधारण के कार्य से भिन्न है। अंत के दिनों में, परमेश्वर विजय का कार्य एक सामान्य और साधारण देह में साकार करता है; वह बीमार को चंगा नहीं करता, उसे मनुष्य के लिए सलीब पर नहीं चढ़ाया जाएगा, बल्कि वह केवल देह में वचन कहता है, देह में मानव को जीतता है। ऐसी देह ही देहधारी परमेश्वर की देह है; ऐसी देह ही देह में परमेश्वर के कार्य को पूर्ण कर सकती है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 103
इस चरण में देहधारी परमेश्वर चाहे कष्ट सह रहा हो या सेवकाई कर रहा हो, वह ऐसा केवल देहधारण के अर्थ को पूरा करने के लिए करता है, क्योंकि यह परमेश्वर का अंतिम देहधारण है। परमेश्वर केवल दो बार देहधारण कर सकता है। ऐसा तीसरी बार नहीं हो सकता। पहला देहधारी परमेश्वर पुरुष था; दूसरा स्त्री, तो मनुष्य के मन में परमेश्वर की देह की छवि पूरी हो चुकी है; इसके अलावा, दोनों देहधारणों ने पहले ही परमेश्वर के कार्य को देह में समाप्त कर लिया है। पहली बार, देहधारण के अर्थ को पूरा करने के लिए परमेश्वर के देहधारण ने सामान्य मानवता धारण की। इस बार उसने सामान्य मानवता भी धारण की है, किन्तु इस देहधारण का अर्थ भिन्न है : यह अधिक गहरा है, और उसका कार्य अधिक गहन महत्ता का है। परमेश्वर के पुनः देहधारी होने का कारण देहधारण के अर्थ को पूरा करना है। जब परमेश्वर इस चरण के कार्य को पूरी तरह से समाप्त कर लेगा, तो देहधारण का संपूर्ण अर्थ, अर्थात्, देह में परमेश्वर का कार्य पूरा हो जाएगा, और फिर देह में करने के लिए और कार्य बाकी नहीं रह जाएगा। अर्थात्, अब से परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए फिर कभी देहधारण नहीं करेगा। केवल मानवजाति को बचाने और पूर्ण करने के लिए ही परमेश्वर देहधारण करता है। दूसरे शब्दों में, अगर कार्य के लिए न होता तो परमेश्वर आसानी से देह में कतई न आता। कार्य करने के लिए देह में आकर वह शैतान को दिखाता है कि परमेश्वर देह है, एक सामान्य, एक साधारण व्यक्ति है—और फिर भी वह संसार को परास्त कर सकता है, शैतान को परास्त कर सकता है, मानवजाति को छुटकारा दिला सकता है, मानवजाति को जीत सकता है! शैतान के कार्य का लक्ष्य मानवजाति को भ्रष्ट करना है, जबकि परमेश्वर का लक्ष्य मानवजाति को बचाना है। शैतान मनुष्य को अथाह कुंड में फँसाता है, जबकि परमेश्वर उसे इससे बचाता है। शैतान लोगों से अपनी आराधना करवाता है, जबकि परमेश्वर उन्हें अपने प्रभुत्व के अधीन करता है, क्योंकि वह सृष्टिकर्ता है। परमेश्वर के इन दो देहधारणों द्वारा ही इन सब कार्यों का नतीजा प्राप्त होता है। उसका देह सार रूप में मानवता और दिव्यता का मिलाप है और उसमें सामान्य मानवता है। इसलिए देहधारी परमेश्वर की देह के बिना, परमेश्वर का मानवजाति को बचाने का कार्य नतीजा प्राप्त नहीं कर पाता, और देह की सामान्य मानवता के बिना, देह में उसका कार्य परिणाम हासिल नहीं कर पाता। देहधारी परमेश्वर का सार यह है कि उसमें सामान्य मानवता होनी चाहिए; अगर ऐसा न हो तो यह देहधारण करने के परमेश्वर के मूल इरादे के विपरीत चला जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 104
मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि देहधारण का अर्थ यीशु के कार्य में पूर्ण नहीं हुआ था? क्योंकि वचन पूरी तरह से देह नहीं बना था। यीशु ने जो किया वह देह में परमेश्वर के कार्य का केवल एक अंश ही था; उसने केवल छुटकारे का कार्य किया और मनुष्य को पूरी तरह से प्राप्त करने का कार्य नहीं किया। इसी कारण से परमेश्वर एक बार पुनः अंत के दिनों में देह बना है। कार्य का यह चरण भी एक साधारण देह में किया जाता है; यह एक सर्वथा सामान्य मानव द्वारा किया जाता है, जिसकी मानवता अंश मात्र भी अलौकिक नहीं होती। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर पूरी तरह से इंसान बन गया है; और वह ऐसा व्यक्ति है जिसकी पहचान परमेश्वर की है, जो एक पूर्ण मानव है, जो एक पूर्ण देह है, जो कार्य को कर रहा है। मानवीय आँखों के लिए, वह केवल एक देह है जो बिल्कुल भी अति-असाधारण नहीं है, एक अति साधारण व्यक्ति जो स्वर्ग की भाषा बोल सकता है, जो कोई भी चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता है, वृहद सभाकक्षों में धर्म के पीछे की असली कहानी को उजागर करना तो दूर की बात है। लोगों को दूसरी देहधारी देह का कार्य पहले वाले से एकदम अलग प्रतीत होता है, और दोनों में कुछ भी समान नहीं दिखता—इस बार पहले वाले के कार्य का थोड़ा-भी अंश नहीं देखा जा सकता। यद्यपि दूसरे देहधारण की देह का कार्य पहले वाले से भिन्न है, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उनका स्रोत एक ही नहीं है। उनका स्रोत एक ही है या नहीं, यह दोनों देहों के द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति पर निर्भर करता है, न कि उनके बाहरी आवरण पर। अपने कार्य के तीन चरणों के दौरान, परमेश्वर ने दो बार देहधारण किया है, और दोनों बार देहधारी परमेश्वर के कार्य ने एक नए युग का शुभारंभ किया है, एक नए कार्य का सूत्रपात किया है; दोनों देहधारण एक-दूसरे के पूरक हैं। मानवीय आँखों के लिए यह बताना असंभव है कि दोनों देह वास्तव में एक ही स्रोत से आते हैं। बेशक यह मानवीय आँखों या मानवीय मन की क्षमता से बाहर है। किन्तु अपने सार में वे एक ही हैं, क्योंकि उनका कार्य एक ही आत्मा से उत्पन्न होता है। दोनों देहधारी देह एक ही स्रोत से उत्पन्न होते हैं या नहीं, इस बात को उस युग और उस स्थान से जिसमें वे पैदा हुए थे, या ऐसे ही अन्य कारकों से नहीं, बल्कि उनके द्वारा किए गए दिव्य कार्य से तय किया जा सकता है। दूसरी देहधारी देह ऐसा कोई भी कार्य नहीं करती जिसे यीशु कर चुका है, क्योंकि परमेश्वर का कार्य किसी परंपरा का पालन नहीं करता, बल्कि हर बार वह एक नया मार्ग खोलता है। दूसरी देहधारी देह का लक्ष्य, लोगों के मन पर पहली देह के प्रभाव को गहरा या दृढ़ करना नहीं है, बल्कि इसे पूरक करना और उनके मन में पहली देह की छवि को सुधारना है, परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान को गहरा करना है, उन सभी विनियमों को तोड़ना है जो लोगों के हृदय में विद्यमान हैं, और उनके हृदय से परमेश्वर की भ्रामक छवि को मिटाना है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के अपने कार्य का कोई भी अकेला चरण मनुष्य को उसके बारे में पूरा ज्ञान नहीं दे सकता; प्रत्येक चरण केवल एक भाग का ज्ञान देता है, न कि संपूर्ण का। यद्यपि परमेश्वर ने अपने स्वभाव को पूरी तरह से व्यक्त कर दिया है, किन्तु मनुष्य की सीमित बोध क्षमता की वजह से, परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान अभी भी अपूर्ण है। मानव भाषा का उपयोग करके, परमेश्वर के स्वभाव की समग्रता को पूरी तरह समझाना असंभव है। तो फिर परमेश्वर के कार्य के एक चरण का परमेश्वर को पूरी तरह से व्यक्त करना और भी कितना असंभव होगा? वह देह में अपनी सामान्य मानवता की आड़ में कार्य करता है, उसे केवल उसकी दिव्यता की अभिव्यक्तियों से ही जाना जा सकता है, न कि उसके दैहिक आवरण से। परमेश्वर मनुष्य को अपने विभिन्न कार्यों के माध्यम से स्वयं को जानने देने के लिए देह में आता है। उसके कार्य के कोई भी दो चरण एक जैसे नहीं होते। केवल इसी प्रकार से मनुष्य, देह में परमेश्वर के कार्य का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकता है और इसे एक निश्चित दायरे तक सीमित नहीं कर सकता। यद्यपि दोनों देहधारणों के कार्य भिन्न हैं, किन्तु देह का सार, और उनके कार्यों का स्रोत समान है; बात केवल इतनी ही है कि उनका अस्तित्व कार्य के दो विभिन्न चरणों को करने के लिए है, और वे दो अलग-अलग युग में आते हैं। कुछ भी हो, परमेश्वर की देहधारी देहें एक ही सार और एक ही स्रोत को साझा करती हैं—यह कुछ ऐसा है जिसे कोई नकार नहीं सकता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 105
देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है और मसीह परमेश्वर के आत्मा द्वारा धारण की गई देह है। यह देह किसी ऐसे मनुष्य से भिन्न है जो देह का है। यह भिन्नता इसलिए है क्योंकि मसीह दैहिक होने के बजाय आत्मा का देहधारण है। उसके पास सामान्य मानवता भी है और पूर्ण दिव्यता भी है। उसकी दिव्यता किसी भी मनुष्य के पास नहीं है। उसकी सामान्य मानवता का उद्देश्य देह में उसकी समस्त सामान्य गतिविधियों को बनाए रखना है, जबकि उसकी दिव्यता स्वयं परमेश्वर के कार्य को कार्यान्वित करती है। चाहे यह उसकी मानवता हो या दिव्यता, दोनों स्वर्गिक परमपिता की इच्छा को समर्पित हैं। मसीह का सार आत्मा, यानी दिव्यता है। इसलिए, उसका सार स्वयं परमेश्वर का है; यह सार उसके स्वयं के कार्य में गड़बड़ी नहीं करेगा और वह कुछ भी ऐसा कतई नहीं कर सकता है, जो उसके अपने ही कार्य को नष्ट करता हो, न ही वह कभी ऐसे वचन कहेगा जो उसकी अपनी इच्छा के विरुद्ध जाते हों। इस प्रकार, देहधारी परमेश्वर कभी भी कोई ऐसा कार्य बिल्कुल नहीं करेगा, जो उसके अपने प्रबंधन में गड़बड़ी करता हो। यह वह बात है, जिसे सभी मनुष्यों को समझना चाहिए। पवित्र आत्मा के कार्य का सार मनुष्य को बचाना और परमेश्वर के अपने प्रबंधन के वास्ते है। इसी प्रकार, मसीह का कार्य भी मनुष्य को बचाना है तथा परमेश्वर की इच्छा के वास्ते है। यह देखते हुए कि परमेश्वर देह बन जाता है, वह अपनी देह में अपने सार को, इस तरह साकार करता है कि उसकी देह उसके कार्य का बीड़ा उठाने के लिए पर्याप्त है। इसलिए देहधारण के समय परमेश्वर के आत्मा का संपूर्ण कार्य मसीह के कार्य द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है और देहधारण के पूरे समय के दौरान संपूर्ण कार्य के केंद्र में मसीह का कार्य होता है। इसे किसी भी अन्य युग के कार्य के साथ मिश्रित नहीं किया जा सकता। और चूँकि परमेश्वर देहधारी हो जाता है, वह अपनी देह की पहचान में कार्य करता है; चूँकि वह देह में आता है, वह अपनी देह में वह कार्य पूरा करता है, जो उसे करना चाहिए। चाहे वह परमेश्वर का आत्मा हो या चाहे वह मसीह हो, दोनों स्वयं परमेश्वर हैं और वह उस कार्य को करता है, जो उसे करना चाहिए और उस सेवकाई को करता है, जो उसे करनी चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 106
परमेश्वर का सार ही अधिकार धारण करता है, लेकिन वह उस संपूर्ण अधिकार के प्रति समर्पित हो पाता है, जो उसकी ओर से आता है। चाहे वह पवित्र आत्मा का कार्य हो या देह का, दोनों का एक दूसरे से टकराव नहीं होता। परमेश्वर का आत्मा सभी चीजों पर अधिकार रखता है। परमेश्वर के सार वाली देह भी अधिकार संपन्न है, पर देह में परमेश्वर वह सब कार्य कर सकता है, जो स्वर्गिक पिता की इच्छा के प्रति समर्पित होता है। इसे किसी मनुष्य द्वारा प्राप्त किया या समझा नहीं जा सकता। परमेश्वर स्वयं अधिकार है, पर उसकी देह उसके अधिकार के प्रति समर्पित हो सकती है। “मसीह परमपिता परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण करता है” का यही अंतर्निहित अर्थ है। परमेश्वर आत्मा है और उद्धार का कार्य कर सकता है, और वह परमेश्वर भी इसे कर सकता है जो मनुष्य बना है। चाहे जो हो, परमेश्वर स्वयं अपना कार्य करता है; वह न तो गड़बड़ी करता है न विघ्न डालता है, ऐसा कार्य तो नहीं ही करता, जो परस्पर विपरीत हो क्योंकि आत्मा और देह द्वारा किए गए कार्य का सार एक समान है। चाहे आत्मा हो या देह, दोनों एक इच्छा को पूरा करने के लिए कार्य करते हैं और उसी कार्य को प्रबंधित करते हैं। यद्यपि आत्मा और देह की दो भिन्न विशेषताएं हैं, किंतु उनके सार एक ही हैं; दोनों में स्वयं परमेश्वर का सार है और स्वयं परमेश्वर की पहचान है। स्वयं परमेश्वर में विद्रोहीपन के तत्व नहीं होते; उसका सार अच्छा है। वह समस्त सुंदरता और अच्छाई की और साथ ही समस्त प्रेम की अभिव्यक्ति है। यहाँ तक कि देह में भी परमेश्वर ऐसा कुछ नहीं करता जो परमपिता परमेश्वर से विद्रोह का सूचक हो। यहाँ तक कि अपने जीवन का बलिदान करने की क़ीमत पर भी वह ऐसा करने को पूरे मन से तैयार रहेगा और कोई दूसरा मन नहीं बनाएगा। परमेश्वर में आत्मतुष्टि और ख़ुदगर्ज़ी के या दंभ या घमंड के तत्व नहीं हैं; उसमें कुटिलता का कोई तत्व नहीं है। जो कुछ भी परमेश्वर से विद्रोह का सूचक है, वह शैतान से आता है; शैतान समस्त कुरूपता और बुराई का स्रोत है। इसका कारण कि मनुष्य में वही गुण हैं जो शैतान में हैं, यह है कि मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट और संसाधित किया गया है। मसीह को शैतान द्वारा भ्रष्ट नहीं किया गया है, अतः उसके पास केवल परमेश्वर के गुण हैं तथा शैतान का एक भी गुण नहीं है। इस बात की परवाह किए बिना कि कार्य कितना कठिन है या देह कितनी निर्बल, परमेश्वर जब देह में रहता है, कभी भी ऐसा कुछ नहीं करेगा, जिससे स्वयं परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी हो, परमपिता परमेश्वर की इच्छा का त्याग और विद्रोह तो बिल्कुल नहीं करेगा। वह देह की पीड़ा सह लेगा, मगर परमपिता परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध नहीं जाएगा; यह वैसा है, जैसा यीशु ने प्रार्थना में कहा, “पिता, हो सके तो इस कटोरे को मेरे पास से गुजर जाने दो : फिर भी, मेरी इच्छा नहीं बल्कि तुम्हारी इच्छा पूरी हो।” लोग अपने चुनाव करते हैं, किंतु मसीह नहीं करता। यद्यपि उसके पास स्वयं परमेश्वर की पहचान है, फिर भी वह परमपिता परमेश्वर की इच्छा की तलाश करता है और देह के दृष्टिकोण से वह पूरा करता है, जो उसे परमपिता परमेश्वर द्वारा सौंपा गया है। यह कुछ ऐसा है, जो मनुष्य हासिल नहीं कर सकता। जो कुछ शैतान से आता है, उसमें परमेश्वर का सार नहीं हो सकता; उसमें केवल वही सार हो सकता है जो परमेश्वर से विद्रोह और उसका विरोध करे। वह पूर्ण रूप से परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं कर सकता, स्वेच्छा से परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण करना तो दूर की बात है। मसीह के अलावा सभी लोग वह कर सकते हैं, जिससे परमेश्वर का विरोध होता हो, और एक भी व्यक्ति परमेश्वर द्वारा सौंपे गए कार्य को सीधे नहीं कर सकता; एक भी परमेश्वर के प्रबंधन को अपने कर्तव्य के रूप में मानने में सक्षम नहीं है। मसीह का सार परमपिता परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण करना है; परमेश्वर से विद्रोह शैतान का गुण है। ये दोनों गुण असंगत हैं और कोई भी जिसमें शैतान के गुण हैं, मसीह नहीं कहला सकता। मनुष्य परमेश्वर के बदले उसका कार्य नहीं कर सकता, इसका कारण यह है कि मनुष्य में परमेश्वर का कोई भी सार नहीं है। मनुष्य परमेश्वर के लिए मनुष्य के व्यक्तिगत हितों और भविष्य की संभावनाओं के वास्ते कार्य करता है, किंतु मसीह परमपिता परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने के लिए कार्य करता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 107
मसीह की मानवता उसकी दिव्यता द्वारा संचालित होती है। यद्यपि वह देह में है, किंतु उसकी मानवता पूर्ण रूप से देह वाले एक मनुष्य के समान नहीं है। उसका अपना अनूठा व्यक्तित्व है और यह भी उसकी दिव्यता द्वारा संचालित होता है। उसकी दिव्यता में कोई निर्बलता नहीं है; मसीह की निर्बलता उसकी मानवता से संबंधित है। एक निश्चित सीमा तक, यह निर्बलता उसकी दिव्यता को विवश करती है, पर इस प्रकार की सीमाएं एक निश्चित दायरे और समय के भीतर होती हैं और असीम नहीं हैं। जब उसकी दिव्यता का कार्य क्रियान्वित करने का समय आता है, तो वह उसकी मानवता की परवाह किए बिना किया जाता है। मसीह की मानवता पूर्णतः उसकी दिव्यता द्वारा निर्देशित होती है। उसके मानवता के साधारण जीवन से अलग, उसकी मानवता के अन्य सभी काम उसकी दिव्यता द्वारा प्रेरित, प्रभावित और निर्देशित होते हैं। यद्यपि मसीह में मानवता है, पर इससे उसकी दिव्यता के कार्य में विघ्न नहीं पड़ता और ऐसा ठीक इसलिए है क्योंकि मसीह की मानवता उसकी दिव्यता द्वारा निर्देशित है; हालाँकि जब सांसारिक आचरण की बात आती है तो उसकी मानवता परिपक्व नहीं है, यह उसकी दिव्यता के सामान्य कार्य को प्रभावित नहीं करता। जब मैं यह कहता हूँ कि उसकी मानवता भ्रष्ट नहीं हुई है, तब मेरा मतलब है कि मसीह की मानवता को तुरंत उसकी दिव्यता द्वारा निर्देशित किया जा सकता है और उसके पास साधारण मनुष्य की तुलना में उच्चतर विवेक है। उसकी मानवता उसके कार्य में दिव्यता द्वारा निर्देशित होने के लिए सबसे अनुकूल है; उसकी मानवता दिव्यता के कार्य को अभिव्यक्त करने में सबसे समर्थ है और साथ ही ऐसे कार्य के प्रति समर्पण करने में सबसे समर्थ है। जब परमेश्वर देह में कार्य करता है, वह कभी उस कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करता, जिसे देह में व्यक्ति को निभाना चाहिए; वह सच्चे हृदय से स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है। उसमें परमेश्वर का सार है और उसकी पहचान स्वयं परमेश्वर की पहचान है। केवल इतना है कि वह पृथ्वी पर आया है और एक सृजित प्राणी बन गया है, जिसका बाहरी आवरण सृजित प्राणी का है और अब ऐसी मानवता से संपन्न है, जो पहले उसके पास नहीं थी; वह स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है; यह स्वयं परमेश्वर का अस्तित्व है तथा मनुष्य उसका अनुकरण नहीं कर सकता। उसकी पहचान स्वयं परमेश्वर है। देह के परिप्रेक्ष्य से वह परमेश्वर की आराधना करता है; इसलिए, ये वचन “मसीह स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करता है” त्रुटिपूर्ण नहीं हैं। वह लोगों से जो माँगता है, वह ठीक-ठीक उसका स्वयं का अस्तित्व है; लोगों से कुछ भी माँगने से पहले वह उसे पहले ही प्राप्त कर चुका होता है। वह कभी भी दूसरों से माँग नहीं करता जबकि वह स्वयं उनसे मुक्त है, क्योंकि इन सबसे उसका अस्तित्व गठित होता है। इस बात की परवाह किए बिना कि वह कैसे अपना कार्य क्रियान्वित करता है, वह इस प्रकार कार्य नहीं करेगा, जिससे परमेश्वर से विद्रोह हो। चाहे वह मनुष्य से कुछ भी माँगे, कोई भी माँग मनुष्य द्वारा प्राप्य से बढ़कर नहीं होती। वह जो कुछ करता है, वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलना है और उसके प्रबंधन के वास्ते है। मसीह की दिव्यता सभी लोगों से ऊपर है; इसलिए सभी सृजित प्राणियों में वह सर्वोच्च अधिकारी है। यह अधिकार उसकी दिव्यता है, यानी परमेश्वर का स्वयं का अस्तित्व और स्वभाव उसकी पहचान निर्धारित करता है। इसलिए, चाहे उसकी मानवता कितनी ही सामान्य हो, इससे इनकार नहीं हो सकता कि उसके पास स्वयं परमेश्वर की पहचान है; चाहे वह किसी भी दृष्टिकोण से बोले और किसी भी तरह परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण करे, यह नहीं कहा जा सकता है कि वह स्वयं परमेश्वर नहीं है। मूर्ख और नासमझ लोग मसीह की सामान्य मानवता को प्रायः एक खोट मानते हैं। चाहे वह किसी भी तरह अपनी दिव्यता के अस्तित्व को अभिव्यक्त और प्रकट करे, लोग यह स्वीकार करने में असमर्थ हैं कि वह मसीह है। और मसीह जितना अधिक अपना समर्पण और नम्रता प्रदर्शित करता है, मूर्ख लोग मसीह को उतना ही हल्के ढंग से लेते हैं। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं, जो उसके प्रति बहिष्कार तथा तिरस्कार की प्रवृत्ति अपना लेते हैं, फिर भी उन शानदार छवियों वाली “महान हस्तियों” के साथ आराधना के लिए मेज़ पर रखते हैं। परमेश्वर के प्रति मनुष्य का प्रतिरोध और विद्रोह इस तथ्य से उपजते हैं कि देहधारी परमेश्वर का सार परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण है, साथ ही ये मसीह की सामान्य मानवता से भी उपजते हैं; यही परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध और विद्रोह का स्रोत है। यदि मसीह न तो अपनी मानवता का भेष रखता, न ही सृजित प्राणी के दृष्टिकोण से परमपिता परमेश्वर की इच्छा की खोज करता, बल्कि इसके बजाय अति मानवता से संपन्न होता, तो बहुत संभव होता कि मनुष्यों के बीच कोई विद्रोह न होता। मनुष्य की सदैव स्वर्ग में एक अदृश्य परमेश्वर में विश्वास करने की इच्छा का कारण यह है कि स्वर्ग में परमेश्वर के पास कोई मानवता नहीं है, न ही उसमें सृजित प्राणी की एक भी विशेषता है। अतः मनुष्य उसका सदैव सर्वोच्च सम्मान के साथ आदर करता है, किंतु मसीह के प्रति तिरस्कार का रवैया रखता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 108
यद्यपि पृथ्वी पर मसीह, स्वयं परमेश्वर के स्थान पर कार्य करने में समर्थ है, पर वह सभी लोगों को देह में अपनी छवि दिखाने के आशय से नहीं आता। वह सब लोगों को अपना दर्शन कराने नहीं आता; वह मनुष्य को अपने हाथ की अगुआई में चलने की अनुमति देने आता है, और इस प्रकार मनुष्य नए युग में प्रवेश करता है। मसीह की देह का काम स्वयं परमेश्वर के कार्य के लिए है, यानी देह में परमेश्वर के कार्य के लिए है, और अपनी देह के सार को पूर्णतः मनुष्य को समझाने में समर्थ करने के लिए नहीं है। चाहे वह जैसे भी कार्य करे, वह कुछ ऐसा नहीं करता, जो देह के लिए प्राप्य से परे हो। चाहे वह जैसे कार्य करे, वह ऐसा देह में होकर सामान्य मानवता के साथ करता है और वह मनुष्य के सामने परमेश्वर की वास्तविक मुखाकृति पूर्ण रूप से प्रकट नहीं करता। इसके अतिरिक्त, देह में उसका कार्य इतना अलौकिक या अपरिमेय कभी नहीं होता है, जैसा मनुष्य समझता है। यद्यपि मसीह देह में स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है और व्यक्तिगत रूप से वह कार्य करता है, जिसे स्वयं परमेश्वर को करना चाहिए, वह स्वर्ग में परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं नकारता, न ही वह अपने स्वयं के कर्मों की बड़े धूमधाम से घोषणा करता है। इसके बजाय, वह विनम्रतापूर्वक अपनी देह के भीतर छिपा रहता है। मसीह के अलावा, जो मसीह होने का झूठा दावा करते हैं, उनमें उसकी विशेषताएं नहीं हैं। अभिमानी और अपनी बड़ाई के स्वभाव वाले उन झूठे मसीहों से तुलना में यह स्पष्ट हो जाता है कि वास्तव में किस प्रकार की देह में मसीह है। जितने वे झूठे होते हैं, उतना ही अधिक इस प्रकार के झूठे मसीह दिखावा करते हैं और उतना ही लोगों को गुमराह करने के लिए वे ऐसे संकेत और चमत्कार करने में समर्थ होते हैं। झूठे मसीहों में परमेश्वर के गुण नहीं होते; मसीह पर झूठे मसीहों से संबंधित किसी भी तत्व का दाग़ नहीं लगता। परमेश्वर केवल देह का कार्य पूर्ण करने के लिए देहधारी बनता है, न कि महज़ मनुष्य को उसे देखने की अनुमति देने के लिए। इसके बजाय, वह अपने कार्य से अपनी पहचान की पुष्टि होने देता है और जो वह प्रकट करता है, उसे अपना सार प्रमाणित करने देता है। उसका सार निराधार नहीं है; उसकी पहचान उसके हाथ द्वारा छीनी नहीं गई थी; यह उसके कार्य और उसके सार से निर्धारित होती है। यद्यपि उसमें स्वयं परमेश्वर का सार है और स्वयं परमेश्वर का कार्य करने में समर्थ है, किंतु वह अभी भी अंततः आत्मा से भिन्न देह है। वह आत्मा की विशेषताओं वाला परमेश्वर नहीं है; वह देह के आवरण वाला परमेश्वर है। इसलिए, चाहे वह जितना सामान्य और जितना निर्बल हो और जैसे भी वह परमपिता परमेश्वर की इच्छा को खोजे, उसकी दिव्यता से इनकार नहीं किया जा सकता। देहधारी परमेश्वर में न केवल सामान्य मानवता और उसकी कमज़ोरियां विद्यमान रहती हैं; उसमें उसकी दिव्यता की अद्भुतता और अथाहपन के साथ ही देह में उसके सभी कर्म विद्यमान रहते हैं। इसलिए, मसीह में मानवता तथा दिव्यता दोनों ही वास्तव में मौजूद हैं और थोड़ी-भी निस्सार या अलौकिक नहीं हैं। वह पृथ्वी पर कार्य करने के मुख्य उद्देश्य से आता है; पृथ्वी पर कार्य करने के लिए सामान्य मानवता से संपन्न होना अनिवार्य है; अन्यथा, उसकी दिव्यता की शक्ति चाहे जितनी महान हो, उसके मूल कार्य का सदुपयोग नहीं हो सकता। यद्यपि उसकी मानवता अत्यंत महत्वपूर्ण है, किंतु यह उसका सार नहीं है। उसका सार दिव्यता है; इसलिए जिस क्षण वह पृथ्वी पर अपनी सेवकाई आरंभ करता है, उसी क्षण वह अपनी दिव्यता के अस्तित्व को अभिव्यक्त करना आरंभ कर देता है। उसकी मानवता केवल उसकी देह के सामान्य जीवन को बनाए रखने के लिए होती है ताकि उसकी दिव्यता देह में सामान्य रूप से कार्य क्रियान्वित कर सके; यह दिव्यता ही है, जो पूरी तरह उसके कार्य को निर्देशित करती है। जब वह अपना कार्य समाप्त करेगा, तो वह अपनी सेवकाई को पूर्ण कर चुका होगा। जो मनुष्य को जानना चाहिए, वह है परमेश्वर के कार्य की संपूर्णता और अपने कार्य के ज़रिए वह मनुष्य को उसे जानने में सक्षम बनाता है। अपने कार्य के दौरान वह अपनी दिव्यता के अस्तित्व को लेता है और काफी पूर्णता के साथ अभिव्यक्त करता है—मानवता के स्वभाव की मिलावट के बिना, या विचार एवं मानव द्वारा निर्मित अस्तित्व की मिलावट के बिना। जब समय आता है कि उसकी संपूर्ण सेवकाई का अंत आ गया है, वह पहले ही उस स्वभाव को उत्तमता से और पूर्णतः अभिव्यक्त कर चुका होगा, जो उसे अभिव्यक्त करना चाहिए। उसका कार्य किसी मनुष्य के निर्देशों पर नहीं होता; उसके स्वभाव की अभिव्यक्ति भी काफ़ी स्वतंत्र है और मन द्वारा नियंत्रित या विचार द्वारा संसाधित नहीं की जाती, बल्कि प्राकृतिक रूप से प्रकट होती है। यह ऐसा है, जिसे कोई मनुष्य हासिल नहीं कर सकता। यहाँ तक कि यदि परिस्थितियाँ कठोर हों या स्थितियाँ आज्ञा न देतीं हों, तब भी वह उचित समय पर अपने स्वभाव को व्यक्त करने में सक्षम है। जो मसीह है, मसीह के होने को अभिव्यक्त करता है, जबकि जो नहीं हैं, उनमें मसीह का स्वभाव नहीं है। इसलिए, भले ही सभी उसका विरोध करें या उसके प्रति धारणाएँ रखें, मनुष्य की धारणाओं के आधार पर कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता कि मसीह का अभिव्यक्त किया हुआ स्वभाव परमेश्वर का है। वे सब जो सच्चे हृदय से मसीह का अनुसरण करते हैं, या इस आशय से परमेश्वर को खोजते हैं, यह मानेंगे कि अपनी दिव्यता की अभिव्यक्ति के आधार पर वह मसीह है। वे कभी भी ऐसे किसी पहलू के आधार पर मसीह से इनकार नहीं करेंगे, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं है। यद्यपि मनुष्य अत्यंत मूर्ख है, किंतु सभी जानते हैं कि मनुष्य की इच्छा से क्या उपजता है और परमेश्वर से क्या उत्पन्न होता है। मात्र इतना है कि बहुत-से लोग अपने स्वयं के इरादों के कारण जानबूझकर मसीह का विरोध करते हैं। यदि ऐसा न हो, तो एक भी मनुष्य के पास मसीह के अस्तित्व से इनकार करने का कारण नहीं होगा, क्योंकि मसीह द्वारा अभिव्यक्त दिव्यता वास्तव में अस्तित्व में है और उसके कार्य को सबकी नंगी आँखों द्वारा देखा जा सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 109
मसीह का कार्य तथा अभिव्यक्ति उसके सार को निर्धारित करते हैं। वह अपने सच्चे हृदय से उसे पूर्ण करने में सक्षम है, जो उसे सौंपा गया है। वह सच्चे हृदय से स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है और सच्चे हृदय से परमपिता परमेश्वर की इच्छा खोजने में सक्षम है। यह सब उसके सार द्वारा निर्धारित होता है। और इसी प्रकार उसका प्राकृतिक प्रकाशन भी उसके सार द्वारा निर्धारित किया जाता है; इसे मैं उसका “प्राकृतिक प्रकाशन” कहता हूँ क्योंकि उसकी अभिव्यक्ति कोई नकल नहीं है, या मनुष्य द्वारा शिक्षा का परिणाम, या मनुष्य द्वारा कई वर्षों के संवर्धन का परिणाम नहीं है। उसने इसे सीखा या इससे स्वयं को सँवारा नहीं; बल्कि, यह उसमें अंतर्निहित है। मनुष्य उसके कार्य, उसकी अभिव्यक्ति, उसकी मानवता, और सामान्य मानवता के उसके संपूर्ण जीवन से इनकार कर सकता है, किंतु कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता कि वह सच्चे हृदय से स्वर्ग के परमेश्वर की आराधना करता है; कोई इनकार नहीं कर सकता है कि वह स्वर्गिक पिता की इच्छा पूरी करने के लिए आया है, और कोई उस गंभीर इच्छा से इनकार नहीं कर सकता, जिससे वह परमपिता परमेश्वर की खोज करता है। यद्यपि उसकी छवि इंद्रियों के लिए सुखद नहीं, उसके प्रवचन असाधारण प्रभामंडल से संपन्न नहीं हैं और उसका कार्य धरती या आकाश को थर्रा देने वाला नहीं है जैसा मनुष्य कल्पना करता है, वास्तव में वह मसीह है, जो सच्चे हृदय से स्वर्गिक पिता की इच्छा पूरी करता है, पूर्णतः स्वर्गिक पिता के प्रति समर्पण करता है और मृत्यु तक समर्पित रहता है। यह इसलिए क्योंकि उसका सार मसीह का सार है। मनुष्य के लिए इस तथ्य पर विश्वास करना कठिन है किंतु यह एक तथ्य है। जब मसीह की सेवकाई पूर्णतः संपन्न हो गई है, तो मनुष्य उसके कार्य से देखने में सक्षम होगा कि उसका स्वभाव और उसका अस्तित्व स्वर्ग के परमेश्वर के स्वभाव और अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है। उस समय, उसके संपूर्ण कार्य को सारांशित कर मनुष्य इसकी पुष्टि कर सकता है कि वह वास्तव में वही देह है जिसे वचन धारण करता है और एक देह और रक्त के मनुष्य के देह के समान नहीं है। पृथ्वी पर मसीह के कार्य के प्रत्येक चरण का प्रतिनिधिक महत्व है, किंतु मनुष्य जो प्रत्येक चरण के वर्तमान कार्य का अनुभव करता है, उसके कार्य के महत्व को स्पष्ट रूप से देखने में अक्षम है। ऐसा विशेष रूप से परमेश्वर द्वारा अपने दूसरे देहधारण में किए गए कार्य के अनेक चरणों के लिए है। अधिकांशतः वे जिन्होंने मसीह के वचनों को केवल सुना या देखा है, मगर जिन्होंने उसे कभी देखा नहीं है, उनके पास उसके कार्य की कोई धारणाएँ नहीं होतीं; जो मसीह को देख चुके हैं और जिन्होंने उसके वचनों को सुना है और साथ ही उसके कार्य का अनुभव किया है, वे उसके कार्य को स्वीकार करने में कठिनाई अनुभव करते हैं। क्या यह इस वजह से नहीं है कि मसीह का प्रकटन और सामान्य मानवता मनुष्य की अभिरुचि के अनुसार नहीं है? जो मसीह के चले जाने के बाद उसके कार्य को स्वीकार करते हैं, उन्हें ऐसी कठिनाइयां नहीं आएँगी, क्योंकि वे मात्र उसका कार्य स्वीकार करते हैं और मसीह की सामान्य मानवता के संपर्क में नहीं आते। मनुष्य परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाएँ छोड़ने में असमर्थ है तथा इसके बजाय गहराई से उसकी पड़ताल करता है; ऐसा इस तथ्य के कारण है कि मनुष्य केवल उसके प्रकटन पर अपना ध्यान केंद्रित करता है तथा उसके कार्य तथा वचनों के आधार पर उसके सार को पहचानने में असमर्थ रहता है। यदि मनुष्य उसके प्रकटन के प्रति अपनी आँखें बंद कर ले या मसीह की मानवता पर चर्चा से बचे और केवल उसकी दिव्यता की बात करे, जिसके कार्य तथा वचन किसी भी मनुष्य द्वारा अप्राप्य हैं, तो मनुष्य की धारणाएँ घटकर आधी रह जाएँगी, इस हद तक कि मनुष्य की समस्त कठिनाइयों का समाधान हो जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 110
जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर का सार है और जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर की अभिव्यक्ति है। चूँकि परमेश्वर देहधारी बना है, इसलिए वह उस कार्य को अपने साथ लाता है जो वह करना चाहता है और चूँकि वह देहधारी परमेश्वर है, इसलिए वह परमेश्वर का स्वरूप व्यक्त करता है और वह मनुष्य के लिए सत्य ला सकता है, उसे जीवन प्रदान कर सकता है और उसे मार्ग दिखा सकता है। जिस देह में परमेश्वर का सार नहीं है, वह निश्चित रूप से देहधारी परमेश्वर नहीं है; इसमें कोई संदेह नहीं। अगर मनुष्य यह जाँच करना चाहता है कि क्या यह परमेश्वर की देहधारी देह है, तो उसे इसका निर्धारण उसके द्वारा व्यक्त स्वभाव और उसके द्वारा बोले गए वचनों से करना चाहिए। अर्थात्, यह निर्धारित करने के लिए कि वह परमेश्वर का देहधारी स्वरूप है या नहीं और वह सच्चा मार्ग है या नहीं, व्यक्ति को उसके सार के आधार पर उसकी परख करनी चाहिए। अतः यह देहधारी परमेश्वर की देह है कि नहीं, यह निर्धारित करने की कुंजी उसके बाहरी स्वरूप के बजाय उसके सार (यानी उसके कार्य, उसके वचनों, उसके स्वभाव और बहुत-से अन्य पहलुओं) में निहित होती है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी स्वरूप की ही जाँच करता है, और परिणामस्वरूप उसके सार की अनदेखी करता है, तो इससे उसके मूर्ख और अज्ञानी होने का पता चलता है। बाहरी स्वरूप सार का निर्धारण नहीं कर सकता; इतना ही नहीं, परमेश्वर का कार्य कभी भी मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हो सकता। क्या यीशु का बाहरी स्वरूप मनुष्य की धारणाओं के विपरीत नहीं था? क्या उसका चेहरा और पहनावा उसकी असली पहचान को दर्शाने में असमर्थ नहीं थे? क्या उस समय के फरीसियों ने यीशु का ठीक इसीलिए विरोध नहीं किया था क्योंकि उन्होंने केवल उसके बाहरी स्वरूप को देखा और उसके मुख से निकले वचनों को गंभीरता से स्वीकार नहीं किया? मुझे उम्मीद है कि प्रत्येक भाई-बहन जो परमेश्वर के प्रकटन की खोज में है, वह इतिहास की त्रासदी को नहीं दोहराएगा, आधुनिक काल का फरीसी नहीं बनेगा और परमेश्वर को फिर से सलीब पर नहीं चढ़ाएगा। तुम्हें सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए कि परमेश्वर की वापसी का स्वागत कैसे किया जाए और तुम्हारे मस्तिष्क में यह स्पष्ट होना चाहिए कि ऐसा व्यक्ति कैसे बना जाए, जो सत्य के प्रति समर्पण करता है। यह हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है, जो यीशु के बादल पर सवार होकर लौटने का इंतजार कर रहा है। हमें अपनी आध्यात्मिक आँखों को साफ करना चाहिए और कल्पना के शब्दों के दलदल में नहीं फँसना चाहिए। हमें परमेश्वर के वास्तविक कार्य के बारे में सोचना चाहिए और परमेश्वर के व्यावहारिक पक्ष पर दृष्टि डालनी चाहिए। खुद को दिवास्वप्नों में बहने या खोने मत दो और हमेशा यह आशा मत करते रहो कि प्रभु यीशु अचानक बादल पर सवार होकर तुम्हारे बीच उतर आएँगे और तुम्हें—जिन्होंने उन्हें कभी जाना या देखा नहीं है और जो उनकी इच्छा के अनुसार चलना नहीं जानते—अपने साथ ले जाएँगे। इससे अधिक यथार्थवादी मामलों के बारे में सोचना बेहतर है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 111
देहधारी बना परमेश्वर स्वयं को सभी सृजित प्राणियों के सामने प्रकट करने के बजाय लोगों के उस एक हिस्से के सामने प्रकट करता है जो उस अवधि के दौरान उसका अनुसरण करते हैं, जब वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है। वह केवल अपने कार्य के एक चरण को पूरा करने के लिए देहधारी बना, मनुष्य को अपनी छवि दिखाने के लिए नहीं। लेकिन उसका कार्य स्वयं उसके द्वारा ही किया जाना चाहिए, इसलिए उसका देह में ऐसा करना आवश्यक है। जब यह कार्य पूरा हो जाएगा, तो वह मनुष्य की दुनिया से चला जाएगा; वह लंबी अवधि तक मानव-जाति के बीच नहीं रह सकता, वरना इससे आगामी कार्य में बाधा आ जाएगी। जो कुछ वह असंख्य लोगों पर प्रकट करता है, वह केवल उसका धार्मिक स्वभाव और उसके समस्त कर्म हैं, अपने दो देहधारणों की छवि नहीं, क्योंकि परमेश्वर की छवि केवल उसके स्वभाव के माध्यम से ही प्रकट की जा सकती है और इसे उसके देहधारी शरीर की छवि से बदला नहीं जा सकता है। उसके देह की छवि केवल सीमित लोगों को प्रकट की जाती है, केवल उन लोगों को जो तब उसका अनुसरण करते हैं जब वह देह में कार्य करता है। इसीलिए जो कार्य अब किया जा रहा है, वह इस तरह गुप्त रूप से किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, यीशु ने जब अपना कार्य किया, तो उसने स्वयं को केवल यहूदियों के सामने प्रकट किया और अपने आप को कभी भी किसी दूसरे देश को सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाया। इस प्रकार, जब एक बार उसने अपना कार्य समाप्त कर लिया, तो वह तुरंत ही मनुष्यों की दुनिया से चला गया और रुका नहीं; उसके बाद वह, मनुष्य की यह छवि, वो नहीं था जो स्वयं को मनुष्य को प्रकट कर रहा था, बल्कि वह पवित्र आत्मा था, जिसने सीधे तौर पर कार्य किया। एक बार जब देहधारी बने परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाता है, तो वह नश्वर संसार से चला जाएगा, और फिर कभी उस तरह का कार्य नहीं करेगा, जो उसने तब किया था, जब वह देह में था। इसके बाद का समस्त कार्य पवित्र आत्मा द्वारा सीधे तौर पर किया जाएगा। इस अवधि के दौरान मनुष्य शायद ही उसके दैहिक शरीर की छवि देख पाएगा; वह स्वयं को बिल्कुल भी मनुष्य को प्रकट नहीं करेगा, बल्कि हमेशा छिपा रहेगा। देहधारी बने परमेश्वर के कार्य के लिए समय सीमित होता है। वह एक विशेष युग, अवधि, देश और विशेष लोगों के बीच किया जाता है। वह कार्य केवल परमेश्वर के देहधारण की अवधि के दौरान के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। यह एक युग का प्रतिनिधि है, और यह एक युग-विशेष में परमेश्वर के आत्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, परमेश्वर के आत्मा के कार्य की संपूर्णता का नहीं। इसलिए, देहधारी बने परमेश्वर की छवि असंख्य लोगों के सामने प्रकट नहीं होगी। असंख्य लोगों के सामने जो चीज प्रकट होती है वह है परमेश्वर की धार्मिकता और अपनी संपूर्णता में उसका स्वभाव, न कि उसकी उस समय की छवि जब वह दो बार देहधारी बना। यह न तो एकल छवि है जो मनुष्य को प्रकट होती है, और न ही दो संयुक्त छवियाँ हैं। इसलिए, यह अनिवार्य है कि देहधारी परमेश्वर का देह उस कार्य की समाप्ति पर पृथ्वी से चला जाए, जिसे करना उसके लिए आवश्यक है, क्योंकि वह केवल उस कार्य को पूरा करने आता है जो उसे करना चाहिए, न कि लोगों को अपनी छवि प्रकट करने आता है। यद्यपि देहधारण की सार्थकता परमेश्वर द्वारा पहले ही दो बार देहधारण करके पूरी की जा चुकी है, फिर भी वह किसी ऐसे देश पर अपने आपको खुलकर प्रकट नहीं करेगा जिसने उसे पहले कभी नहीं देखा है। यीशु फिर कभी स्वयं को धार्मिकता के सूर्य के रूप में यहूदियों के सामने प्रकट नहीं करेगा, न ही वह जैतून के पहाड़ के शिखर पर खड़ा होगा और असंख्य लोगों के सामने खुद को प्रकट करेगा; यहूदियों ने जो कुछ भी देखा है वह सब यहूदिया में अपने समय के दौरान की यीशु की तसवीर है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अपने देहधारण में यीशु का कार्य दो हजार वर्ष पहले समाप्त हो गया; वह किसी यहूदी की छवि में वापस यहूदिया नहीं आएगा, एक यहूदी की छवि में अपने आप को किसी भी अन्य-जाति राष्ट्र के सामने प्रकट करने की बात तो और भी दूर रही, क्योंकि यीशु की देहधारी छवि केवल एक यहूदी की छवि है, मनुष्य के उस पुत्र की छवि नहीं है जिसे यूहन्ना ने देखा था। भले ही यीशु ने अपने अनुयायियों से वादा किया था कि वह फिर आएगा, फिर भी वह अन्य-जाति राष्ट्रों के सब लोगों के समक्ष स्वयं को यहूदी की छवि में प्रकट नहीं करेगा। तुम लोगों को यह जानना चाहिए कि परमेश्वर के देहधारी होने का कार्य एक युग का सूत्रपात करना है। यह कार्य कुछ वर्षों की अवधि तक सीमित है और वह परमेश्वर के आत्मा का समस्त कार्य पूरा नहीं कर सकता है, वैसे ही जैसे, एक यहूदी के रूप में यीशु की छवि केवल परमेश्वर की उस छवि का प्रतिनिधित्व कर सकती है, जब उसने यहूदिया में कार्य किया था, और वह केवल सलीब पर चढ़ने का कार्य ही कर सकता था। जिस अवधि के दौरान यीशु देहधारी था, वह युग का अंत करने या मानवजाति को नष्ट करने का कार्य नहीं कर सकता था। इसलिए, जब उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, और उसने अपना कार्य समाप्त कर लिया, तब वह उच्चतम ऊँचाई पर चढ़ गया और उसने हमेशा के लिए स्वयं को मनुष्य से छिपा लिया। तब से, अन्य-जाति राष्ट्रों के वे वफादार विश्वासी प्रभु यीशु के प्रकटीकरण को देखने में असमर्थ हो गए, वे केवल उसके चित्र को देखने में ही समर्थ रहे, जिसे उन्होंने दीवार पर चिपकाया था। लेकिन यह चित्र तो मनुष्य का बनाया हुआ चित्र है, न कि परमेश्वर की वह छवि है जैसी वह स्वयं को मनुष्य के सामने प्रकट करता है। परमेश्वर खुद को अपने दो देहधारणों की छवि में असंख्य लोगों के सामने खुलकर प्रकट नहीं करेगा। जो कार्य वह मनुष्यों के बीच करता है, वह इसलिए करता है ताकि वे उसके स्वभाव को समझ सकें। मनुष्य को इस सबका खुलासा भिन्न-भिन्न युगों के कार्य के माध्यम से होता है; यह उस स्वभाव के माध्यम से, जो उसने ज्ञात करवाया है और उस कार्य के माध्यम से, जो उसने किया है, संपन्न किया जाता है, यीशु की अभिव्यक्ति के माध्यम से नहीं। अर्थात्, मनुष्य को परमेश्वर की छवि देहधारी छवि के माध्यम से ज्ञात नहीं करवाई जाती है, बल्कि उस देहधारी परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य के माध्यम से ज्ञात करवाई जाती है जिसके पास छवि और आकार दोनों हैं; और उसके कार्य के माध्यम से उसकी छवि का खुलासा होता है और उसका स्वभाव ज्ञात करवाया जाता है। यही उस कार्य की सार्थकता है जिसे वह देह में करना चाहता है।
एक बार जब परमेश्वर के दो देहधारणों का कार्य समाप्त हो जाएगा, तो वह सभी अन्य-जाति राष्ट्रों में अपने धार्मिक स्वभाव को प्रकट करने लगेगा, अपनी छवि असंख्य लोगों को देखने देगा। वह अपने स्वभाव को प्रकट करेगा और इसके माध्यम से विभिन्न श्रेणियों के मनुष्यों का परिणाम प्रकट करेगा, इस प्रकार समस्त पुराने युग को पूरी तरह से समाप्त कर देगा। देह में उसका कार्य बड़े भौगोलिक क्षेत्र तक विस्तारित नहीं होता (जैसे कि यीशु ने केवल यहूदिया में काम किया, और आज मैं केवल तुम लोगों के बीच कार्य करता हूँ), इसका कारण यह है कि देह में उसके कार्य की हदें और सीमाएँ हैं। वह एक साधारण और सामान्य देह में केवल एक अल्पावधि का कार्य करता है; वह इस देहधारी देह का उपयोग शाश्वतता का कार्य करने या अन्य-जाति राष्ट्रों के असंख्य लोगों को दिखाई देने का कार्य करने के लिए नहीं करता। देह में कार्य का दायरा सीमित ही हो सकता है (जैसे कि सिर्फ यहूदिया में या सिर्फ तुम लोगों के बीच कार्य करना), और फिर इन सीमाओं के भीतर किए गए कार्य के माध्यम से इसके दायरे को तब विस्तार दिया जा सकता है। बेशक, विस्तार का कार्य सीधे तौर पर उसके आत्मा द्वारा किया जाना है और तब वह उसके देहधारी शरीर का कार्य नहीं रह जाएगा। चूँकि देह में कार्य की सीमाएँ हैं और वह विश्व के समस्त कोनों तक नहीं फैलता—वह इसे पूरा नहीं कर सकता। देह में कार्य के माध्यम से उसका आत्मा उस कार्य को करता है, जो उसके बाद आता है। इसलिए, देह में किया गया कार्य शुरुआती प्रकृति का होता है, जिसे कुछ निश्चित सीमाओं के भीतर किया जाता है; इसके बाद, उसका आत्मा उस कार्य को आगे बढ़ाता है, और इतना ही नहीं, ऐसा वह एक बढ़े हुए दायरे में करता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (2)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 112
परमेश्वर पृथ्वी पर कार्य करने केवल इसलिए आता है ताकि वह युग की अगुआई करे; उसका उद्देश्य केवल नए युग का आरंभ करना और पुराने युग को समाप्त करना है। वह पृथ्वी पर मनुष्य का जीवन जीने, स्वयं मानव-जगत के जीवन के सुख-दुःख का अनुभव करने, या किसी व्यक्ति को अपने हाथ से पूर्ण बनाने या किसी व्यक्ति को संवृद्धि करते हुए स्वयं देखने के लिए नहीं आया है। यह उसका कार्य नहीं है; उसका कार्य केवल एक नए युग का आरंभ करना और पुराने युग को समाप्त करना है। अर्थात्, वह व्यक्तिगत रूप से एक युग का आरंभ करेगा, व्यक्तिगत रूप से दूसरे युग का अंत करेगा और व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करके शैतान को पराजित करेगा। हर बार जब वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है, तो यह ऐसा होता है मानो वह युद्ध के मैदान में कदम रख रहा हो। सबसे पहले, वह विश्व को जीतता है और देह में रहते हुए शैतान पर विजय प्राप्त करता है; वह सारी महिमा प्राप्त करता है और दो हज़ार वर्षों के कार्य की समग्रता पर से पर्दा उठाता है, और उसे ऐसा बना देता है कि पृथ्वी के सभी मनुष्यों के पास चलने के लिए एक सही मार्ग और जीने के लिए एक शांतिपूर्ण और आनंदमय जीवन हो। किंतु, परमेश्वर लंबे समय तक मनुष्य के साथ पृथ्वी पर नहीं रह सकता, क्योंकि परमेश्वर तो परमेश्वर है, और अंततः मनुष्य के समान नहीं है। वह एक सामान्य मनुष्य का जीवनकाल नहीं जी सकता, अर्थात्, वह पृथ्वी पर एक ऐसे मनुष्य के रूप में नहीं रह सकता, जो साधारण के अलावा कुछ नहीं है, क्योंकि उसके पास अपने मानव-जीवन को बनाए रखने के लिए एक सामान्य मनुष्य की सामान्य मानवता का केवल एक अल्पतम अंश ही है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर पृथ्वी पर कैसे एक परिवार शुरू कर सकता है, कैसे आजीविका अपना सकता है और कैसे बच्चे पैदा कर सकता है और उनकी परवरिश कर सकता है? क्या यह उसके लिए अपमानजनक नहीं होगा? वह सिर्फ सामान्य तरीके से कार्य करने के उद्देश्य से सामान्य मानवता से संपन्न है, न कि एक सामान्य मनुष्य के समान अपना परिवार और आजीविका रखने में समर्थ होने के लिए। उसका सामान्य विवेक, सामान्य मन और उसके देह के सामान्य भोजन और वस्त्र यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं कि उसमें एक सामान्य मानवता है; यह साबित करने के लिए कि वह सामान्य मानवता से सुसज्जित है, उसे परिवार या आजीविका रखने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह पूरी तरह से अनावश्यक होगा! परमेश्वर का पृथ्वी पर आना वचन का देह बनना है; वह मनुष्य को मात्र अपने वचन को समझने और अपने वचन को देखने दे रहा है, अर्थात्, मनुष्य को देह द्वारा किए गए कार्य को देखने दे रहा है। उसका यह इरादा नहीं है कि लोग उसके देह के साथ एक निश्चित तरीके से व्यवहार करें, बल्कि केवल यह है कि मनुष्य अंत तक समर्पित बने रहें, अर्थात्, उसके मुँह से निकलने वाले सभी वचनों के प्रति समर्पित रहें और उसके द्वारा किए जाने वाले समस्त कार्य के प्रति समर्पित रहें। वह मात्र देह में कार्य कर रहा है; वह जानबूझकर मनुष्य से यह नहीं कह रहा कि वह उसकी देह की महानता या पवित्रता की सराहना करे, बल्कि वह मनुष्य को अपने कार्य की बुद्धिमानी और वह समस्त अधिकार दिखा रहा है, जिसका वह प्रयोग करता है। इसलिए, भले ही उसके पास उत्कृष्ट मानवता है, फिर भी वह कोई घोषणा नहीं करता है, और केवल उस कार्य पर ध्यान केंद्रित करता है जो उसे करना चाहिए। तुम लोगों को जानना चाहिए कि ऐसा क्यों है कि परमेश्वर देहधारी बना और फिर भी वह अपनी सामान्य मानवता का कभी भी प्रचार नहीं करता है या उसकी गवाही नहीं देता है, बल्कि इसके बजाय केवल उस कार्य को करता है, जिसे वह करना चाहता है। इसलिए, जो कुछ तुम लोग देहधारी परमेश्वर में देख सकते हो, वह उसका दिव्य स्वरूप है; इसका कारण यह है कि वह अपने मानवीय स्वरूप का ढिंढोरा नहीं पीटता, जिससे कि मनुष्य उसका अनुकरण करे। केवल जब मनुष्य लोगों की अगुआई करता है, तभी वह अपने मानवीय स्वरूप के बारे में बोलता है, ताकि वह उनकी प्रशंसा और विश्वास बेहतर ढंग से पा सके और इसके फलस्वरूप उनका अगुआ बन सके। इसके विपरीत, परमेश्वर केवल अपने कार्य (अर्थात् मनुष्य के लिए अप्राप्य कार्य) के माध्यम से ही मनुष्य पर विजय प्राप्त करता है; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि क्या मनुष्य द्वारा उसकी प्रशंसा की जाती है या वह मनुष्य से अपनी आराधना करवाता है या नहीं। वह बस अपने प्रति मनुष्य में भय की भावना या अपनी अगाधता का भाव भरता है। परमेश्वर को मनुष्य से अपनी सराहना कराने की कोई आवश्यकता नहीं है; वह मनुष्य से बस यह चाहता है कि उसका स्वभाव देख लेने के बाद मनुष्य उसका भय माने। परमेश्वर जो कार्य करता है, वह उसका अपना कार्य है; उसे उसके बजाय मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता, न ही उसे मनुष्य द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही अपना कार्य कर सकता है और मनुष्य की एक नए जीवन में अगुआई करने के लिए नए युग की शुरुआत कर सकता है। जो कार्य वह करता है, वह मनुष्य को एक नया जीवन धारण करने और नए युग में प्रवेश करने में सक्षम बनाने के लिए है। शेष कार्य उन लोगों को सौंप दिया जाता है, जो सामान्य मानवता वाले हैं और जिनकी दूसरों के द्वारा प्रशंसा की जाती है। इसलिए, अनुग्रह के युग में उसने दो हज़ार वर्षों के कार्य को देह में अपने तैंतीस वर्षों में से मात्र साढ़े तीन वर्षों में पूरा कर दिया। जब परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए पृथ्वी पर आता है, तो वह हमेशा दो हजार वर्षों के या एक समस्त युग के कार्य को कुछ ही वर्षों के लघुतम समय के भीतर पूरा कर देता है। वह ठहरता नहीं, और वह देरी नहीं करता है; वह बस कई वर्षों के काम को घनीभूत कर देता है, ताकि वह मात्र कुछ थोड़े-से वर्षों में ही पूरा हो जाए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिस कार्य को वह व्यक्तिगत रूप से करता है, वह पूर्णतः एक नया मार्ग प्रशस्त करने और एक नए युग की अगुआई करने के लिए होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (2)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 113
जब परमेश्वर अपना कार्य करता है, तो वह किसी निर्माण या आंदोलनों में शामिल होने नहीं आता, बल्कि अपनी सेवकाई करने के लिए आता है। हर बार जब वह देह बनता है, तो यह केवल कार्य के किसी चरण को पूरा करने और एक नए युग का सूत्रपात करने के लिए होता है। अब राज्य के युग का आगमन हो चुका है, और राज्य के प्रशिक्षण की शुरुआत भी। कार्य का यह चरण मनुष्य का कार्य नहीं है, और यह एक खास हद तक मनुष्य को आकार देने के लिए नहीं है, बल्कि यह केवल परमेश्वर के कार्य के एक हिस्से को पूरा करने के लिए है। जो वह करता है, वह मनुष्य का कार्य नहीं है, यह पृथ्वी को छोड़ने से पहले एक निश्चित परिणाम प्राप्त करने हेतु मनुष्य को आकार देने के लिए नहीं है; यह उसकी सेवकाई पूरी करने और उस कार्य को समाप्त करने के लिए है, जो उसे करना चाहिए, जो पृथ्वी पर उसके कार्य के लिए उचित रूप से व्यवस्थित करना है और जिसके बाद वह महिमा प्राप्त करेगा। देहधारी परमेश्वर का कार्य उन व्यक्तियों के कार्य के समान नहीं है, जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाता है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर अपना काम करने आता है, तो वह केवल अपनी सेवकाई करने की परवाह करता है। जहाँ तक उसकी सेवकाई से संबंध न रखने वाले अन्य समस्त मुद्दों की बात है, वह उनमें कोई भाग नहीं लेता, वह ऐसी चीजों पर ध्यान तक नहीं देता है। वह मात्र उस कार्य को करता है जो उसे करना चाहिए, और वह उस कार्य की बिल्कुल परवाह नहीं करता, जो मनुष्य को करना चाहिए। वह जो कार्य करता है, वह केवल उस युग से संबंधित होता है जिसमें वह होता है, और उस सेवकाई से संबंधित होता है जिसे उसे करना चाहिए, मानो अन्य सभी मुद्दे उसके दायरे से बाहर हों। वह स्वयं को एक मनुष्य के रूप में जीने से संबंधित अधिक मूलभूत ज्ञान से सुसज्जित नहीं करता, न ही वह अधिक सामाजिक कौशल सीखता है और न ही खुद को ऐसी अन्य किसी चीज़ से लैस करता है जिसे मनुष्य समझता है। वह उन तमाम चीज़ों की ज़रा भी परवाह नहीं करता जो इंसान में होनी चाहिए, और वह मात्र उस कार्य को करता है जो उसका कर्तव्य है। और इस प्रकार, जैसा कि मनुष्य इसे देखता है, देहधारी परमेश्वर इतना अपूर्ण है—जो बातें मनुष्य में होनी चाहिए, वह उनकी तरफ भी कोई ध्यान नहीं देता, और उसे ऐसी बातों की कोई समझ नहीं है। जीवन के बारे में सामान्य ज्ञान जैसी चीज़ें, साथ ही आचरण करने और दुनिया के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत, इन सबका उससे लगभग पूरी तरह से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन तुम देहधारी परमेश्वर में असामान्यता का जरा-सा भी संकेत नहीं पा सकते। कहने का अभिप्राय यह है कि उसकी मानवता केवल एक सामान्य मानवीय जीवन और उसके मस्तिष्क के सामान्य विवेक को बनाए रखती है और उसे सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता प्रदान करती है। लेकिन वह स्वयं को और किसी चीज से लैस नहीं करता है, जो सिर्फ़ मनुष्य (सृजित प्राणियों) में होनी चाहिए। परमेश्वर केवल अपनी सेवकाई करने के लिए देहधारी बनता है। उसका कार्य पूरे युग की ओर निर्देशित होता है, न कि किसी एक व्यक्ति या स्थान के लिए, वह समूचे ब्रह्मांड के लिए निर्देशित होता है। यही उसके कार्य की दिशा और वह सिद्धांत है, जिसके द्वारा वह कार्य करता है। कोई इसे बदल नहीं सकता, और मनुष्य के पास इसमें शामिल होने का कोई उपाय नहीं है। हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तो वह अपने साथ उस युग के कार्य को लेकर आता है, और बीस, तीस, चालीस यहाँ तक कि सत्तर या अस्सी वर्षों तक मनुष्य के साथ रहने का उसका कोई इरादा नहीं होता, जिससे कि मनुष्य उसे बेहतर ढंग से समझ सके और उसे भली-भाँति जान सके। इसकी कोई आवश्यकता नहीं है! ऐसा करने से परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव के बारे में मनुष्य का ज्ञान बिल्कुल भी गहरा नहीं होगा; इसके बजाय, यह केवल उसकी धारणाओं में वृद्धि ही करेगा और उसकी धारणाओं और विचारों को पुख्ता ही बनाएगा। इसलिए तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि वास्तव में देहधारी परमेश्वर का कार्य क्या है। निश्चित रूप से तुम लोग मेरे इन वचनों को समझने से चूक नहीं सकते, जो मैंने तुम लोगों से कहे थे : “मैं एक सामान्य मनुष्य के जीवन का अनुभव करने के लिए नहीं आया हूँ”। क्या तुम लोग इन वचनों को भूल गए हो : “परमेश्वर पृथ्वी पर एक सामान्य मनुष्य का जीवन जीने के लिए नहीं आता”? तुम लोग परमेश्वर के देह बनने के उद्देश्य को नहीं समझते, और न ही तुम लोग यह जानते हो : “परमेश्वर एक सृजित प्राणी के जीवन का अनुभव करने के इरादे से पृथ्वी पर आखिर कैसे आ सकता है?” परमेश्वर पृथ्वी पर केवल अपना काम पूरा करने आता है, और इसलिए पृथ्वी पर उसका कार्य थोड़े समय का होता है। वह पृथ्वी पर इस इरादे के साथ नहीं आता कि परमेश्वर का आत्मा उसके देह को एक ऐसे श्रेष्ठ मानव के रूप में विकसित करे, जो कलीसिया की अगुआई करेगा। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो यह मार्ग का देह बनना है; हालाँकि मनुष्य उसके कार्य को नहीं जानता और ज़बरदस्ती चीज़ों को उस पर थोपता है। किंतु तुम सब लोगों को यह समझना चाहिए कि परमेश्वर देह बना मार्ग है, न कि उस समय के लिए परमेश्वर की भूमिका निभाने हेतु पवित्र आत्मा द्वारा विकसित किया गया एक देह। स्वयं परमेश्वर विकसित किया गया उत्पाद नहीं है, बल्कि देह बना मार्ग है और आज वह तुम सब लोगों के बीच अपने कार्य को आधिकारिक रूप से कर रहा है। तुम सब जानते और मानते हो कि परमेश्वर का देहधारण एक तथ्यामक सत्य है, लेकिन तुम लोग ऐसा अभिनय करते हो, मानो तुम इसे समझते हो। देहधारी परमेश्वर के कार्य से लेकर उसके देहधारण के महत्व और सार तक, तुम लोग इन्हें ज़रा-भी नहीं समझते हो, और स्मृति से वचनों को धाराप्रवाह बोलने में दूसरों का अनुसरण करते हो। क्या तुम मानते हो कि देहधारी परमेश्वर वैसा ही है, जैसी तुम कल्पना करते हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (3)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 114
परमेश्वर केवल युग की अगुआई करने और एक नए कार्य को गतिमान करने के लिए देह बनता है। तुम लोगों के लिए इस बिंदु को समझना आवश्यक है। यह मनुष्य के काम से बहुत अलग है, और दोनों एक साँस में उल्लेख किए जाने योग्य नहीं हैं। कार्य करने के लिए उपयोग किए जा सकने से पूर्व मनुष्य को लंबी अवधि तक विकसित और पूर्ण किए जाने की आवश्यकता होती है, और इसके लिए एक विशेष रूप से उच्च स्तर की मानवता अपेक्षित होती है। मनुष्य को न केवल अपना सामान्य मानवता के विवेक को बनाए रखने में सक्षम होना चाहिए, बल्कि उसे उन अनेक सिद्धांतों और नियमों को भी समझना चाहिए जिनके द्वारा वह संसार से पेश आता है, और इतना ही नहीं, उसे मनुष्य की बुद्धि और नैतिक ज्ञान का और अधिक अध्ययन करने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। मनुष्य के अंदर ये तमाम बातें होनी चाहिए। लेकिन, देहधारी परमेश्वर के मामले में ऐसा नहीं है, क्योंकि उसका कार्य न तो मनुष्य का प्रतिनिधित्व करता है और न ही वह मनुष्य का कार्य है, और इसके बजाय यह उसके अस्तित्व की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है और उस कार्य का प्रत्यक्ष प्रदर्शन है, जो उसे करना चाहिए। (स्वाभाविक रूप से उसका कार्य उपयुक्त समय पर किया जाता है, आकस्मिक या ऐच्छिक ढंग से नहीं, और वह तब शुरू होता है, जब उसकी सेवकाई करने का समय होता है।) वह मनुष्य के जीवन में या मनुष्य के कार्य में भाग नहीं लेता, अर्थात्, उसकी मानवता इनमें से किसी से युक्त नहीं होती (हालाँकि इससे उसका कार्य प्रभावित नहीं होता)। वह अपनी सेवकाई तभी करता है, जब उसके लिए ऐसा करने का समय होता है; उसकी स्थिति कुछ भी हो, वह बस उस कार्य को करने पर ध्यान देता है, जो उसे करना चाहिए। मनुष्य उसके बारे में जो कुछ भी जानता हो या उसके बारे में जो भी राय रखता हो, इससे उसके कार्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उदाहरण के लिए, जब यीशु ने अपना काम किया था, तब कोई नहीं जानता था कि वह कौन है, परंतु उसने केवल अपना काम करने पर ध्यान दिया। इसमें से किसी ने भी उसे उस कार्य को करने में बाधा नहीं डाली, जो उसे करना था। इसलिए, उसने पहले अपनी पहचान को उजागर या घोषित नहीं किया, और बस लोगों को अपना अनुसरण करने दिया। स्वाभाविक रूप से यह केवल परमेश्वर की विनम्रता नहीं थी; बल्कि वह तरीका भी था, जिससे परमेश्वर ने देह में काम किया था। वह केवल इसी तरीके से काम कर सकता था, क्योंकि मनुष्य के पास उसे खुली आँखों से पहचानने का कोई तरीका नहीं था। और यदि मनुष्य उसे पहचान भी लेता, तो भी इससे उसके काम को सहायता नहीं मिलती। इसके अतिरिक्त, वह इसलिए देहधारी नहीं हुआ कि मनुष्य उसके देह को जान जाए; बल्कि अपना कार्य और अपनी सेवकाई करने के लिए हुआ था। इस कारण से, उसने अपनी पहचान सार्वजनिक करने को कोई महत्व नहीं दिया। जब उसने वह सारा कार्य पूरा कर लिया, जो उसे करना चाहिए था, तब उसकी पूरी पहचान और हैसियत स्वभाविक रूप से मनुष्य पर स्पष्ट हो गई। देहधारी परमेश्वर मौन रहता है और कभी कोई घोषणाएँ नहीं करता। वह न तो मनुष्य कैसा है इस पर, और न ही इस बात पर कोई ध्यान नहीं देता है कि मनुष्य उसका अनुसरण किस तरह कर रहा है, वह बस अपनी सेवकाई करने और वह कार्य करने पर ध्यान देता है, जो उसे करना चाहिए। कोई भी उसके कार्य के मार्ग में बाधा नहीं बन सकता। जब उसके कार्य के समापन का समय आएगा, तब वह अवश्य ही पूरा और समाप्त किया जाएगा, और कोई भी अन्यथा आदेश नहीं दे सकता। अपने कार्य की समाप्ति के बाद जब वह मनुष्य से विदा होकर चला जाएगा, तभी मनुष्य उसके द्वारा किए गए कार्य को समझेगा, यद्यपि पूरी तरह स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाएगा। और जिन इरादों से पहली बार उसने अपना कार्य किया, उन्हें समझने में मनुष्य को बहुत समय लगेगा। दूसरे शब्दों में, देहधारी परमेश्वर के युग का कार्य दो भागों में विभाजित है। कार्य का एक भाग परमेश्वर के देहधारी शरीर द्वारा व्यक्तिगत रूप से कार्य करना और बोलना है। एक बार जब उसके देह की सेवकाई पूरी तरह से संपन्न हो जाती है, तो कार्य का दूसरा भाग उन लोगों द्वारा किया जाना शेष रह जाता है, जिनका उपयोग पवित्र आत्मा द्वारा किया जाता है। इस समय इंसान को अपना काम पूरा करना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर पहले ही मार्ग प्रशस्त कर चुका है, और अब मनुष्य को उस पर स्वयं चलने की आवश्यकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि कार्य के एक भाग को देहधारी परमेश्वर करता है, और इसके बाद पवित्र आत्मा और उसके द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोग उस कार्य को आगे बढ़ाते हैं। अतः मनुष्य को पता होना चाहिए कि इस चरण में देहधारी परमेश्वर द्वारा प्राथमिक रूप से किए जाने वाले कार्य में क्या अपरिहार्य है, और उसे समझना चाहिए कि परमेश्वर के देहधारी होने का महत्व क्या है और उसके द्वारा किया जाने वाला कार्य क्या है, और परमेश्वर से वैसी माँगें नहीं करनी चाहिए, जैसी मनुष्य से की जाती हैं। इसी में मनुष्य की गलती, उसकी धारणा और उससे भी अधिक उसकी विद्रोहशीलता छिपी है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (3)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 115
परमेश्वर इस आशय से देह धारण नहीं करता कि मनुष्य उसे जाने, या देहधारी परमेश्वर की देह और मनुष्य की देह के अंतर पहचाने; न ही वह मनुष्य के विवेक की शक्तियों को प्रशिक्षित करने के लिए देह बनता है, और इस अभिप्राय से तो बिल्कुल नहीं बनता कि मनुष्य परमेश्वर द्वारा धारित देह की आराधना करे, जिससे वह बड़ी महिमा प्राप्त करता है। इसमें से कोई भी परमेश्वर के देह बनने का उद्देश्य नहीं है। न ही परमेश्वर मनुष्य की निंदा करने के लिए देह धारण करता है, न ही जानबूझकर मनुष्य को उजागर करने के लिए, और न ही उसके लिए चीज़ों को कठिन बनाने के लिए। इनमें से कोई भी परमेश्वर का इरादा नहीं है। हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तो यह कार्य का एक अपरिहार्य रूप होता है। वह अपने महत्तर कार्य और महत्तर प्रबंधन की खातिर ऐसा करता है—यह वैसा नहीं है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है। परमेश्वर पृथ्वी पर केवल अपने कार्य की अपेक्षाओं और जैसी आवश्यकता है उसके अनुसार आता है। वह पृथ्वी पर मात्र इधर-उधर देखने के इरादे से नहीं आता, बल्कि उस कार्य को करने लिए आता है जो उसे करना चाहिए। अन्यथा वह इतना भारी बोझ क्यों उठाएगा और इस कार्य को करने के लिए इतना बड़ा जोखिम क्यों लेगा? परमेश्वर केवल तभी देह बनता है, जब उसे बनना होता है, और वह हमेशा एक विशिष्ट अर्थ के साथ देह बनता है। यदि यह सिर्फ इसलिए होता कि मनुष्य उसे देखे और अपने अनुभव का क्षितिज व्यापक करे, तो वह निश्चित ही इतने हल्केपन से लोगों के बीच कभी नहीं आता। वह पृथ्वी पर अपने प्रबंधन और अपने महत्तर कार्य के लिए, और इस उद्देश्य से आता है, कि अधिक लोगों को प्राप्त कर सके। वह युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए आता है, वह शैतान को पराजित करने के लिए आता है, और वह शैतान को पराजित करने के लिए देहधारण करता है। इसके अतिरिक्त, वह जीवन जीने में समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करने के लिए आता है। यह सब उसके प्रबंधन से संबंध रखता है, और यह पूरे ब्रह्मांड के कार्य से संबंध रखता है। यदि परमेश्वर मनुष्य को मात्र अपनी देह को जानने देने और मनुष्य की आँखें खोलने के लिए देह बनता, तो वह हर देश की यात्रा क्यों न करता? क्या यह अत्यधिक आसान न होता? परंतु उसने ऐसा नहीं किया, इसके बजाय वह रहने और उस कार्य को आरंभ करने के लिए, जो उसे करना चाहिए, एक उपयुक्त स्थान चुनता है। बस यह अकेला देह ही काफी अर्थपूर्ण है। वह संपूर्ण युग का प्रतिनिधित्व करता है, और संपूर्ण युग का कार्य भी करता है; वह पुराने युग का समापन और नए युग का सूत्रपात दोनों करता है। यह सब एक महत्वपूर्ण मामला है, जो परमेश्वर के प्रबंधन से संबंधित है, और यह सब कार्य के उस एक चरण के मायने हैं, जिसे संपन्न करने परमेश्वर पृथ्वी पर आता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (3)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 116
परमेश्वर द्वारा मनुष्य को बचाने का कार्य सीधे तौर पर आत्मा के माध्यम से और आत्मा की पहचान के साथ नहीं किया जाता, क्योंकि उसके आत्मा को मनुष्य द्वारा न तो छुआ जा सकता है, न देखा जा सकता है और न ही मनुष्य उसके निकट जा सकता है। अगर वह सीधे आत्मा के रूप में मनुष्य को बचाने का प्रयास करता तो मनुष्य उसका उद्धार प्राप्त करने में असमर्थ होता। यदि परमेश्वर एक सृजित मनुष्य का बाहरी रूप धारण न करता तो मनुष्य के लिए इस उद्धार को प्राप्त करने का कोई उपाय न होता। क्योंकि मनुष्य के पास उसके करीब आने का कतई कोई तरीका नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे कोई भी यहोवा के बादल के पास नहीं जा पाया था। केवल एक सृजित मनुष्य बनकर, यानी परमेश्वर जो देह बनने वाला है उस देह में अपने वचन को रखकर ही वह व्यक्तिगत रूप से वचन को उन सभी लोगों में सन्निविष्ट कर सकता है जो उसका अनुसरण करते हैं। केवल तभी मनुष्य व्यक्तिगत रूप से उसके वचन को सुन और देख सकता है और उसके वचन को प्राप्त भी कर सकता है और इस तरीके से पूरी तरह बचाया जा सकता है। यदि परमेश्वर देहधारी न बनता तो देह और रक्त से बना कोई भी मनुष्य ऐसा महान उद्धार प्राप्त न कर पाता, न ही एक भी मनुष्य बचाया जाता। यदि परमेश्वर का आत्मा सीधे मानवजाति के बीच कार्य करता तो पूरी मानवजाति मार गिराई जाती या फिर परमेश्वर के संपर्क में आने का कोई उपाय न होने के कारण वह शैतान द्वारा पूरी तरह से बंदी बना ली जाती। प्रथम देहधारण मनुष्य को पाप से छुटकारा दिलाने के लिए था, उसे यीशु के दैहिक शरीर के माध्यम से छुटकारा दिलाने के लिए था, अर्थात् यीशु ने मनुष्य को सलीब से बचाया, किंतु शैतानी भ्रष्ट स्वभाव मनुष्य के भीतर अभी भी बचे रह गए। दूसरा देहधारण अब पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए नहीं है, अपितु उन लोगों को पूरी तरह से बचाने के लिए है जिन्हें पाप से छुटकारा दिलाया गया था। यह इसलिए किया जाता है ताकि जिनके पापों को क्षमा किया जा चुका है वे अपने पाप से मुक्त और पूरी तरह से शुद्ध हो सकें और स्वभावगत बदलाव हासिल कर सकें और इस प्रकार शैतान के अंधकार के प्रभाव से मुक्त हो जाएँ और परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आएँ। केवल इसी तरीके से मनुष्य पूरी तरह से पावनीकृत हो सकता है। व्यवस्था के युग का अंत होने के बाद और अनुग्रह के युग के आरंभ से परमेश्वर ने उद्धार-कार्य शुरू किया, जो अंत के दिनों में जारी है, जब परमेश्वर मनुष्य की विद्रोहशीलता के लिए उसके न्याय और ताड़ना का कार्य करता है और इस प्रकार मानवजाति को पूरी तरह से शुद्ध करता है। केवल इसके बाद ही परमेश्वर उद्धार के अपने कार्य का समापन करेगा और विश्राम में प्रवेश करेगा। इसलिए, कार्य के तीन चरणों में परमेश्वर स्वयं मनुष्य के बीच अपना कार्य करने के लिए केवल दो बार देहधारी हुआ है। वह इसलिए, क्योंकि कार्य के तीन चरणों में से केवल एक चरण ही लोगों का जीवन जीने में मार्गदर्शन करने के लिए है, जबकि अन्य दो चरणों में उद्धार का कार्य शामिल है। केवल देहधारी होकर ही परमेश्वर मनुष्य के साथ रह सकता है, संसार के कष्ट का अनुभव कर सकता है और एक सामान्य दैहिक शरीर में रह सकता है। केवल इसी तरह से वह लोगों को उस व्यावहारिक वचन की आपूर्ति कर सकता है जिसकी उन्हें सृजित प्राणी होने के नाते आवश्यकता है। परमेश्वर के देहधारण के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर से पूर्ण उद्धार प्राप्त करता है, न कि अपनी प्रार्थनाओं के उत्तर में सीधे स्वर्ग से। मनुष्य देह और रक्त से बना है, उसके पास परमेश्वर के आत्मा को देखने का कोई उपाय नहीं है, उसके आत्मा के निकट पहुँचने की तो बात ही छोड़ दो, इसलिए मनुष्य जिसके संपर्क में आ सकता है वह सिर्फ परमेश्वर का देहधारी देह है। केवल इसी तरीके से मनुष्य समस्त वचन और सभी सत्य समझ पाता है और पूर्ण उद्धार प्राप्त कर पाता है। दूसरा देहधारण मनुष्य को उसके पापों से छुटकारा दिलाने और उसे पूरी तरह से शुद्ध करने के लिए पर्याप्त है। इसलिए, दूसरे देहधारण के साथ देह में परमेश्वर का संपूर्ण कार्य समाप्त कर दिया जाएगा और परमेश्वर के देहधारण का महत्व पूरा कर दिया जाएगा। उसके बाद देह में परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। दूसरे देहधारण के बाद वह अपने कार्य के लिए तीसरी बार देहधारी नहीं होगा। क्योंकि उसका संपूर्ण प्रबंधन समाप्त हो गया होगा, अंत के दिनों के देहधारण ने अपने चुने हुए लोगों को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा, और अंत के दिनों में मानवजाति को उसकी किस्म के अनुसार छाँट लिया गया होगा। वह अब और उद्धार-कार्य नहीं करेगा, न ही वह कोई कार्य करने के लिए देह में लौटेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 117
मनुष्य ने अब जो कुछ हासिल किया है—अपना वर्तमान आध्यात्मिक कद, ज्ञान, प्रेम, वफादारी, समर्पण और अंतर्दृष्टि—ये वे परिणाम हैं, जो वचन के न्याय के माध्यम से प्राप्त किए गए हैं। तुम जो वफादारी रखने और आज तक खड़े रहने में समर्थ हो, यह वचन के माध्यम से प्राप्त किया गया है। अब मनुष्य देखता है कि देहधारी परमेश्वर का कार्य वास्तव में असाधारण है और इसमें ऐसी कई चीजें हैं जिन्हें मनुष्य द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता, और वे रहस्य और चमत्कार हैं। इसलिए बहुतों ने समर्पण कर दिया है। कुछ लोगों ने अपने जन्म के समय से ही किसी भी मनुष्य के प्रति समर्पण नहीं किया है, फिर भी जब वे आज परमेश्वर के वचनों को देखते हैं, तो वे अनजाने ही पूरी तरह से समर्पण कर देते हैं और वे जाँच करने या कुछ और कहने की हिम्मत नहीं करते। मनुष्य वचन के अधीन गिर गया है और वचन के न्याय के अधीन दंडवत पड़ा है। यदि परमेश्वर का आत्मा मनुष्यों से सीधे बात करता, तो समस्त मानवजाति उस वाणी के प्रति समर्पण कर देती, परमेश्वर द्वारा अपने वचनों से मनुष्य को उजागर करने की जरूरत के बिना ही दंडवत हो जाती, बिल्कुल वैसे ही जैसे पौलुस दमिश्क की राह पर ज्योति के मध्य भूमि पर गिर गया था। यदि परमेश्वर इसी तरीके से काम करता रहता, तो मनुष्य वचन के न्याय के माध्यम से अपनी भ्रष्टता जानने और इसके परिणामस्वरूप उद्धार प्राप्त करने में कभी समर्थ न होता। केवल देह बनकर ही परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपने वचन हर मनुष्य के कानों तक पहुँचा सकता है, ताकि वे सभी, जिनके पास कान हैं, उसके वचन सुन सकें और वचन के द्वारा उसके न्याय का कार्य स्वीकार कर सकें। यह वह सच्चा परिणाम है जो उसके वचन द्वारा प्राप्त होता है, न कि मनुष्य को भय से अभिभूत करने के लिए आत्मा का प्रकट होना। केवल इस व्यावहारिक और फिर भी असाधारण कार्य के माध्यम से ही मनुष्य के पुराने स्वभाव, जो अनेक वर्षों से उसके भीतर गहराई में छिपे हुए हैं, पूरी तरह से उजागर किए जा सकते हैं, ताकि मनुष्य उन्हें पहचान सके और बदलाव अनुभव कर सके। ये सब चीजें देहधारी परमेश्वर का व्यावहारिक कार्य हैं, जिसमें वह एक पूर्णतः व्यावहारिक तरीके से बोलता और न्याय करता है और फिर वचन के द्वारा मनुष्य पर न्याय के परिणाम प्राप्त करता है। यह देहधारी परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर के देहधारण का महत्व है। यह देहधारी परमेश्वर का अधिकार प्रकट करने, वचन के कार्य द्वारा प्राप्त किए गए परिणाम प्रकट करने और यह प्रकट करने के लिए किया जाता है कि आत्मा देह में आ चुका है और वचन के द्वारा मनुष्य का न्याय करने के माध्यम से अपना अधिकार प्रदर्शित करता है। यद्यपि उसकी देह एक साधारण, सामान्य मानवता का बाहरी आवरण है, किंतु उसके वचनों से प्राप्त परिणाम मनुष्य को दिखाते हैं कि वह अधिकार से परिपूर्ण है, कि वह स्वयं परमेश्वर है और उसके वचन स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं। इसके माध्यम से समस्त मानवता को दिखाया जाता है कि वह स्वयं परमेश्वर है, कि वह स्वयं परमेश्वर है जो देहधारी हुआ है, कि कोई भी उसका अपमान नहीं कर सकता, और कि कोई भी उसके वचन के द्वारा किए गए न्याय के परे नहीं हो सकता और अंधकार की कोई भी शक्ति उसके अधिकार पर हावी नहीं हो सकती। उसके प्रति मनुष्य का समर्पण पूरी तरह उस देह के कारण है जिसमें वह देहधारी हुआ है, यह पूरी तरह उसके अधिकार के कारण और वचन द्वारा उसके न्याय के कारण है। उसके देहधारी देह द्वारा लाया गया कार्य ही वह अधिकार है जो उसके पास है। उसके देह धारण करने का कारण यह है कि देह के पास भी अधिकार हो सकता है, और वह मनुष्यों के बीच एक व्यावहारिक तरीके से उस तरह कार्य करने में सक्षम है जो मनुष्यों के लिए दृष्टिगोचर और मूर्त है। यह कार्य उस कार्य से कहीं अधिक व्यावहारिक है जिसे परमेश्वर का आत्मा सीधे तौर पर करता है, वह जिसमें समस्त अधिकार है और इसके परिणाम भी स्पष्ट हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि देहधारी परमेश्वर का देह व्यावहारिक तरीके से बोल और कार्य कर सकता है। उसकी देह का बाहरी आवरण कोई अधिकार नहीं रखता और मनुष्य उसके करीब पहुँच सकता है, जबकि उसका सार अधिकार वहन करता है किंतु उसका अधिकार किसी के लिए भी दृष्टिगोचर नहीं है। जब वह बोलता और कार्य करता है तो मनुष्य उसके अधिकार की मौजूदगी का पता लगाने में असमर्थ होता है; इससे उसे अपना व्यावहारिक कार्य करने में सुविधा होती है। यह समस्त व्यावहारिक कार्य परिणाम प्राप्त कर सकता है। हालाँकि कोई मनुष्य यह एहसास नहीं करता कि परमेश्वर अधिकार रखता है या नहीं देखता कि परमेश्वर के प्रति कोई अपमान नहीं किया जा सकता या परमेश्वर का कोप नहीं देखता, फिर भी वह अपने छिपे हुए अधिकार, अपने छिपे हुए कोप और उन वचनों के माध्यम से, जिन्हें वह खुलकर बोलता है, अपने वचनों के अभीष्ट परिणाम प्राप्त कर लेता है। दूसरे शब्दों में, उसकी आवाज के लहजे, उसकी वाणी की कठोरता और उसके वचनों की समस्त बुद्धि के माध्यम से मनुष्य पूरी तरह से आश्वस्त हो जाता है। इस तरीके से मनुष्य उस देहधारी परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पण कर देता है, जिसके पास ऐसा लगता है कि कोई अधिकार नहीं है, जिससे मनुष्य को बचाने का परमेश्वर का लक्ष्य पूरा होता है। यह उसके देहधारण के महत्व का एक और पहलू है : अधिक व्यावहारिक ढंग से बोलना, अपने वचनों की वास्तविकता को मनुष्य में अपने परिणाम प्राप्त करने देना और मनुष्य को परमेश्वर के वचन की शक्ति देखने देना। अतः यदि यह कार्य देहधारण के माध्यम से न किया जाता, तो यह मामूली परिणाम भी प्राप्त न करता और पापी लोगों को पूरी तरह से बचाने में सक्षम न होता। यदि परमेश्वर देहधारी न होता तो वह आत्मा बना रहता जो मनुष्यों के लिए अदृश्य और अगम्य दोनों है। चूँकि मनुष्य देह वाला प्राणी है, इसलिए वह और परमेश्वर दो अलग-अलग दुनिया के हैं और अलग-अलग प्रकृति के हैं। परमेश्वर का आत्मा देह वाले मनुष्य से बेमेल है और उनके बीच संबंध स्थापित किए जाने का कोई उपाय ही नहीं है; दूसरी ओर, मनुष्य आत्मा बनने में अक्षम है। ऐसा होने के कारण, अपना मूल काम करने के लिए परमेश्वर के आत्मा को एक सृजित प्राणी बनना आवश्यक है। परमेश्वर दोनों काम कर सकता है, वह सबसे ऊँचे स्थान पर आरोहण भी कर सकता है और मनुष्यों के बीच कार्य करने और उनके बीच रहने के लिए विनम्र होकर सृजित मनुष्य भी बन सकता है, किंतु मनुष्य सबसे ऊँचे स्थान पर आरोहण नहीं कर सकता और आत्मा नहीं बन सकता और निम्नतम स्थान में तो बिल्कुल भी नहीं उतर सकता। इसीलिए अपना कार्य करने हेतु परमेश्वर का देहधारी होना आवश्यक है। यह ठीक वैसा ही है, जैसे कि प्रथम देहधारण के दौरान, केवल देहधारी परमेश्वर का देह ही सलीब पर चढ़ने के माध्यम से मनुष्य को छुटकारा दिला सकता था, जबकि परमेश्वर के आत्मा के पास मनुष्य के लिए पापबलि के रूप में सलीब पर चढ़ने का कोई उपाय नहीं था। परमेश्वर मनुष्य के लिए एक पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए सीधे देहधारी हो सकता था, किंतु मनुष्य परमेश्वर द्वारा अपने लिए तैयार की गई पापबलि लेने के लिए सीधे स्वर्ग में आरोहण नहीं कर सकता था। ऐसा होने के कारण, मनुष्य द्वारा इस उद्धारकारी अनुग्रह को लेने के लिए स्वर्ग में आरोहण करने के बजाय, यही संभव था कि परमेश्वर से कुछ बार स्वर्ग और पृथ्वी के बीच आने-जाने का आग्रह किया जाए, क्योंकि मनुष्य पतित हो चुका था, और इससे भी बढ़कर, वह स्वर्ग में आरोहण नहीं कर सकता था और पापबलि तो बिल्कुल भी प्राप्त नहीं कर सकता था। इसलिए, यीशु के लिए मनुष्यों के बीच आना और व्यक्तिगत रूप से उस कार्य को करना आवश्यक था, जिसे मनुष्य द्वारा पूरा किया ही नहीं जा सकता था। हर बार जब परमेश्वर देहधारी होता है, तब यह परम आवश्यकता के कारण होता है। यदि किसी भी चरण को परमेश्वर के आत्मा द्वारा सीधे संपन्न किया जा सकता, तो वह देहधारी होने के साथ आने वाली शिकायतों और अपमान के लिए स्वयं को प्रस्तुत न करता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 118
परमेश्वर इसलिए देहधारी हुआ क्योंकि उसके कार्य का लक्ष्य शैतान की आत्मा, या कोई ऐसी चीज नहीं जो देह की न हो, बल्कि मनुष्य है, जो हाड़-माँस का बना है और जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है। चूँकि इंसान की देह को भ्रष्ट कर दिया गया है, इसलिए परमेश्वर ने हाड़-माँस के मनुष्य को अपने कार्य का लक्ष्य बनाया है; इससे भी अधिक, चूँकि मनुष्य भ्रष्टता का लक्ष्य है इसी कारण से परमेश्वर ने उद्धार-कार्य के समस्त चरणों के दौरान मनुष्य को अपने कार्य का एकमात्र लक्ष्य के रूप में चुना है। मनुष्य एक नश्वर प्राणी है, देह और लहू से बना है, और एकमात्र परमेश्वर ही मनुष्य को बचा सकता है। इस प्रकार, परमेश्वर को अपना कार्य करने के लिए देहधारी होना होगा जिसमें मनुष्य के समान ही गुण हों, ताकि उसका कार्य बेहतर प्रभाव पैदा कर सके। परमेश्वर को अपना कार्य करने के लिए इसलिए देह धारण करना होगा क्योंकि मनुष्य हाड़-माँस से बना है और वह न तो पाप पर विजय पा सकता है और न ही स्वयं को शरीर से अलग कर सकता है। हालाँकि देहधारी परमेश्वर का सार और उसकी पहचान, मनुष्य के सार और पहचान से बहुत अधिक भिन्न है, फिर भी उसका रूप-रंग तो मनुष्य के समान ही है; उसका रूप-रंग किसी सामान्य व्यक्ति जैसा है, वह एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही जीवन जीता है, देखने वाले उसमें और किसी सामान्य व्यक्ति के बीच भेद नहीं कर सकते। यह सामान्य रूप-रंग और सामान्य मानवता उसके लिए सामान्य मानवता में अपना दिव्य कार्य करने हेतु पर्याप्त हैं। यह देह उसे सामान्य मानवता में अपना कार्य करने और इंसानों के बीच कार्य करने में उसकी सहायता करती है, इससे भी अधिक उसकी सामान्य मानवता इंसानों के बीच उद्धार-कार्य को कार्यान्वित करने में उसकी सहायता करती है। हालाँकि उसकी सामान्य मानवता ने लोगों में काफी कोलाहल मचा दिया है, फिर भी ऐसे कोलाहल ने उसके कार्य के सामान्य प्रभावों पर कोई असर नहीं डाला है। संक्षेप में, उसकी सामान्य देह का कार्य मनुष्य के लिए सर्वाधिक लाभदायक है। हालाँकि अधिकांश लोग उसकी सामान्य मानवता को स्वीकार नहीं कर सकते, तब भी उसका कार्य परिणाम हासिल कर सकता है, और ये परिणाम उसकी सामान्य मानवता के कारण प्राप्त होते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है। देह में उसके कार्य से, मनुष्य उन धारणाओं की अपेक्षा दस गुना या दर्जनों गुना ज़्यादा चीज़ों को प्राप्त करता है जो मनुष्य के बीच उसकी सामान्य मानवता को लेकर मौजूद हैं, और ऐसी धारणाओं को अंततः उसका कार्य पूरी तरह से निगल जाएगा। और वह प्रभाव जो उसके कार्य ने प्राप्त किया है, यानी उसके बारे में मनुष्य के पास जो ज्ञान है, मनुष्य की धारणाओं से बहुत अधिक बड़ा है। वह देह में जो कार्य करता है उसकी कल्पना करने या उसे मापने का कोई तरीका नहीं है, क्योंकि उसकी देह किसी हाड़-माँस के इंसान की तरह नहीं है; हालाँकि उनका बाहरी रूप एक जैसा है, फिर भी सार एक जैसा नहीं है। उसकी देह परमेश्वर के बारे में लोगों के बीच कई तरह की धारणाओं को जन्म देती है, लेकिन उसकी देह मनुष्य को अधिक ज्ञान भी अर्जित करने दे सकती है, और वह किसी भी ऐसे व्यक्ति पर विजय प्राप्त कर सकती है जिसका बाहरी रूप समान ही है। क्योंकि वह मात्र एक मनुष्य नहीं है, बल्कि मनुष्य जैसे बाहरी रूप वाला परमेश्वर है, कोई भी पूरी तरह से उसकी गहनता से जाँच नहीं कर सकता है और न ही उसे समझ सकता है। सभी लोग एक अदृश्य और अस्पृश्य परमेश्वर से प्रेम करते हैं और उसका स्वागत करते हैं। यदि परमेश्वर मात्र एक अदृश्य आत्मा हो, तो परमेश्वर पर विश्वास करना इंसान के लिए बहुत आसान हो जाता है। लोग अपनी कल्पना को खुली छूट दे सकते हैं, अपने आपको खुश करने के लिए किसी भी छवि को परमेश्वर की छवि के रूप में चुन सकते हैं और खुद को प्रसन्न महसूस करा सकते हैं। इस तरह से, लोग बेहिचक वह सब कर सकते हैं जो उनके “परमेश्वर” को सबसे अधिक पसंद हो और जो वह चाहता है कि वे करें, इसके अलावा, लोग मानते हैं कि “परमेश्वर” के प्रति उनसे ज़्यादा निष्ठावान भक्त और कोई नहीं है, बाकी सब तो अन्य-जातियों के कुत्ते हैं, और परमेश्वर के प्रति वफादार नहीं हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि जिनका परमेश्वर में विश्वास अस्पष्ट और सिद्धान्तों पर आधारित होता है वे इस तरह अनुसरण करते हैं; यह कमोबेश एक-सी ही होती है, थोड़ा ही अंतर होता है। बात केवल इतनी ही है कि उनकी कल्पनाओं में परमेश्वरों की छवि अलग-अलग होती हैं, उसके बावजूद उनका सार वास्तव में एक ही होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 119
देहधारी परमेश्वर पूरी तरह भ्रष्ट इंसान की आवश्यकताओं के कारण ही देह में आया है। यह परमेश्वर की नहीं, मनुष्य की आवश्यकताओं की वजह से है और परमेश्वर ने जो सारी कीमतें चुकाई हैं और जो सारी पीड़ा सही है वह मानवजाति के लिए हैं न कि स्वयं परमेश्वर के लाभ के लिए। परमेश्वर के लिए कोई नफा, नुकसान या प्रतिफल नहीं है; परमेश्वर जो प्राप्त करता है वह कुछ ऐसा नहीं होता जिसे वह काटता है, बल्कि वह होता है जो मूल रूप से उसका था। वह मानवजाति के लिए जो कुछ करता है और वे सारी कीमतें जो उसने मानवजाति के लिए चुकाई हैं उस सबके पीछे का उद्देश्य यह नहीं है कि वह कोई और अधिक प्रतिफल प्राप्त कर सके, बल्कि यह पूरी तरह मानवजाति के लिए है। यूँ तो देह में परमेश्वर के कार्य से अनेक अकल्पनीय मुश्किलें जुड़ी हैं, लेकिन यह अंततः जो प्रभाव प्राप्त करता है वे उन कार्यों से कहीं बढ़कर होते हैं जिन्हें आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किया जाता है। देह के कार्य में काफी बड़ी तादाद में कठिनाइयाँ होती हैं, देह वही पहचान धारण नहीं कर सकता जो आत्मा की होती है, वह आत्मा की तरह अलौकिक कार्य नहीं कर सकता, उसमें आत्मा के समान अधिकार होने का तो सवाल ही नहीं है। फिर भी इस मामूली देह के द्वारा किए गए कार्य का सार आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किए गए कार्य से कहीं श्रेष्ठतर है और यह स्वयं देह ही है जिसकी आवश्यकता सभी लोगों को है। क्योंकि जिन्हें बचाया जाना है उनके लिए, आत्मा का उपयोगिता मूल्य देह की अपेक्षा कहीं अधिक निम्न है : आत्मा का कार्य संपूर्ण विश्व, सारे पहाड़ों, नदियों, झीलों और महासागरों को समाविष्ट करने में सक्षम है, मगर देह का कार्य और अधिक प्रभावकारी ढंग से प्रत्येक ऐसे व्यक्ति से सम्बन्ध रखता है जिसके साथ वो सम्पर्क में आता है। इसके अलावा, स्पर्शगम्य रूप वाली परमेश्वर की देह को मनुष्य के द्वारा बेहतर ढंग से समझा जा सकता है और उस पर भरोसा किया जा सकता है, और यह परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान को और गहरा कर सकती है, तथा मनुष्य पर परमेश्वर के व्यावहारिक कर्मों की और अधिक गहन छाप छोड़ सकती है। आत्मा का कार्य रहस्य से ढका हुआ है; इसकी भविष्यवाणी कर पाना नश्वर प्राणियों के लिए कठिन है, उनके लिए उसे देख पाना तो और भी मुश्किल है और इसलिए वे बिना किसी आधार के मात्र चीजों की कल्पना ही कर सकते हैं। लेकिन देह का कार्य सामान्य और व्यावहारिक है, उसके पास प्रचुर बुद्धि है, और एक ऐसी सच्चाई है जिसे नश्वर इंसान की आँखों द्वारा व्यक्तिगत रूप से देखा जा सकता है; इंसान परमेश्वर के कार्य की बुद्धि को व्यक्तिगत रूप से समझ सकता है, उसके लिए उसे अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाने की आवश्यकता नहीं है। यह देहधारी परमेश्वर के कार्य की सटीकता और उसका व्यावहारिक मूल्य है। आत्मा केवल उन्हीं कार्यों को कर सकता है जो मनुष्य के लिए अदृश्य हैं और जिसकी कल्पना करना उसके लिए कठिन है, उदाहरण के लिए आत्मा की प्रबुद्धता, आत्मा का दिल को छू लेना, और आत्मा का मार्गदर्शन, लेकिन समझदार इंसान को वे कोई स्पष्ट अर्थ प्रदान नहीं कर सकते। वे केवल एक चलता-फिरता या एक मोटे तौर पर समान अर्थ प्रदान कर सकते हैं, और शब्दों से कोई निर्देश नहीं दे पाते। जबकि, देह में परमेश्वर का कार्य बहुत भिन्न होता है : इसमें वचनों का सटीक मार्गदर्शन होता है, और स्पष्ट इरादे और स्पष्ट अपेक्षित लक्ष्य जुड़े होते हैं। इसलिए इंसान को अँधेरे में भटकने या अपनी कल्पना का उपयोग करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है, और अंदाज़ा लगाने की तो बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं होती। देह में किया गया कार्य बहुत स्पष्ट होता है, और उसका कार्य आत्मा के कार्य से काफी ज्यादा भिन्न होता है। आत्मा का कार्य केवल एक सीमित दायरे में ही उपयुक्त होता है, यह देह के कार्य का स्थान नहीं ले सकता। देह के कार्य द्वारा जो सटीक लक्ष्य अपेक्षित हैं, और इस कार्य से मनुष्य ज्ञान का जो व्यावहारिक मूल्य प्राप्त करता है, वह आत्मा के कार्य की सटीकता और व्यावहारिक मूल्य से कहीं ज्यादा है। भ्रष्ट मनुष्यों के लिए, केवल वही कार्य जो अनुसरण के लिए सटीक वचन और स्पष्ट लक्ष्य प्रदान करे, जो दृश्यमान और मूर्त हो, वही सबसे मूल्यवान प्रकार का काम है। केवल यथार्थवादी कार्य और समयोचित मार्गदर्शन ही मनुष्य की अभिरुचियों के लिए उपयुक्त होता है, और केवल व्यावहारिक कार्य ही मनुष्य को उसके भ्रष्ट और पतित स्वभाव से बचा सकता है। इसे केवल देहधारी परमेश्वर हासिल कर सकता है; केवल देहधारी परमेश्वर ही मनुष्य को उसके पुराने भ्रष्ट और पतित स्वभाव से बचा सकता है। यद्यपि आत्मा परमेश्वर का अंतर्निहित सार है, फिर भी इस तरह का कार्य केवल उसकी देह के द्वारा ही किया जा सकता है। यदि आत्मा अकेले ही कार्य करता, तब उसके कार्य का प्रभावी होना संभव नहीं होता—यह एक स्पष्ट सत्य है। अधिकांश लोग इस देह के कारण परमेश्वर के शत्रु बन गए हैं, लेकिन जब यह देह अपना कार्य पूरा करेगी, तो जो लोग उसके खिलाफ हैं वे न केवल उसके शत्रु नहीं रहेंगे, बल्कि उसके गवाह बन जाएँगे। वे ऐसे गवाह बन जाएँगे जिन्हें उसके द्वारा जीत लिया गया है, ऐसे गवाह जो उसके अनुरूप हैं और उससे अभिन्न हैं। देह के कार्य का मनुष्य के लिए जो महत्व है वह उसे मनुष्य को ज्ञात करवाएगा और मनुष्य के अस्तित्व के अर्थ के लिए इस देह के महत्व को मनुष्य जानेगा, मनुष्य के जीवन के विकास के संबंध में उसके व्यावहारिक मूल्य को जानेगा, और इससे भी अधिक, यह जानेगा कि यह देह अप्रत्याशित रूप से जीवन का एक जीवंत स्रोत बन जाएगी जिससे अलग होने की बात मानव सहन नहीं कर सकता। हालाँकि परमेश्वर की देहधारी देह परमेश्वर की पहचान और दर्जे से बिल्कुल मेल नहीं खाती, और मनुष्य को परमेश्वर के वास्तविक मूल्य से असंगत प्रतीत होती है, फिर भी यह देह, जिसके पास परमेश्वर की अंतर्निहित छवि या परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान नहीं है, वह कार्य कर सकती है जिसे परमेश्वर का आत्मा सीधे तौर पर करने में असमर्थ है। ये हैं परमेश्वर के देहधारण के अंतर्निहित मायने और मूल्य, इस महत्व और मूल्य को इंसान न तो समझ पाता है और न ही स्वीकार कर पाता है। यद्यपि सभी लोग परमेश्वर के आत्मा का आदर करते हैं और परमेश्वर की देह का तिरस्कार करते हैं, फिर भी इस बात पर ध्यान न देते हुए कि वे क्या सोचते-समझते हैं, देह के व्यावहारिक मायने और मूल्य आत्मा से बहुत बढ़कर हैं। निस्संदेह, यह केवल भ्रष्ट मनुष्य के संबंध में है। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो सत्य खोजते हैं और परमेश्वर के प्रकटन के लिए लालायित रहते हैं, आत्मा का कार्य केवल दिल को छू सकता है या प्रेरणा प्रदान कर सकता है, और आश्चर्य की यह भावना दे सकता है कि यह कार्य अद्भुत, अथाह और अकल्पनीय है और यह भावना प्रदान कर सकता है कि यह महान, उत्कृष्ट और प्रशंसनीय है, फिर भी सबके लिए अप्राप्य और अगम्य भी है। मनुष्य और परमेश्वर का आत्मा एक-दूसरे को केवल दूर से ही देख सकते हैं, मानो उनके बीच बहुत ज्यादा दूरी हो और वे कभी भी एक समान नहीं हो सकते, मानो मनुष्य और परमेश्वर किसी अदृश्य विभाजन रेखा द्वारा अलग कर दिए गए हों। वास्तव में, यह पवित्रात्मा के द्वारा मनुष्य को दिया गया एक मायाजाल है, जो इसलिए है क्योंकि पवित्रात्मा और मनुष्य दोनों एक ही प्रकार के नहीं हैं, दोनों एक ही संसार में कभी साथ नहीं रह सकते और क्योंकि पवित्रात्मा में मनुष्य का कुछ भी नहीं है। इसलिए मनुष्य को आत्मा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आत्मा सीधे तौर पर वह कार्य नहीं कर सकता जिसकी मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता है। देह का कार्य मनुष्य को अनुसरण के लिए व्यावहारिक लक्ष्य, स्पष्ट वचन और यह एहसास देता है कि परमेश्वर व्यावहारिक और सामान्य है, वह विनम्र और साधारण है। भले ही मनुष्य उससे डरता हो, फिर भी अधिकतर लोगों के लिए वह काफी हद तक पहुँच में है। मनुष्य उसका चेहरा देख सकता है, उसकी वाणी सुन सकता है, इंसान को उसे दूर से देखने की आवश्यकता नहीं है। यह देह इंसान को निकट लगती है, दूर या अथाह नहीं, बल्कि दृश्यमान और पहुँच में लगती है, क्योंकि यह देह उसी संसार में है जिसमें मनुष्य है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 120
जहाँ तक उन लोगों की बात है जो देह में जीते हैं, स्वभावगत बदलाव का अनुसरण करने के लिए लक्ष्यों की आवश्यकता होती है और परमेश्वर को जानने का अनुसरण करने के लिए परमेश्वर के व्यावहारिक कर्मों और वास्तविक चेहरे को देखने की जरूरत होती है। दोनों को सिर्फ परमेश्वर की देहधारी देह से ही प्राप्त किया जा सकता है, दोनों को सिर्फ सामान्य और व्यावहारिक देह से ही पूरा किया जा सकता है। इसीलिए देहधारण आवश्यक है—पूरी भ्रष्ट मानवजाति को इसकी आवश्यकता है। चूँकि लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे परमेश्वर को जानें, इसलिए अज्ञात और अलौकिक परमेश्वरों की छवियों को उनके दिलों से दूर हटाया जाना चाहिए, और चूँकि उनसे अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ने की माँग की जाती है, इसलिए उन्हें पहले अपने भ्रष्ट स्वभावों को जानना चाहिए। यदि लोगों के दिलों से अज्ञात परमेश्वरों की छवियों को हटाने का कार्य केवल मनुष्य करे, तो वह वांछित प्रभाव प्राप्त करने में असफल हो जाएगा। लोगों के दिलों से अस्पष्ट परमेश्वर की छवियों को केवल वचनों से उजागर किया, उतार फेंका या पूरी तरह से निकाला नहीं जा सकता। ऐसा करने से, अंततः इन गहरी समाई चीजों को लोगों के दिलों से हटाना तब भी संभव नहीं होगा। केवल इन अज्ञात और अलौकिक चीजों की जगह व्यावहारिक परमेश्वर और परमेश्वर की अंतर्निहित छवि को रखकर और लोगों को धीरे-धीरे इन्हें ज्ञात करवाकर ही वांछित प्रभाव प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य को एहसास होता है कि जिस परमेश्वर का वह पहले से अनुसरण करता रहा है वह अज्ञात और अलौकिक है। आत्मा की प्रत्यक्ष अगुवाई इस प्रभाव को प्राप्त नहीं कर सकती, किसी व्यक्ति विशेष की शिक्षाएँ तो बिल्कुल नहीं बल्कि देहधारी परमेश्वर ही ऐसा कर सकता है। ठीक इस कारण कि देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता मनुष्य की कल्पनाओं के अस्पष्ट एवं अलौकिक परमेश्वरों से विपरीत हैं, जब देहधारी परमेश्वर आधिकारिक रूप से अपना कार्य करता है तो मनुष्य की सभी धारणाएँ उजागर कर दी जाती हैं। मनुष्य की मूल धारणाएँ तो तभी उजागर हो सकती हैं जब उनकी देहधारी परमेश्वर से तुलना की जाये। देहधारी परमेश्वर से तुलना के बिना, मनुष्य की धारणाओं को उजागर नहीं किया जा सकता; दूसरे शब्दों में, व्यावहारिकता की विषमता के बिना अस्पष्ट चीज़ों को उजागर नहीं किया जा सकता। इस कार्य को करने के लिए कोई भी वचनों का उपयोग करने में सक्षम नहीं है, और कोई भी वचनों का उपयोग करके इस कार्य को स्पष्टता से व्यक्त करने में सक्षम नहीं है। स्वयं परमेश्वर ही अपना कार्य कर सकता है, अन्य कोई उसकी ओर से इस कार्य को नहीं कर सकता। मनुष्य की भाषा कितनी भी समृद्ध क्यों न हो, वह परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता को स्पष्टता से व्यक्त करने में असमर्थ है। यदि परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से मनुष्य के बीच कार्य करे और अपनी छवि और अपने स्वरूप को पूरी तरह से प्रकट करे, तभी मनुष्य अधिक व्यावहारिकता से परमेश्वर को जान सकता है और अधिक स्पष्टता से देख सकता है। इस प्रभाव को कोई हाड़-माँस का इंसान प्राप्त नहीं कर सकता। निस्संदेह, परमेश्वर का आत्मा भी इस प्रभाव को प्राप्त करने में असमर्थ है। परमेश्वर भ्रष्ट मनुष्य को शैतान के प्रभाव से बचा सकता है, परन्तु इस कार्य को सीधे तौर पर परमेश्वर के आत्मा के द्वारा सम्पन्न नहीं किया जा सकता; इसे केवल उस देह के द्वारा सम्पन्न किया जा सकता है जिसे परमेश्वर का आत्मा पहनता है, अर्थात् देहधारी परमेश्वर के देह द्वारा सम्पन्न किया जा सकता है। यह देह मनुष्य भी है और परमेश्वर भी, यह देह सामान्य मानवता धारण किए हुए एक व्यक्ति है और पूरी दिव्यता धारण किए हुए परमेश्वर भी है। और इसलिए, हालाँकि यह देह परमेश्वर का आत्मा नहीं है, और आत्मा से अत्यधिक भिन्न है, फिर भी वह स्वयं देहधारी परमेश्वर है जो मनुष्य को बचाता है, जो आत्मा है और देह भी है। उसे किसी भी नाम से पुकारो, आखिर वह स्वयं परमेश्वर ही है जो मनुष्यजाति को बचाता है। क्योंकि परमेश्वर का आत्मा देह से अविभाज्य है, और देह का कार्य भी परमेश्वर के आत्मा का कार्य है; अंतर बस इतना ही है कि इस कार्य को आत्मा की पहचान का उपयोग करके नहीं किया जाता, बल्कि देह की पहचान का उपयोग करके किया जाता है। सीधे तौर पर आत्मा द्वारा किए जाने वाले कार्य में देहधारण की आवश्यकता नहीं होती, और जिस कार्य को करने के लिए देह की आवश्यकता होती है उसे आत्मा द्वारा सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता, उसे केवल देहधारी परमेश्वर द्वारा ही किया जा सकता है। इस कार्य के लिए इसी की आवश्यकता होती है, और भ्रष्ट इंसान को भी इसी की आवश्यकता है। परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों में, आत्मा द्वारा केवल एक ही चरण सीधे तौर पर सम्पन्न किया गया था, और शेष दो चरणों को देहधारी परमेश्वर द्वारा सम्पन्न किया जाता है, न कि सीधे आत्मा द्वारा। आत्मा द्वारा व्यवस्था के युग में किए गए कार्य में मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को परिवर्तित करना शामिल नहीं था, और न ही इसका परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान से कोई सम्बन्ध था। हालाँकि, अनुग्रह के युग में और राज्य के युग में परमेश्वर की देह के कार्य में, मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव और परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान शामिल है, और उद्धार के कार्य का एक महत्वपूर्ण और निर्णायक हिस्सा है। इसलिए, भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार और प्रत्यक्ष कार्य की कहीं अधिक आवश्यकता है। मनुष्य को इस बात की आवश्यकता है कि देहधारी परमेश्वर उसकी चरवाही करे, उसे समर्थन दे, उसका सिंचन और पोषण करे, उसका न्याय करे, उसे ताड़ना दे। उसे देहधारी परमेश्वर से और अधिक अनुग्रह तथा बड़े छुटकारे की आवश्यकता है। केवल देहधारी परमेश्वर ही मनुष्य का विश्वासपात्र, उसका चरवाहा, उसकी हर वक्त मौजूद सहायता बन सकता है, और यह सब वर्तमान और अतीत दोनों के ही देहधारण की आवश्यकताएँ हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 121
मनुष्य को शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है, मनुष्य ही परमेश्वर के जीवधारियों में श्रेष्ठतम है, इसलिए मनुष्य को परमेश्वर के उद्धार की आवश्यकता है। परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य मनुष्य है, शैतान नहीं, और जिसे बचाया जाएगा वह मनुष्य की देह और मनुष्य की आत्मा है, दानव नहीं। शैतान परमेश्वर के विनाश का लक्ष्य है और मनुष्य परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य है। मनुष्य की देह को शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है, इसलिए सबसे पहले मनुष्य की देह को ही बचाया जाना चाहिए। मनुष्य की देह को इतना ज्यादा भ्रष्ट किया जा चुका है कि वह परमेश्वर का इस हद तक विरोध करती है कि वह खुले तौर पर परमेश्वर का विरोध कर बैठती है और उसके अस्तित्व को ही नकारती है। यह भ्रष्ट देह बेहद अड़ियल है, देह के भ्रष्ट स्वभाव से निपटने और उसे परिवर्तित करने से ज्यादा कठिन और कुछ भी नहीं। शैतान परेशानियाँ खड़ी करने के लिए मनुष्य की देह में आता है, और परमेश्वर के कार्य में व्यवधान उत्पन्न करने और उसकी योजना को बाधित करने के लिए मनुष्य की देह का उपयोग करता है। इस प्रकार इंसान शैतान बनकर परमेश्वर का शत्रु हो गया है। मनुष्य को बचाने के लिए, पहले उस पर विजय पानी होगी। इसी चुनौती से निपटने के लिए परमेश्वर जो कार्य करने का इरादा रखता है, उसकी खातिर देह में आता है और शैतान के साथ युद्ध करता है। उसका उद्देश्य भ्रष्ट मनुष्य का उद्धार, उस शैतान की पराजय और उसका विनाश है, जो परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करता है। परमेश्वर मनुष्य पर विजय पाने के अपने कार्य के माध्यम से शैतान को पराजित करता है, और साथ ही भ्रष्ट मनुष्यजाति को भी बचाता है। यह एक ऐसा कार्य है जो एक ही समय में दो लक्ष्यों को प्राप्त करता है। इंसान के साथ बेहतर ढंग से जुड़ने और उस पर विजय पाने के लिए वह देह में रहकर कार्य करता है, देह में रहकर बात करता है और देह में रहकर समस्त कार्यों का बीड़ा उठाता है। अंतिम बार जब परमेश्वर देह धारण करेगा, तो अंत के दिनों के उसके कार्य को देह में पूरा किया जाएगा। वह सभी लोगों को उनके प्रकार के अनुसार छाँटेगा, अपने सम्पूर्ण प्रबंधन को समाप्त करेगा, और साथ ही देह में अपने समस्त कार्यों को भी पूरा करेगा। पृथ्वी पर उसके सभी कार्यों के समाप्त हो जाने के बाद, वह पूरी तरह से विजयी हो जाएगा। देह में कार्य करते हुए, परमेश्वर मनुष्यजाति को पूरी तरह से जीत लेगा और उसे प्राप्त कर लेगा। क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका समस्त प्रबंधन समाप्त हो चुका होगा? शैतान को पूरी तरह से हराने और विजयी होने के बाद, जब परमेश्वर देह में अपने कार्य का समापन करेगा, तो शैतान के पास मनुष्य को भ्रष्ट करने का फिर और कोई अवसर नहीं होगा। परमेश्वर के प्रथम देहधारण का कार्य छुटकारा और मनुष्य के पापों को क्षमा करना था। अब यह मनुष्यजाति को जीतने और पूरी तरह से प्राप्त करने का कार्य है, ताकि शैतान के पास अपना कार्य करने का कोई मार्ग न बचा होगा, और वह पूरी तरह से हार चुका होगा, और परमेश्वर पूरी तरह से विजयी हो चुका होगा। यह देह का कार्य है, और स्वयं परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 122
परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के शुरुआती कार्य को सीधे तौर पर आत्मा के द्वारा किया गया था, देह के द्वारा नहीं। लेकिन, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का अंतिम कार्य देहधारी परमेश्वर द्वारा किया जाता है, आत्मा द्वारा सीधे तौर पर नहीं किया जाता। मध्यवर्ती चरण का छुटकारे का कार्य भी देह में परमेश्वर के द्वारा किया गया था। समस्त प्रबंधन कार्य के दौरान, सबसे महत्वपूर्ण कार्य शैतान के प्रभाव से मनुष्य को बचाना है। मुख्य कार्य भ्रष्ट लोगों को पूरी तरह से जीतना है ताकि जीते गए लोगों का मूलतः परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय पहले जैसा बहाल किया जा सके, और वे एक सामान्य जीवन, यानी एक सृजित प्राणी का सामान्य जीवन प्राप्त कर सकें। यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, और प्रबंधन कार्य का मूल है। उद्धार के कार्य के तीन चरणों में, व्यवस्था के युग का प्रथम चरण प्रबंधन कार्य के मूल से काफी दूर था; इसमें उद्धार के कार्य का केवल हल्का-सा आभास था, यह शैतान की सत्ता से मनुष्य को बचाने के परमेश्वर के कार्य का आरम्भ नहीं था। कार्य का पहला चरण सीधे तौर पर आत्मा के द्वारा किया गया था क्योंकि, व्यवस्था के अन्तर्गत, मनुष्य केवल व्यवस्था का पालन करना जानता था, उसके अंदर अधिक सत्य नहीं था, और चूँकि व्यवस्था के युग के कार्य में मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन करना शामिल नहीं था, वह मनुष्य को शैतान की सत्ता से बचाने के कार्य से तो और भी संबंधित नहीं था। इस प्रकार परमेश्वर के आत्मा ने कार्य के इस अत्यंत सरल चरण को पूरा किया था जो मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से संबंधित नहीं था। प्रबंधन के मूल से इस चरण के कार्य का कोई ज्यादा संबंध नहीं था, इसका मनुष्य के उद्धार के आधिकारिक कार्य से कोई बड़ा संबंध नहीं था, और इसलिए निजी तौर पर इस कार्य को करने के लिए परमेश्वर को देह धारण करने की आवश्यकता नहीं थी। आत्मा द्वारा किया गया कार्य अप्रत्यक्ष और अथाह है, यह मनुष्य के लिए भयावह और अगम्य है; आत्मा उद्धार के कार्य को करने और मनुष्य को सीधे तौर पर जीवन प्रदान करने के लिए उपयुक्त नहीं है। मनुष्य के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है आत्मा के कार्य को ऐसे तरीके में रूपान्तरित करना जो मनुष्य के करीब हो, यानी जो मनुष्य के लिए अत्यंत उपयुक्त है वह यह है कि परमेश्वर अपने कार्य को करने के लिए एक साधारण, सामान्य व्यक्ति बन जाए। इसके लिए आवश्यक है कि आत्मा के कार्य का स्थान लेने के लिए परमेश्वर देह धारण करे, और मनुष्य के लिए, कार्य करने हेतु परमेश्वर के पास इससे अधिक उपयुक्त मार्ग नहीं है। कार्य के इन तीन चरणों में से, दो चरणों को देह के द्वारा सम्पन्न किया जाता है, और ये दो चरण प्रबंधन कार्य की मुख्य अवस्थाएँ हैं। दो देहधारण परस्पर पूरक हैं और एक दूसरे की बढ़िया ढंग से अनुपूर्ति भी करते हैं। परमेश्वर के देहधारण के प्रथम चरण ने द्वितीय चरण की नींव डाली, ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के दोनों देहधारण एक पूर्ण इकाई बनाते हैं, और एक-दूसरे से असंगत नहीं हैं। परमेश्वर के कार्य के इन दो चरणों को परमेश्वर द्वारा अपनी देहधारी पहचान में कार्यान्वित किया जाता है क्योंकि वे समस्त प्रबंधन के कार्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। लगभग ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के दो देहधारणों के कार्य के बिना, समस्त प्रबंधन कार्य थम गया होता, और मनुष्यजाति को बचाने का कार्य खोखली बातों के सिवाय और कुछ न होता। यह कार्य महत्वपूर्ण है या नहीं, यह मनुष्यजाति की आवश्यकताओं, उसकी कलुषता की वास्तविकता, शैतान के विद्रोहीपन की गंभीरता और कार्य में उसके व्यवधान पर आधारित है। कार्य करने में सक्षम सही व्यक्ति को कार्यकर्ता द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति, और कार्य के महत्व पर तय किया जाता है। जब इस कार्य के महत्व की बात आती है कि इस सम्बन्ध में कार्य के कौन से तरीके को अपनाया जाए—परमेश्वर के आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किया गया कार्य, या देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य, या मनुष्य के माध्यम से किया गया कार्य—तो सबसे पहले इंसान के माध्यम से किए गए कार्य को हटाया जाता है, और फिर कार्य की प्रकृति, आत्मा के कार्य की प्रकृति बनाम देह के कार्य की प्रकृति के आधार पर, अंततः यह निर्णय लिया जाता है कि आत्मा द्वारा सीधे तौर पर किए गए कार्य की अपेक्षा देह के द्वारा किया गया कार्य मनुष्य के लिए अधिक लाभदायक है और अधिक लाभ प्रदान करता है। जब परमेश्वर ने यह निर्णय लिया कि कार्य आत्मा के द्वारा किया जाएगा या देह के द्वारा तो उस समय परमेश्वर का इरादा था। कार्य के प्रत्येक चरण का एक अर्थ और एक आधार होता है। इनमें से कार्य का एक भी चरण बेबुनियादी कल्पनाओं पर आधारित नहीं है, न ही उन्हें मनमाने ढंग से कार्यान्वित किया जाता है; उनमें एक विशेष बुद्धि होती है। परमेश्वर के समस्त कार्य के पीछे की सच्ची कहानी यह है। विशेष रूप से, ऐसे बड़े कार्य में परमेश्वर की और भी बड़ी योजना होती है जैसे कि देहधारी परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से लोगों के बीच में कार्य कर रहा है। इसलिए, उसके कार्य में प्रत्येक क्रिया, विचार और मत में परमेश्वर की बुद्धि और उसके स्वरूप की समग्रता प्रतिबिम्बित होती है; यह परमेश्वर का बेहद मूर्त और सुव्यवस्थित स्वरूप है। इंसान के लिए इन सूक्ष्म विचारों और मतों की कल्पना करना और उन पर विश्वास करना बेहद कठिन है और इन्हें जानना तो और भी कठिन है। इंसान जो काम करता है, वह सामान्य सिद्धान्त के अनुसार किया जाता है, जो उसके लिए अत्यंत संतोषजनक होता है। लेकिन परमेश्वर के कार्य की तुलना में, इसमें बहुत बड़ी असमानता दिखाई देती है। भले ही परमेश्वर के कर्म महान होते हैं और उसके कार्य भव्य पैमाने पर होते हैं, फिर भी उनके पीछे अनेक सूक्ष्म और सटीक योजनाएँ और व्यवस्थाएँ होती हैं जो मनुष्य के लिए अकल्पनीय हैं। उसके कार्य का प्रत्येक चरण न केवल सिद्धान्त के अनुसार किया जाता है, बल्कि प्रत्येक चरण में अनेक ऐसी चीजें होती हैं जिन्हें मानवीय भाषा में स्पष्टता से व्यक्त नहीं किया जा सकता, और ये चीजें इंसान के लिए अदृश्य होती हैं। यह कार्य चाहे आत्मा का हो या देहधारी परमेश्वर का, प्रत्येक में उसके कार्य की योजनाएँ निहित हैं, वह बिना किसी आधार के कार्य नहीं करता, और निरर्थक कार्य नहीं करता। जब आत्मा सीधे तौर पर कार्य करता है तो वह उसके लक्ष्यों के अनुसार होता है, और जब वह कार्य करने के लिए मनुष्य बनता है (यानी जब वह अपने बाहरी रूप को रूपान्तरित करता है), तो उसमें उसका उद्देश्य और भी ज्यादा निहित होता है। अन्यथा वह बेहिचक अपनी पहचान क्यों बदलेगा? वह बेहिचक ऐसा व्यक्ति क्यों बनेगा जिसे निकृष्ट माना जाता है और जिसे यातना दी जाती है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 123
देह में उसका कार्य बहुत सार्थक है, यह कार्य के सम्बन्ध में कहा जाता है, और अंततः देहधारी परमेश्वर ही कार्य का समापन करता है, आत्मा नहीं। कुछ लोग मानते हैं कि परमेश्वर किसी अनजान समय पृथ्वी पर आकर लोगों को दिखाई दे सकता है, जिसके बाद वह व्यक्तिगत रूप से संपूर्ण मनुष्यजाति का न्याय करेगा, एक-एक करके सबकी परीक्षा लेगा, कोई भी नहीं छूटेगा। जो लोग इस ढंग से सोचते हैं, वे देहधारण के इस चरण के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर एक के बाद एक लोगों का न्याय नहीं करता, न ही उन्हें एक-एक करके परीक्षा से गुजारा जाता है; ऐसा करना न्याय का कार्य नहीं होगा। क्या समस्त मनुष्यजाति की भ्रष्टता एक समान नहीं है? क्या पूरी मनुष्यजाति का सार समान नहीं है? न्याय किया जाता है इंसान के भ्रष्ट सार का, शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए इंसानी सार का, और इंसान के सारे पापों का। परमेश्वर मनुष्य के छोटे-मोटे और मामूली दोषों का न्याय नहीं करता। न्याय का कार्य निरूपक है, और किसी व्यक्ति-विशेष के लिए कार्यान्वित नहीं किया जाता। बल्कि यह ऐसा कार्य है जिसमें समस्त मनुष्यजाति के न्याय का प्रतिनिधित्व करने के लिए लोगों के एक समूह का न्याय किया जाता है। देहधारी परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य, संपूर्ण मनुष्यजाति के कार्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए लोगों के एक समूह पर स्वयं द्वारा किए गए कार्य का उपयोग करना है, जिसके बाद यह धीरे-धीरे फैलता जाता है। न्याय का कार्य ऐसा ही है। परमेश्वर किसी विशिष्ट प्रकार के व्यक्ति या लोगों के किसी समूह-विशेष का न्याय नहीं करता, बल्कि संपूर्ण मनुष्यजाति की अधार्मिकता का न्याय करता है, जैसे कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध, या मनुष्य का उसका भय न मानना, या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान। जिसका न्याय किया जाता है वो है इंसान का परमेश्वर-विरोधी सार, और यह न्याय का कार्य अंत के दिनों का विजय-कार्य है। देहधारी परमेश्वर का कार्य और वचन जिन्हें इंसान ने देखा है, वे अंत के दिनों के दौरान बड़े श्वेत सिंहासन के सामने न्याय के कार्य हैं, जिसे इंसान ने अतीत से अपनी धारणाओं में पाल रखा था। देहधारी परमेश्वर द्वारा वर्तमान में किया जा रहा कार्य वास्तव में बड़े श्वेत सिंहासन के सामने न्याय है। आज का देहधारी परमेश्वर वह परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान संपूर्ण मनुष्यजाति का न्याय करता है। यह देह और कार्य, वचन और इस देह का समस्त स्वभाव उसकी समग्रता हैं। यद्यपि इस देह के कार्य का दायरा सीमित है, और उसमें सीधे तौर पर संपूर्ण ब्रह्मांड शामिल नहीं है, फिर भी न्याय के कार्य का सार संपूर्ण मनुष्यजाति का प्रत्यक्ष न्याय है—यह कार्य केवल चीन के चुने हुए लोगों के लिए नहीं, न ही यह थोड़े-से लोगों के लिए किया जाता है। देह में परमेश्वर के कार्य के दौरान, यद्यपि इस कार्य के दायरे में संपूर्ण ब्रह्माण्ड नहीं है, फिर भी यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, जब वह अपनी देह के कार्य के दायरे में उस कार्य को समाप्त कर लेगा तो उसके बाद, वह तुरन्त ही इस कार्य को ब्रह्मांड के भीतर प्रत्येक जगह में उसी तरह से फैला देगा जैसे यीशु के पुनरुत्थान और आरोहण के बाद उसका सुसमाचार फैल गया था। चाहे यह आत्मा का कार्य हो या देह का कार्य, यह ऐसा कार्य है जिसे एक सीमित दायरे में किया जाता है, परन्तु जो संपूर्ण ब्रह्मांड के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। अन्त के दिनों में, परमेश्वर देहधारी पहचान में प्रकट होकर अपना कार्य करता है, और देहधारी परमेश्वर ही वह परमेश्वर है जो बड़े श्वेत सिंहासन के सामने मनुष्य का न्याय करता है। चाहे वह आत्मा हो या देह, जो न्याय का कार्य करता है वह परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान मनुष्य का न्याय करता है। इसे उसके द्वारा किए गए कार्य से तय किया जाता है, न कि उसके बाहरी रंग-रूप या अन्य विभिन्न कारकों द्वारा। यद्यपि इन वचनों के बारे में मनुष्य की धारणाएँ हैं, लेकिन कोई भी देहधारी परमेश्वर के न्याय और संपूर्ण मनुष्यजाति पर विजय के तथ्य को नकार नहीं सकता। इंसान चाहे कुछ भी सोचे, मगर तथ्य आखिरकार तथ्य ही हैं। कोई यह नहीं कह सकता है कि “कार्य परमेश्वर द्वारा किया जाता है, परन्तु देह परमेश्वर नहीं है।” यह भ्रांति है, क्योंकि इस कार्य को देहधारी परमेश्वर के सिवाय और कोई नहीं कर सकता। चूँकि इस कार्य को पहले ही पूरा किया जा चुका है, इसलिए इस कार्य के बाद मनुष्य के लिए परमेश्वर के न्याय का कार्य दूसरी बार प्रकट नहीं होगा; अपने दूसरे देहधारण में परमेश्वर ने पहले ही संपूर्ण प्रबंधन के समस्त कार्य का समापन कर लिया है, इसलिए परमेश्वर के कार्य का चौथा चरण नहीं होगा। क्योंकि जिसका न्याय किया जाता है वह मनुष्य है, मनुष्य जो कि हाड़-माँस का है और भ्रष्ट किया जा चुका है, और यह शैतान की आत्मा नहीं है जिसका सीधे तौर पर न्याय किया जाता है, इसलिए न्याय का कार्य आध्यात्मिक जगत में कार्यान्वित नहीं किया जाता, बल्कि मनुष्यों के बीच किया जाता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 124
मनुष्य की देह की भ्रष्टता का न्याय करने के लिए देह में प्रकट परमेश्वर से अधिक उपयुक्त और कोई योग्य नहीं है। यदि न्याय सीधे तौर पर परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किया जाए, तो यह सर्वव्यापी नहीं होता, और तो और मनुष्य के लिए इसे स्वीकार करना कठिन होता, क्योंकि आत्मा मनुष्य के रूबरू आने में असमर्थ है। इस बिंदु के प्रकाश में, प्रभाव तत्काल नहीं होंगे, मनुष्य का परमेश्वर के उस स्वभाव को अधिक स्पष्टता से देखना तो और भी दूर की बात है जो अपमान बर्दाश्त नहीं करता है। यदि देह में प्रकट परमेश्वर मनुष्यजाति की भ्रष्टता का न्याय करे तभी शैतान को पूरी तरह से हराया जा सकता है। देह में प्रकट परमेश्वर भी सामान्य मानवता वाला व्यक्ति है, फिर भी वह सीधे तौर पर मनुष्य की अधार्मिकता का न्याय कर सकता है; यही उसकी जन्मजात पवित्रता, और उसके अनुपम होने का चिन्ह है। केवल परमेश्वर ही मनुष्य का न्याय करने के योग्य है, और उसका न्याय करने की स्थिति में है, क्योंकि वह सत्य और धार्मिकता को धारण किए हुए है, और इस प्रकार वह मनुष्य का न्याय करने में समर्थ है। जो सत्य और धार्मिकता से रहित हैं वे दूसरों का न्याय करने लायक नहीं हैं। यदि इस कार्य को परमेश्वर के आत्मा द्वारा किया जाता, तो इसका अर्थ शैतान पर विजय नहीं होता। आत्मा अंतर्निहित रूप से ही नश्वर प्राणियों की तुलना में अधिक उत्कृष्ट है, और परमेश्वर का आत्मा अंतर्निहित रूप से पवित्र है, और देह पर विजय प्राप्त किए हुए है। यदि आत्मा ने इस कार्य को सीधे तौर पर किया होता, तो वह मनुष्य के पूरे विद्रोहीपन का न्याय नहीं कर पाता, और उसकी सारी अधार्मिकता को प्रकट नहीं कर पाता। क्योंकि न्याय के कार्य को परमेश्वर के बारे में मनुष्य की धारणाओं के माध्यम से भी कार्यान्वित किया जाता है, और मनुष्य के अंदर कभी भी आत्मा के बारे में कोई धारणाएँ नहीं रही हैं, इसलिए आत्मा मनुष्य की अधार्मिकता को बेहतर तरीके से प्रकट करने में असमर्थ है, वह ऐसी अधार्मिकता को पूरी तरह से उजागर करने में तो बिल्कुल भी समर्थ नहीं है। देहधारी परमेश्वर उन सब लोगों का शत्रु है जो उसे नहीं जानते। उसके बारे में मनुष्य की धारणाओं और उसके विरोध का न्याय करके, वह मनुष्यजाति के सारे विद्रोहीपन को उजागर करता है। देह में उसके कार्य के प्रभाव आत्मा के कार्य की तुलना में अधिक स्पष्ट होते हैं। इसलिए, संपूर्ण मनुष्यजाति के न्याय को आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर सम्पन्न नहीं किया जाता, बल्कि यह देहधारी परमेश्वर का कार्य है। देहधारी परमेश्वर को मनुष्य देख और छू सकता है, और देहधारी परमेश्वर मनुष्य पर पूरी तरह से विजय पा सकता है। मनुष्य उसका विरोध करने से उसके प्रति समर्पण करने की ओर, उसका उत्पीड़न करने से उसे स्वीकार करने की ओर, उसके बारे में धारणा रखने से उसे जानने की ओर, और उसे अस्वीकार करने से उसे प्रेम करने की ओर—ये हैं देहधारी परमेश्वर के कार्य के प्रभाव। मनुष्य को परमेश्वर के न्याय की स्वीकृति से ही बचाया जाता है, वह परमेश्वर के बोले गए वचनों से ही धीरे-धीरे उसे जानने लगता है, परमेश्वर के प्रति उसके विरोध के दौरान परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर विजय पायी जाती है, और परमेश्वर की ताड़ना की स्वीकृति के दौरान वह उससे जीवन की आपूर्ति प्राप्त करता है। यह समस्त कार्य देहधारी परमेश्वर के कार्य हैं, यह आत्मा के रूप में परमेश्वर के कार्य नहीं हैं। देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य महानतम और बेहद गहन कार्य है, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का अति महत्वपूर्ण भाग देहधारण के कार्य के दो चरण हैं। देहधारी परमेश्वर के कार्य में आने वाली बाधाएँ बहुत बड़ी हैं, क्योंकि मनुष्य इतनी अधिक गहराई से भ्रष्ट किया गया है। विशेष रूप से, अंत के दिनों में इन लोगों पर किया गया कार्य और भी ज्यादा कठिनाई से भरा है, परिवेश शत्रुतापूर्ण है, और हर प्रकार के लोगों की काबिलियत बहुत ही कमजोर है। फिर भी इस कार्य के अंत में, थोड़ा भी कम पड़े बिना यह उचित प्रभाव ही प्राप्त करेगा; यह देह के कार्य का प्रभाव है, और यह प्रभाव आत्मा के कार्य की तुलना में अधिक आश्वस्त करने वाला है। परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का समापन देह में किया जाएगा, और इसे देहधारी परमेश्वर द्वारा ही पूरा किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण और सबसे निर्णायक कार्य देह में किया जाता है, और मनुष्य का उद्धार व्यक्तिगत रूप से देहधारी परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए। हर इंसान को यही लगता है कि देहधारी परमेश्वर इंसान से संबंधित नहीं है, जबकि सच्चाई यह है कि देह पूरी मनुष्यजाति की नियति और अस्तित्व से सम्बन्धित है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 125
परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण का कार्यान्वयन पूरी मनुष्यजाति के लिए किया जाता है, और उसका लक्ष्य संपूर्ण मानवजाति है। यद्यपि उसका कार्य देह में है, फिर भी यह सम्पूर्ण मनुष्यजाति के लिये है; वह संपूर्ण मनुष्यजाति का परमेश्वर है, वह सभी सृजित और गैर-सृजित प्राणियों का परमेश्वर है। यद्यपि देह में उसका कार्य एक सीमित दायरे के भीतर है, और इस कार्य का लक्ष्य भी सीमित है, लेकिन जब भी वह कार्य करने के लिए देहधारण करता है तो कार्य का एक लक्ष्य चुनता है जो अत्यंत निरूपक होता है। वह अपने कार्य के लिए सामान्य और मामूली लोगों के समूह को नहीं चुनता, बल्कि कार्य के लक्ष्य के रूप में ऐसे लोगों के समूह को चुनता है जो देह में उसके कार्य के प्रतिनिधि होने में सक्षम हों। वह ऐसे लोगों के समूह को इसलिए चुनता है क्योंकि देह में उसके कार्य का दायरा सीमित होता है, और इसे विशेष रूप से उसके देह के लिए तैयार किया गया है, और इसे विशेष रूप से देह में उसके कार्य के लिए चुना गया है। परमेश्वर का अपने कार्य के लक्ष्यों का चयन बेबुनियाद नहीं होता, बल्कि सिद्धान्त के अनुसार किया जाता है : कार्य का लक्ष्य देहधारी परमेश्वर के कार्य के लिए लाभदायक होना चाहिए, और उसे सम्पूर्ण मनुष्यजाति का प्रतिनिधित्व करने में समर्थ होना चाहिए। उदाहरण के लिए, यीशु के व्यक्तिगत छुटकारे को स्वीकार करने में यहूदी सम्पूर्ण मनुष्यजाति का प्रतिनिधित्व कर सकते थे, और देहधारी परमेश्वर की व्यक्तिगत विजय को स्वीकार करने में चीनी लोग सम्पूर्ण मनुष्यजाति का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। यहूदियों द्वारा सम्पूर्ण मनुष्यजाति के प्रतिनिधित्व का एक आधार है, और परमेश्वर की व्यक्तिगत विजय को स्वीकार करने में चीनियों द्वारा सम्पूर्ण मनुष्यजाति के प्रतिनिधित्व का भी एक आधार है। यहूदियों के बीच किए गए छुटकारे के कार्य से अधिक और कोई चीज छुटकारे के महत्व को प्रदर्शित नहीं करती, और चीनी लोगों के बीच किए जा रहे विजय-कार्य से अधिक अन्य कोई भी चीज विजय-कार्य की सम्पूर्णता और सफलता को प्रदर्शित नहीं करती। देहधारी परमेश्वर का कार्य और वचन लोगों के एक छोटे से समूह पर ही लक्षित प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में, वह संपूर्ण ब्रह्माण्ड का कार्य करता है, और इस छोटे-से समूह के भीतर वह समस्त मनुष्यजाति से बोलता है। देह में उसका कार्य समाप्त हो जाने के बाद, जो लोग उसका अनुसरण करते हैं, वे उस कार्य को फैलाना शुरू कर देंगे जो उसने उनके बीच किया है। देह में उसके कार्य की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह उन लोगों के लिए सटीक वचन, प्रोत्साहन और मनुष्यजाति के लिए अपने सटीक इरादों को उन लोगों के लिए छोड़ सकता है जो उसका अनुसरण करते हैं, ताकि बाद में उसके अनुयायी देह में किए गए उसके समस्त कार्य और संपूर्ण मनुष्यजाति के लिए उसके इरादों को अत्यधिक सटीकता से, और अधिक व्यावहारिक शब्दों में उन लोगों तक पहुँचा सकें जो इस मार्ग को स्वीकार करते हैं। केवल मनुष्यों के बीच कार्य करता हुआ देहधारी परमेश्वर ही सही अर्थों में परमेश्वर के मनुष्य के साथ रहने और उसके साथ जीने को यथार्थ बनाता है और परमेश्वर के चेहरे को देखने, परमेश्वर के कार्य को देखने, और परमेश्वर के व्यक्तिगत वचन को सुनने की मनुष्य की इच्छा को पूरा करता है। देहधारी परमेश्वर उस युग का अंत करता है जब सिर्फ यहोवा की पीठ ही मनुष्यजाति को दिखाई देती थी, और साथ ही वह अज्ञात परमेश्वरों में मनुष्यजाति के विश्वास करने के युग को भी समाप्त करता है। विशेष रूप से, परमेश्वर के अंतिम देहधारण का कार्य संपूर्ण मनुष्यजाति को एक ऐसे युग में लाता है जो अधिक वास्तविक, अधिक व्यावहारिक, और अधिक सुंदर है। यह काम न केवल व्यवस्था और विनियमों के युग का ही अंत करता है, बल्कि अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह मनुष्यजाति पर ऐसे परमेश्वर को प्रकट करता है जो व्यावहारिक और सामान्य है, जो धार्मिक और पवित्र है, जो प्रबंधन योजना के कार्य का खुलासा करता है और मनुष्यजाति के रहस्यों और मंज़िल को प्रदर्शित करता है, जिसने मनुष्यजाति का सृजन किया और प्रबंधन कार्य को अंजाम तक पहुँचाता है, और जिसने हज़ारों वर्षों तक खुद को छिपा कर रखा है। यह काम अस्पष्टता के युग का पूर्णतः अंत करता है, यह उस युग का समापन करता है जिसमें संपूर्ण मनुष्यजाति परमेश्वर का चेहरा खोजना तो चाहती थी मगर खोज नहीं पायी, यह उस युग का अंत करता है जिसमें संपूर्ण मनुष्यजाति शैतान की सेवा करती थी, और यह संपूर्ण मनुष्यजाति की एक पूर्णतया नए युग में अगुवाई करता है। यह सब परमेश्वर के आत्मा के बजाए देह में प्रकट परमेश्वर के कार्य का परिणाम है। केवल जब परमेश्वर अपने देह में कार्य करता है, तभी जो लोग उसका अनुसरण करते हैं, वे अब और उन चीजों को खोजते और टटोलते नहीं हैं जो विद्यमान और अविद्यमान दोनों प्रतीत होती हैं, और अज्ञात परमेश्वरों के इरादों का अंदाजा लगाना बंद कर देते हैं। जब परमेश्वर देह में अपने कार्य को फैलाता है, तो जो लोग उसका अनुसरण करते हैं वे उसके द्वारा देह में किए गए कार्य को सभी धर्मों और पंथों में आगे बढ़ाएँगे, और वे उसके सभी वचनों को संपूर्ण मनुष्यजाति के कानों तक प्रसार करेंगे। उसके सुसमाचार को प्राप्त करने वाले जो सुनेंगे, वे उसके कार्य के तथ्य होंगे, और ऐसी चीजें होंगी जो मनुष्य के द्वारा व्यक्तिगत रूप से देखी और सुनी गई होंगी—ये तथ्य होंगे, अफवाह नहीं। ये तथ्य ऐसे प्रमाण हैं जिनसे वह कार्य को फैलाता है, और वे ऐसे साधन भी हैं जिन्हें वह कार्य को फैलाने में उपयोग करता है। बिना तथ्यों के उसका सुसमाचार सभी देशों और सभी स्थानों तक नहीं फैलेगा; बिना तथ्यों के केवल मनुष्यों की कल्पनाओं के सहारे, वह कभी भी संपूर्ण ब्रह्मांड पर विजय पाने का कार्य नहीं कर सकेगा। आत्मा मनुष्य के लिए अस्पृश्य और अदृश्य है, और आत्मा का कार्य मनुष्य के लिए परमेश्वर के कार्य के और प्रमाण या और तथ्यों को छोड़ने में असमर्थ है। मनुष्य परमेश्वर के असली चेहरे को कभी नहीं देखेगा, वह हमेशा ऐसे अज्ञात परमेश्वर में विश्वास करेगा जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। मनुष्य कभी भी परमेश्वर के मुख को नहीं देखेगा, न ही मनुष्य परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से बोले गए वचनों को कभी सुन पाएगा। आखिर, मनुष्य की कल्पनाएँ खोखली होती हैं, वे परमेश्वर के असली चेहरे का स्थान कभी नहीं ले सकतीं; मनुष्य परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव, और स्वयं परमेश्वर के कार्य का अभिनय नहीं कर सकता। स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर और उसके कार्य को केवल परमेश्वर के व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करने के लिए देह धारण करने और मनुष्य के बीच आने के द्वारा ही पृथ्वी पर लाया जा सकता है जो मनुष्यों के बीच व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है। परमेश्वर के लिए मनुष्य के सामने प्रकट होने का और मनुष्य के लिए परमेश्वर को देखने और परमेश्वर के असली चेहरे को जानने का यही सबसे आदर्श तरीका है। इसे गैर-देहधारी परमेश्वर संपन्न नहीं कर सकता। इस चरण तक अपने कार्य को कार्यान्वित कर लेने के बाद, परमेश्वर के कार्य ने पहले ही इष्टतम प्रभाव प्राप्त कर लिया है, और पूरी तरह सफल रहा है। देह में परमेश्वर के व्यक्तिगत कार्य ने पहले ही उसके संपूर्ण प्रबंधन कार्य को नब्बे प्रतिशत पूरा कर लिया है। यह देह उसके समस्त कार्य को एक बेहतर शुरूआत की ओर ले गई है और इस देह ने उसके समस्त कार्य को एक समापन पर ला दिया है, उसके समस्त कार्य की घोषणा कर दी है, और इस समस्त कार्य को अंतिम बार पूरी तरह पूर्ण कर दिया है। इसके बाद, परमेश्वर के कार्य के चौथे चरण को करने के लिए अन्य कोई देहधारी परमेश्वर नहीं होगा, और परमेश्वर के तीसरे देहधारण का कभी कोई चमत्कारी कार्य नहीं होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 126
देह में परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण संपूर्ण युग के उसके कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, मनुष्य के काम की तरह किसी समय-विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करता। इसलिए उसके अंतिम देहधारण के कार्य के अन्त का यह अर्थ नहीं है कि उसका कार्य पूर्ण रूप से समाप्त हो गया है, क्योंकि देह में उसका कार्य संपूर्ण युग का प्रतिनिधित्व करता है, और केवल उसी समयावधि का ही प्रतिनिधित्व नहीं करता है जिसमें वह देह में कार्य करता है। बात बस इतनी है कि जब वह देह में होता है तब उस दौरान समूचे युग के अपने कार्य को पूरा करता है, उसके पश्चात् यह सभी स्थानों में फैल जाता है। देहधारी परमेश्वर अपनी सेवकाई को पूरा करने के बाद, अपने भविष्य के कार्य को उन्हें सौंप देगा जो उसका अनुसरण करते हैं। इस तरह, संपूर्ण युग का उसका कार्य अखंड रूप से चलता रहेगा। देहधारण के संपूर्ण युग का कार्य केवल तभी पूर्ण माना जाएगा जब यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड के प्रत्येक स्थान में पूरी तरह से फैल जाएगा। देहधारी परमेश्वर का कार्य एक नए युग का आरम्भ करता है, और उसके कार्य को जारी रखने वाले वे लोग हैं जिनका उपयोग परमेश्वर करता है। मनुष्य के द्वारा किया गया समस्त कार्य देहधारी परमेश्वर की सेवकाई के भीतर होता है, वह इस दायरे के परे नहीं जा सकता। यदि देहधारी परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए न आता, तो मनुष्य पुराने युग को समाप्त कर, नए युग की शुरुआत नहीं कर पाता। मनुष्य द्वारा किया गया कार्य मात्र उसके कर्तव्य के दायरे के भीतर होता है जो मानवीय रूप से करना संभव है, वह परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता। केवल देहधारी परमेश्वर ही आकर उस कार्य को पूरा कर सकता है जो उसे करना चाहिए, उसके अलावा, इस कार्य को उसकी ओर से और कोई नहीं कर सकता। निस्संदेह, मैं देहधारण के कार्य के सम्बन्ध में बात कर रहा हूँ। यह देहधारी परमेश्वर पहले कार्य के एक कदम को कार्यान्वित करता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, उसके बाद वह और कार्य करता है, वह भी मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता। कार्य का लक्ष्य मनुष्य पर विजय पाना है। एक लिहाज से, परमेश्वर का देहधारण मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, जिसके अतिरिक्त वह और भी अधिक कार्य करता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, और इसलिए मनुष्य उसके बारे में और भी अधिक आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपना लेता है। वह उन लोगों के बीच विजय-कार्य करता है जिनकी उसके प्रति अनेक धारणाएँ होती हैं। इस बात की परवाह किए बिना कि वे किस प्रकार उससे व्यवहार करते हैं, एक बार जब वह अपनी सेवकाई पूरी कर लेगा, तो सभी लोग उसके प्रभुत्व में आ चुके होंगे। इस कार्य का तथ्य न केवल चीनी लोगों के बीच प्रतिबिम्बित होता है, बल्कि यह इस बात का प्रतिनिधित्व भी करता है कि किस प्रकार सम्पूर्ण मनुष्यजाति को जीता जाएगा। इन लोगों पर हासिल किए गए प्रभाव उन प्रभावों के पूर्वानुभाव हैं जो संपूर्ण मनुष्यजाति पर प्राप्त किए जाएँगे, और जो कार्य वह भविष्य में करेगा उसके प्रभाव, इन लोगों पर प्रभावों से भी कहीं बढ़कर होंगे। देहधारी परमेश्वर के कार्य में कोई तामझाम नहीं होता, न ही यह धुँधलेपन में घिरा होता है। यह असली और वास्तविक होता है, और यह ऐसा कार्य है जिसमें एक एक ही होता है और दो सिर्फ दो ही होता है। यह न तो किसी से छिपा होता है, न ही किसी को धोखा देता है। लोग वास्तविक और असल चीजें देखते हैं, और जो हासिल करते हैं वह व्यावहारिक ज्ञान और सत्य होता है। कार्य समाप्त होने पर, इंसान के पास परमेश्वर के बारे में नया ज्ञान होगा, और जो लोग सच्चे मन से अनुसरण करेंगे, उनके अंदर उसके बारे में कोई धारणाएँ नहीं होंगी। यह सिर्फ चीनी लोगों पर उसके कार्य का प्रभाव नहीं है, बल्कि यह सम्पूर्ण मनुष्यजाति को जीतने में उसके कार्य के प्रभाव को भी दर्शाता है, क्योंकि इस देह, इस देह के कार्य, और इस देह की हर एक चीज़ की तुलना में कोई भी चीज़ सम्पूर्ण मनुष्यजाति पर विजय पाने के कार्य के लिए अधिक लाभदायक नहीं है। वे आज उसके कार्य के लिए लाभदायक हैं, और भविष्य में भी उसके कार्य के लिए लाभदायक होंगे। यह देह संपूर्ण मनुष्यजाति को जीतकर प्राप्त कर लेगी। इससे बेहतर कोई कार्य नहीं है जिससे संपूर्ण मनुष्यजाति परमेश्वर को देखे, उसके प्रति समर्पण करे और उसे जाने। मनुष्य के द्वारा किया गया कार्य मात्र एक सीमित दायरे को दर्शाता है, और जब परमेश्वर अपना कार्य करता है तो वह किसी व्यक्ति-विशेष से बात नहीं करता, बल्कि पूरी मानवजाति से और उन सारे लोगों से बात करता है जो उसके वचनों को स्वीकार करते हैं। परिणामों की घोषणा करने में, परमेश्वर सभी लोगों के परिणामों की घोषणा करता है, सिर्फ किसी व्यक्ति-विशेष का नहीं। वह किसी के साथ विशेष व्यवहार नहीं करता, न ही वह किसी के लिए चीजें मुश्किल बनाता है, वह सम्पूर्ण मनुष्यजाति पर कार्य करता है और उससे बात करता है। इस देहधारी परमेश्वर ने पहले ही संपूर्ण मनुष्यजाति को उसके प्रकार के अनुसार छाँट दिया है, उसका न्याय कर दिया है, और उपयुक्त मंज़िलों की व्यवस्था कर दी है। भले ही परमेश्वर सिर्फ चीन में ही कार्य करता है, लेकिन वास्तव में, वह तो पहले से ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के कार्य को सँभाल चुका है। अपने कथनों और व्यवस्थाओं को चरणबद्ध तरीके से कार्यान्वित करने से पहले, वह इसकी प्रतीक्षा नहीं कर सकता कि उसका कार्य समस्त मनुष्यजाति में फैल जाए। क्या तब तक बहुत देर नहीं हो जाएगी? अब वह भविष्य के कार्य को पहले से ही पूरा करने में पूर्णतः समर्थ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जो कार्य कर रहा है वही देहधारी परमेश्वर है, वह सीमित दायरे में असीमित कार्य कर रहा है, उसके बाद वह इंसान से वह कर्तव्य अच्छे से करवाएगा जो इंसान को निभाना चाहिए—यह उसके कार्य का सिद्धान्त है। वह इंसान के साथ केवल थोड़े समय तक ही रह सकता है, वह उसके साथ पूरे युग का कार्य समाप्त होने तक नहीं रह सकता। चूँकि वह परमेश्वर है इसलिए पहले ही अपने भविष्य के कार्य की भविष्यवाणी कर देता है। उसके बाद, वह अपने वचनों से पूरी मनुष्यजाति को उसके प्रकार के अनुसार छाँटेगा, और मनुष्यजाति उसके वचनों के अनुसार उसके चरणबद्ध कार्य में प्रवेश करेगी। कोई भी बच नहीं पाएगा, सभी को इसके अनुसार अभ्यास करना होगा। इस तरह भविष्य में उसके वचन युग का मार्गदर्शन करेंगे, आत्मा नहीं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 127
मनुष्य की देह को शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, और इसे अत्यधिक अंधा कर दिया गया है और अत्यधिक नुकसान पहुँचाया गया है। परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से देहधारी होकर कार्य करने का सबसे मूलभूत कारण यह है कि उसके उद्धार का लक्ष्य मनुष्य है, जो देह से बना है, और इसलिए कि परमेश्वर के कार्य में बाधा डालने के लिए शैतान भी मनुष्य की देह का उपयोग करता है। दरअसल, शैतान के साथ युद्ध इंसान पर विजय पाने का कार्य है, और साथ ही, इंसान परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य भी है। इस प्रकार अपना कार्य करने के लिए परमेश्वर का देहधारी होना अत्यावश्यक है। शैतान ने मनुष्य की देह को भ्रष्ट कर दिया और मनुष्य शैतान का मूर्त रूप बन गया है, परमेश्वर द्वारा हराए जाने का लक्ष्य बन गया है। इसलिए, पृथ्वी पर शैतान से युद्ध करने और मनुष्यजाति को बचाने का कार्य किया जाता है। इसलिए शैतान से युद्ध करने के लिए परमेश्वर का मनुष्य बनना आवश्यक है। यह अत्यंत व्यावहारिकता का कार्य है। जब परमेश्वर देह में कार्य कर रहा होता है, तो वह वास्तव में देह में शैतान से युद्ध कर रहा होता है। जब वह देह में कार्य करता है, तो वह आध्यात्मिक क्षेत्र का अपना कार्य कर रहा होता है, वह आध्यात्मिक क्षेत्र के अपने समस्त कार्य को पृथ्वी पर साकार करता है। जिस पर विजय पाई जाती है वो इंसान है, वह इंसान जो उसके प्रति विद्रोही है, जिसे पराजित किया जाता है वो शैतान का मूर्त रूप है (बेशक, यह भी इंसान ही है), जो उससे शत्रुता रखता है, और अंततः जिसे बचाया जाता है वह भी इंसान ही है। इसलिए, यह परमेश्वर के लिए और भी अधिक आवश्यक हो जाता है कि वह ऐसा इंसान बने जिसका बाहरी आवरण एक सृजित प्राणी का हो, ताकि वह शैतान से असल युद्ध कर सके, उस इंसान पर विजय पाने के लिए जो उसके प्रति विद्रोही है, उसके समान बाहरी आवरण धारण किए हुए है और उस इंसान को बचाने के लिए जिसका बाहरी आवरण उसी के समान है और जिसे शैतान द्वारा नुकसान पहुँचाया गया है। उसका शत्रु मनुष्य है, उसकी विजय का लक्ष्य मनुष्य है, और उसके उद्धार का लक्ष्य भी मनुष्य ही है, जिसे उसने बनाया है। इसलिए उसे मनुष्य बनना ही होगा, और इस तरह, उसका कार्य बहुत आसान हो जाता है—वह शैतान को हराने और मनुष्य को जीतने में समर्थ है, और भी अधिक मानवजाति को बचाने में सक्षम है। हालाँकि यह देह सामान्य और व्यावहारिक है, फिर भी यह मामूली देह नहीं है : यह ऐसी देह नहीं है जिसके पास केवल मानवता है, बल्कि ऐसी देह है जिसके पास मानवता और दिव्यता दोनों है। यही उसमें और मनुष्य में अन्तर है, और यही परमेश्वर की पहचान का चिह्न है। ऐसी ही देह से वह अपेक्षित कार्य कर सकता है, देह में परमेश्वर की सेवकाई को पूरा कर सकता है, और मनुष्यों के बीच में अपने कार्य को पूर्ण कर सकता है। यदि यह ऐसा नहीं होता, तो मनुष्यों के बीच उसका कार्य हमेशा खाली और त्रुटिपूर्ण होता। यद्यपि परमेश्वर शैतान की आत्मा के साथ युद्ध कर सकता है और विजयी हो सकता है, फिर भी भ्रष्ट हो चुके मनुष्य की पुरानी प्रकृति का समाधान कभी नहीं किया जा सकता, ऐसे लोग जो परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं और उसका विरोध करते हैं, वे कभी भी उसके प्रभुत्व में नहीं आ सकते, यानी वह कभी भी मनुष्यजाति को जीत नहीं सकता और संपूर्ण मानवजाति को प्राप्त नहीं कर सकता। यदि पृथ्वी पर उसके कार्य का समाधान न हो, तो उसका प्रबन्धन कभी समाप्त नहीं होगा, और संपूर्ण मनुष्यजाति विश्राम में प्रवेश नहीं कर पाएगी। यदि परमेश्वर अपने सभी सृजित प्राणियों के साथ विश्राम में प्रवेश नहीं कर सके तो ऐसे प्रबंधन-कार्य का कभी भी कोई परिणाम नहीं होगा, और फलस्वरूप परमेश्वर की महिमा विलुप्त हो जाएगी। यद्यपि उसकी देह के पास कोई अधिकार नहीं है, फिर भी उसका कार्य अपना प्रभाव प्राप्त कर लेगा। यह उसके कार्य की अनिवार्य दिशा है। उसकी देह में अधिकार हो या न हो, अगर वह स्वयं परमेश्वर का कार्य कर पाता है, तो वह स्वयं परमेश्वर है। यह देह कितना भी सामान्य और साधारण क्यों न हो, वह वो कार्य कर सकता है जिसे उसे करना चाहिए, क्योंकि यह देह परमेश्वर है, मात्र मनुष्य नहीं है। यह देह उस कार्य को कर सकती है जिसे मनुष्य नहीं कर सकता, इसका कारण यह है कि उसका आंतरिक सार किसी इंसान के सार से अलग है, और उसके द्वारा इंसान को बचा पाने का कारण यह है कि उसकी पहचान किसी भी इंसान की पहचान से अलग है। यह देह मानवजाति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वह इंसान है और उससे भी बढ़कर वह परमेश्वर है, क्योंकि वह उस कार्य को कर सकता है जिसे कोई देह का साधारण इंसान नहीं कर सकता है, क्योंकि वह भ्रष्ट इंसान को बचा सकता है, जो उसके साथ पृथ्वी पर रहता है। हालाँकि वह भी इंसान है, फिर भी देहधारी परमेश्वर किसी भी मूल्यवान व्यक्ति की तुलना में मानवजाति के लिए अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह उस कार्य को कर सकता है जो परमेश्वर के आत्मा के द्वारा नहीं किया जा सकता, वह स्वयं परमेश्वर की गवाही देने के लिए परमेश्वर के आत्मा की तुलना में अधिक सक्षम है, और मानवजाति को पूरी तरह से प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के आत्मा की तुलना में अधिक समर्थ है। नतीजतन, यूँ तो यह देह सामान्य और साधारण है, फिर भी मानवजाति के प्रति उसके योगदान और मानवजाति के अस्तित्व के लिए उसके महत्व के संदर्भ में वह अत्यंत अनमोल है और कोई भी इंसान इस देह के वास्तविक मूल्य तथा महत्व को नहीं माप सकता है। यूँ तो यह देह शैतान को सीधे नष्ट नहीं कर सकती है, फिर भी देहधारी परमेश्वर मानवजाति को जीतने और शैतान को हराने के लिए अपने कार्य का उपयोग कर सकता है, शैतान को पूरी तरह से अपने प्रभुत्व के अधीन कर सकता है। चूँकि परमेश्वर देहधारी हुआ है, इसलिए वह शैतान को हरा सकता है और मानवजाति को बचाने में सक्षम है। वह शैतान को सीधे नष्ट नहीं करता है, बल्कि उस मानवजाति को जीतने का कार्य करने के लिए देहधारी हो जाता है जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया है। इस तरह से, वह अपने सृजित प्राणियों के बीच बेहतर ढंग से स्वयं की गवाही दे सकता है और वह भ्रष्ट हुए इंसान को बेहतर ढंग से बचा सकता है। परमेश्वर के आत्मा के द्वारा शैतान के प्रत्यक्ष विनाश की तुलना में देहधारी परमेश्वर के द्वारा शैतान की पराजय अधिक बड़ी गवाही देती है और ज्यादा आश्वस्त करने वाली है। देहधारी परमेश्वर सृष्टिकर्ता को जानने में मनुष्य के लिए अधिक सहायक है और अपने सृजित प्राणियों के बीच स्वयं की बेहतर ढंग से गवाही दे सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 128
परमेश्वर मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने, मनुष्य पर स्वयं को व्यक्तिगत रूप से प्रकट करने और उसे स्वयं को देखने देने के लिए पृथ्वी पर आया है; क्या यह कोई साधारण मामला है? यह वास्तव में सरल नहीं है! यह ऐसा नहीं है, जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है : कि परमेश्वर आ गया है, इसलिए मनुष्य उसकी ओर देख सकता है, ताकि मनुष्य समझ सके कि परमेश्वर व्यावहारिक है और अस्पष्ट या खोखला नहीं है, और कि परमेश्वर उच्च है किंतु विनम्र भी है। क्या यह इतना सरल हो सकता है? यह ठीक इसलिए है, क्योंकि शैतान ने मनुष्य की देह को भ्रष्ट कर दिया है और मनुष्य ही वह प्राणी है जिसे परमेश्वर बचाना चाहता है, यही कारण है कि परमेश्वर को शैतान के साथ युद्ध करने और व्यक्तिगत रूप से मनुष्य की चरवाही करने के लिए देह धारण करनी चाहिए। केवल यही उसके कार्य के लिए लाभदायक है। परमेश्वर की दो देह शैतान को हराने के लिए और मनुष्य को बेहतर ढंग से बचाने के लिए भी अस्तित्व में रही हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जो शैतान के साथ युद्ध कर रहा है, वह केवल परमेश्वर ही हो सकता है, चाहे वह परमेश्वर का आत्मा हो या परमेश्वर का देह। संक्षेप में, शैतान के साथ युद्ध करने वाले स्वर्गदूत नहीं हो सकते, और वह मनुष्य तो बिल्कुल नहीं हो सकता, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है। यह युद्ध लड़ने में स्वर्गदूत निर्बल हैं, और मनुष्य के इसमें शामिल होने की आशा और भी कम है। इसलिए यदि परमेश्वर मनुष्य के जीवन में कार्य करना चाहता है, यदि वह मनुष्य को बचाने के लिए व्यक्तिगत रूप से पृथ्वी पर आना चाहता है, तो उसे व्यक्तिगत रूप से देह धारण करना होगा—अर्थात् उसे व्यक्तिगत रूप से देह धारण करना होगा, और अपनी अंतर्निहित पहचान तथा उस कार्य के साथ, जिसे उसे अवश्य करना चाहिए, मनुष्य के बीच आना होगा और व्यक्तिगत रूप से मनुष्य को बचाना होगा। अन्यथा, यदि वह परमेश्वर का आत्मा या मनुष्य होता, जो यह कार्य करता, तो इस युद्ध से कभी कुछ न निकलता, और यह कभी समाप्त न होता। जब परमेश्वर मनुष्य के बीच व्यक्तिगत रूप से शैतान के साथ युद्ध करने के लिए देहधारी होता है, केवल तभी मनुष्य के पास उद्धार का एक अवसर होता है। इसके अतिरिक्त, शैतान इसके परिणाम स्वरूप शर्मिंदा होता है और उसके पास लाभ उठाने के लिए कोई अवसर नहीं होता है या कार्यान्वित करने के लिए कोई साजिश नहीं बचती है। देहधारी परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य परमेश्वर के आत्मा के द्वारा अप्राप्य है, और परमेश्वर की ओर से किसी माँस और रक्त वाले मनुष्य द्वारा उसे किया जाना तो और भी अधिक असंभव है, क्योंकि जो कार्य वह करता है, वह मनुष्य के जीवन के वास्ते और मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने के लिए है। यदि मनुष्य इस युद्ध में भाग लेता, तो वह अपने हथियार डाल देता, वह पूरी तरह से अपमानित होकर भाग जाता और उसकी दुर्गति हो जाती; वह मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने में एकदम असमर्थ रहता। वह सलीब से मनुष्य को बचाने या संपूर्ण विद्रोही मानव-जाति पर विजय प्राप्त करने में असमर्थ होता, केवल थोड़ा-सा पुराना कार्य करने में सक्षम होता जो सिद्धांतों से परे नहीं जाता, या कोई और कार्य, जिसका शैतान की पराजय से कोई संबंध नहीं है। तो परेशान क्यों हुआ जाए? वह मनुष्य को प्राप्त नहीं कर पाता और शैतान को पराजित करने का काम तो बिल्कुल नहीं कर पाता, तो इसका क्या मतलब होता? और इसलिए, शैतान के साथ युद्ध केवल स्वयं परमेश्वर द्वारा ही किया जा सकता है, और इसे मनुष्य द्वारा किया जाना पूरी तरह से असंभव होगा। मनुष्य का कर्तव्य समर्पण और अनुसरण करना है, क्योंकि मनुष्य स्वर्ग और धरती के सृजन के समान कार्य करने में पूरी तरह से असमर्थ है, वह शैतान के साथ युद्ध करने का कार्य तो बिल्कुल नहीं कर सकता है। मनुष्य केवल स्वयं परमेश्वर की अगुआई के तहत ही सृष्टिकर्ता को संतुष्ट कर सकता है, जिसके माध्यम से शैतान पराजित होता है; केवल यही वह एकमात्र कार्य है जो मनुष्य कर सकता है। और इसलिए, हर बार जब एक नया युद्ध आरंभ होता है, अर्थात् हर बार जब एक नए युग का कार्य शुरू होता है, तो इस कार्य को स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाता है, जिसके माध्यम से वह संपूर्ण युग की अगुआई करता है और संपूर्ण मानव-जाति के लिए एक नया मार्ग खोलता है। प्रत्येक नए युग की भोर शैतान के साथ युद्ध में एक नई शुरुआत है, जिसके माध्यम से मनुष्य एक अधिक नए, अधिक सुंदर क्षेत्र और एक नए युग में प्रवेश करता है, जिसकी अगुआई परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से की जाती है। मनुष्य सभी चीजों का स्वामी है, किंतु वे लोग, जिन्हें प्राप्त कर लिया गया है, शैतान के साथ हुए सभी युद्धों का फल बन जाएँगे। शैतान सभी चीजों को भ्रष्ट करने वाला है, वह सभी युद्धों के अंत में हारने वाला है, और वह इन युद्धों के बाद दंडित किया जाने वाला भी है। परमेश्वर, मनुष्य और शैतान में केवल शैतान ही है, जिसका तिरस्कार किया जाएगा। इस बीच, शैतान द्वारा प्राप्त किए गए और परमेश्वर द्वारा वापस न लिए गए लोग शैतान के साथ दंडित किए जाने वाले बन जाएँगे। इन तीनों में से केवल परमेश्वर की ही सभी चीजों के द्वारा आराधना की जानी चाहिए। जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया किंतु परमेश्वर द्वारा वापस ले लिया जाता है और जो परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे इस बीच ऐसे लोग बन जाते हैं, जो परमेश्वर की प्रतिज्ञा प्राप्त करेंगे और परमेश्वर के लिए दुष्ट लोगों का न्याय करेंगे। परमेश्वर निश्चित रूप से विजयी होगा और शैतान निश्चित रूप से पराजित होगा, किंतु मनुष्यों के बीच ऐसे लोग भी हैं, जो जीतेंगे और ऐसे लोग भी हैं, जो हारेंगे। जो जीतेंगे, वे विजेताओं के साथ होंगे और जो हारेंगे, वे हारने वालों के साथ होंगे; यह प्रत्येक व्यक्ति को उसकी किस्म के अनुसार छाँटना है। यह परमेश्वर के संपूर्ण कार्य का अंतिम परिणाम है, यह परमेश्वर के संपूर्ण कार्य का उद्देश्य भी है और यह कभी नहीं बदलेगा। परमेश्वर की प्रबंधन योजना का केंद्रीय भाग मुख्य रूप से मानव-जाति के उद्धार पर केंद्रित है, और परमेश्वर मुख्य रूप से इस केंद्रीय भाग के वास्ते, इस कार्य के वास्ते और शैतान को पराजित करने के उद्देश्य से देहधारी होता है। पहली बार परमेश्वर देहधारी हुआ, तो वह भी शैतान को पराजित करने के लिए था। वह व्यक्तिगत रूप से देहधारी हुआ और पहले युद्ध का कार्य पूरा करने के लिए, जो कि मानव-जाति के छुटकारे का कार्य था, उसे व्यक्तिगत रूप से सलीब पर चढ़ा दिया गया। इसी प्रकार, कार्य के इस चरण को भी परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाता है, जो मनुष्य के बीच अपना कार्य करने के लिए, और व्यक्तिगत रूप से अपने वचनों को बोलने और मनुष्य को इन चीजों को देखने देने के लिए देह बना है। निस्संदेह, यह अपरिहार्य है कि वह मार्ग में साथ-साथ कुछ अन्य कार्य भी करता है, किंतु जिस मुख्य कारण से वह व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को कार्यान्वित करता है, वह है शैतान को हराना, संपूर्ण मानव-जाति पर विजय पाना, और इन लोगों को प्राप्त करना। इसलिए, देहधारी परमेश्वर का कार्य सरल नहीं है। यदि उसका उद्देश्य मनुष्य को केवल यह दिखाना होता कि परमेश्वर विनम्र और छिपा हुआ है, और यह कि परमेश्वर व्यावहारिक है, यदि यह मात्र इस कार्य को करने के वास्ते होता, तो देहधारी होने की कोई आवश्यकता न होती। परमेश्वर देहधारी न हुआ होता, तब भी वह अपनी विनम्रता और अदृश्यता, अपनी महानता और पवित्रता का खुलासा सीधे मनुष्य पर कर सकता था, किंतु ऐसी चीजों का मानव-जाति के प्रबंधन के कार्य से कोई लेना-देना नहीं है। ये मनुष्य को बचाने या उसे पूर्ण करने में असमर्थ हैं, और ये शैतान को पराजित तो बिल्कुल भी नहीं कर सकतीं। यदि शैतान की पराजय में केवल आत्मा ही शामिल होता, जो किसी आत्मा से युद्ध करता, तो ऐसे कार्य का और भी कम व्यावहारिक मूल्य होता; यह मनुष्य को प्राप्त करने में असमर्थ होता और मनुष्य के भाग्य और उसकी भविष्य की संभावनाओं को बरबाद कर देता। इस प्रकार, आज परमेश्वर के कार्य का गहरा महत्व है। यह केवल इसलिए नहीं है कि मनुष्य उसे देख सके या कि मनुष्य के क्षितिज को बढ़ाया जा सके या उसे प्रेरणा और प्रोत्साहन का थोड़ा एहसास कराया जा सके; ऐसे कार्य का कोई महत्व नहीं है। यदि तुम केवल इस प्रकार के ज्ञान के बारे में ही बोल सकते हो, तो यह साबित करता है कि तुम अभी भी परमेश्वर के देहधारण के सच्चे महत्व को नहीं जानते।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 129
परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के प्रत्येक चरण के अपने व्यावहारिक मायने हैं। जब यीशु का आगमन हुआ, तो वह पुरुष रूप में आया, लेकिन इस बार के आगमन में परमेश्वर, स्त्री रूप में आता है। इससे तुम देख सकते हो कि परमेश्वर द्वारा पुरुष और स्त्री, दोनों का ही सृजन उसके कार्य के काम आ सकता है, वह कोई लिंग-भेद नहीं करता। जब उसका आत्मा आता है, तो वह इच्छानुसार किसी भी देह को धारण कर सकता है और वही देह उसका प्रतिनिधित्व करती है; चाहे पुरुष हो या स्त्री जब तक यह उसका देहधारी शरीर है, यह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है। यदि यीशु जब आया तब वह स्त्री के रूप में प्रकट होता, यानी अगर पवित्र आत्मा द्वारा लड़के के बजाय लड़की गर्भ में आई होती तो भी कार्य का वह चरण उसी तरह से पूरा किया गया होता। और यदि ऐसा होता, तो कार्य का वर्तमान चरण पुरुष के द्वारा किया जाता, लेकिन कार्य उसी तरह से पूरा किया जाता। प्रत्येक चरण में किए गए कार्य का अपना अर्थ है; कार्य का कोई भी चरण दूसरे चरण को दोहराता नहीं है, लेकिन वे एक-दूसरे का विरोध भी नहीं करते हैं। उस समय जब यीशु कार्य कर रहा था, तो उसे इकलौता पुत्र कहा गया, और “पुत्र” का अर्थ है पुरुष लिंग। तो फिर इस चरण में इकलौते पुत्र का उल्लेख क्यों नहीं किया जाता है? क्योंकि कार्य की आवश्यकताओं ने लिंग में बदलाव को आवश्यक बना दिया जो यीशु के लिंग से भिन्न हो। परमेश्वर लिंग को लेकर कोई अंतर नहीं करता। वह अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करता है, और अपने कार्य को करते समय उस पर किसी तरह की कोई बाधा भी नहीं होती है, बल्कि वह विशेष रूप से स्वतंत्र होता है, परन्तु कार्य के प्रत्येक चरण के अपने ही व्यावहारिक मायने होते हैं। परमेश्वर ने दो बार देहधारण किया, और यह स्वतः प्रमाणित है कि अंत के दिनों में उसका देहधारण अंतिम है। वह अपने सभी कर्मों का खुलासा करने के लिए आया है। यदि इस चरण में वह देहधारण नहीं करता और व्यक्तिगत रूप से कार्य नहीं करता जिसे मनुष्य देख सके, तो मनुष्य हमेशा के लिए यही धारणा बनाए रखता कि परमेश्वर सिर्फ पुरुष है, स्त्री नहीं। इससे पहले, सब मानते थे कि परमेश्वर सिर्फ पुरुष ही हो सकता है, किसी स्त्री को परमेश्वर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सारी मानवजाति मानती थी कि पुरुषों का स्त्रियों पर अधिकार होता है। वे मानते थे कि किसी स्त्री के पास अधिकार नहीं हो सकता, अधिकार सिर्फ पुरुष के पास ही हो सकता है। वे तो यहाँ तक कहते थे कि पुरुष स्त्री का मुखिया होता है, स्त्री को पुरुष की आज्ञा का पालन करना चाहिए और वह उससे श्रेष्ठ नहीं हो सकती। अतीत में जब ऐसा कहा गया कि पुरुष स्त्री का मुखिया है, तो यह आदम और हव्वा के संबंध में कहा गया था जिन्हें सर्प के द्वारा छला गया था—न कि उस पुरुष और स्त्री के बारे में जिन्हें आरंभ में यहोवा ने रचा था। निस्संदेह, स्त्री को अपने पति का आज्ञापालन और उससे प्रेम करना चाहिए, उसी तरह पुरुष को अपने परिवार का भरण-पोषण करना आना चाहिए। ये वे नियम और संविधियाँ हैं जिन्हें यहोवा ने बनाया था, जिनका इंसान को धरती पर अपने जीवन में पालन करना चाहिए। यहोवा ने स्त्री से कहा, “तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।” उसने यह सिर्फ इसलिए कहा ताकि मानवजाति (अर्थात् पुरुष और स्त्री दोनों) यहोवा के प्रभुत्व में सामान्य जीवन जी सकें, ताकि मानवजाति के जीवन की एक संरचना हो और वह अपने व्यवस्थित क्रम में ही रहे। इसलिए यहोवा ने उपयुक्त नियम बनाए कि पुरुष और स्त्री को किस तरह व्यवहार करना चाहिए, हालाँकि यह पृथ्वी पर रहने वाले सारे सृजित प्राणियों के सन्दर्भ में था और देहधारी परमेश्वर के देह से कोई संबंध नहीं रखता था। परमेश्वर अपने ही सृजित प्राणियों के समान कैसे हो सकता था? उसके वचन सिर्फ उसके द्वारा रची गई मानवजाति के लिए थे; पुरुष और स्त्री के लिए उसने ये नियम इसलिए स्थापित किए थे ताकि मानवजाति सामान्य जीवन जी सके। आरंभ में, जब यहोवा ने मानवजाति का सृजन किया, तो उसने दो प्रकार के मनुष्य बनाए, पुरुष और स्त्री; इसलिए, उसके देहधारी देहों में पुरुष और स्त्री का भेद किया गया। उसने अपना कार्य आदम और हव्वा को बोले गए वचनों के आधार पर निर्धारित नहीं किया। दोनों बार जब उसने देहधारण किया तो यह पूरी तरह से उसकी तब की सोच के अनुसार निर्धारित किया गया जब उसने प्रारंभ में मानवजाति की रचना की थी; अर्थात्, उसने अपने दो देहधारणों के कार्य को उन पुरुष और स्त्री के आधार पर पूरा किया जिन्हें तब तक भ्रष्ट नहीं किया गया था। सर्प द्वारा छले गये आदम और हव्वा से कहे गए यहोवा के वचनों को यदि मनुष्य परमेश्वर के देहधारण के कार्य पर लागू करता है, तो क्या यीशु को अपनी पत्नी से वैसा ही प्रेम नहीं करना पड़ता जैसा कि उसे करना चाहिए था? इस तरह, क्या परमेश्वर तब भी परमेश्वर ही रहता? यदि ऐसा होता, तो क्या वह तब भी अपना कार्य पूरा कर पाता? यदि देहधारी परमेश्वर का स्त्री होना गलत है, तो क्या परमेश्वर का स्त्री की रचना करना भी भयंकर भूल नहीं थी? यदि लोग अब भी मानते हैं कि परमेश्वर का स्त्री के रूप में देहधारण करना गलत है, तो क्या यीशु का देहधारण, जिसने विवाह नहीं किया या अपनी पत्नी से प्रेम नहीं किया, ऐसी ही त्रुटि नहीं होती जैसा कि वर्तमान देहधारण है? चूँकि तुम यहोवा के द्वारा हव्वा को बोले गए वचनों को परमेश्वर के वर्तमान देहधारण के सत्य को मापने के लिए उपयोग करते हो, तब तो तुम्हें, अनुग्रह के युग में देहधारण करने वाले प्रभु यीशु को मापने के लिए यहोवा द्वारा आदम को बोले गए वचनों का उपयोग करना चाहिए। क्या वे दोनों एक ही नहीं हैं? चूँकि तुम प्रभु यीशु को उस पुरुष के हिसाब से मापते हो जिसे सर्प के द्वारा छला नहीं गया था, तब तुम आज के देहधारण के सत्य के बारे में उस स्त्री के हिसाब से नहीं माप सकते जिसे सर्प के द्वारा छला गया था। यह तो अनुचित होगा! परमेश्वर को इस प्रकार मापना यह साबित करता है कि तुममें कोई विवेक नहीं है। जब यहोवा ने दो बार देहधारण किया, तो उसके देहधारण का लिंग उन पुरुष और स्त्री से संबंधित था जिन्हें सर्प के द्वारा छला नहीं गया था; उसने दो बार ऐसे पुरुष और स्त्री के अनुरूप देहधारण किया जिन्हें सर्प के द्वारा नहीं छला गया था। ऐसा न सोचो कि यीशु का पुरुषत्व वैसा ही था जैसा कि आदम का था, जिसे सर्प के द्वारा छला गया था। उन दोनों का कोई संबंध नहीं है, दोनों भिन्न प्रकृति के पुरुष हैं। निश्चय ही ऐसा तो नहीं हो सकता कि यीशु का पुरुषत्व यह साबित करे कि वह सिर्फ स्त्रियों का ही मुखिया है पुरुषों का नहीं? क्या वह सभी यहूदियों (पुरुषों और स्त्रियों सहित) का राजा नहीं है? वह स्वयं परमेश्वर है, वह न सिर्फ स्त्री का मुखिया है बल्कि पुरुष का भी मुखिया है। वह सभी सृजित प्राणियों का प्रभु है, सभी सृजित प्राणियों का मुखिया है। तुम यीशु के पुरुषत्व को स्त्री के मुखिया का प्रतीक कैसे निर्धारित कर सकते हो? क्या यह ईशनिंदा नहीं है? यीशु ऐसा पुरुष है जिसे भ्रष्ट नहीं किया गया है। वह परमेश्वर है; वह मसीह है; वह प्रभु है। वह आदम की तरह का पुरुष कैसे हो सकता है जो भ्रष्ट हो गया था? यीशु वह देह है जिसे परमेश्वर के अति पवित्र आत्मा ने धारण किया हुआ है। तुम यह कैसे कह सकते हो कि वह ऐसा परमेश्वर है जो आदम के पुरुषत्व को धारण किए हुए है? उस स्थिति में, क्या परमेश्वर का समस्त कार्य गलत नहीं हो गया होता? क्या यहोवा ने यीशु के भीतर उस आदम के पुरुषत्व को समाविष्ट किया होगा जिसे सर्प द्वारा छला गया था? क्या वर्तमान देहधारण देहधारी परमेश्वर के कार्य का दूसरा उदाहरण नहीं है जो कि यीशु के लिंग से भिन्न परन्तु प्रकृति में यीशु के ही समान है? क्या तुम अब भी यह कहने का साहस करते हो कि देहधारी परमेश्वर स्त्री नहीं हो सकता क्योंकि स्त्री ही सबसे पहले सर्प के द्वारा छली गई थी? क्या तुम अब भी यह कहने की हिम्मत कर सकते हो कि चूँकि स्त्री सबसे अधिक अशुद्ध होती है और मानवजाति की भ्रष्टता का मूल है, इसलिए परमेश्वर संभवतः एक स्त्री के रूप में देह धारण नहीं कर सकता? क्या तुम अब भी यह कहते जाने की हिम्मत कर सकते हो कि “स्त्री हमेशा पुरुष का आज्ञापालन करेगी और कभी भी परमेश्वर को अभिव्यक्त नहीं कर सकती है या प्रत्यक्ष रूप से उसका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है”? अतीत में तो तुम नहीं समझे; क्या तुम अब भी परमेश्वर के कार्य की, विशेषकर परमेश्वर के देहधारी शरीर की निंदा कर सकते हो? यदि तुम यह स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, तो अच्छा होगा कि तुम अपनी जुबान पर लगाम लगाओ, ऐसा न हो कि तुम्हारी मूर्खता और अज्ञानता प्रकट हो जाए और तुम्हारी कुरूपता उजागर हो जाए। यह मत सोचो कि तुम सब कुछ समझते हो। मैं तुम्हें बता दूँ कि तुमने जो कुछ भी देखा और अनुभव किया है, वह मेरी प्रबंधन योजना के हजारवें हिस्से को समझने के लिए भी अपर्याप्त है। तो फिर तुम इतने अहंकार से पेश क्यों आते हो? तुम्हारी जरा-सी प्रतिभा और अल्पतम ज्ञान यीशु के कार्य में एक पल के लिए भी उपयोग किए जाने के लिए पर्याप्त नहीं है! तुम्हें वास्तव में कितना अनुभव है? तुमने अपने जीवन में जो कुछ देखा और सुना है और जिसकी तुमने कल्पना की है, वह मेरे एक क्षण के कार्य से भी कम है! तुम्हारे लिए यही अच्छा होगा कि तुम आलोचक बनकर दोष मत ढूँढ़ो। चाहे तुम कितने भी अहंकारी हो, फिर भी तुम एक ऐसे सृजित प्राणी से बढ़कर नहीं हो जो एक चींटी के बराबर भी नहीं है! तुम्हारे भीतर उतना भी नहीं है जितना एक चींटी के भीतर होता है! यह मत सोचो कि सिर्फ इसलिए कि तुमने बहुत अनुभव कर लिया है और वरिष्ठ हो गए हो, तुम बेलगाम ढंग से हाथ नचाते हुए बड़ी-बड़ी बातें कर सकते हो। क्या तुम्हारे पास यह अनुभव और यह वरिष्ठता उन वचनों के कारण नहीं है जो मैंने कहे हैं? क्या तुम यह मानते हो कि वे तुम्हारे परिश्रम और कड़ी मेहनत द्वारा अर्जित किए गए हैं? आज, तुम देखते हो कि मैंने देहधारण किया है, और परिणामस्वरूप तुम्हारे अंदर ऐसी प्रचुर अवधारणाएँ हैं, और उनसे निकली धारणाओं का कोई अंत नहीं है। यदि मेरा देहधारण न होता, तो तुम्हारे अंदर कितनी भी असाधारण प्रतिभाएँ होतीं, तब भी तुम्हारे अंदर इतनी अवधारणाएँ नहीं होतीं; और क्या तुम्हारी धारणाएँ इन्हीं से नहीं उभरतीं? यदि यीशु पहली बार देहधारण नहीं करता, तो क्या तुम देहधारण के बारे में जानते? क्या यह इसलिए नहीं है क्योंकि पहले देहधारण से ही तुमने परमेश्वर के देहधारी होने के बारे में जान लिया था, जिसके कारण तुम ढिठाई से दूसरे देहधारण को मापने की कोशिश करते हो? तुम एक समर्पित अनुयायी बनने के बजाय इसकी जाँच-पड़ताल क्यों कर रहे हो? जब तुमने इस धारा में प्रवेश कर लिया है और देहधारी परमेश्वर के सामने आ गए हो, तो क्या वह तुम्हें परमेश्वर की पड़ताल करने देगा? तुम अपने परिवार के इतिहास की पड़ताल कर सकते हो, परन्तु यदि तुम परमेश्वर के “परिवार के इतिहास” की पड़ताल करते हो, तो क्या आज का परमेश्वर तुम्हें ऐसा करने देगा? क्या तुम अंधे नहीं हो? क्या तुम स्वयं तिरस्कार के भागी नहीं बन रहे हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 130
यीशु और मैं एक ही पवित्रात्मा से आते हैं। यद्यपि हमारी देह एक-दूसरे से जुड़ी नहीं है, किन्तु हमारा आत्मा एक ही है; यद्यपि हमारे कार्य की विषयवस्तु और हम जो कार्य करते हैं, वे एक नहीं हैं, तब भी हमारा सार एक समान है; हमारी देह भिन्न रूप धारण करती हैं, लेकिन यह युग में परिवर्तन और हमारे कार्य की भिन्न आवश्यकताओं के कारण है; हमारी सेवकाई एक जैसी नहीं है, इसलिए जो कार्य हम आगे लाते हैं और जिस स्वभाव को हम मनुष्य पर प्रकट करते हैं, वे भी भिन्न हैं। यही कारण है कि आज मनुष्य जो देखता और समझता है वह अतीत के समान नहीं है; ऐसा युग में बदलाव के कारण है। यद्यपि उनके देह के लिंग और रूप भिन्न-भिन्न हैं, और वे दोनों एक ही परिवार में नहीं जन्मे हैं, उसी समयावधि में तो बिल्कुल नहीं, किन्तु फिर भी उनके आत्मा एक ही हैं। यद्यपि उनके देह किसी प्रकार के रक्त या भौतिक संबंध साझा नहीं करते, पर इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे भिन्न-भिन्न समयावधियों में परमेश्वर के देहधारी शरीर हैं। यह एक निर्विवाद सत्य है कि वे परमेश्वर के द्वारा धारित देह हैं। यद्यपि वे रक्त से संबंधित नहीं हैं या एक ही भाषा साझा नहीं करते (एक पुरुष था जो यहूदियों की भाषा बोलता था और दूसरी स्त्री है जो सिर्फ चीनी भाषा बोलती है)। इन्हीं कारणों से उन्हें जो कार्य करना चाहिए, उसे वे भिन्न-भिन्न देशों में, और साथ ही भिन्न-भिन्न समयावधियों में करते हैं। इस तथ्य के बावजूद वे एक ही आत्मा के हैं—यानी उनका सार एक ही है—लेकिन उनकी देह के बाहरी आवरणों में कोई समानता नहीं है। बस उनकी मानवता समान है, परन्तु जहाँ तक उनकी देह के बाहरी स्वरूप और उनके जन्म की परिस्थितियों की बात है, वे दोनों समान नहीं हैं। इन चीजों का उनके अपने-अपने कार्य या उनके बारे में मनुष्य का जो ज्ञान है, उस पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि अंतिम विश्लेषण में, वे एक ही आत्मा के हैं और उन्हें कोई अलग नहीं कर सकता। यद्यपि उनका रक्त-संबंध नहीं है, किन्तु उनका सम्पूर्ण अस्तित्व उनके आत्मा द्वारा निर्देशित होता है, जो उन्हें अलग-अलग समय में अलग-अलग कार्य प्राप्त करने में सक्षम बनाता है और उनकी देह के अलग-अलग रक्त-संबंध हैं। उदाहरण के लिए, यहोवा का आत्मा यीशु के आत्मा का पिता नहीं है, यीशु का आत्मा यहोवा के आत्मा का पुत्र नहीं है : वे एक ही और समान आत्मा के हैं। उसी तरह, आज के देहधारी परमेश्वर और यीशु में कोई रक्त-संबंध नहीं है, लेकिन वे हैं एक ही—क्योंकि उनके आत्मा एक ही हैं। परमेश्वर दया और करुणा का, और साथ ही धार्मिक न्याय का, मनुष्य की ताड़ना का, और मनुष्य को श्राप देने का कार्य कर सकता है; अंत में, वह संसार को नष्ट करने और दुष्टों को सज़ा देने का कार्य कर सकता है। क्या वह यह सब स्वयं नहीं करता? क्या यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता नहीं है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 131
परमेश्वर पूरे ब्रह्मांड और ऊपर के राज्य में महानतम है, तो क्या वह देह की छवि का उपयोग करके स्वयं को पूरी तरह से समझा सकता है? परमेश्वर अपने कार्य के एक चरण को करने के लिए देह के वस्त्र पहनता है। देह की इस छवि का कोई विशेष अर्थ नहीं है, यह युगों के गुज़रने से कोई संबंध नहीं रखती, और न ही इसका परमेश्वर के स्वभाव से कुछ लेना-देना है। यीशु ने अपनी छवि को क्यों नहीं बना रहने दिया? क्यों उसने मनुष्य को अपनी छवि चित्रित नहीं करने दी, ताकि उसे बाद की पीढ़ियों को सौंपा जा सकता? क्यों उसने लोगों को यह स्वीकार नहीं करने दिया कि उसकी छवि परमेश्वर की छवि है? यद्यपि मनुष्य की छवि परमेश्वर की छवि में बनाई गई थी, किंतु फिर भी क्या मनुष्य की छवि के लिए परमेश्वर की उत्कृष्ट छवि का प्रतिनिधित्व करना संभव रहा होता? जब परमेश्वर देहधारी होता है, तो वह स्वर्ग से मात्र एक विशेष देह में अवरोहण करता है। यह उसका आत्मा है, जो देह में अवरोहण करता है, जिसके माध्यम से वह आत्मा का कार्य करता है। यह आत्मा ही है जो देह में व्यक्त होता है, और यह आत्मा ही है जो देह में अपना कार्य करता है। देह में किया गया कार्य पूरी तरह से आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है, और देह कार्य के वास्ते होता है, किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि देह की छवि स्वयं परमेश्वर की वास्तविक छवि का स्थानापन्न होती है; परमेश्वर के देहधारी होने का उद्देश्य और अर्थ यह नहीं है। वह केवल इसलिए देहधारी बनता है, ताकि आत्मा को रहने के लिए ऐसी जगह मिल सके, जो उसकी कार्य-प्रणाली के लिए उपयुक्त हो, ताकि वह देह में अपने कार्य को संपन्न कर सके, और ताकि लोग उसके कर्म देख सकें, उसका स्वभाव समझ सकें, उसके वचन सुन सकें, और उसके कार्य का चमत्कार जान सकें। उसका नाम उसके स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है, उसका कार्य उसकी पहचान का प्रतिनिधित्व करता है, किंतु उसने कभी नहीं कहा है कि देह में उसका रूप उसकी छवि का प्रतिनिधित्व करता है; यह केवल मनुष्य की एक धारणा है। और इसलिए, परमेश्वर के देहधारण के मुख्य पहलू उसका नाम, उसका कार्य, उसका स्वभाव और उसका लिंग हैं। इस युग में उसके प्रबंधन का प्रतिनिधित्व करने के लिए इनका उपयोग किया जाता है। केवल उस समय के उसके कार्य के वास्ते होने से, देह में उसके रूप का उसके प्रबंधन से कोई संबंध नहीं है। फिर भी, देहधारी परमेश्वर के लिए कोई विशेष रूप नहीं रखना असंभव है, और इसलिए वह अपना रूप निश्चित करने के लिए उपयुक्त परिवार चुनता है। यदि परमेश्वर के रूप का प्रातिनिधिक अर्थ होता, तो उसके चेहरे जैसी सामान्य विशेषताओं से संपन्न सभी व्यक्ति भी परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते। क्या यह एक गंभीर त्रुटि नहीं होती? यीशु का चित्र मनुष्य द्वारा चित्रित किया गया था, ताकि मनुष्य उसकी आराधना कर सके। उस समय पवित्रात्मा ने कोई विशेष निर्देश नहीं दिए, और इसलिए मनुष्य ने आज तक उस कल्पित चित्र को आगे बढ़ाया। वास्तव में, परमेश्वर के मूल इरादे के अनुसार, मनुष्य को ऐसा नहीं करना चाहिए था। यह केवल मनुष्य का उत्साह है, जिसके कारण आज तक यीशु का चित्र बचा रहा है। परमेश्वर आत्मा है, और उसकी सटीक छवि सारांशित करने में मनुष्य कभी सक्षम नहीं होगा। उसकी छवि का केवल उसके स्वभाव द्वारा ही प्रतिनिधित्व किया जा सकता है। जहाँ तक उसकी नाक, उसके मुँह, उसकी आँखों और उसके बालों के रूप-रंग की बात है, ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें तुम सारांशित नहीं कर सकते। जब यूहन्ना पर प्रकाशन आया, तो उसने मनुष्य के पुत्र की छवि देखी : उसके मुँह से एक तेज दो-धारी तलवार निकल रही थी, उसकी आँखें आग की ज्वाला के समान थीं, उसका सिर और बाल श्वेत ऊन के समान उज्ज्वल थे, उसके पाँव चमकाए गए काँसे के समान थे, और उसकी छाती के चारों ओर सोने का पटुका बँधा हुआ था। यद्यपि उसके वचन बहुत जीवंत थे, किंतु उसने परमेश्वर की जिस छवि का वर्णन किया, वह किसी सृजित प्राणी की छवि नहीं थी। उसने जो देखा, वह मात्र एक दर्शन था, भौतिक जगत में से किसी व्यक्ति की छवि नहीं थी। यूहन्ना ने एक दर्शन देखा था, किंतु उसने नहीं देखा था कि परमेश्वर वास्तव में कैसा दिखता था। देहधारी परमेश्वर के देह की छवि एक सृजित प्राणी की छवि होने से परमेश्वर के स्वभाव का समग्रता से प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है। जब यहोवा ने मानवजाति का सृजन किया, तो उसने कहा कि उसने ऐसा अपनी छवि में किया और नर और मादा का सृजन किया। उस समय, उसने कहा कि उसने नर और मादा को परमेश्वर की छवि में बनाया। यद्यपि मनुष्य की छवि परमेश्वर की छवि से मिलती-जुलती है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि मनुष्य का रूप परमेश्वर की छवि है। न ही तुम परमेश्वर की छवि को पूरी तरह से संपुटित करने के लिए मनुष्य की भाषा का उपयोग कर सकते हो, क्योंकि परमेश्वर इतना उत्कृष्ट, इतना महान, इतना अद्भुत और अथाह है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 132
इस बार परमेश्वर कार्य करने के लिए आध्यात्मिक देह में नहीं, बल्कि बहुत ही साधारण शरीर में आया है। इसके अलावा, यह परमेश्वर के दूसरे देहधारण का शरीर है और यह वह शरीर भी है, जिसके द्वारा वह देह में लौटकर आया है। यह एक बहुत साधारण देह है। उस पर नजर डालकर तुम ऐसा कुछ भी नहीं देख सकते हो जो उसे दूसरों से भिन्न दिखाता हो, लेकिन तुम उससे अब तक अनसुने सत्य प्राप्त कर सकते हो। महज यह तुच्छ देह परमेश्वर के सत्य के समस्त वचनों का मूर्त रूप है, अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य की वाहक है और मनुष्य के समझने के लिए परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है। क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? क्या तुम मानवजाति का गंतव्य देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? वह तुम्हें ये सभी रहस्य बताएगा—वे रहस्य जो कोई मनुष्य तुम्हें कभी नहीं बता पाया है—और वह तुम्हें वे सत्य भी बताएगा जिन्हें तुम नहीं समझते। वह राज्य में जाने का तुम्हारा द्वार है, और नए युग में जाने के लिए तुम्हारा मार्गदर्शक है। यह साधारण देह कई रहस्यों को समेटे हुए है जिनकी थाह मनुष्य नहीं ले सकता है। उसके कर्म तुम्हारे लिए गूढ़ हैं, लेकिन उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य का संपूर्ण लक्ष्य तुम्हें यह सब देखने की क्षमता देने के लिए पर्याप्त है कि वह कोई साधारण देह नहीं है, जैसा कि लोग मानते हैं, क्योंकि वह अंत के दिनों के परमेश्वर के इरादों और अंत के दिनों में मानवजाति के प्रति परमेश्वर की परवाह का प्रतिनिधित्व करता है। यद्यपि तुम उसके द्वारा बोले गए उन वचनों को नहीं सुन सकते जो आकाश और पृथ्वी को कँपाते-से लगते हैं, यद्यपि तुम उसकी आँखें आग की लपटों जैसी नहीं देख सकते, और यद्यपि तुम उसके लौह-दंड का अनुशासन नहीं पा सकते, फिर भी तुम उसके वचनों से यह सुन सकते हो कि परमेश्वर क्रोधित हो रहा है और यह जान सकते हो कि परमेश्वर मानवजाति पर दया दिखा रहा है, और तुम परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव और उसकी बुद्धि देख सकते हो, और उससे भी अधिक, समस्त मानवजाति के लिए परमेश्वर की परवाह को समझ सकते हो। अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य मनुष्य को स्वर्ग के परमेश्वर का पृथ्वी पर मनुष्य के बीच रहना दिखाना है और परमेश्वर को जानने, उसके प्रति समर्पण करने, उसका भय मानने और उससे प्रेम करने में सक्षम बनाना है। यही कारण है कि वह दूसरी बार देह में लौटा है। यूँ तो आज मनुष्य जो देखता है वह एक ऐसा परमेश्वर है जो बिल्कुल मनुष्य के ही समान है, एक नाक और दो आँखों वाला परमेश्वर और एक बहुत ही साधारण परमेश्वर, लेकिन अंत में परमेश्वर तुम लोगों को दिखाएगा कि अगर यह व्यक्ति न हो, तो आकाश और धरती में जबरदस्त बदलाव आएँगे; अगर यह व्यक्ति न हो तो आकाश धुँधला जाएगा, पृथ्वी पर उथल-पुथल मच जाएगी और समस्त मानवजाति अकाल और महामारियों के बीच जिएगी। वह तुम लोगों को दिखाएगा कि यदि अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर तुम लोगों को बचाने के लिए न आता तो परमेश्वर समस्त मानवजाति को बहुत पहले ही नरक में नष्ट कर चुका होता; यदि यह देह न होती तो तुम लोग सदैव महापापी होते और तुम हमेशा के लिए लाश होते। तुम लोगों को जानना चाहिए कि यदि यह देह न होती तो समस्त मानवजाति के लिए एक महा आपदा से बचना असंभव होता, और उसके लिए अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा मानवजाति को दिए जाने वाले और भी कठोर दंड से बच पाना असंभव होता। यदि इस साधारण देह का जन्म न हुआ होता तो तुम सबकी ऐसी हालत होती कि तुम लोग जीवन की भीख माँगते लेकिन जी न पाते और मरने की भीख माँगते लेकिन मर न पाते; यदि यह देह न होती तो तुम लोग सत्य प्राप्त न कर पाते और आज परमेश्वर के सिंहासन के सामने न आ पाते, बल्कि अपने जघन्य पापों के लिए परमेश्वर द्वारा दंडित किए जाते। क्या तुम लोग जानते थे कि यदि परमेश्वर देह में लौटा न होता तो किसी के पास भी उद्धार का अवसर न होता; और यदि इस देह का आगमन न होता तो परमेश्वर ने बहुत पहले ही पुराने युग को समाप्त कर दिया होता? ऐसा होने से क्या तुम लोग अभी भी परमेश्वर के दूसरे देहधारण को नकारोगे? चूँकि तुम लोग इस साधारण व्यक्ति से इतने बड़े लाभ प्राप्त कर सकते हो तो तुम उसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार क्यों नहीं करोगे?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम जानते थे? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक महान काम किया है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 133
परमेश्वर का कार्य ऐसा है, जिसे तुम समझ नहीं सकते। यदि तुम न तो पूरी तरह से यह समझ सकते हो कि तुम्हारा चुनाव सही है या नहीं, और न ही तुम यह जान सकते हो कि परमेश्वर का कार्य सफल हो सकता है या नहीं, तो तुम अपनी किस्मत क्यों नहीं आजमाते और क्यों नहीं यह देखते कि क्या यह साधारण व्यक्ति तुम्हारी बड़ी मदद कर सकता है और क्या परमेश्वर ने वास्तव में महान काम किया है? लेकिन मैं तुम्हें बता दूँ कि नूह के दिनों में मनुष्य इस हद तक खाने-पीने और शादी-ब्याह करने में लीन रहते थे कि परमेश्वर के लिए यह सब देखना असहनीय हो गया था, इसलिए उसने समस्त मानवजाति के विनाश के लिए एक बड़ी बाढ़ भेजी और बस आठ सदस्यों वाले नूह के परिवार और सभी प्रकार के पशु-पक्षियों को बचाया। लेकिन अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा बचाए गए लोग वे हैं, जो अंत तक उसके वफादार रहे हैं। यद्यपि दोनों युग अत्यधिक भ्रष्टाचार के युग हैं जो परमेश्वर के लिए असहनीय हैं और दोनों युगों में मानवजाति बहुत भ्रष्ट हो चुकी है और उसने परमेश्वर को अपना प्रभु मानने से इनकार कर दिया है, फिर भी परमेश्वर ने नूह के समय के लोगों को ही नष्ट किया। दोनों युगों में मानवजाति परमेश्वर को बहुत कष्ट देती है, फिर भी परमेश्वर ने अब तक अंत के दिनों के लोगों के प्रति धीरज रखा है। ऐसा क्यों है? क्या तुम लोगों ने कभी सोचा नहीं कि ऐसा क्यों है? यदि तुम लोग सचमुच नहीं जानते, तो चलो, मैं तुम्हें बता देता हूँ। अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा लोगों को अनुग्रह प्रदान कर पाने का कारण यह नहीं है कि वे नूह के समय के लोगों की तुलना में कम भ्रष्ट हैं या उनमें परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप का इरादा है और यह कारण तो बिल्कुल नहीं है कि अंत के दिनों में तकनीक इतनी उन्नत हो गई है कि परमेश्वर लोगों को नष्ट नहीं कर सकता। बल्कि इसका कारण यह है कि अंत के दिनों में परमेश्वर को लोगों के एक समूह में कार्य करना है और परमेश्वर यह कार्य अपने देहधारण में स्वयं करने का इरादा रखता है। इतना ही नहीं, परमेश्वर इस समूह के एक भाग को अपने उद्धार का पात्र चुनना चाहता है और अपनी प्रबंधन योजना का परिणाम बनाने का इरादा रखता है, और इन लोगों को अगले युग में लाने का इरादा है। इसलिए किसी भी हालत में परमेश्वर ने जो कीमत चुकाई है, वह पूरी तरह से अंत के दिनों में उसके द्वारा देह धारण वाले कार्य की तैयारी में है। यह तथ्य कि तुम लोग आज तक पहुँच गए हो, इसी देह के कारण है। चूँकि परमेश्वर देह में जीता है, इसीलिए तुम लोगों के पास जीवित रहने का मौका है। ये सारे आशीष इसी साधारण व्यक्ति के कारण मिले हैं। इतना ही नहीं, बल्कि अंत में अनेक राष्ट्र इस साधारण व्यक्ति की उपासना करेंगे और साथ ही इस मामूली व्यक्ति को धन्यवाद देंगे और उसके प्रति समर्पण करेंगे, क्योंकि उसके द्वारा लाए गए सत्य, जीवन और मार्ग ने ही समस्त मानवजाति को बचाया है, मनुष्य और परमेश्वर के बीच के संघर्ष को शांत किया है, उनके बीच की दूरी कम की है, और परमेश्वर के विचारों और मनुष्य के बीच संबंध स्थापित किया है। इसी ने परमेश्वर के लिए और अधिक महिमा हासिल की है। क्या ऐसा साधारण व्यक्ति तुम्हारे विश्वास और श्रद्धा के योग्य नहीं है? क्या यह साधारण देह मसीह कहलाने के योग्य नहीं है? क्या ऐसा साधारण व्यक्ति मनुष्य के बीच परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं बन सकता? क्या ऐसा व्यक्ति, जिसने मानवजाति को आपदा से बचाया है, तुम लोगों के प्रेम और उसे थामे रखने की तुम्हारी इच्छा का अधिकारी नहीं है? यदि तुम लोग उसके मुख से व्यक्त सत्य को नकारते हो, और अपने बीच उसके अस्तित्व से घृणा करते हो, तो अंत में तुम लोगों का क्या होगा?
अंत के दिनों में परमेश्वर का सारा कार्य इस साधारण व्यक्ति के माध्यम से किया जाता है। वह तुम्हें सब-कुछ प्रदान करेगा और इतना ही नहीं, वह तुमसे संबंधित हर चीज तय करने में सक्षम है। क्या ऐसा व्यक्ति वैसा हो सकता है जैसा तुम लोग मानते हो : एक ऐसा व्यक्ति जो इतना सरल है कि उल्लेख करने योग्य नहीं है? क्या उसका सत्य तुम लोगों को पूरी तरह से कायल करने के लिए पर्याप्त नहीं है? क्या अपनी आँखों से उसके कर्म देखकर भी तुम लोग कायल नहीं होते? या फिर जिस मार्ग पर वह लोगों को ले जाता है वह मार्ग तुम लोगों के लिए चलने के लायक नहीं है? आखिरकार वह क्या चीज है जिसके कारण तुम लोग उससे अरुचि महसूस करते हो, उसे अस्वीकार करते हो और उससे दूर रहते हो? यही वह व्यक्ति है जो सत्य व्यक्त करता है, यही वह व्यक्ति है जो सत्य प्रदान करता है और यही वह व्यक्ति है जो तुम लोगों को अनुसरण करने के लिए मार्ग प्रदान करता है। क्या तुम लोग अभी भी इन सत्यों के भीतर परमेश्वर के कार्य के निशान खोज पाने में असमर्थ हो? यीशु के कार्य के बिना मानवजाति सूली से नहीं उतर सकती थी, लेकिन आज के देहधारी परमेश्वर के बिना सूली से उतरे लोग कभी परमेश्वर का अनुमोदन नहीं पा सकते या नए युग में प्रवेश नहीं कर सकते। इस साधारण व्यक्ति के आगमन के बिना तुम लोगों को कभी परमेश्वर के सच्चे मुखमंडल का दर्शन करने का अवसर नहीं मिलता, न ही तुम इसके योग्य होते, क्योंकि तुम सब ऐसे हो जिन्हें बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था। परमेश्वर के द्वितीय देहधारण के आगमन के कारण परमेश्वर ने तुम लोगों को क्षमा कर दिया है और तुम लोगों पर दया दिखाई है। खैर अंत में मुझे तुम लोगों को जिन वचनों के साथ छोड़ना होगा, वे अभी भी यही हैं : यह साधारण व्यक्ति, जो देहधारी परमेश्वर है, तुम लोगों के लिए बड़े महत्व का है। यह वह महान काम है जिसे परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच पहले ही कर दिया है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम जानते थे? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक महान काम किया है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 134
तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में क्या पता होना चाहिए? आत्मा, व्यक्ति और वचन स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर को बनाते हैं; और यही स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर का वास्तविक अर्थ है। यदि तुम सिर्फ व्यक्ति को जानते हो—यदि तुम उसकी रोजाना की आदतों और उसके व्यक्तित्व को जानते हो—लेकिन आत्मा के कार्य को नहीं जानते या यह नहीं जानते कि आत्मा देह में क्या करता है, और यदि तुम सिर्फ आत्मा और वचन पर ध्यान देते हो, केवल आत्मा के सामने प्रार्थना करते हो, लेकिन व्यावहारिक परमेश्वर में परमेश्वर के आत्मा के कार्य को नहीं जानते, तो यह साबित करता है कि तुम व्यावहारिक परमेश्वर को नहीं जानते। व्यावहारिक परमेश्वर संबंधी ज्ञान में उसके वचनों को जानना और अनुभव करना, पवित्रात्मा के कार्य के नियमों और सिद्धांतों को समझना, और परमेश्वर के आत्मा द्वारा देह में कार्य करने के तरीके को समझना शामिल है। इसमें यह जानना भी शामिल है कि देह में परमेश्वर का हर कदम आत्मा द्वारा निर्देशित होता है और उसके द्वारा बोले जाने वाले वचन आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं। इस प्रकार, व्यावहारिक परमेश्वर को जानने के लिए यह जानना सर्वोपरि है कि परमेश्वर मानवता और दिव्यता में कैसे कार्य करता है; इसका संबंध आत्मा की अभिव्यक्ति से है, जिससे सभी लोग जुड़ते हैं।
आत्मा की अभिव्यक्तियों के कौन-से पहलू हैं? परमेश्वर कभी मानवता में कार्य करता है और कभी दिव्यता में—लेकिन दोनों मामलों में नियंत्रक आत्मा होता है। व्यक्ति की बाहरी अभिव्यक्ति उसके भीतर के आत्मा पर निर्भर करती है। आत्मा सामान्य रूप से कार्य करता है, लेकिन आत्मा द्वारा उसके निर्देशन के दो भाग हैं : एक भाग उसका मानवता में किया जाने वाला कार्य है और दूसरा उसका दिव्यता के माध्यम से किया जाने वाला कार्य है। यह तुम्हें अच्छी तरह से जान लेना चाहिए। आत्मा का कार्य परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग होता है : जब उसकी मानवता को कार्य करने की आवश्यकता होती है, तो आत्मा इस मानवता को यह कार्य करने के लिए निर्देशित करता है; और जब उसकी दिव्यता को कार्य करने की आवश्यकता होती है, तो उसे करने के लिए सीधे दिव्यता आगे आती है। चूँकि परमेश्वर देह में कार्य करता है और देह में प्रकट होता है, इसलिए वह मानवता और दिव्यता दोनों में कार्य करता है। मानवता में उसका कार्य आत्मा द्वारा निर्देशित होता है और मनुष्यों की दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, परमेश्वर के साथ उनका जुड़ना आसान बनाने के लिए, उन्हें परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता देखने देने के लिए, और उन्हें यह देखने देने के लिए किया जाता है कि परमेश्वर के आत्मा ने देह धारण किया है और वह मनुष्यों के बीच है, मनुष्य के साथ रहता है और मनुष्य के साथ जुड़ता है। दिव्यता में उसका कार्य लोगों के जीवन के लिए पोषण प्रदान करने और हर चीज में लोगों की सकारात्मक रूप से अगुआई करने, लोगों के स्वभाव को बदलने और उन्हें वास्तव में आत्मा के देह में प्रकटन को देखने देने के लिए किया जाता है। मुख्य रूप से, मनुष्य के जीवन में वृद्धि सीधे दिव्यता में किए गए परमेश्वर के कार्य और वचनों के माध्यम से प्राप्त की जाती है। केवल दिव्यता में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करके ही लोग अपने स्वभावों में बदलाव हासिल कर सकते हैं और केवल तभी वे अपनी आत्मा में संतुष्ट हो सकते हैं; केवल इसमें मानवता में किया जाने वाला कार्य—मानवता में परमेश्वर की चरवाही, सहायता और पोषण—जोड़े जाने पर ही परमेश्वर के कार्य के परिणाम पूरी तरह से हासिल किए जा सकते हैं। आज जिस व्यावहारिक परमेश्वर की बात की जाती है, वह मानवता और दिव्यता दोनों में कार्य करता है। व्यावहारिक परमेश्वर के प्रकट होने के माध्यम से उसका सामान्य मानवीय कार्य और जीवन और उसका पूर्ण दिव्यता का कार्य, सभी हासिल किए जाते हैं। उसकी मानवता और दिव्यता संयुक्त रूप से एक हैं, और दोनों का कार्य वचनों के द्वारा पूरा किया जाता है; मानवता में हो या दिव्यता में, वह वचन बोलता है। जब परमेश्वर मानवता में कार्य करता है, तो वह मानव की भाषा बोलता है, ताकि लोग उससे जुड़ सकें और उसके वचनों को अधिक आसानी से समझ सकें। उसके वचन स्पष्ट रूप से बोले जाते हैं और समझने में आसान होते हैं, ऐसे कि वे सभी लोगों को प्रदान किए जा सकें; लोग सुशिक्षित हों या अल्पशिक्षित, वे सब परमेश्वर के वचनों को प्राप्त कर सकते हैं। दिव्यता में परमेश्वर का कार्य भी वचनों के द्वारा ही किया जाता है, लेकिन वह पोषण से भरा होता है, जीवन से भरा होता है, मनुष्य की धारणाओं से दूषित नहीं होता, उसमें मनुष्य की प्राथमिकताएँ शामिल नहीं होतीं, और वह मानवता की सीमाओं के अधीन नहीं होता है, वह सामान्य मानवता की किसी भी बाधा से मुक्त होता है; साथ ही, वह देह में किया जाता है, लेकिन आत्मा की सीधी अभिव्यक्ति होता है। यदि लोग केवल परमेश्वर द्वारा मानवता में किए गए कार्य को ही स्वीकार करते हैं, तो वे अपने आपको एक दायरे में सीमित कर लेंगे, और एक छोटे-से बदलाव के लिए भी उन्हें कई वर्षों की काट-छाँट और अनुशासन की आवश्यकता होगी। हालाँकि पवित्र आत्मा के कार्य या उसकी उपस्थिति के बिना वे हमेशा अपने पुराने रास्ते पर लौट जाएँगे। दिव्यता के कार्य के माध्यम से ही इस दोष और कमी की भरपाई की जाती है और लोगों को पूर्ण बनाया जाता है। सतत काट-छाँट के बजाय, जो चीज़ ज़रूरी है वह है सकारात्मक पोषण, सभी कमियों की भरपाई करने के लिए वचनों का उपयोग करना, लोगों की हर अवस्था प्रकट करने के लिए वचनों का उपयोग करना, उनके जीवन, उनके प्रत्येक कथन, उनके हर कार्य को निर्देशित करने और उनके इरादों और प्रेरणाओं को खोलकर रख देने के लिए वचनों का उपयोग करना। यही है व्यावहारिक परमेश्वर का व्यावहारिक कार्य। इसलिए, व्यावहारिक परमेश्वर के प्रति अपने रवैये में तुम्हें उसकी मानवता के सामने समर्पण करना चाहिए, उसे पहचानना और स्वीकार करना चाहिए; सबसे अहम बात यह है कि तुम्हें दिव्यता में उसके कार्य और वचनों को भी स्वीकार करना और उनके प्रति समर्पण करना चाहिए। परमेश्वर के देह में प्रकट होने का अर्थ है कि परमेश्वर के आत्मा के सब कार्य और वचन उसकी सामान्य मानवता, और उसके द्वारा धारित देह के माध्यम से किए जाते हैं। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का आत्मा उसकी मानवता को कार्य करने के लिए निर्देशित करता है और दिव्यता के कार्य को देह में पूरा करता है, और देहधारी परमेश्वर में तुम परमेश्वर के मानवता में किए गए कार्य और पूर्ण दिव्यता में किए गए उसके कार्य, दोनों देख सकते हो। व्यावहारिक परमेश्वर के देह में प्रकट होने का यह वास्तविक अर्थ है। यदि तुम इसे स्पष्ट रूप से देख सकते हो, तो तुम परमेश्वर के सभी विभिन्न भागों को जोड़ पाओगे; तुम उसके दिव्यता में किए गए कार्य को बहुत ज्यादा महत्व देना और मानवता में किए गए उसके कार्य को तुच्छ समझना बंद कर दोगे, तुम चरम सीमाओं पर नहीं जाओगे, न ही कोई गलत रास्ता पकड़ोगे। कुल मिलाकर, व्यावहारिक परमेश्वर का अर्थ यह है कि उसका मानवता और दिव्यता का कार्य, आत्मा के निर्देशानुसार, उसके देह के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है, ताकि लोग देख सकें कि वह जीवंत और सजीव, वास्तविक और सत्य है।
परमेश्वर के आत्मा के मानवता में किए जाने वाले कार्य का एक परिवर्ती चरण है। मानवजाति को पूर्ण करके वह अपनी मानवता को आत्मा का निर्देश प्राप्त करने में समर्थ बनाता है, जिसके बाद उसकी मानवता कलीसियाओं को पोषण प्रदान करने और उनकी चरवाही करने में सक्षम होती है। यह परमेश्वर के सामान्य कार्य की एक अभिव्यक्ति है। इसलिए, यदि तुम परमेश्वर के मानवता में किए जाने वाले कार्य के सिद्धांतों को अच्छी तरह देख पाते हो, तो तुम्हारे लिए परमेश्वर के मानवता में किए जाने वाले कार्य के बारे में धारणाएँ बनाना आसान नहीं होगा। चाहे कुछ भी हो, परमेश्वर का आत्मा गलत नहीं हो सकता। वह सही और त्रुटिरहित है; वह कुछ भी गलत नहीं करता। दिव्यता का कार्य परमेश्वर के इरादों की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है, उसमें मानवता का कोई विघ्न नहीं होता। वह पूर्णता से होकर नहीं गुजरता, बल्कि सीधे आत्मा से आता है। हालाँकि, भले ही वह दिव्यता में कार्य करता है, फिर भी यह उसकी सामान्य मानवता के कारण ही है; यह जरा भी अलौकिक नहीं है और किसी सामान्य मनुष्य द्वारा किया जाता प्रतीत होता है। परमेश्वर स्वर्ग से पृथ्वी पर मुख्यतः परमेश्वर के वचनों को देह के माध्यम से व्यक्त करने के लिए—परमेश्वर के आत्मा का कार्य देह के माध्यम से पूरा करने के लिए आया है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 135
आज, व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान बहुत एकतरफा है, और देहधारण के अर्थ के बारे में उनकी समझ अभी भी बहुत कम है। परमेश्वर की देह के संदर्भ में, लोग उसके कार्य और वचनों के माध्यम से देखते हैं कि परमेश्वर के आत्मा में इतना कुछ शामिल है, वह इतना समृद्ध है। लेकिन कुछ भी हो, परमेश्वर की गवाही अंततः परमेश्वर के आत्मा से आती है : परमेश्वर देह में क्या करता है, वह किन सिद्धांतों के द्वारा कार्य करता है, वह मानवता में क्या करता है और वह दिव्यता में क्या करता है। लोगों को इसका ज्ञान होना चाहिए। आज, तुम इस व्यक्ति की आराधना करने में सक्षम हो, जबकि वास्तव में तुम आत्मा की आराधना कर रहे हो और लोगों को देहधारी परमेश्वर संबंधी अपने ज्ञान में कम से कम यह तो हासिल करना ही चाहिए। देह के माध्यम से लोग आत्मा के सार को जान पाते हैं, देह में आत्मा के दिव्य कार्य को और देह में उसके मानवीय कार्य को जान पाते हैं, आत्मा द्वारा देह के माध्यम से बोले गए सभी वचनों और कथनों को स्वीकार कर पाते हैं और यह देख पाते हैं कि परमेश्वर का आत्मा कैसे देह को निर्देशित करता है और कैसे देह में अपनी सामर्थ्य दिखाता है। अर्थात्, देह के माध्यम से मनुष्य स्वर्ग के आत्मा को जान जाता है, मनुष्यों के बीच स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर के प्रकटन ने लोगों की धारणाओं में मौजूद अज्ञात परमेश्वर को गायब कर दिया है। लोगों द्वारा स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर की आराधना ने परमेश्वर के प्रति उनके समर्पण को बढ़ा दिया है, और देह में परमेश्वर के आत्मा के दिव्य कार्य और देह में उसके मानवीय कार्य के माध्यम से मनुष्य प्रकाशन पाता है और उसकी चरवाही की जाती है, और मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन हासिल किए जाते हैं। आत्मा के देह में आगमन का यह वास्तविक अर्थ है, जिसका मुख्य प्रयोजन यह है कि लोग परमेश्वर से जुड़ सकें, परमेश्वर पर भरोसा कर सकें और परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सकें।
मुख्य रूप से लोगों का व्यावहारिक परमेश्वर के प्रति क्या रवैया होता है? तुम देहधारण, वचन के देह में प्रकट होने, देह में परमेश्वर के प्रकटन और व्यावहारिक परमेश्वर के कर्मों के बारे में क्या जानते हो? आज चर्चा के मुख्य मुद्दे क्या हैं? देहधारण, वचन का देह में आना और देह में परमेश्वर का प्रकटन, ये सब वे मुद्दे हैं जिन्हें समझना जरूरी है। अपने आध्यात्मिक कद और युग के आधार पर तुम लोगों को ये मुद्दे धीरे-धीरे समझने चाहिए और अपने जीवन के अनुभव में तुम्हें इनका स्पष्ट ज्ञान होना चाहिए। लोगों द्वारा परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने की प्रक्रिया वह है जिसके माध्यम से वे परमेश्वर के वचनों के देह में प्रकट होने के बारे में जानते हैं। लोग जितना अधिक परमेश्वर के वचनों को अनुभव करते हैं, उतना ही अधिक वे परमेश्वर के आत्मा को जानते हैं; परमेश्वर के वचनों का अनुभव करके लोग आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को समझते हैं और स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में जानते हैं। वस्तुतः, जब परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है और उन्हें प्राप्त करता है, तो वह उन्हें व्यावहारिक परमेश्वर के कर्मों के बारे में जानने दे रहा होता है; वह व्यावहारिक परमेश्वर के कार्य का उपयोग लोगों को देहधारण का वास्तविक अर्थ दिखाने और यह बताने के लिए कर रहा होता है कि परमेश्वर का आत्मा मनुष्य के सामने वास्तव में प्रकट हुआ है। जब लोग परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किए और पूर्ण बनाए जाते हैं, तो इसका मतलब है कि व्यावहारिक परमेश्वर की अभिव्यक्तियों ने उन्हें जीत लिया है और यह कि—व्यावहारिक परमेश्वर के वचनों के माध्यम से—उन्हें परिवर्तित कर दिया गया है और उसके जीवन को उनके भीतर ढाल दिया गया है, उनमें वह भर दिया गया है जो वह स्वयं है (चाहे अपनी मानवता में वह जो भी हो या अपनी दिव्यता में वह जो भी हो), वह उन्हें अपने वचनों के सार से भर देता है और उन्हें अपने वचनों को जीने के लिए सक्षम बना देता है। जब परमेश्वर लोगों को प्राप्त करता है, तो ऐसा वह मुख्य रूप से व्यावहारिक परमेश्वर के वचनों और कथनों का उपयोग करके करता है, ताकि लोगों की कमियों की काट-छाँट कर सके, और उनके विद्रोही स्वभाव का न्याय कर सके और उसे उजागर कर सके, जिससे वे वो चीजें प्राप्त कर सकें जिनकी उन्हें ज़रूरत है, और उन्हें दिखा सके कि परमेश्वर उनके बीच आया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यावहारिक परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य प्रत्येक मनुष्य को शैतान के प्रभाव से बचाना, उन्हें मलिन भूमि से बाहर निकालना और उनके भ्रष्ट स्वभावों को जड़ से खत्म करना है। व्यावहारिक परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने का सबसे गहरा अर्थ एक प्रतिमान और मॉडल के रूप में व्यावहारिक परमेश्वर के साथ सामान्य मानवता को जीने योग्य बनना, बिना किसी विचलन या विपथन के व्यावहारिक परमेश्वर के वचनों और अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम होना, जो भी वह कहे उसी के अनुसार अभ्यास करने और जो भी वह अपेक्षा करे उसे प्राप्त करने में सक्षम बनना है। इस तरह से तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होगे। जब तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए जाते हो, तो तुम्हारे पास न केवल पवित्र आत्मा का कार्य होता है; बल्कि मुख्य रूप से तुम व्यावहारिक परमेश्वर की अपेक्षाओं को जी पाते हो। केवल पवित्र आत्मा के कार्य को पा लेने का यह अर्थ नहीं है कि तुम्हारे पास जीवन है। महत्वपूर्ण यह है कि तुम व्यावहारिक परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने में सक्षम हो या नहीं, जिसका संबंध इस बात से है कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हो या नहीं। देह में व्यावहारिक परमेश्वर के कार्य के ये महानतम अर्थ हैं। कहने का अर्थ है, परमेश्वर सचमुच और वाकई देह में प्रकट होता है—जीवंत और सजीव होकर—जिससे लोग उसे देख सकते हैं, वह देह में आत्मा का कार्य व्यावहारिक तरीके से कर पाता है और देह में लोगों के लिए एक प्रतिमान के रूप में काम करता है, जिससे वह लोगों के एक समूह को प्राप्त करता है। परमेश्वर का देह में आगमन मुख्यतः मनुष्य को परमेश्वर के व्यावहारिक कर्मों को देखने में सक्षम बनाने और निराकार आत्मा को देह में साकार रूप प्रदान करने के लिए है ताकि लोग उसे देख और स्पर्श कर सकें। केवल इसी तरह से, जिन्हें उसके द्वारा पूर्ण बनाया जाता है, वे उसे जी पाएँगे जिसे वह स्वयं जीता है, उसके द्वारा प्राप्त किए जाएँगे और वे उसके इरादों के अनुरूप होंगे। यदि परमेश्वर केवल स्वर्ग में ही बोलता, और वास्तव में पृथ्वी पर न आया होता, तो लोग अब भी परमेश्वर को जानने में असमर्थ होते; वे केवल खोखले सिद्धांत का उपयोग करते हुए परमेश्वर के कर्मों का उपदेश ही दे पाते, और उनके पास परमेश्वर के वचन वास्तविकता के रूप में नहीं होते। परमेश्वर का पृथ्वी पर आने का उद्देश्य मुख्यतः स्वयं को उन लोगों के लिए एक प्रतिमान और मॉडल के रूप में स्थापित करना है जिन्हें उसे प्राप्त करना है; केवल इसी प्रकार लोग वास्तव में परमेश्वर को जान सकते हैं, स्पर्श कर सकते हैं और देख सकते हैं, और केवल तभी वे सच में परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 136
देहधारी परमेश्वर के कार्य में दो भाग शामिल हैं। जब उसने पहली बार देह धारण किया तो लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया या उसे नहीं पहचाना, और उन्होंने यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया। फिर जब वह दूसरी बार देहधारी हुआ, तो लोगों ने फिर भी उस पर विश्वास नहीं किया और पहचाना तो बिल्कुल भी नहीं और उन्होंने एक बार फिर से मसीह को सलीब पर चढ़ा दिया। क्या मनुष्य परमेश्वर का बैरी नहीं है? यदि मनुष्य उसे नहीं जानता, तो वह परमेश्वर का अंतरंग कैसे हो सकता है? कैसे वह परमेश्वर का गवाह बनने योग्य हो सकता है? क्या परमेश्वर से प्यार करने, परमेश्वर की सेवा करने, और परमेश्वर की महिमा बढ़ाने के मनुष्य के दावे कपटपूर्ण झूठ नहीं हैं? यदि तुम अपना जीवन इन अवास्तविक, अव्यावहारिक चीजों का अनुसरण करने के लिए देते हो, तो क्या तुम व्यर्थ में श्रम नहीं करते हो? तुम परमेश्वर के अंतरंग कैसे हो सकते हो, जब तुम जानते तक नहीं कि परमेश्वर कौन है? क्या इस प्रकार का अनुसरण अस्पष्ट और अमूर्त नहीं है? क्या यह कपटपूर्ण नहीं है? व्यक्ति को परमेश्वर का अंतरंग कैसे होना चाहिए? परमेश्वर का अंतरंग होने के व्यावहारिक मायने क्या हैं? क्या तुम परमेश्वर के आत्मा के अंतरंग हो सकते हो? क्या तुम देख सकते हो कि आत्मा कितना बड़ा और ऊँचा है? किसी अदृश्य, अस्पृश्य परमेश्वर का अंतरंग होना—क्या यह अस्पष्ट और अमूर्त नहीं है? इस प्रकार के अनुसरण के व्यावहारिक मायने क्या हैं? क्या यह सब एक कपटपूर्ण झूठ नहीं है? तुम जिस चीज का प्रयास करते हो, वह है परमेश्वर का अंतरंग बनना, पर वास्तव में तुम शैतान के छोटे-से पालतू कुत्ते हो, क्योंकि तुम परमेश्वर को नहीं जानते, और तुम अस्तित्वहीन “सभी चीजों के बीच परमेश्वर” का अनुसरण करते हो, जो कि अदृश्य, अस्पृश्य और तुम्हारी ही धारणाओं में समाहित है। अस्पष्ट रूप से कहा जाए, तो इस प्रकार का “परमेश्वर” शैतान है, और व्यावहारिक रूप से कहा जाए तो यह तुम स्वयं हो। तुम अपना स्वयं का ही अंतरंग होने का प्रयास करते हो, फिर भी कहते हो कि तुम परमेश्वर का अंतरंग होने की खोज करते हो—क्या यह ईशनिंदा नहीं है? ऐसे अनुसरण का क्या मूल्य है? यदि परमेश्वर का आत्मा देह धारण नहीं करता, तो परमेश्वर का सार मनुष्य के लिए केवल अदृश्य, अमूर्त जीवन का आत्मा, रूपहीन और छविहीन है, अभौतिक प्रकार का, अगम्य और अबोधगम्य है। मनुष्य किसी निराकार, अद्भुत, अथाह आत्मा का अंतरंग कैसे हो सकता है? क्या यह एक मजाक नहीं है? यह बेतुका तर्क है जो कि अमान्य और उससे भी बढ़कर अवास्तविक है। सृजित मनुष्य परमेश्वर के आत्मा से अंतर्निहित रूप से भिन्न है, इसलिए ये दोनों अंतरंग कैसे हो सकते हैं? यदि परमेश्वर का आत्मा देह में साकार नहीं होता—अर्थात यदि परमेश्वर देह न बनता, विनम्र होकर एक सृजित प्राणी न बनता, तो सृजित मनुष्य उसका अंतरंग होने में अयोग्य और असमर्थ दोनों होता, और परमेश्वर के उन श्रद्धालु विश्वासियों के अलावा, जिनके पास उनकी आत्माओं के स्वर्ग में प्रवेश कर जाने के बाद परमेश्वर का अंतरंग होने का एक अवसर हो सकता है, अधिकतर लोग परमेश्वर के आत्मा के अंतरंग होने में असमर्थ होते। और यदि लोग देहधारी परमेश्वर के मार्गदर्शन में स्वर्ग में परमेश्वर के अंतरंग होने की इच्छा करते हैं, तो क्या वे आश्चर्यजनक ढंग से मूर्ख अमानव नहीं हैं? लोग केवल अदृश्य परमेश्वर के प्रति “समर्पित होने” का अनुसरण करते हैं और देखे जा सकने वाले परमेश्वर पर थोड़ा-सा भी ध्यान नहीं देते, क्योंकि किसी अदृश्य परमेश्वर का अनुसरण करना बहुत आसान है। लोग उसे जिस तरह चाहें, कर सकते हैं। किंतु प्रत्यक्ष परमेश्वर का अनुसरण इतना आसान नहीं है। जो व्यक्ति किसी अज्ञात परमेश्वर का अनुसरण करता है, वह परमेश्वर को प्राप्त करने में पूरी तरह असमर्थ रहता है, क्योंकि सभी अज्ञात और अमूर्त वस्तुएँ मनुष्य द्वारा कल्पित हैं, और मनुष्य उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता। यदि तुम लोगों के बीच आया हुआ परमेश्वर एक महान और उच्च परमेश्वर होता, जो तुम लोगों के लिए अगम्य होता, तो फिर तुम लोग उसके इरादे कैसे समझ पाते? और तुम किस तरह उसे जान और समझ पाते? यदि वह केवल अपना कार्य करता, और मनुष्य के साथ उसका कोई भी सामान्य संपर्क न होता, या उसमें कोई सामान्य मानवता नहीं होती और वह मनुष्यों के लिए अगम्य होता, तो भले ही उसने तुम लोगों पर कितना भी अधिक कार्य किया होता, किंतु तुम लोगों का उसके साथ कोई संपर्क न होता, और तुम लोग उसे देखने में असमर्थ होते, तो तुम लोग उसे कैसे जान सकते थे? यदि यह सामान्य मानवता से युक्त देह न होती, तो मनुष्य के पास परमेश्वर को जानने का कोई तरीका न होता; यह केवल परमेश्वर के देहधारण के कारण है कि मनुष्य देहधारी परमेश्वर का अंतरंग होने के योग्य है। लोग परमेश्वर के अंतरंग इसलिए हो पाते हैं, क्योंकि वे उसके संपर्क में आते हैं और उसके साथ रहकर और उससे बातचीत करके धीरे-धीरे उसे जान जाते हैं। यदि ऐसा न होता, तो क्या मनुष्य का अनुसरण व्यर्थ न होता? अर्थात्, यह सब परमेश्वर के कार्य के कारण नहीं, बल्कि देहधारी परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता की वजह से है कि मनुष्य परमेश्वर का अंतरंग होने में सक्षम है। यह केवल परमेश्वर के देह धारण करने के कारण है कि लोगों के पास अपना कर्तव्य पूरा करने का अवसर है, और सच्चा परमेश्वर की आराधना करने का अवसर है। क्या यह सर्वाधिक वास्तविक और व्यावहारिक सत्य नहीं है? अब, क्या तुम अभी भी स्वर्ग के परमेश्वर का अंतरंग होने की इच्छा करते हो? केवल जब परमेश्वर अपने आपको एक निश्चित बिंदु तक विनम्र कर लेता है, अर्थात्, केवल जब परमेश्वर देह धारण करता है, तभी मनुष्य उसका अंतरंग और विश्वासपात्र बन सकता है। परमेश्वर आत्मा है, वह इतना महान और ऊँचा है और इतना अथाह है—लोग कैसे उसके अंतरंग होने के योग्य हैं? केवल जब परमेश्वर का आत्मा देह में अवरोहण करता है, और मनुष्य के जैसे बाह्य स्वरूप वाला सृजित प्राणी बनता है, तभी लोग उसके इरादों को समझ सकते हैं और व्यावहारिक रूप से उसके द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं। वह देह में बोलता और कार्य करता है, मानवजाति की खुशियों, दुःखों और क्लेशों में सहभागी होता है, उसी संसार में रहता है जिसमें मानवजाति रहती है, मनुष्यों की रक्षा करता है, उनका मार्गदर्शन करता है और उन्हें शुद्ध होने और अपना उद्धार और आशीष प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। इन चीज़ों को प्राप्त कर चुकने और वास्तव में परमेश्वर के इरादे समझ चुकने के बाद ही लोग परमेश्वर के अंतरंग बन सकते हैं। केवल यही व्यावहारिक है। यदि परमेश्वर लोगों के लिए अदृश्य और अमूर्त होता, तो फिर वे उसके अंतरंग कैसे हो सकते थे? क्या यह खोखला सिद्धांत नहीं है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 137
जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह केवल दिव्यता के भीतर अपना कार्य करता है, जो स्वर्गिक आत्मा ने देहधारी परमेश्वर को सौंपा होता है। जब वह आता है, तब वह भिन्न-भिन्न साधनों से और भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्यों से अपने कथनों को वाणी देने के लिए ही धरती पर हर जगह बोलता है। वह मुख्य रूप से मनुष्य को आपूर्ति करने और उसे सिखाने को अपने लक्ष्यों और कार्य करने के सिद्धांत के रूप में देखता है, और लोगों के अंतर्वैयक्तिक संबंधों या उनके जीवन के विवरणों जैसी चीजों की चिंता नहीं करता। उसकी मुख्य सेवकाई आत्मा की ओर से बोलना है। अर्थात्, जब परमेश्वर का आत्मा मूर्त रूप में देह में प्रकट होता है, तब वह केवल मनुष्य के जीवन के लिए पोषण प्रदान करता है और सत्य विमोचित करता है। वह मनुष्य के कार्य में शामिल नहीं होता, जिसका तात्पर्य यह है कि वह मानवता के कार्य में भाग नहीं लेता। मनुष्य दिव्य कार्य नहीं कर सकते, और परमेश्वर मनुष्य के कार्य में भाग नहीं लेता। इन सारे वर्षों में जबसे परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए इस धरती पर आया है, उसने उसे सदैव लोगों के माध्यम से किया है। परंतु इन लोगों को देहधारी परमेश्वर नहीं माना जा सकता—उन्हें केवल ऐसे मनुष्य माना जा सकता है, जिनका परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जाता है। इस बीच, आज का परमेश्वर आत्मा की वाणी व्यक्त करते हुए और आत्मा की ओर से कार्य करते हुए, सीधे दिव्यता के परिप्रेक्ष्य से बात कर सकता है। इसी प्रकार, वे सब जिनका परमेश्वर ने युगों-युगों और पीढ़ियों के दौरान उपयोग किया है, दैहिक शरीर के भीतर कार्यरत परमेश्वर के आत्मा के दृष्टांत हैं—तो उन्हें परमेश्वर क्यों नहीं कहा जा सकता? परंतु आज का परमेश्वर भी देह में सीधे कार्यरत परमेश्वर का आत्मा ही है, और यीशु भी देह में कार्यरत परमेश्वर का आत्मा था; उन दोनों को परमेश्वर कहा जाता है। तो अंतर क्या है? जिन लोगों का परमेश्वर ने युगों के दौरान उपयोग किया है वे सब सामान्य विचार और विवेक रखने में समर्थ रहे हैं। वे सभी स्वयं के आचरण के और मामलों को सँभालने के सिद्धांतों को समझ चुके हैं। उनकी सामान्य मानवीय धारणाएँ हैं और उनमें वे सभी चीजें रही हैं, जो सामान्य लोगों में होनी चाहिए। उनमें से अधिकांश के पास असाधारण प्रतिभा और जन्मजात बुद्धिमानी रही है। इन लोगों पर कार्य करते हुए परमेश्वर का आत्मा उनकी प्रतिभाओं का उपयोग करता है, जो उनके गुण हैं। परमेश्वर का आत्मा उनकी प्रतिभाओं को उपयोग में लाता है, परमेश्वर की सेवा में उनकी शक्तियों का उपयोग करता है। फिर भी परमेश्वर का सार धारणाओं या विचारों से रहित है, उसमें मनुष्य के ख्यालों की मिलावट नहीं है, यहाँ तक कि उसमें उसकी भी कमी है जो सामान्य मनुष्यों के पास है। कहने का तात्पर्य यह है कि वह स्वयं के आचरण और मामलों को सँभालने के सिद्धांतों से भी परिचित नहीं है। जब आज का परमेश्वर पृथ्वी पर आता है तो ऐसा ही होता है। उसके कार्य और वचनों में मनुष्य के ख्यालों या मानवीय विचारों की मिलावट नहीं है। बल्कि वे आत्मा के ख्यालों की सीधी अभिव्यक्ति हैं, और वह सीधे परमेश्वर की ओर से कार्य करता है। इसका अर्थ है कि आत्मा सीधे बात करता है, अर्थात्, दिव्यता सीधे कार्य करती है, उसमें मनुष्य के ख्यालों की रत्ती भर मिलावट नहीं होती। दूसरे शब्दों में, देहधारी परमेश्वर में दिव्यता सीधे शामिल है, मानवीय विचारों या धारणाओं से रहित है, और उसे संसार से निपटने के लोगों के सिद्धांतों की कोई समझ नहीं है। यदि केवल दिव्यता ही कार्यरत होती (अर्थात् यदि केवल स्वयं परमेश्वर कार्यरत होता), तो पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य करने का कोई उपाय न होता। इसलिए जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो उसके पास थोड़ी संख्या में ऐसे लोग होने चाहिए जिनका उपयोग वह परमेश्वर द्वारा दिव्यता में किए जाने वाले कार्य के सहयोग में मानवता के भीतर कार्य करने के लिए करता है। दूसरे शब्दों में, वह अपने दिव्य कार्य को कायम रखने के लिए मानवीय कार्य का उपयोग करता है। यदि वह ऐसा न करे, तो मनुष्य के पास दिव्य कार्य से सीधे जुड़ने का कोई उपाय नहीं होगा। यीशु और उसके शिष्यों के साथ ऐसा ही था। संसार में अपने समय के दौरान यीशु ने पुरानी व्यवस्था को समाप्त कर दिया और नई आज्ञाएँ स्थापित कीं। उसने अनेक वचन भी कहे। यह सारा कार्य दिव्यता में किया गया था। पतरस, पौलुस और युहन्ना जैसे अन्य सभी ने अपने अनुवर्ती कार्य यीशु के वचनों की नींव पर अवलंबित किए। कहने का तात्पर्य यह है कि उस युग में परमेश्वर ने अपना शुरुआती कार्य किया, अनुग्रह के युग के आरंभ का मार्गदर्शन किया; अर्थात्, उसने पुराने युग को समाप्त करके नए युग का मार्गदर्शन किया, और साथ ही “परमेश्वर ही आरंभ और अंत है” वचनों को भी साकार किया। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को दिव्य कार्य की नींव पर ही मानवीय कार्य करना चाहिए। जब यीशु ने वह सब-कुछ कह दिया जो उसे कहने की आवश्यकता थी और पृथ्वी पर अपना कार्य समाप्त कर लिया, तो वह मनुष्य को छोड़कर चला गया। इसके बाद, सभी लोगों ने, कार्य करते हुए, उसके वचनों में व्यक्त सिद्धांतों के अनुसार ऐसा ही किया, और उसके द्वारा बोले गए सत्यों के अनुसार अभ्यास किया। इन सभी लोगों ने यीशु के लिए कार्य किया। यदि यीशु अकेले ही कार्य कर रहा होता, तो उसने चाहे जितने भी वचन बोले होते, लोगों के पास उसके वचनों के साथ जुड़ने के कोई साधन न होते, क्योंकि वह दिव्यता में कार्य कर रहा था और केवल दिव्यता के वचन ही बोल सकता था, और वह चीजों को लोगों को नहीं समझा सकता था, सामान्य लोगों को अपने वचन नहीं समझा सकता था। और इसलिए उसे प्रेरित और नबी रखने पड़े, जो उसके कार्य का पूरक होने के लिए उसके बाद आए। यही वह सिद्धांत है, जिससे देहधारी परमेश्वर अपना कार्य करता है—बोलने और कार्य करने के लिए देहधारी शरीर का उपयोग करना, ताकि दिव्यता का कार्य पूरा किया जा सके, और फिर अपने कार्य का पूरक होने के लिए कुछ, या शायद अधिक, ऐसे लोगों का उपयोग करना जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हैं। अर्थात्, परमेश्वर मानवता में चरवाही और सिंचन करने के लिए ऐसे लोगों का उपयोग करता है जो उसके इरादों के अनुरूप हैं, ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोग सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकें।
जब परमेश्वर देह में आया, तब यदि वह केवल दिव्यता का कार्य करता, और उसके साथ सहयोग करने के लिए उसके इरादों के अनुरूप लोग नहीं होते, तो मनुष्य परमेश्वर के इरादों को समझने या परमेश्वर के साथ जुड़ने में असमर्थ होता। परमेश्वर के लिए यह कार्य पूर्ण करने, कलीसियाओं की देख-रेख और उनकी चरवाही करने के लिए ऐसे सामान्य लोगों का उपयोग करना आवश्यक है जो उसके इरादों के अनुरूप हों, ताकि मनुष्य की संज्ञानात्मक प्रक्रियाएँ, उसका मस्तिष्क, जिस स्तर की कल्पना करने में सक्षम हैं, उसे प्राप्त किया जा सके। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर अपनी दिव्यता के भीतर जो कार्य करता है, उसका “अनुवाद” करने के लिए वह अपने इरादों के अनुरूप लोगों की एक छोटी संख्या का उपयोग करता है, ताकि उसे स्पष्ट किया जा सके—और दिव्य भाषा को मानव-भाषा में रूपांतरित किया जा सके, ताकि सभी लोग उसे समझ-बूझ सकें। यदि परमेश्वर ऐसा न करता, तो कोई भी परमेश्वर की दिव्य भाषा न समझ पाता, क्योंकि परमेश्वर के इरादों के अनुरूप लोग अंततः थोड़े हैं, और मनुष्य की समझने की क्षमता कमजोर है। यही कारण है कि परमेश्वर देहधारी शरीर में कार्य करते हुए यह तरीका चुनता है। यदि केवल दिव्य कार्य ही होता, तो मनुष्य के पास परमेश्वर को जानने और उसके साथ जुड़ने का कोई तरीका न होता, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर की भाषा नहीं समझता। मनुष्य यह भाषा केवल परमेश्वर के इरादों के अनुरूप लोगों के माध्यम से ही समझ सकने में समर्थ है, जो उसके वचनों को स्पष्ट करते हैं। तथापि, यदि मानवता के भीतर केवल ऐसे लोग ही कार्यरत होते, तो यह केवल मनुष्य का सामान्य जीवन बनाए रख सकता था; यह मनुष्य का स्वभाव नहीं बदल सकता था। परमेश्वर का कार्य एक नया शुरुआती-बिंदु नहीं हो सकता था; केवल वही पुराने गीत होते, वही पुरानी लचर बातें होतीं। केवल देहधारी परमेश्वर के माध्यम से ही, जो अपने देहधारण की अवधि के दौरान वह सब कहता है जिसे कहने की आवश्यकता है और वह सब करता है जिसे करने की आवश्यकता है, उसके बाद लोग उसके वचनों के अनुसार कार्य और अनुभव करते हैं, केवल इसी प्रकार उनका जीवन स्वभाव बदल पाएगा, और केवल इसी प्रकार वे समय के साथ चल पाएँगे। जो दिव्यता के भीतर कार्य करता है वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि जो मानवता के भीतर कार्य करते हैं, वे परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोग हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि देहधारी परमेश्वर अनिवार्य रूप से परमेश्वर द्वारा सार रूप में उपयोग किए जाने वाले लोगों से भिन्न है। देहधारी परमेश्वर दिव्यता का कार्य करने में समर्थ है, जबकि परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोग नहीं। प्रत्येक युग के आरंभ में परमेश्वर का आत्मा मनुष्य को एक नए आरंभ में ले जाने के लिए व्यक्तिगत रूप से बोलता है और एक नए युग का सूत्रपात करता है। जब वह बोलना समाप्त कर देता है, तो इसका अर्थ होता है कि दिव्यता के भीतर उसका कार्य पूरा हो गया है। तत्पश्चात्, सभी लोग अपने जीवन-अनुभव में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों की अगुआई का अनुसरण करते हैं। इसी प्रकार, यह वह चरण भी होता है जिसमें परमेश्वर मनुष्य को नए युग में लाता है और लोगों को एक नया प्रस्थान-बिंदु देता है—इसी समय देह में परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोगों के बीच सार रूप में अंतर
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 138
परमेश्वर अपनी सामान्य मानवता को पूर्ण करने के लिए पृथ्वी पर नहीं आता। वह सामान्य मानवता का कार्य करने के लिए नहीं आता है; वह केवल सामान्य मानवता में दिव्यता का कार्य करने के लिए आता है। परमेश्वर जिस सामान्य मानवता की बात करता है, वह वैसा नहीं है जैसा लोग कल्पना करते हैं। मनुष्य “सामान्य मानवता” को पत्नी या पति और बेटे-बेटियों के होने के रूप में परिभाषित करता है, जो प्रमाण है कि व्यक्ति एक सामान्य व्यक्ति है; परंतु परमेश्वर इसे इस तरह नहीं देखता। वह सामान्य मानवता को सामान्य मानव-विचार, सामान्य मानव-जीवन और सामान्य लोगों से पैदा होने के रूप में देखता है। किंतु उसकी सामान्यता में पत्नी या पति और बच्चे उस तरह शामिल नहीं हैं, जिस तरह मनुष्य सामान्यता की बात करता है। अर्थात्, मनुष्य के विचार में, परमेश्वर जिस सामान्य मानवता की बात करता है, उसे मनुष्य मानवता की अनुपस्थिति मानेगा, जिसमें भावनाओं का लगभग अभाव है और जो दैहिक आवश्यकताओं से रहित प्रतीत होती है, ठीक यीशु की तरह, जिसका केवल बाह्य रूप सामान्य व्यक्ति का था और जिसने सामान्य व्यक्ति का रूप-रंग धारण किया था, किंतु सार रूप में उसमें वह सब नहीं था जो सामान्य व्यक्ति में होना चाहिए। इससे यह देखा जा सकता है कि देहधारी परमेश्वर के सार में सामान्य मानवता की संपूर्णता शामिल नहीं है, बल्कि उन चीजों का केवल एक अंश ही शामिल है जो लोगों में होनी चाहिए, ताकि सामान्य मानव-जीवन की दिनचर्या जारी रह सके और सामान्य मानवीय विवेक बना रहे। परंतु इन चीजों का उससे कोई लेना-देना नहीं है, जिसे मनुष्य सामान्य मानवता मानता है। वे वही हैं, जो देहधारी परमेश्वर में होनी चाहिए। तथापि, ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं कि देहधारी परमेश्वर को सामान्य मानवता से युक्त केवल तभी कहा जा सकता है, जब उसकी पत्नी, बेटे-बेटियाँ, परिवार हो; वे कहते हैं कि इन चीजों के बिना वह सामान्य व्यक्ति नहीं है। तो मैं तुमसे पूछता हूँ, “क्या परमेश्वर की कोई पत्नी है? क्या यह संभव है कि परमेश्वर का एक पति हो? क्या परमेश्वर के बच्चे हो सकते हैं?” क्या ये भ्रांतियाँ नहीं हैं? फिर भी, देहधारी परमेश्वर चट्टानों के बीच दरार से तो प्रस्फुटित हो नहीं सकता या आसमान से तो टपक नहीं सकता। वह केवल एक सामान्य मानव-परिवार में ही जन्म ले सकता है। यही कारण है कि उसके माता-पिता और बहनें हैं। यही वे चीजें हैं, जो देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता में होनी चाहिए। यीशु के साथ ऐसा ही था; यीशु के पिता और माता, बहनें और भाई थे, और यह सब सामान्य था। परंतु यदि उसकी पत्नी और बेटे-बेटियाँ भी होतीं, तो उसकी मानवता वह सामान्य मानवता न होती, जो परमेश्वर द्वारा देहधारी परमेश्वर में होनी अभीष्ट थी। यदि ऐसी स्थिति होती, तो वह दिव्यता की ओर से कार्य करने में सक्षम न हुआ होता। वह दिव्यता का कार्य कर ही इसलिए पाया कि उसकी पत्नी या बच्चे नहीं थे, और फिर भी वह एक सामान्य परिवार में सामान्य लोगों से जन्मा था। इसे और स्पष्ट करने के लिए, परमेश्वर उस व्यक्ति को ही सामान्य व्यक्ति मानता है, जो सामान्य परिवार में जन्मा होता है। केवल ऐसा व्यक्ति ही दिव्यता का कार्य करने की योग्यता रखता है। दूसरी ओर, यदि व्यक्ति की पत्नी या पति और बच्चे हैं, तो वह व्यक्ति दिव्यता का कार्य नहीं कर पाएगा, क्योंकि उसमें केवल वह सामान्य मानवता होगी, जो मनुष्यों में होनी चाहिए, न कि वह सामान्य मानवता, जो परमेश्वर में होनी चाहिए। जिसे परमेश्वर मानता है और जिसे लोग समझते हैं, वे प्रायः अत्यधिक भिन्न होते हैं, एक-दूसरे से बिलकुल अलग। परमेश्वर के कार्य के इस चरण में बहुत-कुछ ऐसा होता है, जो लोगों की धारणाओं के विपरीत और उनसे बहुत अधिक भिन्न होता है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के कार्य के इस चरण में दिव्यता का पूर्ण रूप से स्वयं कार्य करना शामिल है, जिसमें मानवता सहायक भूमिका निभाती है। चूँकि परमेश्वर अपना कार्य स्वयं करने के लिए पृथ्वी पर आता है, मनुष्य को उसमें शामिल नहीं होने देता, इसलिए वह अपना कार्य करने के लिए देह में (एक अपूर्ण, सामान्य व्यक्ति में) अवतरित होता है। वह इस देहधारण द्वारा उपलब्ध कराए गए अवसर का उपयोग मानवजाति के सामने एक नया युग लाने, मानवजाति को अपने कार्य के अगले चरण के बारे में बताने, और लोगों से उसके वचनों में वर्णित मार्ग के अनुसार अभ्यास करवाने के लिए करता है। इस प्रकार देह में परमेश्वर का कार्य समाप्त होता है; वह मनुष्य को छोड़कर जाने वाला और उससे अलग होना वाला है, सामान्य मानवता की देह में अब और निवास नहीं करता, बल्कि अपने कार्य के दूसरे भाग पर बढ़ने के लिए मनुष्य से दूर चला जाता है। फिर, अपने इरादों के अनुरूप लोगों का उपयोग करते हुए वह पृथ्वी पर लोगों के इस समूह के बीच, किंतु उनकी मानवता के भीतर, अपना कार्य जारी रखता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोगों के बीच सार रूप में अंतर
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 139
देहधारी परमेश्वर हमेशा मनुष्य के साथ नहीं रह सकता, क्योंकि परमेश्वर के पास करने के लिए और भी बहुत कार्य है। उसे देह से सीमित नहीं किया जा सकता; उसे वह कार्य करने के लिए, जो उसे करना ही चाहिए, देह छोड़नी पड़ती है, भले ही वह कार्य वह देह की छवि में करता है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह मरने या मानवजाति को छोड़कर जाने से पहले वह रूप पाने की प्रतीक्षा नहीं करता जो एक सामान्य व्यक्ति का होना चाहिए। उसके देह की चाहे कुछ भी उम्र रहे, जब उसका कार्य समाप्त हो जाता है, तो वह मनुष्य को छोड़कर चला जाता है। उसके लिए उम्र जैसी कोई चीज नहीं होती। वह मनुष्य के जीवन-काल के अनुसार अपने दिनों की गिनती नहीं करता; इसके बजाय, वह अपने कार्य के कदमों के अनुसार देह में अपना जीवन समाप्त करता है। ऐसे लोग हो सकते हैं, जिन्हें लगता हो कि देह में आने में परमेश्वर की उम्र एक निश्चित सीमा तक बढ़नी ही चाहिए, उसे वयस्क होना ही चाहिए, वृद्धावस्था तक पहुँचना ही चाहिए, और केवल तभी जाना चाहिए जब उसका शरीर जवाब दे जाए। यह मनुष्य की कल्पना है; परमेश्वर इस प्रकार कार्य नहीं करता। वह देह में केवल वह कार्य करने के लिए आता है जो उसे करना है, वह सामान्य व्यक्ति का जीवन जीने के लिए नहीं आता जिसमें वह माता-पिता से जन्म ले, बड़ा हो, परिवार बनाए और जीविका आरंभ करे, बच्चे पैदा करे और उन्हें पाले-पोसे, या जीवन के तूफानों को सहे—वह सब करे, जो सामान्य लोगों के कार्यकलाप होते हैं। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो यह परमेश्वर के आत्मा का देह धारण करना है, उसका देह में आना है, किंतु परमेश्वर सामान्य मानव का जीवन नहीं जीता। वह केवल अपनी प्रबंधन योजना का एक भाग संपन्न करने के लिए आता है। उसके पश्चात् वह मानवजाति को छोड़कर चला जाता है। जब वह देह में आता है, तो परमेश्वर का आत्मा देह की सामान्य मानवता को पूर्ण नहीं करता। बल्कि, परमेश्वर के पूर्व-निर्धारित समय पर, दिव्यता सीधे अपना कार्य करती है। फिर, वह सब करने के बाद जो उसे करने की आवश्यकता होती है, और अपनी सेवकाई पूरी तरह पूर्ण करने के पश्चात्, इस चरण में परमेश्वर के आत्मा का कार्य संपन्न हो जाता है, इसी समय देहधारी परमेश्वर का जीवन भी समाप्त हो जाता है, फिर चाहे उसके दैहिक शरीर ने निर्धारित जीवनकाल को जिया हो या नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि दैहिक शरीर जीवन के किस चरण तक पहुँचता है, और पृथ्वी पर यह कितने समय तक जीता है, ये दोनों आत्मा के कार्य द्वारा तय किए जाते हैं, और इनका उससे कोई लेना-देना नहीं है जिसे मनुष्य सामान्य मानवता समझता है। यीशु का ही उदाहरण लो। वह देह में साढ़े तेंतीस साल रहा। मानव-शरीर के जीवन-काल के अनुसार उसे उस आयु में नहीं मरना चाहिए था और छोड़कर नहीं जाना चाहिए था। परंतु परमेश्वर के आत्मा का इससे कोई सरोकार नहीं था। उसका कार्य समाप्त हो गया, तो उस समय उसका शरीर ले लिया गया, जो आत्मा के साथ विलुप्त हो गया। यही वह सिद्धांत है, जिससे परमेश्वर देह में कार्य करता है। और इसलिए, सटीकता से कहूँ तो, देहधारी परमेश्वर की मानवता प्राथमिक महत्त्व नहीं रखती। यह फिर उसी बिंदु पर आ जाता है : वह पृथ्वी पर सामान्य मनुष्य का जीवन जीने के लिए नहीं आता। वह ऐसा नहीं करता कि पहले सामान्य मानव-जीवन स्थापित करे और फिर कार्य करना आरंभ करे। बल्कि, अगर वह एक सामान्य मानव-परिवार में जन्म लेता है, तो वह दिव्य कार्य कर पाने में सक्षम होता है, ऐसा कार्य जिस पर मनुष्य के ख्यालों का दाग नहीं होता है; जो दैहिक नहीं होता, जो निश्चित रूप से समाज के तौर-तरीके नहीं अपनाता या जिसमें मनुष्य के विचार या धारणाएँ शामिल नहीं होतीं; और इतना ही नहीं, जिसमें मनुष्य के सांसारिक आचरण के फलसफे शामिल नहीं होते। यही वह कार्य है जो देहधारी परमेश्वर करना चाहता है, और यही उसके देहधारण का व्यावहारिक महत्व भी है। परमेश्वर देह में आता है तो वह अन्य मामूली प्रक्रियाओं से गुजरे बिना, प्राथमिक रूप से कार्य का एक चरण पूरा करने के लिए आता है, जो देह में ही करना आवश्यक है; और जहाँ तक सामान्य मनुष्य के अनुभवों की बात है, वे उसे नहीं होते हैं। देहधारी परमेश्वर के देह को जो कार्य करने की आवश्यकता होती है, उसमें सामान्य मानवीय अनुभव शामिल नहीं होते। इसलिए परमेश्वर देह में वह कार्य संपन्न करने की खातिर आता है, जो उसे देह में रहकर संपन्न करने की आवश्यकता होती है। बाकी चीजों का उससे कोई लेना-देना नहीं होता; वह इतनी सारी मामूली प्रक्रियाओं से नहीं गुजरता। जब उसका कार्य पूरा हो जाता है, तब उसके देहधारण का महत्व भी समाप्त हो जाता है। यह चरण समाप्त करने का अर्थ है कि वह कार्य, जो उसे देह में करने की आवश्यकता है, समाप्त हो गया है, और उसकी देह की सेवकाई पूरी हो गई है। परंतु वह देह में अनिश्चित काल तक कार्य करता नहीं रह सकता। उसे कार्य करने के लिए अन्य स्थान पर जाना और देह को छोड़ना होता है। केवल इसी प्रकार उसका कार्य पूरी तरह से हो सकता है और अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ सकता है। परमेश्वर अपनी मूल योजना के अनुसार कार्य करता है। उसे कौन-सा कार्य करने की आवश्यकता है और वह कौन-सा कार्य पूरा कर चुका है, यह वह अपनी हथेली की तरह स्पष्ट रूप से जानता है। परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति को उस मार्ग पर चलने के लिए ले जाता है, जो उसने पहले ही पूर्व-निर्धारित किया हुआ है। कोई भी इससे बच नहीं सकता। जो लोग परमेश्वर के आत्मा के मार्गदर्शन का अनुसरण करते हैं, केवल वे ही विश्राम में प्रवेश कर पाएँगे। हो सकता है कि बाद के कार्य में मनुष्य का मार्गदर्शन करने के लिए देह में बोल रहा परमेश्वर न हो, बल्कि मूर्त रूप में आत्मा मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन करे। केवल इसी तरह से मनुष्य ठोस ढंग से परमेश्वर को स्पर्श कर पाएगा, उसे देख पाएगा, और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित वास्तविकता में बेहतर ढंग से प्रवेश कर पाएगा, ताकि व्यावहारिक परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जा सके। यही वह कार्य है, जिसे परमेश्वर संपन्न करना चाहता है, और जिसकी उसने बहुत पहले योजना बनाई थी। इससे तुम सब लोगों को वह मार्ग देखना चाहिए, जिस पर तुम लोगों को चलना चाहिए!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोगों के बीच सार रूप में अंतर
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 140
देहधारी हुए परमेश्वर को मसीह कहा जाता है, और इसलिए उस मसीह को जो लोगों को सत्य दे सकता है, परमेश्वर कहना थोड़ी-भी अतिशयोक्ति नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसमें परमेश्वर का सार होता है, और उसमें परमेश्वर का स्वभाव और परमेश्वर के कार्य की बुद्धि होती है, जो मनुष्य के लिए अप्राप्य हैं। जो अपने आप को मसीह कहते हैं, परंतु परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते, वे धोखेबाज हैं। मसीह पृथ्वी पर परमेश्वर की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, बल्कि वह विशेष देह भी है, जिसे धारण करके धरती पर परमेश्वर मनुष्यों के बीच रहकर अपना कार्य करता है और अपना कार्य पूरा करता है। कोई मनुष्य इस देह की जगह नहीं ले सकता, बल्कि यह वह देह है जो पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य का पर्याप्त रूप से बीड़ा उठा सकती है, जो परमेश्वर का स्वभाव व्यक्त कर सकती है, जो पर्याप्त रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती है, और जो मनुष्य को जीवन प्रदान कर सकती है। मसीह का भेस धारण करने वाले लोगों का देर-सबेर पतन हो जाएगा, क्योंकि हालाँकि वे मसीह होने का दावा करते हैं, किंतु उनमें मसीह के सार का लेशमात्र भी नहीं है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि मसीह की प्रामाणिकता मनुष्य द्वारा निर्धारित नहीं की जा सकती, बल्कि स्वयं परमेश्वर द्वारा ही इसका उत्तर दिया और निर्णय लिया जाता है। इस तरह, यदि तुम सचमुच जीवन का मार्ग खोजना चाहते हो, तो पहले तुम्हें यह स्वीकार करना होगा कि परमेश्वर मनुष्य के बीच आता है ताकि वह उसे जीवन का मार्ग प्रदान करने का कार्य कर सके और तुम्हें स्वीकार करना होगा कि अंत के दिनों के दौरान ही वह मनुष्य को जीवन का मार्ग प्रदान करने के लिए मनुष्य के बीच आता है—अतीत में नहीं बल्कि आज।
अंत के दिनों का मसीह जीवन लाता है, और सत्य का स्थायी और शाश्वत मार्ग लाता है। यह सत्य वह मार्ग है, जिसके द्वारा मनुष्य जीवन प्राप्त करता है, और यही एकमात्र मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जाएगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह द्वारा प्रदान किया गया जीवन का मार्ग नहीं खोजते, तो तुम यीशु की स्वीकृति कभी प्राप्त नहीं करोगे, और स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश करने के योग्य कभी नहीं हो पाओगे, क्योंकि तुम इतिहास की कठपुतली और कैदी दोनों ही हो। जो लोग विनियमों से, शब्दों से और इतिहास की बेड़ियों से नियंत्रित होते हैं, वे न तो कभी जीवन प्राप्त कर पाएँगे और न ही जीवन का अनंत मार्ग प्राप्त कर पाएँगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे जो प्राप्त करते हैं वह सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन के जल के बजाय बस मैला पानी ही है, जिससे वे हजारों सालों से चिपके हुए हैं। जिन्हें जीवन के जल की आपूर्ति नहीं की जाती, वे हमेशा मुर्दे, शैतान के खिलौने और नरक की संतानें बने रहेंगे। फिर वे कैसे परमेश्वर के दर्शन कर सकते हैं? तुम केवल अतीत को पकड़े रखने की खोज में रहते हो, स्थिर खड़े रहने और चीजों को वैसे ही रखने की कोशिश करते हो और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को छोड़ने की खोज में नहीं रहते, इसलिए क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोधी नहीं होगे? परमेश्वर के कार्य के कदम उमड़ती लहरों और घुमड़ते गर्जनों की तरह जबरदस्त और शक्तिशाली हैं—फिर भी तुम निष्क्रियता से बैठकर तबाही का इंतजार करते हो, उससे चिपके रहते हो जो पुराना है और चीजों के अपनी गोद में आ गिरने की प्रतीक्षा करते हो। इस तरह, तुम्हें मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करने वाला व्यक्ति कैसे माना जा सकता है? यह कैसे दिखा सकता है कि तुम जिस परमेश्वर को थामे हो, वह वही परमेश्वर है जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? और तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताबों के शब्द तुम्हें पार कराकर नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे परमेश्वर के कार्य के चरणों को खोजने में तुम्हारी अगुआई कैसे कर सकते हैं? और वे तुम्हें ऊपर स्वर्ग में कैसे ले जा सकते हैं? जिन्हें तुम अपने हाथों में थामे हो, वे केवल शब्द हैं, जो तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना दे सकते हैं, वे तुम्हें जीवन देने में सक्षम सत्य नहीं हैं। धर्मशास्त्र के शब्द जिन्हें तुम पढ़ते हो, वे केवल तुम्हारी जिह्वा को समृद्ध कर सकते हैं; वे बुद्धिमानी के शब्द नहीं हैं जो मानव जीवन को जानने में तुम्हारी मदद कर सकते हों, उनके तुम्हें पूर्णता की ओर ले जाने वाला मार्ग होने की बात तो दूर रही। क्या यह विसंगति तुम्हारे लिए चिंतन का कारण नहीं है? क्या यह तुम्हें इसके भीतर समाहित रहस्यों के बारे में अंतर्दृष्टि नहीं देती है? क्या तुम अपने बल पर परमेश्वर से मिलने के लिए अपने आप को स्वर्ग भिजवाने में समर्थ हो? परमेश्वर के आए बिना, क्या तुम परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनंद मनाने के लिए अपने आप को स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? तो मेरा उपदेश यह है कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो और उसकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहा है—देखो कि अब अंत के दिनों में मनुष्य को बचाने का कार्य कौन कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम कभी भी सत्य प्राप्त नहीं करोगे, और न ही कभी जीवन प्राप्त करोगे।
जो लोग मसीह द्वारा बोले गए सत्य पर भरोसा किए बिना जीवन प्राप्त करना चाहते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे बेतुके लोग हैं, और जो मसीह द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे कोरी कल्पना में खोए हैं। और इसलिए मैं कहता हूँ कि जो लोग अंत के दिनों के मसीह को स्वीकार नहीं करते, उनसे परमेश्वर हमेशा घृणा करेगा। अंत के दिनों में मसीह राज्य के लिए मनुष्य का प्रवेशद्वार है और ऐसा कोई नहीं है जो उसे लाँघकर निकल सके। मसीह के माध्यम के अलावा किसी भी दूसरे तरीके से किसी को भी परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें उसके वचन स्वीकारने चाहिए और उसके वचन के प्रति समर्पण करना चाहिए। सत्य और जीवन के प्रावधान को स्वीकारने में असमर्थ रहते हुए केवल आशीष प्राप्त करने की मत सोचो। मसीह अंत के दिनों में इसलिए आया है ताकि वह उन सबको जीवन प्रदान कर सके जो उसमें ईमानदारी से विश्वास रखते हैं। यह कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है, और यह कार्य वह मार्ग है जिसे नए युग में प्रवेश करने वाले सभी लोगों को अपनाना ही चाहिए। यदि तुम मसीह को नहीं स्वीकारते और यही नहीं, उसकी भर्त्सना, ईशनिंदा या उसका उत्पीड़न करते हो, तो तुम्हें अनंतकाल तक जलाया जाना तय है और तुम परमेश्वर के राज्य में कभी प्रवेश नहीं करोगे। ऐसा इसलिए क्योंकि यह मसीह स्वयं पवित्र आत्मा की अभिव्यक्ति है, परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वह है जिसे परमेश्वर ने अपना कार्य पृथ्वी पर करने के लिए सौंपा है, और इसलिए मैं कहता हूँ कि यदि तुम वह सब स्वीकार नहीं करते जो अंत के दिनों के मसीह द्वारा किया जाता है, तो तुम पवित्र आत्मा की ईशनिंदा करते हो। पवित्र आत्मा की ईशनिंदा करने वाले जिस प्रतिफल के पात्र हैं, वह सभी को स्वतः स्पष्ट है। मैं तुम्हें यह भी बताता हूँ : अगर तुम अंत के दिनों के मसीह का प्रतिरोध करते हो, अगर तुम अंत के दिनों के मसीह को नकारते हो तो कोई भी अन्य तुम्हारे बदले में इसका अंजाम नहीं भुगत सकता है। इतना ही नहीं, उस बिंदु के बाद तुम्हें परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने का अवसर कभी नहीं मिलेगा; यदि तुम अपने तौर-तरीके सुधारना भी चाहो, तब भी तुम दोबारा कभी परमेश्वर का चेहरा नहीं देख पाओगे। ऐसा इसलिए क्योंकि तुम जिसका प्रतिरोध कर रहे हो वह मानव नहीं है, तुम जिसे अस्वीकार कर रहे हो वह कोई तुच्छ व्यक्ति नहीं है, बल्कि मसीह है। क्या तुम जानते हो कि इसके क्या दुष्परिणाम हैं? तुम कोई छोटी-मोटी गलती नहीं कर रहे हो, बल्कि एक जघन्य पाप कर रहे हो। और इसलिए मैं हर व्यक्ति को सलाह देता हूँ कि सत्य के सामने अपने नुकीले दाँत और पंजे मत दिखाओ या मनमानी टिप्पणियाँ मत करो, क्योंकि केवल सत्य ही तुम्हें जीवन दिला सकता है, और सत्य के अलावा कुछ भी तुम्हें पुनः जन्म लेने या दोबारा परमेश्वर का चेहरा देखने में सक्षम नहीं बना सकता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है