इंसान की भ्रष्टता का खुलासा I
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 300
कई हजार सालों की भ्रष्टता के दौरान, सब लोग सुन्न और मंदबुद्धि-वाले हो गए हैं; वे सब परमेश्वर का विरोध करने वाले दुष्ट दानव बन गए हैं, इस हद तक कि परमेश्वर के प्रति उनकी विद्रोहशीलता इतिहास की पुस्तकों में दर्ज की गई है और यहाँ तक कि लोग स्वयं भी अपने विद्रोही व्यवहार का पूरा लेखा-जोखा देने में असमर्थ हैं—क्योंकि वे शैतान द्वारा बहुत गहराई से भ्रष्ट कर दिए गए हैं और शैतान द्वारा रास्ते से इस तरह भटका दिए गए हैं कि वे नहीं जानते कि उन्हें किस ओर जाना है। यहाँ तक कि आज भी, लोग परमेश्वर के साथ विश्वासघात करते हैं। जब वे परमेश्वर को देखते हैं, तो वे उसके साथ विश्वासघात करते हैं और जब वे परमेश्वर को नहीं देख पाते, तब भी वे उसके साथ विश्वासघात करते हैं। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो परमेश्वर के शापों और कोप को देखने के बाद भी उसके साथ विश्वासघात करते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य के विवेक ने अपना मूल कार्य खो दिया है और मनुष्य की अंतरात्मा ने भी अपना मूल कार्य खो दिया है। मेरी नजर में, सभी लोग मनुष्य के चोले में जानवर और जहरीले साँप हैं। चाहे वे मेरी आँखों के सामने कितना भी दयनीय दिखने की कोशिश करें, मैं उन पर कभी दया नहीं करूँगा, क्योंकि उन्हें काले और सफेद के बीच के अंतर की बिल्कुल भी समझ नहीं है और उनमें से कोई भी सत्य और असत्य के बीच के अंतर को नहीं समझता है। उनका विवेक इतना सुन्न हो चुका है, फिर भी वे आशीष पाना चाहते हैं; उनकी मानवता इतनी नीच है, फिर भी वे राजाओं की तरह राज करना और ताकत का इस्तेमाल करना चाहते हैं। ऐसे विवेक के साथ वे किसके राजा बन सकते हैं? ऐसी मानवता के साथ वे सिंहासन पर कैसे बैठ सकते हैं? लोग सचमुच बेशर्म हैं! वे ऐसे घृणित लोग हैं जो खुद को अपनी हैसियत से बढ़कर समझते हैं! मेरा सुझाव है कि तुम लोग, जो आशीष पाना चाहते हो, पहले एक आईना ढूँढ़ो और अपना बदसूरत चेहरा देखो। क्या तुममें राजा बनने की योग्यता है? क्या तुम्हारे पास चेहरे की ऐसी विशेषताएँ हैं जो आशीष पा सकने वाले व्यक्ति में होती हैं? तुम्हारे स्वभाव में जरा-सा भी बदलाव नहीं आया है और तुम किसी भी सत्य को अभ्यास में नहीं ला पाए हो, फिर भी तुम एक सुनहरे कल की कामना करते हो। यह कोरा भ्रम है! मनुष्य, जो ऐसी गंदी भूमि में जन्मा, समाज द्वारा गंभीर हद तक संक्रमित हो गया है, वह सामंती नैतिकता से अनुकूलित कर दिया गया है और उसने “उच्चतर शिक्षा संस्थानों” की शिक्षा प्राप्त की है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन को लेकर घटिया दृष्टिकोण, सांसारिक आचरण के घृणित फलसफे, नितांत मूल्यहीन अस्तित्व, नीच रीति-रिवाज और दैनिक जीवन—ये सभी चीजें मनुष्य के हृदय में गंभीर घुसपैठ करती रही हैं, उसकी अंतरात्मा को गंभीरता से नुकसान पहुँचाती और उस पर गंभीर प्रहार करती रही हैं। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से अधिकाधिक दूर होता जा रहा है और उसका अधिकाधिक विरोधी होता जा रहा है। मनुष्य का स्वभाव दिन-प्रतिदिन और अधिक नृशंस हो रहा है और एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के लिए कुछ भी त्याग करता हो, एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रति समर्पण करता हो और ऐसा व्यक्ति तो और भी नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रकटन की खोज करता हो। इसके बजाय, इंसान शैतान की सत्ता में अपने दिल के तृप्त होने तक सुख का अनुसरण करता है और कीचड़ में अपनी देह को भरपूर भ्रष्ट करता है। जो लोग अंधकार में जीते हैं उनमें सत्य सुनने के बाद भी इसका अभ्यास करने की कोई इच्छा नहीं होती है और यह देखने के बाद भी कि परमेश्वर पहले ही प्रकट हो चुका है वे खोजने की ओर उन्मुख नहीं होते हैं। ऐसी भ्रष्ट मानवजाति के पास उद्धार की कोई गुंजाइश कैसे हो सकती है? ऐसी पतित मानवजाति रोशनी में कैसे जी सकती है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वभाव में बदलाव के बिना होना परमेश्वर के साथ शत्रुता रखना है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 301
मनुष्य में उत्पन्न होने वाले भ्रष्ट स्वभावों का मूल कारण शैतान का गुमराह करना, भ्रष्ट करना और जहर देना है। मनुष्य को शैतान द्वारा बाँधा और नियंत्रित किया गया है, और उसकी सोच, नैतिकता, अंतर्दृष्टि और विवेक शैतान द्वारा सब बुरी तरह नष्ट किए जा चुके हैं। शैतान ने इंसान की मूलभूत चीजों को भ्रष्ट कर दिया है, और वे बिल्कुल भी वैसी नहीं हैं जैसा परमेश्वर ने मूल रूप से उन्हें बनाया था, ठीक इसी वजह से मनुष्य परमेश्वर का विरोध करता है और सत्य को नहीं स्वीकार पाता। इसलिए मनुष्य के स्वभाव में बदलाव लाने के लिए सबसे पहले जो किया जाना चाहिए वह है उसकी सोच, अंतर्दृष्टि और विवेक के संदर्भ में परमेश्वर के बारे में और सत्य के बारे में उसके ज्ञान में बदलाव लाना। जो लोग सर्वाधिक गहराई तक भ्रष्ट स्थानों में जन्मे हैं, वे इस बारे में और भी अधिक अज्ञानी हैं कि परमेश्वर क्या है या परमेश्वर में विश्वास करने का क्या अर्थ है। लोग जितने अधिक भ्रष्ट होते हैं, वे उतना ही कम परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में जानते हैं, और उनका विवेक और अंतर्दृष्टि उतनी ही खराब होती है। परमेश्वर के प्रति मनुष्य के विरोध और उसकी विद्रोहशीलता का मूल कारण शैतान द्वारा उसकी भ्रष्टता है। शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिए जाने के कारण मनुष्य का जमीर सुन्न हो गया है, वह नैतिक रूप से भ्रष्ट हो गया है, उसके विचार पतित हो गए हैं और उसका मानसिक दृष्टिकोण पिछड़ा हुआ है। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने से पहले मनुष्य शुरू में परमेश्वर के प्रति समर्पण करता था और उसके वचन सुनने के बाद उनके प्रति समर्पण करता था। वह शुरुआत में सही-सलामत विवेक और जमीर वाला और सामान्य मानवता वाला था। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद, मनुष्य का मूल विवेक, जमीर और मानवता—ये सब सुन्न पड़ गए और शैतान द्वारा बिगाड़ दिए गए। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपना समर्पण और प्रेम खो दिया है। मनुष्य का विवेक असामान्य हो गया है, उसका स्वभाव पशु के समान हो गया है और परमेश्वर के खिलाफ उसकी विद्रोहशीलता लगातार बढ़ती जा रही है और अधिक गंभीर होती जा रही है। फिर भी मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही समझता है, बस लगातार विरोध और विद्रोह करता रहता है। मनुष्य के स्वभाव के खुलासे उसके विवेक, अंतर्दृष्टि और जमीर की अभिव्यक्तियाँ हैं। क्योंकि उसका विवेक और उसकी अंतर्दृष्टि सही-सलामत नहीं हैं और उसका जमीर अत्यंत सुन्न पड़ गया है, इसलिए उसका स्वभाव परमेश्वर के खिलाफ विद्रोही है। यदि मनुष्य के विवेक और उसकी अंतर्दृष्टि में बदलाव नहीं हो सकता है तो उसके स्वभाव में बदलाव होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, न ही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होने का कोई प्रश्न उठता है। यदि मनुष्य का विवेक सही-सलामत नहीं है तो वह परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकता है और परमेश्वर के उपयोग के लिए अनुपयुक्त है। “सामान्य विवेक” का अर्थ है परमेश्वर के प्रति समर्पण करना और वफादार होना, परमेश्वर के लिए लालायित रहना, परमेश्वर के प्रति एकचित्त होना और परमेश्वर के प्रति अंतरात्मा रखना। इसका अर्थ है परमेश्वर के साथ एकदिल और एकमन होना और जानबूझकर परमेश्वर का विरोध न करना। असामान्य विवेक का होना ऐसा नहीं है। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद, मनुष्य ने परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना ली हैं और उसमें परमेश्वर के लिए कोई निष्ठा या तड़प नहीं है, परमेश्वर के प्रति जमीर होने की तो बात ही छोड़ो। मनुष्य जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करता है, उसकी आलोचना करता है और इसके अलावा, उसकी पीठ पीछे उस पर अपशब्दों की बौछार करता है। यह अच्छी तरह से जानते हुए भी कि वह परमेश्वर है, मनुष्य उसकी पीठ पीछे उसकी आलोचना करता है; मनुष्य परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का कोई इरादा नहीं रखता, बल्कि केवल परमेश्वर से माँगें और अनुरोध ही करता रहता है। ऐसे लोग—जिनका विवेक असामान्य होता है—अपने घृणित व्यवहार को जानने या अपने विद्रोह के कृत्यों पर पछताने में अक्षम होते हैं। यदि लोग अपने आप को जानने में सक्षम हैं, तो उन्होंने अपना विवेक थोड़ा-सा पुनः प्राप्त कर लिया है; लोग जितना अधिक परमेश्वर के खिलाफ विद्रोही होते हैं और फिर भी अपने आप को नहीं जानते हैं, वे उतने ही कम सही-सलामत विवेक वाले होते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वभाव में बदलाव के बिना होना परमेश्वर के साथ शत्रुता रखना है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 302
मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के प्रकट होने की जड़ उसकी सुन्न अंतरात्मा, उसकी दुर्भावनापूर्ण प्रकृति और उसके अनुचित विवेक में ही निहित है; यदि मनुष्य की अंतरात्मा और विवेक फिर से सामान्य हो पाते हैं, तो फिर वह परमेश्वर के सामने उपयोग करने योग्य बन जाएगा। चूँकि मनुष्य की अंतरात्मा हमेशा सुन्न रही है, और मनुष्य का विवेक कभी भी उचित नहीं रहा है और अधिकाधिक सुन्न होता जा रहा है, बस इसीलिए परमेश्वर के प्रति मनुष्य के विद्रोहीपन के कार्य कई गुणा बढ़ते जा रहे हैं, इस तरह कि उसने यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया और वह अंत के दिनों में देहधारी परमेश्वर के लिए अपने दरवाजे बंद कर देता है, और परमेश्वर के देह पर दोष लगाता है, और परमेश्वर के देह को तुच्छ समझता है। यदि मनुष्य में थोड़ी-सी भी मानवता होती, तो वह परमेश्वर की देहधारी देह के साथ पेश आने में इतना निर्मम नहीं होता; यदि उसमें जरा-सा भी विवेक होता, तो वह परमेश्वर की देहधारी देह के साथ पेश आने में इतना शातिर नहीं होता; यदि उसमें थोड़ी-सी भी अंतरात्मा होती, तो वह देहधारी परमेश्वर को इस ढंग से “धन्यवाद” न देता। मनुष्य परमेश्वर के देहधारी होने के युग में जीता है, फिर भी वह इतना अच्छा अवसर दिए जाने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद नहीं देता है, और इसके बजाय परमेश्वर के आगमन को कोसता है, या परमेश्वर के देहधारण के तथ्य को पूरी तरह से अनदेखा कर देता है, इसके विरुद्ध और इससे विमुख प्रतीत होता है। मनुष्य परमेश्वर के आगमन को चाहे जैसा भी ले, परमेश्वर हमेशा अपना कार्य करता रहा है, इससे कभी भी नहीं थका है—जबकि मनुष्य परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी स्वागतोत्सुक नहीं रहा है और उससे माँगें करता रहा है। मनुष्य का स्वभाव अत्यंत दुर्भावनापूर्ण बन गया है, उसका विवेक अत्यंत सुन्न हो गया है और उसकी अंतरात्मा उस दुष्ट द्वारा पूरी तरह से रौंद दी गई है और वह बहुत पहले से मनुष्य की मौलिक अंतरात्मा नहीं रही है। मानवजाति को इतना अधिक जीवन और अनुग्रह प्रदान करने को लेकर मनुष्य देहधारी परमेश्वर के प्रति न केवल कृतघ्न है, बल्कि परमेश्वर उसे जो सत्य प्रदान करता है उसके लिए भी उसमें परमेश्वर के लिए घृणा है; क्योंकि मनुष्य को सत्य में थोड़ी-सी भी रुचि नहीं है, इसीलिए उसमें परमेश्वर के प्रति घृणा है। मनुष्य देहधारी परमेश्वर के लिए न सिर्फ अपनी जान देने में अक्षम है, बल्कि वह उससे फायदे ऐंठने की कोशिश भी करता है, और ऐसे भुगतान की माँग करता है जो उससे दर्जनों गुना ज्यादा है जो मनुष्य ने परमेश्वर को दिया है। मनुष्य की अंतरात्मा और विवेक का यह हाल है, फिर भी उसे लगता है कि यह कोई बड़ा मामला नहीं है, अभी भी यह मानता है कि वह परमेश्वर के लिए बहुत खप चुका है और परमेश्वर ने उसे बहुत कम दिया है। कुछ लोग ऐसे हैं जो मुझे एक कटोरा पानी देने के बाद अपने हाथ पसारकर माँग करते हैं कि मैं उन्हें दो कटोरे दूध की कीमत चुकाऊँ या मुझे एक रात के लिए कमरा देने के बाद मुझसे कई गुना किराए की माँग करते हैं। ऐसी मानवता और ऐसी अंतरात्मा के रहते तुम लोग अब भी जीवन पाने की कामना कैसे कर सकते हो? तुम कितने घिनौने पतित हो! इंसान की ऐसी मानवता और अंतरात्मा के कारण ही देहधारी परमेश्वर पूरी धरती पर भटकता फिरता है और किसी भी स्थान पर आश्रय नहीं पाता है। देहधारी परमेश्वर के इतना अधिक कार्य करने के तथ्य की तो बात ही क्या है, अगर वह कतई कोई कार्य न करे तो भी सचमुच अंतरात्मा और मानवता वाले लोगों को उसकी आराधना करनी चाहिए और पूरे दिल से सेवा करनी चाहिए। उचित विवेक वाले लोगों को यही करना चाहिए, यही मनुष्य का कर्तव्य है। अधिकतर लोग परमेश्वर की सेवा करने के लिए शर्तों की बात भी करते हैं। वे इस बात की परवाह नहीं करते कि वह परमेश्वर है या मनुष्य, वे सिर्फ अपनी शर्तों की ही बात करते हैं, और सिर्फ अपनी इच्छाएँ पूरी करने की ही कोशिश करते हैं। जब तुम लोग मेरे लिए खाना पकाते हो तो तुम सेवा शुल्क की माँग करते हो, जब तुम मेरे लिए भाग-दौड़ करते हो तो मुझसे भाग-दौड़ करने का शुल्क माँगते हो, जब तुम मेरे लिए काम करते हो तो काम करने का शुल्क माँगते हो, जब तुम मेरे कपड़े धोते हो तो कपड़े धोने का शुल्क माँगते हो, जब तुम कलीसिया को आपूर्ति करते हो तो स्वास्थ्य लाभ की लागत माँगते हो, जब तुम बोलते हो तो बोलने का शुल्क माँगते हो, जब तुम पुस्तकें बाँटते हो तो वितरण-शुल्क माँगते हो, और जब तुम लिखते हो तो लिखने का शुल्क माँगते हो। जिन लोगों की मैंने काट-छाँट की है, वे भी मुझसे मुआवजा माँगते हैं, जबकि जिन्हें घर भेज दिया गया है, वे अपने नाम के नुकसान की भरपाई माँगते हैं; जो अविवाहित हैं वे दहेज की या अपनी खोई हुई जवानी के लिए मुआवजे की माँग करते हैं, जो मुर्गा काटते हैं वे कसाई के शुल्क की माँग करते हैं, जो खाना पकाते हैं वे पकाने का शुल्क माँगते हैं, और जो सूप बनाते हैं वे उसके लिए भी भुगतान माँगते हैं...। यह तुम लोगों की ऊँची और शक्तिशाली मानवता है, और ये तुम लोगों की स्नेही अंतरात्मा द्वारा निर्धारित कार्य हैं। तुम लोगों का विवेक कहाँ है? तुम लोगों की मानवता कहाँ है? मैं तुम लोगों को बता दूँ! यदि तुम लोग ऐसे ही करते रहे, तो मैं तुम लोगों के मध्य कार्य करना बंद कर दूँगा। मैं मनुष्य के भेस में जंगली जानवरों के झुंड के बीच कार्य नहीं करूँगा, मैं ऐसे समूह के लोगों के लिए दुःख नहीं सहूँगा जिनका उजला चेहरा जंगली हृदय को छुपाए हुए है, मैं ऐसे जानवरों के झुंड के लिए कष्ट नहीं झेलूँगा जिनके उद्धार की थोड़ी-सी भी संभावना नहीं है। जिस दिन मैं तुम सबसे मुँह मोड़ लूँगा, उसी दिन तुम लोग मर जाओगे, उसी दिन तुम लोगों पर अंधकार छा जाएगा, और उसी दिन प्रकाश द्वारा तुम्हें त्याग दिया जाएगा। मैं तुम लोगों को बता दूँ! मैं तुम लोगों जैसे समूह पर कभी दयालु नहीं बनूँगा, ऐसा समूह जो जानवरों से भी बदतर है! मेरे वचनों और कार्यकलापों की सीमाएँ हैं, और जैसी तुम लोगों की मानवता और अंतरात्मा हैं, उसके चलते मैं और कार्य नहीं करूँगा, क्योंकि तुम लोग अंतरात्मा से नितांत रहित हो, तुम लोगों ने मुझे बहुत अधिक पीड़ा दी है, और तुम लोगों के घृणित व्यवहार से मुझे बहुत घिन आती है! मानवता और अंतरात्मा से रहित ऐसे लोगों को उद्धार का अवसर कभी नहीं मिलेगा; मैं ऐसे हृदयहीन और कृतघ्न लोगों को कभी नहीं बचाऊँगा। जब मेरा दिन आएगा, मैं अनंत काल के लिए विद्रोह के पुत्रों पर अपनी झुलसाने वाली आग की लपटें बरसाऊँगा जिन्होंने एक बार मेरे प्रचंड कोप को भड़काया था, मैं ऐसे जानवरों पर अपना अनंत दंड थोप दूँगा, जिन्होंने कभी मुझे अपशब्द कहे थे और मुझे त्याग दिया था, मैं विद्रोह के पुत्रों को अपने क्रोध की आग में हमेशा के लिए जला दूँगा, जिन्होंने कभी मेरे साथ खाया था और जो मेरे साथ रहे थे परंतु जिन्होंने मुझमें विश्वास नहीं रखा, जिन्होंने मेरा अपमान किया और मुझे धोखा दिया। मैं उन सबको अपनी सजा का भागी बनाऊँगा जिन्होंने मेरे क्रोध को भड़काया, मैं उन सभी जानवरों पर अपना सारा कोप बरसाऊँगा जिन्होंने कभी मेरे समकक्षों के रूप में मेरी बगल में खड़े होने की कामना की थी लेकिन कभी मेरी आराधना नहीं की या मेरे प्रति समर्पण नहीं किया; अपनी जिस छड़ी से मैं मनुष्य को मारता हूँ वह उन जानवरों पर पड़ेगी जिन्होंने कभी मेरी देखभाल और मेरे द्वारा बोले गए रहस्यों का आनंद लिया था और जिन्होंने कभी मुझसे भौतिक आनंद छीनने की कोशिश की थी। मैं ऐसे किसी व्यक्ति को क्षमा नहीं करूँगा, जो मेरा स्थान छीनने की कोशिश करता है; मैं उनमें से किसी को भी नहीं छोड़ूँगा, जो मुझसे खाना और कपड़े हथियाने की कोशिश करते हैं। फिलहाल तुम लोग सुरक्षित और स्वस्थ हो और मुझसे की जाने वाली माँगों में हद से आगे बढ़ते जाते हो। जब कोप का दिन आ जाएगा, तो तुम लोग मुझसे और कोई माँग नहीं करोगे; उस समय मैं तुम लोगों को जी भरकर “आनंद” लेने दूँगा, मैं तुम लोगों के चेहरों को मिट्टी में धँसा दूँगा, और तुम लोग दोबारा कभी उठ नहीं पाओगे! देर-सबेर मैं तुम सबका यह कर्ज “चुका” दूँगा—और मुझे आशा है कि तुम लोग धैर्यपूर्वक उस दिन के आने की प्रतीक्षा करोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वभाव में बदलाव के बिना होना परमेश्वर के साथ शत्रुता रखना है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 303
परमेश्वर को पाने में मनुष्य के असफल होने का कारण यह नहीं है कि परमेश्वर के पास दैहिक भावनाएँ हैं या इसलिए कि परमेश्वर मनुष्य द्वारा प्राप्त होना नहीं चाहता, बल्कि इसलिए कि मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त नहीं करना चाहता है और इसलिए कि मनुष्य के पास ऐसा हृदय नहीं है जो आतुरता के साथ परमेश्वर को खोजे। जो सचमुच परमेश्वर को खोजते हैं उनमें से कोई परमेश्वर द्वारा शापित कैसे हो सकता है? सही विवेक और संवेदनशील अंतरात्मा रखने वाला कोई व्यक्ति परमेश्वर द्वारा शापित कैसे हो सकता है? जो सचमुच परमेश्वर की आराधना और सेवा करता है वह परमेश्वर के कोप की आग द्वारा कैसे भस्म हो सकता है? जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करने को इच्छुक है, उसे परमेश्वर के घर से कैसे निकाला जा सकता है? जो यह महसूस करता है कि वह कभी भी परमेश्वर से पर्याप्त प्रेम नहीं कर सकता है वह परमेश्वर के दंड में कैसे रह सकता है? यह कैसे हो सकता है कि जो परमेश्वर के लिए सब कुछ त्यागने को इच्छुक है, उसके पास कुछ न बचे? मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करने का इच्छुक नहीं है, अपनी संपत्तियाँ परमेश्वर के लिए खपाने का इच्छुक नहीं है और परमेश्वर के लिए जीवन-भर का प्रयास समर्पित करने के लिए तैयार नहीं है; इसके बजाय वह कहता है कि परमेश्वर हद पार कर गया है, कि परमेश्वर के बारे में बहुत-कुछ मनुष्य की धारणाओं से मेल नहीं खाता है। ऐसी मानवता के साथ, अपने पूर्ण प्रयास के बावजूद तुम लोग परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर पाओगे, इस तथ्य की तो बात ही छोड़ो कि तुम परमेश्वर को नहीं खोजते हो। क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोग मानवजाति की दोषपूर्ण वस्तुएँ हो? क्या तुम नहीं जानते कि तुम लोगों की मानवता से ज्यादा नीच और कोई मानवता नहीं है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों का “सम्मान” करने के लिए दूसरे तुम्हें क्या कहकर बुलाते हैं? जो लोग सच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे तुम लोगों को भेड़िये का पिता, भेड़िये की माता, भेड़िये का पुत्र, और भेड़िये का पोता कहते हैं; तुम लोग भेड़िये के वंशज हो, भेड़िये के लोग हो, और तुम लोगों को अपनी पहचान जाननी चाहिए और उसे कभी नहीं भूलना चाहिए। यह मत सोचो कि तुम कोई श्रेष्ठ हस्ती हो : तुम लोग मानवजाति के बीच अमानुषों का सबसे नृशंस समूह हो। क्या तुम लोग इसमें से कुछ भी नहीं जानते हो? क्या तुम लोगों को पता है कि तुम लोगों के बीच कार्य करके मैंने कितना जोखिम उठाया है? यदि तुम लोगों का विवेक दोबारा सामान्य नहीं हो सकता है और तुम लोगों की अंतरात्मा सामान्य रूप से कार्य नहीं कर सकती है तो फिर तुम लोग “भेड़िये” के नाम से कभी मुक्त नहीं हो पाओगे, तुम कभी शाप के दिन से नहीं बच पाओगे, कभी अपने दंड के दिन से नहीं बच पाओगे। तुम लोग हीन जन्मे थे, एक मूल्यरहित वस्तु। तुम लोग स्वभाव से भूखे भेड़ियों का झुंड हो, मलबे और कचरे का ढेर हो और तुम लोगों के विपरीत मैं तुम लोगों पर व्यक्तिगत लाभ के लिए कार्य नहीं करता हूँ, बल्कि कार्य की आवश्यकता के कारण कार्य करता हूँ। यदि तुम लोग इसी तरह से विद्रोही बने रहे तो मैं अपना कार्य रोक दूँगा और दोबारा कभी तुम लोगों पर कार्य नहीं करूँगा; इसके विपरीत मैं अपना कार्य एक ऐसे समूह पर स्थानांतरित कर दूँगा जिसे मैं पसंद करता हूँ और इस तरह मैं तुम लोगों को हमेशा के लिए छोड़ दूँगा, क्योंकि मैं उन लोगों को देखने का इच्छुक नहीं हूँ जो मुझसे शत्रुता रखते हैं। तो फिर तुम लोग मेरे अनुरूप होना चाहते हो या मुझसे शत्रुता रखना चाहते हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वभाव में बदलाव के बिना होना परमेश्वर के साथ शत्रुता रखना है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 304
सभी लोग यीशु का सच्चा रूप देखना चाहते हैं, और सभी उसके साथ रहने की इच्छा करते हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई भाई-बहन यह कहेगा कि वह यीशु को देखना या उसके साथ रहना नहीं चाहता। यीशु को देखने से पहले—देहधारी परमेश्वर को देखने से पहले—तुम लोग तमाम तरह के विचार रखते हो, उदाहरण के लिए, यीशु के रूप के बारे में, उसके बोलने के तरीके, उसकी जीवन-शैली इत्यादि के बारे में। लेकिन एक बार उसे वास्तव में देख लेने के बाद तुम लोगों के विचार तेजी से बदल जाएँगे। ऐसा क्यों होता है? क्या तुम लोग जानना चाहते हो? यह सच है कि मनुष्य की सोच नजरअंदाज नहीं की जा सकती—लेकिन इससे भी बढ़कर, मसीह का सार इंसान द्वारा किए जाने वाले किसी भी परिवर्तन को सहन नहीं करता। तुम लोग मसीह को अविनाशी या एक संत मानते हो, लेकिन कोई भी उसे दिव्य सार रखने वाला सामान्य व्यक्ति नहीं मानता। इसलिए, दिन-रात परमेश्वर को देखने की लालसा रखने वालों में से अनेक लोग असल में परमेश्वर से शत्रुता रखते हैं और परमेश्वर के साथ असंगत हैं। क्या यह मनुष्य की गलती नहीं है? तुम लोग अभी भी यह सोचते हो कि तुम लोगों की आस्था और तुम्हारी निष्ठा तुम्हें मसीह का चेहरा देखने योग्य बनाने के लिए पर्याप्त है, लेकिन मैं तुम लोगों को प्रोत्साहित करता हूँ कि तुम अपने आपको और ज्यादा व्यावहारिक चीजों से लैस कर लो! क्योंकि अतीत, वर्तमान और भविष्य में मसीह के संपर्क में आने वालों में से अनेक लोग असफल हो गए हैं या हो जाएँगे; वे सभी फरीसियों की भूमिका निभाते हैं। तुम लोगों की असफलता का क्या कारण है? इसका वास्तविक कारण यह है कि तुम लोगों में से प्रत्येक की धारणाओं में एक ऐसा परमेश्वर है, जो ऊँचा और प्रशंसनीय है। लेकिन सत्य वैसा नहीं है, जैसा मनुष्य चाहता है। न केवल मसीह ऊँचा नहीं है, बल्कि वह विशेष रूप से छोटा है; न केवल वह एक व्यक्ति है, बल्कि वह एक साधारण व्यक्ति है; न केवल वह स्वर्ग में आरोहित नहीं हो सकता, बल्कि वह पृथ्वी पर भी स्वतंत्रतापूर्वक नहीं घूम सकता। इसीलिए लोग उसके साथ साधारण व्यक्ति जैसा व्यवहार करते हैं; जब वे उसके साथ होते हैं, तो उससे बेतकल्लुफी भरा व्यवहार करते हैं, उससे लापरवाही से बात करते हैं, और इस पूरे समय “सच्चे मसीह” के आने का इंतजार भी करते रहते हैं। तुम लोग पहले ही आ चुके मसीह को एक साधारण व्यक्ति समझते हो और उसके वचनों को साधारण व्यक्ति के शब्द मानते हो। इसीलिए तुम लोगों ने मसीह से कुछ भी प्राप्त नहीं किया है, बल्कि अपनी कुरूपता ही प्रकाश में पूरी तरह से उजागर कर दी है।
मसीह के संपर्क में आने से पहले शायद तुम यह मान सकते हो कि तुम्हारा स्वभाव पूरी तरह से बदल चुका है, कि तुम मसीह के निष्ठावान अनुयायी हो और यह कि तुमसे ज्यादा मसीह के आशीष पाने के योग्य कोई नहीं है क्योंकि तुमने कई मार्गों पर यात्रा की है, बहुत सारा काम कर चुके हो और बहुत परिणाम ला चुके हो, इसलिए तुम सोचते हो कि अंत में तुम निश्चित ही उनमें से एक होगे, जिन्हें मुकुट मिलेगा। लेकिन क्या तुम निम्नलिखित तथ्य जानते हो, जो यह है कि जब मनुष्य मसीह को देखता है, तो उसका भ्रष्ट स्वभाव और उसका विद्रोह और प्रतिरोध उजागर हो जाता है, और इस समय उसका विद्रोह और प्रतिरोध किसी अन्य समय की तुलना में ज्यादा पूर्ण रूप में और पूरी तरह से उजागर हो जाते हैं? ऐसा इसलिए है, क्योंकि मसीह मनुष्य का पुत्र है—मनुष्य का ऐसा पुत्र, जिसमें सामान्य मानवता है—इसलिए मनुष्य न तो उसका सम्मान करता है और न ही उसका आदर करता है। चूँकि परमेश्वर देह में रहता है, इसलिए मनुष्य का विद्रोह इतनी अच्छी तरह और इतने विशद विवरण के साथ प्रकाश में आ जाता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि मसीह के आगमन ने मानवजाति की समस्त विद्रोहशीलता उजागर कर दी है और मानवजाति की प्रकृति को बहुत स्पष्ट कर दिया है। इसे कहते हैं “बाघ को फुसलाकर पहाड़ के नीचे लाना” और “भेड़िए को फुसलाकर उसकी गुफा से बाहर लाना।” क्या तुम यह कहने की कल्पना करने की हिम्मत कर सकते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो? क्या तुम यह कहने की कल्पना करने की हिम्मत कर सकते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण दिखाते हो? क्या तुम यह कहने की कल्पना करने की हिम्मत कर सकते हो कि तुम विद्रोही नहीं हो? कुछ लोग कहेंगे : “जब भी परमेश्वर मेरे लिए एक परिवेश आयोजित करता है, मैं कभी शिकायत नहीं करता और हमेशा समर्पित होने में समर्थ होता हूँ और इतना ही नहीं, मैं परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं बनाता।” कुछ लोग कहेंगे : “परमेश्वर मुझे जो भी काम देता है, मैं उसे अपनी पूरी योग्यता के साथ पूर्ण करता हूँ और कभी लापरवाह नहीं होता।” इस स्थिति में, मैं तुम लोगों से यह पूछता हूँ : क्या तुम लोग मसीह के साथ रहते हुए उसके साथ संगत हो सकते हो? और तुम कब तक उसके साथ संगत रहोगे? एक दिन? दो दिन? एक घंटा? दो घंटे? तुम लोगों की आस्था प्रशंसनीय हो सकती है, लेकिन तुम लोगों में दृढ़ता कुछ खास नहीं है। जब तुम सच में मसीह के साथ रहते हो, तो तुम्हारी कथनी और करनी से तुम्हारी आत्मतुष्टता और अभिमान का थोड़ा-थोड़ा करके खुलासा होने लगेगा और इसी प्रकार तुम्हारी असंयमित इच्छाएँ, अवज्ञाकारी मानसिकता और असंतोष स्वाभाविक रूप से प्रकट हो जाएँगे। अंततः तुम्हारा अहंकार और भी बड़ा हो जाएगा, जब तक कि तुम मसीह से उतने ही विपरीत नहीं हो जाते जितना पानी आग से होता है, और तब तुम्हारी प्रकृति पूरी तरह से उजागर हो जाएगी। उस समय तुम्हारी धारणाएँ छिपी नहीं रह सकेंगी, तुम्हारी शिकायतें भी स्वाभाविक रूप से बाहर आ जाएँगी, और तुम्हारी घृणित मानवता पूरी तरह से उजागर हो जाएगी। किंतु फिर भी, तुम अभी भी अपनी विद्रोहशीलता स्वीकारने से इनकार करते हो, और उसके बजाय यह मानते हो कि ऐसे मसीह को स्वीकार करना मनुष्य के लिए आसान नहीं है, वह मनुष्य के प्रति बहुत कठोर है, और अगर वह कोई बेहतर मसीह होता तो तुम पूरी तरह से समर्पित हो जाते। तुम लोग यह मानते हो कि तुम्हारी विद्रोहशीलता जायज है, तुम उसके विरुद्ध विद्रोह तभी करते हो, जब वह तुम लोगों को हद से ज्यादा मजबूर कर देता है। तुम लोगों ने कभी यह विचार नहीं किया कि तुम मसीह को परमेश्वर नहीं मानते, कि तुम्हारा उसके प्रति समर्पित होने का इरादा नहीं है। बल्कि, तुम ढिठाई से यह आग्रह करते हो कि मसीह तुम्हारी इच्छाओं के अनुसार कार्यकलाप करे, और जब वह एक भी काम ऐसा करता है जो तुम्हारी सोच के विपरीत होता है, तो तुम मान लेते हो कि वह परमेश्वर नहीं, एक व्यक्ति है। क्या तुम लोगों में से कई लोग ऐसे नहीं हैं, जिन्होंने उसके साथ इस तरह से विवाद किया है? आखिर वह कौन है, जिस पर तुम लोग विश्वास करते हो? और तुम लोग किस तरह से अनुसरण करते हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो मसीह के साथ असंगत हैं वे निश्चित ही परमेश्वर के विरोधी हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 305
तुम लोग हमेशा मसीह को देखने की कामना करते हो, लेकिन मैं तुम लोगों से आग्रह करता हूँ कि तुम अपने आपको इतना ऊँचा मत समझो; हर कोई मसीह को देख सकता है, लेकिन मैं कहता हूँ कि कोई भी मसीह को देखने लायक नहीं है। क्योंकि मनुष्य की प्रकृति बुराई, अहंकार और विद्रोहशीलता से भरी हुई है, जिस क्षण तुम मसीह को देखोगे, तुम्हारी प्रकृति तुम्हें नष्ट कर देगी और तुम्हें मौत की सजा तक पहुँचाने वाला दंड देगी। किसी भाई (या बहन) के साथ तुम्हारा जुडाव शायद तुम्हारे बारे में बहुत-कुछ न दिखाए, लेकिन जब तुम मसीह से जुड़ते हो तो यह इतना आसान नहीं होता। किसी भी समय तुम्हारी धारणाएँ जड़ पकड़ सकती हैं, तुम्हारा अहंकार पनपना शुरू हो सकता है और तुम्हारी विद्रोहशीलता फल-फूल सकती है। ऐसी मानवता के साथ तुम कैसे मसीह से जुड़ने के लिए उपयुक्त हो सकते हो? क्या तुम उसे हर दिन, हर पल परमेश्वर मान सकते हो? क्या तुममें सचमुच परमेश्वर के प्रति समर्पण की वास्तविकता है? तुम सभी लोग अपने हृदय में बसे ऊँचे परमेश्वर को ही यहोवा मानकर उसकी आराधना करते हो, लेकिन प्रत्यक्ष मसीह को एक व्यक्ति समझते हो। तुम लोगों का विवेक बहुत ही खराब है और मानवता बहुत ही निम्न स्तर की है! तुम लोग मसीह को सदैव परमेश्वर मानने में असमर्थ हो; कभी-कभार ही, जब तुम एक अच्छी मनोदशा में होते हो, तुम उसकी ओर लपकते हो और परमेश्वर के रूप में उसकी आराधना करते हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर के विश्वासी नहीं हो, बल्कि उन सह-अपराधियों की टोली हो, जो मसीह का विरोध करते हैं। यहाँ तक कि दूसरों के प्रति हमदर्दी दिखाने वाले लोगों तक को प्रतिफल दिया जाता है, लेकिन मसीह को, जिसने तुम्हारे बीच ऐसा कार्य किया है, न तो मनुष्य का प्रेम मिला है और न ही उसकी कोई प्रतिपूर्ति या समर्पण। क्या यह हृदय-विदारक बात नहीं है?
हो सकता है कि परमेश्वर में अपनी इतने वर्षों की आस्था के दौरान तुमने कभी किसी को कोसा न हो या कोई बुरा काम न किया हो, फिर भी अगर मसीह के साथ अपने जुड़ाव में तुम सच नहीं बोल सकते, ईमानदारी से कार्य नहीं कर सकते, या मसीह के वचन को समर्पित नहीं हो सकते; तो मैं कहूँगा कि तुम संसार में सबसे अधिक प्रपंची और दुर्भावनापूर्ण व्यक्ति हो। तुम अपने रिश्तेदारों, दोस्तों, पत्नी (या पति), बेटे-बेटियों और माता-पिता के प्रति अत्यंत सौम्य और समर्पित हो सकते हो, और शायद कभी दूसरों का फायदा न उठाते हो, लेकिन अगर तुम मसीह के साथ संगत नहीं हो पाते, उसके साथ सामंजस्यपूर्ण व्यवहार नहीं कर पाते, तो भले ही तुम अपने पड़ोसियों की सहायता के लिए अपना सब-कुछ खपा दो या अपने माता-पिता और घरवालों की अच्छी देखभाल करो, तब भी मैं कहूँगा कि तुम एक बुरे व्यक्ति हो और इतना ही नहीं, शातिर चालों से भरे हुए हो। खुद को सिर्फ इसलिए मसीह के साथ संगत मत समझो कि तुम दूसरों के साथ अच्छा तालमेल बिठा लेते हो या कुछ अच्छी चीजें कर लेते हो। क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा परोपकारी इरादा चालबाजी से स्वर्ग के आशीष प्राप्त कर सकता है? क्या तुम्हें लगता है कि कुछ अच्छी चीजें कर लेना तुम्हारे समर्पण का स्थान ले सकता है? तुम लोगों में से एक भी व्यक्ति काट-छाँट स्वीकार नहीं कर पाता और तुम सभी को मसीह की सामान्य मानवता अपनाने में कठिनाई होती है, इससे भी ऊपर तुम परमेश्वर के प्रति अपने समर्पण का निरंतर ढोल पीटते रहते हो। तुम लोगों जैसी आस्था उचित प्रतिकार लाएगी। काल्पनिक भ्रमों में लिप्त होना और मसीह को देखने की इच्छा करना छोड़ दो, क्योंकि तुम लोगों का आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, यहाँ तक कि तुम उसे देखने के योग्य भी नहीं हो। जब तुम अपनी विद्रोहशीलता को पूरी तरह उतारकर फेंक चुके होगे और मसीह के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से मेलजोल कर पाओगे, उसी समय परमेश्वर स्वाभाविक रूप से तुम्हारे सामने प्रकट होगा। यदि तुम काट-छाँट या न्याय से गुजरे बिना परमेश्वर को देखने जाते हो, तो तुम निश्चित रूप से परमेश्वर के विरोधी बन जाओगे और यकीनन विनाश का लक्ष्य बन जाओगे। मनुष्य की प्रकृति जन्मजात परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण है, क्योंकि सभी लोग शैतान की गहरी भ्रष्टता के अधीन रहे हैं। यदि मनुष्य अपनी भ्रष्टता के बीच से परमेश्वर के साथ मेलजोल करने का प्रयास करता है, तो यह निश्चित है कि इसका कोई अच्छा परिणाम नहीं हो सकता; उसके कार्य और शब्द निश्चित रूप से हर मोड़ पर उसकी भ्रष्टता को प्रकट करेंगे और परमेश्वर के साथ जुड़ने में उसकी विद्रोहशीलता हर मोड़ पर प्रकट होगी। मनुष्य अनजाने ही मसीह का विरोध कर देता है, मसीह को धोखा दे देता है और मसीह को अस्वीकार कर देता है; जब ऐसा होता है तो मनुष्य और ज्यादा संकट की स्थिति में होगा और यदि यह जारी रहा, तो वह दंड का भागी बन जाएगा।
कुछ लोग यह मान सकते हैं कि यदि परमेश्वर के साथ जुड़ाव इतना खतरनाक है, तो बुद्धिमानी यही होगी कि परमेश्वर से दूर रहा जाए। ऐसे लोगों को भला क्या हासिल हो सकता है? क्या वे परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो सकते हैं? निश्चित ही, परमेश्वर के साथ जुड़ाव बहुत कठिन है—लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य भ्रष्ट है, न कि इसलिए कि परमेश्वर मनुष्य के साथ जुड़ नहीं सकता। तुम लोगों के लिए सबसे अच्छा यह होगा कि तुम लोग स्वयं को जानने के सत्य पर थोड़ा प्रयास समर्पित करो। परमेश्वर तुम लोगों की सराहना क्यों नहीं करता? तुम्हारा स्वभाव उसके लिए घृणास्पद क्यों है? तुम्हारा बोलना उसके अंदर घृणा क्यों उत्पन्न करता है? जब तुम लोग थोड़ी-सी निष्ठा दिखा देते हो, तुम अपनी तारीफ के गीत गाने लगते हो; जब तुम छोटा-सा योगदान करते हो तो पुरस्कार माँगने लगते हो; जब तुम थोड़ा-सा समर्पण दिखा देते हो तो दूसरों को नीची निगाह से देखने लगते हो; और जब कुछ छोटे-मोटे काम संपन्न कर लेते हो तो परमेश्वर की अवहेलना करने लगते हो। परमेश्वर की मेजबानी करने के लिए तुम लोग धन, भौतिक चीजें और प्रशंसा माँगते हो। दो सिक्के देते हुए भी तुम्हारा दिल दुखता है; जब तुम दस सिक्के देते हो तो तुम आशीष माँगते हो और दूसरों से विशिष्ट माने जाने की माँग करते हो। तुम लोगों जैसी मानवता के बारे में तो बात करना या सुनना भी पक्के तौर पर अपमानजनक है। क्या तुम्हारे शब्दों और कार्यों में कुछ भी प्रशंसा-योग्य है? जो अपना कर्तव्य निभाते हैं और जो नहीं निभाते; जो अगुआई करते हैं और जो अनुसरण करते हैं; जो परमेश्वर की मेजबानी करते और जो नहीं करते; जो भेंट चढ़ाते हैं और जो नहीं चढ़ाते; जो उपदेश देते हैं और जो वचन ग्रहण करते हैं, इत्यादि : ऐसे सभी लोग अपनी तारीफ करते हैं। क्या तुम लोगों को यह हास्यास्पद नहीं लगता? यह अच्छी तरह से जानते हुए भी कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तुम परमेश्वर से सुसंगत नहीं हो सकते हो। यह अच्छी तरह से जानते हुए भी कि तुम लोग बिल्कुल अयोग्य हो, तुम डींगें मारते रहते हो। क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि तुम्हारी समझ इस हद तक पहुँच गई है कि अब तुम्हारे नियंत्रण से बाहर है? इस तरह के विवेक के साथ तुम परमेश्वर के संपर्क में आने योग्य कैसे हो? क्या तुम लोग इस समय अपने बारे में चिंतित नहीं हो? तुम्हारा स्वभाव पहले ही इस हद तक खराब हो चुका है कि तुम परमेश्वर के साथ संगत होने में असमर्थ हो। इस बात को देखते हुए, क्या तुम लोगों की आस्था हास्यास्पद नहीं है? क्या तुम्हारी आस्था बेतुकी नहीं है? तुम अपने भविष्य से कैसे निपटोगे? तुम कैसे चुनोगे कि तुम्हें कौन-सा मार्ग अपनाना है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो मसीह के साथ असंगत हैं वे निश्चित ही परमेश्वर के विरोधी हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 306
मैंने बहुत सारे वचन व्यक्त किए हैं और अपने इरादों और अपने स्वभाव को भी व्यक्त किया है, इसके बावजूद लोग अभी भी मुझे जानने और मुझ पर विश्वास करने में अक्षम हैं। या यह कहा जा सकता है कि लोग अभी भी मेरे प्रति समर्पण करने में अक्षम हैं। जो बाइबल में जीते हैं, जो व्यवस्था में जीते हैं, जो सलीब पर जीते हैं, जो विनियमों के भीतर जीते हैं, जो उस कार्य के मध्य जीते हैं जिसे मैं आज करता हूँ—उनमें से कौन मेरे अनुरूप है? तुम लोग सिर्फ कोई आशीष और पुरस्कार पाने के बारे में ही सोचते हो, पर तुमने कभी यह नहीं सोचा कि वास्तव में मेरे अनुरूप कैसे बनोगे या अपने आप को मेरे विरुद्ध होने से कैसे रोकोगे। मैं तुम लोगों से बहुत निराश हूँ, क्योंकि मैंने तुम लोगों को बहुत अधिक प्रदान किया है, फिर भी मैंने तुम लोगों से बहुत कम हासिल किया है। तुम लोगों का छल, तुम लोगों का घमंड, तुम लोगों का लालच, तुम लोगों की फालतू इच्छाएँ, तुम लोगों का विश्वासघात, तुम लोगों की अवज्ञा—इनमें से कौन-सी चीज मेरी नजर से बच सकती है? तुम लोग मेरे साथ अनमने ढंग से पेश आते हो, मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश करते हो, मेरा अनादर करते हो, मुझे फुसलाते हो, मुझसे जबरन वसूली करते हो और मुझसे मेरी भेंटें छीन लेते हो—ऐसे बुरे कर्म मेरी सजा से कैसे बचकर निकल सकते हैं? ये सभी बुरे कर्म मेरे खिलाफ तुम लोगों की शत्रुता के प्रमाण हैं और तुम लोगों की मेरे साथ अनुरूपता न होने के प्रमाण हैं। तुम लोगों में से प्रत्येक स्वयं को मेरे बहुत अनुरूप समझता है, परंतु यदि ऐसा होता, तो फिर यह अकाट्य प्रमाण किस पर लागू होगा? तुम लोगों को लगता है कि तुम्हारे अंदर मेरे प्रति उच्चतम सच्चाई और निष्ठा है। तुम लोग सोचते हो कि तुम बहुत ही रहमदिल, बहुत ही करुणामय हो और तुमने मेरे प्रति बहुत समर्पण किया है। तुम लोग सोचते हो कि तुम लोगों ने मेरे लिए पर्याप्त से अधिक किया है। लेकिन क्या तुम लोगों ने कभी इसे अपने कामों से मिलाकर देखा है? मैं कहता हूँ, तुम लोग अत्यंत घमंडी, अत्यंत लालची, अत्यंत लापरवाह हो; और जिन चालबाजियों से तुम लोग मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश करते हो, वे अत्यंत शातिर हैं और तुम लोगों के अत्यंत घृणित इरादे और घृणित तरीके हैं। इसके विपरीत, तुम लोगों की वफादारी बहुत ही थोड़ी है, तुम लोगों में सच्ची भावना बहुत ही कम है और तुम लोग अंतरात्मा से तो पूरी तरह खाली हो। तुम लोगों का दिल बहुत ही दुर्भावनापूर्ण है और तुम किसी को नहीं बख्शते, यहाँ तक कि मुझे भी नहीं। तुम लोग अपने बच्चों या अपने पति की खातिर या अपनी आत्म-रक्षा की खातिर मुझे बाहर निकाल देते हो। तुम लोग जिसकी परवाह करते हो, वह मैं नहीं हूँ—वह तुम लोगों का परिवार, तुम लोगों के बच्चे, तुम लोगों का रुतबा, तुम लोगों का भविष्य और तुम लोगों का सुख है। कब तुम लोगों ने बोलते या कार्य करते समय कभी मेरे बारे में सोचा है? कड़ाके की ठंड के दिनों में तुम लोगों के विचार अपने बच्चों, अपने पति, अपनी पत्नी या अपने माता-पिता की तरफ मुड़ जाते हैं। झुलसाने वाली गर्मी के दिनों में भी तुम सबके विचारों में मेरे लिए कोई स्थान नहीं होता। जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो तब तुम अपने हितों, अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा, अपने परिवार के सदस्यों के बारे में ही सोच रहे होते हो। तुमने कभी ऐसा क्या किया है जो मेरे लिए हो? तुमने कब कभी भी मेरे बारे में सोचा है? ऐसा कब हुआ कि तुमने मेरी और मेरे कार्य की खातिर हरसंभव प्रयास किया हो? मेरे साथ तुम्हारी अनुरूपता का प्रमाण कहाँ है? मेरे प्रति तुम्हारी वफादारी की वास्तविकता कहाँ है? मेरे प्रति तुम्हारे समर्पण की वास्तविकता कहाँ है? कब तुम्हारे इरादे मेरा आशीष पाने की खातिर नहीं रहे हैं? तुम सभी लोग मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हो। तुम सब मुझे धोखा दे रहे हो। तुम लोग सत्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हो, तुम सत्य के अस्तित्व को छिपा रहे हो और सत्य के सार से विश्वासघात कर रहे हो। यह देखते हुए कि तुम लोग इस तरह मेरे विरुद्ध जाते हो, भविष्य में क्या चीज तुम लोगों की प्रतीक्षा कर रही है? तुम लोग केवल एक अज्ञात परमेश्वर के प्रति अनुरूपता का अनुसरण करते हो और मात्र एक अस्पष्ट विश्वास का अनुसरण करते हो, लेकिन तुम मसीह के अनुरूप नहीं हो। ऐसे बुरे कर्मों के साथ क्या तुम लोग बुरे लोगों के साथ वही दंड नहीं भुगतोगे जिसके तुम लायक हो? उस समय तुम लोगों को एहसास होगा कि जो कोई मसीह के अनुरूप नहीं होता है, वह क्रोध के दिन से बच नहीं सकता, और तुम लोगों को पता चलेगा कि जो मसीह के शत्रु हैं, उन्हें कैसा गंभीर दंड दिया जाएगा। जब वह दिन आएगा, तो परमेश्वर में विश्वास के कारण धन्य होने और स्वर्ग में प्रवेश पाने के तुम लोगों के सभी सपने चूर-चूर हो जाएँगे। परंतु यह उन लोगों के साथ नहीं होगा, जो मसीह के अनुरूप हैं। यद्यपि उन्होंने बहुत-कुछ खोया है, यद्यपि उन्होंने काफी कठिनाइयाँ सही हैं, फिर भी वे वह सारी विरासत प्राप्त करेंगे जो मैं मानवजाति को प्रदान करता हूँ। अंततः तुम लोग समझ जाओगे कि केवल मैं ही धार्मिक परमेश्वर हूँ और बस मैं मानवजाति को उसकी खूबसूरत मंजिल तक ले जाने में सक्षम हूँ।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें मसीह के प्रति अनुरूपता का मार्ग खोजना चाहिए
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 307
परमेश्वर ने मनुष्यों को बहुत-कुछ सौंपा है और अनगिनत प्रकार से उनके प्रवेश के बारे में भी संबोधित किया है। परंतु चूँकि लोगों की काबिलियत बहुत ख़राब है, इसलिए परमेश्वर के बहुत सारे वचन जड़ पकड़ने में असफल रहे हैं। इस ख़राब काबिलियत के विभिन्न कारण हैं, जैसे कि मनुष्य के विचार और नैतिकता का भ्रष्ट होना, और उचित पालन-पोषण की कमी; सामंती अंधविश्वास, जिन्होंने मनुष्य के हृदय को बुरी तरह से जकड़ लिया है; दूषित और पतनशील जीवन-शैलियाँ, जिन्होंने मनुष्य के हृदय के गहनतम कोनों में कई बुराइयाँ स्थापित कर दी हैं; सांस्कृतिक ज्ञान की सतही समझ, लगभग अट्ठानबे प्रतिशत लोगों में सांस्कृतिक ज्ञान की शिक्षा की कमी है और इतना ही नहीं, बहुत कम लोग उच्च स्तर की सांस्कृतिक शिक्षा प्राप्त करते हैं। इसलिए, मूल रूप से लोगों को पता नहीं है कि परमेश्वर या आत्मा का क्या अर्थ है, उनके पास सामंती अंधविश्वासों से प्राप्त परमेश्वर की केवल एक धुँधली और अस्पष्ट तस्वीर है। हजारों वर्षों की “राष्ट्रीय भावना” के माध्यम से मानव हृदय में गहराई तक बैठे हानिकारक प्रभावों और सामंती सोच ने लोगों को बाँध और जकड़ दिया है, जिससे उनमें जरा-सी भी स्वतंत्रता नहीं बची है, न कोई महत्वाकांक्षा या दृढ़ता है और न ही प्रगति करने की कोई इच्छा है; इसके बजाय वे नकारात्मक और प्रतिगामी बने रहते हैं, गुलामी की मानसिकता में जकड़े रहते हैं, इत्यादि। इन वस्तुनिष्ठ कारकों ने मानवता के वैचारिक दृष्टिकोण, आकांक्षाओं, नैतिकता और स्वभाव पर एक अमिट गंदा और बदसूरत रंग चढ़ा दिया है। ऐसा लगता है कि मनुष्य आतंकमय अँधेरी दुनिया में जी रहे हैं और उनमें से कोई भी इससे पार पाने के बारे में नहीं सोचता या एक आदर्श दुनिया में जाने के बारे में नहीं सोचता; बल्कि, वे अपने जीवन की स्थिति को लेकर संतोष की भावना के साथ अपने दिन बिताते हैं : बच्चे पैदा करना और पालना, प्रयास करना, पसीना बहाना, अपने श्रम में लगे रहना और एक आरामदायक और सुखी परिवार, वैवाहिक स्नेह, संतानोचित बच्चों, जीवन के अंतिम पड़ाव में आनंद और शांतिपूर्ण ढंग से अपना जीवन जीने का सपना देखना...। दसियों, हजारों, लाखों वर्षों से लेकर अब तक लोग इसी तरह अपना समय बरबाद करते आ रहे हैं, किसी ने भी समस्त मानव जीवन में सबसे शानदार जीवन का निर्माण नहीं किया है, वे केवल इस अँधेरी दुनिया में एक-दूसरे की हत्या, प्रसिद्धि और लाभ की दौड़ और एक-दूसरे के खिलाफ साजिशें रचने में लगे रहते हैं। किसने कभी परमेश्वर के इरादे जानने का प्रयास किया है? क्या किसी ने कभी परमेश्वर के कार्य पर ध्यान दिया है? मनुष्य के वे सभी पक्ष, जो अंधकार के प्रभाव के अधीन हैं, बहुत पहले से ही उसकी मानव प्रकृति बन चुके हैं, इसलिए परमेश्वर का कार्य करना अत्यंत कठिन हो गया है और लोग आज परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपे गए कार्य पर ध्यान देने के तो और भी कम इच्छुक हैं। कुछ भी हो, मैं विश्वास करता हूँ कि मेरे द्वारा ये वचन बोलने का लोग बुरा नहीं मानेंगे, क्योंकि मैं हज़ारों वर्षों के इतिहास के बारे में बात कर रहा हूँ। इतिहास के बारे में बात करने का अर्थ है तथ्य, और इससे भी अधिक, घोटाले, जो सबके सामने प्रत्यक्ष हैं, इसलिए तथ्य के विपरीत बात कहने का क्या अर्थ है? परंतु मैं यह भी विश्वास करता हूँ कि जिन लोगों के पास विवेक है, वे इन शब्दों को देखकर जागृत होंगे और प्रगति करने का प्रयास करेंगे। परमेश्वर आशा भी करता है कि मनुष्य शांति और संतोष के साथ जी सकते हैं और कार्य कर सकते हैं। हालाँकि यह परमेश्वर का इरादा है कि मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम हों और सारी मनुष्यजाति विश्राम में प्रवेश कर पाए। इससे भी अधिक परमेश्वर की इच्छा यह है कि संपूर्ण भूमि परमेश्वर की महिमा से भर जाए। यह शर्म की बात है कि मनुष्य विस्मरण की स्थिति में डूबे और प्रसुप्त रहते हैं, उन्हें शैतान द्वारा इतनी बुरी तरह से भ्रष्ट किया गया है कि अब वे मनुष्य जैसे रहे ही नहीं। इसलिए मनुष्य के विचार, नैतिकता और शिक्षा एक महत्वपूर्ण कड़ी बनाते हैं, और सांस्कृतिक ज्ञान के प्रशिक्षण से दूसरी कड़ी बनती है, जो मनुष्यों की सांस्कृतिक काबिलियत बढ़ाने और उनका मानसिक दृष्टिकोण बदलने के लिए बेहतर है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (3)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 308
लोगों के जीवन अनुभवों में, वे प्रायः मन ही मन सोचते हैं : “मैंने परमेश्वर के लिए अपने परिवार और जीविका का त्याग कर दिया है, और उसने मुझे क्या दिया है? मुझे हिसाब करना चाहिए और इसकी पुष्टि करनी चाहिए—क्या मैंने हाल ही में कोई आशीष प्राप्त किया है? मैंने इस दौरान बहुत कुछ खपाया है, मैं बहुत दौड़ा-भागा हूँ, मैंने बहुत कष्ट सहा है—क्या परमेश्वर ने इस दौरान मेरे प्रदर्शन के बदले में मुझसे कोई वादा किया है? क्या उसने मेरे अच्छे कर्म याद रखे हैं? मेरा परिणाम क्या होगा? क्या मैं आशीष प्राप्त कर सकता हूँ? ...” अपने हृदय में प्रत्येक व्यक्ति बार-बार ऐसे जोड़-तोड़ करता है और परमेश्वर से चीजों की माँग करते हुए लगातार प्रेरणाएँ, महत्वाकांक्षाएँ और लेन-देन की मानसिकता रखता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य अपने हृदय में लगातार परमेश्वर की परीक्षा लेता रहता है और परमेश्वर के बारे में साजिशें रचता रहता है, अपने परिणाम के लिए परमेश्वर के साथ लगातार “मामले पर बहस” करता रहता है और परमेश्वर से बयान माँगने और यह देखने की कोशिश करता है कि परमेश्वर उसे वह चीज देगा या नहीं जो वह चाहता है। परमेश्वर का अनुसरण करने के साथ ही साथ, मनुष्य परमेश्वर को परमेश्वर नहीं मानता। मनुष्य ने परमेश्वर के साथ हमेशा सौदेबाजी करने की कोशिश की है, उससे अनवरत चीजों की माँग की है और हर कदम पर उस पर दबाव डालते हुए, एक इंच दिए जाने पर एक मील लेने की कोशिश की है। परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश करते हुए साथ ही साथ, मनुष्य उसके साथ तर्क-वितर्क भी करता है, और यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो परीक्षण आने पर या अपने आप को किन्हीं खास स्थितियों में पाने पर अक्सर कमजोर, नकारात्मक होते हैं और अपने कार्य में ढिलाई करते हैं और परमेश्वर के बारे में शिकायतों से भरे होते हैं। मनुष्य ने जब पहले-पहल परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ किया था, उसी समय से मनुष्य ने परमेश्वर को एक अक्षय पात्र, एक सर्व-उपयोगी उपकरण माना है और अपने आपको परमेश्वर का सबसे बड़ा साहूकार माना है, मानो परमेश्वर से आशीष और वादे माँगना उसका जन्मजात अधिकार और दायित्व है, जबकि मनुष्य की रक्षा, परवाह और उसकी आपूर्ति करना परमेश्वर की जिम्मेदारियाँ हैं जो परमेश्वर को पूरी करनी चाहिए। ऐसी है “परमेश्वर में विश्वास” के तीन शब्दों की मूलभूत समझ, उन सब लोगों की जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं और ऐसी है परमेश्वर में विश्वास की अवधारणा की उनकी गहनतम समझ। मनुष्य के प्रकृति सार से लेकर उसके व्यक्तिपरक अनुसरण तक, ऐसा कुछ भी नहीं है जो परमेश्वर के भय से संबंधित हो। परमेश्वर में विश्वास करने में मनुष्य के लक्ष्य का परमेश्वर की आराधना के साथ कोई लेना-देना नहीं हो सकता। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य ने परमेश्वर में अपने विश्वास में परमेश्वर का भय मानने और उसकी आराधना करने का इरादा कभी नहीं किया है और कभी भी यह नहीं समझा है कि परमेश्वर में विश्वास करने के लिए ऐसी चीजों की आवश्यकता है। ऐसी दशा के आलोक में, मनुष्य का सार स्पष्ट है। यह सार क्या है? यह सार यह है कि मनुष्य का हृदय दुर्भावनापूर्ण, कुटिल और धोखेबाज है, वह निष्पक्षता, धार्मिकता और सकारात्मक चीजों से प्रेम नहीं करता है और यह तिरस्करणीय और लोभी है। मनुष्य का हृदय परमेश्वर के लिए पूरी तरह से बंद हो चुका है; वह इसे परमेश्वर को बिल्कुल भी नहीं देता है। परमेश्वर ने मनुष्य का सच्चा हृदय कभी नहीं देखा है, न ही उसकी मनुष्य द्वारा कभी आराधना की गई है। परमेश्वर चाहे जितनी बड़ी कीमत चुकाए, या वह चाहे जितना अधिक कार्य करे, या वह मनुष्य का चाहे जितना भरण-पोषण करे, मनुष्य इन सबके प्रति अंधा और उदासीन ही बना रहता है। मनुष्य ने कभी परमेश्वर को अपना हृदय नहीं दिया है, वह अपना हृदय अपने पास ही रखना, स्वयं अपने निर्णय लेना चाहता है—जिसका निहितार्थ यह है कि मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलना या परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना नहीं चाहता है, न ही वह परमेश्वर के रूप में परमेश्वर की आराधना करना चाहता है। ऐसी है आज मनुष्य की दशा।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 309
क्या बहुत-से लोग इसलिए परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं करते और पवित्र आत्मा के कार्य में बाधा नहीं डालते क्योंकि वे परमेश्वर के विभिन्न और विविधतापूर्ण कार्यों को नहीं जानते हैं, और इसके अलावा, क्योंकि वे केवल थोड़े-से ज्ञान और धर्म-सिद्धांत से संपन्न होते हैं जिसका उपयोग करके वे पवित्र आत्मा के कार्य को मापते हैं? यद्यपि इन लोगों के पास केवल उथले अनुभव हैं, फिर भी इनकी प्रकृति अहंकारी, स्वेच्छाचारी और निरंकुश है, ये पवित्र आत्मा के कार्य को तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं, पवित्र आत्मा के अनुशासन की उपेक्षा करते हैं और इसके अलावा, पवित्र आत्मा के कार्य की “पुष्टि” करने के लिए अपने तुच्छ पुराने धर्म-सिद्धांतों का उपयोग करते हैं। वे दिखावा भी करते हैं और अपनी विद्वता के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त रहते हैं, यह मानते हुए कि वे पूरी दुनिया में बेरोकटोक घूम सकते हैं। क्या ऐसे लोग वे नहीं हैं जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा तिरस्कृत कर दिया जाता है और जिन्हें नए युग द्वारा हटा दिया जाता है? क्या वे लोग जो परमेश्वर के सामने आते हैं और खुलेआम उसका प्रतिरोध करते हैं, उथले और सीमित ज्ञान वाले ऐसे नीच व्यक्ति नहीं हैं जो अपनी कथित “बुद्धिमत्ता” का प्रदर्शन कर रहे हैं? उन्हें बाइबल का बस थोड़ा-सा ज्ञान है और फिर भी वे दुनिया के “शैक्षणिक हलकों” में बेरोकटोक राज करना चाहते हैं; उनके पास लोगों को सिखाने के लिए बस थोड़ा-सा उथला धर्म-सिद्धांत है और फिर भी वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा को पलटना चाहते हैं और इसे अपनी विचार प्रक्रियाओं के इर्द-गिर्द घुमाने का प्रयास करते हैं। वे अदूरदर्शी हैं, फिर भी वे परमेश्वर के 6,000 वर्षों के कार्य की भव्यता को देखना चाहते हैं। इन लोगों में नाममात्र की भी समझ नहीं है! वास्तव में, लोगों को परमेश्वर का जितना अधिक ज्ञान होता है, वे उसके कार्य के बारे में उतने ही कम हल्के ढंग से निर्णय करते हैं। वे परमेश्वर के वर्तमान कार्य के बारे में अपने ज्ञान की केवल थोड़ी-सी चर्चा करते हैं, लेकिन उस पर लापरवाही से कोई निर्णय नहीं सुनाते। लोग परमेश्वर को जितना कम जानते हैं, वे उतने ही अधिक अहंकारी होते हैं, स्वयं का उतना ही बढ़ा-चढ़ाकर आकलन करते हैं और उतनी ही मनमानी से यह घोषणा करते हैं कि परमेश्वर का स्वरूप क्या है; फिर भी वे जो घोषणा करते हैं, वह केवल धर्म-सिद्धांत होता है और उसका कोई तथ्यात्मक आधार नहीं होता। ये सबसे बेकार लोग हैं। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य को एक खेल मानते हैं, वे ओछे लोग हैं! पवित्र आत्मा के नए कार्य का सामना होने पर, वे इसके साथ सावधानी से व्यवहार नहीं करते, बल्कि इसके बजाय वे बिना सोचे-समझे बोलते हैं और जल्दी से राय बना लेते हैं, पवित्र आत्मा के कार्य के सही होने को नकारने के लिए अपनी मर्जी को खुली छूट देते हैं और यहाँ तक कि इसका अपमान या ईश-निंदा करते हैं—क्या ये अनादर करने वाले व्यक्ति पवित्र आत्मा के कार्य से अनजान नहीं हैं और इसके अलावा, क्या ये ऐसे घमंडी लोग नहीं हैं जो स्वाभाविक रूप से अहंकारी और निरंकुश हैं? भले ही एक दिन ऐसा आए जब ऐसे लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार कर लें, फिर भी उन्हें परमेश्वर की क्षमा प्राप्त नहीं होगी। वे न केवल परमेश्वर के लिए कार्य करने वालों को नीची दृष्टि से देखते हैं, बल्कि वे स्वयं परमेश्वर की ईश-निंदा भी करते हैं। ऐसे दुस्साहसी लोगों को न तो इस जीवन में और न ही आने वाले संसार में क्षमा किया जाएगा और वे हमेशा के लिए नरक में विनष्ट हो जाएँगे! ऐसे अनादर करने वाले और आत्म-भोगी लोग केवल विश्वासियों का लेबल लगाए रहते हैं, और वे जितने अधिक ऐसे होते हैं, उतनी ही अधिक संभावना होती है कि वे परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करेंगे। क्या वे सभी अहंकारी व्यक्ति जो स्वाभाविक रूप से निरंकुश हैं और जिन्होंने कभी किसी की आज्ञा नहीं मानी है, इसी मार्ग पर नहीं चलते हैं? क्या वे दिन-प्रतिदिन, इसी तरह से उस परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं करते जो हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं होता?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 310
कई हजार वर्षों की प्राचीन संस्कृति और इतिहास के ज्ञान ने मनुष्य के विचारों और धारणाओं तथा उसके मानसिक दृष्टिकोण को इतना कसकर बंद कर दिया है कि वे अभेद्य और प्राकृतिक रूप से नष्ट न होने वाले[1] बन गए हैं। लोग नरक के अठारहवें घेरे में रहते हैं, मानो उन्हें परमेश्वर द्वारा काल-कोठरियों में निर्वासित कर दिया गया हो, जहाँ प्रकाश कभी दिखाई नहीं देता। सामंती सोच ने लोगों का इस तरह उत्पीड़न किया है कि वे मुश्किल से साँस ले पाते हैं और उनका दम घुट रहा है। उनमें प्रतिरोध करने की थोड़ी-सी भी ताकत नहीं है; वे बस सहते हैं और चुपचाप सहते रहते हैं...। कभी किसी ने न्याय और निष्पक्षता के लिए संघर्ष करने या खड़े होने का साहस नहीं किया; लोग बस दिन-ब-दिन और साल-दर-साल सामंती नीति-शास्त्र के प्रहारों और दुर्व्यवहारों तले जानवर से भी बदतर जीवन जीते हैं। उन्होंने कभी मानव-जगत में खुशी पाने के लिए परमेश्वर की तलाश करने के बारे में नहीं सोचा। ऐसा लगता है, मानो लोगों को पीट-पीटकर इस हद तक तोड़ डाला गया है कि वे पतझड़ में गिरे पत्तों की तरह हो गए हैं, मुरझाए हुए, बेरंग और पतले। लोग लंबे समय से अपनी याददाश्त खो चुके हैं; वे असहाय रूप से उस नरक में रहते हैं, जिसका नाम है मानव-जगत, अंत के दिन आने का इंतज़ार करते हुए, ताकि वे इस नरक के साथ ही नष्ट हो जाएँ, मानो वह अंत का दिन, जिसके लिए वे लालायित रहते हैं, वह दिन हो, जब मनुष्य आरामदायक शांति का आनंद लेगा। सामंती नैतिकता ने मनुष्य का जीवन “रसातल” में पहुँचा दिया है, जिससे उसकी प्रतिरोध करने की शक्ति और भी कम हो गई है। सभी प्रकार के उत्पीड़न मनुष्य को धीरे-धीरे रसातल में धकेल रहे हैं, जब तक वह रसातल में नहीं गिर जाता और परमेश्वर से अधिकाधिक दूर धकेलते जाते हैं, कुछ इस तरह कि आज उसे महसूस होता है कि परमेश्वर उसके लिए पूर्णतः अजनबी बन गया है, और जब वे मिलते हैं, तो वह उससे बचने के लिए जल्दी से निकल जाता है। मनुष्य उस पर ध्यान नहीं देता और उसे एक तरफ अकेला खड़ा छोड़ देता है, जैसे कि उसने उसे कभी जाना ही न हो, उसने उसे पहले कभी देखा ही न हो। फिर भी परमेश्वर कभी अपना अदम्य क्रोध उस पर प्रचंडता से न बरसाते हुए मानव-जीवन की लंबी यात्रा के दौरान लगातार मनुष्य की प्रतीक्षा करता रहा है और इस दौरान बिना एक भी शब्द बोले, केवल मनुष्य के पश्चात्ताप करने और नए सिरे से शुरुआत करने की मौन प्रतीक्षा करता रहा है। मनुष्य के साथ मानव-जगत की पीड़ाएँ साझा करने के लिए परमेश्वर बहुत पहले मानव-जगत में आया था। मनुष्य के साथ गुज़ारे इन तमाम वर्षों में कोई भी उसके अस्तित्व को खोज नहीं पाया है। परमेश्वर केवल स्वयं द्वारा लाया गया कार्य करते हुए मानव-जगत की दरिद्र स्थिति का कष्ट चुपचाप सहन करता रहता है। ऐसे कष्टों से गुजरते हुए, जिनका अनुभव मनुष्य ने पहले कभी नहीं किया, वह पिता परमेश्वर की इच्छा और मानवजाति की जरूरतों की खातिर कष्ट सहता है। पिता परमेश्वर की इच्छा की खातिर, और मानवजाति की जरूरतों की खातिर भी, मनुष्य की उपस्थिति में वह चुपचाप उसकी सेवा में खड़ा रहा है, और मनुष्य की उपस्थिति में उसने खुद को नम्र किया है। प्राचीन संस्कृति के ज्ञान ने मनुष्य को चुपके से परमेश्वर की उपस्थिति से चुरा लिया है और मनुष्य को दानवों के राजा और उसकी संतानों को सौंप दिया है। चार पुस्तकों और पाँच क्लासिक्स[क] ने मनुष्य के विचारों और धारणाओं को विद्रोह के एक अन्य युग में पहुँचा दिया है, जिससे वह इन चार पुस्तकों और पाँच क्लासिक्स के संकलनकर्ताओं की पहले से भी ज्यादा पूजा करने लगा है, और परिणामस्वरूप परमेश्वर के बारे में उसकी धारणाएँ और ज्यादा मजबूत हो गई हैं। दानवों के राजा ने बिना मनुष्य के जाने ही उसके हृदय से निर्दयतापूर्वक परमेश्वर को बाहर निकाल दिया और फिर विजयी उल्लास के साथ खुद उस पर कब्ज़ा जमा लिया। तब से मनुष्य के पास एक कुरूप आत्मा और दानवों के राजा का चेहरा है। उसके सीने में परमेश्वर के प्रति घृणा भर गई है, और दानवों के राजा की दुर्भावनापूर्णता दिन-ब-दिन तब तक मनुष्य के भीतर फैलती जाती है, जब तक कि वह पूरी तरह से निगल नहीं लिया जाता है। उसके पास जरा-भी स्वतंत्रता नहीं रह गयी है और उसके पास दानवों के राजा के जालों से छूटने का कोई उपाय नहीं है। उसके पास वहीं उसकी उपस्थिति में बंदी बनने, आत्मसमर्पण करने और उसके अधीन हो जाने के सिवा कोई चारा नहीं रहा। बहुत पहले जब मनुष्य का हृदय अभी शैशवावस्था में ही था, दानवों के राजा ने उसमें नास्तिकता के फोड़े का बीज बो दिया था, और उसे इस तरह की भ्रांतियाँ सिखा दीं, जैसे कि “विज्ञान और प्रौद्योगिकी को पढ़ो; चार आधुनिकीकरणों को साकार करो; और दुनिया में परमेश्वर जैसी कोई चीज नहीं है।” यही नहीं, वह हर अवसर पर चिल्लाता है, “आओ, हम एक सुंदर मातृभूमि का निर्माण करने के लिए अपने कठोर श्रम पर भरोसा करें,” और बचपन से ही हर व्यक्ति को अपने देश की सेवा करने के लिए तैयार रहने के लिए कहता है। बेखबर मनुष्य इसके सामने लाया गया है और यह बेझिझक सारा श्रेय (अर्थात् समस्त मनुष्यों को अपने हाथों में रखने का परमेश्वर का श्रेय) हथिया लेता है। इसमें कभी भी शर्म का भाव नहीं रहा है। इतना ही नहीं, वह निर्लज्जतापूर्वक परमेश्वर के लोगों को पकड़ लेता है और उन्हें अपने घर में खींच लेता है, जहाँ वह मेज पर एक चूहे की तरह उछलकर चढ़ जाता है और मनुष्यों से “परमेश्वर” के रूप में अपनी आराधना करवाता है। कैसा आततायी है! वह चीख-चीखकर ऐसी शर्मनाक और चौंका देने वाली बातें कहता है : “दुनिया में परमेश्वर जैसी कोई चीज नहीं है। हवा प्राकृतिक नियमों द्वारा संचालित परिवर्तनों से उत्पन्न होती है; बारिश तब होती है, जब भाप ठंडे तापमानों से मिलती है और बूँदों के रूप में संघनित होकर पृथ्वी पर गिरती है; भूकंप भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण पृथ्वी की सतह का हिलना है; सूखा सूरज की सतह पर नाभिकीय कणों के विघटन के कारण हवा के शुष्क हो जाने से पड़ता है। ये प्राकृतिक घटनाएँ हैं। इस सबमें परमेश्वर का किया कौन-सा काम है?” ऐसे लोग भी हैं, जो कुछ ऐसे अकथनीय बयान भी देते हैं जैसे कि : “मनुष्य प्राचीन काल में वानरों से विकसित हुआ था, और आज की दुनिया लगभग एक युग पहले शुरू हुए आदिम समाज से विकसित हुई है। किसी देश का उत्थान या पतन पूरी तरह से उसके लोगों के हाथों में है।” पृष्ठभूमि में, शैतान लोगों से उसे दीवार पर लटकवाता या मेज पर रखकर पूजा करवाता और भेंट चढ़वाता है। जब वह चिल्लाता है कि “कोई परमेश्वर नहीं है,” उसी समय वह खुद को परमेश्वर के रूप में स्थापित भी करता है और परमेश्वर के स्थान पर खड़ा होकर तथा दानवों के राजा की भूमिका ग्रहण कर अशिष्टता के साथ परमेश्वर को धरती की सीमाओं से बाहर धकेल देता है। कितनी बेहूदा बात है! यह मनुष्य के भीतर उसके प्रति हड्डियों तक गहरी घृणा उत्पन्न कर देता है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर और वह कट्टर दुश्मन हैं और दोनों साथ-साथ अस्तित्व में नहीं रह सकते। वह व्यवस्था की पहुँच से बाहर आज़ाद घूमता है[2] और परमेश्वर को दूर भगाने की योजना बनाता है। ऐसा है यह दानवों का राजा! इसके अस्तित्व को कैसे बरदाश्त किया जा सकता है? यह तब तक चैन से नहीं बैठेगा, जब तक परमेश्वर के काम को खराब नहीं कर देता और उसे पूरी तरह से अव्यवस्थित[3] नहीं बना देता, मानो वह अंत तक परमेश्वर का विरोध करना चाहता हो, जब तक कि या तो मछली न मर जाए या जाल न टूट जाए। वह जानबूझकर खुद को परमेश्वर के ख़िलाफ खड़ा कर लेता है और उस पर दबाव निरंतर बढ़ाता ही जाता है। इसका घिनौना चेहरा बहुत पहले से पूरी तरह से बेनक़ाब हो चुका है, और अब वह बेहद व्यग्र और परेशानियों से आजिज हो गया[4] है, फिर भी वह परमेश्वर से नफरत करने से बाज नहीं आएगा, मानो परमेश्वर को एक कौर में निगलकर ही वह अपने दिल में बसी घृणा से मुक्ति पा सकेगा। परमेश्वर के इस शत्रु को हम कैसे बरदाश्त कर सकते हैं! केवल इसके उन्मूलन और पूर्ण विनाश से ही हमारे जीवन की इच्छा फलित होगी। इसे उपद्रव करने कैसे दिया जा सकता है? यह मनुष्य को इस हद तक भ्रष्ट कर चुका है कि मनुष्य स्वर्ग सूर्य को नहीं जानता, और वह सुन्न और मंदबुद्धि हो गया है। मनुष्य ने सामान्य मानवीय विवेक खो दिया है। शैतान को नष्ट और भस्म करने के लिए क्यों नहीं हम अपनी पूरी हस्ती का बलिदान कर दें, ताकि भविष्य की सारी चिंताएँ दूर कर सकें और परमेश्वर के कार्य को जल्दी से अभूतपूर्व भव्यता तक पहुँचने दें? बदमाशों का यह गिरोह मनुष्य की दुनिया में आ गया है और उसने यहाँ उथल-पुथल मचा दी है। वे सभी मनुष्यों को एक खड़ी चट्टान की कगार पर ले आए हैं और गुप्त रूप से उन्हें वहाँ से धकेलकर टुकड़े-टुकड़े करने की योजना बना रहे हैं, ताकि फिर वे उनके शवों को निगल सकें। वे व्यर्थ ही परमेश्वर की योजना को नष्ट करने और उसके साथ मुकाबला करते हुए पासे की एक ही चाल में सब कुछ दाँव पर लगाने[5] की आशा करते हैं। यह किसी भी तरह से आसान नहीं है! अंततः दानवों के राजा के लिए सलीब तैयार कर दिया गया है, जो सबसे घृणित अपराधों का दोषी है। परमेश्वर सलीब का नहीं है। वह पहले ही शैतान के लिए उसे किनारे फेंक चुका है। परमेश्वर अब से बहुत पहले ही विजयी होकर उभर चुका है और अब मानवजाति के पापों पर दुख महसूस नहीं करता, लेकिन वह समस्त मानवजाति के लिए उद्धार लाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (7)
फुटनोट :
1. “प्राकृतिक रूप से नष्ट न होने वाले” का प्रयोग यहाँ व्यंग्य के रूप में किया गया है, जिसका अर्थ है कि लोग अपने ज्ञान, संस्कृति और मानसिक दृष्टिकोण में रूढ़िवादी हैं।
2. “व्यवस्था की पहुँच से बाहर आज़ाद घूमता है” इंगित करता है कि शैतान अपने जंगलीपन में निरंकुश है और पूरी भूमि पर उपद्रव करता है।
3. “पूरी तरह अव्यवस्थित” बताता है कि कैसे उस शैतान का हिंसक व्यवहार देखने में असहनीय है।
4. “बेहद व्यग्र और परेशानियों से आजिज” दानवों के राजा के बदसूरत चेहरे के बारे में बताता है।
5. “पासे की एक ही चाल में सब कुछ दाँव पर लगाने” का अर्थ है अंत में जीतने की उम्मीद में अपना सारा धन एक ही दाँव पर लगा देना। यह शैतान की भयावह और दुर्भावनापूर्ण योजनाओं के लिए एक रूपक है। इस अभिव्यक्ति का प्रयोग उपहास में किया जाता है।
क. चार पुस्तकें और पाँच क्लासिक्स चीन में कन्फ्यूशीवाद की प्रामाणिक किताबें हैं।
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 311
ऊपर से नीचे तक और शुरू से अंत तक शैतान परमेश्वर के कार्य को बाधित करता रहा है और उसके विरोध में काम करता रहा है। इन सारी “प्राचीन सांस्कृतिक विरासत,” मूल्यवान “प्राचीन संस्कृति के ज्ञान,” “ताओवाद और कन्फ्यूशीवाद की शिक्षाओं” और “कन्फ्यूशियन क्लासिक्स और सामंती संस्कारों” ने मनुष्य को नरक में पहुँचा दिया है। उन्नत आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ-साथ अत्यधिक विकसित उद्योग, कृषि और व्यवसाय कहीं नजर नहीं आते। इसके बजाय, यह सिर्फ़ प्राचीन काल के “वानरों” द्वारा लाए गए सामंती संस्कारों पर जोर देता है, ताकि परमेश्वर के कार्य को जानबूझकर गड़बड़ कर सके, उसका विरोध कर सके और उसे नष्ट कर सके। न केवल इसने आज तक मनुष्य को सताना जारी रखा है, बल्कि यह उसे पूरे का पूरा निगल[1] भी जाना चाहता है। सामंती नैतिकता की शिक्षाओं के प्रसारण और प्राचीन संस्कृति के ज्ञान की विरासत ने लंबे समय से मनुष्य को संक्रमित किया है और उन्हें छोटे-बड़े शैतानों में बदल दिया है। कुछ ही लोग हैं, जो सहर्ष परमेश्वर को ग्रहण करते हैं और कुछ ही लोग हैं, जो उसके आगमन का उल्लासपूर्वक स्वागत करते हैं। समस्त मानवजाति का चेहरा हत्या के इरादे से भर गया है, और हर जगह हवा में एक हत्यारा वातावरण व्याप्त है। वे परमेश्वर को इस भूमि से निष्कासित करना चाहते हैं; हाथों में चाकू और तलवारें लिए वे परमेश्वर का “विनाश” करने के लिए खुद को युद्ध के विन्यास में व्यवस्थित करते हैं। दानवों की इस सारी भूमि पर, जहाँ मनुष्य को लगातार सिखाया जाता है कि कहीं कोई परमेश्वर नहीं है, मूर्तियाँ फैली हुई हैं, और ऊपर हवा जलते हुए कागज और धूप की वमनकारी गंध से तर है, इतनी घनी कि दम घुटता है। यह उस कीचड़ की बदबू की तरह है, जो जहरीले सर्प के कुलबुलाते समय ऊपर उठती है, जिससे व्यक्ति उलटी किए बिना नहीं रह सकता। इसके अलावा, वहाँ अस्पष्ट रूप से दुष्ट दानवों के मंत्रोच्चार की ध्वनि सुनी जा सकती है, जो दूर नरक से आती हुई प्रतीत होती है, जिसे सुनकर आदमी काँपे बिना नहीं रह सकता। इस भूमि में हर जगह इंद्रधनुष के सभी रंगों वाली मूर्तियाँ रखी हैं, जिन्होंने इस देश को भड़कीली, दिखावटी दुनिया में बदल दिया है, और दानवों का राजा दुष्टतापूर्वक हँसता रहता है, मानो उसका षड्यंत्र सफल हो गया हो। इस बीच, मनुष्य पूरी तरह से बेखबर रहता है, और उसे यह भी पता नहीं कि शैतान ने उसे पहले ही इस हद तक भ्रष्ट कर दिया है कि वह बेसुध हो गया है और उसने अपना सिर लटका दिया है। शैतान चाहता है कि एक ही झपट्टे में परमेश्वर से संबंधित सब कुछ साफ कर दे, और एक बार फिर उसे अपवित्र कर उसकी हत्या कर दे; वह उसके कार्य को टुकड़े-टुकड़े करने और उसमें विघ्न डालने का इरादा रखता है। वह कैसे परमेश्वर को समान दर्जे का होने दे सकता है? कैसे वह मानवीय दुनिया में अपने काम में परमेश्वर का “हस्तक्षेप” बरदाश्त कर सकता है? कैसे वह परमेश्वर को उसके घिनौने चेहरे को उजागर करने दे सकता है? कैसे यह परमेश्वर को अपने काम को अव्यवस्थित करने की अनुमति दे सकता है? क्रोध के साथ भभकता यह दानव कैसे परमेश्वर को पृथ्वी पर अपने राजसी दरबार पर नियंत्रण करने दे सकता है? कैसे वह स्वेच्छा से परमेश्वर के श्रेष्ठतर सामर्थ्य के आगे झुक सकता है? इसके कुत्सित चेहरे की असलियत उजागर की जा चुकी है, इसलिए किसी को समझ नहीं आता कि हँसे या रोए और सचमुच इसके बारे में बात करना कठिन है। क्या यही इसका सार नहीं है? कुरूप आत्माओं के साथ, वे अभी भी यह मानते हैं कि वे अविश्वसनीय रूप से सुंदर हैं—यह सह-अपराधियों का गिरोह![2] वे भोग में लिप्त होने के लिए सांसारिक क्षेत्र में उतरते हैं और हंगामा करते हैं, और चीजों में इतनी हलचल पैदा कर देते हैं कि दुनिया एक चंचल और अस्थिर जगह बन जाती है और मनुष्य का दिल घबराहट और बेचैनी से भर जाता है, और उन्होंने मनुष्य के साथ इतना खिलवाड़ किया है कि उसका रूप एक अमानवीय जानवर जैसा अत्यंत कुरूप हो गया है, जिससे मूल शुद्ध मनुष्य का आखिरी निशान भी खो गया है। इतना ही नहीं, वे धरती पर संप्रभु सत्ता ग्रहण करना चाहते हैं। वे परमेश्वर के कार्य को इतना बाधित करते हैं कि वह मुश्किल से बहुत धीरे आगे बढ़ पाता है, और वे मनुष्य को इतना कसकर बंद कर देते हैं, जैसे कि तांबे और इस्पात की दीवारें हों। इतने सारे गंभीर पाप करने और इतनी आपदाओं का कारण बनने के बाद भी क्या वे ताड़ना के अलावा किसी अन्य चीज की उम्मीद कर रहे हैं? दानव और राक्षस काफी समय से पृथ्वी पर अंधाधुंध विचरण कर रहे हैं, और उन्होंने परमेश्वर के इरादों और हृदय के रक्त, दोनों को ही इतना कसकर सीलबंद कर दिया है कि वे अभेद्य बन गए हैं। सचमुच, यह एक घातक पाप है! ऐसा कैसे हो सकता है कि परमेश्वर चिंतित महसूस न करे? परमेश्वर कैसे क्रोधित नहीं हो सकता? उन्होंने परमेश्वर के कार्य में गंभीर बाधा पहुँचाई है और उसका घोर विरोध किया है : कितने विद्रोही हैं वे! यहाँ तक कि वे छोटे-बड़े राक्षस भी शेर के पीछे चलते गीदड़ों जैसा व्यवहार करते हैं और गड़बड़ी करने में बुराई की धारा का अनुसरण करते हैं। सत्य को जानने के बावजूद उसका जानबूझकर विरोध करते हैं, ये विद्रोह के बेटे! यह ऐसा है मानो, अब जबकि नरक का राजा राजसी सिंहासन पर चढ़ गया है, तो वे बेपरवाह हो गए हैं और दंभी हो गए हैं और अन्य सभी की अवमानना करने लगे हैं। उनमें से कितने सत्य की खोज करते हैं और न्याय का पालन करते हैं? वे सभी जानवर हैं, जो सूअरों और कुत्तों से बेहतर नहीं हैं, वे गोबर के एक ढेर के बीच में बदबूदार मक्खियों के एक समूह के प्रमुख हैं, दंभपूर्ण आत्म-बधाई में अपने सिर हिलाते हैं और हर तरह का उपद्रव भड़काते[3] हैं। उनका मानना है कि नरक का उनका राजा सबसे बड़ा राजा है, और इतना भी नहीं जानते कि वे खुद बदबूदार मक्खियों से ज्यादा कुछ नहीं हैं। और फिर भी, वे अपने माता-पिता रूपी सूअरों और कुत्तों की ताकत का लाभ उठाकर परमेश्वर के अस्तित्व को बदनाम करते हैं। वे तुच्छ मक्खियाँ मानती हैं कि उनके माता-पिता नीली व्हेल[4] की तरह विशाल हैं। क्या वे नहीं जानते कि वे खुद बहुत छोटे हैं, और उनके माता-पिता उनसे सैकड़ों लाखों गुना बड़े गंदे सूअर और कुत्ते हैं? अपनी नीचता से अनजान वे उपद्रव करने के लिए उन सूअरों और कुत्तों द्वारा छोड़ी गई सड़न की बदबू पर भरोसा करते हैं और शर्मिंदगी से बेखबर वे व्यर्थ ही भविष्य की पीढ़ियों को पैदा करने के बारे में सोचते हैं! अपनी पीठ पर हरे पंख लगाए (जो उनके परमेश्वर पर विश्वास करने के दावे का सूचक है), वे आत्मतुष्ट हैं और हर जगह अपनी सुंदरता और आकर्षण की डींग हाँकते हैं, जबकि वे चुपके से अपने शरीर की गंदगी को मनुष्य पर फेंक देते हैं। इतना ही नहीं, वे स्वयं से अत्यधिक प्रसन्न होते हैं, मानो वे इंद्रधनुषी रंगों वाले एक जोड़ी पंखों से अपनी गंदगी छिपा सकते हों और इसी तरह वे सच्चे परमेश्वर के अस्तित्व का विरोध करते हैं (यह धार्मिक दुनिया में परदे के पीछे चलने वाली हकीकत को दर्शाता है)। मनुष्य को कैसे पता चलेगा कि मक्खी के पंख कितने भी खूबसूरत और आकर्षक हों, मक्खी एक अत्यंत छोटे प्राणी से बढ़कर कुछ नहीं है, जिसका पेट गंदगी से भरा हुआ और शरीर रोगाणुओं से ढका हुआ है? अपने माता-पिता रूपी सूअर और कुत्तों के बल पर वे देश-भर में उपद्रव करते हैं (यह उस तरीके को संदर्भित करता है, जिससे परमेश्वर को सताने वाले धार्मिक अधिकारी सच्चे परमेश्वर और सत्य से विश्वासघात करने के लिए राष्ट्र की सरकार से मिले मजबूत समर्थन पर भरोसा करते हैं), बेलगाम हैवानियत के साथ। ऐसा लगता है, मानो यहूदी फरीसियों के भूत परमेश्वर के साथ बड़े लाल अजगर के देश में, अपने पुराने घोंसले में लौट आए हों। उन्होंने हजारों साल पहले का अपना काम फिर करते हुए उत्पीड़न का दूसरा दौर शुरू कर दिया है। पतितों के इस समूह का अंततः पृथ्वी पर नष्ट हो जाना निश्चित है! ऐसा प्रतीत होता है कि कई सहस्राब्दियों के बाद अशुद्ध आत्माएँ और भी चालाक और धूर्त हो गई हैं। वे गुप्त रूप से लगातार परमेश्वर के काम को बर्बाद करना चाहती हैं। उनके पास प्रचुर छल-कपट है और वे अपनी मातृभूमि में कई हजार साल पहले की त्रासदी की पुनरावृत्ति करना चाहती हैं और परमेश्वर को लगभग पुकार उठने के कगार तक भड़काती हैं। परमेश्वर उन्हें नष्ट करने के लिए तीसरे स्वर्ग में लौट जाने से खुद को मुश्किल से रोक पाता है। परमेश्वर से प्रेम करने के लिए मनुष्य को उसके इरादे समझने चाहिए, उसके सुख-दुःख जानने चाहिए, और यह समझना चाहिए कि वह किस चीज से घृणा करता है। ऐसा करने से मनुष्य के प्रवेश में और तेज़ी आएगी। मनुष्य का प्रवेश जितनी तेजी से होगा, उतने ही अधिक परमेश्वर के इरादे पूरे होंगे; और उतना ही मनुष्य दानवों के राजा की असलियत जान जाएगा और उतना ही वह परमेश्वर के नजदीक आएगा, ताकि उसकी इच्छा फलित हो सके।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (7)
फुटनोट :
1. “निगल” जाना दानवों के राजा के क्रूर व्यवहार के बारे में बताता है, जो लोगों को पूरी तरह से काबू में कर लेता है।
2. “सहअपराधियों का गिरोह” का वही अर्थ है, जो “खलनायकों के समूह” का है।
3. “हर तरह का उपद्रव भड़काते” का मतलब है कि कैसे वे लोग, जो दानवों के होते हैं, दंगा फैलाते हैं और परमेश्वर के कार्य को बाधित करते हैं तथा उसका विरोध करते हैं।
4. “नीली व्हेल” का इस्तेमाल उपहास के रूप में किया गया है। यह एक रूपक है, जो बताता है कि कैसे मक्खियाँ इतनी छोटी होती हैं कि सूअर और कुत्ते भी उन्हें व्हेल की तरह विशाल नज़र आते हैं।
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 312
यह भूमि जो हजारों सालों से मलिन रही है, असहनीय रूप से गंदी और असीम दुःखों से भरी हुई है, प्रेत यहाँ हर जगह बेकाबू दौड़ते हैं, चालें चलते हैं और धोखा देते हैं, निराधार आरोप लगाते हैं,[1] निर्दयी ढंग से क्रूर तरीके अपनाते हैं, इस भुतहा शहर को कुचलते हैं और इसे लाशों से पाटते हैं; सड़ांध जमीन पर छा जाती है और हवा में व्याप्त हो जाती है, और इस पर जबर्दस्त पहरेदारी[2] है। आसमान से परे की दुनिया कौन देख सकता है? दानव मनुष्य के पूरे शरीर को कसकर बांध देता है, उसकी दोनों आँखों पर पर्दा डाल देता है, उसके होंठों को मजबूती से बंद कर देता है। दानवों के राजा ने हजारों वर्षों तक उपद्रव किया है, और आज भी वह उपद्रव कर रहा है और इस भुतहा शहर पर बारीकी से नज़र रखे हुए है, मानो यह राक्षसों का एक अभेद्य महल हो; इस बीच रक्षक कुत्तों का यह झुंड बेहद गुस्सैल नजरों से घूरता है, वे इस बात से अत्यंत भयभीत रहते हैं कि कहीं परमेश्वर अचानक उन्हें पकड़कर समाप्त न कर दे, उन्हें सुख-शांति के स्थान से वंचित न कर दे। ऐसे भुतहा शहर के लोग परमेश्वर को कैसे देख सके होंगे? क्या वे कभी परमेश्वर की प्रियता और मनोहरता का आनंद ले सके होंगे? क्या वे कभी मानव-जगत के मामलों को समझ सकते हैं? उनमें से कौन परमेश्वर के उत्कट इरादों को समझ सकता है? फिर, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि देहधारी परमेश्वर पूरी तरह से छिपा रहता है : इस तरह के अंधकारमय समाज में, जहाँ राक्षस बेरहम और अमानवीय हैं, लोगों को निर्दयतापूर्वक मार डालने वाला दानवों का सरदार ऐसे परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकता है जो सुंदर, दयालु और पवित्र भी है? वह परमेश्वर के आगमन की सराहना और जय-जयकार कैसे कर सकता है? ये अनुचर! ये दया का प्रतिफल घृणा से चुकाते हैं, लंबे समय पहले ही ये परमेश्वर के साथ शत्रु की तरह पेश आने लगे थे, ये परमेश्वर का उत्पीड़न करते हैं, बेहद बर्बर हैं, इनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी सम्मान नहीं है, वे हमला करते हैं और लूटते हैं, वे सारी अंतरात्मा खो चुके हैं, वे अंतरात्मा के विरुद्ध कार्य करते हैं और निर्दोषों को ललचाकर उन्हें संवेदनशून्यता की अवस्था में पहुँचा देते हैं। प्राचीन संतों के कौन-से उत्तराधिकारी? कौन-से प्रिय अगुआ? वे सब के सब नीच हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे की हर चीज को अँधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! कौन-सी धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के कौन-से वैध अधिकार और हित? ये सब बुराई को छिपाने की चालें हैं! किसने परमेश्वर के कार्य को अंगीकार किया है? किसने परमेश्वर के कार्य के लिए अपना जीवन अर्पित किया है या रक्त बहाया है? मनुष्य जो पीढ़ियों से माता-पिता से लेकर बच्चों तक एक अखंड क्रम में गुलाम रहे हैं, उन्होंने परमेश्वर को बेझिझक गुलाम बना लिया है—ऐसा कैसे हो सकता है कि इससे रोष न भड़के? दिल में हजारों वर्ष की घृणा भरी हुई है, हजारों साल का पाप दिल पर अंकित है—इससे कैसे न घृणा पैदा होगी? परमेश्वर का बदला लो, उसके शत्रु को पूरी तरह से समाप्त कर दो, उसे अब और बेकाबू न दौड़ने दो, और उसे अत्याचारी के रूप में शासन मत करने दो! यही समय है : मनुष्य बहुत पहले अपनी सभी शक्ति जुटा चुका है और वह इसके लिए अपने हृदय का सारा रक्त अर्पित करेगा और हर मूल्य चुकाएगा, ताकि वह इस दानव के घृणित चेहरे से नकाब उतार सके और जो लोग अंधे हो गए हैं, जिन्होंने हर प्रकार की पीड़ा और कठिनाई सही है, उन्हें अपनी पीड़ा से उबरने और इस दुष्ट बूढ़े दानव से विद्रोह करने दे। परमेश्वर के कार्य को इतनी पूरी तरह क्यों बाधित करना? परमेश्वर के लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न चालें क्यों चलना? वास्तविक स्वतंत्रता और वैध अधिकार एवं हित कहाँ हैं? निष्पक्षता कहाँ है? आराम कहाँ है? गर्मजोशी कहाँ है? परमेश्वर के जनों को छलने के लिए धोखे भरी चालों का उपयोग क्यों करना? परमेश्वर के आगमन को दबाने के लिए बल का इस्तेमाल क्यों करना? क्यों नहीं परमेश्वर को उस धरती पर स्वतंत्रता से घूमने दिया जाए जिसे उसने बनाया? क्यों परमेश्वर को इस हद तक खदेड़ा जाए कि उसके पास सिर रखने के लिए जगह भी न रहे? मनुष्यों की गर्मजोशी कहाँ है? लोगों के बीच उसका स्वागत कहाँ है? परमेश्वर में ऐसी तड़प क्यों पैदा की जाए? परमेश्वर को बार-बार पुकारने पर मजबूर क्यों किया जाए? परमेश्वर को उस बिंदु तक क्यों धकेल दिया जाए कि उसे अपने प्रिय पुत्र के लिए चिंता करनी पड़े? यह समाज इतना अंधकारपूर्ण है—इसके घिनौने रक्षक कुत्ते परमेश्वर को उस दुनिया में स्वतंत्रतापूर्वक आने-जाने क्यों नहीं देते जो उसने बनाई है? दुख-दर्द में रहने वाला इंसान यह सब क्यों नहीं समझता? तुम लोगों के लिए परमेश्वर ने बहुत यातना सही है, और अत्यंत पीड़ा के साथ अपना प्यारा पुत्र, अपना देह और रक्त तुम लोगों को सौंपा है—तो फिर तुम लोग अभी भी उससे नजरें क्यों फेर लेते हो? हर किसी के सामने तुम लोग परमेश्वर के आगमन को अस्वीकार कर देते हो, और परमेश्वर की दोस्ती को नकार देते हो। तुम लोग इतने अंतरात्मा विहीन क्यों हो? क्या तुम लोग ऐसे अंधकारपूर्ण समाज में अन्याय सहन करना चाहते हो? तुम अपने आपको हजारों साल की घृणा से भरने के बजाय दानवों के सरदार के “मल” से भर लेते हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (8)
फुटनोट :
1. “निराधार आरोप लगाते हैं” उन तरीकों को संदर्भित करता है, जिनके द्वारा शैतान लोगों को नुकसान पहुँचाता है।
2. “जबर्दस्त पहरेदारी” दर्शाता है कि वे तरीके, जिनके द्वारा शैतान लोगों को बुरी तरीके से नुकसान पहुँचाता है, बहुत ही क्रूर होते हैं और लोगों को इतना नियंत्रित करते हैं कि उन्हें हिलने-डुलने की भी जगह नहीं मिलती।
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 313
यदि लोग वास्तव में मानव-जीवन के सही मार्ग को और साथ ही परमेश्वर के मानव-जाति के प्रबंधन के उद्देश्य को पूरी तरह से समझ सकें, तो वे अपनी व्यक्तिगत संभावनाओं और नियति को एक खजाने के रूप में अपने दिलों में थामे नहीं रहेंगे। तब वे अपने उन माता-पिता की सेवा करने में और दिलचस्पी नहीं रखेंगे, जो सूअरों और कुत्तों से भी बदतर हैं। क्या मनुष्य की संभावनाएँ और भाग्य ठीक वर्तमान समय के पतरस के तथाकथित “माता-पिता” नहीं हैं? वे मनुष्य के मांस और रक्त की तरह हैं। देह का गंतव्य और भविष्य भला क्या होगा? क्या वह जीते-जी परमेश्वर का दर्शन करना होगा, या मृत्यु के बाद आत्मा का परमेश्वर से मिलना? क्या कल देह क्लेशों की एक बड़ी भट्ठी में होगी, या भीषण आग में? क्या ये और इससे संबंधित ऐसे ही प्रश्न कि क्या मनुष्य की देह संकट का सामना करेगी या पीड़ा झेलेगी, वो बड़ी खबर नहीं हैं जिसे लेकर वर्तमान धारा में कोई भी व्यक्ति, जिसके पास दिमाग और विवेक है, सबसे ज्यादा चिंतित है? (यहाँ “पीड़ा” आशीष पाने से संबंध रखती है; इसका अर्थ है कि भविष्य के परीक्षण मनुष्य के गंतव्य के लिए लाभदायक हैं। संकट का मतलब है दृढ़ता से खड़ा न रह पाना या गुमराह होना; या इसका मतलब है व्यक्ति को दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियाँ मिलेंगी और वह आपदाओं के बीच अपना जीवन गँवा देगा, और कि व्यक्ति की आत्मा के लिए कोई उपयुक्त गंतव्य नहीं है।) यद्यपि मनुष्यों के पास ठोस विवेक है, लेकिन संभवतः वे जो सोचते हैं, वह उससे पूरी तरह मेल नहीं खाता, जिससे उनका विवेक सुसज्जित होना चाहिए। इसका कारण यह है कि वे सब अपेक्षाकृत भ्रमित हैं और आँख मूँदकर चीजों का अनुसरण करते हैं। उन सभी को इस बात की पूरी समझ होनी चाहिए कि उन्हें किस चीज में प्रवेश करना चाहिए, और विशेष रूप से, उन्हें यह पता लगाना चाहिए कि क्लेश के दौरान किस चीज में प्रवेश किया जाना चाहिए (यानी, भट्ठी में शोधन के दौरान), और साथ ही, उन्हें अग्नि-परीक्षणों के दौरान किस-किस चीज से लैस होना चाहिए। हमेशा अपने माता-पिता (अर्थात देह) की सेवा न करो, जो सूअरों और कुत्तों की तरह हैं, और चींटियों और कीड़ों से भी बदतर हैं। इस पर चिंता करते हुए बहुत सोचने, इतना सोच-विचार करने और अपने दिमाग को परेशान करने से क्या फायदा? यह देह तेरी अपनी नहीं है, बल्कि यह परमेश्वर के हाथों में है, जो न केवल तुझे नियंत्रित करता है, बल्कि शैतान को भी आज्ञा देता है। (मूलतः इसका अर्थ है कि यह देह मूलतः शैतान की है। चूँकि शैतान भी परमेश्वर के हाथों में है, इसलिए इसे केवल इसी तरह से कहा जा सकता है। इसका कारण यह है कि इसे इस तरह से कहना अधिक मना लेने वाला है; यह बताता है कि मानव पूरी तरह से शैतान की सत्ता के अधीन नहीं, बल्कि परमेश्वर के हाथों में है।) तू देह के उत्पीड़न तले जी रहा है, लेकिन क्या देह तेरी है? क्या यह तेरे नियंत्रण में है? इसे लेकर अपने दिमाग के घोड़े क्यों दौड़ाता है? क्यों जिद्द करते हुए अपनी बदबूदार देह के लिए, जो लंबे समय से निंदित, शापित और अशुद्ध आत्माओं द्वारा मलिन की गई है, परमेश्वर से याचना करने की परेशानी उठाता है? शैतान के सहयोगियों को हमेशा अपने दिल के इतने करीब रखने की क्या जरूरत है? क्या तुझे चिंता नहीं है कि देह तेरे वास्तविक भविष्य को, तेरी अद्भुत आशाओं को और तेरे जीवन के वास्तविक गंतव्य को बरबाद कर सकती है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मानव-जाति के प्रबंधन का उद्देश्य
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 314
आज तुम लोगों ने जो समझा है, वह पूरे इतिहास में ऐसे किसी भी व्यक्ति से ऊँचा है, जिसे पूर्ण नहीं बनाया गया था। चाहे तुम लोगों का परीक्षणों का ज्ञान हो या परमेश्वर में आस्था, यह परमेश्वर के किसी भी विश्वासी के ज्ञान या आस्था से अधिक ऊँचा है। जिन चीजों को तुम लोग समझते हो, ये वे हैं, जिन्हें तुम लोग परिवेशों के परीक्षणों से गुजरने से पहले जान गए हो, लेकिन वे तुम लोगों के वास्तविक आध्यात्मिक कद से बिल्कुल भी मेल नहीं खाती हैं। तुम लोग जो जानते हो, वह उससे अधिक है, जिसे तुम लोग अभ्यास में लाते हो। यद्यपि तुम लोग कहते हो कि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, और आशीषों की खोज नहीं बल्कि केवल परमेश्वर के इरादे पूरे करने का प्रयास करना चाहिए, किंतु जो तुम्हारे जीवन में अभिव्यक्त होता है, वह इससे एकदम अलग है, और बहुत दूषित हो गया है। अधिकतर लोग शांति और अन्य लाभों के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। जब तक तुम्हारे लिए लाभप्रद न हो, तब तक तुम परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, और यदि तुम परमेश्वर के अनुग्रह प्राप्त नहीं कर पाते, तो तुम खीज जाते हो। तुमने जो कहा, वो तुम्हारा असली आध्यात्मिक कद कैसे हो सकता है? जब अनिवार्य पारिवारिक घटनाओं, जैसे कि बच्चों का बीमार पड़ना, प्रियजनों का अस्पताल में भर्ती होना, फसल की ख़राब पैदावार, और परिवार के सदस्यों द्वारा उत्पीड़न की बात आती है, तो इन अक्सर घटित होने वाले रोज़मर्रा के मामलों से निपटना भी तुम्हारे लिए मुश्किल हो जाता है। जब ऐसी चीजें घटित होती हैं, तो तुम हमेशा दहशत में आ जाते हो, तुम नहीं जानते कि क्या करना है—और अधिकांश समय तुम परमेश्वर से शिकायत करते हो। तुम शिकायत करते हो कि परमेश्वर के वचनों ने तुमको धोखा दिया है, परमेश्वर के कार्य ने तुम्हारे साथ खिलवाड़ किया है। क्या तुम लोगों के ऐसे ही विचार नहीं हैं? क्या तुम्हें लगता है कि ऐसी चीजें कभी-कभार ही तुम लोगों के बीच में होती हैं? तुम लोग हर दिन इसी तरह की घटनाओं के बीच रहते हुए बिताते हो। तुम परमेश्वर में अपने विश्वास में कैसे सफल हो सकते हो, इस बारे में ज़रा भी विचार नहीं करते और न ही इस बारे में विचार करते हो कि परमेश्वर के इरादे कैसे पूरे करें। तुम लोगों का असली आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, यहाँ तक कि नन्हे चूज़े से भी छोटा। जब तुम्हारे पारिवारिक व्यवसाय में नुकसान होता है, तो तुम परमेश्वर से शिकायत करते हो, जब तुम लोग स्वयं को परमेश्वर की सुरक्षा से रहित किसी परिवेश में पाते हो, तब भी तुम परमेश्वर से शिकायत करते हो, यहाँ तक कि तुम तब भी शिकायत करते हो, जब तुम्हारे चूज़े मर जाते हैं या तुम्हारी बूढ़ी गाय बाड़े में बीमार पड़ जाती है। तुम तब शिकायत करते हो, जब तुम्हारे बेटे का शादी करने का समय आता है, लेकिन तुम्हारे परिवार के पास पर्याप्त धन नहीं होता; तुम मेज़बानी का कर्तव्य करना चाहते हो, लेकिन तुम्हारे पास पैसे नहीं होते, तब भी तुम शिकायत करते हो। तुम शिकायतों से लबालब भरे हो, और इस वजह से कभी-कभी सभाओं में भी नहीं जाते या परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते भी नहीं हो, और न जाने कितने लंबे समय तक नकारात्मक बने रहते हो। आज तुम्हारे साथ जो कुछ भी होता है, उसका तुम्हारी संभावनाओं या भाग्य से कोई संबंध नहीं होता; ये चीजें तब भी होतीं, जब तुम परमेश्वर पर विश्वास न करते, मगर आज तुम उनका उत्तरदायित्व परमेश्वर पर डाल देते हो और जोर देकर कहते हो कि परमेश्वर ने तुम्हें हटा दिया है। परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास कैसा है? क्या तुमने अपना जीवन सचमुच अर्पित किया है? यदि तुम लोगों ने अय्यूब के समान परीक्षणों का सामना किया होता, तो आज परमेश्वर का अनुसरण करने वाले तुम लोगों में से कोई भी अडिग न रह पाता, तुम सभी लोग नीचे गिर जाते। और, निस्संदेह, तुम लोगों और अय्यूब के बीच ज़मीन-आसमान का अंतर है। आज यदि तुम लोगों की आधी संपत्ति जब्त कर ली जाए, तो तुम लोग परमेश्वर के अस्तित्व को नकारने की हिम्मत कर लोगे; यदि तुम्हारा बेटा या बेटी तुमसे छीन ली जाए, तो तुम कोसते हुए सड़कों पर निकल पड़ोगे; यदि आजीविका कमाने का तुम लोगों का एकमात्र रास्ता बंद हो जाए, तो तुम लोग परमेश्वर से उसके बारे में हिसाब माँगने लगोगे; तुम लोग पूछोगे कि मैंने तुम लोगों को डराने के लिए शुरुआत में इतने सारे वचन क्यों कहे। ऐसा कुछ नहीं है, जिसे तुम लोग ऐसे समय में करने की हिम्मत न करो। इससे यह स्पष्ट है कि तुम लोगों के पास कोई सच्ची अंतर्दृष्टि नहीं है और न ही कोई सच्चा आध्यात्मिक कद है। इसलिए, तुम लोगों पर जो परीक्षण हैं वे बहुत बड़े हैं, क्योंकि तुम लोग बहुत अधिक जानते हो, लेकिन तुम लोग जो वास्तव में समझते हो वह तुम लोगों की जानकारी का हजारवाँ हिस्सा भी नहीं है। तुम लोगों को स्वयं को केवल जानने और समझने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसके बजाय, तुम लोगों के लिए यह देखना सबसे अच्छा होगा कि तुम लोगों ने वास्तव में कितने सत्यों को अभ्यास में लाया है, जिन सत्यों को तुम लोग जानते हो उनमें से किनका तुम लोगों को अभी अभ्यास करना बाकी है, पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी के कौन-से हिस्से तुम लोगों ने अपनी कड़ी मेहनत के पसीने से प्राप्त किए हैं, क्या सत्य का अनुसरण करने का तुम्हारा संकल्प पूरा हो गया है, पूर्ण बनाए जाने के अपने अनुसरण में तुम कितनी दूर पहुँच गए हो और क्या शैतान के प्रलोभनों पर विजय पाने के लिए तुम्हारे पास सच्चा आध्यात्मिक कद है। तुम्हें अपने असल आध्यात्मिक कद और जो गवाही तुम्हें देनी चाहिए, उनके संबंध में पूरी गंभीरता और ईमानदारी से प्रयास करना चाहिए और उसके लिए कीमत चुकानी चाहिए। परमेश्वर में विश्वास करते हुए, इस बारे में मत सोचो कि तुम कौन-से आशीष प्राप्त कर सकते हो या भविष्य में तुम किस चीज का आनंद ले सकते हो। अंततः, क्या तुम सत्य प्राप्त कर सकते हो और जीवन प्राप्त कर सकते हो, यह सब तुम्हारे व्यक्तिगत अनुसरण पर निर्भर करता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (3)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 315
कुछ लोग अपने बाहरी स्वरूप के मामले में खूबसूरती से सज-धज कर रहते हैं : बहनें अपने आपको फूलों की तरह सँवारती हैं और भाई राजकुमारों या अमीर छबीले नौजवानों की तरह कपड़े पहनते हैं। वे केवल बाहरी खान-पान और कपड़ों की परवाह करते हैं; लेकिन अंदर से वे कंगाल होते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज़रा-सा भी ज्ञान नहीं होता। इसके क्या मायने हो सकते हैं? और कुछ तो ऐसे हैं जो भिखारियों की तरह कपड़े पहनते हैं—वे वाकई पूर्वी एशिया के गुलाम लगते हैं! क्या तुम लोगों को सचमुच नहीं पता कि मैं तुम लोगों से क्या अपेक्षा करता हूँ? आपस में संगति करो : तुम लोगों ने वास्तव में क्या पाया है? तुम लोगों ने इतने सालों तक परमेश्वर में आस्था रखी है, फिर भी तुम लोगों ने इतना ही प्राप्त किया है—क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती? क्या तुम लज्जित महसूस नहीं करते? इतने सालों से तुम सत्य मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहे हो, फिर भी आज तुम्हारा आध्यात्मिक कद गौरैये से भी छोटा है! अपने मध्य राजकुमारी किस्म की महिलाओं को देखो, कपड़ों और मेकअप में तुम बहुत ही सुंदर दिखती हो, एक-दूसरे से अपनी तुलना करती हो—और तुलना क्या करती हो? अपनी मौज-मस्ती की? अपनी माँगों की? क्या तुम्हें यह लगता है कि मैं मॉडल भर्ती करने आया हूँ? तुम में ज़रा भी शर्म नहीं है! तुम लोगों का जीवन कहाँ है? जिन चीज़ों के पीछे तुम लोग भाग रही हो, क्या वे तुम्हारी असंयमित इच्छाएँ नहीं हैं? तुम्हें लगता है कि तुम बहुत सुंदर हो, लेकिन भले ही तुम बहुत सजी-सँवरी हो, क्या तुम अभी भी गोबर के ढेर में जन्मा कुलबुलाता कीड़ा नहीं हो? आज खुशकिस्मती से तुम जिस स्वर्गिक आशीष का आनंद ले रही हो, वह तुम्हारे सुंदर चेहरे के कारण नहीं है, बल्कि परमेश्वर अपवाद स्वरूप तुम्हें ऊपर उठा रहा है। क्या यह तुम्हें अब भी स्पष्ट नहीं हुआ कि तुम कहाँ से आई हो? जीवन का उल्लेख होने पर, तुम अपना मुँह बंद कर लेती हो और कुछ नहीं बोलती, बुत की तरह गूँगी बन जाती हो, फिर भी तुम सजने-सँवरने की जुर्रत करती हो! फिर भी तुम्हारा मन अपने चेहरे पर लाली और पाउडर लगाने का करता है! और तुम लोगों के बीच के छैलों को देखो—वे एकदम अभद्र हैं। वे अपने चेहरों पर बेपरवाह भाव लिए दिनभर मटरगश्ती करते रहते हैं—वे जहाँ भी जाते हैं, उनमें मर्यादा की ज़रा-सी भी समझ नहीं होती। क्या वे मानव के समान हैं? तुम लोगों में से हर एक आदमी और औरत का ध्यान दिनभर कहाँ रहता है? क्या तुम लोगों को पता है कि तुम लोग अपने भरण-पोषण के लिए किस पर निर्भर हो? अपने कपड़े देखो, देखो तुम्हारे हाथों ने क्या प्राप्त किया है, अपने पेट पर हाथ फेरो—इतने बरसों में तुमने अपनी आस्था में जो दिल का खून बहाया है, उससे तुमने क्या नतीजे हासिल किए हैं? तुम अब भी पर्यटन-स्थल के बारे में सोचते हो, अपनी बदबूदार देह को सजाने-सँवारने की सोचते हो—यह सब निरर्थक है! तुमसे सामान्य इंसान बनने के लिए कहा जाता है, फिर भी अभी तुम असामान्य हो, यही नहीं तुम विरूपित भी हो। ऐसा व्यक्ति मेरे सामने आने की धृष्टता कैसे कर सकता है? इस तरह की मानवता के साथ, तुम्हारा अपनी सुंदरता का प्रदर्शन करना, देह पर इतराना और हमेशा देह की वासनाओं में जीना—क्या तुम घिनौने राक्षसों और दुष्ट आत्माओं के वंशज नहीं हो? मैं ऐसे घिनौने राक्षसों को लंबे समय तक अस्तित्व में नहीं रहने दूँगा! ऐसा मानकर मत चलो कि मुझे पता ही नहीं कि तुम दिल में क्या सोचते हो। ऐसा हो सकता है कि तुम अपनी वासना और देह को खुला न छोड़ो, लेकिन तुम्हारे दिल में जो विचार हैं, उन्हें मैं कैसे न जानूँगा? तुम्हारी आँखों की सारी ख्वाहिशों को मैं कैसे न जानूँगा? क्या तुम राजकुमारी किस्म की युवतियाँ अपनी देह का प्रदर्शन करने के लिए अपने आपको इतना सुंदर नहीं बनाती हो? पुरुषों से तुम्हें क्या लाभ होगा? क्या वे तुम लोगों को अथाह पीड़ा से बचा सकते हैं? जहाँ तक तुम लोगों में छबीले नौजवानों की बात है, तुम सब अपने आपको सभ्य और शालीन दिखाने के लिए सजते-सँवरते हो, लेकिन क्या यह तुम्हारी सुंदरता पर ध्यान ले जाने के लिए नहीं किया गया है? तुम लोग यह किसके लिए कर रहे हो? महिलाओं से तुम लोगों को क्या फायदा होगा? क्या वे तुम लोगों के पापों का मूल नहीं हैं? मैंने तुम सभी स्त्री-पुरुषों से बहुत-सी बातें कही हैं, लेकिन तुम लोगों ने उनमें से कुछ का ही पालन किया है। तुम लोग बहुत कम सुन पाते हो, तुम लोगों की आँखें कमजोर पड़ चुकी हैं, तुम्हारे दिल इस हद तक दुराग्रही हैं कि तुम्हारे जिस्मों में वासना के अलावा कुछ नहीं है और तुम लोग इसके चँगुल में फँस गए हो और अब निकल नहीं सकते। गंदगी और मैल में छटपटाते तुम जैसे कीड़ों के इर्द-गिर्द कौन आना चाहता है? मत भूलो कि तुम्हारी औकात उनसे ज़्यादा कुछ नहीं है जिन्हें मैंने गोबर के ढेर से निकाला है, तुममें मूलतः सामान्य मानवता नहीं थी। मैं तुम लोगों से उस सामान्य मानवता की अपेक्षा करता हूँ जो मूलतः तुम्हारे अंदर नहीं थी, इसकी नहीं कि तुम अपनी वासना की नुमाइश करो या अपनी दुर्गंध-युक्त देह को बेलगाम छोड़ दो, जिसे बरसों तक दानवों ने प्रशिक्षित किया है। जब तुम लोग इस तरह सजते-सँवरते हो, तो क्या तुम्हें डर नहीं लगता कि तुम इसमें और गहरे फँस जाओगे? क्या तुम लोगों को पता नहीं कि तुम लोग मूलतः पाप के हो? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों की देह वासना से भरी है? बात इस हद तक पहुँच गई है कि तुम लोगों के कपड़ों से भी वासना झलकती है, जो घिनौने राक्षसों के रूप में तुम लोगों के बेहद भद्दे स्वरूप को प्रकट करती है। क्या ऐसा नहीं है कि तुम लोग यह सब किसी भी अन्य व्यक्ति से अधिक स्पष्ट रूप से जानते हो? क्या तुम लोगों के दिलों को, तुम लोगों की आँखों को, तुम लोगों के होठों को घिनौने राक्षसों ने गंदा नहीं कर दिया है? क्या तुम्हारे ये अंग घिनौने नहीं हैं? क्या तुम लोगों को लगता है कि जब तक तुम कुछ नहीं करते, तब तक तुम सर्वाधिक पवित्र हो? क्या तुम लोगों को लगता है कि भड़कीले वस्त्रों में सजने-सँवरने से तुम्हारी गंदी आत्माएँ छिप जाएँगी? ऐसा नहीं होगा! मेरी सलाह है कि अधिक यथार्थवादी बनो, कपटी और नकली मत बनो और अपनी आकर्षक चीजों की नुमाइश मत करो। तुम लोग अपनी वासना को लेकर एक-दूसरे के सामने शान बघारते हो, लेकिन बदले में तुम लोगों को अनंत यातनाएँ और निर्मम ताड़ना ही मिलेगी! तुम लोगों को एक-दूसरे से आँखें लड़ाने और रोमाँस में लिप्त रहने की क्या आवश्यकता है? क्या यह तुम लोगों की सत्यनिष्ठा है? क्या यह तुम लोगों की अडिग सत्यनिष्ठा है? मुझे तुम लोगों में से उनसे बेइंतहा नफरत है जो बुरी औषधि और जादू-टोने में लिप्त रहते हैं; मुझे तुम लोगों में से उन नौजवान लड़के-लड़कियों से नफरत है जिन्हें अपने शरीर से लगाव है। बेहतर होगा अगर तुम लोग स्वयं पर नियंत्रण रखो, क्योंकि अब आवश्यक है कि तुम्हारे अंदर सामान्य मानवता हो, तुम लोगों को अपनी वासना की नुमाइश करने की अनुमति नहीं दी गई है—लेकिन फिर भी तुम लोग हाथ से कोई मौका जाने नहीं देते हो, क्योंकि तुममें अत्यधिक दैहिक भ्रष्टता है और तुम्हारी वासना बहुत प्रचंड है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (7)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 316
अब तुम लोगों का प्रयास प्रभावी रहा है या नहीं, यह इस बात से मापा जाता है कि इस समय तुम लोगों के अंदर क्या है। तुम लोगों के परिणाम का निर्धारण करने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है; कहने का अर्थ है कि तुम लोगों ने जो भी त्याग किए हैं और जो कुछ काम किए हैं, उनके आधार पर तुम लोगों के परिणाम का खुलासा किया जाता है। तुम लोगों के अनुसरण से, तुम लोगों की आस्था से और तुम लोगों ने जो कुछ किया है उनसे, तुम लोगों के परिणाम का खुलासा किया जा सकता है। तुम लोगों में, बहुत-से ऐसे हैं जो पहले ही उद्धार से परे हो चुके हैं, क्योंकि आज का दिन लोगों के परिणाम को उजागर करने का दिन है, और मैं अपने काम में भ्रमित नहीं रहूँगा; मैं अगले युग में उन लोगों को नहीं ले जाऊँगा जो पूरी तरह से उद्धार से परे हैं। एक समय आएगा, जब मेरा कार्य पूरा हो जाएगा। मैं उन दुर्गंधयुक्त, बेजान लाशों पर कार्य नहीं करूँगा जिन्हें बिल्कुल भी बचाया नहीं जा सकता; अब इंसान के उद्धार के अंतिम दिन हैं, और मैं निरर्थक कार्य नहीं करूँगा। स्वर्ग और धरती के बारे में शिकायत मत करो—दुनिया का अंत आ रहा है, यह अपरिहार्य है। चीजें इस मुकाम तक आ गयी हैं, और उन्हें रोकने के लिए तुम इंसान के तौर पर कुछ नहीं कर सकते; तुम अपनी इच्छानुसार चीजों को बदल नहीं सकते। कल, तुमने सत्य का अनुसरण करने के लिए कीमत अदा नहीं की थी और तुम समर्पित नहीं थे; आज, समय आ चुका है, तुम उद्धार से परे हो; और कल तुम्हें निकाल दिया जाएगा, और तुम्हारे उद्धार की कोई गुंजाइश नहीं होगी। भले ही मैं दयालु और कोमल हृदय वाला हूँ और मैं तुम्हें बचाने के लिए सब कुछ कर रहा हूँ, अगर तुम अपने स्तर पर प्रयास नहीं करते या अपने लिए विचार नहीं करते, तो इसका मुझसे क्या लेना-देना? जो लोग केवल अपने देह-सुख की सोचते हैं और सुख-साधनों का आनंद लेते हैं; जो विश्वास रखते हुए प्रतीत होते हैं लेकिन सचमुच विश्वास नहीं रखते; जो दानवी चिकित्सा प्रथाओं और जादू-टोने में लिप्त रहते हैं; जो व्यभिचारी और पतित हैं; जो यहोवा के चढ़ावे और उसकी संपत्ति को चुराते हैं; जिन्हें रिश्वत पसंद है; जो व्यर्थ में स्वर्गारोहित होने के सपने देखते हैं; जो अहंकारी और दंभी हैं, जो केवल व्यक्तिगत प्रसिद्धि और लाभ के लिए होड़ करते हैं; जो अवमाननापूर्ण शब्दों को फैलाते हैं; जो स्वयं परमेश्वर की निंदा करते हैं; जो स्वयं परमेश्वर की आलोचना और बुराई करने के अलावा कुछ नहीं करते; जो अपना अलग गुट बनाते हैं और परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते हैं; जो परमेश्वर का उत्कर्ष करने से कहीं अधिक खुद का उत्कर्ष करते हैं; वे छिछोरे नौजवान, अधेड़ उम्र के लोग और बुज़ुर्ग स्त्री-पुरुष जो व्यभिचार में फँसे हुए हैं; जो स्त्री-पुरुष व्यक्तिगत प्रसिद्धि और लाभ का आनंद लेते हैं और लोगों के बीच निजी रुतबा तलाशते हैं; जिन लोगों को कोई मलाल नहीं है और जो पाप में फँसे हुए हैं—क्या वे तमाम लोग उद्धार से परे नहीं हैं? व्यभिचार, पाप, दानवी चिकित्सा प्रथाएँ, जादू-टोना, ईशनिंदा वाले शब्द और अवमाननापूर्ण शब्द, सब तुम लोगों में निरंकुशता से फैल रहे हैं; सत्य और जीवन के वचन तुम लोगों के बीच कुचले जाते हैं और तुम लोगों के मध्य पवित्र शब्द मलिन किए जाते हैं। तुम मलिनता और विद्रोहशीलता से भरे हुए अन्य-जाति राष्ट्र के लोगों! तुम लोगों का परिणाम क्या होगा? जिन्हें देह-सुख से प्यार है, जो देह का जादू-टोना करते हैं, और जो व्यभिचार के पाप में फँसे हुए हैं, वे जीते रहने का दुस्साहस कैसे कर सकते हैं! क्या तुम नहीं जानते कि तुम जैसे लोग कीड़े-मकौड़े हैं जो उद्धार से परे हैं? किसी भी चीज की माँग करने का हक तुम्हें किसने दिया? आज तक, उन लोगों में जरा-सा भी परिवर्तन नहीं आया है जिन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, जो केवल देह से प्यार करते हैं—ऐसे लोगों को कैसे बचाया जा सकता है? जो जीवन के मार्ग से प्रेम नहीं करते, जो परमेश्वर का उत्कर्ष नहीं करते और उसकी गवाही नहीं देते, जो अपने रुतबे के लिए षडयंत्र रचते हैं, जो स्वयं का उत्कर्ष करते हैं—क्या वे आज भी वैसे ही नहीं हैं? उन्हें बचाने का क्या मूल्य है? तुम्हें बचाया जा सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं है कि तुम कितने वरिष्ठ हो या तुम कितने साल से काम कर रहे हो, और इस बात पर तो बिल्कुल भी निर्भर नहीं है कि तुमने कितनी योग्यताएँ हासिल कर ली हैं। बल्कि इस बात पर निर्भर है कि क्या तुम्हारा अनुसरण फलीभूत हुआ है। तुम्हें यह जानना चाहिए कि जिन्हें बचाया जाता है वे ऐसे “वृक्ष” होते हैं जिन पर फल लगते हैं, ऐसे वृक्ष नहीं जो हरी-भरी पत्तियों और फूलों से तो लदे होते हैं, लेकिन जिन पर फल नहीं आते। अगर तुम बरसों तक भी गलियों की खाक छानते रहे हो, तो उससे क्या फर्क पड़ता है? तुम्हारी गवाही कहाँ है? तुम्हारे पास खुद से प्रेम करने वाले और अपनी वासनायुक्त कामनाओं से भरे दिल की तुलना में परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बहुत कम है—क्या इस तरह का व्यक्ति पतित नहीं है? वे उद्धार के लिए नमूना और मॉडल कैसे हो सकते हैं? तुम्हारी प्रकृति सुधर नहीं सकती, तुम बहुत अधिक विद्रोहशीलता के अधीन हो, तुम छुटकारा पाने से परे हो! क्या ऐसे लोगों को हटा नहीं दिया जाएगा? क्या मेरे कार्य के समाप्त हो जाने का समय तुम्हारा अंत आने का समय नहीं है? मैंने तुम लोगों के बीच बहुत सारा कार्य किया है और बहुत सारे वचन बोले हैं—इनमें से कितने सच में तुम लोगों के कानों में गए हैं? इनमें से कितनों के प्रति तुम लोगों ने कभी समर्पण किया है? जब मेरा कार्य समाप्त होगा, तो यह वो समय होगा जब तुम मेरा विरोध करना बंद कर दोगे, तुम मेरे खिलाफ खड़ा होना बंद कर दोगे। जब मैं काम करता हूँ, तो तुम लोग लगातार मेरे खिलाफ काम करते रहते हो; तुम लोग कभी मेरे वचनों का अनुपालन नहीं करते। मैं अपना कार्य करता हूँ, और तुम अपना “काम” करते हो, और अपना छोटा-सा राज्य बनाते हो। तुम लोग लोमड़ियों और कुत्तों के झुंड हो, तुम लोग मेरे खिलाफ काम करने के अलावा कुछ नहीं करते हो! तुम लोग लगातार उन्हें अपने आगोश में लाने का प्रयास कर रहे हो जो तुम लोगों के प्रति अपना अविभक्त प्रेम समर्पित करते हैं—तुम लोगों के भय मानने वाले दिल कहाँ हैं? तुम्हारा हर काम कपट से भरा होता है! तुम्हारे अंदर न समर्पण है, न भय है, तुम्हारा हर काम कपटपूर्ण और ईश-निंदा करने वाला होता है! क्या ऐसे लोगों को बचाया जा सकता है? जो पुरुष यौन-संबंधों में अनैतिक और लंपट होते हैं, वे हमेशा कामोत्तेजक वेश्याओं को आकर्षित करके उनके साथ मौज-मस्ती करना चाहते हैं। मैं ऐसे काम-वासना में लिप्त अनैतिक राक्षसों को कतई नहीं बचाऊँगा। मैं तुम घिनौने राक्षसों से पूरी तरह घृणा करता हूँ, तुम्हारा व्यभिचार और तुम्हारी कामुक अदाएँ तुम लोगों को नरक में धकेल देंगे। तुम लोगों को अपने बारे में क्या कहना है? घिनौने राक्षसो और दुष्ट आत्माओ, तुम लोग बेहद घृणित हो! तुम बेहद घृणित हो! ऐसे कूड़े-करकट को कैसे बचाया जा सकता है? क्या ऐसे लोगों को जो पाप में फँसे हुए हैं, उन्हें अब भी बचाया जा सकता है? आज, तुम लोगों के दिल इस सत्य, इस मार्ग और इस जीवन की ओर आकर्षित नहीं होते हैं। बल्कि, वे पाप, और पैसे, रुतबे, प्रसिद्धि, लाभ, देह के सुखों, और पुरुषों के सौंदर्य और महिलाओं की कामुक अदाओं की ओर आकर्षित होते हैं। यह तुम लोगों को मेरे राज्य में प्रवेश करने के योग्य कैसे बनाता है? तुम लोगों की छवियाँ परमेश्वर की छवि से भी बड़ी हैं, तुम लोगों का रुतबा परमेश्वर के रुतबे से भी ऊँचा है, लोगों के बीच तुम लोगों की प्रतिष्ठा की तो बात ही छोड़ दो—तुम लोग वास्तव में ऐसी मूर्तियाँ बन गए हो जिनकी लोग आराधना करते हैं। क्या तुममें से हर एक प्रधान दूत नहीं बन गया है? जब लोगों के परिणामों का खुलासा किया जाता है, जो वह समय भी है जब उद्धार का कार्य समाप्ति के करीब होने लगेगा, तो तुम लोगों में से बहुत-से ऐसी लाश होंगे जो उद्धार से परे होंगे और जिन्हें हटा दिया जाना होगा। उद्धार-कार्य के दौरान, मैं सभी लोगों के प्रति दयालु और नेक होता हूँ। जब कार्य समाप्त होता है, तो अलग-अलग किस्म के लोगों का परिणाम प्रकट किया जाएगा, और उस समय, मैं दयालु और नेक नहीं रहूँगा, क्योंकि लोगों के परिणामों का खुलासा हो चुका होगा, और हरेक अपनी किस्म के अनुसार छाँटा गया होगा, फिर और अधिक उद्धार-कार्य करने का कोई मतलब नहीं होगा, क्योंकि उद्धार का युग गुजर चुका होगा, और गुजर जाने के बाद वह वापस नहीं आएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (7)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 317
मनुष्य सदा अंधकार के प्रभाव के आवरण में रहा है, शैतान के प्रभाव में कैद रहा है, बच निकलने में असमर्थ रहा है और शैतान द्वारा संसाधित उसका स्वभाव उत्तरोत्तर भ्रष्ट होता जाता है। कहा जा सकता है कि मनुष्य सदा ही अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभाव के बीच रहा है और परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करने में असमर्थ है। ऐसे में, यदि मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, तो उसे अपनी आत्मतुष्टता, अभिमान, अहंकार, दंभ इत्यादि, वह सब कुछ उतार फेंकना चाहिए जो शैतान के स्वभाव का है। अन्यथा, उसका प्रेम मिलावटी प्रेम है, शैतानी प्रेम है और ऐसा प्रेम है जो कदापि परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सकता है। पवित्र आत्मा द्वारा प्रत्यक्ष रूप से पूर्ण बनाए जाने, तोड़े जाने, काट-छाँट किए जाने, अनुशासित किए जाने, ताड़ना दिए जाने और शोधन किए जाने बिना कोई भी परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करने में समर्थ नहीं है। यदि तुम कहो कि तुम्हारे स्वभाव का एक हिस्सा परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है और इसलिए तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने में समर्थ हो, तो तुम्हारे शब्द अहंकारी हैं, और तुम हास्यास्पद हो। ऐसे लोग ही महादूत हैं! मनुष्य की जन्मजात प्रकृति परमेश्वर का सीधे प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है; उसे परमेश्वर की पूर्णता के माध्यम से अपनी जन्मजात प्रकृति को उतार फेंकना होगा और केवल तभी—परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होकर, परमेश्वर के इरादों को पूरा करके और इससे भी आगे पवित्र आत्मा के कार्य से गुजरकर—वह जो जीता है उसे परमेश्वर द्वारा मान्यता दी जा सकती है। देह में रहने वाला कोई भी व्यक्ति सीधे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, जब तक कि उसका पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग न किया गया हो। लेकिन इस तरह के व्यक्ति के लिए भी, यह नहीं कहा जा सकता कि उसका स्वभाव और वह जो जीता है वह पूर्णतः परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है; केवल इतना कहा जा सकता है कि वह जो जीता है वह पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित है। ऐसे व्यक्ति का स्वभाव परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है।
यद्यपि मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत किया जाता है—यह निर्विवाद है और इसे एक सकारात्मक चीज माना जा सकता है—फिर भी इसे शैतान द्वारा संसाधित किया गया है और इसलिए मनुष्य का संपूर्ण स्वभाव शैतान का स्वभाव है। कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव चीजों को स्पष्ट, “तथ्यपरक” ढंग से करने का है और यह उनमें भी स्पष्ट दिखाई देता है, और कि उनका व्यक्तित्व भी इसी तरह का है, और इसलिए वे कहते हैं कि उनका स्वभाव परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है। ये किस प्रकार के व्यक्ति हैं? क्या शैतानी भ्रष्ट स्वभाव परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में समर्थ है? जो कोई भी यह कहता है कि उसका स्वभाव परमेश्वर का द्योतक है वह परमेश्वर की ईशनिंदा करता है और पवित्र आत्मा को अपमानित करता है! पवित्र आत्मा जिस पद्धति से कार्य करता है, वह दर्शाता है कि पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य केवल और केवल विजय का कार्य है। इस प्रकार, मनुष्य के बहुत-से शैतानी भ्रष्ट स्वभाव अभी शुद्ध किए जाने बाकी हैं, और वह जो जीता है वह अब भी शैतान की छवि है, जिसे मनुष्य अच्छा मानता है, और यह मनुष्य की देह के कर्मों का प्रतिनिधित्व करता है; अधिक सटीक रूप से, यह शैतान का प्रतिनिधित्व करता है, और परमेश्वर का प्रतिनिधित्व बिल्कुल नहीं कर सकता है। यहाँ तक कि यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को पहले ही इस हद तक प्यार करता हो कि वह पृथ्वी पर स्वर्ग के जीवन का आनंद ले पाता हो, ऐसे वक्तव्य दे पाता हो जैसे : “परमेश्वर! मैं तुझे पर्याप्त प्रेम नहीं कर सकता हूँ,” और उच्चतम क्षेत्र तक पहुँच गया हो, तब भी यह नहीं कहा जा सकता कि वह परमेश्वर को जीता है या परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है, क्योंकि मनुष्य का सार परमेश्वर के सार से भिन्न है, और मनुष्य कभी परमेश्वर को जी नहीं सकता, परमेश्वर बन पाना तो दूर की बात है। मनुष्य पवित्र आत्मा के निर्देशन में जो भी जीता है वह सिर्फ उस चीज के अनुसार है जिसकी माँग परमेश्वर मनुष्य से करता है।
शैतान के समस्त क्रियाकलाप और कर्म मनुष्य में दिखाई देते हैं। आज मनुष्य के समस्त क्रियाकलाप और कर्म शैतान की अभिव्यक्ति हैं और इसलिए परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं। मनुष्य शैतान का मूर्त रूप है और मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर के स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। कुछ लोगों का अच्छा व्यक्तित्व होता है; परमेश्वर ऐसे लोगों के व्यक्तित्व के माध्यम से कुछ चीजें कर सकता है, और वे जो चीजें करते हैं वे पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित होती हैं। फिर भी उनका स्वभाव परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। उन पर कार्य करके परमेश्वर सिर्फ उनमें पहले से विद्यमान चीज का उपयोग कर रहा है और हाथ में उपलब्ध “सामग्री” को काम में ला रहा है। बीते युगों के पैगंबर हों या परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त लोग हों, कोई भी उसका सीधे प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। सारे ही लोग परिस्थितियों के दबाव में ही परमेश्वर से प्रेम करने लगते हैं और अपनी इच्छा से कोई एक भी सहयोग करने का प्रयास नहीं करता है। सकारात्मक चीज़ें क्या हैं? वह सब जो सीधे परमेश्वर से आता है सकारात्मक है; तथापि, मनुष्य का स्वभाव शैतान द्वारा संसाधित किया गया है और परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। केवल देहधारी परमेश्वर का प्रेम, कष्ट सहने का संकल्प, धार्मिकता, समर्पण, विनम्रता और अदृश्यता सीधे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि जब वह आया, वह पापमय प्रकृति से रहित आया और, शैतान द्वारा संसाधित हुए बिना, सीधे परमेश्वर से आया। यीशु केवल पापी देह की छवि में है और पाप का प्रतिनिधित्व नहीं करता है; इसलिए, सलीब पर चढ़ने के द्वारा उसके कार्य निष्पादन से पहले के समय तक (उसके सलीब पर चढ़ने के क्षण सहित) उसके कार्य, कर्म और वचन, सभी परमेश्वर के प्रत्यक्ष रूप से प्रतिनिधि हैं। यीशु का यह उदाहरण इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि पापमय प्रकृति वाला कोई भी व्यक्ति परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है, और मनुष्य का पाप शैतान का प्रतिनिधित्व करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि पाप परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं करता और परमेश्वर निष्पाप है। यहाँ तक कि पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्य पर किया गया कार्य भी पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित किया गया ही माना जा सकता है, और परमेश्वर की ओर से मनुष्य द्वारा किया गया नहीं कहा जा सकता। किंतु, जहाँ तक मनुष्य का संबंध है, परमेश्वर का प्रतिनिधित्व न उसका पाप करता है और न उसका स्वभाव। अतीत से लेकर आज तक पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्य पर किए गए समस्त कार्य पर दृष्टि डालें तो मनुष्य के पास वह सब जो वह जीता है, इसलिए है क्योंकि पवित्र आत्मा ने उस पर कार्य किया है। बहुत ही कम हैं जो पवित्र आत्मा द्वारा काट-छाँट और अनुशासित किए जाने के बाद सत्य को जी पाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि मात्र पवित्र आत्मा का कार्य ही उपस्थित है; मनुष्य की ओर से सहयोग अनुपस्थित है। क्या अब तुम इसे स्पष्ट रूप से देख रहे हो? तो फिर, जब पवित्र आत्मा कार्य करता है तब उसके साथ सहयोग करने और अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए तुम अपना अधिकतम कैसे करोगे?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 318
परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास, सत्य का तुम्हारा अनुसरण, और यहाँ तक कि तुम्हारे आचरण का तरीका, सब वास्तविकता पर आधारित होने चाहिए : हर चीज वास्तविक और व्यावहारिक होनी चाहिए, और तुम्हें भ्रामक और काल्पनिक बातों का अनुसरण नहीं करना चाहिए। इस तरह आचरण करने का कोई मूल्य नहीं है, और, इतना ही नहीं, ऐसे जीवन का कोई अर्थ नहीं है। चूँकि तुम्हारा अनुसरण और जीवन केवल मिथ्या और कपट के बीच व्यतीत होते हैं, और चूँकि तुम उन चीजों का अनुसरण नहीं करते जो मूल्यवान और अर्थपूर्ण हैं, इसलिए तुम्हें केवल अनर्गल तर्क-वितर्क और सिद्धांत प्राप्त होते हैं, जो सत्य से संबंधित नहीं होते। ऐसी चीजों का तुम्हारे अस्तित्व के अर्थ और मूल्य से कोई संबंध नहीं है और ये तुम्हारे लिए केवल खोखली दशा ला सकती हैं। इस तरह, तुम्हारा पूरा जीवन बिना किसी मूल्य और अर्थ का हो जाएगा—और यदि तुम सार्थक जीवन का अनुसरण नहीं करते, तो तुम सौ वर्षों तक भी जीवित रह सकते हो किंतु यह सब व्यर्थ होगा। उसे मानव-जीवन कैसे कहा जा सकता है? क्या यह वास्तव में एक जानवर का जीवन नहीं है? इसी प्रकार, यदि तुम लोग परमेश्वर में विश्वास के मार्ग पर चलने का अनुसरण करते हो, किंतु उस परमेश्वर को खोजने का कोई प्रयास नहीं करते, जिसे देखा जा सकता है, और इसके बजाय अदृश्य एवं अमूर्त परमेश्वर की आराधना करते हो, तो क्या इस प्रकार की खोज और भी अधिक व्यर्थ नहीं है? अंत में, तुम्हारा अनुसरण खंडहरों का ढेर बन जाएगा। ऐसे अनुसरण का तुम्हें क्या लाभ है? मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह केवल उन्हीं चीजों से प्यार करता है, जिन्हें वह देख या स्पर्श नहीं कर सकता, जो अत्यधिक रहस्यमयी और अद्भुत होती हैं, और जो मनुष्यों द्वारा अकल्पनीय और अप्राप्य हैं। चीजें जितनी अधिक अवास्तविक होती हैं, उतना ही अधिक लोगों द्वारा उनका विश्लेषण किया जाता है, और यहाँ तक कि लोग अन्य सभी से बेपरवाह होकर भी उनका अनुसरण करते हैं और उन्हें प्राप्त करने की व्यर्थ आशा करते हैं। जितना अधिक अवास्तविक ये चीज़ें होती हैं, उतना ही अधिक बारीकी से लोग उनकी जाँच और विश्लेषण करते हैं और, यहाँ तक कि इतनी दूर चले जाते हैं कि उनके बारे में अपने स्वयं के व्यापक विचार बना लेते हैं। इसके विपरीत, चीजें जितनी अधिक वास्तविक होती हैं, लोग उनके प्रति उतने ही अधिक उपेक्षापूर्ण होते हैं; वे केवल उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं और यहाँ तक कि उनके प्रति तिरस्कारपूर्ण भी हो जाते हैं। क्या तुम लोगों का यही रवैया उस यथार्थपरक कार्य के प्रति नहीं है, जो मैं आज करता हूँ? ये चीज़ें जितनी अधिक वास्तविक होती हैं, उतना ही अधिक तुम लोग उनके विरुद्ध पूर्वाग्रही हो जाते हो। तुम उनकी जाँच किए जाने की जरा भी गुंजाइश नहीं छोड़ते, बल्कि केवल उनकी उपेक्षा कर देते हो; तुम लोग इन यथार्थवादी, निम्नस्तरीय अपेक्षाओं को हेय दृष्टि से देखते हो, और यहाँ तक कि इस परमेश्वर के बारे में कई धारणाओं को प्रश्रय देते हो, जो कि सर्वाधिक व्यावहारिक है, और बस उसकी व्यावहारिकता और सामान्यता को स्वीकारने में अक्षम हो। इस तरह, क्या तुम लोग एक अज्ञात विश्वास नहीं रखते? तुम लोगों का अतीत के अज्ञात परमेश्वर में अचल विश्वास है, और आज के व्यावहारिक परमेश्वर में कोई रुचि नहीं है। क्या ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि कल का परमेश्वर और आज का परमेश्वर दो भिन्न-भिन्न युगों से हैं? क्या ऐसा इसलिए भी नहीं है, क्योंकि बीते कल का परमेश्वर स्वर्ग में रहने वाला महान और उच्च परमेश्वर है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर एक छोटा-सा मनुष्य है? इसके अलावा, क्या ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि मनुष्यों द्वारा आराधना किया जाने वाला परमेश्वर उनकी अपनी धारणाओं से उत्पन्न हुआ है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर उत्पन्न, मूर्त देह है? हर चीज पर विचार करने के बाद, क्या ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि आज का परमेश्वर इतना अधिक वास्तविक है कि मनुष्य उसका अनुसरण नहीं करता? क्योंकि आज का परमेश्वर लोगों से जो कहता है, वह ठीक वही है, जिसे करने के लिए लोग सबसे अधिक अनिच्छुक हैं, और जो उन्हें लज्जित महसूस करवाता है। क्या यह लोगों के लिए चीज़ों को कठिन बनाना नहीं है? क्या यह लोगों के दागों को उघाड़ नहीं देता? नतीजतन, बहुत-से लोग वास्तविक परमेश्वर, व्यावहारिक परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते और देहधारी परमेश्वर के शत्रु बन जाते हैं, अर्थात् मसीह-विरोधी बन जाते हैं। क्या यह एक स्पष्ट तथ्य नहीं है? अतीत में, जब परमेश्वर का अभी देह धारण करना बाकी था, तो तुम कोई धार्मिक हस्ती या कोई धर्मनिष्ठ विश्वासी रहे होगे। परमेश्वर के देह धारण करने के बाद ऐसे कई धर्मनिष्ठ विश्वासी अनजाने में मसीह-विरोधी बन गए। क्या तुम जानते हो, यहाँ क्या चल रहा है? परमेश्वर पर अपने विश्वास में तुम वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित नहीं करते या सत्य का अनुसरण नहीं करते, बल्कि अवास्तविक चीजों पर ध्यान केंद्रित करते हो—क्या यह देहधारी परमेश्वर के प्रति तुम्हारी शत्रुता का स्पष्टतम स्रोत नहीं है? देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है, इसलिए क्या देहधारी परमेश्वर पर विश्वास न करने वाले सभी लोग मसीह-विरोधी नहीं हैं? इसलिए क्या तुम जिस पर विश्वास करते हो और जिससे प्रेम करते हो, वह सच में देहधारी परमेश्वर है? क्या यही वास्तव में जीवित, श्वास लेता हुआ वह परमेश्वर है, जो बहुत ही वास्तविक और असाधारण रूप से सामान्य है? तुम्हारे अनुसरण का ठीक-ठीक क्या उद्देश्य है? क्या यह स्वर्ग में है या पृथ्वी पर? क्या यह एक धारणा है या सत्य? क्या यह परमेश्वर है या कोई अलौकिक प्राणी? वास्तव में, सत्य जीवन का सर्वाधिक व्यावहारिक सिद्धांत है और मानवजाति के लिए सर्वोच्च जीवन का नीति-वाक्य है। चूँकि यही वह अपेक्षा है जो परमेश्वर मनुष्य से करता है और यही परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाने वाला कार्य है, इसलिए इसे “जीवन-सिद्धांत” कहा जाता है। यह किसी चीज से सारांशित किया गया कोई नीति-वाक्य नहीं है, न ही यह किसी महान हस्ती द्वारा कहा गया कोई प्रसिद्ध उद्धरण है। इसके बजाय, यह स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीजों के संप्रभु का मानवजाति के लिए कथन है; यह मनुष्य द्वारा किया गया कुछ वचनों का सारांश नहीं है, बल्कि परमेश्वर का अंतर्निहित जीवन है। इसलिए इसे “सर्वोच्च जीवन-सिद्धांत” कहा जाता है। लोगों की सत्य को अभ्यास में लाने की खोज उनके कर्तव्य का निर्वाह है, अर्थात्, यह परमेश्वर की अपेक्षा पूरी करने का प्रयास है। इस अपेक्षा का सार किसी भी मनुष्य द्वारा प्राप्त न किए जा सकने योग्य खोखले धर्म-सिद्धांत के बजाय सर्वाधिक वास्तविक सत्य है। यदि तुम्हारा अनुसरण सिद्धांत के अलावा कुछ नहीं है और वह वास्तविकता से युक्त नहीं है, तो क्या तुम वह नहीं हो जो सत्य के विरुद्ध विद्रोह करता है? क्या तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो, जो सत्य पर आक्रमण करता है? ऐसा व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम का अनुसरण करने वाला कैसे हो सकता है? वास्तविकता से रहित लोग वे लोग हैं, जो सत्य के साथ विश्वासघात करते हैं, और वे सभी सहज रूप से विद्रोही हैं!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 319
तुम सभी परमेश्वर के समक्ष पुरस्कृत होने और उसके द्वारा कृपा की दृष्टि से देखे जाने की इच्छा रखते हो; सभी ऐसी चीजों की आशा करते हैं, जब वे परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करते हैं, क्योंकि सभी उच्चतर चीजों की खोज में लीन रहते हैं, और कोई भी दूसरों से पीछे नहीं रहना चाहता। लोग बस ऐसे ही हैं। यही कारण है कि तुम लोगों में से बहुत-से लोग लगातार स्वर्ग के परमेश्वर की चापलूसी करके उसका अनुग्रह पाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि वास्तव में, परमेश्वर के प्रति तुम लोगों की निष्ठा और निष्कपटता अपने प्रति तुम लोगों की निष्ठा और निष्कपटता से बहुत कम है। मैं यह क्यों कह रहा हूँ? क्योंकि मैं परमेश्वर के प्रति तुम लोगों की निष्ठा को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करता, और इसलिए भी, क्योंकि मैं उस परमेश्वर के अस्तित्व को नकारता हूँ, जो तुम लोगों के दिलों में है। दूसरे शब्दों में, जिस परमेश्वर की तुम लोग आराधना करते हो, जिस अज्ञात परमेश्वर का तुम लोग गुणगान करते हो, उसका कोई अस्तित्व नहीं है। मैं यह इतनी निश्चितता से इसलिए कह सकता हूँ, क्योंकि तुम लोग सच्चे परमेश्वर से बहुत दूर हो। तुम लोगों की निष्ठा का कारण तुम लोगों के दिलों के भीतर की मूर्ति है; इस बीच, जहाँ तक मेरी बात है, मुझ परमेश्वर को तुम लोग न तो बड़ा, न ही छोटा मानते हो, तुम लोग मुझे केवल शब्दों से स्वीकार करते हो। जब मैं कहता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर से बहुत दूर हो, तो मेरा मतलब है कि तुम लोग सच्चे परमेश्वर से दूर हो, जबकि अज्ञात परमेश्वर निकट प्रतीत होता है। जब मैं कहता हूँ, “बड़ा नहीं,” तो यह इस संदर्भ में है कि आज तुम लोग जिस परमेश्वर में विश्वास रखते हो, वह केवल महान क्षमताओं से रहित कोई व्यक्ति प्रतीत होता है, ऐसा व्यक्ति जो बहुत बुलंद नहीं है। और जब मैं “छोटा नहीं” कहता हूँ, तो इसका मतलब है कि हालाँकि यह व्यक्ति हवा को नहीं बुला सकता और बारिश को आज्ञा नहीं दे सकता, फिर भी वह परमेश्वर के आत्मा को वह कार्य करने के लिए बुलाने में सक्षम है, जो आकाश और पृथ्वी को हिला देता है, और लोगों को पूरी तरह से भौचक्का कर देता है। बाहरी तौर पर, तुम सभी पृथ्वी पर इस मसीह के प्रति अत्यधिक आज्ञाकारी दिखाई देते हो, किंतु सार में, तुम लोगों को उसमें विश्वास नहीं है, और न ही तुम उससे प्यार करते हो। दूसरे शब्दों में, जिसमें तुम लोग वास्तव में विश्वास रखते हो, वह तुम लोगों की खुद की भावनाओं का अज्ञात परमेश्वर है और जिसे तुम लोग वास्तव में प्यार करते हो, वह वो परमेश्वर है जिसके लिए तुम दिन-रात तरसते हो, किंतु जिसे तुमने व्यक्तिगत रूप से कभी नहीं देखा है। किंतु इस मसीह के प्रति तुम्हारी आस्था खंडित और प्रेम शून्य है। विश्वास का अर्थ है आस्था और भरोसा; प्रेम का अर्थ है व्यक्ति के हृदय में श्रद्धा और प्रशंसा, कभी वियोग नहीं। किंतु आज के मसीह के प्रति तुम लोगों का विश्वास और प्रेम इससे बहुत कम है। जब विश्वास की बात आती है, तो तुम लोग कैसे उसमें विश्वास रखते हो? जब प्यार की बात आती है, तो तुम लोग किस तरह से उससे प्यार करते हो? तुम लोगों को उसके स्वभाव की कोई समझ ही नहीं है, उसके सार को तो तुम बिल्कुल भी नहीं जानते, तो फिर तुम लोग उसमें विश्वास कैसे रखते हो? उसमें तुम लोगों के विश्वास की वास्तविकता कहाँ है? तुम लोग उसे कैसे प्यार करते हो? उसके प्रति तुम लोगों के प्यार की वास्तविकता कहाँ है?
बहुत-से लोगों ने आज तक बिना किसी हिचकिचाहट के मेरा अनुसरण किया है। इसी तरह, तुम लोगों ने भी पिछले कई वर्षों में बहुत थकान झेली है। तुममें से प्रत्येक के सहज चरित्र और आदतों को मैंने शीशे की तरह साफ़ समझा है; तुममें से प्रत्येक के साथ मेलजोल अत्यधिक दुष्कर रहा है। अफ़सोस की बात यह है कि यद्यपि मैंने तुम लोगों के बारे में बहुत-कुछ समझा है, लेकिन तुम लोग मेरे बारे में कुछ भी नहीं समझते। कोई आश्चर्य नहीं कि लोग कहते हैं कि तुम लोग पलभर को भ्रमित होकर किसी व्यक्ति की चाल में आ गए। वास्तव में, तुम लोग मेरे स्वभाव के बारे में कुछ नहीं समझते, और इसकी थाह तो तुम पा ही नहीं सकते कि मेरे मन में क्या है। आज, मेरे बारे में तुम लोगों की गलतफहमियाँ तेजी से बढ़ रही हैं, और मुझमें तुम लोगों का विश्वास एक भ्रमित विश्वास बना हुआ है। यह कहने के बजाय कि तुम लोगों को मुझमें विश्वास है, यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि तुम लोग चापलूसी से मेरा अनुग्रह पाने की कोशिश कर रहे हो और मेरी खुशामद कर रहे हो। तुम लोगों के इरादे बहुत सरल हैं : जो भी कोई मुझे पुरस्कृत कर सकता है, मैं उसी का अनुसरण करूँगा और जो भी कोई मुझे महाविनाशों से बचाएगा, मैं उसी में विश्वास रखूँगा, चाहे वह परमेश्वर हो या कोई परमेश्वर-विशेष हो। इनमें से किसी में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। तुम लोगों के बीच ऐसे कई लोग हैं, और यह स्थिति बहुत गंभीर है। अगर किसी दिन इस बात की परीक्षा हो जाए कि तुम लोगों में से कितनों को मसीह में उसके सार में अंतर्दृष्टि के कारण विश्वास है, तो मुझे डर है कि तुम लोगों में से एक भी मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं होगा। इसलिए तुममें से प्रत्येक के लिए इस प्रश्न पर विचार करना अच्छा होगा : जिस परमेश्वर में तुम लोग विश्वास रखते हो, वह मुझसे बहुत अलग है, और ऐसा होने के कारण, परमेश्वर में तुम लोगों के विश्वास का सार क्या है? जितना अधिक तुम लोग अपने तथाकथित परमेश्वर में विश्वास रखते हो, उतना ही अधिक तुम लोग मुझसे दूर भटक जाते हो। तो फिर, इस मुद्दे का सार क्या है? यह निश्चित है कि तुम लोगों में से किसी ने भी कभी इस तरह के प्रश्न पर विचार नहीं किया है, लेकिन क्या तुम लोगों को इसकी गंभीरता का एहसास हुआ है? क्या तुम लोगों ने इस तरह से विश्वास रखते रहने के परिणामों के बारे में सोचा है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पृथ्वी के परमेश्वर को वास्तव में कैसे जानें
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 320
मैं सचमुच उन लोगों की सराहना करता हूँ जो दूसरों पर शक नहीं करते, और मैं सचमुच उन लोगों को पसंद करता हूँ जो सत्य स्वीकारने के लिए तैयार रहते हैं; इन दो प्रकार के लोगों की मैं बहुत परवाह करता हूँ, क्योंकि मेरी नज़र में ये ईमानदार लोग हैं। यदि तुम बहुत धोखेबाज हो, तो तुम सभी लोगों और मामलों के प्रति सतर्क और शंकित रहोगे; इस प्रकार मुझमें तुम्हारी आस्था संदेह की नींव पर निर्मित होगी। मैं इस तरह की आस्था को कभी स्वीकार नहीं कर सकता। सच्चे विश्वास के अभाव में तुम सच्चे प्यार से और भी अधिक वंचित हो। और यदि तुम परमेश्वर पर संदेह भी कर सकते हो और उसके बारे में मनमाने ढंग से अनुमान लगा सकते हो, तो तुम यकीनन सभी लोगों में सबसे अधिक धोखेबाज हो। तुम अनुमान लगाते हो कि क्या परमेश्वर मनुष्य जैसा हो सकता है : अक्षम्य रूप से पापी, क्षुद्र, निष्पक्षता और तर्कसंगतता से विहीन, न्याय की भावना से रहित, कुटिल चालें चलने वाला, कपटी और धूर्त, बुराई और अंधकार में खुश होने वाला, आदि-आदि। क्या लोगों के ऐसे विचारों का कारण यह नहीं है कि उन्हें परमेश्वर का थोड़ा-सा भी ज्ञान नहीं है? ऐसा विश्वास पाप से कम नहीं है! कुछ लोग तो यह तक मानते हैं कि मुझे सिर्फ वही लोग पसंद हैं जो चापलूसी करना और तलवे चाटना जानते हैं और जो लोग ऐसा करना नहीं जानते, वे परमेश्वर के घर में अवांछनीय होंगे और वे वहाँ अपना स्थान खो देंगे। क्या तुम लोगों ने इतने बरसों में बस यही ज्ञान हासिल किया है? क्या तुम लोगों ने यही प्राप्त किया है? और मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान इन गलतफहमियों पर ही नहीं रुकता; परमेश्वर के आत्मा के खिलाफ तुम्हारी निंदा और स्वर्ग की बदनामी इससे भी बुरी बात है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि ऐसी आस्था तुम लोगों को केवल मुझसे दूर भटकाएगी और मेरे प्रति शत्रुता और बढ़ा देगी। कार्य के कई वर्षों के दौरान तुम लोगों ने कई सत्य देखे हैं, किंतु क्या तुम लोग जानते हो कि मेरे कानों ने क्या सुना है? तुम में से कितने लोग सत्य को स्वीकारने के लिए तैयार हैं? तुम सब लोग विश्वास करते हो कि तुम सत्य के लिए कीमत चुकाने को तैयार हो, किंतु तुम लोगों में से कितनों ने वास्तव में सत्य के लिए दुःख झेला है? तुम लोगों के हृदय में अधार्मिकता के सिवाय कुछ नहीं है, जिससे तुम लोगों को लगता है कि हर कोई, चाहे वह कोई भी हो, बराबर से धोखेबाज और कुटिल है—यहाँ तक कि तुम यह भी विश्वास करते हो कि देहधारी परमेश्वर, किसी सामान्य मनुष्य की तरह, दयालु हृदय या कृपालु प्रेम से रहित हो सकता है। इससे भी अधिक, तुम लोग मानते हो कि नेक गुण और दयालु, कृपालु प्रकृति केवल स्वर्ग के परमेश्वर में ही होती है। तुम लोग मानते हो कि ऐसा पवित्र व्यक्ति मौजूद नहीं है, कि केवल अंधकार एवं दुष्टता ही पृथ्वी पर राज करते हैं, जबकि परमेश्वर एक ऐसी चीज़ है, जिसे लोग अच्छाई और सुंदरता के लिए अपने मनोरथ सौंपते हैं, वह उनके द्वारा गढ़ी गई एक काल्पनिक हस्ती है। तुम लोगों के विचार से, स्वर्ग का परमेश्वर बहुत ही खरा, धार्मिक और महान है, आराधना और श्रद्धा के योग्य है, जबकि पृथ्वी का यह परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर का एक स्थानापन्न और साधन मात्र है। तुम विश्वास करते हो कि यह परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर के समकक्ष नहीं हो सकता, उनका एक-साथ उल्लेख तो बिल्कुल नहीं किया जा सकता। जब परमेश्वर की महानता और सम्मान की बात आती है, तो वे स्वर्ग के परमेश्वर की महिमा हैं, किंतु जब मनुष्य की प्रकृति और भ्रष्टता की बात आती है, तो ये ऐसी चीजें हैं जिनमें पृथ्वी के परमेश्वर का हिस्सा है। स्वर्ग का परमेश्वर हमेशा उत्कृष्ट है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर हमेशा ही नगण्य, कमजोर और अक्षम है। स्वर्ग के परमेश्वर में दैहिक अनुभूतियाँ नहीं हैं, बल्कि केवल धार्मिकता है, जबकि धरती के परमेश्वर के केवल स्वार्थपूर्ण उद्देश्य हैं और वह निष्पक्षता और तर्कसंगतता से रहित है। स्वर्ग के परमेश्वर में थोड़ी-सी भी कुटिलता नहीं है और वह हमेशा विश्वसनीय है, जबकि पृथ्वी के परमेश्वर में हमेशा बेईमानी का एक पक्ष होता है। स्वर्ग का परमेश्वर मनुष्यों से बहुत प्रेम करता है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर मनुष्य की पर्याप्त परवाह नहीं करता, यहाँ तक कि उसकी पूरी तरह से उपेक्षा करता है। यह भ्रामक ज्ञान तुम लोगों के हृदय में काफी समय से मौजूद रहा है; यह त्रुटिपूर्ण है और तुम लोग आगे भी इसमें लगे रह सकते हो। तुम लोग मसीह के सभी कर्मों पर अधार्मिकता के दृष्टिकोण से विचार करते हो और उसके सभी कार्यों और साथ ही उसकी पहचान और सार का मूल्यांकन दुष्ट के परिप्रेक्ष्य से करते हो। तुम लोगों ने बहुत गंभीर गलती की है और ऐसा काम किया है, जो तुमसे पहले के लोगों ने कभी नहीं किया। अर्थात्, तुम लोगों ने हमेशा अपने सिर पर मुकुट धारण करने वाले स्वर्ग के उस उच्च परमेश्वर की ही सेवा की है, जबकि उस परमेश्वर की कभी “सेवा-टहल” नहीं की जिसे तुम इतना तुच्छ समझते हो कि वह तुम लोगों को दिखाई ही नहीं देता। क्या यह तुम लोगों का पाप नहीं है? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध तुम लोगों के अपराध का विशिष्ट उदाहरण नहीं है? तुम लोग स्वर्ग के परमेश्वर को पूरे उत्साह से पूजते हो। तुम उत्कृष्ट छवियों का गहराई से आदर करते हो और असाधारण वाक्पटुता वाले लोगों की बहुत तारीफ करते हो। तुम उस परमेश्वर का आदेश मानने के लिए पूरी तरह से तैयार रहते हो जो तुम्हारे हाथ धन-दौलत से भर देता है और तुम उस परमेश्वर के लिए बहुत अधिक लालायित रहते हो जो तुम्हारी हर इच्छा पूरी कर सकता है। तुम केवल इस परमेश्वर की आराधना नहीं करते, जो ऊँचा नहीं है; तुम केवल इस परमेश्वर के साथ जुड़ने से घृणा करते हो, जिसे कोई मनुष्य ऊँची नज़र से नहीं देखता। तुम केवल इस परमेश्वर के लिए कार्य करने के अनिच्छुक हो, जिसने तुम्हें कभी एक पैसा नहीं दिया है, और जो तुम्हें अपने लिए लालायित करवाने में असमर्थ है, वह केवल यह अनाकर्षक परमेश्वर ही है। यह परमेश्वर तुम्हें अपनी नज़र का दायरा बढ़ाने में, तुम्हें खज़ाना मिल जाने का एहसास कराने में सक्षम नहीं बना सकता, तुम्हारी इच्छा पूरी तो बिल्कुल नहीं कर सकता। तो फिर तुम उसका अनुसरण क्यों करते हो? क्या तुमने कभी इस तरह के प्रश्न पर विचार किया है? तुम जो करते हो, वह केवल इस मसीह को ही नाराज़ नहीं करता, बल्कि, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, वह स्वर्ग के परमेश्वर को नाराज़ करता है। मेरे विचार से परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास का यह उद्देश्य नहीं है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पृथ्वी के परमेश्वर को वास्तव में कैसे जानें
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 321
तुम लोग लालायित रहते हो कि परमेश्वर तुम पर प्रसन्न हो, मगर तुम लोग परमेश्वर से दूर हो। यह क्या मामला है? तुम लोग केवल उसके वचनों को स्वीकार करते हो, उसके द्वारा काट-छाँट को नहीं, उसकी हर व्यवस्था को स्वीकार करने, उस पर पूर्ण आस्था रखने में तो तुम बिल्कुल भी समर्थ नहीं हो। तो आखिर मामला क्या है? अंतिम विश्लेषण में तुम लोगों की आस्था अंडे के खाली खोल के समान है, जो कभी चूजा पैदा नहीं कर सकता। क्योंकि तुम लोगों की आस्था तुम्हारे लिए सत्य लेकर नहीं आई है या उसने तुम्हें जीवन नहीं दिया है, बल्कि इसके बजाय तुम लोगों को सहारा और आशा का एक भ्रामक बोध दिया है। सहारे और आशा का बोध ही परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास का उद्देश्य है, सत्य और जीवन नहीं। इस प्रकार मैं कहता हूँ कि परमेश्वर में तुम्हारी आस्था की प्रक्रिया और कुछ नहीं, बल्कि परमेश्वर का अनुग्रह पाने का चापलूस और बेशर्म तरीका रहा है, और उसे किसी भी तरह से सच्ची आस्था नहीं माना जा सकता। इस प्रकार के विश्वास से कोई चूज़ा कैसे पैदा हो सकता है? दूसरे शब्दों में, इस तरह की आस्था से क्या हासिल हो सकता है? परमेश्वर में तुम लोगों की आस्था का प्रयोजन अपने लक्ष्य पूरे करने में उसका उपयोग करना है। क्या यह तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के स्वभाव के अपमान का एक और तथ्य नहीं है? तुम लोग स्वर्ग के परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो, परंतु पृथ्वी के परमेश्वर के अस्तित्व से इनकार करते हो; लेकिन मैं तुम लोगों के विचार स्वीकार नहीं करता; मैं केवल उन लोगों को स्वीकार करता हूँ, जो अपने पैरों को मजबूती से जमीन पर रखते हुए पृथ्वी के परमेश्वर की सेवा करते हैं, किंतु उनकी सराहना कभी नहीं करता, जो पृथ्वी के मसीह को स्वीकार नहीं करते। ऐसे लोग स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति कितने भी वफादार क्यों न हों, अंत में वे कुकर्मियों को दंड देने वाले मेरे हाथ से बचकर नहीं निकल सकते। ये लोग बुरे हैं; ये वे बुरे लोग हैं, जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और जिन्होंने कभी खुशी से मसीह के प्रति समर्पण नहीं किया है। निस्संदेह, उनकी संख्या में वे सब सम्मिलित हैं जो मसीह को नहीं जानते, और इसके अलावा, उसे स्वीकार नहीं करते। क्या तुम समझते हो कि जब तक तुम स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति वफादार हो, तब तक मसीह के प्रति जैसा चाहो वैसा व्यवहार कर सकते हो? गलत! मसीह के प्रति तुम्हारी अज्ञानता स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति अज्ञानता है। तुम स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति चाहे कितने भी वफादार क्यों न हो, यह मात्र खोखली बात और दिखावा है, क्योंकि पृथ्वी का परमेश्वर मनुष्य के लिए न केवल सत्य प्राप्त करने और अधिक गहरा ज्ञान रखने में सहायक है, बल्कि इससे भी अधिक, मनुष्य को दोषी ठहराने और उसके बाद दुष्टों को दंडित करने के लिए तथ्य हासिल करने में सहायक है। क्या तुमने यहाँ लाभदायक और हानिकारक परिणामों को समझ लिया है? क्या तुमने उनका अनुभव किया है? मैं चाहता हूँ कि तुम लोग शीघ्र ही किसी दिन इस सत्य को समझो : परमेश्वर को जानने के लिए तुम्हें न केवल स्वर्ग के परमेश्वर को जानना चाहिए, बल्कि, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, पृथ्वी के परमेश्वर को भी जानना चाहिए। अपनी प्राथमिकताओं को गड्डमड्ड मत करो या गौण को मुख्य की जगह मत लेने दो। केवल इसी तरह से तुम परमेश्वर के साथ वास्तव में एक अच्छा संबंध बना सकते हो, परमेश्वर के नज़दीक हो सकते हो, और अपने हृदय को उसके और अधिक निकट ले जा सकते हो। यदि तुम काफी वर्षों से विश्वासी रहे हो और लंबे समय से मुझसे जुड़े हुए हो, किंतु फिर भी मुझसे दूर हो, तो मैं कहता हूँ कि अवश्य ही तुम प्रायः परमेश्वर के स्वभाव को नाराज करते हो और तुम्हारे परिणाम का अनुमान लगाना बहुत मुश्किल होगा। यदि मेरे साथ कई वर्षों का संबंध न केवल तुम्हें ऐसा मनुष्य बनाने में असफल रहा है जिसमें मानवता और सत्य हो, बल्कि, इससे भी अधिक, उसने तुम्हारे दुष्ट तौर-तरीकों को तुम्हारी प्रकृति में बद्धमूल कर दिया है, और न केवल तुम्हारा अहंकार पहले से दोगुना हो गया है, बल्कि मेरे बारे में तुम्हारी गलतफहमियाँ भी कई गुना बढ़ गई हैं, यहाँ तक कि तुम मुझे अपना छोटा-सा लँगोटिया यार मान लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हारा रोग अब त्वचा में ही नहीं रहा, बल्कि तुम्हारी हड्डियों तक में घुस गया है। तुम्हारे लिए बस यही शेष बचा है कि तुम अपने अंतिम संस्कार की व्यवस्था किए जाने की प्रतीक्षा करो। तब तुम्हें मुझसे प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है कि मैं तुम्हारा परमेश्वर बनूँ, क्योंकि तुमने मृत्यु के योग्य पाप किया है, एक अक्षम्य पाप किया है। मैं तुम्हें बख्श भी दूँ, तो भी स्वर्ग का परमेश्वर तुम्हारा जीवन लेने पर जोर देगा, क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव के प्रति तुम्हारा अपराध कोई साधारण समस्या नहीं है, बल्कि बहुत ही गंभीर प्रकृति का है। जब समय आएगा, तो मुझे दोष मत देना कि मैंने तुम्हें पहले नहीं बताया था। फिर से बात वहीं आ जाती है : जब तुम मसीह—पृथ्वी के परमेश्वर—से एक साधारण मनुष्य के रूप में जुड़ते हो, अर्थात् जब तुम यह मानते हो कि यह परमेश्वर एक व्यक्ति के अलावा कुछ नहीं है, तो तुम नष्ट हो जाओगे। तुम सबके लिए मेरी यही एकमात्र चेतावनी है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पृथ्वी के परमेश्वर को वास्तव में कैसे जानें
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 322
मनुष्य में केवल उपस्थित प्रतीत होने वाला और अनुपस्थित प्रतीत होने वाला “आस्था” शब्द होता है, फिर भी वह यह नहीं जानता कि वास्तव में आस्था क्या होती है, मनुष्य यह तो बिल्कुल भी नहीं जानता कि उसमें आस्था क्यों होनी चाहिए। मनुष्य बहुत कम जानता है और मनुष्य में बहुत सारी कमियाँ हैं; मुझमें उसकी आस्था मूर्खता और अज्ञानता से भरी है। यद्यपि वह नहीं जानता कि आस्था क्या होती है, न ही वह यह जानता है कि वह मुझमें आस्था क्यों रखता है, फिर भी वह सनकियों की तरह मुझमें विश्वास किए चला जाता है। मैं मनुष्य से मात्र यह नहीं चाहता कि वह मुझे सनकियों की तरह इस तरीके से पुकारे या मुझ पर अनमने ढंग से विश्वास करे, क्योंकि जो काम मैं करता हूँ, वह इसलिए करता हूँ कि वह मुझे देख और जान सके, इसलिए नहीं कि वह एक नई रोशनी में मुझे देखे। मैंने एक बार कई चिह्न और अचंभे दिखाए थे और कई चमत्कार प्रदर्शित किए थे, उस समय के इस्राएलियों ने मेरी बहुत प्रशंसा की थी, बीमारों को चंगा करने और दानवों को निकालने की मेरी विलक्षण सामर्थ्य का काफी सम्मान किया था। उस समय यहूदी सोचते थे कि मेरी चंगाई की शक्तियाँ अति उत्तम और असाधारण हैं—और क्योंकि मैंने इतना सारा काम किया था, वे सभी मेरा बड़ा सम्मान करते थे और मेरी सारी शक्तियों के प्रति बहुत ईर्ष्या का भाव रखते थे। इस प्रकार, जिन्होंने भी मुझे चमत्कार करते देखा, उन सबने निकटता से मेरा अनुसरण किया, यहाँ तक कि बीमारों को चंगा करते देखने के लिए हज़ारों लोग मेरे इर्द-गिर्द इकट्ठे हो गए। मैंने इतने सारे चिह्न और चमत्कार प्रकट किए, फिर भी लोगों ने मुझे एक महान चिकित्सक ही माना; मैंने उस समय लोगों को शिक्षा देने के लिए बहुत सारे वचन भी कहे, फिर भी उन्होंने मुझे मात्र अपने शिक्षार्थियों से बेहतर एक शिक्षक ही समझा। यहाँ तक कि आज भी, जबकि लोग मेरे कार्य के ऐतिहासिक दस्तावेज देख चुके हैं, उनकी व्याख्या यही चली आ रही है कि मैं बीमारों को चंगा करने वाला एक महान चिकित्सक और अज्ञानियों का शिक्षक हूँ, और उन्होंने मुझे दयावान प्रभु यीशु मसीह के रूप में सीमित किया है। ऐसा हो सकता है कि पवित्र शास्त्र की व्याख्या करने वाले चंगाई के मेरे “कौशल” को पार कर गए हों या शिक्षार्थी अपने शिक्षक से आगे निकल गए हों, फिर भी ऐसे प्रसिद्ध लोग, जिनका नाम सारे संसार में जाना जाता है, मुझे मात्र चिकित्सक जितना छोटा समझते हैं। मेरे कर्मों की संख्या इतनी ज्यादा है कि वे समुद्र-तटों की रेत के कणों से भी ज्यादा हैं और मेरी बुद्धि इतनी महान है कि वह सुलेमान के सभी पुत्रों की बुद्धि से बढ़कर है, फिर भी लोग मुझमें इस तरह विश्वास करते हैं जैसे कि मैं मामूली हैसियत वाला मात्र एक चिकित्सक और मनुष्यों का कोई अज्ञात शिक्षक हूँ। बहुत सारे लोग मुझ में सिर्फ इसलिए विश्वास करते हैं कि मैं उन्हें चंगा कर दूँ। बहुत सारे लोग मुझ में सिर्फ इसलिए विश्वास करते हैं कि मैं उनके शरीर से अशुद्ध आत्माओं को निकालने के लिए अपनी सामर्थ्य का इस्तेमाल करूँ और बहुत-से लोग मुझसे बस शांति और आनंद प्राप्त करने के लिए मुझमें विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझसे सिर्फ और अधिक भौतिक संपदा माँगने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझमें सिर्फ इसलिए विश्वास करते हैं कि इस जीवन को शांति से गुजार सकें और अगले जीवन में सुरक्षित और हानिरहित रह सकें। बहुत-से लोग केवल नरक की पीड़ा से बचने के लिए और स्वर्ग के आशीष प्राप्त करने के लिए मुझ में विश्वास करते हैं। बहुत सारे लोग केवल अस्थायी आराम के लिए मुझमें विश्वास करते हैं, फिर भी अगले जीवन में कुछ भी हासिल करने का प्रयास नहीं करते। जब मैं लोगों पर अपना क्रोध उतारता हूँ और कभी उनके पास रही सारी सुख-शांति छीन लेता हूँ, तो मनुष्य शंकालु हो जाता है। जब मैं मनुष्य को नरक का कष्ट देता हूँ और स्वर्ग के आशीष वापस ले लेता हूँ, वे क्रोध से भर जाते हैं। जब लोग मुझसे खुद को चंगा करने के लिए कहते हैं और मैं उन पर ध्यान नहीं देता और उनके प्रति घृणा महसूस करता हूँ तो वे मुझे छोड़कर चले जाते हैं, इलाज के दुष्ट तरीके और जादू-टोने का मार्ग खोजने लगते हैं। जब मैं मनुष्य द्वारा मुझसे माँगी गई सारी चीजें वापस ले लेता हूँ, तो वे बिना कोई निशान छोड़े गायब हो जाते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि लोग मुझमें आस्था इसलिए रखते हैं क्योंकि मेरा अनुग्रह अत्यंत विपुल है, और क्योंकि बहुत अधिक लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं। यहूदियों के घर के लोग मुझ पर मेरे अनुग्रह के कारण ही विश्वास करते थे और जहाँ कहीं मैं जाता था, मेरा अनुसरण करते थे। सीमित ज्ञान और अनुभव वाले वे अज्ञानी लोग केवल वे चिह्न और चमत्कार देखना चाहते थे, जिन्हें मैं प्रकट करता था। वे मुझे यहूदियों के घराने के मुखिया के रूप में मानते थे, जो सबसे बड़े चमत्कार कर सकता था। और इसलिए जब मैंने लोगों के लिए दानवों को निकाल दिया, तो उनके बीच बड़ी चर्चा हुई : उन्होंने कहा कि मैं एलियाह हूँ, मैं मूसा हूँ, मैं सभी पैगंबरों में सबसे प्राचीन हूँ, कि मैं चिकित्सकों में सबसे महान हूँ। मेरे यह कहने के अलावा कि मैं जीवन, मार्ग और सत्य हूँ, कोई मेरी हस्ती और मेरी पहचान को नहीं जान सका। मेरे यह कहने के अलावा कि स्वर्ग वह जगह है जहाँ मेरा पिता रहता है, कोई यह नहीं जान पाया कि मैं परमेश्वर का पुत्र और स्वयं परमेश्वर हूँ। मेरे यह कहने के अलावा कि मैं सारी मानव-जाति के लिए छुटकारा लाऊँगा और मनुष्यों को दाम देकर छुड़ाऊँगा, कोई नहीं जान पाया कि मैं मनुष्यों का उद्धारकर्ता हूँ; और लोगों ने मुझे केवल एक उदार और दयालु व्यक्ति के रूप में जाना। और यह स्पष्ट कर देने के अलावा कि सब कुछ मेरा है, किसी ने मुझे नहीं जाना और किसी ने यह विश्वास नहीं किया कि मैं जीवित परमेश्वर का पुत्र हूँ। लोगों की मुझमें ऐसी आस्था है और इस तरह वे मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश करते हैं। जब वे मेरे बारे में ऐसे दृष्टिकोण रखते हैं, तो वे मेरी गवाही कैसे दे सकते हैं?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम आस्था के बारे में क्या जानते हो?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 323
लोगों ने लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास किया है, फिर भी उनमें से ज्यादातर को इस बात की समझ नहीं है कि “परमेश्वर” शब्द का अर्थ क्या है, वे बस उलझन में अनुसरण करते हैं। उन्हें नहीं पता कि वास्तव में मनुष्य को परमेश्वर में विश्वास क्यों करना चाहिए, या परमेश्वर क्या है। अगर लोग सिर्फ परमेश्वर में विश्वास करना और उसका अनुसरण करना जानते हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि परमेश्वर क्या है, और अगर वे परमेश्वर को भी नहीं जानते, तो क्या यह बस एक बहुत बड़ा मजाक नहीं है? इतनी दूर आने के बाद, भले ही लोगों ने अब तक बहुत-से स्वर्गिक रहस्य देखे हैं और गहन ज्ञान की बहुत-सी बातें सुनी हैं, जो मनुष्य ने पहले कभी नहीं समझी थीं, फिर भी वे बहुत-से अत्यंत सतही सत्यों से अनजान हैं जिन पर मनुष्य ने पहले कभी चिंतन नहीं किया। कुछ लोग कह सकते हैं, “हमने कई वर्ष परमेश्वर में विश्वास किया है। हम कैसे नहीं जान सकते कि परमेश्वर क्या है? क्या ऐसा कहकर तुम हमारा महत्व नहीं घटा रहे?” लेकिन वास्तविकता यह है कि यद्यपि आज लोग मेरा अनुसरण करते हैं, किंतु वे आज के किसी भी कार्य के बारे में कुछ नहीं जानते, और सबसे सतह-स्तर के और सरलतम प्रश्नों को समझने में भी विफल हो जाते हैं, परमेश्वर से संबंधित सबसे जटिल प्रश्नों की तो बात ही छोड़ दो। जान लो कि जिन प्रश्नों की तुम्हें कोई परवाह नहीं है, जिन्हें तुमने पहचाना नहीं है, वही वे प्रश्न हैं जिन्हें समझना तुम्हारे लिए सबसे आवश्यक है, क्योंकि तुम केवल भीड़ के पीछे चलना जानते हो और उस चीज पर कोई ध्यान नहीं देते और उसकी कोई परवाह नहीं करते, जिससे तुम्हें स्वयं को सुसज्जित करना चाहिए। क्या तुम सचमुच जानते हो कि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास क्यों करना चाहिए? क्या तुम सचमुच जानते हो कि परमेश्वर क्या है? क्या तुम सचमुच जानते हो कि मनुष्य क्या है? परमेश्वर में विश्वास रखने वाले व्यक्ति के रूप में, अगर तुम इन बातों को समझने में विफल रहते हो, तो क्या तुम परमेश्वर के विश्वासी होने की गरिमा खो नहीं देते? आज मेरा कार्य यह है : लोगों को उनका सार समझाना, वह सब समझाना जो मैं करता हूँ, और परमेश्वर के असली चेहरे से परिचित करवाना। यह मेरी प्रबंधन योजना का अंतिम कार्य है, मेरे कार्य का अंतिम चरण है। यही कारण है कि मैं तुम लोगों को जीवन के सारे रहस्य पहले से बता रहा हूँ, ताकि तुम लोग उन्हें मुझसे स्वीकार कर सको। चूँकि यह अंतिम युग का कार्य है, इसलिए मुझे तुम लोगों को वे सभी जीवन सत्य बताने होंगे जिन्हें तुम लोगों ने पहले कभी स्वीकार नहीं किया है—भले ही तुम लोग उन्हें समझने या सहन करने में असमर्थ हो—क्योंकि तुम लोग बहुत अपर्याप्त हो और तुम्हारे पास आवश्यक गुण नहीं हैं। मैं अपना कार्य समाप्त करूँगा; मैं वह कार्य पूरा करूँगा जो मुझे करना है, और तुम लोगों को उन सब आदेशों के बारे में बताऊँगा जो मैंने तुम लोगों को दिए हैं, ताकि ऐसा न हो कि जब अँधेरा छाए, तो तुम लोग फिर से भटक जाओ और उस दुष्ट के कुचक्रों में फँस जाओ। कई मार्ग हैं जिन्हें तुम नहीं समझते, कई मामले हैं जिनकी तुम्हें जानकारी नहीं है। तुम लोग इतने अज्ञानी हो; मैं तुम लोगों का आध्यात्मिक कद और तुम लोगों की कमियाँ अच्छी तरह जानता हूँ। इसलिए, तुम लोग भले ही कई वचन समझने में असमर्थ हो, फिर भी मैं तुम्हें ये सारे सत्य बताने को तैयार हूँ जिन्हें तुम लोगों ने पहले कभी स्वीकार नहीं किया है, क्योंकि मुझे इस बात की चिंता रहती है कि अपने वर्तमान आध्यात्मिक कद में तुम लोग मेरे लिए अपनी गवाही में अडिग रहने में समर्थ हो या नहीं। ऐसा नहीं है कि मैं तुम लोगों को नीची नजर से देखता हूँ; लेकिन तुम सभी लोग जानवर हो, जिन्हें अभी मेरे औपचारिक प्रशिक्षण से गुजरना है, और मैं बिल्कुल नहीं देख सकता कि तुम लोगों के भीतर कितनी महिमा है। यद्यपि मैंने तुम लोगों पर कार्य करने में बहुत ऊर्जा खर्च की है, फिर भी ऐसा लगता है कि तुम लोगों में कुछ ही सकारात्मक पहलू हैं और नकारात्मक पहलू कहीं नहीं मिलते; यह बस एक ऐसी गवाही है जो शैतान को शर्मिंदा करती है। तुम्हारे भीतर बाकी लगभग हर चीज शैतान का जहर है। तुम लोग मुझे ऐसे दिखते हो, जैसे तुम उद्धार से परे हो। वर्तमान स्थिति में, मैं तुम लोगों की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ और व्यवहार देखता हूँ, और अंततः, मैं तुम लोगों का असली आध्यात्मिक कद जानता हूँ। यही कारण है कि मैं तुम लोगों की चिंता करता रहता हूँ : अपने बल पर जीने के लिए छोड़ दिए जाने पर क्या तुम जैसे आज हो, उससे बेहतर या उसके समान हो पाओगे? क्या तुम लोगों का बचकाना आध्यात्मिक कद तुम लोगों को व्याकुल नहीं करता? क्या तुम लोग सचमुच इस्राएल के चुने हुए लोगों जैसे हो सकते हो—हर समय मेरे और केवल मेरे प्रति निष्ठावान? तुम लोगों में जो प्रकट होता है, वह बच्चों द्वारा तब की जाने वाली शरारत नहीं है जब वे अपने माता-पिता से दूर होते हैं, बल्कि अपने स्वामियों के कोड़ों की पहुँच से बाहर हो जाने वाले जानवरों से फूटकर बाहर आने वाला जंगलीपन है। तुम लोगों को अपनी प्रकृति जाननी चाहिए, जो तुम लोगों में समान कमजोरी भी है; यह एक रोग है, जो तुम लोगों में समान है। इसलिए आज तुम लोगों से मेरा एकमात्र आग्रह यह है कि मेरे प्रति अपनी गवाही में अडिग रहो। किसी भी परिस्थिति में पुरानी बीमारी फिर न उभरने दो। गवाही देना ही सबसे महत्वपूर्ण है—यह मेरे कार्य का मर्म है। तुम लोगों को मेरे वचन वैसे ही स्वीकार करने चाहिए, जैसे मरियम ने सपने में आया यहोवा का प्रकाशन स्वीकार किया था, विश्वास करके और फिर समर्पण करके। केवल यही शुचितापूर्ण होने की पात्रता रखता है। क्योंकि तुम लोग ही हो, जो मेरे वचन सबसे अधिक सुनते हो, जिन्हें मेरा सबसे अधिक आशीष प्राप्त है। मैंने तुम लोगों को अपनी समस्त मूल्यवान चीजें दे दी हैं, मैंने सब-कुछ तुम लोगों को प्रदान कर दिया है, फिर भी तुम लोगों का मूल्य इस्राएल के लोगों से बहुत अलग है—दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। लेकिन उनकी तुलना में तुम लोगों ने इतना अधिक प्राप्त किया है; जहाँ वे मेरे प्रकटन की बेतहाशा प्रतीक्षा करते हैं, वहीं तुम लोग मेरी प्रचुरता को साझा करते हुए मेरे साथ सुखद दिन बिताते हो। इस अंतर को देखते हुए, मेरे ऊपर चीखने-चिल्लाने और मेरे साथ झगड़ा करने और मेरी संपत्ति में अपने हिस्से की माँग करने का अधिकार तुम लोगों को कौन देता है? क्या तुम लोगों को ज्यादा कुछ नहीं मिला है? मैं तुम लोगों को इतना अधिक देता हूँ, लेकिन बदले में तुम लोग मुझे सिर्फ हृदयविदारक उदासी और चिंता, और अदम्य रोष और असंतोष ही देते हो। तुम बहुत घृणास्पद हो—तथापि तुम दयनीय भी हो, इसलिए मेरे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं है कि मैं अपना सारा रोष निगल लूँ और तुम लोगों के सामने बार-बार अपनी आपत्तियाँ जाहिर करूँ। हजारों वर्षों के कार्य के दौरान मैंने कभी मानवजाति के साथ प्रतिवाद नहीं किया, क्योंकि मैंने पाया है कि मानवता के समूचे विकास में तुम लोगों के बीच के धोखेबाजी के काम ही हैं, जो प्राचीन काल के प्रसिद्ध पुरखों द्वारा तुम लोगों के लिए छोड़ी गई बहुमूल्य धरोहरों की तरह सर्वाधिक विख्यात हुए हैं। उन अव-मानवीय सूअरों और कुत्तों से मुझे कितनी घृणा है। तुम लोगों में अंतरात्मा की बहुत कमी है! तुम लोग बहुत नीच चरित्र के हो! तुम लोगों के हृदय बहुत कठोर हैं! अगर मैं ऐसे वचन और कार्य इस्राएलियों के बीच ले गया होता, तो बहुत पहले ही महिमा प्राप्त कर चुका होता। लेकिन तुम लोगों के बीच यह अप्राप्य है; तुम लोगों के बीच सिर्फ क्रूर उपेक्षा, अनदेखा किया जाना और तुम्हारे बहाने हैं। तुम्हारी इंद्रियाँ बहुत सुन्न हैं और तुम बिल्कुल निकम्मे हो!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 324
तुम सभी को अब परमेश्वर में आस्था का सही अर्थ समझना चाहिए। परमेश्वर में आस्था रखने के जिस अर्थ के बारे में मैंने पहले बोला था, वह तुम लोगों के सकारात्मक प्रवेश से संबंधित था। आज बात अलग है : आज मैं परमेश्वर पर तुम लोगों की आस्था के सार का गहन-विश्लेषण करूँगा। बेशक, यह तुम लोगों का नकारात्मकता के पहलू से मार्गदर्शन करना है; अगर मैंने ऐसा नहीं किया, तो तुम लोग अपना सच्चा चेहरा कभी नहीं देख पाओगे, और हमेशा अपनी धर्मपरायणता और वफादारी की डींग हाँकोगे। यह कहना उचित है कि अगर मैंने तुम लोगों के हृदय की गहराई में छिपी कुरूपता बेनकाब न की, तो तुम लोगों में से प्रत्येक अपने सिर पर मुकुट रखकर समस्त महिमा का श्रेय खुद ही ले लेगा। तुम लोगों की अभिमानी और दंभी प्रकृति तुम लोगों को अपने ही अंतःकरण के साथ विश्वासघात करने, मसीह के खिलाफ विद्रोह करने और उसका प्रतिरोध करने और अपने कुरूप चेहरे प्रकट करने के लिए प्रेरित करती है, और इस तरह तुम लोगों के इरादों, धारणाओं, असंयत इच्छाओं और लालच से भरी नजरों को प्रकाश में ले आती है। फिर भी तुम लोग मसीह के कार्य के लिए अपने जीवन भर के जोश की घोषणा करते रहते हो और मसीह द्वारा बहुत पहले कहे गए सत्यों को बोलते और दोहराते रहते हो। यही तुम लोगों की “आस्था”—तुम लोगों की “अशुद्धता-रहित आस्था” है। मैंने पूरे समय मनुष्य के लिए बहुत कठोर मानक रखा है। अगर तुम्हारी वफादारी इरादों और शर्तों के साथ आती है, तो मैं तुम्हारी तथाकथित वफादारी के बिना रहना चाहूँगा, क्योंकि मैं उन लोगों से बेहद घृणा करता हूँ, जो मुझे अपने इरादों से धोखा देते हैं और शर्तों द्वारा मुझसे जबरन वसूली करते हैं। मैं मनुष्य से सिर्फ यही चाहता हूँ कि वह मेरे प्रति पूरी तरह से वफादार हो और सभी चीजें एक ही शब्द—आस्था—की खातिर और इसे साबित करने के लिए करे। मैं तुम्हारे द्वारा मुझे प्रसन्न करने की कोशिश करने के लिए की जाने वाली खुशामद से नफरत करता हूँ, क्योंकि मैंने हमेशा तुम लोगों के साथ सच्चाई से व्यवहार किया है, और इसलिए मैं तुम लोगों से भी यही चाहता हूँ कि तुम भी मेरे प्रति एक सच्ची आस्था के साथ कार्य करो। जब आस्था की बात आती है, तो कई लोग यह सोच सकते हैं कि वे परमेश्वर का अनुसरण इसलिए करते हैं क्योंकि उनमें आस्था है, अन्यथा वे इस प्रकार की पीड़ा न सहते। तो मैं तुमसे यह पूछता हूँ : अगर तुम परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो, तो कभी भी उसका भय क्यों नहीं मानते? अगर तुम परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो, तो तुम्हारे हृदय में उसका थोड़ा-सा भी खौफ क्यों नहीं है? अगर तुम स्वीकार करते हो कि मसीह परमेश्वर का देहधारी शरीर है, तो तुम उसकी अवमानना क्यों करते हो? तुम उसके प्रति अनादरपूर्वक क्यों पेश आते हो? तुम उसकी खुलेआम आलोचना क्यों करते हो? तुम हमेशा उसकी गतिविधियों की जासूसी क्यों करते हो? तुम उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित क्यों नहीं होते? तुम उसके वचनों को अपने क्रियाकलापों की कसौटी के रूप में क्यों नहीं लेते? क्यों तुम उसकी भेंटें जबरन छीनते और चुराते हो? क्यों तुम मसीह के स्थान से बोलने की कोशिश करते हो? क्यों तुम यह मूल्यांकन करते हो कि उसका कार्य और वचन सही हैं या नहीं? क्यों तुम पीठ पीछे उसकी निंदा करने का साहस करते हो? क्या तुम्हारी आस्था इन्हीं और अन्य बातों से मिलकर बनी है?
तुम लोगों के शब्दों और व्यवहार में मसीह के प्रति तुम्हारे अविश्वास के तत्त्व प्रकट होते हैं। तुम जो कुछ भी करते हो, उसके इरादों और लक्ष्यों में अविश्वास व्याप्त रहता है। यहाँ तक कि तुम लोगों की नजरों के भाव में भी मसीह के प्रति अविश्वास होता है। कहा जा सकता है कि तुम लोगों में से प्रत्येक व्यक्ति हर पल अविश्वास के तत्त्व मन में रखता है। इसका अर्थ है कि हर पल तुम लोग मसीह के साथ विश्वासघात करने के खतरे में हो, क्योंकि तुम लोगों के शरीर में दौड़ने वाला रक्त देहधारी परमेश्वर में अविश्वास से तर रहता है। इसलिए, मैं कहता हूँ कि परमेश्वर में आस्था के मार्ग पर जो पदचिह्न तुम लोग छोड़ते हो, वे वास्तविक नहीं हैं; जब तुम लोग परमेश्वर में आस्था के मार्ग पर चलते हो, तो तुम जमीन पर अपने पैर मजबूती से नहीं रखते—तुम बस बेमन से चलते हो। तुम लोग कभी मसीह के वचन पर पूरी तरह से विश्वास नहीं करते और उसे तुरंत अभ्यास में लाने में अक्षम हो। यही कारण है कि तुम लोगों को मसीह में आस्था नहीं है। उसके बारे में हमेशा धारणाएँ रखना उसमें तुम्हारी आस्था के न होने का दूसरा कारण है। मसीह के कार्य के बारे में हमेशा संशयग्रस्त रहना, मसीह के वचनों पर कान न देना, मसीह जो भी करता है उसके बारे में राय रखना और उसे सही तरह से समझने में समर्थ न होना, चाहे कोई भी स्पष्टीकरण दिया जाए, पर अपनी धारणाएँ छोड़ने में कठिनाई महसूस करना, इत्यादि—अविश्वास के ये सभी तत्त्व तुम लोगों के दिलों में घुल-मिल गए हैं। यद्यपि तुम लोग मसीह के कार्य का अनुसरण करते हो और कभी पीछे नहीं रहते, लेकिन तुम लोगों के हृदयों में अत्यधिक विद्रोहीपन घुल गया है। यह विद्रोहीपन परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास में एक अशुद्धि है। शायद तुम लोगों को ऐसा न लगता हो, लेकिन अगर तुम इसके भीतर से अपने इरादे पहचानने में असमर्थ हो, तो तुम्हारा नष्ट होने वाले लोगों में होना निश्चित है, क्योंकि परमेश्वर केवल उन्हें ही पूर्ण करता है जो वास्तव में उस पर विश्वास करते हैं, उन्हें नहीं जो उस पर आधा विश्वास करते हैं, और उन सबको तो बिल्कुल नहीं, जिन्होंने कभी यह नहीं माना कि वह परमेश्वर है और फिर भी अनिच्छा से उसका अनुसरण करते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम सचमुच परमेश्वर के विश्वासी हो?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 325
कुछ लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, न्याय से तो और भी कम प्रेम करते हैं। इसके बजाय वे सत्ता और दौलत से प्रेम करते हैं; ऐसे लोग सत्ता चाहने वाले कहे जाते हैं। वे केवल दुनिया के शक्तिशाली संप्रदायों को और धर्म-महाविद्यालयों से आने वाले पादरियों और शिक्षकों को ही खोजते हैं। यूँ तो उन्होंने सत्य के मार्ग को स्वीकार कर लिया है, फिर भी वे केवल अर्ध-विश्वासी हैं और वे अपने समस्त तन और मन को समर्पित करने में असमर्थ हैं; वे अपने मुँह से तो परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की बात करते हैं, लेकिन उनकी नजरें बड़े पादरियों और शिक्षकों पर गड़ी रहती हैं और वे मसीह की ओर निगाह फेरने तक की जहमत नहीं उठाते हैं। उनके मन प्रसिद्धि, लाभ और प्रतिष्ठा के विचारों से भरे रहते हैं। वे इसे असंभव समझते हैं कि ऐसा छोटा व्यक्ति इतने लोगों पर विजय प्राप्त कर सकता है, कि इतना साधारण व्यक्ति लोगों को पूर्ण बना सकता है। वे इसे असंभव समझते हैं कि ये धूल और घूरे में पड़े नाचीज लोग परमेश्वर द्वारा चुने गए हैं। वे मानते हैं कि अगर ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार के पात्र होते, तो स्वर्ग और पृथ्वी उलट-पुलट हो जाते और सभी लोगों का हँसते-हँसते बुरा हाल हो जाता। उनका मानना है कि अगर परमेश्वर ने ऐसे लोगों को पूर्ण बनाने के लिए चुना होता, तो वे सभी बड़े लोग स्वयं परमेश्वर बन जाते। उनके दृष्टिकोण अविश्वास से दूषित हैं; अविश्वासी होने से भी बढ़कर, वे अविवेकी जानवर हैं। क्योंकि वे केवल रुतबे, प्रतिष्ठा और सत्ता को महत्व देते हैं और बड़े समूहों और संप्रदायों को सम्मान देते हैं और उनमें मसीह की अगुआई में चलने वालों के लिए रत्ती भर भी परवाह नहीं है। वे तो बस ऐसे विश्वासघाती हैं जिन्होंने मसीह, सत्य और जीवन से पीठ फेर ली है।
तुम मसीह की विनम्रता की प्रशंसा नहीं करते, लेकिन तुम उन ऊँचे रुतबे वाले झूठे चरवाहों का सम्मान जरूर करते हो। तुम मसीह की मनोहरता या बुद्धि से प्रेम नहीं करते, बल्कि तुम उन व्यभिचारियों को बहुत पसंद करते हो, जो संसार की गंदगी के साथ रहते हैं। तुम मसीह की सिर टिकाने तक की जगह न होने की पीड़ा पर केवल कुटिलता से हँसते हो, लेकिन उन मुरदों की तारीफ करते हो, जो चढ़ावों का गबन करते हैं और ऐयाशी में जीते हैं। तुम मसीह के साथ कष्ट सहने को तैयार नहीं हो, बल्कि खुद को खुशी-खुशी उन लापरवाह और मनमाने मसीह-विरोधियों की बाँहों में सौंप देते हो, जबकि वे तुम्हें सिर्फ देह, शब्द और नियंत्रण ही प्रदान करते हैं। अभी भी तुम्हारा हृदय उनकी ओर, उनकी प्रतिष्ठा की ओर, उनके रुतबे, उनकी शक्तियों की ओर मुड़ता है। अभी भी तुम यही रवैया अपनाए हुए हो कि मसीह का कार्य स्वीकारना कठिन है और तुम इसे स्वीकारने के लिए तैयार नहीं रहते। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि तुममें मसीह को स्वीकार करने की आस्था नहीं है। तुमने आज तक उसका अनुसरण सिर्फ इसलिए किया है, क्योंकि तुम्हारे पास कोई और विकल्प नहीं था। बुलंद छवियों की एक शृंखला हमेशा तुम्हारे हृदय में बसी रहती है; तुम उनके किसी शब्द और कर्म को नहीं भूल सकते, न ही उनके प्रभावशाली शब्दों और हाथों को भूल सकते हो। वे तुम लोगों के हृदय में हमेशा सर्वोच्च और हमेशा नायक रहते हैं। लेकिन आज के मसीह के लिए ऐसा नहीं है। तुम्हारे हृदय में वह हमेशा महत्वहीन है, वह मनुष्य है जो हमेशा भय के अयोग्य है। क्योंकि वह बहुत ही साधारण है, उसका बहुत ही कम प्रभाव है और वह कद्दावर होने से बहुत पीछे है।
बहरहाल, मैं कहता हूँ कि जो लोग सत्य को महत्व नहीं देते वे सभी छद्म-विश्वासी हैं और सत्य के प्रति विश्वासघाती हैं। ऐसे लोगों को कभी भी मसीह का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा। क्या अब तुमने पहचान लिया है कि तुम्हारे भीतर कितना अविश्वास है, और तुममें मसीह के प्रति कितना विश्वासघात है? मैं तुम्हें इस प्रकार नसीहत देता हूँ : चूँकि तुमने सत्य का मार्ग चुना है, तो तुम्हें खुद को संपूर्ण हृदय से समर्पित करना चाहिए; दुविधाग्रस्त या आधे दिल वाले न बनो। तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर संसार का या किसी एक व्यक्ति का परमेश्वर नहीं है, बल्कि उन सबका परमेश्वर है जो उस पर सचमुच विश्वास करते हैं, जो उसकी आराधना करते हैं और जो उसके प्रति समर्पित और निष्ठावान हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम सचमुच परमेश्वर के विश्वासी हो?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 326
अपने विश्वास में लोग परमेश्वर को उन्हें एक उपयुक्त मंज़िल और जितना वे चाह सकते हैं, उतना अनुग्रह देने, उसे अपना सेवक बनाने, उसे अपने साथ एक शांतिपूर्ण, मैत्रीपूर्ण संबंध, फिर वह चाहे कभी भी हो, बनाए रखने के लिए बाध्य करना चाहते हैं, ताकि उनके बीच कभी कोई संघर्ष न हो। अर्थात् परमेश्वर में उनका विश्वास यह माँग करता है कि वह उनकी सभी आवश्यकताएँ पूरी करने का वादा करे और उनके द्वारा बाइबल में पढ़े गए इन वचनों को ध्यान में रखते हुए कि, “तुम लोग जो कुछ भी माँगोगे, मैं वह सब सुनूँगा,” उन्हें वह सब प्रदान करे, जो वे माँगें। वे परमेश्वर से किसी का न्याय या काट-छाँट न करने की अपेक्षा करते हैं, क्योंकि वह हमेशा दयालु उद्धारकर्ता यीशु रहा है, जो हर समय और सभी जगहों पर लोगों के साथ एक अच्छा संबंध रखता है। लोग परमेश्वर में जिस तरह से विश्वास करते हैं, वह इस प्रकार है : वे बस बेशर्मी से परमेश्वर से माँग माँगें करते हैं, यह मानते हैं कि चाहे वे विद्रोही हों या आज्ञाकारी, उसे बस उन्हें सब कुछ देते रहना है। वे बस परमेश्वर से लगातार “ऋण वसूली” करते हैं, यह विश्वास करते हुए कि उसे उन्हें बिना किसी प्रतिरोध के “चुकाना” है और इतना ही नहीं, दोगुना भुगतान करना है। वे सोचते हैं कि परमेश्वर ने उनसे कुछ लिया हो या नहीं, वे उसके साथ चालाकी कर सकते हैं, वह लोगों को अपनी इच्छानुसार आयोजित नहीं कर सकता, और लोगों के सामने जब वह चाहे और बिना उनकी अनुमति के अपनी बुद्धि और धार्मिक स्वभाव तो बिल्कुल भी प्रकट नहीं कर सकता, जो कई वर्षों से छिपाए हुए हैं। वे बस परमेश्वर के सामने अपने पाप स्वीकार करते हैं, और यह मानते हैं कि उसे बस इसके प्रति कोई अरुचि महसूस किए बिना उन्हें दोषमुक्त करना है, और यह हमेशा के लिए चलता रहेगा। वे परमेश्वर को आदेश दे देते हैं, और यह मानकर चलते हैं कि उसे बस उनका आज्ञापालन करना है, क्योंकि यह बाइबल में दर्ज है कि परमेश्वर मनुष्यों से सेवा करवाने के लिए नहीं आया, बल्कि उनकी सेवा करने के लिए आया है, वह उनका सेवक बनने आया है। अब भी, क्या तुम लोग इसी तरह से विश्वास नहीं करते? जब भी तुम परमेश्वर से कुछ पाने में असमर्थ होते हो, तुम भाग जाना चाहते हो; जब तुम्हें कुछ समझ में नहीं आता, तो तुम बहुत क्रोधित हो जाते हो, और इस हद तक चले जाते हो कि उसे तरह-तरह की गालियाँ देने लगते हो। तुम लोग स्वयं परमेश्वर को पूरी तरह से अपनी बुद्धि और चमत्कार भी व्यक्त नहीं करने दोगे, तुम बस अस्थायी आराम और सुख-सुविधाओं में लिप्त होना चाहते हो। परमेश्वर में विश्वास को लेकर अब तक तो तुम लोगों का वही पुराना रवैया रहा है। यदि परमेश्वर तुम लोगों को थोड़ा-सा प्रताप दिखा दे, तो तुम लोग दुखी हो जाते हो। क्या तुम लोग देख रहे हो कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद कितना बड़ा है? यह न समझो कि तुम सभी परमेश्वर के प्रति वफादार हो, जबकि वास्तव में तुम लोगों के पुराने विचार नहीं बदले हैं। जब तक तुम पर कोई मुसीबत नहीं आ पड़ती, तुम्हें लगता है कि सब कुछ सुचारु रूप से चल रहा है, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम एक ऊँचे मुकाम पर पहुँच जाता है। अगर तुम्हारे साथ कुछ मामूली-सा भी घट जाए, तो तुम रसातल में जा गिरते हो। क्या यही परमेश्वर के प्रति तुम्हारा निष्ठावान होना है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें रुतबे के आशीष को परे रखना चाहिए और मनुष्य का उद्धार लाने का परमेश्वर का इरादा समझना चाहिए
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 327
तुम लोगों के अनुसरण में, तुम्हारी बहुत ज्यादा व्यक्तिगत धारणाएँ, आशाएँ और संभावनाएँ रहती हैं। अब कार्य इस तरह से किया जाता है कि तुम लोगों की रुतबे की इच्छा और तुम्हारी अत्यधिक इच्छाओं से निपटा जा सके। ये आशाएँ, रुतबे की यह इच्छा और ये धारणाएँ, सभी शैतानी स्वभावों के प्रतीक हैं। लोगों के दिलों में इन चीजों के होने का कारण पूरी तरह से यह है कि शैतान का जहर हमेशा लोगों के विचारों को भ्रष्ट करता रहता है। लोग शैतान के इन प्रलोभनों से खुद को कभी मुक्त नहीं कर पाते और वे पाप के बीच जी रहे हैं, फिर भी नहीं मानते कि यह पाप है। इतना ही नहीं, वे सोचते हैं, “हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे हमें आशीष प्रदान करना चाहिए और हमारे लिए सब कुछ सही ढंग से व्यवस्थित करना चाहिए। हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए हमें दूसरों से श्रेष्ठतर होना चाहिए और हमारे पास दूसरों की तुलना में ऊँचा रुतबा और बेहतर संभावनाएँ होनी चाहिए। चूँकि हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे हमें असीम आशीष देना चाहिए। अन्यथा इसे परमेश्वर पर विश्वास करना नहीं कहा जाएगा।” बहुत सालों से जिन विचारों पर लोगों ने अपने अस्तित्व के लिए भरोसा रखा था, वे उनके दिलों को इस स्थिति तक दूषित कर रहे हैं कि वे विश्वासघाती, डरपोक और नीच हो गए हैं। न केवल उनमें इच्छाशक्ति या संकल्प की कमी है, बल्कि वे लालची, अभिमानी और मनमौजी भी हो गए हैं। उनमें स्वयं से परे जाने के संकल्प का पूरी तरह से अभाव है और इन अंधकारपूर्ण प्रभावों के बंधनों से मुक्त होने का तो लेशमात्र भी साहस नहीं है। लोगों के विचार और जीवन इतने सड़ चुके हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने के पीछे के उनके परिप्रेक्ष्य अभी भी असहनीय रूप से घिनौने हैं और यहाँ तक कि सुनने में भी पूरी तरह से आपत्तिजनक हैं। लोग पूरी तरह से कायर, शक्तिहीन, नीच और कमजोर हैं। वे अंधकार की शक्तियों से घृणा नहीं करते, वे प्रकाश और सत्य के लिए प्रेम महसूस नहीं करते; इसके बजाय, वे उन्हें निष्कासित करने की पूरी कोशिश करते हैं। क्या तुम लोगों के वर्तमान विचार और परिप्रेक्ष्य ठीक ऐसे ही नहीं हैं? यानी, चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें आशीष मिलना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि तुम्हारा रुतबा कभी न गिरे, यह अविश्वासियों से ऊँचा बना रहे—तुम लोग इस तरह का परिप्रेक्ष्य सिर्फ एक या दो साल से नहीं, बल्कि कई सालों से पाले हुए हो। तुम्हारी लेन-देन वाली सोच बहुत ज्यादा विकसित हो गई है। यद्यपि तुम आज इस पड़ाव पर पहुँच गए हो, फिर भी रुतबे की बात आने पर तुम निश्चिंत नहीं हो पाते; तुम लगातार इसकी ताक-झाँक करते रहते हो और प्रतिदिन इस पर नजर रखते हो, इस गहरे डर के साथ कि कहीं एक दिन तुम्हारा रुतबा छिन न जाए और तुम्हारा नाम खराब न हो जाए। लोगों ने सहूलियत की अपनी अभिलाषा को कभी नहीं छोड़ा। मैं आज जिस तरह से तुम लोगों का न्याय कर रहा हूँ, अंत में तुम लोगों के अंदर किस स्तर की समझ होगी? तुम लोग कहोगे कि यद्यपि तुम लोगों का रुतबा ऊँचा नहीं है, फिर भी तुम लोगों ने परमेश्वर के उत्कर्ष का आनंद तो लिया ही है और तुम्हारे पास रुतबा नहीं है क्योंकि तुम लोग अधम पैदा हुए थे, लेकिन तुम रुतबा प्राप्त कर लेते हो, क्योंकि परमेश्वर तुम्हारा उत्कर्ष करता है—यह कुछ ऐसा है जो तुम लोगों को परमेश्वर ने प्रदान किया है। आज तुम लोग व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर का प्रशिक्षण, उसकी ताड़ना और उसका न्याय प्राप्त करने में सक्षम हो। इससे भी बढ़कर, यह उसका उत्कर्ष है। तुम लोग व्यक्तिगत रूप से उसके द्वारा शुद्धिकरण और प्रज्वलन प्राप्त करने में सक्षम हो। यह परमेश्वर का महान प्रेम है। युगों-युगों से और पीढ़ियों से एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो उसका शुद्धिकरण और प्रज्वलन प्राप्त करने में सक्षम रहा हो और एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो उसके वचनों की पूर्णता प्राप्त करने में सक्षम रहा हो। परमेश्वर अब तुम लोगों से आमने-सामने बात कर रहा है, तुम लोगों को शुद्ध कर रहा है, तुम लोगों के भीतर के विद्रोहीपन को उजागर कर रहा है—यह सचमुच उसका उत्कर्ष है। लोग क्या कर पाने में सक्षम हैं? चाहे वे दाऊद के पुत्र हों या मोआब के वंशज, कुल मिला कर, लोग ऐसे सृजित प्राणी हैं जिनके पास गर्व करने के लिए कुछ नहीं है। चूँकि तुम लोग सृजित प्राणी हो, इसलिए तुम लोगों को एक सृजित प्राणी का कर्तव्य करना चाहिए। तुम लोगों से अन्य कोई अपेक्षाएँ नहीं हैं। तुम लोगों को ऐसे प्रार्थना करनी चाहिए : “परमेश्वर, चाहे मेरे पास रुतबा हो या न हो, अब मैं स्वयं को जानता हूँ। यदि मेरा रुतबा ऊँचा है तो यह तुम्हारे द्वारा उन्नयन के कारण है और यदि यह निम्न है तो यह तुम्हारे पूर्वनियत करने के कारण है। सब कुछ तुम्हारे हाथों में है। मेरे पास न तो कोई विकल्प है, न ही कोई शिकायत है। यह तुमने पूर्वनियत किया कि मैं इस देश में और इस जाति के बीच पैदा होऊँगा, और मैं जो कुछ कर सकता हूँ वह बस यह है कि मैं पूरी तरह से तुम्हारे प्रभुत्व के अधीन समर्पित हो जाऊँ क्योंकि सब कुछ वही है जो तुमने पूर्वनियत किया है। मैं रुतबे पर ध्यान नहीं देता हूँ; मैं एक सृजित प्राणी के सिवाय कुछ नहीं हूँ। यदि तुम मुझे अथाह कुंड में, आग और गंधक की झील में डालते हो, तो मैं एक सृजित प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ। यदि तुम मेरा उपयोग करते हो, तो मैं एक सृजित प्राणी हूँ। भले ही तुम मुझे पूर्ण बना दो, मैं फिर भी एक सृजित प्राणी हूँ। यदि तुम मुझे पूर्ण नहीं बनाते हो, तब भी मैं तुमसे प्रेम करूँगा क्योंकि मैं एक सृजित प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ। मैं सृष्टिकर्ता के एक अदने सृजित प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ, समस्त सृजित मनुष्यों में से सिर्फ एक हूँ। तुमने ही मुझे बनाया है और अब तुमने मुझे अपने हाथों में रखा है ताकि मेरे साथ जैसा चाहो वैसा कर सको। मैं तुम्हारा साधन और तुम्हारी विषमता होने का इच्छुक हूँ, क्योंकि सब कुछ वही है जो तुमने पूर्वनियत किया है और कोई भी इसे बदल नहीं सकता। सभी चीजें और सभी घटनाएँ तुम्हारे हाथों में हैं।” उस समय तू रुतबे पर कोई ध्यान नहीं देगा—यानी जब तू इससे मुक्त हो जाएगा। तभी तू आत्मविश्वास से, निर्भीकता से अनुसरण में सक्षम होगा और तभी तेरा हृदय किसी भी बंधन से मुक्त हो सकेगा। एक बार लोग जब इन चीजों से मुक्त हो जाते हैं, तो उनके पास और कोई चिंता नहीं होती। अभी तुम लोगों में से अधिकांश की चिंताएँ क्या हैं? तुम लोग हमेशा रुतबे को लेकर विवश रहते हो और हमेशा अपनी संभावनाओं की चिंता करते रहते हो। तुम हमेशा परमेश्वर के वचनों की पुस्तक के पन्ने पलटते रहते हो, मानवजाति की मंजिल से संबंधित परमेश्वर के कथनों को पढ़ना चाहते हो और जानना चाहते हो कि तुम्हारी संभावनाएँ और मंजिल क्या होगी। तुम हमेशा सोचते हो, “क्या वाकई मेरी कोई संभावना है? क्या परमेश्वर ने उन्हें वापस ले लिया है? परमेश्वर बस यह कहता है कि मैं एक विषमता हूँ; तो फिर, मेरी संभावनाएँ क्या हैं?” तुम लोगों के लिए अपनी संभावनाओं और नियति को छोड़ देना मुश्किल है। अब तुम लोग अनुयायी हो और तुम लोगों को कार्य के इस स्तर की कुछ समझ प्राप्त हो गई है। लेकिन तुम लोगों ने अभी तक रुतबे के लिए अपनी अभिलाषा को छोड़ा नहीं है। जब तुम्हारा रुतबा ऊँचा होता है तो तुम अनुसरण की अच्छी तरह से कोशिश करते हो, किन्तु जब तुम्हारा रुतबा निम्न होता है तो तुम अनुसरण की कोशिश नहीं करते। तुम्हारे मन में हमेशा रुतबे के फायदे होते हैं। ऐसा क्यों होता है कि अधिकांश लोग अपने आप को निराशा से निकाल नहीं पाते? क्या उत्तर हमेशा निराशाजनक संभावनाओं के कारण नहीं होता? जैसे ही परमेश्वर के वचन जारी किए जाते हैं, तुम लोग यह देखने की हड़बड़ी करते हो कि तुम्हारा रुतबा और पहचान वास्तव में क्या है। तुम लोग रुतबे और पहचान को प्राथमिकता देते हो, और दर्शन को दूसरे स्थान पर रखते हो। तीसरे स्थान पर वह चीज है “जिसमें तुम लोगों को प्रवेश करना चाहिए”, और चौथे स्थान पर परमेश्वर का वर्तमान इरादा आता है। तुम लोग सबसे पहले यह देखते हो कि तुम्हें परमेश्वर से मिली पदवी “विषमता” बदली है या नहीं। तुम लोग बार-बार पढ़ते हो, और जब देखते हो कि “विषमता” पदवी हटा दी गई है, तो तुम लोग खुश हो जाते हो और परमेश्वर का लगातार धन्यवाद करते रहते हो और उसके महान सामर्थ्य की स्तुति करते हो। लेकिन यदि तुम देखते हो कि तुम लोग अभी भी विषमता ही हो, तो तुम लोग तुरंत परेशान हो जाते हो और तुम लोगों के हृदय की प्रेरणा तुरंत गायब हो जाती है। जितना अधिक तू इस तरह से अनुसरण करेगा उतना ही कम तू पाएगा। रुतबे के लिए किसी व्यक्ति की अभिलाषा जितनी अधिक होगी, उतनी ही गंभीरता से उसकी काट-छाँट करनी होगी और उसे बड़े शोधन से उतना ही अधिक गुजरना होगा। इस तरह के लोग इतने निकम्मे होते हैं! उन्हें काफी काट-छाँट और न्याय से गुजरना होगा ताकि वे रुतबे की अपनी इच्छा को पूरी तरह छोड़ दें। यदि तुम लोग इसी तरह से अनुसरण करोगे, तो अंत में कुछ भी नहीं पाओगे। जो लोग जीवन का अनुसरण नहीं करते वे रूपान्तरित नहीं किए जा सकते और जो सत्य के लिए प्यासे नहीं होते हैं वे सत्य प्राप्त नहीं कर सकते हैं। तू व्यक्तिगत रूपान्तरण का अनुसरण करने और प्रवेश करने पर ध्यान नहीं देता; बल्कि तू हमेशा उन असंयत इच्छाओं और उन चीजों पर ध्यान देता है जो तुझे परमेश्वर से प्रेम करने और उसके करीब आने से रोकती हैं। क्या ये चीजें तुझे रूपान्तरित कर सकती हैं? क्या ये तुझे राज्य में ला सकती हैं? यदि तेरे अनुसरण का लक्ष्य सत्य की तलाश करना नहीं है, तो तू इस अवसर का लाभ उठाकर फिर से दुनिया में जाकर अपनी किस्मत आजमा सकती है। अपने समय को इस तरह बर्बाद करना ठीक नहीं है—क्यों अपने आप को यातना देती है? क्या यह सच नहीं है कि तू सुंदर दुनिया में सभी प्रकार की चीजों का आनंद उठा सकती है? धन, सुंदर स्त्री-पुरुष, रुतबा, अभिमान, परिवार, बच्चे, इत्यादि—क्या ये दुनिया की वे बेहतरीन चीजें नहीं हैं जिनका तू आनंद उठा सकती है? यहाँ एक सहूलियत भरे स्थान की खोज में इधर-उधर भटकने का क्या फायदा? जब मनुष्य के पुत्र के पास ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ वह आराम करने के लिए अपना सिर रख सके, तो तुझे आराम के लिए जगह कैसे मिल सकती है? वह तेरे लिए आराम की एक सुन्दर जगह कैसे बना सकता है? क्या यह संभव है? मेरे न्याय के अतिरिक्त, आज तू केवल सत्य की शिक्षाएँ प्राप्त कर सकती है। तू मुझसे आराम प्राप्त नहीं कर सकती और तू मुझसे उस सुखद आशियाने को भी प्राप्त नहीं कर सकती जिसके बारे में तू दिन-रात सोचती रहती है। मैं तुझे दुनिया की दौलत और वैभव नहीं प्रदान करूँगा। यदि तू सच्चे मन से अनुसरण करे, तो मैं तुझे समग्र जीवन का मार्ग देने, तुझे फिर से मछली की तरह पानी में लौटा देने को तैयार हूँ। यदि तू सच्चे मन से अनुसरण नहीं करेगी, तो मैं यह सब वापस ले लूँगा। मैं अपने मुँह के वचन उन्हें प्रदान करने को तैयार नहीं हूँ जो आराम का लालच करते हैं, जो बिल्कुल सूअरों और कुत्तों जैसे हैं!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 328
इस बात का निरीक्षण करना कि तुम जो चीजें करते हो, क्या उसमें धार्मिकता का अभ्यास करते हो, और क्या तुम्हारे क्रियाकलाप परमेश्वर की जाँच-पड़ताल में टिके रह पाते हैं : यह वह सिद्धांत है, जिसके द्वारा परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग अपने कार्य करते हैं। तुम लोग धार्मिक कहलाओगे, क्योंकि तुम लोग परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम हो और क्योंकि तुम परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा स्वीकार करते हो। परमेश्वर की नज़र में जो लोग परमेश्वर की देखभाल, सुरक्षा और पूर्णता स्वीकार करते हैं और जो उसके द्वारा प्राप्त कर लिए जाते हैं, वे धार्मिक लोग हैं और परमेश्वर उन सभी को मूल्यवान समझता है। जितना अधिक तुम परमेश्वर के वर्तमान वचन स्वीकार करते हो, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के इरादे समझने-बूझने में सक्षम हो जाते हो और उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के वचनों को जी सकते हो और उसकी अपेक्षाएँ पूरी कर सकते हो। यह तुम लोगों के लिए परमेश्वर का आदेश है और वह है जिसे प्राप्त करने में तुम लोगों को सक्षम होना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के मापन और परिसीमन के लिए धारणाओं का उपयोग करते हो, मानो परमेश्वर कोई मिट्टी की अचल मूर्ति हो, पूरी तरह परमेश्वर को बाइबल तक सीमांकित करते हो और उसे कार्य के एक सीमित दायरे में बाँधते हो तो इससे यह प्रमाणित होता है कि तुम लोगों ने परमेश्वर की निंदा की है। चूँकि पुराने विधान के युग के यहूदियों ने परमेश्वर को एक अचल प्रतिमा के रूप में लिया था जिसे वे अपने हृदयों में रखते थे, मानो परमेश्वर को मात्र मसीहा ही कहा जा सकता था और मात्र वही जिसे मसीहा कहा जाता था, परमेश्वर हो सकता हो और चूँकि लोग परमेश्वर की सेवा और आराधना इस तरह से करते थे, मानो वह मिट्टी की एक (निर्जीव) मूर्ति हो, इसलिए उन्होंने उस समय के यीशु को मौत की सजा देते हुए सलीब पर चढ़ा दिया—निर्दोष यीशु को इस तरह मौत की सजा दे दी गई। परमेश्वर निर्दोष था, फिर भी मनुष्य ने उसे छोड़ने से इनकार कर दिया, अड़ियल बनकर उसे मृत्युदंड दे दिया और इसलिए यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया। मनुष्य सदैव विश्वास करता है कि परमेश्वर स्थिर है, और वह उसे एक अकेली पुस्तक बाइबल के आधार पर सीमित करता है, मानो मनुष्य को परमेश्वर के प्रबंधन की पूर्ण समझ हो, मानो मनुष्य वह सब अपनी हथेली पर रखता हो जो परमेश्वर करता है। लोग चरम रूप से बेतुके, चरम रूप से अहंकारी हैं और उनमें बड़ी-बड़ी बातें करने का पैदाइशी हुनर है। परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान कितना भी उत्कृष्ट क्यों न हो, मैं फिर भी यही कहता हूँ कि तुम परमेश्वर को नहीं जानते, तुम वह व्यक्ति हो जो परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करता है और तुमने परमेश्वर को दोषी ठहराया है, क्योंकि तुम परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर चलने में सर्वथा अक्षम हो। क्यों परमेश्वर मनुष्य के कार्यकलापों से कभी संतुष्ट नहीं होता? ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को कभी नहीं जानता, उसकी बहुत-सी धारणाएँ हैं, परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान वास्तविकता से किसी भी तरह मेल नहीं खाता; इसके बजाय, वह सूत्रबद्ध और दोहराया जाने वाला होता है और यंत्रवत ढंग से अनुकृत और कठोरता से लागू किया जाता है। और इसलिए, आज पृथ्वी पर आने पर, परमेश्वर को एक बार फिर मनुष्य द्वारा सलीब पर चढ़ा दिया गया है। क्रूर मानवजाति! कुचक्र और षड्यंत्र, एक को दूसरे से छीनना और हथियाना, प्रसिद्धि और लाभ के लिए हाथापाई, आपसी कत्लेआम—यह सब कब समाप्त होगा? परमेश्वर द्वारा बोले गए सैकड़ों हज़ारों वचनों के बावजूद किसी को भी होश नहीं आया है। लोग अपने परिवार और बेटे-बेटियों के वास्ते, आजीविका, भावी संभावनाओं, रुतबे, घमंड और पैसों के लिए, भोजन, कपड़ों और देह के वास्ते कार्य करते हैं। पर क्या कोई ऐसा है, जिसके कार्य वास्तव में परमेश्वर के वास्ते हैं? यहाँ तक कि जो परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं, उनमें से भी थोड़े ही हैं जो परमेश्वर को जानते हैं। कितने लोग अपने स्वयं के हितों के लिए काम नहीं करते? कितने लोग अपना रुतबा बचाए रखने के लिए दूसरों पर अत्याचार या उनका बहिष्कार नहीं करते? और इसलिए, परमेश्वर को असंख्य बार जबरन मृत्युदंड दिया गया है और अनगिनत क्रूर न्यायाधीशों ने परमेश्वर को दोषी ठहराया है और एक बार फिर उसे सलीब पर चढ़ाया है। कितनों को इसलिए धार्मिक लोग कहा जा सकता है, क्योंकि वे वास्तव में परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं?
क्या परमेश्वर के सामने एक पवित्र जन या धार्मिक व्यक्ति के रूप में पूर्ण बनाया जाना इतना आसान है? यह एक सच्चा वक्तव्य है कि “इस पृथ्वी पर कोई भी धार्मिक नहीं है, जो धार्मिक हैं वे इस संसार में नहीं हैं।” जब तुम लोग परमेश्वर के सम्मुख आते हो तो विचार करो कि तुम लोग क्या पहने हुए हो, अपने हर शब्द और क्रिया, हर हरकत, अपने हर विचार और धारणा, और यहाँ तक कि उन सपनों पर भी विचार करो जिन्हें तुम लोग हर दिन देखते हो—वे सब तुम्हारे अपने वास्ते हैं। क्या यह सही स्थिति नहीं है? “धार्मिकता” का अर्थ दूसरों को भिक्षा देना नहीं है, इसका अर्थ अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना नहीं है और इसका अर्थ लड़ाई-झगड़ों और विवादों, लूट या चोरी से अलग रहना नहीं है। धार्मिकता का अर्थ परमेश्वर के आदेश को अपने कर्तव्य के रूप में लेना और समय और स्थान की परवाह किए बिना परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति ऐसे समर्पण करना है जैसे वह स्वर्ग से भेजी गई वृत्ति हो, ठीक वैसे ही जैसे प्रभु यीशु द्वारा सब किया गया था। यही वह धार्मिकता है, जिसके बारे में परमेश्वर ने कहा था। लूत को धार्मिक इसलिए कहा जा सका था, क्योंकि उसने अपने लाभ-हानि का विचार किए बिना परमेश्वर द्वारा भेजे गए दो फ़रिश्तों को बचाया था; उसने उस समय जो किया केवल उसे धार्मिक कहा जा सकता है, परंतु उसे धार्मिक पुरुष नहीं कहा जा सकता। चूँकि लूत ने परमेश्वर को देखा था, केवल इसलिए उसने उन फ़रिश्तों के बदले अपनी दो बेटियाँ दे दीं, किंतु अतीत का उसका समस्त व्यवहार धार्मिकता का प्रतिनिधित्व नहीं करता था। और इसलिए मैं कहता हूँ कि “इस पृथ्वी पर कोई धार्मिक नहीं है।” जो लोग बहाली की धारा में हैं उनमें से भी किसी को धार्मिक व्यक्ति नहीं कहा जा सकता। तुम्हारे कार्यकलाप कितने भी अच्छे क्यों न हों, तुम कैसे भी परमेश्वर के नाम का महिमामंडन करते हुए प्रतीत क्यों न हो, दूसरों को मारते या श्राप नहीं देते, न ही दूसरों की चोरी करते और उन्हें लूटते हो, तब भी तुम्हें धार्मिक नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह बात एक सामान्य व्यक्ति में हो सकती है। अभी जो महत्वपूर्ण है, वह यह है कि तुम परमेश्वर को नहीं जानते। केवल यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में तुममें थोड़ी-सी सामान्य मानवीयता है, लेकिन परमेश्वर द्वारा कही गई धार्मिकता का कोई तत्त्व नहीं है और इसलिए जो कुछ भी तुम करते हो, उसमें से कुछ भी यह साबित करने में सक्षम नहीं है कि तुम परमेश्वर को जानते हो।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बुरे लोगों को निश्चित ही दंड दिया जाएगा
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 329
पहले जब परमेश्वर स्वर्ग में था, तब लोग अपने क्रियाकलापों में परमेश्वर के साथ अनमने ढंग से पेश आते थे। आज परमेश्वर मनुष्य के बीच में रहा है—अनगिनत वर्षों से—और कोई यह नहीं जानता। फिर भी लोग अपने क्रियाकलापों में अभी भी परमेश्वर के साथ अनमने ढंग से पेश आते हैं। क्या लोग अपनी सोच में अत्यंत पिछड़े हुए नहीं हैं? वे बिल्कुल यहूदा के जैसे हैं : यीशु के आने से पहले यहूदा अपने भाई-बहनों को धोखा देने के लिए उनसे झूठ बोला करता था, यहाँ तक कि यीशु के आने के बाद भी वह नहीं बदला; वह यीशु के बारे में जरा भी नहीं जानता था और अंत में उसने यीशु से गद्दारी कर दी। क्या इसका कारण यह नहीं था कि वह परमेश्वर को नहीं जानता था? यदि आज तुम लोग अभी भी परमेश्वर को नहीं जानते तो संभव है कि तुम लोग दूसरे यहूदा बन जाओ और इसके परिणामस्वरूप दो हज़ार वर्ष पहले अनुग्रह के युग में यीशु को सलीब पर चढ़ाए जाने की त्रासदी पुनः खेली जाए। क्या तुम लोगों को इस बात पर विश्वास नहीं है? यह सच है! वर्तमान में ज़्यादातर लोग ऐसी ही स्थिति में हैं। शायद अभी यह कहना थोड़ी जल्दबाज़ी हो, लेकिन ऐसे सभी लोग यहूदा की भूमिका निभाते हैं। मैं अनर्थक बातें नहीं कह रहा, बल्कि तथ्य के आधार पर कह रहा हूँ—और तुम विश्वास किए बिना नहीं रह सकते। यद्यपि अनेक लोग विनम्रता का दिखावा करते हैं, किंतु उनके हृदयों में बंद पानी के एक कुंड, बदबूदार पानी के एक गड्ढे के अलावा कुछ नहीं है। अभी कलीसिया में इस तरह के बहुत लोग हैं और तुम लोग सोचते हो, मुझे बिल्कुल कुछ पता नहीं है। आज मेरा आत्मा मेरे लिए खड़ा होता है और मेरे लिए गवाही देता है। क्या तुम्हें लगता है कि मैं कुछ नहीं जानता? क्या तुम लोगों को लगता है कि मैं तुम लोगों के दिलों के अंदर के कपटपूर्ण विचारों या जो चीजें तुम अपने दिलों के भीतर रखते हो, उनके बारे में कुछ नहीं समझता? क्या परमेश्वर पर धौंस जमाना इतना आसान है? क्या तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर के साथ जैसा चाहो वैसा व्यवहार कर सकते हो? अतीत में मैं चिंतित था कि कहीं तुम लोग बाधित न हो जाओ, इसलिए मैं तुम लोगों को स्वतंत्रता देता गया, किंतु मानवता ने उसके प्रति दिखाई गई दयालुता को नहीं सराहा और इसलिए जब मैंने उन्हें उँगली पकड़ाई तो उन्होंने पहुँचा पकड़ लिया। अपने बीच एक-दूसरे से पूछो : मैंने लगभग कभी किसी की भी काट-छाँट नहीं की और मैंने किसी को भी कभी यूँ ही नहीं फटकारा—फिर भी मैं मनुष्य की प्रेरणाओं और धारणाओं के बारे में बहुत स्पष्ट हूँ। क्या तुम्हें लगता है कि स्वयं परमेश्वर, जिसकी गवाही परमेश्वर देता है, मूर्ख है? यदि ऐसा है, तो मैं कहता हूँ कि तुम बहुत अंधे हो। मैं तुम्हें उजागर नहीं करूँगा, पर आओ देखें कि तुम कितने भ्रष्ट हो सकते हो। आओ देखें कि क्या तुम्हारी तुच्छ चालाकियाँ तुम्हें बचा सकती हैं या परमेश्वर से प्रेम करने के लिए सर्वोत्तम प्रयास करना तुम्हें बचा सकता है? आज मैं तुम्हें दोषी नहीं ठहराऊँगा; यह देखने के लिए परमेश्वर के समय का इंतजार करते हैं कि वह तुमसे कैसे प्रतिशोध लेता है। अब मेरे पास तुम्हारे साथ निरर्थक बातचीत के लिए समय नहीं है और मैं केवल तुम्हारे वास्ते अपने वृहत्तर काम में विलंब नहीं करना चाहता। तुम जैसे किसी भुनगे के साथ काट-छाँट करने में परमेश्वर को जो समय लगेगा, तुम उसके योग्य नहीं हो—इसलिए आओ देखें, तुम कितने लंपट हो सकते हो। ऐसे लोग परमेश्वर के थोड़े-से भी ज्ञान का अनुसरण नहीं करते, न ही उनका हृदय जरा-भी परमेश्वर-प्रेमी होता है और फिर भी वे परमेश्वर द्वारा धार्मिक लोग कहलाए जाने की इच्छा रखते हैं—क्या यह एक मजाक नहीं है? चूँकि वास्तव में ईमानदार लोगों की संख्या बहुत थोड़ी है, इसलिए मैं केवल मनुष्य को निरंतर जीवन देने पर ध्यान केंद्रित करूँगा। मैं केवल वही करूँगा, जो मुझे आज करना चाहिए, किंतु भविष्य में मैं हर व्यक्ति को उसके कार्यों के अनुसार प्रतिफल दूँगा। जो कहने की बात है, वह मैंने कह दी है, क्योंकि ठीक यही वह कार्य है, जो मैं करता हूँ। मैं केवल वही करता हूँ जो मुझे करना चाहिए और वह नहीं करता जो मुझे नहीं करना चाहिए। फिर भी मुझे आशा है कि तुम लोग खुद को अधिक जाँचोगे : वास्तव में परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान कितना सच्चा है? क्या तुम वह व्यक्ति हो जिसने परमेश्वर को एक बार और सलीब पर चढ़ा दिया है? मेरे अंतिम वचन ये हैं : धिक्कार है उन लोगों पर जो परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बुरे लोगों को निश्चित ही दंड दिया जाएगा
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 330
जब तुम आज के मार्ग पर चलते हो, तो सबसे उपयुक्त प्रकार का अनुसरण क्या होता है? अपने अनुसरण में तुम्हें खुद को किस तरह के व्यक्ति के रूप में देखना चाहिए? तुम्हारे लिए यह जानना उचित है कि आज तुम जिसका भी सामना करते हो, उसे तुम्हें कैसे लेना चाहिए, फिर चाहे वे परीक्षण हों या कठिनाइयाँ, शाप हों या निर्मम ताड़ना। इन सभी चीजों का सामना करते हुए तुम्हें इनमें से हर एक पर ध्यान से विचार करना चाहिए। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मैं ऐसा इसलिए कहता हूँ क्योंकि आज जिन चीजों का तुम सामना करते हो, वे अंततः छोटी अवधि के परीक्षण हैं जो बार-बार आते हैं; शायद जहाँ तक तुम्हारी बात है, वे विशेष रूप से तनावपूर्ण नहीं हैं और इसलिए तुम चीजों को बिना हस्तक्षेप किए उनके स्वाभाविक क्रम में चलने देते हो और उन्हें प्रगति के लिए किए जाने वाले अनुसरण में कोई मूल्यवान संपत्ति नहीं मानते। तुम कितने विचारहीन हो! तुम इतने विचारहीन हो कि इस मूल्यवान संपत्ति को अपनी आँखों के सामने तैरते हुए बादल जैसा समझते हो और बार-बार बरसने वाले इन कठोर आघातों को सँजोकर नहीं रखते—ये आघात अल्पकालिक होते हैं और तुम्हें बहुत भारी भी नहीं लगते—बल्कि तुम उन्हें दिल पर नहीं लेते, ठंडी अनासक्ति से देखते हो और उन्हें केवल ऐसा समझते हो जैसे किसी ईंट की दीवार से टकरा गए हो। तुम इतने घमंडी हो! इन भयंकर हमलों के प्रति, जो बार-बार आने वाले तूफानों की तरह हैं, तुम केवल लापरवाही भरी उपेक्षा दिखाते हो; कभी-कभी तो तुम पूर्ण उदासीनता प्रकट करते हुए एक ठंडी मुस्कान तक दे देते हो—क्योंकि तुमने अपने मन में कभी एक बार भी यह नहीं सोचा कि तुम इस तरह के “दुर्भाग्य” क्यों झेलते रहते हो। क्या ऐसा हो सकता है कि मैं मनुष्य के साथ घोर अन्याय करता हूँ? क्या मैं तुम्हारी गलतियाँ निकालने को अपना काम बना लेता हूँ? भले ही तुम्हारी सोच से जुड़ी समस्याएँ उतनी गंभीर न हों, जितनी मैंने वर्णित की हैं, फिर भी तुमने अपने बाहरी आत्मसंयम के माध्यम से पहले से ही अपनी आंतरिक दुनिया की एक उत्तम तस्वीर चित्रित की है। मुझे यह बताने की कोई आवश्यकता नहीं कि तुम्हारे दिल की गहराइयों में छिपी चीजें मात्र बेतुके अपशब्द और उदासी के हल्के निशान हैं, जिन्हें दूसरे मुश्किल से ही देख पाते हैं। चूँकि तुम्हें लगता है कि इस तरह के परीक्षण झेलना बहुत गलत है, इसलिए तुम कोसते हो; और चूँकि ये परीक्षण तुम्हें दुनिया की वीरानी का एहसास कराते हैं, इसलिए तुम उदासी से भर जाते हो। तुम इन बार-बार के आघातों और अनुशासन के क्रियाकलापों को सर्वोत्तम सुरक्षा के रूप में नहीं देखते; तुम उन्हें स्वर्ग द्वारा पैदा की गई निरर्थक परेशानियों के रूप में, या फिर तुम पर आने वाले उचित दंड के रूप में देखते हो। तुम कितने अज्ञानी हो! तुम निर्दयतापूर्वक अच्छे समय को अँधेरे में कैद कर लेते हो; तुम अद्भुत परीक्षणों और अनुशासन के एक के बाद एक अनुभवों को अपने शत्रुओं द्वारा किए गए हमलों के रूप में देखते हो। तुम नहीं जानते कि अपने परिवेश में कैसे ढलना है, और ऐसा करने का प्रयास करने के इच्छुक तो तुम बिल्कुल भी नहीं हो, क्योंकि तुम इस बार-बार की—और अपनी दृष्टि में निर्मम—ताड़ना से कुछ भी हासिल करने के लिए तैयार नहीं हो। तुम न तो खोजने का और न ही अन्वेषण करने का कोई प्रयास करते हो, और बस अपने भाग्य के आगे नतमस्तक हो, जहाँ वह ले जाए, चले जाते हो। जो शायद तुम्हें ताड़ना के बर्बर कार्य लगते हैं, उन्होंने तुम्हारा दिल नहीं बदला, न ही उन्होंने तुम्हारे दिल पर कब्जा किया है; इसके बजाय उन्होंने तुम्हारे दिल में छुरा घोंपा है। तुम इस “क्रूर ताड़ना” को इस जीवन में सिर्फ अपने दुश्मन की तरह देखते हो, और इसलिए तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया है। तुम इतने आत्मतुष्ट हो! तुम शायद ही कभी यह मानते हो कि तुम इस तरह के परीक्षण इसलिए भुगतते हो क्योंकि तुम बहुत घृणित हो; इसके बजाय तुम खुद को बहुत अभागा समझते हो, और तो और, यह भी कहते हो कि मैं हमेशा तुम्हारी गलतियाँ निकालता रहता हूँ। और आज जब चीजें इस मुकाम पर पहुँच गई हैं, तो तुम उसके बारे में वास्तव में कितना जानते हो, जो मैं कहता और करता हूँ? यह मत सोचो कि तुम एक स्वाभाविक रूप से जन्मी विलक्षण प्रतिभा हो, जो स्वर्ग से थोड़ी ही निम्न, किंतु पृथ्वी से कहीं अधिक ऊँची है। तुम किसी दूसरे से ज्यादा होशियार नहीं हो—यहाँ तक कि यह भी कहा जा सकता है कि पृथ्वी पर जितने भी विवेकशील लोग हैं, उनसे तुम्हारा कहीं ज्यादा मूर्ख होना हास्यास्पद है, क्योंकि तुम खुद को बहुत ऊँचा समझते हो और तुममें कभी हीनता की भावना नहीं रही, मानो तुम मेरे कार्यों को उनके छोटे से छोटे ब्योरे तक स्पष्ट रूप से देख सकते हो। वास्तव में, तुम ऐसे व्यक्ति ही नहीं हो, जिसमें विवेक हो, क्योंकि तुम्हें इस बात का कुछ पता नहीं कि मैं क्या करने का इरादा रखता हूँ, और तुम इस बात से तो बिल्कुल भी अवगत नहीं हो कि मैं अभी क्या कर रहा हूँ। और इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम एक बूढ़े किसान के बराबर भी नहीं हो, एक ऐसा किसान जिसे मानव-जीवन की थोड़ी सी भी समझ नहीं है फिर भी जो भूमि पर खेती करते समय अपना सारा भरोसा स्वर्ग के आशीषों पर रखता है। तुम्हें अपने जीवन की जरा भी परवाह नहीं है, तुम प्रसिद्धि के बारे में भी कुछ नहीं जानते और तुममें आत्म-जागरूकता तो बिल्कुल भी नहीं है। तुम वास्तव में इतने “महान” हो!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो लोग सीखते नहीं और अज्ञानी बने रहते हैं—क्या वे जानवर नहीं हैं?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 331
जहाँ तक मेरे द्वारा तुम लोगों को बार-बार दी गई शिक्षाओं की बात है, तो उन्हें तो तुम लोगों ने बहुत पहले ही अपने दिमाग में पीछे की ओर धकेल दिया है, यहाँ तक कि तुम उनके साथ ऐसे पेश आते हो मानो वे खाली समय में जी बहलाने वाली खेलने की चीज हों। इन सभी चीजों को तुम हमेशा अपना व्यक्तिगत “ताबीज” मानकर देखते हो। जब शैतान तुम पर आरोप लगाता है, तब तुम प्रार्थना करते हो; नकारात्मक होने पर तुम गहरी नींद में चले जाते हो; जब तुम खुश होते हो, तो अंधाधुंध दौड़ते हो; जब मैं तुम्हें फटकारता हूँ, तो तुम दीन-हीन होकर गिड़गिड़ाने और खुशामद करने लगते हो; और फिर मेरे सामने से जाते ही दुष्टतापूर्ण उल्लास से हँसते हो। तुम खुद को दूसरे सभी लोगों से ऊँचा समझते हो, लेकिन तुम कभी भी खुद को सबसे गर्वीला नहीं समझते, और हमेशा इतने अभिमानी, आत्म-संतुष्ट और घमंडी होते हो कि शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। ऐसे “छोटे मालिक”, “छोटी मालकिनें”, “हुजूर” और “मालकिनें”, जो सीखते नहीं और अज्ञानी बने रहते हैं, मेरे वचनों को अनमोल खजाना कैसे मान सकते हैं? तो मैं तुमसे पूछता हूँ : इतने लंबे समय में तुमने मेरे वचनों और मेरे कार्य से आखिर क्या सीखा है? क्या तुमने धोखा देने के बेहतर कौशल सीखे हैं? या अपनी देह में और अधिक सांसारिक चतुराई विकसित करना? या मेरे प्रति अपने रवैये में अधिक अनादर? मैं तुमसे सीधे कहता हूँ : मेरे द्वारा किए गए इन्हीं सभी कार्यों ने तुम्हें—जिसमें कभी चूहे जितना भी साहस हुआ करता था—और अधिक निर्भीक बना दिया। मेरे प्रति तुम जिस डर की भावना का अनुभव करते हो, वह हर गुजरते दिन के साथ कम होती जाती है, क्योंकि मैं बहुत दयालु हूँ और मैंने हिंसा का प्रयोग करके तुम्हारी देह को कभी ताड़ना नहीं दी है। शायद, तुम समझते हो कि मैं केवल कठोर शब्द बोल रहा हूँ—लेकिन अकसर ऐसा होता है कि मैं तुम्हें मुस्कराता हुआ चेहरा दिखाता हूँ, और मैं लगभग कभी तुम्हारे मुँह पर तुम्हें नहीं डाँटता। इसके अलावा, मैं हमेशा तुम्हारी कमजोरी के प्रति सहनशील रहता हूँ और पूर्णतः इसी वजह से आज तुम मेरे साथ वैसा व्यवहार करते हो, जैसा साँप ने दयालु किसान के साथ किया था। मैं मानवजाति के कौशल की पराकाष्ठा और उसकी निरीक्षण-शक्तियों की कुशाग्रता की कितनी प्रशंसा करता हूँ! मैं तुम्हें एक सत्य बता दूँ : आज यह बहुत कम महत्त्व रखता है कि तुम्हारे पास भय मानने वाला हृदय है या नहीं; उसके बारे में मैं न तो चिंतित हूँ और न ही व्याकुल। लेकिन मुझे तुम्हें यह भी बताना होगा : तुम यह “प्रतिभा के धनी” व्यक्ति, जो सीखते नहीं और अज्ञानी बने रहते हो, अंततः अपनी आत्म-प्रशंसात्मक क्षुद्र चतुराई के कारण पतन को प्राप्त हो जाओगे—तुम वही होगे जो दुःख भोगेगा और जिसे ताड़ना दी जाएगी। मैं इतना बेवकूफ नहीं हूँ कि जब तुम नरक में दुःख भुगतोगे तो मैं तुम्हारा साथ दूँगा, क्योंकि मैं तुम्हारे जैसा नहीं हूँ। मत भूलो कि तुम एक सृजित प्राणी हो, जिसे मेरे द्वारा शाप दिया गया है, लेकिन जिसे मेरे द्वारा सिखाया और बचाया भी जाता है, और तुममें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे मैं छोड़ना न चाहूँ। मैं जिस भी समय अपना काम करता हूँ, मैं कभी किसी भी व्यक्ति, घटना या चीज से प्रभावित नहीं होता। मानवजाति के प्रति मेरा रवैया और दृष्टिकोण हमेशा एक-से रहे हैं। मैं तुम्हारे प्रति अनुकूल भाव नहीं रखता, क्योंकि तुम मेरे प्रबंधन का केवल एक गौण हिस्सा हो और तुम किसी भी अन्य प्राणी से अधिक विशेष नहीं हो। तुम्हें मेरी यह सलाह है : तुम्हें हर समय यह याद रखना चाहिए कि तुम परमेश्वर द्वारा सृजित प्राणी से अधिक कुछ नहीं हो! हालाँकि तुम अपना अस्तित्व मेरे साथ साझा करते हो, लेकिन तुम्हें अपनी पहचान पता होनी चाहिए; अपने बारे में बहुत ऊँची राय मत रखो। अगर मैं तुम्हें न भी फटकारूँ, या तुम्हारी काट-छाँट न भी करूँ और मुस्कराते चेहरे के साथ तुम्हारा अभिवादन भी करूँ, तो भी यह ये साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि तुम मेरे समान ही हो। तुम—तुम्हें खुद को सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति के रूप में जानना चाहिए, खुद सत्य के रूप में नहीं! तुम्हें हर समय मेरे वचनों के अनुसार बदलने के लिए तैयार रहना ही होगा। तुम इससे बच नहीं सकते। मैं तुमसे आग्रह करता हूँ, इस मूल्यवान समय के दौरान, जब तुम्हारे पास यह दुर्लभ अवसर है, कुछ सीखने का प्रयास करो। मुझे मूर्ख मत बनाओ; मैं नहीं चाहता कि तुम मुझे धोखा देने के लिए मेरी चापलूसी करो। जब तुम मुझे खोजते हो, तो यह पूरी तरह से मेरे लिए नहीं होता, बल्कि तुम्हारे खुद के लिए होता है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो लोग सीखते नहीं और अज्ञानी बने रहते हैं—क्या वे जानवर नहीं हैं?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 332
इस समय हर वह दिन निर्णायक है जिसे तुम लोग जीते हो और यह तुम्हारे गंतव्य और भाग्य के लिए बड़े ही महत्व का है, इसलिए आज जो कुछ भी तुम्हारे पास है, वह सब तुम्हें सँजोना चाहिए और गुजरने वाले हर क्षण को सँजोना चाहिए। सबसे बड़े लाभ बटोर सकने के लिए तुम्हें हर पल का उपयोग करना चाहिए, और इस तरह जीवन व्यर्थ जीने से बचना चाहिए। तुम लोग इस बात को लेकर भ्रमित महसूस कर सकते हो कि मैं इस तरह के वचन क्यों कहता हूँ। स्पष्ट कहूँ तो मैं तुम लोगों में से किसी के भी व्यवहार से प्रसन्न नहीं हूँ। क्योंकि तुमसे मुझे जो आशाएँ थीं, वे वैसी नहीं थीं जैसे तुम आज हो। इस प्रकार, मैं यह कह सकता हूँ : तुम लोगों में से प्रत्येक व्यक्ति खतरे के कगार पर है और मदद के लिए तुम्हारी पहले की पुकारें और सत्य का अनुसरण करने तथा रोशनी की खोज करने की तुम्हारी पूर्व आकांक्षाएँ खत्म होने वाली हैं। यह मेरे प्रति तुम्हारे प्रतिदान का अंतिम प्रदर्शन है और यह कुछ ऐसी चीज है जिसकी मैंने कभी अपेक्षा नहीं की थी। मैं तथ्यों के विपरीत कुछ नहीं कहना चाहता, क्योंकि तुम लोगों ने मुझे बहुत निराश किया है। शायद तुम लोग इसे बिना विरोध किए स्वीकार नहीं करना चाहते हो, वास्तविकता का सामना नहीं करना चाहते हो—फिर भी मुझे तुमसे गंभीरता से यह पूछना ही होगा : इन सभी वर्षों में तुम्हारे हृदय वास्तव में किन चीजों से भरे रहे हैं? वे वास्तव में किसके प्रति वफादार हैं? यह मत कहना कि ये प्रश्न अनायास कहाँ से आ गए और मुझसे यह मत पूछना कि मैंने ऐसी बातें क्यों पूछी हैं। यह जान लो : चूँकि मैं तुम लोगों को बहुत ही अच्छी तरह से जानता हूँ, मैं तुम्हारी बहुत ही अधिक परवाह करता हूँ और तुम्हारे आचरण और कर्मों में मैंने अपना बहुत अधिक हृदय लगाया है, इसलिए मैंने तुमसे लगातार हिसाब माँगा है और कड़वी कठिनाइयाँ सही हैं। फिर भी तुम लोग मुझे बदले में उदासीनता और असहाय विवशता के सिवा कुछ नहीं देते हो। तुम लोग मेरे प्रति इतने लापरवाह रहे हो; क्या यह संभव है कि मैं इसके बारे में कुछ भी नहीं जानता हूँ? अगर तुम लोग यही मानते हो, तो इससे यह तथ्य और भी अधिक प्रमाणित हो जाता है कि तुम मेरे साथ सच्चे मन से दयालुता से व्यवहार नहीं करते हो। और इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोग खुद को धोखा दे रहे हो। तुम सभी लोग बहुत चतुर हो इतने कि यह भी नहीं जानते कि तुम क्या कर रहे हो—तो फिर तुम मुझे अपना हिसाब देने के लिए किस चीज का उपयोग करोगे?
मेरे लिए सबसे ज्यादा चिंता का सवाल यह है कि तुम लोगों के हृदय किसके प्रति वफादार हैं। मुझे यह भी आशा है कि तुममें से प्रत्येक अपने विचारों को व्यवस्थित करने की कोशिश करेगा और खुद से पूछेगा कि तुम वास्तव में किसके प्रति वफादार हो और वास्तव में किसके लिए जीते हो। शायद तुम लोगों ने इन प्रश्नों पर कभी सावधानीपूर्वक विचार नहीं किया है, अतः मेरे द्वारा तुम्हारे सामने इनका उत्तर प्रकट करना कैसा रहेगा?
स्मृति वाला कोई भी व्यक्ति इस तथ्य को स्वीकार करेगा : मनुष्य अपने लिए जीता है और अपने प्रति वफादार होता है। मैं तुम लोगों के उत्तरों को पूरी तरह से सही नहीं मानता, क्योंकि तुममें से प्रत्येक अपनी-अपनी जिंदगी में गुजर-बसर कर रहा है और अपने व्यक्तिगत कष्ट के बीच संघर्ष कर रहा है। इसलिए, तुम ऐसे लोगों के प्रति वफादार हो, जिनसे तुम प्रेम करते हो और जो चीजें तुम्हें पसंद हैं; तुम अपने प्रति पूर्णतः वफादार नहीं हो। क्योंकि तुम लोगों में से हर एक अपने आसपास के लोगों, घटनाओं और चीजों से प्रभावित है, तुम अपने प्रति सच्चे अर्थों में वफादार नहीं हो। मैं ये वचन तुम लोगों के अपने प्रति वफादार होने का समर्थन करने के लिए नहीं, बल्कि किसी एक चीज के प्रति तुम्हारी वफादारी उजागर करने के लिए कह रहा हूँ, क्योंकि इतने वर्षों के दौरान मैंने तुममें से किसी से भी कभी कोई वफादारी नहीं पाई है। इन सब वर्षों में तुम लोगों ने मेरा अनुसरण किया है, फिर भी तुमने मुझे कभी वफादारी का एक कण भी नहीं दिया है। इसके बजाय, तुम उन लोगों और चीजों के इर्द-गिर्द घूमते रहे हो जिन्हें तुम लोग पसंद करते हो—इतना कि हर समय, और हर जगह जहाँ तुम जाते हो, उन्हें अपने हृदय के करीब रखते हो और तुमने कभी भी उन्हें छोड़ा नहीं है। जब भी तुम लोग किसी एक चीज के बारे में, जिससे तुम प्रेम करते हो, उत्सुक और जोशीले हो रहे होते हो, तो तुम ऐसा उसी समय कर रहे होते हो जब तुम मेरा अनुसरण कर रहे होते हो, यहाँ तक कि जब तुम साथ ही मेरे वचनों को सुन रहे होते हो। इसलिए मैं कहता हूँ कि जिस वफादारी की अपेक्षा मैं तुम लोगों से करता हूँ, उसे तुम लोग अपने “पालतुओं” के प्रति वफादार होने और उन्हें संजोने के लिए इस्तेमाल कर रहे हो। हालाँकि तुम लोग मेरे लिए एक-दो चीजों का त्याग करते हो, पर वह तुम्हारे सर्वस्व का प्रतिनिधित्व नहीं करता, और यह नहीं दर्शाता कि वह मैं हूँ, जिसके प्रति तुम सचमुच वफादार हो। तुम लोग खुद को उन उपक्रमों में संलग्न कर देते हो, जिनके प्रति तुम बहुत गहरा चाव रखते हो : तुममें से कुछ अपने बेटे-बेटियों के प्रति वफादार हैं, तो अन्य अपने पतियों, पत्नियों, धन-संपत्ति, व्यवसाय, वरिष्ठ अधिकारियों, हैसियत या स्त्रियों के प्रति वफादार हैं। जिन चीजों के प्रति तुम लोग वफादार होते हो, उनसे तुम कभी ऊबते या नाराज नहीं होते; बल्कि तुम उन चीजों को ज्यादा बड़ी मात्रा में और बेहतर तरीके से पाने के लिए और अधिक लालायित हो जाते हो और तुम कभी भी ऐसा करना छोड़ते नहीं हो। मेरे वचन और मैं हमेशा उन चीजों के पीछे धकेल दिए जाते हैं, जिनके प्रति तुम गहरा चाव रखते हो, और तुम्हारे पास उन्हें आखिरी स्थान पर रखने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचता। ऐसे लोग भी हैं जो इस आखिरी स्थान को भी उन चीजों के लिए छोड़ देते हैं जिनके लिए वे वफादार हैं, लेकिन जिन्हें उन्होंने अभी खोजा नहीं है। उनके दिलों में कभी भी मेरा मामूली-सा भी निशान नहीं रहा है। तुम लोग सोच सकते हो कि मैं तुमसे बहुत ज्यादा अपेक्षा रखता हूँ या तुम पर गलत आरोप लगा रहा हूँ—लेकिन क्या तुमने कभी इस तथ्य पर ध्यान दिया है कि जब तुम खुशी-खुशी अपने परिवार के साथ समय बिता रहे होते हो, तो तुम कभी भी मेरे प्रति वफादार नहीं रहे हो? इस समय, क्या तुम लोगों को इससे तकलीफ नहीं होती? जब तुम लोगों के दिल अपनी मेहनत का प्रतिफल पाकर खुशी से भरे होते हैं, तब क्या तुम लोग खुद को पर्याप्त सत्यों से लैस न करने के कारण निराश महसूस नहीं करते? मेरा अनुमोदन प्राप्त न करने पर तुम लोग कब रोए हो? तुम लोग अपने बेटे-बेटियों के लिए अपना दिमाग खपाते हो और बहुत तकलीफ उठाते हो, फिर भी तुम संतुष्ट नहीं होते; फिर भी तुम यह मानते हो कि तुमने उनके लिए ज्यादा मेहनत नहीं की है, कि तुमने उनके लिए वह सब कुछ नहीं किया है जो तुम कर सकते थे, जबकि मेरे लिए तुम हमेशा से असावधान और लापरवाह रहे हो; मैं केवल तुम्हारी यादों में रहता हूँ, तुम्हारे दिलों में नहीं। तुम लोग कभी मेरे श्रमसाध्य इरादों को समझने की कोशिश नहीं करते या उनके प्रति कभी विचारशीलता नहीं दिखाते हो। तुम सिर्फ मामूली संक्षिप्त सोच-विचार करते हो, और समझते हो कि यह काफी होगा। यह “वफादारी” वह नहीं है, जिसकी मैंने लंबे समय से कामना की है, बल्कि वह है जिससे मैंने लंबे समय से नफरत की है। फिर भी, चाहे मैं कुछ भी कहूँ, तुम केवल एक-दो चीजें ही स्वीकार करते रहते हो; तुम इसे पूरी तरह स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि तुम सभी बहुत “आत्मविश्वासी” हो; तुम हमेशा मेरे द्वारा कहे गए वचनों में से यह छाँट लेते हो कि क्या स्वीकार करना है और क्या नहीं। अगर तुम लोग आज भी ऐसे ही हो, तो मेरे पास भी तुम्हारे आत्मविश्वास से निपटने के लिए कुछ तरीके हैं—और तो और, मैं तुम्हें स्वीकार करवा दूँगा कि मेरे वचन सत्य हैं और उनमें से कोई भी तथ्यों को विकृत नहीं करता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम वास्तव में किसके प्रति वफादार हो?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 333
अगर मैं तुम लोगों के सामने अभी कुछ पैसे रखूँ और तुम्हें चुनने की आजादी दूँ—और अगर मैं तुम्हारी पसंद के लिए तुम्हारी निंदा न करूँ—तो तुममें से ज्यादातर लोग पैसे का चुनाव करेंगे और सत्य को छोड़ देंगे। तुममें से जो बेहतर होंगे, वे पैसे को छोड़ देंगे और अनिच्छा से सत्य को चुन लेंगे, जबकि इन दोनों के बीच वाले एक हाथ से पैसे को झपट लेंगे और दूसरे हाथ से सत्य को। इस तरह तुम्हारा असली रंग क्या स्वतः प्रकट नहीं हो जाएगा? सत्य और किसी ऐसी अन्य चीज के बीच, जिसके प्रति तुम लोग वफादार हो, तुम सभी ऐसा ही चुनाव करोगे और तुम्हारा रवैया ऐसा ही रहेगा। क्या ऐसा नहीं है? तुम लोगों में बहुत-से सही और गलत के बीच डगमगाए हैं, है ना? सकारात्मक और नकारात्मक, काले और सफेद, परिवार और परमेश्वर, संतानों और परमेश्वर, सद्भाव और बिगाड़, धन और गरीबी, रुतबा और मामूलीपन, समर्थन दिए जाने और ठुकरा दिए जाने इत्यादि के बीच सभी संघर्षों के दौरान तुम लोगों ने जो विकल्प चुने हैं उनके बारे में तुम लोग निश्चित ही अनजान नहीं हो! एक सौहार्दपूर्ण परिवार और टूटे हुए परिवार के बीच तुमने पहले को चुना और तुमने ऐसा बिना किसी संकोच के किया; धन-संपत्ति और कर्तव्य के बीच तुमने फिर से पहले को चुना, यहाँ तक कि तुममें किनारे पर वापस लौटने[क] की इच्छा भी नहीं रही; विलासिता और निर्धनता के बीच तुमने पहले को चुना; अपने बच्चों, पत्नियों और पतियों या मेरे बीच तुमने पहले को चुना; और धारणाओं और सत्य के बीच तुमने अब भी पहले को चुना। तुम लोगों के तरह-तरह के बुरे कर्मों को देखते हुए मेरा विश्वास तुम पर से बिल्कुल उठ गया है, मैं बिल्कुल स्तब्ध हूँ। तुम्हारे हृदय अप्रत्याशित रूप से इतने कठोर हैं कि उन्हें कोमल नहीं बनाया जा सकता। सालों तक मैंने अपने हृदय का जो खून खपाया है, उससे मुझे आश्चर्यजनक रूप से तुम्हारे परित्याग और विवशता से अधिक कुछ नहीं मिला, लेकिन तुम लोगों के प्रति मेरी आशाएँ हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती ही जाती हैं, क्योंकि मेरा दिन सबके सामने पूरी तरह से खुला हुआ है। फिर भी अब तुम लोग अंधेरी और बुरी चीजों का पीछा कर रहे हो और उनसे अपनी पकड़ ढीली करने से इनकार करते हो। तो फिर तुम्हारा परिणाम क्या होगा? क्या तुम लोगों ने कभी इस पर सावधानी से विचार किया है? अगर तुम लोगों को फिर से चुनाव करने को कहा जाए, तो तुम्हारा क्या रुख रहेगा? क्या अब भी तुम लोग पहले को ही चुनोगे? क्या अब भी तुम लोग निराशा और दर्दनाक शोक से मेरा प्रतिदान करोगे? क्या अब भी तुम्हारे हृदयों में जरा-सी ही गर्मजोशी होगी? क्या तुम अब भी इस बात से अनभिज्ञ रहोगे कि मेरे हृदय को सुकून पहुँचाने के लिए तुम्हें क्या करना चाहिए? इस क्षण तुम्हारा चुनाव क्या है? क्या तुम मेरे वचनों के प्रति समर्पण करोगे या उनसे विमुख रहोगे? मेरा दिन तुम लोगों की आँखों के सामने रख दिया गया है, और एक नया जीवन और एक नया प्रारंभिक बिंदु तुम लोगों के सामने है। लेकिन मुझे तुम लोगों को बताना होगा कि यह प्रारंभिक बिंदु नए कार्य का प्रारंभ नहीं है जैसा कि अतीत में हुआ था, बल्कि यह पुराने कार्य का अंत है। अर्थात् यह अंतिम कार्य है। मेरा ख्याल है कि तुम लोग समझ सकते हो कि इस प्रारंभिक बिंदु के बारे में असामान्य क्या है। लेकिन जल्दी ही किसी दिन तुम लोग इस प्रारंभिक बिंदु का सही अर्थ समझ जाओगे, अतः आओ, हम एक-साथ इससे आगे बढ़ें और आने वाले समापन का स्वागत करें! लेकिन तुम्हारे बारे में जो बात मुझे चिंतित किए रहती है, वह यह है कि अन्याय और न्याय से सामना होने पर तुम लोग हमेशा पहले को चुनते हो। हालाँकि यह सब तुम्हारे अतीत की बात है। मैं तुम लोगों के अतीत की हर बात भूल जाने की उम्मीद करता हूँ, हालाँकि ऐसा करना बहुत मुश्किल है। फिर भी मेरे पास ऐसा करने का एक अच्छा तरीका है : भविष्य को अतीत का स्थान लेने दो और अपने अतीत की छाया मिटाकर अपने आज के सच्चे व्यक्तित्व को उसकी जगह लेने दो। इस तरह मैं एक बार फिर तुम लोगों को चुनाव करने का कष्ट दूँगा : तुम वास्तव में किसके प्रति वफादार हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम वास्तव में किसके प्रति वफादार हो?
फुटनोट :
क. किनारे पर वापस लौटना : एक चीनी कहावत, जिसका मतलब है “अपने बुरे कामों से विमुख होना; अपने बुरे काम छोड़ना।”
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 334
जब भी गंतव्य का जिक्र होता है, तुम लोग उसे विशेष गंभीरता से लेते हो; इतना ही नहीं, यह एक ऐसी चीज़ है, जिसके बारे में तुम सभी विशेष रूप से संवेदनशील हो। कुछ लोगों से एक अच्छा गंतव्य पाने के लिए परमेश्वर के सामने दंडवत करते हुए अपने सिर जमीन पर पटकने का इंतज़ार नहीं हो पा रहा है। मैं तुम्हारी उत्सुकता देखता हूँ, जिसे शब्दों में व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। यह इससे अधिक कुछ नहीं है कि तुम लोग अपनी देह विपत्ति में नहीं डालना चाहते, और भविष्य में चिरस्थायी सज़ातो बिल्कुल भी नहीं भुगतना चाहते। तुम लोग केवल स्वयं को थोड़ा और उन्मुक्त, थोड़ा और आसान जीवन जीने देने की आशा करते हो। इसलिए जब भी गंतव्य का जिक्र होता है, तुम लोग खास तौर से बेचैन महसूस करते हो और अत्यधिक डर जाते हो कि अगर तुम लोग पर्याप्त सतर्क नहीं रहे, तो तुम परमेश्वर को नाराज़ कर सकते हो और इस प्रकार उस दंड के भागी हो सकते हो, जिसके तुम पात्र हो। अपने गंतव्य की खातिर तुम लोग समझौते करने से भी नहीं हिचके हो, यहाँ तक कि तुममें से कई लोग, जो कभी कुटिल और चंचल थे, अचानक विशेष रूप से विनम्र और ईमानदार बन गए हैं; तुम्हारी ईमानदारी का दिखावा बिल्कुल कँपा देने वाला है। फिर भी, तुम सभी के पास “ईमानदार” दिल हैं, और तुम लोगों ने लगातार बिना कोई बात छिपाए अपने दिलों के राज़ मेरे सामने खोले हैं, चाहे वह शिकायत हो, धोखा हो या वफादारी हो। कुल मिलाकर, तुम लोगों ने अपने अस्तित्व के गहनतम कोनों में पड़ी मूलभूत चीज़ें मेरे सामने खुलकर “कबूल” की हैं। बेशक, मैंने कभी इन चीज़ों को टाला नहीं है, क्योंकि वे सब मेरे लिए बहुत आम हो गई हैं। लेकिन अपने अंतिम गंतव्य के लिए तुम लोग परमेश्वर का अनुमोदन पाने के लिए अपने सिर के बाल का एक रेशा भी गँवाने के बजाय आग के दरिया में कूद जाओगे। ऐसा नहीं है कि मैं तुम लोगों के साथ बहुत कट्टर हो रहा हूँ; बात यह है कि मैं जो कुछ भी करता हूँ, उसके रूबरू आने के लिए तुम लोगों के हृदय में वफादारी की बहुत कमी है। तुम लोग शायद न समझ पाओ कि मैंने अभी क्या कहा है, इसलिए मैं तुम्हें एक आसान स्पष्टीकरण देता हूँ : तुम लोगों को सत्य और जीवन की ज़रूरत नहीं है; न ही तुम्हें अपने आचरण के सिद्धांतों की ज़रूरत है, मेरे श्रमसाध्य कार्य की तो निश्चित रूप से ज़रूरत नहीं है। इसके बजाय तुम लोगों को उन चीज़ों की ज़रूरत है, जो तुम्हारी देह से जुड़ी हैं—धन-संपत्ति, हैसियत, परिवार, विवाह आदि। तुम लोग मेरे वचनों और कार्य को पूरी तरह से ख़ारिज करते हो, इसलिए मैं तुम्हारी आस्था को एक शब्द में समेट सकता हूँ : लापरवाह। जिन चीज़ों के प्रति तुम लोग पूर्णतः वफादार हो, उन्हें हासिल करने के लिए तुम किसी भी हद तक जा सकते हो, लेकिन मैंने पाया है कि तुम लोग परमेश्वर में अपने विश्वास से संबंधित मामलों में ऐसा नहीं करते। इसके बजाय, तुम तुलनात्मक रूप से वफादार हो, तुलनात्मक रूप से गंभीर हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि जिनके दिल में पूर्ण ईमानदारी का अभाव है, वे परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में असफल हैं। ध्यान से सोचो—क्या तुम लोगों के बीच कई लोग असफल हैं?
तुम लोगों को ज्ञात होना चाहिए कि परमेश्वर पर विश्वास में सफलता लोगों के अपने कार्यों का परिणाम होती है; जब लोग सफल नहीं होते, बल्कि असफल होते हैं, तो वह भी उनके अपने कार्यों के कारण ही होता है, उसमें किसी अन्य कारक की कोई भूमिका नहीं होती। मेरा मानना है कि तुम लोग ऐसी चीज़ प्राप्त करने के लिए हर साधन का उपयोग करोगे, जो परमेश्वर में विश्वास करने से ज्यादा मुश्किल होती है और जिसे पाने के लिए उससे ज्यादा कष्ट उठाने पड़ते हैं, और उसे तुम बड़ी गंभीरता से लोगे, यहाँ तक कि तुम उसमें कोई गलती बरदाश्त करने के लिए भी तैयार नहीं होंगे; इस तरह के निरंतर प्रयास तुम लोग अपने जीवन में करते हो। यहाँ तक कि तुम लोग उन परिस्थितियों में भी मेरी देह को धोखा दे सकते हो, जिनमें तुम अपने परिवार के किसी सदस्य को धोखा नहीं दोगे। यही तुम लोगों का हमेशा का व्यवहार और वह सिद्धांत है जिससे तुम संसार से निपटते हो। क्या तुम लोग अभी भी अपने गंतव्य की खातिर मुझे धोखा देने के लिए एक झूठा मुखौटा नहीं लगा रहे हो, ताकि तुम्हारा गंतव्य अद्भुत हो जाए और पूरी तरह तुम्हारी इच्छा के अनुरूप हो? मुझे पता है कि तुम्हारी वफादारी अस्थायी है, ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी ईमानदारी। क्या मामला ये नहीं है कि तुम्हारा संकल्प और तुम जो कीमत चुकाते हो, वे सिर्फ अभी मौजूद हैं और भविष्य में मौजूद नहीं रहेंगे? तुम बस एक सुंदर मंजिल की खातिर भरसक कोशिश करने के लिए एक आखिरी प्रयास करना चाहते हो। तुम्हारा एकमात्र उद्देश्य सौदेबाज़ी करना है, सत्य का ऋणी होने से बचना नहीं, मुझे उस कीमत का प्रतिदान करना तो बिल्कुल भी नहीं, जो मैंने अदा की है। संक्षेप में, तुम केवल जो चाहते हो, उसे प्राप्त करने के लिए अपनी चतुर चालें चलने के इच्छुक हो, लेकिन उसके लिए खुला संघर्ष करने के लिए तैयार नहीं हो। क्या यही तुम लोगों के अंतरतम विचार नहीं हैं? तुम्हें स्वयं ढोंग नहीं करना चाहिए, अपने गंतव्य के बारे में इतनी माथापच्ची तो और भी नहीं करनी चाहिए कि दिन में तुम्हारी खाने-पीने की इच्छा ही न हो और रात को चैन से सो भी न पाओ। क्या यह सच नहीं है कि अंत में तुम्हारा परिणाम पहले ही निर्धारित हो चुका होगा? तुम लोगों में से प्रत्येक को अपना कर्तव्य खुले और ईमानदार दिलों के साथ निभाना चाहिए, और जो भी कीमत ज़रूरी हो, उसे चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए। जैसा कि तुम लोगों ने कहा है, जब दिन आएगा तो परमेश्वर किसी के साथ भी अनुचित व्यवहार नहीं करेगा, जिसने उसके लिए कष्ट उठाया हो या कीमत चुकाई हो। इस प्रकार का दृढ़ विश्वास बनाए रखने लायक है, और यह सही है कि तुम लोगों को इसे कभी नहीं भूलना चाहिए। केवल इसी तरह से मैं तुम लोगों के बारे में निश्चिंत हो सकता हूँ। वरना तुम सदैव ऐसे लोग रहोगे जिनके बारे में मैं निश्चिंत नहीं रह सकता, और तुम हमेशा मेरी घृणा के पात्र रहोगे। अगर तुम सभी लोग अपनी अंतरात्मा का अनुसरण कर सको और अपना सर्वस्व मेरे लिए अर्पित कर सको, अगर मेरे कार्य के लिए कोई कोर-कसर न छोड़ो, और मेरे सुसमाचार के कार्य के लिए अपनी जीवन भर की ऊर्जा अर्पित कर सको, तो क्या फिर मेरा हृदय तुम्हारे लिए अक्सर हर्ष से नहीं उछलेगा? इस तरह से मैं तुम लोगों के बारे में पूरी तरह से निश्चिंत हो सकूँगा, है ना? यह शर्म की बात है कि तुम लोग जो कर सकते हो, वह मेरी अपेक्षाओं का दयनीय रूप से एक बहुत छोटा-सा भाग है। ऐसे में, तुम लोग मुझसे वे चीज़ें माँगने की धृष्टता कैसे कर सकते हो, जिनकी तुम आशा करते हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, गंतव्य के बारे में
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 335
तुम्हारा गंतव्य और तुम्हारी नियति तुम लोगों के लिए बहुत अहम हैं—उनका तुम लोगों पर बहुत असर होता है। तुम मानते हो कि अगर तुम लोग अत्यंत सावधानी से चीजें नहीं करते, तो इसका अर्थ यह होगा कि अब तुम्हारा कोई गंतव्य नहीं रह जाएगा, कि तुमने अपना भाग्य बर्बाद कर लिया है। लेकिन क्या तुम लोगों ने कभी यह सोचा है कि अगर लोग मात्र अपने गंतव्य के लिए प्रयास करते हैं, तो वे व्यर्थ ही कड़ी मेहनत कर रहे हैं? ऐसे प्रयास सच्चे नहीं हैं—वे नकली हैं, धोखा हैं। यदि ऐसा है, तो जो लोग केवल अपने गंतव्य के लिए प्रयास करते हैं, वे अपनी अंतिम पराजय की दहलीज पर हैं, क्योंकि परमेश्वर में व्यक्ति के विश्वास की विफलता धोखे के कारण होती है। मैं पहले कह चुका हूँ कि मुझे चाटुकारिता, खुशामद या उत्साहपूर्ण ढंग से व्यवहार किया जाना पसंद नहीं है। मुझे पसंद है कि ईमानदार लोग मेरे सत्य और अपेक्षाओं का सामना कर सकें। इससे भी अधिक मुझे तब अच्छा लगता है, जब लोग पूरी बारीकी से मेरे हृदय के प्रति विचारशील होते हैं, और जब वे मेरी खातिर सब कुछ खपाने तक में सक्षम होते हैं। केवल इसी तरह से मेरे हृदय को सुकून मिल सकता है। इस समय, तुम लोगों के विषय में ऐसी कितनी चीज़ें हैं, जो मुझे नापसंद हैं? तुम लोगों के विषय में ऐसी कितनी चीज़ें हैं, जो मुझे पसंद हैं? क्या ऐसा हो सकता है कि तुम लोगों में से किसी ने भी कुरूपता के वे सभी विभिन्न प्रकार महसूस न किए हों, जो तुम लोगों ने अपने गंतव्य की खातिर खुद को खपाने में प्रदर्शित किए हैं?
अपने दिल में मैं ऐसे किसी भी दिल को चोट नहीं पहुँचाना चाहता, जो सकारात्मक है और ऊपर उठने की आकांक्षा रखता है, और किसी व्यक्ति के समर्पित होकर अपना कर्तव्य करने के जोश को मिटा देने की इच्छा तो मैं और भी नहीं रखता। फिर भी, मुझे तुम लोगों में से प्रत्येक को तुम्हारी कमियों और तुम्हारे दिलों के गहनतम कोनों में मौजूद मलिन आत्माओं के बारे में चेताना होगा। मैं ऐसा सिर्फ इस उम्मीद में करता हूँ कि तुम लोग मेरे वचनों के सामने अपना सच्चा हृदय अर्पित करने में सक्षम होगे, क्योंकि मुझे सबसे ज्यादा घृणा लोगों द्वारा मेरे साथ किए जाने वाले धोखे से है। मैं केवल यह उम्मीद करता हूँ कि मेरे कार्य के अंतिम चरण में तुम लोग अपने सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन में सक्षम होंगे, और तुम स्वयं को पूरे मन से समर्पित करोगे, अधूरे मन से नहीं। बेशक, मैं यह उम्मीद भी करता हूँ कि तुम सभी लोगों को अच्छा गंतव्य प्राप्त हो सके। फिर भी, मेरी तुमसे अपेक्षा है, और वह यह है कि तुम लोग मुझे अपनी एकमात्र और अंतिम वफादारी समर्पित करने में सर्वोत्तम निर्णय लो। अगर किसी में वह एकमात्र वफादारी नहीं है, तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से शैतान की सँजोई हुई संपत्ति है और मैं आगे उसे इस्तेमाल करने के लिए नहीं रखूँगा, बल्कि उसे उसके माता-पिता द्वारा देखभाल किए जाने के लिए घर भेज दूँगा। मेरा कार्य तुम लोगों के लिए एक बड़ी मदद है; मैं तुम लोगों से एक ईमानदार और ऊपर उठने का आकांक्षी हृदय पाने की उम्मीद करता हूँ, लेकिन मेरे हाथ अभी तक खाली हैं। इस बारे में सोचो : अगर मैं किसी दिन अब भी ऐसी अकथनीय वेदना में हूँ, तो फिर तुम लोगों के प्रति मेरा रवैया क्या होगा? क्या मैं तब भी तुम्हारे प्रति वैसा ही सौम्य रहूँगा, जैसा अब हूँ? क्या मेरा हृदय तब भी उतना ही शांत होगा, जितना अब है? क्या तुम लोग उस व्यक्ति की भावनाएँ समझते हो, जिसने कड़ी मेहनत से खेत जोता हो और उसे फसल की कटाई में अन्न का एक दाना भी नसीब न हुआ हो? क्या तुम लोग यह समझते हो कि आदमी को बड़ा आघात लगने पर उसके दिल को कितनी भारी चोट पहुँचती है? क्या तुम लोग उस व्यक्ति की कड़वाहट का अंदाज़ा लगा सकते हो, जो कभी आशा से भरा हो, पर जिसे मनमुटाव के साथ विदा होना पड़ा हो? क्या तुम लोगों ने उस व्यक्ति का गुस्सा देखा है, जिसे भड़काया गया हो? क्या तुम लोग उस व्यक्ति की बदला लेने की आतुरता जानते हो, जिसके साथ शत्रुता और धोखे का व्यवहार किया गया हो? अगर तुम इन लोगों की मानसिकता समझ सकते हो, तो मैं सोचता हूँ, तुम्हारे लिए यह कल्पना करना कठिन नहीं होना चाहिए कि अपने प्रतिशोध के समय परमेश्वर का रवैया क्या होगा! अंत में, मुझे उम्मीद है कि तुम सब अपने गंतव्य के लिए गंभीर प्रयास करोगे; हालाँकि, अच्छा होगा कि तुम अपने प्रयासों में धोखा देने वाले साधन न अपनाओ, अन्यथा मैं अपने दिल में तुमसे निराश बना रहूँगा। और यह निराशा कहाँ ले जाती है? क्या तुम लोग स्वयं को ही बेवकूफ नहीं बना रहे हो? जो लोग अपने गंतव्य के विषय में सोचते हैं, पर फिर भी उसे बरबाद कर देते हैं, उनके बचाए जाने की संभावना सबसे कम है। यहाँ तक कि अगर वे बेहद नाराज और क्रोधित भी हो जाएँ, तो ऐसे लोगों पर कौन दया करेगा? संक्षेप में, मैं अभी भी तुम लोगों के लिए ऐसे गंतव्य की कामना करता हूँ, जो उपयुक्त और सुंदर दोनों हो, और उससे भी बढ़कर, मैं उम्मीद करता हूँ कि तुम लोगों में से कोई भी विपत्ति में नहीं फँसेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, गंतव्य के बारे में