परमेश्वर के कार्य को जानना I

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 141

इन दिनों परमेश्वर के कार्य को जानना, अधिकांशतः यह जानना है कि अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर की मुख्य सेवकाई क्या है और पृथ्वी पर वह क्या करने के लिए आया है। मैंने पहले अपने वचनों में उल्लेख किया है कि परमेश्वर पृथ्वी पर (अंत के दिनों के दौरान) प्रस्थान से पहले हमारे सामने एक प्रतिमान स्थापित करने के लिए आया है। परमेश्वर यह प्रतिमान कैसे स्थापित करता है? ऐसा वह वचन बोलकर, और धरती पर सर्वत्र कार्य करके और बोलकर करता है। अंत के दिनों में यही परमेश्वर का कार्य है; वह केवल इसलिए बोलता है ताकि पृथ्वी वचनों का संसार बन जाए और ताकि उसके वचन प्रत्येक व्यक्ति को पोषण दें और प्रबुद्ध करें और इस प्रकार उसकी आत्मा अपने भीतर प्रकाश देख सके और दर्शनों के बारे में स्पष्टता प्राप्त करे। अंत के दिनों में परमेश्वर देहधारी हो गया है और मुख्य रूप से वचन बोलने के लिए ही पृथ्वी पर आया है। जब यीशु आया, तो उसने स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का प्रचार किया और उसने सलीब पर चढ़कर छुटकारा दिलाने का कार्य संपन्न किया। उसने व्यवस्था के युग का अंत किया और उन सबको मिटा दिया जो पुराना था। यीशु के आगमन से व्यवस्था के युग का अंत हो गया और अनुग्रह का युग आरंभ हुआ; अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर का आगमन अनुग्रह के युग का अंत लेकर आया है। वह मुख्य रूप से अपने वचन बोलने आया है—मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करने, मनुष्य को रोशन और प्रबुद्ध करने—और इस प्रकार मनुष्य के हृदय के भीतर से अज्ञात परमेश्वर का स्थान समाप्त करने आया है। यीशु जब आया तो उसने कार्य का यह चरण नहीं क्रियान्वित किया। जब वह आया, तब उसने कई चमत्कार किए, उसने बीमारों को चंगा किया और दुष्टात्माओं को बाहर निकाला, और सलीब पर चढ़कर छुटकारा दिलाने का कार्य किया। परिणामस्वरूप, लोग अपनी धारणाओं के अनुसार यह मानते हैं कि परमेश्वर को ऐसा ही होना चाहिए। क्योंकि जब यीशु आया, उसने मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर की छवि हटाने का कार्य नहीं किया; जब वह आया, उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, उसने बीमारों को चंगा किया और दुष्टात्माओं को बाहर निकाला, और उसने स्वर्ग के राज्य का सुसमाचार का प्रसार किया। एक दृष्टि से, अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का देहधारण मनुष्य की धारणाओं में अज्ञात परमेश्वर द्वारा ग्रहण किए गए स्थान को हटाता है, ताकि मनुष्य के हृदय में अज्ञात परमेश्वर की छवि अब और न रहे। अपने व्यावहारिक वचनों और कार्य, विभिन्न स्थानों पर अपने दौरों के जरिए और मनुष्यों के बीच वह जो असाधारण रूप से व्यावहारिक और सामान्य कार्य करता है, उस सबके माध्यम से वह मनुष्य के लिए परमेश्वर की व्यावहारिकता जानने का निमित्त बनता है, और मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर का स्थान हटाता है। दूसरी दृष्टि से, परमेश्वर अपने देह द्वारा कहे गए वचनों का उपयोग मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए, और समस्त कामों को पूरा करने के लिए करता है। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर यही कार्य संपन्न करेगा।

तुम लोगों को क्या पता होना चाहिए :

1. परमेश्वर का कार्य अलौकिक नहीं है, और तुम्हें इसके बारे में धारणाएँ नहीं पालनी चाहिए।

2. तुम लोगों को वह मुख्य कार्य समझना चाहिए, जिसे देहधारी परमेश्वर इस बार करने के लिए आया है।

वह बीमारों को चंगा करने, या दुष्टात्माओं को बाहर निकालने, या चमत्कार दिखाने नहीं आया है, और वह पश्चात्ताप के सुसमाचार का प्रचार करने, या मनुष्य को छुटकारा दिलाने के लिए नहीं आया है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यीशु यह कार्य पहले ही कर चुका है, और परमेश्वर उसी कार्य को दोहराता नहीं। आज, परमेश्वर अनुग्रह के युग का अंत करने और अनुग्रह के युग की सभी प्रथाओं को खत्म करने आया है। व्यावहारिक परमेश्वर मुख्य रूप से अपनी व्यावहारिकता दिखाने के लिए आया है। जब यीशु आया, तो उसने बहुत ज्यादा नहीं बोला; उसने मुख्य रूप से अचंभे दिखाए, चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित किए, और बीमारों को चंगा किया तथा दुष्टात्माओं को बाहर निकाला या फिर उसने भविष्यवाणियाँ कीं, ताकि लोग पूरी दृढ़ता के साथ उस पर विश्वास करें और यह देखें कि वह वास्तव में परमेश्वर है और उसमें कोई दैहिक भावनाएँ नहीं हैं। अंततः उसने सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा किया। आज का परमेश्वर चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित नहीं करता, न ही वह बीमारों को चंगा करता और दुष्टात्माओं को बाहर निकालता है। जब यीशु आया, तो उसने जो कार्य किया, वह परमेश्वर के एक भाग का प्रतिनिधित्व करता था, परंतु इस बार परमेश्वर कार्य के उस चरण को करने आया है जो अपेक्षित है, परमेश्वर वही कार्य दोहराता नहीं है; वह ऐसा परमेश्वर है जो सदैव नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता, और इसलिए तुम आज जो भी देखते हो, वह व्यावहारिक परमेश्वर के वचन और कार्य हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वर्तमान कार्य का ज्ञान

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 142

अंत के दिनों में परमेश्वर मुख्य रूप से अपने वचनों को कहने, वह सब समझाने जो मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक है, वह बताने जिसमें मनुष्य को प्रवेश करना चाहिए, मनुष्य को परमेश्वर के कर्मों को दिखाने, और मनुष्य को परमेश्वर की बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता और चमत्कारिकता दिखाने के लिए देहधारी हुआ है। परमेश्वर जिन कई तरीकों से बोलता है, उनके माध्यम से मनुष्य परमेश्वर की सर्वोच्चता, परमेश्वर की महानता और इससे भी बढ़कर, परमेश्वर की विनम्रता और अदृश्यता को निहारता है। मनुष्य देखता है कि परमेश्वर सर्वोच्च है, परंतु वह विनम्र और छिपा हुआ है, और सबसे छोटा हो सकता है। उसके कुछ वचन सीधे आत्मा के दृष्टिकोण से कहे गए हैं, कुछ सीधे मनुष्य के दृष्टिकोण से, और कुछ तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से। इसमें यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर के कार्य करने का ढंग बहुत भिन्न-भिन्न है, और वह इसे वचनों के माध्यम से ही मनुष्य को देखने देता है। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का कार्य सामान्य और व्यावहारिक दोनों है, और इस प्रकार अंत के दिनों में लोगों के समूह को समस्त परीक्षणों में से सबसे बड़े परीक्षण से गुज़ारा जाता है। परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता के कारण, सभी लोग परीक्षणों में प्रवेश कर चुके हैं; मनुष्य परमेश्वर के परीक्षणों में उतरा है, तो उसका कारण परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता ही है। यीशु के युग के दौरान कोई धारणाएँ या परीक्षण नहीं थे। चूँकि यीशु द्वारा किया गया अधिकांश कार्य मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप था, इसलिए लोगों ने उसका अनुसरण किया, और उसके बारे में उनकी कोई धारणाएँ नहीं थीं। आज के परीक्षण मनुष्य द्वारा अब तक झेले गए परीक्षणों में सबसे बड़े हैं, और जब यह कहा जाता है कि ये लोग महाक्लेश से निकल आए हैं, तो उसका अर्थ यही क्लेश है। आज परमेश्वर इन लोगों में आस्था, प्रेम, कष्ट की स्वीकृति और समर्पण बढ़ाने के लिए बोलता है। अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन मनुष्य के प्रकृति सार, मनुष्य के व्यवहार और अभिव्यक्तियों और वर्तमान में जिसमें मनुष्य को प्रवेश करना चाहिए, उसके अनुरूप हैं। उसके वचन व्यावहारिक और सामान्य दोनों हैं : वह आने वाले कल की बात नहीं करता है, न ही वह पीछे मुड़कर बीते हुए कल को देखता है; वह केवल उसी की बात करता है जिसमें आज प्रवेश करना चाहिए, जिसे आज अभ्यास में लाना चाहिए और जिसे आज समझना चाहिए। यदि वर्तमान समय में ऐसा कोई व्यक्ति उभरे, जो संकेत और चमत्कार प्रदर्शित करने, दुष्टात्माओं को निकालने, बीमारों को चंगा करने और कई चमत्कार दिखाने में समर्थ हो, और यदि वह व्यक्ति दावा करे कि वह यीशु है जो आ गया है, तो यह एक बुरी आत्मा द्वारा उसका वेश धारण करना होगा, यह एक बुरी आत्मा द्वारा यीशु की नकल करने का कृत्य होगा। यह याद रखो! परमेश्वर वही कार्य नहीं दोहराता। यीशु के कार्य का चरण पहले ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर कार्य के उस चरण को पुनः कभी हाथ में नहीं लेगा। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता; उदाहरण के लिए, पुराने नियम ने मसीहा के आगमन की भविष्यवाणी की, और फिर पता चला कि जो आया था वह यीशु था। इसलिए एक और मसीहा का आना ग़लत होगा। यीशु एक बार पहले ही आ चुका है और यदि “यीशु” को इस समय फिर से आना हो, तो यह गलत होगा। प्रत्येक युग के लिए एक नाम है और प्रत्येक नाम में उस युग का चरित्र चित्रण होता है। मनुष्य की धारणाओं के अनुसार परमेश्वर को सदैव चिह्न और चमत्कार दिखाने चाहिए, सदैव बीमारों को चंगा करना और दानवों को बहिष्कृत करना चाहिए और सदैव ठीक यीशु के समान होना चाहिए। परंतु इस बार परमेश्वर इसके समान बिल्कुल नहीं है। यदि अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर अब भी चिह्न और चमत्कार दिखाए और अब भी दानवों को बहिष्कृत करे और बीमारों को चंगा करे—यदि वह बिल्कुल यीशु की तरह करे—तो परमेश्वर वही कार्य दोहरा रहा होगा और यीशु के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाएगा। इसलिए परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य का एक चरण पूरा करता है। ज्यों ही उसके कार्य का प्रत्येक चरण पूरा होता है, बुरी आत्माएँ शीघ्र ही उसकी नकल करने की कोशिश करती हैं और जब शैतान परमेश्वर के बिल्कुल पीछे-पीछे चलने लगता है, तब परमेश्वर तरीका बदलकर भिन्न तरीका अपना लेता है। ज्यों ही परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण पूरा करता है, बुरी आत्माएँ उसकी नकल करने का प्रयास करती हैं। तुम लोगों को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए। आज परमेश्वर का कार्य यीशु के कार्य से भिन्न क्यों है? आज परमेश्वर चिह्न और चमत्कार क्यों नहीं दिखाता है, दानवों को क्यों नहीं निकालता है और बीमारों को चंगा क्यों नहीं करता है? यदि यीशु का कार्य व्यवस्था के युग के दौरान किए गए कार्य के समान ही होता, तो क्या वह अनुग्रह के युग के परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर पाता? क्या वह सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा कर पाता? यदि यीशु मंदिर में गया होता और व्यवस्था के युग की तरह उसने सब्त को माना होता, उसे किसी ने नहीं सताया होता और सबने उसे गले लगाया होता, तो क्या उसे सलीब पर चढ़ाया जा सकता था? क्या वह छुटकारे का कार्य पूरा कर सकता था? यदि अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर यीशु के समान चिह्न और चमत्कार दिखाता, तो इसका क्या अर्थ होता? यदि परमेश्वर अंत के दिनों के दौरान अपने कार्य का एक और भाग करता है, जो उसकी प्रबंधन योजना के भाग का प्रतिनिधित्व करता है, तो केवल तभी मनुष्य परमेश्वर का अधिक गहरा ज्ञान प्राप्त कर सकता है और परमेश्वर की प्रबंधन योजना पूर्ण हो सकती है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वर्तमान कार्य का ज्ञान

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 143

अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर मुख्य रूप से अपने वचन बोलने आया है। वह पवित्रात्मा के दृष्टिकोण से, मनुष्य के दृष्टिकोण से, और तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से बोलता है; वह एक समयावधि के लिए एक तरीके का प्रयोग करते हुए, भिन्न-भिन्न तरीकों से बोलता है, और वह बोलने के इन तरीकों का उपयोग मनुष्य की धारणाओं को बदलने और मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर की छवि हटाने के लिए करता है। यही परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला मुख्य कार्य है। चूँकि मनुष्य मानता है कि जब परमेश्वर आएगा, तो वह बीमारों को चंगा करेगा, दुष्टात्माओं को निकालेगा, चमत्कार दिखाएगा और मनुष्य को भौतिक आशीष प्रदान करेगा, इसलिए परमेश्वर कार्य का—ताड़ना और न्याय के कार्य का—यह चरण पूरा करता है, ताकि मनुष्य की धारणाओं में मौजूद ऐसी बातों को निकाल सके, मनुष्य को परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता को जानने दे सके, मनुष्य के दिल से यीशु की मौजूदा छवि को हटाया जा सके और उसके स्थान पर परमेश्वर की नई छवि स्थापित की जा सके। एक बार जब मनुष्यों के दिलों में मौजूद परमेश्वर की छवि पुरानी पड़ जाती है, तब वह एक मूर्ति बन जाती है। जब यीशु आया और उसने कार्य का वह चरण पूरा किया, तब वह परमेश्वर की संपूर्णता का प्रतिनिधित्व नहीं करता था। उसने कुछ चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित किए, कुछ वचन बोले, और अंततः सलीब पर चढ़ा दिया गया। उसने परमेश्वर के एक भाग का प्रतिनिधित्व किया। वह परमेश्वर के समग्र रूप का प्रतिनिधित्व नहीं कर सका, बल्कि उसने परमेश्वर के कार्य के एक भाग को करने में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर बहुत महान, बहुत अद्भुत और अथाह है, और वह प्रत्येक युग में अपने कार्य का बस एक भाग ही करता है। इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के लिए जीवन के वचनों का पोषण देना; मनुष्य के प्रकृति सार और भ्रष्ट स्वभाव को उजागर करना; और उसकी धर्म संबंधी धारणाओं, सामंती सोच, पुरानी पड़ चुकी सोच और ज्ञान और संस्कृति को मिटाना है। ये सभी चीजें परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर किए जाने के माध्यम से शुद्ध की जानी चाहिए। अंत के दिनों में, मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए परमेश्वर चिह्नों और चमत्कारों का नहीं, वचनों का उपयोग करता है। वह मनुष्य को प्रकट करने, उसका न्याय करने, उसे ताड़ना देने और उसे पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, ताकि परमेश्वर के वचनों में मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि और मनोहरता देखने लगे, और परमेश्वर के स्वभाव को समझने लगे, और ताकि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर के कर्मों को निहारे। व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा अपने वचनों से मूसा को मिस्र से बाहर ले गया, और उसने इस्राएलियों को कुछ वचन बोले; उस समय, परमेश्वर के कर्मों का अंश प्रकट किया गया था, परंतु चूँकि मनुष्य की काबिलियत सीमित थी और कोई भी चीज उसके ज्ञान को पूर्ण नहीं बना सकती थी, इसलिए परमेश्वर बोलता और कार्य करता रहा। अनुग्रह के युग में मनुष्य ने एक बार फिर परमेश्वर के कर्मों का अंश देखा। यीशु चिह्न और चमत्कार दिखा पाया, बीमारों को चंगा कर पाया और दुष्टात्माओं को निकाल पाया, और सलीब पर चढ़ पाया, जिसके तीन दिन बाद वह पुनर्जीवित हुआ और देह में मनुष्य के सामने प्रकट हुआ। परमेश्वर के बारे में मनुष्य इससे अधिक कुछ नहीं जानता। मनुष्य उतना ही जानता है, जितना परमेश्वर उस पर प्रकट करता है, और यदि परमेश्वर मनुष्य पर और अधिक न प्रकट करे, तो यह परमेश्वर के बारे में मनुष्य के परिसीमन की सीमा होगी। इसलिए परमेश्वर कार्य करता रहता है, ताकि उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान अधिक गहरा हो सके और वह धीरे-धीरे परमेश्वर के सार को जान जाए। अंत के दिनों में, परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए अपने वचनों का उपयोग करता है। परमेश्वर के वचनों द्वारा तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव उजागर किया जाता है, और तुम्हारी धर्म संबंधी धारणाओं को परमेश्वर की व्यावहारिकता से बदल दिया जाता है। अंत के दिनों में परमेश्वर मुख्य रूप से इन वचनों को पूरा करने के लिए देहधारी हुआ है, “वचन देह बन जाता है, वचन देह में आता है, और वचन देह में प्रकट होता है”, और यदि तुम्हें इसका पूरा ज्ञान नहीं है, तो तुम दृढ़ता से खड़े नहीं रह पाओगे। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर की मंशा मुख्य रूप से कार्य के उस चरण को पूरा करने की है, जिसमें वचन देह में प्रकट होता है, और यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना के कार्य का एक भाग है। इसलिए तुम लोगों का ज्ञान पूरा होना चाहिए; परमेश्वर चाहे जैसे कार्य करे, किंतु वह मनुष्य को अपनी सीमा निर्धारित नहीं करने देता। यदि परमेश्वर अंत के दिनों के दौरान यह कार्य न करता, तो उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान इससे आगे न जा पाता। तुम्हें बस इतना पता होगा कि परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया जा सकता है और वह सदोम को नष्ट कर सकता है, और यीशु मृतकों में से जी उठ सकता है और पतरस के सामने प्रकट हो सकता है...। परंतु तुम यह कभी नहीं कहोगे कि परमेश्वर के वचन सब कुछ संपन्न कर सकते हैं और मनुष्य को जीत सकते हैं। केवल परमेश्वर के वचनों का अनुभव करके ही तुम ऐसी ज्ञान की बातें बोल सकते हो। जितना अधिक तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव करोगे, उसके बारे में तुम्हारा ज्ञान उतना ही अधिक विस्तृत हो जाएगा और केवल तभी तुम परमेश्वर को अपनी धारणाओं में सीमित नहीं करोगे। मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करके ही उसे जानता है; परमेश्वर को जानने का कोई और सही मार्ग नहीं है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वर्तमान कार्य का ज्ञान

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 144

आज, तुम सभी लोगों को यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा मुख्य रूप से “वचन देह बन जाता है” का तथ्य साकार किया जाता है। पृथ्वी पर अपने व्यावहारिक कार्य के माध्यम से परमेश्वर इस बात की अनुमति देता है कि मनुष्य उसे जाने, उसके साथ जुड़े और उसके व्यावहारिक कर्मों को देखे। वह मनुष्य को यह स्पष्ट रूप से देखने देता है कि वह चिह्न और चमत्कार दिखाने में सक्षम है और ऐसा समय भी आता है, जब वह ऐसा करने में अक्षम होता है; यह युग पर निर्भर करता है। इससे तुम देख सकते हो कि परमेश्वर चिह्न और चमत्कार दिखाने में अक्षम नहीं है, बल्कि इसके बजाय वह अपने कार्य का ढंग, किए जाने वाले कार्य और युग के अनुसार बदल देता है। कार्य के वर्तमान चरण में वह चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता; यीशु के युग में उसने कुछ चिह्न और चमत्कार दिखाए थे, क्योंकि उस युग में उसका कार्य भिन्न था। परमेश्वर आज वह कार्य नहीं करता, और कुछ लोग मानते हैं कि वह चिह्न और चमत्कार दिखाने में अक्षम है या वे सोचते हैं कि चूँकि वह चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता, तो वह परमेश्वर नहीं है। क्या यह एक झूठा तर्क नहीं है? परमेश्वर चिह्न और चमत्कार दिखाने में सक्षम है, परंतु वह एक भिन्न युग में कार्य कर रहा है और इसलिए वह ऐसा कार्य नहीं करता। अलग-अलग युगों में और परमेश्वर के कार्य के भिन्न चरणों के अनुसार, परमेश्वर अलग-अलग कर्म अभिव्यक्त करता है। परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास चिह्नों और चमत्कारों में विश्वास करना नहीं है, न ही अजूबों पर विश्वास करना है, बल्कि नए युग के दौरान उसके व्यावहारिक कार्य में विश्वास करना है। मनुष्य परमेश्वर को उसके कार्य करने के ढंग के माध्यम से जानता है, और यही ज्ञान मनुष्य के भीतर परमेश्वर में विश्वास, अर्थात् परमेश्वर के कार्य और कर्मों में विश्वास, उत्पन्न करता है। कार्य के इस चरण में परमेश्वर मुख्य रूप से बोलता है। चिह्न और चमत्कार देखने की प्रतीक्षा मत करो, तुम कोई चिह्न और चमत्कार नहीं देखोगे! ऐसा इसलिए है, क्योंकि तुम अनुग्रह के युग में पैदा नहीं हुए थे। यदि हुए होते, तो तुम चिह्न और चमत्कार देख पाते, परंतु तुम अंत के दिनों के दौरान पैदा हुए हो, और इसलिए तुम केवल परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता देख सकते हो। अंत के दिनों के दौरान अलौकिक यीशु को देखने की अपेक्षा मत करो। तुम केवल व्यावहारिक देहधारी परमेश्वर को ही देखने में सक्षम हो, जो किसी भी सामान्य मनुष्य से भिन्न नहीं है। प्रत्येक युग में परमेश्वर विभिन्न कर्म अभिव्यक्त करता है। प्रत्येक युग में वह अपने कर्मों का अंश अभिव्यक्त करता है, और प्रत्येक युग का कार्य परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग का और परमेश्वर के कर्मों के एक भाग का प्रतिनिधित्व करता है। वह जिन कर्मों को अभिव्यक्त करता है, वे हर उस युग के साथ बदलते जाते हैं जिसमें वह कार्य करता है, परंतु वे सब परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान को अधिक गहरा करने देते हैं, मनुष्य को परमेश्वर में अधिक सच्चा और ठोस विश्वास करने देते हैं। मनुष्य परमेश्वर में उसके समस्त कर्मों के कारण विश्वास करता है, क्योंकि वह इतना अद्भुत, इतना महान और सर्वशक्तिमान है, क्योंकि वह अथाह है, इसलिए मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है। यदि तुम परमेश्वर में इसलिए विश्वास करते हो, क्योंकि वह चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित करने में सक्षम है और बीमारों को चंगा कर सकता और पिशाचों को बाहर निकाल सकता है, तो तुम्हारा विचार ग़लत है, और कुछ लोग तुमसे कहेंगे, “क्या दुष्टात्माएँ भी इस तरह की चीजें करने में सक्षम नहीं हैं?” क्या यह परमेश्वर की छवि को शैतान की छवि के साथ गड्डमड्ड नहीं कर देता? आज, परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास परमेश्वर के कई कर्मों और उसके द्वारा किए जा रहे कार्य की विशाल मात्रा और उसके बोलने के अनेक तरीक़ों के कारण है। परमेश्वर अपने वचनों के माध्यम से मनुष्य को जीतता है और उसे पूर्ण बनाता है। मनुष्य परमेश्वर में उसके कई कर्मों के कारण विश्वास करता है, इसलिए नहीं कि वह चिह्न और चमत्कार दिखाने में सक्षम है; लोग परमेश्वर को केवल उसके कर्मों को देखकर ही जानते हैं। परमेश्वर के व्यावहारिक कर्मों को जानकर ही—वह कैसे कार्य करता है, कौन-सी बुद्धिमत्तापूर्ण पद्धतियों का उपयोग करता है, कैसे बोलता है और मनुष्य को कैसे पूर्ण बनाता है—केवल इन पहलुओं को जानकर ही तुम परमेश्वर की व्यावहारिकता को बूझ सकते हो और उसके स्वभाव को समझ सकते हो, यह जानकर कि वह क्या पसंद करता है, किससे बेहद घृणा करता है और मनुष्य के ऊपर कैसे कार्य करता है। परमेश्वर क्या पसंद करता है और वह किस चीज से बेहद नफरत करता है, इसे समझकर तुम सकारात्मक और नकारात्मक के बीच भेद कर सकते हो, और परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ज्ञान के माध्यम से तुम्हारे जीवन में प्रगति होती है। संक्षेप में, तुम्हें परमेश्वर के कार्य का ज्ञान प्राप्त करना ही चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करने के बारे में अपने विचारों को दुरुस्त अवश्य कर लेना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वर्तमान कार्य का ज्ञान

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 145

तुम कैसे भी अनुसरण करो, तुम्हें सर्वोपरि, परमेश्वर द्वारा आज किए जाने वाले कार्य को समझना और उसके महत्व को जानना चाहिए। तुम्हें यह अवश्य समझना और जानना चाहिए कि जब परमेश्वर अंत के दिनों में आता है तो वह कौन-सा कार्य लाता है, कैसा स्वभाव लेकर आता है, और वह असल में मनुष्य में क्या चीज पूरी करेगा। यदि तुम उस कार्य को नहीं जानते या समझते, जिसे करने के लिए वह देह में आया है, तो तुम उसके इरादे कैसे समझ सकते हो, और तुम उसके अंतरंग कैसे बन सकते हो? वास्तव में, परमेश्वर का अंतरंग होना जटिल नहीं है, किंतु यह सरल भी नहीं है। यदि लोग इसे पूरी तरह से समझ सकें और इसे अमल में ला सकें, तो यह सरल बन जाता है; यदि लोग इसे पूरी तरह से न समझ सकें, तो यह बहुत कठिन बन जाता है, और, इतना ही नहीं, वे अस्पष्ट और अमूर्त चीजों का अनुसरण करने में प्रवण हो जाते हैं। यदि परमेश्वर के अनुसरण में लोगों के पास समर्थन देने के लिए अपना कोई नजरिया नहीं है, और वे नहीं जानते कि उन्हें किस सत्य को धारण करना चाहिए, तो इसका अर्थ है कि उनका कोई आधार नहीं है, और इसलिए उनके लिए अडिग रहना आसान नहीं है। आज, ऐसे बहुत लोग हैं जो सत्य को नहीं समझते, जो भले और बुरे के बीच अंतर नहीं कर सकते या यह नहीं बता सकते कि किससे प्रेम या घृणा करें। ऐसे लोग मुश्किल से ही अडिग रह पाते हैं। परमेश्वर में विश्वास की कुंजी सत्य को अभ्यास में लाने, परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होने, और जब परमेश्वर देह में आता है, तब मनुष्य पर उसके कार्य और उन सिद्धांतों को, जिनसे वह बोलता है, जानने में सक्षम होना है। भीड़ का अनुसरण मत करो। तुम्हारे पास इसके सिद्धांत होने चाहिए कि तुम्हें किसमें प्रवेश करना चाहिए, और तुम्हें उन पर अडिग रहना चाहिए। अपने भीतर उन चीजों पर दृढ़ रहो जो परमेश्वर की प्रबुद्धता से आती हैं—यह तुम्हारे लिए मददगार होगा। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो आज तुम एक दिशा में जाओगे तो कल दूसरी दिशा में, और कभी भी कोई व्यावहारिक चीज़ प्राप्त नहीं करोगे। ऐसा होना तुम्हारे जीवन के लिए ज़रा भी लाभदायक नहीं है। जो सत्य को नहीं समझते, वे हमेशा दूसरों का अनुसरण करते हैं : यदि लोग कहते हैं कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो तुम भी कहते हो कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है; यदि लोग कहते हैं कि यह दुष्टात्मा का कार्य है, तो तुम्हें भी संदेह हो जाता है, या तुम भी कहते हो कि यह किसी दुष्टात्मा का कार्य है। तुम हमेशा दूसरों के शब्दों को तोते की तरह दोहराते हो और स्वयं किसी भी चीज का भेद पहचानने में अक्षम हो, न ही तुम स्वयं सोचने में सक्षम होते हो। इस तरह के व्यक्ति का कोई स्पष्ट रुख नहीं होता, जिसे भेद की कोई पहचान नहीं होती—ऐसा व्यक्ति निकम्मा होता है! तुम हमेशा दूसरों के वचनों को दोहराते हो : आज ऐसा कहा जाता है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, परंतु शायद एक दिन कोई कहे कि यह पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है और कि यह असल में मनुष्य के कर्मों के अतिरिक्त कुछ नहीं है—फिर भी तुम इसका भेद नहीं पहचान पाते और जब तुम दूसरों को यह कहते देखते हो, तो तुम इसे दोहराते हो। यह वास्तव में पवित्र आत्मा का कार्य है, परंतु तुम कहते हो कि यह मनुष्य का कार्य है; क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य की ईशनिंदा करने वालों में से एक नहीं बन गए हो? इसमें, क्या तुमने परमेश्वर का इसलिए विरोध नहीं किया है, क्योंकि तुममें भेद पहचान की क्षमता नहीं है? शायद किसी दिन कोई मूर्ख प्रकट होकर कहे कि “यह किसी दुष्टात्मा का कार्य है,” और इन शब्दों को सुनकर तुम हतप्रभ रह जाओ, और एक बार फिर तुम दूसरों के शब्दों से बेबस हो जाओगे। हर बार जब कोई तुम्हारे साथ गड़बड़ी करता है, तो तुम अपने दृष्टिकोण पर अडिग रहने में असमर्थ हो जाते हो, और यह सब इसलिए होता है क्योंकि तुम्हारे पास सत्य नहीं है। परमेश्वर पर विश्वास करना और परमेश्वर को जानने की कोशिश करना आसान बात नहीं है। ये चीज़ें एक-साथ इकट्ठे होने और उपदेश सुनने भर से हासिल नहीं की जा सकतीं, और तुम केवल जुनून के द्वारा पूर्ण नहीं किए जा सकते। तुम्हें अनुभवों से गुजरना चाहिए, तुम्हारे पास ज्ञान होना चाहिए और तुम्हें अपने कार्यों में सैद्धांतिक होना चाहिए और पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करना चाहिए। जब तुम अनुभवों से गुज़र जाओगे, तो तुम कई चीजों में अंतर करने में सक्षम हो जाओगे—तुम भले और बुरे के बीच, न्याय और दुष्टता के बीच, देह और रक्त से संबंधित चीज़ों और सत्य से संबंधित चीज़ों के बीच अंतर करने में सक्षम हो जाओगे। तुम्हें इन सभी चीजों के बीच अंतर करने में सक्षम होना चाहिए, और ऐसा करने में, चाहे कैसी भी परिस्थितियाँ हों, तुम कभी भी नहीं भटकोगे। केवल यही तुम्हारा वास्तविक आध्यात्मिक कद है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 146

परमेश्वर के कार्य को जानना कोई आसान बात नहीं है। अपनी खोज में तुम्हारे पास मानक और एक उद्देश्य होना चाहिए, तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि सच्चे मार्ग का कैसे अनुसरण कैसे करें, यह कैसे मापें कि यह सच्चा मार्ग है या नहीं, और यह परमेश्वर का कार्य है या नहीं। सच्चे मार्ग की खोज करने में सबसे बुनियादी सिद्धांत क्या है? तुम्हें देखना होगा कि इस मार्ग में पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, ये वचन सत्य की अभिव्यक्ति हैं या नहीं, किसकी गवाही दी गई है, और यह तुम्हारे लिए क्या ला सकता है। सच्चे मार्ग और झूठे मार्गों के बीच अंतर करने के लिए बुनियादी ज्ञान के कई पहलू आवश्यक हैं, जिनमें सबसे मूलभूत है यह बताना कि इसमें पवित्र आत्मा का कार्य मौजूद है या नहीं। क्योंकि परमेश्वर पर लोगों के विश्वास का सार परमेश्वर के आत्मा पर विश्वास है, और यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर पर उनका विश्वास इसलिए है, क्योंकि यह देह परमेश्वर के आत्मा का मूर्त रूप है, जिसका अर्थ यह है कि ऐसा विश्वास अभी भी आत्मा पर विश्वास है। आत्मा और देह के मध्य अंतर हैं, परंतु चूँकि यह देह आत्मा से आता है और वचन देह धारण करता है, इसलिए मनुष्य जिसमें विश्वास करता है, वह अभी भी परमेश्वर का अंतर्निहित सार है। अतः, यह पहचानने के लिए कि यह सच्चा मार्ग है या नहीं, सर्वोपरि तुम्हें यह देखना चाहिए कि इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, जिसके बाद तुम्हें यह देखना चाहिए कि इस मार्ग में सत्य है या नहीं। सत्य, जैसा कि इसके बारे में कहा जाता है, सामान्य मानवता का जीवन स्वभाव है। दूसरे शब्दों में, यह वही है जो मनुष्य से तब अपेक्षित था जब परमेश्वर ने आरंभ में उसका सृजन किया था, यानी, अपनी समग्रता में सामान्य मानवता (मानवता का विवेक और साथ ही अंतर्दृष्टि, बुद्धि और कैसा आचरण करें इसके बारे में बुनियादी ज्ञान सहित) है। अर्थात्, तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि यह मार्ग लोगों को एक सामान्य मानव जीवन में ले जा सकता है या नहीं, बोला गया सत्य सामान्य मानवता की वास्तविकता के आधार पर अपेक्षाएँ रखता है या नहीं, यह सत्य यथार्थवादी और व्यावहारिक है या नहीं, और यह सबसे सामयिक है या नहीं। यदि इसमें सत्य है, तो यह लोगों को सामान्य और व्यावहारिक अनुभवों में ले जाने में सक्षम है; इसके अलावा, लोग हमेशा से अधिक सामान्य बन जाते हैं, उनके पास जो मानवता का विवेक होता है, वह और भी पूरा हो जाता है, उनका दैहिक और आध्यात्मिक जीवन हमेशा से अधिक व्यवस्थित हो जाता है, और उनकी भावनाएँ हमेशा से और अधिक सामान्य हो जाती हैं। यह दूसरा सिद्धांत है। एक अन्य सिद्धांत है, जो यह है कि लोगों के पास परमेश्वर का बढ़ता हुआ ज्ञान है या नहीं, और इस प्रकार के कार्य और सत्य का अनुभव करना उनमें परमेश्वर-प्रेमी हृदय को प्रेरित कर सकता है या नहीं और उन्हें परमेश्वर के हमेशा से अधिक निकट ला सकता है या नहीं। इसमें यह मापा जा सकता है कि यह सच्चा मार्ग है अथवा नहीं। सबसे बुनियादी बात यह है कि क्या यह मार्ग अलौकिक होने के बजाय यथार्थवादी है, और यह मनुष्य के जीवन के लिए पोषण प्रदान करने में सक्षम है या नहीं। यदि यह इन सिद्धांतों के अनुरूप है, तो निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह मार्ग सच्चा मार्ग है। मैं ये वचन तुम लोगों से तुम्हारे भविष्य के अनुभवों में अन्य मार्गों को स्वीकार करवाने के लिए नहीं कह रहा हूँ, न ही किसी भविष्यवाणी के रूप में कह रहा हूँ कि भविष्य में एक नए युग का अन्य कार्य होगा। मैं इन्हें इसलिए कह रहा हूँ, ताकि तुम लोग निश्चित हो जाओ कि आज का मार्ग ही सच्चा मार्ग है, ताकि तुम लोग आज के कार्य के प्रति केवल आधा-अधूरा ही विश्वास न करो और उसे स्पष्ट देखने में असमर्थ न रहो। यहाँ ऐसे कई लोग हैं, जो निश्चित होने के बावजूद अभी भी भ्रमित तरीके से अनुगमन करते हैं; ऐसी निश्चितता का कोई सिद्धांत नहीं होता, और ऐसे लोगों को देर-सबेर हटा दिया जाएगा। यहाँ तक कि वे भी, जो अपने अनुसरण में विशेष रूप से उत्साही हैं, तीन भाग ही निश्चित हैं और पाँच भाग अनिश्चित हैं, जो दर्शाता है कि उनका कोई आधार नहीं है। चूँकि तुम लोगों की काबिलियत बहुत कमज़ोर है और तुम्हारी नींव बहुत सतही है, इसलिए तुम लोगों को इन भेद पहचानने के मामलों की समझ नहीं है। परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं है, वह ऐसा कार्य नहीं करता जो वास्तविक न हो, वह मनुष्य से अत्यधिक अपेक्षाएँ नहीं रखता, और वह ऐसा कार्य नहीं करता जो मनुष्यों की समझ से परे हो। वह जो भी कार्य करता है, वह सब मनुष्य की सामान्य समझ के दायरे के भीतर होता है, और सामान्य मानवता की समझ से परे नहीं होता, और उसका कार्य मनुष्य की सामान्य जरूरतों के अनुसार किया जाता है। यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य होता है, तो लोग हमेशा से अधिक सामान्य बन जाते हैं, और उनकी मानवता हमेशा से अधिक सामान्य बन जाती है। लोग अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभाव का और मनुष्य के सार का बढ़ता हुआ ज्ञान प्राप्त करते हैं, और वे सत्य के लिए हमेशा से अधिक ललक भी प्राप्त करते हैं। अर्थात्, मनुष्य का जीवन आगे बढ़ता रहता है और मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अधिकाधिक बदलावों से गुजरता रहता है—जिस सबका अर्थ है परमेश्वर का मनुष्य का जीवन बनना। यदि कोई मार्ग उन चीजों को उजागर करने में असमर्थ है जो मनुष्य का सार हैं, मनुष्य के स्वभाव को बदलने में असमर्थ है, और, इससे भी बढ़कर, लोगों को परमेश्वर के सामने लाने में असमर्थ है या उन्हें परमेश्वर की सच्ची समझ प्रदान करने में असमर्थ है, और यहाँ तक कि उसकी मानवता के हमेशा से अधिक निम्न होने और उसकी समझ के हमेशा से अधिक असामान्य होने का कारण बनता है, तो यह मार्ग सच्चा मार्ग नहीं होना चाहिए, और यह दुष्टात्मा का कार्य या पुराना मार्ग हो सकता है। संक्षेप में, यह पवित्र आत्मा का वर्तमान कार्य नहीं हो सकता। तुम लोगों ने इन सभी वर्षों में परमेश्वर पर विश्वास किया है, फिर भी तुम्हें सच्चे और झूठे मार्गों के मध्य अंतर करने या सच्चे मार्ग की तलाश करने के सिद्धांतों का कोई आभास नहीं है। अधिकतर लोग इन मामलों पर ध्यान तक नहीं देते; वे सिर्फ वहाँ चल पड़ते हैं जहाँ बहुसंख्यक जाते हैं, और वह दोहरा देते हैं जो बहुसंख्यक कहते हैं। ऐसे लोग सच्चे मार्ग की खोज करने वाले कैसे हैं? और ऐसे लोग सच्चा मार्ग कैसे पा सकते हैं? यदि तुम इन कुछ मुख्य सिद्धांतों को समझ लो, तो चाहे कुछ भी हो जाए, तुम गुमराह नहीं होगे। आज यह महत्वपूर्ण है कि लोग भेद पहचानने की कुछ क्षमता विकसित करें; यही वह चीज है जो सामान्य मानवता के पास होनी चाहिए, और यही वह चीज है जो लोगों के अनुभव में आनी चाहिए। यदि लोगों ने आज तक अनुगमन किया है और फिर भी वे जरा भी भेद नहीं पहचान सकते और उनकी मानवता का विवेक अभी भी नहीं बढ़ा है, तो वे बहुत भ्रमित हैं और उनका अनुसरण गलत है और उसमें भटकाव हैं। तुमने आज तक अनुसरण किया है लेकिन तुममें भेद पहचानने की जरा-सी भी क्षमता नहीं है, और जबकि यह सत्य है, जैसा कि तुम कहते हो, कि तुमने सच्चा मार्ग तलाश कर लिया है, क्या तुमने उसे प्राप्त कर लिया है? क्या तुमने भेद पहचानने की कोई क्षमता विकसित की है? सच्चे मार्ग का सार क्या है? सच्चे मार्ग में, तुमने सच्चा मार्ग प्राप्त नहीं किया है; तुमने कुछ भी सत्य प्राप्त नहीं किया है। अर्थात्, तुमने वह प्राप्त नहीं किया है, जिसकी परमेश्वर तुमसे अपेक्षा करता है, और इसलिए तुम्हारी भ्रष्टता में कोई परिवर्तन नहीं आया है। यदि तुम इसी तरह अनुसरण करते रहे, तो तुम अंततः हटा दिए जाओगे। आज के दिन तक अनुसरण करके, तुम्हें निश्चित हो जाना चाहिए कि जिस मार्ग को तुमने अपनाया है वह सही मार्ग है, और तुम्हें कोई और संदेह नहीं होने चाहिए। कई लोग हमेशा संदेह से भरे रहते हैं और छोटी-छोटी बातों के कारण सत्य का अनुसरण करना बंद कर देते हैं। ये ऐसे लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर के कार्य का कोई ज्ञान नहीं है; ये वे लोग हैं जो भ्रमित तरीके से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। जो लोग परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते, वे उसके अंतरंग होने या उसकी गवाही देने में असमर्थ हैं। जो लोग केवल आशीषों की तलाश करते हैं और केवल उसकी खोज करते हैं जो कि अज्ञात और अमूर्त है, मैं उन्हें यथाशीघ्र सत्य का अनुसरण करने की सलाह देता हूँ, ताकि उनके जीवन का कोई अर्थ हो सके। अपने आपको अब और मूर्ख मत बनाओ!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 147

भिन्न-भिन्न युगों के आने-जाने के साथ छह हजार वर्षों के दौरान किए गए कार्य की समग्रता धीरे-धीरे बदलती गई है। इस कार्य में आए बदलाव समस्त संसार की परिस्थितियों और एक इकाई के तौर पर मानवजाति की विकासपरक प्रवृत्ति पर आधारित रहे हैं; प्रबंधन का कार्य तदनुसार केवल धीरे-धीरे बदला है। सृष्टि के आरंभ से इस सबकी योजना नहीं बनाई गई थी। संसार का सृजन होने से पहले या इसके तुरंत बाद तक यहोवा ने अभी कार्य के प्रथम चरण यानी व्यवस्था के कार्य, कार्य के दूसरे चरण यानी अनुग्रह के कार्य और कार्य के तीसरे चरण यानी विजय के कार्य की योजना नहीं बनाई थी, जिसमें वह पहले मोआब के कुछ वंशजों से शुरुआत करता और इसके माध्यम से समस्त ब्रह्मांड को जीतता। संसार का सृजन करने के बाद, उसने कभी ये वचन नहीं कहे; न ही उसने ये मोआब के बाद कहे, उसने ये वचन लूत से पहले तो बिल्कुल नहीं कहे। परमेश्वर का समस्त कार्य उसके आगे बढ़ने के साथ ही किया जाता है। उसका छह-हजार-वर्षों का समस्त प्रबंधन कार्य इसी तरह से आगे बढ़ा है; संसार का सृजन करने से पहले उसने किसी भी हाल में “मानवजाति के विकास के लिए सारांश चार्ट” जैसी कोई योजना नहीं लिखी थी। अपने कार्य में परमेश्वर सीधे अपना स्वरूप व्यक्त करता है; वह किसी योजना को बनाने पर मगजपच्ची नहीं करता है। निस्संदेह, बहुत से नबियों ने बहुत सी भविष्यवाणियाँ की हैं, परंतु फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य सदैव एक सटीक योजना पर आधारित रहा है; वे भविष्यवाणियाँ परमेश्वर के उस समय के कार्य के अनुसार की गई थीं। वह जो भी कार्य करता है वह सबसे यथार्थवादी कार्य होता है। वह इसे युगों के विकास के अनुसार कार्यान्वित करता है और इसे यह आधार देता है कि चीजें कैसे बदलती हैं। उसके लिए, कार्य को संपन्न करना किसी बीमारी के लिए सही उपचार का नुस्खा देने के सदृश है; अपना कार्य करते समय वह अवलोकन करता है और अपने अवलोकनों के अनुसार कार्य जारी रखता है। अपने कार्य के प्रत्येक चरण में, परमेश्वर अपनी प्रचुर बुद्धि और अपनी सामर्थ्य को व्यक्त करने में सक्षम है; वह किसी युग विशेष के कार्य के अनुसार अपनी प्रचुर बुद्धि और अधिकार को प्रकट करता है, और उस युग के दौरान अपने द्वारा वापस लाए गए सभी लोगों को अपना समस्त स्वभाव देखने देता है। हर युग में जो भी कार्य करने की जरूरत है उसके अनुसार वह लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है, वह सब कार्य करता है जो उसे करना चाहिए। वह लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति इस आधार पर करता है कि शैतान ने उन्हें किस हद तक भ्रष्ट कर दिया है। यह उसी तरह है जब यहोवा ने आरंभ में आदम और हव्वा का सृजन किया था, उसने ऐसा इसलिए किया ताकि वे पृथ्वी पर परमेश्वर को अभिव्यक्त करने में समर्थ हों और उसकी रचनाओं के बीच परमेश्वर की गवाही दे सकें। किंतु सर्प द्वारा प्रलोभन दिए जाने के बाद हव्वा ने पाप किया, आदम ने भी वही किया; उन दोनों ने बगीचे से अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाया। इस प्रकार, यहोवा के पास उन पर करने के लिए अतिरिक्त कार्य था। उनकी नग्नता देखकर उसने पशुओं की खालों से बने वस्त्रों से उनके शरीर को ढक दिया। इसके बाद उसने आदम से कहा, “तू ने जो अपनी पत्नी की बात सुनी, और जिस वृक्ष के फल के विषय मैं ने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना, उसको तू ने खाया है इसलिये भूमि तेरे कारण शापित है ... और अन्त में मिट्टी में मिल जाएगा क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है; तू मिट्टी तो है और मिट्टी ही में फिर मिल जाएगा।” स्त्री से उसने कहा, “मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दुःख को बहुत बढ़ाऊँगा; तू पीड़ित होकर बालक उत्पन्न करेगी; और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।” उसके बाद से उसने उन्हें अदन की वाटिका से निकाल दिया और उन्हें इसके बाहर वैसे ही जीवन यापन कराया, जैसे लोग आज पृथ्वी पर जीवन जीते हैं। जब परमेश्वर ने आरंभ में मनुष्य का सृजन किया, तब उसने यह योजना नहीं बनाई थी कि सृजन के बाद मनुष्य साँप द्वारा प्रलोभित हो और फिर वह मनुष्य और साँप को शाप दे। उसकी वास्तव में इस प्रकार की कोई योजना नहीं थी; जिस तरह चीज़ों का विकास हुआ उसी ने उसे अपनी रचनाओं के बीच नया कार्य करने को दिया। यहोवा द्वारा पृथ्वी पर आदम और हव्वा के बीच यह कार्य संपन्न करने के बाद मानवजाति कई हजार वर्षों तक विकसित होती रही, तब तक, जब तक कि “यहोवा ने देखा कि मनुष्यों की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है वह निरन्तर बुरा ही होता है। और यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ। ... परन्तु यहोवा के अनुग्रह की दृष्‍टि नूह पर बनी रही।” इस समय यहोवा के पास और अधिक नया कार्य करने के लिए था, क्योंकि जिस मानवजाति का उसने सृजन किया था वह सर्प के प्रलोभन में आने के बाद अत्यधिक पापमय हो चुकी थी। इन परिस्थितियों को देखते हुए, यहोवा ने समस्त मानवता में से बचाने के लिए नूह के परिवार का चयन किया, और संसार को जलप्रलय के द्वारा नष्ट करने का अपना कार्य संपन्न किया। मानवजाति आज के दिन तक भी इसी तरीके से विकसित हो रही है, उत्तरोत्तर भ्रष्ट हो रही है, और जब मानवजाति का विकास अपने शिखर पर पहुँच जाएगा, तब इसका अर्थ मानवजाति का अंत होगा। संसार के बिल्कुल आरंभ से लेकर अंत तक परमेश्वर के कार्य की वास्तविक कहानी सदैव ऐसी ही रही है और सदा ऐसी ही रहेगी। यह वैसा ही है जैसे लोग अपनी-अपनी किस्म के अनुसार छाँटे जाएंगे; यह ऐसा मामला नहीं है कि हर एक प्रकार के व्यक्ति को बिल्कुल आरंभ से एक ख़ास श्रेणी से संबंधित होने के लिए पूर्वनियत कर दिया जाता है, बल्कि इसमें मानवजाति को केवल विकास की एक प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही धीरे-धीरे श्रेणीबद्ध किया जाता है। अंत में, जिस किसी को भी पूरी तरह से बचाया नहीं जा सकता है उसे उसके “पुरखों” के पास लौटा दिया जाएगा। मानवजाति के बीच परमेश्वर का कोई भी कार्य संसार के सृजन के समय पहले से तैयार नहीं किया गया था; बल्कि, यह चीजों का विकास ही है जिसने परमेश्वर को मानवजाति के बीच अधिक वास्तविक एवं व्यावहारिक रूप से कदम-दर-कदम अपना कार्य करने दिया है। उदाहरण के लिए, यहोवा परमेश्वर ने स्त्री को प्रलोभित करने के लिए साँप का सृजन नहीं किया था। यह उसकी कोई विशिष्ट योजना नहीं थी, न ही यह कुछ ऐसा था जिसे उसने जानबूझकर पूर्वनियत किया था। यह कहा जा सकता है कि यह अनपेक्षित घटना थी। इस प्रकार, इसी कारण से यहोवा ने आदम और हव्वा को अदन की वाटिका से निष्कासित किया और फिर कभी मनुष्य का सृजन न करने की शपथ ली। परंतु लोगों को केवल इसी आधार पर परमेश्वर की बुद्धि का पता चलता है। यह वैसा ही है जैसा मैंने पहले कहा था : “मैं अपनी बुद्धि शैतान की साजिशों के आधार पर प्रयोग में लाता हूँ।” चाहे मानवजाति कितनी भी भ्रष्ट हो जाए या साँप उन्हें कैसे भी प्रलोभित करे, यहोवा के पास तब भी अपनी बुद्धि है; इस तरह, जबसे उसने संसार का सृजन किया है, वह नए-नए कार्य में लगा रहा है और उसके कार्य का कोई भी कदम कभी भी दोहराया नहीं गया है। शैतान ने लगातार साजिशें की हैं; मानवजाति लगातार शैतान के द्वारा भ्रष्ट की गई है, और यहोवा परमेश्वर ने अपने बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य को लगातार संपन्न किया है। वह कभी भी असफल नहीं हुआ है, और संसार के सृजन से लेकर अब तक उसने कार्य करना कभी नहीं रोका है। शैतान द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट करने के बाद से, परमेश्वर अपने उस शत्रु को परास्त करने के लिए उनके बीच लगातार कार्य करता रहा है जिसने मानवजाति को भ्रष्ट किया है। यह लड़ाई आरंभ से शुरू हुई है और संसार के अंत तक चलती रहेगी। इतना ज्यादा कार्य करते हुए, यहोवा परमेश्वर ने न केवल शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी मनुष्यजाति को अपने द्वारा महान उद्धार को प्राप्त करने की अनुमति दी है, बल्कि उसे अपनी बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता और अधिकार को देखने की अनुमति भी दी है। इसके अलावा, अंत में वह मानवजाति को दुष्टों को दंड और अच्छों को पुरस्कार देने वाला अपना धार्मिक स्वभाव देखने देगा। उसने आज के दिन तक शैतान के साथ युद्ध किया है और कभी भी पराजित नहीं हुआ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह बुद्धिमान परमेश्वर है और वह अपनी बुद्धि शैतान की साजिशों के आधार पर प्रयोग करता है। और इसलिए परमेश्वर न केवल स्वर्ग की सब चीजों से अपने अधिकार का पालन करवाता है; बल्कि वह पृथ्वी की सभी चीज़ों को अपने पाँव रखने की चौकी के नीचे रखवाता है, और एक अन्य महत्वपूर्ण बात है, वह दुष्टों को, जो मानवजाति पर आक्रमण करते हैं और उसे सताते हैं, अपनी ताड़ना के अधीन करता है। इस कार्य के सभी नतीजे उसकी बुद्धि के कारण प्राप्त होते हैं। उसने मानवजाति के अस्तित्व से पहले अपनी बुद्धि कभी प्रकट नहीं की थी क्योंकि स्वर्ग में, पृथ्वी पर या समस्त ब्रह्मांड में उसका कोई शत्रु नहीं था, और सारी चीजों में अंधकार की शक्तियों की कोई घुसपैठ नहीं थी। जब प्रधान स्वर्गदूत ने उसके साथ विश्वासघात किया तो उसने पृथ्वी पर मानवजाति का सृजन किया, और मानवजाति के कारण ही उसने प्रधान स्वर्गदूत, शैतान के साथ अपना सहस्राब्दी लंबा युद्ध औपचारिक रूप से आरंभ किया—एक ऐसा युद्ध जो हर उत्तरोत्तर चरण के साथ और अधिक घमासान होता जाता है। इनमें से हर चरण में उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि उपस्थित रहती हैं। केवल तभी स्वर्ग और पृथ्वी में हर चीज परमेश्वर की बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता और इससे भी बढ़कर परमेश्वर की व्यावहारिकता को देख चुकी है। वह आज भी अपने कार्य को उसी व्यावहारिक तरीके से संपन्न करता है; इसके अतिरिक्त, जैसे-जैसे वह अपना कार्य करता है, वह अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को भी प्रकट करता है; वह तुम लोगों को कार्य के प्रत्येक चरण की वास्तविक कहानी को देखने देता है, यह देखने देता है कि परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की आखिर कैसे व्याख्या की जाए और इससे भी बढ़कर परमेश्वर की व्यावहारिकता की निर्णायक व्याख्या को देखने देता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 148

पवित्र आत्मा का कार्य सदैव उसके आगे बढ़ने के साथ ही किया जाता है; वह किसी भी समय अपने कार्य की योजना बना सकता है, और कभी भी उसे संपन्न कर सकता है। मैं क्यों सदैव कहता हूँ कि पवित्र आत्मा का कार्य यथार्थवादी होता है, और वह सदैव नया होता है, कभी पुराना नहीं होता, और सदैव सबसे अधिक ताजगी भरा होता है? जब संसार का सृजन किया गया था, तब उसके कार्य की योजना पहले से नहीं बनाई गई थी; ऐसा बिल्कुल भी नहीं हुआ था! कार्य का हर चरण अपने-अपने समय पर समुचित परिणाम प्राप्त करता है और ये चरण एक दूसरे को अस्त-व्यस्त नहीं करते हैं। बहुत बार तुम्हारे मन की योजनाएँ पवित्र आत्मा के नवीनतम कार्य के साथ तालमेल नहीं बिठा सकती हैं। उसका कार्य उतना सरल नहीं है जितने सरल होने का मनुष्य तर्क देता है, न ही उतना जटिल है जैसा मनुष्य कल्पना करता है—इसमें लोगों को उनकी जरूरतों के अनुसार किसी भी समय और किसी भी स्थान पर आपूर्ति करना शामिल है। कोई भी मनुष्यों के सार के बारे में उतना स्पष्ट नहीं है, जितना वह है, और ठीक इसी कारण से कोई भी चीज लोगों की यथार्थपरक आवश्यकताओं के उतनी अनुकूल नहीं हो सकती, जितना उसका कार्य है। इसलिए, मनुष्य के दृष्टिकोण से, उसका कार्य कई सहस्राब्दी पूर्व अग्रिम रूप से योजनाबद्ध किया गया प्रतीत होता है। अब जबकि वह तुम लोगों के बीच कार्य करता है, वह किसी भी समय और किसी भी जगह तुम लोगों की दशाओं के अनुसार कार्य करता और बोलता है। इन दशाओं से सामना होने पर उसके पास बोलने के लिए बिल्कुल सही वचन होते हैं, वह ठीक वे ही वचन बोलता है जिनकी लोगों को आवश्यकता होती है। उसके कार्य के पहले कदम को लो : ताड़ना का समय। उसके बाद परमेश्वर ने अपना कार्य लोगों की अभिव्यक्ति, उनकी विद्रोहशीलता, उनसे उभरी सकारात्मक और नकारात्मक दशाओं के आधार पर संचालित किया और साथ ही इस आधार पर भी कि जब उनकी नकारात्मकता किसी खास बिंदु पर पहुँच जाए तो वे कितने नकारात्मक हो सकते हैं; और परमेश्वर ने अपने कार्य में बेहतर नतीजा हासिल करने के लिए इन चीजों का फायदा उठाया और इनका इस्तेमाल किया। अर्थात, वह लोगों को पोषण देने का कार्य किसी समय-विशेष में उनकी वर्तमान दशा के अनुसार करता है; वह अपने कार्य का हर कदम लोगों की वास्तविक स्थितियों के अनुसार संपन्न करता है। समस्त सृजित प्राणी उसके हाथों में है, वह उन्हें कैसे नहीं जान सकता? परमेश्वर लोगों की स्थितियों के अनुसार, किसी भी समय और स्थान पर, कार्य के उस अगले कदम को कार्यान्वित करता है, जो किया जाना चाहिए। यह कार्य किसी भी तरह से अनादिकाल से पूर्वनियत नहीं किया गया है; यह एक मानवीय धारणा है! वह अपने कार्य के परिणाम देखकर कार्य करता है, और उसका कार्य लगातार अधिक गहन और विकसित होता जाता है; अपने कार्य के नतीजों का अवलोकन करने के बाद वह अपने कार्य के अगले कदम को कार्यान्वित करता है। वह धीरे-धीरे एक स्थिति से दूसरी स्थिति में जाने के लिए और समय के साथ लोगों को अपने नए कार्य का खुलासा करने के लिए कई चीजों का उपयोग करता है। कार्य का यह तरीका लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति करने में समर्थ हो सकता है, क्योंकि परमेश्वर सभी लोगों को बहुत अच्छी तरह से जानता है। वह अपने कार्य को स्वर्ग से इसी तरह संपन्न करता है। इसी प्रकार देहधारी परमेश्वर भी इसी ढंग से अपना कार्य करता है, वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार व्यवस्थाएँ बनाता है और मनुष्यों के बीच कार्य करता है। उसका कोई भी कार्य संसार के सृजन से पहले व्यवस्थित नहीं किया गया था, न ही उसकी पहले से ध्यानपूर्वक योजना बनाई गई थी। संसार के सृजन के दो हजार वर्षों के बाद, यहोवा ने देखा कि मानवजाति किस स्तर तक भ्रष्ट हो गई है, इसलिए उसने यह भविष्यवाणी करने के लिए नबी यशायाह के मुख का उपयोग किया कि व्यवस्था के युग का अंत होने के बाद यहोवा अनुग्रह के युग में मानवजाति को छुटकारा दिलाने का अपना कार्य करेगा। निस्संदेह, यह यहोवा की योजना थी, किंतु यह योजना भी उन परिस्थितियों के अनुसार बनाई गई थी जिनका वह उस समय अवलोकन कर रहा था; उसने आदम का सृजन करने के तुरंत बाद इस बारे में नहीं सोचा था। यशायाह ने केवल भविष्यवाणी कही, किंतु यहोवा ने व्यवस्था के युग के दौरान इस कार्य के लिए अग्रिम तैयारियाँ नहीं की थीं; बल्कि उसने अनुग्रह के युग के आरंभ में इस कार्य की शुरुआत की, जब दूत यूसुफ के स्वप्न में इस प्रकाशन के साथ दिखाई दिया कि परमेश्वर देहधारी बनेगा और केवल तभी देहधारण का उसका कार्य आरंभ हुआ। परमेश्वर ने संसार के सृजन के ठीक बाद अपने देहधारण के कार्य के लिए तैयारी नहीं कर ली थी, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं; इसका निर्णय केवल मानवजाति के विकास की मात्रा और शैतान के साथ परमेश्वर के युद्ध की स्थिति के आधार पर लिया गया था।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 149

जब परमेश्वर देह बनता है, तो उसका आत्मा किसी इंसान पर उतरता है; दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का आत्मा भौतिक शरीर धारण करता है। पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए वह अपने साथ कुछ सीमित कदम लाने के लिए नहीं आता; उसका कार्य पूर्णतया असीमित होता है। पवित्र आत्मा देह में रहकर जो कार्य करता है, वह भी उसके कार्य के परिणामों द्वारा ही निर्धारित होता है और वह इन चीजों का उपयोग उस समयावधि का निर्धारण करने के लिए करता है, जिसमें वह देह में रहते हुए कार्य करेगा। पवित्र आत्मा अपने कार्य में आगे बढ़ते हुए उसकी जाँच करके उसके प्रत्येक चरण को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करता है; यह कार्य ऐसा कुछ अलौकिक नहीं है कि मानवीय कल्पना की सीमाओं को विस्तार दे दे। यह यहोवा द्वारा आकाश और पृथ्वी और अन्य सब वस्तुओं के सृजन के कार्य के समान है; उसने साथ-साथ योजना बनाई और कार्य किया। उसने रोशनी को अंधकार से अलग किया और सुबह और शाम अस्तित्व में आईं—इसमें एक दिन लगा। दूसरे दिन उसने आकाश बनाया और इसमें भी एक दिन लगा; फिर उसने पृथ्वी, समुद्र और उन्हें आबाद करने वाले सब प्राणी बनाए, जिसमें एक दिन और लगा। यह छठे दिन तक चला, जब परमेश्वर ने मनुष्य का सृजन किया और उससे पृथ्वी पर सभी चीजों का प्रबंधन कराया। तब सातवें दिन, जब उसने सभी चीजों का सृजन पूरा कर लिया, तब उसने विश्राम किया। परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दिया और उसे पवित्र दिन के रूप में निर्दिष्ट किया। उसने इस पवित्र दिन को स्थापित करने का निर्णय सभी चीजों का सृजन करने के बाद ही लिया, उनका सृजन करने से पहले नहीं। यह कार्य भी उसके आगे बढ़ने के साथ ही किया गया था; सभी चीजों का सृजन करने से पहले उसने छह दिनों में संसार का सृजन करना और सातवें दिन विश्राम करना तय नहीं किया था; यह बिल्कुल भी तथ्य के अनुरूप नहीं है। उसने ऐसा कुछ नहीं कहा था, न ही इसकी योजना बनाई थी। उसने यह कदापि नहीं कहा था कि सभी चीजों का सृजन छठे दिन पूरा किया जाएगा और सातवें दिन वह विश्राम करेगा; बल्कि उसे उस समय जो अच्छा लगा, उसके अनुसार उसने सृजन किया। जब उसने सभी चीजों का सृजन समाप्त कर लिया, तो छठा दिन हो चुका था। यदि वह पाँचवाँ दिन रहा होता, जब उसने सभी चीजों का सृजन करना समाप्त किया होता, तो उसने छठे दिन को पवित्र दिन के रूप में निर्दिष्ट किया होता। किंतु वास्तव में उसने सभी चीजों का सृजन करना छठे दिन समाप्त किया, और इसलिए सातवाँ दिन पवित्र दिन बन गया, जो आज तक चला आ रहा है। इसलिए, उसका वर्तमान कार्य इसी तरीके से संपन्न किया जा रहा है। वह तुम लोगों की दशाओं के अनुसार तुम लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति करने के लिए बोलता है। अर्थात्, आत्मा लोगों की दशाओं के अनुसार बोलता और कार्य करता है; वह सबकी पड़ताल करता है और किसी भी समय, किसी भी स्थान पर कार्य करता है। मैं जो कुछ करता हूँ, कहता हूँ, तुम लोगों पर रखता हूँ और तुम लोगों को प्रदान करता हूँ, बिना अपवाद के वह वो है जिसकी तुम लोगों को आवश्यकता है। इस प्रकार, मेरा कोई भी कार्य वास्तविकता से अलग नहीं है; वह सब व्यावहारिक है, क्योंकि तुम सब लोग जानते हो कि “परमेश्वर का आत्मा सबकी पड़ताल करता है।” यदि यह सब समय से पहले तय किया गया होता तो क्या यह कतई पत्थर की लकीर न हो जाती? तुम्हें लगता है कि परमेश्वर ने पूरी छह सहस्राब्दियों की योजना बना ली और फिर मानवजाति को विद्रोही, प्रतिरोधी, कुटिल और धोखेबाज होने, देह की भ्रष्टता, शैतानी स्वभाव, आँखों की वासना और व्यक्तिगत भोग-विलासों से युक्त होने के लिए पूर्वनियत किया। इसमें से कुछ भी परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत नहीं किया गया था, बल्कि यह सब कुछ शैतान की भ्रष्टता के परिणामस्वरूप हुआ। कुछ लोग कह सकते हैं, “क्या शैतान भी परमेश्वर की मुट्ठी में नहीं था? परमेश्वर ने पूर्वनियत किया था कि शैतान मनुष्य को इस तरह से भ्रष्ट करेगा, और उसके बाद परमेश्वर ने मनुष्य पर अपना कार्य संपन्न किया।” क्या परमेश्वर वास्तव में मानवजाति को भ्रष्ट करने के लिए शैतान को पूर्वनियत करेगा? परमेश्वर तो केवल मानवजाति को सामान्य रूप से जीने देने के लिए अत्यधिक उत्सुक है, तो क्या वह उसके जीवन में विघ्न डालेगा? अगर ऐसा होता, तो क्या शैतान को हराना और मानवजाति को बचाना एक निरर्थक प्रयास न होता? मानवजाति की विद्रोहशीलता कैसे पूर्वनियत की जा सकती थी? यह शैतान के विघ्न के कारण पैदा हुई चीज है, तो यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत कैसे की जा सकती थी? शैतान के परमेश्वर की पकड़ में होने की जैसी तुम लोग कल्पना करते हो, वह शैतान के परमेश्वर की पकड़ में होने को मैं जिस रूप में कहता हूँ, उससे बिल्कुल अलग है। तुम लोगों के कथनों के अनुसार कि “परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, और शैतान उसके हाथों में है,” शैतान उसके साथ कभी विश्वासघात नहीं कर सकता। क्या तुमने यह नहीं कहा कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है? तुम लोगों का ज्ञान अत्यधिक अमूर्त और वास्तविकता से अछूता है; मनुष्य कभी भी परमेश्वर के विचारों या उसकी बुद्धि की थाह नहीं पा सकता! परमेश्वर सर्वशक्तिमान है; यह बिल्कुल भी गलत नहीं है। प्रधान स्वर्गदूत ने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया, क्योंकि परमेश्वर ने आरंभ में उसे अधिकार का एक भाग दिया था। निस्संदेह, यह एक अनपेक्षित घटना थी, जैसे कि हव्वा का साँप के बहकावे में आना। किंतु शैतान चाहे किसी भी तरह से विश्वासघात करे, वह फिर भी उतना सर्वशक्तिमान नहीं है, जितना कि परमेश्वर है। जैसा कि तुम लोगों ने कहा है, शैतान महज शक्तिमान है; वह चाहे जो भी करे, परमेश्वर का अधिकार उसे सदैव पराजित करेगा। “परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, और शैतान उसके हाथों में है,” कथन के पीछे यही वास्तविक अर्थ है। इसलिए, शैतान के साथ युद्ध को एक बार में एक कदम आगे बढ़ाया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर शैतान की साजिशों के जवाब में अपने कार्य की योजना बनाता है—अर्थात् वह मानवजाति के लिए उद्धार उस रूप में लाता है और अपनी बुद्धि एवं सर्वशक्तिमत्ता उस रूप में प्रकट करता है, जो युग के लिए उपयुक्त है। इसी प्रकार, अंत के दिनों का कार्य अनुग्रह के युग से पहले पूर्वनियत नहीं किया गया था; चीजों को ऐसे व्यवस्थित ढंग से पूर्वनियत नहीं किया जाता है : पहले, मनुष्य के बाहरी स्वभाव में परिवर्तन करना; दूसरे, मनुष्य को परमेश्वर की ताड़ना और परीक्षणों का भागी बनाना; तीसरे, मनुष्य को मृत्यु के परीक्षण से गुजारना; चौथे, मनुष्य को परमेश्वर से प्रेम करने के समय का अनुभव कराना और एक सृजित प्राणी का संकल्प व्यक्त कराना; पाँचवें, मनुष्य को परमेश्वर के इरादे दिखाना और परमेश्वर को पूर्णतः जानने देना, और अंततः मनुष्य को पूर्ण करना। इन सब चीजों की योजना उसने अनुग्रह के युग के दौरान नहीं बनाई; बल्कि उसने इनकी योजना वर्तमान युग में बनानी आरंभ की। शैतान कार्य कर रहा है, वैसे ही परमेश्वर भी कार्य कर रहा है। शैतान अपना भ्रष्ट स्वभाव व्यक्त करता है, जबकि परमेश्वर सीधे बोलता और वचन व्यक्त करता है, कुछ मूलभूत चीजों को उजागर करता है। आज यही कार्य किया जा रहा है, और कार्य करने का यही सिद्धांत बहुत पहले, संसार के सृजन के बाद उपयोग में लाया गया था।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 150

पहले, परमेश्वर ने आदम और हव्वा का सृजन किया, और उसने साँप का भी सृजन किया। सभी चीजों में साँप सर्वाधिक विषैला था; उसकी देह में विष था, जिसका उपयोग शैतान ने साँप का लाभ उठाने के लिए किया। साँप ने ही हव्वा को पाप करने के लिए ललचाया। हव्वा के बाद आदम ने पाप किया, और तब वे दोनों अच्छे और बुरे के बीच भेद करने में समर्थ हो गए। यदि यहोवा जानता था कि साँप हव्वा को प्रलोभित करेगा और हव्वा आदम को प्रलोभित करेगी, तो उसने उन सबको एक ही वाटिका के भीतर क्यों रखा? यदि वह इन चीजों का पूर्वानुमान करने में समर्थ था, तो उसने क्यों साँप की रचना की और उसे अदन की वाटिका के भीतर रखा? अदन की वाटिका में अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल क्यों था? क्या वह चाहता था कि वे उस फल को खाएँ? जब यहोवा आया, तब न आदम और न हव्वा ने उसका सामना करने का साहस किया और तब जाकर यहोवा को पता चला कि उन्होंने अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खा लिया है और वे साँप के छल-कपट का शिकार बन चुके हैं। अंत में, उसने साँप को शाप दिया, और उसने आदम और हव्वा को भी शाप दिया। जब उन दोनों ने उस वृक्ष के फल को खाया, तब यहोवा को बिल्कुल भी पता नहीं था कि वे ऐसा कर रहे हैं। मानवजाति दुष्ट और यौन स्वच्छंद होने की हद तक भ्रष्ट हो गई, यहाँ तक कि उनके हृदयों में जो कुछ भी था वह सिर्फ बुरा और अधार्मिक था; यह सिर्फ गंदगी थी। इसलिए, यहोवा को मानवजाति का सृजन करने पर पछतावा हुआ। उसके बाद उसने संसार को जलप्रलय के द्वारा नष्ट करने का अपना कार्य संपन्न किया, जिसमें नूह और उसके पुत्र बच गए। कुछ चीजें वास्तव में इतनी अधिक उन्नत और अलौकिक नहीं होती हैं जितनी लोग कल्पना कर सकते हैं। कुछ लोग पूछते हैं, “चूँकि परमेश्वर जानता था कि प्रधान स्वर्गदूत उसके साथ विश्वासघात करेगा, तो परमेश्वर ने उसका सृजन क्यों किया?” तथ्य ये हैं : पृथ्वी के अस्तित्व से पहले, प्रधान स्वर्गदूत स्वर्ग के स्वर्गदूतों में सबसे महान था। स्वर्ग के सभी स्वर्गदूतों पर उसका अधिकार था; और यह अधिकार उसे परमेश्वर ने दिया था। परमेश्वर के अपवाद के साथ, वह स्वर्ग के स्वर्गदूतों में सर्वोच्च था। बाद में जब परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया, तब प्रधान स्वर्गदूत ने पृथ्वी पर परमेश्वर से और भी बड़ा विश्वासघात किया। मैं कहता हूँ कि उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात इसलिए किया क्योंकि वह मानवजाति का प्रबंधन करना चाहता था और परमेश्वर के अधिकार को मात देना चाहता था। यह प्रधान स्वर्गदूत ही था जिसने हव्वा को पाप करने के लिए ललचाया; उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित करना और मानवजाति से परमेश्वर को धोखा दिलाकर अपना आज्ञापालन करवाना चाहता था। उसने देखा कि बहुत-सी चीजें हैं जो उसका आज्ञापालन कर सकती थीं—स्वर्गदूत उसकी आज्ञा मान सकते थे, ऐसे ही पृथ्वी पर लोग भी उसकी आज्ञा मान सकते थे। पृथ्वी पर पक्षी और पशु, वृक्ष और जंगल, पर्वत और नदियाँ और सभी वस्तुएँ मनुष्य—अर्थात, आदम और हव्वा—की देखभाल के अधीन थीं, जबकि आदम और हव्वा प्रधान स्वर्गदूत का आज्ञापालन करते थे। इसलिए प्रधान स्वर्गदूत परमेश्वर के अधिकार से आगे बढ़ना और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना चाहता था। इसके बाद उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने के लिए बहुत से स्वर्गदूतों की अगुआई की, जो बाद में विभिन्न अशुद्ध आत्माएँ बन गए। क्या आज के दिन तक मानवजाति का विकास प्रधान स्वर्गदूत की भ्रष्टता के कारण नहीं है? मानवजाति जैसी आज है, केवल इसलिए है क्योंकि प्रधान स्वर्गदूत ने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया और मानवजाति को भ्रष्ट कर दिया। यह कदम-दर-कदम कार्य उतना अमूर्त और आसान नहीं है जितना कि लोग कल्पना कर सकते हैं। शैतान ने एक कारणवश विश्वासघात किया, फिर भी लोग इतनी आसान-सी बात को समझने में असमर्थ हैं। जिस परमेश्वर ने स्वर्ग और पृथ्वी और सब वस्तुओं का सृजन किया, उसने क्यों शैतान का भी सृजन किया? चूँकि परमेश्वर शैतान से बहुत अधिक नफरत करता है, और शैतान परमेश्वर का शत्रु है, तो परमेश्वर ने उसका सृजन क्यों किया? शैतान का सृजन करके, क्या वह एक शत्रु का सृजन नहीं कर रहा था? परमेश्वर ने वास्तव में एक शत्रु का सृजन नहीं किया था; बल्कि उसने एक स्वर्गदूत का सृजन किया था, और बाद में इस स्वर्गदूत ने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया। उसका रुतबा इतना ऊँचा हो गया था कि उसमें परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने की इच्छा होने लगी। कहा जा सकता है कि यह मात्र एक संयोग था, परंतु यह अपरिहार्य भी था। यह उस बात के समान है कि कैसे कोई व्यक्ति एक निश्चित आयु तक बढ़ने के बाद अपरिहार्य रूप से मरेगा; चीजें उस स्तर तक विकसित हो चुकी हैं। कुछ बेतुके और मूर्ख लोग कहते हैं : “जब शैतान तुम्हारा शत्रु है, तो तुमने उसका सृजन क्यों किया? क्या तुम नहीं जानते थे कि प्रधान स्वर्गदूत तुम्हारे साथ विश्वासघात करेगा? क्या तुम अनंतकाल से अनंतकाल में नहीं झाँकते हो? क्या तुम प्रधान स्वर्गदूत की प्रकृति को नहीं जानते थे? जब तुम्हें स्पष्ट रूप से पता था कि वह तुम्हारे साथ विश्वासघात करेगा, तो तुमने उसे प्रधान स्वर्गदूत क्यों बनाया? न सिर्फ उसने तुम्हारे साथ विश्वासघात किया, बल्कि उसने कितने ही स्वर्गदूतों की अगुआई करते हुए उन्हें अपने साथ ले लिया और मनुष्यजाति को भ्रष्ट करने के लिए नश्वरों के संसार में उतर आया; और आज तक तुम अपनी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना को पूरा करने में असमर्थ रहे हो।” क्या ये शब्द सही हैं? जब तुम इस तरीके से सोचते हो, तो क्या तुम मानसिक ऊर्जा बर्बाद नहीं कर रहे हो? कुछ अन्य लोग हैं जो कहते हैं : “यदि शैतान ने वर्तमान समय तक मानवजाति को भ्रष्ट नहीं किया होता, तो परमेश्वर ने मानवजाति का इस प्रकार उद्धार नहीं किया होता। ऐसे में परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता अदृश्य ही रहतीं; उसकी बुद्धि कहाँ प्रकट होती? शैतान के लिए परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया; ताकि वह भविष्य में अपनी सर्वशक्तिमत्ता प्रकट कर सके—अन्यथा मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि को कैसे खोज सकता था? यदि मनुष्य ने परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं किया और उसके प्रति विद्रोह नहीं किया होता, तो परमेश्वर के कर्मों का खुलासा करना आवश्यक नहीं होता। यदि सारे सृजित प्राणी परमेश्वर की आराधना करें और उसकी आज्ञा मानें, तो उसके पास करने के लिए कोई कार्य नहीं होगा।” यह वास्तविकता से और भी दूर है, क्योंकि परमेश्वर के बारे में कुछ भी गंदा नहीं है, इसलिए वह गंदगी का सृजन नहीं कर सकता है। वह अब अपने कर्मों को केवल इसलिए प्रकट करता है ताकि अपने शत्रु को परास्त करे, अपने द्वारा सृजित मानव को बचाए, उन दुष्ट आत्माओं और शैतान को पराजित करे, जो उससे घृणा करते हैं, विश्वासघात करते हैं, और उसका प्रतिरोध करते हैं, जो बिल्कुल आरंभ में उसके अधिकार क्षेत्र के अधीन थे और उसी से संबंधित थे। वह इन दुष्ट आत्माओं को पराजित करना चाहता है और ऐसा करके वह समस्त चीजों पर अपनी सर्वशक्तिमत्ता प्रकट करना चाहता है। मानवजाति और पृथ्वी पर सभी वस्तुएँ अब शैतान की सत्ता के अधीन हैं और दुष्टों की सत्ता के अधीन हैं। परमेश्वर अपने कर्मों को सभी चीजों पर प्रकट करना चाहता है ताकि लोग उसे जान सकें, और परिणामस्वरूप शैतान को हरा सके और अपने शत्रुओं को पूरी तरह पस्त कर सके। इस कार्य की समग्रता परमेश्वर के कर्मों के प्रकट होने के माध्यम से संपन्न होती है। उसकी सभी रचनाएँ शैतान की सत्ता के अधीन हैं, इसलिए वह उनके सामने अपनी सर्वशक्तिमत्ता प्रकट करना चाहता है, और परिणामस्वरूप शैतान को पराजित करना चाहता है। यदि शैतान नहीं होता, तो परमेश्वर को अपने कर्म प्रकट करने की जरूरत न पड़ती। यदि शैतान ने विघ्न न डाला होता तो मानवजाति को सृजित करने के बाद परमेश्वर मनुष्यों को अदन की वाटिका में रहने ले जाता। शैतान के विश्वासघात से पहले परमेश्वर ने अपने सारे कर्म स्वर्गदूतों या प्रधान स्वर्गदूत को कभी प्रकट क्यों नहीं किए? यदि आरंभ में स्वर्गदूतों और प्रधान स्वर्गदूत ने परमेश्वर को जान लिया होता और उसके प्रति समर्पण कर लिया होता तो वह ये निरर्थक कार्यकलाप न करता। क्योंकि शैतान और दानव मौजूद हैं और क्योंकि मनुष्य परमेश्वर का प्रतिरोध करता है और वह विद्रोही स्वभावों से लबालब भरा हुआ है, इसलिए परमेश्वर अपने कर्मों को प्रकट करेगा। क्योंकि वह शैतान से युद्ध करेगा, इसलिए शैतान को पराजित करने के लिए वह अवश्य अपने अधिकार का उपयोग करेगा और अपने सभी कर्मों का उपयोग करेगा; इस तरह, परमेश्वर द्वारा मनुष्यों के बीच किया गया उद्धार का कार्य उन्हें उसकी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को देखने देगा। आज परमेश्वर जो कार्य करता है, वह अर्थपूर्ण है, और किसी भी तरह से वैसा नहीं है जैसाकि कुछ लोग कहते हैं : “क्या तुम जो कार्य करते हो वह विरोधाभासी नहीं है? क्या कार्य का यह सिलसिला अपने आपके लिए विघ्न पैदा करने के लिए किया गया काम नहीं है? तुमने शैतान का सृजन किया, फिर उसे तुम्हारे साथ विश्वासघात और तुम्हारा प्रतिरोध करने दिया। तुमने मानवजाति का सृजन किया, और फिर उसे शैतान को सौंप दिया, और तुमने आदम और हव्वा को प्रलोभित होने दिया। चूँकि तुमने ये सारी चीजें जानबूझकर की हैं, फिर क्यों तुम मानवजाति से नफरत करते हो? तुम शैतान से नफरत क्यों करते हो? क्या ये चीजें तुम्हारे स्वयं के द्वारा बनाई हुई नहीं हैं? इसमें तुम्हारे लिए घृणा करने वाली क्या बात है?” बहुत से बेहूदा लोग इस तरह की बातें कहते हैं। वे परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, परंतु वे अपने हृदयों की गहराई में परमेश्वर के बारे में शिकायत करते हैं। कितनी विरोधाभासी बात है! तुम तथ्यों को नहीं समझते हो, तुम्हारे पास बहुत-से अलौकिक विचार हैं, और तुम यहाँ तक दावा करते हो कि परमेश्वर ने गलती की है—तुम कितने बेहूदा हो! यह तुम्हीं हो जो सत्य के साथ हेराफेरी करते हो; इसलिए बात यह नहीं है कि परमेश्वर ने गलती की है! कुछ लोग तो बार-बार शिकायत करते हैं : “यह तुम ही थे जिसने शैतान का सृजन किया, और तुमने ही शैतान को मनुष्यों के बीच भेज दिया और उन्हें उसके हवाले कर दिया। मनुष्यों द्वारा शैतानी स्वभाव धारण कर लेने के बाद तुमने उन्हें क्षमा नहीं किया; इसके विपरीत, तुमने उनसे एक हद तक नफरत की। आरंभ में तुमने मनुष्य को एक हद तक प्रेम किया, लेकिन अब तुम मानवजाति से नफरत करते हो। यह तुम ही हो जो मानवजाति से नफरत करते हो, लेकिन तुम वह भी हो जिसने मानवजाति से प्रेम किया है। आखिर यह क्या हो रहा है? क्या यह एक विरोधाभास नहीं है?” इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग इसे कैसे देखते हो, स्वर्ग में यही हुआ था; प्रधान स्वर्गदूत ने इसी तरह से परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया था और मानवजाति को इसी प्रकार भ्रष्ट किया गया, और आज के दिन तक मनुष्य ऐसे ही चलता रहा है। इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि तुम इसे किन शब्दों में व्यक्त करते हो, पूरी कहानी यही है। फिर भी, तुम लोगों को यह अवश्य समझना चाहिए कि परमेश्वर वर्तमान में जो कार्य कर रहा है, उसका पूरा उद्देश्य तुम लोगों को बचाना और शैतान को पराजित करना है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 151

परमेश्वर लोगों के प्रबंधन का उपयोग शैतान को पराजित करने के लिए करता है। लोगों को भ्रष्ट करके शैतान लोगों के भाग्य का अंत कर देता है और परमेश्वर के कार्य में बाधा डालता है। दूसरी ओर, परमेश्वर का कार्य मनुष्यों का उद्धार करना है। परमेश्वर के कार्य का कौन-सा कदम मानवजाति को बचाने के अभिप्राय से नहीं है? कौन-सा कदम लोगों को शुद्ध करने, उनसे धार्मिक आचरण करवाने और उन्हें एक प्यारी छवि जीने देने के लिए नहीं है? लेकिन शैतान ऐसा नहीं करता है। वह मानवजाति को भ्रष्ट करता है; मानवजाति को भ्रष्ट करने के अपने कार्य को ब्रह्मांड के अंदर निरंतर करता रहता है। निस्संदेह, परमेश्वर भी अपना स्वयं का कार्य करता है। वह शैतान की ओर जरा भी ध्यान नहीं देता है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि शैतान के पास कितना अधिकार है, उसे यह अधिकार परमेश्वर द्वारा ही दिया गया था; परमेश्वर ने उसे अपना पूरा अधिकार नहीं दिया था, और इसलिए वह चाहे जो कुछ करे, वह परमेश्वर से आगे नहीं बढ़ सकता और सदैव परमेश्वर की पकड़ में रहेगा। परमेश्वर ने स्वर्ग में रहने के समय अपने किसी भी कर्म को प्रकट नहीं किया। उसने शैतान को स्वर्गदूतों पर नियंत्रण रखने की अनुमति देने के लिए उसे अपने अधिकार में से मात्र कुछ हिस्सा ही दिया था। इसलिए वह चाहे जो कुछ करे, वह परमेश्वर के अधिकार से बढ़कर नहीं हो सकता है, क्योंकि परमेश्वर ने मूल रूप से उसे जो अधिकार दिया है वह सीमित है। जैसे-जैसे परमेश्वर कार्य करता है, शैतान बाधा डालता है। अंत के दिनों में, उसके विघ्न समाप्त हो जाएंगे; उसी तरह, परमेश्वर का कार्य भी पूरा हो जाएगा, और परमेश्वर जिन लोगों को पूर्ण करना चाहता है उन्हें पूर्ण कर दिया जाएगा। परमेश्वर लोगों को सकारात्मक रूप से निर्देशित करता है; उसका जीवन जीवित जल है, अपार और असीम है। शैतान ने मनुष्य को एक हद तक भ्रष्ट किया है; अंत में, जीवन का जीवित जल मनुष्य को पूर्ण करेगा और शैतान के लिए हस्तक्षेप करना और अपना कार्य करना असंभव हो जाएगा। इस प्रकार, परमेश्वर इन लोगों को पूर्णतः प्राप्त करने में समर्थ हो जाएगा। शैतान अब भी विद्रोही बना रहता है; वह लगातार परमेश्वर से होड़ करने की कोशिश में लगा रहता है, परंतु परमेश्वर उस पर कोई ध्यान नहीं देता है। परमेश्वर ने कहा है, “मैं शैतान की सभी अंधकार की शक्तियों के ऊपर और उसके सभी अंधकारमय प्रभावों के ऊपर विजय प्राप्त करूँगा।” यही वह कार्य है जो देह में किया जाना है और यही परमेश्वर के देहधारण का महत्व भी है : अंत के दिनों में शैतान को पराजित करने के कार्य के चरण को पूरा करना और शैतान की सभी चीजों को मिटाना। परमेश्वर की शैतान पर विजय अपरिहार्य है! वास्तव में शैतान बहुत पहले ही असफल हो चुका है। जब बड़े लाल अजगर के पूरे देश में सुसमाचार फैलने लगा—अर्थात्, जब देहधारी परमेश्वर ने कार्य करना आरंभ किया और यह कार्य आगे बढ़ने लगा—शैतान बुरी तरह परास्त हो गया था, क्योंकि देहधारण का मूल उद्देश्य ही शैतान को पराजित करना था। शैतान ने देखा कि परमेश्वर एक बार फिर से देहधारी हुआ है और उसने अपना कार्य करना भी आरंभ कर दिया, जिसे कोई भी शक्ति रोक नहीं सकती, और जब उसने इस कार्य को देखा, तो वह अवाक रह गया और उसने कुछ और करने का साहस नहीं किया। पहले-पहल तो शैतान ने सोचा कि उसके पास भी प्रचुर बुद्धि है, और उसने परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी की और विघ्न डाला; लेकिन, उसने यह आशा नहीं की थी कि परमेश्वर एक बार फिर देह बन जाएगा, या अपने कार्य में, परमेश्वर शैतान के विद्रोहीपन का उपयोग मानवजाति को उजागर करने और उसका न्याय करने में करेगा, जिससे वह मनुष्यों को जीतेगा और शैतान को पराजित करेगा। परमेश्वर शैतान की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान है, और उसका कार्य शैतान के कार्य से बहुत बढ़कर है। इसलिए, जैसा मैंने पहले कहा था : “मैं जिस कार्य को करता हूँ वह शैतान की साजिशों के जवाब में किया जाता है; अंत में, मैं अपनी सर्वशक्तिमत्ता और शैतान की सामर्थ्यहीनता को प्रकट करूँगा।” परमेश्वर अपना कार्य करते हुए सामने रहेगा, जबकि शैतान बाधा डालने के लिए लगातार उसके पीछे लगा रहेगा, जब तक कि अंत में वह अंततः नष्ट नहीं हो जाता है—उसे पता भी नहीं चलेगा कि उस पर किस चीज ने प्रहार किया! कुचलकर चूर-चूर कर दिए जाने के बाद ही उसे सत्य का ज्ञान होगा और तब तक वह आग की झील में पहले ही जलाया जा चुका होगा। तब क्या वह पूरी तरह से विश्वस्त नहीं हो जाएगा? क्योंकि उसके पास चलने के लिए और कोई चालें नहीं होंगी!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 152

मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य मनुष्य से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि मनुष्य ही इस कार्य का लक्ष्य और परमेश्वर द्वारा रचा गया एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो परमेश्वर की गवाही दे सकता है। मनुष्य का जीवन और उसके समस्त क्रियाकलाप परमेश्वर से अलग नहीं किए जा सकते और वे सब परमेश्वर के हाथों से नियंत्रित किए जाते हैं, यहाँ तक कि यह भी कहा जा सकता है कि कोई भी व्यक्ति परमेश्वर से स्वतंत्र होकर अस्तित्व में नहीं रह सकता। कोई भी इसे नकार नहीं सकता, क्योंकि यह एक तथ्य है। परमेश्वर जो कुछ भी करता है, वह सब मानवजाति के लाभ के लिए और शैतान के षड्यंत्रों के विरुद्ध होता है। वह सब कुछ, जिसकी मनुष्य को आवश्यकता होती है, परमेश्वर से आता है, और परमेश्वर ही मनुष्य के जीवन का स्रोत है। इस प्रकार, मनुष्य परमेश्वर से अलग होने में एकदम असमर्थ है। इतना ही नहीं, परमेश्वर का मनुष्य से अलग होने का कभी कोई इरादा भी नहीं रहा। जो कार्य परमेश्वर करता है, वह संपूर्ण मानवजाति के लिए है और उसके विचार सदैव दयालु होते हैं। तो मनुष्य के लिए परमेश्वर का कार्य और परमेश्वर के विचार (अर्थात् परमेश्वर के इरादे) दोनों ही ऐसे “दर्शन” हैं, जिन्हें मनुष्य को जानना चाहिए। ऐसे दर्शन परमेश्वर का प्रबंधन भी हैं, और यह ऐसा कार्य है, जिसे करने में मनुष्य अक्षम है। इस बीच, परमेश्वर द्वारा अपने कार्य के दौरान मनुष्य से की जाने वाली अपेक्षाएँ मनुष्य का “अभ्यास” कहलाती हैं। दर्शन स्वयं परमेश्वर का कार्य हैं, या वे मानवजाति के लिए उसके इरादे हैं या उसके कार्य के लक्ष्य और महत्व हैं। दर्शनों को प्रबंधन का एक हिस्सा भी कहा जा सकता है, क्योंकि यह प्रबंधन परमेश्वर का कार्य है, और मनुष्य की ओर निर्देशित है, जिसका अभिप्राय है कि यह वह कार्य है, जिसे परमेश्वर मनुष्यों के बीच करता है। यह कार्य वह प्रमाण और वह मार्ग है, जिसके माध्यम से मनुष्य परमेश्वर को जान पाता है, और मनुष्य के लिए इसका अत्यधिक महत्व है। यदि परमेश्वर के कार्य के ज्ञान पर ध्यान देने के बजाय लोग केवल परमेश्वर में विश्वास के सिद्धांतों पर या तुच्छ महत्वहीन ब्योरों पर ही ध्यान देते हैं, तो वे परमेश्वर को जान ही नहीं पाएँगे, वे परमेश्वर के इरादों के अनुरूप तो बिल्कुल नहीं होंगे। परमेश्वर का जो कार्य परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान के लिए अत्यधिक सहायक है, दर्शन कहलाता है। ये दर्शन परमेश्वर का कार्य हैं, परमेश्वर के इरादे हैं और परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य और महत्व हैं, जो सब मनुष्य के लाभ के लिए हैं। अभ्यास का तात्पर्य उससे है, जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए, जो परमेश्वर का अनुसरण करने वाले सृजित प्राणियों द्वारा किया जाना चाहिए—दूसरे शब्दों में, यह मनुष्य का कर्तव्य है। जो मनुष्य को करना चाहिए, वह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे मनुष्य द्वारा बिल्कुल आरंभ से ही समझ लिया गया था, बल्कि ये वे अपेक्षाएँ हैं जो परमेश्वर अपने कार्य के दौरान मनुष्य से करता है। जैसे-जैसे परमेश्वर कार्य करता जाता है, ये अपेक्षाएँ धीरे-धीरे अधिक गहरी और अधिक उन्नत होती जाती हैं। उदाहरण के लिए, व्यवस्था के युग के दौरान मनुष्य को व्यवस्था का पालन करना था, और अनुग्रह के युग के दौरान मनुष्य को सलीब को सहना था। राज्य का युग भिन्न है : इसमें मनुष्य से की जाने वाली अपेक्षाएँ व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान की गई अपेक्षाओं से ऊँची हैं। जैसे-जैसे दर्शन अधिक उन्नत होते जाते हैं, मनुष्य से अपेक्षाएँ भी पहले से अधिक उन्नत, और पहले से अधिक स्पष्ट तथा अधिक व्यावहारिक होती जाती हैं। इसी प्रकार, दर्शन भी उत्तरोत्तर व्यावहारिक होते जाते हैं। ये अनेक व्यावहारिक दर्शन न केवल परमेश्वर के प्रति मनुष्य के बेहतर समर्पण में मदद करते हैं, बल्कि इससे भी बढ़कर, वे परमेश्वर के बारे में उसके ज्ञान के लिए भी सहायक हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 153

पिछले युगों की तुलना में राज्य के युग के दौरान परमेश्वर का कार्य अधिक वास्तविक, मनुष्य के सार और उसके स्वभाव में परिवर्तनों पर अधिक निर्देशित और उन सभी को स्वयं परमेश्वर की गवाही देने में अधिक समर्थ है जो उसका अनुसरण करते हैं। दूसरे शब्दों में, राज्य के युग के दौरान जब परमेश्वर कार्य करता है, तो वह मनुष्य को अतीत के किसी भी समय की तुलना में स्वयं को अधिक दिखाता है, जिसका अर्थ है कि वे दर्शन, जो मनुष्य को जानने चाहिए, किसी भी पिछले युग की तुलना में अधिक ऊँचे हैं। चूँकि मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य अभूतपूर्व क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है, इसलिए राज्य के युग के दौरान मनुष्य द्वारा जाने गए दर्शन संपूर्ण प्रबंधन कार्य में सर्वोच्च हैं। परमेश्वर का कार्य अभूतपूर्व क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है, इसलिए मनुष्य द्वारा ज्ञात किए जाने वाले दर्शन सभी दर्शनों में सर्वोच्च बन गए हैं, और इसके परिणामस्वरूप मनुष्य का अभ्यास भी किसी भी पिछले युग की तुलना में उच्चतर है, क्योंकि मनुष्य का अभ्यास दर्शनों के साथ कदम मिलाते हुए बदलता जाता है, और दर्शनों की परिपूर्णता मनुष्य से की जाने वाली अपेक्षाओं की परिपूर्णता को भी चिह्नित करती है। जैसे ही परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन रुकता है, वैसे ही मनुष्य का अभ्यास भी रुक जाता है और परमेश्वर के कार्य के बिना मनुष्य के पास अतीत के जमाने के विनियमों का पालन करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं होगा या फिर उसके पास आगे के लिए कोई रास्ता नहीं बचेगा। नए दर्शनों के बिना मनुष्य द्वारा कोई नया अभ्यास नहीं किया जाएगा; संपूर्ण दर्शनों के बिना मनुष्य द्वारा कोई परिपूर्ण अभ्यास नहीं किया जाएगा; उच्चतर दर्शनों के बिना मनुष्य द्वारा कोई उच्चतर अभ्यास नहीं किया जाएगा। मनुष्य का अभ्यास परमेश्वर के पदचिह्नों के साथ-साथ बदलता जाता है, और उसी प्रकार मनुष्य का ज्ञान और अनुभव भी परमेश्वर के कार्य के साथ-साथ बदलता जाता है। मनुष्य चाहे कितना भी सक्षम हो, वह फिर भी परमेश्वर से अलग नहीं हो सकता, और यदि परमेश्वर एक क्षण के लिए भी कार्य करना बंद कर दे, तो मनुष्य तुरंत ही उसके क्रोध से मर जाएगा। मनुष्य के पास घमंड करने लायक कुछ भी नहीं है, क्योंकि आज मनुष्य का ज्ञान कितना ही ऊँचा क्यों न हो, उसके अनुभव कितने ही गहन क्यों न हों, वह परमेश्वर के कार्य से अलग नहीं किया जा सकता—क्योंकि मनुष्य का अभ्यास और जिसका उसे परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में अनुसरण करना चाहिए, वे दर्शनों से अलग नहीं किए जा सकते। परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में ऐसे दर्शन हैं, जिन्हें मनुष्य को जानना चाहिए और इनके बाद मनुष्य से उचित अपेक्षाएँ की जाती हैं। नींव के रूप में इन दर्शनों के बिना मनुष्य न तो अभ्यास में समर्थ होगा, और न ही वह दृढ़तापूर्वक परमेश्वर का अनुसरण करने में समर्थ होगा। यदि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता या परमेश्वर के इरादों को नहीं समझता, तो वह जो कुछ भी करता है, वह सब व्यर्थ है, और वह परमेश्वर द्वारा अनुमोदित किए जाने के योग्य नहीं है। मनुष्य के गुण कितने भी समृद्ध क्यों न हों, वह फिर भी परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना काम नहीं कर सकता। भले ही मनुष्य के क्रियाकलाप कितने भी अच्छे क्यों न हों या वे कितने भी ज्यादा क्यों न हों, फिर भी वे परमेश्वर के कार्य का स्थान नहीं ले सकते। और इसलिए, किसी भी परिस्थिति में मनुष्य का अभ्यास दर्शनों से अलग नहीं किया जा सकता। जो नए दर्शनों को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते, उनके पास कोई भी नया अभ्यास नहीं होता। उनके अभ्यास का सत्य के साथ कोई संबंध नहीं होता, क्योंकि वे विनियमों का पालन करते हैं और मृत व्यवस्था को बनाए रखते हैं; उनके पास नए दर्शन बिल्कुल नहीं होते और परिणामस्वरूप उनके पास नए युग का कोई अभ्यास नहीं होता। उन्होंने दर्शनों को गँवा दिया है, और ऐसा करके उन्होंने पवित्र आत्मा के कार्य को भी गँवा दिया है, और उन्होंने सत्य को गँवा दिया है। जो लोग सत्य से विहीन हैं, वे अतार्किकता की संतान हैं; वे शैतान के मूर्त रूप हैं। भले ही कोई किसी भी प्रकार का व्यक्ति क्यों न हो, वह परमेश्वर के कार्य के दर्शनों से रहित नहीं हो सकता, और पवित्र आत्मा की उपस्थिति से वंचित नहीं हो सकता; जैसे ही व्यक्ति दर्शनों को गँवा देता है, वह तुरंत रसातल में पतित हो जाता है और अंधकार में जीता है। दर्शनों से विहीन लोग वे लोग हैं जो परमेश्वर का अनुसरण भ्रमित तरीके से करते हैं, वे वो लोग हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य से रहित हैं, और वे नरक में रह रहे हैं। ऐसे लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, बल्कि परमेश्वर के नाम को एक तख़्ती के रूप में लटकाए रहते हैं। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते, जो देहधारी परमेश्वर को नहीं जानते, जो परमेश्वर के प्रबंधन की संपूर्णता में कार्य के तीन चरणों को नहीं जानते—वे दर्शनों को नहीं जानते और वे सत्य से रहित हैं। और क्या जो लोग सत्य को धारण नहीं करते, वे सभी कुकर्मी नहीं हैं? जो सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, जो परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करने के इच्छुक हैं, और जो सच में परमेश्वर के साथ सहयोग करते हैं, वे ऐसे लोग हैं जिनके लिए दर्शन नींव के रूप में कार्य करते हैं। उन्हें परमेश्वर द्वारा अनुमोदित किया जाता है, क्योंकि वे परमेश्वर के साथ सहयोग करते हैं, और यह सहयोग ही है, जिसे मनुष्य द्वारा अभ्यास में लाया जाना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 154

दर्शनों में अभ्यास के अनेक मार्ग समाविष्ट हैं। मनुष्य से की गई व्यावहारिक अपेक्षाएँ भी दर्शनों के भीतर समाविष्ट होती हैं, जैसे परमेश्वर का कार्य समाविष्ट होता है, जिसे मनुष्य को जानना चाहिए। अतीत में, विशेष सभाओं या विशाल सभाओं के दौरान, जो विभिन्न स्थानों पर होती थीं, अभ्यास के मार्ग के केवल एक पहलू के बारे में ही बोला जाता था। इस प्रकार का अभ्यास वह था, जिसे अनुग्रह के युग के दौरान अभ्यास में लाया जाना था, और जिसका परमेश्वर के ज्ञान से शायद ही कोई संबंध था, क्योंकि अनुग्रह के युग का दर्शन केवल यीशु के सलीब पर चढ़ने का दर्शन था, और उससे बड़े कोई दर्शन नहीं थे। मनुष्य से सलीब पर चढ़ने के माध्यम से मानवजाति के छुटकारे के उसके कार्य से अधिक कुछ जानना अपेक्षित नहीं था, और इसलिए अनुग्रह के युग के दौरान मनुष्य के जानने के लिए कोई अन्य दर्शन नहीं थे। इस तरह मनुष्य के पास परमेश्वर का सिर्फ थोड़ा-सा ही ज्ञान था और यीशु की प्रेमपूर्ण दयालुता और करुणा के ज्ञान के अलावा उसके लिए अभ्यास में लाने हेतु केवल कुछ साधारण और दयनीय चीजें ही थीं, ऐसी चीजें जो आज से एकदम अलग थीं। अतीत में, मनुष्य की सभा भले ही किसी भी रूप में रही हो, मनुष्य परमेश्वर के कार्य के व्यावहारिक ज्ञान के बारे में बात करने में असमर्थ था और कोई भी स्पष्ट रूप से यह कहने में समर्थ तो बिल्कुल भी नहीं था कि मनुष्य के लिए प्रवेश करने हेतु अभ्यास का सबसे उचित मार्ग कौन-सा है। मनुष्य ने सहनशीलता और धैर्य की नींव में मात्र कुछ सरल विवरण जोड़े; उसके अभ्यास के सार में कोई भी परिवर्तन नहीं आया, क्योंकि उसी युग के भीतर परमेश्वर ने कोई नया कार्य नहीं किया, और मनुष्य से उसने केवल सहनशीलता और धैर्य की या सलीब धारण करने की ही अपेक्षाएँ कीं—ऐसे अभ्यासों के अलावा, यीशु के सलीब पर चढ़ने की तुलना में कोई ऊँचे दर्शन नहीं थे। अतीत में अन्य दर्शनों का कोई उल्लेख नहीं था, क्योंकि परमेश्वर ने बहुत अधिक कार्य नहीं किया था और क्योंकि उसने मनुष्य से केवल सीमित अपेक्षाएँ ही की थीं। इस तरह से, मनुष्य ने चाहे कुछ भी किया हो, वह इन सीमाओं का अतिक्रमण करने में अक्षम था; उसने बस एक उथले, सरल तरीके से अभ्यास किया। आज मैं अधिक दर्शनों की बात करता हूँ, क्योंकि आज अधिक कार्य किया गया है, कार्य जो व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग से कई गुना अधिक है। मनुष्य से अपेक्षाएँ भी अतीत के युगों की तुलना में कई गुना ऊँची हैं। यदि मनुष्य ऐसे कार्य को पूर्ण रूप से जानने में अक्षम है, तो इसका कोई बड़ा महत्व नहीं होगा; ऐसा कहा जा सकता है कि यदि मनुष्य इसमें अपने पूरे जीवनकाल की कोशिशें नहीं लगाता, तो उसे ऐसे कार्य को पूरी तरह से समझने में कठिनाई होगी। विजय के कार्य में केवल अभ्यास के मार्ग के बारे में बात करना मनुष्य पर विजय को असंभव बना देगा। मनुष्य से कोई अपेक्षा किए बिना केवल दर्शनों की बात करना भी मनुष्य पर विजय को असंभव कर देगा। यदि अभ्यास के मार्ग के अलावा और कुछ नहीं बोला जाता, तो मनुष्य की घातक कमजोरियों पर प्रहार करना या मनुष्य की धारणाओं को दूर करना असंभव होता, और इसलिए भी मनुष्य पर पूर्ण रूप से विजय पाना असंभव होता। दर्शन मनुष्य पर विजय के प्रमुख साधन हैं, किंतु यदि दर्शनों के अलावा अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होता, तो मनुष्य के पास अनुसरण करने का कोई मार्ग नहीं होता, और प्रवेश का कोई साधन तो बिल्कुल नहीं होता। आरंभ से लेकर अंत तक परमेश्वर के कार्य का सिद्धांत यह रहा है : दर्शनों में वह बात है, जिसे अभ्यास में लाया जा सकता है और साथ ही अभ्यास के अतिरिक्त दर्शन भी हैं। मनुष्य के जीवन और उसके स्वभाव, दोनों में होने वाले परिवर्तनों की सीमा दर्शनों में होने वाले परिवर्तनों के साथ-साथ बदलती है। यदि मनुष्य केवल अपने प्रयासों पर ही निर्भर रहता, तो उसके लिए विस्तृत सीमा में परिवर्तन हासिल करना असंभव होता। दर्शन स्वयं परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के प्रबंधन के बारे में बोलते हैं। अभ्यास मनुष्य के अभ्यास के मार्ग को और मनुष्य के अस्तित्व के मार्ग को संदर्भित करता है। परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन में दर्शनों और अभ्यास के बीच का संबंध परमेश्वर और मनुष्य के बीच का संबंध है। यदि दर्शनों को हटा दिया जाता, या यदि अभ्यास के बारे में बात किए बिना ही उन्हें बोला जाता, या यदि केवल दर्शन ही होते और मनुष्य के अभ्यास का उन्मूलन कर दिया जाता, तो ऐसी चीज़ों को परमेश्वर का प्रबंधन नहीं माना जा सकता था, और ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता था कि परमेश्वर का कार्य मानवजाति के लिए है; इस तरह से, न केवल मनुष्य के कर्तव्य को हटा दिया जाता, बल्कि यह परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य का खंडन भी होता। यदि, आरंभ से लेकर अंत तक, परमेश्वर के कार्य को सम्मिलित किए बिना, मनुष्य से मात्र अभ्यास करने की अपेक्षा की जाती, और इससे भी बढ़कर, यदि मनुष्य से परमेश्वर के कार्य को जानने की अपेक्षा न की जाती, तो ऐसे कार्य को परमेश्वर का प्रबंधन कहना और भी कम तर्कसंगत होता। यदि मनुष्य परमेश्वर को न जानता, और परमेश्वर के इरादों से अनजान होता, और बस आँख मूँदकर अस्पष्ट तरीके से अभ्यास करता, तो वह कभी भी ऐसा सृजित प्राणी नहीं बनता जो पूरी तरह से मानक के अनुरूप हो। और इसलिए ये दोनों चीज़ें अनिवार्य हैं। यदि केवल परमेश्वर का कार्य ही होता, अर्थात् यदि केवल दर्शन ही होते और मनुष्य की ओर से कोई सहयोग या अभ्यास न होता, तो इसे परमेश्वर का प्रबंधन नहीं कहा जा सकता था। यदि केवल मनुष्य का अभ्यास और प्रवेश ही होता, तो भले ही वह प्रवेश का उच्चतम मार्ग होता, वह भी अस्वीकार्य होता। मनुष्य के प्रवेश को कार्य और दर्शनों के साथ कदम मिलाते हुए धीरे-धीरे परिवर्तित होना चाहिए; वह मनमाने ढंग से नहीं बदल सकता। मनुष्य के अभ्यास के सिद्धांत अनियंत्रित नहीं हैं, बल्कि निश्चित सीमाओं के अंतर्गत निर्धारित हैं। वे सिद्धांत कार्य के दर्शनों के साथ कदम मिलाते हुए परिवर्तित होते हैं। इसलिए परमेश्वर का प्रबंधन अंततः परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के अभ्यास पर आकर ठहरता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 155

प्रबंधन-कार्य केवल मानवजाति के कारण ही घटित हुआ, जिसका अर्थ है कि वह केवल मानवजाति के अस्तित्व के कारण ही उत्पन्न हुआ। मानवजाति से पहले, या शुरुआत में, जब स्वर्ग और पृथ्वी तथा समस्त वस्तुओं का सृजन किया गया था, कोई प्रबंधन नहीं था। यदि, परमेश्वर के संपूर्ण कार्य में, मनुष्य के लिए लाभकारी कोई अभ्यास न होता—अर्थात् यदि वह भ्रष्ट मानवजाति से उचित अपेक्षाएँ न करता (यदि परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य में मनुष्य के अभ्यास के लिए कोई उचित मार्ग न होता)—तो इस कार्य को परमेश्वर का प्रबंधन नहीं कहा जा सकता था। यदि परमेश्वर के कार्य की संपूर्णता में केवल भ्रष्ट मानवजाति को यह बताना शामिल होता कि वह किस प्रकार अपने अभ्यास को करे, और परमेश्वर अपने किसी भी उद्यम को कार्यान्वित न करता और अपनी सर्वशक्तिमत्ता या बुद्धि को लेशमात्र भी प्रकट न करता, और मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाएँ चाहे कितनी भी ऊँची क्यों न होतीं, चाहे परमेश्वर कितने भी लंबे समय तक मनुष्यों के बीच क्यों न रहता, मनुष्य परमेश्वर के स्वभाव के बारे में कुछ भी नहीं जानता, तो इस प्रकार के कार्य को परमेश्वर का प्रबंधन और भी नहीं कहा जा सकता था। सरल शब्दों में कहें तो परमेश्वर के प्रबंधन का कार्य परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य तथा परमेश्वर द्वारा प्राप्त लोगों के मार्गदर्शन में क्रियान्वित किए गए समस्त कार्य से मिलकर बना है। ऐसे कार्य को संक्षेप में प्रबंधन कहा जा सकता है। दूसरे शब्दों में, मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य, और साथ ही परमेश्वर का अनुसरण करने वाले सभी लोगों द्वारा उसका सहयोग सम्मिलित रूप से प्रबंधन कहा जाता है। यहाँ, परमेश्वर का कार्य दर्शन कहलाता है, और मनुष्य का सहयोग अभ्यास कहलाता है। परमेश्वर का कार्य जितना अधिक ऊँचा होता है (अर्थात् दर्शन जितने अधिक ऊँचे होते हैं), परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य के लिए उतना ही अधिक स्पष्ट किया जाता है, उतना ही अधिक वह मनुष्य की धारणाओं के विपरीत होता है, और उतना ही ऊँचा मनुष्य का अभ्यास और सहयोग हो जाता है। मनुष्य से अपेक्षाएँ जितनी अधिक ऊँची होती हैं, उतना ही अधिक परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं के विपरीत होता है, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य के परीक्षण और वे मानक भी, जिन्हें पूरे करने की उससे अपेक्षा की जाती है, अधिक ऊँचे हो जाते हैं। इस कार्य के समापन पर समस्त दर्शनों को पूरा कर लिया गया होगा, और वह, जिसे अभ्यास में लाने की मनुष्य से अपेक्षा की जाती है, परिपूर्णता की पराकाष्ठा पर पहुँच चुका होगा। यह वह समय भी होगा जब प्रत्येक प्राणी को उसके प्रकार के अनुसार छाँटा जाएगा, क्योंकि जिस बात को जानने की मनुष्य से अपेक्षा की जाती है, उसे मनुष्य को दिखाया जा चुका होगा। इसलिए, जब दर्शन अपने चरम बिंदु पर पहुँच जाएँगे, तो कार्य तदनुसार अपने अंत तक पहुँच जाएगा और मनुष्य का अभ्यास भी अपने चरम पर पहुँच जाएगा। मनुष्य का अभ्यास परमेश्वर के कार्य पर आधारित है, और परमेश्वर का प्रबंधन केवल मनुष्य के अभ्यास और सहयोग के माध्यम से ही पूरी तरह से व्यक्त होता है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य की प्रदर्शन-वस्तु और परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन कार्य का लक्ष्य है, और साथ ही परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन का उत्पाद भी है। यदि परमेश्वर ने मनुष्य के सहयोग के बिना अकेले ही कार्य किया होता, तो ऐसा कुछ भी न होता जो उसके संपूर्ण कार्य का मूर्त परिणाम बनता और तब परमेश्वर के प्रबंधन का जरा-सा भी महत्व न होता। अपने कार्य के अतिरिक्त, केवल इस कार्य को व्यक्त करने और इसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को प्रमाणित करने के लिए उपयुक्त लक्ष्य चुनकर ही परमेश्वर अपने प्रबंधन का उद्देश्य हासिल कर सकता है, और शैतान को पूरी तरह से हराने के लिए इस संपूर्ण कार्य का उपयोग करने का उद्देश्य प्राप्त कर सकता है। इसलिए मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य का एक अपरिहार्य अंग है, और मनुष्य ही वह एकमात्र प्राणी है जो परमेश्वर के प्रबंधन को सफल करवा सकता है और उसके चरम उद्देश्य को प्राप्त करवा सकता है; मनुष्य के अतिरिक्त अन्य कोई जीवन-रूप ऐसी भूमिका नहीं निभा सकता। यदि मनुष्य को परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य का सच्चा मूर्त परिणाम बनना है, तो भ्रष्ट मानवजाति को उसके विद्रोहीपन से पूरी तरह से छुटकारा दिलाना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य को विभिन्न समयों के लिए उपयुक्त अभ्यास दिया जाए और परमेश्वर मनुष्यों के बीच तदनुरूप कार्य करे। केवल इसी तरह से अंततः ऐसे लोगों का समूह प्राप्त किया जाएगा, जो परमेश्वर के प्रबंधन कार्य का मूर्त परिणाम हैं। मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य सिर्फ अकेले परमेश्वर के कार्य के माध्यम से स्वयं परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकता; हासिल किए जाने के लिए ऐसी गवाही को जीवित मनुष्यों की भी आवश्यकता होती है जो उसके कार्य के लिए उपयुक्त हों। परमेश्वर पहले इन लोगों पर कार्य करेगा, तब उनके माध्यम से उसका कार्य व्यक्त होगा और इस प्रकार उसकी ऐसी गवाही सृजित प्राणियों के बीच दी जाएगी और इसमें परमेश्वर अपने कार्य के लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा। परमेश्वर शैतान को पराजित करने के लिए अकेले कार्य नहीं करता, क्योंकि वह समस्त सृजित प्राणियों के बीच अपने लिए सीधे गवाही नहीं दे सकता। यदि वह ऐसा करता, तो मनुष्य को पूर्ण रूप से आश्वस्त करना असंभव होता, इसलिए परमेश्वर को मनुष्य पर कार्य करते हुए उसे जीतना होगा, केवल तभी वह समस्त सृजित प्राणियों के बीच गवाही प्राप्त करने में समर्थ होगा। यदि सिर्फ परमेश्वर ही कार्य करता रहता, जबकि मनुष्य सहयोग न करता या परमेश्वर उससे सहयोग करने की अपेक्षा न करता, तो मनुष्य कभी परमेश्वर के स्वभाव को जानने में समर्थ न होता और सदा के लिए परमेश्वर के इरादों से अनजान रहता। तब इसे परमेश्वर के प्रबंधन का कार्य नहीं कहा जा सकता था। यदि परमेश्वर के कार्य को समझे बिना केवल मनुष्य स्वयं ही प्रयास, अनुसरण और कठिन परिश्रम करता, तो मनुष्य निरर्थक परिश्रम कर रहा होता। पवित्र आत्मा के कार्य के बिना मनुष्य जो कुछ करता है, वह शैतान का होता है, यह विद्रोही और बुरा कर्म होता है; भ्रष्ट मानवजाति द्वारा जो कुछ किया जाता है, उस सबमें शैतान प्रदर्शित होता है, और उसमें ऐसा कुछ भी नहीं होता जो परमेश्वर के साथ संगत हो, और जो कुछ मनुष्य करता है, वह शैतान की अभिव्यक्ति होता है। परमेश्वर ने जो कुछ भी कहा है, वह सब दर्शनों और अभ्यास से संबंधित है। दर्शनों की बुनियाद पर मनुष्य अभ्यास, और समर्पण का मार्ग पाता है, और वह अपनी धारणाओं को एक ओर रख पाता है और वे चीज़ें प्राप्त कर पाता है, जो पहले उसके पास नहीं थीं। परमेश्वर अपेक्षा करता है कि मनुष्य उसके साथ सहयोग करे, कि मनुष्य उसकी आवश्यकताओं के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो जाए, और मनुष्य स्वयं परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य को देखने, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता का आकलन करने और परमेश्वर के स्वभाव को जानने की माँग करता है। संक्षेप में, ये ही परमेश्वर के प्रबंधन हैं। मनुष्य के साथ परमेश्वर का मिलन ही प्रबंधन है, और यह महानतम प्रबंधन है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 156

जिसमें दर्शन शामिल होते हैं, वह मुख्यतः स्वयं परमेश्वर के कार्य को संदर्भित करता है, और जिसमें अभ्यास शामिल होता है, वह मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए और उसका परमेश्वर से कोई संबंध नहीं है। परमेश्वर का कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा पूरा किया जाता है, और मनुष्य का अभ्यास स्वयं मनुष्य द्वारा प्राप्त किया जाता है। जो स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए, उसे मनुष्य द्वारा किए जाने की आवश्यकता नहीं है, और जिसका मनुष्य द्वारा अभ्यास किया जाना चाहिए, वह परमेश्वर से संबंधित नहीं है। परमेश्वर का कार्य उसकी अपनी सेवकाई है और उसका मनुष्य से कोई संबंध नहीं है। यह कार्य मनुष्य द्वारा किए जाने की आवश्यकता नहीं है, और, इतना ही नहीं, मनुष्य परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य को करने में असमर्थ होगा। जिसका अभ्यास मनुष्य द्वारा किए जाने की आवश्यकता है, उसे मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए, भले ही वह अपने जीवन का बलिदान करना हो या अपनी गवाही में अडिग रहने के लिए उसे शैतान के सुपुर्द करना हो—ये सब मनुष्य द्वारा पूरे किए जाने चाहिए। स्वयं परमेश्वर वह समस्त कार्य पूरा करता है, जो उसे पूरा करना चाहिए, और जो मनुष्य को करना चाहिए, वह मनुष्य को दिखाया जाता है, और शेष कार्य मनुष्य के करने के लिए छोड़ दिया जाता है। परमेश्वर अतिरिक्त कार्य नहीं करता; वह केवल वही कार्य करता है जो उसकी सेवकाई के अंतर्गत है, और वह मनुष्य को केवल मार्ग दिखाता है, और केवल मार्ग को खोलने का कार्य करता है, और मार्ग प्रशस्त करने का कार्य नहीं करता। इसे सभी को समझ लेना चाहिए। सत्य को अभ्यास में लाने का अर्थ है परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना, और यह सब मनुष्य का कर्तव्य है, और यह वह है जिसे मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए, और इसका परमेश्वर के साथ कोई लेना-देना नहीं है। यदि मनुष्य माँग करता है कि परमेश्वर भी सत्य में उसी तरह से कष्ट और शोधन को सहन करे जैसे मनुष्य सहन करता है, तो मनुष्य विद्रोही हो रहा है। परमेश्वर का कार्य अपनी सेवकाई करना है, और मनुष्य का कर्तव्य बिना किसी प्रतिरोध के परमेश्वर के समस्त मार्गदर्शन के प्रति समर्पण करना है। परमेश्वर चाहे किसी भी प्रकार से कार्य करे या जीवन व्यतीत करे, मनुष्य का कर्तव्य है कि वह उस बात को अवश्य पूरा करे जिसे उसे हासिल करना चाहिए। केवल स्वयं परमेश्वर ही मनुष्य से अपेक्षाएँ कर सकता है, अर्थात् केवल स्वयं परमेश्वर ही मनुष्य से अपेक्षाएँ करने के लिए उपयुक्त है। मनुष्य के पास कोई विकल्प नहीं होना चाहिए और उसे पूरी तरह से समर्पण और अभ्यास करने के सिवा कुछ नहीं करना चाहिए; यही वह विवेक है जो मनुष्य में होना चाहिए। जब वह कार्य पूरा हो जाता है जो स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए, तो मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह कदम-दर-कदम उसका अनुभव करे। यदि, अंत में, जब परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन पूरा हो जाता है, तब भी मनुष्य वह नहीं करता, जिसकी परमेश्वर द्वारा अपेक्षा की गई है, तो मनुष्य को दंडित किया जाना चाहिए। यदि मनुष्य परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी नहीं करता, तो यह मनुष्य का विद्रोहीपन है; इसका अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर ने अपना कार्य पर्याप्त पूर्णता से नहीं किया है। वे सभी, जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं ला सकते, वे जो परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी नहीं कर सकते, और वे जो अपना समर्पण नहीं दे सकते और अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर सकते, उन सभी को दंड दिया जाएगा। आज तुम लोगों से जो कुछ हासिल करने की अपेक्षा की जाती है, वे अतिरिक्त माँगें नहीं, बल्कि मनुष्य का कर्तव्य है, जिसे सभी लोगों द्वारा किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अपना कर्तव्य तक निभाने में या उसे अच्छी तरह से निभाने में भी असमर्थ हो, तो क्या तुम लोग अपने ऊपर मुसीबतें नहीं ला रहे हो? क्या तुम लोग मृत्यु को आमंत्रित नहीं कर रहे हो? कैसे तुम लोग अभी भी भविष्य और संभावनाओं की आशा कर सकते हो? परमेश्वर का कार्य मानवजाति के लिए किया जाता है, और मनुष्य का सहयोग परमेश्वर के प्रबंधन के लिए दिया जाता है। जब परमेश्वर वह सब कर लेता है जो उसे करना चाहिए, तो मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने अभ्यास में कोई कसर न छोड़े और परमेश्वर के साथ सहयोग करे। परमेश्वर के कार्य में मनुष्य को कोई कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए, उसे अपना समर्पण प्रदान करना चाहिए और अनगिनत धारणाओं में संलग्न नहीं होना चाहिए, या निष्क्रिय बैठकर मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। परमेश्वर मनुष्य के लिए स्वयं को बलिदान कर सकता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर को अपना समर्पण प्रदान नहीं कर सकता? परमेश्वर मनुष्य के प्रति एक हृदय और मन वाला है, तो क्यों मनुष्य थोड़ा-सा सहयोग प्रदान नहीं कर सकता? परमेश्वर मानवजाति के लिए कार्य करता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के लिए अपना कुछ कर्तव्य पूरा नहीं कर सकता? परमेश्वर का कार्य इतनी दूर तक आ गया है, पर तुम लोग अभी भी देखते ही हो किंतु करते नहीं, सुनते ही हो किंतु हिलते नहीं। क्या ऐसे लोग तबाही के लक्ष्य नहीं हैं? परमेश्वर पहले ही अपना सर्वस्व मनुष्य को अर्पित कर चुका है, तो क्यों आज मनुष्य ईमानदारी से कुछ कर्तव्य निभाने में असमर्थ है? परमेश्वर के लिए उसका कार्य उसकी पहली प्राथमिकता है, और उसके प्रबंधन का कार्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करना उसकी पहली प्राथमिकता है। इसे तुम सभी लोगों को समझ लेना चाहिए। तुम लोगों से कहे गए वचन तुम लोगों के सार के बिल्कुल मूल तक पहुँच गए हैं, और परमेश्वर का कार्य अभूतपूर्व क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है। अनेक लोग अभी भी इस मार्ग की सच्चाई या झूठ को नहीं समझते; वे अभी भी प्रतीक्षा कर रहे हैं और देख रहे हैं, और अपना कर्तव्य नहीं निभा रहे। इसके बजाय वे परमेश्वर द्वारा कहे और किए गए प्रत्येक वचन और कार्य की जाँच करते हैं, वे इस बात पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि वह क्या खाता है और क्या पहनता है, और उनकी धारणाएँ और भी अधिक गहरी जड़ें पकड़ लेती हैं। क्या ऐसे लोग बेवजह बात का बतंगड़ नहीं बना रहे हैं? ऐसे लोग उस तरह के कैसे हो सकते हैं, जो परमेश्वर को खोजते हैं? और वे लोग उस तरह के कैसे हो सकते हैं, जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का इरादा रखते हैं? वे अपने समर्पण और कर्तव्य को अपने मस्तिष्क में पीछे रख देते हैं, और इसके बजाय परमेश्वर के पते-ठिकाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वे सचमुच नफरत के लायक हैं! यदि मनुष्य ने वह सब कुछ समझ लिया है जो उसे समझना चाहिए, और वह सब अभ्यास में ला चुका है जो उसे अभ्यास में लाना चाहिए, तो परमेश्वर निश्चित रूप से उसे अपने आशीष प्रदान करेगा, क्योंकि वह मनुष्य से जो अपेक्षा करता है, वह मनुष्य का कर्तव्य है, जिसे मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए। यदि मनुष्य यह समझने में असमर्थ है कि उसे क्या समझना चाहिए, और यदि वह उसे अभ्यास में लाने में असमर्थ है जिसे उसे अभ्यास में लाना चाहिए, तो उसे दंड दिया जाएगा। जो लोग परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं करते, उसके प्रति शत्रुता रखते हैं, जो लोग नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, उसके प्रति विरोधी रवैया रखते हैं, भले ही वे ऐसा कुछ न करते हों जो स्पष्ट रूप से उसके विरुद्ध हो। जो लोग परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सत्य को अभ्यास में नहीं लाते, वे सब ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों का जानबूझकर विरोध करते हैं और उनके प्रति विद्रोही हैं, भले ही ऐसे लोग पवित्र आत्मा के कार्य के बारे में विशेष रूप से “चिंतित” होते हों। जो लोग आज्ञाकारी और समर्पित नहीं हैं, वे विद्रोही हैं, और वे परमेश्वर के विरोध में हैं। जो लोग अपना कर्तव्य नहीं निभाते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं करते, और जो लोग परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं करते, वे वो लोग हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य को स्वीकार नहीं करते।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 157

जब परमेश्वर का कार्य एक निश्चित बिंदु तक पहुँच जाता है, और उसका प्रबंधन एक निश्चित बिंदु पर पहुँच जाता है, तो जो लोग उसके इरादों के अनुरूप हैं, वे सब उसकी अपेक्षाएँ पूरी करने में सक्षम होते हैं। परमेश्वर अपने मानकों और मनुष्य की क्षमताओं के अनुसार मनुष्य से अपेक्षाएँ करता है। अपने प्रबंधन के बारे में बात करते हुए वह मनुष्य के लिए मार्ग भी बताता है और मनुष्य को अस्तित्व में रहने का मार्ग प्रदान करता है। परमेश्वर का प्रबंधन और मनुष्य का अभ्यास दोनों कार्य के एक ही चरण के होते हैं और उन्हें एक-साथ ही कार्यान्वित किया जाता है। परमेश्वर के प्रबंधन की चर्चा मनुष्य के स्वभाव में होने वाले परिवर्तनों से संबंधित है और मनुष्य को क्या करना चाहिए तथा उसके स्वभाव में होने वाले परिवर्तनों की चर्चा परमेश्वर के कार्य से संबंधित है। ऐसा कोई समय नहीं होता जब इन दोनों को अलग किया जा सके। मनुष्य का अभ्यास कदम-दर-कदम बदल रहा है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाएँ भी बदल रही हैं, और परमेश्वर का कार्य हमेशा बदल रहा है और प्रगति कर रहा है। यदि मनुष्य का अभ्यास विनियमों के जाल में उलझा रहता है, तो यह साबित करता है कि वह परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन से वंचित है; यदि मनुष्य का अभ्यास कभी नहीं बदलता या गहराई तक नहीं जाता, तो यह साबित करता है कि मनुष्य का अभ्यास मनुष्य की इच्छानुसार किया जाता है, और वह गैर-सत्य का अभ्यास है; यदि मनुष्य के पास चलने के लिए कोई मार्ग नहीं है, तो वह पहले ही शैतान के हाथों में पड़ चुका है और शैतान द्वारा नियंत्रित होता है, जिसका अर्थ है कि वह दुष्ट आत्माओं द्वारा नियंत्रित होता है। यदि मनुष्य का अभ्यास अधिक गहराई तक नहीं जाता, तो परमेश्वर का कार्य विकास नहीं करेगा, और यदि परमेश्वर के कार्य में कोई बदलाव नहीं होता, तो मनुष्य का प्रवेश रुक जाएगा; यह अपरिहार्य है। परमेश्वर के संपूर्ण कार्य के दौरान यदि मनुष्य सदैव यहोवा की व्यवस्था का पालन करता रहता, तो परमेश्वर का कार्य प्रगति नहीं कर सकता था, और संपूर्ण युग का अंत करना तो बिल्कुल भी संभव न होता। यदि मनुष्य हमेशा सलीब को पकड़े रहता और धैर्य और विनम्रता का अभ्यास करता रहता, तो परमेश्वर के कार्य का प्रगति करते रहना असंभव होता। छह हजार वर्षों का प्रबंधन ऐसे ही उन लोगों के बीच समाप्त नहीं किया जा सकता, जो केवल व्यवस्था का पालन करते हैं, या सिर्फ सलीब थामे रहते हैं और धैर्य और विनम्रता का अभ्यास करते हैं। इसके बजाय, परमेश्वर के प्रबंधन का संपूर्ण कार्य अंत के दिनों के उन लोगों के बीच संपन्न किया जाएगा, जो परमेश्वर को जानते हैं, जिन्हें शैतान के चंगुल से छुड़ाया गया है, और जिन्होंने अपने आप को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह से मुक्त कर लिया है। यह परमेश्वर के कार्य की अनिवार्य दिशा है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि धार्मिक कलीसियाओं के लोगों का अभ्यास पुराना पड़ गया है? वह इसलिए, क्योंकि जिसका वे अभ्यास करते हैं, वह आज के कार्य से असंबद्ध है। अनुग्रह के युग में जिसका वे अभ्यास करते थे वह सही था, किंतु चूँकि युग गुज़र चुका है और परमेश्वर का कार्य बदल चुका है, इसलिए उनका अभ्यास धीरे-धीरे प्रचलन से बाहर हो गया है। उसे नए कार्य और नए प्रकाश ने पीछे छोड़ दिया है। अपनी मूल बुनियाद के आधार पर पवित्र आत्मा का कार्य कई कदम गहरी प्रगति कर चुका है। किंतु वे लोग अभी भी परमेश्वर के कार्य के मूल चरण पर अटके हुए हैं और अभी भी पुराने अभ्यासों और पुराने प्रकाश से चिपके हुए हैं। तीन या पाँच वर्षों में ही परमेश्वर का कार्य बहुत बदल सकता है, तो क्या 2,000 वर्षों के दौरान और भी अधिक बड़े रूपांतरण नहीं हुए होंगे? यदि मनुष्य के पास कोई नया प्रकाश या अभ्यास नहीं है, तो इसका अर्थ है कि वह पवित्र आत्मा के कार्य के साथ बना नहीं रहा है और यह मनुष्य की असफलता है। परमेश्वर के नए कार्य के अस्तित्व को इसलिए नहीं नकारा जा सकता कि जिन लोगों के पास पहले पवित्र आत्मा का कार्य था, वे आज भी प्रचलन से बाहर हो चुके अभ्यासों का पालन करते हैं। पवित्र आत्मा का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है, और जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं, उन्हें भी अधिक गहरे जाना और कदम-दर-कदम बदलना चाहिए। उन्हें एक ही चरण पर रुक नहीं जाना चाहिए। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते, केवल वे ही परमेश्वर के मूल कार्य पर रुक जाएँगे और पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं करेंगे। जो लोग विद्रोही हैं, केवल वे ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में अक्षम होंगे। यदि मनुष्य का अभ्यास पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ गति बनाए नहीं रखता, तो मनुष्य का अभ्यास निश्चित रूप से वर्तमान कार्य से कटा हुआ है और वह निश्चित रूप से वर्तमान कार्य के विपरीत है। ऐसे पुराने पड़ चुके लोग परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में एकदम अक्षम होते हैं, वे ऐसे लोग तो बिल्कुल भी नहीं बन सकते जो अंततः परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रहेंगे। इतना ही नहीं, संपूर्ण प्रबंधन कार्य ऐसे लोगों के समूह के बीच संपन्न नहीं किया जा सकता। जो लोग कभी यहोवा की व्यवस्था का पालन करते थे और जिन्होंने कभी सलीब के लिए दुःख सहा था, यदि वे अंत के दिनों के कार्य के इस चरण को स्वीकार नहीं कर सकते, तो उन्होंने जो कुछ भी किया है वह सब व्यर्थ और निष्फल हो जाएगा। पवित्र आत्मा के कार्य की स्पष्टतम अभिव्यक्ति अभी वर्तमान को गले लगाने में है, अतीत से चिपके रहने में नहीं। जो लोग आज के कार्य के साथ बने नहीं रहे हैं, और जो आज के अभ्यास से अलग हो गए हैं, वे वो लोग हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं और उसे स्वीकार नहीं करते। ऐसे लोग परमेश्वर के वर्तमान कार्य का विरोध करते हैं। यद्यपि वे अतीत के प्रकाश को पकड़े रहते हैं, किंतु इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते। मनुष्य के अभ्यास में परिवर्तनों के बारे में, अतीत और वर्तमान के बीच के अभ्यास की भिन्नताओं के बारे में, पूर्ववर्ती युग के दौरान किस प्रकार अभ्यास किया जाता था और आज किस प्रकार किया जाता है इस बारे में, यह सब बातचीत क्यों की गई है? मनुष्य के अभ्यास में ऐसे विभाजनों के बारे में हमेशा बात की जाती है, क्योंकि पवित्र आत्मा का कार्य लगातार आगे बढ़ रहा है, इसलिए मनुष्य के अभ्यास का निरंतर बदलना आवश्यक है। यदि मनुष्य एक ही चरण में अटका रहता है, तो यह प्रमाणित करता है कि वह परमेश्वर के नए कार्य और नए प्रकाश के साथ बने रहने में असमर्थ है; इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि परमेश्वर की प्रबंधन-योजना नहीं बदली है। जो पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हैं, वे सदैव सोचते हैं कि वे सही हैं, किंतु वास्तव में उन पर परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही रुक गया है और वे पूरी तरह से पवित्र आत्मा के कार्य से रहित हैं। परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही लोगों के एक अन्य समूह को हस्तांतरित हो गया था और वह अपने नए कार्य को इन लोगों पर पूरा करने का इरादा रखता है। चूँकि धर्म में मौजूद लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने में अक्षम हैं और केवल अतीत के पुराने कार्य को ही पकड़े रहते हैं, इसलिए परमेश्वर ने इन लोगों को छोड़ दिया है, और वह अपना कार्य उन लोगों पर करता है जो इस नए कार्य को स्वीकार करते हैं। ये वे लोग हैं जो उसके नए कार्य के साथ सहयोग करते हैं, और केवल इसी तरह से उसका प्रबंधन पूरा हो सकता है। परमेश्वर का प्रबंधन सदैव आगे बढ़ रहा है, और मनुष्य का अभ्यास हमेशा ऊँचा हो रहा है। परमेश्वर सदैव कार्य कर रहा है और मनुष्य को सदैव आवश्यकता रहती है; इस प्रकार दोनों अपने चरम बिंदु तक पहुँचते हैं और परमेश्वर तथा मनुष्य पूर्ण एकता प्राप्त करते हैं। यह परमेश्वर के महान कार्य की पूर्णता की अभिव्यक्ति है और यह परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन का अंतिम परिणाम है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 158

परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में मनुष्य से तद्नुरूपी अपेक्षाएँ भी होती हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा के भीतर हैं, वे सभी पवित्र आत्मा की उपस्थिति और अनुशासन के अधीन हैं, और जो पवित्र आत्मा की धारा में नहीं हैं, वे शैतान के शासन में हैं और पवित्र आत्मा के किसी भी कार्य से रहित हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करते हैं और वे वो लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य के साथ सहयोग करते हैं। यदि इस धारा में रहने वाले लोग सहयोग करने में अक्षम रहते हैं और इस दौरान परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो उन्हें अनुशासित किया जाएगा और सबसे खराब बात यह होगी कि उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिया जाएगा। चूँकि उन्होंने पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार किया है, वे पवित्र आत्मा की धारा में जीते हैं, पवित्र आत्मा की देखभाल और सुरक्षा प्राप्त करते हैं। जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है, और जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा अनुशासित किया जाता है, यहाँ तक कि उन्हें दंड भी दिया जा सकता है। चाहे वे किसी भी प्रकार के व्यक्ति हों, यदि वे पवित्र आत्मा की धारा के भीतर हैं, तो परमेश्वर अपने नाम की खातिर उन सभी लोगों की जिम्मेदारी लेगा, जो उसके नए कार्य को स्वीकार करते हैं। जो लोग उसके नाम को महिमामंडित करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, वे उसके आशीष प्राप्त करेंगे; जो लोग उससे विद्रोह करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में नहीं लाते, वे उसका दंड प्राप्त करेंगे। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं, वे वो लोग हैं जो नए कार्य को स्वीकार करते हैं और चूँकि उन्होंने नए कार्य को स्वीकार कर लिया है, इसलिए उन्हें उसी के अनुसार परमेश्वर के साथ सहयोग करना चाहिए, और उन विद्रोहियों के समान कार्य नहीं करना चाहिए, जो अपना कर्तव्य नहीं निभाते। यह मनुष्य से परमेश्वर की एकमात्र अपेक्षा है। जो लोग नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, उनके मामले में ऐसा नहीं है : वे पवित्र आत्मा की धारा से बाहर हैं, और पवित्र आत्मा का अनुशासन और फटकार उन पर बिल्कुल भी लागू नहीं होते। पूरे दिन ये लोग देह में जीते हैं, अपने मस्तिष्क के भीतर जीते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं, वह सब उनके अपने मानसिक विश्लेषण और अनुसंधान से उत्पन्न हुए धर्म-सिद्धांतों के अनुसार होता है; यह वह नहीं है जो पवित्र आत्मा के नए कार्य द्वारा अपेक्षित है और यह परमेश्वर के साथ सहयोग तो बिल्कुल भी नहीं है। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और इससे भी बढ़कर, वे परमेश्वर के आशीषों और सुरक्षा से रहित होते हैं। उनकी अधिकांश कथनी और करनी पवित्र आत्मा के पुराने कार्य की अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे धर्म-सिद्धांत हैं, सत्य नहीं। ऐसे धर्म-सिद्धांत और विनियम यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इन लोगों का एक-साथ इकट्ठा होना धर्म के अलावा कुछ नहीं है; वे चुने हुए लोग या परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य नहीं हैं। उनका एक साथ इकट्ठा होना केवल एक धार्मिक खिचड़ी कहलाया जा सकता है; उसे कलीसिया नहीं कहा जा सकता। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। उनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य नहीं है; जो कुछ वे करते हैं वह धर्म का द्योतक होता है, वे जिसे जीते हैं वह धर्म से भरा हुआ होता है; उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और कार्य नहीं होता, और वे पवित्र आत्मा का अनुशासन या प्रबुद्धता प्राप्त करने के लायक तो बिल्कुल भी नहीं हैं। ये समस्त लोग निर्जीव लाशें और कीड़े हैं, जो आध्यात्मिकता से रहित हैं। उन्हें मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध का कोई ज्ञान नहीं है, मनुष्य के समस्त कुकर्मों का कोई ज्ञान नहीं है, और वे परमेश्वर के समस्त कार्य और परमेश्वर के वर्तमान इरादों को तो बिल्कुल भी नहीं जानते। वे सभी अज्ञानी, अधम लोग हैं, और वे कूडा-करकट हैं जो विश्वासी कहलाने के योग्य नहीं हैं! वे जो कुछ भी करते हैं, उसकी परमेश्वर के प्रबंधन के लिए कोई प्रासंगिकता नहीं है और वह परमेश्वर की योजनाओं को तो बिल्कुल भी नहीं बिगाड़ सकता। उनकी कथनी और करनी अत्यंत घृणास्पद और अत्यंत दयनीय होती हैं, ये उल्लेख करने के लायक भी नहीं हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में नहीं हैं, उनके द्वारा किए गए किसी भी कार्य का पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ कोई लेना-देना नहीं है। इस वजह से, चाहे वे कुछ भी क्यों न करें, उनमें पवित्र आत्मा का अनुशासन नहीं होता है, पवित्र आत्मा की—प्रबुद्धता तो बिल्कुल नहीं होती है। कारण, वे सभी ऐसे लोग हैं, जिन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं है, और जिन्हें पवित्र आत्मा ने तिरस्कृत कर दिया है। उन्हें कुकर्मी कहा जाता है, क्योंकि वे अपनी मर्जी से काम करते हैं, अपनी देह पर काम करते हैं और ऐसा करते हुए परमेश्वर के नाम का झंडा लहराते हैं; क्योंकि वे जानबूझकर परमेश्वर के प्रति शत्रुता रखते हैं और परमेश्वर के कार्य के विपरीत काम करते हैं। परमेश्वर के साथ सहयोग करने में मनुष्य की असफलता अपने आप में चरम रूप से विद्रोही है, इसलिए क्या वे लोग, जो जानबूझकर परमेश्वर के प्रतिकूल चलते हैं, विशेष रूप से अपना उचित प्रतिफल प्राप्त नहीं करेंगे?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 159

तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के दर्शनों को जानना और उसके कार्य की समग्र दिशा को समझना होगा। यह सकारात्मक प्रवेश है। एक बार जब तुम दर्शनों के सत्य में सही ढंग से महारत हासिल कर लोगे, तो तुम्हारा प्रवेश सुरक्षित हो जाएगा; चाहे परमेश्वर का कार्य कैसे भी क्यों न बदले, तुम अपने हृदय में अडिग बने रहोगे, दर्शनों के बारे में स्पष्ट रहोगे और तुम्हारे प्रवेश तथा तुम्हारे अनुसरण के लिए एक लक्ष्य होगा। इस तरह से, तुम्हारे भीतर का समस्त अनुभव और ज्ञान अधिक गहरा और विस्तृत हो जाएगा। एक बार जब तुम सामान्य दिशा समझ लोगे, तो तुम्हें जीवन में कोई नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा, और तुम भटकोगे नहीं। यदि तुम कार्यों के इन चरणों को नहीं जानोगे, तो तुम्हें प्रत्येक चरण पर नुकसान होगा, और तुम्हें चीजें ठीक करने में कुछ ज्यादा दिन लगेंगे, और तुम कुछ सप्ताह में भी सही मार्ग पकड़ने में सक्षम नहीं हो पाओगे। क्या इससे देरी नहीं होगी? सकारात्मक प्रवेश और अभ्यास के मार्ग में बहुत-कुछ ऐसा है, जिसमें तुम लोगों को महारत हासिल करनी होगी। जहाँ तक परमेश्वर के कार्य के दर्शनों का संबंध है, तुम्हें इन बिंदुओं को अवश्य समझना चाहिए : उसके विजय के कार्य के मायने, पूर्ण बनाए जाने का भावी मार्ग, परीक्षणों और क्लेश के अनुभवों के माध्यम से क्या हासिल किया जाना चाहिए, न्याय और ताड़ना के मायने, पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांत, तथा पूर्णता और विजय के सिद्धांत। ये सब दर्शनों के सत्य से संबंध रखते हैं। शेष कार्य के तीन चरण हैं—व्यवस्था का युग, अनुग्रह का युग और राज्य का युग—और साथ ही भावी गवाही। ये भी दर्शनों के सत्य हैं, और ये सर्वाधिक मूलभूत होने के साथ-साथ सर्वाधिक महत्वपूर्ण भी हैं। वर्तमान में ऐसी बहुत-सी बातें हैं जिनमें तुम लोगों को प्रवेश करना चाहिए और जिनका तुम लोगों को अभ्यास करना चाहिए और वे अब अधिक बहुस्तरीय तथा अधिक विस्तृत हो गई हैं। यदि तुम्हें इन सत्यों का कोई ज्ञान नहीं है, तो यह साबित होता है कि तुम्हें अभी प्रवेश प्राप्त करना शेष है। अधिकांश समय लोगों का सत्य का ज्ञान बहुत उथला होता है; यहाँ तक कि वे कुछ बुनियादी सत्यों को अभ्यास में लाने में भी अक्षम होते हैं और यह तक नहीं जानते कि तुच्छ मामलों को भी कैसे सँभाला जाए। लोगों के सत्य का अभ्यास करने में अक्षम होने का कारण यह है कि उनका स्वभाव विद्रोही है और आज के कार्य का उनका ज्ञान बहुत ही सतही और एकतरफ़ा है। इसलिए, लोगों को पूर्ण बनाए जाने का काम आसान नहीं है। तुम बहुत ज्यादा विद्रोही हो, और तुम अपने पुराने अहं को बहुत ज़्यादा बनाए रखते हो; तुम सत्य के पक्ष में खड़े रहने में अक्षम हो, और तुम सबसे स्पष्ट सत्यों तक का अभ्यास करने में असमर्थ हो। ऐसे लोगों को बचाया नहीं जा सकता और ये वे लोग हैं, जिन्हें जीता नहीं गया है। यदि तुम्हारा प्रवेश न तो विस्तृत है और न ही सोद्देश्य, तो तुम्हारा विकास धीमी गति से होगा। यदि तुम्हारे प्रवेश में जरा-सी भी वास्तविकता नहीं है, तो तुम्हारा अनुसरण व्यर्थ हो जाएगा। यदि तुम सत्य के सार से अनभिज्ञ हो, तो तुम अपरिवर्तित रहोगे। मनुष्य के जीवन में विकास और उसके स्वभाव में परिवर्तन वास्तविकता में प्रवेश करने, और इससे भी बढ़कर, विस्तृत अनुभवों में प्रवेश करने से प्राप्त होते हैं। यदि तुम्हारे प्रवेश के दौरान तुम्हारे पास अनेक विस्तृत अनुभव हैं और तुम्हारे पास बहुत-सा वास्तविक ज्ञान और प्रवेश है, तो तुम्हारा स्वभाव शीघ्रता से बदल जाएगा। भले ही वर्तमान में तुम अभ्यास के बारे में बहुत स्पष्ट न हो, तो भी तुम्हें कम से कम परमेश्वर के कार्य के दर्शनों के बारे में स्पष्ट अवश्य होना चाहिए। यदि नहीं, तो तुम प्रवेश करने में अक्षम होगे; प्रवेश केवल तुम्हें सत्य का ज्ञान होने पर ही संभव है। केवल पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हें तुम्हारे अनुभव में प्रबुद्ध करने पर ही तुम सत्य की अधिक गहरी समझ प्राप्त करोगे और अधिक गहराई से प्रवेश करोगे। तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य को जानना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 160

आरंभ में, मानवजाति के सृजन के बाद, इस्राएलियों ने परमेश्वर के कार्य के आधार के रूप में काम किया। संपूर्ण इस्राएल पृथ्वी पर यहोवा के कार्य का आधार था। यहोवा का कार्य व्यवस्थाओं की स्थापना करके मनुष्य की सीधे अगुआई और चरवाही करना था, ताकि मनुष्य एक सामान्य जीवन जी सके और पृथ्वी पर सामान्य तरीके से यहोवा की आराधना कर सके। व्यवस्था के युग में परमेश्वर मनुष्य के द्वारा न तो देखा जा सकता था और न ही उसे छुआ जा सकता था। क्योंकि उसने केवल उन लोगों का मार्गदर्शन किया जिन्हें शैतान ने सबसे पहले भ्रष्ट किया था, उन्हें शिक्षा दी और उनकी देखभाल की, उसके वचनों में केवल व्यवस्थाएँ, विधान और उनके स्व-आचरण के मानदंड शामिल थे, न कि वे सत्य जो लोगों को जीवन की आपूर्ति करते हैं। उसकी अगुआई में इस्राएली शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट नहीं किए गए थे। उसका व्यवस्था का कार्य उद्धार के कार्य में केवल पहला चरण था, उद्धार के कार्य का एकदम आरंभ और उसका मनुष्य के जीवन-स्वभाव में होने वाले परिवर्तनों से लगभग कोई संबंध नहीं था। इसलिए, उद्धार के कार्य के आरंभ में उसे इस्राएल में अपने कार्य के लिए देह धारण करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसीलिए उसे एक माध्यम—एक उपकरण—की आवश्यकता थी, जिसके जरिए मनुष्य के साथ संपर्क किया जा सकता। इस प्रकार, सृजित प्राणियों के मध्य से यहोवा की ओर से बोलने और कार्य करने वाले लोग उठ खड़े हुए, और इस तरह से मनुष्य के पुत्र और नबी मनुष्यों के मध्य कार्य करने के लिए आए। “मनुष्य के पुत्रों” ने यहोवा की ओर से मनुष्यों के मध्य कार्य किया और यहोवा ने उन्हें “मनुष्य के पुत्र” कहा। इसका अर्थ है कि ऐसे लोग यहोवा की ओर से व्यवस्था निर्धारित करते हैं। वे लोग इस्राएलियों के बीच याजक भी थे; ऐसे याजक, जिनका यहोवा द्वारा ध्यान रखा जाता था और जिनकी रक्षा की जाती थी, जिनमें यहोवा का आत्मा कार्य करता था; वे लोगों के मध्य अगुआ थे और सीधे यहोवा की सेवा करते थे। दूसरी ओर, नबी यहोवा की ओर से सभी देशों और सभी कबीलों के लोगों से बोलने के लिए विशेष रूप से नियुक्त थे। उन्होंने यहोवा के कार्य की भविष्यवाणी भी की। चाहे वे मनुष्य के पुत्र हों या नबी, सभी को स्वयं यहोवा के आत्मा द्वारा ऊपर उठाया गया था और उनमें यहोवा का कार्य था। लोगों के मध्य ये वे लोग थे, जो सीधे यहोवा का प्रतिनिधित्व करते थे; उन्होंने अपना कार्य केवल इसलिए किया, क्योंकि उन्हें यहोवा ने ऊपर उठाया था, इसलिए नहीं कि वे ऐसी देह थे, जिनमें स्वयं पवित्र आत्मा ने देहधारण किया था। इसलिए, हालाँकि वे परमेश्वर की ओर से बोलने और कार्य करने में एक-समान थे, फिर भी व्यवस्था के युग में वे मनुष्य के पुत्र और नबी देहधारी परमेश्वर की देह नहीं थे। अनुग्रह के युग और अंतिम चरण में परमेश्वर का कार्य ठीक विपरीत था, क्योंकि मनुष्य के उद्धार और न्याय का कार्य दोनों स्वयं देहधारी परमेश्वर द्वारा किए गए थे, इसलिए उसकी ओर से कार्य करने के लिए नबियों और मनुष्य के पुत्रों को फिर से ऊपर उठाने की आवश्यकता नहीं थी। मनुष्य की नज़रों में उनके कार्य के सार और पद्धति में कोई अनिवार्य अंतर नहीं है। इसी कारण लोग लगातार देहधारी परमेश्वर के कार्य और नबियों और मनुष्य के पुत्रों के कार्य को आपस में गड्डमड्ड करते रहते हैं। देहधारी परमेश्वर का रंग-रूप मूल रूप से वैसा ही था, जैसा कि नबियों और मनुष्य के पुत्रों का था। देहधारी परमेश्वर तो नबियों की अपेक्षा और भी अधिक सामान्य और व्यावहारिक था। इसलिए मनुष्य उनके मध्य अंतर करने में अक्षम है। मनुष्य केवल रूप-रंग पर ध्यान देता है, इस बात से पूरी तरह से अनजान, कि यद्यपि दोनों काम करने और बोलने में एक-जैसे हैं, फिर भी उनमें अनिवार्य अंतर है। चूँकि चीज़ों को अलग-अलग करके बताने की मनुष्य की क्षमता बहुत खराब है, इसलिए वह सरल मुद्दों के बीच अंतर करने में भी अक्षम है, जटिल चीज़ों का तो फिर कहना ही क्या। जब नबियों ने और पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए लोगों ने बोला और कार्य किया, तो यह मनुष्य के कर्तव्य निभाने के लिए था; यह एक सृजित प्राणी की भूमिका निभाना था और यह वही था जो मनुष्य को करना चाहिए। किंतु देहधारी परमेश्वर के वचन और कार्य उसकी सेवकाई करने के लिए थे। यद्यपि उसका बाहरी कवच एक सृजित प्राणी का था, किंतु उसका कार्य अपनी भूमिका का क्रियान्वयन करना नहीं, बल्कि अपनी सेवकाई करना था। “कर्तव्य” शब्द सृजित प्राणियों के संबंध में इस्तेमाल किया जाता है, जबकि “सेवकाई” देहधारी परमेश्वर की देह के संबंध में। इन दोनों के बीच एक मूलभूत अंतर है; इन दोनों की अदला-बदली नहीं की जा सकती। मनुष्य का कार्य केवल अपना कर्तव्य निभाना है, जबकि परमेश्वर का कार्य प्रबंधन करना और अपनी सेवकाई को कार्यान्वित करना है। इसलिए, यद्यपि कई प्रेरित पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए और कई नबी पवित्र आत्मा से परिपूर्ण थे, फिर भी उनका कार्य और उनके वचन केवल सृजित प्राणियों के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के लिए थे। हो सकता है, उनकी भविष्यवाणियाँ देहधारी परमेश्वर द्वारा कहे गए जीवन के मार्ग से बढ़कर रही हों, और उनकी मानवता देहधारी परमेश्वर की मानवता का अतिक्रमण करती हो, पर फिर भी वे अपना कर्तव्य ही निभा रहे थे, सेवकाई पूरी नहीं कर रहे थे। मनुष्य का कर्तव्य उसकी भूमिका को संदर्भित करता है; यह मनुष्य के लिए प्राप्य है। जबकि देहधारी परमेश्वर द्वारा की जाने वाली सेवकाई उसके प्रबंधन से संबंधित है और यह मनुष्य द्वारा अप्राप्य है। चाहे देहधारी परमेश्वर बोले, कार्य करे, या चमत्कार करे, वह अपने प्रबंधन के अंतर्गत महान कार्य कर रहा है, इस प्रकार का कार्य उसके बदले मनुष्य नहीं कर सकता। मनुष्य का कार्य केवल सृजित प्राणी के रूप में परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के किसी दिए गए चरण में केवल अपना कर्तव्य पूरा करना है। परमेश्वर के प्रबंधन के बिना, अर्थात्‌ यदि देहधारी परमेश्वर की सेवकाई खो जाती है, तो सृजित प्राणी का कर्तव्य भी खो जाएगा। अपनी सेवकाई करने में परमेश्वर का कार्य मनुष्य का प्रबंधन करना है, जबकि मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य की पूर्ति स्रष्टा की माँगें पूरी करने के लिए अपने दायित्वों की पूर्ति है, और उसे किसी भी तरह से अपनी सेवकाई करना नहीं माना जा सकता। परमेश्वर के अंतर्निहित सार के लिए—उसके पवित्रात्मा के लिए—परमेश्वर का कार्य उसका प्रबंधन है, किंतु देहधारी परमेश्वर के लिए, जो एक सृजित प्राणी का बाहरी कवच धारण करता है, उसका कार्य अपनी सेवकाई करना है। वह जो कुछ भी कार्य करता है, अपनी सेवकाई करने के लिए करता है, और मनुष्य जो अधिकतम कर सकता है, वह है उसके प्रबंधन के क्षेत्र के भीतर और उसकी अगुआई के अधीन अपना सर्वश्रेष्ठ देना।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 161

अनुग्रह के युग में यीशु ने भी कई वचन बोले और बहुत कार्य किया। वह यशायाह से कैसे अलग था? वह दानिय्येल से कैसे अलग था? क्या वह कोई नबी था? ऐसा क्यों कहा जाता है कि वह मसीह है? उनके मध्य क्या भिन्नताएँ हैं? वे सभी मनुष्य थे और उन सबने वचन बोले थे, जो, इसके अलावा, मनुष्य को लगभग एक-से प्रतीत होते थे। उन सभी ने वचन बोले और कार्य किए। पुराने विधान के नबियों ने भविष्यवाणियाँ कीं, और उसी तरह से, यीशु भी वैसा ही कर सकता था। ऐसा क्यों है? यहाँ भेद कार्य की प्रकृति के आधार पर है। इस मामले को विवेक से परखने के लिए तुम्हें देह की प्रकृति पर विचार नहीं करना चाहिए, न ही तुम्हें उनके वचनों की गहराई पर विचार करना चाहिए। कुछ भी हो, तुम्हें पहले उनके कार्य और उसके द्वारा मनुष्य में प्राप्त किए जाने वाले परिणामों पर विचार करना चाहिए। उस समय नबियों द्वारा की गई भविष्यवाणियों ने मनुष्य के जीवन की आपूर्ति नहीं की, यशायाह और दानिय्येल जैसे लोगों द्वारा प्राप्त की गई प्रेरणाएँ मात्र भविष्यवाणियाँ थीं, जीवन का मार्ग नहीं। यदि यहोवा की ओर से प्रत्यक्ष प्रकाशन नहीं होता, तो कोई भी इस कार्य को नहीं कर सकता था, जो नश्वर लोगों के लिए संभव नहीं है। यीशु ने भी कई वचन बोले, परंतु वे वचन जीवन का मार्ग थे, जिनमें से मनुष्य अभ्यास का मार्ग प्राप्त कर सकता था। दूसरे शब्दों में, एक तो वह मनुष्य के जीवन की आपूर्ति कर सकता था, क्योंकि यीशु जीवन है; दूसरे, वह मनुष्यों के विकृत पहलुओं को उलट सकता था; तीसरे, अगले युग में प्रवेश करते हुए वह यहोवा के कार्य को हाथ में ले सकता था; चौथे, वह मनुष्य के भीतर की आवश्यकताएँ जान सकता था और समझ सकता था कि मनुष्य में किस चीज का अभाव है; पाँचवें, वह नए युग का सूत्रपात और पुराने युग का समापन कर सकता था। यही कारण है कि वह परमेश्वर और मसीह है; वह न केवल यशायाह से भिन्न है, अपितु अन्य सभी नबियों से भी भिन्न है। नबियों के कार्य के लिए तुलना के रूप में यशायाह को लें। पहले, वह मनुष्य के जीवन की आपूर्ति नहीं कर सकता था। दूसरे, वह नए युग का सूत्रपात नहीं कर सकता था। वह यहोवा की अगुआई के अधीन कार्य कर रहा था, न कि नए युग का सूत्रपात करने के लिए। तीसरे, उसके द्वारा बोले गए शब्द उससे परे थे। वे सीधे परमेश्वर के आत्मा से प्राप्त प्रकाशन थे और दूसरे लोगों ने जब उन्हें सुना तो वे उन्हें नहीं समझे। ये कुछ चीज़ें अकेले ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि उसके वचन भविष्यवाणियों से अधिक और यहोवा के बदले किए गए कार्य के एक पहलू से ज़्यादा कुछ नहीं थे। वह पूरी तरह से यहोवा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। वह यहोवा का सेवक था, यहोवा के काम में एक उपकरण। वह केवल व्यवस्था के युग के भीतर और यहोवा के कार्य-क्षेत्र के भीतर ही कार्य कर रहा था; उसने व्यवस्था के युग से आगे कार्य नहीं किया। इसके विपरीत, यीशु का कार्य भिन्न था। उसने यहोवा के कार्य-क्षेत्र को पार कर लिया; उसने देहधारी परमेश्वर के रूप में कार्य किया और संपूर्ण मानवजाति के छुटकारे के लिए सलीब पर चढ़ गया। दूसरे शब्दों में, उसने यहोवा द्वारा किए गए कार्य के बाहर नया कार्य किया। यह नए युग का सूत्रपात करना था। इसके अतिरिक्त वह उन बातों के बारे में बोलने में सक्षम था जिन तक मनुष्य नहीं पहुँच सकता था। उसका कार्य परमेश्वर के प्रबंधन के भीतर का कार्य था, जो संपूर्ण मानवजाति को समाविष्ट करता था। इसमें केवल कुछ ही लोग शामिल नहीं थे, न ही इसका उद्देश्य केवल सीमित संख्या में लोगों की अगुआई करना था। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि परमेश्वर कैसे मनुष्य के रूप में देहधारी हुआ, कैसे उस समय पवित्रात्मा ने प्रकाशन दिए, और कैसे पवित्रात्मा कार्य करने के लिए एक मनुष्य पर उतरा, तो ये ऐसी बातें हैं, जिन्हें मनुष्य देख या छू नहीं सकता। इन सत्यों का इस बात का साक्ष्य होना सर्वथा असंभव है कि वह देहधारी परमेश्वर है। इस प्रकार भेद केवल परमेश्वर के वचनों और कार्य के आधार पर ही किया जा सकता है, क्योंकि मनुष्य केवल इन्हीं के संपर्क में आ सकता है और इन्हें अनुभव कर सकता है। केवल यही वास्तविक है। इसका कारण यह है कि पवित्रात्मा के मामले तुम्हारे लिए दृष्टिगोचर नहीं हैं और केवल स्वयं परमेश्वर को ही स्पष्ट रूप से ज्ञात हैं, यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर की देह भी सारी चीज़ें नहीं जानती; तुम केवल उसके द्वारा किए गए कार्य से ही यह निश्चित कर सकते हो कि वह परमेश्वर है। उसके कार्यों से यह देखा जा सकता है कि एक तो वह एक नए युग की शुरुआत करने में सक्षम है; दूसरे, वह मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करने और मनुष्य को अनुसरण का मार्ग दिखाने में सक्षम है। यह इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि वह स्वयं परमेश्वर है। कम से कम, जो कार्य वह करता है, वह पूरी तरह से परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और ऐसे कार्य से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का आत्मा उसके भीतर है। चूँकि देहधारी परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से नए युग का सूत्रपात करना, नए कार्य की अगुआई करना और नया क्षेत्र पैदा करना था, इसलिए ये कुछ स्थितियाँ अकेले ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वह स्वयं परमेश्वर है। इस प्रकार यह उसे यशायाह, दानिय्येल और अन्य महान नबियों से भिन्नता प्रदान करता है। यशायाह, दानिय्येल और अन्य नबी उच्च शिक्षित वर्ग के और सुसंस्कृत मनुष्य थे; वे यहोवा की अगुआई में असाधारण लोग थे। देहधारी परमेश्वर की देह भी ज्ञान-संपन्न थी और उसमें विवेक का अभाव नहीं था, किंतु उसकी मानवता विशेष रूप से सामान्य थी। वह एक साधारण व्यक्ति था, और खुली आँखें यह भेद नहीं पहचान सकती थीं कि उसमें कोई विशेष मानवता है या उसकी मानवता में दूसरों से भिन्न किसी बात का पता नहीं लगा सकती थीं। वह अलौकिक या अद्वितीय बिल्कुल नहीं था, वह अत्यधिक शिक्षित नहीं था और उसके पास ऊँचा ज्ञान या सिद्धांत नहीं थे। जिस जीवन के बारे में उसने कहा और जिस मार्ग की उसने अगुआई की, वे सिद्धांत के माध्यम से, ज्ञान के माध्यम से, संसार से व्यवहार करते हुए उसके अनुभव के माध्यम से प्राप्त नहीं किए गए थे, न ही वे उसके पारिवारिक पालन-पोषण के परिणाम के रूप में घटित हुए थे। बल्कि वे आत्मा का प्रत्यक्ष कार्य थे, जो कि देहधारी देह का कार्य है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर के बारे में मनुष्य महान धारणाएँ रखता है और विशेष रूप से चूँकि ये धारणाएँ बहुत सारे अस्पष्ट और अलौकिक तत्वों से बनी हैं, इसलिए मनुष्य की दृष्टि में मानवीय कमजोरियों वाला यह सामान्य परमेश्वर, जो संकेत और चमत्कार प्रदर्शित नहीं कर सकता, निश्चित रूप से परमेश्वर नहीं है। क्या ये मनुष्य की भ्रामक धारणाएँ नहीं हैं? यदि देहधारी परमेश्वर का देह एक सामान्य मनुष्य न होता, तो उसे देहधारी देह कैसे कहा जा सकता था? देह का होना एक साधारण, सामान्य व्यक्ति होना है; यदि वह कोई अलौकिक प्राणी होता, तो फिर वह देह का नहीं होता। यह साबित करने के लिए कि वह देह का है, देहधारी परमेश्वर को एक सामान्य देह धारण करने की आवश्यकता थी। यह सिर्फ़ देहधारण के मायने पूरे करने के लिए था। किंतु नबियों और मनुष्य के पुत्रों के साथ यह मामला नहीं था। वे पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए मेधावी मनुष्य थे; मनुष्य की नज़रों में उनकी मानवता विशेष रूप से महान थी, और उन्होंने ऐसे कई कार्य किए, जो सामान्य मानवता से आगे निकल गए। इसी कारण से, मनुष्य ने उन्हें परमेश्वरों के रूप में माना। अब तुम सब लोगों को इसे स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए, क्योंकि यह ऐसा विषय रहा है जिसके बारे में पिछले युगों के लोग सबसे अधिक भ्रमित रहे हैं। इसके अतिरिक्त देहधारण सबसे अधिक रहस्यमय चीज़ है और देहधारी परमेश्वर को स्वीकार करना मनुष्य के लिए सर्वाधिक कठिन है। मैं जो कहता हूँ, वह तुम लोगों को अपनी भूमिका पूरी करने और देहधारण का रहस्य समझने में सहायक है। यह सब परमेश्वर के प्रबंधन, उसके दर्शनों से संबंधित है। इसके बारे में तुम लोगों की समझ दर्शनों, अर्थात् परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य, का ज्ञान प्राप्त करने में अधिक लाभदायक होगी। इस तरह, तुम लोग विभिन्न प्रकार के लोगों द्वारा अवश्य करने योग्य कर्तव्य के बारे में और अधिक समझ प्राप्त करोगे। यद्यपि ये वचन तुम्हें प्रत्यक्ष रूप से मार्ग नहीं दिखाते, फिर भी ये तुम लोगों के प्रवेश के लिए बहुत सहायक हैं, क्योंकि वर्तमान में तुम लोगों के जीवन में दर्शनों का अत्यधिक अभाव है, और यह तुम लोगों के प्रवेश में रुकावट डालने वाली एक महत्वपूर्ण बाधा बन जाएगा। यदि तुम लोग इन मुद्दों को समझने में अक्षम रहते हो, तो तुम लोगों के प्रवेश को प्रेरित करने वाली कोई प्रेरणा नहीं होगी। और इस तरह का अनुसरण तुम्हें अपना कर्तव्य अच्छे से पूरा करने में सक्षम कैसे बना सकता है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 162

कुछ लोग पूछेंगे, “देहधारी परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य और अतीत के भविष्यवक्ताओं और प्रेरितों द्वारा किए गए कार्य में क्या अन्तर है? दाऊद को प्रभु कहकर पुकारा जाता था, और यीशु को प्रभु कहकर पुकारा जाता था; यद्यपि उन्होंने जो कार्य किया वह भिन्न था, फिर भी उन्हें एक जैसे ही नाम से पुकारा गया था। मुझे बताओ उनकी पहचान एक जैसी क्यों नहीं थी? जो यूहन्ना ने देखा था वह एक दर्शन था, ऐसा दर्शन जो पवित्र आत्मा से भी आया था, और वह उन वचनों को कहने में समर्थ था जो पवित्र आत्मा ने कहने का इरादा किया था; तो यूहन्ना की पहचान यीशु से भिन्न क्यों है?” यीशु के द्वारा कहे गए वचन परमेश्वर का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व करने में समर्थ थे और वे परमेश्वर के कार्य का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व करते थे। जो यूहन्ना ने देखा वह एक दर्शन था, और वह परमेश्वर के कार्य का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ था। ऐसा क्यों है कि यूहन्ना, पतरस और पौलुस ने बहुत-से वचन कहे—जैसे यीशु ने कहे थे—फिर भी उनके पास यीशु के समान पहचान नहीं थी? मुख्य रूप से ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने जो कार्य किया वह भिन्न था। यीशु ने परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व किया, और वह परमेश्वर का आत्मा था जो सीधे तौर पर कार्य कर रहा था। उसने नये युग का कार्य किया, ऐसा कार्य जिसे पहले कभी किसी ने नहीं किया था। उसने एक नया मार्ग प्रशस्त किया, उसने यहोवा का प्रतिनिधित्व किया और उसने स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया, जबकि पतरस, पौलुस और दाऊद, इस बात की परवाह किए बिना कि उन्हें क्या कहकर पुकारा जाता था, उन्होंने केवल सृजित प्राणी की पहचान का प्रतिनिधित्व किया था, और उन्हें यीशु या यहोवा ने भेजा था। इसलिए भले ही उन्होंने कितना ही काम क्यों न किया हो, भले ही उन्होंने कितने ही बड़े चमत्कार क्यों न किए हों, वे तब भी बस सृजित प्राणी ही थे, और परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ थे। उन्होंने परमेश्वर के नाम पर या परमेश्वर द्वारा भेजे जाने के बाद ही कार्य किया था; इससे भी बढ़कर, उन्होंने यीशु या यहोवा द्वारा शुरू किए गए युगों में कार्य किया था, और उन्होंने जो कार्य किया वह पृथक नहीं था। वे आखिरकार सृजित प्राणी ही थे। पुराने नियम में, बहुत सारे भविष्यवक्ताओं ने भविष्यवाणियाँ की थीं, या भविष्यवाणी की पुस्तकें लिखी थीं। किसी ने भी नहीं कहा था कि वे परमेश्वर हैं, परन्तु जैसे ही यीशु ने कार्य करना आरम्भ किया, परमेश्वर के आत्मा ने उसकी गवाही दी कि वह परमेश्वर है। ऐसा क्यों है? इस बिन्दु पर यह तुम्हें पहले से ही जान लेना चाहिए! इससे पहले, प्रेरितों और भविष्यवक्ताओं ने विभिन्न धर्मपत्र लिखे, और बहुत-सी भविष्यवाणियाँ कीं। बाद में, लोगों ने बाइबल में रखने के लिए उनमें से कुछ को चुन लिया और कुछ खो गई थीं। चूँकि ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि उनके द्वारा बोला गया सब कुछ पवित्र आत्मा से आया, तो क्यों इसमें से कुछ को अच्छा माना जाता है, और कुछ को खराब? और क्यों कुछ को चुना गया था और अन्यों को नहीं? यदि वे वाकई में पवित्र आत्मा के द्वारा कहे गए वचन होते, तो क्या लोगों को उनका चयन करने की आवश्यकता होती? क्यों यीशु द्वारा बोले गए वचनों और उसके कार्यों का विवरण चारों सुसमाचारों में से प्रत्येक में भिन्न है? क्या यह उन लोगों का दोष नहीं है जिन्होंने इसे दर्ज किया? कुछ लोग पूछेंगे, “चूँकि पौलुस और नए नियम के अन्य लेखकों द्वारा लिखे गए धर्मपत्र और उनके द्वारा किए गए कार्य आंशिक रूप से मनुष्य की इच्छा से आये थे, और मनुष्य की धारणाओं से मिश्रित हो गए थे, तो क्या उन वचनों में कोई मानवीय मिलावट नहीं है जिन्हें आज तुम (परमेश्वर) बोलते हो, क्या उनमें वास्तव में कोई भी मानवीय धारणा शामिल नहीं है?” परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य का यह चरण पौलुस और अनेक प्रेरितों और भविष्यवक्ताओं के द्वारा किए गए कार्य से पूरी तरह से भिन्न है। न केवल यहाँ पहचान में अन्तर है, बल्कि, मुख्य रूप से, कार्यान्वित किए गए कार्य में भी अन्तर है। जब पौलुस को नीचे गिराया गया और वह प्रभु के सामने गिर पड़ा उसके पश्चात्, कार्य करने के लिए पवित्र आत्मा के द्वारा उसकी अगुवाई की गई थी, और वह ऐसा बन गया था जिसे भेजा गया था। इसलिए उसने कलीसियाओं को धर्मपत्र लिखे, और इन सभी धर्मपत्रों ने यीशु की शिक्षाओं को जारी रखा। पौलुस को प्रभु यीशु के नाम पर कार्य करने के लिए प्रभु के द्वारा भेजा गया था, परन्तु जब परमेश्वर स्वयं आया, तो उसने किसी नाम से कार्य नहीं किया, तथा अपने कार्य में किसी और का नहीं बल्कि परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व किया। परमेश्वर अपने कार्य को सीधे तौर पर करने के लिए आया : उसे मनुष्य के द्वारा सिद्ध नहीं बनाया गया था, और उसके कार्य को किसी मनुष्य की शिक्षाओं के आधार पर कार्यान्वित नहीं किया गया था। कार्य के इस चरण में परमेश्वर अपने व्यक्तिगत अनुभवों के बारे में बात करने के द्वारा अगुवाई नहीं करता है, बल्कि जो कुछ उसके पास है उसके अनुसार अपने कार्य को सीधे तौर पर कार्यान्वित करता है। उदाहरण के लिए, सेवा करने वालों का परीक्षण, ताड़ना का समय, मृत्यु का परीक्षण, परमेश्वर से प्रेम करने का समय...। यह सब वह कार्य है जो पहले कभी नहीं किया गया है, और ऐसा कार्य है जो, मनुष्य के अनुभवों के बजाय, वर्तमान युग का है। उन वचनों में जो मैंने कहे हैं, मनुष्य के अनुभव कौन-से हैं? क्या वे सब सीधे तौर पर आत्मा से नहीं आते हैं, और क्या वे आत्मा के द्वारा जारी नहीं किए जाते हैं? बस इतना ही है कि तुम्हारी क्षमता इतनी कम है कि तुम सत्य को देखने में असमर्थ हो! जीवन का वह व्यावहारिक तरीका जिसकी मैं बात करता हूँ, पथ के मार्गदर्शन के लिए है, और इसे किसी के द्वारा पहले कभी नहीं कहा गया है, न ही कभी किसी ने इस पथ का अनुभव किया है, या इसकी वास्तविकता को जाना है। इन वचनों को मेरे कहने से पहले, किसी ने कभी नहीं कहा था। किसी ने कभी ऐसे अनुभवों के बारे में बात नहीं की थी, न ही उन्होंने कभी ऐसे विवरणों को कहा था, और, इससे भी बढ़कर, किसी ने भी इन चीज़ों को उजागर करने के लिए ऐसी अवस्थाओं की ओर कभी संकेत नहीं किया था। किसी ने कभी भी उस पथ की अगुवाई नहीं की जिसकी अगुवाई आज मैं करता हूँ, और यदि मनुष्य अगुवाई कर रहा होता, तो कोई नया मार्ग नहीं होता। उदाहरण के लिए, पौलुस और पतरस को लें। उनके पास यीशु द्वारा पथ की अगुआई किए जाने से पहले अपने स्वयं के कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं थे। जब यीशु ने उस पथ की अगुवाई की केवल उसके बाद ही उन्होंने यीशु के द्वारा बोले गए वचनों का, और उसके द्वारा अगुआई किए गए पथ का अनुभव किया; इससे उन्होंने अनेक अनुभव अर्जित किए, और धर्मपत्रों को लिखा। और इस प्रकार, मनुष्य के अनुभव परमेश्वर के कार्य के समान नहीं हैं, और परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं के समान या अपने अनुभव के आधार पर मनुष्य द्वारा साझा किए गए ज्ञान के समान नहीं है। मैंने बार-बार कहा है कि मैं एक नए पथ की अगुवाई कर रहा हूँ, और नया कार्य कर रहा हूँ, और मेरा कार्य और मेरे कथन यूहन्ना और अन्य सभी भविष्यवक्ताओं से भिन्न हैं। मैं कभी भी ऐसा नहीं करता हूँ कि पहले अनुभवों को प्राप्त करूँ और फिर उन्हें तुम लोगों से कहूँ—ऐसा मामला तो बिल्कुल भी नहीं है। यदि ऐसा होता, तो क्या इससे तुम लोगों को बहुत पहले ही देर न हो जाती? अतीत में, जिस ज्ञान के बारे में बहुतों ने बात की थी वह काफी उत्कृष्ट था, परन्तु उनके सभी वचन केवल तथाकथित आध्यात्मिक व्यक्तियों के आधार पर बोले गए थे। उन्होंने पथ प्रदर्शन नहीं किया, परन्तु वे उनके अनुभवों से आये थे, जो कुछ उन्होंने देखा था उससे, और उनके ज्ञान से आये थे। कुछ उनकी धारणाएँ थीं, और कुछ में वे अनुभव थे जिनकी उन्होंने व्युत्पत्ति की थी। आज, मेरे कार्य की प्रकृति उनसे पूरी तरह से भिन्न है। मैंने दूसरों के द्वारा अगुवाई किए जाने का अनुभव नहीं किया है, न ही मैंने दूसरों के द्वारा सिद्ध किए जाने को स्वीकार किया है। इससे भी बढ़ कर, मैंने जो कुछ भी कहा और जिसकी भी संगति की है, वह सब किसी भी अन्य के असदृश है, और किसी अन्य के द्वारा कभी नहीं बोला गया है। आज, इस बात की परवाह किए बिना कि तुम कौन हो, तुम लोगों का कार्य उन वचनों के आधार पर कार्यान्वित किया जाता है जिन्हें मैं बोलता हूँ। इन कथनों और कार्य के बिना, कौन इन चीज़ों का अनुभव करने में सक्षम होता (सेवा करने वालों के परीक्षण, ताड़ना का समय...), और कौन ऐसे ज्ञान को कहने में समर्थ होता? क्या तुम सचमुच इसे देखने में असमर्थ हो? चाहे कार्य का कदम कोई भी हो, जैसे ही मेरे वचन कहे जाते हैं, तुम लोग मेरे वचनों के अनुसार संगति करना शुरू करते हो, और उनके अनुसार काम करते हो, और यह ऐसा मार्ग नहीं है जिसके बारे में तुम लोगों में से किसी ने भी सोचा है। इतनी दूर तक आने के बाद, क्या तुम अब भी इतने स्पष्ट और सरल प्रश्न को देखने में असमर्थ हो? यह ऐसा मार्ग नहीं है जिसे किसी ने सोचा है, न ही यह किसी आध्यात्मिक व्यक्ति पर आधारित है। यह एक नया पथ है, और यहाँ तक कि बहुत-से पुराने हो चुके वचन जिन्हें यीशु के द्वारा कहा गया था, अमान्य हो चुके हैं। जो मैं कहता हूँ वह एक नये युग को शुरू करने का कार्य है, और यह अपने आप में एक विशिष्ट कार्य है; जो कार्य मैं करता हूँ, और जो वचन मैं कहता हूँ, वे सब नए हैं। क्या यह आज का नया कार्य नहीं है? यीशु का कार्य भी इसके जैसा ही था। उसका कार्य भी मन्दिर के लोगों से भिन्न था, और इसलिए यह फरीसियों के कार्य से भी भिन्न था, और न ही यह उस कार्य के समान था जो इस्राएल के सभी लोगों द्वारा किया गया था। इसे देखने के बाद, लोग अपना मन नहीं बना सके : “क्या इसे सचमुच में परमेश्वर के द्वारा किया गया था?” यीशु ने यहोवा की व्यवस्था का पालन नहीं किया; जब वह मनुष्य को सिखाने आया, तो जो कुछ उसने कहा वह उससे नया और भिन्न था जिन्हें प्राचीन संतों और पुराने नियम के भविष्यवक्ताओं के द्वारा कहा गया था, और इस वजह से, लोग अनिश्चित बने रहे। यही बात मनुष्य को संभालना इतना कठिन बनाती है। कार्य के इस नये चरण को स्वीकार करने से पहले, वह पथ जिस पर तुम में से अधिकतर लोग चलते थे, वह उन पिछले आध्यात्मिक व्यक्तियों द्वारा रखी गई नींव के आधार पर अभ्यास करना और उसमें प्रवेश करना था। परन्तु आज, वह कार्य जिसे मैं करता हूँ वह बहुत ही भिन्न है, और इसलिए तुम लोग यह निर्णय लेने में असमर्थ हो कि यह सही है या नहीं। मैं परवाह नहीं करता हूँ कि पहले तुम किस पथ पर चले थे, न ही मेरी इसमें रुचि है कि तुमने किसका “भोजन” खाया था, या किसे तुमने अपने “पिता” के रूप में अपनाया था। चूँकि मैं आ गया हूँ और मनुष्य का मार्गदर्शन करने के लिए नया कार्य लाया हूँ, इसलिए जो मेरा अनुसरण करते हैं उन सभी को जो कुछ मैं कहता हूँ वह अवश्य करना चाहिए। तुम चाहे कितने ही सामर्थ्यवान “परिवार” से क्यों न आते हो, तुम्हें मेरा अनुसरण करना ही होगा, तुम्हें अपने पहले के अभ्यासों के अनुसार अवश्य ही काम नहीं करना चाहिए, तुम्हारे “पालक पिता” को पद से हट जाना चाहिए, और अपना न्यायसंगत हिस्सा खोजने के लिए तुम्हें अपने परमेश्वर के सामने आना चाहिए। तुम समग्र रूप से मेरे ही हाथों में हो, और तुम्हें अपने पालक पिता के प्रति बहुत अधिक अंधा विश्वास अर्पित नहीं करना चाहिए; वह तुम्हें पूरी तरह से नियन्त्रित नहीं कर सकता है। आज का कार्य अपने आप में विशिष्ट कार्य है। जो कुछ मैं आज कहता हूँ वह सब स्पष्ट रूप से अतीत की किसी बुनियाद पर आधारित नहीं है; यह एक नई शुरुआत है। यदि तुम कहो कि इसे मनुष्य के हाथ से सृजित किया गया है, तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जो इतना अंधा है कि बचाया नहीं जा सकता है!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पदवियों और पहचान के संबंध में

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 163

यशायाह, यहेजकेल, मूसा, दाऊद, अब्राहम और दानिय्येल इस्राएल के चुने हुए लोगों में से अगुवे या भविष्यवक्ता थे। उन्हें परमेश्वर क्यों नहीं कहा गया था? क्यों पवित्र आत्मा ने उनकी गवाही नहीं दी? क्यों जैसे ही यीशु ने अपना कार्य प्रारम्भ किया और अपने वचनों को बोलना आरम्भ किया तो पवित्र आत्मा ने यीशु की गवाही दी? और क्यों पवित्र आत्मा ने अन्य लोगों की गवाही नहीं दी? जो मनुष्य हाड़-माँस के थे, उन्हें, “प्रभु” कहकर पुकारा जाता था। इस बात की परवाह किए बिना कि उन्हें क्या कहकर पुकारा जाता था, उनका कार्य उनके अस्तित्व और सार को दर्शाता है, और उनका अस्तित्व और सार उनकी पहचान को दर्शाता है। उनका सार उनकी पदवियों से सम्बंधित नहीं है; जो कुछ वे अभिव्यक्त करते थे, और जैसा जीवन वे जीते थे, इसे उसके द्वारा दर्शाया जाता है। पुराने नियम में, प्रभु कहकर पुकारा जाना सामान्य बात थी, और किसी भी व्यक्ति को किसी भी तरह से पुकारा जा सकता था, परन्तु उनका सार और अंतर्निहित पहचान अपरिवर्तनीय रहती थी। उन झूठे मसीहाओं, झूठे भविष्यवक्ताओं और गुमराह करने वालों के बीच, क्या ऐसे लोग भी नहीं हैं जिन्हें “परमेश्वर” कहा जाता है? और वे परमेश्वर क्यों नहीं हैं? क्योंकि वे परमेश्वर का कार्य करने में असमर्थ हैं। मूलतः वे मनुष्य हैं, लोगों को गुमराह करने वाले हैं, न कि परमेश्वर; और इसलिए उनके पास परमेश्वर की पहचान नहीं है। क्या बारह गोत्रों में दाऊद को भी प्रभु कहकर नहीं पुकारा जाता था? यीशु को भी प्रभु कहकर पुकारा गया था; क्यों सिर्फ यीशु को ही देहधारी परमेश्वर कहकर पुकारा गया था? क्या यिर्मयाह को भी “मनुष्य का पुत्र” नहीं कहा गया था? और क्या यीशु को मनुष्य का पुत्र नहीं कहा जाता था? क्यों यीशु को परमेश्वर की ओर से सलीब पर चढ़ाया जा सका था? क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि उसका सार भिन्न था? क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि जो कार्य उसने किया वह भिन्न था? क्या पद नाम से फर्क पड़ता है? यद्यपि यीशु को भी मनुष्य का पुत्र कहा जाता था, फिर भी वह परमेश्वर का पहला देहधारण था, वह सामर्थ्य ग्रहण करने, और छुटकारे के कार्य को पूरा करने के लिए आया था। यह साबित करता है कि यीशु की पहचान और सार उन दूसरों से भिन्न थे जिन्हें भी मनुष्य का पुत्र कहा जाता था। आज, तुम लोगों में से कौन यह कहने का साहस कर सकता है कि पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किए गए लोगों द्वारा कहे गए सभी वचन पवित्र आत्मा से आये थे? क्या किसी में ऐसी चीज़ें कहने का साहस है? यदि तुम ऐसी चीज़ें कहते हो, तो फिर क्यों एज्रा की भविष्यवाणी की पुस्तक को हटा दिया गया था, और क्यों यही उन प्राचीन संतों और भविष्यवक्ताओं की पुस्तकों के साथ किया गया था? यदि वे सभी पवित्र आत्मा से आयी थीं, तो तुम लोग क्यों ऐसे मनमाने चुनाव करने का साहस करते हो? क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य को चुनने के योग्य हो? इस्राएल की बहुत सारी कहानियों को भी हटा दिया गया था। और यदि तुम मानते हो कि अतीत के ये सभी लेख पवित्र आत्मा से आये, तो फिर क्यों कुछ पुस्तकों को हटा दिया गया था? यदि वे सभी पवित्र आत्मा से आये, तो उन सब को सुरक्षित रखा जाना चाहिए था, और पढ़ने के लिए कलीसियाओं के भाइयों और बहनों को भेजा जाना चाहिए था, उन्हें मानवीय इच्छा के अनुसार मनमाने ढंग से चुना या नामंज़ूर नहीं किया जाना चाहिए था—केवल ऐसा करना ही सही होता। यह कहना कि पौलुस और यूहन्ना के अनुभव उनकी व्यक्तिगत अंतर्दृष्टियों के साथ घुल-मिल गए थे इसका यह मतलब नहीं है कि उनका अनुभवजन्य ज्ञान शैतान से आया था, बल्कि बात केवल इतनी है कि उनके पास ऐसी चीज़ें थीं जो उनके व्यक्तिगत अनुभवों और अंतर्दृष्टियों से आई थीं। उनका ज्ञान उस समय के उनके वास्तविक अनुभवों की पृष्ठभूमि पर आधारित था। कौन आत्मविश्वास के साथ कह सकता था कि यह सब पवित्र आत्मा से आया था? यदि चारों सुसमाचार पवित्र आत्मा से आए, तो ऐसा क्यों था कि मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना में से प्रत्येक ने यीशु के कार्य के बारे कुछ भिन्न कहा? यदि तुम लोग इस पर विश्वास नहीं करते हो, तो फिर तुम बाइबल के विवरणों में देखो कि किस प्रकार पतरस ने प्रभु को तीन बार नकारा था : वे सब भिन्न हैं, और उनमें से प्रत्येक की अपनी विशेषताएँ हैं। बहुत-से अज्ञानी लोग कहते हैं, “देहधारी परमेश्वर भी एक मनुष्य है, तो क्या जो वचन वह कहता है, वे पूरी तरह से पवित्र आत्मा से आ सकते हैं? जब पौलुस और यूहन्ना के शब्द मानवीय इच्छा के साथ मिले हुए थे, तो क्या जिन वचनों को वो कहता है वे वास्तव में मानवीय इच्छा के साथ मिले हुए नहीं हैं?” जो लोग ऐसी बातें करते हैं वे अन्धे और अज्ञानी हैं! चारों सुसमाचारों को ध्यान से पढ़ो : यीशु ने जो कहा और किया, उसके बारे में प्रत्येक व्यक्ति का विवरण एक-दूसरे से लगभग पूरी तरह भिन्न है और प्रत्येक लेखक का अपना दृष्टिकोण है। यदि इन पुस्तकों के लेखकों के द्वारा जो कुछ लिखा गया था, वह सब पवित्र आत्मा से आया, तो यह सब एक समान और सुसंगत होना चाहिए। तो फिर उनमें विसंगतियाँ क्यों हैं? क्या मनुष्य अत्यंत मूर्ख नहीं है जो इसे देखने में असमर्थ है? यदि तुम्हें परमेश्वर की गवाही देने के लिए कहा जाता है, तो तुम किस प्रकार की गवाही प्रदान कर सकते हो? क्या तुम ऐसी समझ के साथ परमेश्वर के लिए गवाही दे सकते हो? यदि अन्य लोग तुमसे पूछें, “यदि यूहन्ना और लूका के लेख मानवीय इच्छा के साथ मिश्रित हो गए थे, तो क्या तुम लोगों के परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन मानवीय इच्छा से मिश्रित नहीं हैं?” क्या तुम एक स्पष्ट उत्तर दे पाओगे? लूका और मत्ती द्वारा यीशु के वचनों को सुनने और यीशु के कार्यों को देखने के पश्चात्, उन्होंने यीशु द्वारा किए गए कार्य के कुछ तथ्यों के संस्मरणों का विवरण देने के तरीके से स्वयं के ज्ञान के बारे में बोला था। क्या तुम कह सकते हो कि उनके ज्ञान को पूरी तरह से पवित्र आत्मा के द्वारा प्रकट किया गया था? बाइबल के बाहर, कई आध्यात्मिक व्यक्ति थे जिनके पास उनसे भी अधिक ज्ञान था तो बाद की पीढ़ियों के द्वारा उनके वचनों को क्यों नहीं अपनाया गया था? क्या उनका भी पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग नहीं किया गया था? यह जान लो कि आज मैं जो कार्य कर रहा हूँ, वह अपनी अंतर्दृष्टि के साथ यीशु के कार्य की नींव पर निर्माण करना नहीं है और न ही यह यीशु के कार्य को पृष्ठभूमि के रूप में लेकर अपना ज्ञान साझा करना है। उस समय यीशु ने कौन-सा कार्य किया था? और आज मैं कौन-सा कार्य कर रहा हूँ? जो मैं करता और कहता हूँ उसकी कोई मिसाल नहीं है। जिस पथ पर मैं आज चलता हूँ उस पर इससे पहले कभी नहीं चला गया है, इस पर बीते युगों और अतीत की पीढ़ियों के लोगों द्वारा कभी नहीं चला गया था। आज, इसका निर्माण किया गया है, और क्या यह आत्मा का कार्य नहीं है? यद्यपि यह पवित्र आत्मा का कार्य था, फिर भी अतीत के सभी अगुवाओं ने अपने कार्य को औरों की बुनियाद पर कार्यान्वित किया था; हालाँकि, स्वयं परमेश्वर का कार्य भिन्न होता है। यीशु के कार्य का चरण वैसा ही था : उसने एक नया मार्ग प्रशस्त किया। जब वह आया तब उसने स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का उपदेश दिया, और कहा कि मनुष्य को पश्चात्ताप करना और पाप-स्वीकार करना चाहिए। जब यीशु ने अपना कार्य पूरा किया, उसके बाद पतरस और पौलुस और दूसरों ने यीशु के कार्य को जारी रखना प्रारम्भ किया था। जब यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया और उसका स्वर्ग में आरोहण हो गया, उसके बाद उन्हें सलीब के मार्ग का प्रचार करने के लिए आत्मा के द्वारा भेजा गया था। यद्यपि पौलुस के वचन उत्कृष्ट थे, फिर भी, वे भी यीशु द्वारा कहे गए की बुनियाद पर आधारित थे, जैसे कि धैर्य, प्रेम, कष्ट, सिर ढकना, बपतिस्मा, या पालन किए जाने वाले अन्य विनियम। यह सब यीशु के वचनों की बुनियाद पर था। वे एक नया मार्ग खोलने में असमर्थ थे, क्योंकि वे सभी परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए गए मनुष्य थे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पदवियों और पहचान के संबंध में

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 164

उस समय जब यीशु ने बोला और कार्य किया, तो वह किसी विनियम का पालन नहीं कर रहा था; और उसने अपने कार्य को पुराने नियम की व्यवस्था के कार्य के अनुसार कार्यान्वित नहीं किया था। यह उस कार्य के अनुसार कार्यान्वित किया गया था जो अनुग्रह के युग में किया जाना चाहिए। वह उस कार्य के अनुसार जो वह सामने लाया था, स्वयं की योजना के अनुसार, और अपनी सेवकाई के अनुसार आगे बढ़ा; उसने पुराने नियम की व्यवस्था के अनुसार कार्य नहीं किया। उसने जो भी किया उसमें कुछ भी पुराने नियम की व्यवस्था के अनुसार नहीं था, और वह भविष्यवक्ताओं के वचनों को पूरा करने के कार्य को करने के लिए नहीं आया था। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण विशिष्ट रूप से प्राचीन भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणियों को पूरा करने के लिए नहीं किया गया था, वह विनियमों का पालन करने या प्राचीन भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणियों को जानबूझकर साकार करने के लिए नहीं आया था। फिर भी उसके कार्यों ने प्राचीन भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणियों में व्यवधान नहीं डाला, न ही उन्होंने उसके द्वारा पहले किए गए कार्य में व्यवधान डाला था। उसके कार्य का प्रमुख बिन्दु किसी विनियम का पालन करना नहीं, इसके बजाय उस कार्य को करना था जो उसे स्वयं करना चाहिए था। वह कोई भविष्यवक्ता या नबी नहीं था, बल्कि कार्य करने वाला था, जो वास्तव में उस कार्य को करने आया था जिसे उसे करना चाहिए, और अपने नए युग को शुरू करने और अपने नये कार्य को कार्यान्वित करने के लिए आया था। निस्संदेह, जब यीशु अपना कार्य करने के लिए आया, तो उसने पुराने नियम में प्राचीन भविष्यवक्ताओं के द्वारा कहे गए बहुत-से वचनों को भी पूरा किया। इसलिए आज के कार्य ने पुराने नियम के प्राचीन भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणियों को भी पूरा किया है। बस ऐसा है कि मैं उस “पुरानी जन्त्री” का संदर्भ नहीं देता हूँ, बस इतना ही, क्योंकि और भी बहुत-से कार्य हैं जो मुझे अवश्य ही करने हैं, और बहुत-से वचन हैं जो मुझे तुम लोगों से अवश्य कहने हैं; दोनों ही बाइबल के अंशों की व्याख्या करने की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं, और क्योंकि ऐसे कार्य का तुम लोगों के लिए कोई बड़ा महत्व या मूल्य नहीं है, और यह तुम लोगों की सहायता नहीं कर सकता है, या तुम लोगों को बदल नहीं सकता है। मैं नया कार्य बाइबल के किसी अंश को पूरा करने के वास्ते नहीं करूँगा। यदि परमेश्वर केवल बाइबल के प्राचीन भविष्यवक्ताओं के वचनों को पूरा करने के लिए पृथ्वी पर आया, तो अधिक बड़ा कौन है, देहधारी परमेश्वर या वे प्राचीन भविष्यवक्ता? आख़िरकार, क्या भविष्यवक्ता परमेश्वर के प्रभारी हैं, या परमेश्वर भविष्यवक्ताओं का प्रभारी है? तुम इन वचनों की व्याख्या कैसे करते हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पदवियों और पहचान के संबंध में

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 165

परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण एक ही धारा का अनुसरण करता है, और इसलिए परमेश्वर की छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना में, संसार की नींव से लेकर ठीक आज तक, प्रत्येक कदम का अगले कदम के द्वारा नजदीकी से अनुसरण किया गया है। यदि मार्ग प्रशस्त करने के लिए कोई न होता, तो पीछे चलने के लिए कोई न होता; चूँकि ऐसे लोग हैं जो पीछे चलते हैं, इसलिए ऐसे लोग हैं जो मार्ग प्रशस्त करते हैं। यह इस तरह से है कि कार्य कदम-दर-कदम आगे बढ़ाया गया, प्रत्येक कदम पिछले वाले को जारी रखता है। अगर कोई मार्ग प्रशस्त करने वाला न होता, तो कार्य को आरंभ करना असंभव होता और परमेश्वर के पास अपने कार्य को आगे ले जाने का कोई साधन नहीं होता। कोई भी कदम दूसरे कदम में गड़बड़ी नहीं करता है, और एक धारा बनाने के लिए प्रत्येक कदम दूसरे कदम का क्रम से अनुसरण करता है; यह सब एक ही आत्मा के द्वारा किया जाता है। परन्तु इस बात पर ध्यान दिए बिना कि कोई व्यक्ति मार्ग खोलता है या दूसरे के कार्य को जारी रखता है, यह उनकी पहचान को निर्धारित नहीं करता है। क्या यह सही नहीं है? यूहन्ना ने मार्ग खोला, और यीशु ने उसके कार्य को जारी रखा, तो क्या इससे साबित होता है कि यीशु की पहचान यूहन्ना से निम्नतर थी? यीशु से पहले यहोवा ने अपने कार्य को कार्यान्वित किया, तो क्या तुम कह सकते हो कि यहोवा यीशु से अधिक महान है? यह महत्वपूर्ण नहीं है कि उन्होंने मार्ग प्रशस्त किया या दूसरे के कार्य को जारी रखा; जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है वह उनके कार्य का सार, और वह पहचान जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं। क्या यह सही नहीं है? चूँकि परमेश्वर का मनुष्य के बीच कार्य करने का इरादा था, इसलिए उसे ऐसे लोगों को खड़ा करना था जो मार्ग प्रशस्त करने का कार्य कर सकते थे। जब यूहन्ना ने धर्म का उपदेश देना शुरू किया ही था, तो उसने कहा था, “प्रभु का मार्ग तैयार करो, उसकी सड़कें सीधी करो।” “मन फिराओ, क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।” उसने शुरुआत से ही ऐसा कहा, और वह इन वचनों को क्यों कह पाया था? जिस क्रम में इन वचनों को कहा गया था उस लिहाज से, यह यूहन्ना था जिसने सबसे पहले स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को कहा था, और यीशु ने उसके बाद बोला था। मनुष्य की धारणाओं के अनुसार, यह यूहन्ना था जिसने नया पथ प्रशस्त किया था, और इसलिए निस्संदेह यूहन्ना यीशु से अधिक महान था। परन्तु यूहन्ना ने नहीं कहा था कि वह मसीह है, और परमेश्वर ने परमेश्वर के प्रिय पुत्र के रूप में उसकी गवाही नहीं दी थी, बल्कि मार्ग को प्रशस्त करने और प्रभु के लिए मार्ग तैयार करने के लिए मात्र उसका उपयोग किया था। उसने यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त किया था, परन्तु वह यीशु की जगह कार्य नहीं कर सकता था। मनुष्य का समस्त कार्य भी पवित्र आत्मा के द्वारा बनाए रखा गया था।

पुराने नियम के युग में, यहोवा ने मार्ग की अगुवाई की थी, और यहोवा का कार्य पुराने नियम के सम्पूर्ण युग, और इस्राएल में किए गए समस्त कार्य को दर्शाता था। मूसा ने तो मात्र इस कार्य को पृथ्वी पर बनाए रखा, और उसके कार्य को मनुष्य के द्वारा प्रदान किया गया सहयोग माना जाता है। उस समय, यह यहोवा ही था जो बोलता था, मूसा को बुलाता था, और उसने मूसा को इस्राएल के लोगों में से ऊपर उठाया था, और उससे जंगल में और कनान में प्रवेश करने में उनकी अगुवाई करवाई थी। यह स्वयं मूसा का कार्य नहीं था, परन्तु ऐसा कार्य था जिसे यहोवा द्वारा व्यक्तिगत रूप से निर्देशित किया गया था, और इसलिए मूसा को परमेश्वर नहीं कहा जा सकता है। मूसा ने भी व्यवस्था निर्धारित की, परन्तु इस व्यवस्था का आदेश यहोवा के द्वारा व्यक्तिगत रूप से दिया गया था। बस इतना ही था कि उसने उन्हें मूसा से व्यक्त करवाया था। यीशु ने भी आज्ञाएँ दीं, और पुराने नियम की व्यवस्था का उन्मूलन किया और नये युग के लिए आज्ञाएँ निर्दिष्ट कीं। यीशु स्वयं परमेश्वर क्यों है? क्योंकि मूसा का कार्य और यीशु का कार्य समान नहीं हैं। उस समय, मूसा के द्वारा किया गया कार्य युग को नहीं दर्शाता था, न ही उसने कोई नया मार्ग खोला था; यहोवा मार्ग की अगुआई कर रहा था और मूसा के कार्य को निर्देशित कर रहा था, और मूसा मात्र वह व्यक्ति था जिसका परमेश्वर द्वारा उपयोग किया गया था। जब यीशु आया, तब यूहन्ना ने मार्ग प्रशस्त करने के कार्य के एक कदम को कार्यान्वित कर लिया था, और स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का प्रचार करना शुरू कर दिया था (पवित्र आत्मा ने इसे शुरू किया था)। जब यीशु आया, तो उसने सीधे तौर पर खुद का कार्य किया, परन्तु उसके कार्य और मूसा के कार्य के बीच में एक बहुत बड़ा अन्तर था। यशायाह ने भी बहुत-सी भविष्यवाणियाँ कहीं, फिर भी क्यों वह स्वयं परमेश्वर नहीं था? यीशु ने बहुत-सी भविष्यवाणियाँ नहीं कहीं, फिर भी क्यों वह स्वयं परमेश्वर था? किसी ने भी यह कहने का साहस नहीं किया कि उस समय यीशु का समस्त कार्य पवित्र आत्मा की ओर से आया, न ही उन्होंने यह कहने का साहस किया कि यह सब मनुष्य की इच्छा से आया, या यह पूरी तरह स्वयं परमेश्वर का कार्य था। मनुष्य के पास ऐसी बातों का विश्लेषण करने का कोई तरीका नहीं था। यह कहा जा सकता है कि यशायाह ने जो कार्य किया था और जो भविष्यवाणियाँ कीं, वे सभी पवित्र आत्मा से आई थीं; वे सीधे तौर पर स्वयं यशायाह से नहीं आयीं, बल्कि यहोवा की ओर से प्रेरणाएँ थीं। यीशु ने बड़ी मात्रा में कार्य नहीं किया, और बहुत सारे वचनों को नहीं कहा, न ही उसने बहुत सारी भविष्यवाणियाँ कहीं। मनुष्य के लिए, उसका उपदेश देना विशेष रूप से उत्कृष्ट प्रतीत नहीं होता था, फिर भी वह स्वयं परमेश्वर था, और मनुष्य का इसे समझाना असंभव है। किसी ने कभी भी यूहन्ना, या यशायाह, या दाऊद पर विश्वास नहीं किया है; न ही किसी ने कभी उन्हें परमेश्वर कहा, या दाऊद परमेश्वर, या यूहन्ना परमेश्वर कहा; किसी ने कभी भी ऐसा नहीं बोला, और केवल यीशु को ही हमेशा मसीह कहा गया है। यह वर्गीकरण परमेश्वर की गवाही, उस कार्य जिसका उसने उत्तरदायित्व लिया, और उस सेवकाई, जो उसने की, उसके अनुसार किया जाता है। बाइबल के महापुरुषों—अब्राहम, दाऊद, यहोशू, दानिय्येल, यशायाह, यूहन्ना और यीशु—के संबंध में उनके द्वारा किए गए कार्य के माध्यम से तुम कह सकते हो कि स्वयं परमेश्वर कौन है, और किस प्रकार के लोग भविष्यवक्ता हैं, और कौन प्रेरित हैं। किसे परमेश्वर के द्वारा उपयोग किया जाता है, और कौन स्वयं परमेश्वर है, यह सार और जिस प्रकार का कार्य उन्होंने किया, उसके द्वारा विभेदित और निर्धारित किया जाता है। यदि तुम अन्तर बताने में असमर्थ हो, तो इससे साबित होता है कि तुम नहीं जानते हो कि परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ क्या होता है। यीशु परमेश्वर है क्योंकि उसने बहुत सारे वचन कहे, और बहुत अधिक कार्य किया, विशेष रूप से उसके द्वारा अनेक चमत्कारों का प्रदर्शन। उसी तरह, यूहन्ना ने भी बहुत अधिक कार्य किया, और बहुत सारे वचनों को बोला, मूसा ने भी ऐसा ही किया था; क्यों उन्हें परमेश्वर नहीं कहा गया था? आदम का सृजन सीधे तौर पर परमेश्वर के द्वारा किया गया था; सिर्फ एक सृजित प्राणी कहे जाने के बजाय उसे परमेश्वर क्यों नहीं कहा गया था? यदि कोई तुमसे कहे, “आज, परमेश्वर ने बहुत अधिक कार्य किया है, और बहुत सारे वचन कहे हैं; वह स्वयं परमेश्वर है। तो, चूँकि मूसा ने बहुत सारे वचन कहे, इसलिए वह भी स्वयं परमेश्वर अवश्य होना चाहिए!” तुम्हें बदले में उनसे पूछना चाहिए, “उस समय, क्यों परमेश्वर ने स्वयं परमेश्वर के रूप में यीशु की गवाही दी, और यूहन्ना की नहीं दी? क्या यूहन्ना यीशु से पहले नहीं आया था? यूहन्ना का कार्य महान था या यीशु का कार्य? मनुष्य को यूहन्ना का कार्य यीशु के कार्य से अधिक महान प्रतीत होता है, परन्तु क्यों पवित्र आत्मा ने यीशु की गवाही दी, और यूहन्ना की नहीं? आज भी वही चीज हो रही है! उस समय, जब मूसा ने इस्राएल के लोगों की अगुवाई की, तो यहोवा ने बादलों के बीच से उससे बात की। मूसा ने सीधे तौर पर बात नहीं की, बल्कि इसके बजाए यहोवा के द्वारा सीधे तौर पर उसका मार्गदर्शन किया गया था। यह पुराने नियम के इस्राएल में कार्य था। मूसा के भीतर आत्मा, या परमेश्वर का अस्तित्व नहीं था। वह उस कार्य को नहीं कर सकता था, और इसलिए उसके द्वारा और यीशु के द्वारा किए गए कार्य में एक बड़ा अन्तर है। और ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने जो कार्य किया वह भिन्न था! किसी व्यक्ति को परमेश्वर के द्वारा उपयोग किया जाता है या नहीं, या वह कोई भविष्यवक्ता, या कोई प्रेरित, या स्वयं परमेश्वर है या नहीं, इसे उसके कार्य की प्रकृति के द्वारा पहचाना जा सकता है, और यह तुम्हारे सन्देहों का अन्त कर देगा। बाइबल में यह लिखा है कि सिर्फ मेमना ही सात मुहरों को खोल सकता है। विभिन्न युगों के दौरान, उन महान व्यक्तियों में पवित्रशास्त्रों के अनेक प्रतिपादक हुए हैं, और इसलिए क्या तुम कह सकते हो कि वे सब मेमने हैं? क्या तुम कह सकते हो कि उनकी सभी व्याख्याएँ परमेश्वर से आई थीं? वे तो मात्र प्रतिपादक हैं; उनके पास मेमने की पहचान नहीं है। वे कैसे सात मुहरों को खोलने के योग्य हो सकते हैं? यह सत्य है कि “सिर्फ मेमना ही सात मुहरों को खोल सकता है,” परन्तु वह सिर्फ सात मुहरों को खोलने के लिए ही नहीं आता है। यह कार्य आवश्यक नहीं है, यह साथ किया जाता है। वह अपने कार्य के बारे में बिल्कुल स्पष्ट है; क्या पवित्रशास्त्रों की व्याख्या करने में काफ़ी समय बिताना उसके लिए आवश्यक है? क्या “पवित्रशास्त्रों की व्याख्या करते मेमने के युग” को छह हज़ार वर्षों के कार्य के साथ अवश्य जोड़ा जाना चाहिए? वह नया कार्य करने के लिए आता है, और वह बीते समयों के कार्य के बारे में केवल थोड़ा ही बताता है, लोगों को छह हज़ार वर्षों के कार्य के सत्य को समझने में मदद करता है। बाइबल के बहुत सारे अंशों की व्याख्या करने की कोई आवश्यकता नहीं है; यह वर्तमान कार्य है जो प्रमुख है, जो महत्वपूर्ण है। तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर विशेष रूप से सात मुहरों को तोड़ने के लिए नहीं आता है, बल्कि उद्धार के कार्य को करने के लिए आता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पदवियों और पहचान के संबंध में

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 166

अनुग्रह के युग में यूहन्ना ने यीशु का मार्ग प्रशस्त किया। यूहन्ना स्वयं परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकता था और उसने मात्र मनुष्य का कर्तव्य पूरा किया था। यद्यपि यूहन्ना प्रभु का अग्रदूत था, फिर भी वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ था; वह पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया मात्र एक मनुष्य था। यीशु के बपतिस्मा लेने के बाद पवित्र आत्मा कबूतर के समान उस पर उतरा। तब यीशु ने अपना काम शुरू किया, अर्थात् उसने मसीह की सेवकाई करनी प्रारंभ की। इसीलिए उसने परमेश्वर की पहचान अपनाई, क्योंकि वह परमेश्वर से ही आया था। भले ही इससे पहले उसकी आस्था कैसी भी रही हो—वह कई बार दुर्बल रहा होगा, या कई बार मज़बूत रहा होगा—यह सब अपनी सेवकाई करने से पहले के उसके सामान्य मानव-जीवन से संबंधित था। उसका बपतिस्मा (अभिषेक) होने के पश्चात् उसके ऊपर तुरंत ही परमेश्वर का सामर्थ्य और महिमा आ गई, और इस प्रकार उसने अपनी सेवकाई करनी आरंभ की। वह चिह्नों का प्रदर्शन और अद्भुत काम कर सकता था, चमत्कार कर सकता था, और उसके पास सामर्थ्य और अधिकार था, क्योंकि वह सीधे स्वयं परमेश्वर की ओर से काम कर रहा था; वह आत्मा के स्थान पर उसका काम कर रहा था और आत्मा की आवाज़ व्यक्त कर रहा था। इसलिए, वह स्वयं परमेश्वर था; यह निर्विवाद है। यूहन्ना वह व्यक्ति था, जिसका पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया था। वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, न ही परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करना उसके लिए संभव था। यदि वह ऐसा करना चाहता, तो पवित्र आत्मा ने इसकी अनुमति नहीं दी होती, क्योंकि वह उस काम को करने में असमर्थ था, जिसे स्वयं परमेश्वर संपन्न करने का इरादा रखता था। कदाचित् उसमें बहुत-कुछ ऐसा था, जो मनुष्य की इच्छा का था या कुछ विचलन भरा था; वह किसी भी परिस्थिति में प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। उसकी ग़लतियाँ और बेतुकापन केवल उसका ही प्रतिनिधित्व करते थे, किंतु उसका काम पवित्र आत्मा का प्रतिनिधि था। फिर भी, तुम यह नहीं कह सकते कि उसका सब-कुछ परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता था। क्या उसकी विकृतियाँ भी परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती थीं? मनुष्य के प्रतिनिधित्व में विकृतियों का होना सामान्य है, परंतु यदि परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में विचलन होते हैं, तो क्या यह परमेश्वर के प्रति अनादर नहीं होगा? क्या यह पवित्र आत्मा के विरुद्ध ईशनिंदा नहीं होगी? पवित्र आत्मा किसी इंसान को आसानी से परमेश्वर के स्थान पर खड़े होने की अनुमति नहीं देता, भले ही दूसरों के द्वारा उसे ऊँचा स्थान दिया गया हो। यदि वह परमेश्वर नहीं है, तो वह अंत में खड़े रहने में असमर्थ होगा। पवित्र आत्मा किसी इंसान को, जैसे वह चाहे वैसे, परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति नहीं देता! उदाहरण के लिए, पवित्र आत्मा ने ही यूहन्ना के बारे में गवाही दी और उसी ने उसे यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाले व्यक्ति के रूप में भी प्रकट किया, परंतु पवित्र आत्मा द्वारा उस पर किया गया कार्य अच्छी तरह से मापा हुआ था। यूहन्ना से कुल इतना कहा गया था कि वह यीशु के लिए मार्ग तैयार करने वाला बने, उसके लिए मार्ग तैयार करे। कहने का अभिप्राय यह है कि पवित्र आत्मा ने केवल मार्ग बनाने में उसके कार्य का समर्थन किया और उसे केवल इसी प्रकार का कार्य करने की अनुमति दी—उसे कोई अन्य कार्य करने की अनुमति नहीं दी गई थी। यूहन्ना ने एलिय्याह का प्रतिनिधित्व किया था, और वह उस नबी का प्रतिनिधित्व करता था, जिसने मार्ग तैयार किया था। पवित्र आत्मा ने इसमें उसका समर्थन किया था; जब तक उसका कार्य मार्ग तैयार करना था, तब तक पवित्र आत्मा ने उसका समर्थन किया। किंतु यदि उसने दावा किया होता कि वह स्वयं परमेश्वर है और यह कहा होता कि वह छुटकारे का कार्य पूरा करने के लिए आया है, तो पवित्र आत्मा को उसे अनुशासित करना पड़ता। यूहन्ना का काम चाहे जितना भी बड़ा रहा हो, और चाहे पवित्र आत्मा ने उसे समर्थन दिया हो, फिर भी उसका काम असीम नहीं था। माना कि पवित्र आत्मा द्वारा उसके कार्य का समर्थन किया गया था, परंतु उस समय उसे दिया गया सामर्थ्य केवल उसके द्वारा मार्ग तैयार किए जाने तक ही सीमित था। वह कोई अन्य काम बिल्कुल नहीं कर सकता था, क्योंकि वह सिर्फ यूहन्ना था जिसने मार्ग तैयार किया था, वह यीशु नहीं था। इसलिए, पवित्र आत्मा की गवाही कुंजी है, किंतु पवित्र आत्मा जो कार्य मनुष्य को करने की अनुमति देता है, वह उससे भी अधिक निर्णायक है। क्या यूहन्ना के बारे में उस समय जबरदस्त तरीके से गवाही नहीं दी गई थी? क्या उसका काम भी महान नहीं था? किंतु जो काम उसने किया, वह यीशु के काम से बढ़कर नहीं हो सका, क्योंकि वह पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए व्यक्ति से अधिक नहीं था और वह सीधे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, और इसलिए उसने जो काम किया, वह सीमित था। जब उसने मार्ग तैयार करने का काम समाप्त कर लिया, पवित्र आत्मा ने उसके बाद उसकी गवाही बरक़रार नहीं रखी, कोई नया काम उसके पीछे नहीं आया, और स्वयं परमेश्वर का काम शुरू होते ही वह चला गया।

कुछ ऐसे लोग हैं, जो दुष्टात्माओं से ग्रस्त हैं और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते रहते हैं, “मैं परमेश्वर हूँ!” लेकिन अंत में उनका खुलासा हो जाता है, क्योंकि वे जिस बात का प्रतिनिधित्व करते हैं, वही गलत है। वे शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं, और पवित्र आत्मा उन पर कोई ध्यान नहीं देता। तुम अपने आपको कितना भी बड़ा ठहराओ या तुम कितना भी जोर से चिल्लाओ, तुम फिर भी एक सृजित प्राणी ही रहते हो और एक ऐसा प्राणी जो शैतान का है। मैं कभी नहीं चिल्लाता, “मैं परमेश्वर हूँ, मैं परमेश्वर का प्रिय पुत्र हूँ!” परंतु जो कार्य मैं करता हूँ, वह परमेश्वर का कार्य है। क्या मुझे चिल्लाने की आवश्यकता है? मुझे ऊँचा उठाए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर अपना काम स्वयं करता है और उसे मनुष्य द्वारा रुतबा देने या सम्मानजनक उपाधि दिए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। उसका काम उसकी पहचान और हैसियत का प्रतिनिधित्व करता है। अपने बपतिस्मा से पहले क्या यीशु स्वयं परमेश्वर नहीं था? क्या वह परमेश्वर द्वारा धारित देह नहीं था? निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि केवल गवाही दिए जाने के बाद ही वह परमेश्वर का इकलौता पुत्र बना। क्या उसके द्वारा काम शुरू करने से बहुत पहले ही यीशु नाम का कोई व्यक्ति नहीं था? तुम नए मार्ग लाने या आत्मा का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ हो। तुम आत्मा के कार्य को या उसके द्वारा बोले जाने वाले वचनों को व्यक्त नहीं कर सकते। तुम न तो स्वयं परमेश्वर का कार्य करने में सक्षम हो और न ही आत्मा का कार्य करने में। परमेश्वर की बुद्धि, अद्भुतता और अथाह स्वरूप और उसके स्वभाव की समग्रता, जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देता है—इन सबको व्यक्त करना तुम्हारी क्षमता के बाहर है। इसलिए परमेश्वर होने का दावा करने की कोशिश करना व्यर्थ होगा; तुम्हारे पास सिर्फ़ नाम होगा और कोई सार नहीं होगा। स्वयं परमेश्वर आ गया है, किंतु कोई उसे नहीं पहचानता, फिर भी वह अपना काम जारी रखता है और ऐसा वह आत्मा के प्रतिनिधित्व में करता है। चाहे तुम उसे मनुष्य कहो या परमेश्वर, प्रभु कहो या मसीह, या उसे बहन कहो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। परंतु जो कार्य वह करता है, वह आत्मा का है और वह स्वयं परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि मनुष्य उसे किस नाम से पुकारता है। क्या वह नाम उसके काम का निर्धारण कर सकता है? चाहे तुम उसे कुछ भी कहकर पुकारो, जहाँ तक परमेश्वर का संबंध है, वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारी स्वरूप है; वह आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है और उसके द्वारा अनुमोदित है। यदि तुम एक नए युग के लिए मार्ग नहीं बना सकते या पुराने युग का समापन नहीं कर सकते या एक नए युग का सूत्रपात या नया कार्य नहीं कर सकते, तो तुम्हें परमेश्वर नहीं कहा जा सकता!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (1)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 167

यहाँ तक कि जिस इंसान का पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाता है, वह भी स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। इतना ही नहीं कि ऐसा इंसान परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, बल्कि उसके द्वारा किया जाने वाला काम भी सीधे तौर पर परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के अनुभवों को सीधे तौर पर परमेश्वर के प्रबंधन के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता और वे परमेश्वर के प्रबंधन का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। वह समस्त कार्य, जिसे स्वयं परमेश्वर करता है, ऐसा कार्य है, जिसे वह अपनी स्वयं की प्रबंधन योजना में करने का इरादा करता है और वह बड़े प्रबंधन से संबंध रखता है। लोगों द्वारा किए गए कार्य में उनके व्यक्तिगत अनुभवों की आपूर्ति शामिल रहती है। उसमें उस मार्ग के अलावा, जिस पर पहले के लोग चले थे, अनुभव के एक नए मार्ग की खोज करना और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में अपने भाई-बहनों का मार्गदर्शन करना शामिल रहता है। इस तरह के लोग अपने व्यक्तिगत अनुभवों या आध्यात्मिक लोगों के आध्यात्मिक लेखन की ही आपूर्ति करते हैं। यद्यपि इन लोगों का पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाता है, फिर भी वे जो कार्य करते हैं, वह छह-हज़ार-वर्षीय योजना के बड़े प्रबंधन-कार्य से संबंध नहीं रखता। वे सिर्फ ऐसे लोग हैं, जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा विभिन्न अवधियों में उभारा गया, ताकि वे तब तक पवित्र आत्मा की धारा में लोगों की अगुआई करें, जब तक कि वे जो भूमिकाएँ निभा सकते हैं, वे पूरी न हो जाएँ या उनके जीवन का अंत न हो जाए। जो कार्य वे करते हैं, वह केवल स्वयं परमेश्वर के लिए एक उचित मार्ग तैयार करना है या पृथ्वी पर स्वयं परमेश्वर के प्रबंधन का एक निश्चित पहलू जारी रखना है। अपने आप में ये लोग उसके प्रबंधन का महान कार्य करने में सक्षम नहीं होते, न ही वे नए मार्गों की शुरुआत कर सकते हैं, उनमें से कोई पिछले युग के परमेश्वर के समस्त कार्य का समापन तो बिल्कुल भी नहीं कर सकता। इसलिए, जो कार्य वे करते हैं, वह केवल अपनी भूमिका निभाने वाले एक सृजित प्राणी का प्रतिनिधित्व करता है, वह अपनी सेवकाई संपन्न करने वाले स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जो कार्य वे करते हैं, वह स्वयं परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य के समान नहीं है। एक नए युग की शुरुआत करने का कार्य ऐसा नहीं है, जो परमेश्वर के स्थान पर मनुष्य द्वारा किया जा सकता हो। इसे स्वयं परमेश्वर के अलावा किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता। मनुष्य के द्वारा किया जाने वाला समस्त कार्य एक सृजित प्राणी के रूप में उसके कर्तव्य का निर्वहन है और वह तब किया जाता है, जब पवित्र आत्मा द्वारा उसे प्रेरित या प्रबुद्ध किया जाता है। इन लोगों द्वारा प्रदान किया जाने वाला मार्गदर्शन मनुष्य को बस दैनिक जीवन में अभ्यास का मार्ग दिखाना और यह बताना होता है कि उसे किस प्रकार परमेश्वर के इरादों के अनुरूप कार्य करना चाहिए। मनुष्य के कार्य में न तो परमेश्वर का प्रबंधन सम्मिलित है और न ही वह आत्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। उदाहरण के लिए, विटनेस ली और वॉचमैन नी का कार्य मार्ग की अगुआई करना था। मार्ग चाहे नया हो या पुराना, कार्य बाइबल के सिद्धांतों के भीतर ही बने रहने के आधार पर किया गया था। चाहे स्थानीय कलीसियाओं को पुनर्स्थापित करना हो या स्थानीय कलीसियाओं को बनाना हो, उनका कार्य कलीसियाओं की स्थापना से संबंधित था। उनके द्वारा किया गया कार्य उस कार्य को आगे बढ़ाता था, जिसे यीशु और उसके प्रेरित अधूरा छोड़ गए थे या जिसे उन्होंने अनुग्रह के युग में आगे विकसित नहीं किया था। उन्होंने अपने कार्य में उस चीज़ को बहाल किया जिसे यीशु ने अपने समय के कार्य में, अपने बाद आने वाली पीढ़ियों से करने को कहा था, जैसे कि अपना सिर ढककर रखना, बपतिस्मा लेना, रोटी तोड़ना या दाखरस पीना। यह कहा जा सकता है कि उनका कार्य बाइबल का पालन करना था और बाइबल के भीतर ही मार्ग तलाशना था। उन्होंने किसी भी प्रकार की कोई नई प्रगति नहीं की। इसलिए, कोई उनके कार्य में केवल बाइबल के भीतर ही नए मार्गों की खोज और साथ ही बेहतर और अधिक यथार्थवादी अभ्यास ही देख सकता है। किंतु कोई उनके कार्य में परमेश्वर के वर्तमान इरादे नहीं खोज सकता और उस नए कार्य को तो बिल्कुल नहीं खोज सकता जिसे अंत के दिनों में करने का परमेश्वर का इरादा है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिस मार्ग पर वे चले, वह फिर भी पुराना ही था—उसमें कोई नवीनीकरण और प्रगति नहीं थी। उन्होंने यीशु को सलीब पर चढ़ाए जाने के तथ्य को पकड़े रखना, लोगों को पश्चात्ताप करने और अपने पाप स्वीकार करने के लिए कहने के अभ्यास का पालन करना, और इस तरह की उक्तियों का पालन जारी रखा, जैसे कि, जो अंत तक सहन करता है उसे बचा लिया जाएगा, और कि पुरुष स्त्री का सिर है और स्त्री को अपने पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए, यहाँ तक कि उन्होंने इस परंपरागत धारणा को भी बनाए रखा कि बहनें उपदेश नहीं दे सकतीं, वे केवल आज्ञापालन कर सकती हैं। यदि इस तरह की अगुआई जारी रही होती, तो पवित्र आत्मा कभी भी नया कार्य करने, लोगों को विनियमों से मुक्त करने या उन्हें स्वतंत्रता और सुंदरता की अवस्था में ले जाने में समर्थ नहीं होता। इसलिए, युग का परिवर्तन करने वाले कार्य के इस चरण को आवश्यकता है कि स्वयं परमेश्वर कार्य करे और बोले; अन्यथा कोई व्यक्ति उसके स्थान पर ऐसा नहीं कर सकता। अभी तक, इस धारा के बाहर पवित्र आत्मा का समस्त कार्य एकदम रुक गया है, और जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया था, वे दिग्भ्रमित हो गए हैं। इसलिए, चूँकि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों का कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य से भिन्न है, इसलिए उनकी पहचान और वे जिनकी ओर से कार्य करते हैं, दोनों ही भिन्न हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि पवित्र आत्मा जिस कार्य को करने का इरादा करता है, वह भिन्न है, और इसलिए समान रूप से कार्य करने वालों की अलग-अलग पहचान और रुतबे होते हैं। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोग कुछ नया कार्य भी कर सकते हैं और वे पूर्व युग में किए गए किसी कार्य को हटा भी सकते हैं, किंतु उनके द्वारा किया गया कार्य नए युग में परमेश्वर के स्वभाव और इरादों को व्यक्त नहीं कर सकता। वे केवल पूर्व युग के कार्य को हटाने के लिए कार्य करते हैं, और सीधे तौर पर स्वयं परमेश्वर के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के उद्देश्य से कोई नया कार्य करने के लिए कुछ नहीं करते। इस प्रकार, चाहे वे पुराने पड़ चुके कितने भी अभ्यासों का उन्मूलन कर दें या वे कितने भी नए अभ्यास आरंभ कर दें, वे फिर भी मनुष्य और सृजित प्राणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। किंतु जब स्वयं परमेश्वर कार्य करता है, तो वह खुलकर प्राचीन युग के अभ्यासों के उन्मूलन की घोषणा नहीं करता या सीधे तौर पर नए युग की शुरुआत की घोषणा नहीं करता। वह अपने कार्य में सीधा और स्पष्ट है। वह जिस कार्य को करने का इरादा रखता है, उसे सीधे तौर पर करता है; अर्थात्, वह उस कार्य को सीधे तौर पर व्यक्त करता है जिसे वह स्वयं आरंभ करता है, वह अपने अस्तित्व और स्वभाव को व्यक्त करते हुए अपने मूल इरादे के अनुसार सीधे तौर पर अपना कार्य करता है। जैसा कि मनुष्य देखता है, उसका स्वभाव और कार्य भी पिछले युगों से भिन्न हैं। किंतु स्वयं परमेश्वर के दृष्टिकोण से, यह मात्र उसके कार्य की निरंतरता और आगे का विकास है। जब स्वयं परमेश्वर कार्य करता है, तो वह अपने वचन व्यक्त करता है और सीधे नया कार्य लाता है। इसके विपरीत, जब मनुष्य काम करता है, तो वह विचार-विमर्श एवं अध्ययन के माध्यम से होता है, या वह दूसरों के कार्य की बुनियाद पर निर्मित ज्ञान का विस्तार और अभ्यास का व्यवस्थापन है। कहने का अर्थ है कि मनुष्य द्वारा किए गए कार्य का सार किसी स्थापित व्यवस्था का अनुसरण करना और “नए जूतों से पुराने मार्ग पर चलना” है। इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों द्वारा अपनाया गया मार्ग भी स्वयं परमेश्वर द्वारा आरंभ किए गए मार्ग पर ही आधारित है। इसलिए, कुल मिलाकर मनुष्य फिर भी मनुष्य है, और परमेश्वर फिर भी परमेश्वर है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (1)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 168

यूहन्ना प्रतिज्ञा द्वारा जन्मा था, बहुत-कुछ वैसे ही, जैसे अब्राहम के यहाँ इसहाक पैदा हुआ था। उसने यीशु के लिए मार्ग तैयार किया और बहुत कार्य किया, किंतु वह परमेश्वर नहीं था। बल्कि, वह नबियों में से एक था, क्योंकि उसने केवल यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त किया था। उसका कार्य भी महान था, और केवल उसके द्वारा मार्ग तैयार किए जाने के बाद ही यीशु ने आधिकारिक रूप से अपना कार्य शुरू किया। संक्षेप में उसने केवल यीशु की सेवा की और उसके द्वारा किया गया कार्य यीशु के कार्य की सेवा में था। उसके द्वारा मार्ग प्रशस्त किए जाने के बाद यीशु ने अपना कार्य शुरू किया, जो पहले से अधिक नया, अधिक ठोस और अधिक विस्तृत था। यूहन्ना ने कार्य का केवल शुरुआती अंश किया; नए कार्य का ज्यादा बड़ा भाग यीशु द्वारा किया गया था। यूहन्ना ने भी नया कार्य किया, किंतु उसने नए युग का सूत्रपात नहीं किया था। यूहन्ना प्रतिज्ञा द्वारा जन्मा था, और उसका नाम स्वर्गदूत द्वारा दिया गया था। उस समय, कुछ लोग उसका नाम उसके पिता जकरयाह के नाम पर रखना चाहते थे, परंतु उसकी माँ ने कहा, “इस बालक को उस नाम से नहीं पुकारा जा सकता। उसे यूहन्ना के नाम से पुकारा जाना चाहिए।” यह सब पवित्र आत्मा के निर्देश पर हुआ था। यीशु का नाम भी पवित्र आत्मा के निर्देश पर रखा गया था, उसका जन्म पवित्र आत्मा से हुआ था और पवित्र आत्मा द्वारा उसकी प्रतिज्ञा की गई थी। यीशु परमेश्वर, मसीह और मनुष्य का पुत्र था। किंतु, यूहन्ना का कार्य भी महान होने के बावजूद उसे परमेश्वर क्यों नहीं कहा गया? यीशु द्वारा किए गए कार्य और यूहन्ना द्वारा किए गए कार्य में ठीक-ठीक क्या अंतर था? क्या सिर्फ यही एक कारण था कि यूहन्ना वह व्यक्ति था, जिसने यीशु के लिए मार्ग तैयार किया था? या इसलिए, क्योंकि इसे परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत कर दिया गया था? यद्यपि यूहन्ना ने भी कहा था, “मन फिराओ, क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है,” और उसने स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का भी उपदेश दिया था, किंतु उसका कार्य आगे नहीं बढ़ा और उसने मात्र शुरुआत की। इसके विपरीत, यीशु ने एक नए युग का सूत्रपात करने के साथ-साथ पुराने युग का अंत भी किया, किंतु उसने पुराने विधान की व्यवस्था भी पूरी की। उसके द्वारा किया गया कार्य यूहन्ना के कार्य से अधिक महान था, और इतना ही नहीं, वह समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए आया—उसने कार्य के इस चरण को किया। जबकि यूहन्ना ने बस मार्ग प्रशस्त किया। यद्यपि उसका कार्य महान था, उसके वचन बहुत थे, और उसका अनुसरण करने वाले चेले भी बहुत थे, फिर भी उसके कार्य ने लोगों के लिए एक नई शुरुआत लेकर आने से बढ़कर कुछ नहीं किया। मनुष्य ने उससे कभी जीवन, मार्ग या गहरे सत्य प्राप्त नहीं किए, न ही मनुष्य ने उसके जरिये परमेश्वर के इरादों की समझ प्राप्त की। यूहन्ना एक बड़ा भविष्यद्वक्ता (एलिय्याह) था, जिसने यीशु के कार्य के लिए जगह खोली और उसके लिए लोगों को तैयार किया; वह अनुग्रह के युग का अग्रदूत था। ऐसे मामलों का भेद उनके सामान्य मानवीय स्वरूप देखकर बिल्कुल नहीं पहचाना जा सकता। यह इसलिए भी उचित है, क्योंकि यूहन्ना ने भी काफ़ी उल्लेखनीय काम किया; और इतना ही नहीं, पवित्र आत्मा द्वारा उसकी प्रतिज्ञा की गई थी, और उसके कार्य को पवित्र आत्मा द्वारा समर्थन दिया गया था। ऐसा होने के कारण, केवल उनके द्वारा किए गए कार्य के माध्यम से व्यक्ति उनकी संबंधित पहचानों के बीच अंतर कर सकता है, क्योंकि किसी इंसान के बाहरी स्वरूप से उसके सार के बारे में बताने का कोई उपाय नहीं है, न ही कोई ऐसा तरीका है जिससे मनुष्य यह सुनिश्चित कर सके कि पवित्र आत्मा की गवाही क्या है। यूहन्ना द्वारा किया गया कार्य और यीशु द्वारा किया गया कार्य एक-दूसरे से भिन्न थे और उनकी प्रकृतियाँ भी अलग थीं। इसी के आधार पर व्यक्ति यह निर्धारित कर सकता है कि यूहन्ना परमेश्वर था या नहीं। यीशु का कार्य शुरू करना, जारी रखना, समापन करना और सफल बनाना था। उसने इनमें से प्रत्येक चरण पूरा किया था, जबकि यूहन्ना का कार्य शुरुआत से अधिक और कुछ नहीं था। आरंभ में, यीशु ने सुसमाचार का प्रचार किया और पश्चात्ताप के मार्ग का प्रचार किया, और फिर वह मनुष्य को बपतिस्मा देने लगा, बीमारों को चंगा करने लगा, और दुष्टात्माओं को निकालने लगा। अंत में, उसने मानवजाति को पाप से छुटकारा दिलाया और संपूर्ण युग के अपने कार्य को पूरा किया। उसने हर स्थान पर जाकर मनुष्य को उपदेश दिया और स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का प्रचार किया। इस दृष्टि से यीशु और यूहन्ना समान थे, अंतर यह था कि यीशु ने एक नए युग का सूत्रपात किया और वह मनुष्य के लिए अनुग्रह का युग लाया। उसके मुँह से वह वचन निकला जिसका मनुष्य को अभ्यास करना चाहिए, और वह मार्ग निकला जिसका मनुष्य को अनुग्रह के युग में अनुसरण करना चाहिए, और अंत में उसने छुटकारे का कार्य पूरा किया। यूहन्ना यह कार्य नहीं कर सकता था। और इसलिए, वह यीशु ही था जिसने स्वयं परमेश्वर का कार्य किया, और वही है जो स्वयं परमेश्वर है और सीधे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य की धारणाएँ कहती हैं कि वे सभी जो प्रतिज्ञा द्वारा जन्मे थे, आत्मा से जन्मे थे, जिनका पवित्र आत्मा ने समर्थन किया था और जिन्होंने नए मार्ग खोले, वे परमेश्वर हैं। इस तर्क के अनुसार, यूहन्ना भी परमेश्वर होगा, और मूसा, अब्राहम और दाऊद ..., ये सब भी परमेश्वर होंगे। क्या यह निरा मज़ाक नहीं है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (1)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 169

कुछ लोग आश्चर्य कर सकते हैं, “युग का सूत्रपात स्वयं परमेश्वर द्वारा क्यों किया जाना चाहिए? क्या उसके स्थान पर कोई सृजित प्राणी नहीं खड़ा हो सकता?” तुम सब लोग जानते हो कि एक नए युग का सूत्रपात करने के खास उद्देश्य से ही परमेश्वर देह बनता है, और, निस्संदेह, जब वह नए युग का सूत्रपात करता है, तो उसी समय वह पूर्व युग का समापन भी कर देता है। परमेश्वर आदि और अंत है; स्वयं वही है, जो अपने कार्य को आरंभ करता है और इसलिए स्वयं उसी को पिछले युग का समापन करने वाला भी होना चाहिए। यही उसके द्वारा शैतान को पराजित करने और संसार पर विजय प्राप्त करने का प्रमाण है। हर बार जब स्वयं वह मनुष्य के बीच कार्य करता है, तो यह एक नए युद्ध की शुरुआत होती है। नए कार्य की शुरुआत के बिना स्वाभाविक रूप से पुराने कार्य का समापन नहीं होगा। और जब पुराने का समापन नहीं होता तो यह इस बात का प्रमाण है कि शैतान के साथ युद्ध अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। केवल जब स्वयं परमेश्वर आकर मनुष्यों के बीच नया कार्य करता है, तभी मनुष्य शैतान की शक्ति से पूरी तरह मुक्त हो सकता है और एक नया जीवन तथा एक नई शुरुआत प्राप्त कर सकता है। अन्यथा, मनुष्य सदैव पुराने युग में जिएगा और हमेशा शैतान के पुराने प्रभाव के अधीन रहेगा। परमेश्वर द्वारा लाए गए प्रत्येक युग के साथ मनुष्य के एक भाग को मुक्त किया जाता है, और इस प्रकार परमेश्वर के कार्य के साथ-साथ मनुष्य एक नए युग की ओर बढ़ता है। परमेश्वर की विजय का अर्थ उन सबकी विजय है, जो उसका अनुसरण करते हैं। यदि सृजित मानवजाति को युग के समापन का कार्यभार दिया जाता, तब चाहे यह मनुष्य के दृष्टिकोण से हो या शैतान के, यह परमेश्वर के विरोध या परमेश्वर के साथ विश्वासघात के कार्य से बढ़कर न होता, यह परमेश्वर के प्रति समर्पण का कार्य न होता, और मनुष्य का कार्य शैतान के फायदा उठाने का साधन बन जाता। केवल जब मनुष्य स्वयं परमेश्वर द्वारा सूत्रपात किए गए युग में परमेश्वर के प्रति समर्पण कर उसका अनुसरण करता है, तभी शैतान पूरी तरह से आश्वस्त हो सकता है, क्योंकि यह सृजित प्राणी का कर्तव्य है। इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोगों को केवल अनुसरण और समर्पण करने की आवश्यकता है, और इससे अधिक तुम लोगों से किसी बात की अपेक्षा नहीं की जाती। प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा अपने कर्तव्य का पालन करने और अपने संबंधित कार्य को क्रियान्वित करने का यही अर्थ है। परमेश्वर अपना काम करता है और उसे कोई आवश्यकता नहीं है कि मनुष्य उसके स्थान पर काम करे, और न ही वह सृजित प्राणियों के काम में भाग लेता है। मनुष्य अपना कर्तव्य करता है और परमेश्वर के कार्य में भाग नहीं लेता है। यही समर्पण का अर्थ है और यही शैतान की पराजय का प्रमाण है। स्वयं परमेश्वर द्वारा नए युग के सूत्रपात का कार्य पूरा कर देने के पश्चात् वह मनुष्यों के बीच स्वयं आकर कार्य करने नहीं आता। केवल तभी एक सृजित प्राणी के रूप में मनुष्य अपना कर्तव्य करने और मिशन पूरा करने के लिए आधिकारिक रूप से नए युग में कदम रखता है। ये वे सिद्धांत हैं, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, जिनका उल्लंघन किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता। केवल इस तरह से कार्य करना ही विवेकपूर्ण और तर्कसंगत है। परमेश्वर का कार्य स्वयं परमेश्वर ही करता है। वही है, जो अपने कार्य को आरंभ करता है और वही है, जो अपने कार्य का समापन करता है। वही है, जो कार्य की योजना बनाता है, और वही है, जो उसका प्रबंधन करता है, और इससे भी बढ़कर, वही है, जो अपने कार्य को उसकी पूर्णता तक पहुँचाता है। जैसा कि बाइबल में कहा गया है, “मैं ही आदि और अंत हूँ; मैं ही बोनेवाला और काटनेवाला हूँ।” परमेश्वर के प्रबंधन से संबंधित सारा कार्य स्वयं परमेश्वर ही करता है। वह छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना का संप्रभु है; कोई भी उसके स्थान पर उसका कार्य नहीं कर सकता और कोई भी उसके कार्य का समापन नहीं कर सकता, क्योंकि वही है, जो सब कुछ अपने हाथ में रखता है। संसार का सृजन कर, वह संपूर्ण संसार की अगुआई करेगा ताकि वह उसके प्रकाश में जिए और वही निश्चित रूप से सम्पूर्ण युग का अंत भी करेगा और इस प्रकार अपनी संपूर्ण योजना को परिपूर्ण कर देगा!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (1)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 170

परमेश्वर का संपूर्ण स्वभाव छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना के दौरान प्रकट किया गया है। वह सिर्फ अनुग्रह के युग में प्रकट नहीं किया गया है, न ही सिर्फ व्यवस्था के युग में, सिर्फ अंत के दिनों की इस अवधि में तो बिल्कुल भी नहीं। अंत के दिनों में किया जा रहा कार्य न्याय, कोप और ताड़ना को दर्शाता है। अंत के दिनों में किया जा रहा कार्य व्यवस्था के युग के कार्य या अनुग्रह के युग के कार्य का स्थान नहीं ले सकता। किंतु तीनों चरण आपस में जुड़कर एक इकाई बनते हैं और वे सभी एक ही परमेश्वर के कार्य हैं। स्वाभाविक रूप से, इस कार्य का क्रियान्वयन तीन अलग-अलग युगों में विभाजित है। अंत के दिनों में किया जा रहा कार्य हर चीज को समाप्ति की ओर ले जाता है; व्यवस्था के युग में किया गया कार्य आरंभ करने का कार्य था; और अनुग्रह के युग में किया गया कार्य छुटकारे का कार्य था। जहाँ तक इस संपूर्ण छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना के कार्य के दर्शनों की बात है, कोई भी व्यक्ति उनके बारे में अंतर्दृष्टि या समझ प्राप्त करने में समर्थ नहीं है और ये दर्शन पहेली बने हुए हैं। अंत के दिनों में, राज्य के युग का सूत्रपात करने के लिए केवल वचन का कार्य किया जाता है, परंतु यह सभी युगों का प्रतिनिधि नहीं है। अंत के दिन अंत के दिनों से अधिक कुछ नहीं हैं और राज्य के युग से अधिक कुछ नहीं हैं, और वे अनुग्रह के युग या व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व नहीं करते। बात बस यह है कि अंत के दिनों के दौरान छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना का समस्त कार्य तुम लोगों पर प्रकट किया जा रहा है। यह रहस्य का अनावरण है। यह ऐसा रहस्य है, जिसे कोई मनुष्य अनावृत नहीं कर सकता। चाहे मनुष्य को बाइबल की कितनी भी अधिक समझ क्यों न हो, वह शब्दों से बढ़कर नहीं है, क्योंकि मनुष्य बाइबल के सार को नहीं समझता। बाइबल पढ़ने से मनुष्य कुछ सत्य समझ सकता है, कुछ वचनों की व्याख्या कर सकता है या कुछ प्रसिद्ध अंशों और अध्यायों की गहन जाँच-परख कर सकता है, परंतु वह उन वचनों के भीतर निहित अर्थ खोलने में कभी समर्थ नहीं होगा, क्योंकि मनुष्य सिर्फ मृत वचन ही देखता है, यहोवा और यीशु के कार्य के दृश्य नहीं, और मनुष्य के पास इस कार्य का रहस्य सुलझाने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना का रहस्य सबसे बड़ा रहस्य है, अत्यधिक छिपा हुआ, और मनुष्य के लिए पूर्णतः अथाह। परमेश्वर के इरादों को कोई तब तक सीधे नहीं समझ सकता, जब तक स्वयं परमेश्वर उन्हें मनुष्य को न समझाए और प्रकट करे; अन्यथा ये चीजें मनुष्य के लिए हमेशा पहेली बनी रहेंगी, हमेशा मुहरबंद रहस्य बनी रहेंगी। धार्मिक जगत के लोगों की तो बात छोड़ो; यदि तुम लोगों को भी आज न बताया जाता, तो तुम लोग भी इसे न समझ पाते। छह हजार वर्षों का यह कार्य नबियों की सभी भविष्यवाणियों से अधिक रहस्यमय है। यह दुनिया के सृजन से लेकर अब तक का सबसे बड़ा रहस्य है और समस्त युगों का कोई भी नबी कभी इसकी थाह पाने में सक्षम नहीं हुआ है, क्योंकि इस रहस्य से केवल अंतिम युग में ही पर्दा उठता है और पहले कभी प्रकट नहीं किया गया है। यदि तुम लोग इस रहस्य को समझ सकते हो और यदि तुम इसकी समग्रता में इसका बोध पा लेते हो, तो सभी धार्मिक लोग इस रहस्य से जीत लिए जाएँगे। केवल यही सबसे बड़ा दर्शन है; यही है जिसे समझने के लिए मनुष्य सबसे अधिक लालायित रहता है, किंतु यही उसके लिए सबसे अधिक अस्पष्ट भी है। जब तुम लोग अनुग्रह के युग में थे, तो तुम नहीं जानते थे कि यीशु द्वारा किया गया कार्य क्या था या यहोवा ने क्या कार्य किया था। लोगों को समझ में नहीं आता था कि यहोवा ने क्यों व्यवस्थाएँ निर्धारित कीं, उसने क्यों लोगों को व्यवस्थाओं का पालन करने के लिए कहा अथवा मंदिर क्यों बनाने पड़े थे, और लोगों को यह तो बिल्कुल भी समझ में नहीं आया कि क्यों इस्राएलियों को मिस्र से बीहड़ में और फिर कनान में ले जाया गया। ये मामले आज तक प्रकट नहीं किए गए थे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 171

ऐसे लोगों के अतिरिक्त, जिन्हें पवित्र आत्मा का विशेष निर्देश और मार्गदर्शन प्राप्त है, लोग स्वतंत्र रूप से जीवन जीने में सक्षम नहीं हैं। उन सभी को परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले लोगों की सेवकाई और चरवाही की आवश्यकता होती है, इसलिए परमेश्वर हर युग में अलग-अलग लोगों को खड़ा करता है, जो उसके कार्य की खातिर कलीसियाओं की चरवाही करने में लगातार व्यस्त रहते हैं। कहने का अर्थ यह है कि परमेश्वर का कार्य उन लोगों के माध्यम से होना चाहिए जिन पर वह अनुग्रह करता है और जिन्हें वह इसके लायक समझता है; पवित्र आत्मा को उनके भीतर के उस भाग के माध्यम से कार्य करना चाहिए जो उसके इस्तेमाल के लायक है, पवित्र आत्मा उन्हें पूर्ण बनाकर परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल के लिए उपयुक्त बनाता है। चूँकि मनुष्य की बोध क्षमता बहुत कम है, इसलिए उसकी चरवाही परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले लोगों को करनी चाहिए; यह परमेश्वर द्वारा मूसा के इस्तेमाल जैसा ही था, जिसमें उसने उस समय इस्तेमाल के लिए बहुत कुछ उपयुक्त पाया, और जो उसने उस चरण में परमेश्वर का कार्य करने के लिए इस्तेमाल किया। इस चरण में, परमेश्वर मनुष्य का इस्तेमाल करता है, साथ ही उस भाग का लाभ भी उठाता है जो कि पवित्र आत्मा द्वारा कार्य करने के लिए उपयोग किया जा सकता है और पवित्र आत्मा उसे निर्देश भी देता है और साथ ही उस बचे हुए भाग को पूर्ण बनाता है, जिसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

जिस कार्य को परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त व्यक्ति करता है, वह मसीह या पवित्र आत्मा के कार्य के साथ सहयोग करने के लिए है। परमेश्वर इस व्यक्ति को लोगों के बीच से ही खड़ा करता है, ताकि वह परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों की अगुआई कर सके। परमेश्वर उसे मानवीय सहयोग का कार्य करने के लिए भी ऊपर उठाता है। इस तरह का व्यक्ति जो मानवीय सहयोग का कार्य करने में सक्षम है, उसके माध्यम से, मनुष्य से परमेश्वर की और अधिक अपेक्षाओं को और उस कार्य को जो पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्यों के बीच किया जाना चाहिए, पूरा किया जा सकता है। इसे दूसरे शब्दों में यूँ कहा जा सकता है : ऐसे मनुष्य का इस्तेमाल करने का परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे परमेश्वर के इरादों को बेहतर ढंग से समझ सकें और परमेश्वर की अपेक्षाओं को काफी हद तक पूरा कर सकें। चूँकि लोग परमेश्वर के वचनों को या परमेश्वर के इरादों को सीधे तौर पर समझने में असमर्थ हैं, इसलिए परमेश्वर ने किसी ऐसे व्यक्ति को खड़ा किया है जिसे इस तरह का कार्य करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त ऐसे व्यक्ति को माध्यम भी कहा जा सकता है जिसके ज़रिए परमेश्वर लोगों का मार्गदर्शन करता है, एक “दुभाषिया” जो परमेश्वर और लोगों के बीच में संप्रेषण बनाए रखता है। इस प्रकार, ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के घर के किसी कर्मी या प्रेरित से अलग होता है। उन सभी को परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग कहा जा सकता है, फिर भी उसके कार्य के सार और परमेश्वर द्वारा उसके उपयोग की पृष्ठभूमि में, वह व्यक्ति दूसरे कार्यकर्ताओं और प्रेरितों से बिल्कुल अलग होता है। परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त व्यक्ति अपने कार्य के सार और अपने उपयोग की पृष्ठभूमि के संबंध में, परमेश्वर द्वारा तैयार किया जाता है, उसे परमेश्वर के कार्य के लिए परमेश्वर ही खड़ा करता है और वह स्वयं परमेश्वर के कार्य में सहयोग करता है। कोई भी व्यक्ति उसकी जगह उसका कार्य नहीं कर सकता—दिव्य कार्य के साथ मनुष्य का सहयोग अपरिहार्य होता है। दूसरी ओर, दूसरे कार्यकर्ताओं या प्रेरितों द्वारा किया गया कार्य हर अवधि में कलीसियाओं के लिए व्यवस्थाओं के कई पहलुओं का संचार और कार्यान्वयन है, या फिर कलीसियाई जीवन को बनाए रखने के लिए जीवन के कुछ सरल पोषण का कार्य करना है। इन कार्यकर्ताओं और प्रेरितों को परमेश्वर द्वारा नियुक्त नहीं किया जाता, पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने की तो बात ही दूर है। वे कलीसिया में से ही चुने जाते हैं और कुछ समय तक प्रशिक्षण देने और विकसित किए जाने के बाद, जो इस्तेमाल के लिए उपयुक्त होते हैं उन्हें रख लिया जाता है और जो उपयुक्त नहीं होते, उन्हें वहीं वापस भेज दिया जाता है जहाँ से वे आए थे। चूँकि ये लोग कलीसियाओं में से ही चुने जाते हैं, कुछ लोग अगुआ बनने के बाद अपना असली रंग दिखाते हैं और कुछ लोग बहुत-से बुरे काम करने पर हटा भी दिए जाते हैं। दूसरी ओर, परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त व्यक्ति को परमेश्वर द्वारा तैयार किया जाता है, उसमें एक विशिष्ट योग्यता और मानवता होती है। ऐसे व्यक्ति को पहले ही पवित्र आत्मा द्वारा तैयार और पूर्ण कर दिया जाता है और पवित्र आत्मा द्वारा पूर्ण रूप से मार्गदर्शन दिया जाता है, विशेषकर जब उसके कार्य की बात आती है, तो उसे पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित और नियंत्रित किया जाता है—नतीजतन, उसके द्वारा परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुआई के मार्ग में कोई भटकाव नहीं होता है, क्योंकि परमेश्वर निश्चित रूप से अपने स्वयं के कार्य की जिम्मेदारी लेता है और हर समय अपना स्वयं का कार्य करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा मनुष्य को इस्तेमाल करने के विषय में

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 172

पवित्र आत्मा की धारा में जो कार्य है वह पवित्र आत्मा का कार्य है, चाहे यह परमेश्वर का अपना कार्य हो या उपयोग किए जा रहे मनुष्यों का कार्य। स्वयं परमेश्वर का सार आत्मा है, जिसे पवित्र आत्मा या सात गुना सघन आत्मा भी कहा जा सकता है। कुल मिलाकर, वे परमेश्वर के आत्मा हैं, हालाँकि भिन्न-भिन्न युगों में परमेश्वर के आत्मा को भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा गया है। परन्तु उनका सार तब भी एक ही है। इसलिए, स्वयं परमेश्वर का कार्य पवित्र आत्मा का कार्य है, जबकि देहधारी परमेश्वर का कार्य, पवित्र आत्मा का कार्य ही है। जिन मनुष्यों का उपयोग किया जाता है उनका कार्य भी पवित्र आत्मा का कार्य है। फिर भी परमेश्वर का कार्य पवित्र आत्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति है, और उससे कम कुछ नहीं, जबकि उपयोग किए जा रहे लोगों का कार्य बहुत-सी मानवीय चीज़ों के साथ मिश्रित होता है, और वह पवित्र आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति नहीं होता, उसकी पूर्ण अभिव्यक्ति होने की तो बात ही छोड़ो। पवित्र आत्मा का कार्य विविध होता है और यह किसी परिस्थिति द्वारा सीमित नहीं होता। पवित्र आत्मा भिन्न-भिन्न लोगों पर भिन्न-भिन्न कार्य करता है; इससे भिन्न-भिन्न सार अभिव्यक्त होते हैं और यह भिन्न-भिन्न युगों और देशों में भी अलग-अलग होता है। निस्संदेह, यद्यपि पवित्र आत्मा कई भिन्न-भिन्न तरीकों से और कई तरह के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है, इसका सार हमेशा भिन्न होता है, फिर चाहे कार्य जैसे भी किया जाए या जिस भी प्रकार के लोगों पर किया जाए; भिन्न-भिन्न लोगों पर किए गए सभी कार्यों के अपने सिद्धांत होते हैं और सभी अपने प्राप्तकर्ताओं के सार का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। इसकी वजह यह है कि पवित्र आत्मा का कार्य दायरे में काफी विशिष्ट और काफी नपा-तुला होता है। देहधारी देह में किया गया कार्य उस कार्य के समान नहीं होता जो लोगों पर किया जाता है, और भिन्न-भिन्न काबिलियत वाले लोगों पर कार्य भी भिन्न-भिन्न किया जाता है। देहधारी देह में किया जाने वाला कार्य लोगों पर नहीं किया जाता और लोगों पर किया जाने वाला वही कार्य देहधारी देह में नहीं किया जाता। संक्षेप में, इससे फर्क नहीं पड़ता है कि कार्य कैसे किया जाता है, विभिन्न प्राप्तकर्ताओं पर किया गया कार्य कभी एक समान नहीं होता, और जिन सिद्धांतों के द्वारा वह कार्य करता है वे भिन्न-भिन्न लोगों की अवस्था और प्रकृति के अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं। पवित्र आत्मा भिन्न-भिन्न लोगों पर उनके अंतर्निहित सार के आधार पर कार्य करता है और उनसे उनके अंतर्निहित सार से अधिक की माँग नहीं करता, न ही वह उन पर उनकी अंतर्निहित काबिलियत से ज़्यादा कार्य करता है। इसलिए, मनुष्य पर पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को कार्य के प्राप्तकर्ता के सार को देखने देता है। मनुष्य का अंतर्निहित सार परिवर्तित नहीं होता; मनुष्य की अंतर्निहित काबिलियत सीमित है। पवित्र आत्मा लोगों की सीमित काबिलियत के अनुसार उनका उपयोग या उन पर कार्य करता है, ताकि वे उसमें से कुछ प्राप्त कर सकें। जब पवित्र आत्मा उपयोग किए जा रहे लोगों पर कार्य करता है तो उन लोगों की प्रतिभा और अंतर्निहित काबिलियत काम में लाई जाती हैं, उन्हें रोककर नहीं रखा जाता। उनकी अंतर्निहित काबिलियत कार्य की सेवा में काम में लाई जाती है। यह कहा जा सकता है कि वह अपने कार्य में परिणाम हासिल करने के लिए लोगों के उन हिस्सों का उपयोग करता है, जिनका उसके कार्य में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके विपरीत, देहधारी देह में किया गया कार्य आत्मा के कार्य की सीधी अभिव्यक्ति है और उसमें मनुष्य के मन और विचारों की मिलावट नहीं होती; इस तक न तो इंसान की खूबी की, न उसके अनुभव या उसकी सहज स्थिति की पहुँच होती है। पवित्र आत्मा के विभिन्न प्रकार के कार्य का लक्ष्य इंसान को लाभ पहुँचाना और उसका आत्मिक उन्नयन करना है। हालाँकि, कुछ लोगों को पूर्ण बनाया जा सकता है जबकि अन्य लोग पूर्ण बनने की अवस्था में नहीं होते, जिसका तात्पर्य है कि उन्हें पूर्ण नहीं किया जा सकता और उन्हें शायद ही बचाया जा सकता है, और भले ही उनमें पवित्र आत्मा का कार्य रहा हो, फिर भी अंततः उन्हें निकाल दिया जाता है। कहने का अर्थ है कि यद्यपि पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को आत्मिक उन्नयन करना है, फिर भी इसका यह अर्थ नहीं है कि वे सभी लोग जिनमें पवित्र आत्मा का कार्य रहा है, उन्हें पूरी तरह से पूर्ण बनाया जाएगा, क्योंकि बहुत-से लोग अपनी खोज में जिस मार्ग का अनुसरण करते हैं, वह पूर्ण बनाए जाने का मार्ग नहीं है। उनमें पवित्र आत्मा का केवल एकतरफ़ा कार्य है, आत्मपरक मानवीय सहयोग या सही मानवीय खोज नहीं है। इस तरह, इन लोगों पर पवित्र आत्मा का कार्य उन लोगों की सेवा के लिए आता है जिन्हें पूर्ण बनाया जा रहा है। पवित्र आत्मा के कार्य को लोग सीधे तौर पर न तो देख सकते हैं, न ही उसे स्पर्श कर सकते हैं। इसे केवल कार्य करने की खूबी वाले लोग ही व्यक्त कर सकते हैं, जिसका अर्थ यह है कि पवित्र आत्मा का कार्य लोगों के जरिये अभिव्यक्त किया जाता है और इस प्रकार से अनुयायियों को प्रदान किया जाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 173

पवित्र आत्मा के कार्य को कई प्रकार के लोगों और अनेक भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के माध्यम से संपन्न और पूरा किया जाता है। यद्यपि देहधारी परमेश्वर का कार्य एक संपूर्ण युग के कार्य का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और एक संपूर्ण युग में लोगों के प्रवेश का प्रतिनिधित्व कर सकता है, फिर भी लोगों के प्रवेश के विस्तृत विवरण पर कार्य अभी भी उन लोगों द्वारा किए जाने की आवश्यकता है जिनका उपयोग पवित्र आत्मा द्वारा किया जाता है, न कि इसे देहधारी परमेश्वर द्वारा किए जाने की आवश्यकता है। इसलिए, परमेश्वर का कार्य, या परमेश्वर की अपनी सेवकाई, देहधारी परमेश्वर की देह का कार्य है, इसे परमेश्वर के बदले मनुष्य नहीं कर सकता। पवित्र आत्मा का कार्य विभिन्न प्रकार के लोगों द्वारा पूरा किया जाता है; कोई एक ही व्यक्ति अकेला इसे पूरा नहीं कर सकता और कोई एक ही व्यक्ति अकेला इसकी पूरी तरह से व्याख्या नहीं कर सकता। जो लोग कलीसियाओं की अगुआई करते हैं, वे भी पूरी तरह से पवित्र आत्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते; वे केवल अगुआई का कुछ कार्य ही कर सकते हैं। इस तरह, पवित्र आत्मा के कार्य को तीन हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है : परमेश्वर का अपना कार्य, प्रयुक्त लोगों का कार्य, और उन सभी लोगों पर किया गया कार्य जो पवित्र आत्मा की धारा में हैं। परमेश्वर का अपना कार्य संपूर्ण युग की अगुआई करना है; उपयोग में लाए जाने वाले लोगों का कार्य परमेश्वर के अपना कार्य कर लेने के पश्चात् परमेश्वर के सभी अनुयायियों की अगुआई करने के लिए भेजे जाने या नियुक्त किए जाने का है, और यही वे लोग हैं जो परमेश्वर के कार्य में सहयोग करते हैं; पवित्र आत्मा द्वारा धारा में मौजूद लोगों पर किया जाने वाला कार्य उसके अपने कार्य को बनाए रखने के लिए है, अर्थात्, उसके संपूर्ण प्रबंधन को और उसकी गवाही को बनाए रखने के लिए, साथ ही उन लोगों को पूर्ण बनाने के लिए है जिन्हें पूर्ण बनाया जा सकता है। ये तीनों हिस्से मिलकर, पवित्र आत्मा का पूर्ण कार्य हैं, किन्तु स्वयं परमेश्वर के कार्य के बिना, संपूर्ण प्रबंधन कार्य निष्क्रिय हो जाएगा। स्वयं परमेश्वर के कार्य में संपूर्ण मनुष्यजाति का कार्य समाविष्ट है, और यह संपूर्ण युग के कार्य का भी प्रतिनिधित्व करता है, कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर का अपना कार्य पवित्र आत्मा के सभी कार्य की गतिकी और रुझान का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि प्रेरितों का कार्य परमेश्वर के अपने कार्य के बाद आता है और उसे जारी रखता है, वह न तो युग की अगुवाई करता है, न ही वह पूरे युग में पवित्र आत्मा के कार्य के रुझान का प्रतिनिधित्व करता है। वे केवल वही कार्य करते हैं जो मनुष्य को करना चाहिए, जिसका प्रबंधन कार्य से कोई लेना-देना नहीं है। परमेश्वर का अपना कार्य प्रबंधन कार्य के भीतर ही एक परियोजना है। मनुष्य का कार्य केवल वही कर्तव्य है जिसका निर्वहन प्रयुक्त लोग करते हैं, और उसका प्रबंधन कार्य से कोई संबंध नहीं है। विभिन्न पहचान और कार्य के विभिन्न निरूपणों के कारण, इस तथ्य के बावजूद कि वे दोनों पवित्र आत्मा के कार्य हैं, परमेश्वर के अपने कार्य और मनुष्य के कार्य के बीच स्पष्ट और सारभूत अंतर हैं। इसके अतिरिक्त, पवित्र आत्मा विभिन्न पहचानों वाली पात्रों पर विभिन्न सीमाओं तक कार्य करता है। ये पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांत और दायरे हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 174

मनुष्य का कार्य उसके अनुभव और उसकी मानवता का प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य जो कुछ मुहैया कराता है और जो कार्य करता है, वह उसका प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य की अंतर्दृष्टि, उसकी विवेक-बुद्धि, उसकी तर्कशक्ति और उसकी समृद्ध कल्पना, सभी उसके कार्य में शामिल होते हैं। मनुष्य का अनुभव, विशेष रूप से उसके कार्य का प्रतिनिधित्व करने में समर्थ होता है और मनुष्य जो कुछ भी अनुभव करता है वह उसके कार्य में प्रतिबिंबित होगा। मनुष्य का कार्य उसके अनुभव को व्यक्त कर सकता है। जब कुछ लोग नकारात्मक तरीके से अनुभव करते हैं, तो उनकी संगति की अधिकांश भाषा नकारात्मक तत्वों से ही युक्त होती है। यदि कुछ समय के लिए उनका अनुभव सकारात्मक रहता है और उनके पास सकारात्मक पहलू में एक विशेष रूप से स्पष्ट मार्ग होता है, तो उनकी संगति बहुत प्रोत्साहन देने वाली होगी, और लोग उनसे सकारात्मक आपूर्ति प्राप्त कर सकते हैं। यदि कोई कर्मी कुछ समय के लिए नकारात्मक हो जाता है, तो उसकी संगति में हमेशा नकारात्मक तत्त्व होंगे। इस प्रकार की संगति लोगों को नीचे खींचती है; लोग उसकी संगति के बाद अनजाने ही उदास महसूस करना शुरू कर देंगे। अगुआ की अवस्था के आधार पर अनुयायियों की अवस्था बदलती है। कर्मी भीतर से जैसा होता है, वह वैसा ही व्यक्त करता है, और पवित्र आत्मा का कार्य प्रायः मनुष्य की अवस्था के साथ बदल जाता है। वह मनुष्य के अनुभव के अनुसार कार्य करता है और उसे बाध्य नहीं करता, बल्कि लोगों के अनुभव के सामान्य क्रम के अनुसार उनसे माँग करता है। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य की संगति परमेश्वर के वचन से भिन्न होती है। जब लोग संगति करते हैं, तब वे अपनी व्यक्तिगत अंतर्दृष्टि और अनुभव के बारे में ही संगति करते हैं, और परमेश्वर के कार्य के आधार पर उनकी अंतर्दृष्टि और अनुभव को व्यक्त करते हैं। उनकी जिम्मेदारी यह है कि परमेश्वर के कार्य करने या बोलने के पश्चात् वे पता लगायें कि उन्हें इसमें से किसका अभ्यास करना चाहिए और किसमें प्रवेश करना चाहिए, और फिर इसे अनुयायियों को प्रदान कर दें। इसलिए, मनुष्य का कार्य उसके प्रवेश और अभ्यास का प्रतिनिधित्व करता है। निस्संदेह, ऐसा कार्य मानवीय सबक और अनुभव या कुछ मानवीय विचारों के साथ मिश्रित होता है। पवित्र आत्मा चाहे जैसे कार्य करे, चाहे वह मनुष्य पर कार्य करे या देहधारी परमेश्वर में, कर्मी हमेशा वही व्यक्त करते हैं जो वे होते हैं। यद्यपि कार्य पवित्र आत्मा ही करता है, फिर भी मनुष्य अंतर्निहित रूप से जैसा होता है कार्य उसी पर आधारित होता है, क्योंकि पवित्र आत्मा बिना आधार के कार्य नहीं करता। दूसरे शब्दों में, पवित्र आत्मा शून्य के आधार पर कार्य नहीं करता—वह हमेशा वास्तविक परिस्थितियों और असली स्थितियों के अनुसार कार्य करता है। केवल इसी तरह से मनुष्य के स्वभाव को रूपान्तरित किया जा सकता है और उसकी पुरानी धारणाओं एवं पुराने विचारों को बदला जा सकता है। जो कुछ मनुष्य देखता है, अनुभव करता है और कल्पना कर सकता है, वह उसी को व्यक्त करता है; अगर वह कोई धर्म-सिद्धांत या धारणा ही हो तो भी, वह उसके मन की पहुँच के भीतर ही होता है। चाहे मनुष्य के कार्य का आकार कुछ भी हो, यह उसके अनुभव के दायरे से परे नहीं जा सकता, न ही जो वह देखता है, या जिसकी वह कल्पना या जिसका विचार कर सकता है, उससे बढ़कर हो सकता है। परमेश्वर जो व्यक्त करता है वह उसका स्वरूप है, और यह मनुष्य की पहुँच से परे है, अर्थात्, मनुष्य की सोच से परे है। वह संपूर्ण मानवजाति की अगुवाई करने के अपने कार्य को व्यक्त करता है, इसका मानवीय अनुभव के विवरणों से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि यह उसके अपने प्रबंधन से संबंधित है। मनुष्य जो व्यक्त करता है वह उसका अपना अनुभव है, जबकि परमेश्वर अपने अस्तित्व को व्यक्त करता है, जो कि उसका अंतर्निहित स्वभाव है और मनुष्य की पहुँच से परे है। मनुष्य का अनुभव उसकी अंतर्दृष्टि और वह ज्ञान है जो उसने परमेश्वर द्वारा अपने अस्तित्व की अभिव्यक्ति के आधार पर प्राप्त किया है। ऐसी अंतर्दृष्टि और ज्ञान मनुष्य का अस्तित्व कहलाता है, और वे मनुष्य के अंतर्निहित स्वभाव और उसकी काबिलियत के आधार पर व्यक्त होते हैं—इसीलिए इन्हें मनुष्य का अस्तित्व कहा जाता है। जो कुछ मनुष्य देखता और अनुभव करता है वह उसकी संगति कर पाता है। अतः कोई भी व्यक्ति उस पर संगति नहीं कर सकता जिसका उसने अनुभव नहीं किया है या देखा नहीं है या जिस तक उसका मन नहीं पहुँच पाता है, वे ऐसी चीज़ें हैं जो उसके भीतर नहीं हैं। यदि जो कुछ मनुष्य व्यक्त करता है वह ऐसी चीज है जो उसने अनुभव नहीं की है, तो यह उसकी कल्पना या धर्म-सिद्धांत है। संक्षेप में, ऐसे शब्दों में कोई वास्तविकता नहीं होती। यदि तुम समाज की चीजों से कभी संपर्क में न आते, तो तुम समाज के जटिल संबंधों की स्पष्ट संगति करने में समर्थ नहीं होते। यदि तुम्हारा कोई परिवार न होता परन्तु अन्य लोग पारिवारिक मुद्दों के बारे में बात करते, तो तुम उनकी अधिकांश बातों को नहीं समझ पाते। इसलिए, जो कुछ मनुष्य संगति करता है और जिस कार्य को वह करता है, वे उसके भीतरी अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि किसी ने ताड़ना और न्याय के बारे में अपनी समझ की संगति की, परंतु तुम्हारे पास उसका कोई अनुभव नहीं था, तो तुम उसके ज्ञान को नकारने का साहस नहीं करोगे, उसके बारे में सौ प्रतिशत निश्चित होने का साहस तो बिल्कुल भी नहीं करोगे। क्योंकि उसकी संगति ऐसी चीज़ है जिसका तुमने कभी अनुभव नहीं किया है, जिसके बारे में तुमने कभी जाना नहीं है, तुम्हारा मन उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। तुम उसके ज्ञान से बस भविष्य में ताड़ना और न्याय से गुज़रने का एक मार्ग पा सकते हो। परंतु यह मार्ग केवल एक धर्म-सैद्धांतिक ज्ञान ही हो सकता है; यह तुम्हारी समझ का स्थान नहीं ले सकता, तुम्हारे अनुभव का स्थान तो बिल्कुल भी नहीं ले सकता। शायद तुम सोचो कि उसकी समझ काफी सही है, परंतु अपने अनुभव में, तुम इसे अनेक बातों में अव्यावहारिक पाते हो। शायद तुम्हें लगे कि उसकी कुछ समझ पूरी तरह अव्यावहारिक है; उस समय तुम इसके बारे में धारणाएँ पाल लेते हो, तुम इसे स्वीकार तो करते हो, लेकिन केवल अनिच्छा से। परन्तु जब तुम अनुभव करते हो, तो वह ज्ञान जिससे तुमने धारणाएँ बनायी थीं, तुम्हारे अभ्यास का मार्ग बन जाता है। जितना अधिक तुम अभ्यास करते हो, उतना ही अधिक तुम उन वचनों के सही मूल्य और अर्थ को समझते हो जो तुमने सुने हैं। स्वयं अनुभव प्राप्त कर लेने के पश्चात्, तुम उस ज्ञान के बारे में बात कर पाते हो जो तुम्हारे पास उन चीज़ों के बारे में होना चाहिए जो तुमने अनुभव की हैं। इसके अलावा, तुम यह भेद भी पहचान सकते हो कि किसका ज्ञान वास्तविक और व्यावहारिक है और किसका ज्ञान धर्म-सिद्धांत पर आधारित और बेकार है। इसलिए, जो ज्ञान तुम साझा करते हो वह सत्य के अनुरूप है या नहीं, यह किसी भी चीज से बढ़कर इस बात पर निर्भर है कि तुम्‍हारे पास उसका व्यावहारिक अनुभव है या नहीं। जहाँ तुम्हारे अनुभवों में सत्य होगा, वहाँ तुम्हारा ज्ञान व्यावहारिक और मूल्यवान होगा। तुम अपने अनुभव के माध्यम से भेद पहचानने की क्षमता और अंतर्दृष्टि भी प्राप्त कर सकते हो, अपना ज्ञान बढ़ा सकते हो, तुम्हें कैसा आचरण करना चाहिए, इस बारे में अपनी बुद्धि और सामान्य बोध बढ़ा सकते हो। जिन लोगों के पास सत्य नहीं होता, उनके द्वारा साझा किया जाने वाला ज्ञान धर्म-सिद्धांत है, फिर भले ही वह ज्ञान कितना भी ऊँचा हो। जब देह के मामलों की बात आती है तो हो सकता है कि इस प्रकार का व्यक्ति बहुत बुद्धिमान हो, परंतु जब आध्यात्मिक मामलों की बात आती है तब उसके पास भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ऐसे लोगों के पास आध्यात्मिक मामलों का बिल्कुल भी अनुभव नहीं होता। ये वे लोग होते हैं जो आध्यात्मिक मामलों में प्रबुद्ध नहीं होते और जिनमें आध्यात्मिक समझ नहीं होती। तुम चाहे ज्ञान के किसी भी पहलू के बारे में बात करो, अगर यह तुम्हारा अस्तित्व है, तो यह तुम्हारा व्यक्तिगत अनुभव है, तुम्हारा वास्तविक ज्ञान है। जो लोग केवल धर्म-सिद्धांत की ही बात करते हैं—जिनमें सत्य या वास्तविकता नहीं होती—वे जिस बारे में बात करते हैं, उसे उनका अस्तित्व भी कहा जा सकता है, क्योंकि उनका धर्म-सिद्धांत गहरे चिंतन से ही आया है और यह उनके गहरे मनन का परिणाम है। फिर भी यह केवल धर्म-सिद्धांत ही है, कल्पना से अधिक कुछ नहीं!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 175

विभिन्न प्रकार के लोगों के अनुभव उनकी आंतरिक चीज़ों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आध्यात्मिक अनुभव के बिना कोई सत्य के ज्ञान पर बात नहीं कर सकता, न ही विभिन्न आध्यात्मिक चीज़ों के सही ज्ञान के बारे में बात कर सकता है। इंसान वही व्यक्त करता है जो वह भीतर से होता है—यह निश्चित है। यदि कोई आध्यात्मिक चीज़ों और सत्य का ज्ञान पाना चाहता है, तो उसके पास व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए। यदि तुम मानवीय जीवन में सामान्य बोध के बारे में स्पष्ट रूप से बात नहीं कर सकते, तो तुम आध्यात्मिक चीज़ों के बारे में तो कितना कम बात कर पाओगे? जो लोग कलीसियाओं की अगुवाई कर सकते हैं, लोगों को जीवन प्रदान कर सकते हैं और लोगों के लिए प्रेरित हो सकते हैं, उनके पास व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए; उन्हें आध्यात्मिक चीज़ों की सही समझ, सत्य की सही समझ-बूझ और अनुभव होना चाहिए। ऐसे ही लोग कलीसियाओं की अगुवाई करने वाले कर्मी या प्रेरित होने के योग्य हैं। अन्यथा, वे न्यूनतम रूप में केवल अनुसरण ही कर सकते हैं, अगुवाई नहीं कर सकते, वे लोगों को जीवन प्रदान करने वाले प्रेरित तो बिल्कुल भी नहीं हो सकते। क्योंकि प्रेरित की भूमिका भाग-दौड़ करना या लड़ना नहीं है; बल्कि जीवन की सेवकाई का कार्य करना और लोगों के स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए उनकी अगुवाई करना है। यह वह भूमिका है जो वे लोग निभाते हैं जो आदेश स्वीकार करते हैं और भारी जिम्मेदारी उठाते हैं, ऐसी जिम्मेदारी जिसे हर कोई नहीं उठा सकता। इस प्रकार के कार्य का बीड़ा केवल ऐसे लोगों द्वारा ही उठाया जा सकता है जिनके पास जीवन अस्तित्व है, अर्थात् जिन्हें सत्य का अनुभव है। इसे हर वह व्यक्ति नहीं कर सकता जो मात्र चीजें त्याग सकता है, भाग-दौड़ कर सकता है या जो खुद को खपाने की इच्छा रखता है; जिन्हें सत्य का कोई अनुभव नहीं है, जिनकी काट-छाँट या जिनका न्याय नहीं किया गया है, वे इस प्रकार का कार्य करने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग जिनके पास कोई अनुभव नहीं है, लोग जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है, वे वास्तविकता को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते, क्योंकि उनके पास ऐसा अस्तित्व नहीं होता। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति न केवल अगुवाई का कार्य नहीं कर पाता, बल्कि यदि उसमें लम्बी अवधि तक कोई सत्य न हो, तो उन्हें निकाला जाना है। जो अंतर्दृष्टि तुम साझा करते हो, वह उन कठिनाइयों का प्रमाण बन सकती है जिनका तुमने जीवन में अनुभव किया है, जिन चीजों के लिए तुम्हें ताड़ना दी गई है और जिन मामलों में तुम्हारा न्याय किया गया है। यह बात परीक्षणों पर भी लागू होती है : जहाँ एक व्यक्ति शोधित किया हुआ है, जहाँ एक व्यक्ति कमजोर है—इन क्षेत्रों में मनुष्य को अनुभव होता है, इनमें मनुष्य के पास मार्ग होता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई विवाह में कुंठाओं से पीड़ित है, तो वह अक्सर ऐसी संगति करेगा, “परमेश्वर का धन्यवाद, परमेश्वर की स्तुति हो, मुझे परमेश्वर के इरादे पूरे करने चाहिए और अपना संपूर्ण जीवन उसे अर्पित कर देना चाहिए, और मुझे अपने जीवन का प्रमुख मामला पूरी तरह से परमेश्वर के हाथों में सौंप देना चाहिए। मैं अपना संपूर्ण जीवन परमेश्वर को देने की प्रतिज्ञा करने को तैयार हूँ।” मनुष्य के भीतर की सभी चीजें संगति के माध्यम से दर्शाई जा सकती हैं। किसी व्यक्ति के बोलने की गति, वह ज़ोर से बोलता है या धीमे से—ऐसे मामले अनुभव के मामले नहीं हैं और वे उन बातों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते जो उसके पास है और जो वह है। ये चीजें केवल इतना ही बता सकती हैं कि व्यक्ति का व्यक्तित्व अच्छा है या बुरा, या उसकी प्रकृति अच्छी है या बुरी, परन्तु यह इस बात के बराबर नहीं कहा जा सकता कि उसके पास अनुभव है या नहीं। बोलते समय स्वयं को व्यक्त करने की योग्यता, या बोलने की कुशलता या गति, सिर्फ अभ्यास की बातें हैं, ये चीजें उसके अनुभव का स्थान नहीं ले सकतीं। जब तुम अपने व्यक्तिगत अनुभवों की संगति करते हो, तो तुम उन सभी चीजों की संगति करते हो जिन्हें तुम महत्वपूर्ण मानते हो और जो तुम्हारे भीतर हैं। मेरा व्याख्यान मेरे अस्तित्व को दर्शाता है, परन्तु जो मैं कहता हूँ वह मनुष्य की पहुँच से परे होता है। मैं जो कहता हूँ, वह वो नहीं है जिसका मनुष्य अनुभव करता है, वह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे मनुष्य देख सकता है; वह कोई ऐसी चीज भी नहीं है जिसके संपर्क में वह आ सकता है; बल्कि यह मेरा स्वरूप है। कुछ लोग केवल इतना ही स्वीकार करते हैं कि जो मैं संगति करता हूँ वह मैंने अनुभव किया है, परंतु वे यह स्वीकार नहीं करते कि यह आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। निस्संदेह, जो मैं कहता हूँ वह मैंने अनुभव किया है। यह मैं ही हूँ जिसने छः हजार वर्षों का प्रबंधन-कार्य किया है। मैंने मनुष्यजाति के सृजन के आरम्भ से लेकर आज तक हर चीज का अनुभव किया है; कैसे मैं इसके बारे में बात नहीं कर पाऊँगा? जब मनुष्य की प्रकृति की बात आती है, तो मैंने इसे स्पष्ट रूप से देखा है; मैंने बहुत पहले ही इसका अवलोकन कर लिया था। कैसे मैं इसके बारे में स्पष्ट रूप से बात नहीं कर पाऊँगा? चूँकि मैंने मनुष्य के सार को स्पष्टता से देखा है, इसलिए मैं मनुष्य को ताड़ना देने और उसका न्याय करने के योग्य हूँ, क्योंकि सभी मनुष्य मुझ से ही आए हैं परन्तु उन्हें शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। निस्संदेह, मैं उस कार्य का आकलन करने के भी योग्य हूँ जो मैंने किया है। यद्यपि यह कार्य मेरे देह द्वारा नहीं किया जाता, फिर भी यह आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है, और यही वह है जो मेरा पास है और जो मैं हूँ। इसलिए, मैं इसे व्यक्त करने और उस कार्य को करने के योग्य हूँ जो मुझे करना चाहिए। जो कुछ लोग कहते हैं उसका उन्होंने अनुभव किया होता है। वही उन्होंने देखा है, जहाँ तक उनका दिमाग पहुँच सकता है और जिसे उनकी इंद्रियाँ महसूस कर सकती हैं। उसी की वे संगति कर सकते हैं। देहधारी परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं और वे उस कार्य को अभिव्यक्त करते हैं जो आत्मा द्वारा किया गया है, जिसे देह ने अनुभव नहीं किया है या देखा नहीं है, लेकिन फिर भी अपने अस्तित्व को व्यक्त करता है, क्योंकि देह का सार आत्मा है, और वह आत्मा के कार्य को व्यक्त करता है। यद्यपि यह देह की पहुँच से परे है, फिर भी इस कार्य को आत्मा द्वारा पहले ही कर लिया गया है। देहधारण के पश्चात्, देह की अभिव्यक्ति के माध्यम से, वह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व को जानने में सक्षम बनाता है और लोगों को परमेश्वर के स्वभाव और उस कार्य को देखने देता है जो उसने किया है। मनुष्य का कार्य लोगों को इस बारे में अधिक स्पष्ट होने में सक्षम बनाता है कि उन्हें किसमें प्रवेश करना चाहिए और उन्हें क्या समझना चाहिए; इसमें लोगों की सत्य समझने और उसका अनुभव करने में अगुआई करना शामिल है। मनुष्य का कार्य लोगों को सहारा देना है; परमेश्वर का कार्य मानवजाति के लिए नए मार्गों और नए युगों को प्रशस्त करना है, और लोगों के सामने वह प्रकट करना है जिसे नश्वर लोग नहीं जानते, जिससे वे परमेश्वर के स्वभाव को जानने में सक्षम हो जाएँ। परमेश्वर का कार्य सम्पूर्ण मानवजाति की अगुवाई करना है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 176

पवित्र आत्मा का सारा कार्य लोगों को लाभ पहुँचाने के लिए किया जाता है। यह सब लोगों का आत्मिक उन्नयन करने के लिए किया जाता है; ऐसा कोई कार्य नहीं है जो लोगों को लाभान्वित न करता हो। चाहे सत्य गहरा हो या उथला, चाहे सत्य को स्वीकार करने वाले लोगों की काबिलियत कैसी भी क्यों न हो, जो कुछ भी पवित्र आत्मा करता है, यह सब लोगों के लिए लाभदायक है। परन्तु पवित्र आत्मा का कार्य सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता; इसे पवित्र आत्मा के साथ सहयोग करने वाले लोगों के जरिए व्यक्त किया जाना चाहिए। केवल इसी तरह पवित्र आत्मा का कार्य परिणाम दे सकता है। निस्संदेह, जब पवित्र आत्मा प्रत्यक्ष तौर पर कार्य करता है, तो उसमें कोई मिलावट नहीं होती; परन्तु जब पवित्र आत्मा मनुष्य के माध्यम से कार्य करता है, तो यह कलुषित हो जाता है और पवित्र आत्मा का मूल कार्य नहीं रह जाता। इस तरह से, सत्य विभिन्न अंशों तक बदल जाता है। अनुयायी पवित्र आत्मा के मूल इरादे को न पाकर, पवित्र आत्मा के कार्य और मनुष्य के अनुभव एवं ज्ञान के संयोजन को प्राप्त करते हैं। अनुयायियों के द्वारा जो प्राप्त किया जाता है उसका जो भाग पवित्र आत्मा का कार्य है, सही होता है, जबकि उनके द्वारा प्राप्त मनुष्य का अनुभव और ज्ञान भिन्न-भिन्न होते हैं क्योंकि कर्मी भिन्न-भिन्न होते हैं। जिन कर्मियों को पवित्र आत्मा का प्रबोधन और मार्गदर्शन प्राप्त हो जाता है, वे प्रबोधन और मार्गदर्शन के आधार पर अनुभव पाते जाएँगे। इन अनुभवों में मनुष्य का मन और अनुभव, और साथ ही मानवता का अस्तित्व मिला हुआ होता है, उसके बाद वे वह ज्ञान या अंतर्दृष्टि प्राप्त करते हैं जो उनमें होनी चाहिए। सत्य का अनुभव कर लेने पर, यह मनुष्य के अभ्यास का मार्ग होता है। अभ्यास का यह मार्ग कभी बिल्कुल एक-जैसा नहीं रहता, क्योंकि लोगों के अनुभव भिन्न-भिन्न होते हैं; जिन चीजों का लोग अनुभव करते हैं, वे भी भिन्न-भिन्न होती हैं। इस तरह, पवित्र आत्मा की वही प्रबुद्धता भिन्न-भिन्न ज्ञान और अभ्यास में परिणत होती है, क्योंकि प्रबुद्धता प्राप्त करने वाले लोग भिन्न-भिन्न होते हैं। कुछ लोगों के अभ्यास में मामूली भटकाव होते हैं, कुछ में बड़े भटकाव होते हैं और दूसरे लोग पूरी तरह गलत तरीके से अभ्यास करते हैं। क्योंकि लोगों की बोध क्षमता भिन्न होती है और उनकी अंतर्निहित काबिलियत भी भिन्न होती है। कुछ लोग उपदेश सुनने के बाद उसे एक तरह से समझते हैं, जबकि कुछ लोग कोई सत्य सुनकर दूसरी तरह से समझते हैं। कुछ लोगों की समझ में थोड़ा-सा विचलन होता है, जबकि कुछ लोग सत्य के असली अर्थ को बिल्कुल भी नहीं समझते। इसलिए, इंसान की समझ ही तय करती है कि वह दूसरों की अगुवाई कैसे करेगा; यह बिल्कुल सत्य है, क्योंकि इंसान का कार्य उसके अस्तित्व की अभिव्यक्ति ही है। जो लोग सत्य की सही समझ रखने वाले लोगों की अगुवाई में होते हैं, उनकी भी सत्य की समझ सही होगी। अगर ऐसे लोग हैं भी जिनकी समझ बेतुकी है, तो भी ऐसे लोग बहुत कम हैं, और हर कोई ऐसा नहीं होगा। यदि किसी की सत्य की समझ बेतुकी है, तो उसका अनुसरण करने वाले लोग भी निस्संदेह विकृत ही होंगे और वे लोग हर लिहाज से बेतुके होंगे। अनुयायियों की सत्य की समझ की मात्रा मुख्य रूप से कर्मियों पर निर्भर करती है। निस्संदेह, परमेश्वर से आया सत्य सही और त्रुटिहीन है और यह पूरी तरह से विश्वसनीय है। परंतु, कर्मी पूरी तरह से सही नहीं होते और उन्हें पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता। यदि कर्मियों के पास सत्य का अभ्यास करने का बहुत व्यावहारिक तरीका है, तो अनुयायियों के पास भी अभ्यास का तरीका होगा। यदि कर्मियों के पास सत्य का अभ्यास करने का कोई तरीका न होकर, केवल सिद्धांत है, तो अनुयायियों में कोई वास्तविकता नहीं होगी। अनुयायियों की काबिलियत और प्रकृति जन्म से ही निर्धारित होते हैं और वे कर्मियों के साथ संबद्ध नहीं होते, परंतु अनुयायियों के सत्य समझने की सीमा और उनका परमेश्वर का ज्ञान कर्मियों पर निर्भर करता है (ऐसा केवल कुछ लोगों के साथ होता है)। जैसा कर्मी होगा, वैसे ही उसके अनुयायी होंगे जिनकी वह अगुआई करता है। कर्मी बिना कुछ भी बाकी रखे अपने अस्तित्व को ही व्यक्त करता है। वह जो अपेक्षाएँ अपने अनुयायियों से करता है, वे वही होती हैं जिन्हें वह हासिल करने का इच्छुक होता या है इसमें समर्थ होता है। ज्यादातर कर्मी उसी के आधार पर अपने अनुयायियों से अपेक्षाएँ करते हैं जो वे स्वयं करते हैं, इसके बावजूद कि उनके अनुयायी बहुत-सी चीजों को बिल्कुल भी प्राप्त नहीं कर पाते—और जिस चीज को इंसान प्राप्त नहीं कर पाता, वह उसके प्रवेश में बाधा बन जाती है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 177

उन लोगों के कार्य में बहुत कम विचलन होते हैं, जो काट-छाँट, न्याय और ताड़ना से गुजर चुके होते हैं और उनके कार्य की अभिव्यक्ति भी कहीं अधिक सटीक होती है। जो लोग कार्य करने की अपनी स्वाभाविकता पर निर्भर करते हैं, उनमें काफी बड़े विचलन होते हैं। अपूर्ण लोगों के कार्य में उनकी स्वाभाविकता बहुत अधिक अभिव्यक्त होती है, जो पवित्र आत्मा के कार्य में बहुत बड़ा अवरोध उत्पन्न करती है। किसी व्यक्ति की काबिलियत कितनी ही अच्छी क्यों न हो, उसे भी परमेश्वर के आदेश का कार्य करने से पहले काट-छाँट और न्याय से गुजरना ही चाहिए। यदि वह ऐसे न्याय से होकर नहीं गुजरा है, तो उसका कार्य, चाहे कितनी भी अच्छी तरह से क्यों न किया गया हो, सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हो सकता, वह हमेशा उसकी अपनी स्वाभाविकता और मानवीय भलाई का परिणाम होता है। काट-छाँट और न्याय से होकर गुजर चुके लोगों का कार्य उन लोगों के कार्य से कहीं अधिक सटीक होता है, जिनकी काट-छाँट और न्याय नहीं किया गया है। जो लोग न्याय से होकर नहीं गुजरे हैं, वे मानव-देह और विचारों के सिवाय और कुछ भी व्यक्त नहीं करते, जिनमें बहुत सारी मानव-बुद्धि और जन्मजात प्रतिभा मिली होती है। यह मनुष्य द्वारा परमेश्वर के कार्य की सटीक अभिव्यक्ति नहीं है। जो लोग ऐसे लोगों का अनुसरण करते हैं, वे उनकी जन्मजात काबिलियत द्वारा उनके सामने लाए जाते हैं। चूँकि वे मनुष्य की अंतर्दृष्टि और अनुभव को बहुत अधिक व्यक्त करते हैं, जो परमेश्वर के मूल इरादे से लगभग कटे हुए और उससे बहुत भटके हुए होते हैं, इसलिए इस प्रकार के व्यक्ति का कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख नहीं ला पाता, बल्कि वह उन्हें मनुष्य के सामने ले आता है। इसलिए, जो लोग न्याय और ताड़ना से होकर नहीं गुजरे हैं, वे परमेश्वर के आदेश के कार्य को क्रियान्वित करने योग्य नहीं हैं। मानक स्तर के कर्मी का कार्य लोगों को सही मार्ग पर लाने और सत्य में ज्यादा गहराई से प्रवेश करने में मदद कर सकता है। उसका कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है, वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न हो सकता है और वह विनियमों से बँधा हुआ नहीं होता, उन्हें मुक्ति और स्वतंत्रता, जीवन में क्रमिक विकास और सत्य में उत्तरोत्तर अधिक गहन प्रवेश करने की क्षमता प्रदान करता है। जो कर्मी मानक स्तर का नहीं है उसका कार्य इससे कहीं दूर होता है। उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल विनियमों के भीतर ला सकता है और लोगों से उसकी अपेक्षाएँ हर व्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न नहीं होतीं; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता। इस प्रकार के कार्य में बहुत अधिक विनियम और बहुत अधिक सिद्धांत होते हैं और वह लोगों को वास्तविकता में नहीं ला सकता, न ही वह उन्हें जीवन में विकास के सामान्य अभ्यास में ला सकता है। वह लोगों को केवल कुछ बेकार विनियमों का पालन करने में ही सक्षम बना सकता है। ऐसा मार्गदर्शन लोगों को भटका सकता है। वह तुम्हें अपने जैसा बनाने में तुम्हारी अगुआई करता है, उसके पास जो है और जो वह है उसमें ला सकता है। इस बात का भेद पहचानने के लिए कि अगुआ मानक स्तर के हैं या नहीं, इसकी कुंजी यह देखना है कि अगुआ दूसरों को किस मार्ग पर ले जाते हैं और उनके कार्य के परिणाम क्या हैं, और यह भी देखना चाहिए कि अनुयायी सत्य के अनुसार सिद्धांत पाते हैं या नहीं और अपने रूपांतरण के लिए उपयुक्त अभ्यास के तरीके प्राप्त करते हैं या नहीं। तुममें विभिन्न प्रकार के लोगों के विभिन्न कार्यों के बीच भेद पहचानने की क्षमता होनी चाहिए; तुम्हें भ्रमित अनुयायी नहीं बनना चाहिए। यह लोगों के प्रवेश के मामले पर प्रभाव डालता है। यदि तुम यह भेद पहचानने में असमर्थ हो कि किस व्यक्ति की अगुआई में मार्ग है और किसकी अगुआई में नहीं, तो तुम आसानी से गुमराह हो जाओगे। इस सबका तुम्हारे अपने जीवन के साथ सीधा संबंध है। अपूर्ण लोगों के कार्य में बहुत अधिक स्वाभाविकता होती है; उसमें बहुत अधिक मानवीय इच्छा मिली हुई होती है। उनका अस्तित्व स्वाभाविकता है—जिसके साथ वे पैदा हुए हैं। यह काट-छाँट किए जाने के बाद का जीवन या रूपांतरित किए जाने के बाद की वास्तविकता नहीं है। ऐसा व्यक्ति उन्हें सहारा कैसे दे सकता है, जो जीवन की खोज कर रहे हैं? मनुष्य का मूल जीवन उसकी जन्मजात बुद्धि या प्रतिभा है। इस प्रकार की बुद्धि या प्रतिभा मनुष्य से परमेश्वर की सटीक अपेक्षाओं से काफी दूर होती है। यदि किसी मनुष्य को पूर्ण नहीं बनाया गया है और उसके भ्रष्ट स्वभावों की काट-छाँट नहीं की गई है तो वह जो व्यक्त करता है उसके और सत्य के बीच एक बहुत बड़ा अंतर होगा; वह जो व्यक्त करता है उसमें अस्पष्ट चीजें मिली होंगी, जैसे कि उसकी कल्पनाएँ और एकतरफा अनुभव। इतना ही नहीं, वह चाहे कुछ भी करे, लोग यही महसूस करते हैं कि उसमें कोई समग्र लक्ष्य और कोई सत्य नहीं है जो सभी लोगों के प्रवेश करने के लिए उपयुक्त हो। लोगों से जो अपेक्षाएँ की जाती हैं, उनमें से ज्यादातर उनकी योग्यता से परे होती हैं, मानो वे जमीन पर जीने के लिए मजबूर की जा रही मछली हों। यह मनुष्य की इच्छा का कार्य है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव, उसके विचार और उसकी धारणाएँ उसके शरीर के सभी अंगों में व्याप्त हैं। मनुष्य सत्य का अभ्यास करने की सहज-प्रवृत्ति के साथ पैदा नहीं होता, न ही उसमें सीधे तौर पर सत्य को समझने की सहज-प्रवृत्ति होती है। उसमें मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव जोड़ दो—जब इस प्रकार का स्वाभाविक व्यक्ति कार्य करता है, तो क्या इससे गड़बड़ियाँ नहीं होतीं? परंतु पूर्ण बनाए जा चुके व्यक्ति के पास उस सत्य का अनुभव होता है जिसे लोगों को समझना चाहिए और उसके पास उनके भ्रष्ट स्वभावों का ज्ञान होता है। उसके कार्य में अस्पष्ट और अवास्तविक चीजें धीरे-धीरे कम हो जाती हैं, मानवीय मिलावटें पहले से कम हो जाती हैं और उसका काम और सेवा परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के अधिक करीब पहुँच जाते हैं। इस प्रकार, उसका काम सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर गया है और वह वास्तविक भी बन गया है। मनुष्य के मन के विचार विशेष रूप से पवित्र आत्मा के कार्य को अवरुद्ध कर देते हैं। मनुष्य के पास समृद्ध कल्पना और उचित तर्क होते हैं, और उसके पास मामलों से निपटने का लंबा अनुभव होता है। यदि मनुष्य के ये पहलू काट-छाँट और सुधार से होकर नहीं गुजरते, तो वे सभी कार्य की बाधाएँ हैं। इसलिए मनुष्य का कार्य सटीकता के सर्वोच्च स्तर तक नहीं पहुँच सकता, विशेषकर अपूर्ण लोगों का कार्य।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 178

मनुष्य का कार्य एक विस्तार और सीमा के भीतर रहता है। एक व्यक्ति केवल किसी निश्चित चरण के कार्य को करने में ही समर्थ होता है, वह संपूर्ण युग का कार्य नहीं कर सकता—अन्यथा, वह लोगों को विनियमों में ले जाएगा। मनुष्य के कार्य को केवल एक विशेष समय या चरण पर ही लागू किया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य के अनुभव का एक दायरा होता है। परमेश्वर के कार्य की तुलना मनुष्य के कार्य से नहीं की जा सकती। मनुष्य के अभ्यास करने के तरीके और सत्य का उसका ज्ञान, ये सभी एक विशेष दायरे में लागू होते हैं। तुम यह नहीं कह सकते कि जिस मार्ग पर मनुष्य चलता है वह पूरी तरह से पवित्र आत्मा का इरादा है, क्योंकि मनुष्य को केवल पवित्र आत्मा द्वारा ही प्रबुद्ध किया जा सकता है और उसे पवित्र आत्मा से पूरी तरह से नहीं भरा जा सकता। जिन चीजों को मनुष्य अनुभव कर सकता है, वे सभी सामान्य मानवता के दायरे के भीतर हैं और वे सामान्य मानवीय बुद्धि में मौजूद विचारों की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ सकतीं। वे सभी लोग, जो सत्य वास्तविकता को जी सकते हैं, इस सीमा के भीतर अनुभव करते हैं। जब वे सत्य का अनुभव करते हैं, तो यह हमेशा पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के तहत सामान्य मानव-जीवन का अनुभव होता है; यह अनुभव करने का ऐसा कोई तरीका नहीं है जो सामान्य मानव-जीवन की सीमाओं से परे हो। वे अपने मानव-जीवन को जीने की बुनियाद पर पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध किए गए सत्य का अनुभव करते हैं। इसके अतिरिक्त, यह सत्य हर व्यक्ति के लिए अलग होता है, और इसकी गहराई उस व्यक्ति की अवस्था से संबंधित होती है। बस यही कहा जा सकता है कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसे व्यक्ति का सामान्य मानवीय जीवन है जो सत्य की खोज कर रहा है, और इसे ऐसा मार्ग कहा जा सकता है जिस पर पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध कोई सामान्य व्यक्ति चलता है। कोई यह नहीं कह सकता कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसा मार्ग है जिस पर पवित्र आत्मा चलता है। सामान्य मानवीय अनुभव में, क्योंकि जो लोग अनुसरण करते हैं वे एक समान नहीं होते, इसलिए पवित्र आत्मा का कार्य भी समान नहीं होता। इसके अतिरिक्त, क्योंकि जिन परिवेशों का लोग अनुभव करते हैं और उनके अनुभव की सीमाएँ एक समान नहीं होतीं, इसलिए उनके मन और विचारों के मिश्रण की वजह से, उनका अनुभव विभिन्न अंशों तक मिश्रित हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भिन्न व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार ही किसी सत्य को समझता है। सत्य के वास्तविक अर्थ की उसकी समझ पूर्ण नहीं होती और यह उसका केवल एक या कुछ ही पहलू होते हैं। मनुष्य सत्य के जिस दायरे का अनुभव करता है, वह प्रत्येक इंसान की परिस्थितियों के अनुरूप बदलता है। इस तरह, एक ही सत्य के बारे में विभिन्न लोगों द्वारा व्यक्त ज्ञान एक समान नहीं होता। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य का अनुभव हमेशा सीमित होता है—वह पवित्र आत्मा के इरादे पूरी तरह से नहीं दर्शा सकता। मनुष्य के कार्य को परमेश्वर का कार्य नहीं समझा जा सकता, भले ही मनुष्य जो कुछ व्यक्त करता है वह परमेश्वर के इरादों से बहुत हद तक मेल खाता हो और भले ही मनुष्य का अनुभव पूर्ण बनाए जाने के उस कार्य के बहुत करीब हो जिसे पवित्र आत्मा करना चाहता है। मनुष्य केवल परमेश्वर का सेवक हो सकता है, जो केवल वही कार्य करता है जो परमेश्वर उसे सौंपता है। मनुष्य केवल पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध ज्ञान और व्यक्तिगत अनुभवों से प्राप्त सत्यों को ही व्यक्त कर सकता है। मनुष्य में पवित्र आत्मा का निर्गम बनने की योग्यताएँ नहीं हैं या वह वैसा बनने की शर्तें पूरी नहीं करता। वह यह कहने का हकदार नहीं है कि उसका कार्य परमेश्वर का कार्य है। लोगों के कार्य करने के अपने सिद्धांत होते हैं और हर किसी के अलग-अलग अनुभव होते हैं और उनकी अलग-अलग स्थितियाँ होती हैं। मनुष्य के कार्य में पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के अंतर्गत उसके सभी अनुभव शामिल होते हैं। ये अनुभव केवल मनुष्य के अस्तित्व का ही प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, ये परमेश्वर के अस्तित्व का या पवित्र आत्मा के इरादों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि मनुष्य जिस मार्ग पर चलता है, उसी पर पवित्र आत्मा भी चलता है क्योंकि मनुष्य का कार्य परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता और मनुष्य के कार्य और मनुष्य का अनुभव पूरी तरह से पवित्र आत्मा के इरादे नहीं होते। मनुष्य के कार्य की विनियमों में पड़ने की संभावना है, और उसकी कार्य-पद्धति आसानी से एक दायरे में सीमित हो जाती है और यह लोगों की स्वतंत्र मार्ग पर अगुवाई करने में असमर्थ होती है। अधिकांश अनुयायी एक सीमित दायरे में जीवन जीते हैं, और उनके अनुभव करने का तरीका भी अपने दायरे में सीमित होता है। मनुष्य का अनुभव हमेशा सीमित होता है; उसकी कार्य-पद्धति भी कुछ प्रकारों तक ही सीमित होती है और इसकी तुलना पवित्र आत्मा के कार्य से या स्वयं परमेश्वर के कार्य से नहीं की जा सकती। ऐसा इसलिए है क्योंकि आख़िरकार मनुष्य का अनुभव सीमित होता है। परमेश्वर अपना कार्य चाहे जिस तरह करे, वह विनियम से बंधा नहीं होता; इसे जैसे भी किया जाए, यह किसी एक पद्धति तक सीमित नहीं होता। परमेश्वर के कार्य के किसी प्रकार के कोई विनियम नहीं होते—उसका समस्त कार्य मुक्त और स्वतंत्र होता है। भले ही मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करते हुए कितना ही समय क्यों न बिताए, वह उसे निचोड़कर ऐसे नियम नहीं निकाल सकता जो परमेश्वर के कार्य करने के तरीके का संचालन करते हों। यद्यपि उसका कार्य अत्यंत सिद्धांत-आधारित होता है, फिर भी वह कार्य हमेशा नए-नए तरीकों से किया जाता है और उसमें नये-नये विकास होते रहते हैं, और यह मनुष्य की पहुँच से परे होता है। एक ही समयावधि के दौरान, परमेश्वर के पास भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य और लोगों की अगुवाई करने के भिन्न-भिन्न तरीके हो सकते हैं, ताकि लोगों के पास हमेशा नए-नए प्रवेश और नए-नए परिवर्तन हों। तुम उसके कार्य के नियम नहीं समझ सकते क्योंकि वह हमेशा नए तरीकों से कार्य करता है, और केवल इसी तरह परमेश्वर के अनुयायी विनियमों से नहीं बँधते। स्वयं परमेश्वर का कार्य हमेशा लोगों की धारणाओं से परहेज करता है और उनका विरोध करता है। जो लोग सच्चे हृदय से उसका अनुसरण और उसकी खोज करते हैं, केवल वही अपने स्वभाव में बदलाव ला सकते और स्वतंत्रता से जी सकते हैं, वे किन्हीं विनियमों से बाधित नहीं होते या किन्हीं धार्मिक धारणाओं से प्रतिबंधित नहीं होते। मनुष्य का कार्य लोगों से उसके अपने अनुभव और जो वह स्वयं हासिल कर सकता है, उसके आधार पर माँगें करता है। ये अपेक्षित मानक एक निश्चित दायरे के भीतर सीमित होते हैं, और अभ्यास के तरीके भी बहुत-सीमित होते हैं। इसलिए अनुयायी अनजाने में ही सीमित दायरे के भीतर जीवन जीते हैं; जैसे-जैसे समय गुजरता है, ये चीजें विनियम और कर्मकांड बन जाती हैं। यदि एक अवधि के कार्य की अगुवाई कोई ऐसा व्यक्ति करता है जो परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से पूर्ण किए जाने से नहीं गुजरा है और जिसने न्याय प्राप्त नहीं किया है, तो उसके सभी अनुयायी धर्म से चिपके रहने वाले बन जाएँगे और परमेश्वर का विरोध करने में माहिर हो जाएँगे। इसलिए, यदि कोई अगुआ मानक स्तर का है, तो उसने अवश्य ही न्याय से गुजरकर, पूर्ण किया जाना स्वीकार किया होगा। जो लोग न्याय से नहीं गुजरे हैं, उनमें भले ही पवित्र आत्मा का कार्य हो, वे केवल अस्पष्ट और अव्यावहारिक चीजों को ही व्यक्त करते हैं। अगर वे लंबे समय तक लोगों की अगुआई करते हैं तो वे उन्हें अस्पष्ट और अलौकिक विनियमों की ओर ले जाएँगे। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की देह से मेल नहीं खाता; वह मनुष्य के विचारों से मेल नहीं खाता, बल्कि मनुष्य की धारणाओं का विरोध करता है; यह अस्पष्ट धार्मिक रंग से कलंकित नहीं होता। परमेश्वर के कार्य के परिणाम वे लोग प्राप्त नहीं कर सकते जो उसके द्वारा पूर्ण नहीं बनाए गए हैं; वे मनुष्य की सोच से परे होते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 179

जो कार्य मनुष्य के मन में होता है उसे वह बहुत आसानी से प्राप्त कर सकता है। उदाहरण के लिए, धार्मिक संसार के पादरी और अगुवे अपना कार्य करने के लिए अपनी खूबियों और पदों पर भरोसा रखते हैं। जो लोग लम्बे समय तक उनका अनुसरण करते हैं वे उनकी खूबियों से संक्रमित होकर उनके अस्तित्व के कुछ हिस्से से प्रभावित हो जाते हैं। वे लोगों की खूबी, योग्यता और ज्ञान पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वे अलौकिक चीजों और अनेक गहन और अवास्तविक सिद्धांतों पर ध्यान देते हैं (निस्संदेह, ये गहन सिद्धांत अप्राप्य हैं)। वे लोगों के स्वभावों में बदलाव पर नहीं, बल्कि लोगों की उपदेश देने और कार्य करने की क्षमताओं को प्रशिक्षित करने और उनका बाइबल और आध्यात्मिक सिद्धांतों संबंधी ज्ञान सुधारने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वे इस बात पर ध्यान केंद्रित नहीं करते कि लोग कितना सत्य समझते हैं या उनके जीवन स्वभाव कितना बदलते हैं और वे लोगों के भ्रष्ट सार से कोई सरोकार नहीं रखते, वे लोगों की सामान्य और असामान्य अवस्थाओं से परिचित होने की कोशिश तो बिल्कुल नहीं करते। वे लोगों की धारणाओं का विरोध नहीं करते, न ही वे उनकी धारणाएँ उजागर करते हैं, वे लोगों की कमियों या भ्रष्टता के लिए उनकी काट-छाँट तो बिल्कुल भी नहीं करते। उनका अनुसरण करने वाले अधिकांश लोग अपनी खूबी से सेवा करते हैं, और जो कुछ वे प्रदर्शित करते हैं, वह धार्मिक धारणाएँ और धर्म-संबंधी सिद्धांत होते हैं, जो वास्तविकता से कोसों दूर होते हैं और उन्हें जीवन प्राप्त करने में बिल्कुल भी मदद नहीं कर सकते। वास्तव में, उनके कार्य का सार प्रतिभाशाली व्यक्तियों को विकसित करना, ऐसे व्यक्ति को, जिसके पास कुछ नहीं होता, एक असाधारण सेमेनरी स्नातक के रूप में विकसित करना है जो बाद में कार्य और अगुआई करता है। क्या तुम परमेश्वर के छः हज़ार वर्षों के कार्य में निहित नियमों को समझ सकते हो? मनुष्य जो कार्य करता है उसमें बहुत-से विनियम और प्रतिबंध होते हैं, और मानवीय मस्तिष्क बहुत ही रूढ़िवादी होता है। इसलिए मनुष्य जो कुछ व्यक्त करता है, वह उसके अनुभव के दायरे में मौजूद उसका ज्ञान और एहसास होता है। मनुष्य इसके अलावा कुछ भी व्यक्त करने में असमर्थ है। मनुष्य के अनुभव या उसका ज्ञान, उसकी जन्मजात खूबियों या सहज-प्रवृत्ति से उत्पन्न नहीं होते; वे परमेश्वर के मार्गदर्शन और उसकी प्रत्यक्ष चरवाही की वजह से उत्पन्न होते हैं। मनुष्य के पास केवल इस चरवाही को स्वीकार करने की क्षमता होती है और उसके पास वह क्षमता नहीं होती जिससे वह सीधे तौर पर यह अभिव्यक्त करे कि दिव्यता क्या है। मनुष्य स्रोत बनने में असमर्थ है; वह केवल ऐसा पात्र हो सकता है जो स्रोत से पानी को स्वीकार करता है; यह मनुष्य की सहज-प्रवृत्ति है, ऐसी क्षमता है जो मनुष्य होने के नाते उसमें होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचन को ग्रहण करने वाली उस क्षमता को गँवा देता है और मानवीय सहज-प्रवृत्ति को गँवा देता है, तो वह व्यक्ति उसे भी खो देता है जो अत्यंत बहुमूल्य है, और सृजित मनुष्य के कर्तव्य को भी गँवा देता है। यदि किसी मनुष्य में परमेश्वर के वचन या कार्य का ज्ञान या अनुभव नहीं है, तो वह व्यक्ति अपना कर्तव्य, ऐसा कर्तव्य जो एक सृजित प्राणी के रूप में उसे निभाना चाहिए, खो देता है, और वह सृजित प्राणी के रूप में अपनी गरिमा गँवा देता है। यह व्यक्त करना परमेश्वर की सहज-प्रवृत्ति है कि दिव्यता क्या है, फिर चाहे इसे देह में व्यक्त किया जाए या सीधे तौर पर आत्मा द्वारा व्यक्त किया जाए; यह परमेश्वर की सेवकाई है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य के दौरान या उसके बाद अपना अनुभव या ज्ञान व्यक्त करता है (अर्थात्, अपने स्वरूप को व्यक्त करता है); यह मनुष्य की सहज-प्रवृत्ति और कर्तव्य है, और वही मनुष्य को प्राप्त करना चाहिए। यद्यपि मनुष्य जो व्यक्त करता है, वह परमेश्वर जो व्यक्त करता है उससे बहुत कम पड़ता है और अनेक विनियमों से भरा होता है, फिर भी मनुष्य को अपना वह कर्तव्य अवश्य निभाना चाहिए जो उसे निभाना चाहिए और उसे वह सब करना चाहिए जो उसे करना है। मनुष्य को अपना कर्तव्य निभाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए, और कुछ भी बाकी नहीं रखना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 180

तुम लोगों को पता होना चाहिए कि परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य में भेद कैसे करना है। तुम मनुष्य के कार्य में क्या देख सकते हो? मनुष्य के कार्य में उसके अनुभव के बहुत-से तत्व होते हैं; मनुष्य वही व्यक्त करता है जैसा उसका स्वरूप होता है। अपना कार्य करने में परमेश्वर भी वही व्यक्त करता है जो उसका स्वरूप है, परंतु उसका अस्तित्व मनुष्य से भिन्न है। मनुष्य का अस्तित्व मनुष्य के अनुभव और जीवन का प्रतिनिधि है (जो कुछ मनुष्य अपने जीवन में अनुभव करता या जिससे सामना होता है, या जो उसके सांसारिक आचरण के फलसफे हैं), और भिन्न-भिन्न परिवेशों में रहने वाले लोग भिन्न-भिन्न अस्तित्व व्यक्त करते हैं। क्या तुम्हारे पास सामाजिक अनुभव है और तुम वास्तव में किस प्रकार अपने परिवार में रहते और उसके भीतर कैसे अनुभव करते हो, इसे तुम्हारी अभिव्यक्ति में देखा जा सकता है, जबकि तुम देहधारी परमेश्वर के कार्य से यह नहीं देख सकते कि उसके पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं। वह मनुष्य के सार को अच्छी तरह से जानता है और सभी प्रकार के लोगों के विभिन्न अभ्यास उजागर कर सकता है। इतना ही नहीं, वह मनुष्यों के भ्रष्ट स्वभाव और विद्रोही व्यवहार भी उजागर कर सकता है। वह दुनिया के लोगों के बीच नहीं रहता, परंतु वह नश्वर लोगों की प्रकृति और दुनिया के लोगों की समस्त भ्रष्टता से अवगत है। यही उसका अस्तित्व है। यद्यपि वह दुनिया के साथ व्यवहार नहीं करता, लेकिन वह दुनिया से निपटने के तमाम नियम जानता है, क्योंकि वह मानवीय प्रकृति को पूरी तरह से समझता है। वह आत्मा के आज के और अतीत के, दोनों कार्यों के बारे में जानता है जिन्हें मनुष्य की आँखें नहीं देख सकतीं और कान नहीं सुन सकते। इसमें बुद्धि शामिल है जो कि सांसारिक आचरण का फलसफा नहीं है और वह चमत्कार है जिनकी थाह पाना मनुष्य के लिए कठिन है। यही उसका अस्तित्व है, लोगों के लिए खुला भी और उनसे छिपा हुआ भी है। वह जो कुछ व्यक्त करता है, वह असाधारण मनुष्य का अस्तित्व नहीं है, बल्कि आत्मा के अंतर्निहित गुण और अस्तित्व हैं। वह दुनिया भर में यात्रा नहीं करता परंतु उसकी हर चीज़ को जानता है। वह “वन-मानुषों” के साथ संपर्क करता है जिनके पास कोई ज्ञान या अंतर्दृष्टि नहीं होती, परंतु वह ऐसे वचन व्यक्त करता है जो ज्ञान से ऊँचे और महान हस्तियों के वचनों से ऊपर होते हैं। वह ऐसे मंदबुद्धि और संवेदनशून्य लोगों के समूह में रहता है जिनमें मानवता नहीं है और जो मानव-जीवन को या मानवता के मानदंडों को नहीं समझते, परंतु वह मानवजाति से सामान्य मानवता का जीवन जीने के लिए कह सकता है, साथ ही वह मानवजाति की नीच और अधम मानवता को उजागर भी करता है। यह सब कुछ उसका अस्तित्व ही है, किसी भी रक्त-माँस के इंसान के अस्तित्व की तुलना में अधिक ऊँचा। उसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह उस कार्य को करने के लिए जो उसे करने की जरूरत है और भ्रष्ट मानवजाति के सार को पूरी तरह से उजागर करने के लिए जटिल, बोझिल और पतित सामाजिक जीवन का अनुभव करने का अतिरिक्त कदम उठाए। पतित सामाजिक जीवन उसके देह को “विकसित” नहीं कर सकता। उसका कार्य और उसके वचन केवल मनुष्य के विद्रोहीपन को उजागर करते हैं और संसार से निपटने के लिए मनुष्य को अनुभव और सबक प्रदान नहीं करते। जब वह मनुष्य को जीवन की आपूर्ति करता है तो उसे समाज या मनुष्य के परिवार की जाँच-पड़ताल करने की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य को उजागर करना और न्याय करना उसकी देह के अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं है; यह लंबे समय तक मनुष्य के विद्रोहीपन को जानने और मनुष्य की भ्रष्टता से घृणा करने के बाद उसका मनुष्य की अधार्मिकता उजागर करना है। जो भी कार्य वह करता है, वह सब मनुष्य के सामने उसका स्वभाव प्रकट करता है और उसके अस्तित्व को व्यक्त करता है। केवल वही इस कार्य को कर सकता है; इस कार्य को रक्त-माँस का व्यक्ति नहीं कर सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 181

जिस कार्य को परमेश्वर करता है वह उसकी देह के अनुभव का प्रतिनिधित्व नहीं करता; जिस कार्य को मनुष्य करता है वह मनुष्य के अनुभव का प्रतिनिधित्व करता है। हर कोई अपने व्यक्तिगत अनुभव की बात करता है। परमेश्वर सीधे तौर पर सत्य व्यक्त कर सकता है, जबकि मनुष्य कुछ सत्यों का अनुभव करने के पश्चात् केवल प्रासंगिक अनुभवों को ही व्यक्त कर सकता है। परमेश्वर के कार्य के कोई विनियम नहीं होते और वह समय या भौगोलिक रुकावटों के अधीन नहीं है। वह अपने स्वरूप को किसी भी समय और किसी भी स्थान पर व्यक्त कर सकता है। उसे जैसा अच्छा लगता है वह वैसा ही करता है। मनुष्य के कार्य में परिस्थितियाँ और सन्दर्भ होते हैं; उनके बिना, वह कार्य करने में असमर्थ होता है और वह परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान को व्यक्त करने या सत्य के बारे में अपने अनुभव को व्यक्त करने में भी असमर्थ होता है। कोई चीज स्वयं परमेश्वर का कार्य है या मनुष्य का कार्य, जब तक तुम दोनों की तुलना करते हो तुम अंतर जान जाओगे। यदि कोई कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा नहीं किया गया है और वह केवल मनुष्य का ही कार्य है, तो तुम बस जान जाओगे कि इन लोगों की शिक्षाएँ ऊँची, किसी भी अन्य व्यक्ति की क्षमता से परे हैं और उनके बोलने का लहजा, चीजों को सँभालने का उनका सिद्धांत और कार्य करने का उनका अनुभवी और सधा हुआ तरीका दूसरों की पहुँच से बाहर होते हैं। तुम सभी इन अच्छी क्षमता और उत्कृष्ट ज्ञान वाले लोगों की सराहना करते हो, परंतु तुम परमेश्वर के कार्य और वचनों से यह नहीं देख पाते कि उसकी मानवता कितनी ऊँची है। इसके बजाए, वह साधारण है, और कार्य करते समय, वह सामान्य और व्यावहारिक होता है, फिर भी नश्वर इंसान के लिए वह असीमित भी है, जिसकी वजह से लोगों में उसका भय मानने वाला हृदय उत्पन्न होता है। किसी के कार्य में उसका अनुभव विशेष रूप से उन्नत हो सकता है या उसकी कल्पना और तर्कशक्ति विशेष रूप से उन्नत हो सकती है और उसकी मानवता विशेष रूप से अच्छी हो सकती है; ये चीजें केवल लोगों की प्रशंसा ही अर्जित कर सकती हैं, परंतु उनके अंदर भय और त्रास जाग्रत नहीं कर सकतीं। सभी लोग उन लोगों की प्रशंसा करते हैं जिनमें कार्य-क्षमता होती है, विशेष रूप से जिनका अनुभव गहरा होता है और जो सत्य का अभ्यास कर सकते हैं, परंतु ऐसे लोग कभी भी भय पैदा नहीं कर सकते, केवल प्रशंसा और ईर्ष्या प्राप्त कर सकते हैं। परंतु जिन लोगों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लिया है वे परमेश्वर की प्रशंसा नहीं करते; बल्कि उन्हें लगता है कि परमेश्वर का कार्य मनुष्य की पहुँच से परे है और यह मनुष्य के लिए अथाह है, यह तरोताज़ा और अद्भुत है। जब लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं, तो वे उसके बारे में पहले यह जान पाते हैं कि वह अथाह, बुद्धिमान और अद्भुत है और स्वभावतः वे उसका भय मानना शुरू कर देते हैं; उन्हें लगता है कि जो कार्य वह करता है वह रहस्यात्मक और मनुष्य के दिमाग की पहुँच से परे है। लोग केवल परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने, उसके इरादों को पूरा करने में समर्थ होना चाहते हैं; वे उससे बढ़कर होने की इच्छा नहीं करते, क्योंकि जो कार्य परमेश्वर करता है वह मनुष्य की सोच और कल्पना से परे होता है और वह परमेश्वर के बदले उस कार्य को नहीं कर सकता। यहाँ तक कि मनुष्य खुद अपनी कमियों को नहीं जानता, फिर भी परमेश्वर ने एक नया मार्ग प्रशस्त किया है और वह मनुष्य को एक अधिक नए और अधिक खूबसूरत संसार में ले जाने के लिए आया है, जिससे मनुष्य ने नई प्रगति और एक नई शुरुआत की है। लोगों के मन में परमेश्वर के लिए जो भाव है वो प्रशंसा का भाव नहीं है, या सिर्फ प्रशंसा नहीं है। उनका गहनतम अनुभव भय और प्रेम है; और उनकी भावना यह है कि परमेश्वर वास्तव में अद्भुत है। वह ऐसा कार्य करता है जिसे करने में मनुष्य असमर्थ है, और ऐसी बातें कहता है जिन्हें कहने में मनुष्य असमर्थ है। जिन लोगों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है उन्हें हमेशा एक अवर्णनीय एहसास होता है। पर्याप्त गहरे अनुभव वाले लोग परमेश्वर से आने वाले प्रेम को समझ सकते हैं; वे उसकी मनोरमता को महसूस कर सकते हैं, महसूस कर सकते हैं कि उसका कार्य बहुत बुद्धिमत्तापूर्ण और बहुत अद्भुत है, और परिणामस्वरूप उनके बीच असीमित सामर्थ्य उपजती है। यह डर या कभी-कभार का प्रेम और श्रद्धा नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के लिए परमेश्वर की दया और सहिष्णुता की गहरी भावना है। हालाँकि, जिन लोगों ने उसकी ताड़ना और न्याय का अनुभव किया है, उन्हें बोध है कि वह प्रतापी है और अपमान सहन नहीं करता। यहाँ तक कि जिन लोगों ने उसके अधिकांश कार्य का अनुभव किया है, वे भी उसकी थाह पाने में असमर्थ हैं; जो लोग सचमुच उसका भय मानते हैं, वे सभी जानते हैं कि उसका कार्य लोगों की धारणाओं से मेल नहीं खाता बल्कि हमेशा उनकी धारणाओं के विरोध में होता है। उसे इसकी जरूरत नहीं है कि लोग उसकी पूरी तरह प्रशंसा करें या वे उसके प्रति सतही समर्पण-भाव दिखाएँ; बल्कि वह चाहता है कि उनके अंदर सच्चा भय और समर्पण हो। उसके इतने सारे कार्य में, सच्चे अनुभव वाले किसी भी व्यक्ति में उसका भय मानने वाला हृदय विकसित होता है, जो प्रशंसा से बढ़कर है। लोगों ने ताड़ना और न्याय के उसके कार्य के कारण उसके स्वभाव को देखा है, और इसलिए उनके पास उसका भय मानने वाला हृदय होता है। परमेश्वर भय माने जाने और समर्पण करने योग्य है, क्योंकि उसका अस्तित्व और उसका स्वभाव सृजित प्राणियों के समान नहीं है, ये सृजित प्राणियों से ऊपर हैं। परमेश्वर स्व-अस्तित्वधारी, चिरकालीन और असृजित प्राणी है, और केवल परमेश्वर ही भय और समर्पण के योग्य है; मनुष्य इसके योग्य नहीं है। इसलिए, जिन लोगों ने उसके कार्य का अनुभव किया है और जिन्होंने सचमुच में उसे जाना है, उनमें उसका भय मानने वाला हृदय उत्पन्न होता है। लेकिन, जो लोग उसके बारे में अपनी धारणाएँ नहीं छोड़ते—जो उसे परमेश्वर मानते ही नहीं—वे परमेश्वर का भय मानने वाले हृदय से पूर्णतः रहित होते हैं और हालाँकि वे उसका अनुसरण करते हैं फिर भी उन्हें जीता नहीं जाता; वे प्रकृति से ही विद्रोही लोग हैं। वह ऐसे परिणाम को प्राप्त करने के लिए इस कार्य को करता है ताकि सभी सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता का भय मानने वाला हृदय रखें, उसकी आराधना करें, और बिना किसी शर्त के उसके प्रभुत्व के अधीन आत्मसमर्पण कर सकें। उसके समस्त कार्य का लक्ष्य इसी अंतिम परिणाम को हासिल करना है। यदि जिन लोगों ने ऐसे कार्य का अनुभव कर लिया है, उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय थोड़ा-भी नहीं होता, यदि अतीत का उनका विद्रोहीपन बिल्कुल भी नहीं बदलता है, तो उन्हें निश्चित ही निकाल दिया जाएगा। यदि परमेश्वर के प्रति किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति केवल दूर से ही प्रशंसा करना या सम्मान प्रकट करना है और जरा-सा भी प्रेम करना नहीं है, तो यह वो परिणाम है जिस पर वह व्यक्ति आ पहुँचा है जिसके पास परमेश्वर-प्रेमी हृदय नहीं है, और उस व्यक्ति में पूर्ण किए जाने की शर्तों का अभाव है। यदि इतना अधिक कार्य भी किसी व्यक्ति के सच्चे प्रेम को प्राप्त करने में असमर्थ है, तो इसका अर्थ है उस व्यक्ति ने परमेश्वर को प्राप्त नहीं किया है और वह असल में सत्य की खोज नहीं कर रहा। जो व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम नहीं करता, वह सत्य से भी प्रेम नहीं करता और इस तरह वह परमेश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता, वह परमेश्वर की स्वीकृति तो बिल्कुल भी प्राप्त नहीं कर सकता। ऐसे लोग, पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव चाहे जैसे कर लें, और न्याय का चाहे जैसे अनुभव कर लें, वे परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं रख पाते। ऐसे लोगों की प्रकृति अपरिवर्तनीय होती है, और उनका स्वभाव अत्यंत कुत्सित होता है। जिन लोगों में परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं है, उन्हें निकाल दिया जाएगा, वे दण्ड के पात्र बनेंगे, और उन्हें उसी तरह दण्ड दिया जाएगा जैसे बुराई करने वालों को दिया जाता है, और ऐसे लोग उनसे भी अधिक कष्ट सहेंगे जिन्होंने अधार्मिक कर्म किए हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 182

आखिरकार, परमेश्वर का कार्य इंसान के कार्य से अलग है, तो उसकी अभिव्यक्तियों का मनुष्य की अभिव्यक्तियों के समान होना कैसे संभव है? परमेश्वर का अपना विशेष स्वभाव है, जबकि इंसान के पास ऐसे कर्तव्य हैं जिनका उसे निर्वहन करना ही चाहिए। परमेश्वर का स्वभाव उसके कार्य में व्यक्त होता है, जबकि इंसान का कर्तव्य इंसान के अनुभवों में समाविष्ट होता है और इंसान के अनुसरण में अभिव्यक्त होता है। इसलिए यह किए गए कार्य से स्पष्ट हो जाता है कि कोई चीज़ परमेश्वर की अभिव्यक्ति है या इंसान की अभिव्यक्ति। इसे स्वयं परमेश्वर द्वारा बताने की आवश्यकता नहीं है, न ही इंसान को गवाही देने के लिए प्रयास करने की आवश्यकता है; स्वयं परमेश्वर को किसी व्यक्ति का दमन करने की आवश्यकता तो बिलकुल नहीं है। यह सब सहज प्रकटन के रूप में आता है; न तो यह जबरन होता है, न ही इंसान इसमें हस्तक्षेप कर सकता है। इंसान के कर्तव्य को उसके अनुभवों से जाना जा सकता है, और इसके लिए उसे कोई अतिरिक्त अनुभवजन्य कार्य करने की आवश्यकता नहीं है। इंसान जब अपना कर्तव्य निभाता है तो उसका समस्त सार प्रकट हो सकता है, जबकि परमेश्वर अपना कार्य करते समय अपना अंतर्निहित स्वभाव व्यक्त कर सकता है। अगर यह इंसान का कार्य है, तो इसे छिपाया नहीं जा सकता। अगर यह परमेश्वर का कार्य है, तो किसी के लिए भी परमेश्वर के स्वभाव को छिपाना और भी असंभव है, इसे इंसान द्वारा नियंत्रित करना तो बिल्कुल ही संभव नहीं। किसी भी इंसान को परमेश्वर नहीं कहा जा सकता, उसके काम और शब्दों को पवित्र या अपरिवर्तनीय तो बिल्कुल नहीं माना जा सकता है। परमेश्वर को इंसान कहा जा सकता है क्योंकि उसने देहधारण किया, लेकिन उसके कार्य को इंसान का कार्य या इंसान का कर्तव्य नहीं माना जा सकता। इससे भी बढ़कर, परमेश्वर के कथन और पौलुस के पत्रों को समान नहीं माना जा सकता, न ही परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को और इंसान के अनुदेशों के शब्दों को समान दर्जा दिया जा सकता है। इसलिए, ऐसे सिद्धांत हैं जो परमेश्वर के कार्य को इंसान के काम से अलग करते हैं। इन्हें उनके सारों के अनुसार अलग किया जाता है, न कि कार्य के विस्तार या उसकी अस्थायी कार्यकुशलता के आधार पर। इस विषय पर, अधिकतर लोग सिद्धांतों की गलती करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इंसान बाह्य स्वरूप को देखता है, जिसे वह हासिल कर सकता है, जबकि परमेश्वर सार को देखता है, जिसे इंसान की भौतिक आँखों से नहीं देखा जा सकता। अगर तुम परमेश्वर के वचनों और कार्य को औसत इंसान का कर्तव्य मानते हो, और इंसान के बड़े पैमाने के काम को उसका कर्तव्य-निर्वहन मानने के बजाय देहधारी परमेश्वर का कार्य मानते हो, तो क्या तुम सैद्धांतिक रूप से गलत नहीं हो? इंसान के पत्र और जीवनियाँ आसानी से लिखी जा सकती हैं, मगर केवल पवित्र आत्मा के कार्य की बुनियाद पर। लेकिन परमेश्वर के कथनों और कार्य को इंसान आसानी से संपन्न नहीं कर सकता या उन्हें मानवीय बुद्धि और सोच द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता, लोग उनकी पड़ताल करने के बाद पूरी तरह से उनकी व्याख्या तो बिल्कुल नहीं कर सकते हैं। यदि सिद्धांत के ये मामले तुम लोगों में कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं करते हैं, तो यह साबित करता है कि तुम लोगों की आस्था बहुत सच्ची या गंभीर नहीं है। केवल यही कहा जा सकता है कि तुम लोगों की आस्था अस्पष्टता से भरी हुई है, और यह भ्रमित तथा सिद्धांतविहीन दोनों है। परमेश्वर और इंसान के सर्वाधिक मौलिक सार संबंधी मसलों को समझे बिना, क्या इस प्रकार की आस्था आध्यात्मिक रूप से सर्वाधिक सुन्न नहीं है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तेरह धर्मपत्रों पर तुम्हारा दृढ़ मत क्या है?

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 183

यीशु पृथ्वी पर साढ़े तैंतीस साल तक रहा था, वह सलीब पर चढ़ने का कार्य करने के लिए आया था, और सलीब पर चढ़ने के माध्यम से परमेश्वर ने अपनी महिमा का एक भाग प्राप्त किया। जब परमेश्वर देह में आया, तो वह विनम्र और छिपा रहने में समर्थ था और अत्यधिक पीड़ा सहन कर सकता था। यद्यपि वह स्वयं परमेश्वर था, फिर भी उसने हर अपमान और हर बदनामी सहन की और छुटकारे का कार्य पूरा करने के लिए सलीब पर चढ़ाए जाने का गहरा दर्द सहा। कार्य के इस चरण का समापन हो जाने के बाद, यद्यपि लोगों ने देखा कि परमेश्वर ने महान महिमा प्राप्त कर ली है, फिर भी यह उसकी महिमा की संपूर्णता नहीं थी; यह उसकी महिमा का केवल एक भाग था, जिसे उसने यीशु से प्राप्त किया था। यद्यपि यीशु सारे कष्ट सहने, विनम्र और छिपे रहने, और परमेश्वर के लिए सलीब पर चढ़ाए जाने में समर्थ था, फिर भी परमेश्वर ने अपनी महिमा का केवल एक भाग ही प्राप्त किया, और उसकी महिमा इस्राएल में प्राप्त हुई थी। परमेश्वर के पास अभी भी महिमा का एक अन्य भाग है : पृथ्वी पर व्यावहारिक रूप से कार्य करने के लिए आना और लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाना। यीशु के कार्य के चरण के दौरान, उसने कुछ अलौकिक चीज़ें कीं, लेकिन कार्य का वह चरण किसी भी तरह से सिर्फ चिह्न और चमत्कार दिखाने के लिए नहीं था। यह मुख्य रूप से यह दिखाने के लिए था कि यीशु पीड़ा सहन कर सकता था और परमेश्वर के लिए सलीब पर चढ़ाया जा सकता था, कि यीशु गहरी पीड़ा सहन करने में समर्थ था, क्योंकि वह परमेश्वर से प्रेम करता था, और कि यद्यपि परमेश्वर ने उसे त्याग दिया था, लेकिन फिर भी वह परमेश्वर की इच्छा को अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करने का इच्छुक था। जब परमेश्वर ने इस्राएल में अपना कार्य समाप्त कर लिया और यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया, तो उसके बाद परमेश्वर ने महिमा प्राप्त की और उसने शैतान के सामने गवाही दी। तुम लोग न तो जानते हो और न ही तुम लोगों ने देखा है कि परमेश्वर चीन में कैसे देहधारी बन गया, तो फिर तुम लोग यह कैसे देख सकते हो कि परमेश्वर ने महिमा पा ली है? परमेश्वर ने तुम लोगों पर विजय का बहुत-सा कार्य किया है और तुम लोग अडिग रहे हो। इस चरण का परमेश्वर का कार्य इस तरह सफल होता है और यह परमेश्वर की महिमा का एक भाग है। तुम लोग केवल इसे ही देखते हो और तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना अभी बाक़ी है, और तुम्हें अभी अपने हृदय पूर्णतः परमेश्वर को देने हैं। तुम लोगों को अभी इस महिमा की संपूर्णता को देखना शेष है; तुम लोग सिर्फ यह देखते हो कि परमेश्वर ने पहले ही तुम लोगों के हृदयों को जीत लिया है, और तुम लोग उसे कभी नहीं छोड़ सकते और तुम बिल्कुल अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करोगे और तुम लोगों के हृदय नहीं बदलेंगे, और कि यही परमेश्वर की महिमा है। तुम लोग किस चीज में परमेश्वर की महिमा देखते हो? लोगों में उसके कार्य के प्रभावों में। लोग देखते हैं कि परमेश्वर बहुत प्यारा है, परमेश्वर उनके हृदय में है और वे उसे छोड़ने को तैयार नहीं हैं, और यह परमेश्वर की महिमा है। कलीसियाओं में भाई-बहनों का जोश बढ़ चुका है। वे अपने हृदयों से परमेश्वर से प्रेम कर सकते हैं, और परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य की सर्वोच्च शक्ति और उसके वचनों के अतुलनीय पराक्रम को देख सकते हैं। वे देखते हैं कि उसके वचनों में अधिकार है और कि वह दानवों की भूमि में, जो कि चीन की मुख्य भूमि है, अपने कार्य को कार्यान्वित कर सकता है। लोगों के कमज़ोर होने के बावजूद उनके हृदय परमेश्वर के सामने झुक जाते हैं और वे परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने को तैयार होते हैं। भले ही वे कमज़ोर और अयोग्य हों, वे इस बात को देखने में समर्थ होते हैं कि परमेश्वर के वचन बहुत प्यारे हैं और इसलिए उनके द्वारा सँजोए जाने योग्य हैं। यह परमेश्वर की महिमा है। जब वह दिन आता है, जब लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं, और वे उसके सामने झुकने में समर्थ होते हैं, और वे पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं, और अपने भविष्य की संभावनाओं और भाग्य को परमेश्वर के हाथों में छोड़ सकते हैं, तब परमेश्वर की महिमा का दूसरा भाग पूरी तरह से प्राप्त कर लिया गया होगा। कहने का अर्थ है कि जब व्यावहारिक परमेश्वर के कार्य को सर्वथा पूरा कर लिया जाएगा, तो चीन की मुख्य भूमि में उसका कार्य समाप्त हो जाएगा। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर द्वारा पूर्व-निर्धारित किए और चुने गए लोग पूर्ण बना दिए जाएँगे, तो परमेश्वर महिमा प्राप्त कर चुका होगा। परमेश्वर ने कहा कि वह अपनी महिमा के दूसरे भाग को पूर्व दिशा में ले आया है, किंतु यह आँखों के लिए अदृश्य है। परमेश्वर अपने कार्य को पूर्व दिशा में ले आया है—वह पहले ही पूर्व दिशा में आ चुका है। यह परमेश्वर की महिमा है। आज यद्यपि उसका कार्य अभी पूरा किया जाना बाकी है, लेकिन चूँकि परमेश्वर ने कार्य करने का निर्णय लिया है, इसलिए वह निश्चित रूप से पूरा होगा। परमेश्वर ने निर्णय लिया है कि वह इस कार्य को चीन में पूरा करेगा, और उसने तुम लोगों को पूर्ण करने का संकल्प किया है। इस प्रकार उसने तुम लोगों के पीछे जाने के सभी साधन बाधित कर दिए हैं—उसने पहले ही तुम्हारे हृदय जीत लिए हैं और भले ही तुम चाहो या न चाहो, तुम्हें आगे बढ़ना है, और जब तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए जाते हो, तो परमेश्वर महिमा प्राप्त करेगा। आज परमेश्वर द्वारा संपूर्ण महिमा प्राप्त की जानी अभी बाकी है, क्योंकि तुम लोगों को अभी पूर्ण किया जाना बाकी है। यद्यपि तुम लोगों के हृदय परमेश्वर की ओर लौट चुके हैं, फिर भी तुम्हारी देह में अभी भी कई कमजोरियाँ हैं, तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में अक्षम हो, तुम परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहने में असमर्थ हो, और तुम्हारे भीतर अभी भी बहुत-सी नकारात्मक चीज़ें हैं, जिन्हें तुम लोगों को त्यागना होगा। तुम्हें अभी भी कई परीक्षणों और शोधनों से गुज़रना होगा—केवल इसी तरह से तुम्हारे जीवन स्वभाव परिवर्तित हो सकते हैं और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “सहस्राब्दि राज्य आ चुका है” के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 184

उस समय यीशु का कार्य समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाना था। उन सभी के पापों को क्षमा कर दिया गया था जो उसमें विश्वास करते थे; अगर तुम्हें उस पर विश्वास था, वह तुम्हें छुटकारा दिलाता था; यदि तुम उस पर विश्वास करते थे, तो तुम पाप के नहीं रह जाते थे, तुम अपने पापों से मुक्त हो जाते थे। यही बचाए जाने और विश्वास द्वारा उचित ठहराए जाने का अर्थ है। फिर भी विश्वासियों के अंदर परमेश्वर के प्रति विद्रोह और विरोध के भाव थे, जिन्हें अभी भी धीरे-धीरे हटाया जाना था। उद्धार का अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य पूरी तरह से यीशु द्वारा प्राप्त कर लिया गया है, बल्कि यह था कि मनुष्य अब पाप का नहीं रह गया था, उसे उसके पापों से मुक्त कर दिया गया था। अगर तुम उसमें विश्वास करते थे, तो तुम पाप के नहीं रह जाते थे। उस समय, यीशु ने बहुत-से ऐसे कार्य किए जो उसके शिष्यों की समझ से बाहर थे, और ऐसी बहुत-सी बातें कहीं जो लोगों की समझ में नहीं आयीं। इसका कारण यह है कि उस समय उसने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया। इस प्रकार, यीशु के जाने के कई वर्ष बाद, मत्ती ने उसकी एक वंशावली बनायी और अन्य लोगों ने भी बहुत-से ऐसे कार्य किए जो मनुष्य की इच्छा के अनुसार थे। यीशु मनुष्य को पूर्ण करने और प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि कार्य का एक चरण संपन्न करने के लिए आया था : स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को आगे बढ़ाने और सूली पर चढ़ने का कार्य करने। इसलिए, एक बार जब यीशु को सूली पर चढ़ा दिया गया, तो उसके कार्य का पूरी तरह से अंत हो गया। किन्तु वर्तमान चरण में जो कि विजय का कार्य है, अधिक वचन बोले जाने चाहिए, अधिक कार्य किया जाना चाहिए और कई प्रक्रियाएँ होनी चाहिए। उसी तरह, यीशु और यहोवा के कार्यों के रहस्य भी प्रकट होने चाहिए, ताकि सभी लोगों को अपने विश्वास में समझ और स्पष्टता मिल जाए, क्योंकि यह अंत के दिनों का कार्य है, और अंत के दिन परमेश्वर के कार्य के समापन के दिन हैं, यह कार्य खत्म होने का समय है। कार्य का यह चरण तुम्हारे लिए यहोवा की व्यवस्था और यीशु के छुटकारे को एकदम स्पष्ट कर देगा, और यह मुख्य रूप से इसलिए है ताकि तुम परमेश्वर की छह हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना के पूरे कार्य को समझ सको और इस छह हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना की सारी महत्ता और सार समझ सको, और यीशु द्वारा किए गए सभी कार्यों और उसके द्वारा बोले गए वचनों का प्रयोजन और यहाँ तक कि बाइबल में अपने अंधे विश्वास और उसकी आराधना को भी समझ सको। तुम्हें इन सब को पूरी तरह से समझने में मदद करेगा। तुम यीशु द्वारा किए गए कार्य और परमेश्वर के आज के कार्य, दोनों को समझ जाओगे; तुम समस्त सत्य, जीवन और मार्ग को समझ लोगे और देख लोगे। यीशु द्वारा किए गए कार्य के चरण में, यीशु समापन कार्य किए बिना क्यों चला गया? क्योंकि यीशु के कार्य का चरण समापन का कार्य नहीं था। जब उसे सूली पर चढ़ाया गया, तब उसके वचनों का भी अंत हो गया था; उसके सूली पर चढ़ने के बाद उसका कार्य पूरी तरह समाप्त हो गया था। वह वर्तमान चरण जैसा नहीं था, जिसमें वचनों के अंत तक बोले जाने और उसका समस्त कार्य समाप्त हो जाने के बाद ही परमेश्वर का कार्य समाप्त होगा। यीशु के कार्य के चरण के दौरान, ऐसे बहुत-से वचन थे जो अनकहे रह गए थे, या जो स्पष्ट रूप से नहीं बोले गए थे। फिर भी यीशु ने इस बात की परवाह नहीं की कि उसके वचन पूरी तरह से व्यक्त हो गए हैं या नहीं, क्योंकि उसकी सेवकाई कोई वचनों की सेवकाई नहीं थी, इसलिए सूली पर चढ़ाये जाने के बाद वह चला गया। कार्य का वह चरण मुख्यतः सूली पर चढ़ने के वास्ते था और वह वर्तमान चरण से भिन्न है। कार्य का यह चरण मुख्य रूप से समस्त कार्य का समापन करने, आखिरी साफ-सफाई करने और उसे अंत तक ले जाने के लिए है। यदि अंत तक वचन नहीं बोले गए, तो इस कार्य को पूरा करना असंभव होगा, क्योंकि कार्य के इस चरण में समस्त कार्य का समापन और उसे पूरा करने का काम वचनों के उपयोग से किया जाता है। उस समय यीशु ने ऐसा बहुत-सा कार्य किया, जो मनुष्य की समझ से बाहर था। वह चुपचाप चला गया और आज भी ऐसे बहुत-से लोग हैं जो उसके वचनों को नहीं समझते। उनकी समझ त्रुटिपूर्ण है, फिर भी वे उसे सही मानते हैं, और नहीं जानते कि वे गलत हैं। अंतिम चरण पूरी तरह से परमेश्वर के कार्य का अंत और इसका उपसंहार करेगा। सभी लोग परमेश्वर की प्रबंधन योजना को समझ और जान लेंगे। मनुष्य की धारणाएँ, उसके इरादे, उसकी भ्रामक समझ, यहोवा और यीशु के कार्यों के प्रति उसकी धारणाएँ, अविश्वासियों के बारे में उसके विचार और उसकी सभी विकृतियाँ ठीक कर दी जाएँगी। और मनुष्य जीवन में सभी सही मार्ग, परमेश्वर द्वारा किया गया समस्त कार्य और संपूर्ण सत्य समझ जाएगा। जब ऐसा होगा, तो कार्य का यह चरण समाप्त हो जाएगा। यहोवा का कार्य दुनिया का सृजन था, वह आरंभ था; कार्य का यह चरण कार्य का अंत है, और यह समापन है। आरंभ में, परमेश्वर का कार्य इस्राएल के चुने हुए लोगों के बीच किया गया था और यह सभी जगहों में से सबसे पवित्र जगह पर एक अभूतपूर्व कार्य था। कार्य का अंतिम चरण दुनिया का न्याय करने और युग को समाप्त करने के लिए सभी देशों में से सबसे गंदे देश में किया जा रहा है। पहले चरण में, परमेश्वर का कार्य सबसे प्रकाशमान स्थान पर किया गया था और अंतिम चरण सबसे अंधकारमय स्थान पर किया जाता है, और यह अंधकार भगा दिया जाएगा, रोशनी लाई जाएगी और सब लोगों पर विजय प्राप्त की जाएगी। जब इस सबसे गंदे और सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी और समस्त आबादी स्वीकार कर लेगी कि परमेश्वर होता है, जो कि सच्चा परमेश्वर है, और हर व्यक्ति पूरी तरह से कायल हो जाएगा, तब समस्त ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त करने का कार्य कार्यान्वित करने के लिए इस तथ्य का उपयोग किया जाएगा। कार्य का यह चरण प्रातिनिधिक है : एक बार इस युग का कार्य समाप्त हो गया, तो छह हजार वर्षों का प्रबंधन कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। जब सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों को जीत लिया जाएगा, तो कहने की जरूरत नहीं है कि बाकी सब जगह भी ऐसा ही होगा। इस तरह, केवल चीन में विजय का कार्य ही प्रातिनिधिक महत्व रखता है। चीन अंधकार की सभी शक्तियों का मूर्त रूप है और चीन के लोग उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो देह के हैं, शैतान के हैं, दैहिक हैं। चीनी लोग ही बड़े लाल अजगर द्वारा सबसे ज्यादा भ्रष्ट किए गए हैं, वही परमेश्वर के सबसे कट्टर विरोधी हैं, उन्हीं की मानवता सबसे अधम और सबसे गंदी है, इसलिए वे समस्त भ्रष्ट मानवता के आद्यरूप हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि अन्य देशों में कोई समस्या नहीं है; मनुष्य की धारणाएँ समान हैं, यद्यपि इन देशों के लोग अच्छी काबिलियत वाले हो सकते हैं, किन्तु यदि वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं, तो अवश्य ही वे उसका विरोध करते होंगे। यहूदियों ने भी परमेश्वर का विरोध और उससे विद्रोह क्यों किया? फरीसियों ने भी उसका विरोध क्यों किया? यहूदा ने यीशु के साथ विश्वासघात क्यों किया? उस समय, बहुत-से अनुयायी यीशु को नहीं जानते थे। यीशु को सूली पर चढ़ाये जाने और उसके फिर से जी उठने के बाद भी, लोगों ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया? क्या मनुष्य का विद्रोहीपन बिल्कुल समान नहीं है? बात बस इतनी है कि चीन के लोग इसके एक उदाहरण के रूप में पेश किए जाते हैं, जब उन पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी तो वे एक मॉडल और नमूना बन जाएँगे और दूसरों के लिए संदर्भ का काम करेंगे। मैंने हमेशा क्यों कहा है कि तुम लोग मेरी प्रबंधन योजना का केवल एक गौण अंग हो? चीन के लोगों में ही भ्रष्टता, अशुद्धता, अधार्मिकता, विरोध और विद्रोहशीलता सर्वाधिक पूर्णता से व्यक्त होती हैं और अपने विविध रूपों में प्रकट होती हैं। एक लिहाज से, वे खराब काबिलियत के हैं और दूसरे लिहाज से, उनका जीवन और उनकी मानसिकता पिछड़ी हुई है, उनकी आदतें, सामाजिक वातावरण, जिस परिवार में वे जन्मे हैं—सभी दयनीय और सर्वाधिक पिछड़े हैं। उनकी हैसियत भी निम्न है। इस स्थान पर कार्य प्रातिनिधिक है, एक बार जब यह परीक्षा-कार्य पूरी तरह से कार्यान्वित हो जाएगा, तो परमेश्वर का उसके ठीक बाद का कार्य अधिक आसान हो जाएगा। जब कार्य का यह चरण पूरा हो जाएगा, तब अगला कार्य बिल्कुल भी कठिन नहीं होगा। एक बार जब कार्य का यह चरण सम्पन्न हो जाएगा, तो बड़ी सफलता पूरी तरह प्राप्त हो चुकी होगी और समस्त ब्रह्माण्ड में विजय का कार्य पूर्ण अंत तक पहुँच चुका होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 185

अब मोआब के वंशजों पर कार्य करना उन लोगों को बचाना है, जो सबसे गहरे अँधेरे में गिर गए हैं। यद्यपि वे शापित हैं, फिर भी परमेश्वर उनसे महिमा पाने का इच्छुक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पहले वे सभी ऐसे लोग थे जिनके हृदयों में परमेश्वर नहीं था और केवल उन लोगों को जिनके हृदयों में परमेश्वर नहीं है, परमेश्वर के प्रति समर्पण और उससे प्रेम करने के लिए तैयार करना ही सच्ची विजय है। उसके कार्य के ऐसे नतीजे सबसे मूल्यवान और सबसे ठोस हैं। केवल यही महिमा प्राप्त करना है—यही वह महिमा है, जिसे परमेश्वर अंत के दिनों में प्राप्त करना चाहता है। बावजूद इसके कि ये लोग कम दर्जे के हैं, अब इनका ऐसे महान उद्धार को प्राप्त करने में सक्षम होना वास्तव में परमेश्वर द्वारा उन्नयन है। यह काम बहुत ही सार्थक है। मंशा न्याय के माध्यम से ही इन लोगों को प्राप्त करने की है—उन्हें दंडित करने की नहीं, बल्कि बचाने की है। यदि अंत के दिनों में, वह अभी भी इस्राएल में विजय का कार्य कर रहा होता, तो वह बेकार होता; यदि वह फलदायक भी होता, तो उसका कोई मूल्य या कोई बड़ा अर्थ न होता, और वह समस्त महिमा प्राप्त करने में सक्षम न होता। तुम लोगों पर कार्य करना उन लोगों पर कार्य करना है जो सबसे अंधकारमय स्थानों में गिर चुके हैं, जो सबसे अधिक पिछड़े हुए हैं। ये लोग यह नहीं मानते कि परमेश्वर है और वे कभी नहीं जान पाए हैं कि परमेश्वर है। इन सृजित प्राणियों को शैतान ने इस हद तक भ्रष्ट किया है कि वे परमेश्वर को भूल गए हैं। शैतान द्वारा अंधे बना दिए जाने के बाद, वे बिल्कुल नहीं जानते कि स्वर्ग में एक परमेश्वर है। अपने दिलों में तुम सब लोग मूर्तियों और शैतान की पूजा करते हो, क्या तुम सबसे अधम, सबसे पिछड़े लोग नहीं हो? तुम लोग देह का निम्नतम स्वरूप हो, किसी भी निजी स्वतंत्रता से विहीन और तुम लोग कष्टों से पीड़ित भी हो। तुम लोग इस समाज में सबसे निम्न स्तर पर भी हो, जिन्हें विश्वास की स्वतंत्रता तक नहीं है। तुम सब पर कार्य करने का यही अर्थ है। आज मोआब के तुम वंशजों पर कार्य करना जानबूझकर तुम लोगों को अपमानित करने के लिए नहीं है, बल्कि कार्य के अर्थ को प्रकट करने के लिए है। तुम लोगों के लिए यह एक महान उत्कर्ष है। अगर व्यक्ति में विवेक और अंतर्दृष्टि हो, तो वह कहेगा, “मैं मोआब का वंशज हूँ, आज परमेश्वर द्वारा ऐसा महान उत्कर्ष या ऐसे महान आशीष पाने के सचमुच अयोग्य हूँ। अपनी समस्त करनी और कथनी में, और अपनी हैसियत और मूल्य के अनुसार, मैं परमेश्वर से ऐसे महान आशीष पाने के बिल्कुल भी योग्य नहीं हूँ। इस्राएलियों को परमेश्वर से बहुत प्रेम है, और जिस अनुग्रह का वे आनंद उठाते हैं, वह उन्हें परमेश्वर द्वारा ही दिया जाता है, लेकिन उनकी हैसियत हमसे बहुत ऊँची है। अब्राहम यहोवा के प्रति बहुत निष्ठावान था और पतरस यीशु के प्रति बहुत निष्ठावान था—उनकी निष्ठा हमसे सौ गुना अधिक थी। और अपने कार्यों के आधार पर हम परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने के बिल्कुल अयोग्य हैं।” चीन में इन लोगों की सेवा परमेश्वर के सामने बिल्कुल नहीं लाई जा सकती। यह पूरी तरह से गड़बड़ है; अब तुम जो परमेश्वर के अनुग्रह का इतना आनंद लेते हो, तो वह केवल परमेश्वर का उत्कर्ष है! तुम लोगों ने कब परमेश्वर के कार्य को खोजा है? तुमने कब अपना जीवन परमेश्वर के लिए बलिदान किया है? तुमने कब अपने परिवार, अपने माता-पिता और अपने बच्चों का स्वेच्छा से त्याग किया है? तुममें से किसी ने भी कोई बड़ी कीमत नहीं चुकाई है! यदि पवित्र आत्मा तुम्हें बाहर नहीं लाता, तो तुममें से कितने सब कुछ बलिदान करने में सक्षम होते? तुमने आज तक केवल बल और दबाव के तहत अनुसरण किया है। तुम लोगों की निष्ठा कहाँ गई? तुम लोगों का समर्पण कहाँ गया? तुम्हारे कर्मों के आधार पर तुम्हें बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था—तुम लोगों का पूरी तरह सफाया होना चाहिए था। ऐसे महान आशीषों का आनंद लेने की तुम लोगों में क्या योग्यता है? तुम ज़रा भी योग्य नहीं हो! तुम लोगों में से किसने अपना स्वयं का मार्ग बनाया है? तुममें से किसने खुद सच्चा मार्ग खोजा है? तुम सभी आलसी और लोभी कमीने हो जो आराम में लिप्त रहते हैं! क्या तुम लोग समझते हो कि तुम महान हो? तुम लोगों के पास शेखी बघारने के लिए क्या है? इसे अनदेखा करने पर भी कि तुम लोग मोआब के वंशज हो, क्या तुम लोगों की प्रकृति या तुम लोगों के जन्मस्थान सबसे ऊँची किस्म के हैं? इसे अनदेखा करने पर भी कि तुम लोग मोआब के वंशज हो, क्या तुम सभी पूरी तरह से मोआब के पुत्र नहीं हो? क्या तथ्यों की सच्चाई बदली जा सकती है? क्या तुम लोगों की प्रकृति उजागर करने से अब तथ्यों की सच्चाई गलत तरीके से पेश हो जाती है? अपनी दासता, अपने जीवन और अपने चरित्र देखो—क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम मानवजाति में निम्नतम हो? तुम लोगों के पास क्या है, जिसकी तुम शेखी बघार सकते हो? समाज में अपने दर्जे को देखो। क्या तुम लोग उसके सबसे निचले स्तर पर नहीं हो? क्या तुम लोगों को लगता है कि मैंने गलत कहा है? अब्राहम ने इसहाक का त्याग किया—तुम लोगों ने किस चीज का त्याग किया है? अय्यूब ने सब कुछ त्याग दिया—तुमने क्या त्याग किया है? सच्चा मार्ग तलाशने के क्रम में बहुत सारे लोगों ने खुद का त्याग दिया है, अपना जीवन कुर्बान किया है और अपना खून बहाया है। क्या तुम लोगों ने वह कीमत चुकाई है? उनकी तुलना में तुम लोग इस महान अनुग्रह का आनंद लेने के बिल्कुल भी योग्य नहीं हो। तो क्या आज यह कहना तुम्हारे साथ अन्याय करना है कि तुम लोग मोआब के वंशज हो? तुम लोग खुद को बहुत ऊँचा मत समझो। तुम्हारे पास शेखी बघारने के लिए कुछ नहीं है। ऐसा महान उद्धार, ऐसा महान अनुग्रह तुम लोगों को मुफ्त में प्रदान किया जा रहा है। तुम लोगों ने कुछ भी अर्पित नहीं किया है, फिर भी तुम अनुग्रह का मुफ्त आनंद उठा रहे हो। क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती? क्या यह सच्चा मार्ग तुम लोगों ने स्वयं खोजा और पाया था? क्या पवित्र आत्मा ने तुम लोगों को इसे स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं किया? तुम लोगों के पास कभी भी एक खोजने वाला दिल नहीं था, सत्य की खोज करने वाला और उसकी लालसा रखने वाला दिल तो बिल्कुल भी नहीं था। तुम बस बैठे-बिठाए इसका आनंद ले रहे हो; तुमने इन सत्यों को ज़रा भी प्रयास किए बिना पाया है। तुम्हें शिकायत करने का क्या अधिकार है? क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा मोल सबसे बड़ा है? उन लोगों की तुलना में, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित किया और अपना रक्त बहाया, तुम लोगों के पास शिकायत करने को क्या है? अब तुम लोगों को नष्ट करना सही और स्वाभाविक होगा! समर्पण करने और अनुसरण करने के अलावा तुम लोगों के पास कोई अन्य विकल्प नहीं है—तुम लोग इसके योग्य नहीं हो! तुम्हारे बीच में से अधिकतर लोगों को बुलाया गया था, लेकिन अगर तुम्हारी परिस्थिति ने तुम्हें मजबूर नहीं किया होता या अगर तुम्हें बुलाया नहीं गया होता, तो तुम लोग बाहर आने के लिए पूरी तरह से अनिच्छुक होते। ऐसा त्याग करने के लिए कौन तैयार है? देह का सुख छोड़ने के लिए कौन तैयार है? तुम सब वे लोग हो जो आराम में लिप्त रहते हैं और एक विलासी जीवन की चाह रखते हैं! तुम लोगों को इतने बड़े आशीष मिल गए हैं—तुम्हें और क्या कहना है? तुम्हें क्या शिकायतें हैं? तुम लोगों को स्वर्ग के सबसे बड़े आशीषों और सबसे बड़े अनुग्रह का आनंद लेने दिया गया है और जो कार्य पृथ्वी पर पहले कभी नहीं किया गया था, उसे आज तुम पर प्रकट किया गया है, क्या यह एक आशीष नहीं है? आज तुम्हें इतनी अधिक ताड़ना दी गई है, क्योंकि तुम लोगों ने परमेश्वर का विरोध किया है और उसके खिलाफ विद्रोह किया है। इस ताड़ना के कारण तुम लोगों ने परमेश्वर की दया और उसकी प्रेमपूर्ण दयालुता देखी है, और उससे भी अधिक तुमने उसकी धार्मिकता और पवित्रता देखी है। इस ताड़ना की वजह से और मानव की गंदगी के कारण, तुम लोगों ने परमेश्वर की महान शक्ति देखी है, और उसकी पवित्रता और महानता देखी है। क्या यह एक दुर्लभतम सत्य नहीं है? क्या यह एक अर्थपूर्ण जीवन नहीं है? परमेश्वर जो कार्य करता है, वह अर्थ से भरा है! अतः जितना निम्न तुम लोगों का स्थान है, उतना ही अधिक वह यह साबित करता है कि परमेश्वर ने तुम्हारा उत्कर्ष किया है, और उतना ही अधिक आज तुम लोगों पर उसके कार्य का महान मूल्य साबित होता है। यह बस एक अनमोल खजाना है, जो कहीं और नहीं पाया जा सकता! युगों तक किसी ने भी ऐसे महान उद्धार का आनंद नहीं लिया है। यह तथ्य कि तुम्हारी स्थिति निम्न है, यह दर्शाता है कि परमेश्वर का उद्धार कितना महान है, और यह दर्शाता है कि परमेश्वर मानवजाति के प्रति वफादार है—वह बचाता है, नष्ट नहीं करता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 186

जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह संसार का नहीं होता है और संसार का आनंद लेने के लिए वह देह नहीं बनता है। जहाँ कहीं भी उसका कार्य उसके स्वभाव को प्रकट करता है और सबसे अधिक सार्थक होता है, वह उसी स्थान पर जन्म लेता है, फिर चाहे वह भूमि पवित्र हो या गंदी। वह चाहे कहीं भी कार्य करे, वह पवित्र है। दुनिया में सारी चीजें उसके द्वारा बनाई गई थीं, बात बस इतनी है कि वे शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी हैं। लेकिन सभी चीजें अभी भी परमेश्वर की हैं; वे सभी चीजें उसके हाथों में हैं। वह अपनी पवित्रता प्रकट करने के लिए एक गंदी भूमि में आता है और वहाँ कार्य करता है; वह केवल अपने कार्य की खातिर ऐसा करता है, अर्थात् वह ऐसा कार्य करने के लिए अत्यधिक अपमान सहता है, केवल इस गंदी भूमि के लोगों को बचाने के लिए। यह गवाही की खातिर, पूरी मानवजाति की खातिर किया जाता है। ऐसा कार्य लोगों को जो दिखाता है वह है परमेश्वर की धार्मिकता और यह बेहतर ढंग से दिखा पाता है कि परमेश्वर सर्वोच्च है। उसकी महानता और सत्यनिष्ठा उन नीच लोगों के एक समूह के उद्धार में सटीक रूप से प्रकट होती हैं, जिनका अन्य लोग तिरस्कार करते हैं। एक गंदी भूमि में पैदा होना यह साबित नहीं करता कि वह निम्न है; यह तो बस सभी सृजित प्राणियों को उसकी महानता और मानवजाति के लिए उसका सच्चा प्यार देखने देता है। जितना अधिक वह ऐसा करता है, उतना ही अधिक यह मनुष्य के लिए उसके शुद्ध प्रेम, उसके दोषरहित प्रेम को प्रकट करता है। परमेश्वर पवित्र और धार्मिक है, भले ही वह एक गंदी भूमि में पैदा हुआ था और भले ही वह उन लोगों के साथ रहता है जो गंदगी से भरे हुए हैं, ठीक वैसे ही जैसे अनुग्रह के युग में यीशु पापियों के साथ रहता था। क्या उसके कार्य का हर अंश संपूर्ण मानवजाति के जीवित रहने की खातिर नहीं किया जाता? क्या यह सब इसीलिए नहीं है ताकि मानवजाति महान उद्धार प्राप्त कर सके? दो हजार साल पहले, वह अनेक वर्षों तक पापियों के साथ रहा। यह छुटकारे के वास्ते था। आज, वह घिनौने, निम्न लोगों के एक समूह के साथ रह रहा है। यह उद्धार के वास्ते है। क्या उसका सारा कार्य तुम मनुष्यों के लिए नहीं है? यदि मानवजाति को बचाने की बात न होती, तो वह एक चरनी में पैदा होने के बाद इतने वर्षों तक पापियों के साथ क्यों रहता और कष्ट सहता? और यदि मानवजाति को बचाने की बात न होती तो वह क्यों दूसरी बार देह में लौटता, क्यों इस भूमि पर जन्म लेता जहाँ दानव इकट्ठे होते हैं और क्यों इन लोगों के साथ रहता जो शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट किए गए हैं? क्या परमेश्वर निष्ठापूर्ण नहीं है? उसके कार्य का कौन-सा हिस्सा मानवजाति के लिए नहीं रहा है? कौन-सा हिस्सा तुम्हारी नियति के लिए नहीं रहा है? परमेश्वर पवित्र है—यह अपरिवर्तनीय है! वह गंदगी से अदूषित है, भले ही वह एक घिनौनी भूमि में आया है; इस सब का केवल यही अर्थ हो सकता है कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम अत्यंत निःस्वार्थ है और वह जो पीड़ा और अपमान सहता है वह अत्यंत महान है! क्या तुम लोग यह नहीं जानते कि वह तुम सभी के लिए, और तुम लोगों की नियति के लिए जो अपमान सहता है, वह कितना बड़ा है? वह बड़े लोगों या अमीर और शक्तिशाली परिवारों के पुत्रों को बचाने के बजाय विशेष रूप से उनको बचाता है, जो दीन-हीन हैं और नीची निगाह से देखे जाते हैं। क्या यह सब उसकी पवित्रता नहीं है? क्या यह सब उसकी धार्मिकता नहीं है? समस्त मानवजाति के अस्तित्व के लिए वह स्वेच्छा से एक घिनौनी भूमि में पैदा हुआ और उसने हर अपमान सहा। परमेश्वर बहुत वास्तविक है—वह कोई मिथ्या कार्य नहीं करता। क्या उसके कार्य का हर चरण इतने व्यावहारिक रूप से नहीं किया गया है? यद्यपि सब लोग उसकी निंदा करते हैं और कहते हैं कि वह पापियों के साथ मेज पर बैठता है, यद्यपि सब लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं और कहते हैं कि वह गंदगी के पुत्रों के साथ रहता है, कि वह सबसे अधम लोगों के साथ रहता है, फिर भी वह निस्वार्थ रूप से अपने आपको समर्पित करता है और फिर भी उसे मानवजाति के बीच इस तरह नकारा जाता है। क्या जो कष्ट वह सहता है, वह तुम लोगों के कष्टों से बड़ा नहीं है? क्या जो कार्य वह करता है, वह तुम लोगों द्वारा चुकाई गई कीमत से ज्यादा नहीं है? तुम लोग गंदे देश में पैदा हुए, फिर भी तुमने परमेश्वर की पवित्रता प्राप्त की है। तुम लोग उस देश में पैदा हुए, जहाँ राक्षस एकत्र होते हैं, फिर भी तुम्हें महान सुरक्षा प्राप्त हुई है। तुम्हारे पास विकल्प क्या है? तुम्हारी शिकायतें क्या हैं? क्या जो पीड़ा उसने सही है, वह तुम लोगों द्वारा सही गई पीड़ा से अधिक नहीं है? वह पृथ्वी पर आया है और उसने मानव-जगत के सुखों का कभी आनंद नहीं उठाया। वह ऐसी चीजों से घृणा करता है। परमेश्वर मनुष्य से भौतिक चीज़ें पाने के लिए पृथ्वी पर नहीं आया, न ही वह मनुष्य के भोजन, कपड़ों और गहनों का आनंद उठाने के लिए आया है। वह इन चीज़ों पर कोई ध्यान नहीं देता। वह धरती पर मनुष्य की खातिर दुःख उठाने के लिए आया, न कि सांसारिक ऐश्वर्य का आनंद उठाने के लिए। वह पीड़ित होने, काम करने और अपनी प्रबंधन योजना पूरी करने के लिए आया। उसने रहने के लिए किसी अच्छे स्थान को नहीं चुना, जैसे कि कोई दूतावास या महँगा होटल, उसकी सेवा में कई सेवक भी नहीं खड़े रहते हैं। तुम लोगों ने जो देखा है, क्या उससे तुम्हें पता नहीं चलता कि वह काम करने के लिए आया या सुख भोगने के लिए? क्या तुम लोगों की आँखें नहीं देखतीं? क्या उसने तुम लोगों पर पर्याप्त अनुग्रह नहीं किया है? यदि वह किसी आरामदायक स्थान पर पैदा हुआ होता, तो क्या वह महिमा पाने में सक्षम होता? क्या वह कार्य करने में सक्षम होता? क्या उसके ऐसा करने का कोई अर्थ होता? क्या वह मानवजाति को पूरी तरह से जीत पाता? क्या वह गंदगी की भूमि से लोगों को बचा सकता था? अपनी धारणाओं के अनुसार लोग पूछते हैं, “चूँकि परमेश्वर पवित्र है, तो वह हमारे इस गंदे स्थान में क्यों पैदा हुआ? तुम हम गंदे मनुष्यों से घृणा करते हो और हमारा तिरस्कार करते हो; तुम हमारे प्रतिरोध और विद्रोह से घृणा करते हो, तो तुम हमारे साथ क्यों रहते हो? तुम सर्वोच्च परमेश्वर हो। तुम कहीं भी पैदा हो सकते थे, तो तुम्हें इस गंदे देश में क्यों पैदा होना पड़ा? तुम प्रतिदिन हमारा न्याय करते हो और हमें ताड़ना देते हो, और तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि हम मोआब के वंशज हैं, तो फिर भी तुम हमारे बीच क्यों रहते हो? तुम मोआब के वंशजों के परिवार में क्यों पैदा हुए? तुमने ऐसा क्यों किया?” तुम लोगों के इस तरह के विचार पूर्णतः विवेकरहित हैं! केवल इसी तरह का कार्य लोगों को उसकी महानता, उसकी विनम्रता और उसकी अदृश्यता दिखाता है। वह अपने कार्य की खातिर सब कुछ बलिदान करने को तैयार है, और उसने समस्त कष्ट अपने कार्य के लिए सहे हैं। ऐसा वह मानव-जाति की खातिर करता है, और इससे भी बढ़कर, शैतान को जीतने के लिए करता है, और इसलिए करता है ताकि सभी सृजित प्राणी उसके प्रभुत्व के अंतर्गत समर्पण कर सकें। केवल यही सार्थक, मूल्यवान कार्य है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 187

जिस समय यीशु ने यहूदिया में कार्य किया था, तब उसने खुलकर ऐसा किया, परंतु अब, मैं तुम लोगों के बीच गुप्त रूप से काम करता और बोलता हूँ। अन्य-जातियाँ इस बात से पूरी तरह से अनजान हैं। तुम लोगों के बीच मेरा कार्य बाहर के लोगों के लिए बंद है। इन वचनों, इन ताड़नाओं और न्यायों को केवल तुम लोग ही जानते हो, और कोई नहीं। यह समस्त कार्य तुम लोगों के बीच ही किया जाता है और केवल तुम लोगों के लिए ही प्रकट किया जाता है; अन्य-जातियों में से कोई भी इसे नहीं जानता, क्योंकि अभी समय नहीं आया है। यहाँ ये लोग ताड़ना सहने के बाद पूर्ण किए जाने के समीप हैं, परंतु बाहर के लोग इस बारे में कुछ नहीं जानते। यह कार्य बहुत अधिक छिपा हुआ है! उनके लिए देहधारी परमेश्वर छिपा हुआ है, परंतु जो इस धारा में हैं, उनके लिए कहा जा सकता है कि वह खुला है। यद्यपि परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से सब-कुछ खुला है, सब-कुछ प्रकट है और सब-कुछ मुक्त है, लेकिन यह केवल उनके लिए सही है, जो उसमें विश्वास करते हैं; जहाँ तक शेष लोगों का, अन्य-जातियों का संबंध है, उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं करवाया जाता। वर्तमान में तुम लोगों में और चीन में जो कार्य किया जा रहा है, वह एकदम छिपाया हुआ है, ताकि उन्हें इसके बारे में पता न चले। यदि उन्हें इस कार्य का पता चल गया, तो वे सिवाय उसकी निंदा और उत्पीड़न के, कुछ नहीं करेंगे। वे उसमें विश्वास नहीं करेंगे। बड़े लाल अजगर के देश में, इस सबसे अधिक पिछड़े इलाके में, कार्य करना कोई आसान बात नहीं है। यदि इस कार्य को खुले तौर पर किया जाता, तो इसे जारी रखना असंभव होता। कार्य का यह चरण इस स्थान में किया ही नहीं जा सकता। यदि इस कार्य को खुले तौर पर किया जाता, तो वे इसे कैसे आगे बढ़ने दे सकते थे? क्या यह कार्य को और अधिक जोखिम में नहीं डाल देता? यदि इस कार्य को छिपाया नहीं जाता, बल्कि यीशु के समय के समान ही किया जाता, जब उसने असाधारण ढंग से बीमारों को चंगा किया और राक्षसों को निकाला था, तो क्या इसे बहुत पहले ही दानवों द्वारा “पकड़” नहीं लिया गया होता? क्या वे परमेश्वर के अस्तित्व को बरदाश्त कर पाते? यदि मैं अभी मनुष्य को उपदेश और व्याख्यान देने के लिए उपासना-गृहों में प्रवेश करता, तो क्या मुझे बहुत पहले ही टुकड़े-टुकड़े नहीं कर दिया गया होता? और यदि ऐसा होता, तो मेरा कार्य कैसे जारी रह पाता? चिह्न और चमत्कार खुले तौर पर बिल्कुल भी प्रकट न करना, यह सब छिपाने के लिए ही है। इसलिए, अन्य-जातियों को मेरा कार्य दिख नहीं सकता, वे इसे जान या खोज नहीं सकते। यदि कार्य के इस चरण को अनुग्रह के युग में यीशु के तरीके से ही किया जाता, तो यह उतना सुस्थिर नहीं हो सकता था, जितना अब है। इसलिए, इस तरह गुप्त रूप से कार्य करना तुम लोगों के लिए और सारे कार्य के लिए लाभकारी है। जब पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा, अर्थात् जब यह गुप्त कार्य पूरा हो जाएगा, तब कार्य का यह चरण एक झटके से प्रकट हो जाएगा। सब जान जाएँगे कि चीन में विजेताओं का एक समूह है; सब जान जाएँगे कि परमेश्वर ने चीन में देहधारण किया और उसका कार्य समाप्ति पर आ गया है। केवल तभी मनुष्य को इसका एहसास होगा : ऐसा क्यों है कि चीन का अभी ह्रास या पतन दिखना बाकी है? इससे पता चलता है कि परमेश्वर ने चीन में व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य किया है और उसने लोगों के एक समूह को विजेताओं के रूप में पूर्ण बना दिया है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (2)

पिछला: परमेश्वर के कार्य को जानना

अगला: परमेश्वर के कार्य को जानना II

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें