परमेश्वर के कार्य को जानना II
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 188
परमेश्वर के विश्वासी होने के नाते तुममें से प्रत्येक को समझना चाहिए कि आज परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को ग्रहण करके और उसकी योजना के उस सारे कार्य को ग्रहण करके जो वह तुम पर करता है, तुम वास्तव में अधिकतम उत्कर्ष और उद्धार प्राप्त कर चुके हो। परमेश्वर ने ब्रह्माण्ड में अपने कार्य का सम्पूर्ण ध्यान लोगों के इस समूह पर रखा है। उसने तुम लोगों के लिए अपने हृदय का सारा रक्त अर्पित कर दिया है; वह ब्रह्माण्ड में आत्मा का समस्त कार्य वापस ले चुका है और तुम लोगों को दे चुका है। इसी कारण से तुम लोग सौभाग्यशाली हो। इतना ही नहीं, वह अपनी महिमा इस्राएल, अपने चुने हुए लोगों से हटाकर तुम लोगों के ऊपर ले आया है और वह इस समूह के माध्यम से अपनी योजना का उद्देश्य पूर्ण रूप से प्रत्यक्ष करेगा। इसलिए तुम लोग ही वे हो जो परमेश्वर की विरासत प्राप्त करोगे और इससे भी अधिक, तुम परमेश्वर की महिमा के वारिस हो। तुम सब लोगों को शायद ये वचन स्मरण हों : “क्योंकि हमारा पल भर का हल्का-सा क्लेश हमारे लिए कहीं अधिक और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।” तुम सब लोगों ने पहले भी ये वचन सुने हैं, किंतु तुममें से किसी ने भी उनका सच्चा अर्थ नहीं समझा। आज तुम उनके वास्तविक अर्थ से गहराई से अवगत हो। ये वचन परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों के दौरान पूरे किए जाएँगे और वे उन लोगों में पूरे किए जाएँगे जिन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक उत्पीड़ित किया गया है, उस देश में जहाँ वह कुण्डली मारकर बैठा है। बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसीलिए इस देश में लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने के कारण अपमान और उत्पीड़न सहना पड़ता है और परिणामस्वरूप ये वचन तुम लोगों में, लोगों के इस समूह में पूरे होते हैं। चूँकि परमेश्वर अपना कार्य उस देश में कार्यान्वित करता है जो परमेश्वर का विरोध करता है, इसलिए उसका संपूर्ण कार्य प्रचंड बाधाओं का सामना करता है और उसके बहुत-से वचन तुरंत पूरे नहीं हो सकते हैं; इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप लोग शोधित किए जाते हैं, जो पीड़ा सहने का हिस्सा भी है। परमेश्वर के लिए बड़े लाल अजगर के देश में अपना कार्य कार्यान्वित करना अत्यंत कठिन है, परंतु इसी कठिनाई के माध्यम से परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण करता है, ताकि वह अपनी बुद्धि और अपने अद्भुत कर्मों को प्रकट कर सके और परमेश्वर इस अवसर का उपयोग लोगों के इस समूह को पूर्ण करने के लिए करता है। लोगों की पीड़ा के माध्यम से, उनकी काबिलियत के माध्यम से और इस गंदे देश के लोगों के समस्त शैतानी स्वभावों के माध्यम से ही परमेश्वर शुद्धिकरण और विजय का अपना कार्य करता है, ताकि इससे वह महिमा प्राप्त कर सके और उन लोगों को प्राप्त कर सके जो उसके कर्मों की गवाही देते हैं। परमेश्वर ने इस समूह के लोगों के लिए जो समस्त कीमत चुकाई है, उसका सम्पूर्ण अर्थ यही है। अर्थात्, परमेश्वर विजय का कार्य उन्हीं लोगों के माध्यम से करता है जो उसका विरोध करते हैं, और केवल इसी प्रकार परमेश्वर की महान सामर्थ्य प्रकट हो सकती है। दूसरे शब्दों में, गंदे देश के लोग ही परमेश्वर की महिमा को विरासत में पाने के योग्य हैं, और केवल यही परमेश्वर की महान सामर्थ्य को उभारकर सामने ला सकता है। इसी कारण गंदे देश से ही, और गंदे देश में रहने वालों से ही परमेश्वर महिमा प्राप्त करता है—परमेश्वर का ऐसा ही इरादा है। यह बिल्कुल यीशु के कार्य के चरण जैसा है : वह केवल उन्हीं फरीसियों के बीच महिमा प्राप्त कर सकता था जिन्होंने उसे सताया था; यदि फरीसियों द्वारा किया गया उत्पीड़न और यहूदा द्वारा दिया गया धोखा नहीं होता, तो यीशु का उपहास नहीं उड़ाया जाता या उसे लांछित नहीं किया जाता, सलीब पर तो और भी नहीं चढ़ाया जाता, और उसे कभी महिमा प्राप्त नहीं हो सकती थी। जहाँ परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य करता है, और जहाँ वह देह में कार्य करता है वहीं वह महिमा प्राप्त करता है और वहीं वह उन्हें प्राप्त करता है जिन्हें वह प्राप्त करना चाहता है। यही परमेश्वर के कार्य की योजना है और यही उसका प्रबंधन है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 189
परमेश्वर की कई हज़ार वर्षों की योजना में, कार्य के दो भाग देह में किए गए हैं : पहला है सलीब पर चढ़ाए जाने का कार्य, जिसके लिए वह महिमा प्राप्त करता है; दूसरा है अंत के दिनों में विजय और पूर्णता का कार्य, जिसके लिए वह महिमा प्राप्त करता है। यही परमेश्वर का प्रबंधन है। इसलिए परमेश्वर के कार्य, या तुम लोगों को दिए गए परमेश्वर के आदेश को सीधी-सादी बात मत समझो। तुम सभी लोग परमेश्वर की कहीं अधिक असाधारण और अनंत महत्व की महिमा के वारिस हो, और यह परमेश्वर द्वारा विशेष रूप से निश्चित किया गया था। उसकी महिमा के दो भागों में से एक तुम लोगों में अभिव्यक्त किया जाता है; परमेश्वर की महिमा का एक समूचा भाग तुम लोगों को प्रदान किया गया है, ताकि यह तुम लोगों की विरासत हो सके। यही परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उत्कर्ष है, और यह वह योजना भी है जो उसने बहुत पहले पूर्वनिर्धारित कर दी थी। जहाँ बड़ा लाल अजगर रहता है उस देश में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य की महानता को देखते हुए, यदि यह कार्य कहीं और ले जाया जाता, तो यह बहुत पहले अत्यंत फलदायी हो गया होता और मनुष्य द्वारा तत्परता से स्वीकार कर लिया जाता। यही नहीं, परमेश्वर में विश्वास करने वाले पश्चिम के पादरियों के लिए इस कार्य को स्वीकार कर पाना अत्यंत आसान होता, क्योंकि यीशु के कार्य का चरण एक मिसाल का काम करता है। यही कारण है कि परमेश्वर महिमा पाने के कार्य का यह चरण कहीं और पूरा कर पाने में असमर्थ है; जब कार्य का लोगों द्वारा समर्थन किया जाता है और उसे राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त होती है तो परमेश्वर की महिमा स्थापित होने के लिए कोई जगह नहीं होती है। इस देश में कार्य के इस चरण का यही असाधारण महत्व है। तुम लोगों के बीच एक भी व्यक्ति नहीं है जो कानून द्वारा सुरक्षित है—बल्कि तुम कानून द्वारा दंडित किए जाते हो। इससे भी अधिक कठिनाई यह है कि लोग तुम लोगों को समझते नहीं हैं : चाहे वे तुम्हारे रिश्तेदार हों, तुम्हारे माता-पिता, तुम्हारे मित्र या तुम्हारे सहकर्मी हों, उनमें से कोई भी तुम लोगों को समझता नहीं है। जब परमेश्वर द्वारा तुम लोगों को “त्याग दिया” जाता है, तब तुम लोगों के लिए इस दुनिया में जीते रह पाना असंभव हो जाता है, किंतु फिर भी, लोग परमेश्वर से दूर होना अभी भी सहन नहीं कर सकते हैं। यही परमेश्वर द्वारा लोगों पर विजय प्राप्त करने का महत्व है और यही परमेश्वर की महिमा है। तुम लोगों ने आज के दिन जो विरासत पाई है वह युग-युगांतर से प्रेरितों और नबियों की विरासत से भी बढ़कर है और यहाँ तक कि मूसा और पतरस की विरासत से भी अधिक है। आशीष एक या दो दिन में प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं; उन्हें एक बड़ी कीमत पर अर्जित किया जाना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है, तुम लोगों के पास वह प्रेम होना ही चाहिए जिसका शोधन हो चुका है, तुममें अत्यधिक आस्था होनी ही चाहिए, और तुम्हारे पास वे बहुत-से सत्य होने ही चाहिए जो परमेश्वर माँग करता है कि तुम प्राप्त करो; इससे भी बढ़कर, तुम्हें बिना भयभीत हुए या पीछे हटे न्याय की ओर मुड़ने में समर्थ होना चाहिए और ऐसा परमेश्वर-प्रेमी हृदय रखना चाहिए जो मृत्युपर्यंत स्थिर हो। तुम लोगों में संकल्प होना ही चाहिए, तुम लोगों के जीवन स्वभाव जरूर बदलने चाहिए; तुम लोगों की भ्रष्टता की चंगाई होनी ही चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के सारे आयोजन बिना शिकायत स्वीकार करने ही चाहिए, और यहाँ तक कि मृत्युपर्यंत समर्पण करने में भी समर्थ होना चाहिए। यही तुम्हें हासिल करना है, यही परमेश्वर के कार्य का अंतिम लक्ष्य है और यही अपेक्षा परमेश्वर लोगों के इस समूह से करता है। चूँकि वह तुम लोगों को देता है, इसलिए वह बदले में तुम लोगों से निश्चय ही माँगेगा, और निश्चय ही तुमसे उचित माँगें रखेगा। इसलिए, परमेश्वर द्वारा किए गए समस्त कार्य के पीछे एक कारण होता है। इससे यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर बार-बार ऐसा कार्य क्यों करता है जो इतने उच्च मानक स्थापित करता और कड़ी अपेक्षाएँ करता है। इसलिए, तुम लोगों को परमेश्वर में आस्था से ओतप्रोत होना चाहिए। संक्षेप में, परमेश्वर का समूचा कार्य तुम लोगों के लिए किया जाता है, यह इसलिए किया जाता है ताकि तुम लोग उसकी विरासत पाने के योग्य बन सको। यह कहने के बजाय कि यह परमेश्वर की अपनी महिमा के लिए है, यह कहना बेहतर होगा कि यह तुम लोगों के उद्धार के लिए है और इस समूह के लोगों को पूर्ण बनाने के लिए है जो गंदे देश में अत्यंत पीड़ित हैं। तुम लोगों को परमेश्वर का इरादा समझना चाहिए। और इसलिए, मैं बहुत-से ऐसे अज्ञानी लोगों को नसीहत देता हूँ जिनमें न कोई अंतर्दृष्टि है न विवेक : परमेश्वर की परीक्षा मत लो, तथा अब और प्रतिरोध मत करो। परमेश्वर पहले ही ऐसी सारी पीड़ा से गुजर चुका है जो मनुष्य ने कभी नहीं सही है और वह बहुत पहले मनुष्य के बदले और भी अधिक अपमान सह चुका है। तो फिर ऐसा क्या है जिसे तुम छोड़ नहीं सकते? परमेश्वर के इरादे से अधिक महत्वपूर्ण और क्या हो सकता है? परमेश्वर के प्रेम से बढ़कर और क्या हो सकता है? परमेश्वर के लिए इस गंदे देश में कार्य करना पहले से ही काफी कठिन है; उस पर यदि मनुष्य जानबूझकर और सोच-समझकर गलत काम करता है, तो परमेश्वर का कार्य और लंबा खींचना पड़ेगा। संक्षेप में, यह किसी के हित में नहीं है, और इसमें किसी का लाभ नहीं है। परमेश्वर समय से बंधा नहीं है; उसका कार्य और उसकी महिमा सबसे पहले आते हैं। इसलिए, जब तक कोई चीज उसके कार्य का हिस्सा है तो वह उसके लिए कोई भी कीमत चुकाएगा, चाहे इसमें जितना भी समय लगे। यह परमेश्वर का स्वभाव है : वह तब तक विश्राम नहीं करेगा जब तक उसका कार्य पूरा नहीं हो जाता है। उसका कार्य तभी समाप्त होगा जब वह अपनी महिमा का दूसरा भाग प्राप्त कर लेता है। समस्त ब्रह्माण्ड में यदि परमेश्वर महिमा पाने के कार्य का दूसरा भाग पूरा नहीं कर पाता है, तो उसका दिन कभी नहीं आएगा, उसका हाथ अपने चुने हुए लोगों पर से कभी नहीं हटेगा, उसकी महिमा इस्राएल पर कभी नहीं उतरेगी, और उसकी योजना कभी समाप्त नहीं होगी। तुम लोगों को परमेश्वर का इरादा देखने में सक्षम होना चाहिए और तुम्हें देखना चाहिए कि परमेश्वर का कार्य स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों के सृजन जितना सरल नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आज का कार्य उन लोगों का रूपांतरण करना है जो भ्रष्ट किए जा चुके हैं, जो बेहद सुन्न हैं, यह उन्हें शुद्ध करने के लिए है जो सृजित किए गए थे किंतु शैतान द्वारा संसाधित किए गए थे। यह आदम और हव्वा का सृजन नहीं है, यह प्रकाश का सृजन, या प्रत्येक पौधे और पशु का सृजन तो और भी नहीं है। परमेश्वर शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दी गई चीजों को शुद्ध करता है और फिर उन्हें नए सिरे से प्राप्त करता है, उन्हें ऐसी चीजें बनाता है, जो उसकी होती हैं और उन्हें अपनी महिमा बनाता है। यह स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों के सृजन जितना आसान नहीं है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है, न ही यह शैतान को अथाह कुंड में जाने का शाप देने के कार्य जैसा है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है। बल्कि, यह मनुष्य का कायापलट करने का कार्य है, उन चीजों को जो नकारात्मक हैं, और उसकी नहीं हैं, ऐसी चीजों में बदलने का कार्य है जो सकारात्मक हैं और उसकी हैं। परमेश्वर के कार्य के इस चरण के पीछे की यही वास्तविक कहानी है। तुम लोगों को यह समझना ही चाहिए, और विषयों को अत्यधिक सरलीकृत करने से बचना चाहिए। परमेश्वर का कार्य किसी भी साधारण कार्य के समान नहीं है। इसकी अद्भुतता और बुद्धि मनुष्य की सोच से परे हैं। परमेश्वर कार्य के इस चरण के दौरान सभी चीजों का सृजन नहीं करता है, किंतु वह उन्हें नष्ट भी नहीं करता है। इसके बजाय, वह अपनी सृजित की गई सभी चीजों का कायापलट करता है, और शैतान द्वारा दूषित कर दी गई सभी चीजों को शुद्ध करता है। और इस प्रकार, परमेश्वर एक महान उद्यम आरंभ करता है। यही परमेश्वर के कार्य का संपूर्ण महत्व है। क्या इन वचनों में तुम यह देखते हो कि परमेश्वर का कार्य सचमुच इतना सीधा-सरल है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 190
परमेश्वर के 6,000 वर्षों के प्रबंधन कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है : व्यवस्था का युग, अनुग्रह का युग और राज्य का युग। कार्य के ये तीनों चरण मानव-जाति के उद्धार के वास्ते हैं, अर्थात् ये उस मानव-जाति के उद्धार के लिए हैं, जिसे शैतान द्वारा बुरी तरह से भ्रष्ट कर दिया गया है। किंतु, साथ ही, परमेश्वर शैतान के साथ युद्ध भी कर रहा है। इस प्रकार, जैसे उद्धार के कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है, ठीक वैसे ही शैतान के साथ युद्ध को भी तीन चरणों में बाँटा जाता है, और परमेश्वर के कार्य के ये दो पहलू एक-साथ संचालित किए जाते हैं। शैतान के साथ युद्ध वास्तव में मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है, और चूँकि मानव-जाति के उद्धार का कार्य कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे एक ही चरण में सफलतापूर्वक पूरा किया जा सकता हो, इसलिए शैतान के साथ युद्ध को भी चरणों और अवधियों में बाँटा जाता है, और मनुष्य की आवश्यकताओं और मनुष्य में शैतान की भ्रष्टता की सीमा के अनुसार शैतान के साथ युद्ध छेड़ा जाता है। कदाचित् मनुष्य अपनी कल्पना में यह विश्वास करता है कि इस युद्ध में परमेश्वर शैतान के विरुद्ध शस्त्र उठाएगा, वैसे ही, जैसे दो सेनाएँ आपस में लड़ती हैं। मनुष्य की बुद्धि मात्र यही कल्पना करने में सक्षम है; यह अत्यधिक अस्पष्ट और अवास्तविक सोच है, फिर भी मनुष्य यही विश्वास करता है। और चूँकि मैं यहाँ कहता हूँ कि मनुष्य के उद्धार का साधन शैतान के साथ युद्ध करने के माध्यम से है, इसलिए मनुष्य कल्पना करता है और मानता है कि युद्ध इसी तरह से संचालित किया जाता है। मनुष्य के उद्धार के कार्य के तीन चरण हैं, जिसका तात्पर्य है कि शैतान के साथ युद्ध को तीन चरणों में विभाजित किया गया है और इस प्रकार शैतान को हमेशा के लिए पराजित कर दिया जाएगा। किंतु शैतान के साथ युद्ध के समस्त कार्य की वास्तविक कहानी यह है कि इसके परिणाम कार्य के अनेक चरणों में हासिल किए जाते हैं : मनुष्य को अनुग्रह प्रदान करना, मनुष्य के लिए पाप-बलि बनना, मनुष्य के पापों को क्षमा करना, मनुष्य पर विजय पाना और मनुष्य को पूर्ण बनाना। सरल शब्दों में कहें तो शैतान के साथ युद्ध करना उसके विरुद्ध हथियार उठाना नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को बचाने के जरिए परमेश्वर की गवाही देना है, मनुष्य के जीवन में कार्य करना है और मनुष्य के स्वभाव को बदलना है और इस तरह शैतान को पराजित करना है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने के माध्यम से शैतान को पराजित किया जाता है। जब शैतान को पराजित कर दिया जाएगा, अर्थात् जब मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा, तो अपमानित शैतान पूरी तरह से बंधन में डाल दिया जाएगा, और इस प्रकार मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। इस प्रकार, मनुष्य के उद्धार का सार शैतान के विरुद्ध युद्ध है और यह युद्ध मुख्य रूप से मनुष्य के उद्धार में प्रतिबिंबित होता है। अंत के दिनों का चरण, जिसमें मनुष्य को जीता जाना है, शैतान के साथ युद्ध में कार्य का अंतिम चरण है, और यह शैतान की सत्ता से मनुष्य के संपूर्ण उद्धार का कार्य भी है। मनुष्य पर विजय का आंतरिक अर्थ मनुष्य पर विजय पाने के बाद शैतान के मूर्त रूप—मनुष्य, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है—का अपने जीते जाने के बाद सृष्टिकर्ता के पास वापस लौटना है, जिसके माध्यम से वह शैतान से विद्रोह कर पूरी तरह से परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा। इस तरह मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। इसलिए, विजय का कार्य शैतान के विरुद्ध युद्ध में अंतिम कार्य है, और यह परमेश्वर के प्रबंधन में अंतिम चरण है जो शैतान को पराजित करने के लिए है। इस कार्य के बिना मनुष्य का संपूर्ण उद्धार अंततः असंभव होगा, शैतान की संपूर्ण पराजय भी असंभव होगी, और मानव-जाति कभी भी अपनी अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करने या शैतान के प्रभाव से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं होगी। इसलिए, शैतान के साथ युद्ध की समाप्ति से पहले मनुष्य के उद्धार का कार्य समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य का केंद्रीय भाग मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है। सबसे आरंभ में मानव-जाति परमेश्वर के हाथों में थी, किंतु शैतान के प्रलोभन और भ्रष्टता की वजह से, मनुष्य को शैतान द्वारा बाँध लिया गया और वह इस दुष्ट के हाथों में पड़ गया। इस प्रकार, परमेश्वर के प्रबंधन कार्य में शैतान पराजित किए जाने का लक्ष्य बन गया। चूँकि शैतान ने मनुष्य पर कब्ज़ा कर लिया था, और चूँकि मनुष्य परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन की पूँजी है, इसलिए यदि मनुष्य को बचाया जाना है, तो उसे शैतान के हाथों से वापस लेना होगा, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य को, जिसे शैतान द्वारा बंदी बना लिया गया है, वापस लेना होगा। इस प्रकार, शैतान को मनुष्य के पुराने स्वभाव में बदलावों और मनुष्य के मूल विवेक को पुनर्स्थापित करने के माध्यम से पराजित किया जाना चाहिए। इस तरह से बंदी बना लिए गए मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस लिया जा सकता है। यदि मनुष्य शैतान के प्रभाव और बंधन से मुक्त हो जाता है, तो शैतान शर्मिंदा हो जाएगा, मनुष्य को अंततः वापस ले लिया जाएगा, और शैतान को हरा दिया जाएगा। और चूँकि मनुष्य को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त किया जा चुका है, इसलिए एक बार जब यह युद्ध समाप्त हो जाएगा, तो मनुष्य इस संपूर्ण युद्ध में जीत के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ लाभ बन जाएगा, और शैतान वह लक्ष्य बन जाएगा जिसे दंडित किया जाएगा, जिसके पश्चात् मानव-जाति के उद्धार का संपूर्ण कार्य पूरा कर लिया जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 191
परमेश्वर ने चीन में, या हांगकांग और ताइवान के हमवतनों के शब्दों में कहें तो “मुख्यभूमि में” देहधारण किया है। जब परमेश्वर ऊपर से पृथ्वी पर आया, तो स्वर्ग में और पृथ्वी पर कोई इसके बारे में नहीं जानता था, क्योंकि यही एक गुप्त स्थिति में परमेश्वर के लौटने का वास्तविक अर्थ है। वह लंबे समय से कार्य कर रहा है और देह में रह रहा है, फिर भी इसके बारे में कोई नहीं जानता। यहाँ तक कि आज भी इसे कोई नहीं पहचानता। शायद यह एक शाश्वत पहेली बनी रहेगी। इस बार परमेश्वर का देह में आना कुछ ऐसा है जिसके बारे में कोई मनुष्य नहीं जान सकता। पवित्रात्मा का कार्य चाहे कितने भी बड़े पैमाने का और प्रभावशाली हो, परमेश्वर हमेशा शांत बना रहता है, अपने बारे में कभी कुछ नहीं बताता। कोई कह सकता है कि उसके कार्य का यह चरण ऐसा है, मानो स्वर्ग के क्षेत्र में हो रहा हो। यद्यपि यह हर उस व्यक्ति को बिल्कुल स्पष्ट है, जिसके पास देखने के लिए आँखें हैं, किंतु कोई इसे नहीं पहचानता। जब परमेश्वर अपने कार्य के इस चरण को समाप्त कर लेगा, तो हर मनुष्य अपने लंबे सपने से जाग जाएगा और अपना सामान्य रवैया छोड़ देगा।[1] मुझे याद है, परमेश्वर ने एक बार कहा था, “इस बार देह में आना बाघ की माँद में गिरने जैसा है।” इसका अर्थ यह है कि चूँकि इस बार के परमेश्वर के कार्य में परमेश्वर देह में आता है और इतना ही नहीं, बड़े लाल अजगर के निवास-स्थान में पैदा होता है, इसलिए पहले से भी ज्यादा वह इस बार धरती पर आकर अत्यधिक खतरे का सामना करता है। वह चाकुओं, बंदूकों, लाठियों और डंडों का सामना करता है; वह परीक्षाओं का सामना करता है; वह हत्या के इरादे से भरे चेहरों वाली भीड़ का सामना करता है। वह किसी भी समय मारे जाने का जोख़िम उठाता है। परमेश्वर अपने साथ कोप लेकर आया। किंतु वह पूर्णता का कार्य करने के लिए आया, जिसका अर्थ है कि वह कार्य का दूसरा भाग करने के लिए आया, जो छुटकारे के कार्य के बाद जारी रहता है। अपने कार्य के इस चरण के वास्ते, परमेश्वर ने अत्यधिक विचार किया है और सावधानी बरती है और परीक्षाओं के हमलों से बचने के लिए हर संभव उपाय कर रहा है, विनम्र और गुप्त रहता है और कभी अपनी पहचान का दिखावा नहीं करता। जब यीशु ने सलीब से मनुष्य को बचाया, तब उसने ऐसा सिर्फ छुटकारे का कार्य पूरा करने के लिए किया था; वह पूर्णता का कार्य करने नहीं आया था। इस प्रकार परमेश्वर का केवल आधा कार्य ही किया गया था, छुटकारे का कार्य पूरा करना उसकी संपूर्ण योजना का केवल आधा भाग ही था। जब नया युग शुरू और पुराना युग समाप्त होने वाला था, तभी परमपिता परमेश्वर ने अपने कार्य के दूसरे हिस्से पर विचार करना शुरू किया और उसके लिए तैयारी करनी शुरू कर दी। अंत के दिनों में इस देहधारण की भविष्यवाणी अतीत में स्पष्ट रूप से नहीं की गई थी, जिससे इस बार परमेश्वर के देह में आने को लेकर अधिक गोपनीयता की नींव रखी गई। भोर के समय, सभी लोगों की जानकारी में आए बिना परमेश्वर पृथ्वी पर आया और देह में अपना जीवन शुरू कर दिया। लोग इस क्षण के आगमन से अनभिज्ञ थे। कदाचित वे सब घोर निद्रा में थे, कदाचित बहुत-से लोग जो सतर्कतापूर्वक जागे हुए थे, प्रतीक्षा कर रहे थे, और कदाचित कई लोग स्वर्ग के परमेश्वर से चुपचाप प्रार्थना कर रहे थे। किंतु इन सभी अनेक लोगों के बीच, एक भी व्यक्ति नहीं जानता था कि परमेश्वर पहले ही पृथ्वी पर आ चुका है। परमेश्वर ने ऐसा इसलिए किया, ताकि वह अपना कार्य अधिक सुचारु रूप से कर सके और बेहतर नतीजे हासिल कर सके, और साथ ही, और अधिक परीक्षाओं को पहले से रोक सके। जब मनुष्य की वसंत की नींद टूटेगी, तो परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही समाप्त हो गया होगा और वह पृथ्वी पर भ्रमण और अस्थायी निवास का अपना जीवन पूरा करके चला जाएगा। चूँकि परमेश्वर के कार्य के लिए परमेश्वर का व्यक्तिगत रूप से कार्य करना और बोलना आवश्यक है, और चूँकि उसमें मनुष्य के हस्तक्षेप करने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए परमेश्वर ने स्वयं कार्य करने हेतु पृथ्वी पर आने के लिए अत्यधिक पीड़ा सही है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य के लिए उसका स्थान लेने में असमर्थ है। इसलिए परमेश्वर ने पृथ्वी पर अपना स्वयं का कार्य करने, अपनी समस्त सोच और देखरेख भरपूर इस्तेमाल करने, दरिद्र लोगों के इस समूह को, गोबर के ढेर में पड़े लोगों के इस समूह को छुटकारा दिलाने के लिए और उस स्थान पर आने के लिए जहाँ बड़ा लाल अजगर निवास करता है, अनुग्रह के युग के खतरों की अपेक्षा कई हजार गुना बड़े खतरे उठाने का जोखिम लिया है। यद्यपि कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में नहीं जानता, फिर भी परमेश्वर परेशान नहीं है, क्योंकि इससे परमेश्वर के कार्य में बहुत लाभ मिलता है। हर कोई परम नृशंस और शातिर है; इसलिए वे परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे बरदाश्त कर सकते हैं? इसी कारण, पृथ्वी पर आकर परमेश्वर हमेशा चुप रहता है। मनुष्य चाहे कितना भी क्रूर हो, फिर भी परमेश्वर उनमें से किसी को भी दिल पर नहीं लेता, बल्कि उस कार्य को करता रहता है जिसे करने की उसे आवश्यकता है, ताकि उस बड़े कार्यभार को पूरा कर सके, जो स्वर्गिक पिता ने उसे सौंपा है। तुम लोगों में से किसने परमेश्वर की मनोरमता को पहचाना है? कौन परमपिता परमेश्वर के भार के प्रति उसके पुत्र से अधिक विचारशीलता दर्शाता है? कौन परमपिता परमेश्वर की इच्छा को समझने में सक्षम है? स्वर्ग में परमपिता परमेश्वर का आत्मा अक्सर चिंतित रहता है, और पृथ्वी पर उसका पुत्र परमपिता परमेश्वर की इच्छा की खातिर बारंबार प्रार्थना करता है, जिससे उसका हृदय चिंता से टुकड़े-टुकड़े हो जाता है। क्या कोई है, जो परमपिता परमेश्वर के अपने बेटे के लिए प्यार को जानता हो? क्या कोई है, जो जानता हो कि कैसे प्यारा पुत्र परमपिता परमेश्वर को याद करता है? स्वर्ग और पृथ्वी के बीच दुविधा में फँसकर, दोनों दूर से लगातार एक-दूसरे को निहार रहे हैं, आत्मा में एक-दूसरे का अनुसरण कर रहे हैं। हे मानवजाति! तू परमेश्वर के हृदय के प्रति कब विचारशील होगी? तू कब परमेश्वर के इरादे को समझेगी? पिता और पुत्र हमेशा एक-दूसरे पर निर्भर रहे हैं। फिर क्यों उन्हें पृथक किया जाना चाहिए, एक ऊपर स्वर्ग में और एक नीचे पृथ्वी पर? पिता अपने पुत्र में उतना ही अनुरक्त है, जितना पुत्र अपने पिता से प्यार करता है। फिर क्यों पिता को इतनी गहरी और दर्दनाक उत्कंठा के साथ पुत्र की प्रतीक्षा करनी चाहिए? भले ही वे लंबे समय से पृथक न हुए हों, फिर भी किसे पता है कि कितने दिनों और रातों से पिता दर्दभरे उद्वेग से तड़प रहा है, और कितने लंबे समय से वह अपने प्रिय पुत्र की त्वरित वापसी के लिए प्रतीक्षा कर रहा है? वह देखता रहता है, मौन होकर बैठा रहता है और प्रतीक्षा करता रहता है; सब कुछ उसके प्रिय पुत्र की शीघ्र वापसी के लिए किया जाता है। उसका पुत्र पृथ्वी के छोरों तक भटक चुका है : वे कब फिर एक-दूसरे से मिलेंगे? भले ही पुनः मिलने के बाद वे अनंत काल तक साथ रहेंगे, किंतु वह हजारों दिनों और रातों के अलगाव को कैसे सहन कर सकता है, एक ऊपर स्वर्ग में और दूसरा नीचे पृथ्वी पर? पृथ्वी के दशक स्वर्ग में सहस्त्राब्दियों जैसे लगते हैं। कैसे परमपिता परमेश्वर चिंता न करे? जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह मानव-जगत के अनगिनत उतार-चढ़ावों का वैसे ही अनुभव करता है, जैसे मनुष्य करता है। परमेश्वर निर्दोष है, फिर क्यों उसे वही दर्द सहना पड़े, जो आदमी सहता है? कोई आश्चर्य नहीं कि परमपिता परमेश्वर अपने पुत्र के लिए इतना अधिक लालायित रहता है; परमेश्वर के हृदय को कौन समझ सकता है? परमेश्वर मनुष्य को बहुत अधिक देता है; कैसे मनुष्य परमेश्वर के हृदय का पर्याप्त रूप से प्रतिदान कर सकता है? फिर भी मनुष्य परमेश्वर को बहुत कम देता है; ऐसे में भला परमेश्वर चिंता क्यों नहीं करेगा?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (4)
फुटनोट :
1. “अपना सामान्य रवैया छोड़ देगा” इस बात को संदर्भित करता है कि एक बार परमेश्वर को जान लेने पर उसके बारे में लोगों की धारणाएँ और विचार किस तरह बदल जाते हैं।
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 192
मनुष्यों में से शायद ही कोई परमेश्वर की मनोदशा की अत्यावश्यकता को समझता है, क्योंकि मनुष्यों की काबिलियत बहुत खराब और उनकी आत्मा काफी सुन्न है, और वे सब न तो परवाह करते हैं और न ही ध्यान देते हैं कि परमेश्वर क्या कर रहा है। इसलिए परमेश्वर मनुष्य के बारे में लगातार व्यग्र रहता है, मानो मनुष्य की पाशविक प्रकृति किसी भी क्षण बाहर आ सकती हो। इससे व्यक्ति और भी ज्यादा स्पष्टता से देख सकता है कि परमेश्वर के पृथ्वी पर आने के बाद मनुष्य द्वारा उसकी भारी परीक्षा ली जाती है। किंतु लोगों के एक समूह को पूर्ण करने के वास्ते, महिमा से पूरी तरह भरे हुए परमेश्वर ने मनुष्य से कुछ भी न छिपाते हुए उसे अपने हर इरादे के बारे में बता दिया। उसने लोगों के इस समूह को पूर्ण करने के लिए दृढ़ता से संकल्प किया है, और इसलिए चाहे उसका सामना कठिनाई से हो या परीक्षाओं से, वह नज़र फेर लेता है और इस सबको अनदेखा करता है। वह केवल चुपचाप अपना कार्य करता है और दृढ़ता से विश्वास करता है कि एक दिन जब परमेश्वर महिमा प्राप्त कर लेगा, तो मनुष्य उसे जान लेगा, और वह यह भी विश्वास करता है कि जब मनुष्य परमेश्वर द्वारा पूर्ण कर दिया जाएगा, तो वह परमेश्वर के हृदय को पूरी तरह से समझ जाएगा। वर्तमान में ऐसे लोग हो सकते हैं जो परमेश्वर की परीक्षा ले रहे होंगे या उसे गलत समझ रहे होंगे या उसके खिलाफ शिकायत कर रहे होंगे; परमेश्वर इनमें से किसी को भी दिल पर नहीं लेता। जब परमेश्वर महिमा में उतरेगा, तो सभी लोग समझ जाएँगे कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है, मानव-जाति की खुशी के लिए करता है, और वे सब समझ जाएँगे कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है, इसलिए करता है ताकि मानव-जाति बेहतर ढंग से जी सके। परमेश्वर के आगमन के बाद मनुष्य उसकी परीक्षा लेता है और उसका आगमन प्रताप और कोप के साथ होता है। जिस समय परमेश्वर मनुष्य को छोड़कर जाएगा, उसने बहुत पहले ही महिमा प्राप्त कर ली होगी और वह पूरी तरह महिमा से भरा हुआ और लौटने की खुशी के साथ विदा होगा। लोग चाहे पृथ्वी पर कार्य करने वाले परमेश्वर को कैसे भी नकारें, वह इसे दिल पर नहीं लेता और बस अपना कार्य करता रहता है। परमेश्वर द्वारा विश्व का सृजन लाखों-करोड़ों वर्ष पहले किया गया था। वह पृथ्वी पर एक असीमित मात्रा में कार्य करने के लिए आया है, और उसने मानव-जगत की अस्वीकृति और बदनामी का पूरी तरह से अनुभव किया है। परमेश्वर के आगमन का कोई स्वागत नहीं करता; उसके साथ सिर्फ उदासीनता से व्यवहार किया जाता है। इन हजारों वर्षों की कठिनाइयों के दौरान, मनुष्य के आचरण ने बहुत पहले ही परमेश्वर को बहुत गहरा घाव दिया है। वह अब मनुष्य के विद्रोह पर ध्यान नहीं देता, बल्कि इसके बजाय उसने मनुष्य को रूपांतरित और शुद्ध करने के लिए एक अलग योजना बनाई है। उपहास, निंदा, उत्पीड़न, क्लेश, सलीब पर चढ़ने की पीड़ा, मनुष्य द्वारा बहिष्कार, आदि वे चीज़ें हैं, जिनका परमेश्वर ने देह में आने के बाद से सामना किया है : परमेश्वर ने इन चीज़ों का खूब स्वाद चखा है। देह में आए परमेश्वर ने मानव-जगत की कठिनाइयों को पूरी तरह सहा है। स्वर्ग के परमपिता परमेश्वर के आत्मा ने बहुत समय पहले ही जान लिया था कि ये दृश्य असहनीय हैं और अपना सिर ऊपर उठाकर और आँखें मूँदकर वह अपने प्यारे पुत्र की वापसी का इंतजार करता है। वह केवल इतना ही चाहता है कि मानवजाति सुनेगी और समर्पण करेगी, उसकी देह के आगे अत्यधिक शर्मिंदगी महसूस करेगी और उसके खिलाफ विद्रोह करना बंद करेगी। वह केवल इतना ही चाहता है कि मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करने में सक्षम हो। उसने बहुत समय पहले ही मनुष्य से अधिक माँगें करनी बंद कर दी हैं, क्योंकि परमेश्वर ने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है, फिर भी मनुष्य निश्चिंत है[1] और परमेश्वर के कार्य को ज़रा भी गंभीरता से नहीं लेता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (4)
फुटनोट :
1. “निश्चिंत है” का अर्थ है कि लोग परमेश्वर के कार्य के बारे में बेपरवाह हैं और उसे उतना महत्वपूर्ण नहीं समझते।
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 193
जब, अनुग्रह के युग में, परमेश्वर तीसरे स्वर्ग में लौटा, तो समस्त मानव-जाति के छुटकारे का परमेश्वर का कार्य वास्तव में पहले ही अपने अंतिम भाग में पहुँच गया था। धरती पर जो कुछ शेष रह गया था, वह था सलीब जिसे यीशु ने अपनी पीठ पर ढोया था, बारीक सन का कपड़ा जिसमें यीशु को लपेटा गया था, और काँटों का मुकुट और लाल रंग का लबादा जो यीशु ने पहना था (ये वे वस्तुएँ थीं, जिनसे यहूदियों ने उसका मज़ाक उड़ाया था)। अर्थात्, यीशु के सलीब पर चढ़ने के कार्य से अत्यधिक सनसनी उत्पन्न होने के बाद, चीजें फिर से शांत हो गईं। तब से यीशु के शिष्यों ने हर जगह कलीसियाओं में चरवाही और सिंचन करते हुए उसके कार्य को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। उनके कार्य की विषयवस्तु यह थी : उन्होंने सभी लोगों से पश्चात्ताप करने, अपने पाप स्वीकार करने और बपतिस्मा लेने के लिए कहा; और सभी प्रेरितों ने यीशु के सलीब पर चढ़ने की असली कहानी और असली परिस्थितियों को फैलाया, और इसलिए हर कोई अपने पाप स्वीकार करने के लिए स्वयं को यीशु के सामने दंडवत होने से नहीं रोक पाया; और इसके अलावा प्रेरितों ने हर जगह जाकर यीशु द्वारा बोले गए वचनों का प्रचार किया। उस क्षण से अनुग्रह के युग में कलीसियाओं का निर्माण होना शुरू हुआ। उस युग में यीशु ने जो किया, वह मनुष्य के जीवन और स्वर्गिक पिता के इरादों के बारे में बात करना भी था, लेकिन चूँकि वह एक अलग युग था, इसलिए उनमें से कई उक्तियाँ और अभ्यास आज की उक्तियों और अभ्यासों से बहुत भिन्न थे। किंतु दोनों का सार एक ही है : दोनों हूबहू और यथार्थतः देह में परमेश्वर के आत्मा के कार्य हैं। इस प्रकार का कार्य और कथन आज के दिन तक जारी है, और यही कारण है कि आज भी धार्मिक जगत में इसी प्रकार की चीजों को साझा किया जाता है, और यह सर्वथा अपरिवर्तित है। जब यीशु का कार्य संपन्न हो गया और कलीसियाएँ पहले ही यीशु मसीह के सही मार्ग पर आ चुकी थीं, तब भी परमेश्वर ने अपने कार्य के एक अन्य चरण के लिए अपनी योजना शुरू कर दी, जो कि अंत के दिनों में उसके देह बनने का मामला था। जैसा कि मनुष्य इसे देखता है, परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने ने परमेश्वर के देहधारण के कार्य को पहले ही संपन्न कर दिया था, समस्त मानव-जाति को छुटकारा दिला दिया था, और परमेश्वर को रसातल की चाबी थामने में समर्थ बनाया। हर कोई सोचता है कि परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से निष्पादित हो चुका है। वस्तुतः, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, उसके कार्य का केवल एक छोटा-सा हिस्सा ही निष्पादित हुआ है। उसने मानवजाति को केवल छुटकारा दिलाया था; उसने मानवजाति को जीता नहीं था, मनुष्य की शैतानी कुरूपता को बदलने की बात तो छोड़ ही दो। इसीलिए परमेश्वर कहता है, “यद्यपि मेरे द्वारा धारित देह मृत्यु की पीड़ा से गुज़री, किंतु वह मेरे देहधारण का संपूर्ण लक्ष्य नहीं था। यीशु मेरा प्यारा पुत्र है और उसे मेरे लिए सलीब पर चढ़ा दिया गया, किंतु उसने मेरे कार्य का पूरी तरह से समापन नहीं किया। उसने केवल उसका एक अंश पूरा किया।” इस प्रकार परमेश्वर ने देहधारण के कार्य को जारी रखने के लिए योजनाओं के दूसरे चक्र की शुरुआत की। परमेश्वर का अंतिम इरादा शैतान के पंजों से बचाए गए हर व्यक्ति को पूर्ण बनाना और प्राप्त करना था, यही वजह है कि परमेश्वर एक बार फिर देह में आने का खतरा उठाने के लिए तैयार हो गया। “देहधारण” से तात्पर्य है, महिमा के बिना आना (क्योंकि परमेश्वर का कार्य अभी तक समाप्त नहीं हुआ है), बल्कि प्यारे पुत्र की, मसीह की पहचान में प्रकट होना, जिससे परमेश्वर बहुत प्रसन्न है। यही कारण है कि इसे “खतरा उठाना” कहा जाता है। देहधारी शरीर कमजोर सामर्थ्य वाला है और उसे अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए,[1] और उसका सामर्थ्य स्वर्गिक पिता के अधिकार से एकदम अलग है; वह अन्य कार्य में शामिल हुए बिना परमपिता परमेश्वर का कार्य और आज्ञा पूरी करता हुआ, केवल देह की सेवकाई पूरी करता है, और वह केवल कार्य के एक हिस्से को पूरा करता है। यही कारण है कि परमेश्वर के पृथ्वी पर आते ही उसे “मसीह” बुलाया गया—यह इस नाम का सन्निहित अर्थ है। आगमन परीक्षा के साथ होता है, यह कहे जाने का कारण यह है कि कार्य का केवल एक हिस्सा पूरा किया जा रहा है। इसके अलावा, परमपिता परमेश्वर द्वारा उसे केवल “मसीह” और “प्यारा पुत्र” कहा जाता है, लेकिन उसने उसे संपूर्ण महिमा नहीं दी है, ऐसा सटीक रूप से इसलिए है कि देहधारी केवल कार्य का एक हिस्सा करने के लिए आता है, स्वर्ग के परमपिता का प्रतिनिधित्व करने के लिए नहीं, बल्कि प्यारे पुत्र की सेवकाई पूरी करने के लिए। जब प्यारा पुत्र अपने कंधे पर उठाए गए समस्त कार्यभार को पूरा कर लेता है, तो परमपिता उसे परमपिता की पहचान के साथ-साथ पूर्ण महिमा भी देता है। कहा जा सकता है कि यह “स्वर्ग की संहिता” है। चूँकि वह, जो देह में आया है, और स्वर्ग का परमपिता, दो अलग-अलग लोकों में हैं, दोनों आत्मा में एक-दूसरे को केवल निहारते हैं, परमपिता प्रिय पुत्र पर नज़र रखता है, किंतु पुत्र दूर से परमपिता को देखने में असमर्थ है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि देह जो प्रकार्य करने में सक्षम है, वे बहुत छोटे हैं और उसे किसी भी क्षण मार दिए जाने की संभावना है, और यह आगमन बड़े ख़तरे से भरा है। यह परमेश्वर द्वारा अपने प्रिय पुत्र को एक बार फिर शेर के मुँह में, जहाँ उसका जीवन ख़तरे में है, छोड़ने जैसा है, उसे ऐसी जगह छोड़ने के बराबर है जहाँ शैतान सबसे अधिक केंद्रित है। इन विकट स्थितियों में भी परमेश्वर ने अपने प्रिय पुत्र को एक गंदगी और व्यभिचार से भरे स्थान के लोगों को उसे “वयस्कता की अवस्था में लाने” के लिए सौंप दिया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यही एक तरीका है जिससे परमेश्वर का कार्य उपयुक्त और स्वाभाविक प्रतीत हो सकता है, और यही एक तरीका है जिससे परमपिता परमेश्वर की सभी इच्छाएँ पूरी की जा सकती हैं और मानवजाति के बीच उसके कार्य के अंतिम हिस्से को पूरा किया जा सकता है। यीशु ने परमपिता परमेश्वर के कार्य का एक चरण निष्पादित करने से अधिक कुछ नहीं किया। देहधारी शरीर द्वारा लगाए गए अवरोध और पूरा किए जाने वाले कार्य में भिन्नताओं की वजह से यीशु स्वयं नहीं जानता था कि देह में एक दूसरा आगमन भी होगा। इसलिए बाइबल के किसी प्रतिपादक या नबी ने स्पष्ट रूप से यह भविष्यवाणी करने का साहस नहीं किया कि परमेश्वर अंत के दिनों में पुनः देहधारी होगा, अर्थात् वह देह में अपने कार्य के दूसरे हिस्से को करने के लिए फिर से देह में आएगा। इसलिए, किसी को पता नहीं चला कि परमेश्वर पहले ही लंबे समय से स्वयं को देह में छिपाए हुए था। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि यीशु ने पुनर्जीवित और स्वर्गारोहित होने के बाद ही इस कार्यभार को स्वीकार किया था, इसलिए परमेश्वर के दूसरे देहधारण के बारे में कोई स्पष्ट भविष्यवाणी नहीं है, और मानव-मस्तिष्क के लिए इस पर विचार कर पाना कठिन है। बाइबल की भविष्यवाणी की अनेक किताबों में ऐसा कोई भी वचन नहीं है, जो इसका स्पष्टता से उल्लेख करता हो। किंतु जब यीशु काम करने आया था, तो एक स्पष्ट भविष्यवाणी पहले से मौजूद थी, जिसमें कहा गया था कि एक कुँआरी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी, अर्थात् वह पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आया था। इसके बावजूद, परमेश्वर ने तब भी कहा कि यह मृत्यु के जोख़िम पर हुआ, तो आज यह मामला कितना अधिक जोखिम भरा होगा? इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर कहता है कि इस देहधारण में खतरों का जोखिम अनुग्रह के युग के खतरों से हजारों गुना अधिक है। बहुत-सी जगहों पर परमेश्वर ने भविष्यवाणी की है कि वह विजेताओं के एक समूह को सीनियों के देश में प्राप्त कर रहा होगा—वह जगह दुनिया के पूर्व में है जहाँ विजेताओं को प्राप्त किया जाना है। इस प्रकार परमेश्वर अपने दूसरे देहधारण में जहाँ कदम रखता है, वह बिना किसी संदेह के सीनियों का देश है, ठीक वह स्थान जहाँ बड़ा लाल अजगर कुंडली मारे पड़ा है। वहाँ परमेश्वर बड़े लाल अजगर के वंशजों को प्राप्त करेगा, ताकि वह पूर्णतः पराजित और शर्मिंदा हो जाए। परमेश्वर पीड़ा के बोझ से अत्यधिक दबे इन लोगों को जगाने जा रहा है, जब तक कि वे पूरी तरह से जाग नहीं जाते, वह उन्हें कोहरे से बाहर निकालेगा, और उनसे बड़े लाल अजगर को अस्वीकार करवाएगा। वे अपने सपने से जागेंगे, बड़े लाल अजगर के सार को जानेंगे, परमेश्वर को अपना संपूर्ण हृदय देने में सक्षम होंगे, अन्धकार की शक्तियों के दमन के बीच उठ खड़े होंगे, दुनिया के पूर्व में खड़े होंगे और परमेश्वर की विजय का प्रमाण बनेंगे। केवल इसी तरीके से परमेश्वर महिमा प्राप्त करेगा। केवल इसी कारण से परमेश्वर इस्राएल में समाप्त हुए कार्य को उस देश में लाया, जहाँ बड़ा लाल अजगर कुंडली मारे पड़ा है, और प्रस्थान करने के लगभग दो हजार वर्ष बाद वह अनुग्रह के युग के कार्य को जारी रखने के लिए पुनः देह में आया है। मनुष्य की नग्न आँखों को लग रहा है कि परमेश्वर देह में नए कार्य का शुभारंभ कर रहा है। किंतु परमेश्वर की दृष्टि से, वह अनुग्रह के युग के कार्य को जारी रख रहा है, पर केवल कुछ हजार वर्षों के अंतराल के बाद, और अपने कार्य के स्थान तथा कार्यक्रम में बदलाव के साथ। यद्यपि आज के कार्य में धारित देह की छवि यीशु से सर्वथा भिन्न है, फिर भी वे एक ही सार और मूल से उत्पन्न हुए हैं, और वे एक ही स्रोत से आते हैं। उनके बाहरी आवरण कई मायनों में भिन्न हो सकते हैं लेकिन उनके कार्य की वास्तविक कहानी पूरी तरह से समान है। आख़िरकार उनके युगों में रात और दिन का अंतर है। तो फिर परमेश्वर के कार्य का स्वरूप अपरिवर्तित कैसे रह सकता है? या उसके कार्य के विभिन्न चरण एक-दूसरे के आड़े कैसे आ सकते हैं?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (6)
फुटनोट :
1. “कमजोर सामर्थ्य वाला है और उसे अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए” संकेत करता है कि देह की कठिनाइयाँ बहुत अधिक हैं और किया गया कार्य बहुत-सीमित।
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 194
मानव को आज तक का समय लग गया है यह समझ पाने में कि उसमें केवल उसके आध्यात्मिक जीवन का प्रावधान और परमेश्वर को जानने के अनुभव का ही अभाव नहीं है, बल्कि—इससे भी अधिक महत्वपूर्ण—उसके स्वभाव में परिवर्तन का अभाव है। अपनी ही जाति के इतिहास और प्राचीन संस्कृति के बारे में मनुष्य की पूर्ण अज्ञानता के कारण वह परमेश्वर के कार्य के बारे में बिल्कुल भी नहीं जानता। सभी लोग आशा करते हैं कि वे अपने दिलों की गहराई में परमेश्वर से जुड़े रह सकें लेकिन चूँकि उनकी देह अत्यधिक भ्रष्ट है और वे सुन्न और मंदबुद्धि दोनों हैं इसलिए वे परमेश्वर के बारे में बिल्कुल कुछ नहीं जानते हैं। आज मनुष्यों के बीच आने का परमेश्वर का प्रयोजन और कुछ नहीं, बल्कि विचारों और आत्माओं, और साथ ही उनके दिलों में मौजूद परमेश्वर की छवि को भी बदलना है, जो लोगों ने लाखों वर्षों से बना रखी है। वह इस अवसर का इस्तेमाल मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करेगा। अर्थात्, वह मनुष्यों के ज्ञान के माध्यम से, उसके बारे में लोगों की समझ और उसके प्रति उनके रवैये को बदल देगा, उन्हें परमेश्वर को जानने में हमेशा से कहीं अधिक पूरी तरह से नई और मजबूत शुरुआत करने में सक्षम बनाएगा, और इस प्रकार मनुष्य के हृदय का नवीकरण और रूपांतरण हासिल करेगा। काट-छाँट और अनुशासन साधन हैं, जबकि विजय और नवीकरण लक्ष्य हैं। मनुष्य ने एक अज्ञात परमेश्वर के बारे में जो अंधविश्वासी विचार बना रखे हैं, उन्हें दूर करना हमेशा से परमेश्वर का इरादा रहा है, और हाल ही में यह उसके लिए एक तात्कालिक आवश्यकता का मुद्दा भी बन गया है। काश, सभी लोग इस स्थिति पर विचार करने में दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य अपनाएँ। जिस तरीके से प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता है, उसे बदलो, ताकि परमेश्वर का यह अत्यावश्यक इरादा जल्दी फलित हो सके और पृथ्वी पर परमेश्वर के काम का अंतिम चरण उत्तमता से संपन्न हो सके। परमेश्वर को वह लगन दो, जिसे देना तुम लोगों का दायित्व है, और अंतिम बार परमेश्वर के दिल को सुकून दो। तुम भाई-बहनों में से कोई भी इससे जी न चुराए या केवल अनमने ढंग से काम न करे। परमेश्वर ने इस बार निमंत्रण के उत्तर में और मनुष्य की मनोदशा की स्पष्ट प्रतिक्रिया के तौर पर देहधारण किया है। अर्थात्, वह मनुष्य को वह चीज़ प्रदान करने आया है, जिसकी उसे ज़रूरत है। चाहे किसी की काबिलियत या संस्कार कैसे भी हों, वह हर व्यक्ति को परमेश्वर के वचन को देखने में और अपने वचन से यह देखने में समर्थ बनाएगा कि परमेश्वर का अस्तित्व है और वह प्रकट हुआ है, तथा परमेश्वर द्वारा उसे पूर्ण बनाए जाने को स्वीकार करने देगा, और ऐसा करके वह मनुष्य के विचारों और धारणाओं को बदल देगा, जिससे कि परमेश्वर का मूल चेहरा मनुष्य के दिल में गहरी जड़ें जमा लेगा। यह पृथ्वी पर परमेश्वर की एकमात्र इच्छा है। मनुष्य की जन्मजात प्रकृति चाहे कितनी ही सशक्त हो, या मनुष्य का सत्व चाहे कितना भी खराब हो, या अतीत में मनुष्य का व्यवहार चाहे वास्तव में कैसा भी रहा हो, परमेश्वर इन बातों पर कोई ध्यान नहीं देता। परमेश्वर केवल यह उम्मीद करता है कि मनुष्य अपने हृदय में मौजूद परमेश्वर की छवि को पूरी तरह से नया बना सके और मानवजाति के सत्व को जान सके, और इस तरह मनुष्य के वैचारिक दृष्टिकोण में परिवर्तन आ सके और वह परमेश्वर के लिए गहराई से लालायित हो सके तथा उसके प्रति एक शाश्वत लगाव जगा सके : यही एक अपेक्षा है, जो परमेश्वर मनुष्य से करता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (7)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 195
मैंने कई बार कहा है कि परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा को परिवर्तित करने, उसकी रूह को बदलने के लिए इस प्रकार किया जाता है कि बहुत बड़ा आघात सह चुके उसके दिल को छूकर रूपांतरित किया जा सके और इस प्रकार उसकी उस आत्मा को बचाया जा सके जिसे पाप द्वारा अत्यंत गंभीर रूप से हानि पहुँचाई गई है; इसका उद्देश्य लोगों की आत्मा को जगाना है, उनके उदासीन दिलों को पिघलाना है और उनका कायाकल्प होने देना है। यही परमेश्वर का सबसे बड़ा इरादा है। मनुष्य का जीवन और उसके अनुभव कितने ऊँचे या गहरे हैं, इसकी बात करना छोड़ दो; जब लोगों के हृदय जाग्रत कर दिए जाएँगे, जब उन्हें उनके सपनों से जगा दिया जाएगा और वे बड़े लाल अजगर द्वारा पहुँचाई गई हानि से पूरी तरह से अवगत हो जाएँगे, तो परमेश्वर की सेवकाई का काम पूरा हो जाएगा। परमेश्वर का कार्य पूरा होने का दिन वह दिन भी है जब मनुष्य आधिकारिक तौर पर परमेश्वर पर विश्वास की सही राह पर चलना शुरू करेगा। इस समय, परमेश्वर की सेवकाई समाप्त हो चुकी होगी : देहधारी परमेश्वर का कार्य पूरी तरह समाप्त हो चुका होगा, और मनुष्य आधिकारिक तौर पर उस कर्तव्य को निभाना शुरू कर देगा, जो उसे निभाना चाहिए—वह अपनी सेवकाई का कार्य करेगा। ये परमेश्वर के कार्य के कदम हैं। इस प्रकार, तुम लोगों को इन बातों की जानकारी की नींव पर अपने प्रवेश का मार्ग खोजना चाहिए। यह सब तुम लोगों को समझना चाहिए। मनुष्य के प्रवेश में तभी सुधार आएगा, जब परिवर्तन उसके दिल की गहराई में होंगे, क्योंकि परमेश्वर का कार्य राक्षसों के एकत्र होने के इस स्थान से मनुष्य का पूर्ण उद्धार करना है—जिसे छुड़ा लिया गया है, जो अभी भी अंधकार की शक्तियों के अधीन रहता है, और जो कभी जागा नहीं है; ऐसा इसलिए ताकि मनुष्य हज़ारों साल के पापों से मुक्त होकर परमेश्वर का चहेता बन सके, बड़े लाल अजगर को मारकर परमेश्वर का राज्य स्थापित करे और जल्दी ही परमेश्वर के दिल को आराम पहुँचाए; ऐसा इसलिए है ताकि तुम अपने सीने में भरी घृणा को बिना अड़चन के निकाल सको, उन फफूंदग्रस्त रोगाणुओं का उन्मूलन कर सको, तुम लोग इस जीवन को छोड़ सको जो एक बैल या घोड़े के जीवन से कुछ अलग नहीं है, अब दास बनकर न रहो, बड़े लाल अजगर द्वारा आसानी से कुचले न जाओ या उसके द्वारा तुम्हें आज्ञा न दी जाए; तुम लोग अब इस असफल राष्ट्र का हिस्सा नहीं रहोगे, तुम अब घृणित बड़े लाल अजगर के नहीं रहोगे, और तुम अब उसके दास नहीं रहोगे। परमेश्वर द्वारा निश्चित रूप से राक्षसों के घरौंदों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएँगे, तुम लोग परमेश्वर के साथ खड़े होंगे—तुम लोग परमेश्वर के हो, दासों के इस साम्राज्य के नहीं हो। परमेश्वर लंबे समय से इस अंधेरे समाज से अत्यधिक घृणा करता आया है। वह इस दुष्ट, घिनौने बूढ़े सर्प पर अपने पैर रखने के लिए अपने दांत पीसता है, ताकि वह फिर से कभी उठ न पाए और फिर कभी मनुष्य के साथ दुर्व्यवहार न कर पाए; वह उसके अतीत के दुष्कर्मों को क्षमा नहीं करेगा, वह उसके द्वारा मनुष्य को दिए गए धोखे को बर्दाश्त नहीं करेगा और वह विभिन्न युगों में उसके द्वारा किए गए हर पाप का हिसाब चुकता करेगा। परमेश्वर समस्त बुराइयों के सरगना[1] को जरा भी नहीं छोड़ेगा, वह इसे पूरी तरह से इसे नष्ट कर देगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (8)
फुटनोट :
1. “समस्त बुराइयों के सरगना” बूढ़े शैतान को संदर्भित करता है। यह वाक्यांश चरम नफरत व्यक्त करता है।
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 196
मानवजाति के लिए कार्य करने की खातिर परमेश्वर ने कई रातें बिना सोए गुजारी हैं। वह उच्चतम स्थान से लेकर अनंत गहराई तक जीते-जागते नरक में, जहाँ मनुष्य रहता है, वहाँ पृथ्वी के दोनों छोरों के बीच मनुष्य के साथ अपने दिन गुजारने के लिए उतर आया है, फिर भी उसने कभी मनुष्य के बीच पसरी मलिनता की शिकायत नहीं की है, मनुष्य के विद्रोहीपन के लिए कभी भी उसे फटकारा नहीं है, बल्कि वह स्वयं अपना कार्य करते हुए अत्यधिक अपमान सहन करता है। परमेश्वर नरक का कैसे हो सकता है? वह नरक में अपना जीवन कैसे बिता सकता है? लेकिन समस्त मानवजाति के लिए, ताकि पूरी मानवजाति को जल्द ही विश्राम मिल सके, उसने अपमान सहा है और पृथ्वी पर आने में अन्याय झेला है, और मनुष्य को बचाने की खातिर स्वयं “नरक” और “रसातल” में, बाघ की माँद में प्रवेश किया है। मनुष्य परमेश्वर का विरोध करने योग्य कैसे हो सकता है? परमेश्वर से शिकायत करने का उसके पास क्या कारण है? वह परमेश्वर के सामने जाने की हिम्मत कैसे कर सकता है? स्वर्ग का परमेश्वर व्यभिचार की इस सबसे घिनौनी भूमि में आया है, और कभी भी उसने अपनी शिकायतें जाहिर नहीं की, न ही मनुष्य के बारे में शिकायत की, बल्कि वह चुपचाप मनुष्य द्वारा कुचले जाने[1] और उसके अत्याचार को स्वीकार करता है। उसने कभी मनुष्य की अनुचित माँगों का प्रतिकार नहीं किया है, कभी भी उसने मनुष्य से अत्यधिक अपेक्षाएँ नहीं की हैं, और कभी भी उसने मनुष्य से अनुचित माँगें नहीं की हैं; वह, तमाम कठिनाइयाँ झेलते हुए और बिना शिकायत किए, बस मनुष्य की जरूरत के सभी कार्य करता है : शिक्षा देना, प्रबुद्ध करना, फटकारना, वचनों के माध्यम से शोधन करना, याद दिलाना, प्रोत्साहन देना, सांत्वना देना, न्याय करना और उजागर करना। उसका कौन-सा कदम मनुष्य के जीवन की खातिर नहीं है? यद्यपि उसने मनुष्यों की संभावनाओं और नियति को हटा दिया है, फिर भी परमेश्वर द्वारा उठाया गया कौन-सा कदम मनुष्य के भाग्य के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम मनुष्य के अस्तित्व के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम मनुष्य को इस कष्ट से और अँधेरी शक्तियों के अत्याचार से मुक्त कराने के लिए नहीं रहा है, जो इतनी काली हैं जितनी कि रात? उनमें से कौन-सा कदम मनुष्य की खातिर नहीं है? परमेश्वर के हृदय को, जो ममतामयी माँ के हृदय जैसा है, कौन समझ सकता है? परमेश्वर के उत्सुक हृदय को कौन समझ सकता है? परमेश्वर के उत्साही हृदय और उसकी उत्साही आशाओं का प्रतिफल बर्फीले दिलों से, ठंडी और उदासीन आँखों से, मनुष्य द्वारा बार-बार की फटकार और अपमान से दिया गया है; उनका प्रतिफल तीखी टिप्पणियों, कटाक्ष और हिकारत से दिया गया है; उनका प्रतिफल मनुष्य द्वारा उपहास करके, कुचलकर और नकारकर, अपनी गलतफहमियों, शिकायत, मनो-मालिन्य टालमटोल और धोखे, हमले और कड़वाहट से ही दिया गया है। गर्मजोशी से भरे शब्दों को तनी हुई भौंहों और इनकार में हिलती हजारों उँगलियों की ठंडी अवज्ञा मिली है। किंतु परमेश्वर सिर झुकाए नत-मस्तक बैल की तरह लोगों की सेवा करने की पीड़ा सहन कर सकता है।[2] कितनी बार सूर्य और चंद्रमा आए और गए, कितनी ही बार उसने सितारों का सामना किया है, कितनी ही बार वह भोर में निकला और गोधूलि में लौटा है, कितनी ही बार उसने अपने पिता के वियोग की तुलना में हजार गुना ज्यादा पीड़ा सहते हुए, मनुष्य के हमले और तोड़-फोड़ बर्दाश्त करते हुए, और मनुष्य की काट-छाँट करते हुए बेचैनी से करवटें बदलीं हैं। मनुष्य ने परमेश्वर की विनम्रता और अदृश्यता का प्रतिफल अपने पूर्वाग्रह[3] से, अनुचित विचारों और अनुचित व्यवहार से चुकाया है, और परमेश्वर के गुमनामी में कार्य करने के निश्शब्द तरीके, उसके धैर्य और सहनशीलता की चुकौती मनुष्य की लालचभरी निगाह से की गई है; मनुष्य परमेश्वर को बिना तरस खाए घसीटकर मार डालने की कोशिश करता है और परमेश्वर को जमीन पर कुचल देने का प्रयास करता है। परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में मनुष्य का रवैया “अजीब चतुराई” का है, और परमेश्वर को, जिसे मनुष्य द्वारा तंग और तिरस्कृत किया गया है, असंख्य लोगों के पैरों तले कुचल दिया जाता है, जबकि मनुष्य स्वयं को ऊँचा खड़ा करता है, जैसे कि वह “पहाड़ी का राजा” हो, जैसे कि वह पूरी सत्ता हथियाना,[4] परदे के पीछे से अपना दरबार चलाना, परदे के पीछे परमेश्वर को एक कर्तव्यनिष्ठ और नियम-निष्ठ निर्देशक बनाना चाहता हो, जिसे प्रतिरोध करने या अवज्ञा करने नहीं दिया जाता है। मनुष्य ने परमेश्वर को “अंतिम सम्राट” की भूमिका दिलवा दी है, जो हर तरह की स्वतंत्रता से रहित एक कठपुतली[5] की भूमिका निभाए। मनुष्य के कर्म अकथनीय हैं, तो वह परमेश्वर से कुछ भी माँगने योग्य कैसे हुआ? वह परमेश्वर को “सुझाव” देने योग्य कैसे हुआ? वह यह माँग करने योग्य कैसे हुआ कि परमेश्वर उसकी कमजोरियों के प्रति सहानुभूति रखे? वह परमेश्वर की दया पाने योग्य कैसे हुआ? वह बार-बार परमेश्वर की उदारता प्राप्त करने योग्य कैसे हुआ? वह बार-बार परमेश्वर की क्षमा पाने योग्य कैसे हुआ? उसकी अंतरात्मा कहाँ गयी? उसने बहुत पहले ही परमेश्वर का दिल तोड़ दिया था, उसने बहुत पहले ही परमेश्वर का दिल टुकड़े-टुकड़े करके छोड़ दिया था। परमेश्वर चमक से भरे चेहरे और आनंद से भरे दिल के साथ मनुष्यों के बीच इस आशा से आया था कि मनुष्य उसके प्रति दयालु होगा, भले ही उसमें गर्मजोशी की कमी हो। फिर भी, परमेश्वर के दिल को मनुष्य ने कम सुकून पहुँचाया है, जो कुछ उसने प्राप्त किया है, वह केवल तेजी से बढ़ते[6] हमले और यातनाएँ हैं। मनुष्य का दिल बहुत लालची है, उसकी इच्छा बहुत बड़ी है, वह कभी भी संतुष्ट नहीं होता, वह हमेशा शातिर और उजड्ड रहता है, वह परमेश्वर को कभी बोलने की आज़ादी या अधिकार नहीं देता, और अपमान के सामने सिर झुकाने, और मनुष्य द्वारा अपने साथ मनचाहे तरीके से की जाने वाली जोड़-तोड़ स्वीकार करने के अलावा परमेश्वर के लिए कोई विकल्प नहीं छोड़ता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (9)
फुटनोट :
1. “विनाश” का इस्तेमाल मानवजाति का विद्रोहीपन उजागर करने के लिए किया गया है।
2. “उग्र भौंहों और इनकार में हिलतीं उँगलियों की ठंडी अवज्ञा मिली है, एक राज़ी बैल की तरह सिर झुकाए लोगों की सेवा करते हुए” मूलतः एक वाक्य था, लेकिन यहाँ चीजों को साफ करने के लिए इसे दो भागों में विभाजित किया गया है। वाक्य का पहला भाग मनुष्य के कार्यों को दर्शाता है, जबकि दूसरा वाक्य परमेश्वर द्वारा सही गई पीड़ा और इस बात को इंगित करता है कि परमेश्वर दीन और छिपा हुआ है।
3. “पूर्वाग्रह” लोगों के विद्रोही व्यवहार को दर्शाता है।
4. “पूरी सत्ता हथियाने” का तात्पर्य लोगों के विद्रोही से है। वे खुद को ऊँचा उठाकर रखते हैं, दूसरों को बेड़ियों से बाँधते हैं, उनसे अपना अनुकरण करवाते हैं और अपने लिए कष्ट उठाने को कहते हैं। ये वे ताकतें हैं, जो कि परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं।
5. “कठपुतली” का इस्तेमाल उन लोगों का उपहास करने के लिए किया गया है, जो परमेश्वर को नहीं जानते।
6. “तेजी से बढ़ते” का इस्तेमाल लोगों के घृणित व्यवहार को रेखांकित करने के लिए किया गया है।
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 197
परमेश्वर के देहधारण ने सभी धर्मों और दायरों को चकित कर दिया है, इसने विभिन्न धार्मिक समुदायों की मूल व्यवस्था को “उलट-पुलट कर दिया” है, और इसने उन सभी लोगों के दिलों को झकझोर दिया है जो परमेश्वर की उपस्थिति की कामना करते हैं। कौन है जो सराहना से नहीं भरा है? कौन परमेश्वर को देखने का अभिलाषी नहीं है? परमेश्वर कई सालों से मनुष्यों के बीच व्यक्तिगत रूप से रहा है, फिर भी मनुष्य ने कभी इसका अनुभव नहीं किया है। आज परमेश्वर स्वयं प्रकट हुआ है और उसने जनता के सामने अपनी पहचान प्रकट कर दी है—यह कैसे मनुष्य के दिल को प्रसन्न नहीं कर सका? परमेश्वर ने एक बार मनुष्य के साथ सुख और दुख, वियोग और पुनर्मिलन साझा किए थे, और आज वह मानवजाति के साथ फिर से जुड़ गया है, और वे एक साथ अपने साझे अतीत के किस्से याद करते हैं। परमेश्वर के यहूदिया छोड़ने के बाद लोगों को उसका कोई और समाचार नहीं मिला। उन्हें एक बार फिर परमेश्वर से मिलने की आस थी और आज वे अप्रत्याशित रूप से एक बार फिर उससे मिल गए। इससे उनके अंदर अतीत की स्मृतियाँ क्यों नहीं जागेंगी? दो हजार साल पहले इस दिन यहूदियों के वंशज शमोन बरयोना ने उद्धारकर्ता यीशु को देखा, उसके साथ एक ही मेज पर भोजन किया और कई वर्षों तक उसका अनुसरण करने के बाद उसके लिए एक गहरा मित्रभाव विकसित किया : उसने तहेदिल से उससे प्रेम किया; उसने प्रभु यीशु से गहराई से प्यार किया। यहूदी लोगों को कुछ भी अंदाजा नहीं था कि यह सुनहरे बालों वाला बच्चा, जो एक सर्द नांद में पैदा हुआ था, देहधारी परमेश्वर की पहली छवि था। उन सभी ने यही सोचा था कि यीशु उनके जैसा ही था, किसी ने भी उसे अपने से अलग नहीं समझा था—लोग इस आम और साधारण यीशु को कैसे पहचान सकते थे? यहूदी लोगों ने उसे उस समय के एक यहूदी पुत्र के रूप में ही जाना। किसी ने भी उसे एक सुंदर परमेश्वर के रूप में नहीं देखा, और लोगों से उससे चीजें माँगने के अलावा कुछ नहीं किया, उससे माँग की कि वह उन्हें प्रचुर और भरपूर आशीषें, शांति और सुख प्रदान करे, लोगों ने और कुछ भी नहीं किया। उन्हें सिर्फ यह पता था कि, एक करोड़पति की तरह, उसके पास वह सब कुछ था जिसकी कोई कभी भी इच्छा कर सकता था। फिर भी लोग कभी भी उसके साथ ऐसे पेश नहीं आए कि वह कोई ऐसा हो जिससे उन्होंने प्रेम किया हो; उस समय के लोगों ने उससे प्रेम नहीं किया, और केवल उसका विरोध किया, और उससे बेतुकी मांगें की, पर उसने कभी प्रतिरोध नहीं किया, वह लगातार मनुष्य को आशीषें देते रहा, भले ही मनुष्य उसे जान नहीं पाए थे। मनुष्यों को चुपचाप आत्मीयता, प्रेमपूर्ण उदारता और दया प्रदान करने, और इससे भी ज्यादा, मनुष्यों को व्यवहार के ऐसे नए तरीके देने के अलावा जिससे वे नियमों के बंधन से बाहर निकल सकें, उसने और कुछ भी नहीं किया। मनुष्य ने उसे प्यार नहीं किया, केवल उससे ईर्ष्या की और उसकी असाधारण प्रतिभा को पहचाना। अंधी मानवजाति कैसे जान सकती थी कि जब प्रिय उद्धारक यीशु उनके बीच आया, तो उसे कितना बड़ा अपमान सहन करना पड़ा था? किसी ने भी उसके दुख को नहीं समझा, किसी ने भी पिता परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम के बारे में नहीं जाना, और न ही किसी ने उसके अकेलेपन के बारे में जाना; भले ही मरियम उसकी जन्मदात्री थी, फिर भी वह दयालु प्रभु यीशु के दिल की वाणी को कैसे समझ सकती थी? मनुष्य के पुत्र द्वारा सही गई अकथनीय पीड़ा को किसने जाना? उससे चीजें मांगने के बाद, उस समय के लोगों ने रुखाई से उसे अपने दिमाग के पीछे धकेल दिया और उसे बाहर निकाल फेंका। इसलिए वह सड़कों पर घूमता रहा, दिन-ब-दिन, साल-दर-साल, कई सालों तक यूँ ही घूमता रहा, जब तक उसने तैंतीस कठोर सालों की पीड़ा नहीं गुजार लिया, वे साल जो लंबे और संक्षिप्त दोनों ही थे। जब लोगों को उसकी जरूरत होती थी, तो वे उसे अपने घरों में मुस्कुराते हुए चेहरों के साथ आमंत्रित करते थे, उससे चीजें मांगने की कोशिश करते हुए—और जैसे ही उसने उन्हें अपना योगदान दिया, वे तुरंत उसे दरवाजे से बाहर कर देते थे। जो कुछ उसने अपने मुंह से मुहैया कराया, लोगों ने उसे खाया, उन्होंने उसका रक्त पिया, उन्होंने उन कृपाओं का आनंद लिया जो उसने उन पर कीं, फिर भी उन्होंने उसका विरोध किया, क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था कि उनके जीवन उन्हें किसने दिए थे। आखिरकार, उन्होंने उसे क्रूस पर जड़ दिया, फिर भी उसने कोई आवाज नहीं की। आज भी, वह चुप रहता है। लोग उसके शरीर को खाते हैं, वे उसका रक्त पीते हैं, वे वह खाना खाते हैं जो वह उनके लिए बनाता है, और वे उस रास्ते पर चलते हैं जो उसने उनके लिए खोला है, फिर भी वे उसे अस्वीकार करने का इरादा रखते हैं; वास्तव में जिस परमेश्वर ने उन्हें जीवन दिया है उसके साथ वे शत्रु जैसा व्यवहार करते हैं, और इसके बदले अपनी किस्म के उन दासों को “स्वर्गिक पिता” की तरह मानते हैं। ऐसा करते हुए, क्या वे जानबूझकर उसका विरोध नहीं कर रहे? यीशु सलीब पर चढ़कर क्यों मरा? क्या तुम लोग जानते हो? क्या यहूदा ने जो उसके सबसे निकट था और जिसने उसे खाया था, उसे पीया था और उसका आनंद लिया था, उसके साथ विश्वासघात नहीं किया? क्या यहूदा ने यीशु के साथ इसलिए विश्वासघात नहीं किया था क्योंकि यीशु उसके लिए एक महत्वहीन सामान्य शिक्षक से ज्यादा कुछ नहीं था? यदि लोगों ने सचमुच यह देखा होता कि यीशु असाधारण था, और एक ऐसा मनुष्य था जो स्वर्ग से आया था, तो वे कैसे उसे चौबीस घंटे तक क्रूस पर जीवित जड़ सकते थे, जब तक कि उसके शरीर में कोई सांस नहीं बची? परमेश्वर को कौन जान सकता है? लोग अतृप्य लालच के साथ परमेश्वर का आनंद लेने के अलावा और कुछ नहीं करते हैं, परंतु उसे उन्होंने कभी जाना नहीं है। उन्हें एक इंच दिया गया था और उन्होंने एक मील ले लिया है, और वे “यीशु” को अपनी आज्ञाओं और अपने आदेशों का पूरी तरह से आज्ञाकारी बना लेते हैं। किसने कभी मनुष्य के इस पुत्र के लिए दया जैसी कोई चीज दिखाई है, जिसके पास सिर धरने की भी जगह नहीं है? किसने कभी पिता परमेश्वर के आदेश को पूरा करने के लिए उसका साथ देने का विचार किया है? किसने कभी उसके लिए थोड़ा-भी विचार किया है? किसने कभी उसकी कठिनाइयों के बारे में सोचा है? थोड़े-से भी प्यार के बिना, मनुष्य उसे आगे-पीछे घुमाता है; मनुष्य को पता नहीं है कि उसका प्रकाश और जीवन कहाँ से आया था, और वह दो हजार साल पहले के “यीशु” को, जिसने मनुष्य के बीच कष्ट का अनुभव किया है, एक बार फिर क्रूस पर चढ़ाने की गुपचुप योजना बनाने के अलावा वह और कुछ नहीं करता है। क्या “यीशु” सचमुच ऐसी घृणा को जगाता है? क्या वह सब कुछ जो उसने किया, लंबे समय से भुला दिया गया है? वह नफरत जो हजारों सालों से इकट्ठी हो रही थी, अंततः बाहर फूट पड़ेगी। यहूदियों की श्रेणी के तुम लोग! “यीशु” ने कब तुम लोगों से शत्रुता की है? क्या तुम वाकई उससे इतनी नफरत करते हो? उसने बहुत कुछ किया है, और बहुत कुछ कहा है—क्या यह तुम सभी के हित में नहीं है? उसने तुम सबको अपना जीवन दे दिया है, बदले में कुछ भी माँगे बिना, उसने तुम्हें अपना सर्वस्व दे दिया है—क्या तुम लोग सचमुच अब भी उसे जिंदा खा जाना चाहते हो? उसने कुछ भी बचाकर रखे बिना अपना सब कुछ तुम लोगों को समर्पित कर दिया है, बिना कभी सांसारिक महिमा का आनंद उठाए, बिना मनुष्य के बीच आत्मीयता, मनुष्य के बीच प्रेम, या मनुष्य के बीच खुशी और आनंद का सुख उठाए। लोग उसके प्रति इतने कठोर हैं; उसने पृथ्वी पर कभी भी सारी प्रचुरता का आनंद नहीं लिया है, उसने अपना पूरा सच्चा, उत्कट हृदय मनुष्य को समर्पित कर दिया है, उसने खुद को पूरी तरह से मानवजाति को समर्पित कर दिया है—और किसने कभी उसे स्नेह दिया है? किसने कभी उसे सुख दिया है? मनुष्य ने उस पर सारा दबाव लाद रखा है, सारा दुर्भाग्य उसे सौंप दिया है, मनुष्य के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण अनुभव उस पर थोप रखे हैं, उसने सारे अन्याय का दोष उसके ऊपर डाल दिया है, और उसने इसे चुपचाप स्वीकार कर लिया है। क्या उसने कभी किसी से विरोध किया है? क्या उसने कभी किसी से थोड़ा भी हर्जाना माँगा है? किसी ने कभी उसके प्रति कोई चिंता दिखाई है? सामान्य लोगों के रूप में, किसका एक रूमानी बचपन नहीं था? किसका यौवन रंगीन नहीं रहा? प्रियजनों का अपनत्व किसे नहीं मिला है? कौन रिश्तेदारों और दोस्तों के कोमल स्नेह से वंचित है? किसे दूसरों का सम्मान नहीं मिला है? एक स्नेही परिवार के बिना कौन है? अपने विश्वासपात्रों के स्नेह के बिना कौन है? और क्या उसने कभी इनमें से किसी का भी सुख पाया है? किसने उसे कभी थोड़ी-सी भी आत्मीयता दी है? किसने उसे कभी लेशमात्र भी ढांढस दिया है? किसने उसके प्रति कभी थोड़ी-सी भी मानवीय नैतिकता दिखाई है? कौन उसके प्रति कभी भी सहिष्णु रहा है? दुख के दिनों में कौन कभी उसके साथ रहा है? किसने कभी उसके साथ दुख भरा जीवन जिया है? मनुष्य ने उससे अपनी अपेक्षाओं को कभी भी कम नहीं किया; वह बिना किसी हिचकिचाहट के केवल उससे चीजें माँगता है, मानो कि मनुष्य की दुनिया में आकर, उसे मनुष्य का बैल या घोड़ा, उसका कैदी बनना पड़ेगा, और उसे अपना सर्वस्व मनुष्यों को दे देना होगा; नहीं तो मनुष्य कभी उसे माफ नहीं करेगा, कभी उसे ऐसे ही जाने नहीं देगा, उसे कभी परमेश्वर नहीं कहेगा, और कभी भी उसे सम्मान की दृष्टि से नहीं देखेगा। परमेश्वर के प्रति मनुष्य का रवैया बहुत कठोर है, मानो वह परमेश्वर को मृत्यु तक यातना देने के बाद ही उससे अपनी माँगें कम करेगा; अन्यथा मनुष्य परमेश्वर के लिए अपने अपेक्षित मानकों को कभी कम नहीं करेगा। ऐसे मनुष्य से परमेश्वर बेहद घृणा कैसे नहीं कर सकता? क्या यह आज की त्रासदी नहीं है? मनुष्य की अंतरात्मा कहीं भी दिखाई नहीं देती। वह कहता रहता है कि वह परमेश्वर के प्रेम का ऋण चुकाएगा, परंतु वह परमेश्वर का गहन-विश्लेषण करता है और मृत्यु तक उसे यातना देता है। क्या यह परमेश्वर में उसके विश्वास करने का एक “गुप्त नुस्खा” नहीं है जो उसे अपने पूर्वजों से विरासत में प्राप्त हुआ है? “यहूदी” हर जगह हैं; और आज भी वे वही करते हैं, वे अब भी परमेश्वर के विरोध का ही काम करते हैं, और फिर भी मानते हैं कि वे परमेश्वर की बड़ाई कर रहे हैं। कैसे मनुष्य की दैहिक आँखें परमेश्वर को जान सकती हैं? कैसे मनुष्य जो देह में जीता है, आत्मा से आए देहधारी परमेश्वर को परमेश्वर के रूप में मान सकता है? मनुष्य के बीच कौन उसे जान सकता है? मनुष्य के बीच सच्चाई कहाँ है? सच्ची धार्मिकता कहाँ है? कौन परमेश्वर के स्वभाव को जानने में सक्षम है? कौन स्वर्ग के परमेश्वर के साथ होड़ कर सकता है? कोई आश्चर्य नहीं है कि जब परमेश्वर मनुष्य के बीच आता है, तो कोई भी उसे नहीं जानता, और वह अस्वीकार किया जाता है। मनुष्य कैसे परमेश्वर के अस्तित्व को सहन कर सकता है? कैसे वह प्रकाश को संसार से अंधेरे को बाहर निकालने की अनुमति दे सकता है? क्या यह सब कुछ मनुष्य के समर्पण की ईमानदार और खरी भावना नहीं है? क्या यही मनुष्य का ईमानदार प्रवेश नहीं है? और क्या परमेश्वर का कार्य मनुष्य के प्रवेश के आसपास केंद्रित नहीं है? मेरी इच्छा है कि तुम लोग मनुष्य के प्रवेश के साथ परमेश्वर के कार्य को जोड़ो, और मनुष्य और परमेश्वर के बीच एक अच्छा संबंध स्थापित करो, और उस कर्तव्य को अच्छे से पूरा करो जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए, जो कर सकते हो वह सब करो। इस तरह, इसके बाद परमेश्वर के महिमा प्राप्त करने के साथ समाप्त हो जाएगा!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (10)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 198
आज मैं चीन में परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर इसलिए काम करता हूँ ताकि उनके सारे विद्रोही स्वभावों को प्रकट करूँ और उनकी समस्त कुरूपता को उजागर करूँ और इस संदर्भ का उपयोग वह कहने के लिए करूँ जो मुझे कहने की ज़रूरत है। उसके बाद, मैं संपूर्ण ब्रह्मांड को जीतने के अपने कार्य का अगला चरण करूँगा। मैं पूरे ब्रह्मांड में प्रत्येक व्यक्ति की अधार्मिकता का न्याय करने के लिए तुम लोगों के प्रति अपने न्याय का प्रयोग करूँगा, क्योंकि तुम्हीं लोग मनुष्यजाति में विद्रोहियों के प्रतिनिधि हो। जो लोग ऊपर नहीं उठ पाएँगे, वे सिर्फ विषमता और सेवा करने वाले बन जाएँगे, जबकि जो लोग ऊपर उठ पाएँगे, उनका प्रयोग किया जाएगा। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि जो लोग नहीं उठ पाएँगे, वे केवल विषमता के रूप में कार्य करेंगे? क्योंकि मेरे वर्तमान वचन और कार्य, तुम लोगों की पृष्ठभूमि को निशाना बनाते हैं और इसलिए कि तुम सब समस्त मनुष्यजाति में विद्रोही लोगों के प्रतिनिधि और साक्षात प्रतिमान बन चुके हो। बाद में, मैं इन वचनों को, जो तुम सबको जीतते हैं, विदेशों में ले जाऊँगा और वहाँ के लोगों को जीतने के लिए उनका प्रयोग करूँगा, फिर भी तुम उन्हें प्राप्त नहीं कर पाओगे। क्या वह तुम्हें एक विषमता नहीं बनाएगा? समस्त मनुष्यजाति का भ्रष्ट स्वभाव, मनुष्य के विद्रोही कार्य, मनुष्य की भद्दी छवियाँ और चेहरे, आज ये सभी उन वचनों में दर्ज होते हैं, जिनका प्रयोग तुम लोगों को जीतने के लिए किया गया था। तब मैं इन वचनों का प्रयोग प्रत्येक राष्ट्र और सम्प्रदाय के लोगों को जीतने के लिए करूँगा, क्योंकि तुम सब आदर्श और उदाहरण हो। हालाँकि मैंने तुम लोगों को जानबूझकर नहीं त्यागा; यदि तुम अपने अनुसरण में असफल होते हो और इस प्रकार तुम असाध्य होना प्रमाणित करते हो, तो क्या तुम सब मात्र सेवा करने वाले और विषमता नहीं होगे? मैंने एक बार कहा था कि शैतान की युक्तियों के आधार पर मेरी बुद्धि प्रयुक्त की जाती है। मैंने ऐसा क्यों कहा था? क्या वह उसके पीछे की वास्तविक कहानी नहीं है, जो मैं अभी कह और कर रहा हूँ? यदि तुम आगे नहीं बढ़ सकते, यदि तुम पूर्ण नहीं बनाए जाते, बल्कि दंडित किए जाते हो, तो क्या तुम विषमता नहीं बन जाओगे? हो सकता है कि आज के दिन तक पहुँचने से ठीक पहले तक तुमने अत्यधिक पीड़ा सही हो, परन्तु तुम अभी भी कुछ नहीं समझते; तुम जीवन की प्रत्येक बात के विषय में अज्ञानी हो। यद्यपि तुम्हें ताड़ना दी गई और तुम्हारा न्याय किया गया; फिर भी तुम बिल्कुल भी नहीं बदले और तुम ने भीतर तक जीवन ग्रहण ही नहीं किया है। जब तुम्हारे कार्य को जाँचने का समय आएगा, तुम अग्नि जैसे परीक्षण और अधिक बड़े क्लेश का अनुभव करोगे। जब यह अग्नि तुम पर आ पड़ेगी, तो तुम्हारा सम्पूर्ण अस्तित्व राख में बदल जाएगा। तुम्हारे पास जीवन नहीं है, तुम्हारे भीतर रत्ती भर भी शुद्ध स्वर्ण नहीं है, तुम अभी भी पुराने भ्रष्ट स्वभाव में फँसे हुए हो, यहाँ तक कि तुम एक अच्छी विषमता भी नहीं हो सकते, तो तुम्हें क्यों नहीं हटाया जाएगा? विजय-कार्य में क्या किसी ऐसे व्यक्ति का उपयोग किया जा सकता है, जिसका मूल्य एक पाई भी नहीं है और जिसके पास जीवन ही नहीं है? जब वह समय आएगा, तो तुम सब के दिन नूह और सदोम के दिनों से भी अधिक कठिन होंगे! तुम किसी भी तरह से प्रार्थना करो, इससे तुम्हारा कोई भला नहीं होगा। उद्धार का कार्य पहले ही समाप्त हो चुकने पर क्या तुम वापस आकर नए सिरे से पश्चात्ताप करना आरंभ कर सकते हो? एक बार जब उद्धार का सम्पूर्ण कार्य पूरा हो जाएगा, तब उद्धार का कोई और कार्य नहीं रहेगा; उसके बाद केवल बुरे लोगों को दंड देने का कार्य आरम्भ होगा। तुम प्रतिरोध करते हो, तुम विद्रोह करते हो, और तुम जानबूझकर गलत काम करते हो। क्या तुम कठोर दण्ड के लक्ष्य नहीं हो? मैं आज यह तुम्हारे लिए स्पष्ट रूप से बोल रहा हूँ। यदि तुम अनसुना करते हो, तो जब बाद में तुम पर विपत्ति टूटेगी, यदि तुम तब विश्वास और पछतावा करना आरम्भ करोगे, तो क्या इसमें तब बहुत देर नहीं हो चुकी होगी? मैं तुम्हें आज पश्चात्ताप करने का एक अवसर प्रदान कर रहा हूँ, लेकिन तुम ऐसा नहीं करते हो। तुम और कितनी प्रतीक्षा करना चाहते हो? ताड़ना के दिन तक? मैं आज तुम्हारे पिछले अपराध याद नहीं रखता हूँ; मैं तुम्हें बार-बार क्षमा करता हूँ, मात्र तुम्हारे सकारात्मक पक्ष को देखने के लिए मैं तुम्हारे नकारात्मक पक्ष को अनदेखा करता हूँ, क्योंकि मेरे समस्त वर्तमान वचन और कार्य तुम्हें बचाने के लिए हैं। तुम्हारे प्रति मैं कोई बुरा इरादा नहीं रखता। फिर भी तुम प्रवेश करने से इन्कार करते हो; तुम भले और बुरे में अंतर नहीं कर सकते और दयालुता की कद्र करना नहीं जानते हो। क्या ऐसे लोग बस दण्ड और धार्मिक प्रतिफल की प्रतीक्षा नहीं कर रहे हैं?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 199
जब मूसा ने चट्टान पर प्रहार किया, और यहोवा द्वारा प्रदान किया गया पानी उसमें से बहने लगा, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब दाऊद ने—आनंद से भरे अपने हृदय के साथ—मुझ यहोवा की स्तुति में तंतुवाद्य और वीणा बजाई, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब अय्यूब ने पहाड़ों में भरे अपने पशु और संपदा के अनगिनत ढेर खो दिए, और उसका शरीर पीड़ादायक फोड़ों से भर गया, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब वह मुझ यहोवा की वाणी सुन सका, और मेरी महिमा देख सका, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। पतरस उसकी आस्था के कारण ही यीशु मसीह का अनुसरण कर सका था। वह जो मेरे वास्ते सलीब पर चढ़ाया जा सका और महिमामयी गवाही दे सका, तो यह भी उसकी आस्था के कारण ही था। जब यूहन्ना ने मनुष्य के पुत्र की महिमामयी छवि देखी, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब उसने अंत के दिनों का दर्शन देखा, तो यह सब और भी ज्यादा उसकी आस्था के कारण था। तथाकथित अन्य-जाति राष्ट्रों के असंख्य लोगों ने मेरा प्रकाशन प्राप्त किया है और यह जाना है कि मैं मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने के लिए देह में लौट आया हूँ; इसका कारण भी उनकी आस्था ही है। वे सब जो मेरे कठोर वचनों से आघात पाते हैं और फिर भी उनसे सांत्वना पाते हैं और बचाए जाते हैं—क्या उन्होंने ऐसा अपनी आस्था के कारण ही नहीं किया है? अपनी आस्था के कारण लोग बहुत-सी चीजें पा चुके हैं और जरूरी नहीं है कि ये आशीषें हों। उन्हें शायद उस तरह की प्रसन्नता और आनन्द का अनुभव न हो, जो दाऊद ने अनुभव किया था, या यहोवा के द्वारा प्रदान किया गया वैसा जल प्राप्त न हो, जैसा मूसा ने प्राप्त किया था। उदाहरण के लिए, अय्यूब को उसकी आस्था की वजह से यहोवा द्वारा आशीष प्रदान किया गया था, लेकिन उसे विपत्ति भी मिली। चाहे तुम्हें आशीष प्राप्त हो या तुम किसी विपत्ति का सामना करो, दोनों ही आशीषित घटनाएँ हैं। यदि तुम्हारी आस्था नहीं होती, तो तुम यह विजय का कार्य स्वीकार नहीं कर सकते और आज अपनी आँखों के सामने यहोवा के कर्मों को प्रदर्शित होते तो तुम बिल्कुल भी नहीं देख पाते—तुम इसे देख पाने में सक्षम नहीं होते और इसे प्राप्त करना तो बिल्कुल ही नामुमकिन होता। ये विपत्तियाँ, ये आपदाएँ, और ये समस्त न्याय—यदि ये तुम पर न आते, तो क्या तुम आज यहोवा के कार्य को देखने में समर्थ होते? आज, यह आस्था ही है जो तुम्हारा जीता जाना संभव बनाती है और यह तुम्हारा जीता जाना ही है जो तुम्हें यहोवा के प्रत्येक कार्य पर विश्वास करने देता है। केवल आस्था के कारण ही तुम इस प्रकार की ताड़ना और न्याय पाते हो। इस ताड़ना और न्याय के द्वारा तुम जीते और पूर्ण किए जाते हो। यदि आज यह ताड़ना और न्याय न हो, तो तुम्हारी आस्था व्यर्थ होगी, क्योंकि तुम परमेश्वर को नहीं जान पाओगे; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम उसमें कितना विश्वास करते हो, तुम्हारी आस्था बस खोखले शब्द रह जाएगी और उसमें कोई वास्तविकता नहीं होगी। जब तुम इस विजय के कार्य को प्राप्त कर लेते हो, जो तुम्हें पूर्णतः समर्पित बनाता है, तभी तुम्हारी आस्था सच्ची और विश्वसनीय बनती है और तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर मुड़ता है। भले ही तुम इस “आस्था” शब्द के कारण काफी अधिक न्याय या बहुत से शापों से होकर गुजरते हो, फिर भी तुममें सच्ची आस्था है और तुम सबसे सच्ची, सबसे वास्तविक और सबसे मूल्यवान वस्तु प्राप्त कर चुके हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि न्याय की प्रक्रिया में ही तुम सृजित प्राणियों की मंजिल को देखते हो; इस न्याय में ही तुम सृष्टिकर्ता की मनोहरता देखते हो; इस प्रकार के विजय-कार्य में ही तुम परमेश्वर की भुजा को देखते हो; इसी विजय में तुम मानव जीवन को पूरी तरह समझते हो; इसी विजय में तुम जीवन में सही मार्ग प्राप्त करते हो और “मनुष्य” का सच्चा अर्थ समझ जाते हो; केवल इसी विजय में तुम सर्वशक्तिमान के धार्मिक स्वभाव और उसके सुंदर, महिमामय मुखमंडल को देखते हो। इसी विजय-कार्य में तुम मनुष्य की उत्पत्ति को जान पाते हो और समस्त मनुष्यजाति के “अनश्वर इतिहास” को समझते हो; इसी विजय में तुम मनुष्यजाति के पूर्वजों और मनुष्यजाति की भ्रष्टता के उद्गम के बारे में जान पाते हो; इसी विजय में तुम आनंद और दिलासा के साथ-साथ अंतहीन ताड़ना, अनुशासन और उस मनुष्यजाति के लिए सृष्टिकर्ता के फटकार के वचन प्राप्त करते हो जिसे उसने बनाया है; इसी विजय-कार्य में तुम आशीष प्राप्त करते हो, साथ ही वे विपत्तियाँ भी भुगतते हो जो मनुष्य को भोगनी ही हैं...। क्या यह सब तुम्हारी थोड़ी-सी आस्था के कारण नहीं है? और क्या ये चीजें प्राप्त करने से तुम्हारी आस्था नहीं बढ़ती है? क्या तुमने काफी अधिक प्राप्त नहीं कर लिया है? तुमने मात्र परमेश्वर के वचन को ही नहीं सुना और परमेश्वर की बुद्धि को ही नहीं देखा, अपितु तुमने उसके कार्य के प्रत्येक चरण को भी व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है। हो सकता है तुम कहो कि यदि तुम्हारे पास आस्था नहीं होती तो तुम इस प्रकार की ताड़ना और न्याय से पीड़ित न होते। परन्तु तुम्हें जानना चाहिए कि बिना आस्था के न केवल तुम इस प्रकार की ताड़ना प्राप्त करने या सर्वशक्तिमान से इस प्रकार की देखभाल प्राप्त करने में असमर्थ होते, बल्कि तुम सृष्टिकर्ता से मिलने के इस सुअवसर को भी सदा के लिए खो देते। तुम मनुष्यजाति के उद्गम को कभी भी नहीं जान पाते और न ही मानव जीवन की महत्ता को समझ पाते। भले ही तुम्हारी देह नष्ट हो जाती और तुम्हारी आत्मा अलग हो जाती, फिर भी तुम सृष्टिकर्ता के समस्त कार्यों को नहीं समझ पाते, तुम्हें इस बात का ज्ञान तो कभी न हो पाता कि मनुष्यजाति को बनाने के पश्चात सृष्टिकर्ता ने इस पृथ्वी पर कितने महान कार्य किए। उसके द्वारा बनाई गई इस मनुष्यजाति के एक सदस्य के रूप में क्या तुम इस प्रकार अज्ञानतावश अंधकार में गिरने और अनंत दंड की पीड़ा उठाने के लिए तैयार हो? यदि तुम स्वयं को आज की ताड़ना और न्याय से अलग करते हो, तो तुम्हें किसका सामना करना पड़ेगा? क्या तुम सोचते हो कि वर्तमान न्याय से एक बार अलग होकर तुम इस कष्ट भरे जीवन से बचने में समर्थ हो जाओगे? क्या यह सत्य नहीं है कि यदि तुम “इस स्थान” को छोड़ते हो, तो जिससे तुम्हारा सामना होगा, वह दानवों के द्वारा दी जाने वाली पीड़ादायक यातना या गंभीर नुकसान होगा? क्या तुम्हारा सामना असहनीय दिनों और रातों से हो सकता है? क्या तुम सोचते हो कि आज इस न्याय से बचकर, तुम भविष्य की उस पीड़ा को सदा के लिए टाल सकते हो? तुम्हारे मार्ग में क्या आएगा? क्या यह कोई स्वप्न-लोक होगा जिसकी तुम आशा करते हो? क्या तुम सोचते हो कि वास्तविकता से वैसे ही भागकर, जैसे तुम आज भाग रहे हो, तुम भविष्य की उस अनंत ताड़ना से बच सकते हो? क्या आज के बाद, तुम दोबारा इस प्रकार का अवसर और इस प्रकार का आशीष प्राप्त कर पाओगे? क्या तुम उन्हें तब खोज पाओगे जब आपदाएँ तुम पर आ पड़ेंगी? क्या तुम उन्हें खोज पाओगे, जब सम्पूर्ण मनुष्यजाति विश्राम में प्रवेश करेगी? तुम्हारा वर्तमान खुशहाल जीवन और तुम्हारा छोटा-सा मैत्रीपूर्ण परिवार—क्या वे तुम्हारी भविष्य की अनन्त मंजिल की जगह ले सकते हैं? यदि तुम सच्ची आस्था रखते हो और यदि अपनी आस्था के कारण तुम्हें बहुत अधिक प्राप्त होता है, तो यह सबकुछ तुम्हें, एक सृजित प्राणी को, प्राप्त होना चाहिए और यह सब तुम्हारे पास पहले ही हो जाना चाहिए था। तुम्हारी आस्था और तुम्हारे जीवन के लिए ऐसी विजय से अधिक लाभकारी और कुछ नहीं है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 200
आज तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम पर कैसे विजय प्राप्त की जाए और उन पर विजय पाए जाने के बाद लोगों की अभिव्यक्तियाँ क्या होती हैं। तुम कह सकते हो कि तुम पर विजय पा ली गई है, पर क्या तुम मृत्युपर्यंत समर्पित रह सकते हो? इस बात की परवाह किए बिना कि इसमें कोई संभावना है या नहीं, तुम्हें बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में सक्षम होना चाहिए और कैसा भी परिवेश हो, तुम्हें परमेश्वर में आस्था नहीं खोनी चाहिए। अंततः तुम्हें गवाही के दो पहलू प्राप्त करने चाहिए : अय्यूब की गवाही—मृत्युपर्यंत समर्पण; और पतरस की गवाही—परमेश्वर से परम प्रेम। एक मामले में तुम्हें अय्यूब की तरह होना चाहिए : उसने समस्त भौतिक संपत्ति गँवा दी और देह की बीमारी का सामना किया, फिर भी उसने यहोवा का नाम नहीं त्यागा। यह अय्यूब की गवाही थी। पतरस मृत्युपर्यंत परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम रहा—जब उसने अपनी मृत्यु का सामना किया, तब भी उसने परमेश्वर से प्रेम किया, जब उसे क्रूस पर चढ़ाया गया, तब भी उसने परमेश्वर से प्रेम किया। उसने अपने भविष्य का विचार नहीं किया या सुंदर आशाओं अथवा अव्यावहारिक विचारों का अनुसरण नहीं किया, और केवल परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर की समस्त व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने का प्रयास किया। इससे पहले कि यह माना जा सके कि तुमने गवाही दी है, इससे पहले कि तुम ऐसा व्यक्ति बन सको जिसे जीते जाने के बाद पूर्ण बना दिया गया है, तुम्हें यह स्तर हासिल करना होगा। आज यदि लोग वास्तव में अपने सार और स्थिति को जानते, तो क्या वे तब भी संभावनाओं और आशाओं का अनुसरण करते? तुम्हें जो जानना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर मुझे पूर्ण करे या न करे, मुझे परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए; अब वह जो कुछ भी करता है वह अच्छा है और मेरी खातिर किया जाता है ताकि हमारे स्वभाव बदल सकें और हम शैतान के प्रभाव से मुक्त हो सकें, ताकि गंदगी की भूमि में पैदा हुए हम लोग उस गंदगी से छुटकारा पा सकें और उसे झाड़कर फेंक सकें, शैतान के प्रभाव से मुक्त हो सकें और उससे उबर सकें। निश्चित रूप से तुमसे यही अपेक्षा है, किंतु परमेश्वर के लिए यह विजय मात्र है, जो इसलिए की जाती है कि लोग समर्पण करने का संकल्प लें और सब कुछ परमेश्वर के आयोजनों के हवाले छोड़ सकें। इस तरह से चीजें संपन्न होंगी। आज ज्यादातर लोगों पर विजय पाई जा चुकी है, परंतु उनके अंदर अभी भी बहुत-कुछ विद्रोही है और वे समर्पित नहीं हैं। लोगों का वास्तविक आध्यात्मिक कद अभी भी बहुत छोटा है। जैसे ही उनके पास आशाएँ और संभावनाएँ होती हैं, वे प्रेरित महसूस करते हैं और यदि उनके पास बिल्कुल भी कोई आशा नहीं होती और कहने लायक कोई संभावना नहीं होती, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं और यहाँ तक कि परमेश्वर को छोड़ने के बारे में भी सोचने लगते हैं। इतना ही नहीं, लोगों में सामान्य मानवता को जीने का प्रयास करने की कोई बड़ी इच्छा नहीं है। यह अस्वीकार्य है। इसलिए मुझे अब भी विजय की बात करनी चाहिए। दरअसल, पूर्णता विजय के साथ-साथ ही होती है; जैसे ही तुम पर विजय पाई जाती है, पूर्ण बनाए जाने के पहले प्रभाव भी प्राप्त हो जाते हैं। जहाँ विजय पाने और पूर्ण बनाए जाने में अंतर होता है, तो वह लोगों में होने वाले परिवर्तन की मात्रा के अनुसार होता है। तुम पर विजय प्राप्त किया जाना पूर्ण बनाए जाने का प्रथम चरण है, परंतु यह पूरी तरह से पूर्ण बना दिए जाने का विकल्प नहीं है, न ही यह इस बात का सबूत है कि लोग परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिए गए हैं। लोगों को जीते जाने के बाद उनके स्वभाव में कुछ परिवर्तन आते हैं, किंतु ये परिवर्तन उन लोगों की तुलना में बहुत कम होते हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया गया है। आज जो किया जा रहा है, वह लोगों को पूर्ण बनाने का आरंभिक कार्य है—उन पर विजय पाना—और अगर तुम पर विजय नहीं पाई जाती, तो तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने और उसके द्वारा पूरी तरह से प्राप्त किए जाने का कोई उपाय नहीं होगा। तुम सिर्फ ताड़ना और न्याय के कुछ वचन ही पाओगे, किंतु वे तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परिवर्तित करने में असमर्थ होंगे। इस तरह, तुम उनमें से एक होगे, जिन्हें हटा दिया जाता है; यह मेज पर शानदार दावत देखने किंतु उसे खा न पाने से अलग नहीं होगा। क्या यह तुम्हारे लिए बेहद दयनीय परिदृश्य नहीं है? और इसलिए तुम्हें बदलावों का अनुसरण करना चाहिए : जीत लिया जाना हो या पूर्ण बनाया जाना, दोनों का संबंध इस बात से है कि तुम्हारे अंदर बदलाव आए हैं या नहीं और तुम समर्पित हो या नहीं, और यह निश्चित करता है कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हो या नहीं। जान लो कि तुम पर “विजय प्राप्त किया जाना” और “पूर्ण बनाया जाना” केवल तुम्हारे अंदर आए बदलाव और समर्पण की मात्रा पर निर्भर करते हैं, साथ ही इस बात पर कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम कितना सच्चा है। आज जरूरत इस बात की है कि तुम्हें पूरी तरह से पूर्ण बनाया जा सके, परंतु शुरुआत में तुम पर विजय प्राप्त किया जाना आवश्यक है—तुम्हें परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए, अनुसरण करने का विश्वास होना चाहिए और तुम्हें ऐसा व्यक्ति बनना चाहिए जो बदलावों और परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करता हो। केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति होगे, जो पूर्ण बनाए जाने का प्रयास करता है। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि पूर्ण बनाए जाने के दौरान तुम लोगों को जीता जाएगा और जीते जाने के दौरान तुम लोगों को पूर्ण बनाया जाएगा। आज तुम पूर्ण बनाए जाने का प्रयास कर सकते हो या अपनी बाहरी मानवता में बदलावों और अपनी काबिलियत में सुधारों का अनुसरण कर सकते हो, परंतु प्रमुख महत्व की बात यह है कि तुम यह समझ सको कि जो कुछ आज परमेश्वर कर रहा है, वह सार्थक और लाभकारी है : यह गंदगी की भूमि में पैदा हुए तुम्हें खुद को गंदगी से छुटकारा दिलाने और उसे झाड़कर फेंकने में सक्षम बनाता है, यह तुम्हें शैतान के प्रभाव पर विजय पाने और शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त होने में सक्षम बनाता है और तुम्हारा ध्यान इन चीजों पर केंद्रित करवाकर यह तुम्हें इस गंदगी की भूमि में सुरक्षा प्रदान करता है। अंततः तुमसे कौन-सी गवाही देने के लिए कहा जाएगा? इसका उद्देश्य यह है कि तुम, जो गंदगी की भूमि में पैदा हुए हो, पवित्रीकृत हो सको ताकि फिर कभी गंदगी से मैले न हो और तुम, जो शैतान की शक्ति के अधीन रहते हो, शैतान के प्रभाव से मुक्त हो सको ताकि न तो शैतान तुम्हें अपने कब्जे में कर सके और न ही तुम्हें परेशान कर सके; इस प्रकार तुम सर्वशक्तिमान के हाथों में रहो। यही गवाही और शैतान से युद्ध में विजय का साक्ष्य है। तुम शैतान से विद्रोह करने में सक्षम हो, अपने जीवन में अब और शैतानी स्वभाव प्रकट नहीं करते, इसके बजाय उस स्थिति को जीते हो, जिसे परमेश्वर ने मनुष्य के सृजन के समय चाहा था कि मनुष्य प्राप्त करे : सामान्य मानवता, सामान्य समझ, सामान्य अंतर्दृष्टि, परमेश्वर से प्रेम करने का सामान्य संकल्प और परमेश्वर के प्रति निष्ठा। एक सृजित प्राणी को ऐसी ही गवाही देनी चाहिए। तुम कहते हो, “हम गंदगी की भूमि पर पैदा हुए थे, परंतु परमेश्वर की सुरक्षा के कारण, उसकी अगुआई के कारण, और क्योंकि उसने हम पर विजय प्राप्त की है इसलिए, हम शैतान के प्रभाव से मुक्त हो गए हैं। हम आज समर्पण कर पाते हैं, तो यह भी इस बात का प्रभाव है कि परमेश्वर ने हम पर विजय पाई है, और यह इसलिए नहीं है कि हम अच्छे हैं, या हम स्वभावतः परमेश्वर से प्रेम करते थे। चूँकि परमेश्वर ने हमें चुना और हमें पूर्वनिर्धारित किया, इसीलिए आज हम पर विजय पाई गई है, और इसीलिए हम उसके लिए गवाही देने में समर्थ हुए हैं और उसकी सेवा कर सकते हैं; ठीक वैसे ही, चूँकि उसने हमें चुना और हमारी रक्षा की, इसीलिए हमें उद्धार प्राप्त हुआ है और हमें शैतान की सत्ता से बचाया गया है और हमने गंदगी से छुटकारा प्राप्त कर लिया है और हम बड़े लाल अजगर के देश में शुद्ध किए गए हैं।”
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (2)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 201
अंत के दिनों का कार्य सारे विनियमों से अलग है और चाहे तुम शापित हो या दंडित, अगर तुम मेरे कार्य के लिए फायदेमंद हो और आज के विजय के कार्य में लाभप्रद हो और चाहे तुम मोआब के वंशज हो या बड़े लाल अजगर की संतान, अगर तुम कार्य के इस चरण में एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभा सकते हो और अपना कार्य पूरी तरह से कर सकते हो, तो उचित परिणाम प्राप्त होगा। तुम बड़े लाल अजगर की संतान हो, और तुम मोआब के वंशज हो; कुल मिलाकर, जो भी रक्त-मांस से बने हैं, वे सभी सृजित प्राणी हैं, और वे सृष्टिकर्ता द्वारा बनाए गए थे। तुम सृजित प्राणी हो, तुम्हारी अपनी कोई पसंद नहीं होनी चाहिए, और यही तुम्हारा कर्तव्य है। निस्संदेह, आज सृष्टिकर्ता का कार्य समस्त ब्रह्मांड पर निर्देशित है। तुम किसी भी वंश के क्यों न हो, अंततः तुम सृजित प्राणियों में से एक हो, तुम लोग—मोआब के वंशज—सृजित प्राणियों का अंग हो, अंतर सिर्फ़ यह है कि तुम्हारा मूल्य कम है। चूँकि आज परमेश्वर का कार्य समस्त सृजित प्राणियों में किया जा रहा है और समस्त ब्रह्मांड उसका लक्ष्य है, इसलिए सृष्टिकर्ता अपना कार्य करने के लिए किसी भी व्यक्ति, घटना या वस्तु का चयन करने को स्वतंत्र है। वह इस बात की चिंता नहीं करता कि तुम किसके वंशज हो, जब तक तुम एक सृजित प्राणी हो, और जब तक तुम उसके कार्य—विजय के कार्य—और उसकी गवाही के लिए लाभदायक हो, तब तक वह बिना किसी आशंका के तुम पर अपना कार्य करेगा। यह लोगों की परंपरागत धारणाओं को खंड-खंड कर देता है, जैसे यह है कि परमेश्वर कभी अन्य-जाति राष्ट्रों के मध्य कार्य नहीं करेगा, विशेषकर उनमें, जो शापित और निम्न हैं, क्योंकि जो शापित हैं, उनकी आगामी समस्त पीढ़ियाँ भी सदा के लिए शापित रहेंगी, उन्हें कभी उद्धार का कोई अवसर प्राप्त नहीं होगा; परमेश्वर कभी अन्यजाति राष्ट्र की भूमि पर उतरकर कार्य नहीं करेगा, और कभी मलिनता की भूमि पर अपने कदम नहीं रखेगा, क्योंकि वह पवित्र है। ये सभी धारणाएँ परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य द्वारा चकनाचूर कर दी गई हैं। जान लो कि परमेश्वर समस्त सृजित प्राणियों का परमेश्वर है, वह स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों पर संप्रभु है और केवल इस्राएल के लोगों का परमेश्वर नहीं है। इसलिए चीन में यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है और क्या यह असंख्य राष्ट्रों में परिचालित नहीं किया जाएगा? भविष्य की महान गवाही चीन तक सीमित नहीं रहेगी; यदि परमेश्वर केवल तुम लोगों को जीतता है, तो क्या दानवों को कायल किया जा सकता है? वे जीते जाने या परमेश्वर के सामर्थ्य को नहीं समझते, और केवल जब समस्त ब्रह्मांड में परमेश्वर के चुने हुए लोग इस कार्य के चरम परिणामों का अवलोकन करेंगे, तभी सब सृजित प्राणी जीते जाएँगे। कोई भी मोआब के वंशजों से अधिक पिछड़ा और भ्रष्ट नहीं है। यहाँ तक कि ऐसे लोगों पर भी विजय प्राप्त कर ली गई है—यानी वे जो कि सबसे अधिक भ्रष्ट थे, जिन्होंने परमेश्वर को स्वीकार नहीं किया, या इस बात पर विश्वास नहीं किया कि परमेश्वर है, जब विजय प्राप्त कर ली गई है और वे अपने मुख से परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, उसकी स्तुति करते हैं और उससे प्रेम करने में समर्थ हैं—यह और सिर्फ यही विजय की गवाही है। हालाँकि तुम लोग पतरस नहीं हो, पर तुम पतरस की छवि को जीते हो, तुम पतरस की गवाही धारण करने में सक्षम हो और अय्यूब की भी और यह सबसे महान गवाही है। अंततः तुम कहोगे, “हम इस्राएली नहीं हैं बल्कि मोआब के नकारे गए वंशज हैं, हम पतरस नहीं, उसकी जैसी काबिलियत पाने में हम सक्षम नहीं, न ही हम अय्यूब हैं, और हम पौलुस के परमेश्वर के लिए कष्ट सहने और खुद को परमेश्वर के लिए खपाने के संकल्प से तो तुलना भी नहीं कर सकते, और हम इतने पिछड़े हुए हैं, और इसलिए हम परमेश्वर के आशीषों का आनंद लेने के अयोग्य हैं। परमेश्वर ने फिर भी आज हमें उन्नत किया है; इसलिए हमें परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए, और हालाँकि हमारी क्षमता और योग्यताएँ अपर्याप्त हैं, लेकिन हम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तैयार हैं—यह हमारा संकल्प है। हम मोआब के वंशज हैं, और हम शापित हैं। यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत था, और हम इसे बदलने में असमर्थ हैं, परंतु हमारा जीवन और हमारा ज्ञान बदल सकता है, और हमारे पास परमेश्वर को संतुष्ट करने का संकल्प है।” जब तुम्हारे पास यह संकल्प होगा, तब यह साबित करेगा कि तुम्हारे पास पहले ही जीते जाने की गवाही है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (2)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 202
विजय के कार्य का अभीष्ट प्रभाव मुख्य रूप से यह है कि मनुष्य की देह अब विद्रोह न करे; अर्थात मनुष्य का मस्तिष्क परमेश्वर की नई समझ हासिल करे, उसका दिल पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पण करे और मनुष्य ऐसे संकल्प ले जो परमेश्वर की खातिर हों। जब लोगों के व्यक्तित्व या देह में बदलाव होता है तो उन्हें जीत लिया गया नहीं माना जाता है; जब उनकी मानसिकता, उनकी चेतना और उनके विवेक में बदलाव होता है, यानी जब उनके पूरे मानसिक दृष्टिकोण में बदलाव होता है तो तभी वे परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाते हैं। जब तुममें समर्पण करने का संकल्प होता है, जब तुम नई मानसिकता अपना लेते हो, जब तुममें परमेश्वर के वचनों और कार्य के विषय में कोई धारणा नहीं रह जाती है, न ही इन चीजों को लेकर कोई इरादा होता है और तुम्हारे मस्तिष्क में सामान्य रूप से सोचने की क्षमता होती है—यानी, जब तुम खुद को पूरे दिल से परमेश्वर के लिए खपा सकते हो—तब तुम उस प्रकार के व्यक्ति होते हो जिस पर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त की जा चुकी होती है। धर्म के दायरे में बहुत-से लोग जीवनभर बहुत अधिक पीड़ा सहते हैं : वे अपनी देह को अधीन रखते हैं और अपने क्रूस उठाए चलते हैं, यहाँ तक कि वे मृत्यु की ऐन कगार पर पीड़ा भोगना और सहना जारी रखते हैं! कुछ लोग अपनी मृत्यु की सुबह भी उपवास रखते हैं। वे जीवन-भर स्वयं को अच्छे भोजन और अच्छे कपड़ों से दूर रखते हैं और केवल पीड़ा सहने पर ही ज़ोर देते हैं। वे अपनी देह को अधीन रखने और अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने में सक्षम होते हैं। पीड़ा सहन करने का उनका जोश सराहनीय है। लेकिन उनकी मानसिकता, उनकी धारणाओं, उनके मानसिक दृष्टिकोण और उनकी पुरानी प्रकृति की लेशमात्र भी काट-छाँट नहीं की गई है। उनकी स्वयं के बारे में कोई सच्ची समझ नहीं होती। परमेश्वर के बारे में उनकी मानसिक छवि एक अज्ञात परमेश्वर की पारंपरिक छवि होती है। परमेश्वर के लिए पीड़ा सहने का उनका संकल्प, उनके उत्साह और उनकी मानवता के अच्छे व्यक्तित्व से आता है। भले ही वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वे न तो परमेश्वर को समझते हैं और न उसके इरादों को जानते हैं। वे केवल अंधों की तरह परमेश्वर के लिए कार्य करते और पीड़ा सहते हैं। वे विवेकशीलता को बिल्कुल महत्व नहीं देते और उन्हें इसकी भी बहुत परवाह नहीं होती कि वे यह कैसे सुनिश्चित करें कि उनकी सेवा वास्तव में परमेश्वर के इरादों को पूरा करे। उन्हें इसका ज्ञान तो बिल्कुल ही नहीं होता कि परमेश्वर के विषय में समझ कैसे हासिल करें। वे जिस परमेश्वर की सेवा करते हैं वह परमेश्वर अपनी मूल छवि में नहीं है, बल्कि वह उनकी कल्पनाओं का परमेश्वर होता है, एक ऐसा परमेश्वर जिसके बारे में उन्होंने बस सुना है या जिसके बारे में लेखों में बस किंवदंतियाँ पढ़ी हैं। फिर वे अपनी उर्वर कल्पनाओं और धर्मनिष्ठता का उपयोग परमेश्वर की खातिर पीड़ा सहने के लिए करते हैं और परमेश्वर के लिए उस कार्य का दायित्व स्वयं ले लेते हैं जो परमेश्वर करना चाहता है। उनकी सेवा बहुत ही अनिश्चित होती है, ऐसी कि उनमें से कोई भी परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने के पूरी तरह योग्य नहीं होता। चाहे वे स्वेच्छा से जितनी भी पीड़ा सहते हों, सेवा को लेकर उनका मूल परिप्रेक्ष्य और परमेश्वर के बारे में उनकी मानसिक छवि अपरिवर्तित रहती है, क्योंकि वे परमेश्वर के न्याय, उसकी ताड़ना, उसके शोधन और उसकी पूर्णता से नहीं गुजरे हैं, न ही किसी ने सत्य द्वारा उनका मार्गदर्शन किया है। यूँ तो वे उद्धारकर्ता यीशु पर विश्वास करते हैं, लेकिन उनमें से किसी ने कभी उद्धारकर्ता को देखा नहीं होता हैं। वे केवल किंवदंती और सुनी-सुनाई बात के माध्यम से ही उसके बारे में जानते हैं। इसलिए उनकी सेवा आँख बंद करके बेतरतीब ढंग से की जाने वाली सेवा से अधिक कुछ नहीं है, जैसे एक नेत्रहीन आदमी अपने पिता की सेवा कर रहा हो। इस प्रकार की सेवा के माध्यम से आखिरकार क्या हासिल किया जा सकता है? और इसे स्वीकृति कौन देगा? शुरुआत से लेकर अंत तक, उनकी सेवा कभी भी बदलती नहीं। वे केवल मानव-निर्मित पाठ प्राप्त करते हैं और अपनी सेवा को केवल अपनी स्वाभाविकता और ख़ुद की पसंद पर आधारित रखते हैं। इससे क्या इनाम प्राप्त हो सकता है? यहाँ तक कि यीशु को देखने वाला पतरस भी नहीं जानता था कि परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा कैसे करनी है; अंत में, वृद्धावस्था में पहुंचने के बाद ही वह इसे समझ पाया। यह उन नेत्रहीन लोगों के बारे में क्या कहता है जिन्होंने किसी भी तरह की काट-छाँट का ज़रा-भी अनुभव नहीं किया और जिनका किसी ने मार्गदर्शन नहीं किया? क्या आजकल तुम लोगों में से अधिकांश की सेवा उन नेत्रहीन लोगों की तरह ही नहीं है? जिन लोगों का न्याय नहीं हुआ है, जिनकी काट-छाँट नहीं हुई है, जो नहीं बदले हैं—क्या वे सब वो नहीं हैं जो पूरी तरह जीते नहीं गए हैं? ऐसे लोगों का क्या उपयोग? यदि तुम्हारी मानसिकता, जीवनभर के तुम्हारे ज्ञान और परमेश्वर को लेकर तुम्हारे ज्ञान में कोई नया परिवर्तन नहीं दिखता है और तुम वास्तव में कुछ भी हासिल नहीं करते हो, तो तुम अपनी सेवा में कभी कोई नतीजा प्राप्त नहीं करोगे! परमेश्वर के कार्य की एक नई समझ और दर्शन के बिना तुम जीते नहीं जाते हो। तब तुम्हारा परमेश्वर का अनुसरण उन्हीं लोगों की तरह होगा जो पीड़ा सहते हैं और उपवास रखते हैं : इसका कोई मूल्य नहीं होता! वे जो करते हैं उसमें कोई गवाही नहीं होती, इसीलिए मैं कहता हूँ कि उनकी सेवा व्यर्थ होती है! वे लोग जीवनभर पीड़ा सहते हैं और बंदीगृह में समय बिताते हैं, वे हर पल सहनशील, दयालु होते हैं, हमेशा अपने क्रूस उठाए चलते हैं और वे दुनिया द्वारा बदनाम किए और ठुकराए जाते हैं—वे हर कठिनाई का अनुभव करते हैं। यूँ तो वे अंत तक आज्ञाकारी रहते हैं, लेकिन फिर भी उन पर विजय प्राप्त नहीं की जाती और वे विजय प्राप्ति की कोई भी गवाही पेश नहीं कर पाते। वे बहुत अधिक कष्ट भोग चुके होते हैं, लेकिन अपने भीतर वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते हैं। उनकी पुरानी सोच, पुरानी धारणाओं, धार्मिक प्रथाओं, मानव-निर्मित ज्ञान और मानवीय सोच में से किसी की भी काट-छाँट नहीं हुई होती है। उनमें कोई नई समझ नहीं होती है। परमेश्वर के बारे में उनकी लेशमात्र समझ भी सच या सटीक नहीं होती है। उन्होंने परमेश्वर के इरादों को गलत समझ लिया होता है। क्या इससे परमेश्वर की सेवा होती है? परमेश्वर के बारे में अतीत में तुम्हारी समझ चाहे जो भी रही हो, अगर यह आज भी पहले जैसी ही रहती है और परमेश्वर चाहे जो भी करे तुम परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान को अपनी धारणाओं और सोच पर आधारित रखना जारी रखते हो, अर्थात्, अगर तुम्हारे पास परमेश्वर का कोई नया, सच्चा ज्ञान नहीं होता है और तुम परमेश्वर की अंतर्निहित छवि और स्वभाव को जानने में विफल रहते हो, यदि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ अभी भी सामंती, अंधविश्वासी सोच पर आधारित है और यह अब भी मानवीय कल्पनाएँ और धारणाएँ है, तो तुम पर विजय प्राप्त नहीं की गई है। मैं अब तुमसे जो बहुत-से वचन कहता हूँ उन सबका यह उद्देश्य है कि तुम जान सको और यह ज्ञान तुम्हें नवीनतर, सटीक ज्ञान की ओर ले जाए; इनका उद्देश्य तुम्हारी पुरानी धारणाओं और पुराने ज्ञान को काट-छाँट कर दूर करना भी है, ताकि तुम नया ज्ञान ले सको। अगर तुम सच में मेरे वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम्हारे ज्ञान में काफी बदलाव आएगा। यदि तुम एक समर्पित हृदय के साथ परमेश्वर के वचनों को खाओगे-पिओगे, तो तुम्हारा परिप्रेक्ष्य बदल जाएगा। यदि तुम बार-बार ताड़ना को स्वीकार कर पाओ, तो तुम्हारी पुरानी मानसिकता धीरे-धीरे बदल जाएगी। यदि तुम्हारी पुरानी मानसिकता पूरी तरह से नई बन जाए, तो तुम्हारा अभ्यास भी तदनुसार बदलेगा। इस तरह तुम्हारी सेवा अधिकाधिक सटीक होती जाएगी, परमेश्वर के इरादों को अधिकाधिक पूरा कर पाएगी। यदि तुम अपना जीवन, मानव जीवन की अपनी समझ और परमेश्वर के बारे में अपनी अनेक धारणाओं को बदल सको, तो तुम्हारी स्वाभाविकता धीरे-धीरे कम होती जाएगी। यह और इससे कम कुछ भी नहीं, वह प्रभाव है जब परमेश्वर लोगों पर विजय प्राप्त करता है, यह वह बदलाव है जो लोगों में घटित होता है। यदि परमेश्वर में अपनी आस्था में तुम केवल अपनी देह को अधीन करने और सहने और पीड़ा भुगतने के बारे में जानते हो, और तुम यह नहीं जानते हो कि यह सही है या गलत, यह तो और भी कम जानते हो कि यह किसकी खातिर किया जाता है तो ऐसा अभ्यास बदलाव का निमित्त कैसे बन सकता है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (3)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 203
पूर्ण बनाए जाने का क्या अर्थ है? जीत लिए जाने का क्या अर्थ है? जीत लिए जाने हेतु लोगों को किन मानदंडों पर खरा उतरना अनिवार्य है? और पूर्ण बनाए जाने के लिए उन्हें किन मानदंडों पर खरा उतरना अनिवार्य है? जीत लिया जाना और पूर्ण किया जाना दोनों मनुष्य को पूर्ण करने के लिए हैं, ताकि उसे उसके वास्तविक रूप में लौटाया जा सके और उसे उसके शैतानी भ्रष्ट स्वभावों और शैतान के प्रभाव से मुक्त किया जा सके। यह जीत लिया जाना मनुष्य को आकार देने की प्रक्रिया में सबसे पहले आता है; यह कार्य का पहला कदम है। पूर्ण किया जाना दूसरा कदम है, और वह समापन-कार्य है। सभी लोगों को जीत लिए जाने की प्रक्रिया से होकर गुजरना आवश्यक है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो उनके पास परमेश्वर को जानने का कोई तरीका नहीं होगा, न ही वे यह जानेंगे कि परमेश्वर है, अर्थात उनके लिए परमेश्वर को स्वीकार करना असंभव होगा। और यदि लोग परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते, तो परमेश्वर द्वारा उन्हें पूर्ण किया जाना भी असंभव होगा, चूँकि वे इस संपूर्णता के मानदंड पर खरा नहीं उतरते। यदि तुम परमेश्वर को स्वीकार ही नहीं करते, तो तुम उसे जान कैसे सकते हो? तुम उसका अनुसरण कैसे कर सकते हो? तुम उसके लिए गवाही नहीं दे सकोगे, उसे संतुष्ट करने के लिए विश्वास रखने की तो बात ही अलग है। अतः जो भी व्यक्ति पूर्ण किया जाना चाहता है, उसके लिए पहला कदम जीत लिए जाने के कार्य से होकर गुज़रना है। यह पहली शर्त है। परंतु जीत लिया जाना और पूर्ण बनाया जाना, दोनों का उद्देश्य लोगों को आकार देना और उन्हें परिवर्तित करना है, और दोनों में से प्रत्येक, मनुष्य के प्रबंधन के कार्य का अंग है। किसी व्यक्ति को पूर्ण बनाने के ये दो कदम हैं और दोनों अपरिहार्य हैं। यह सच है कि “जीत लिया जाना” सुनने में ज्यादा अच्छा नहीं लगता, परंतु वास्तव में, किसी को जीत लिए जाने की प्रक्रिया ही उसे परिवर्तित किए जाने की प्रक्रिया है। एक बार जब तुम्हें जीत लिया जाता है, तो तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव पूरी तरह से भले ही उतार न फेंके गए हों, पर तुम उन्हें जान चुके होगे। विजय के कार्य के माध्यम से तुम अपनी निम्न मानवता को और साथ ही अपने विद्रोहीपन को भी काफी हद तक अच्छी तरह जान चुके होगे। यद्यपि तुम विजय के कार्य की छोटी अवधि में उन्हें उतार फेंकने या बदल देने में असमर्थ होगे, पर तुम उन्हें जान चुके होगे, और यह तुम्हारी पूर्णता की नींव रखेगा। इस तरह जीता जाना और पूर्ण किया जाना दोनों ही लोगों को बदलने के लिए, उन्हें उनके शैतानी भ्रष्ट स्वभावों से छुटकारा दिलाने के लिए किए जाते हैं, ताकि वे स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर को दे सकें। बात बस इतनी है कि जीत लिया जाना लोगों के स्वभाव बदलने में पहला कदम है, और साथ ही यह लोगों द्वारा परमेश्वर को पूरी तरह से दिए जाने का भी पहला कदम है, और यह पूर्ण किए जाने के कदम से निम्न है। एक जीत लिए गए व्यक्ति के जीवन का स्वभाव एक पूर्ण किए गए व्यक्ति के स्वभाव की तुलना में बहुत कम बदलता है। “जीत लिया जाना” और “पूर्ण किया जाना” ये अलग-अलग नाम दिए गए हैं क्योंकि वे कार्य के भिन्न चरण हैं और लोगों को भिन्न अपेक्षित मानकों पर रखते हैं; जीत लिया जाना उन्हें निम्न स्तरों पर और पूर्ण किया जाना उच्च स्तर पर रखता है। पूर्ण किए गए लोग धार्मिक लोग हैं, जिन्हें पावनीकृत किया गया है; वे मानवता के प्रबंधन के कार्य के स्फटिक रूप या अंतिम उत्पाद हैं। यद्यपि वे पूर्ण मानव नहीं हैं, फिर भी वे ऐसे लोग हैं, जो अर्थपूर्ण जीवन जीने का प्रयास करते हैं। जबकि जीते गए लोग परमेश्वर के अस्तित्व को मात्र जबान से स्वीकार करते हैं और केवल ये स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर ने देहधारण किया है, कि वचन देह में प्रकट हुआ है, और परमेश्वर पृथ्वी पर न्याय और ताड़ना का कार्य करने के लिए आया है। इसके अलावा, वे यह स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर का न्याय, ताड़ना, प्रहार और शोधन, सब मनुष्य के लिए लाभप्रद हैं। उन्होंने मनुष्य जैसा होना बस आरंभ ही किया है। उनके पास जीवन की कुछ अंतर्दृष्टियाँ अवश्य हैं, परंतु अभी भी वह उनके लिए अस्पष्ट बना हुआ है। दूसरे शब्दों में, वे अभी थोड़ी मानवता को धारण करना आरंभ कर ही रहे हैं। ये जीत लिए जाने के परिणाम हैं। जब लोग पूर्णता के मार्ग पर कदम रखते हैं, तो उनका पुराना स्वभाव बदल सकता है। इसके अतिरिक्त, उनके जीवन निरंतर विकसित होते रहते हैं, और वे धीरे-धीरे सत्य में और गहरे प्रवेश करते जाते हैं। वे संसार से और उन सभी से घृणा करने में सक्षम होते हैं, जो सत्य का अनुसरण नहीं करते। विशेष रूप से वे न केवल स्वयं से घृणा करते हैं, परंतु उससे अधिक, वे स्वयं को स्पष्ट रूप से जानते हैं। वे सत्य के अनुसार जीने को तैयार होते हैं और वे सत्य के अनुसरण को अपना लक्ष्य बनाते हैं और वे अपने मस्तिष्क द्वारा उत्पन्न विचारों के भीतर जीवन जीने के लिए तैयार नहीं हैं। वे मनुष्य की आत्मतुष्टि, अकड़ और दंभ के प्रति घृणा महसूस करते हैं, वे औचित्य की सशक्त भावना के साथ बोलते हैं, चीजों का सामना करते समय उनमें विवेक और बुद्धि होती है, और वे परमेश्वर के प्रति वफादार और समर्पित होते हैं। यदि वे ताड़ना और न्याय की किसी घटना का अनुभव करते हैं, तो न केवल वे नकारात्मक और दुर्बल नहीं बनते, बल्कि वे परमेश्वर की इस ताड़ना और न्याय के प्रति आभारी होते हैं, यह विश्वास करते हुए कि वे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के बिना नहीं रह सकते; कि वे उसकी रक्षा करते हैं। वे लोग शांति और आनंद की आस्था और पेट भरने की खोज में रहने का अनुसरण नहीं करते। न ही वे अस्थायी दैहिक आनंद के पीछे भागते हैं। पूर्ण किए गए लोगों के पास यह होता है। जीत लिए जाने के पश्चात लोग स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर है, किन्तु यह स्वीकृति उनमें सीमित ढंग से अभिव्यक्त होती है। वचन के देह में प्रकट होने का वास्तव में क्या अर्थ है? देहधारण का क्या अर्थ है? देहधारी परमेश्वर ने क्या किया है? उसके कार्य का लक्ष्य और मायने क्या हैं? उसके कार्य को इतना अधिक अनुभव करने के पश्चात, देह में उसके कर्मों को अनुभव करने के पश्चात, तुमने क्या प्राप्त किया है? इन सब चीज़ों को समझने के बाद ही तुम जीते गए व्यक्ति होगे। यदि तुम मात्र यही कहते हो मैं स्वीकार करता हूँ कि परमेश्वर है, परंतु उस चीज़ का त्याग नहीं करते जिसका त्याग तुम्हें करना चाहिए, और तुम तब दैहिक आनंद छोड़ने में असफल रहते हो जब उन्हें छोड़ने का समय होता है, इसके बजाय हमेशा की तरह तुम दैहिक सुख-सुविधाओं की लालसा करना जारी रखते हो, और यदि तुम भाइयों और बहनों के प्रति पूर्वाग्रहों का त्याग करने में असमर्थ हो, और अनेक सरल अभ्यास करने में किसी कीमत का भुगतान नहीं करते, तो यह प्रमाणित करता है कि तुम्हें अभी भी जीता जाना बाक़ी है। उस मामले में, चाहे तुम बहुत अधिक समझते भी हो, तो भी यह सब व्यर्थ होगा। जीते गए लोग वे हैं, जिन्होंने कुछ आरंभिक बदलाव और आरंभिक प्रवेश प्राप्त कर लिया है। परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव लोगों को परमेश्वर का प्रारंभिक ज्ञान और सत्य की प्रारंभिक समझ देता है। तुम बहुत-से अधिक गहन, अधिक विस्तृत सत्यों की वास्तविकता में पूर्णतः प्रवेश करने में अक्षम हो सकते हो, परंतु तुम अनेक आधारभूत सत्यों का अभ्यास करने में सक्षम होते हो, जैसे कि तुम्हारे दैहिक आनंद या अपने वास्तविक जीवन में तुम्हारी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से संबंधित सत्य। यह सब बेशक जीते जाने की प्रक्रिया के दौरान लोगों में प्राप्त होने वाला प्रभाव है। विजितों के स्वभाव में परिवर्तन देखे जा सकते हैं; उदाहरण के लिए, जिस तरह वे पहनते-ओढ़ते और स्वयं को स्टाइल करते हैं, और जिस तरह वे जीते हैं—ये सब बदल सकते हैं। परमेश्वर में विश्वास का उनका दृष्टिकोण बदल जाता है, वे अपने अनुसरण के लक्ष्य में स्पष्ट होते हैं, और उनके अधिक बड़े संकल्प होते हैं। विजय के कार्य के दौरान उनके जीवन स्वभाव में अनुरूपी बदलाव भी होते हैं, लेकिन वे उथले, प्राथमिक और उन बदलावों से कहीं कम होते हैं, जो पूर्ण बनाए गए लोगों के स्वभाव और खोज के लक्ष्यों में होते हैं। यदि जीते जाने के दौरान व्यक्ति का स्वभाव बिल्कुल नहीं बदलता और वह कोई सत्य प्राप्त नहीं करता, तो यह व्यक्ति कचरा और पूर्णतः अनुपयोगी है! जो लोग जीते नहीं गए हैं, वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते! यदि कोई व्यक्ति मात्र जीते जाने का प्रयास करता है, तो उसे पूरी तरह से पूर्ण नहीं किया जा सकता, भले ही उसके स्वभाव ने विजय के कार्य के दौरान कुछ अनुरूपी बदलाव दिखाए हों। वह स्वयं को प्राप्त प्रारंभिक सत्य भी खो देगा। जीते गए और पूर्ण किए गए लोगों के स्वभावों में होने वाले बदलाव में बहुत अंतर होता है। परंतु जीत लिया जाना बदलाव में पहला कदम है; यह नींव है। इस आरंभिक बदलाव की कमी इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानता, क्योंकि यह ज्ञान न्याय से आता है, और यह न्याय विजय के कार्य का मुख्य अंग है। इस प्रकार, पूर्ण बनाए गए सभी लोगों को पहले जीते जाने से होकर गुज़रना चाहिए, अन्यथा उनके लिए पूर्ण बनाए जाने का कोई मार्ग नहीं है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (4)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 204
आज मैं तुम लोगों को तुम्हारे ही अस्तित्व के लिए इस प्रकार इसलिए नसीहत देता हूँ, ताकि मेरा कार्य सुचारु रूप से आगे बढ़े और पूरे ब्रह्मांड के भीतर मेरा उद्घाटन कार्य अधिक उचित और उत्तम ढंग से क्रियान्वित किया जा सके। मैं प्रत्येक देश और राष्ट्र के लोगों के लिए अपने वचनों, अधिकार, प्रताप और न्याय को प्रकट करता हूँ। जो कार्य मैं तुम लोगों के बीच करता हूँ, वह संपूर्ण ब्रह्मांड के भीतर मेरे कार्य का आरंभ है। यद्यपि अभी अंत के दिन चल रहे हैं, याद रहे कि “अंत के दिन” केवल एक युग का नाम है, एक नाम जो एक युग को संदर्भित करता है; ठीक व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के समान यह अंतिम कुछ वर्षों या महीनों के बजाय एक संपूर्ण युग को इंगित करता है। फिर भी अंत के दिन अनुग्रह के युग और व्यवस्था के युग से भिन्न हैं। अंत के दिनों का कार्य इस्राएल में कार्यान्वित नहीं किया जाता है, बल्कि अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच किया जाता है; यह कार्य मेरे सिंहासन के सामने इस्राएल के बाहर के सभी राष्ट्रों और कबीलों के लोगों पर विजय प्राप्त करता है ताकि ब्रह्मांड में मेरी महिमा सृष्टिमंडल और नभमंडल को भर सके। यह इसलिए है ताकि मैं और अधिक महिमा प्राप्त कर सकूँ, ताकि पृथ्वी के सभी सृजित प्राणी मेरी महिमा को अनगिनत राष्ट्रों तक, बाद की पीढ़ियों में हमेशा के लिए फैला सकें, और स्वर्ग एवं पृथ्वी के सभी सृजित प्राणी उस समस्त महिमा को देख सकें जो मैंने पृथ्वी पर अर्जित की है। अंत के दिनों के दौरान कार्यान्वित किया जाने वाला कार्य विजय का कार्य है। यह पृथ्वी के समस्त लोगों को अपना पार्थिव जीवन जीने का मार्गदर्शन देना नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी पर मानवजाति के सहस्रों-वर्ष लंबे, अविनाशी दुःख के जीवन का अंत है। परिणामस्वरूप, अंत के दिनों का कार्य इस्राएल में हुए कार्य के समान नहीं हो सकता जो कई हजार वर्षों तक चला था और न ही यह यहूदिया में हुए कार्य के समान हो सकता है जो केवल कुछ वर्षों तक चला और फिर परमेश्वर के दूसरे देहधारण तक दो सहस्राब्दियों तक जारी रहा। अंत के दिनों के लोग केवल देह में आए मुक्तिदाता के पुनः प्रकटन से मेलजोल करते हैं, और वे परमेश्वर के व्यक्तिगत कार्य और वचन को प्राप्त करते हैं। अंत के दिनों की समाप्ति में दो हजार वर्ष नहीं लगेंगे; वे संक्षिप्त हैं, उस समय की तरह जैसे जब यीशु ने यहूदिया में अनुग्रह के युग का कार्य किया था। ऐसा इसलिए है क्योंकि अंत के दिनों का संबंध संपूर्ण युग का समापन करने से है। वे परमेश्वर की छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना को पूरा और समाप्त करने के बारे में हैं और मनुष्य के दुःखों की जीवन यात्रा का समापन करने के बारे में हैं। वे समस्त मानवजाति को अगले युग में ले जाने या मानवजाति का जीवन जारी रहने देने के बारे में नहीं हैं; इसका मेरी प्रबंधन योजना या मनुष्य के अस्तित्व के लिए कोई महत्व नहीं होगा। यदि मानवजाति इसी प्रकार चलती रही, तो वह देर-सवेर दुष्ट दानव द्वारा पूरी तरह निगल ली जाएगी और वे आत्माएँ जो मेरी हैं अंततः पूरी तरह इसके हाथों बर्बाद हो जाएँगी। मेरा कार्य केवल छह हजार वर्षों तक चलता है और मैंने समस्त मानवजाति पर उस दुष्ट का नियंत्रण भी छह हजार वर्षों तक ही चलते रहने की अनुमति दी है। इसलिए, अब समय पूरा हुआ। मैं अब और न तो जारी रखना चाहता हूँ और न ही विलंब करना चाहता हूँ : अंत के दिनों के दौरान मैं शैतान को परास्त कर दूँगा, मैं अपनी संपूर्ण महिमा वापस ले लूँगा और मैं पृथ्वी पर उन सभी आत्माओं को वापस ले लूँगा जो मेरी हैं, ताकि ये व्यथित आत्माएँ दुःख के सागर से बच सकें और इस प्रकार पृथ्वी पर मेरे समस्त कार्य का समापन होगा। इस दिन के बाद से मैं पृथ्वी पर फिर कभी देहधारी नहीं बनूँगा और फिर कभी मेरा आत्मा, जो सबका संप्रभु है, पृथ्वी पर कार्य नहीं करेगा। मैं पृथ्वी पर केवल एक मानवजाति की पुनर्रचना करूँगा, एक ऐसी मानवजाति जो पावनीकृत है और जो पृथ्वी पर मेरा विश्वासयोग्य शहर है। पर जान लो कि मैं संपूर्ण संसार को जड़ से नहीं मिटाऊँगा, न ही मैं समस्त मानवजाति का संहार करूँगा। मैं उस शेष तृतीयांश को रखूँगा—वह तृतीयांश जो मेरे द्वारा पूरी तरह से जीत लिया गया है और जो मुझसे प्रेम करता है और मैं इस तृतीयांश को पृथ्वी पर फलने-फूलने और बढ़ने दूँगा, ठीक वैसे जैसे इस्राएली व्यवस्था के तहत करते थे; उन्हें प्रचुर मात्रा में भेड़ें और मवेशी मिलेंगे जिनसे मैं उनका पोषण करता हूँ, साथ ही पृथ्वी की सारी समृद्धि मिलेगी। यह मानवजाति हमेशा मेरे साथ रहेगी, मगर यह आज की घोर रूप से गंदी मानवजाति नहीं होगी, बल्कि वह मानवजाति होगी जो मेरे द्वारा प्राप्त किए गए सभी लोगों का समूह है। इस प्रकार की मानवजाति शैतान द्वारा नष्ट, बाधित या घेरी नहीं जाएगी और वही एकमात्र मानवजाति होगी जो मेरे शैतान को हरा देने के बाद पृथ्वी पर जीना जारी रखेगी। यही वह मानवजाति है, जो आज मेरे द्वारा जीत ली गई है और जिसे मेरी प्रतिज्ञा हासिल है। और इसलिए, अंत के दिनों में जीती गई मानवजाति भी वही मानवजाति है जो बची रहेगी और जिसे मेरे अनंत आशीष प्राप्त होंगे। वे शैतान पर मेरी विजय का एकमात्र प्रमाण होंगे और शैतान से मेरे युद्ध का एकमात्र विजयोपहार। युद्ध के ये विजयोपहार मेरे द्वारा शैतान की सत्ता से बचाए गए हैं और ये मेरी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना की एकमात्र सारगर्भित निष्पत्ति और फल हैं। ये संपूर्ण ब्रह्मांड के हर राष्ट्र और संप्रदाय, हर स्थान और देश से हैं। ये भिन्न-भिन्न जातियों के हैं, भिन्न-भिन्न भाषाओं, रीति-रिवाजों और त्वचा के रंगों वाले हैं और ये विश्व के हर देश और संप्रदाय में और यहाँ तक कि संसार के हर कोने में भी फैले हैं। अंततः वे पूर्ण मानवजाति बनाने के लिए साथ आएँगे, लोगों का एक समूह, जिस तक शैतान की शक्तियाँ नहीं पहुँच सकतीं। मानवजाति के बीच जिन लोगों को मेरे द्वारा बचाया और जीता नहीं गया है, वे ख़ामोशी से समुद्र की गहराइयों में डूब जाएँगे, और मेरी भस्म करने वाली लपटों द्वारा हमेशा के लिए जला दिए जाएँगे। मैं इस पुरानी, अत्यधिक गंदी मानवजाति को जड़ से उसी तरह मिटाऊँगा, जैसे मैंने मिस्र की पहली संतानों, मवेशियों और भेड़ों को जड़ से मिटाया था, केवल इस्राएलियों को छोड़ा था, जिन्होंने मेमने का माँस खाया, मेमने का लहू पिया और अपने दरवाज़े की चौखटों को मेमने के लहू से चिह्नित किया। क्या जो लोग मेरे द्वारा जीत लिए गए हैं और मेरे परिवार के हैं, वे भी ऐसे लोग नहीं, जो उस मेमने का माँस खाते हैं जो मैं हूँ और उस मेमने का लहू पीते हैं जो मैं हूँ और जिन्हें मेरे द्वारा छुटकारा दिलाया गया है और जो मेरी आराधना करते हैं? क्या ऐसे लोगों के साथ हमेशा मेरी महिमा नहीं बनी रहती? क्या वे लोग जो उस मेमने के, यानी कि मेरे माँस के बिना हैं, बहुत पहले ही चुपचाप सागर की गहराइयों में नहीं डूब गए हैं? आज तुम मेरा प्रतिरोध करते हो और आज मेरे वचन ठीक इस्राएल के पुत्रों और पौत्रों को यहोवा द्वारा कहे गए वचनों जैसे हैं। फिर भी तुम लोगों के हृदय की गहराइयों में हठधर्मिता है और तुम मेरे क्रोध का संचय कर रहे हो, अपनी देह पर और अधिक दुःख, अपने पापों पर और अधिक न्याय और अपनी अधार्मिकता पर और अधिक क्रोध ला रहे हो। जब आज तुम लोग मुझसे ऐसा व्यवहार करते हो तो मेरे क्रोध के दिन किसे बख्शा जा सकता है? ताड़ना की मेरी आँखों से किसकी अधार्मिकता बच सकती है? किसके अधर्म मुझ सर्वशक्तिमान के हाथों से बच सकते हैं? किसका प्रतिरोध मुझ सर्वशक्तिमान के न्याय से बच सकता है? मैं, यहोवा इस प्रकार तुम लोगों से, अन्यजातियों के परिवार के वंशजों से बात करता हूँ और जिन वचनों को मैं तुम लोगों से कहता हूँ, वे व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के सभी कथनों से बढ़कर हैं, फिर भी तुम लोग मिस्र के सभी लोगों से अधिक हठधर्मी हो। जब मैं शांति से कार्य करता हूँ तो क्या तुम लोग मेरे क्रोध को संचित नहीं करते हो? कैसे तुम लोग मुझ सर्वशक्तिमान के दिन से बिना चोट खाए बच सकते हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कोई भी जो देह में है, क्रोध के दिन से नहीं बच सकता
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 205
तुम लोगों को अपना सर्वस्व मेरे कार्य के लिए अर्पित कर देना चाहिए। तुम्हें वह कार्य करना चाहिए, जिससे मुझे लाभ हो। मैं तुम लोगों को वह सब समझाने के लिए तैयार हूँ, जो तुम लोग नहीं समझते, ताकि तुम लोग मुझसे वह सब प्राप्त कर सको, जिसका तुम लोगों में अभाव है। यद्यपि तुम लोगों के दोष इतने ज्यादा हैं कि गिने नहीं जा सकते, फिर भी, तुम लोगों को अपनी अंतिम दया प्रदान करते हुए, मैं तुम लोगों पर वह कार्य करते रहने के लिए तैयार हूँ जो मुझे करना चाहिए, ताकि तुम लोग मुझसे लाभान्वित हो सको और वह महिमा प्राप्त कर सको, जो तुम लोगों में अनुपस्थित है और जिसे संसार ने कभी देखा नहीं है। मैंने इतने अधिक वर्षों तक कार्य किया है, फिर भी किसी मनुष्य ने मुझे कभी जाना नहीं है। मैं तुम लोगों को वे रहस्य बताने के लिए तैयार हूँ, जो मैंने कभी किसी और को नहीं बताए हैं।
मनुष्यों के बीच मैं वह आत्मा था जिसे वे देख नहीं सकते थे, वह आत्मा जिसके साथ वे कभी जुड़ नहीं सकते थे। पृथ्वी पर अपने कार्य के तीन चरणों (संसार का सृजन, छुटकारा और विनाश) के कारण मैं उनके बीच अपना कार्य करने के लिए भिन्न-भिन्न समयों पर प्रकट होता हूँ (सार्वजनिक रूप से कभी नहीं)। पहली बार मैं मनुष्यों के बीच छुटकारे के युग के दौरान आया था। निस्संदेह मैं एक यहूदी परिवार में आया; इसलिए पृथ्वी पर परमेश्वर का आगमन देखने वाले पहले लोग यहूदी थे। मैंने इस कार्य को व्यक्तिगत रूप से इसलिए किया, क्योंकि छुटकारे का अपना कार्य करने के लिए मैं अपने देहधारी शरीर का उपयोग पाप-बलि के रूप में करना चाहता था। इस प्रकार मुझे सबसे पहले देखने वाले अनुग्रह के युग के यहूदी थे। यह पहली बार था जब मैंने देह में कार्य किया था। राज्य के युग में मेरा कार्य जीतना और पूर्ण बनाना है, इसलिए मैं अभी भी देह में रहकर ही अपना चरवाही का कार्य करता हूँ। यह दूसरी बार है जब मैं देह में कार्य कर रहा हूँ। कार्य के अंतिम दो चरणों में लोग जिसके साथ जुड़ते हैं वह अदृश्य, अमूर्त आत्मा नहीं है, बल्कि एक व्यक्ति है जो देह के रूप में साकार आत्मा है। इस प्रकार मनुष्य की नजरों में मैं पुनः इंसान बन जाता हूँ, जिसमें परमेश्वर का कोई संकेत नहीं है। इतना ही नहीं, जिस परमेश्वर को लोग देखते हैं वह न सिर्फ नर, बल्कि नारी भी है, जो उनके लिए सबसे अधिक विस्मयकारी और उलझन में डालने वाली बात है। मेरे बार-बार किए गए असाधारण कार्य ने बरसों से चले आ रहे पुराने विश्वास चकनाचूर कर दिए हैं। लोग स्तब्ध हैं! परमेश्वर केवल पवित्र आत्मा, आत्मा, सात गुना तीव्र आत्मा या सर्व-समावेशी आत्मा ही नहीं है, बल्कि एक मनुष्य भी है—एक साधारण मनुष्य, एक अत्यधिक सामान्य मनुष्य। वह नर ही नहीं, नारी भी है। वे इस बात में एक-समान हैं कि वे दोनों ही मनुष्यों से जन्मे हैं और इस बात में असमान हैं कि एक पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आया और दूसरा मनुष्य से जन्मा, किंतु सीधे आत्मा से उत्पन्न है। वे इस बात में एक-समान हैं कि परमेश्वर के दोनों देहधारी शरीरों ने परमपिता परमेश्वर के कार्य का बीड़ा उठा लिया है और असमान इस बात में हैं कि एक ने छुटकारे का कार्य किया, जबकि दूसरा विजय का कार्य करता है। दोनों परमपिता परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन एक प्रेममय-करुणा और दयालुता से भरा मुक्तिदाता है और दूसरा कोप और न्याय से भरा धार्मिकता का परमेश्वर है। एक सर्वोच्च सेनापति है जिसने छुटकारे का कार्य आरंभ किया, जबकि दूसरा धार्मिक परमेश्वर है जो विजय का कार्य संपन्न करता है। एक आरंभ है, दूसरा अंत। एक निष्पाप देह है, दूसरा वह देह जो छुटकारे को पूरा करता है, कार्य जारी रखता है और कभी भी पापी नहीं है। दोनों एक ही आत्मा हैं, लेकिन वे भिन्न-भिन्न देहों में वास करते हैं और भिन्न-भिन्न स्थानों पर पैदा हुए थे और उनके बीच कई हजार वर्षों का अंतर है। फिर भी उनका संपूर्ण कार्य एक-दूसरे का पूरक है, कभी परस्पर-विरोधी नहीं है, और एक-दूसरे के तुल्य है। दोनों ही मनुष्य हैं, लेकिन एक बालक था और दूसरी बालिका। इन तमाम वर्षों में लोगों ने न सिर्फ आत्मा को और न केवल एक मनुष्य, एक पुरुष को देखा है, बल्कि बहुत सारी ऐसी चीजें भी देखी हैं, जो मानव-धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं; इसलिए मनुष्य कभी मेरी पूरी तरह थाह नहीं ले पाते हैं और वे मुझ पर आधा विश्वास और आधा संदेह करते रहते हैं—मानो मैं विद्यमान तो हूँ, लेकिन मैं एक भ्रामक सपना भी हूँ—यही कारण है कि आज तक भी लोग नहीं जानते कि परमेश्वर क्या है। क्या तुम वास्तव में मुझे एक सरल वाक्य में समेट सकते हो? क्या तुम सचमुच यह कहने का साहस करते हो, “यीशु और कोई नहीं बल्कि परमेश्वर है, और परमेश्वर और कोई नहीं बल्कि यीशु है”? क्या तुम सचमुच इतने निर्भीक हो कि यह कह सको, “परमेश्वर और कोई नहीं बल्कि आत्मा है, और आत्मा और कोई नहीं बल्कि परमेश्वर है”? क्या तुम यह कहने का साहस करते हो, “परमेश्वर केवल देह ओढ़े हुए एक मनुष्य है”? क्या तुममें सचमुच दृढ़तापूर्वक यह कहने का साहस है, “यीशु की छवि परमेश्वर की महान छवि है”? क्या तुम अपनी साहित्यिक प्रतिभा का उपयोग करके परमेश्वर के स्वभाव और उसकी छवि को पूरी तरह समझा सकते हो? क्या तुम वास्तव में यह कहने की हिम्मत करते हो, “परमेश्वर ने अपनी छवि के अनुरूप सिर्फ नरों की रचना की, नारियों की नहीं”? अगर तुम ऐसा कहते हो, तो फिर मेरे चुने हुए लोगों के बीच कोई नारी नहीं होगी, नारियाँ मानवजाति का एक वर्ग तो बिल्कुल भी नहीं होंगी। अब क्या तुम वास्तव में जानते हो कि परमेश्वर क्या है? क्या परमेश्वर मनुष्य है? क्या परमेश्वर आत्मा है? क्या परमेश्वर वास्तव में एक पुरुष है? क्या जो कार्य मुझे करना है, वह केवल यीशु ही पूरा कर सकता है? अगर तुम मेरा सार संक्षेप में बताने के लिए उपर्युक्त में से केवल एक को ही चुनते हो तो तुम एक ऐसे समर्पित विश्वासी हो जो अत्यंत अज्ञानी है। अगर मैं केवल एक बार देहधारण का कार्य करता, क्या तुम लोग मुझे सीमित कर देते? क्या तुम सचमुच एक झलक में मुझे पूरी तरह समझ सकते हो? क्या तुम अपने जीवनकाल में जिन बातों से रूबरू हुए हो उनके आधार पर मुझे सचमुच पूरी तरह समेट सकते हो? अगर मैंने अपने दोनों देहधारणों में एक समान कार्य किया होता तो तुम लोग मुझे किस रूप में देखते? क्या तुम मुझे हमेशा के लिए सलीब पर कीलों से ठोंका हुआ छोड़ दोगे? क्या परमेश्वर उतना सरल हो सकता है जितना तुम दावा करते हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 206
पिछले दो युगों के कार्य का एक चरण इस्राएल में पूरा किया गया, और एक यहूदिया में। सामान्य तौर पर कहा जाए तो, इस कार्य का कोई भी चरण इस्राएल छोड़कर नहीं गया, और प्रत्येक चरण पहले चुने गए लोगों पर किया गया। परिणामस्वरूप, इस्राएली मानते हैं कि यहोवा परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है। चूँकि यीशु ने यहूदिया में कार्य किया, जहाँ उसने सूली पर चढ़ाए जाने का काम पूरा किया, इसलिए यहूदी उसे यहूदी लोगों के उद्धारक के रूप में देखते हैं। वे सोचते हैं कि वह केवल यहूदियों का राजा है, अन्य किसी का नहीं; वह अंग्रेजों को छुटकारा दिलाने वाला प्रभु नहीं है, न ही अमेरिकियों को छुटकारा दिलाने वाला प्रभु, बल्कि वह इस्राएलियों को छुटकारा दिलाने वाला प्रभु है, और इस्राएल में भी उसने यहूदियों को छुटकारा दिलाया। वास्तव में, परमेश्वर सभी चीज़ों का संप्रभु है। वह सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर है। वह केवल इस्राएलियों का परमेश्वर नहीं है, न यहूदियों का; बल्कि वह सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर है। उसके कार्य के पिछले दो चरण इस्राएल में हुए और इसकी वजह से लोगों ने कुछ निश्चित धारणाएँ विकसित कर ली हैं। वे मानते हैं कि यहोवा ने अपना कार्य इस्राएल में किया, और स्वयं यीशु ने अपना कार्य यहूदिया में किया, और इतना ही नहीं, यीशु ने यह कार्य देह में किया। चाहे जो भी हो, उन्हें लगता है कि यह कार्य इस्राएल से आगे नहीं बढ़ा। परमेश्वर ने मिस्रियों या भारतीयों पर कार्य नहीं किया; उसने केवल इस्राएलियों पर कार्य किया। लोग इस प्रकार विभिन्न धारणाएँ बना लेते हैं, वे परमेश्वर के कार्य को एक निश्चित दायरे में सीमित कर देते हैं। वे कहते हैं कि जब परमेश्वर कार्य करता है, तो अवश्य ही उसे ऐसा चुने हुए लोगों पर और इस्राएल में करना चाहिए; इस्राएलियों के अलावा परमेश्वर किसी अन्य पर कार्य नहीं करता, न ही उसके कार्य का कोई बड़ा दायरा है। वे देहधारी परमेश्वर को नियंत्रित करने में विशेष रूप से सख़्त हैं और उसे इस्राएल की सीमा से बाहर नहीं जाने देते। क्या ये सब मानवीय धारणाएँ मात्र नहीं हैं? परमेश्वर ने संपूर्ण स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजें बनाईं, उसने सभी सृजित प्राणी बनाए, तो वह अपने कार्य को केवल इस्राएल तक सीमित कैसे रख सकता है? अगर ऐसा होता, तो उसके तमाम सृजित प्राणी बनाने का क्या तुक था? उसने पूरी दुनिया को बनाया, और उसने अपनी छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना केवल इस्राएल में नहीं, बल्कि ब्रह्मांड में प्रत्येक व्यक्ति पर कार्यान्वित की। चाहे तुम जो कोई भी हो—चीनी, अमेरिकी, अंग्रेज, रूसी—प्रत्येक व्यक्ति आदम का वंशज है; वे सब परमेश्वर के बनाए हुए हैं। उनमें से एक भी सृजित प्राणियों के दायरे से बाहर नहीं जा सकता और उनमें से एक भी खुद को “आदम का वंशज” होने की उपाधि से अलग नहीं कर सकता। वे सभी सृजित प्राणी हैं, वे सभी आदम की संतानें हैं, और वे सभी आदम और हव्वा के भ्रष्ट वंशज भी हैं। केवल इस्राएली ही सृजित प्राणी नहीं हैं, बल्कि सभी लोग सृजित प्राणी हैं; बस इतना ही है कि कुछ को शाप दिया गया है, और कुछ को आशीष। इस्राएलियों के बारे में कई स्वीकार्य बातें हैं; परमेश्वर ने आरंभ में उन पर कार्य किया क्योंकि वे सबसे कम भ्रष्ट थे। चीनियों की उनसे तुलना नहीं की जा सकती; वे उनसे बहुत हीन हैं। इसलिए, आरंभ में परमेश्वर ने इस्राएलियों के बीच कार्य किया, और उसके कार्य का दूसरा चरण केवल यहूदिया में संपन्न हुआ—जिसके कारण मनुष्यों के बीच बहुत सारी धारणाएँ और विनियम बन गए हैं। वास्तव में, यदि परमेश्वर मनुष्य की धारणाओं के अनुसार कार्य करता, तो वह केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर होता, और इस प्रकार वह अन्यजाति-राष्ट्रों के बीच अपने कार्य को फैलाने में असमर्थ होता, क्योंकि वह केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर होता, सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर नहीं। भविष्यवाणियों में कहा गया है कि यहोवा का नाम अन्य-जाति राष्ट्रों में सम्मान पाएगा, कि वह अन्य-जाति राष्ट्रों में फैल जाएगा। यह भविष्यवाणी क्यों की गई थी? यदि परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर होता, तो वह केवल इस्राएल में ही कार्य करता। इतना ही नहीं, वह इस कार्य का विस्तार न करता, और वह ऐसी भविष्यवाणी न करता। चूँकि उसने यह भविष्यवाणी की थी, इसलिए वह निश्चित रूप से अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच, प्रत्येक देश में और समस्त भूमि पर अपने कार्य को फैलाएगा। चूँकि उसने ऐसा कहा है, इसलिए वह ऐसा ही करेगा; यह उसकी योजना है, क्योंकि वह स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीज़ों का सृष्टिकर्ता प्रभु और सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर है। चाहे वह इस्राएलियों पर कार्य करता हो या संपूर्ण यहूदिया में, वह जो कार्य करता है, वह संपूर्ण ब्रह्मांड और संपूर्ण मानवता का कार्य होता है। आज जो कार्य वह बड़े लाल अजगर के देश—एक अन्य-जाति राष्ट्र में—करता है, वह भी संपूर्ण मानवता का कार्य है। इस्राएल पृथ्वी पर उसके कार्य का आधार हो सकता है; इसी प्रकार, अन्यजाति-राष्ट्रों के बीच चीन भी उसके कार्य का आधार हो सकता है। क्या उसने अब इस भविष्यवाणी को पूरा नहीं किया है कि “यहोवा का नाम अन्यजाति-राष्ट्रों में महान होगा”? अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच उसके कार्य का पहला चरण यह कार्य है, जिसे वह बड़े लाल अजगर के देश में कर रहा है। देहधारी परमेश्वर का इस राष्ट्र में कार्य करना और इन शापित लोगों पर कार्य करना विशेष रूप से मनुष्य की धारणाओं के विपरीत है; ये लोग सबसे निम्न स्तर के हैं, इनका कोई मूल्य नहीं है, और इन्हें यहोवा ने आरंभ में त्याग दिया था। लोगों को दूसरे लोगों द्वारा त्यागा जा सकता है, परंतु यदि वे परमेश्वर द्वारा त्यागे जाते हैं, तो किसी की भी हैसियत उनसे कम नहीं होगी, और किसी का भी मूल्य उनसे कम नहीं होगा। एक सृजित प्राणी के लिए शैतान द्वारा वश में किया जाना या लोगों द्वारा त्याग दिया जाना बहुत कष्टदायक चीज है—परंतु किसी सृजित प्राणी को उसके सृष्टिकर्ता द्वारा त्याग दिए जाने का अर्थ है कि उसका रुतबा सबसे निचले स्तर पर है। मोआब के वंशज शापित थे और वे इस पिछड़े देश में पैदा हुए थे; निःसंदेह अंधकार के प्रभाव से ग्रस्त सभी लोगों में मोआब के वंशजों का रुतबा सबसे कम है। चूँकि अब तक ये लोग सबसे कम रुतबे वाले रहे हैं, इसलिए उन पर किया गया कार्य मनुष्य की धारणाओं को सबसे अधिक खंडित करता है और परमेश्वर की संपूर्ण छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना के लिए सबसे लाभदायक भी है। इन लोगों पर ऐसा कार्य करना मनुष्य की धारणाओं को खंडित करने में सबसे अधिक सक्षम है और इसके साथ परमेश्वर एक युग का सूत्रपात करता है; इसके साथ वह मनुष्य की सभी धारणाओं को खंडित कर देता है; इसके साथ वह संपूर्ण अनुग्रह के युग के कार्य का समापन करता है। उसका शुरुआती कार्य इस्राएल की सीमाओं के भीतर यहूदिया में किया गया था; अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच उसने नए युग का सूत्रपात करने के लिए कोई कार्य नहीं किया। कार्य का अंतिम चरण न केवल अन्य-जातियों पर किया जा रहा है; बल्कि इससे भी अधिक, उन लोगों पर किया जा रहा है, जिन्हें शापित किया गया है। यह एक बिंदु शैतान को अपमानित करने के लिए सबसे सक्षम प्रमाण है, और इस प्रकार, परमेश्वर ब्रह्मांड में सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर, सभी चीज़ों का प्रभु, और सभी जीवधारियों की आराधना की वस्तु “बन” जाता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर समस्त सृजित प्राणियों का प्रभु है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 207
आज ऐसे लोग हैं, जो अभी भी नहीं समझते कि परमेश्वर ने कौन-सा नया कार्य आरंभ किया है। अन्यजाति-राष्ट्रों में परमेश्वर ने एक नई शुरुआत की है। उसने एक नया युग प्रारंभ किया है और एक नया कार्य शुरू किया है—और वह इस कार्य को मोआब के वंशजों पर कर रहा है। क्या यह उसका नवीनतम कार्य नहीं है? युगों-युगों में पहले कभी किसी ने इस कार्य का अनुभव नहीं किया है। किसी ने कभी इसके बारे में नहीं सुना है, समझना तो दूर की बात है। परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर की चमत्कारिकता, परमेश्वर का अथाहपन, परमेश्वर की महानता, परमेश्वर की पवित्रता, सब कार्य के इस चरण के माध्यम से प्रकट किए जाते हैं, जो कि अंत के दिनों का कार्य है। क्या यह नया कार्य नहीं है, ऐसा कार्य, जो मानव की धारणाओं को खंडित करता है? ऐसे लोग भी हैं, जो इस प्रकार सोचते हैं : “चूँकि परमेश्वर ने मोआब को शाप दिया था और कहा था कि वह मोआब के वंशजों का त्याग कर देगा, तो वह उन्हें अब कैसे बचा सकता है?” ये अन्यजाति के वे लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा शाप दिया गया था और इस्राएल से बाहर निकाल दिया गया था; इस्राएली उन्हें “अन्यजाति के कुत्ते” कहते थे। हरेक की दृष्टि में, वे न केवल अन्यजाति के कुत्ते हैं, बल्कि उससे भी बदतर, विनाश के पुत्र हैं; कहने का तात्पर्य यह कि वे परमेश्वर द्वारा चुने हुए लोग नहीं हैं। भले ही शुरुआत में वे इस्राएल की सीमाओं के भीतर पैदा हुए, फिर भी वे इस्राएल के लोगों का हिस्सा नहीं हैं; और अन्य-जाति राष्ट्रों में निष्कासित कर दिए गए थे। ये सबसे हीन लोग हैं। चूँकि वे मानवता के बीच सबसे निचले स्तर पर हैं, यही कारण है कि परमेश्वर एक नए युग को आरंभ करने का अपना कार्य उन पर करता है, क्योंकि वे भ्रष्ट मानवता के प्रतिनिधि हैं। परमेश्वर का कार्य अविवेकपूर्ण और उद्देश्यहीन नहीं है; जो कार्य वह आज इन लोगों पर करता है, वह सृजित प्राणियों पर किया जाने वाला कार्य भी है। नूह परमेश्वर का एक सृजित प्राणी था, जैसे कि उसके वंशज भी हैं। दुनिया में हाड़-मांस से बना कोई भी प्राणी परमेश्वर का सृजित प्राणी है। परमेश्वर का कार्य सभी सृजित प्राणियों पर निर्देशित है; यह इस बात पर आधारित नहीं है कि सृजित किए जाने के बाद किसी को शापित किया गया है या नहीं। उसका प्रबंधन कार्य सभी सृजित प्राणियों पर निर्देशित है, केवल उन चुने हुए लोगों पर नहीं, जिन्हें शापित नहीं किया गया है। चूँकि परमेश्वर अपने सृजित प्राणियों पर अपना कार्य करने का इरादा रखता है, इसलिए वह इसे निश्चित रूप से सफलतापूर्वक पूरा करेगा, और वह उन लोगों पर कार्य करेगा जो उसके कार्य के लिए लाभदायक हैं। इसलिए, जब वह लोगों पर कार्य करता है, तो सभी विनियमों को तोड़ देता है; “शापित,” “ताड़ित” और “धन्य” शब्द उसके लिए अस्तित्व में नहीं हैं! यहूदी लोग अच्छे हैं, इस्राएल के चुने हुए लोग भी अच्छे हैं; वे उच्च काबिलियत और अच्छी मानवता वाले लोग हैं। प्रारंभ में यहोवा ने उन्हीं पर अपना कार्य आरंभ किया, और अपना सबसे पहला कार्य किया—परंतु आज उन्हें विजय के कार्य का प्राप्तकर्ता बनाना अर्थहीन होगा। वे भी सृजित प्राणियों का एक हिस्सा हो सकते हैं और उनमें बहुत-कुछ सकारात्मक हो सकता है, किंतु उन पर कार्य के इस चरण को कार्यान्वित करना बेमतलब होगा; यह लोगों को जीत पाने में सक्षम नहीं होगा, न ही यह सभी सृजित प्राणियों को समझाने में सक्षम होगा। यही उसके द्वारा अपने कार्य को बड़े लाल अजगर के देश के इन लोगों तक ले जाने का आशय है। यहाँ सबसे अधिक महत्वपूर्ण उसके द्वारा एक युग आरंभ करना, उसके द्वारा सभी विनियमों और सभी मानवीय धारणाओं को तोड़ना और उसके द्वारा संपूर्ण अनुग्रह के युग के कार्य का समापन करना है। यदि उसका वर्तमान कार्य फिर भी इस्राएलियों पर किया गया होता, तो जब तक उसकी छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना समाप्त होने को आती, हर कोई यह विश्वास करने लगता कि परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है, कि केवल इस्राएली ही परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं और यह कि केवल इस्राएली ही परमेश्वर का आशीष और प्रतिज्ञा विरासत में पाने योग्य हैं। अंत के दिनों के दौरान बड़े लाल अजगर के अन्य-जाति राष्ट्र में परमेश्वर का देहधारी होना सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर होने का उसका कार्य पूरा करता है; उसका संपूर्ण प्रबंधन कार्य पूरा करता है और बड़े लाल अजगर के देश में उसके प्रबंधन कार्य के केंद्रीय भाग को समाप्त करता है। कार्य के इन तीनों चरणों के मूल में मनुष्य का उद्धार है—अर्थात, सभी सृजित प्राणियों से सृष्टिकर्ता की आराधना करवाना। इस प्रकार, कार्य के प्रत्येक चरण का बहुत बड़ा अर्थ है; परमेश्वर ऐसा कुछ नहीं करता जिसका कोई अर्थ या मूल्य न हो। एक ओर, कार्य का यह चरण एक नए युग का सूत्रपात और पिछले दो युगों का अंत करता है; दूसरी ओर, यह लोगों की समस्त धारणाओं और लोगों के विश्वास के सभी पुराने तरीकों को और चीजों को समझने के पुराने तरीकों को खंडित करता है। पिछले दो युगों का कार्य मनुष्य की विभिन्न धारणाओं के अनुसार किया गया था; किंतु यह चरण मनुष्य की धारणाओं को पूरी तरह मिटा देता है, और ऐसा करके वह मानवजाति को पूरी तरह से जीत लेता है। मोआब के वंशजों पर किए गए कार्य के माध्यम से उसके वंशजों को जीतकर परमेश्वर संपूर्ण ब्रह्मांड के लोगों को जीत लेगा। यह उसके कार्य के इस चरण का गहनतम अर्थ है, और यही उसके कार्य के इस चरण का सबसे मूल्यवान पहलू है। भले ही तुम अब जानते हो कि तुम्हारा अपना स्थान निम्न है और तुम कम मूल्य के हो, फिर भी तुम यह महसूस करोगे कि तुमने एक बहुत बड़ा आशीष विरासत में प्राप्त किया है और इतना बड़ा वादा प्राप्त किया है, और यह कि तुम परमेश्वर के इस महान कार्य को पूरा करने में सहायता कर सकते हो, तुम परमेश्वर का असली मुखमंडल देख सकते हो, तुम परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव को जान सकते हो और तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चल सकते हो, जो तुम्हें सबसे आनंददायक चीज लगती है। परमेश्वर के कार्य के पिछले दो चरण इस्राएल में संपन्न किए गए थे। यदि अंत के दिनों के दौरान उसके कार्य का यह चरण भी इस्राएलियों पर किया जाता, तो न केवल सभी सृजित प्राणी मान लेते कि केवल इस्राएली ही परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं, बल्कि परमेश्वर की संपूर्ण प्रबंधन योजना भी अपना वांछित परिणाम प्राप्त न कर पाती। जिस समय इस्राएल में उसके कार्य के दो चरण पूरे किए गए थे, उस दौरान अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच न तो कोई नया कार्य—न ही नया युग प्रारंभ करने का कोई कार्य—किया गया था। कार्य का आज का चरण—एक नए युग के सूत्रपात का कार्य—पहले अन्यजाति-राष्ट्रों में किया जा रहा है, और इतना ही नहीं, प्रारंभ में मोआब के वंशजों पर किया जा रहा है; इस प्रकार संपूर्ण युग का आरंभ किया गया है। परमेश्वर ने मनुष्य की धारणाओं में निहित किसी भी ज्ञान को बाकी नहीं रहने दिया और सब खंडित कर दिया। विजय प्राप्त करने के अपने कार्य में उसने मानवीय धारणाओं को और चीजों को समझने के लोगों के पुराने, आरंभिक तरीकों को ध्वस्त कर दिया है। वह लोगों को देखने देता है कि परमेश्वर पर कोई विनियम लागू नहीं होते, कि परमेश्वर के मामले में कुछ भी पुराना नहीं है, कि वह जो कार्य करता है वह पूरी तरह से स्वतंत्र है, पूरी तरह से मुक्त है, और कि वह अपने समस्त कार्य में सही है। वह सृजित प्राणियों पर जो भी कार्य करता है, उसके प्रति तुम्हें पूरी तरह से समर्पित होना चाहिए। उसके समस्त कार्य का अर्थ होता है, और यह उसके इरादों और बुद्धि के अनुसार किया जाता है, मनुष्य की पसंद और धारणाओं के अनुसार नहीं। अगर कोई चीज उसके कार्य के लिए लाभदायक होती है, तो वह उसे करता है; और अगर कोई चीज उसके कार्य के लिए लाभदायक नहीं होती, तो वह उसे नहीं करता, चाहे वह कितनी ही अच्छी क्यों न हो! वह कार्य करता है और अपने कार्य के अर्थ और प्रयोजन के अनुसार अपने कार्य के प्राप्तकर्ताओं और स्थान का चयन करता है। कार्य करते हुए वह पुराने विनियमों से चिपका नहीं रहता, न ही वह पुराने सूत्रों का पालन करता है। इसके बजाय, वह अपने कार्य की योजना उसके मायने के अनुसार बनाता है। अंततः वह वास्तविक प्रभाव और प्रत्याशित लक्ष्य प्राप्त करेगा। यदि तुम आज इन बातों को नहीं समझते, तो इस कार्य का तुम पर कोई प्रभाव नहीं होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर समस्त सृजित प्राणियों का प्रभु है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 208
परमेश्वर के कार्य की बाधाएं कितनी बड़ी हैं? क्या कभी किसी ने जाना है? गहरे जमे अंधविश्वासों द्वारा बंदी बनाए लोगों में से कौन परमेश्वर के सच्चे चेहरे को जानने में सक्षम है? इतने उथले और बेतुके पिछड़े सांस्कृतिक ज्ञान के साथ वे कैसे परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों को पूरी तरह से समझ सकते हैं? यहाँ तक कि आमने-सामने बोलने और अच्छी तरह से बोलकर समझाने पर भी वे कैसे समझ सकते हैं? कभी-कभी ऐसा लगता है, मानो परमेश्वर के वचन बहरे कानों में पड़े हों : लोगों की थोड़ी-सी भी प्रतिक्रिया नहीं होती, वे बस अपना सिर हिलाते हैं और समझते कुछ नहीं। यह चिंताजनक कैसे न हो? इस “दूरस्थ,[1] प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास और सांस्कृतिक ज्ञान” ने लोगों के ऐसे नाकाबिल समूह को पोषित किया है। यह प्राचीन संस्कृति—बहुमूल्य विरासत—कबाड़ का ढेर है! यह बहुत पहले ही एक चिरस्थायी शर्मिंदगी बन गई, और उल्लेख करने लायक भी नहीं है! इसने लोगों को परमेश्वर का विरोध करने की चालें और तकनीकें सिखा दी हैं, और राष्ट्रीय शिक्षा के “सुव्यवस्थित, सौम्य मार्गदर्शन”[2] ने लोगों को परमेश्वर के प्रति और भी अधिक विद्रोही बना दिया है। परमेश्वर के कार्य का हर हिस्सा अत्यंत कठिन है, और पृथ्वी पर अपने कार्य का हर कदम परमेश्वर के लिए परेशान करने वाला रहा है। पृथ्वी पर उसका कार्य कितना कठिन है! पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य के कदम बहुत कष्टसाध्य हैं : मनुष्य की कमजोरियों, कमियों, बचपने, अज्ञानता और मनुष्य की हर चीज के लिए परमेश्वर सूक्ष्म योजनाएँ बनाता है और ध्यानपूर्वक विचार करता है। मनुष्य एक कागज़ी बाघ की तरह है, जिसे कोई छेड़ने या भड़काने की हिम्मत नहीं करता; हल्के-से स्पर्श से ही वह पलटकर काट लेता है, या फिर नीचे गिर जाता है और अपना रास्ता भूल जाता है, और ऐसा लगता है, मानो एकाग्रता की थोड़ी-सी कमी होने पर वह पुनः वापस चला जाता है, या फिर परमेश्वर की उपेक्षा करता है, या अपने शरीर की अशुद्ध चीजों में लिप्त होने के लिए अपने सूअरों और कुत्तों जैसे माता-पिताओं की ओर भागता है। यह कितनी बड़ी बाधा है! व्यावहारिक रूप से परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक कदम पर उसकी परीक्षा ली जाती है, और लगभग हर कदम पर परमेश्वर को बड़े खतरे का जोखिम होता है। उसके वचन निष्कपट, ईमानदार और द्वेषरहित हैं, फिर भी कौन उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार है? कौन पूरी तरह से आत्मसमर्पण करने के लिए तैयार है? इससे परमेश्वर का दिल टूट जाता है। वह मनुष्य के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत करता है, वह मनुष्य के जीवन के लिए चिंता से घिरा रहता है, और वह मनुष्य की कमज़ोरी के साथ सहानुभूति रखता है। उसने अपने द्वारा बोले गए सभी वचनों के लिए अपने कार्य के प्रत्येक चरण में कई उतार-चढ़ावों का सामना किया है; वह हमेशा आगे कुआं और पीछे खाई वाली परिस्थिति में फँसा रहता है, और दिन-रात बार-बार मनुष्य की कमज़ोरी, विद्रोहीपन, बचकानेपन, नाजुकपन ... के बारे में सोचता है। इसे किसने कभी भी जाना है? वह किस पर विश्वास कर सकता है? कौन समझ पाएगा? वह हमेशा मनुष्य के पापों, हिम्मत की कमी और दुर्बलता से घृणा करता है, और वह हमेशा मनुष्य की भेद्यता के बारे में चिंता करता है, और वह मनुष्य के आगे के मार्ग के बारे में विचार करता है। हमेशा, जब वह मनुष्य के वचनों और कर्मों को देखता है, तो वह दया और क्रोध से भर जाता है, और हमेशा इन चीजों को देखने से उसके दिल में दर्द पैदा होता है। निर्दोष, आखिरकार, सुन्न हो चुके हैं; परमेश्वर क्यों हमेशा उनके लिए चीजों को मुश्किल करे? कमज़ोर मनुष्य में दृढ़ता की बहुत कमी होती है; परमेश्वर क्यों हमेशा उसके लिए अदम्य क्रोध रखे? कमज़ोर और निर्बल मनुष्य में थोड़ा-सा भी जीवट नहीं है; परमेश्वर क्यों हमेशा उसके विद्रोहीपन के लिए उसे झिड़के? स्वर्ग में परमेश्वर की धमकियों का कौन-सामना कर सकता है? आखिरकार, मनुष्य नाज़ुक है, और हताशा की स्थितियों में है, परमेश्वर ने अपना क्रोध अपने दिल की गहराई में धकेल दिया है, ताकि मनुष्य धीरे-धीरे आत्म-चिंतन कर सके। फिर भी गंभीर संकट में फँसा मनुष्य परमेश्वर के इरादों की थोड़ी-सी भी कद्र नहीं करता; मनुष्य को शैतानों के बूढ़े सम्राट द्वारा अपने पैरों तले कुचल दिया गया है, फिर भी वह पूरी तरह से अनजान है, वह हमेशा स्वयं को परमेश्वर के विरुद्ध रखता है, या फिर वह न तो उसके प्रति उत्साहित है, न उदासीन। परमेश्वर ने कई वचन कहे हैं, फिर भी किसने उन्हें कभी भी गंभीरता से लिया है? मनुष्य परमेश्वर के वचनों को नहीं समझता, फिर भी वह अविचलित और उत्कंठा-रहित रहता है; उसने वास्तव में कभी भी बूढ़े दानव का सार नहीं जाना है। लोग रसातल में, नरक में रहते हैं, लेकिन मानते हैं कि वे समुद्र-तल के महल में रहते हैं; उन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा सताया जाता है, फिर भी वे स्वयं को बड़े लाल अजगर की सत्ता के “कृपापात्र”[3] मानते हैं; दानव द्वारा उन्हें मूर्ख बनाया जाता है, फिर भी उन्हें लगता है कि वे देह के उत्कृष्ट कला-कौशल का आनंद ले रहे हैं। कैसा घटिया, नीच अभागों का समूह है यह! मनुष्य का दुर्भाग्य से पाला पड़ चुका है, लेकिन उसे इसका पता नहीं है, और इस अंधेरे समाज में वह एक के बाद एक दुर्घटनाओं का सामना करता है,[4] फिर भी वह इसके प्रति जागृत नहीं हुआ है। कब वह खुद के प्रति उदार होने के अपने स्वभाव को और अपने दासता के स्वभाव को त्याग पाएगा? क्यों वह परमेश्वर के हृदय के प्रति विचारशील नहीं है? क्या वह चुपचाप इस दमन और कठिनाई को सहता रहता है? क्या वह उस दिन की कामना नहीं करता, जब वह अंधेरे को प्रकाश में बदल सके? क्या वह उस न्याय और सत्य को प्राप्त करना नहीं चाहता है जिसे दबाया गया है? क्या वह लोगों द्वारा सत्य को अस्वीकार किए जाने और तथ्यों को तोड़े-मरोड़े जाने को देखते रहने और कुछ न करने का इच्छुक है? क्या वह इस अन्याय को सहते रहना चाहता है? क्या वह गुलाम होने के लिए तैयार है? क्या वह इस असफल राज्य के गुलामों के साथ परमेश्वर के हाथों नष्ट होने को तैयार है? कहाँ है तुम्हारा संकल्प? कहाँ है तुम्हारी महत्वाकांक्षा? कहाँ है तुम्हारी गरिमा? कहाँ है तुम्हारी सत्यनिष्ठा? कहाँ है तुम्हारी स्वतंत्रता? क्या तुम शैतानों के सम्राट, बड़े लाल अजगर को अपना पूरा जीवन अर्पित करना[5] चाहते हो? क्या तुम ख़ुश हो कि वह तुम्हें यातना देते-देते मौत के घाट उतार दे? गहराई का चेहरा अराजक और काला है, जबकि सामान्य लोग ऐसे दुखों का सामना करते हुए स्वर्ग की ओर देखकर रोते हैं और पृथ्वी से शिकायत करते हैं। मनुष्य कब अपने सिर को ऊँचा रख पाएगा? मनुष्य दुर्बल और क्षीण है, वह इस क्रूर और अत्याचारी शैतान से कैसे मुकाबला कर सकता है? वह क्यों नहीं जितनी जल्दी हो सके, परमेश्वर को अपना जीवन सौंप देता? वह क्यों अभी भी डगमगाता है? वह कब परमेश्वर का कार्य समाप्त कर सकता है? इस प्रकार उसे निरुद्देश्य ढंग से तंग और प्रताड़ित किया गया है और उसका पूरा जीवन अंततः व्यर्थ ही बीता है; उसे आने और विदा होने की इतनी जल्दी क्यों है? वह परमेश्वर को देने के लिए कोई अनमोल चीज़ क्यों नहीं रखता? क्या वह घृणा की सहस्राब्दियों को भूल गया है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (8)
फुटनोट :
1. “दूरस्थ” का प्रयोग उपहास में किया गया है।
2. “सुव्यवस्थित, सौम्य मार्गदर्शन” का प्रयोग उपहास में किया गया है।
3. “कृपापात्र” शब्द का प्रयोग उन लोगों का उपहास करने के लिए किया गया है, जो काठ जैसे होते हैं और जिन्हें स्वयं के बारे में कोई जानकारी नहीं होती।
4. “एक के बाद एक दुर्घटनाओं का सामना करता है” इस ओर इशारा करता है कि बड़े लाल अजगर के देश में पैदा हुए लोग अपना सिर ऊँचा रखने में असमर्थ हैं।
5. “पूरा जीवन अर्पित करना” अपमानजनक अर्थ में कहा गया है।
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 209
आज के मार्ग पर चलना आसान नहीं है। कहा जा सकता है कि इसे पाना कठिन है, और यह युगों-युगों से बहुत दुर्लभ रहा है। किंतु किसने सोचा होगा कि मनुष्य की देह अकेले ही उसे बरबाद करने के लिए काफी होगी? आज का कार्य निश्चित रूप से वसंत की बारिश जितना कीमती है और मनुष्य के प्रति परमेश्वर की दया जैसा मूल्यवान है। फिर भी, अगर मनुष्य उसके वर्तमान कार्य के उद्देश्य को नहीं जानता या मानवजाति के सार को नहीं समझता, तो उसके कीमती और अमूल्य होने की बात कैसे बताई जा सकती है? देह मनुष्यों की अपनी नहीं है, इसलिए कोई स्पष्ट रूप से यह नहीं देख सकता कि उनका गंतव्य वास्तव में कहाँ होगा। फिर भी, तुझे यह अच्छी तरह से जानना चाहिए कि सृष्टिकर्ता मानवजाति को, जिसे सृजित किया गया था, उसकी मूल स्थिति में वापस लौटाएगा, और उसके सृजन के समय की उसकी मूल छवि को बहाल कर देगा। वह पूरी तरह से उस साँस को वापस ले लेगा, जो उसने मनुष्य में फूँकी थी, और उसके हाड़-मांस को वापस लेकर सब-कुछ सृष्टिकर्ता को लौटा देगा। वह मानवता को पूरी तरह से रूपांतरित और नवीकृत करेगा, और मनुष्य से परमेश्वर की पूरी विरासत वापस ले लेगा, जो मानवजाति की नहीं है, बल्कि परमेश्वर की है, और फिर कभी उसे मानव-जाति को नहीं सौंपेगा। इसका कारण यह है कि शुरू से ही उनमें से कुछ भी मानवजाति का नहीं है। वह वो सब-कुछ वापस ले लेगा—यह अनुचित लूट नहीं है, बल्कि यह स्वर्ग और पृथ्वी को उनकी मूल अवस्था में बहाल करने के साथ-साथ मनुष्य को रूपांतरित और नवीकृत करने के लिए है। यह मनुष्य के लिए उचित गंतव्य है, हालाँकि यह शायद देह को ताड़ना दिए जाने के बाद उसका पुनः ग्रहण नहीं होगा, जैसा कि लोग कल्पना कर सकते हैं। परमेश्वर देह के विनाश के बाद उसके कंकाल नहीं चाहता; वह मनुष्य के मूल तत्व चाहता है, जो शुरुआत में परमेश्वर के ही थे। इसलिए, वह मानवता का सफाया अथवा मनुष्य की देह को पूरी तरह से खत्म नहीं करेगा, क्योंकि देह मनुष्य की निजी संपत्ति नहीं है। बल्कि, यह परमेश्वर का अनुलग्नक है, जो मानव-जाति का प्रबंधन करता है। वह अपने “आनंद” के लिए मनुष्य की देह का सर्वनाश कैसे कर सकता है? अब तक क्या तूने सचमुच अपनी उस देह की संपूर्णता को त्याग दिया है, जिसका मूल्य एक फूटी कौड़ी भी नहीं है? यदि तू अंत के दिनों के तीस प्रतिशत कार्य को समझ सके (इस केवल तीस प्रतिशत का अर्थ है आज पवित्र आत्मा के कार्य के साथ-साथ अंत के दिनों में परमेश्वर के वचन के कार्य को समझना), तो तू आज की तरह अपनी देह की “सेवा” करना या उसके साथ “संतानोचित” व्यवहार करना जारी नहीं रखेगा, जो कई वर्षों से भ्रष्ट हो गई है। तुझे स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि मनुष्य अब एक अभूतपूर्व स्थिति में आगे बढ़ चुके हैं और अब वे इतिहास के पहियों की तरह आगे लुढ़कते नहीं रहेंगे। तेरी फफूंदी लगी हुई देह लंबे समय से मक्खियों से आच्छादित है, तो कैसे उसमें इतिहास के उन पहियों को उलटाने की शक्ति हो सकती है, जिन्हें परमेश्वर ने आज तक चलते रहने में समर्थ बनाया है? कैसे वह अंत के दिनों की चुपचाप टिकटिक करती घड़ी को दोबारा चालू कर सकती है और उसकी सुइयाँ घड़ी की दिशा में मोड़ सकती है? कैसे वह घने कोहरे में लिपटी प्रतीत होने वाली दुनिया को पुनः रूपांतरित कर सकती है? क्या तेरी देह पहाड़ों और नदियों को फिर से जीवित कर सकती है? क्या तेरी देह, जिसका छोटा-सा काम है, वास्तव में मानव की उस तरह की दुनिया को बहाल कर सकती है, जिसकी तूने लालसा की है? क्या तू वास्तव में अपने वंशजों को “मानव” बनने के लिए शिक्षित कर सकता है? क्या तू अब समझ सकता है? तेरी देह वास्तव में किस चीज की है? मानव को बचाने, उसे पूर्ण बनाने और उसे रूपांतरित करने का परमेश्वर का मूल इरादा तुझे एक खूबसूरत मातृभूमि देना या मनुष्य की देह को शांतिपूर्ण आराम प्रदान करना नहीं था; यह परमेश्वर की महिमा और गवाही के लिए था, भविष्य में मनुष्यों के बेहतर आनंद के लिए था, और इसलिए था कि वे शीघ्र ही आराम कर सकें। फिर भी, यह तेरी देह के लिए नहीं था, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन की पूँजी है और मनुष्य की देह एक अनुलग्नक मात्र है। (मानव वह प्राणी है जिसके पास आत्मा और शरीर दोनों है, जबकि देह केवल एक सड़ने वाली चीज है। इसका मतलब है कि देह प्रबंधन योजना में इस्तेमाल के लिए एक उपकरण है।) तुझे यह जानना चाहिए कि परमेश्वर का मनुष्य को पूर्ण बनाना, उसे पूर्ण करना और उसे प्राप्त करना, उसकी देह पर तलवारों और प्रहारों के साथ-साथ अंतहीन पीड़ा और आग से जलन, निष्ठुर न्याय, ताड़ना, शाप और असीम परीक्षणों के सिवाय कुछ नहीं लाता है। मानव का प्रबंधन करने के कार्य की वास्तविक कहानी और सच्चाई ऐसी है। किंतु इन सारी चीजों का निशाना मनुष्य की देह पर लगा हुआ है और शत्रुता के सारे तीरों का लक्ष्य निर्दयतापूर्वक मनुष्य की देह है (क्योंकि मनुष्य निर्दोष है)। यह सब परमेश्वर की महिमा और गवाही के लिए और उसके प्रबंधन के लिए है। इसका कारण यह है कि उसका कार्य केवल मानव-जाति के लिए नहीं है, बल्कि पूरी योजना के लिए भी है और साथ ही मानव-जाति के सृजन के समय का उसका मूल इरादा पूरा करने के लिए भी है। इसलिए, मनुष्य जो अनुभव करता है, उसका शायद नब्बे प्रतिशत पीड़ा और अग्नि-परीक्षण ही है और वे मीठे और सुखद दिन बहुत कम हैं या बिल्कुल नहीं हैं, जिनके लिए मनुष्य की देह लालायित रही है। परमेश्वर के साथ खूबसूरत समय बिताकर देह में सुखद पलों का आनंद लेना तो मनुष्य के लिए और भी असंभव है। देह मलिन है, इसलिए मनुष्य की देह जिस चीज को देखती या उसका आनंद लेती है, वह परमेश्वर की ताड़ना के अलावा और कुछ नहीं है, जिसे मनुष्य अपनी भावनाओं का लिहाज न रखने वाली समझता है, मानो उसमें सामान्य समझ की कमी हो। इसका कारण यह है कि परमेश्वर अपने धार्मिक स्वभाव को प्रकट करेगा, जो “मनुष्य की भावनाओं का लिहाज न रखने वाला” है, जो मनुष्य के अपमानों को बरदाश्त नहीं करता और दुश्मनों से घृणा करता है। परमेश्वर किसी भी आवश्यक तरीके से खुले तौर पर अपना संपूर्ण स्वभाव प्रकट करता है और इस तरह शैतान के साथ अपने छह-हजार-वर्षीय युद्ध का कार्य पूरा करता है—जो संपूर्ण मानव-जाति के उद्धार और पुराने शैतान के विनाश का कार्य है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मानव-जाति के प्रबंधन का उद्देश्य
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 210
अंत के दिन आ चुके हैं और विश्व भर के देशों में उथल-पुथल है। राजनीतिक अव्यवस्था है, सब जगह अकाल, महामारियाँ, बाढ़ें और सूखे दिखाई पड़ रहे हैं। मानव के संसार में आपदाएँ हैं; स्वर्ग ने भी विपदाएँ नीचे भेज दी हैं। ये अंत के दिनों के संकेत हैं। परंतु लोगों को यह उल्लास और वैभव का संसार प्रतीत होता है। यह संसार अधिकाधिक भड़कीला और लुभावना बनता जा रहा है, सारे लोगों के हृदय इसकी ओर खिंचे चले आते हैं और बहुत-से लोग जाल में फँस जाते हैं और स्वयं को इससे छुड़ा नहीं पाते हैं; बहुत अधिक संख्या में लोग उनके द्वारा गुमराह होंगे जो धोखेबाज़ी और जादू-टोने में लिप्त हैं। यदि तुम उन्नति के लिए कठोर प्रयास नहीं करते और आकांक्षाओं से रहित हो और तुमने सच्चे मार्ग में अपनी जड़ें नहीं जमाई हैं तो बुराई का ज्वार तुम्हें बहा ले जाएगा। चीन सभी देशों में सबसे पिछड़ा है; यह वह देश है जहाँ बड़ा लाल अजगर कुण्डली मारकर बैठा है, इसके पास ऐसे लोग सबसे अधिक हैं जो मूर्तियों की पूजा और जादू-टोने करते हैं, सबसे ज़्यादा मंदिर हैं, और यह ऐसा स्थान है जहाँ अशुद्ध आत्माएँ निवास करती हैं। तुम इसी से जन्मे थे, तुम इसी के द्वारा शिक्षित हुए हो और इसके प्रभाव से तरबतर हुए थे; तुम इसके द्वारा भ्रष्ट और पीड़ित किए गए हो, परंतु जागृत होने के पश्चात तुम इससे विद्रोह कर देते हो और परमेश्वर द्वारा पूर्णतः प्राप्त कर लिए जाते हो। यह परमेश्वर की महिमा है, और यही कारण है कि कार्य के इस चरण का अत्यधिक महत्व है। परमेश्वर ने इतने बड़े पैमाने का कार्य किया है, इतने अधिक वचन बोले हैं, और वह अंततः तुम लोगों को पूरी तरह प्राप्त कर लेगा—यह परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य का एक भाग है, और तुम शैतान के साथ परमेश्वर की लड़ाई के “विजय की लूट” हो। तुम लोग सत्य को जितना अधिक समझते हो और कलीसिया का तुम्हारा जीवन जितना बेहतर होता है, उतना ही अधिक वह बड़ा लाल अजगर उसके घुटनों पर लाया जाता है। ये सब आध्यात्मिक जगत के विषय हैं—ये आध्यात्मिक जगत की लड़ाइयाँ हैं, और जब परमेश्वर विजयी होगा तो शैतान लज्जित और धराशायी होगा। परमेश्वर के कार्य के इस चरण का विशालकाय महत्व है। परमेश्वर इतने विशाल पैमाने पर कार्य इसलिए करता है और लोगों के इस समूह को पूरी तरह इसलिए बचाता है ताकि तुम शैतान के प्रभाव से बच सको, पवित्र देश में रह सको, परमेश्वर की ज्योति में रह सको, और ज्योति की अगुआई और मार्गदर्शन पा सको। तब तुम्हारे जीवन का अर्थ है। तुम लोग जो खाते और पहनते हो, वह अविश्वासियों से भिन्न है; तुम लोग परमेश्वर के वचनों का आनंद लेते हो और सार्थक जीवन जीते हो—और वे किसका आनंद लेते हैं? वे बस अपने “पूर्वजों की विरासत” और अपनी “राष्ट्रीय भावना” का आनंद लेते हैं। उनमें लेश मात्र भी मानवता नहीं है! तुम लोगों के कपड़े और साज-शृंगार, शब्द और कार्य सब उनसे भिन्न हैं। तुम लोग अंततः गंदगी से पूरी तरह बच जाओगे, शैतान के प्रलोभन के फंदे में अब और नहीं फँसोगे, और प्रतिदिन परमेश्वर का पोषण प्राप्त करोगे। तुम लोगों को सदैव चौकन्ना रहना चाहिए। यद्यपि तुम गंदी जगह में रहते हो, किंतु तुम गंदगी से बेदाग़ हो और परमेश्वर के साथ रह सकते हो, उसकी उत्कृष्ट सुरक्षा प्राप्त कर सकते हो। परमेश्वर ने इस पीले देश के समस्त लोगों में से तुम लोगों को चुना है। क्या तुम सबसे धन्य लोग नहीं हो? तुम सृजित प्राणी हो—तुम्हें निस्संदेह परमेश्वर की आराधना और सार्थक जीवन का अनुसरण करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की आराधना नहीं करते हो बल्कि अपनी अशुद्ध देह के भीतर रहते हो, तो क्या तुम बस मानव भेष में जानवर नहीं हो? चूँकि तुम मानव प्राणी हो, इसलिए तुम्हें स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाना और सारे कष्ट सहने चाहिए! आज तुम्हें जो थोड़ा-सा कष्ट दिया जाता है, वह तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक और दृढ़तापूर्वक स्वीकार करना चाहिए और अय्यूब तथा पतरस के समान सार्थक जीवन जीना चाहिए। इस संसार में, मनुष्य दानव द्वारा दिए गए कपड़े पहनता है, दानव का दिया भोजन खाता है, दानव के नियंत्रण में कार्य और सेवा करता है और गंदगी में पूरी तरह ढँक जाने तक उसके पैरों तले रौंदा जाता है। उसने जीवन का अर्थ नहीं समझा है, न सच्चा मार्ग प्राप्त किया है—इस तरह जीने का क्या महत्व है? तुम वे लोग हो जो सही मार्ग का अनुसरण करते हो और सुधार की खोज करते हो। तुम लोग बड़े लाल अजगर के देश में उठ खड़े होते हो और उनमें हो जिन्हें परमेश्वर धार्मिक कहता है। क्या यह सबसे सार्थक जीवन नहीं है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (2)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 211
आज मैं तुम पर जो कार्य कर रहा हूँ, वो तुम्हें सामान्य मानवता के जीवन में ले जाने के लिए है; यह नए युग के आरंभ और मानवजाति को नए युग के जीवन में ले जाने के लिए है। इस कार्य का हर एक कदम सीधे तौर पर तुम लोगों के मध्य किया जाता है और विकसित होता है : मैं तुम लोगों को रूबरू शिक्षा देता हूँ और मैं तुम लोगों के हाथ पकड़कर ले जाता हूँ; मैं तुम लोगों को वो बातें बताता हूँ जिसकी तुम्हें समझ नहीं है; तुम्हें वो चीज़ें प्रदान करता हूँ जिनका तुम्हारे अंदर अभाव है। यह कहा जा सकता है कि यह सारा कार्य तुम लोगों के जीवन के लिए पोषण है, तुम लोगों को सामान्य मानवता के जीवन में ले जाने के लिए है; यह खास तौर से अंत के दिनों के दौरान लोगों के इस समूह को जीवन के लिए पोषण मुहैया कराने के लिए है। मेरे लिए, यह सारा कार्य पुराने युग का अंत करने और नए युग में ले जाने के लिए है; जहाँ तक शैतान का सवाल है, मैंने उसी को पराजित करने के लिए देहधारण किया। मैं तुम लोगों के बीच अब जो कार्य कर रहा हूँ, वह तुम लोगों का वर्तमान पोषण और सही समय पर तुम्हारा उद्धार है, लेकिन इन थोड़े-से वर्षों में, मैं तुम लोगों को सारा सत्य, जीवन का सारा मार्ग बता दूँगा, यहाँ तक कि भविष्य का कार्य भी बता दूँगा; भविष्य में यह तुम लोगों को सामान्य तौर पर चीज़ों का अनुभव करने में समर्थ बनाने के लिए पर्याप्त होगा। मेरे सारे वचन तुम लोगों को मेरे गंभीर निर्देश हैं। मैं और कोई निर्देश नहीं देता हूँ; आज मैंने तुम लोगों से जो सारे वचन बोले हैं, वे ही तुम लोगों को मेरे निर्देश हैं, क्योंकि आज तुम लोगों को मेरे बोले गए वचनों का कोई अनुभव नहीं है, और तुम लोग उनके आंतरिक अर्थ को नहीं समझते हो। एक दिन, तुम लोगों के अनुभव उसी तरह पूरे होंगे, जैसा कि आज मैंने कहा है। ये वचन तुम्हारे आज के दर्शन हैं, और भविष्य में तुम इन्हीं पर निर्भर रहोगे; वे आज तुम्हारे जीवन के लिए पोषण हैं और भविष्य के लिए गंभीर निर्देश हैं, इससे बेहतर निर्देश नहीं हो सकते थे। क्योंकि मेरे पास कार्य करने के लिए धरती पर उतना समय नहीं है जितना मेरे वचनों का अनुभव करने के लिए तुम्हारे पास है; मैं मात्र अपना कार्य पूरा कर रहा हूँ, जबकि तुम लोग जीवन का अनुसरण कर रहे हो, एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें जीवन की लंबी यात्रा शामिल है। बहुत-सी चीज़ों का अनुभव करने के बाद ही तुम जीवन के मार्ग को पूरी तरह से प्राप्त कर पाओगे; तभी तुम मेरे आज बोले गए वचनों के अंदर छिपे हुए अर्थ को समझ पाओगे। तुम सभी के पास तुम लोगों के हाथों में मेरे वचन हैं, तुममें से हर एक ने मेरे सभी आदेश प्राप्त कर लिए हैं और मुझे तुम लोगों को जो भी आदेश देना चाहिए था, वह मैंने दे दिया है। चाहे कितना भी बड़ा प्रभाव क्यों न प्राप्त हुआ हो, संक्षेप में, जब वचनों का कार्य समाप्त हो जाएगा, तब परमेश्वर की इच्छा कार्यान्वित हो चुकी होगी। ऐसा नहीं है जैसा तुम सोचते हो कि तुम्हें एक निश्चित स्तर तक बदलना होगा; परमेश्वर तुम्हारी धारणाओं के अनुसार कार्य नहीं करता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (7)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 212
अंत के दिनों में परमेश्वर ने वह कार्य करने के लिए, जो उसे करना चाहिए, और अपने वचनों की सेवकाई करने के लिए देहधारण किया। वह उन लोगों को पूर्ण बनाने के लक्ष्य के साथ व्यक्तिगत रूप से मनुष्यों के मध्य कार्य करने के लिए आया जो उसके इरादों के अनुरूप हैं। सृष्टि के समय से लेकर आज तक केवल अंत के दिनों में ही उसने इस तरह का कार्य किया है। केवल अंत के दिनों के दौरान ही परमेश्वर ने इतने बड़े पैमाने का कार्य करने के लिए देहधारण किया है। यद्यपि वह कष्ट सहता है, जिन्हें सहना लोगों को मुश्किल लगेगा, और एक महान परमेश्वर होने के बावजूद भी वह खुद को विनम्र कर एक साधारण व्यक्ति बनाता है, उसका कार्य ज़रा-भी विलंबित नहीं हुआ है और उसकी योजना में थोड़ी भी गड़बड़ी नहीं हुई है—वह अपनी मूल योजना के अनुसार ही कार्य कर रहा है। इस देहधारण के उद्देश्यों में से एक उद्देश्य लोगों को जीतना है और दूसरा उद्देश्य उन लोगों को पूर्ण बनाना है, जिनसे वह प्रेम करता है। वह अपनी आँखों से उन लोगों को देखने की इच्छा रखता है, जिन्हें वह पूर्ण बनाता है, और वह खुद अपनी आँखों से अपने द्वारा पूर्ण बनाए गए लोगों को उसके लिए गवाही देते हुए देखना चाहता है। वे केवल एक या दो व्यक्ति नहीं हैं, जिन्हें पूर्ण बनाया जाता है। बल्कि, यह एक समूह है, जिसमें कुछ ही लोग शामिल हैं। इस समूह के लोग संसार के विभिन्न देशों और दुनिया की विभिन्न राष्ट्रीयताओं से आते हैं। वह इतना अधिक कार्य इस उद्देश्य से करता है ताकि इस समूह के लोगों को प्राप्त करे, उस गवाही को प्राप्त करे जो इस समूह के लोग उसके लिए देते हैं, और उस महिमा को प्राप्त करे जो वह लोगों के इस समूह से हासिल कर सकता है। वह ऐसा कोई भी कार्य नहीं करता, जिसका कोई महत्व नहीं होता, और न ही वह ऐसा कोई कार्य करता है, जिसका कोई मूल्य नहीं है। यह कहा जा सकता है कि इतना अधिक कार्य करने के पीछे परमेश्वर का उद्देश्य उन सभी लोगों को पूर्ण बनाना है, जिन्हें वह पूर्ण बनाना चाहता है। इससे बाहर जो उसके पास खाली समय है, उसमें वह उन लोगों को निकाल देगा, जो बुरे हैं। यह जान लो कि वह यह महान कार्य उन लोगों के कारण नहीं करता, जो दुष्ट हैं; इसके विपरीत, वह अपना सब-कुछ छोटी-सी संख्या वाले उन लोगों के कारण देता है, जिन्हें उसके द्वारा पूर्ण बनाया जाना है। जो कार्य वह करता है, जो वचन वह बोलता है, जो रहस्य वह खोलता है, और उसका न्याय और उसकी ताड़ना सब-कुछ उस छोटी-सी संख्या वाले लोगों के लिए ही है। वह उन लोगों के कारण देहधारी नहीं हुआ, जो दुष्ट हैं, और उनके कारण वह क्रोध से आगबबूला तो बिल्कुल भी नहीं होता। वह उन लोगों के कारण सत्य बोलता और प्रवेश की बात करता है, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है; उसने उनके कारण ही देह धारण किया, और उनके कारण ही वह अपनी प्रतिज्ञाएँ और आशीष प्रदान करता है। वह दुष्टों के लिए सत्य नहीं बोलता, प्रवेश की और मानवता में जीवन की बात नहीं करता है। वह उन लोगों से बात करने से बचना चाहता है, जो दुष्ट हैं, और उन लोगों पर समस्त सत्य उड़ेल देना चाहता है, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है। फिर भी उसके कार्य के लिए फिलहाल यह आवश्यक है कि दुष्टों को भी उसकी कुछ मूल्यवान चीज़ों का आनंद उठाने दिया जाए। जो लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते, जो परमेश्वर को संतुष्ट नहीं करते, और जो उसके कार्य में गड़बड़ी पैदा करते हैं, वे सभी दुष्ट हैं। उन्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता, और परमेश्वर उन्हें ठुकरा देता है। इसके विपरीत, जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं और जो परमेश्वर के कार्य के लिए अपना सर्वस्व खपा देते हैं, वे वो लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना है। परमेश्वर जिन लोगों को पूर्ण करने की इच्छा रखता है, वे कोई और नहीं बल्कि इस समूह के लोग ही हैं, और जो कार्य परमेश्वर करता है, वह इन्हीं लोगों के लिए है। जिस सत्य की वह बात करता है, वह उन लोगों की ओर ही निर्देशित किया जाता है, जो उसे अभ्यास में लाने की इच्छा रखते हैं। वह उन लोगों से बात नहीं करता, जो सत्य को अभ्यास में नहीं लाते। अंतर्दृष्टि की जिस वृद्धि और विवेक के जिस विकास की वह बात करता है, वे उन लोगों की ओर लक्षित हैं, जो सत्य का अभ्यास कर सकते हैं। जिस पूर्ण बनाए जाने की वह बात करता है वह भी इन्हीं लोगों पर लक्षित होता है। पवित्र आत्मा का कार्य उन लोगों की ओर निर्देशित होता है, जो सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हैं। बुद्धि और मानवता रखने जैसी बातें उन लोगों की ओर निर्देशित होती हैं, जो सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक होते हैं। जो लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते, वे सत्य के अनेक वचन सुन सकते हैं, परंतु चूँकि वे प्रकृति से बहुत दुष्ट हैं, और सत्य में रुचि नहीं रखते, इसलिए वे केवल सिद्धांत, शब्द और खोखली परिकल्पनाएँ ही समझते हैं, जिनका उनके जीवन प्रवेश के लिए जरा-सा भी महत्व नहीं है। उनमें से कोई भी परमेश्वर के प्रति निष्ठावान नहीं है; वे सभी वे लोग हैं, जो परमेश्वर को देखते तो हैं, किंतु उसे प्राप्त नहीं कर सकते; वे सभी परमेश्वर द्वारा दोषी ठहराए जाते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 213
विजय प्राप्त करने का मुख्य लक्ष्य लोगों को शुद्ध करना है, ताकि वे सत्य को धारण कर सकें, क्योंकि लोग सत्य बहुत कम समझते हैं! ऐसे लोगों पर विजय पाने का कार्य करने का गहनतम अर्थ है। तुम सभी लोग अंधकार के प्रभाव में आ गए हो और तुम्हें गहरा नुकसान पहुँचा है। अतः इस कार्य का लक्ष्य तुम लोगों को मानव-प्रकृति को जानने और परिणामस्वरूप सत्य को जीने में सक्षम बनाना है। पूर्ण बनाया जाना ऐसी चीज़ है, जिसे सभी सृजित प्राणियों को स्वीकार करना चाहिए। यदि इस चरण के कार्य में केवल लोगों को पूर्ण बनाना ही शामिल होता, तो इसे यूके या अमेरिका या इस्राएल में किया जा सकता था; इसे किसी भी राष्ट्र के लोगों पर किया जा सकता था। परंतु विजय का कार्य चयनात्मक है। विजय के कार्य का पहला चरण अल्पकालिक है; इतना ही नहीं, इसे शैतान को अपमानित करने और संपूर्ण ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। यह विजय का आरंभिक कार्य है। कहा जा सकता है कि परमेश्वर पर विश्वास करने वाले किसी भी सृजित प्राणी को पूर्ण बनाया जा सकता है, क्योंकि पूर्ण बनाया जाना ऐसा काम है, जिसे केवल एक दीर्घकालिक परिवर्तन के बाद ही हासिल किया जा सकता है। परंतु जीता जाना अलग बात है। जीत के लिए नमूना और आदर्श वे लोग होने चाहिए, जो सबसे पिछड़े हैं और सबसे गहनतम अंधकार में जी रहे हैं; वे सर्वाधिक तुच्छ लोग हैं जो परमेश्वर को सबसे कम स्वीकारते हैं तथा परमेश्वर के प्रति सर्वाधिक विद्रोही हैं। ठीक इसी प्रकार का व्यक्ति जीते जाने की गवाही दे सकता है। विजय के कार्य का मुख्य लक्ष्य शैतान को हराना है, जबकि लोगों को पूर्ण बनाने का लक्ष्य उन्हें प्राप्त करना है। विजय का यह कार्य यहाँ तुम जैसे लोगों पर इसलिए किया जा रहा है, ताकि तुम लोगों को जीते जाने के बाद गवाही देने में सक्षम बनाया जा सके। इसका लक्ष्य है विजय प्राप्त करने के बाद लोगों से गवाही दिलवाना। इन जीते गए लोगों का उपयोग शैतान को अपमानित करने का लक्ष्य हासिल करने के लिए किया जाएगा। तो, विजय का मुख्य तरीका क्या है? ताड़ना, न्याय, शाप देना और प्रकटन—लोगों को जीतने के लिए धार्मिक स्वभाव का उपयोग करना, ताकि वे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के कारण पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएँ। लोगों को जीतने के लिए वचन की वास्तविकता और अधिकार का उपयोग करना—ऐसा कर देना कि वे पूरी तरह आश्वस्त हो जाएँ—यही जीते जाने का अर्थ है। जो लोग पूर्ण बनाए जा चुके हैं, वे जीते जाने के बाद न केवल समर्पण कर पाने में सक्षम होते हैं, बल्कि वे न्याय के कार्य का ज्ञान प्राप्त करने, अपने स्वभाव को बदलने और परमेश्वर को जानने में भी समर्थ होते हैं। वे परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग का अनुभव करते हैं और सत्य से भर जाते हैं। वे परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में समर्थ होते हैं, वे परमेश्वर के लिए दुःख उठाने में समर्थ होते हैं और उनके पास अपना संकल्प होता है। पूर्ण किए गए लोग वे हैं जिन्हें परमेश्वर के वचन का अनुभव होने के कारण सत्य की व्यावहारिक समझ होती है। जीते गए लोग वे हैं, जो सत्य को जानते हैं परंतु जिन्होंने सत्य के वास्तविक अर्थ को नहीं समझा है। जीते जाने के बाद वे समर्पण करते हैं, परंतु उनका समर्पण उनके द्वारा प्राप्त किए गए न्याय का परिणाम होता है। उन्हें कई सत्यों के वास्तविक अर्थ की बिल्कुल भी समझ नहीं है। वे सत्य को मौखिक रूप से स्वीकारते हैं, परंतु उनके पास सत्य में प्रवेश नहीं है; वे सत्य को समझते हैं, परंतु उन्होंने सत्य का अनुभव नहीं किया है। पूर्ण बनाए जा रहे लोगों पर किए जा रहे कार्य में जीवन के पोषण के साथ-साथ ताड़ना और न्याय शामिल हैं। जो व्यक्ति सत्य में प्रवेश करने पर ध्यान देता है, वही पूर्ण बनाया जाने वाला व्यक्ति है। पूर्ण किए गए और जीते गए लोगों के मध्य अंतर इस बात में निहित है कि उन्होंने सत्य में प्रवेश किया है या नहीं। पूर्ण बनाए गए लोग वे हैं, जो सत्य को समझते हैं, सत्य में प्रवेश करते हैं और सत्य को जीते हैं; पूर्ण न बनाए जा सकने वाले लोग वे हैं, जो सत्य को नहीं समझते और सत्य में प्रवेश नहीं करते, अर्थात् जो सत्य को नहीं जीते हैं। यदि ऐसे लोग अब पूरी तरह समर्पण करने में समर्थ हैं, तो वे जीते जाते हैं। यदि जीते गए लोग सत्य को नहीं खोजते—यदि वे अनुसरण करते हैं परंतु सत्य को जीते नहीं, यदि वे सत्य को देखते और सुनते हैं किंतु सत्य के अनुसार जीने पर ध्यान नहीं देते—तो वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते। जिन लोगों को पूर्ण बनाया जाना है, वे पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर चलते हुए परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार सत्य का अभ्यास करते हैं। इसके माध्यम से वे परमेश्वर के इरादे पूरे करते हैं, और वे पूर्ण बना दिए जाते हैं। जो कोई भी विजय के कार्य का समापन होने से पूर्व अंत तक अनुसरण करता है, वह जीता गया होता है, परंतु उसे पूर्ण बनाया गया नहीं कहा जा सकता। “पूर्ण बनाए गए” उन लोगों को संदर्भित करता है, जो जीते जाने का कार्य समाप्त होने के बाद सत्य का अनुसरण करने में सक्षम होते हैं और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाएँगे। यह उन लोगों को संदर्भित करता है, जो जीते जाने का कार्य समाप्त होने के बाद विपत्ति में अडिग रहते हैं और सत्य को जीते हैं। जीते जाने से पूर्ण बनाए जाने को कार्य के चरणों की भिन्नताएँ और लोगों द्वारा सत्य को समझने तथा सत्य में प्रवेश करने की मात्रा की भिन्नताएँ अलग करती हैं। जिन लोगों ने पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर चलना आरंभ नहीं किया है, अर्थात् जो सत्य को धारण नहीं करते, वे अंततः अभी भी निकाल दिए जाएँगे। केवल वे लोग ही पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं, जो सत्य को धारण करते हैं और उसे जीते हैं। अर्थात्, जो पतरस की छवि को जीते हैं, वे पूर्ण बनाए गए हैं, जबकि बाकी सब जीते गए हैं। जीते जा रहे सभी लोगों पर किए जा रहे कार्य में शाप, ताड़ना और कोप शामिल हैं, और जो कुछ उन पर पड़ता है, वह धार्मिकता और शाप है। ऐसे व्यक्ति पर कार्य करना जरा भी नरमी दिखाए बिना उजागर करना है—उनके भीतर के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करना है, ताकि वे अपने आप इन्हें पहचान लें और पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएँ। एक बार जब मनुष्य पूरी तरह से समर्पित बन जाता है, तो विजय का कार्य समाप्त हो जाता है। यहाँ तक कि यदि अधिकतर लोग अभी भी सत्य को समझने की कोशिश नहीं करते, तो भी विजय का कार्य समाप्त हो जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल पूर्ण बनाया गया मनुष्य ही सार्थक जीवन जी सकता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 214
परमेश्वर मनुष्य को कैसे पूर्ण बनाता है, परमेश्वर का स्वभाव क्या है, उसके स्वभाव में क्या शामिल है—यदि मनुष्य इन सभी चीजों को स्पष्ट रूप से समझा सकता है, तो यह परमेश्वर के नाम का उद्घोष करना है, यह परमेश्वर की गवाही देना है और यह परमेश्वर का उत्कर्ष करना है। मनुष्य, परमेश्वर को जानने की बुनियाद के आधार पर, अंततः अपने जीवन स्वभाव में रूपांतरित हो जाएगा। जितनी अधिक मनुष्य की काट-छाँट की जाती है और जितना अधिक शोधन किया जाता है, उतना ही वह मज़बूत होता है; जितने अधिक परमेश्वर के कार्य के चरण होते हैं, उतना अधिक मनुष्य को पूर्ण बनाया जाता है। आज मनुष्य के अनुभव में, परमेश्वर के कार्य का हर एक कदम उसकी धारणाओं के विपरीत होता है और सब कुछ मनुष्य की सोच से परे और उसकी अपेक्षाओं से बाहर रहता है। परमेश्वर वह सब कुछ प्रदान करता है जिसकी मनुष्य को आवश्यकता होती है, जो किसी भी लिहाज से मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं है और जब तुम कमजोर होते हो, तो वह अपने वचन बोलता है। केवल इसी तरह से वह तुम्हारे जीवन की आपूर्ति कर सकता है। तुम्हारी धारणाओं का विरोध करके वह तुम्हें परमेश्वर की काट-छाँट स्वीकार करवाता है; केवल इसी तरह से तुम अपनी भ्रष्टता को उतार फेंक सकते हो। आज, देहधारी परमेश्वर एक ओर अपनी दिव्यता के भीतर कार्य करता है और दूसरी ओर अपनी सामान्य मानवता के भीतर कार्य करता है। जब तुम परमेश्वर के किसी भी कार्य को नहीं नकारते हो, जब तुम इसकी परवाह किए बिना कि परमेश्वर अपनी सामान्य मानवता के भीतर क्या कहता या करता है, समर्पण कर पाते हो, जब तुम इसकी परवाह किए बिना कि वह कितना सामान्य है, समर्पण करने और समझने में समर्थ हो जाते हो और जब तुम व्यावहारिक अनुभव प्राप्त कर लेते हो, केवल तभी तुम आश्वस्त हो सकते हो कि वह परमेश्वर है, केवल तभी तुम धारणाएं बनाना बंद करोगे और केवल तभी तुम उसका अंत तक अनुसरण कर पाओगे। परमेश्वर के कार्य में बुद्धि है और वह जानता है कि कैसे मनुष्य उसकी गवाही में अडिग रह सकता है। वह जानता है कि मनुष्य का घातक दोष कहाँ है और जिन वचनों को वह बोलता है, वे तुम्हारे घातक दोष पर प्रहार कर सकते हैं, किंतु वह अपने लिए गवाही में तुम्हें अडिग रखने के लिए अपने प्रतापी और बुद्धिमान वचनों का भी उपयोग करता है। परमेश्वर के चमत्कारी कर्म ऐसे ही हैं। जो कार्य परमेश्वर करता है, वह मानवीय सोच के लिए अकल्पनीय है। देह वाला यह मनुष्य किस प्रकार की भ्रष्टता से ग्रस्त है और मनुष्य का सार किन चीज़ों से बना है—ये सभी चीज़ें परमेश्वर के न्याय के ज़रिए उजागर होती हैं, जो मनुष्य को अपनी शर्मिंदगी से छिपने के लिए कहीं का नहीं छोड़तीं।
परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य इसलिए करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर के बारे में ज्ञान प्राप्त कर सके; साथ ही, वह अपनी गवाही की खातिर ऐसा करता है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के प्रति परमेश्वर के न्याय के बिना मनुष्य उसके धार्मिक स्वभाव को बिल्कुल नहीं जान सकता था, जो किसी अपमान को सहन नहीं करता, न ही मनुष्य परमेश्वर के बारे में अपने पुराने ज्ञान को एक नए ज्ञान में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है; इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के जरिए, वह मनुष्य को परमेश्वर से जुड़े ज्ञान तक पहुँचने, अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने और परमेश्वर के लिए जबरदस्त गवाही देने लायक बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का परिवर्तन परमेश्वर के कई विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज़रिए प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में ऐसे बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसके इरादों के अनुरूप बनने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन दर्शाता है कि मनुष्य को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त करा दिया गया है और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह और ऐसा व्यक्ति बन गया है, जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है। आज देहधारी परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए पृथ्वी पर आया है और वह अपेक्षा रखता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति समर्पित हो, और उसकी गवाही दे—मनुष्य को परमेश्वर के व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जानना है, उसे उसके उन सभी वचनों और कार्य के प्रति समर्पण करना है, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं और उसे उस समस्त कार्य की गवाही देनी है, जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और मनुष्य को जीतने के उसके सभी कर्मों की भी गवाही देनी है। जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही सटीक और व्यावहारिक होती है और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्वर अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने उसके न्याय, उसकी ताड़ना, और काट-छाँट से गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। वह अपनी गवाही देने के लिए उनका उपयोग करता है जिनका स्वभाव बदल गया है और जिन्होंने इस प्रकार उसके आशीर्वाद प्राप्त कर लिए हैं। उसे मनुष्य के मुँह से की जाने वाली स्तुति की आवश्यकता नहीं है, न ही उसे शैतान की किस्म के उन लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जिन्हें उसने नहीं बचाया है। केवल वो जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही देने योग्य हैं और केवल वो जिनके स्वभाव को रूपांतरित कर दिया गया है, उसकी गवाही देने योग्य हैं। परमेश्वर मनुष्य को जानबूझकर अपने नाम को शर्मिंदा नहीं करने देगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर के लिए गवाही दे सकते हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 215
बाइबल के उस दृश्य का स्मरण करो, जब परमेश्वर ने सदोम पर तबाही बरपाई थी, और यह भी सोचो कि किस प्रकार लूत की पत्नी नमक का खंभा बन गई थी। वापस सोचो कि किस प्रकार नीनवे के लोगों ने टाट और राख में अपने पापों की स्वीकारोक्ति और पश्चात्ताप किया था, और याद करो कि जब 2,000 वर्ष पहले यहूदियों ने यीशु को सलीब पर चढ़ाया, उसके बाद क्या हुआ था। यहूदी इजराइल से निर्वासित कर दिए गए थे और वे दुनिया भर के देशों में भाग गए थे, बहुत लोग मारे गए थे, और संपूर्ण यहूदी राष्ट्र, अपने देश के विनाश की अभूतपूर्व पीड़ा का भागी हो गया था। उन्होंने परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया था—जघन्य पाप किया था—और परमेश्वर के स्वभाव को भड़काया था। उन्होंने जो किया था उसका उन्हें हर्जाना चुकाना पड़ा था और उन्हें उनके क्रियाकलापों के सभी परिणाम भुगतने पड़े थे। उन्होंने परमेश्वर की निंदा की थी, परमेश्वर को अस्वीकार किया था, और इसलिए उनकी केवल एक ही नियति थी : परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना। यही वह कड़वा परिणाम और आपदा थी, जो उनके शासक उनके देश और राष्ट्र पर लाए थे।
आज परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए लोगों के बीच लौट आया है और उसके कार्य का पहला पड़ाव है तानाशाही का ठेठ नमूना : चीन, जो नास्तिकता का कट्टर गढ़ है। परमेश्वर ने अपनी बुद्धि और सामर्थ्य से लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया है। इस अवधि के दौरान चीन की सत्तारूढ़ पार्टी उसका हर तरह से पीछा करती आ रही है और उसे हर तरह से सताया जा रहा है, उसे अपना सिर टिकाने के लिए कोई जगह नहीं मिली है और उसके पास कोई आश्रय नहीं है। इसके बावजूद परमेश्वर अभी भी वह कार्य जारी रखे हुए है, जिसे करने का उसका इरादा है : वह बोल रहा है और अपने वचन सुना रहा है और सुसमाचार फैला रहा है। कोई व्यक्ति परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की थाह नहीं पा सकता। चीन में, जो परमेश्वर को शत्रु माननेवाला देश है, परमेश्वर ने कभी भी अपना कार्य बंद नहीं किया है। बल्कि और अधिक लोगों ने उसके कार्य और वचनों को स्वीकार किया है, क्योंकि परमेश्वर मानवजाति के हर एक सदस्य को हरसंभव सीमा तक बचाता है। हम सबको विश्वास है कि परमेश्वर जो कुछ हासिल करने का इरादा रखता है उसे कोई भी देश या ताकत बाधित नहीं कर सकती और जो लोग परमेश्वर के कार्य में बाधा उत्पन्न करने की कोशिश करते हैं, परमेश्वर के वचनों का विरोध करते हैं, और परमेश्वर की योजना में विघ्न डालते और उसे बिगाड़ने की कोशिश करते हैं वे अंततः परमेश्वर द्वारा दंडित किए जाएँगे। जो भी व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का प्रतिरोध करता है उसे परमेश्वर नरक भेजेगा; जो भी देश परमेश्वर के कार्य का प्रतिरोध करता है उसे परमेश्वर नष्ट कर देगा; जो भी राष्ट्र परमेश्वर के कार्य का विरोध करने के लिए उठता है उसे परमेश्वर इस पृथ्वी से मिटा देगा और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। मैं सभी राष्ट्रों और सभी देशों और यहाँ तक कि सभी उद्योगों के लोगों से यह प्रबल आग्रह करता हूँ कि वे आकर परमेश्वर की वाणी को सुनें, परमेश्वर के कार्य को देखें और मानवजाति के भाग्य पर ध्यान दें, और इस तरह परमेश्वर को मानवजाति के बीच सर्वाधिक पवित्र, सर्वाधिक सम्माननीय, सर्वोच्च और आराधना का एकमात्र पात्र बनाएँ, और संपूर्ण मानवजाति को परमेश्वर के आशीष के बीच जीने में सक्षम बनाएँ, ठीक उसी तरह जैसे अब्राहम के वंशज यहोवा की प्रतिज्ञा के अधीन रहे और ठीक उसी तरह जैसे आदम और हव्वा, जिन्हें परमेश्वर ने आदि में बनाया था, अदन के बगीचे में रहे।
परमेश्वर का कार्य एक प्रचंड लहर के समान आगे बढ़ता है। परमेश्वर को कोई नहीं थाम सकता है और कोई भी उसके कदमों को रोक नहीं सकता। जो उसके वचन सावधानीपूर्वक सुनते हैं, और जो उसे खोजते हैं और उसके लिए लालायित रहते हैं, वे ही उसके पदचिह्नों का अनुसरण कर सकते हैं और उसकी प्रतिज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। जो ऐसा नहीं करते, वे प्रचंड आपदा और यथोचित दंड भुगतेंगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 216
संसार की उत्पत्ति के समय, परमेश्वर ने अपना प्रबंधन कार्य प्रारंभ किया और मनुष्य इस कार्य के केंद्र में है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर द्वारा सभी चीजों की सृष्टि मनुष्य के लिए ही है। चूँकि उसके प्रबंधन का कार्य हज़ारों सालों में फैला हुआ है, और वह केवल एक ही मिनट या सेकंड के अंतराल में या पलक झपकते या एक या दो सालों में पूरा नहीं होता, इसलिए उसे मनुष्य के अस्तित्व के लिए आवश्यक और अधिक चीजों का सृजन करना पड़ा, जैसे कि सूर्य, चंद्रमा, सभी प्रकार के जीव, भोजन और एक जीवित पर्यावरण। यह परमेश्वर के प्रबंधन का प्रारंभ था।
इसके बाद परमेश्वर ने मनुष्य को शैतान के हाथों में सौंप दिया, और मनुष्य शैतान की सत्ता के अधीन रहने लगा, जिसने धीरे-धीरे परमेश्वर के प्रथम युग के कार्य की शुरुआत की : व्यवस्था के युग की कहानी...। व्यवस्था के युग के दौरान कई हज़ार सालों में, मानवजाति व्यवस्था के युग के मार्गदर्शन की आदी हो गई और उसे हलके में लेने लगी। धीरे-धीरे मनुष्य परमेश्वर की देखभाल से दूर होता चला गया। और इसलिए, व्यवस्था का अनुसरण करते हुए लोग मूर्तिपूजा और बुरे कर्म भी करने लगे। वे यहोवा की सुरक्षा से वंचित थे और केवल मंदिर की वेदी के सामने अपना जीवनयापन कर रहे थे। वास्तव में, परमेश्वर का कार्य उन्हें बहुत पहले छोड़ चुका था, और हालाँकि इस्राएली अभी भी व्यवस्था से चिपके हुए थे और यहोवा का नाम लेते थे, यहाँ तक कि गर्व से विश्वास करते थे कि केवल वे ही यहोवा के लोग हैं और वे यहोवा के चुने हुए हैं, किंतु परमेश्वर की महिमा ने उन्हें चुपके से त्याग दिया था ...
जब परमेश्वर अपना कार्य करता है, तो वह हमेशा चुपचाप एक स्थान को छोड़ कर धीरे से दूसरे स्थान पर अपना नया कार्य प्रारंभ कर देता है। यह उन लोगों को मनगढ़ंत कहानी लगती है, जो सुन्न होते हैं। लोगों ने हमेशा पुरानी बातों को बाकी सभी बातों से ऊपर सँजोया है और नई, अपरिचित चीजों से शत्रुता बरती है या उन्हें विघ्न माना है। इसलिए, जो कुछ भी नया कार्य परमेश्वर करता है, प्रारंभ से बिल्कुल अंत तक, मनुष्य समस्त चीजों में अंतिम होता है, जो इसे जान पाता है।
जैसा कि हमेशा से होता आया है, व्यवस्था के युग में यहोवा के कार्य के बाद परमेश्वर ने दूसरे चरण का अपना कार्य प्रारंभ किया : देह धारण कर—दस, बीस साल के लिए मनुष्य के समान देह में आकर—विश्वासियों के बीच बोलते और अपना कार्य करते हुए उसने ऐसा किया। फिर भी बिना किसी अपवाद के, कोई भी यह बात नहीं जान पाया और प्रभु यीशु को सलीब पर लटकाए जाने और उसके पुनर्जीवित होने के बाद बहुत थोड़े-से लोगों ने ही माना कि वह देहधारी परमेश्वर था। ... जैसे ही परमेश्वर के कार्य का दूसरा चरण पूरा हुआ—सलीब पर चढ़ाए जाने के बाद—मनुष्य को पाप से वापस पाने (अर्थात् मनुष्य को शैतान के हाथों से छुड़ाने) का परमेश्वर का कार्य संपन्न हो गया। और इसलिए, उस क्षण के बाद से, मानवजाति को केवल प्रभु यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करना था, और उसके पाप क्षमा कर दिए जाते। बस नाम के लिए कहें तो, मनुष्य के पाप अब उसके द्वारा उद्धार प्राप्त करने और परमेश्वर के सामने आने में बाधक नहीं रहे थे और न ही शैतान द्वारा मनुष्य को दोषी ठहराने का कारण रह गए थे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि स्वयं परमेश्वर ने व्यावहारिक कार्य किया था, उसने पापी देह की छवि बनकर उसका अनुभव किया था, और परमेश्वर स्वयं ही पापबलि था। इस प्रकार, मनुष्य सलीब से उतर गया, परमेश्वर के देह—इस पापी देह की छवि के जरिये छुड़ा और बचा लिया गया। और इसलिए, शैतान द्वारा बंदी बना लिए जाने के बाद, मनुष्य परमेश्वर के सामने उसका उद्धार स्वीकार करने के एक कदम और पास आ गया। बेशक, कार्य का यह चरण परमेश्वर का वह प्रबंधन था जो व्यवस्था के युग के प्रबंधन से अधिक गहन और अधिक विकसित था।
परमेश्वर का प्रबंधन ऐसा है : वह मनुष्य को शैतान के हवाले करता है—वह मनुष्य जो यह जानता ही नहीं कि परमेश्वर क्या है, सृष्टिकर्ता क्या है, परमेश्वर की आराधना कैसे करें या उसे परमेश्वर के प्रति समर्पण क्यों करना चाहिए—और वह शैतान को मनमाने ढंग से उसे भ्रष्ट करने देता है; कदम-दर-कदम, परमेश्वर तब मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस ले लेता है, जब तक कि मनुष्य पूरी तरह से परमेश्वर की आराधना नहीं करने लगता और शैतान को अस्वीकार नहीं कर देता। यही परमेश्वर का प्रबंधन है। यह किसी मिथक-कथा जैसा और समझने में मुश्किल लग सकता है। लोगों को यह किसी मिथक-कथा जैसा इसलिए लगता है, क्योंकि उन्हें इसका भान नहीं है कि पिछले हज़ारों सालों में मनुष्य के साथ कितना कुछ घटित हुआ है, और यह तो वे बिल्कुल भी नहीं जानते कि इस ब्रह्मांड और नभमंडल में कितनी कहानियाँ घट चुकी हैं। और इससे भी बढ़कर, ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अपनी नश्वर आँखों से उस अधिक अद्भुत, अधिक भय पैदा करने वाली दुनिया को नहीं देख सकते जो भौतिक दुनिया से परे मौजूद है। यह उन्हें समझ से बाहर लगता है क्योंकि उन्हें परमेश्वर द्वारा मानवजाति के उद्धार के महत्व या उसके प्रबंधन कार्य के महत्व की कोई समझ नहीं है और वे यह नहीं समझते कि परमेश्वर वास्तव में किस प्रकार की मानवजाति चाहता है। क्या वह ऐसी मानवजाति है जो शैतान द्वारा बिल्कुल भी भ्रष्ट न की गई हो, जैसे आदम और हव्वा थे? नहीं! परमेश्वर के प्रबंधन का उद्देश्य लोगों के एक ऐसे समूह को प्राप्त करना है, जो उसकी आराधना करे और उसके प्रति समर्पित हो। हालाँकि ये लोग शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं, परंतु वे अब शैतान को अपने पिता के रूप में नहीं देखते; इसके बजाय, वे शैतान के भयानक चेहरे को पहचानते हैं और उसे अस्वीकार करते हैं, और वे परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने के लिए उसके सामने आते हैं। वे जान जाते हैं कि कुरूप और पवित्र में क्या अंतर है, वे परमेश्वर की महानता और शैतान की बुराई को भी पहचान जाते हैं। इस प्रकार के मनुष्य अब शैतान की सेवा नहीं करेंगे, या शैतान की आराधना नहीं करेंगे, या शैतान को प्रतिष्ठापित नहीं करेंगे। इसका कारण यह है कि यह एक ऐसे लोगों का समूह है, जो सचमुच परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए गए हैं। यही परमेश्वर द्वारा मानवजाति का प्रबंधन करने के कार्य की महत्ता है। इस प्रबंधन कार्य के दौरान, मानवजाति शैतान की भ्रष्टता की पात्र है और साथ ही मानवजाति परमेश्वर के उद्धार की पात्र भी है; यह वह उत्पाद है जिसके लिए परमेश्वर और शैतान लड़ रहे हैं। जैसे-जैसे परमेश्वर अपना कार्य करता है, वह कदम-दर-कदम मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस प्राप्त कर रहा है और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के और भी करीब आता जाता है ...
और फिर राज्य का युग आया, जो कार्य का अधिक व्यावहारिक चरण है, और फिर भी जिसे स्वीकार करना मनुष्य के लिए सबसे कठिन भी है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जितना अधिक मनुष्य परमेश्वर के नज़दीक आता है, परमेश्वर की छड़ी उसके उतने ही करीब पहुँचती है और परमेश्वर का चेहरा उतनी ही अधिक स्पष्टता से मनुष्य के सामने प्रकट हो जाता है। मानवजाति के छुटकारे के बाद मनुष्य औपचारिक रूप से परमेश्वर के परिवार में लौट आता है। मनुष्य ने सोचा कि अब आनंद का समय आया है, किंतु परमेश्वर द्वारा उसे ऐसे पुरज़ोर आक्रमण का भागी बनाया जाता है, जैसा कभी किसी ने अनुमान नहीं लगाया होगा : होता यह है कि, यह एक बपतिस्मा है, जिसका परमेश्वर के लोगों को “आनंद” लेना है। इस प्रकार के व्यवहार के अंतर्गत, लोगों के पास ठहरकर स्वयं के बारे में यह सोचने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता, “मैं, कई सालों तक खोया हुआ वह मेमना हूँ, जिसे वापस पाने के लिए परमेश्वर ने कितना कुछ खर्च किया है, फिर परमेश्वर मुझसे ऐसा व्यवहार क्यों करता है? क्या यह परमेश्वर का मुझपर हँसने और मुझे उजागर करने का तरीका है? ...” वर्षों के अनुभवों के बाद, शोधन और ताड़ना के कष्टों से गुजरते हुए मनुष्य तपकर मजबूत हो गया है। वैसे तो मनुष्य बीते समय की “महिमा” और “रोमांस” खो चुका है, लेकिन अनजाने में ही वह स्व-आचरण के सिद्धांतों और इतने वर्षों से मानवजाति को बचाने में परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों को समझ गया है। धीरे-धीरे, मनुष्य अपनी बर्बरता से, इस बात से कि उसे काबू में करना कितना मुश्किल है, परमेश्वर के बारे में अपनी सभी गलतफहमियों से और परमेश्वर से उसने जो अत्यधिक माँगें की हैं उनसे नफरत करने लगता है। गुजरा समय वापस नहीं लाया जा सकता। बीती हुई घटनाएँ ऐसी यादें बन जाती हैं जिनके लिए मनुष्य पश्चात्ताप करता है और परमेश्वर के वचन और कोमल प्रेम मनुष्य के नए जीवन में प्रेरक शक्ति बन जाते हैं। मनुष्य के घाव दिन-ब-दिन भरते जाते हैं, उसका शरीर मजबूत होता जाता है और वह उठ खड़ा होता है और उसे सर्वशक्तिमान का चेहरा दिखाई देता है...। यह पता चलता है कि वह हमेशा मेरे पास में रहा है, मेरी देखभाल करता रहा है। उसकी मुस्कान और उसका सुंदर चेहरा अब भी कितना भाव जगाने वाला है, अब भी उसके दिल में अपनी सृजित मानवजाति के लिए अब भी बहुत चिंता समाई हुई है और उसके हाथ अब भी उतने ही गर्म और शक्तिशाली हैं जितने वे शुरुआत में थे। यह ऐसा है मानो मनुष्य अदन के बगीचे के समय में लौट आया हो, लेकिन अब मनुष्य साँप के प्रलोभनों को नहीं सुनता है और यहोवा के चेहरे से नहीं छिपता है। मनुष्य परमेश्वर के सामने आराधना में घुटने टेक देता है, परमेश्वर के मुस्कुराते चेहरे की तरफ देखता है और उसे अपना सबसे कीमती बलिदान अर्पण कर देता है—ओह! मेरे प्रभु, मेरे परमेश्वर!
परमेश्वर का प्रेम और उसकी दया उसके प्रबंधन कार्य के हर ब्योरे में व्याप्त रहती है और इसकी परवाह किए बिना कि चाहे लोग परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे समझ पाएँ या नहीं, वह जो कार्य पूरा करना चाहता है, उसे वह निरंतर दृढ़ता के साथ करता है। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर के प्रबंधन को लोग कितना समझते हैं, परमेश्वर के कार्य से मनुष्य को हुए लाभ और सहायता को हर कोई अनुभव कर सकता है। शायद आज तुमने परमेश्वर से कोई प्रेम या जीवन की आपूर्ति महसूस नहीं की है, लेकिन जब तक तुम परमेश्वर को नहीं छोड़ते और सत्य का अनुसरण करने के अपने संकल्प को नहीं छोड़ते, एक दिन ऐसा आएगा, जब परमेश्वर का मुस्काता मुखमंडल तुम पर प्रकट होगा। क्योंकि परमेश्वर के प्रबंधन कार्य का उद्देश्य शैतान की सत्ता के अधीन मौजूद लोगों को फिर से पाना है, न कि उन लोगों को त्याग देना, जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 217
सभी लोगों को पृथ्वी पर मेरे कार्य के प्रयोजन को समझने की आवश्यकता है, अर्थात् मैं अंततः क्या प्राप्त करने का इरादा रखता हूँ, और इस कार्य को पूरा करने से पहले मुझे इसमें कौन-सा स्तर प्राप्त कर लेना चाहिए। यदि आज तक मेरे साथ चलते रहने के बाद भी लोग यह नहीं समझते कि मेरा कार्य क्या है, तो क्या वे मेरे साथ व्यर्थ में नहीं चले? यदि लोग मेरा अनुसरण करते हैं, तो उन्हें मेरे इरादे जानने चाहिए। मैं पृथ्वी पर हज़ारों सालों से कार्य कर रहा हूँ और आज भी मैं अपना कार्य इसी तरह से जारी रखे हुए हूँ। यद्यपि मेरे कार्य में कई परियोजनाएँ शामिल हैं, किंतु इसका उद्देश्य अपरिवर्तित है; यद्यपि, उदाहरण के लिए, मैं मनुष्य के प्रति न्याय और ताड़ना से भरा हुआ हूँ, फिर भी मैं जो करता हूँ, वह उसे बचाने के वास्ते, और मनुष्य के पूर्ण किए जाने के बाद अपने सुसमाचार को बेहतर ढंग से फैलाने और अन्य-जाति देशों के बीच अपने कार्य को बेहतर ढंग से बढ़ाने के वास्ते है। इसलिए आज, एक ऐसे वक्त, जब कई लोग लंबे समय से अत्यधिक निराश रह चुके हैं, मैं अभी भी अपना कार्य जारी रखे हुए हूँ, मैं वह कार्य जारी रखे हुए हूँ जो मनुष्य को न्याय और ताड़ना देने के लिए मुझे करना चाहिए। इस तथ्य के बावजूद कि जो कुछ मैं कहता हूँ, मनुष्य उससे उकता गया है और मेरे कार्य से जुड़ने की उसकी कोई इच्छा नहीं है, मैं फिर भी वह कार्य कर रहा हूँ जो कि मुझे उचित रूप से करना चाहिए क्योंकि मेरे कार्य का उद्देश्य अपरिवर्तित है और मेरी मूल योजना भंग नहीं होगी। मेरे न्याय का उद्देश्य मनुष्य को मेरे प्रति बेहतर ढंग से समर्पण करने में सक्षम बनाना है, और मेरी ताड़ना का उद्देश्य मनुष्य को बेहतर ढंग से बदलाव हासिल करने में सक्षम बनाना है। यद्यपि मैं जो कुछ भी करता हूँ, वह मेरे प्रबंधन के वास्ते है, फिर भी मैंने कभी ऐसा कोई कार्य नहीं किया है, जो मनुष्य के लाभ के लिए न रहा हो, क्योंकि मैं इस्राएल से बाहर की सभी जातियों को इस्राएलियों के समान ही समर्पित बनाने का इरादा रखता हूँ, उन्हें वास्तविक मनुष्य बनाना चाहता हूँ, ताकि इस्राएल के बाहर की भूमियों में मेरे लिए एक आधार बन सके। यही मेरा प्रबंधन है; यही मेरा अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच कार्य है। अभी भी बहुत-से लोग मेरे प्रबंधन को नहीं समझते, क्योंकि वे ऐसी बातों की परवाह नहीं करते हैं और इसके बजाय वे अपने स्वयं के भविष्य और मंजिल की ही परवाह करते हैं। मैं चाहे कुछ भी कहूँ, लोग उस कार्य के प्रति उदासीन रहते हैं जो मैं करता हूँ, इसके बजाय वे पूरे दिल से अपनी भविष्य की मंजिलों पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। अगर चीजें इसी तरह से चलती रहीं, तो मेरा कार्य कैसे फैल सकता है? मेरे सुसमाचार का पूरे संसार में कैसे प्रचार किया जा सकता है? तुम लोगों को जानना चाहिए कि जब मेरा कार्य फैलेगा, तो मैं तुम लोगों को तितर-बितर कर दूँगा और तुम्हें उसी प्रकार प्रहार करूँगा, जैसे यहोवा ने इस्राएल के प्रत्येक गोत्र पर प्रहार किया था। यह सब इसलिए किया जाएगा, ताकि मेरा सुसमाचार सारी पृथ्वी पर फैल सके और अन्य-जाति राष्ट्रों तक मेरा कार्य फैल सके, इस प्रकार मेरे नाम का वयस्कों और बच्चों, सभी के बीच, महान मानकर आदर किया जाएगा और मेरे पवित्र नाम की महिमा सभी जातियों और राष्ट्रों के लोगों के मुख से की जाएगी। इस अंतिम युग में मेरा नाम अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच बड़ाई पा सके, मेरे कर्म अन्य-जाति राष्ट्रों के लोगों द्वारा देखे जा सकें, ताकि मेरे कर्मों के कारण वे मुझे सर्वशक्तिमान कहें और मेरे वचन शीघ्र ही साकार हो सकें। मैं सभी लोगों को ज्ञात करवाऊँगा कि मैं केवल इस्राएलियों का परमेश्वर नहीं हूँ, बल्कि समस्त अन्य-जाति राष्ट्रों के लोगों का भी परमेश्वर हूँ, यहाँ तक कि उन राष्ट्रों का भी परमेश्वर हूँ जिन्हें मैंने शाप दिया है। मैं सभी लोगों को यह दिखाऊँगा कि मैं सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर हूँ। यह मेरा सबसे बड़ा कार्य है, अंत के दिनों के लिए मेरी कार्य-योजना का उद्देश्य है और यह एकमात्र कार्य है जिसे मैं अंत के दिनों में पूरा करने का इरादा रखता हूँ।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 218
यह केवल अंत के दिनों के दौरान है कि जिस कार्य का मैं हज़ारों सालों से प्रबंधन करता आ रहा हूँ, वह मनुष्य के सामने पूर्णतः प्रकट कर दिया गया है। केवल अब मैंने अपने प्रबंधन का पूरा रहस्य मनुष्य पर प्रकट किया है, और मनुष्य ने मेरे कार्य का उद्देश्य जान लिया है, और इसके अतिरिक्त, उसने मेरे सभी रहस्यों को समझ लिया है। मैंने मनुष्य को पहले ही उस मंज़िल के बारे में सब कुछ बता दिया है, जिसके बारे में वह चिंतित रहता है। मैंने पहले ही मनुष्य पर अपने सारे रहस्य उजागर कर दिए हैं, जो 5,900 सालों से अधिक समय से गुप्त थे। यहोवा कौन है? मसीहा कौन है? यीशु कौन है? तुम लोगों को यह सब ज्ञात होना चाहिए। ये नाम मेरे कार्य के निर्णायक मोड़ हैं। क्या तुम लोग इसे समझ गए हो? मेरा पवित्र नाम कैसे घोषित किया जाना चाहिए? मेरे नाम का किसी ऐसे देश में कैसे उपदेश दिया जाना चाहिए, जिसने मुझे मेरे किसी भी नाम से पुकारा हो? मेरा कार्य फैल रहा है, और मैं इसे पूरा का पूरा किसी भी देश में और सभी देशों में फैलाऊँगा। चूँकि मेरा कार्य तुम लोगों पर किया गया है, इसलिए मैं तुम लोगों को वैसे ही मारूँगा, जैसे यहोवा ने इस्राएल में दाऊद के घर के चरवाहों को मारा था, जिससे तुम हर देश में बिखर जाओ। क्योंकि अंत के दिनों में मैं प्रत्येक राष्ट्र को चूर-चूर कर दूँगा, जिससे वहाँ के लोग जनजातियों और देशों में फिर से बँट जाएँ। जब मैं पुनः वापस आऊँगा, सारे देश पहले ही मेरी जलती हुई आग द्वारा निर्धारित सीमाओं में विभाजित हो चुके होंगे। उस समय मैं मानवजाति के सामने नए सिरे से एक झुलसा देने वाले सूरज के समान प्रकट होऊँगा और मैं खुद को खुलेआम उन्हें उस पवित्र की छवि में दिखाऊँगा जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखा है, और मैं असंख्य देशों के बीच चलूँगा, ठीक वैसे ही, जैसे मैं, यहोवा, कभी विभिन्न यहूदी कबीलों के बीच चला था। उसके बाद से मैं पृथ्वी पर मानवजाति के जीवन में उसकी अगुआई करूँगा और वे निश्चित रूप से देखेंगे कि मेरी महिमा उनके ऊपर है और हवा में बादलों का एक खंभा उनके जीवन में उनकी अगुआई कर रहा है, क्योंकि मैं अपना प्रकटन पवित्र स्थानों में करूँगा। मनुष्य मेरी धार्मिकता का दिन देखेगा और मेरी महिमा का प्रकटन भी देखेगा। यही वह समय होगा जब मैं पूरी पृथ्वी पर राजा के रूप में शासन करूँगा और अपने बहुत सारे पुत्रों को महिमा में लाऊँगा। पूरी पृथ्वी पर लोग दंडवत करेंगे। और मानवजाति के बीच मेरा डेरा दृढ़ता से खड़ा होगा और वह आज के मेरे कार्य की चट्टान पर बनाया जाएगा। सारे लोग मंदिर में भी मेरी सेवा करेंगे। मैं गंदी और घृणित चीजों से ढकी हुई वेदी को चूर-चूर कर दूँगा और नए सिरे से बनाऊँगा। उस पवित्र वेदी पर नवजात मेमनों और बछड़ों का चट्टा लग जाएगा। मैं आज के मंदिर को ढहा दूँगा और निश्चित रूप से एक नया मंदिर बनाऊँगा। घृणित लोगों से भरा हुआ जो मंदिर अभी खड़ा है वह ढह जाएगा और जो मंदिर मैं बनाऊँगा, वह मेरे प्रति समर्पित सेवकों से भरा होगा। मेरे मंदिर की महिमा के वास्ते वे एक बार फिर से उठ खड़े होंगे और मेरी सेवा करेंगे। तुम लोग वह दिन निश्चित रूप से देखोगे, जब मैं बहुत बड़ी महिमा प्राप्त करूँगा और वह दिन भी देखोगे जब मैं मंदिर ढहाऊँगा और एक नया मंदिर बनाऊँगा। तुम लोग मानवजाति के बीच मेरे डेरे के आने का दिन भी अवश्य देखोगे। ठीक उसी तरीके से जैसे मैं मंदिर को चकनाचूर करूँगा, वैसे ही मैं अपने तंबू को मानवजाति के बीच ले आऊँगा, ठीक वैसे ही वे मेरे अवतरण को देखेंगे। प्रत्येक देश को चकनाचूर करने के बाद मैं उन्हें नए सिरे से एक-साथ इकट्ठा करूँगा और फिर अपना मंदिर बनाऊँगा और अपनी वेदी स्थापित करूँगा ताकि सभी लोग मुझे बलि अर्पित कर सकें, मेरे मंदिर में मेरी सेवा करें और उस कार्य के प्रति अपना समर्पण दिखाएँ जो मैं अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच करता हूँ। वे आज के इस्राएलियों जैसे होंगे, जो याजकों के लबादों और चमकते मुकुटों से सजे होंगे और उनके बीच मुझ यहोवा की महिमा होगी, और मेरा प्रताप उनके ऊपर आसमानों में उपस्थित होगा। अन्य-जाति राष्ट्रों में भी मेरा कार्य ऐसा ही होगा। जैसा मेरा कार्य इस्राएल में था, वैसा ही मेरा कार्य अन्य-जाति राष्ट्रों में भी होगा, क्योंकि मैं इस्राएल में अपने कार्य का प्रसार करूँगा और इसे अन्य-जाति राष्ट्रों में फैलाऊँगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 219
अब वह समय है जब मेरा आत्मा महान कार्य करता है और वह समय है जब मैं अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच अपना कार्य शुरू करता हूँ। इससे भी बढ़कर यह वह समय है जब मैं सभी सृजित प्राणियों को वर्गीकृत करता हूँ, हर एक को उसकी संबंधित श्रेणी में रखता हूँ ताकि मेरा कार्य और अधिक तेजी से आगे बढ़ सके और नतीजे हासिल करने में अधिक सक्षम हो। और इसलिए मैं तुमसे अभी भी यही माँग करता हूँ कि तुम अपने पूरे अस्तित्व को मेरे संपूर्ण कार्य के लिए अर्पित कर दो; और इससे भी अधिक तुम मेरे द्वारा तुम पर किए गए संपूर्ण कार्य का स्पष्ट रूप से भेद पहचान लो और इसे सटीकता से देख लो और अपनी पूरी ऊर्जा खपा दो ताकि मेरा कार्य और बड़े नतीजे हासिल कर सके। यही चीज तुम्हें समझ लेनी चाहिए। एक-दूसरे से होड़ लेने, वैकल्पिक योजना तलाशने या अपनी देह के लिए आराम तलाशने से बाज आओ ताकि मेरे कार्य में विलंब करने और अपने अद्भुत भविष्य में बाधा डालने से बच सको। ऐसा करने से तुम्हें सुरक्षा मिलनी तो दूर रही, तुम खुद पर केवल बरबादी ले आओगे। क्या यह तुम्हारी मूर्खता नहीं होगी? जिसमें तुम आज लिप्त हो वही चीज तुम्हारे भविष्य को बरबाद कर रही है, जबकि आज तुम जो पीड़ा सहते हो वही चीज तुम्हारी सुरक्षा कर रही है। तुम्हें इन चीजों का स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए ताकि तुम उन प्रलोभनों का शिकार होने से बच सको जिनसे बाहर निकलना तुम्हें कठिन लगेगा और ताकि तुम घने कोहरे में गलती से घुसने और फिर कभी सूर्य को न खोज पाने से बच सको। जब घना कोहरा छँटेगा, तुम अपने आपको महान दिन के न्याय के मध्य पाओगे। उस समय तक मेरा दिन मानवजाति के करीब आ चुका होगा। तुम मेरे न्याय से कैसे बच निकलोगे? तुम सूर्य की झुलसा देने वाली गर्मी को कैसे सह पाओगे? जब मैं मनुष्य को अपनी विपुलता प्रदान करता हूँ, तो वह उसे छाती से नहीं लगाता, बल्कि उसे ऐसी जगह पर फेंक देता है, जहाँ उस पर कोई ध्यान नहीं देता। जब मेरा दिन मनुष्य पर उतरेगा, तो वह मेरी विपुलता को खोज पाने या सत्य के उन कड़वे वचनों का पता लगा पाने में समर्थ नहीं होगा, जो मैंने उसे बहुत पहले बोले थे। वह बिलखेगा और रोएगा, क्योंकि उसने प्रकाश की चमक खो दी है और अंधकार में गिर गया है। आज तुम लोग जो देखते हो वह मात्र मेरे मुँह की तीखी तलवार है; तुमने मेरे हाथ में छड़ी नहीं देखी है और न ही वह ज्वाला देखी है जिससे मैं मनुष्य को जलाता हूँ। इसी कारण तुम लोग मेरी उपस्थिति में अभी भी अभिमानी और असंयमी हो और इसी कारण तुम लोग अभी भी मेरे घर में मुझसे लड़ते हो, उस बात पर अपनी इंसानी जबान से विवाद करते हो जो मैंने अपने मुँह से कही है। मनुष्य मुझसे नहीं डरता और आज तक उसने मेरे साथ शत्रुता कायम रखी है, अब भी बिल्कुल भय महसूस नहीं करता है। तुम लोगों के मुँह में अधर्मियों की जिह्वा और दाँत हैं। तुम लोगों के शब्द और कर्म उस साँप के समान हैं जिसने हव्वा को पाप करने के लिए बहकाया था। तुम एक-दूसरे से आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत की माँग करते हो और मेरी उपस्थिति में तुम अपने लिए पद, प्रतिष्ठा और लाभ झपटने के लिए संघर्ष करते हो, फिर भी तुम लोग नहीं जानते कि मैं तुम्हारे शब्दों और कर्मों को गुप्त रूप से देख रहा हूँ। इससे पहले कि तुम लोग मेरी निगाह में भी आओ, मैंने तुम लोगों के हृदयों की गहराइयों की थाह ले ली है। मनुष्य हमेशा मेरे हाथ की पकड़ से बच निकलना और मेरी आँखों की जाँच-पड़ताल से बचना चाहता है, किंतु मैंने उसके शब्दों या कर्मों को कभी नहीं टाला है। इसके बजाय, मैं उद्देश्यपूर्वक उन शब्दों और कर्मों को अपनी निगाह में आने देता हूँ, ताकि मैं मनुष्य की अधार्मिकता को ताड़ना दे सकूँ और उसके विद्रोहीपन का न्याय कर सकूँ। इस प्रकार, मनुष्य के गुप्त शब्द और कर्म हमेशा मेरे न्याय के आसन के सामने रहते हैं और मेरा न्याय मनुष्य को छोड़कर कभी नहीं गया है, क्योंकि उसका विद्रोहीपन बहुत ही ज्यादा है। मेरा कार्य मनुष्य के उन सभी शब्दों और कर्मों को जलाना और शुद्ध करना है, जो मेरे आत्मा की उपस्थिति में कहे और किए गए थे। इस तरह से,[क] जब मैं पृथ्वी से चला जाऊँगा, तब भी लोग मेरे प्रति वफादारी बनाए रखेंगे और वे तब भी मेरे कार्य के प्रति वैसे ही पेश आने में सक्षम होंगे जैसे मेरे पवित्र सेवक मेरी सेवा करने में पेश आते हैं और वे पृथ्वी पर मेरे कार्य को उस दिन तक जारी रहने देंगे जब तक यह पूरा न हो जाए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है
फुटनोट :
क. मूल पाठ में, “इस तरह से” यह वाक्यांश नहीं है।
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 220
क्या तुम लोगों ने देखा है कि इस समूह के लोगों में परमेश्वर कौन-सा कार्य पूरा करेगा? परमेश्वर ने एक बार कहा था कि सहस्राब्दि राज्य में भी लोगों को उसके कथनों का पालन आगे करते रहना होगा और भविष्य में कनान के उत्तम देश में परमेश्वर के कथन मनुष्य के जीवन का सीधे तौर पर मार्गदर्शन करेंगे। जब मूसा निर्जन प्रदेश में था, तो परमेश्वर ने सीधे तौर पर उसे निर्देश दिया और उससे बात की। परमेश्वर ने लोगों के आनंद के लिए स्वर्ग से भोजन, पानी और मन्ना भेजा था और आज भी ऐसा ही है : लोगों के आनंद के लिए परमेश्वर ने स्वयं खाने और पीने की चीजें भिजवाई हैं और उसने लोगों को ताड़ना देने के लिए स्वयं शाप भेजे हैं। और इसलिए, अपने कार्य का प्रत्येक कदम व्यक्तिगत तौर पर परमेश्वर द्वारा ही उठाया जाता है। आज लोग तथ्यों के घटित होने की ताक में रहते हैं, वे संकेत और चमत्कार देखने का प्रयास करते हैं और संभव है कि ऐसे सभी लोग त्याग दिए जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर का कार्य अधिकाधिक व्यावहारिक होता जा रहा है। कोई नहीं जानता कि परमेश्वर स्वर्ग से अवरोहण कर चुका है, वे इस बात से भी अनभिज्ञ हैं कि परमेश्वर ने स्वर्ग से भोजन और शक्तिवर्धक पेय भेजे हैं—किंतु परमेश्वर वास्तव में विद्यमान है और लोग सहस्राब्दि राज्य के जिस रोमांचक दृश्य की कल्पना करते हैं, वह भी परमेश्वर के स्वयं कथन व्यक्त करने का दृश्य है। यह तथ्य है, और केवल इसे ही पृथ्वी पर परमेश्वर के साथ राज करना कहा जाता है। पृथ्वी पर परमेश्वर के साथ राज करना देह को संदर्भित करता है। जो देह का नहीं होता है वह पृथ्वी पर विद्यमान नहीं होता है, और इस प्रकार जो तीसरे स्वर्ग में जाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं वे सब ऐसा व्यर्थ ही करते हैं। एक दिन, जब संपूर्ण विश्व परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा, तो ब्रह्मांड में उसके कार्य का केंद्र उसके कथनों का अनुसरण करेगा। अन्यत्र परमेश्वर के कथनों को प्राप्त करने के लिए कुछ लोग टेलीफोन का उपयोग करेंगे, कुछ लोग विमान पकड़ेंगे, कुछ लोग समुद्र के पार जाने के लिए नाव लेंगे और कुछ लोग लेज़र का उपयोग करेंगे। हर कोई सराहना और लालसा से परिपूर्ण होगा। वे सभी परमेश्वर के निकट आएँगे और परमेश्वर की ओर एकत्र हो जाएँगे और सभी परमेश्वर की आराधना करेंगे। और ये सब परमेश्वर के कर्म होंगे। इसे स्मरण रखो! परमेश्वर निश्चित रूप से कभी अन्यत्र कहीं फिर से आरंभ नहीं करेगा। परमेश्वर इस तथ्य को पूर्ण करेगा : वह ब्रह्मांड के सभी लोगों को अपने सम्मुख लाएगा और उनसे पृथ्वी के परमेश्वर की आराधना कराएगा। अन्य स्थानों पर उसका कार्य समाप्त हो जाएगा और लोगों को सच्चा मार्ग तलाशने के लिए मजबूर किया जाएगा। यह यूसुफ की तरह होगा : हर कोई भोजन के लिए उसके पास आया, और उसके सामने झुका, क्योंकि उसके पास खाने की चीजें थीं। अकाल के प्रकोप से बचने के लिए लोग सच्चा मार्ग तलाशने के लिए बाध्य होंगे। संपूर्ण धार्मिक जगत गंभीर अकाल से ग्रस्त होगा और केवल आज का परमेश्वर ही मनुष्य के आनंद के लिए हमेशा बहने वाले स्रोत से युक्त, जीवन देने वाले जल का स्रोत है और लोग आकर उस पर निर्भर हो जाएँगे। यह वह समय होगा जब परमेश्वर के कर्म प्रकट होंगे और जब परमेश्वर महिमा प्राप्त करेगा; ब्रह्मांड के सभी लोग इस साधारण “मनुष्य” के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने आएंगे। क्या यह परमेश्वर के महिमा प्राप्त करने का दिन नहीं होगा? एक दिन, बूढ़े पादरी जीवन के जल के झरने से पानी की माँग करते हुए टेलीग्राम भेजेंगे। वे बुज़ुर्ग होंगे, फिर भी वे इस व्यक्ति की आराधना करने आएँगे जिसे वे तुच्छ निगाहों से देखते थे। वे उसे अपने मुँह से स्वीकृति देंगे और अपने हृदय से उस पर विश्वास करेंगे—क्या यही संकेत और चमत्कार नहीं है? जिस दिन संपूर्ण राज्य आनंद करेगा, वह परमेश्वर के महिमा प्राप्त करने का दिन होगा, और जो कोई तुम लोगों के पास आएगा और परमेश्वर के शुभ समाचार को स्वीकार करेगा, वह परमेश्वर द्वारा धन्य किया जाएगा, और जो देश तथा लोग ऐसा करेंगे, वे परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाएँगे और उनकी देखभाल की जाएगी। भविष्य की दिशा यह होगी : जो लोग परमेश्वर के कथन प्राप्त करेंगे उनके पास पृथ्वी पर आगे का मार्ग होगा और जो लोग परमेश्वर के कथनों से रहित हैं, वे चाहे व्यवसाय, वैज्ञानिक शोध या शिक्षा या उद्योग में लगे हुए हों, वे एक कदम चलना भी असंभव पाएंगे और सच्चा मार्ग खोजने के लिए बाध्य होंगे। “सत्य के साथ तुम संपूर्ण संसार में चलोगे; सत्य के बिना तुम कहीं नहीं पहुँचोगे” का यही अर्थ है। ये तथ्य हैं : संपूर्ण ब्रह्मांड को नियंत्रित करने और मानवजाति का स्वामी बनने और इसे जीतने के लिए परमेश्वर मार्ग का (अर्थात अपने समस्त वचनों का) उपयोग करता है। लोग हमेशा उन साधनों में एक बड़े बदलाव की आशा करते हैं, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। ईमानदारी से कहें तो, वचनों के माध्यम से ही परमेश्वर लोगों को नियंत्रित करता है, और तुम्हें वह जो कहता है, उसे पूरा करना चाहिए, चाहे तुम्हारी वैसा करने की इच्छा हो या न हो; यह एक वस्तुनिष्ठ तथ्य है और सबको अवश्य स्वीकार होना चाहिए, और इसी तरह यह अपरिहार्य है और सबको ज्ञात है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सहस्राब्दि राज्य आ चुका है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 221
परमेश्वर के वचन असंख्य घरों में फैलेंगे, सबको ज्ञात हो जाएँगे और केवल तभी उसका कार्य संपूर्ण ब्रह्मांड में फैल चुका होगा। कहने का अर्थ है कि अगर परमेश्वर का कार्य संपूर्ण ब्रह्मांड में फैलना है तो उसके वचनों का फैलना आवश्यक है। जिस दिन परमेश्वर महिमा प्राप्त करेगा, उस दिन परमेश्वर के वचन अपना अधिकार और शक्ति प्रदर्शित करेंगे। युगों के पहले से लेकर आज तक का उसका हर एक वचन पूरा और घटित होगा। इस प्रकार से, परमेश्वर पृथ्वी पर महिमा प्राप्त कर चुका होगा—कहने का अर्थ है, कि उसके वचन पृथ्वी पर सामर्थ्य का उपयोग करेंगे। परमेश्वर के मुँह से बोले गए वचनों के परिणामस्वरूप सभी बुरे लोगों को ताड़ित किया जाएगा और उसके मुँह से बोले गए वचनों के परिणामस्वरूप सभी धार्मिक लोग धन्य होंगे और उसके मुँह से बोले गए वचनों द्वारा सब कुछ स्थापित और संपन्न किया जाएगा। वह कोई संकेत या चमत्कार नहीं दिखाएगा; सब-कुछ उसके वचनों के द्वारा पूर्ण होगा, और उसके वचन तथ्यों को उत्पन्न करेंगे। पृथ्वी पर हर व्यक्ति परमेश्वर के वचनों का गुणगान और स्तुति करेगा; चाहे बालिग हों या बच्चे, स्त्री, पुरुष, बूढ़े या युवा, सभी लोग परमेश्वर के वचनों के अधीन आत्मसमर्पण करेंगे। परमेश्वर के वचन देह में प्रकट होते हैं, और लोगों को उन्हें पृथ्वी पर जीवंत और सजीव रूप में देखने में सक्षम बनाते हैं। वचन के देहधारी होने का यही अर्थ है। परमेश्वर पृथ्वी पर मुख्य रूप से “वचन देहधारी हुआ” के तथ्य को पूर्ण करने आया है, जिसका अर्थ है कि वह इसलिए आया है, ताकि उसके वचन देह से निर्गत हों (पुराने नियम में मूसा के समय की तरह नहीं, जब परमेश्वर की वाणी सीधे स्वर्ग से निर्गत होती थी)। इसके बाद उसके सारे वचन सहस्राब्दि राज्य के युग के दौरान पूर्ण होंगे, वे मनुष्यों की नजरों के सामने दिखाई देने वाले तथ्य बन जाएँगे और उनमें लेशमात्र भी अंतर के बिना लोग उन्हें अपनी आँखों से देखेंगे। यही परमेश्वर के देहधारण की बहुत बड़ी सार्थकता है। कहने का अर्थ है कि आत्मा का कार्य देह के माध्यम से और वचनों के माध्यम से पूर्ण होता है। यही “वचन देहधारी हुआ” और “वचन का देह में प्रकट होना” का सही अर्थ है। केवल परमेश्वर ही आत्मा के इरादों को व्यक्त कर सकता है और केवल देहधारी परमेश्वर ही आत्मा की ओर से बोल सकता है; परमेश्वर के वचन देहधारी परमेश्वर में अभिव्यक्त होते हैं और अन्य सभी उनके द्वारा मार्गदर्शित होते हैं। कोई भी इससे बाहर नहीं हो सकता है, सभी इसके दायरे के भीतर मौजूद हैं। केवल इन कथनों से ही लोग जागरूक हो सकते हैं; इनके बिना अगर लोग यह सोचते हैं कि वे कथनों को स्वर्ग से प्राप्त कर सकते हैं तो वे सपना देख रहे हैं। देहधारी परमेश्वर की देह में इस तरह का अधिकार प्रदर्शित होता है, जिससे सभी लोग उस पर पूरी आस्था के साथ विश्वास करते हैं। यहाँ तक कि सर्वाधिक सम्मानित विशेषज्ञ और धार्मिक पादरी भी इन वचनों को नहीं बोल सकते। उन सबको इनके नीचे आत्मसमर्पण करना चाहिए, और अन्य कोई भी दूसरी शुरुआत करने में सक्षम नहीं होगा। परमेश्वर ब्रह्मांड को जीतने के लिए वचनों का उपयोग करेगा। वह ऐसा अपने देहधारी शरीर के द्वारा नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड के सभी लोगों को जीतने के लिए देहधारी हुए परमेश्वर के मुँह से कथनों के उपयोग द्वारा करेगा; केवल यही है देह बनने का तरीका और केवल यही है वचन का देह में प्रकट होना। शायद लोगों को ऐसा प्रतीत होता है कि मानो परमेश्वर ने कोई महान कार्य नहीं किया है—किंतु जब परमेश्वर अपने वचन कहेगा तो वे पूरी तरह आश्वस्त और स्तब्ध हो जाएँगे। बिना तथ्यों के, लोग चीखते और चिल्लाते हैं; परमेश्वर के वचनों से वे शांत हो जाते हैं। परमेश्वर इस तथ्य को निश्चित रूप से पूरा करेगा, क्योंकि यह परमेश्वर की लंबे समय से स्थापित योजना है : पृथ्वी पर वचन के आगमन के तथ्य का पूर्ण होना। वास्तव में, मुझे इसे बताने की कोई आवश्यकता नहीं है—पृथ्वी पर सहस्राब्दि राज्य का आगमन ही पृथ्वी पर परमेश्वर के वचनों का आगमन है। स्वर्ग से नए यरूशलेम का अवरोहण मनुष्य के बीच रहने, मनुष्य के प्रत्येक क्रियाकलाप और उसके प्रत्येक विचार और ख्याल में साथ देने के लिए परमेश्वर के वचनों का आगमन है। यह भी एक तथ्य है, जिसे परमेश्वर पूरा करेगा; यही सहस्राब्दि राज्य की खूबसूरती है। यह परमेश्वर द्वारा निर्धारित योजना है : उसके वचन एक हज़ार वर्षों तक पृथ्वी पर प्रकट होंगे, और वे उसके सभी कर्मों को प्रकट करेंगे और पृथ्वी पर उसके समस्त कार्य को पूरा करेंगे, जिसके बाद मानवजाति के इस चरण का अंत हो जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सहस्राब्दि राज्य आ चुका है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 222
जब पृथ्वी पर सीनियों का देश साकार होगा—जब राज्य साकार होगा—तो पृथ्वी पर और युद्ध नहीं होंगे; फिर कभी अकाल, महामारी और भूकंप नहीं आएँगे, लोग हथियारों का उत्पादन बंद कर देंगे; सभी शांति और स्थिरता में रहेंगे; लोगों के बीच सामान्य व्यवहार होंगे और देशों के बीच भी सामान्य व्यवहार होंगे। फिर भी वर्तमान की इससे कोई तुलना नहीं है। स्वर्ग के नीचे सब कुछ अराजक है और हर देश में धीरे-धीरे तख़्तापलट की शुरुआत हो रही है। परमेश्वर के कथनों के साथ-साथ, लोग धीरे-धीरे बदल रहे हैं और आंतरिक रूप से, हर देश धीरे-धीरे टूट रहा है। रेत के महल की तरह बेबीलोन की स्थिर नींव हिलनी शुरू हो गयी है, और जैसे ही परमेश्वर के इरादों में बदलाव होता है, दुनिया में अनजाने में भारी बदलाव होने लगते हैं, और किसी भी समय हर तरह के चिह्न प्रकट होने लगते हैं, जो दिखाता है कि दुनिया के अंत का दिन आ गया है! यह परमेश्वर की योजना है और इन्हीं कदमों के जरिए वह कार्य करता है। निश्चित रूप से हर देश टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाएगा और पुराने सदोम का दूसरी बार सर्वनाश होगा। इस प्रकार परमेश्वर कहता है, “संसार का स्खलन हो रहा है! बेबीलोन पंगु होने की स्थिति में है!” स्वयं परमेश्वर के अलावा और कोई इसे पूरी तरह से समझ नहीं सकता; आख़िरकार, लोगों की जागरूकता की एक सीमा है। उदाहरण के लिए, आंतरिक मामलों के मंत्रियों को पता हो सकता है कि वर्तमान परिस्थितियाँ अस्थिर और अराजक हैं, लेकिन वे उनका समाधान करने में असमर्थ हैं। वे केवल धारा के संग बह सकते हैं, अपने हृदय में उस दिन की आस लगाए हुए, जब वे अपने मस्तक उन्नत रख सकेंगे, जब सूर्य एक बार फिर से पूर्व में उगेगा, देश भर में चमकेगा और इस दुःखद स्थिति को पलट देगा। लेकिन उन्हें पता नहीं कि जब सूर्य दूसरी बार उगता है, तो इसका उदय चीजों को पहले जैसी स्थिति में लाने के उद्देश्य से नहीं होता है—यह एक पुनरुत्थान होता है, एक संपूर्ण परिवर्तन। पूरे ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर की योजना ऐसी ही है। वह एक नई दुनिया को अस्तित्व में लाएगा लेकिन सबसे पहले वह इंसान का नवीनीकरण करेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों का अनावरण, अध्याय 22 के साथ अध्याय 23
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 223
संसार में, भूकंप आपदा की शुरुआत हैं। सबसे पहले, मैं संसार—अर्थात् पृथ्वी—को बदलता हूँ और उसके बाद महामारियाँ और अकाल आते हैं। यह मेरी योजना है, ये मेरे सोपान हैं, और अपनी प्रबंधन योजना को पूरा करने के उद्देश्य से, मैं अपनी सेवा करवाने के लिए सभी को तैयार करूँगा। इस प्रकार पूरा ब्रह्माण्ड जगत, मेरे सीधे हस्तक्षेप के बिना भी, नष्ट कर दिया जाएगा। जब मैं पहली बार देह बना और सलीब पर चढ़ाया गया, तब पृथ्वी प्रचण्ड रूप से हिल गई थी, जब अंत आएगा तब भी ऐसा ही होगा। जिस पल मैं देह से आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करूँगा, उसी पल भूकंप आने शुरू हो जाएँगे। इस प्रकार, ज्येष्ठ पुत्र बिल्कुल भी आपदा का कष्ट नहीं झेलेंगे, जबकि वे जो ज्येष्ठ पुत्र नहीं हैं कष्ट झेलने के लिए आपदाओं के बीच छोड़ दिए जाएँगे। इसलिए, मानवीय दृष्टिकोण से, हर कोई ज्येष्ठ पुत्र बनने का इच्छुक है। लोगों के पूर्वाभासों में, यह आशीषों के आनंद के लिए नहीं है, बल्कि आपदा के कष्ट से बचने के लिए है। यह बड़े लाल अजगर का षड़यंत्र है। तो भी मैं इसे कभी बचकर नहीं जाने दूँगा; मैं इसे मेरा कठोर दण्ड भुगतवाऊँगा और फिर खड़ा करके इससे अपनी सेवा करवाऊँगा (इसका अर्थ मेरे पुत्रों और मेरे लोगों को पूरा करना है), उसे सदा अपने ही षडयंत्रों के धोखे में फँसने, सदा मेरा न्याय स्वीकार करने, और सदा मेरे द्वारा जलाया जाने पर मजबूर करूँगा। यही सेवा करने वालों से स्तुति करवाने (अर्थात, मेरी महान सामर्थ्य को प्रकट करने के लिए उनका उपयोग करने) का सच्चा अर्थ है। मैं बड़े लाल अजगर को अपने राज्य में चोरी-छिपे घुसने नहीं दूँगा, न ही मैं इसे अपनी स्तुति करने का अधिकार दूँगा! (क्योंकि यह लायक नहीं है, यह कभी लायक नहीं होगा!) मैं बड़े लाल अजगर से अनंत काल तक अपनी केवल सेवा करवाऊँगा! मैं इसे अपने सामने केवल दण्डवत होने दूँगा। (जो नष्ट कर दिए जाते हैं, वे उनसे बेहतर स्थिति में होते हैं जो नरकवास में हैं; विनाश कठोर दण्ड का अस्थायी रूप मात्र है, जबकि जो लोग नरकवास में हैं, वे अनंत काल के लिए कठोर दण्ड भुगतेंगे। इसी कारण से मैं “दण्डवत” शब्द का प्रयोग करता हूँ। चूंकि ये लोग चोरी-छिपे मेरे घर में घुस आते हैं और मेरे काफ़ी अनुग्रहों का आनंद लेते हैं, और मेरे कुछ ज्ञान से युक्त हो जाते हैं, इसलिए मैं कठोर दण्ड का प्रयोग करता हूँ। जहाँ तक उनकी बात है जो मेरे घर के बाहर हैं, तुम कह सकते हो कि अज्ञानी कष्ट नहीं भुगतेंगे।) अपनी धारणाओं में, लोग सोचते हैं कि जिन लोगों को नष्ट कर दिया जाता है, वे उनसे बदतर स्थिति में हैं जो नरकवास में हैं, लेकिन इसके विपरीत, नर्क में पड़े लोगों को सदा के लिए कठोरतापूर्वक दंडित करना पड़ता है, और जिन्हें नष्ट कर दिया जाता है वे समूचे अनंत काल के लिए शून्यता में लौट जाएँगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 108
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 224
जब राज्य की सलामी गूँजती है—और वही वह क्षण होता है जब सात बार मेघगर्जन होते हैं—तब यह ध्वनि स्वर्ग और पृथ्वी को झकझोर देती है, सर्वोच्च आसमान में हलचल मचा देती है और प्रत्येक मानव के हृदय के तारों को कंपकंपा देती है। बड़े लाल अजगर के देश में राज्य का स्तुतिगान आधिकारिक तौर पर गूँज उठता है, यह सिद्ध करते हुए कि मैंने उस देश को नष्ट करके अपना राज्य स्थापित कर लिया है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह बात है कि पृथ्वी पर मेरा राज्य स्थापित हो गया है। इस क्षण मेरे स्वर्गदूत संसार के प्रत्येक देश में घूमने के लिए भेजे जाने लगे हैं, ताकि वे मेरे पुत्रों और मेरे लोगों की चरवाही कर सकें। यह मेरे कार्य के अगले चरण की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी है। तथापि मैं व्यक्तिगत रूप से उस स्थान पर आता हूँ जहाँ वह बड़ा लाल अजगर कुंडली मारकर बैठा है और उसके साथ “प्रतिस्पर्धा” करता हूँ। एक बार जब सभी लोग मुझे देह में जानने लगेंगे और देह में मेरे कर्मों को देख पाएँगे, तब बड़े लाल अजगर की माँद राख में बदल जाएगी और इस तरह विलुप्त हो जाएगी कि उसका नामो-निशान तक नहीं रहेगा। मेरे राज्य के लोगों के रूप में, चूँकि तुम बड़े लाल अजगर से अत्यंत गहराई से घृणा करते हो, तुम्हें अपने कार्यकलाप से मेरे हृदय को संतुष्ट करना होगा, और इस तरह उस अजगर को शर्मिंदा करना होगा। क्या तुम लोग सचमुच महसूस करते हो कि बड़ा लाल अजगर घृणास्पद है? क्या तुम सच में महसूस करते हो कि वह राज्य के राजा का शत्रु है? क्या तुममें वास्तव में यह आस्था है कि तुम मेरे लिए अद्भुत गवाही दे सकते हो? क्या तुममें सचमुच आस्था है कि तुम बड़े लाल अजगर को पराजित कर सकते हो? मैं तुम लोगों से बस यही माँगता हूँ; मैं तुम लोगों से बस इतनी ही अपेक्षा करता हूँ कि तुम लोग इस चरण तक पहुँच सको। क्या तुम लोग यह कर सकोगे? क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम यह प्राप्त कर सकते हो? मानव सचमुच में क्या करने में सक्षम हैं? बल्कि क्या यह मैं स्वयं ही नहीं करता? मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि मैं व्यक्तिगत रूप से उस स्थान पर आता हूँ, जहाँ युद्ध चल रहा होता है? मैं जो चाहता हूँ वह तुम लोगों का विश्वास है, न कि तुम लोगों के कर्म। सभी मनुष्य मेरे वचनों को सीधे-सच्चे ढंग से समझने में अक्षम हैं और इसके बजाय बस कनखियों से उन पर एक नज़र भर डालते हैं। क्या इससे तुम्हें अपने लक्ष्य प्राप्त करने में मदद मिली है? क्या इस ढंग से तुम मुझे जानने लगे हो? ईमानदारी से कहूँ, तो पृथ्वी पर मानवों में कोई एक भी ऐसा नहीं है जो सीधे मेरे चेहरे की ओर देख पाने में समर्थ हो और कोई एक भी ऐसा नहीं है, जो मेरे वचनों के अर्थ को शुद्धता के साथ समझ पाता हो। इसलिए मैंने पृथ्वी पर एक अभूतपूर्व परियोजना शुरू की है, ताकि मैं अपने लक्ष्य प्राप्त कर सकूँ और लोगों के हृदय में अपनी सच्ची छवि स्थापित कर सकूँ। इस तरह, मैं उस युग का अंत करूँगा जिसमें धारणाएँ लोगों के ऊपर हावी रहती हैं।
आज, मैं न केवल बड़े लाल अजगर के देश के ऊपर उतर रहा हूँ, बल्कि मैं अपना चेहरा समूचे ब्रह्माण्ड की ओर भी मोड़ रहा हूँ, जिसने समूचे सर्वोच्च आसमान में कंपकंपाहट उत्पन्न कर दी है। क्या कहीं कोई एक भी स्थान है जो मेरे न्याय के अधीन नहीं है? क्या कोई एक भी स्थान है जो उन आपदाओं के बीच नहीं है जो मैं उस पर बरसाता रहता हूँ? हर उस स्थान पर जहाँ मैं जाता हूँ, मैंने तरह-तरह के “विनाश के बीज” छितरा दिए हैं। यह मेरे कार्य करने के तरीक़ों में से एक है, और यह निस्संदेह मानवता के उद्धार का एक कार्य है, और जो मैं उन्हें देता हूँ वह अब भी एक प्रकार की प्रेमपूर्ण दयालुता है। मैं चाहूँगा कि और भी अधिक लोग मुझे जानें और मुझे देखें और इस तरह उस परमेश्वर का भय मानने लगें जिसे वे इतने सारे वर्षों से देख नहीं सके हैं, किंतु जो ठीक इस समय व्यावहारिक है। मैंने संसार की सृष्टि किस कारण से की? मानव प्राणियों के भ्रष्ट हो जाने के बाद भी, मैंने उन्हें समूल नष्ट क्यों नहीं किया? समूची मानव जाति आपदाओं के बीच किस कारण से रहती है? निजी तौर पर देहधारण करने में मेरा क्या उद्देश्य था? जब मैं अपना कार्य कर रहा होता हूँ, तो मानवता न केवल कड़वे का, बल्कि मीठे का स्वाद भी सीखती है। संसार के सारे लोगों में, कौन है जो मेरे अनुग्रह के भीतर नहीं रहता है? यदि मैंने मानव प्राणियों को भौतिक आशीष प्रदान नहीं किए होते, तो संसार में कौन समृद्ध होने में समर्थ हो पाता? क्या ऐसा हो सकता है कि तुम लोगों को मेरे लोगों का दर्जा हासिल करने देना एक आशीष है? यदि तुम मेरे लोग न होते, बल्कि सेवा करने वाले होते, तो क्या तुम लोग अभी भी मेरे आशीषों के भीतर मौजूद नहीं होते? तुममें से कोई भी मेरे वचनों के मूल को समझने में सक्षम नहीं है। लोग मेरे द्वारा प्रदान की गई पदवियों को सँजोकर नहीं रखते। बहुत-से लोग “सेवा करने वाले” की पदवी के कारण अपने हृदयों में शिकायतें रखते हैं और बहुत-से लोग “मेरे लोग” की पदवी के कारण अपने हृदयों में मेरे प्रति प्रेम विकसित कर लेते हैं। किसी को भी मुझे मूर्ख बनाने का प्रयास नहीं करना चाहिए; अपनी आँखों से मैं सभी चीजों की पड़ताल करता हूँ! तुम लोगों में से कौन स्वेच्छा से ग्रहण करता है और किसमें पूर्ण समर्पण है? यदि राज्य की सलामी नहीं गूँजती, तो क्या तुम लोग अंत तक सचमुच समर्पण कर पाते? मानव क्या कर पाने और क्या सोच पाने में समर्थ हैं, और वे कितनी दूर तक जा पाते हैं—ये सब चीजें मैंने बहुत पहले ही पूर्वनिर्धारित कर दी थीं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 10
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 225
इस तथ्य के बावजूद कि राज्य का निर्माण औपचारिक रूप से आरंभ हो गया है, राज्य के लिए औपचारिक रूप से सलामी बजनी अभी शेष है; अभी यह केवल आने वाली चीज़ों की भविष्यवाणी है। जब परमेश्वर के सभी लोग पूर्ण किए जा चुके होंगे और पृथ्वी के सभी देश मसीह का राज्य बन चुके होंगे, तो यही वह समय होगा जब सात गर्जनाएँ गूँजेंगी। वर्तमान दिन उस चरण की दिशा में एक लंबा कदम है; उस दिन की ओर बढ़ने के लिए धावा बोल दिया गया है। यह परमेश्वर की योजना है और निकट भविष्य में यह साकार हो जाएगी। लेकिन, परमेश्वर जो कुछ भी कहता है, वह सब पहले ही उसके द्वारा पूरा कर दिया गया है। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि धरती के देश केवल रेत के किले हैं, ढह जाने के कगार पर हैं—अंत का दिन सन्निकट है और बड़ा लाल अजगर परमेश्वर के वचन के नीचे गिर जाएगा। यह सुनिश्चित करने के लिए कि परमेश्वर की योजना पूरी तरह से सफल हो, स्वर्गदूत मानव संसार में उतर आए हैं, उन्होंने परमेश्वर को संतुष्ट करने का भरसक प्रयास करना शुरू कर दिया है और देहधारी परमेश्वर दुश्मन से लड़ाई करने के लिए युद्ध के मैदान में स्वयं मौजूद है। जहाँ देहधारी देह होती है, वहीं शत्रु पूर्णतया नष्ट हो जाता है। सबसे पहले चीन नष्ट होगा; परमेश्वर के हाथों इसका सर्वनाश कर दिया जाएगा। परमेश्वर इस पर कतई कोई भी दया नहीं दिखाएगा। जैसे-जैसे परमेश्वर के लोग अधिक परिपक्व होते जाते हैं, वैसे-वैसे यह सिद्ध होता जाता है कि बड़ा लाल अजगर और भी ढहता जा रहा है; यह मनुष्य के लिए स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर है। परमेश्वर के लोगों की परिपक्वता दुश्मन के पतन का संकेत है। यह “प्रतिस्पर्धा करने” के अर्थ का थोड़ा स्पष्टीकरण है। इस तरह, परमेश्वर ने अनेक अवसरों पर अपने लोगों को स्मरण दिलाया है कि वे इंसानों के दिलों में उन धारणाओं द्वारा कायम रुतबे को नष्ट करने के लिए परमेश्वर की खूबसूरत गवाहियाँ दें, जो बड़े लाल अजगर की कुरूपता हैं। परमेश्वर लोगों के विश्वास में जीवन डालने के लिए इस तरह के अनुस्मारकों का उपयोग करता है और, ऐसा करने में, अपने कार्य में नतीजे प्राप्त करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने कहा है, “मानव सचमुच में क्या करने में सक्षम हैं? बल्कि क्या यह मैं स्वयं ही नहीं करता?” सभी मनुष्य ऐसे ही हैं; न केवल वे अक्षम हैं, बल्कि वे अक्सर निरुत्साहित और निराश हो जाते हैं। इस कारण, वे परमेश्वर को नहीं जान सकते। परमेश्वर न केवल मानवजाति की आस्था को पुनर्जीवित करता है, बल्कि समय-समय पर वह लोगों के भीतर गुप्त रूप से शक्ति का संचार कर रहा है।
इसके बाद, परमेश्वर ने पूरे ब्रह्मांड से बात करना शुरू कर दिया। परमेश्वर ने न केवल चीन में अपना नया कार्य आरंभ किया है, बल्कि उसने पूरे ब्रह्मांड के भीतर आज का नया कार्य करना आरंभ कर दिया है। कार्य के इस चरण में चूँकि परमेश्वर अंततः उसके साथ विश्वासघात करने वाली संपूर्ण मानवता को एक बार फिर से अपने सिंहासन के सामने आत्मसमर्पण करवाने से पहले दुनिया भर में अपने सभी कर्मों को प्रकट करने का इरादा रखता है, इसलिए परमेश्वर के न्याय में अभी भी उसकी दया और प्रेमपूर्ण दयालुता शामिल होगी। जैसे-जैसे दुनिया भर में विभिन्न घटनाक्रम होते हैं, जिनके कारण लोग घबरा जाते हैं, वैसे-वैसे उनके लिए परमेश्वर को खोजने के अवसर पैदा होते हैं ताकि उसके सम्मुख आने के लिए लोग वापस उमड़ पड़ें। इस प्रकार परमेश्वर कहता है, “यह मेरे कार्य करने के तरीक़ों में से एक है, और यह निस्संदेह मानवता के उद्धार का एक कार्य है, और जो मैं उन्हें देता हूँ वह अब भी एक प्रकार की प्रेमपूर्ण दयालुता है।”
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों का अनावरण, अध्याय 10
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 226
अपने कार्य को उसकी संपूर्णता में खोलते हुए, मैं पृथ्वी पर अपने अधिकार का प्रयोग करता हूँ। मेरे कार्य में जो कुछ है वह सब समूची पृथ्वी पर प्रतिबिंबित होता है; स्वर्ग में मेरी गतिविधियों को मानवजाति, पृथ्वी पर, कभी समझ नहीं पाई, न ही मेरे आत्मा के कार्यक्षेत्रों और प्रक्षेपपथों पर विस्तृत रूप से चिंतन-मनन कर पाई है। अधिकांश मानव प्राणी उन छोटी-मोटी बातों को ही पकड़ पाते हैं जो आत्मा के बाहर होती हैं, आत्मा की वास्तविक दशा बूझ नहीं पाते हैं। मैं मानवजाति से जो माँगें करता हूँ, वह अज्ञात स्वयं से नहीं करता जो स्वर्ग में है, न ही आँके न जा सकने वाले स्वयं से करता हूँ जो मैं पृथ्वी पर हूँ; मैं पृथ्वी पर मनुष्य की आध्यात्मिक कद-काठी के अनुसार उपयुक्त माँगें करता हूँ। मैंने कभी किसी को कठिनाइयों में नहीं डाला है, न ही मैंने अपने सुख के लिए कभी किसी से “उसका खून निचोड़ने” के लिए कहा है—क्या मेरी माँगें केवल ऐसी शर्तों तक सीमित हो सकती हैं? पृथ्वी पर अनगिनत प्राणियों में से, कौन-सा प्राणी मेरे मुख के वचनों के स्वभावों के प्रति समर्पित नहीं होता है? इनमें से कौन-सा प्राणी, मेरे समक्ष आते हुए, मेरे वचनों और मेरी प्रज्वलित अग्नि के द्वारा पूर्णतः भस्म नहीं कर दिया जाता है? इनमें से कौन-सा प्राणी मेरे समक्ष गर्वोन्मत्त उल्लास में “अकड़कर चलने” की हिम्मत करता है? इनमें से कौन-सा प्राणी मेरे समक्ष शीश नहीं झुकाता है? क्या मैं वह परमेश्वर हूँ जो सृष्टि पर मात्र ख़ामोशी थोपता है? सृष्टि की असंख्य चीजों में से, मैं उन्हें चुनता हूँ जो मेरे इरादों के अनुरूप हैं; मानवजाति के असंख्य मनुष्यों में से, मैं उन्हें चुनता हूँ जो मेरे हृदय की परवाह करते हैं। मैं समस्त तारों में से सर्वश्रेष्ठ चुनता हूँ, इस तरह अपने राज्य में प्रकाश की एक मद्धिम-सी किरण और जोड़ लेता हूँ। मैं पृथ्वी पर चलता हूँ, सर्वत्र अपनी सुगंध बिखेरते हुए, और, प्रत्येक स्थल पर, मैं अपना स्वरूप पीछे छोड़ता जाता हूँ। प्रत्येक स्थल मेरी वाणी की ध्वनि से गुँजायमान हो जाता है। लोग सर्वत्र बीते कल के रमणीय दृश्यों पर देर तक ठिठके रहते हैं, क्योंकि समूची मानवजाति अतीत को याद कर रही है ...
समूची मानवजाति मेरा चेहरे देखने को लालायित है, परंतु जब मैं व्यक्तित्व में पृथ्वी पर नीचे आता हूँ, तब वे सब मेरे आगमन से विमुख हो जाते हैं, और वे सभी रोशनी के आगमन को निर्वासित कर देते हैं, मानो मैं स्वर्ग में मनुष्य का शत्रु होऊँ। मनुष्य अपनी आँखों में रक्षात्मक चमक के साथ मेरा अभिवादन करता है, और निरंतर सतर्क बना रहता है, इससे अत्यंत भयभीत कि शायद मेरे पास उसके लिए इतर योजनाएँ हों। क्योंकि मनुष्य मुझे अपरिचित मित्र मानते हैं, इसलिए उन्हें लगता है मानो मैं भेदभाव किए बिना उन्हें मार डालने का मनोरथ पाले बैठा हूँ। मनुष्य की नज़रों में, मैं जानलेवा बैरी हूँ। विपत्ति के बीच मेरी गर्मजोशी का स्वाद चखने के बाद भी मनुष्य मेरे प्रेम से अनभिज्ञ बना हुआ है, और अब भी मुझे दूर रोके रखने और मेरी अवज्ञा करने पर उतारू है। उसके विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए उसकी स्थिति का लाभ उठाना तो दूर, मैं मनुष्य को आलिंगन की गर्माहट में लपेट लेता हूँ, उसके मुँह को मिठास से भर देता हूँ, और उसके पेट में ज़रूरत भर का भोजन डाल देता हूँ। परंतु, जब मेरा प्रचंड कोप से भरा गुस्सा पहाड़ों और नदियों को झकझोरता है, तब, मनुष्य की कायरता के कारण, मैं भिन्न-भिन्न रूपों में यह राहतें अब और उस पर न्योछावर नहीं करूँगा। इस क्षण, प्रचंड क्रोध में मैं अपने आपे से बाहर हो जाऊँगा, समस्त जीवित प्राणियों को पश्चाताप करने का अवसर देने से इनकार करके, और मनुष्य के लिए अपनी समस्त आशा को तिलांजलि देकर, मैं उसे इतना कठोर दण्ड दूँगा जिसका वह पूरी तरह हक़दार है। इस क्षण, गरजते बादल और चमकती बिजली कौंधते और दहाड़ते हैं, उसी तरह जैसे महासागर की लहरें गुस्से से उफन रही हों, जैसे दसियों हजारों पहाड़ भरभराकर ढह रहे हों। अपने विद्रोहीपन के कारण, मनुष्य गरजते बादल और चमकती बिजली के द्वारा मार गिराया जाता है, और गरजते बादल तथा चमकती बिजली के जबरदस्त झोंकों में अन्य जीव-जंतुओं का भी सफाया हो जाता है, समूचा ब्रह्माण्ड अचानक उथल-पुथल हो जाता है, और सृष्टि जीवन की आदिम साँस पुनः प्राप्त नहीं कर पाती है। मानवजाति के असंख्य समुदाय गरजते बादल की दहाड़ से बचकर निकल नहीं सकते; चमकती बिजली की कौंधों के बीच, झुंड के झुंड मनुष्य, तेज़ बहाव में एक के ऊपर एक तेज़ी से गिरते जाते हैं, पहाड़ों से झरनों में गिरती प्रचंड धाराएँ उन्हें दूर बहा ले जाती हैं। देखते ही देखते अचानक, “मनुष्यों” का संसार मनुष्य की “मंज़िल” से मिलता और उसमें समा जाता है। महासागर की सतह पर शव बहते हैं। समस्त मानवजाति मेरे कोप के कारण मुझसे बहुत दूर चली जाती है, क्योंकि मनुष्य ने मेरे आत्मा के सार के विरुद्ध पाप किया है, उसकी विद्रोहशीलता ने मुझे नाराज़ कर दिया है। परंतु, जल से रिक्त स्थानों में, अन्य मनुष्य अब भी, हँसी और गाने के बीच, उन प्रतिज्ञाओं का आनंद ले रहे हैं, जो मैंने कृपापूर्वक उन्हें प्रदान की हैं।
जब सारे लोग ख़ामोश हो जाते हैं, मैं उनकी नज़रों के सामने प्रकाश की एक किरण विकिरित करता हूँ। तत्पश्चात, मनुष्यों के मन निर्मल और आँखें उजली हो जाती हैं, वे अब और ख़ामोश रहने के इच्छुक नहीं रह जाते हैं; इस प्रकार, तत्काल उनके हृदयों में आध्यात्मिक भावनाएँ उठती हैं। यह होने के साथ ही, समूची मानवजाति पुनर्जीवित हो जाती है। मेरे द्वारा घोषित वचनों के माध्यम से जीवित रहने का एक और अवसर प्राप्त करके, अपनी अनकही वेदनाओं को एक ओर रखते हुए, सभी मनुष्य मेरे समक्ष आते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सभी मानव पृथ्वी पर जीवित रहना चाहते हैं। तो भी उनके बीच किसने कभी भी मेरी खातिर जीने का मनोरथ किया है? उनमें से किसने कभी भी अपने भीतर वे शानदार चीज़ें अनावृत की हैं जो वह मेरे आनंद के लिए प्रस्तुत करे? उनमें से किसने कभी भी मेरी मोहक सुगंध की खोज की है? समस्त मानव प्राणी अपरिष्कृत और अशुद्ध वस्तुएँ हैं : बाहर की ओर, वे आँखों को चौंधियाते प्रतीत होते हैं, किंतु उनका सार मुझसे सच्चे अर्थ में प्रेम करना नहीं है, क्योंकि मानव हृदय के गहरे अवतलों में कभी मेरा कोई तत्त्व नहीं रहा है। मनुष्य में बहुत कमियाँ हैं : मुझसे उसकी तुलना करना उतनी ही विशाल खाई को प्रकट करना प्रतीत होता है जितनी स्वर्ग और पृथ्वी के बीच है। ऐसा होते हुए भी, मैं मनुष्य के कमज़ोर और सुभेद्य स्थलों पर प्रहार नहीं करता हूँ, न ही मैं उसकी कमियों के कारण उसकी खिल्ली उड़ाता हूँ। मेरे हाथ हज़ारों सालों से पृथ्वी पर कार्य में जुटे हैं, और इस पूरे समय मेरी आँखों ने संपूर्ण मानवजाति के ऊपर नज़र रखी है। तो भी मैंने कभी एक भी मानव जीवन खेलने के लिए यूँ ही नहीं ले लिया है मानो वो कोई खिलौना हो। मैं देखता हूँ वे पीड़ाएँ जो मनुष्य ने सही हैं और मैं समझता हूँ कि उसने क्या क़ीमत चुकाई है। जब वह मेरे सामने खड़ा होता है, मैं नहीं चाहता कि ताड़ना देने के लिए मनुष्य को चुपके से पकड़ लूँ, न ही मैं अवांछनीय चीजें उस पर न्योछावर करना चाहता हूँ। इसके बजाय, इस पूरे समय, मैंने मनुष्य का भरण-पोषण ही किया है, और उसे दिया ही है। इसलिए, वह सब जिसका मनुष्य आनंद लेता है, मेरा अनुग्रह ही है, यह सब उदारता है जो मेरे हाथों से आता है। चूँकि मैं पृथ्वी पर हूँ, इसलिए मनुष्य को कभी भूख की यंत्रणाएँ नहीं झेलनी पड़ीं। अपितु, मैं मनुष्य को अपने हाथों की वे चीज़ें प्राप्त करने देता हूँ जिनका वह आनंद ले सकता है, और मनुष्यजाति को अपने आशीषों के भीतर जीने देता हूँ, क्या समस्त मानवजाति मेरी ताड़ना के अधीन नहीं जीती है? जिस तरह पहाड़ों की गहराइयों में बाहुल्य है, और समुद्र में आनंददायक चीजों की प्रचुरता है, ठीक उसी तरह क्या आज मेरे वचनों के भीतर जी रहे लोगों के पास सराहना करने और स्वाद लेने के लिए और भी अधिक भोजन नहीं है? मैं पृथ्वी पर हूँ, और पृथ्वी पर मानवजाति मेरे आशीषों का आनंद लेती है। मैं जब पृथ्वी को छोड़कर जाता हूँ, जिस समय मेरा कार्य भी अपनी पूर्णता पर पहुँचता है, उस समय अपनी दुर्बलता के कारण मानवजाति मेरा प्यार-दुलार अब और प्राप्त नहीं करेगी।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 17
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 227
क्या तुम लोग सच में बड़े लाल अजगर से घृणा करते हो? क्या तुम सच में, ईमानदारी से उससे घृणा करते हो? मैंने तुम लोगों से इतनी बार क्यों पूछा है? मैं तुमसे यह प्रश्न बार-बार क्यों पूछता हूँ? तुम लोगों के हृदय में बड़े लाल अजगर की क्या छवि है? क्या उसे वास्तव में हटा दिया गया है? क्या तुम सचमुच उसे अपना पिता नहीं मानते? सभी लोगों को मेरे प्रश्नों में निहित मेरा इरादा समझना चाहिए। यह लोगों का क्रोध भड़काने के लिए नहीं है, न ही मनुष्यों में विद्रोह उभारने के लिए है, न ही इसलिए है कि मनुष्य अपना मार्ग स्वयं ढूँढ़ सके, बल्कि इसलिए है कि सभी लोग अपने आपको बड़े लाल अजगर के बंधन से छुड़ा लें। फिर भी किसी को चिंतित नहीं होना चाहिए। सब कुछ मेरे वचनों से पूरा हो जाएगा; कोई मनुष्य इसमें भाग नहीं ले सकता, और कोई मनुष्य वह काम नहीं कर सकता जिसे मैं करूँगा। मैं सभी देशों की हवा साफ करूँगा और पृथ्वी पर से दुष्टात्माओं के सभी निशान मिटा दूँगा। मैं पहले ही शुरू कर चुका हूँ और मैं अपनी ताड़ना का प्रारंभिक कार्य बड़े लाल अजगर के निवास-स्थान में आरंभ करूँगा। इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि मेरी ताड़ना पूरे ब्रह्मांड पर आ गई है। बड़ा लाल अजगर और सभी प्रकार की अशुद्ध आत्माएँ मेरी ताड़ना से बच नहीं सकती हैं, क्योंकि मैं सभी देशों की पड़ताल करता हूँ। जब पृथ्वी पर मेरा कार्य पूरा हो जाएगा, अर्थात् जब न्याय का युग समाप्त होगा, तब मैं औपचारिक रूप से बड़े लाल अजगर को ताड़ना दूँगा। मेरे लोग बड़े लाल अजगर को दी जाने वाली मेरी धार्मिक ताड़ना अवश्य देखेंगे, मेरी धार्मिकता के कारण अनवरत रूप से स्तुति अवश्य व्यक्त करेंगे, और मेरी धार्मिकता के कारण सदा मेरे पवित्र नाम की बड़ाई अवश्य करेंगे। इसलिए तुम लोग औपचारिक रूप से अपने कर्तव्य निभाओगे, और औपचारिक रूप से सभी देशों में मेरी स्तुति करोगे, हमेशा-हमेशा के लिए!
जब न्याय का युग अपने शिखर पर पहुँचेगा, तो मैं अपना कार्य समाप्त करने में जल्दबाजी नहीं करूँगा, बल्कि इसे ताड़ना के युग के प्रमाण के साथ जोड़ दूँगा, ताकि मेरे सारे लोग देख सकें; इसमें अधिक बड़े फल लगेंगे। यह प्रमाण वह साधन है, जिसके द्वारा मैं बड़े लाल अजगर को ताड़ना देता हूँ, और मैं अपने लोगों को उनकी आँखों से यह सब दिखाऊँगा, ताकि वे मेरे स्वभाव के बारे में अधिक जान सकें। जिस समय मेरे लोग मेरा आनंद लेते हैं, वह वही समय होता है जब बड़े लाल अजगर को ताड़ना दी जाती है। बड़े लाल अजगर के लोगों को उसके विरुद्ध खड़ा करना और उनसे उसके विरुद्ध विद्रोह करवाना मेरी योजना है, और यह वह तरीका है जिससे मैं अपने लोगों को पूर्ण करता हूँ, और यह मेरे सभी लोगों के लिए जीवन में प्रगति करने का एक बड़ा अवसर है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 28
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 228
जब उज्ज्वल चाँद उगता है, तो शांत रात तत्काल बिखर जाती है। यद्यपि चाँद छिन्न-भिन्न हालत में होता है, लेकिन मनुष्य उल्लसित होता है, और चाँदनी द्वारा सुंदर बनाए गए दृश्य की प्रशंसा करता हुआ शांति से उस चाँदनी में बैठता है। मनुष्य अपनी मनोदशा का वर्णन नहीं कर सकता; ऐसा लगता है मानो वह अपने विचारों को अतीत की ओर ले जाना चाहता हो, मानो वह भविष्य की ओर देखना चाहता हो और मानो वह वर्तमान का आनंद उठा रहा हो। एक मुस्कुराहट उसके चेहरे पर उभरती है, और आनंदमय वातावरण में एक ताजगी देने वाली खुशबू व्याप्त हो जाती है; जैसे ही मंद हवा बहनी शुरू होती है, मनुष्य उस गहरी सुगंध को महसूस कर लेता है और वह उससे मानो मदहोश हो जाता है, जागने में असमर्थ। यही वह समय है, जब मैं व्यक्तिगत रूप से मनुष्यों के बीच आया हूँ, और मनुष्य में तीव्र सुगंध का बढ़ा हुआ एहसास है, और इस प्रकार वह इस सुगंध में जीता है। मैं मनुष्य के साथ शांति से हूँ, वह मेरे साथ मेल से रहता है; अब वह मुझे अलग नज़र से नहीं देखता, अब मैं मनुष्य की कमियों की काट-छाँट नहीं करता, अब मनुष्य के चेहरे पर दुःख की छाया नहीं दिखती और अब मृत्यु संपूर्ण मानवजाति पर नहीं मँडराती। आज मैं मनुष्य के साथ-साथ चलते हुए, उसके साथ मिलकर ताड़ना के युग में आगे बढ़ता हूँ। मैं अपना कार्य कर रहा हूँ, अर्थात्, मैं मनुष्यों के बीच अपनी छड़ी से प्रहार करता हूँ और मनुष्यों में जो कुछ विद्रोहात्मक है, वह उस पर पड़ती है। मनुष्य की नजर में मेरी छड़ी में विशेष शक्तियाँ प्रतीत होती हैं : यह उन सभी पर पड़ती है, जो मेरे शत्रु हैं, और उन्हें आसानी से नहीं छोड़ती; मेरा विरोध करने वाले सभी लोगों पर यह छड़ी अपना अंतर्निहित कार्य करती है; वे सभी जो मेरे हाथों में हैं मेरे इरादों के अनुसार अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं, और वे कभी मेरे इरादों के विरुद्ध नहीं गए हैं, न ही अपना सार बदला है। परिणामस्वरूप, समुद्र गरजेंगे, पहाड़ गिर जाएँगे, बड़ी-बड़ी नदियाँ विघटित हो जाएँगी, मनुष्य हमेशा अस्थिर रहेगा, सूरज मंद पड़ जाएगा, चाँद काला हो जाएगा, मनुष्य के पास शांति से जीने के लिए और दिन नहीं रहेंगे, भूमि पर शांति का और समय नहीं होगा, स्वर्ग फिर कभी शांत और निर्विघ्न नहीं रहेगा, यह अब खुद को संयमित नहीं करेगा। सभी चीजें नई कर दी जाएँगी और फिर से अपना मूल रूप पा लेंगी। पृथ्वी पर सारे परिवार छिन्न-भिन्न कर दिए जाएँगे, और पृथ्वी पर सारे देश अंदर से विभाजित हो जाएँगे; पति-पत्नी के बीच पुनर्मिलन के दिन चले जाएँगे, माँ-बेटा दोबारा आपस में नहीं मिलेंगे, न बाप-बेटी ही फिर कभी आपस में मिल पाएँगे। पृथ्वी पर चीजें जिस तरह से भी हुआ करती थीं, उन सब को मेरे द्वारा ध्वस्त कर दिया जाएगा। मैं लोगों को अपनी भावनाएँ अभिव्यक्त करने का अवसर नहीं देता, क्योंकि मैं दैहिक भावनाओं से रहित हूँ, और चरम सीमा तक लोगों की भावनाओं से नफरत करने लगा हूँ। लोगों के बीच की भावनाओं के कारण ही मुझे एक तरफ कर दिया गया है, और इस तरह मैं उनकी नजरों में “तीसरा पक्ष” बन गया हूँ; यह लोगों के बीच की भावनाओं के कारण ही है कि मैं भुला दिया गया हूँ; मनुष्य अपनी भावनाओं के कारण ही अपने “जमीर” को फिर से उठा लेने का अवसर पाता है; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह हमेशा मेरी ताड़ना से विमुख रहता है; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह हमेशा मुझे अन्यायी और अनुचित कहता है और कहता है कि मैं चीजें सँभालने में मनुष्य की भावनाओं से बेपरवाह रहता हूँ। क्या पृथ्वी पर मेरे भी सगे-संबंधी हैं? किसने कभी मेरी तरह मेरी संपूर्ण प्रबंधन योजना के लिए बिना खाने या सोने की परवाह किए दिन-रात काम किया है? मनुष्य की तुलना परमेश्वर से कैसे हो सकती है? मनुष्य परमेश्वर के साथ सुसंगत कैसे हो सकता है? परमेश्वर, जो कि सृजन करता है, उस मनुष्य की तरह कैसे हो सकता है, जिसे सृजित किया गया है? मैं कैसे पृथ्वी पर मनुष्य के साथ हमेशा रह सकता हूँ और उसके साथ मिलकर कार्य कर सकता हूँ? मेरे दिल के लिए चिंता कौन महसूस कर सकता है? क्या यह मनुष्य की प्रार्थना है? मैं एक बार मनुष्य से मिलने और उसके साथ चलने के लिए सहमत हुआ था—और हाँ, आज तक मनुष्य मेरी देखभाल और सुरक्षा में जिया है, लेकिन क्या कभी कोई ऐसा दिन आएगा, जब मनुष्य मेरी देखभाल से अपने आपको अलग कर सकेगा? हालाँकि मनुष्य ने कभी मेरे हृदय की परवाह का भार नहीं उठाया है, लेकिन प्रकाशहीन भूमि पर निरंतर कौन रह सकता है? यह केवल मेरे आशीषों के कारण है कि मनुष्य आज तक जीवित है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 28
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 229
सारे देशों में बड़ी अराजकता है, क्योंकि परमेश्वर की छड़ी ने पृथ्वी पर अपना कार्य करना शुरू कर दिया है। परमेश्वर का कार्य पृथ्वी की स्थिति में देखा जा सकता है। जब परमेश्वर कहता है, “समुद्र गरजेंगे, पहाड़ गिर जाएँगे, बड़ी-बड़ी नदियाँ विघटित हो जाएँगी,” तो यह पृथ्वी पर छड़ी का आरंभिक कार्य है, जिसके परिणामस्वरूप “पृथ्वी पर सारे परिवार छिन्न-भिन्न कर दिए जाएँगे, और पृथ्वी पर सारे देश अंदर से विभाजित हो जाएँगे; पति-पत्नी के बीच पुनर्मिलन के दिन चले जाएँगे, माँ-बेटा दोबारा आपस में नहीं मिलेंगे, न बाप-बेटी ही फिर कभी आपस में मिल पाएँगे। पृथ्वी पर चीजें जिस तरह से भी हुआ करती थीं, उन सब को मेरे द्वारा ध्वस्त कर दिया जाएगा।” पृथ्वी पर परिवारों की सामान्य स्थिति ऐसी होगी। स्वाभाविक रूप से, संभवतः सभी लोगों की स्थिति ऐसी नहीं हो सकती है; अधिकतर की स्थिति ऐसी ही होगी। दूसरी ओर, इसका संदर्भ इस धारा के लोगों द्वारा भविष्य में अनुभव की जाने वाली परिस्थितियों से है। यह भविष्यवाणी करता है कि एक बार जब वे वचनों की ताड़ना से गुजर चुके होंगे और गैर-विश्वासियों पर आपदा बरपाई जा चुकी होगी, तो पृथ्वी पर लोगों के बीच पारिवारिक संबंधों का अस्तित्व नहीं रह जाएगा; वे सब सिनिम के लोग होंगे और परमेश्वर के राज्य में समर्पित होंगे। इस प्रकार, पति-पत्नी के बीच पुनर्मिलन के दिन चले जाएँगे, माँ-बेटा दोबारा आपस में नहीं मिलेंगे, न बाप-बेटी ही फिर कभी आपस में मिल पाएँगे। और इसलिए, धरती के लोगों के परिवार बिखर जाएँगे, टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएँगे और यह परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर किया जाने वाला अंतिम कार्य होगा। और क्योंकि परमेश्वर इस कार्य को पूरे विश्व में फैलाएगा, इसलिए वह लोगों के लिए “भावना” शब्द को स्पष्ट करने के लिए इस अवसर का उपयोग करता है, इस प्रकार उन्हें यह देखने देता है कि परमेश्वर का इरादा सभी लोगों के परिवारों को बिखराना है और यह दिखाना है कि परमेश्वर मानवजाति के बीच सभी “पारिवारिक विवादों” को हल करने के लिए ताड़ना का उपयोग करता है। यदि ऐसा न हो, तो पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य के अंतिम हिस्से को पूरा करने का कोई मार्ग नहीं होगा। परमेश्वर के वचनों का अंतिम भाग मानवजाति की सबसे बड़ी कमजोरी को प्रकट करता है—वे सभी भावनाओं की एक दशा में जीते हैं—और इसलिए परमेश्वर उनमें से किसी एक को भी नहीं छोड़ता, बल्कि संपूर्ण मानवजाति के हृदयों में छिपे रहस्यों को उजागर करता है। लोगों के लिए अपनी भावनाओं को छोड़ना इतना कठिन क्यों है? क्या ऐसा करना अंतरात्मा के मानकों के परे जाना है? क्या अंतरात्मा परमेश्वर की इच्छा पूरी कर सकती है? क्या भावनाएँ विपत्ति में लोगों की सहायता कर सकती हैं? परमेश्वर की नजरों में, भावनाएँ उसकी दुश्मन हैं—क्या यह परमेश्वर के वचनों में स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों का अनावरण, अध्याय 28
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 230
परमेश्वर के सभी वचनों में उसके स्वभाव का एक हिस्सा समाहित होता है। परमेश्वर के स्वभाव को वचनों में पूरी तरह से व्यक्त नहीं किया जा सकता है, जो यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि उसमें कितनी प्रचुरता है। आखिरकार, जिसे लोग देख और स्पर्श कर सकते हैं, वो उतना ही सीमित है जितनी कि लोगों की क्षमता है। यद्यपि परमेश्वर के वचन स्पष्ट हैं, तब भी लोग इन्हें पूरी तरह से समझने में असमर्थ हैं। उदाहरण के लिए इन वचनों को लो : “बिजली के बीच सभी प्रकार के जानवर अपने असली स्वरूप में प्रकट कर दिए जाते हैं। इसी प्रकार मेरे प्रकाश से रोशन होकर मनुष्य ने भी उस पवित्रता को वापस पा लिया है जो कभी उसके पास थी। ओह, अतीत का भ्रष्ट संसार! अंततः यह गंदे पानी में पलट गया है और सतह के नीचे डूबकर कीचड़ में बदल गया है!” परमेश्वर के सभी वचनों में उसके अस्तित्व का समावेश है, और भले ही सभी लोग इन वचनों से अवगत हों, फिर भी किसी ने कभी उनके अर्थ को नहीं जाना है। परमेश्वर की दृष्टि में, वे सभी जो उसका विरोध करते हैं, उसके शत्रु हैं अर्थात् जो लोग दुष्टात्माओं के हैं, वे पशु हैं। इस से कलीसिया की वास्तविक स्थिति को देखा जा सकता है। सभी लोग दूसरों द्वारा उपदेश या ताड़ना या सीधे निष्कासन के अधीन हुए बिना, अन्य मानवीय कार्यों के अधीन हुए बिना और दूसरों द्वारा चीजें बताए जाने के बिना परमेश्वर के वचनों की रोशनी में अपनी जाँच करते हैं। इस “सूक्ष्मदर्शी” के द्वारा, वे बहुत स्पष्ट रूप से देखते हैं कि उनके भीतर वास्तव में कितनी बीमारी है। परमेश्वर के वचनों में, हर प्रकार की आत्मा को वर्गीकृत किया जाता है और उसे उसके मूल रूप में प्रकट किया जाता है; जिनके पास स्वर्गदूतों की आत्माएँ हैं वे अधिक रोशन और प्रबुद्ध हो जाते हैं, इसलिए परमेश्वर के वचन हैं : “उस पवित्रता को पुनः प्राप्त कर लिया है जो कभी उनके पास थी।” ये वचन परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए अंतिम परिणामों पर आधारित हैं। फिलहाल, निस्संदेह, इस परिणाम को पूरी तरह से हासिल नहीं किया जा सकता है—यह सिर्फ एक पूर्वानुभव है, जिसके माध्यम से परमेश्वर के इरादे देखे जा सकते हैं। ये वचन इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं कि बहुत से लोग परमेश्वर के वचनों के भीतर चूर-चूर हो जाएंगे और सभी लोगों के पवित्रीकरण की उत्तरोत्तर प्रक्रिया में पराजित हो जाएँगे। यहाँ, “यह कीचड़ में बदल गया है” परमेश्वर द्वारा आग से संसार का नाश किए जाने का विरोध नहीं करता, और “बिजली” परमेश्वर के क्रोध की ओर संकेत करती है। जब परमेश्वर अपना महान कोप प्रकट करेगा, तब परिणामस्वरूप पूरी दुनिया ज्वालामुखी के फटने की तरह हर प्रकार की आपदाओं का अनुभव करेगी। आकाश में ऊपर खड़े हो कर, यह देखा जा सकता है कि पृथ्वी पर सभी प्रकार की आपदाएँ, दिन प्रति दिन मानवजाति को घेर रही हैं। ऊपर से नीचे देखने पर, पृथ्वी विभिन्न दृश्य प्रदर्शित करती है जो भूकंप से पहले के दृश्य जैसे हैं। तरल अग्नि अनियंत्रित बहती है, लावा बेरोकटोक बहता है, पहाड़ सरकते हैं और हर ओर ठंडी रोशनी चमकती है। पूरी दुनिया आग में डूब गई है। यह परमेश्वर के कोप के उत्सर्जन का दृश्य है, और यह उसके न्याय का समय है। वे सभी जो मांस और रक्त वाले हैं भागने में असमर्थ होंगे। इस प्रकार, पूरी दुनिया को नष्ट करने के लिए देशों के बीच युद्ध और लोगों के बीच संघर्ष की आवश्यकता नहीं होगी; इसके बजाय दुनिया परमेश्वर की ताड़ना के पालने में “स्वयं का होशहवास में आनंद” लेगी। कोई भी बच निकलने में सक्षम नहीं होगा; हर एक व्यक्ति को, एक के बाद एक, इस कठिन परीक्षा से गुजरना होगा। इसके बाद संपूर्ण ब्रह्माण्ड एक बार पुनः पवित्र कांति से जगमगाएगा और समस्त मानवजाति एक बार पुनः एक नया जीवन शुरू करेगी। और परमेश्वर ब्रह्मांड के ऊपर आराम करेगा और हर दिन मानवजाति को आशीष देगा। स्वर्ग असहनीय ढंग से उजाड़ नहीं होगा, बल्कि उस जीवन-शक्ति को पुनः प्राप्त करेगा, जो संसार की सृष्टि के बाद से उसके पास नहीं रही है। “छठा दिन” सटीक रूप से वह समय है जब परमेश्वर एक नया जीवन शुरू करेगा। परमेश्वर और मनुष्यजाति दोनों विश्राम में प्रवेश करेंगे और ब्रह्मांड अब धुँधला या मैला नहीं रहेगा, बल्कि नया कर दिया जाएगा। यही कारण है कि परमेश्वर ने कहा : “पृथ्वी अब मौत के समान स्थिर और मूक नहीं है, स्वर्ग अब उजाड़ और नीरस नहीं है।” स्वर्ग के राज्य में अधार्मिकता या मानवीय भावनाएँ, या मानवजाति का कोई भी भ्रष्ट स्वभाव कभी नहीं रहा है क्योंकि वहाँ शैतान का विघ्न मौजूद नहीं है। सभी “लोग” परमेश्वर के वचनों को समझने में सक्षम हैं, और स्वर्ग का जीवन खुशी से भरा जीवन है। स्वर्ग में सभी लोगों के पास बुद्धि और परमेश्वर की गरिमा है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों का अनावरण, अध्याय 18
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 231
यह कहा जा सकता है कि आज के सभी वचन भविष्य के मामलों की भविष्यवाणी करते हैं और वे परमेश्वर के कार्य के अगले कदम के लिए उसकी व्यवस्थाओं का वर्णन करते हैं। परमेश्वर ने कलीसिया के लोगों पर अपना काम लगभग पूरा कर लिया है और इसके बाद वह सभी लोगों के सामने क्रोध के साथ प्रकट होगा। जैसा कि परमेश्वर कहता है, “मैं धरती के लोगों से अपने कार्यों को स्वीकार करवाऊँगा और ‘न्यायपीठ’ के सामने अपने कर्म साबित करवाऊँगा, पूरी पृथ्वी के लोगों के बीच अपने कर्म स्वीकार करवाऊँगा और सभी को झुका दूँगा।” क्या तुम लोगों ने इन वचनों में कुछ देखा? इनमें परमेश्वर के कार्य के अगले हिस्से का सारांश है। पहले परमेश्वर उन सभी संरक्षक कुत्तों को, जो राजनीतिक शक्ति का संचालन करते हैं, पूरी तरह से आश्वस्त करेगा और वे इतिहास के मंच से खुद अपनी मर्जी से पीछे हट जाएँगे, ताकि वे फिर कभी प्रतिष्ठा के लिए न लड़ें और फिर कभी कुचक्रों तथा षड्यंत्रों में न उलझें। यह कार्य परमेश्वर द्वारा पृथ्वी पर लाई गई विभिन्न आपदाओं के जरिये करना होगा। लेकिन परमेश्वर प्रकट नहीं होगा। इस समय, बड़े लाल अजगर का देश अभी भी गंदगी की भूमि होगा, और इसलिए परमेश्वर प्रकट नहीं होगा, परंतु केवल ताड़ना के रूप में उभरेगा। ऐसा है परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव, जिससे कोई बच नहीं सकता। इस दौरान, बड़े लाल अजगर के देश में रहने वाले सभी लोग विपत्ति झेलेंगे, जिसमें स्वाभाविक रूप से पृथ्वी पर राज्य (कलीसिया) भी शामिल है। यह वही समय है जब लोगों के ऊपर तथ्य आएँगे। इसलिए इसका अनुभव सभी लोगों द्वारा किया जाता है, और कोई बच नहीं पाएगा। यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत किया गया है। ठीक कार्य के इसी चरण के कारण परमेश्वर कहता है, “यही समय है महान योजनाओं को पूरा करने का।” क्योंकि भविष्य में पृथ्वी पर कोई कलीसिया नहीं होगी और आपदाओं के आगमन के कारण लोग केवल उसी के बारे में सोच पाएँगे, जो उनके सामने होगा और बाकी हर चीज़ को वे नज़रअंदाज़ कर देंगे, और आपदाओं के बीच परमेश्वर का आनंद लेना उनके लिए मुश्किल होगा। इसलिए, लोगों से कहा जाता है कि वे इस अद्भुत समय में परमेश्वर से खुलकर और पूरी तरह से प्रेम करें, ताकि वे इस अवसर को गँवा न बैठें। जब यह तथ्य गुज़र जाएगा, तो परमेश्वर ने बड़े लाल अजगर को पूरी तरह हरा दिया होगा, और इस प्रकार परमेश्वर के लोगों का उसके लिए गवाही देने का कार्य समाप्त हो गया होगा; इसके बाद परमेश्वर कार्य के अगले चरण की शुरुआत करेगा, वह बड़े लाल अजगर के देश को तबाह कर देगा, और अंततः पूरे ब्रह्मांड के लोगों को सलीब पर उलटा लटका देगा, जिसके बाद वह पूरी मानवजाति को नष्ट कर देगा—ये परमेश्वर के कार्य के भावी चरण हैं। इसलिए, तुम लोगों को इस शांतिपूर्ण वातावरण में परमेश्वर से ईमानदारी से प्रेम करने का प्रयास करना चाहिए। भविष्य में तुम लोगों के पास परमेश्वर से प्रेम करने के और अधिक अवसर नहीं होंगे, क्योंकि लोगों के पास केवल देह में रहते हुए परमेश्वर से प्रेम करने का अवसर होता है; जब वे किसी दूसरे संसार में रहेंगे, तो कोई परमेश्वर से प्रेम करने की बात नहीं करेगा। क्या यह एक सृजित प्राणी की ज़िम्मेदारी नहीं है? और इसलिए तुम लोगों को अपने जीवन-काल के दौरान परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? क्या तुमने कभी इस बारे में सोचा है? क्या तुम परमेश्वर से प्रेम करने के लिए मर जाने के बाद का इंतज़ार कर रहे हो? क्या यह खोखली बात नहीं है? तुम आज ही परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास क्यों नहीं करते? क्या व्यस्त रहते हुए परमेश्वर से प्रेम करना परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम हो सकता है? परमेश्वर के कार्य का यह चरण शीघ्र ही समाप्त हो जाएगा, ऐसा कहने का कारण यह है कि परमेश्वर के पास शैतान के सामने पहले से ही गवाही है। इसलिए मनुष्य को कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है; मनुष्य से केवल इतना कहा जा रहा है कि वह अपने जीवित रहने के वर्षों में परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयत्न करता रहे—यही कुंजी है। चूँकि परमेश्वर की अपेक्षाएँ बहुत ऊँची नहीं हैं, और इसके अलावा, चूँकि उसके दिल में एक झुलसाने वाली बेचैनी है, इसलिए उसने कार्य के इस चरण के पूरी तरह से समाप्त होने से पहले ही कार्य के अगले चरण का सारांश प्रकट कर दिया है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि कितना समय बचा है; यदि परमेश्वर अपने दिल में चिंतित न होता, तो क्या वह ये वचन इतनी जल्दी कहता? समय कम होने के कारण ही परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है। आशा है कि तुम लोग अपने पूरे दिल से, अपने पूरे मस्तिष्क से, और अपनी पूरी शक्ति से परमेश्वर से प्रेम कर पाओगे, ठीक वैसे ही, जैसे तुम लोग अपने जीवन को सँजोते हो। क्या यह परम सार्थक जीवन नहीं है? जीवन का अर्थ खोजने के लिए तुम और कहाँ जाओगे? क्या तुम बहुत अंधे नहीं हो रहे हो? क्या तुम परमेश्वर से प्रेम करने के लिए तैयार हो? क्या परमेश्वर मनुष्य के प्रेम के योग्य है? क्या लोग मनुष्य के लाड़-प्यार के योग्य हैं? तो तुम्हें क्या करना चाहिए? परमेश्वर से बिना किसी हिचकिचाहट के निडर होकर प्रेम करो और देखो कि परमेश्वर तुम्हारे साथ क्या करेगा। देखो कि क्या वह तुम्हें मार डालेगा? संक्षेप में, परमेश्वर से प्रेम करने का कार्य परमेश्वर के लिए प्रतिलिपि बनाने और बातें लिखने के कार्य से अधिक महत्वपूर्ण है। तुम्हें उस चीज़ को पहला स्थान देना चाहिए, जो सबसे महत्वपूर्ण है, ताकि तुम्हारे जीवन का अधिक मूल्य हो और वह ख़ुशियों से भरा हो, और फिर तुम्हें अपने लिए परमेश्वर के “दंडादेश” की प्रतीक्षा करनी चाहिए। मैं सोचता हूँ कि क्या तुम्हारी योजना में परमेश्वर से प्रेम करना शामिल है। मैं चाहता हूँ कि हर व्यक्ति की योजनाएँ परमेश्वर द्वारा पूरी की जाने की पात्र बनें और वे सब साकार हो जाएँ।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों का अनावरण, अध्याय 42