अंत के दिनों में न्याय

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 77

मनुष्य को छुटकारा दिलाए जाने से पहले उसके अंदर शैतान के बहुत-से जहर पहले ही डाल दिए गए थे और हजारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद उसके भीतर एक ऐसी प्रकृति है जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती है। इसलिए जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया तो यह छुटकारे के मामले से बढ़कर कुछ नहीं था। यानी मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर वापस खरीदा गया, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति नहीं हटाई गई। मनुष्य, जो इतना गंदा है, को परमेश्वर की सेवा करने योग्य होने से पहले परिवर्तन से होकर गुजरना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह जान जाएगा और वह पूरी तरह बदल पाएगा और शुद्ध हो पाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटने योग्य हो सकता है। सारा वर्तमान कार्य इसलिए किया जाता है ताकि मनुष्य को शुद्ध किया और बदला जा सके; ऐसा इसलिए है ताकि वचन के न्याय और ताड़ना के माध्यम से और शोधन के जरिये मनुष्य अपनी भ्रष्टता छोड़ सके और शुद्ध किया जा सके। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है। वास्तव में यह चरण विजय के कार्य का चरण भी है और साथ ही उद्धार-कार्य का दूसरा चरण भी है। वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाता है, और वचन द्वारा शोधन, न्याय और उजागर किए जाने से ही मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताएँ, धारणाएँ, मंशाएँ और व्यक्तिगत आशाएँ पूरी तरह से प्रकट होती हैं। हालाँकि मनुष्य को छुटकारा दिलाया जा चुका है और उसके पाप क्षमा किए जा चुके हैं, फिर भी इसे केवल इस तरह समझा जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता और उसके साथ उसके अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। लेकिन मनुष्य पाप से मुक्त हुए बिना देह में रहता है और केवल पाप करता रह सकता है और निरंतर अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करता रह सकता है। यही वह जीवन है जो मनुष्य जीता है, पाप करने और क्षमा किए जाने का एक अंतहीन चक्र। अधिकतर लोग दिन में पाप करते हैं और शाम को उन्हें स्वीकार करते हैं। और इसलिए, हालाँकि पाप-बलि मनुष्य के लिए हमेशा के लिए प्रभावी है, फिर भी यह मनुष्य को पाप से नहीं बचा सकती। उद्धार का केवल आधा कार्य पूरा हुआ है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव हैं। उदाहरण के लिए, जब लोगों को पता चला कि वे मोआब के वंशज हैं तो उन्होंने शिकायत की, जीवन का अनुसरण करना छोड़ दिया और पूरी तरह से नकारात्मक हो गए। क्या यह इस बात को नहीं दर्शाता कि मनुष्य अभी भी परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन पूरी तरह समर्पण करने में असमर्थ है? क्या ठीक यही मनुष्य के शैतानी भ्रष्ट स्वभाव नहीं हैं? जब तुम्हें ताड़ना का भागी नहीं बनाया गया था, तो तुमने अपने हाथ बाकी सबके हाथों से ऊँचे उठाए थे, यहाँ तक कि यीशु के हाथों से भी ऊँचे। और तुमने ऊँची आवाज में पुकारा था : “परमेश्वर के प्रिय पुत्र बनो! परमेश्वर के अंतरंग बनो! हम मर जाएँगे, पर शैतान के आगे नहीं झुकेंगे! बूढ़े शैतान के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़े लाल अजगर के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़ा लाल अजगर सदा-सदा के लिए सत्ता से गिर जाए! परमेश्वर हमें पूर्ण करे!” तुमने बाकी सबसे ऊँचा पुकारा था। किंतु फिर ताड़ना का समय आया और एक बार फिर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किए गए। तुम्हारी पुकार बंद हो गई और तुम अपना संकल्प खो बैठे। यही मनुष्य की भ्रष्टता है; यह एक ऐसी चीज है जो पाप से ज्यादा गहरी है, जो शैतान द्वारा रोपी जाती है और मनुष्य के भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए है। मनुष्य के लिए अपने पापों से अवगत होना आसान नहीं है और उसके पास अपनी गहरी जमी हुई प्रकृति को पहचानने का कोई उपाय नहीं है। यह परिणाम केवल वचनों के न्याय के जरिये प्राप्त किया जा सकता है। केवल इसी प्रकार मनुष्य इस बिंदु से आगे धीरे-धीरे बदल सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 78

“न्याय” शब्द का जिक्र होने पर संभवतः तुम उन वचनों के बारे में सोचोगे, जो यहोवा ने प्रत्येक क्षेत्र के लोगों को निर्देश देते हुए कहे थे और जो वचन यीशु ने फरीसियों को फटकार लगाते हुए कहे थे। अपनी समस्त कठोरता के बावजूद, ये वचन परमेश्वर द्वारा मनुष्य का न्याय नहीं थे; बल्कि वे विभिन्न परिस्थितियों, यानी विभिन्न संदर्भों में परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन थे। ये वचन अंत के दिनों के मसीह द्वारा मनुष्यों का न्याय करते हुए कहे जाने वाले वचनों से भिन्न हैं। अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों का गहन-विश्लेषण करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर के प्रति समर्पण किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता जीनी चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभावों पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य परमेश्वर को कैसे अस्वीकार करता है, और भी अधिक इस तथ्य को उजागर करने पर केंद्रित हैं कि मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध एक विरोधी शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर कुछ वचनों में मनुष्य की प्रकृति को पूरी तरह नहीं समझाता है; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर और काट-छाँट करने की इन विभिन्न विधियों को साधारण वचनों से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है; बल्कि उजागर और काट-छाँट करने के इस कार्य को करने में उस सत्य का उपयोग किया जाता है जो मनुष्य के पास बिल्कुल भी नहीं होता है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य की समझ पैदा करने का काम करता है। न्याय के कार्य ने मनुष्य को परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों के बारे में काफी समझ प्राप्त करने में सक्षम बनाया है जो उसकी समझ से परे होते हैं। इसने मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार और अपनी भ्रष्टता की जड़ को समझने और जानने, साथ ही अपने कुरूप चेहरे का पता लगाने में सक्षम बनाया है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन को उन सभी के लिए उद्घाटित करने का कार्य है जो उसमें आस्था रखते हैं। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है। अगर तुम इन सत्यों को महत्वपूर्ण नहीं समझते, अगर तुम हमेशा उनसे बचने की कोशिश करते हो या उनके बाहर कोई नया रास्ता खोजने की कोशिश करते हो, तो मैं कहूँगा कि तुम घोर पापी हो। अगर तुम्हारा परमेश्वर में विश्वास है, फिर भी तुम सत्य को नहीं खोजते या परमेश्वर के इरादों को नहीं खोजते, न ही उस वचन से प्यार करते हो, जो तुम्हें परमेश्वर के निकट लाता है, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो न्याय से बचने की कोशिश कर रहा है, और यह कि तुम एक कठपुतली और ग़द्दार हो, जो महान श्वेत सिंहासन से भागता है। परमेश्वर ऐसे किसी भी विद्रोही को नहीं छोड़ेगा, जो उसकी आँखों के नीचे से बचकर भागता है। ऐसे मनुष्य और भी अधिक कठोर दंड पाएँगे। जो लोग परमेश्वर का न्याय प्राप्त करने के लिए उसके सम्मुख आते हैं और इसके अलावा शुद्ध किए जा चुके हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर के राज्य में रहेंगे। बेशक, यह कुछ ऐसा है, जो भविष्य से संबंधित है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह सत्य के द्वारा न्याय का कार्य करता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 79

न्याय का कार्य परमेश्वर का अपना कार्य है, इसलिए स्वाभाविक रूप से इसे परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए; उसकी जगह इसे मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता। चूँकि न्याय मानवजाति को जीतने के लिए सत्य का उपयोग है, तो यह निर्विवाद है कि परमेश्वर इस कार्य को करने के लिए देहधारी छवि में मनुष्यों के बीच एक बार फिर से प्रकट होता है। अर्थात्, अंत के दिनों का मसीह दुनिया भर के लोगों को सिखाने के लिए और उन्हें सभी सत्यों का ज्ञान कराने के लिए सत्य का उपयोग करेगा। यह परमेश्वर के न्याय का कार्य है। कई लोग परमेश्वर के दूसरे देहधारण को लेकर असहज महसूस करते हैं, क्योंकि लोगों को यह बात मानने में कठिनाई होती है कि परमेश्वर न्याय का कार्य करने के लिए देह धारण करेगा। फिर भी, मुझे तुम्हें यह अवश्य बताना होगा कि प्रायः परमेश्वर का कार्य मनुष्य की अपेक्षाओं से बहुत आगे तक जाता है, और मनुष्य के मन के लिए इसे स्वीकार करना कठिन होता है। क्योंकि लोग पृथ्वी पर मात्र भुनगों के समान हैं, जबकि परमेश्वर वह सर्वोच्च सत्ता है जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है; मनुष्य का मन गंदे पानी से भरे हुए एक गड्ढे के सदृश है, जो केवल भुनगों को ही उत्पन्न करता है, जबकि परमेश्वर के विचारों द्वारा निर्देशित कार्य का प्रत्येक चरण परमेश्वर की बुद्धि का परिणाम है। लोग हमेशा परमेश्वर के साथ संघर्ष करने की कोशिश करते हैं, जिसके बारे में मैं कहता हूँ कि यह स्वतः स्पष्ट है कि अंत में कौन हारेगा। मैं तुम सबको प्रोत्साहित करता हूँ कि अपने आपको स्वर्ण से अधिक मूल्यवान मत समझो। जब दूसरे लोग परमेश्वर का न्याय स्वीकार कर सकते हैं, तो तुम क्यों नहीं? तुम दूसरों से कितने ऊँचे हो? अगर दूसरे लोग सत्य के आगे सिर झुका सकते हैं, तो तुम भी ऐसा क्यों नहीं कर सकते? परमेश्वर का कार्य अटल है। वह सिर्फ तुम्हारे द्वारा किए गए “योगदान” के कारण न्याय के कार्य को फिर से नहीं दोहराएगा, और तुम इतने अच्छे अवसर के हाथ से निकल जाने पर पछतावे से भर जाओगे। अगर तुम्हें मेरे वचनों पर विश्वास नहीं है, तो फिर आकाश में स्थित उस महान श्वेत सिंहासन द्वारा तुम्हारा “न्याय” किए जाने की प्रतीक्षा करो! तुम्हें अवश्य पता होना चाहिए कि सभी इजराइलियों ने यीशु को खारिज और अस्वीकार किया था, और फिर भी यीशु द्वारा मानवजाति के छुटकारे का तथ्य पूरे ब्रह्मांड और पृथ्वी के छोरों तक फैल गया। क्या यह परमेश्वर द्वारा बहुत पहले पूरा किया गया तथ्य नहीं है? अगर तुम अभी भी यीशु द्वारा स्वयं को स्वर्ग में ले जाए जाने का इंतज़ार कर रहे हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक हठी निर्जीव काठ का बेकार टुकड़ा हो। यीशु तुम जैसे किसी भी झूठे विश्वासी को स्वीकार नहीं करेगा, जो सत्य के प्रति निष्ठाहीन है और केवल आशीष चाहता है। इसके विपरीत, वह तुम्हें दसियों हज़ार वर्षों तक जलने देने के लिए आग की झील में फेंकने में कोई दया नहीं दिखाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह सत्य के द्वारा न्याय का कार्य करता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 80

क्या अब तुम समझ गए हो कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? अगर तुम समझ गए हो, तो मैं तुम्हें न्याय किए जाने के लिए आज्ञाकारी ढंग से समर्पित होने की सलाह देता हूँ, वरना तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किए जाने या उसके द्वारा अपने राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को स्वीकार करते हैं लेकिन कभी शुद्ध नहीं किए जा सकते, अर्थात् जो न्याय के कार्य के बीच से ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिए जाएँगे। फरीसियों के पापों की तुलना में उनके पाप अधिक गंभीर हैं और अधिक संख्या में हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। जो लोग मजदूरी के भी योग्य नहीं हैं, वे और कठोर दंड प्राप्त करेंगे, ऐसा दंड जो चिरस्थायी भी होगा। परमेश्वर ऐसे किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा, जिसने एक बार तो वचनों से वफादारी दिखाई, मगर फिर परमेश्वर को धोखा दे दिया। ऐसे लोग आत्मा, प्राण और शरीर के दंड के माध्यम से प्रतिदंड भुगतेंगे। क्या यह हूबहू परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का प्रकटन नहीं है? क्या मनुष्य का न्याय करने और उसे उजागर करने में परमेश्वर का बिल्कुल यही उद्देश्य नहीं है? परमेश्वर उन लोगों को, जो न्याय के समय के दौरान सभी प्रकार के कुकर्म करते हैं, दुष्टात्माओं से आक्रांत स्थान पर भेजता है, और उन दुष्टात्माओं को इच्छानुसार उनके दैहिक शरीर नष्ट करने देता है, और उन लोगों के शरीरों से लाश की दुर्गंध निकलती है। यही उनका उचित प्रतिदंड है। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों और झूठे कार्यकर्ताओं का हर पाप उनकी रिकॉर्ड पुस्तिकाओं में लिखता है; और जब सही समय आता है, वह उन्हें अशुद्ध आत्माओं के बीच में फेंक देता है, उन अशुद्ध आत्माओं को अपनी इच्छानुसार उनके पूरे शरीर को अपवित्र करने देता है, और ऐसी व्यवस्था करता है कि वे कभी पुनर्जन्म नहीं ले पाते हैं और फिर कभी प्रकाश नहीं देख पाते हैं। परमेश्वर बुरे लोगों की सूची में उन पाखंडियों को जोड़ता है जो कुछ समय के लिए तो सेवा करते हैं, लेकिन अंत तक वफ़ादार नहीं रहते हैं और वह उन्हें बुरे लोगों के साथ कीचड़ में लोटने और उनके साथ मिलकर विविध प्रकार के बदमाशों का गिरोह बनाने देता है और अंत में, परमेश्वर उन्हें जड़ से मिटा देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देता है और उन पर कोई ध्यान नहीं देता, जो कभी भी मसीह के प्रति वफादार नहीं रहे या जिन्होंने अपनी ताकत का बिल्कुल भी योगदान नहीं किया, और युग बदलने पर वह उन सभी को जड़ से मिटा देगा। वे अब और पृथ्वी पर मौजूद नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य का मार्ग तो बिल्कुल भी प्राप्त नहीं करेंगे। परमेश्वर अपने लोगों की सेवा करने वालों की सूची में ऐसे हर व्यक्ति को जोड़ता है, जो कभी भी परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं रहा है, बल्कि उसके पास परमेश्वर के साथ अनमने ढंग से व्यवहार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ऐसे गिने-चुने लोग ही जीवित बचेंगे, जबकि बहुसंख्यक लोग उन लोगों के साथ नष्ट कर दिए जाएँगे जिनका श्रम मानक-स्तर का भी नहीं है। अंत में, परमेश्वर उन सभी को, जो परमेश्वर के साथ एकदिल और एकमन हैं, अपने लोगों और पुत्रों को, और परमेश्वर द्वारा याजक बनाए जाने के लिए पूर्वनियत लोगों को अपने राज्य में ले आएगा। ये परमेश्वर के कार्य का सार हैं। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है, जिन्हें परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है, उन्हें अविश्वासियों की श्रेणियों में सूचीबद्ध किया जाएगा और तुम लोग निश्चित रूप से कल्पना कर सकते हो कि उनका क्या परिणाम होगा। मैं तुम सभी लोगों से पहले ही वह कह चुका हूँ, जो मुझे कहना चाहिए; तुम लोग जो मार्ग चुनते हो, वह केवल तुम्हारी पसंद है। तुम लोगों को जो समझना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी व्यक्ति की प्रतीक्षा कभी नहीं करता जो उसके साथ कदमताल नहीं कर सकता और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मनुष्य के प्रति कोई दया नहीं दिखाता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह सत्य के द्वारा न्याय का कार्य करता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 81

परमेश्वर किसी भी युग में अपने कार्य को दोहराता नहीं है। चूँकि अंत के दिन आ गए हैं, इसलिए वह अंत के दिनों का अपना कार्य करेगा, और अंत के दिनों के अपने संपूर्ण स्वभाव को प्रकट करेगा। अंत के दिनों के बारे में बात करें तो इसका आशय एक भिन्न युग से है, वह युग जिसमें यीशु ने कहा था कि तुम अवश्य ही आपदा का सामना करोगे, और भूकंपों, अकालों और महामारियों का सामना करोगे, जो यह दर्शाएँगे कि यह एक नया युग है, और अब अनुग्रह का युग नहीं है। मान लो अगर, जैसा कि लोग कहते हैं, परमेश्वर हमेशा अपरिवर्तनशील हो, उसका स्वभाव हमेशा दयालु और प्रेममय हो, वह मनुष्य से ऐसे ही प्यार करे जैसे वह स्वयं से करता है, और वह सभी को उद्धार प्रदान करे और कभी भी मनुष्य से नफरत न करे, तो क्या उसका कार्य कभी समाप्त हो पाएगा? जब यीशु आया और उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, तो सभी पापियों के लिए स्वयं को बलिदान करके और स्वयं को वेदी पर चढ़ाकर उसने छुटकारे का कार्य पहले ही पूरा कर लिया था और अनुग्रह के युग को समाप्त कर दिया था। तो उस युग के कार्य को अंत के दिनों में दोहराने का क्या मतलब होता? क्या वही कार्य करना यीशु के कार्य को नकारना नहीं होगा? यदि परमेश्वर ने इस चरण में आकर सलीब पर चढ़ने का कार्य नहीं किया, बल्कि वह प्रेममय और दयालु ही बना रहा, तो क्या वह युग का अंत करने में समर्थ होगा? क्या एक प्रेममय और दयालु परमेश्वर युग का समापन करने में समर्थ होगा? युग का समापन करने के अपने अंतिम कार्य में परमेश्वर का स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, जिसमें वह वो सब प्रकट करता है जो अधार्मिक है, वह अनगिनत लोगों का सरेआम न्याय करता है और उन लोगों को पूर्ण बनाता है जो सच्चे दिल से उससे प्रेम करते हैं। केवल इस तरह का स्वभाव ही युग का समापन कर सकता है। अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सभी चीजें अपनी किस्म के अनुसार छाँटी जाती हैं और अपनी विभिन्न खूबियों के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित की जाती हैं। ठीक यही वह समय है जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और गंतव्य प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय का अनुभव न करें तो उनके विद्रोहीपन और अधार्मिकता को उजागर नहीं किया जा सकता है। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी चीजों का परिणाम प्रकट किया जा सकता है। लोग जो सच में हैं वह केवल तब दिखाते हैं जब उन्हें ताड़ना दी जाती है और उनका न्याय किया जाता है। बुरे को बुरे के साथ रखा जाएगा, भले को भले के साथ, और सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से सभी चीजों के परिणाम प्रकट किए जाएँगे ताकि बुरे को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और अनगिनत लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के सामने आत्मसमर्पण कर लें। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से पूरा करना होगा। चूँकि लोगों की भ्रष्टता अपने शिखर पर पहुँच गई है और उनका विद्रोहीपन अत्यंत गंभीर है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यतः ताड़ना और न्याय से युक्त है और अंत के दिनों में प्रकट होता है, लोगों को पूरी तरह से परिवर्तित कर सकता है और उन्हें पूर्ण कर सकता है, बुराई को उजागर कर सकता है, और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दंडित किया जाएगा। इसलिए इस तरह के स्वभाव में युग का महत्व निहित है। प्रत्येक नए युग के कार्य की खातिर परमेश्वर के स्वभाव का प्रकटन और खुलासा होता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर अपने स्वभाव को मनमाने और निरर्थक ढंग से प्रकट करता है। मान लो कि लोगों के परिणामों के प्रकट होने के अंत के दिनों में अगर परमेश्वर अभी भी लोगों पर असीम दया और करुणा बरसाता रहता और उनसे प्रेम करता रहता, उन्हें धार्मिक न्याय के अधीन करने के बजाय उनके प्रति नरमी, धैर्य और क्षमा दर्शाता रहता और उन्हें माफ करता रहता, चाहे उनके पाप कितने भी गंभीर क्यों न हों, उन्हें रत्ती भर भी धार्मिक न्याय के अधीन न करता, तो फिर परमेश्वर के समस्त प्रबंधन का समापन कब होता? कब इस तरह का कोई स्वभाव सही मंजिल की ओर मानवजाति की अगुआई करने में सक्षम होगा? यह किसी ऐसे न्यायाधीश के समान है जो लोगों के प्रति हमेशा प्रेममय होता है, एक दयालु चेहरे और सौम्य हृदय वाला प्रेममय न्यायाधीश जो लोगों से प्यार करता है चाहे उन्होंने जो भी अपराध किए हों, और उन्हें प्रेम और सहनशीलता दिखाता है चाहे वे जो भी हों—ऐसा न्यायाधीश कब न्यायोचित निर्णय पर पहुँचेगा? अंत के दिनों के दौरान केवल धार्मिक न्याय ही लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँट सकता है और उन्हें एक नए क्षेत्र में ला सकता है। इस तरह से परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से समस्त युग का अंत किया जाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 82

देह में उसका कार्य बहुत सार्थक है, यह कार्य के सम्बन्ध में कहा जाता है, और अंततः देहधारी परमेश्वर ही कार्य का समापन करता है, आत्मा नहीं। कुछ लोग मानते हैं कि परमेश्वर किसी अनजान समय पृथ्वी पर आकर लोगों को दिखाई दे सकता है, जिसके बाद वह व्यक्तिगत रूप से संपूर्ण मनुष्यजाति का न्याय करेगा, एक-एक करके सबकी परीक्षा लेगा, कोई भी नहीं छूटेगा। जो लोग इस ढंग से सोचते हैं, वे देहधारण के इस चरण के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर एक के बाद एक लोगों का न्याय नहीं करता, न ही उन्हें एक-एक करके परीक्षा से गुजारा जाता है; ऐसा करना न्याय का कार्य नहीं होगा। क्या समस्त मनुष्यजाति की भ्रष्टता एक समान नहीं है? क्या पूरी मनुष्यजाति का सार समान नहीं है? न्याय किया जाता है इंसान के भ्रष्ट सार का, शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए इंसानी सार का, और इंसान के सारे पापों का। परमेश्वर मनुष्य के छोटे-मोटे और मामूली दोषों का न्याय नहीं करता। न्याय का कार्य निरूपक है, और किसी व्यक्ति-विशेष के लिए कार्यान्वित नहीं किया जाता। बल्कि यह ऐसा कार्य है जिसमें समस्त मनुष्यजाति के न्याय का प्रतिनिधित्व करने के लिए लोगों के एक समूह का न्याय किया जाता है। देहधारी परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य, संपूर्ण मनुष्यजाति के कार्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए लोगों के एक समूह पर स्वयं द्वारा किए गए कार्य का उपयोग करना है, जिसके बाद यह धीरे-धीरे फैलता जाता है। न्याय का कार्य ऐसा ही है। परमेश्वर किसी विशिष्ट प्रकार के व्यक्ति या लोगों के किसी समूह-विशेष का न्याय नहीं करता, बल्कि संपूर्ण मनुष्यजाति की अधार्मिकता का न्याय करता है, जैसे कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध, या मनुष्य का उसका भय न मानना, या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान। जिसका न्याय किया जाता है वो है इंसान का परमेश्वर-विरोधी सार, और यह न्याय का कार्य अंत के दिनों का विजय-कार्य है। देहधारी परमेश्वर का कार्य और वचन जिन्हें इंसान ने देखा है, वे अंत के दिनों के दौरान बड़े श्वेत सिंहासन के सामने न्याय के कार्य हैं, जिसे इंसान ने अतीत से अपनी धारणाओं में पाल रखा था। देहधारी परमेश्वर द्वारा वर्तमान में किया जा रहा कार्य वास्तव में बड़े श्वेत सिंहासन के सामने न्याय है। आज का देहधारी परमेश्वर वह परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान संपूर्ण मनुष्यजाति का न्याय करता है। यह देह और कार्य, वचन और इस देह का समस्त स्वभाव उसकी समग्रता हैं। यद्यपि इस देह के कार्य का दायरा सीमित है, और उसमें सीधे तौर पर संपूर्ण ब्रह्मांड शामिल नहीं है, फिर भी न्याय के कार्य का सार संपूर्ण मनुष्यजाति का प्रत्यक्ष न्याय है—यह कार्य केवल चीन के चुने हुए लोगों के लिए नहीं, न ही यह थोड़े-से लोगों के लिए किया जाता है। देह में परमेश्वर के कार्य के दौरान, यद्यपि इस कार्य के दायरे में संपूर्ण ब्रह्माण्ड नहीं है, फिर भी यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, जब वह अपनी देह के कार्य के दायरे में उस कार्य को समाप्त कर लेगा तो उसके बाद, वह तुरन्त ही इस कार्य को ब्रह्मांड के भीतर प्रत्येक जगह में उसी तरह से फैला देगा जैसे यीशु के पुनरुत्थान और आरोहण के बाद उसका सुसमाचार फैल गया था। चाहे यह आत्मा का कार्य हो या देह का कार्य, यह ऐसा कार्य है जिसे एक सीमित दायरे में किया जाता है, परन्तु जो संपूर्ण ब्रह्मांड के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। अन्त के दिनों में, परमेश्वर देहधारी पहचान में प्रकट होकर अपना कार्य करता है, और देहधारी परमेश्वर ही वह परमेश्वर है जो बड़े श्वेत सिंहासन के सामने मनुष्य का न्याय करता है। चाहे वह आत्मा हो या देह, जो न्याय का कार्य करता है वह परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान मनुष्य का न्याय करता है। इसे उसके द्वारा किए गए कार्य से तय किया जाता है, न कि उसके बाहरी रंग-रूप या अन्य विभिन्न कारकों द्वारा। यद्यपि इन वचनों के बारे में मनुष्य की धारणाएँ हैं, लेकिन कोई भी देहधारी परमेश्वर के न्याय और संपूर्ण मनुष्यजाति पर विजय के तथ्य को नकार नहीं सकता। इंसान चाहे कुछ भी सोचे, मगर तथ्य आखिरकार तथ्य ही हैं। कोई यह नहीं कह सकता है कि “कार्य परमेश्वर द्वारा किया जाता है, परन्तु देह परमेश्वर नहीं है।” यह भ्रांति है, क्योंकि इस कार्य को देहधारी परमेश्वर के सिवाय और कोई नहीं कर सकता। चूँकि इस कार्य को पहले ही पूरा किया जा चुका है, इसलिए इस कार्य के बाद मनुष्य के लिए परमेश्वर के न्याय का कार्य दूसरी बार प्रकट नहीं होगा; अपने दूसरे देहधारण में परमेश्वर ने पहले ही संपूर्ण प्रबंधन के समस्त कार्य का समापन कर लिया है, इसलिए परमेश्वर के कार्य का चौथा चरण नहीं होगा। क्योंकि जिसका न्याय किया जाता है वह मनुष्य है, मनुष्य जो कि हाड़-माँस का है और भ्रष्ट किया जा चुका है, और यह शैतान की आत्मा नहीं है जिसका सीधे तौर पर न्याय किया जाता है, इसलिए न्याय का कार्य आध्यात्मिक जगत में कार्यान्वित नहीं किया जाता, बल्कि मनुष्यों के बीच किया जाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 83

मनुष्य की देह की भ्रष्टता का न्याय करने के लिए देह में प्रकट परमेश्वर से अधिक उपयुक्त और कोई योग्य नहीं है। यदि न्याय सीधे तौर पर परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किया जाए, तो यह सर्वव्यापी नहीं होता, और तो और मनुष्य के लिए इसे स्वीकार करना कठिन होता, क्योंकि आत्मा मनुष्य के रूबरू आने में असमर्थ है। इस बिंदु के प्रकाश में, प्रभाव तत्काल नहीं होंगे, मनुष्य का परमेश्वर के उस स्वभाव को अधिक स्पष्टता से देखना तो और भी दूर की बात है जो अपमान बर्दाश्त नहीं करता है। यदि देह में प्रकट परमेश्वर मनुष्यजाति की भ्रष्टता का न्याय करे तभी शैतान को पूरी तरह से हराया जा सकता है। देह में प्रकट परमेश्वर भी सामान्य मानवता वाला व्यक्ति है, फिर भी वह सीधे तौर पर मनुष्य की अधार्मिकता का न्याय कर सकता है; यही उसकी जन्मजात पवित्रता, और उसके अनुपम होने का चिन्ह है। केवल परमेश्वर ही मनुष्य का न्याय करने के योग्य है, और उसका न्याय करने की स्थिति में है, क्योंकि वह सत्य और धार्मिकता को धारण किए हुए है, और इस प्रकार वह मनुष्य का न्याय करने में समर्थ है। जो सत्य और धार्मिकता से रहित हैं वे दूसरों का न्याय करने लायक नहीं हैं। यदि इस कार्य को परमेश्वर के आत्मा द्वारा किया जाता, तो इसका अर्थ शैतान पर विजय नहीं होता। आत्मा अंतर्निहित रूप से ही नश्वर प्राणियों की तुलना में अधिक उत्कृष्ट है, और परमेश्वर का आत्मा अंतर्निहित रूप से पवित्र है, और देह पर विजय प्राप्त किए हुए है। यदि आत्मा ने इस कार्य को सीधे तौर पर किया होता, तो वह मनुष्य के पूरे विद्रोहीपन का न्याय नहीं कर पाता, और उसकी सारी अधार्मिकता को प्रकट नहीं कर पाता। क्योंकि न्याय के कार्य को परमेश्वर के बारे में मनुष्य की धारणाओं के माध्यम से भी कार्यान्वित किया जाता है, और मनुष्य के अंदर कभी भी आत्मा के बारे में कोई धारणाएँ नहीं रही हैं, इसलिए आत्मा मनुष्य की अधार्मिकता को बेहतर तरीके से प्रकट करने में असमर्थ है, वह ऐसी अधार्मिकता को पूरी तरह से उजागर करने में तो बिल्कुल भी समर्थ नहीं है। देहधारी परमेश्वर उन सब लोगों का शत्रु है जो उसे नहीं जानते। उसके बारे में मनुष्य की धारणाओं और उसके विरोध का न्याय करके, वह मनुष्यजाति के सारे विद्रोहीपन को उजागर करता है। देह में उसके कार्य के प्रभाव आत्मा के कार्य की तुलना में अधिक स्पष्ट होते हैं। इसलिए, संपूर्ण मनुष्यजाति के न्याय को आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर सम्पन्न नहीं किया जाता, बल्कि यह देहधारी परमेश्वर का कार्य है। देहधारी परमेश्वर को मनुष्य देख और छू सकता है, और देहधारी परमेश्वर मनुष्य पर पूरी तरह से विजय पा सकता है। मनुष्य उसका विरोध करने से उसके प्रति समर्पण करने की ओर, उसका उत्पीड़न करने से उसे स्वीकार करने की ओर, उसके बारे में धारणा रखने से उसे जानने की ओर, और उसे अस्वीकार करने से उसे प्रेम करने की ओर—ये हैं देहधारी परमेश्वर के कार्य के प्रभाव। मनुष्य को परमेश्वर के न्याय की स्वीकृति से ही बचाया जाता है, वह परमेश्वर के बोले गए वचनों से ही धीरे-धीरे उसे जानने लगता है, परमेश्वर के प्रति उसके विरोध के दौरान परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर विजय पायी जाती है, और परमेश्वर की ताड़ना की स्वीकृति के दौरान वह उससे जीवन की आपूर्ति प्राप्त करता है। यह समस्त कार्य देहधारी परमेश्वर के कार्य हैं, यह आत्मा के रूप में परमेश्वर के कार्य नहीं हैं। देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य महानतम और बेहद गहन कार्य है, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का अति महत्वपूर्ण भाग देहधारण के कार्य के दो चरण हैं। देहधारी परमेश्वर के कार्य में आने वाली बाधाएँ बहुत बड़ी हैं, क्योंकि मनुष्य इतनी अधिक गहराई से भ्रष्ट किया गया है। विशेष रूप से, अंत के दिनों में इन लोगों पर किया गया कार्य और भी ज्यादा कठिनाई से भरा है, परिवेश शत्रुतापूर्ण है, और हर प्रकार के लोगों की काबिलियत बहुत ही कमजोर है। फिर भी इस कार्य के अंत में, थोड़ा भी कम पड़े बिना यह उचित प्रभाव ही प्राप्त करेगा; यह देह के कार्य का प्रभाव है, और यह प्रभाव आत्मा के कार्य की तुलना में अधिक आश्वस्त करने वाला है। परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का समापन देह में किया जाएगा, और इसे देहधारी परमेश्वर द्वारा ही पूरा किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण और सबसे निर्णायक कार्य देह में किया जाता है, और मनुष्य का उद्धार व्यक्तिगत रूप से देहधारी परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए। हर इंसान को यही लगता है कि देहधारी परमेश्वर इंसान से संबंधित नहीं है, जबकि सच्चाई यह है कि देह पूरी मनुष्यजाति की नियति और अस्तित्व से सम्बन्धित है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 84

आज परमेश्वर तुम लोगों का न्याय करता है, तुम लोगों को ताड़ना देता है और तुम्हें दोषी ठहराता है, लेकिन तुम्हें यह जानना चाहिए कि तुम्हें दोषी इसलिए ठहराया जाता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको। वह दोषी ठहराता है, शाप देता है, न्याय करता और ताड़ना देता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको, ताकि तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हो सके और उससे भी बढ़कर तुम अपनी कीमत जान सको और यह देख सको कि परमेश्वर के सभी कार्य धार्मिक हैं, वे उसके स्वभाव और उसके कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार हैं, वह मनुष्य के उद्धार के लिए अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है और यह कि वह धार्मिक परमेश्वर है, जो मनुष्य से प्रेम करता है, उसे बचाता है, उसका न्याय करता है और उसे ताड़ना भी देता है। यदि तुम केवल यह जानते हो कि तुम निम्न स्तर के हो, कि तुम भ्रष्ट और विद्रोही हो, परंतु यह नहीं जानते कि परमेश्वर आज तुम पर जो न्याय और ताड़ना का कार्य कर रहा है उसके माध्यम से वह अपने उद्धार को प्रकट करने का इरादा रखता है, तो तुम्हारे पास चीजों को अनुभव करने का कोई तरीका नहीं है, तुम आगे बढ़ने में तो बिल्कुल भी सक्षम नहीं हो। परमेश्वर लोगों को मार गिराने या नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि उनका न्याय करने, उन्हें शाप देने, ताड़ना देने और बचाने के लिए आया है। जब तक उसकी 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना का समापन नहीं हो जाता—पहले वह मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी के परिणाम का खुलासा करेगा—पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से उद्धार की खातिर है; इसका विशुद्ध प्रयोजन उससे प्रेम करने वाले लोगों को पूरी तरह पूर्ण करना और उन्हें अपने प्रभुत्व के प्रति समर्पण कराना है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर लोगों को कैसे बचाता है, यह सब उन्हें उनकी पुरानी शैतानी प्रकृति से अलग करके किया जाता है; अर्थात्, वह उन्हें जीवन का अनुसरण करवाकर बचाता है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो उनके पास परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का कोई रास्ता नहीं होगा। उद्धार स्वयं परमेश्वर का कार्य है और जीवन का अनुसरण ऐसी चीज है, जो उद्धार स्वीकार करने के लिए मनुष्य के पास होनी ही चाहिए। मनुष्य की निगाह में, उद्धार परमेश्वर का प्रेम है, और परमेश्वर का प्रेम ताड़ना, न्याय और शाप नहीं हो सकता; उद्धार में दया, प्रेमपूर्ण दयालुता और, इनके अलावा, सांत्वना के वचनों के साथ-साथ परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए असीम आशीष समाविष्ट होने चाहिए। लोगों का मानना है कि जब परमेश्वर मनुष्य को बचाता है, तो ऐसा वह उसे अपने आशीषों और अनुग्रह से प्रेरित करके करता है, ताकि वह अपना हृदय परमेश्वर को दे सके। दूसरे शब्दों में, उसका मनुष्य को स्पर्श करना उसे बचाना है। इस तरह का उद्धार लेनदेन पर आधारित है। केवल जब परमेश्वर मनुष्य को सौ गुना प्रदान करता है, तभी मनुष्य परमेश्वर के नाम के प्रति समर्पण करेगा और ऐसा करके वह परमेश्वर को गौरवान्वित करेगा और उसका मान बढ़ाएगा। मानवजाति के लिए परमेश्वर का यह इरादा नहीं है। परमेश्वर पृथ्वी पर भ्रष्ट मानवता को बचाने के लिए कार्य करने आया है—इसमें कोई झूठ नहीं है। यदि ऐसा न होता, तो वह अपना कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से निश्चित ही नहीं आता। अतीत में, उद्धार के उसके साधन में परम दया और प्रेमपूर्ण दयालुता दिखाना शामिल था, यहाँ तक कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। वर्तमान अतीत जैसा नहीं है : आज तुम लोगों का उद्धार अंत के दिनों के समय घटित होता है, जब प्रत्येक व्यक्ति उसके प्रकार के अनुसार छाँटा जाता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन दया या प्रेमपूर्ण दयालुता नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है, ताकि मनुष्य को अधिक पूरी तरह से बचाया जा सके। इस प्रकार, तुम लोगों को जो भी प्राप्त होता है, वह ताड़ना, न्याय और निर्मम प्रहार है, लेकिन यह जान लो : इस निर्मम प्रहार में थोड़ा-सा भी दंड नहीं है। मेरे वचन कितने भी कठोर हों, तुम लोगों को जो मिलता है, वे कुछ वचन ही होते हैं, जो तुम लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत हो सकते हैं, और मैं कितना भी क्रोधित क्यों न हूँ, तुम लोगों को जो मिलता है, वे फिर भी फटकार के वचन ही होते हैं, और मेरा आशय तुम लोगों को नुकसान पहुँचाना या तुम लोगों को मार डालना नहीं है। क्या यह सब तथ्य नहीं है? जान लो कि आजकल हर चीज उद्धार के लिए है, चाहे वह धार्मिक न्याय हो या निर्मम शोधन और ताड़ना। भले ही आज प्रत्येक व्यक्ति उसके प्रकार के अनुसार छाँटा जाए या सभी प्रकार के लोगों को बेनकाब किया जाए, परमेश्वर के समस्त वचनों और कार्य का प्रयोजन उन लोगों को बचाना है जो परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हैं। धार्मिक न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से लाया जाता है और निर्मम शोधन उसे शुद्ध करने के लिए किया जाता है; कठोर वचन बोलना या ताड़ना देना, दोनों शुद्ध करने के लिए हैं और वे उद्धार के लिए हैं। इस प्रकार, उद्धार का आज का तरीका अतीत के तरीके जैसा नहीं है। आज धार्मिक न्याय तुम्हारे उद्धार का काम करता है और वह तुम लोगों में से प्रत्येक को तुम्हारे प्रकार के अनुसार छाँटने का एक अच्छा उपकरण है और निर्मम ताड़ना तुम लोगों के सर्वोच्च उद्धार का काम करती है। ऐसी ताड़ना और न्याय का सामना होने पर तुम लोगों को क्या कहना है? क्या तुम लोगों ने शुरू से अंत तक हमेशा उद्धार का आनंद नहीं लिया है? तुम लोगों ने देहधारी परमेश्वर को देखा है और उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि का एहसास किया है; इसके अलावा, तुम लोगों ने बार-बार प्रहार और अनुशासन का अनुभव किया है। लेकिन क्या तुम लोगों को सर्वोच्च अनुग्रह भी प्राप्त नहीं हुआ है? क्या तुम लोगों को प्राप्त हुए आशीष किसी भी अन्य की तुलना में अधिक नहीं हैं? तुम लोगों को प्राप्त हुए अनुग्रह सुलेमान को प्राप्त महिमा और संपत्ति से भी अधिक विपुल हैं! इसके बारे में सोचो : यदि आगमन के पीछे मेरा इरादा तुम लोगों को बचाने के बजाय तुम्हारी निंदा करना और सज़ा देना होता, तो क्या तुम लोगों का जीवन इतने लंबे समय तक चल सकता था? क्या तुम लोग जो मांस और रक्त के पापी प्राणी हो, आज तक जीवित रहते? यदि मेरा उद्देश्य केवल तुम लोगों को दंड देना होता, तो मैं देह धारण क्यों करता और इतने महान उद्यम की शुरुआत क्यों करता? क्या तुम जैसे तुच्छ लोगों को दंडित करने का काम महज एक वचन बोलने से ही नहीं किया जा सकता? क्या तुम लोगों की जानबूझकर निंदा करने के बाद अभी भी मुझे तुम लोगों को नष्ट करने की आवश्यकता होगी? क्या तुम लोगों को अभी भी मेरे इन वचनों पर विश्वास नहीं है? क्या मैं केवल दया और प्रेमपूर्ण दयालुता के माध्यम से मनुष्य को बचा सकता हूँ? या क्या मैं मनुष्यों को बचाने के लिए केवल सूली पर चढ़ने के तरीके का ही उपयोग कर सकता हूँ? क्या मेरा धार्मिक स्वभाव मनुष्य को पूरी तरह से समर्पित बनाने में अधिक सहायक नहीं है? क्या यह मनुष्य को पूरी तरह से बचाने में अधिक सक्षम नहीं है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें रुतबे के आशीष को परे रखना चाहिए और मनुष्य का उद्धार लाने का परमेश्वर का इरादा समझना चाहिए

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 85

यद्यपि मेरे वचन कठोर हैं, किंतु वे सब मनुष्य के लिए उद्धार हैं, क्योंकि मैं केवल वचन बोल रहा हूँ, मनुष्य की देह को दंडित नहीं कर रहा हूँ। इन वचनों के कारण मनुष्य प्रकाश में रह पाता है, यह जान पाता है कि प्रकाश मौजूद है, यह जान पाता है कि प्रकाश अनमोल है, और, इससे भी बढ़कर, यह जान पाता है कि ये वचन उसके लिए कितने फायदेमंद हैं, साथ ही यह भी जान पाता है कि परमेश्वर उद्धार है। यद्यपि मैंने ताड़ना और न्याय के बहुत-से वचन कहे हैं, लेकिन कुछ भी वास्तव में तुम लोगों पर नहीं आया है। मैं विशेष रूप से अपना काम करने और अपने वचन बोलने के लिए आया हूँ, और भले ही मेरे वचन कड़े हैं, लेकिन वे तुम लोगों की भ्रष्टता और विद्रोहशीलता का न्याय करने के लिए बोले जाते हैं। मेरे ऐसा करने का उद्देश्य मनुष्य को शैतान की सत्ता से बचाना है। मेरा उद्देश्य अपने वचनों का उपयोग कर मनुष्य को बचाना है; यह अपने वचनों से मनुष्य को नुकसान पहुँचाना नहीं है। मेरे वचन कठोर इसलिए हैं, ताकि मेरे कार्य में परिणाम प्राप्त हो सकें। केवल ऐसे कार्य से ही मनुष्य खुद को जान सकता है और अपने विद्रोही स्वभाव से दूर हो सकता है। वचनों के कार्य की सबसे बड़ी सार्थकता यह है कि यह लोगों को सत्य को समझ लेने के बाद उसे अभ्यास में लाने और उसके द्वारा अपने स्वभाव में बदलाव लाने और अपना और परमेश्वर के कार्य का ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। वचन बोलकर कार्य करने से ही परमेश्वर और मनुष्य के बीच के रिश्ते का पुल बन सकता है, केवल वचन ही सत्य की व्याख्या कर सकते हैं। इस तरह से काम करना मनुष्य को जीतने का सबसे अच्छा साधन है; वचनों को बोलने के अलावा कोई अन्य तरीका लोगों को सत्य और परमेश्वर के कार्य को अधिक स्पष्टता के साथ समझने में सक्षम नहीं बना सकता। इसलिए, अपने कार्य के अंतिम चरण में परमेश्वर उन सभी सत्यों और रहस्यों को खोलने के लिए मनुष्य से बोलने के तरीके का इस्तेमाल करता है, जिन्हें वह नहीं समझता, ताकि वह परमेश्वर से सच्चा मार्ग और जीवन प्राप्त कर सके और ऐसा करके उसके इरादे पूरे कर सके। मनुष्य पर परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य उसे परमेश्वर के इरादे पूरे करने में सक्षम बनाना है और ऐसा उसे बचाने के लिए किया जाता है। इसलिए, मनुष्य का उद्धार करते समय परमेश्वर उसे दंड देने का काम नहीं करता। मनुष्य को बचाते समय परमेश्वर दुष्ट लोगों को दंडित करता या नेक लोगों को पुरस्कृत नहीं करता, न ही वह विभिन्न प्रकार के लोगों की मंज़िल का खुलासा करता है। बल्कि, अपने कार्य के अंतिम चरण के पूरा होने के बाद ही वह दुष्ट लोगों को दंडित और नेक लोगों को पुरस्कृत करने का काम करेगा, और केवल तभी वह सभी प्रकार के लोगों के परिणामों का भी खुलासा करेगा। दंडित केवल वही लोग किए जाएँगे, जिन्हें सचमुच बचाया नहीं जा सकता, जबकि बचाया केवल उन्हीं लोगों को जाएगा, जिन्होंने परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार के समय उसका उद्धार प्राप्त कर लिया है। उद्धार का अपना कार्य करने के दौरान परमेश्वर हर उस व्यक्ति को यथासंभव बचाता है जिसे बचाया जा सकता है और उनमें से किसी को भी नहीं छोड़ता है, क्योंकि परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य मनुष्य को बचाना है। जो लोग परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार के दौरान अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने में असमर्थ रहते हैं—और वे भी, जो पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं कर पाते हैं—वे दंड के भागी होंगे। कार्य का यह चरण—वचनों का कार्य—लोगों के लिए वे सभी वचन खोल देगा जिन्हें वे नहीं समझते हैं, साथ ही उन सभी रहस्यों को भी खोल देगा जो उन्हें समझ में नहीं आते हैं। यह उन्हें परमेश्वर के इरादों को और उनसे परमेश्वर की अपेक्षाओं को समझने देता है और अपने में परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने और अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने की पूर्वापेक्षाएँ रखने देता है। परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए केवल वचनों का उपयोग करता है और लोगों को थोड़ा-सा विद्रोही होने पर दंडित नहीं करता है। ऐसा इसलिए कि यह उद्धार के कार्य का समय है और यदि लोग जब भी विद्रोही हों उन्हें दंडित किया जाए, तो किसी के पास भी बचाए जाने का अवसर नहीं होगा और हरेक दंडित होगा और रसातल में जा गिरेगा। मनुष्य का न्याय करने के लिए वचनों के उपयोग का उद्देश्य उसे स्वयं को जानने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने देना है; इसका उद्देश्य उसे इस तरह के न्याय से दंडित करना नहीं है। वचनों के कार्य के दौरान बहुत-से लोग देहधारी परमेश्वर के प्रति अपनी विद्रोहशीलता और प्रतिरोध उजागर करने के साथ ही अपने समर्पण की गैर-मौजूदगी भी उजागर करेंगे। फिर भी, इसकी वजह से वह उन्हें दंडित नहीं करेगा, बल्कि केवल उन लोगों को अस्वीकार कर देगा, जो पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुके हैं और जिन्हें बचाया नहीं जा सकता। वह उनकी देह शैतान को दे देगा, और कुछ मामलों में, उनकी देह का अंत कर देगा। शेष लोग अनुसरण करना और काट-छाँट किए जाने का अनुभव करना जारी रखेंगे। यदि अनुसरण करते समय भी ये लोग काट-छाँट किए जाने को स्वीकार नहीं करते, और ज्यादा पतित हो जाते हैं, तो वे उद्धार पाने के अपने अवसर से वंचित हो जाएँगे। हर ऐसे व्यक्ति के पास उद्धार के लिए कई अवसर होंगे जिसने परमेश्वर के वचनों द्वारा जीत लिया जाना स्वीकार कर लिया है; प्रत्येक व्यक्ति के उद्धार में परमेश्वर उसे यथासंभव अधिकतम छूट देगा। दूसरे शब्दों में, उसके प्रति परम उदारता दिखाई जाएगी। अगर लोग गलत रास्ता छोड़ दें और पश्चात्ताप करें, तो परमेश्वर उन्हें उद्धार प्राप्त करने के अवसर देगा। जब मनुष्य पहली बार परमेश्वर से विद्रोह करते हैं तो वह उन्हें मार गिराना नहीं चाहता; बल्कि वह उन्हें बचाने की पूरी कोशिश करता है। यदि किसी में वास्तव में उद्धार के लिए कोई गुंजाइश नहीं है तो परमेश्वर उन्हें छोड़ देता है। किसी को दंडित करने में परमेश्वर थोड़ा धीमा इसलिए चलता है क्योंकि वह हर उस व्यक्ति को बचाना चाहता है जिसे बचाया जा सकता है। वह लोगों का न्याय करने, उन्हें प्रबुद्ध करने और उनका मार्गदर्शन करने के लिए बस वचनों का उपयोग करता है; वह उन्हें मार गिराने के लिए छड़ी का उपयोग नहीं करता है। मनुष्य को उद्धार दिलाने के लिए वचनों का उपयोग करना कार्य के अंतिम चरण का उद्देश्य और महत्त्व है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें रुतबे के आशीष को परे रखना चाहिए और मनुष्य का उद्धार लाने का परमेश्वर का इरादा समझना चाहिए

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 86

परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य इसलिए करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर के बारे में ज्ञान प्राप्त कर सके; साथ ही, वह अपनी गवाही की खातिर ऐसा करता है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के प्रति परमेश्वर के न्याय के बिना मनुष्य उसके धार्मिक स्वभाव को बिल्कुल नहीं जान सकता था, जो किसी अपमान को सहन नहीं करता, न ही मनुष्य परमेश्वर के बारे में अपने पुराने ज्ञान को एक नए ज्ञान में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है; इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के जरिए, वह मनुष्य को परमेश्वर से जुड़े ज्ञान तक पहुँचने, अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने और परमेश्वर के लिए जबरदस्त गवाही देने लायक बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का परिवर्तन परमेश्वर के कई विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज़रिए प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में ऐसे बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसके इरादों के अनुरूप बनने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन दर्शाता है कि मनुष्य को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त करा दिया गया है और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह और ऐसा व्यक्ति बन गया है, जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है। आज देहधारी परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए पृथ्वी पर आया है और वह अपेक्षा रखता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति समर्पित हो, और उसकी गवाही दे—मनुष्य को परमेश्वर के व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जानना है, उसे उसके उन सभी वचनों और कार्य के प्रति समर्पण करना है, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं और उसे उस समस्त कार्य की गवाही देनी है, जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और मनुष्य को जीतने के उसके सभी कर्मों की भी गवाही देनी है। जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही सटीक और व्यावहारिक होती है और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्वर अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने उसके न्याय, उसकी ताड़ना, और काट-छाँट से गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। वह अपनी गवाही देने के लिए उनका उपयोग करता है जिनका स्वभाव बदल गया है और जिन्होंने इस प्रकार उसके आशीर्वाद प्राप्त कर लिए हैं। उसे मनुष्य के मुँह से की जाने वाली स्तुति की आवश्यकता नहीं है, न ही उसे शैतान की किस्म के उन लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जिन्हें उसने नहीं बचाया है। केवल वो जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही देने योग्य हैं और केवल वो जिनके स्वभाव को रूपांतरित कर दिया गया है, उसकी गवाही देने योग्य हैं। परमेश्वर मनुष्य को जानबूझकर अपने नाम को शर्मिंदा नहीं करने देगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर के लिए गवाही दे सकते हैं

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 87

परमेश्वर द्वारा मनुष्य की पूर्णता किन साधनों से संपन्न होती है? वह परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से संपन्न होती है। परमेश्वर के स्वभाव में मुख्यतः धार्मिकता, कोप, प्रताप, न्याय और शाप शामिल हैं और वह मनुष्य को मुख्य रूप से अपने न्याय के माध्यम से पूर्ण बनाता है। कुछ लोग समझते नहीं हैं और पूछते हैं, ऐसा क्यों है कि परमेश्वर केवल न्याय और शाप के जरिए ही मनुष्य को पूर्ण बना सकता है। वे कहते हैं, “यदि परमेश्वर मनुष्य को शाप दे तो क्या वह मर नहीं जाएगा? यदि परमेश्वर को मनुष्य का न्याय करना पड़े तो क्या मनुष्य को दोषी नहीं ठहराया जाएगा? तो फिर भी वह पूर्ण कैसे बनाया जा सकता है?” ऐसे शब्द उन लोगों के होते हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर जिस चीज को शाप देता है वह है मनुष्य की विद्रोहशीलता और वह जिस चीज का न्याय करता है वे हैं मनुष्य के पाप। यूँ तो वह कठोरतापूर्वक बोलता है और मनुष्य की भावनाओं का बिल्कुल भी लिहाज नहीं करता है और वह सब उजागर करता है जो मनुष्य के भीतर होता है, कुछ कठोर वचनों के जरिए वह सब उजागर करता है जो मनुष्य के भीतर सारभूत है, ऐसे न्याय के जरिए वह मनुष्य को देह के सार का गहन ज्ञान प्रदान करता है और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के समक्ष समर्पण कर देता है। मनुष्य की देह पाप की है और शैतान की है, यह विद्रोही है और यह परमेश्वर की ताड़ना का पात्र है। इसलिए मनुष्य को खुद को जानने देने के लिए उस पर परमेश्वर के न्याय के वचन आने ही चाहिए और सभी प्रकार के शोधन का प्रयोग किया जाना चाहिए; तभी परमेश्वर का कार्य प्रभावी हो सकता है।

परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों से यह देखा जा सकता है कि उसने मनुष्य की देह को पहले ही दोषी ठहरा दिया है। तो क्या ये वचन शाप के वचन नहीं हैं? परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन मनुष्य के असली रंग उजागर करते हैं, और ऐसे खुलासों के जरिये उसका न्याय किया जाता है, और जब वह देखता है कि वह परमेश्वर के इरादे पूरे करने में असमर्थ है, तो वह अपने भीतर दुःख और पछतावा अनुभव करता है, वह महसूस करता है कि वह परमेश्वर का बहुत ऋणी है, और परमेश्वर के इरादे पर खरा नहीं उतर सकता। ऐसा समय भी होता है जब पवित्र आत्मा तुम्हें भीतर से अनुशासित करता है, और यह अनुशासन परमेश्वर के न्याय से आता है; ऐसा समय भी होता है जब परमेश्वर तुम्हें फटकारता है और अपना चेहरा तुमसे छिपा लेता है, जब वह तुम पर ध्यान नहीं देता और तुम पर कार्य नहीं करता, और तुम्हारा शोधन करने के लिए बिना आवाज किए तुम्हें ताड़ना देता है। मनुष्य पर परमेश्वर का कार्य मुख्य रूप से अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करने के लिए होता है। मनुष्य अंततः परमेश्वर के लिए क्या गवाही देता है? मनुष्य यह गवाही देता है कि परमेश्वर धार्मिक परमेश्वर है, उसका स्वभाव धार्मिकता, क्रोध, ताड़ना और न्याय है; मनुष्य परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की गवाही देता है। परमेश्वर अपने न्याय का उपयोग मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करता है, उसने मनुष्य से प्रेम किया है और उसे बचाया है—परंतु उसके प्रेम में क्या निहित है? उसमें न्याय, प्रताप, क्रोध और शाप निहित है। यद्यपि अतीत में परमेश्वर ने मनुष्य को शाप दिया था, परंतु उसने मनुष्य को पूरी तरह से अथाह कुंड में नहीं फेंका, बल्कि उसने यह उपाय मनुष्य के विश्वास के शोधन के लिए किया था; उसने मनुष्य को घातक स्थिति में नहीं डाला था, बल्कि उसने मनुष्य को पूर्ण बनाने का कार्य किया था। देह का सार वही है जो शैतान का है—परमेश्वर ने यह बिल्कुल सही कहा है—परंतु परमेश्वर द्वारा कार्यान्वित तथ्य उसके वचनों के अनुसार साकार नहीं होते। वह तुम्हें शाप देता है ताकि तुम उससे प्रेम कर सको, ताकि तुम देह के सार को जान सको; वह तुम्हें ताड़ना देता है ताकि तुम्हें जगाया जा सके, तुम अपने भीतर की कमियाँ और मनुष्य की दयनीयता और उसकी अयोग्यता जान सको। इस प्रकार, परमेश्वर के शाप, उसका न्याय, और उसका प्रताप और क्रोध—ये सब मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए हैं। परमेश्वर आज जो कुछ भी करता है और तुम लोगों पर अपने कार्य के माध्यम से वह जो धार्मिक स्वभाव प्रकट करता है—यह सब मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए है। ऐसा है परमेश्वर का प्रेम।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 88

अपनी परंपरागत धारणाओं में मनुष्य विश्वास करता है कि परमेश्वर का प्रेम अनुग्रह, दया और मनुष्य की निर्बलता के लिए उसकी करुणा है। यद्यपि ये चीजें भी परमेश्वर का प्रेम हैं, परंतु ये बहुत एकतरफा हैं, और ये वो प्राथमिक साधन नहीं हैं, जिनके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाता है। कुछ लोग बीमारी के कारण परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ करते हैं। यह बीमारी तुम्हारे लिए परमेश्वर का अनुग्रह है; इसके बिना तुम परमेश्वर में विश्वास न करते, और यदि तुम परमेश्वर में विश्वास न करते, तो तुम यहाँ तक न पहुँच पाते—और इस प्रकार यह अनुग्रह भी परमेश्वर का प्रेम है। यीशु में विश्वास करने के समय लोगों ने बहुत-कुछ ऐसा किया जो परमेश्वर को पसंद नहीं आया, क्योंकि वे सत्य नहीं समझते थे, फिर भी परमेश्वर में दया और प्रेमपूर्ण दयालुता है, और वह मनुष्य को यहाँ तक ले आया है, और यद्यपि मनुष्य कुछ नहीं समझता, फिर भी परमेश्वर मनुष्य को अपना अनुसरण करने देता है, और इससे भी बढ़कर, वह मनुष्य को वर्तमान समय तक ले आया है। क्या यह परमेश्वर का प्रेम नहीं है? परमेश्वर के स्वभाव में जो प्रकट होता है, वह परमेश्वर का प्रेम है—यह बिल्कुल सही है! जब कलीसिया का निर्माण अपने चरम पर पहुँच गया, तो परमेश्वर ने सेवाकर्ताओं के कार्य वाला कदम उठाया और मनुष्य को अथाह कुंड में डाल दिया। सेवाकर्ताओं के समय के सभी वचन शाप थे : तुम्हारी देह के शाप, तुम्हारे शैतानी भ्रष्ट स्वभाव के शाप, और तुमसे जुड़ी उन चीजों के शाप, जो परमेश्वर के इरादे पूरे नहीं करतीं। परमेश्वर ने अपने कार्य के उस चरण में जो व्यक्त किया, वह प्रताप था और उसके बाद जल्दी ही उसने ताड़ना के कार्य का चरण कार्यान्वित किया, और वहाँ मृत्यु का परीक्षण आया। ऐसे कार्य में मनुष्य ने परमेश्वर के क्रोध, प्रताप, न्याय और ताड़ना को देखा, परंतु साथ ही उसने परमेश्वर के अनुग्रह, उसकी प्रेमपूर्ण दयालुता और उसकी दया को भी देखा। वह सब जो परमेश्वर ने किया, और जो स्वभाव उसने व्यक्त किया, वह मनुष्य के प्रति परमेश्वर का प्रेम था, और वह सब जो परमेश्वर ने किया, वह मनुष्य की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए पर्याप्त था। उसने यह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए किया, और उसने मनुष्य को उसके आध्यात्मिक कद के अनुसार पोषण प्रदान किया। यदि परमेश्वर ने ऐसा न किया होता, तो मनुष्य परमेश्वर के समक्ष आने में असमर्थ रहता, और उसके पास परमेश्वर का असली चेहरा देखने का कोई उपाय न होता। जब से मनुष्य ने पहली बार परमेश्वर पर विश्वास करना आरंभ किया, तब से आज तक परमेश्वर ने मनुष्य को उसके आध्यात्मिक कद के अनुसार धीरे-धीरे पोषण प्रदान किया है, जिससे मनुष्य आंतरिक रूप से धीरे-धीरे उसे जान रहा है। वर्तमान समय में आकर ही मनुष्य अनुभव करता है कि परमेश्वर का न्याय कितना अद्भुत है। सृष्टि के समय से लेकर आज तक, सेवाकर्ताओं के कार्य का कदम, शाप के कार्य की पहली घटना थी। परमेश्वर ने मनुष्य को अथाह कुंड में फेंक दिए जाने का शाप दिया। यदि परमेश्वर ने ऐसा न किया होता, तो आज मनुष्य के पास परमेश्वर का सच्चा ज्ञान न होता; केवल शाप के द्वारा ही मनुष्य आधिकारिक रूप से परमेश्वर के स्वभाव का अनुभव कर पाया। सेवाकर्ताओं के परीक्षण के माध्यम से मनुष्य को उजागर किया गया। उसने देखा कि उसकी वफादारी में कमी है, उसका आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, वह परमेश्वर के इरादे पूरे करने में असमर्थ है, और उसने सिर्फ शब्दों से ही कहा कि उसे हर समय परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। यद्यपि सेवाकर्ताओं के कार्य के कदम में परमेश्वर ने मनुष्य को शापित किया, लेकिन अब पीछे मुड़कर देखें तो परमेश्वर के कार्य का वह कदम अद्भुत था : वह मनुष्य के लिए एक बड़ा मोड़ लेकर आया और उससे उसके जीवन-स्वभाव में एक बड़ा बदलाव आया। सेवाकर्ताओं के समय से पहले मनुष्य जीवन की खोज, परमेश्वर में विश्वास करने के अर्थ, या परमेश्वर के कार्य की बुद्धि के बारे में कुछ नहीं समझता था, न ही वह यह समझता था कि परमेश्वर अपने कार्य में मनुष्य का परीक्षण कर सकता है। सेवाकर्ताओं के समय से लेकर आज तक, मनुष्य देखता है कि परमेश्वर का कार्य कितना अद्भुत है, उसे वह अथाह लगता है, और वह देखता है कि अपने दिमाग का इस्तेमाल करके वह यह कल्पना करने में असमर्थ है कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है। वह यह भी देखता है कि उसका आध्यात्मिक कद कितना छोटा है और उसमें बहुत ज्यादा विद्रोहीपन है। जब परमेश्वर ने मनुष्य को शापित किया, तो वह एक प्रभाव प्राप्त करने के लिए था, और उसने उसकी जान नहीं ली। यद्यपि उसने मनुष्य को शाप दिया, लेकिन ऐसा उसने वचनों के जरिये किया; मनुष्य के साथ कुछ हुआ नहीं, क्योंकि जिसे परमेश्वर ने शापित किया वह मनुष्य की विद्रोहशीलता थी, इसलिए उसके शापों के वचन भी मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए बोले गए थे। परमेश्वर चाहे मनुष्य का न्याय करे या उसे शाप दे, ये दोनों ही मनुष्य को पूर्ण बनाते हैं : दोनों का उपयोग मनुष्य के भीतर जो अशुद्ध है, उसे पूर्ण बनाने के लिए किया जाता है। इस उपाय से मनुष्य का शोधन किया जाता है, और मनुष्य के भीतर जो कमी है, उसे परमेश्वर के वचनों और कार्य के द्वारा पूर्ण किया जाता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम—चाहे वे कठोर वचन हों या न्याय या ताड़ना—मनुष्य को पूर्ण बनाता है और बिल्कुल उचित होता है। युगों-युगों और पीढ़ियों से कभी परमेश्वर ने ऐसा कार्य नहीं किया है; आज वह तुम लोगों पर कार्य करता है और ऐसा करता है कि तुम लोग उसकी बुद्धि को पूरी तरह समझने लगो। यद्यपि तुम लोगों ने अंदर से कुछ कष्ट सहा है, फिर भी तुम्हारे हृदय हमेशा सुकून और शांति महसूस करते हैं; यह तथ्य कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के इस चरण का आनंद लेने में सक्षम हो, तुम लोगों का सौभाग्य है। भविष्य में तुम चाहे जो भी प्राप्त करने में सक्षम हो, तुम देखते हो कि आज तुम लोगों पर परमेश्वर का सारा कार्य प्रेम है। यदि मनुष्य परमेश्वर के न्याय और शोधन का अनुभव नहीं करता, केवल बाहरी तौर पर चीजें करता है और बाहरी उत्साह दिखाता है जबकि उसका स्वभाव कभी नहीं बदलता, तो क्या इसे परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया गया माना जाता है? आज, यद्यपि मनुष्य के भीतर अभी भी बहुत-कुछ ऐसा है जो घमंडी है, फिर भी मनुष्य का स्वभाव पहले की तुलना में बहुत ज्यादा स्थिर है। तुम्हारे प्रति परमेश्वर की काट-छाँट तुम्हें बचाने के लिए है, और यद्यपि तुम उस समय कुछ पीड़ा महसूस करो, फिर भी जब वह दिन आएगा जब तुम्हारा स्वभाव बदलेगा, तब तुम पीछे मुड़कर देखने पर पाओगे कि परमेश्वर का कार्य कितना बुद्धिमत्तापूर्ण है, और उस समय तुम परमेश्वर का इरादा सही मायने में समझ पाओगे। आज कुछ लोग ऐसे हैं, जो कहते हैं कि वे परमेश्वर का इरादा समझते हैं, परंतु यह बहुत व्यावहारिक नहीं है। वे झूठ बोल रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वर्तमान में उन्हें अभी यह पूरी तरह समझना बाकी है कि परमेश्वर का इरादा मनुष्य को बचाना है या मनुष्य को शाप देना। शायद तुम अभी इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, लेकिन जब वह दिन आएगा जब तुम देखोगे कि परमेश्वर के महिमा प्राप्त करने का दिन आ गया है और तुम देखोगे कि परमेश्वर से प्रेम करना कितना सार्थक है—क्योंकि यह तुम्हें मानव जीवन को जानने देता है और तुम्हारी देह को परमेश्वर से प्रेम करने की दुनिया में जीने देता है, जिससे तुम्हारी आत्मा को मुक्ति मिलती है, तुम्हारा जीवन आनंद से भर जाता है और तुम हमेशा परमेश्वर के करीब जाते हो और उसकी ओर देखते हो—तब तुम वास्तव में उस कार्य के अपार मूल्य को जानोगे जिसे परमेश्वर अभी करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 89

जो कार्य अब किया जा रहा है, वह लोगों से शैतान और अपने पूर्वज के खिलाफ विद्रोह करने के लिए किया जा रहा है। वचन के द्वारा सभी न्यायों का उद्देश्य लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करना और उन्हें जीवन का सार समझने में सक्षम बनाना है। ये बार-बार के न्याय लोगों के हृदयों को बेध देते हैं। प्रत्येक न्याय सीधे उनके भाग्यों से संबंधित होता है और उनके हृदयों को घायल करने के लिए होता है, ताकि वे उन सभी बातों को जाने दें और फलस्वरूप जीवन के बारे में जान जाएँ, इस गंदी दुनिया को जान जाएँ, परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को जान जाएँ, और मानवजाति को भी जान जाएँ, जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है। जितना अधिक इस प्रकार की ताड़ना और न्याय होता है, उतना ही अधिक मनुष्य का हृदय घायल किया जा सकता है और उतना ही अधिक उसकी आत्मा को जगाया जा सकता है। इस प्रकार के न्याय का लक्ष्य इन अत्यधिक भ्रष्ट और सबसे अधिक गहराई से भ्रमित लोगों की आत्माओं को जगाना है। मनुष्य के पास कोई आत्मा नहीं है, अर्थात् उसकी आत्मा बहुत पहले ही मर गई और वह नहीं जानता है कि स्वर्ग है, नहीं जानता कि परमेश्वर है, और निश्चित रूप से नहीं जानता कि वह मौत की अतल खाई में संघर्ष कर रहा है; वह संभवतः कैसे जान सकता है कि वह इस बुरे मानवीय नरक में जी रहा है? वह संभवतः कैसे जान सकता है कि उसका यह सड़ा हुआ शव शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद मृत्यु के रसातल में गिर गया है? वह संभवतः कैसे जान सकता है कि पृथ्वी पर सभी चीजें मानवजाति द्वारा बहुत पहले ही इतनी बरबाद कर दी गई हैं कि अब सुधारी नहीं जा सकतीं? और वह संभवतः कैसे जान सकता है कि आज सृष्टिकर्ता पृथ्वी पर आया है और भ्रष्ट किए गए लोगों के एक समूह की तलाश कर रहा है, जिसे वह बचा सके? भले ही मनुष्य ने हर संभव शोधन और न्याय का अनुभव किया है, उसकी संवेदनहीन चेतना पूरी तरह से अचल रही है और लगभग प्रतिक्रियाहीन है। मनुष्य कितना पतित है! और यद्यपि इस प्रकार का न्याय आसमान से गिरने वाले क्रूर ओलों के समान है, फिर भी वह मनुष्य के लिए सर्वाधिक लाभप्रद है। इस तरह से लोगों का न्याय किए बिना नतीजा हासिल नहीं किया जा सकता और लोगों को दुःख की अतल खाई से बचाना नितांत असंभव होगा। इस तरह कार्य किए बिना तो लोगों का रसातल से बाहर निकलना बहुत कठिन होगा, क्योंकि उनके हृदय बहुत पहले ही मर चुके हैं और उनकी आत्माओं को शैतान द्वारा बहुत पहले ही कुचल दिया गया है। पतन की गहराइयों में डूब चुके तुम लोगों को बचाने के लिए तुम्हें हर प्रयास कर पुकारने और तुम्हारा न्याय करने की आवश्यकता है; केवल तभी तुम लोगों के जमे हुए हृदयों को जगाया जा सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल पूर्ण बनाया गया मनुष्य ही सार्थक जीवन जी सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 90

सबसे पिछड़े और मलिन स्थान पर देहधारी होकर ही परमेश्वर अपने पवित्र और धार्मिक स्वभाव की समग्रता को प्रकट कर सकता है। और उसका धार्मिक स्वभाव किस चीज के जरिए प्रकट होता है? वह उसके द्वारा मनुष्य के पापों का न्याय करने, शैतान का न्याय करने, पाप से घृणा करने और उन शत्रुओं से उसकी घृणा के जरिए प्रकट होता है जो उसका प्रतिरोध और उसके खिलाफ विद्रोह करते हैं। मैं आज जो वचन बोलता हूँ, वे मनुष्य के पापों का न्याय करने के लिए, मनुष्य की अधार्मिकता का न्याय करने के लिए और मनुष्य के विद्रोहीपन को और मनुष्य की कुटिलता और धोखेबाजी को शाप देने के लिए हैं। मनुष्य के शब्दों और कर्मों में जो कुछ भी परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं है उस सबका न्याय होना चाहिए और मनुष्य का समस्त विद्रोहीपन पाप के रूप में ठहराया जाता है। उसके वचन न्याय के सिद्धांतों के इर्द-गिर्द घूमते हैं; वह अपने धार्मिक स्वभाव को प्रकट करने के लिए मनुष्य की अधार्मिकता के न्याय, मनुष्य की विद्रोहशीलता के शाप और मनुष्य के सभी कुरूप चेहरों को उजागर करने का उपयोग करता है। पवित्रता उसके धार्मिक स्वभाव का निरूपण है और दरअसल उसकी पवित्रता उसका धार्मिक स्वभाव है। तुम लोगों के भ्रष्ट स्वभाव आज के वचनों के प्रसंग हैं—मैं उनके अनुसार बोलता हूँ, न्याय करता हूँ और विजय के कार्य को कार्यान्वित करता हूँ। मात्र यही व्यावहारिक कार्य है और केवल इसी तरह से परमेश्वर की पवित्रता पूरी तरह से प्रमुखता पा सकती है। अगर तुममें भ्रष्ट स्वभाव का कोई निशान नहीं है तो परमेश्वर तुम्हारा न्याय नहीं करेगा, न ही वह तुम्हें अपना धार्मिक स्वभाव दिखाएगा। चूँकि तुममें भ्रष्ट स्वभाव हैं, इसलिए परमेश्वर तुम्हें छोड़ेगा नहीं और इसी के जरिए उसकी पवित्रता दिखती है। अगर परमेश्वर देखता कि मनुष्य की मलिनता और विद्रोहशीलता बहुत भयंकर हैं, लेकिन वह न तो बोलता, न तुम्हारा न्याय करता, न तुम्हारी अधार्मिकता के लिए तुम्हें ताड़ना देता, तो इससे यह साबित हो जाता कि वह परमेश्वर नहीं है, क्योंकि उसे पाप से कोई घृणा न होती; वह मनुष्य जितना ही मलिन होता। आज मैं तुम्हारी मलिनता के कारण ही तुम्हारा न्याय कर रहा हूँ, और तुम्हारी भ्रष्टता और विद्रोहशीलता के कारण ही तुम्हें ताड़ना दे रहा हूँ। मैं तुम लोगों के सामने अपने सामर्थ्य की अकड़ नहीं दिखा रहा या जानबूझकर तुम लोगों का दमन नहीं कर रहा; मैं ऐसा इसलिए कर रहा हूँ, क्योंकि इस मलिन धरती पर पैदा हुए तुम लोग मलिनता से बुरी तरह दूषित हो गए हो। तुम लोगों ने गंदी जगहों पर रहने वाले सूअर की तरह अपनी सत्यनिष्ठा और मानवीयता खो दी है। तुम्हारी मलिनता और भ्रष्टता की वजह से ही तुम्हारा न्याय किया जाता है और मैं तुम पर अपना क्रोध बरसाता हूँ। ठीक इन वचनों के न्याय की वजह से ही तुम यह देख पाए हो कि परमेश्वर धार्मिक परमेश्वर है और परमेश्वर पवित्र परमेश्वर है; ठीक अपनी पवित्रता और धार्मिकता की वजह से ही वह तुम लोगों का न्याय करता है और तुम लोगों पर अपना क्रोध बरसाता है; ठीक मानवजाति की विद्रोहशीलता को देखने की वजह से ही वह अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करता है। मानवजाति की मलिनता और भ्रष्टता उसकी पवित्रता को प्रकट करती है। यह दिखाने के लिए यह पर्याप्त है कि वह स्वयं परमेश्वर है, जो पवित्र और निष्कलंक है और फिर भी मलिनता की धरती पर रहता है। यदि कोई व्यक्ति दूसरों के साथ कीचड़ में लोटता है और उसके बारे में कुछ भी पवित्र नहीं है, और उसके पास कोई धार्मिक स्वभाव नहीं है तो वह मनुष्य की अधार्मिकता का न्याय करने के योग्य नहीं है, न ही वह मनुष्य पर न्याय को कार्यान्वित करने के योग्य है। जो लोग एक-दूसरे के समान ही मलिन हैं, वे अपने जैसे लोगों का न्याय करने के योग्य कैसे हो सकते हैं? केवल स्वयं पवित्र परमेश्वर ही पूरी मलिन मानवजाति का न्याय कर सकता है। मनुष्य के पापों का न्याय मनुष्य कैसे कर सकता है? मनुष्य के पाप मनुष्य कैसे देख सकता है और मनुष्य किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के योग्य कैसे हो सकता है? अगर परमेश्वर मनुष्य के पापों का न्याय करने योग्य न होता, तो वह स्वयं धार्मिक परमेश्वर कैसे हो सकता था? चूँकि लोग भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं, इसलिए उनका न्याय करने के लिए परमेश्वर बोलता है और केवल तभी वे देख पाते हैं कि वह एक पवित्र परमेश्वर है। परमेश्वर मनुष्य के पापों के कारण उसका न्याय करता है और उसे ताड़ना देता है और इन पापों को उजागर करता है। इस न्याय से न कोई व्यक्ति बच सकता है, न ही कोई चीज। जो कुछ भी मलिन है, उस सबका वह न्याय करता है। केवल इसी तरह से प्रकट होता है कि परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है। अगर इससे अलग कुछ होता, तो यह कैसे कहा जा सकता था कि तुम लोग नाम और तथ्य दोनों से विषमता हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय-कार्य के दूसरे चरण के प्रभावों को कैसे प्राप्त किया जाता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 91

इजराइल में किए गए कार्य में और आज के कार्य में बहुत बड़ा अंतर है। यहोवा ने इजराइलियों के जीवन का मार्गदर्शन किया, तो उस समय इतनी ताड़ना और न्याय नहीं था, क्योंकि उस वक्त लोग दुनियादारी बहुत ही कम समझते थे और उनमें भ्रष्ट स्वभाव नहीं के बराबर थे। तब इजराइली पूरी तरह से यहोवा की आज्ञा का पालन करते थे। जब उसने उन्हें वेदियों का निर्माण करने के लिए कहा, तो उन्होंने जल्दी से वेदियों का निर्माण कर दिया; जब उसने उन्हें याजकों का पोशाक पहनने के लिए कहा, तो उन्होंने उसकी आज्ञा का पालन किया। उन दिनों यहोवा भेड़ों के झुंड की देखभाल करने वाले चरवाहे की तरह था, जिसके मार्गदर्शन में भेड़ें हरे-भरे मैदान में घास चरती थीं; यहोवा ने उनकी ज़िंदगी को राह दिखाई, उनके खाने, पहनने, रहने और यात्रा करने में उनकी अगुआई की। वह समय परमेश्वर के स्वभाव को प्रकट करने का नहीं था, क्योंकि उस समय मनुष्य नवजात था; कुछ ही लोग थे, जो विद्रोही और प्रतिरोधी थे, मनुष्यों में मलिनता अधिक नहीं थी, इसलिए लोग परमेश्वर के स्वभाव के लिए विषमता नहीं बन सकते थे। परमेश्वर की पवित्रता मलिनता की धरती से आए लोगों के माध्यम से स्पष्ट होती है; आज वह मलिनता की धरती के इन लोगों में प्रकट होने वाली मलिनता का इस्तेमाल करता है, वह न्याय करता है और ऐसा करते समय उसके न्याय में उसका स्वरूप प्रकट होता है। वह न्याय क्यों करता है? वह न्याय के वचन इसलिए बोल पाता है, क्योंकि वह पाप से अत्यधिक घृणा करता है; अगर वह मनुष्य की विद्रोहशीलता से घृणा न करता, तो वह इतना क्रोधित कैसे हो सकता था? अगर उसके अंदर अत्यधिक घृणा न होती, कोई नफरत न होती, अगर वह लोगों की विद्रोहशीलता की ओर कोई ध्यान न देता, तो इससे वह मनुष्य जितना ही मलिन प्रमाणित हो जाता। वह मनुष्य का न्याय और उसकी ताड़ना इसलिए कर सकता है, क्योंकि उसे मलिनता से घृणा है, और जिस मलिनता से वह अत्यधिक घृणा करता है, वह उसके अंदर नहीं है। अगर उसके अंदर भी प्रतिरोध और विद्रोहशीलता होती, तो वह प्रतिरोधी और विद्रोही लोगों से अत्यधिक घृणा न करता। अगर अंत के दिनों का कार्य अभी भी इस्राएल में किया गया होता, तो उसका कोई मतलब न होता। अंत के दिनों का कार्य सबसे अंधकारमय और सबसे पिछड़े स्थान चीन में ही क्यों किया जा रहा है? यह सब परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता प्रकट करने के लिए है। संक्षेप में, स्थान जितना अधिक अंधकारमय होता है, परमेश्वर की पवित्रता उतनी ही अधिक प्रकट की जा सकती है। दरअसल, यह सब परमेश्वर के कार्य के लिए है। केवल आज तुम लोगों को यह एहसास हुआ है कि परमेश्वर तुम लोगों के बीच खड़ा रहने के लिए स्वर्ग से धरती पर उतर आया है, जो तुम लोगों की मलिनता और विद्रोहशीलता द्वारा प्रमुखता से दिखाया गया है, और केवल अब तुम लोग परमेश्वर को जानते हो। क्या यह सबसे बड़ा उत्कर्ष नहीं है? दरअसल, तुम लोग चीन में लोगों का वह समूह हो, जिन्हें चुना गया था। और चूँकि तुम्हें चुना गया था और तुमने परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लिया है, लेकिन चूँकि तुम लोग ऐसे महान अनुग्रह का आनंद लेने के लिए उपयुक्त नहीं हो, इसलिए इससे साबित होता है कि यह सब तुम लोगों के लिए सर्वोच्च उत्कर्ष है। परमेश्वर तुम लोगों के समक्ष आया है और उसने तुम लोगों के सामने पूरी समग्रता में अपना पवित्र स्वभाव प्रकट किया है, उसने तुम लोगों को वह सब दिया है और उन तमाम आशीषों का आनंद लेने दिया है जिनका तुम लोग आनंद ले सकते थे। तुम लोगों ने न केवल परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का स्वाद लिया है, बल्कि इससे भी बढ़कर, तुम लोग परमेश्वर के उद्धार का, परमेश्वर के छुटकारे का और परमेश्वर के असीम और अनंत प्रेम का स्वाद भी ले चुके हो। तुम लोगों ने, जो कि सबसे मलिन हो, ऐसे महान अनुग्रह का आनंद लिया है—क्या तुम धन्य नहीं हो? क्या यह परमेश्वर द्वारा तुम लोगों को ऊपर उठाना नहीं है? तुम लोगों का दर्जा निम्नतम है; तुम लोग स्वाभाविक तौर पर ऐसे महान आशीष का आनंद उठाने के योग्य नहीं हो, फिर भी परमेश्वर ने तुम्हें अपवाद के रूप में उन्नत किया है। क्या तुम्हें शर्म नहीं आती? अगर तुम अपना कर्तव्य नहीं निभा पाते, तो अंततः तुम्हें अपने आप पर शर्म आएगी, और तुम स्वयं को दंडित करोगे। आज तुम्हें न तो अनुशासित किया गया है, न ही तुम्हें दंड दिया गया है; तुम्हारी देह एकदम सही-सलामत है—लेकिन अंततः ये वचन तुम्हें शर्मिंदा करेंगे। आज तक मैंने किसी को भी खुले आम ताड़ना नहीं दी है; हो सकता है कि मेरे वचन सख्त हों, लेकिन मैं लोगों से किस तरह पेश आता हूँ? मैं उन्हें सांत्वना देता हूँ, प्रोत्साहन देता हूँ और याद दिलाता हूँ। मैं ऐसा किसी और कारण से नहीं, बल्कि तुम लोगों को बचाने के लिए करता हूँ। क्या तुम लोग सचमुच मेरे इरादों को नहीं समझते? मैं जो कुछ भी कहता हूँ, उसे तुम सभी लोगों को समझना चाहिए और उससे प्रेरित होना चाहिए। केवल अब जाकर कई लोग समझते हैं : क्या यह आशीष सटीक रूप से विषमता होने के कारण नहीं आता है? क्या विषमता होना सर्वाधिक धन्य चीज़ नहीं है? अंततः, जब तुम सुसमाचार का प्रचार करने जाओगे, तो तुम लोग यह बात कहोगे : “हम विशिष्ट विषमताएँ हैं।” वे तुमसे पूछेंगे, “तुम्हारे विशिष्ट विषमता होने के क्या मायने हैं?” और तुम कहोगे, “हम परमेश्वर के कार्य और उसके महान सामर्थ्य के लिए विषमता हैं। हमारी विद्रोहशीलता परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की समग्रता को प्रकाश में लाती है; हम लोग अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य की सेवा करने वाले हैं, हम लोग उसके कार्य की लटकन हैं और उसके औज़ार भी हैं।” जब वे सुनेंगे, तो उन्हें कुतूहल होगा। तुम आगे कहोगे : “हम लोग परमेश्वर के पूरे ब्रह्मांड के कार्य की पूर्णता और मानव-जाति पर उसकी विजय के नमूने और प्रतिमान हैं। हम लोग पवित्र हों या मलिन, कुल मिलाकर, हम लोग अभी भी तुम लोगों से अधिक धन्य हैं, क्योंकि हमने परमेश्वर को देखा है, और उसके द्वारा हमें जीते जाने के अवसर के जरिये परमेश्वर का महान सामर्थ्य जाहिर होता है; केवल हम लोगों के मलिन और भ्रष्ट होने के कारण ही उसका धार्मिक स्वभाव प्रमुखता से उभरा है। क्या तुम लोग इस प्रकार अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य की गवाही देने में सक्षम हो? तुम लोग पात्र नहीं हो! यह हमारे लिए परमेश्वर के उत्कर्ष के सिवा कुछ नहीं है! भले ही हम अहंकारी न हों, हम गर्व से परमेश्वर की स्तुति कर सकते हैं, क्योंकि कोई भी इस तरह की महान प्रतिज्ञा प्राप्त नहीं कर सकता, और कोई भी ऐसे महान आशीष का आनंद नहीं ले सकता। हम सचमुच कृतज्ञ महसूस करते हैं कि हम लोग, जो कि इतने मलिन हैं, परमेश्वर के प्रबंधन के दौरान विषमता के रूप में कार्य कर सकते हैं।” और जब वे पूछेंगे, “नमूने और प्रतिमान क्या होते हैं?” तो तुम कहोगे, “मानव-जाति में हम लोग सबसे विद्रोही और मलिन हैं; हमें शैतान द्वारा सबसे ज्यादा गहराई से भ्रष्ट किया गया है और हम देह के सबसे अधिक पिछड़े हुए और निम्न लोग हैं। हम लोग शैतान द्वारा इस्तेमाल किए गए लोगों के विशिष्ट उदाहरण हैं। आज हम जीते जाने के लिए परमेश्वर द्वारा मानवजाति में से चुने गए पहले लोग हैं, और हमने परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का अवलोकन किया है और उसकी प्रतिज्ञा को प्राप्त किया है; और हम और अधिक लोगों को जीतने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं, इस प्रकार हम मानव-जाति के बीच जीते जाने वालों के नमूने और प्रतिमान हैं।” इन शब्दों से बेहतर कोई और गवाही नहीं है, और यह तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ अनुभव है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय-कार्य के दूसरे चरण के प्रभावों को कैसे प्राप्त किया जाता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 92

तुम लोगों पर किया गया विजय का कार्य गहनतम अर्थ रखता है : एक ओर, इस कार्य का उद्देश्य लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाना है, और इसलिए पूर्ण करना है, ताकि वे विजेताओं का एक समूह बन सकें—पूर्ण किए गए लोगों का प्रथम समूह, अर्थात प्रथम फल। दूसरी ओर, यह सृजित प्राणियों को परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेने देना, परमेश्वर के पूर्ण और महानतम उद्धार को प्राप्त करने देना और मनुष्य को न केवल उसकी दया और प्रेमपूर्ण करुणा का, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से ताड़ना और न्याय का आनंद लेने देना है। संसार की सृष्टि से अब तक परमेश्वर ने जो कुछ अपने कार्य में किया है, वह प्रेम ही है, जिसमें मनुष्य के लिए कोई घृणा नहीं है। यहाँ तक कि जो ताड़ना और न्याय तुमने देखे हैं, वे भी प्रेम ही हैं, अधिक सच्चा और अधिक वास्तविक प्रेम, ऐसा प्रेम जो लोगों को मानव-जीवन के सही मार्ग पर ले जाता है। तीसरी ओर, यह शैतान के समक्ष गवाही देना है। और चौथी ओर, यह भविष्य के सुसमाचार के कार्य को फैलाने की नींव रखना है। जो समस्त कार्य वह कर चुका है, उसका उद्देश्य लोगों को मानव-जीवन के सही मार्ग पर ले जाना है, ताकि वे सामान्य मानवीय जीवन जी सकें, क्योंकि लोग नहीं जानते कि कैसे जीएँ, और बिना मार्गदर्शन के तुम केवल एक खोखला जीवन जियोगे; तुम्हारा जीवन मूल्यहीन और निरर्थक होगा, और तुम एक सामान्य व्यक्ति बनने में बिल्कुल असमर्थ रहोगे। यह मनुष्य को जीते जाने का गहनतम अर्थ है। तुम सब लोग मोआब के वंशज हो; तुम लोगों में किया जाने वाला जीते जाने का कार्य तुम्हारा महान उद्धार है। तुम सब पाप और व्यभिचार की धरती पर रहते हो; और तुम सब व्यभिचारी और पापी हो। आज तुम लोग न केवल परमेश्वर को देख सकते हो, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण रूप से, तुम लोगों ने ताड़ना और न्याय प्राप्त किया है, तुमने यह गहनतम उद्धार प्राप्त किया है, दूसरे शब्दों में, तुमने परमेश्वर का महानतम प्रेम प्राप्त किया है। परमेश्वर जो कुछ करता है, वह तुम लोगों के लिए सच्चा प्रेम है। वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता। यह तुम लोगों के पापों के कारण है कि वह तुम लोगों का न्याय करता है, ताकि तुम लोग आत्म-चिंतन करो और यह जबरदस्त उद्धार प्राप्त करो। यह सारा कार्य मनुष्य को पूर्ण करने के प्रयोजन से किया जाता है। प्रारंभ से लेकर अंत तक, परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए भरसक कोशिश कर रहा है, और अपने ही हाथों से बनाए हुए लोगों को पूर्णतया नष्ट करने की उसकी बिल्कुल इच्छा नहीं है। आज वह कार्य करने के लिए तुम लोगों के बीच आया है; क्या यह और भी बड़ा उद्धार नहीं है? अगर वह तुम लोगों से नफरत करता, तो क्या फिर भी वह व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? वह इस प्रकार कष्ट क्यों उठाए? परमेश्वर तुम लोगों से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम लोगों को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम सर्वाधिक वास्तविक है। केवल लोगों के विद्रोही होने के कारण ही उसे न्याय के माध्यम से उन्हें बचाना पड़ता है; वरना उन्हें बचाना तब भी असंभव होता। क्योंकि तुम लोग नहीं जानते कि अपने जीवन कैसे जिएँ, और नहीं जानते कि कैसे जीना चाहिए, और चूँकि तुम लोग इस व्यभिचारी और पापमय भूमि पर जीते हो और स्वयं व्यभिचारी और गंदे दानव हो, इसलिए वह सह नहीं सकता कि तुम और अधिक पतित बनते जाओ, वह तुम लोगों को इस मलिन भूमि पर उस तरह से रहते हुए देख नहीं सकता जैसे तुम अभी जी रहे हो, शैतान द्वारा उसकी इच्छानुसार कुचले जाते हुए, और वह नहीं सह सकता कि तुम्हें रसातल में गिरने दे। वह केवल लोगों के इस समूह को प्राप्त करना और तुम लोगों को पूर्णतः बचाना चाहता है। तुम लोगों पर विजय का कार्य करने का यह मुख्य उद्देश्य है—यह उद्धार के लिए है। यदि तुम नहीं देख सकते कि जो कुछ तुम पर किया जा रहा है, वह प्रेम और उद्धार है, यदि तुम सोचते हो कि यह मनुष्य को यातना देने की एक पद्धति, एक तरीका भर है और विश्वास के लायक नहीं है, तो तुम पीड़ा और कठिनाई सहने के लिए वापस अपने संसार में ही लौट जाओ! यदि तुम इस धारा में इस न्याय और अमित उद्धार, और इन सब आशीषों का जो मनुष्य के संसार में कहीं न पाए जा सकते और इस प्रेम का आनंद उठाने के इच्छुक हो, तो अच्छा है : विजय के कार्य को स्वीकार करने के लिए इस धारा में बने रहो, ताकि तुम्हें पूर्ण बनाया जा सके। परमेश्वर के न्याय के कारण आज तुम कुछ कष्ट और शोधन सहते हो, लेकिन यह कष्ट मूल्यवान और अर्थपूर्ण है। यद्यपि मनुष्य के लिए परमेश्वर की ताड़ना और न्याय शोधन हैं, निर्दयतापूर्ण प्रकाशन हैं और उसके पापों के लिए उसे सज़ा देने और उसके देह को सज़ा देने के उद्देश्य से की गई चीजें हैं, फिर भी इस कार्य का कुछ भी उनके देह की निंदा करने और उसे नष्ट करने के इरादे से नहीं है। वचन का कठोर प्रकाशन तुम्हें सही मार्ग पर ले जाने के उद्देश्य से है। तुम लोगों ने इस कार्य का बहुत-कुछ व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है, और स्पष्टतः, यह तुम्हें बुरे मार्ग पर नहीं ले गया है! यह सब तुम्हें सामान्य मानवता को जीने योग्य बनाने के लिए है; और यह सब तुम्हारी सामान्य मानवता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम तुम्हारी आवश्यकताओं पर आधारित है, तुम्हारी दुर्बलताओं के अनुसार है, और तुम्हारे वास्तविक आध्यात्मिक कद के अनुसार है, और तुम लोगों पर कोई असहनीय बोझ नहीं लादा गया है। यह आज तुम्हें स्पष्ट नहीं है, और तुम्हें लगता है कि मैं तुम पर कठोर हो रहा हूँ, और तुम सदैव यह विश्वास करते हो कि मैं तुम्हें प्रतिदिन इसलिए ताड़ना देता हूँ, इसलिए तुम्हारा न्याय करता हूँ और इसलिए तुम्हारी भर्त्सना करता हूँ, क्योंकि मैं तुमसे घृणा करता हूँ। किंतु यद्यपि जो तुम प्राप्त करते हो, वह ताड़ना और न्याय है, किंतु वास्तव में यह तुम्हारे लिए प्रेम है, और यह सबसे बड़ी सुरक्षा है। यदि तुम इस कार्य के गहन अर्थ को नहीं समझ सकते, तो तुम्हारे लिए अनुभव जारी रखना असंभव होगा। तुम्हें इस उद्धार से आश्वासन प्राप्त करना चाहिए। होश में आने से इनकार मत करो। इतनी दूर आकर तुम्हें विजय के कार्य का अर्थ स्पष्ट दिखाई देना चाहिए, और तुम्हें अब और इसके बारे में ऐसी-वैसी राय नहीं रखनी चाहिए!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (4)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 93

जो अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के दौरान अडिग रहने में समर्थ हैं—यानी, शुद्धिकरण के अंतिम कार्य के दौरान—वे लोग होंगे, जो परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे; तो वे सभी जो विश्राम में प्रवेश करेंगे, शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके होंगे और परमेश्वर के शुद्धिकरण के अंतिम कार्य से गुजरने के बाद ही उसके द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे। ये लोग, जो अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे, अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर ताड़ना और न्याय का कार्य मूलतः मानवता को शुद्ध करने और विश्राम के अंतिम दिन की खातिर करता है; अन्यथा मानवता का कोई भी सदस्य अपनी किस्म के अनुसार छांटा नहीं जा सकेगा या विश्राम में प्रवेश नहीं कर सकेगा। यह कार्य ही मानवता के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। परमेश्वर का शुद्धिकरण का कार्य ही मनुष्यों को उनकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा और उसका ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानवता के उन विद्रोही तत्वों को उजागर करेगा, और इस तरह बचाए जा सकने वालों को बचाए न जा सकने वालों से अलग करेगा और जो बचे रह सकते हैं उनसे उन्हें अलग करेगा जो बचे नहीं रह सकते हैं। इस कार्य के समाप्त होने पर जो लोग बचे रह सकते हैं वे सब शुद्ध किए जाएँगे और मानवता के उच्चतर क्षेत्र में प्रवेश करेंगे जहाँ वे पृथ्वी पर और अधिक अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का आनंद उठाएंगे; दूसरे शब्दों में, वे मानवता के विश्राम के दिन में प्रवेश करेंगे और परमेश्वर के साथ जिएंगे। जो बचे नहीं रह सकते हैं उनकी ताड़ना और उनका न्याय किए जाने के बाद उनके असली रूप पूरी तरह उजागर हो जाएँगे; उसके बाद वे सब के सब नष्ट कर दिए जाएँगे और शैतान के समान उन्हें पृथ्वी पर जीवित रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवता में इस किस्म के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ऐसे लोग अंतिम विश्राम की धरती पर प्रवेश करने के योग्य नहीं हैं, न ही वे उस विश्राम के दिन में प्रवेश के योग्य हैं जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे, क्योंकि वे दंड के लक्ष्य हैं और वे धार्मिक लोग नहीं, बल्कि बुरे लोग हैं। उन्हें एक बार छुटकारा दिया गया था और उन्हें न्याय और ताड़ना भी दी गई थी; उन्होंने एक बार परमेश्वर के लिए मजदूरी भी की थी। लेकिन जब अंतिम दिन आएगा तो उन्हें अब भी अपनी बुराई के कारण और अपनी विद्रोहशीलता और असाध्यता के परिणामस्वरूप निकाल दिया और नष्ट कर दिया जाएगा; वे भविष्य के संसार में अब कभी नहीं जिएंगे और कभी भविष्य की मानवजाति के बीच नहीं रहेंगे। जैसे ही मानवता के पावनीकृत जन विश्राम में प्रवेश करेंगे, चाहे वे मृत लोगों की आत्मा हों या अभी भी देह में रह रहे लोग, सभी बुराई करने वाले और वे सभी जिन्हें बचाया नहीं गया है, नष्ट कर दिए जाएँगे। जहाँ तक इन बुरा करने वाली आत्माओं और मनुष्यों, या धार्मिक लोगों की आत्माओं और धार्मिकता करने वालों की बात है, चाहे वे जिस युग में हों, जो भी बुरे हैं वे सभी नष्ट हो जाएँगे और जो लोग धार्मिक हैं, वे बच जाएँगे। किसी व्यक्ति या आत्मा को उद्धार प्राप्त होगा या नहीं, यह पूर्णतः अंत के युग के कार्य के आधार पर तय नहीं होता है; बल्कि यह इससे निर्धारित होता है कि क्या वह परमेश्वर का प्रतिरोध या उससे विद्रोह कर चुका है कि नहीं। पिछले युग में जिन लोगों ने बुरा किया और जो बचाए नहीं जा सके वे निःसंदेह दंड के भागी बनेंगे और वे जो इस युग में बुरा करते हैं और उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते, तो वे भी निश्चित रूप से दंड के भागी बनेंगे। मनुष्य अच्छे और बुरे के आधार पर श्रेणीबद्ध किए जाते हैं, न कि उस युग के आधार पर जिसमें वे जीते हैं। एक बार इस प्रकार वर्गीकृत किए जाने पर, उन्हें तुरंत दंड या पुरस्कार नहीं दिया जाएगा; बल्कि, परमेश्वर अंत के दिनों में अपने विजय के कार्य को समाप्त करने के बाद ही बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने का अपना कार्य करेगा। वास्तव में, वह मनुष्यों को तब से अच्छे और बुरे में पृथक कर रहा है, जबसे उसने मानवजाति के उद्धार का अपना कार्य आरंभ किया था। बात बस इतनी है कि वह धार्मिकों को पुरस्कृत और दुष्टों को दंड देने का कार्य केवल तब करेगा, जब उसका कार्य समाप्त हो जाएगा; ऐसा नहीं है कि वह अपने कार्य के पूरा होने पर उन्हें श्रेणियों में पृथक करेगा और फिर तुरंत दुष्टों को दंडित करना और धार्मिकों को पुरस्कृत करना शुरू करेगा। बल्कि, यह कार्य तभी किया जाएगा, जब उसका कार्य पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगा। बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने के परमेश्वर के अंतिम कार्य के पीछे का एकमात्र उद्देश्य, सभी मनुष्यों को पूरी तरह शुद्ध करना है, ताकि वह पूरी तरह पावनीकृत मानवता को शाश्वत विश्राम में ला सके। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण है; यह उसके समस्त प्रबंधन-कार्य का अंतिम चरण है। यदि परमेश्वर ने कुकर्मियों का नाश न किया, बल्कि उन्हें बचे रहने दिया तो सारी की सारी मानवजाति अभी भी विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थ होगी और परमेश्वर उसे एक अधिक अद्भुत क्षेत्र में नहीं ला पाएगा। ऐसा कार्य पूरी तरह समाप्त नहीं होगा। जब उसका कार्य समाप्त होगा तो संपूर्ण मानवजाति पूर्णतः पावनीकृत हो जाएगी; केवल इसी तरीके से परमेश्वर शांतिपूर्वक विश्राम में रह सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 94

मेरे पदचिह्न पूरे ब्रह्मांड में और पृथ्वी के सिरों तक जाते हैं, मेरी आँखें लगातार हर व्यक्ति की जाँच करती हैं, और इससे भी अधिक, मैं ब्रह्मांड को पूरा देखता हूँ। मेरे वचन वास्तव में ब्रह्मांड के हर कोने में कार्य कर रहे हैं। जो कोई भी मेरे लिए सेवा प्रदान नहीं करने का साहस करता है, जो कोई भी मेरे प्रति वफ़ादार नहीं होने का साहस करता है, जो कोई भी मेरे नाम की आलोचना करने का साहस करता है, और जो कोई भी मेरे पुत्रों को बुरा-भला कहने और उनकी बदनामी करने का साहस करता है—जो वास्तव में इन चीज़ों को करने में सक्षम हैं, उन्हें कठोर न्याय से गुज़रना ही होगा। मेरा न्याय अपनी पूरी समग्रता में पड़ेगा, जिसका अर्थ है कि अब न्याय का युग है, और सतर्क अवलोकन से तुम पाओगे कि मेरा न्याय पूरे ब्रह्मांड की दुनिया में फैला हुआ है। निस्संदेह, मेरा घर भी नहीं छूटेगा; जिनके विचार, शब्द और कार्यकलाप मेरे इरादों से मेल नहीं खाते हैं, उनका न्याय किया जाएगा। इसे समझो! मेरा न्याय समस्त ब्रह्मांड की दुनिया पर निर्देशित है, लोगों या चीज़ों के एक समूह मात्र पर नहीं। क्या तुम इसे समझ रहे हो? यदि भीतर से तुम अपने विचारों में मुझे लेकर दुविधा में हो, तो अंदर से तुरंत तुम्हारा न्याय किया जाएगा।

मेरा न्याय सभी आकारों और रूपों में आता है। यह जान लो! मैं ब्रह्मांड की दुनिया का अद्वितीय और बुद्धिमान परमेश्वर हूँ! कुछ भी मेरे सामर्थ्य से परे नहीं है। मेरे सभी न्याय तुम लोगों पर प्रकट किए जाते हैं : यदि तुम अपने विचारों में मुझे लेकर दुविधा में हो, तो एक चेतावनी के रूप में मैं तुम्हें प्रबुद्ध करूँगा। यदि तुम नहीं सुनोगे, तो मैं तुरंत तुम्हें त्याग दूँगा (इसमें मैं अपने नाम पर संदेह करने को नहीं, बल्कि दैहिक सुखों से संबंधित बाहरी व्यवहारों को संदर्भित कर रहा हूँ)। यदि मेरे प्रति तुम्हारे विचार अवज्ञापूर्ण हैं, यदि तुम मुझसे शिकायत करते हो, यदि तुम शैतान के विचारों को बार-बार स्वीकार करते हो, और यदि तुम जीवन की भावनाओं का अनुसरण नहीं करते, तो तुम्हारी आत्मा अँधेरे में रहेगी और तुम्हारी देह पीड़ा भुगतेगी। तुम्हें मेरे करीब आना चाहिए। तुम संभवतः केवल एक या दो दिनों में ही अपनी सामान्य स्थिति बहाल करने में असमर्थ रहोगे, और तुम्हारा जीवन स्पष्ट रूप से बहुत पीछे रह जाएगा। जो लोग वाणी से स्वच्छंद हैं, मैं तुम लोगों के मुँह और ज़बान को अनुशासित कर दूँगा और तुम्हारी ज़बान की काट-छाँट करवा दूँगा। जो लोग कर्म में असंयमित रूप से स्वच्छंद हैं, मैं तुम लोगों को तुम्हारी आत्मा में चेतावनी दूँगा, और जो लोग नहीं सुनेंगे, उन्हें गंभीर रूप से ताड़ना दूँगा। जो लोग खुले आम मेरी आलोचना और अवज्ञा करते हैं, जो वचन या कर्म से समर्पण की कमी प्रदर्शित करते हैं, मैं उन्हें पूरी तरह से हटा दूँगा और उनका त्याग कर दूँगा, उनके नष्ट होने और उनके उच्चतम आशीषों के खोने का कारण बनूँगा; ये वे लोग हैं, जो चुने जाने के बाद हटा दिए जाएँगे। जो लोग अज्ञानी हैं, अर्थात्, जिनकी दृष्टि स्पष्ट नहीं है, मैं फिर भी उन्हें प्रबुद्ध करूँगा और बचाऊँगा; लेकिन जो लोग सत्य को समझते हैं, परंतु फिर भी उसका अभ्यास नहीं करते, उन्हें पूर्वोक्त नियमों के अनुसार प्रशासित किया जाएगा, चाहे वे अज्ञानी हों या न हों। जहाँ तक उन लोगों की बात है, जिनके इरादे शुरू से ही ग़लत हैं, मैं उन्हें हमेशा के लिए वास्तविकता को समझने में असमर्थ बना दूँगा और अंततः वे धीरे-धीरे, एक-एक करके, हटा दिए जाएँगे। एक भी नहीं बचेगा, हालाँकि वे अभी मेरी व्यवस्था के अनुसार बने हुए हैं (क्योंकि मैं चीज़ों को जल्दबाज़ी में नहीं, बल्कि व्यवस्थित ढंग से करता हूँ)।

मेरा न्याय पूरी तरह से प्रकट है; यह विभिन्न लोगों को संबोधित करता है, उन सबको अपने उचित स्थान ले लेने चाहिए। मैं लोगों का प्रशासन और न्याय उनके द्वारा तोड़े गए नियमों के अनुसार करूँगा। जहाँ तक उनकी बात है, जो इस नाम में नहीं हैं और जो अंत के दिनों के मसीह को स्वीकार नहीं करते, उन पर केवल एक ही नियम लागू होता है : जो कोई मेरी अवज्ञा करेंगे, मैं तुरंत उनकी आत्मा, जीव और देह ले लूँगा और उन्हें अधोलोक में फेंक दूँगा; जो मेरी अवज्ञा नहीं करते, मैं दूसरा न्याय करने से पहले तुम लोगों के परिपक्व होने की प्रतीक्षा करूँगा। मेरे वचन हर चीज़ पूरी स्पष्टता के साथ समझाते हैं और कुछ भी छिपा हुआ नहीं है। मैं केवल यह आशा करता हूँ कि तुम लोग हर समय उन्हें ध्यान में रखने में सक्षम होगे!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 67

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 95

अंत के दिन वे हैं जब सभी वस्तुएँ विजय के जरिए अपनी किस्म के अनुसार छाँटी जाएँगी। विजय, अंत के दिनों का कार्य है; दूसरे शब्दों में, प्रत्येक व्यक्ति के पापों का न्याय करना, अंत के दिनों का कार्य है। अन्यथा, लोगों की छँटाई उनकी किस्म के अनुसार कैसे की जा सकेगी? तुम लोगों के बीच किस्म के अनुसार की जाने वाली छँटाई का कार्य सम्पूर्ण ब्रह्मांड में ऐसे कार्य का आरंभ है। इसके पश्चात सभी देशों के लोगों और तमाम लोगों को भी विजय-कार्य को स्वीकार करना होगा। इसका अर्थ यह है कि सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति की अपनी किस्म के अनुसार छँटाई होगी और उसे न्याय के लिए न्याय के सिंहासन के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा। कोई भी व्यक्ति और कोई भी वस्तु इस ताड़ना और न्याय को सहने से बच नहीं सकती और न ही कोई व्यक्ति और वस्तु ऐसी है जिसकी किस्म के अनुसार छँटाई नहीं की जाती; प्रत्येक व्यक्ति की छँटाई की जाएगी, क्योंकि सभी चीजों के परिणाम निकट आ रहे हैं और समस्त स्वर्ग और पृथ्वी अपने अंत तक पहुँच गए हैं। मनुष्य उस दिन से कैसे बचेगा जिस दिन मानवीय अस्तित्व का अंत होगा? और इस प्रकार, तुम सब और कितनी देर तक अपने विद्रोही कार्य जारी रख सकते हो? क्या तुम लोगों का अंतिम दिन अभी ठीक तुम्हारे सामने नहीं है? वे जो परमेश्वर का भय मानते हैं और उसके प्रकट होने के लिए तरसते हैं, वे परमेश्वर की धार्मिकता के प्रकटन के दिन को कैसे नहीं देख सकते? वे नेकी के लिए अन्तिम पुरस्कार कैसे नहीं प्राप्त कर सकते? क्या तुम वह व्यक्ति हो, जो भला करता है या वह जो बुरा करता है? क्या तुम वह हो जो धार्मिक न्याय को स्वीकार करता है और फिर समर्पण करता है या तुम वह हो जो धार्मिक न्याय को स्वीकार करता है फिर शापित किया जाता है? क्या तुम रोशनी में न्याय के सिंहासन के समक्ष जीते हो या तुम अंधकार के बीच रसातल में जीते हो? क्या तुम्हीं सबसे साफ तौर पर नहीं जानते हो कि तुम्हारा परिणाम बस पुरस्कार पाने का होगा या दंड का? क्या तुम सबसे साफ तौर पर नहीं जानते और गहराई से नहीं समझते हो कि परमेश्वर धार्मिक है? तो तुम्हारा आचरण और तुम्हारा हृदय किस प्रकार का है? आज जब मैं तुम्हें जीतता हूँ, तो क्या मुझे तुम्हें वास्तव में यह बताने की आवश्यकता है कि तुम्हारा आचरण भला है या बुरा? तुमने मेरे लिए कितना त्याग किया है? तुम मेरी आराधना कितनी गहराई से करते हो? क्या तुम स्वयं सबसे स्पष्ट नहीं जानते कि तुम मेरे प्रति कैसा व्यवहार करते हो? किसी और से ज्यादा खुद तुम्हें अच्छी तरह ज्ञात होना चाहिए कि तुम्हारा परिणाम भला क्या होगा! मैं तुम्हें सच कहता हूँ : मैंने केवल मनुष्यजाति को सृजित किया है और मैंने तुम्हें सृजित किया है; परंतु मैंने तुम लोगों को शैतान के हाथों में नहीं दिया और न ही मैंने जान-बूझकर तुम लोगों से अपने खिलाफ विद्रोह करवाया या तुम लोगों से अपना प्रतिरोध करवाया और इस प्रकार तुम्हें दंडित किया। क्या तुम्हें मिलने वाली ये सारी विपत्तियाँ इसलिए नहीं हैं कि तुम लोगों के हृदय बहुत कठोर हैं और तुम लोगों का आचरण बहुत घिनौना है? तो क्या जो परिणाम तुम्हें मिलेगा, वह भी तुम स्वयं निर्धारित करने में सक्षम नहीं हो? क्या तुम अपने हृदय में किसी से भी बेहतर नहीं जानते कि तुम्हारा परिणाम क्या होगा? मैं लोगों को इसलिए जीतता हूँ, क्योंकि मैं उन्हें प्रकट करना और बेहतर ढंग से तुम्हारा उद्धार करना चाहता हूँ। यह तुम से बुरा करवाने या जानबूझकर तुम्हें विनाश के नरक में ले जाने के लिए नहीं है। समय आने पर, तुम्हारी बड़ी पीड़ाएँ, तुम्हारा रोना और दाँत पीसना—क्या यह सब तुम्हारे पापों के कारण नहीं होगा? इस प्रकार, क्या तुम्हारी अपनी भलाई या तुम्हारी अपनी बुराई ही तुम्हारा सर्वोत्तम न्याय नहीं है? क्या यह उसका प्रमाण नहीं है जो सबसे अच्छी तरह खुलासा कर सकता है कि तुम्हारा परिणाम क्या होगा?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 96

एक गरजदार आवाज फूटती है, पूरे ब्रह्मांड को थरथराती हुई, कान बहरे करती हुई, और लोगों के पास इससे बच निकलने का समय ही नहीं होता। कुछ मार गिराए जाते हैं, कुछ नष्ट कर दिए जाते हैं, और कुछ का न्याय किया जाता है। यह सचमुच एक ऐसा दृश्य है, जैसा पहले कभी किसी ने नहीं देखा। ध्यान से सुनो : बिजली कड़कने की गर्जनाओं के साथ विलाप की आवाज आती है और यह आवाज रसातल से आती है; यह नरक से आती है। यह विद्रोह के उन पुत्रों का जार-जार रोना है जिनका मेरे द्वारा न्याय किया गया है। जिन्होंने मेरा कहा नहीं सुना और जो मेरे वचनों को अभ्यास में नहीं लाए, उनका कठोरतापूर्वक न्याय किया गया है और वे मेरे प्रचंड कोप के शाप के भागी बने हैं। मेरी आवाज न्याय और कोप है; यह किसी के भी साथ नरमी नहीं दिखाती है और किसी के भी प्रति दया नहीं दिखाती है, क्योंकि मैं धार्मिक परमेश्वर स्वयं हूँ, और मैं कोप, ज्वलन, शुद्धीकरण और विनाश से युक्त हूँ। मुझमें कुछ भी छिपा हुआ नहीं है और कोई दैहिक भावनाएँ नहीं हैं; इसके विपरीत खुलापन, धार्मिकता, न्याय और निष्पक्षता है। चूँकि मेरे पहलौठे पुत्र पहले ही सिंहासन पर मेरे साथ हैं, असंख्य राष्ट्रों और सभी लोगों के ऊपर शासन कर रहे हैं, इसलिए जो चीजें और लोग पक्षपातपूर्ण और अन्यायी हैं, उनका अब न्याय किया जाना शुरू हो रहा है। मैं एक-एक कर उनकी जाँच करूँगा, कुछ भी नहीं छोड़ूँगा और उन्हें पूर्णतः प्रकट करूँगा। चूँकि मेरा न्याय पूरी तरह प्रकट हो गया है और पूरी तरह खोल दिया गया है, और मैंने कतई कुछ भी अपने पास नहीं रखा है; मैं उन सबको निकाल फेंकूँगा जो मेरे इरादों के अनुरूप नहीं हैं और उन्हें अथाह कुंड में अनंत काल के लिए नष्ट कराऊँगा। वहाँ मैं उन्हें सदा के लिए जलवाऊँगा। सिर्फ यही मेरी धार्मिकता है और सिर्फ यही मेरा खरापन है। कोई भी इसे बदल नहीं सकता और हर चीज को मेरा अनुपालन करना है।

अधिकतर लोग यह सोचकर मेरे वचनों को अनदेखा करते हैं कि वचन तो बस वचन हैं और तथ्य तो तथ्य हैं। वे अंधे हैं! क्या वे नहीं जानते हैं कि मैं निष्ठावान परमेश्वर स्वयं हूँ? मेरे वचन और तथ्य एक साथ घटित होते हैं। क्या यह नितांत सच नहीं है? लोग मेरे वचनों को बूझते ही नहीं हैं और केवल वे ही सच में समझते हैं जो प्रबुद्ध किए गए हैं। यह तथ्य है। लोग ज्यों ही मेरे वचनों को देखते हैं, वे बुरी तरह भयभीत हो जाते हैं, और छिपने के लिए घबराहट में चारों तरफ भागने लगते हैं। यह तब और अधिक होता है जब मेरा न्याय बरसता है। जब मैंने सभी चीज़ों का सृजन किया, जब मैं दुनिया को नष्ट करता हूँ, और जब मैं पहलौठे पुत्रों को पूर्ण करता हूँ—तब ये सारी चीज़ें मेरे मुख से निकले एक ही वचन से संपन्न होती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मेरा वचन अपने आप में अधिकार है; यह न्याय है। कहा जा सकता है कि मैं जो व्यक्ति हूँ यही न्याय और प्रताप है और इसे कोई नहीं बदल सकता है। यह मेरे प्रशासनिक आदेशों का एक पहलू है; यह एक तरीक़ा है जिससे मैं लोगों का न्याय करता हूँ। मेरी नज़रों में सब कुछ—जिसमें सारे लोग, सारी घटनाएँ और सारी चीजें शामिल हैं—मेरे हाथों में और मेरे न्याय के अधीन है। कोई भी व्यक्ति और कोई भी चीज़ लीक से हटकर कुछ भी करने की हिम्मत नहीं करती है, और सब कुछ मेरे कहे वचनों के अनुसार संपन्न होना ही चाहिए। मनुष्य की धारणाओं के भीतर से हर कोई उस व्यक्ति के वचनों पर विश्वास करता है जो मैं हूँ। जब मेरा आत्मा वचन व्यक्त करता है तो हर कोई संशय से भर जाता है, मेरी सर्वशक्तिमत्ता के ज्ञान से रहित होता है और यहाँ तक कि मेरे विरुद्ध अभियोग भी लगाता है। अब मैं तुझे बताता हूँ, जो भी मेरे वचनों पर संदेह करते हैं, जो भी मेरे वचनों के प्रति लापरवाह होते हैं, यही वे हैं जो नष्ट कर दिए जाएँगे; वे विनाश के शाश्वत पुत्र हैं। इससे देखा जा सकता है कि बहुत कम हैं जो पहलौठे पुत्र हैं, क्योंकि मैं इसी तरह कार्य करता हूँ। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, मैं एक अंगुली भी हिलाए बिना सब कुछ संपन्न करता हूँ; मैं बस अपने वचनों का प्रयोग करता हूँ। यही वह है जहाँ मेरी सर्वशक्तिमत्ता निहित है। मेरे वचनों में, कोई भी मेरे कहे के स्रोत और उद्देश्य का पता नहीं लगा सकता है। लोग यह नहीं कर सकते हैं। वे केवल अपने क्रियाकलापों में मेरे मार्गदर्शन का अनुसरण कर सकते हैं और जो कुछ भी मेरे इरादों के अनुरूप होता है वह सब करने में मेरी धार्मिकता का अनुसरण कर सकते हैं, जिससे मेरा परिवार धार्मिकता और शांति प्राप्त करे, सदा के लिए जीवित रहे, और अनंतकाल तक दृढ़ और अटल रहे।

मेरा न्याय हरेक तक पहुँचता है, मेरे प्रशासनिक आदेश हरेक को स्पर्श करते हैं, और मेरे वचन तथा मेरा व्यक्तित्व हरेक पर प्रकट किया जाता है। यह मेरे आत्मा के लिए महान कार्य करने का समय है (इस समय वे जिन्हें धन्य किया जाएगा और वे जो दुर्भाग्य का सामना करेंगे, वे एक दूसरे से अलग किए जाते हैं)। मेरे वचनों के निकलते ही, मैंने उन लोगों को अलग कर दिया जिन्हें धन्य किया जाएगा और साथ ही उन्हें भी जो दुर्भाग्य का सामना करेंगे। यह सब शीशे की तरह साफ़ है, और मैं एक नज़र में यह सब देख सकता हूँ। (मैं यह अपनी मानवता के संबंध में कह रहा हूँ; इसलिए ये वचन मेरे प्रारब्ध और चयन का खंडन नहीं करते।) मैं पहाड़ों और नदियों और सारी चीज़ों के बीच फिरता हूँ, ब्रह्माण्ड के अंतरिक्षों में चारों ओर, प्रत्येक स्थान की पड़ताल करता हूँ और उसे स्वच्छ करता हूँ, जिससे मेरे वचनों के परिणामस्वरूप उन सब अस्वच्छ ठिकानों और कामुक भूमियों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और वे भस्म होकर शून्यता में विलीन हो जाएँगी। मेरे लिए, सब कुछ आसान है। यदि अभी वह समय होता जो मैंने दुनिया को नष्ट करने के लिए पूर्व-निर्धारित किया था, तो मैं मात्र एक वचन के कथन के साथ इसे निगल सकता था। लेकिन अभी वह समय नहीं है। इससे पहले कि मैं यह कार्य करूँ, सब-कुछ तैयार होना चाहिए, ताकि मेरी योजना बाधित न हो और मेरे प्रबंधन में गड़बड़ी न हो। मैं जानता हूँ कि इसे यथोचित ढंग से कैसे करना है। मेरे पास मेरी बुद्धि है, और मेरे पास मेरी अपनी व्यवस्थाएँ हैं। लोगों को एक अंगुली भी नहीं हिलानी चाहिए; मेरे हाथों न मार गिराए जाने के प्रति सावधान रहो। यह मेरे प्रशासनिक आदेशों का पहले ही उल्लंघन कर चुका है। इसमें मेरे प्रशासनिक आदेशों की कठोरता और साथ ही उनके पीछे निहित सिद्धांतों को देखा जा सकता है, जिनके दो पहलू हैं : एक यह कि मैं उन सभी को मार गिराता हूँ जो मेरे इरादों के अनुरूप नहीं होते हैं और जो मेरे प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करते हैं; दूसरा यह कि मैं उन सभी को कोपपूर्वक शाप देता हूँ जो मेरे प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करते हैं। ये दोनों पहलू अपरिहार्य हैं और मेरे प्रशासनिक आदेशों के पीछे के कार्यकारी सिद्धांत हैं। सबके साथ इन्हीं दो सिद्धांतों के अनुसार लेशमात्र भी ढिलाई के बिना निपटा जाता है, फिर चाहे कोई कितना भी वफ़ादार क्यों न हो। यह मेरी धार्मिकता, मेरा प्रताप और मेरा कोप दिखाने के लिए पर्याप्त है, जो सभी पार्थिव चीज़ों, सभी सांसारिक चीज़ों और उन सभी चीज़ों को भस्म कर देगा जो मेरे इरादों के अनुरूप नहीं हैं। मेरे वचनों में रहस्य हैं जो छिपे रहते हैं, और मेरे वचनों में ऐसे रहस्य भी हैं जो प्रकट कर दिए गए हैं। इस तरह, मनुष्य की धारणाओं और मानवीय सोच के अनुसार मेरे वचन सदा के लिए अबूझ हैं और मेरा हृदय सदा ऐसा है जिसकी थाह नहीं मिल सकती है। अर्थात, मुझे मनुष्यों को उनकी धारणाओं और सोच से मुक्त करना होगा। यह मेरी प्रबंधन योजना का सबसे महत्वपूर्ण अंश है। मुझे अपने पहलौठे पुत्रों को प्राप्त करने और उन कामों को पूरा करने के लिए जिन्हें मैं करना चाहता हूँ, इसे इस तरह से करना होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 103

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 97

सिय्योन! ख़ुशी मनाओ! सिय्योन! गाओ-बजाओ! मैं जीतकर लौटा हूँ, मैं विजयी होकर लौटा हूँ! असंख्य लोगो! जल्दी से सही ढंग से पंक्तिबद्ध हो जाओ! सृष्टि की सभी चीज़ो! अब रुक जाओ, क्योंकि मेरा व्यक्तित्व पूरे ब्रह्मांड के सामने है और दुनिया के पूर्व में प्रकट हो रहा है! कौन आराधना में घुटने नहीं टेकने का साहस करता है? कौन मुझे सच्चा परमेश्वर नहीं कहने का साहस करता है? कौन भय मानने वाले हृदय से नहीं देखने का साहस करता है? कौन स्तुति नहीं करने का साहस करता है? कौन ख़ुशी नहीं मनाने का साहस करता है? मेरे लोग निश्चित रूप से मेरी आवाज सुनेंगे, और मेरे पुत्र निश्चित रूप से मेरे राज्य में होंगे! पर्वत, नदियाँ और सभी चीज़ें निरंतर जयजयकार करेंगी, और बिना रुके छलाँग लगाएँगी। इस समय कोई भी पीछे हटने का साहस नहीं करेगा, और कोई भी प्रतिरोध में उठने का साहस नहीं करेगा। यह मेरा अद्भुत कर्म है, और इससे भी बढ़कर, यह मेरा महान सामर्थ्य है! मैं समस्त सृष्टि में अपने प्रति भय उत्पन्न करूँगा और इससे भी बढ़कर मैं समस्त सृष्टि से अपनी स्तुति करवाऊँगा। यह मेरी छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना का अंतिम उद्देश्य है और यही है जिसे मैंने अटल रूप से निर्धारित किया है। एक भी व्यक्ति, चीज या घटना मेरे प्रतिरोध में उठने या मेरा विरोध करने का साहस नहीं करती। मेरे सभी लोग मेरे पर्वत पर (दूसरे शब्दों में, उस दुनिया में, जिसे मैं बाद में बनाऊँगा) उमड़ पड़ेंगे और वे निश्चित रूप से मेरे सामने झुकेंगे, क्योंकि मुझमें प्रताप और न्याय है और मैं अधिकार रखता हूँ। (इसका आशय तब से है, जब मैं शरीर में होता हूँ। मेरे पास देह में भी अधिकार है, किंतु चूँकि देह में समय और स्थान की सीमाओं से परे नहीं जाया जा सकता, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि मैंने पूरी महिमा प्राप्त कर ली है। यद्यपि मैं देह में पहलौठे पुत्रों को प्राप्त करता हूँ, पर अभी भी यह नहीं कहा जा सकता कि मैंने महिमा प्राप्त कर ली है। केवल जब मैं सिय्योन लौटूँगा और अपना रूप बदलूँगा, तभी यह कहा जा सकेगा कि मैं अधिकार रखता हूँ—अर्थात् यह कि मैंने महिमा प्राप्त कर ली है।) मेरे लिए कुछ भी मुश्किल नहीं होगा। मेरे मुँह के वचनों से सब-कुछ नष्ट हो जाएगा, और मेरे मुँह के वचनों से सब-कुछ स्थापित और पूरा हो जाएगा। यही मेरा महान सामर्थ्य है और यही मेरा अधिकार है। चूँकि मैं सामर्थ्य से भरपूर और अधिकार से परिपूर्ण हूँ, इसलिए कोई व्यक्ति मुझे बाधित करने का साहस नहीं कर सकता। मैंने बहुत पहले ही हर चीज पर विजय प्राप्त कर ली है, और मैंने विद्रोह के सभी पुत्रों पर जीत हासिल कर ली है। मैं सिय्योन लौटने के लिए अपने पहलौठे पुत्रों को अपने साथ लाऊँगा। मैं अकेला सिय्योन नहीं लौटूँगा। इसलिए जब सभी लोग मेरे पहलौठे पुत्रों को देखेंगे, तो इस प्रकार उनके हृदय मुझसे भय मानने वाले बन जाएँगे। पहलौठे पुत्रों को प्राप्त करने का मेरा यही उद्देश्य है, और दुनिया के निर्माण के समय से ही यह मेरी योजना रही है।

जब सब-कुछ तैयार हो जाएगा, तो वह मेरे सिय्योन लौटने का दिन होगा और वह दिन मेरे चुने हुए असंख्य लोगों द्वारा याद रखा जाएगा। जब मैं सिय्योन लौटूँगा, तो पृथ्वी पर सभी चीज़ें चुप हो जाएँगी, और पृथ्वी पर सब कुछ शांत हो जाएगा। जब मैं सिय्योन लौट जाऊँगा, तो हर चीज़ पुनः अपने मूल रूप में आ जाएगी। उस समय, फिर मैं सिय्योन में अपना कार्य शुरू करूँगा। मैं बुरे लोगों को दंड दूँगा और अच्छे लोगों को इनाम दूँगा, और मैं अपनी धार्मिकता को लागू करूँगा, अपने न्याय को कार्यान्वित करूँगा, और मैं हर चीज़ पूरी करने के लिए अपने वचनों का उपयोग करूँगा, और सभी लोगों और सभी चीज़ों को अपने ताड़ना देने वाले हाथ का अनुभव करवाऊँगा। मैं निश्चित रूप से सभी लोगों को अपनी पूरी महिमा, अपनी पूरी बुद्धि, अपनी पूर्ण समृद्धि दिखवाऊँगा। कोई भी व्यक्ति आलोचना करने के लिए उठने का साहस नहीं करेगा, क्योंकि मुझमें सभी चीज़ें पूरी होती हैं और यहाँ हर आदमी मेरा पूरा सम्मान देखे और मेरी पूरी जीत का स्वाद ले, क्योंकि मुझमें सभी चीज़ें अभिव्यक्त होती हैं। यह मेरे महान सामर्थ्य और मेरे अधिकार को दर्शाने के लिए पर्याप्त है। कोई मेरा अपमान करने का साहस नहीं करेगा और कोई मुझे बाधित करने का साहस नहीं करेगा। मुझमें सब कुछ खुला हुआ है—कौन कुछ भी छिपाने का साहस करेगा? मैं निश्चित रूप से उसे नहीं छोडूँगा! ऐसे निकृष्ट लोगों को मेरी गंभीर सजा अवश्य मिलेगी और ऐसे अधमों को मेरी नजर से दूर अवश्य हटाया जाएगा। मैं ज़रा-सी भी दया न दिखाते हुए और उनकी भावनाओं का ज़रा भी ध्यान न रखते हुए, उन पर लोहे की छड़ी से शासन करूँगा और मैं उनका न्याय करने के लिए अपने अधिकार का उपयोग करूँगा, क्योंकि मैं स्वयं परमेश्वर हूँ, जो दैहिक भावनाओं से रहित है और प्रतापी है और कोई अपमान सहन नहीं करता। सभी को यह समझना और देखना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि वे “बिना कारण या तर्क” के मेरे द्वारा मार गिराए जाएँ और नष्ट कर दिए जाएँ, क्योंकि मेरी छड़ी उन सभी को मार गिराएगी, जो मेरा अपमान करते हैं। मुझे इस बात की परवाह नहीं है कि वे मेरे प्रशासनिक आदेशों को जानते हैं या नहीं; यह ऐसी चीज नहीं है जिसकी मुझे परवाह हो, क्योंकि किसी को भी मेरे व्यक्तित्व के खिलाफ अपमान करने की इजाजत नहीं है। इसी कारण से ऐसा कहा जाता है कि मैं एक शेर हूँ; जिस किसी का भी सामना करता हूँ, उसे मार गिराता हूँ। इसी कारण से ऐसा कहा जाता है कि अब यह कहना कि मैं दया और प्रेममय-कृपालुता का परमेश्वर हूँ, मेरी ईशनिंदा करना है। मूलतः मैं मेमना नहीं, बल्कि शेर हूँ। कोई मेरा अपमान करने का साहस नहीं करता; जो कोई ऐसा करता है, मैं उसकी भावनाओं की फ़िक्र किए बिना तुरंत उसे मृत्युदंड दूँगा! यह मेरा स्वभाव दिखाने के लिए पर्याप्त है। इसलिए, अंतिम युग में लोगों का एक बड़ा समूह पीछे हट जाएगा, और यह लोगों के लिए सहना मुश्किल होगा, लेकिन जहाँ तक मेरा संबंध है, मैं आराम से और खुश हूँ और मैं इसे कठिन कार्य बिलकुल नहीं समझता। मेरा स्वभाव ऐसा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 120

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 98

राज्य में, सभी चीज़ें पुनर्जीवित होना और प्राणशक्ति उत्सर्जित करना आरम्भ करती हैं। पृथ्वी की अवस्था में परिवर्तनों के कारण, एक तथा दूसरी भूमि के बीच सीमाएँ भी खिसकने लगती हैं। मैं भविष्यवाणी कर चुका हूँ कि जब ज़मीन को ज़मीन से अलग किया जाता है, और जब ज़मीन ज़मीन से जुड़ती है, यही वह समय होगा जब मैं हरेक राष्ट्र के टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा। इस समय, मैं सभी चीज़ों को फिर नया करूँगा और बदल दूँगा और समस्त ब्रह्माण्ड को पुनर्विभाजित करूँगा, इस प्रकार पूरे ब्रह्माण्ड को व्यवस्थित करूँगा, और पुराने को नए में रूपान्तरित कर दूँगा—यह मेरी योजना है और ये मेरे कर्म हैं। जब हर देश और मेरे चुने लोगों में से हरेक मेरे सिंहासन के सामने लौटेगा, तब मैं इसके साथ स्वर्ग की सारी प्रचुरता मानव संसार को प्रदान करूँगा, जिससे, मेरी बदौलत, वह संसार बेजोड़ प्रचुरता से लबालब भर जाएगा। पुराने संसार के अस्तित्वमान रहते हुए, मैं अपना क्रोध हर देश के ऊपर पूरी जोर से बरसाऊंगा और प्रशासनिक आदेश लागू करूँगा जो समूचे ब्रह्मांड में सार्वजनिक किए जाते हैं और जो कोई भी उनका उल्लंघन करेगा उन्हें ताड़ना दी जाएगी :

जब मैं पूरे ब्रह्मांड से बोलता हूँ, सब लोग मेरी आवाज सुनते हैं, यानी सभी लोग उन सभी कर्मों को देखते हैं जिन्हें मैंने समूचे ब्रह्मांड में अंजाम दिया है। जो मेरे इरादों के विरुद्ध जाते हैं, अर्थात जो मनुष्य के कर्मों से मेरा विरोध करते हैं, वे मेरी ताड़ना के बीच गिरेंगे। मैं स्वर्ग के असंख्य तारों को नया बनाऊँगा; मेरी बदौलत, सूर्य और चंद्रमा नए हो जाएँगे, आकाश अब वैसा नहीं रहेगा जैसा वह था; और पृथ्वी पर सभी चीजें फिर से नई बना दी जाएँगी—यह सब मेरे वचनों के कारण संपन्न किया जाएगा। ब्रह्मांड के भीतर सारे देशों को नए सिरे से बाँटा जाएगा और मेरे राज्य द्वारा प्रतिस्थापित किया जाएगा, जिससे पृथ्वी पर विद्यमान देश हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएँगे, और केवल वह राज्य होगा जो मेरी आराधना करता है; पृथ्वी के सभी देशों को नष्ट कर दिया जाएगा और उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। ब्रह्मांड के भीतर मनुष्यों में से वे सभी जो दानवों के हैं पूर्णतया नष्ट कर दिए जाएँगे। वे सभी जो शैतान की आराधना करते हैं वे मेरी जलती हुई आग के बीच गिर पड़ेंगे—अर्थात् उनको छोड़कर जो अभी धारा के अन्तर्गत हैं, शेष सभी को राख में बदल दिया जाएगा। जब मैं प्रत्येक जनसमूह को ताड़ना दूँगा तो धार्मिक समुदाय मेरे राज्य में अलग-अलग पैमाने पर लौट आएँगे और मेरे कर्मों के माध्यम से जीत लिए जाएँगे, क्योंकि वे यह देख चुके होंगे कि “सफेद बादल पर सवार पवित्र दिव्य जन” पहले ही आ चुका है। सब लोग अपनी किस्म के अनुसार छाँटे जाएँगे और वे अपने क्रियाकलापों के अनुरूप विविध प्रकार की ताड़नाएँ प्राप्त करेंगे; वे सब जिन्होंने मेरा प्रतिरोध किया है नष्ट हो जाएँगे और जहाँ तक उनकी बात है जिनके पृथ्वी पर कर्मों ने मुझे शामिल नहीं किया है, उन्होंने जिस तरह का व्यवहार किया है उस कारण वे पृथ्वी पर मेरी संतान और मेरे लोगों के शासन के अधीन अस्तित्व में बने रहेंगे। मैं असंख्य देशों और असंख्य लोगों के सामने प्रकट होऊँगा और अपनी वाणी को पृथ्वी पर व्यक्त करूँगा, अपने महान कार्य के पूरे होने की उद्घोषणा करूँगा और सब लोगों को अपनी-अपनी आँखों से यह देखने दूँगा।

जैसे-जैसे मेरे कथन गहन होते जाते हैं, मैं ब्रह्मांड की दशा को भी देखता हूँ। मेरे वचनों के माध्यम से सभी चीजें नई बन जाती हैं। स्वर्ग बदल जाता है और पृथ्वी भी बदल जाती है। मनुष्य को उसके मूल रूप में उजागर किया जाता है और धीरे-धीरे लोगों को अपनी किस्म के अनुसार छाँटा जाता है और अनजाने में अपने “परिवारों” में लौटा दिया जाता है। इससे मुझे अत्यधिक प्रसन्नता होती है। मैं विघ्न से मुक्त हो जाता हूँ और किसी को पता चले बिना मेरा महान कार्य संपन्न होता है और सभी चीजें भी बदल जाती हैं। जब मैंने संसार की सृष्टि की थी, मैंने सभी चीजों को उनकी किस्म के अनुसार छाँट दिया था, सभी आकार वाली चीजों का वर्गीकरण किया था। जब मेरी प्रबंधन योजना समापन के निकट आएगी, मैं सृष्टि की पूर्व दशा बहाल कर दूँगा, मैं हर चीज को उसी प्रकार बहाल कर दूँगा जैसी वह मूलतः थी, प्रत्येक चीज को पूरी तरह बदल दूँगा और हर चीज को अपनी योजना में शामिल करूँगा। समय आ चुका है! मेरी योजना का अंतिम चरण पूरा होने वाला है। आह, गंदी पुरानी दुनिया! इसका मेरे वचनों के बीच पतन तय है! यह पक्का मेरी योजना से मिट्टी में मिल जाएगी! आह, सारी चीजें! वे सब मेरे वचनों के बीच नया जीवन प्राप्त करेंगी—उनके पास उनका संप्रभु होगा! आह, पवित्र और निष्कलंक नया संसार! यह पक्का मेरी महिमामई रोशनी के भीतर पुनर्जीवित होगा! आह, सिय्योन पर्वत! अब और मौन मत रह। मैं विजयी बनकर लौट आया हूँ! मैं सभी चीजों के बीच समूची पृथ्वी को देखता हूँ। पृथ्वी पर रहने वाले लोगों ने नए जीवन की शुरुआत कर दी है और उनके पास नई आशाएँ हैं। आह, मेरे लोगो! ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम मेरे प्रकाश के बीच पुनर्जीवित न होओ? ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम लोग मेरे मार्गदर्शन में आनन्द से न उछलो? भूमि उल्लास से गूँज रही है, जल हर्षोल्लासपूर्ण ठहाकों से गूँज रहा है! आह, पुनर्जीवित इस्राएल! मेरे द्वारा पूर्वनिर्धारित किए जाने की वजह से तुम कैसे गर्व महसूस नहीं कर सकते हो? कौन रोया है? किसने विलाप किया है? पहले का इस्राएल समाप्त हो गया है, और आज के इस्राएल का उदय हुआ है, जो संसार में सीधा और बहुत ऊँचा खड़ा है, और समस्त मानवता के हृदय में तनकर डटा हुआ है। आज का इस्राएल मेरे लोगों के माध्यम से अस्तित्व का आधार निश्चित रूप से प्राप्त करेगा! आह, घृणास्पद मिस्र! कहीं तू अब भी मेरा प्रतिरोध तो नहीं कर रहा है? तू कैसे मेरी दया का लाभ उठा सकता है और मेरी ताड़ना से बचने की कोशिश कर सकता है? ऐसा कैसे हो सकता है कि तू मेरी ताड़ना के दायरे में न रहे? वे सभी जिनसे मैं प्रेम करता हूँ, निश्चय ही अनन्त काल तक जीवित रहेंगे, और वे सभी जो मेरा प्रतिरोध करते हैं, निश्चय ही अनन्त काल तक मेरे द्वारा ताड़ित किए जाएँगे। क्योंकि मैं एक ईर्ष्यालु परमेश्वर हूँ और मैं सभी लोगों को उनकी करनी के लिए हल्के में नहीं छोड़ूँगा। मैं पूरी पृथ्वी की पड़ताल करूँगा और धार्मिकता, प्रताप, कोप और ताड़ना के साथ संसार के पूरब में प्रकट होते हुए मैं खुद को असंख्य मनुष्यों के सामने प्रकट करूँगा!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 26

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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