इंसान की भ्रष्टता का खुलासा II

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 336

तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर के देहधारण को स्वीकार करते हो, और तुम स्वीकार करते हो कि वचन देह में प्रकट हुआ है, फिर भी उसकी पीठ पीछे तुम कुछ चीजें करते हो, ऐसी चीजें जो उसकी अपेक्षा के खिलाफ हैं, और तुम्हारे दिल में उसके लिए कोई भय नहीं है। क्या यह परमेश्वर को स्वीकार करना है? तुम उस चीज को स्वीकार करते हो, जो वह कहता है, पर उन बातों का अभ्यास नहीं करते, जिनका कर सकते हो, न ही तुम उसके वचन पर चलते हो। क्या यह परमेश्वर को स्वीकार करना है? और भले ही तुम उसे स्वीकार करते हो, परंतु तुम उससे सतर्क रहने का हृदय रखते हो, उसका भय मानने का नहीं। यदि तुमने उसके कार्य को देखा और स्वीकार किया है और तुम जानते हो कि यह व्यक्ति परमेश्वर है, और फिर भी तुम उदासीन और पूर्णतः अपरिवर्तित रहते हो, तो तुम उस तरह के व्यक्ति हो जिसे अभी जीता नहीं गया है। जिन्हें जीत लिया गया है, उन्हें वह सब करना चाहिए, जो वे कर सकते हैं; और हालाँकि वे उच्चतर सत्यों में प्रवेश करने में सक्षम नहीं हैं, और ये सत्य उनकी पहुँच से परे हैं, फिर भी वे ऐसे लोग हैं, जो अपने हृदय में इन्हें प्राप्त करने के इच्छुक हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे जो समझ सकते हैं, उसकी सीमाएँ हैं, और जिसका वे अभ्यास करने में सक्षम हैं, उसकी भी सीमाएँ हैं। फिर भी उन्हें कम से कम वह सब करना चाहिए, जो वे कर सकते हैं। यदि तुम यह हासिल कर सकते हो, तो यह वह प्रभाव है, जो विजय के कार्य के कारण साकार किया गया है। मान लो, तुम कहते हो, “यह देखते हुए कि वह ऐसे अनेक वचन बोल सकता है जिन्हें मनुष्य नहीं बोल सकता, यदि वह परमेश्वर नहीं है, तो फिर कौन है?” इस प्रकार की समझ के होने का यह अर्थ नहीं कि तुम परमेश्वर को स्वीकार करते हो। यदि तुम परमेश्वर को स्वीकार करते हो, तो यह तुम्हें अपने वास्तविक कार्यों के द्वारा प्रदर्शित करना चाहिए। यदि तुम किसी कलीसिया की अगुआई करते हो, परंतु धार्मिकता का अभ्यास नहीं करते, और धन और संपदा की लालसा रखते हो, और हमेशा कलीसिया का पैसा हड़प लेते हो, तो क्या यह, यह स्वीकार करना है कि परमेश्वर है? परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और भय माने जाने के योग्य है। तुम भयभीत कैसे नहीं होगे, यदि तुम वास्तव में स्वीकार करते हो कि परमेश्वर है? अगर तुम ऐसे घृणित कार्य करने में सक्षम हो, तो क्या तुम वास्तव में उसे स्वीकार करते हो? क्या वह परमेश्वर ही है, जिसमें तुम विश्वास करते हो? जिसमें तुम विश्वास करते हो, वह एक अज्ञात परमेश्वर है; इसीलिए तुम भयभीत नहीं हो! जो लोग वास्तव में परमेश्वर को स्वीकारते और जानते हैं, वे सभी उससे डरते हैं और ऐसा कुछ भी करने की हिम्मत नहीं करते, जो उसके विरोध में हो या जो उनके जमीर के विरुद्ध जाता हो; वे विशेषतः ऐसा कुछ भी करने से डरते हैं, जिसके बारे में वे जानते हैं कि यह परमेश्वर के इरादों के विरुद्ध है। केवल इसे ही परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करना माना जा सकता है। तुम्हें क्या करना चाहिए, जब तुम्हारे माता-पिता तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करने से रोकने की कोशिश करते हैं? तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए, जब तुम्हारा अविश्वासी पति तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार करता है? और तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए, जब भाई और बहन तुमसे घृणा करते हैं? यदि तुम उसे स्वीकार करते हो, तो इन मामलों में तुम उचित रूप से व्यवहार करोगे और वास्तविकता को जियोगे। यदि तुम ठोस कार्य करने में असफल रहते हो, परंतु मात्र कहते हो कि तुम परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हो, तब तुम मात्र एक बोलने वाले व्यक्ति हो! तुम कहते हो कि तुम उसमें विश्वास करते और उसे स्वीकार करते हो, पर तुम किस तरह से उसे स्वीकार करते हो? तुम किस तरह से उसमें विश्वास करते हो? क्या तुम अपने हृदय में उससे भयभीत रहते हो? क्या तुम उसका भय मानते हो? क्या तुम अपने भीतर गहराई में उसके प्रति प्रेम से भरा हृदय रखते हो? जब तुम व्यथित होते हो और तुम्हारे पास सहारे के लिए कोई नहीं होता, तो तुम परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करते हो, पर बाद में तुम इसके बारे में सब-कुछ भूल जाते हो। यह परमेश्वर से प्रेम करना नहीं है, और न ही यह उसमें विश्वास करना है! अंततः परमेश्वर मनुष्य से क्या प्राप्त करवाना चाहता है? मैंने जिन सभी स्थितियों का उल्लेख किया, जैसे कि अपने स्वयं के महत्व से अत्यधिक प्रभावित महसूस करना, यह अनुभव करना कि तुम चीजों को अतिशीघ्र समझ लेते हो, अन्य लोगों को बाधित करना, दूसरों को नीची निगाह से देखना, लोगों को उनकी दिखावट से आँकना, सीधे लोगों को धौंस देना, कलीसिया के धन की लालसा रखना, आदि-आदि—जब ये सभी शैतानी भ्रष्ट स्वभाव तुममें से अंशतः हटा दिए गए हों, केवल तभी तुम पर पाई गई जीत अभिव्यक्त होगी।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (4)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 337

मैंने इस तरह से तुम लोगों के बीच कार्य किया और बात की है, मैंने बहुत सारी ऊर्जा और हृदय का रक्त व्यय किया है, फिर भी तुम लोगों ने कब वह सुना है, जो मैं तुम लोगों से सीधे तौर पर कहता हूँ? तुम लोग कहाँ मुझ सर्वशक्तिमान के सामने दंडवत हुए हो? तुम लोग मुझसे ऐसा व्यवहार क्यों करते हो? क्यों जो तुम लोग कहते और करते हो, वह मेरे क्रोध को उकसाता है? तुम्हारे हृदय इतने कठोर क्यों हैं? क्या मैंने कभी भी तुम्हें मार गिराया है? क्यों तुम लोग मुझे दुःखी और चिंतित करने के अलावा और कुछ नहीं करते? क्या तुम लोग अपने ऊपर मेरे, यहोवा के, क्रोध के दिन के आने की प्रतीक्षा में हो? क्या तुम लोग प्रतीक्षा कर रहे हो कि मैं तुम्हारे विद्रोहीपन से उकसाए गए क्रोध को भेजूँ? क्या मैं तुम लोगों के लिए जो कुछ करता हूँ, वह तुम्हारी खातिर नहीं होता है? फिर भी तुम लोग मुझ यहोवा के साथ सदैव इस तरह पेश आए हो : मेरे बलिदान को चुराना, मेरी वेदी के चढ़ावों को अपने घर भेड़िये की माँद में ले जाकर शावकों और शावकों के शावकों को खिलाना; लोगों का एक दूसरे से लड़ना, गुस्से से घूरते हुए और तलवारों व भालों के साथ एक दूसरे का सामना करना, मुझ सर्वशक्तिमान के वचनों को मलमूत्र के समान गंदा करने के लिए शौचालय में उछालना। तुम लोगों की ईमानदारी कहाँ है? तुम लोगों की मानवता पाशविकता बन गई है! तुम लोगों के हृदय बहुत पहले पत्थरों में बदल गए हैं। क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि जब मेरे क्रोध का दिन आएगा, तब मुझ सर्वशक्तिमान के विरुद्ध आज की गई तुम लोगों की दुष्टता का मैं न्याय करूँगा? क्या तुम लोगों को लगता है कि मुझे इस प्रकार से बेवकूफ़ बनाकर, मेरे वचनों को कीचड़ में फेंककर और उन पर ध्यान न देकर—क्या तुम लोगों को लगता है कि मेरी पीठ पीछे ऐसा करके तुम लोग मेरी क्रोधित नज़रों से बच सकते हो? क्या तुम लोग नहीं जानते कि जब तुम लोग मेरे बलिदान चुराते थे और मेरी वस्तुओं के लिए लालायित होते थे, तो तुम मुझ यहोवा की आँखों द्वारा पहले ही देखे जा चुके होते थे? क्या तुम लोग नहीं जानते कि जब तुम लोगों ने मेरे बलिदान चुराए, तो यह उस वेदी के सामने किया, जिस पर बलिदान चढ़ाए जाते हैं? तुम लोग कैसे मान सकते हो कि तुम इतने चालाक हो और मुझे इस तरह से धोखा दे सकते हो? मेरा क्रोध तुम लोगों के जघन्य पापों से दूर कैसे जा सकता है? मेरा प्रचंड क्रोध कैसे तुम लोगों के बुरे कर्मों को नज़रंदाज़ कर सकता है? आज तुम लोग जो बुराई करते हो, वह तुम लोगों के लिए कोई बचने का मार्ग नहीं खोलती, बल्कि तुम्हारे कल के लिए ताड़ना इकट्ठी करती है; यह तुम लोगों के प्रति मुझ सर्वशक्तिमान की ताड़ना को उकसाती है। कैसे तुम लोगों के दुष्कृत्य और बुरे वचन मेरी ताड़ना से बच सकते हैं? कैसे तुम लोगों की प्रार्थनाएँ मेरे कानों तक पहुँच सकती हैं? तुम लोगों की अधार्मिकता के लिए मैं दंड से बचने का उपाय कैसे खोल सकता हूँ? मेरे विरुद्ध विद्रोह करने पर मैं कैसे तुम लोगों के दुष्कृत्यों को बख्श सकता हूँ? ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं तुम लोगों की ज़ुबानें काटकर अलग न कर दूँ, जो साँप के समान ज़हरीली हैं? तुम लोग मुझे अपनी धार्मिकता के वास्ते नहीं पुकारते, बल्कि इसके बजाय अपनी अधार्मिकता के परिणामस्वरूप मेरा क्रोध संचित करते हो। मैं तुम लोगों को कैसे क्षमा कर सकता हूँ? मेरी, सर्वशक्तिमान की नजरों में तुम लोगों के शब्द और क्रियाकलाप दोनों ही मलिन के रूप में देखे जाते हैं। मेरी, सर्वशक्तिमान की नजरों में तुम लोगों की अधार्मिकता निरंतर ताड़ना के रूप में देखी जाती है। मेरी धार्मिक ताड़ना और न्याय तुम लोगों से दूर कैसे हो सकता है? क्योंकि तुम लोग मेरे साथ ऐसे पेश आते हो, मुझे दुःखी और क्रोधित करते हो, तो मैं कैसे तुम लोगों को अपने हाथों से बचकर जाने दे सकता हूँ और उस दिन से दूर होने दे सकता हूँ जब मैं, यहोवा तुम लोगों को ताड़ना और शाप दूँगा? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों के सभी बुरे वचन और कथन बहुत पहले ही मेरे कानों तक पहुँच चुके हैं? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों की अधार्मिकता ने बहुत पहले ही मेरी धार्मिकता के पवित्र लबादे को गंदा कर दिया है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों के विद्रोहीपन ने बहुत पहले से ही मेरे प्रचुर क्रोध को भड़का दिया है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों ने बहुत पहले से ही मुझे अति कुपित कर रखा है और मैंने बहुत समय तक तुम्हें सहा है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि मैं जिस देह में हूँ उसे तुम पहले ही क्षत-विक्षत कर चुके हो, इसे चिथड़ा-चिथड़ा कर चुके हो? मैंने अब तक इतना सहा है कि मैं तुम लोगों के प्रति अब और सहिष्णु नहीं होता और अपना क्रोध प्रकट करता हूँ। क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों के दुष्कृत्य पहले ही मेरी आँखों के सामने आ चुके हैं और मेरी पुकारें पहले ही मेरे पिता के कानों तक पहुँच चुकी हैं? वह कैसे तुम लोगों को मेरे साथ ऐसा व्यवहार करने दे सकता है? क्या मैं तुम लोगों पर जो भी कार्य करता हूँ, वह तुम लोगों के वास्ते नहीं है? फिर भी मैं, यहोवा, जो कार्य करता हूँ उसके वास्ते तुम लोगों में से किसकी भलमनसाहत बढ़ी है? क्या मैं अपने पिता की इच्छा के प्रति असमर्पित हो सकता हूँ क्योंकि मैं कमजोर हूँ और क्योंकि मैंने पीड़ा सही है? क्या तुम लोग मेरे हृदय को नहीं समझते? मैं तुम लोगों से उसी तरह बोलता हूँ जैसे यहोवा बोलता था; क्या मैंने तुम लोगों के लिए बहुत ज्यादा बलिदान नहीं किया है? भले ही मैं अपने पिता के कार्य के वास्ते यह सारा कष्ट सहने को तैयार हूँ, फिर भी मेरे कष्ट सहने के कारण तुम लोग उस ताड़ना से कैसे मुक्त हो सकते हो जो मैं तुम पर लाता हूँ? क्या तुम लोगों ने मेरा बहुत आनंद नहीं लिया है? आज, मैं अपने परमपिता द्वारा तुम लोगों को प्रदान किया गया हूँ; क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोग मेरे उदार वचनों से कहीं अधिक का आनंद लेते हो? क्या तुम लोग नहीं जानते कि मेरा जीवन तुम लोगों के जीवन और जिन चीजों का तुम आनंद लेते हो उनके बदले दिया गया था? क्या तुम लोग नहीं जानते कि मेरे पिता ने शैतान के साथ युद्ध के लिए मेरे जीवन का उपयोग किया और कि उसने मेरा जीवन तुम लोगों को प्रदान किया है, तुम लोगों को सौ गुना प्राप्त कराया है और तुम लोगों को कितने ही प्रलोभनों से बचाया है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि यह केवल मेरे कार्य के माध्यम से ही है कि तुम लोगों को कई प्रलोभनों और कई उग्र ताड़नाओं से छूट दी गई है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि यह केवल मेरे ही कारण है कि मेरे पिता ने तुम लोगों को अभी तक आनंद लेने दिया है? आज तुम लोग इतने अड़ियल कैसे बने रह सकते हो, इतना कि जैसे तुम्हारे हृदयों के ऊपर घट्टे उग आए हों? वह दुष्टता जो तुम आज करते हो, कैसे उस क्रोध के दिन से बच सकती है, जो पृथ्वी से मेरे जाने के बाद आएगा? कैसे मैं उन अड़ियल लोगों को यहोवा के क्रोध से बचने दे सकता हूँ?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कोई भी जो देह में है, क्रोध के दिन से नहीं बच सकता

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 338

अतीत के बारे में सोचो : कब तुम लोगों के प्रति मेरी दृष्टि क्रोधित, और मेरी आवाज़ कठोर हुई है? मैंने कब तुम लोगों में मीनमेख निकाली है? मैंने कब तुम लोगों को अनुचित रूप से फटकारा है? मैंने कब तुम लोगों को तुम्हारे मुँह पर डाँटा है? क्या यह मेरे कार्य के वास्ते नहीं है कि मैं तुम लोगों को हर प्रलोभन से बख्श देने के लिए अपने परमपिता को पुकारता हूँ? तुम लोग मेरे साथ इस प्रकार का व्यवहार क्यों करते हो? क्या मैंने कभी भी अपने अधिकार का उपयोग तुम लोगों की देह को मार गिराने के लिए किया है? तुम लोग मुझे इस प्रकार का प्रतिफल क्यों दे रहे हो? मेरे प्रति कभी हाँ और कभी ना करने के बाद, तुम लोग न हाँ में हो और न ही ना में, और फिर तुम मुझे मनाने और मुझसे बातें छिपाने का प्रयास करते हो और तुम लोगों के मुँह अधार्मिक लोगों के थूक से भरे हुए हैं। क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम लोगों की ज़ुबानें मेरे आत्मा को धोखा दे सकती हैं? क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम लोगों की ज़ुबानें मेरे क्रोध से बच सकती हैं? क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम लोगों की ज़ुबानें मुझ यहोवा के कार्यों की, जैसी चाहे वैसी आलोचना कर सकती हैं? क्या मैं ऐसा परमेश्वर हूँ जिसकी मनुष्य आलोचना करता है? क्या मैं छोटे से भुनगे को इस प्रकार अपनी ईशनिंदा करने दे सकता हूँ? मैं ऐसे विद्रोह के पुत्रों को कैसे अपने अनंत आशीषों के बीच रख सकता हूँ? तुम लोगों के वचनों और कार्यों ने तुम लोगों को काफी समय तक उजागर और निंदित किया है। जब मैंने स्वर्ग का विस्तार किया और सभी चीज़ों का सृजन किया, तो मैंने अपने अलावा किसी भी प्राणी को उसके मन मुताबिक़ भाग लेने की अनुमति नहीं दी, मैं किसी भी चीज को उसकी इच्छानुसार मेरे कार्य और मेरे प्रबंधन में गड़बड़ करने की अनुमति तो बिल्कुल नहीं देता। मैं किसी भी मनुष्य या वस्तु को सहन नहीं करता; मैं कैसे उन लोगों को छोड़ सकता हूँ, जो मेरे प्रति क्रूर और अमानवीय हैं? मैं कैसे उन लोगों को क्षमा कर सकता हूँ, जो मेरे वचनों से विश्वासघात करते हैं? मैं कैसे उन्हें छोड़ सकता हूँ, जो मुझसे विद्रोह करते हैं? क्या मनुष्य की नियति मुझ सर्वशक्तिमान के हाथों में नहीं है? मैं कैसे तुम्हारी अधार्मिकता और विद्रोहीपन को पवित्र मान सकता हूँ? तुम्हारे पाप मेरी पवित्रता को कैसे मैला कर सकते हैं? मैं अधर्मी की गंदगी से दूषित नहीं होता, न ही मैं अधर्मियों के चढ़ावों का आनंद लेता हूँ। यदि तुम मुझ यहोवा के प्रति वफादार होते, तो क्या तुम मेरी वेदी से बलिदानों को अपने लिए ले सकते थे? क्या तुम मेरे पवित्र नाम की ईशनिंदा के लिए अपनी विषैली ज़ुबान का उपयोग कर सकते थे? क्या तुम इस प्रकार मेरे वचनों से विश्वासघात कर सकते थे? क्या तुम मेरी महिमा और पवित्र नाम को, एक दुष्ट, शैतान की सेवा के लिए एक उपकरण के रूप में उपयोग कर सकते थे? मेरा जीवन पवित्र लोगों के आनंद के लिए प्रदान किया जाता है। मैं तुम्हें कैसे तुम्हारी इच्छानुसार मेरे जीवन के साथ एक खेलने की वस्तु की तरह पेश आने और तुम लोगों के बीच के संघर्ष में इसे एक उपकरण के रूप में उपयोग करने की इजाज़त दे सकता हूँ? मेरे प्रति व्यवहार में तुम लोग इतने निर्दयी और अच्छाई के मार्ग से इतने वंचित कैसे हो सकते हो? क्या तुम लोग नहीं जानते कि मैंने पहले ही तुम लोगों के दुष्कृत्यों को जीवन के इन वचनों में लिख दिया है? तुम लोग कोप के उस दिन से कैसे बच सकते हो जब मैं मिस्र को ताड़ना दूँगा? मैं कैसे तुम लोगों को इस तरह बार-बार मेरा विरोध और मुझसे विद्रोह करने की अनुमति दे सकता हूँ? मैं तुम लोगों को सीधे तौर पर कहता हूँ कि जब वह दिन आएगा, तो तुम लोगों की ताड़ना मिस्र की ताड़ना की अपेक्षा अधिक असहनीय होगी! तुम लोग कैसे मेरे कोप के दिन से बच सकते हो? मैं तुम लोगों से सत्य कहता हूँ : मेरी सहनशीलता तुम लोगों के दुष्कृत्यों के लिए तैयार की गई थी और उस दिन तुम लोगों की ताड़ना के लिए मौजूद है। एक बार जब मेरी सहनशीलता चुक गई, तो क्या तुम लोग वह नहीं होगे जो कुपित न्याय भुगतेंगे? क्या सभी चीज़ें मुझ सर्वशक्तिमान के हाथों में नहीं हैं? मैं कैसे इस प्रकार स्वर्ग के नीचे तुम लोगों को मुझसे विद्रोह करने दे सकता हूँ? तुम लोगों का जीवन अत्यंत कठोर होगा क्योंकि तुम लोग मसीहा से मिल चुके हो, जिसके बारे में कहा गया था कि वह आएगा, फिर भी जो कभी नहीं आया। क्या तुम लोग उसके शत्रु नहीं हो? यीशु तुम लोगों का मित्र रहा है, फिर भी तुम लोग मसीहा के शत्रु हो। क्या तुम लोग नहीं जानते कि यद्यपि तुम लोग यीशु के मित्र हो, पर तुम लोगों के दुष्कृत्यों ने उन लोगों के पात्रों को भर दिया है, जो घृणा योग्य हैं? यद्यपि तुम लोग यहोवा के बहुत करीबी हो, पर क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों के बुरे वचन यहोवा के कानों तक पहुँचकर उसके क्रोध को भड़का चुके हैं? वह तुम्हारा करीबी कैसे हो सकता है, और वह कैसे तुम्हारे उन पात्रों को नहीं जला सकता, जो दुष्कृत्यों से भरे हुए हैं? कैसे वह तुम्हारा शत्रु नहीं हो सकता?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कोई भी जो देह में है, क्रोध के दिन से नहीं बच सकता

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 339

अब मैं तुम्हारी आसक्ति भरी देह को देख रहा हूँ जो मुझे चापलूसी से मनाने का प्रयास करती है और मेरे पास तुम्हारे लिए केवल एक छोटी-सी चेतावनी है, हालाँकि मैं ताड़ना से तुम्हारी “सेवा” नहीं करूँगा। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम मेरे कार्य में क्या भूमिका निभाते हो, और तब मैं संतुष्ट रहूँगा। इससे परे के मामलों में, यदि तुम मेरा विरोध करते हो या मेरे पैसे खर्च करते हो, या मुझ यहोवा के लिए चढ़ाई गई भेंटें खा जाते हो, या तुम भुनगे एक-दूसरे को काटते हो, या तुम कुत्ते-जैसे प्राणी आपस में संघर्ष या एक-दूसरे का अतिक्रमण करते हो—तो मेरी इनमें से किसी में भी दिलचस्पी नहीं है। तुम लोगों को केवल इतना ही जानने की आवश्यकता है कि तुम लोग किस प्रकार की चीजें हो, और मैं संतुष्ट हो जाऊँगा। इस सबके अलावा, यदि तुम लोग एक-दूसरे पर हथियार तानना चाहते हो या शब्दों से एक-दूसरे के साथ लड़ना चाहते हो, तो ठीक है; ऐसी चीजों में हस्तक्षेप करने की मेरी कोई इच्छा नहीं है और मनुष्य के मामलों का मुझसे बिल्कुल भी कोई संबंध नहीं है। ऐसा इसलिए नहीं है कि मैं तुम लोगों के बीच के टकरावों की परवाह नहीं करता, बल्कि ऐसा इसलिए है कि मैं तुम लोगों में से एक नहीं हूँ, मैं उन मामलों में भाग नहीं लेता जो तुम लोगों के बीच होते हैं। मैं स्वयं एक सृजित प्राणी नहीं हूँ और दुनिया का नहीं हूँ, इसलिए मैं लोगों के हलचल भरे जीवन से और उनके बीच उलझे हुए, अनुचित संबंधों से घृणा करता हूँ। मैं विशेष रूप से कोलाहलपूर्ण भीड़ से घृणा करता हूँ। हालाँकि, मुझे प्रत्येक सृजित प्राणी के हृदय की अशुद्धियों की गहरी जानकारी है, और तुम लोगों को सृजित करने से पहले से ही मैं मानव-हृदय में गहराई से विद्यमान अधार्मिकता को जानता था, और मुझे मानव-हृदय की सारी धूर्तता और कुटिलता की जानकारी थी। इसलिए, भले ही जब लोग अधार्मिक कार्य करते हैं, तब उसका बिल्कुल भी कोई निशान दिखाई न देता हो, किंतु मुझे तब भी पता चल जाता है कि तुम लोगों के हृदयों में समाई अधार्मिकता उन सभी चीजों की प्रचुरता को पार कर जाती है, जो मैंने बनाई हैं। तुम लोगों में से हर एक आम लोगों के शिखर तक उठ चुका है; तुम आम लोगों के पूर्वजों के रूप में आरोहित हो चुके हो। तुम लोग अत्यंत स्वेच्छाचारी हो और तुम तमाम भुनगों के बीच बेकाबू होकर घूमते हो—आराम के स्थान की तलाश में रहते हो और इस भ्रम में हो कि तुम उन भुनगों को निगल जाओगे जो तुमसे छोटे हैं। अपने हृदयों में तुम लोग दुर्भावनापूर्ण और कपटी हो और समुद्र-तल की गहराई में डूबे हुए भूतों को भी पीछे छोड़ चुके हो। तुम गोबर की तली में रहते हो और ऊपर से नीचे तक भुनगों को तब तक परेशान करते हो, जब तक कि वे बिल्कुल अशांत न हो जाएँ, और थोड़ी देर एक-दूसरे से लड़ने-झगड़ने के बाद शांत होते हो। तुम लोगों को अपनी जगह का पता नहीं है, फिर भी तुम लोग गोबर में एक-दूसरे के साथ लड़ाई करते हो। इस तरह की लड़ाई से तुम क्या हासिल कर सकते हो? यदि तुम लोगों के हृदय वास्तव में मेरा भय मानते, तो तुम लोग मेरी पीठ पीछे एक-दूसरे के साथ होड़ कैसे कर सकते थे? तुम्हारा रुतबा कितना भी ऊँचा क्यों न हो, क्या तुम फिर भी गोबर में एक बदबूदार छोटा-सा कीड़ा ही नहीं हो? क्या तुम पंख उगाकर आकाश में उड़ने वाला कबूतर बन पाओगे? बदबूदार छोटे कीड़ो, तुम लोग मुझ यहोवा की वेदी के चढ़ावे चुराते हो; ऐसा करके क्या तुम लोग अपनी बरबाद, ध्वस्त प्रतिष्ठा बचा सकते हो और इस्राएल के चुने हुए लोग बन सकते हो? तुम लोग बेशर्म कमीने हो! वेदी पर वे भेंटें उन लोगों द्वारा स्नेह के प्रतीक के रूप में मुझे चढ़ाई गई थीं जो मेरा भय मानते हैं। वे मेरे नियंत्रण और मेरे उपयोग के लिए होती हैं, तो लोगों द्वारा मुझे दिए गए छोटे जंगली कबूतर तुम मुझसे कैसे लूट सकते हो? क्या तुम एक यहूदा बनने से नहीं डरते? क्या तुम इस बात से नहीं डरते कि तेरी भूमि रक्त का मैदान बन सकती है? बेशर्म चीज़! क्या तुम्हें लगता है कि लोगों द्वारा चढ़ाए गए जंगली कबूतर तुम जैसे भुनगे का पेट भरने के लिए हैं? मैंने तुम्हें जो दिया है, वह वही है जिससे मैं संतुष्ट हूँ और तुम्हें देने का इच्छुक हूँ; मैंने तुम्हें जो नहीं दिया है, वह मेरी इच्छा पर निर्भर होना चाहिए। तुम बस मेरे चढ़ावे चुरा नहीं सकते। वह जो कार्य करता है, वह मैं, यहोवा—सृष्टिकर्ता—हूँ, और लोग मेरी वजह से भेंटें चढ़ाते हैं। क्या तुम्हें लगता है कि तुम जो दौड़-भाग करते हो, यह उसकी भरपाई है? तुम सच में बेशर्म हो! तुम किसके लिए दौड़-भाग करते हो? क्या यह तुम्हारे अपने लिए नहीं है? तुम मेरी भेंटें क्यों चुराते हो? तुम मेरे बटुए में से पैसे क्यों चुराते हो? क्या तुम यहूदा इस्करियोती के बेटे नहीं हो? मुझ यहोवा को चढ़ाई गई भेंटें याजकों द्वारा उपभोग किए जाने के लिए हैं। क्या तुम याजक हो? तुम मेरी भेंटें दंभ के साथ खाने की हिम्मत करते हो, यहाँ तक कि उन्हें मेज पर छोड़ देते हो; तुम किसी लायक नहीं हो! नालायक कमीने! मुझ यहोवा की आग तुम्हें भस्म कर देगी!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जब झड़ते हुए पत्ते अपनी जड़ों की ओर लौटेंगे, तो तुम्हें अपनी की हुई सभी बुराइयों पर पछतावा होगा

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 340

तुम लोगों का विश्वास बहुत सुंदर है; तुम्हारा कहना है कि तुम अपना सारा जीवन-काल मेरे कार्य के लिए खपाने को तैयार हो, और तुम इसके लिए अपने प्राणों का बलिदान करने को तैयार हो, लेकिन तुम्हारे स्वभाव में अधिक बदलाव नहीं आया है। तुम लोग बस घमंड से बोलते हो, बावजूद इस तथ्य के कि तुम्हारा वास्तविक व्यवहार बहुत दयनीय है। यह ऐसा है जैसे कि लोगों की जीभ और होंठ तो स्वर्ग में हों, लेकिन उनके पैर बहुत नीचे पृथ्वी पर हों, परिणामस्वरूप उनके वचन और कर्म तथा उनकी प्रतिष्ठा अभी भी चिथड़ा-चिथड़ा और विध्वस्त हैं। तुम लोगों की प्रतिष्ठा नष्ट हो गई है, तुम्हारा ढंग निम्नस्तरीय है, तुम्हारे बोलने का तरीका निम्न कोटि का है, तुम्हारा जीवन घृणित है; यहाँ तक कि तुम्हारी सारी मनुष्यता नीच अधमता की है। तुम दूसरों के प्रति संकीर्ण सोच रखते हो और छोटी-छोटी बात पर बखेड़ा करते हो। तुम अपनी प्रतिष्ठा और हैसियत को लेकर इस हद तक झगड़ते हो कि नरक और आग की झील में उतरने तक को तैयार रहते हो। तुम लोगों के वर्तमान वचन और कर्म मेरे लिए यह तय करने के लिए काफी हैं कि तुम लोग पापी हो। मेरे कार्य के प्रति तुम लोगों का रवैया मेरे लिए यह तय करने के लिए काफी है कि तुम लोग अधर्मी हो, और तुम लोगों के समस्त स्वभाव यह इंगित करने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम लोग गंदी आत्माएँ हो, जो घृणित चीजों से भरी हैं। तुम लोगों की अभिव्यक्तियाँ और जो कुछ भी तुम प्रकट करते हो, वह यह कहने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम वे लोग हो, जिन्होंने अशुद्ध आत्माओं का पेट भरकर रक्त पी लिया है। जब स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का जिक्र होता है, तो तुम लोग अपनी भावनाएँ जाहिर नहीं करते। क्या तुम लोग मानते हो कि तुम्हारा मौजूदा ढंग तुम्हें मेरे स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश कराने के लिए पर्याप्त है? क्या तुम लोग मानते हो कि तुम मेरे कार्य और वचनों की पवित्र भूमि में प्रवेश पाने की अनुमति प्राप्त कर सकते हो, इससे पहले कि मैं तुम लोगों के वचनों और कर्मों का परीक्षण करूँ? कौन है, जो मेरी आँखों में धूल झोंक सकता है? तुम लोगों का घृणित, नीच व्यवहार और बातचीत मेरी दृष्टि से कैसे छिपे रह सकते हैं? तुम लोगों के जीवन मेरे द्वारा उन अशुद्ध आत्माओं का रक्त और मांस पीने और खाने वालों के जीवन के रूप में तय किए गए हैं, क्योंकि तुम लोग रोज़ाना मेरे सामने उनका अनुकरण करते हो। मेरे सामने तुम्हारा व्यवहार विशेष रूप से ख़राब और नीचतापूर्ण रहा है, तो मैं तुम्हें घिनौना कैसे न समझता? तुम्हारे शब्दों में अशुद्ध आत्माओं की अपवित्रताएँ है : तुम फुसलाते हो, भेद छिपाते हो चापलूसी करते हो, ठीक उन लोगों की तरह जो टोने-टोटकों में संलग्न रहते हैं और उनकी तरह भी जो कपट करते हैं और अधर्मियों का खून पीते हैं। मनुष्य की समस्त अभिव्यक्तियाँ बेहद अधार्मिक हैं, तो फिर सभी लोगों को पवित्र भूमि में कैसे रखा जा सकता है, जहाँ धर्मी रहते हैं? क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा यह घिनौना व्यवहार तुम्हें उन अधर्मी लोगों से पवित्र ठहराकर अलग कर देता है? तुम्हारी साँप जैसी जीभ अंततः तुम्हारी इस देह का नाश कर देगी, जो तबाही बरपाती है और घृणापूर्ण कार्य करती है, और तुम्हारे वे हाथ भी, जो अशुद्ध आत्माओं के रक्त से सने हैं, अंततः तुम्हारी आत्मा को नरक में खींच लेंगे। तो फिर तुम मैल से सने अपने हाथों को साफ़ करने का यह मौका क्यों नहीं लपकते? और तुम अधर्मी शब्द बोलने वाली अपनी इस जीभ को काटकर फेंकने के लिए इस अवसर का लाभ क्यों नहीं उठाते? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम अपने हाथों, जीभ और होंठों के लिए नरक की आग में जलने के लिए तैयार हो? मैं तमाम लोगों के हृदयों की अपनी दोनों आँखों से पड़ताल करता हूँ, क्योंकि मानव-जाति के निर्माण से बहुत पहले मैंने उनके दिलों को अपने नियंत्रण में ले लिया था। मैंने बहुत पहले लोगों के दिलों की असलियत जान ली थी, इसलिए उनके विचार मेरी दृष्टि से कैसे बच सकते थे? मेरे आत्मा की आग से जलने से बचने के लिए उनके पास अभी भी समय कैसे हो सकता है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 341

तुम्हारे होंठ कबूतरों से अधिक दयालु हैं, लेकिन तुम्हारा दिल पुराने साँप से ज्यादा भयानक है। तुम्हारे होंठ लेबनानी महिलाओं जितने सुंदर हैं, लेकिन तुम्हारा दिल उनकी तरह दयालु नहीं है, और कनानी लोगों की सुंदरता से तुलना तो वह निश्चित रूप से नहीं कर सकता। तुम्हारा दिल बहुत कपटी है! जिन चीज़ों से मुझे घृणा है, वे केवल अधर्मी के होंठ और उनके दिल हैं, और लोगों से मैं यह अपेक्षा नहीं करता कि वे पवित्र जनों से आगे निकल जाएँ; बात बस इतनी है कि मुझे अधर्मियों के बुरे कर्मों से घृणा महसूस होती है, और मुझे उम्मीद है कि वे अपनी मलिनता त्याग पाएँगे और अपनी मौजूदा दुर्दशा से बच सकेंगे, ताकि वे उन अधर्मी लोगों से अलग खड़े हो सकें और उन लोगों के साथ रह सकें और पवित्र हो सकें, जो धर्मी हैं। तुम लोग उन्हीं परिस्थितियों में हो जिनमें मैं हूँ, लेकिन तुम लोग मैल से ढके हो; तुम्हारे पास उन मनुष्यों की मूल समानता का छोटे से छोटा अंश भी नहीं है, जिन्हें शुरुआत में बनाया गया था। इतना ही नहीं, चूँकि तुम लोग रोज़ाना उन अशुद्ध आत्माओं की नकल करते हो, और वही करते हो जो वे करती हैं और वही कहते हो जो वे कहती हैं, इसलिए तुम लोगों के समस्त अंग—यहाँ तक कि तुम लोगों की जीभ और होंठ भी—उनके गंदे पानी से इस क़दर भीगे हुए हैं कि तुम लोग पूरी तरह से दाग़ों से ढँके हुए हो, और तुम्हारा एक भी अंग ऐसा नहीं है जिसका उपयोग मेरे कार्य के लिए किया जा सके। यह बहुत हृदय-विदारक है! तुम लोग घोड़ों और मवेशियों की ऐसी दुनिया में रहते हो, फिर भी तुम लोगों को वास्तव में परेशानी महसूस नहीं होती; तुम लोग आनंद से भरे हुए हो और आज़ादी तथा आसानी से जीते हो। तुम लोग उस गंदे पानी में तैर रहे हो, फिर भी तुम्हें वास्तव में इस बात का एहसास नहीं है कि तुम इस तरह की दुर्दशा में गिर चुके हो। हर दिन तुम अशुद्ध आत्माओं के साहचर्य में रहते हो, “मल-मूत्र” के साथ व्यवहार करते हो और तुम्हारा जीवन बहुत नीच है; तुम वास्तव में इस बात से अवगत नहीं हो कि तुम बिल्कुल भी मनुष्यों की दुनिया में नहीं रहते और तुम अपने नियंत्रण में नहीं हो। क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारा जीवन बहुत पहले ही अशुद्ध आत्माओं द्वारा रौंद दिया गया था या कि तुम्हारा चरित्र बहुत पहले ही गंदे पानी से मैला कर दिया गया था? क्या तुम्हें लगता है कि तुम एक सांसारिक स्वर्ग में रह रहे हो और तुम खुशियों के बीच में हो? क्या तुम नहीं जानते कि तुमने अपना जीवन अशुद्ध आत्माओं के साथ बिताया है, और तुम हर उस चीज़ के साथ सह-अस्तित्व में रहे हो जो उन्होंने तुम्हारे लिए तैयार की है? तुम्हारे जीने के ढंग का कोई अर्थ कैसे हो सकता है? तुम्हारे जीवन का कोई मूल्य कैसे हो सकता है? तुम अपने माता-पिता के लिए, अशुद्ध आत्माओं वाले माता-पिता के लिए, दौड़-भाग करते रहे हो, फिर भी तुम्हें वास्तव में इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि तुम्हें नुकसान पहुँचाने वाले वे अशुद्ध आत्माओं वाले माता-पिता हैं, जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया और पाल-पोसकर बड़ा किया। इससे भी अधिक, तुम नहीं जानते कि तुम्हारी सारी गंदगी वास्तव में उन्होंने ही तुम्हें दी है; तुम बस यही जानते हो कि वे तुम्हें “आनंद” दे सकते हैं, वे तुम्हें ताड़ना नहीं देते, न ही वे तुम्हारी आलोचना करते हैं, और विशेष रूप से वे तुम्हें शाप नहीं देते। वे कभी तुम पर गुस्से से भड़के नहीं, बल्कि तुम्हारे साथ आनंद और मिलनसार ढंग से व्यवहार करते हैं। उनके शब्द तुम्हारे दिल को पोषण देते हैं और तुम्हें लुभाते हैं, ताकि तुम गुमराह हो जाओ, और बिना एहसास किए, तुम फँसा लिए जाते हो और उनकी सेवा करने के इच्छुक हो जाते हो, उनके लिए एक जरिया और नौकर बन जाते हो। तुम्हें कोई शिकायत नहीं होती है, बल्कि तुम उनके लिए कुत्तों और घोड़ों की तरह कार्य करने के लिए तैयार रहते हो; वे तुम्हें गुमराह करते हैं। यही कारण है कि मेरे कार्य के प्रति तुम्हारी कोई प्रतिक्रिया नहीं है। कोई आश्चर्य नहीं कि तुम हमेशा मेरे हाथों से चुपके से निकल जाना चाहते हो, और कोई आश्चर्य नहीं कि तुम हमेशा मीठे शब्दों का प्रयोग करके छल से मेरी स्वीकृति लेना चाहते हो। इससे पता चलता है कि तुम्हारे पास पहले से एक दूसरी योजना थी, एक दूसरी व्यवस्था थी। सर्वशक्तिमान के तौर पर किए गए कुछ कार्यों को तुम देख सकते हो, पर तुम्हें मेरे न्याय और ताड़ना की जरा-सी भी जानकारी नहीं है। तुम्हें कोई अंदाज़ा नहीं है कि मेरी ताड़ना कब शुरू हुई; तुम केवल मुझे धोखा देना जानते हो—लेकिन तुम यह नहीं जानते कि मैं मनुष्य का कोई उल्लंघन बरदाश्त नहीं करूँगा। चूँकि तुम पहले ही मेरी सेवा करने का संकल्प ले चुके हो, इसलिए मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगा। मैं ऐसा परमेश्वर हूँ जो बुराई से बेइंतहा नफरत करता है, और मैं वह परमेश्वर हूँ, जो मनुष्य के प्रति ईर्ष्या रखता है। चूँकि तुमने पहले ही अपने शब्दों को वेदी पर रख दिया है, इसलिए मैं यह नहीं होने दूँगा कि तुम मेरी ही आँखों के सामने से भाग जाओ, न ही मैं यह होने दूँगा कि तुम दो स्वामियों की सेवा करो। क्या तुम्हें लगता है कि मेरी वेदी पर और मेरी आँखों के सामने अपने शब्दों को रखने के बाद तुम किसी दूसरे से प्रेम कर सकते हो? मैं लोगों को इस तरह से मुझे मूर्ख कैसे बनाने दे सकता हूँ? क्या तुम्हें लगता था कि तुम अपनी जीभ से यूँ ही मेरे लिए प्रतिज्ञा और शपथ ले सकते हो? तुम मेरे सिंहासन की शपथ कैसे ले सकते हो, मेरा सिंहासन, मैं जो सबसे ऊँचा हूँ? क्या तुम्हें लगा कि तुम्हारी शपथ पहले ही खत्म हो चुकी है? मैं तुम लोगों को बता दूँ : तुम्हारी देह भले ही खत्म हो जाए, पर तुम्हारी शपथ खत्म नहीं हो सकती। अंत में, मैं तुम लोगों की शपथ के आधार पर तुम्हें दोषी ठहराऊँगा। हालाँकि तुम लोगों को लगता है कि अपने शब्द मेरे सामने रखकर अनमने ढंग से मेरा सामना कर लोगे, और तुम लोगों के दिल अशुद्ध और बुरी आत्माओं की सेवा कर सकते हैं। मेरा गुस्सा उन लोगों का धोखा कैसे सहन कर सकता है जो कुत्ते और सुअर जैसे हैं? मुझे अपने प्रशासनिक आदेश कार्यान्वित करने होंगे, और अशुद्ध आत्माओं के हाथों से उन सभी कट्टर, “पावन” लोगों को वापस खींचना होगा जिनका मुझमें विश्वास है, ताकि वे एक अनुशासित प्रकार से मेरे लिए “सेवारत” हो सकें, मेरे बैल बन सकें, मेरे घोड़े बन सकें, मेरे संहार की दया पर रह सकें। मैं तुमसे तुम्हारे पिछले संकल्प फिर से उठवाऊँगा और एक बार फिर से अपनी सेवा करवाऊँगा। मैं ऐसे किसी भी सृजित प्राणी को अनुमति नहीं दूँगा, जो मुझे ठगता है। तुम्हें क्या लगा कि तुम बस मनमाने ढंग से अनुरोध कर सकते हो और मेरे सामने झूठ बोल सकते हो? क्या तुम्हें लगा कि मैंने तुम्हारे वचन और कर्म सुने या देखे नहीं? तुम्हारे वचन और कर्म मेरी दृष्टि में कैसे नहीं आ सकते? मैं लोगों को इस तरह अपने को ठगने कैसे दे सकता हूँ?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 342

मैं कई वसंत और पतझड़ से तुम लोगों के बीच में चलता रहा हूँ; मैं लंबे समय तक तुम लोगों के बीच जीया हूँ, और तुम लोगों के साथ जीया हूँ। तुम लोगों का कितना घृणित व्यवहार मेरी आँखों के सामने से फिसला है? तुम्हारे वे हृदयस्पर्शी शब्द लगातार मेरे कानों में गूँजते हैं; तुम लोगों के हज़ारों-करोड़ों संकल्प मेरी वेदी पर रखे गए हैं—इतने ज्यादा कि उन्हें गिना भी नहीं जा सकता। लेकिन तुम लोगों का जो समर्पण है और जितना तुम अपने आपको खपाते हो, वह रंचमात्र भी नहीं है। मेरी वेदी पर तुम लोग ईमानदारी की एक नन्ही बूँद भी नहीं रखते। मुझ पर तुम लोगों के विश्वास के फल कहाँ हैं? तुम लोगों ने मुझसे अनंत अनुग्रह प्राप्त किया है और तुमने स्वर्ग के अनंत रहस्य देखे हैं; यहाँ तक कि मैंने तुम लोगों को स्वर्ग की लपटें भी दिखाई हैं, लेकिन मैं तुम लोगों को जलाना सह नहीं सकता था। फिर भी, बदले में तुम लोगों ने मुझे कितना दिया है? तुम लोग मुझे कितना देने के लिए तैयार हो? तुम्हारे हाथ में जो भोजन है जो मैंने प्रदान किया है, पलटकर उसी को तुम मुझे चढ़ा देते हो, यह तक कहते हो कि वह तुम्हें अपनी कड़ी मेहनत के पसीने के बदले मिला है और तुम अपना सर्वस्व मुझे चढ़ा रहे हो। तुम यह कैसे नहीं जानते कि मेरे लिए तुम्हारा “योगदान” बस वे सभी चीजें हैं, जो मेरी ही वेदी से चुराई गई हैं? इतना ही नहीं, अब तुम वे चीज़ें मुझे चढ़ा रहे हो, क्या तुम मुझे धोखा नहीं दे रहे? तुम यह कैसे नहीं जान पाते कि आज जिन भेंटों का आनंद मैं उठा रहा हूँ, वे मेरी वेदी पर चढ़ाई गई सभी भेंटें हैं, न कि जो तुमने अपनी कड़ी मेहनत से कमाई हैं और फिर मुझे चढ़ावा दिया है? तुम लोग वास्तव में मुझे इस तरह धोखा देने की हिम्मत करते हो, इसलिए मैं तुम लोगों को कैसे माफ़ कर सकता हूँ? तुम लोग मुझसे इसे और सहने की अपेक्षा कैसे कर सकते हो? मैंने तुम लोगों को सब कुछ प्रदान किया है, मैंने तुम लोगों के लिए सब कुछ खोलकर रख दिया है और तुम्हारी ज़रूरतें पूरी की हैं, तुम लोगों की सोच के दायरे को बहुत बढ़ाया है, फिर भी तुम लोग अपनी अंतरात्मा की अनदेखी कर इस तरह मुझे धोखा देते हो। मैंने निःस्वार्थ भाव से अपना सब कुछ तुम लोगों को प्रदान किया है, ताकि तुम लोग अगर पीड़ित भी होते हो, तो भी तुम लोगों को मुझसे वह सब मिल जाए, जो मैं स्वर्ग से लाया हूँ। फिर भी, तुम लोगों में बिल्कुल भी समर्पण नहीं है, और अगर तुमने कोई छोटा-मोटा योगदान किया भी हो, तो बाद में तुम मुझसे उसका “हिसाब बराबर” करने की कोशिश करते हो। क्या तुम्हारा योगदान शून्य नहीं माना जाएगा? तुमने मुझे मात्र रेत का एक कण चढ़ाया है, जबकि माँगा एक टन सोना है। क्या तुम बस बेतुके ढंग से माँग करने वाले नहीं बन रहे हो? मैं तुम लोगों के बीच काम करता हूँ। उस दस प्रतिशत का भी कोई नामोनिशान नहीं है, जो मुझे मिलना चाहिए, अतिरिक्त बलिदानों की तो बात ही छोड़ दो। इसके अलावा, धर्मपरायण लोगों द्वारा भेंट चढ़ाए जाने वाले उस दस प्रतिशत को भी बुरे लोगों द्वारा छीन लिया जाता है। क्या तुम सभी मुझसे तितर-बितर नहीं हो गए हो? क्या तुम सब मेरे विरोधी नहीं हो? क्या तुम सब मेरी वेदी को नष्ट नहीं कर रहे हो? ऐसे लोगों को मेरी आँखें एक खज़ाने के रूप में कैसे देख सकती हैं? क्या वे सुअर और कुत्ते नहीं हैं, जिनसे मैं घृणा करता हूँ? मैं तुम लोगों के बुरे कर्मों को खज़ाना कैसे कह सकता हूँ? मेरा कार्य वास्तव में किसके लिए किया जाता है? क्या इसका प्रयोजन केवल मेरे द्वारा तुम लोगों को मार गिराकर अपना अधिकार प्रकट करना हो सकता है? क्या तुम सबके जीवन मेरे एक ही वचन पर नहीं टिके हैं? ऐसा क्यों है कि मैं तुम लोगों को निर्देश देने के लिए केवल वचनों का प्रयोग कर रहा हूँ, और मैंने जितनी जल्दी हो सके, तुम लोगों को मार गिराने के लिए अपने वचनों को तथ्यों में नहीं बदला है? क्या मेरे वचनों और कार्य का उद्देश्य केवल लोगों पर प्रहार करना ही है? क्या मैं ऐसा परमेश्वर हूँ, जो अंधाधुंध निर्दोषों को मार डालता है? इस समय तुम लोगों में से कितने मानव-जीवन का सही मार्ग खोजने के लिए अपने पूर्ण अस्तित्व के साथ मेरे सामने आ रहे हैं? मेरे सामने केवल तुम लोगों के शरीर हैं, तुम्हारे दिल अभी भी निरंकुश और मुझसे बहुत, बहुत दूर हैं। चूँकि तुम लोग नहीं जानते कि मेरा कार्य वास्तव में क्या है, इसलिए तुम लोगों में से कई ऐसे हैं, जो मुझे छोड़ जाना और मुझसे दूरी बनाना चाहते हैं, और इसके बजाय ऐसे आनंद के संसार में रहने की आशा करते हैं, जहाँ कोई ताड़ना या न्याय नहीं है। क्या लोग अपने दिलों में इसी की कामना नहीं करते? मैं तुम्हें बाध्य करने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ। तुम जो भी मार्ग अपनाते हो, वह तुम्हारी अपनी पसंद है। आज के मार्ग के साथ न्याय और शाप है, लेकिन तुम सबको पता होना चाहिए कि जो कुछ भी मैंने तुम लोगों को दिया है—चाहे वह न्याय हो या ताड़ना—वे सर्वोत्तम उपहार हैं जो मैंने तुम लोगों को दिए हैं, और वे सब वे चीजें हैं जिनकी तुम लोगों को तत्काल आवश्यकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 343

मैंने पृथ्वी पर बहुत अधिक कार्य किया है और मैं बहुत वर्षों तक मानव-जाति के बीच चला हूँ, फिर भी लोगों को मेरी छवि और स्वभाव का शायद ही ज्ञान है और कुछ ही लोग उस कार्य के बारे में पूरी तरह से बता सकते हैं जो मैं करता हूँ। ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जिनकी लोगों में कमी है, कोई भी कभी नहीं समझता कि मैं क्या करता हूँ और लोग दिल में हमेशा इस तरह सतर्क रहते हैं मानो उन्हें गहरा डर हो कि मैं उन्हें किसी अन्य स्थिति में डाल दूँगा और फिर उन पर और ध्यान नहीं दूँगा। इस प्रकार, मेरे प्रति लोगों का रवैया हमेशा अत्यंत सतर्कता के साथ बहुत उदासीन रहता है। इसका कारण यह है कि मैं जो कार्य करता हूँ, लोग उसे समझे बिना वर्तमान तक आए हैं, और विशेषकर, वे उन वचनों से भ्रमित हैं, जो मैं उनसे कहता हूँ। वे मेरे वचनों को यह जाने बिना अपने हाथों में रखते हैं कि उन्हें इन पर अटल विश्वास करने के लिए खुद को प्रतिबद्ध करना चाहिए या अनिर्णय का विकल्प चुनते हुए उन्हें भूल जाना चाहिए। वे नहीं जानते कि उन्हें इन वचनों को अभ्यास में लाना चाहिए या इंतजार करना और देखना चाहिए; उन्हें सब कुछ छोड़कर बहादुरी से अनुसरण करना चाहिए, या पहले की तरह दुनिया के साथ मित्रता जारी रखनी चाहिए। लोगों की आंतरिक दुनिया बहुत जटिल है और वे बहुत धूर्त हैं। चूँकि लोग मेरे वचनों को स्पष्ट या पूर्ण रूप से देख नहीं पाते, इसलिए उनमें से बहुतों को उनका अभ्यास करने में कष्ट होता है और अपना दिल मेरे सामने रखने में कठिनाई होती है। मैं तुम लोगों की कठिनाइयों को गहराई से समझता हूँ। देह में रहते हुए कई कमजोरियाँ अपरिहार्य होती हैं और कई वस्तुगत कारक तुम्हारे लिए कठिनाइयाँ पैदा करते हैं। तुम लोग अपने परिवार का पालन-पोषण करते हो, अपने दिन कड़ी मेहनत करते हुए बिताते हो, और साल-दर-साल तुम्हारा समय कष्ट में बीतता है। देह में रहने में कई कठिनाइयाँ हैं—मैं इससे इनकार नहीं करता, और तुम लोगों से मेरी अपेक्षाएँ निश्चित रूप से तुम्हारी कठिनाइयों के अनुसार हैं। मेरे कार्य की सभी अपेक्षाएँ तुम्हारे वास्तविक आध्यात्मिक कद पर आधारित हैं। शायद अतीत में लोगों द्वारा अपने कार्य में तुम लोगों से की गई अपेक्षाएँ अत्यधिकता के तत्त्वों से युक्त थीं, लेकिन तुम लोगों को यह जान लेना चाहिए कि मैंने कभी भी अपने कहने और करने में तुम लोगों से अत्यधिक अपेक्षाएँ नहीं कीं। मेरी समस्त अपेक्षाएँ लोगों की प्रकृति, देह और उनकी जरूरतों पर आधारित हैं। तुम लोगों को पता होना चाहिए और मैं तुम लोगों को बहुत स्पष्ट रूप से बता सकता हूँ कि मैं लोगों के सोचने के कुछ तर्कसंगत तरीकों का विरोध नहीं करता, और न मैं मनुष्य की अंतर्निहित प्रकृति का विरोध करता हूँ। ऐसा केवल इसलिए है क्योंकि लोग नहीं समझते कि मेरे अपेक्षित मानक वास्तव में क्या हैं, न वे मेरे वचनों का मूल अर्थ ही समझते हैं; लोग अभी तक मेरे वचनों के बारे में संदेह से ग्रस्त हैं, यहाँ तक कि आधे से भी कम लोग मेरे वचनों पर विश्वास करते हैं। शेष लोग छद्म-विश्वासी हैं, और उससे भी ज्यादा ऐसे हैं जो मुझे “कहानियाँ कहते” सुनना पसंद करते हैं। इसके अलावा, कई लोग ऐसे भी हैं जो इसे तमाशा समझकर इसका मजा लेते हैं। मैं तुम लोगों को सावधान करता हूँ : मेरे बहुत-से वचन उन लोगों के लिए प्रकट कर दिए गए हैं जो मुझ पर विश्वास करते हैं, और जो लोग राज्य के सुंदर दृश्य का आनंद तो लेते हैं लेकिन उसके दरवाजों के बाहर बंद हैं, वे मेरे द्वारा पहले ही निकाल दिए गए हैं। क्या तुम लोग मेरे द्वारा तिरस्कृत मोठ घास भर नहीं हो? तुम लोग कैसे मुझे जाते देख सकते हो और फिर खुशी से मेरी वापसी का स्वागत कर सकते हो? मैं तुम लोगों से कहता हूँ, नीनवे के लोगों ने यहोवा के क्रोध भरे शब्दों को सुनने के बाद तुरंत टाट के वस्त्र और राख में पश्चात्ताप किया था। चूँकि उन्होंने उसके वचनों पर विश्वास किया, इसलिए वे आतंक और खौफ से भर गए और नतीजतन उन्होंने टाट और राख में पश्चात्ताप किया। जहाँ तक आज के लोगों का संबंध है, हालाँकि तुम लोग भी मेरे वचनों पर विश्वास करते हो, बल्कि इससे भी बढ़कर यह मानते हो कि आज एक बार फिर यहोवा तुम लोगों के बीच आ गया है; लेकिन तुम लोगों का रवैया सरासर श्रद्धाहीन है, मानो तुम लोग बस उस यीशु को देख रहे हो, जो हजारों साल पहले यहूदिया में पैदा हुआ था और अब तुम्हारे बीच उतर आया है। मैं गहराई से उस धोखेबाजी को समझता हूँ, जो तुम लोगों के दिल में मौजूद है; तुममें से अधिकतर लोग केवल जिज्ञासावश मेरा अनुसरण करते हैं और अपने खालीपन के कारण मेरी खोज में आए हैं। जब तुम लोगों की तीसरी इच्छा—एक शांतिपूर्ण और सुखी जीवन जीने की इच्छा—टूट जाती है, तो तुम लोगों की जिज्ञासा भी गायब हो जाती है। तुम लोगों में से प्रत्येक के दिल के भीतर मौजूद धोखेबाजी तुम्हारे शब्दों और कर्मों के माध्यम से उजागर होती है। स्पष्ट कहूँ तो, तुम लोग मेरे बारे में केवल उत्सुक हो, मुझसे भयभीत नहीं हो; तुम लोग अपनी जीभ पर काबू नहीं रखते और अपने व्यवहार को तो और भी कम नियंत्रित करते हो। तो तुम लोगों का विश्वास आखिर कैसा है? क्या यह वास्तविक है? तुम लोग सिर्फ अपनी चिंताएँ दूर करने और अपनी ऊब मिटाने के लिए, अपने जीवन में मौजूद खालीपन को भरने के लिए मेरे वचनों का उपयोग करते हो। तुम लोगों में से कौन मेरे वचनों को अभ्यास में लाया है? वास्तविक विश्वास किसे है? तुम लोग चिल्लाते रहते हो कि परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है जो लोगों के अंतर्तम हृदयों का अवलोकन करता है, परंतु जिस परमेश्वर के बारे में तुम अपने दिलों में चिल्लाते रहते हो, उसकी मेरे साथ क्या अनुरूपता है? जब तुम लोग इस तरह से चिल्ला रहे हो, तो फिर वैसे कार्य क्यों करते हो? क्या ऐसा हो सकता है कि यही वह प्रेम है जो तुम लोग मुझे प्रतिफल में चुकाना चाहते हो? तुम लोगों के होंठों पर ढेर सारा समर्पण है, लेकिन तुम लोगों के बलिदान और अच्छे कर्म कहाँ हैं? अगर तुम्हारे शब्द मेरे कानों तक न पहुँचते, तो मैं तुम लोगों से इतनी नफरत कैसे कर पाता? यदि तुम लोग वास्तव में मुझ पर विश्वास करते, तो तुम ऐसी शर्मनाक अवस्था में कैसे पड़ सकते थे? तुम लोगों के चेहरों पर ऐसे उदासी छाई है, मानो तुम रसातल में कोई मुकदमा झेल रहे हो। तुम लोगों के पास जीवन-शक्ति का एक कण भी नहीं है, और तुम अपने अंदर की आवाज के बारे में क्षीणता से बात करते हो; यहाँ तक कि तुम शिकायतों और शापों से भी भरे हुए हो। मैं जो करता हूँ, उसमें तुम लोगों ने बहुत पहले ही अपना विश्वास खो दिया था, यहाँ तक कि तुम्हारा मूल विश्वास भी गायब हो गया है, इसलिए तुम अंत तक संभवतः कैसे अनुसरण कर सकते हो? ऐसी स्थिति में तुम लोगों को कैसे बचाया जा सकता है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 344

यद्यपि मेरा कार्य तुम लोगों के लिए बहुत सहायक है, किंतु मेरे वचन तुम लोगों पर हमेशा खो जाते हैं और बेकार हो जाते हैं। मेरे द्वारा पूर्ण बनाए जाने के पात्र ढूँढ़ पाना मुश्किल है, इस बिंदु तक कि आज मैं तुम लोगों में आशा लगभग खो चुका हूँ। मैंने तुम्हारे बीच कई सालों तक खोज की है, लेकिन किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ पाना मुश्किल है, जो मेरा विश्वासपात्र बन सकता हो। मुझे लगता है कि मुझमें तुम लोगों पर कार्य जारी रखने का भरोसा नहीं है, और न कोई प्रेम है जिससे मैं तुमसे प्रेम करना जारी रखूँ। इसका कारण यह है कि मैंने बहुत पहले से तुम लोगों की उन तुच्छ, दयनीय “उपलब्धियों” से बेइंतहा नफरत की है; ऐसा लगता है जैसे मैंने कभी तुम लोगों के बीच बात नहीं की और कभी तुम लोगों पर कार्य नहीं किया। तुम्हारी उपलब्धियाँ बहुत घृणास्पद हैं। तुम लोग अपने लिए हमेशा बरबादी और शर्मिंदगी लाते हो और तुम्हारा लगभग कोई मूल्य नहीं है। मैं शायद ही तुम लोगों में इंसान से समानता खोज पाऊँ, न ही मैं तुम्हारे अंदर इंसान होने की गंध पा सकता हूँ। तुम्हारी ताज़ी सुगंध कहाँ है? वह कीमत कहाँ है, जो तुम लोगों ने कई वर्षों में चुकाई है और उसके परिणाम कहाँ हैं? क्या तुम लोगों को कभी कोई परिणाम नहीं मिला? मेरे कार्य में अब एक नई शुरुआत है, एक नया प्रारंभ। मैं भव्य योजनाएँ कार्यान्वित करने जा रहा हूँ, और भी बड़ा कार्य शुरू कर रहा हूँ, फिर भी तुम लोग अभी भी पहले की तरह ही कीचड़ में लोट लगाकर पतित हो रहे हो, अतीत के गंदे पानी में रह रहे हो और अपनी मूल दुर्दशा से खुद को मुक्त करने में लगभग असफल रहे हो। इसलिए तुम लोगों ने अभी तक मेरे वचनों से कुछ हासिल नहीं किया है। तुम लोगों ने अब तक खुद को कीचड़ और गंदे पानी के अपने मूल स्थान से नहीं छुड़ाया है, और तुम लोग केवल मेरे वचनों को जानते हो, लेकिन तुमने वास्तव में मेरे वचनों की स्वतंत्रता के दायरे में प्रवेश नहीं किया है, इसलिए मेरे वचन कभी भी तुम लोगों के लिए प्रकट नहीं किए गए हैं; वे भविष्यवाणी की एक किताब की तरह हैं, जो हजारों वर्षों से मुहरबंद रही है। मैं तुम लोगों के जीवन में प्रकट होता हूँ, लेकिन तुम लोग इससे हमेशा अनजान रहते हो। तुम लोग मुझे जानते तक नहीं। मेरे द्वारा कहे गए वचनों में से लगभग आधे वचन तुम लोगों का न्याय करते हैं, और वे आधा प्रभाव हासिल करते हैं, जिससे तुम स्तब्ध और हक्के-बक्के रह जाते हो। शेष आधे वचन तुम लोगों को जीवन के बारे में सिखाने के लिए और आचरण कैसे करें, इस बारे में बताने के लिए हैं। लेकिन जहाँ तक तुम्हारा संबंध है, ऐसा लगता है, जैसे ये वचन तुम लोगों के लिए मौजूद ही नहीं हैं, या जैसे कि तुम लोग बच्चों की बातें सुन रहे थे, ऐसी बातें जिन्हें सुनकर तुम हमेशा दबे-ढके ढंग से मुसकरा देते हो, लेकिन उन पर कार्रवाई कुछ नहीं करते। तुम लोगों ने इन चीजों की कभी परवाह नहीं की है; तुम लोगों ने हमेशा मेरे कार्यों को जिज्ञासा के नाम पर ही देखा है, जिसका परिणाम यह हुआ है कि अब तुम लोग अँधेरों में घिर गए हो और प्रकाश को देख नहीं सकते, और इसलिए तुम लोग अँधेरे में दयनीय ढंग से रोते हो। मैं बस तुम लोगों का समर्पण चाहता हूँ, तुम्हारा बेशर्त समर्पण, और इससे भी बढ़कर मेरी अपेक्षा है कि तुम लोग मेरी कही हर चीज़ के बारे में पूरी तरह से निश्चित रहो। तुम लोगों को उपेक्षा का रवैया नहीं अपनाना चाहिए और खास तौर से मेरी कही चीज़ों के बारे में चयनात्मक व्यवहार नहीं करना चाहिए, न ही मेरे वचनों और कार्य के प्रति उदासीन रहना चाहिए, जिसके कि तुम आदी हो। मेरा कार्य तुम लोगों के बीच किया जाता है और मैंने तुम लोगों के लिए बहुत सारे वचन प्रदान किए हैं, लेकिन यदि तुम लोग मेरे साथ इस तरह लापरवाही से व्यवहार करोगे, तो जो कुछ तुमने न तो हासिल किया और न ही जिसे अभ्यास में लाए हो, उसे मैं केवल गैर-यहूदी परिवारों को दे सकता हूँ। समस्त सृजित प्राणियों में से कौन है, जिसे मैंने अपने हाथों में नहीं रखा हुआ है? तुम लोगों में से अधिकांश “पके बुढ़ापे” की उम्र के हो और तुम लोगों के पास इस तरह के कार्य को स्वीकार करने की ऊर्जा नहीं है, जो मेरे पास है। तुम लोग हमेशा मुश्किल से गुजारा करने वाले हानहाओ पक्षी[क] की तरह हो और तुमने कभी भी मेरे वचनों को गंभीरता से नहीं लिया है। युवा लोग अत्यंत अहंकारी और अति-आसक्त हैं और मेरे कार्य पर और भी कम ध्यान देते हैं। वे मेरे भोज के व्यंजनों का आनंद लेने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते; वे उस छोटे-से पक्षी की तरह हैं, जो अपने पिंजरे से बाहर निकलकर बहुत दूर जाने के लिए उड़ गया है। इस तरह के युवा और वृद्ध लोग मेरे लिए कैसे उपयोगी हो सकते हैं?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन

फुटनोट :

क. हानहाओ पक्षी की कहानी ईसप की चींटी और टिड्डी की नीति-कथा से काफ़ी मिलती-जुलती है। जब मौसम गर्म होता है, तब हानहाओ पक्षी अपने पड़ोसी नीलकंठ द्वारा बार-बार चेताए जाने के बावजूद घोंसला बनाने के बजाय सोना पसंद करता है। जब सर्दी आती है, तो हानहाओ ठिठुरकर मर जाता है।


परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 345

यद्यपि तुम युवा लोग जवान शेरों के समान हो, पर तुम्हारे दिलों में शायद ही सच्चा मार्ग है। तुम्हारा यौवन तुम लोगों को मेरे अधिक कार्य का हकदार नहीं बनाता; उलटे तुम लोग हमेशा अपने प्रति मेरी विमुखता को भड़काते हो। यद्यपि तुम लोग युवा हो, लेकिन तुम लोगों में या तो जीवन-शक्ति या फिर महत्वाकांक्षा की कमी है, और तुम लोग अपने भविष्य के बारे में हमेशा अप्रतिबद्ध रहते हो; ऐसा लगता है मानो तुम उदासीन हो, फिर भी हमेशा इसे दिल पर ले लेते हो। यह कहा जा सकता है कि युवा लोगों में जो जीवन-शक्ति, आकांक्षाएँ और रुख पाए जाने चाहिए, वे तुम लोगों में बिल्कुल नहीं मिल सकते; तुम्हारा, इस तरह के युवा व्यक्ति का, कोई रुख नहीं है और तुममें क्या सही है और क्या गलत, अच्छे और बुरे, सुंदर और कुरूप के बीच भेद करने की कोई योग्यता नहीं है। तुम लोगों में कोई भी ऐसे तत्त्व खोज पाना असंभव है, जो ताज़ा हों। तुम लोग लगभग पूरी तरह से पुराने ढंग के हो, और इस तरह के तुम युवा लोगों ने भीड़ का अनुसरण करना, नासमझ होना भी सीख लिया है। तुम लोग स्पष्ट रूप से सही को गलत से अलग नहीं कर सकते, सच और झूठ में भेद नहीं कर सकते, उत्कृष्टता के लिए कभी प्रयास नहीं कर सकते, और न ही तुम यह बता सकते हो कि क्या सही है और क्या गलत, सत्य क्या है और ढोंग क्या है। तुम लोगों में धर्म की सड़ांध बूढ़े लोगों से भी अधिक भारी और गंभीर है। तुम गर्वीले, उद्धत और अविवेकी तक हो, तुम बहुत प्रतिस्पर्धी हो और तुम्हारा झगड़ालूपन बहुत मजबूत है—इस तरह के युवा व्यक्ति के पास सत्य कैसे हो सकता है? जो व्यक्ति अपने रुख पर कायम नहीं रह सकता, वह अपनी गवाही में दृढ़ कैसे रह सकता है? जिस व्यक्ति में सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता न हो, उसे युवा कैसे कहा जा सकता है? जिस व्यक्ति में एक युवा व्यक्ति की जीवन-शक्ति, जोश, ताज़गी, शांति और स्थिरता नहीं है, उसे मेरा अनुयायी कैसे कहा जा सकता है? जिस व्यक्ति में कोई सत्य, कोई न्याय की भावना न हो, बल्कि जिसे खेलना और लड़ना पसंद हो, वह मेरा गवाह बनने के योग्य कैसे हो सकता है? युवा लोगों को कपट से भरा नहीं होना चाहिए या दूसरे लोगों के प्रति भेदभावपूर्ण नजरों से भरा नहीं होना चाहिए। उन्हें विनाशकारी, घृणित कृत्य नहीं करने चाहिए। उन्हें आकांक्षाओं, प्रेरणा और ऊपर उठने की जबरदस्त भावना से रहित नहीं होना चाहिए। उन्हें अपनी संभावनाओं को लेकर निराश नहीं होना चाहिए और न ही उन्हें जीवन में आशा और भविष्य में आस्था खोनी चाहिए। उनमें यह दृढ़ता होनी चाहिए कि वे सत्य के उस मार्ग पर कायम रहें जो उन्होंने अब चुना है—ताकि वे मेरे लिए पूरा जीवन खपाने की अपनी इच्छा साकार कर सकें। युवा लोगों को सत्य से रहित नहीं होना चाहिए, न ही उन्हें पाखंड और अधार्मिकता को प्रश्रय देना चाहिए—उन्हें अपने उचित रुख पर दृढ़ रहना चाहिए; उन्हें धारा के साथ बहना नहीं चाहिए, बल्कि उनमें न्याय और सत्य के लिए त्याग करने और संघर्ष करने का हिम्मत भरा जज्बा होना चाहिए। उनमें यह बहादुरी होनी चाहिए कि वे अंधकार की शक्तियों के उत्पीड़न के सामने न झुकें और अपने अस्तित्व की सार्थकता को परिवर्तित कर दें। उन्हें सब-कुछ चुपचाप नहीं सह लेना चाहिए, बल्कि इससे भी बढ़कर उनमें सच्चाई, बेबाकी और अपने भाई-बहनों के प्रति क्षमा की भावना होनी चाहिए। बेशक, मेरी ये अपेक्षाएँ सभी से हैं और सभी को मेरा यह प्रोत्साहन है। लेकिन इससे भी बढ़कर ये सभी युवा लोगों के लिए मेरे सांत्वनापूर्ण वचन हैं। तुम लोगों को मेरे वचनों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए। विशेष रूप से युवा लोगों को चीजों के सही-गलत का स्पष्ट भेद पहचानने, न्याय और सत्य खोजने के संकल्प से रहित नहीं होना चाहिए। तुम लोगों को सभी सुंदर और अच्छी चीजों का अनुसरण करना चाहिए और सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता प्राप्त करनी चाहिए। यही नहीं, तुम लोगों को अपने खुद के जीवन के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए और इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। लोग इस दुनिया में तो आते हैं, पर मुझसे उनका सामना होना दुर्लभ है और सत्य खोजने और उसे प्राप्त करने का अवसर मिलना भी दुर्लभ है। तुम लोग इस सुंदर समय को इस जीवन में अनुसरण करने के सही मार्ग के रूप में क्यों नहीं सँजोओगे? और तुम लोग हमेशा सत्य और न्याय के प्रति इतने तिरस्कारपूर्ण क्यों बने रहते हो? तुम लोग क्यों हमेशा अधार्मिकता और गंदगी के लिए स्वयं को रौंदते और बरबाद करते रहते हो, जो लोगों के साथ खिलवाड़ करती है? और तुम लोग क्यों उन बूढ़े लोगों की तरह वैसे काम करते हो जो अधर्मी करते हैं? तुम लोग पुरानी चीजों के पुराने तरीकों का अनुकरण क्यों करते हो? तुम लोगों का जीवन न्याय, सत्य और पवित्रता से भरा होना चाहिए; तुम लोगों से कभी भी इतनी जल्दी पतित होने और इस तरह रसातल में गिर जाने की अपेक्षा नहीं की गई थी। क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि यह एक भयानक दुर्भाग्य होगा? क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि यह बहुत अन्यायपूर्ण होगा?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 346

यदि इतने सारे कार्य, और इतने सारे वचनों का तुम पर कोई असर नहीं हुआ है, तो जब परमेश्वर के कार्य को फैलाने का समय आएगा, तब तुम अपने कर्तव्य को निभाने में असमर्थ रहोगे और तुम शर्मिंदा और अपमानित होगे। उस समय, तुम ऐसा महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर के कितने ऋणी हो, कि परमेश्वर के विषय में तुम्हारा ज्ञान कितना सतही है। यदि तुम आज परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण नहीं करते हो, जबकि वह कार्य कर रहा है, तो बाद में बहुत देर हो जाएगी। अंत में, तुम्हारे पास कहने के लिए कोई ज्ञान नहीं होगा—तुम खोखले रह जाओगे, और तुम्हारे पास कुछ भी न होगा। परमेश्वर को हिसाब देने के लिए तुम किसका उपयोग करोगे? क्या तुममें परमेश्वर का सामना करने का दुस्साहस होगा? तुम्हें इसी वक्त अपने लक्ष्य के लिए कठिन प्रयास करना चाहिए, ताकि तुम अंततः पतरस की तरह जान पाओ कि परमेश्वर की ताड़ना और उसका न्याय मनुष्य के लिए कितना लाभकारी है, और बिना उसकी ताड़ना और न्याय के मनुष्य को बचाया नहीं जा सकता, वह इस अपवित्र भूमि और दलदल में गहराई तक धँसता ही चला जाएगा। शैतान द्वारा भ्रष्ट लोग एक-दूसरे के विरुद्ध साजिश करते रहे हैं और एक-दूसरे की राह में काँटे बिछाते रहे हैं, उन्होंने परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय खो दिया है। वे बहुत विद्रोही बन गए हैं, उन्होंने ढेरों धारणाएँ पाल रखी हैं, और वे सभी शैतान के हैं। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के बगैर, मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध नहीं किया जा सकता और उसे बचाया नहीं जा सकता। देहधारी परमेश्वर के देह में कार्य के द्वारा जो कुछ व्यक्त किया गया है, बिल्कुल वही आत्मा के द्वारा प्रकट किया गया है, और परमेश्वर का कार्य भी आत्मा द्वारा किए गए कार्य के अनुसार ही किया जाता है। आज, यदि तुम्हारे पास इस कार्य का कोई ज्ञान नहीं है, तो तुम बहुत ही मूर्ख हो, तुमने बहुत कुछ खो दिया है! यदि तुमने परमेश्वर का उद्धार नहीं पाया है, तो तुम्हारा विश्वास धार्मिक विश्वास है, और तुम एक ऐसे ईसाई हो जो धर्म का ईसाई है। चूँकि तुम मृत विनियमों को कसकर थामे हुए हो, तुमने पवित्र आत्मा के नए कार्य को खो दिया है; अन्य लोग, जो परमेश्वर को प्रेम करने का अनुसरण करते हैं, सत्य और जीवन पाने में सक्षम हैं, जबकि तुम्हारा विश्वास परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने में असमर्थ है। इसकी बजाय, तुम बुरे काम करने वाले बन गए हो, तुम एक ऐसे व्यक्ति बन गए हो जो घातक और घृणित कार्य करता है; तुम शैतान की हँसी के पात्र और उसके कैदी बन गए हो। मनुष्य को परमेश्वर पर केवल विश्वास ही नहीं करना है, बल्कि उसे परमेश्वर से प्रेम करना है, उसका अनुसरण और उसकी आराधना करनी है। यदि आज तुम अनुसरण नहीं करोगे, तो वह दिन आएगा जब तुम कहोगे, “मैंने पहले सही तरीके से परमेश्वर का अनुसरण क्यों नहीं किया, उसे सही ढंग से संतुष्ट क्यों नहीं किया, मैं अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन क्यों नहीं लाया? उस समय परमेश्वर के प्रति समर्पित न हो पाने और परमेश्वर के वचन के ज्ञान का अनुसरण न करने का आज मुझे कितना अफसोस है। तब परमेश्वर ने कितना कुछ कहा था—मैंने अनुसरण क्यों नहीं किया? मैं कितना मूर्ख था!” तुम अपने-आपसे बेहद नफरत करोगे। आज, तुम मेरी बातों पर विश्वास नहीं करते, और उन पर ध्यान नहीं देते; जब वह दिन आएगा जब यह कार्य फैल जाएगा और तुम इसकी संपूर्णता देखोगे, तब तुम्हें अफसोस होगा, और उस समय तुम भौंचक्के रह जाओगे। आशीषें हैं, फिर भी तुम्हें उनका आनंद लेना नहीं आता, सत्य है, फिर भी तुम उसका अनुसरण नहीं करते। क्या तुम अपने-आप पर मुसीबत नहीं लाते? आज, यद्यपि परमेश्वर के कार्य का अगला चरण अभी शुरू होना बाकी है, फिर भी तुमसे जो कुछ अपेक्षित है और तुम्हें जिन्हें जीने के लिए कहा जाता है, उनमें कुछ भी अतिरिक्त नहीं है। इतना सारा कार्य है, इतने सारे सत्य हैं; क्या वे इस योग्य नहीं हैं कि तुम उन्हें जानो? क्या ताड़ना और न्याय तुम्हारी आत्मा को जागृत करने में असमर्थ हैं? क्या ताड़ना और न्याय तुममें खुद के प्रति नफरत पैदा करने में असमर्थ हैं? क्या तुम शैतान के प्रभाव में जीकर, और शांति, आनंद और थोड़े-बहुत दैहिक सुख के साथ जीवन बिताकर संतुष्ट हो? क्या तुम सभी लोगों में सबसे अधिक निम्न नहीं हो? उनसे ज्यादा मूर्ख और कोई नहीं है जो उद्धार को देख चुके हैं लेकिन इसे प्राप्त करने का प्रयास नहीं करते हैं; वे ऐसे लोग हैं जो देह-सुख में लिप्त होते हैं और शैतान का आनंद लेते हैं। तुम यह आशा करते हो कि परमेश्वर में तुम्हारी आस्था के मार्ग में कोई भी मुश्किल या क्लेश या लेशमात्र भी पीड़ा नहीं होगी। तुम हमेशा निरर्थक चीजों के पीछे भागते हो और तुम जीवन को कोई अहमियत नहीं देते, बल्कि तुम अपने बेतुके विचारों को सत्य से ज्यादा महत्व देते हो। तुम कितने निकम्‍मे हो! तुम सूअर की तरह जीते हो—तुममें और सूअर और कुत्ते में क्या अंतर है? जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, बल्कि देह से प्यार करते हैं, क्या वे सब जानवर नहीं हैं? क्या वे मरे हुए लोग जिनमें आत्मा नहीं है, चलती-फिरती लाशें नहीं हैं? तुम लोगों के बीच कितने सारे वचन कहे गए हैं? क्या तुम लोगों के बीच केवल थोड़ा-सा ही कार्य किया गया है? मैंने तुम लोगों के बीच कितनी आपूर्ति की है? तो फिर तुमने इसे प्राप्त क्यों नहीं किया? तुम्हें किस बारे में शिकायत करनी है? क्या ऐसा नहीं है कि तुमने इसलिए कुछ भी प्राप्त नहीं किया है क्योंकि तुम देह से बहुत अधिक प्रेम करते हो? और क्या इसकी वजह यह नहीं है कि तुम्‍हारे विचार बहुत ज्यादा असंयमित हैं? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि तुम बहुत ज्यादा मूर्ख हो? यदि तुम इन आशीषों को प्राप्त करने में विफल होते हो, तो क्या तुम परमेश्वर को दोष दोगे कि उसने तुम्‍हें नहीं बचाया? तुम परमेश्वर में विश्वास करने के बाद शांति प्राप्त करने में सक्षम होने का अनुसरण करते हो—ताकि तुम्हारे बच्चे बीमारी से दूर रहें, तुम्हारे पति को एक अच्छी नौकरी मिल जाए, तुम्हारे बेटे को एक अच्छी पत्नी और तुम्हारी बेटी को एक अच्छा पति मिले, तुम्हारे बैल और घोड़े जमीन की अच्छी जुताई कर पाएँ और तुम्हारी फसलों के लिए साल भर अच्छा मौसम रहे। तुम इन्हीं चीजों का अनुसरण करते हो। तुम्‍हारा अनुसरण केवल आराम से जीने के लिए है—ताकि तुम्‍हारे परिवार में कोई दुर्घटना न हो, आँधी-तूफान तुम्‍हारे पास से होकर गुजर जाएँ, धूल-मिट्टी तुम्‍हारे चेहरे को छू भी न पाए, तुम्‍हारे परिवार की फसलें बाढ़ में न बह जाएँ—किसी भी आपदा से प्रभावित न हों, तुम “परमेश्वर के आलिंगन” में रहो, एक आरामदायक घरौंदे में रहो। तुम जैसा डरपोक इंसान, जो हमेशा देह के पीछे भागता है—क्या तुम्‍हारे अंदर एक दिल है, क्या तुम्‍हारे अंदर एक आत्मा है? क्या तुम एक पशु नहीं हो? मैं बदले में बिना कुछ माँगे तुम्‍हें सच्चा मार्ग देता हूँ, फिर भी तुम उसका अनुसरण नहीं करते। क्या तुम अभी भी उनमें से एक हो जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं? मैं तुम्‍हें एक सच्चा मानवीय जीवन देता हूँ, फिर भी तुम उसका अनुसरण नहीं करते। क्या तुम कुत्ते और सूअर की किस्म के ही नहीं हो? सूअर मनुष्य के जीवन का अनुसरण नहीं करते, वे शुद्ध किए जाने का अनुसरण नहीं करते और वे नहीं समझते कि जीवन क्या है। प्रतिदिन, वे बस पेट भर खाना खाते हैं और सो जाते हैं। मैंने तुम्‍हें सच्चा मार्ग प्रदान किया है, फिर भी तुमने उसे प्राप्त नहीं किया है, तुम्‍हारे हाथ खाली हैं। क्या तुम इस जीवन में एक सूअर का जीवन जीते रहना चाहते हो? ऐसे लोगों के जिंदा रहने का क्या अर्थ है? तुम्‍हारा जीवन घृणित और नीच है, तुम गंदगी और व्यभिचार में जीते हो और किसी लक्ष्य को पाने का प्रयास नहीं करते हो, तो क्या तुम्‍हारा जीवन अत्यंत निकृष्ट नहीं है? क्या तुममें परमेश्वर का सामना करने का दुस्साहस है? यदि तुम इसी तरह अनुभव करते रहे, तो क्या केवल शून्य ही तुम्हारे हाथ नहीं लगेगा? तुम्हें सच्चा मार्ग प्रदान किया गया है, किंतु अंततः तुम उसे प्राप्त कर पाओगे या नहीं, यह तुम्हारे अपने अनुसरण पर निर्भर करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 347

तुम लोगों की देह, तुम लोगों की असाधारण इच्छाएँ, तुम लोगों का लोभ और तुम लोगों की वासना तुम लोगों में गहराई तक जमी हुई हैं। ये चीजें तुम लोगों के हृदयों को निरंतर इतना नियंत्रित कर रही हैं कि तुम लोगों में अपने उन सामंती और पतित विचारों के जुए को अपने ऊपर से उतार फेंकने की शक्ति नहीं है। तुम लोग न तो अपनी वर्तमान स्थिति को बदलने के लिए लालायित हो, न ही अंधकार की शक्तियों के प्रभाव से बच निकलने के लिए। तुम बस इन चीजों से बँधे हुए हो। भले ही तुम लोग जानते हो कि यह जीवन इतना दर्दनाक है और यह मानवीय दुनिया इतनी अंधकारमय, फिर भी तुम लोगों में से किसी एक में भी अपना जीवन बदलने का साहस नहीं है। तुम केवल इस जीवन की वास्तविकताओं से पलायन करने, आत्मा की इंद्रियातीतता हासिल करने और एक शांत, अद्भुत, स्वर्ग जैसे परिवेश में जीने की अभिलाषा करते हो। तुम लोग अपने वर्तमान जीवन को बदलने के लिए कठिनाइयाँ सहने को तैयार नहीं हो; न ही तुम इस न्याय और ताड़ना के अंदर उस जीवन की खोज करने की इच्छा रखते हो, जिसमें तुम लोगों को प्रवेश करना चाहिए। इसके विपरीत, तुम देह से परे उस सुंदर संसार के बारे में अवास्तविक स्वप्न देखते हो। जिस जीवन की तुम लोग अभिलाषा करते हो, वह एक ऐसा जीवन है जिसे तुम बिना कोई पीड़ा सहे अनायास ही प्राप्त कर सकते हो। यह पूरी तरह से अवास्तविक है! ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोग जिसकी आशा करते हो, वह देह में एक सार्थक जीवनकाल जीने के लिए जीवनकाल के दौरान सत्य प्राप्त करने के लिए, अर्थात्, सत्य के लिए जीने और इंसाफ के लिए अडिग रहने के लिए नहीं है। यह वह नहीं है, जिसे तुम लोग उज्ज्वल, चकाचौंध करने वाला जीवन मानोगे। तुम लोगों को लगता है कि यह एक मोहक या सार्थक जीवन नहीं होगा। तुम्हारी नजर में, ऐसा जीवन जीना अन्याय जैसा लगता होगा। भले ही तुम लोग आज इस ताड़ना को स्वीकार करते हो, तुम लोग जिसकी खोज कर रहे हो, वह सत्य को प्राप्त करने या वर्तमान में सत्य को जीने के लिए नहीं है, बल्कि इसके बजाय बाद में देह से परे एक सुखी जीवन में प्रवेश करने में समर्थ होने के लिए है। तुम लोग सत्य की तलाश नहीं कर रहे हो, न ही तुम सत्य के पक्ष में खड़े हो, सत्य के लिए जीना तो दूर की बात है। तुम लोग आज प्रवेश की खातिर अनुसरण नहीं कर रहे हो; बल्कि तुम्हारे विचारों पर इस बात का कब्ज़ा है कि एक दिन क्या हो सकता है : तुम नीले आसमान पर टकटकी लगाए हुए हो और कड़वे आँसू बहा रहे हो, उस दिन की प्रतीक्षा में जब तुम्हें स्वर्ग में ले जाया जाएगा। क्या तुम लोग नहीं जानते कि इस तरह सोचने का तरीका पहले से ही वास्तविकता से परे है? तुम सोचते रहते हो कि अनंत दया और करुणा करने वाला उद्धारकर्ता एक दिन निःसंदेह तुम्हें, इस संसार में कठिनाई और पीड़ा सहने वाले को, अपने साथ ले जाने के लिए आएगा और कि वह तुम्हारे साथ जो गलत हुआ है उसके लिए न्याय दिलाएगा और तुम्हारा बदला लेगा, तुम्हें, जिसे कि सताया और उत्पीड़ित किया गया है। क्या तुम पाप से भरे हुए नहीं हो? क्या तुम अकेले हो, जिसने इस संसार में दुःख झेला है? तुम शैतान की सत्ता के अधीन गिर पड़े हो और तुमने दुःख झेला है, क्या परमेश्वर को अभी भी सचमुच तुम्हारे साथ जो गलत हुआ है उसके लिए तुम्हें न्याय दिलाने की आवश्यकता है? जो लोग परमेश्वर की माँगें पूरी करने में असमर्थ हैं—क्या वे परमेश्वर के शत्रु नहीं हैं? जो लोग देहधारी परमेश्वर में विश्वास नहीं करते—क्या वे सभी मसीह-विरोधी नहीं हैं? तुम्हारे अच्छे व्यवहार का क्या महत्व है? क्या वह परमेश्वर की आराधना करने वाले किसी हृदय का स्थान ले सकता है? तुम सिर्फ कुछ अच्छी चीजें करके परमेश्वर के आशीष प्राप्त नहीं कर सकते, और परमेश्वर केवल इसलिए तुम्हारे साथ हुए गलत के लिए न्याय ही नहीं दिलाएगा और तुम्हारे साथ किए गए अन्याय का बदला नहीं लेगा कि तुम्हें उत्पीड़ित किया गया और सताया गया है। जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और फिर भी परमेश्वर को नहीं जानते, परंतु जो अच्छा करते हैं—क्या वे भी ताड़ित नहीं किए जाते? तुम सिर्फ परमेश्वर पर विश्वास करते हो, सिर्फ यह चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हारे विरुद्ध हुए अन्याय का समाधान करे और उसका बदला ले, और तुम चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हें तुम्हारा दिन प्रदान करे, वह दिन, जब तुम अंततः अपना सिर ऊँचा कर सको। लेकिन तुम सत्य की उपेक्षा करते हो और तुम सत्य को जीने की प्यास नहीं रखते हो। तुम इस कठिन, खोखले जीवन से बच निकलने में सक्षम तो बिल्कुल भी नहीं हो। इसके बजाय, देह में अपना जीवन बिताते हुए और पाप के बीच जीवन जीते हुए तुम अपेक्षापूर्वक परमेश्वर की ओर देखते हो कि वह तुम्हारे साथ हुए गलत के लिए न्याय दिलाए और तुम्हारे अस्तित्व के कोहरे को हटा दे। परंतु क्या यह संभव है? यदि तुम्हारे पास सत्य हो, तो तुम परमेश्वर का अनुसरण कर सकते हो। यदि तुम जीवन यापन करते हो, तो तुम परमेश्वर के वचन की अभिव्यक्ति हो सकते हो। यदि तुम्हारे पास जीवन हो, तो तुम परमेश्वर के आशीषों का आनंद ले सकते हो। जिन लोगों के पास सत्य होता है, वे परमेश्वर के आशीष का आनंद ले सकते हैं। परमेश्वर उन लोगों के कष्टों का निवारण सुनिश्चित करता है, जो उसे संपूर्ण हृदय से प्रेम करते हैं और जो कठिनाइयाँ और दुःख सहते हैं, उनके नहीं जो केवल अपने आप से प्रेम करते हैं और जो शैतान के धोखों का शिकार हो चुके हैं। उन लोगों में अच्छाई कैसे हो सकती है, जो सत्य से प्रेम नहीं करते? उन लोगों में धार्मिकता कैसे हो सकती है, जो केवल देह से प्रेम करते हैं? क्या धार्मिकता और अच्छाई दोनों सत्य के संदर्भ में नहीं बोली जातीं? क्या वे उन लोगों के लिए आरक्षित नहीं हैं, जो परमेश्वर से संपूर्ण हृदय से प्रेम करते हैं? जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते और जो केवल सड़ी हुई लाशें हैं—क्या वे सभी लोग बुराई को आश्रय नहीं देते? जो लोग सत्य को जीने में असमर्थ हैं—क्या वे सब सत्य के शत्रु नहीं हैं? और तुम्हारा क्या हाल है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल पूर्ण बनाया गया मनुष्य ही सार्थक जीवन जी सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 348

मनुष्य का प्रबंधन करना हमेशा मेरा कर्तव्य रहा है। इससे भी बढ़कर, मनुष्य पर विजय कुछ ऐसा है जो मैंने बहुत पहले तब नियत की थी, जब मैंने संसार की रचना की थी। लोग नहीं जानते हैं कि अंत के दिनों में मैं मनुष्य को पूरी तरह से जीत लूँगा, या कि मानवजाति के बीच से विद्रोही लोगों को जीत लेना शैतान को मेरे द्वारा हराए जाने का प्रमाण है। परंतु जब मेरा शत्रु मेरे साथ युद्ध में शामिल हुआ, तो मैंने उसे पहले से ही बता दिया कि मैं उन लोगों को जीत लूँगा, जिन्हें शैतान ने बंदी और अपनी संतान बना लिया था और अपने घर की निगरानी करने वाले वफादार सेवकों में तब्दील कर दिया था। जीतने का मूल अर्थ है परास्त करना, अपमानित करना; इस्राएलियों की भाषा में इसका अर्थ है बुरी तरह से हराना, नष्ट कर देना और मेरे खिलाफ फिर से प्रतिरोध करने में अक्षम कर देना। परंतु आज, जब तुम्हारे बीच इसका उपयोग किया जाता है, तो इसका अर्थ होता है जीतना। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि मेरा इरादा हमेशा से मानवजाति के उन दुष्टों को पूरी तरह से हराना और नष्ट करना है, ताकि वे फिर मुझसे विश्वासघात न कर सकें, मेरे कार्य में गड़बड़ी करने या उसमें विघ्न डालने की तो हिम्मत भी न कर सकें। इस प्रकार, जहाँ तक मनुष्य का सवाल है, इस शब्द का अर्थ जीतना हो गया है। शब्द के चाहे कुछ भी संकेतार्थ हों, मेरा कार्य मनुष्यों को हराना है। क्योंकि जहाँ यह बात सच है कि मानवजाति मेरे प्रबंधन में एक अधीनस्थ है, परंतु सटीक रूप से कहूँ तो मनुष्य मेरे शत्रुओं के अलावा कुछ नहीं हैं। मनुष्य वे दुष्ट हैं, जो मेरा विरोध और मुझसे विद्रोह करते हैं। मनुष्य मेरे द्वारा शापित उस दुष्ट की संतान के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। मनुष्य उस प्रधान दूत के वंशजों के अतिरिक्त कुछ नहीं है, जिसने मेरे साथ विश्वासघात किया था। मनुष्य उस दुष्ट दानव की विरासत के अतिरिक्त कुछ नहीं है जो बहुत पहले ही मेरे द्वारा ठुकरा दिया गया था और जो सीधे मुझसे शत्रुता रखता है। चूँकि सारी मानवजाति के ऊपर का आसमान, स्पष्टता की जरा-सी झलक के बिना, मलिन और अंधकारमय है, और मानव-संसार स्याह अँधेरे में इस तरह डूबा हुआ है कि उसमें रहने वाला व्यक्ति अपने चेहरे के सामने लाकर अपने हाथ को या अपना सिर उठाकर सूरज को भी नहीं देख सकता। उसके पैरों के नीचे की कीचड़दार और गड्ढों से भरी सड़क घुमावदार और टेढ़ी-मेढ़ी है; पूरी जमीन पर लाशें बिखरी हुई हैं। अँधेरे कोने मृतकों के अवशेषों से भरे पड़े हैं, जबकि ठंडे और छायादार कोनों में दानवों की भीड़ ने अपना निवास बना लिया है। हर कदम पर, दानव लोगों के बीच झुंडों में आते-जाते रहते हैं। सभी तरह के जंगली जानवरों की गंदगी से ढकी हुई संतानें घमासान युद्ध में उलझी हुई हैं, जिनकी आवाज दिल में दहशत पैदा करती है। ऐसे समय में, इस तरह के संसार में, ऐसे “सांसारिक स्वर्गलोक” में व्यक्ति जीवन के आनंद की खोज करने कहाँ जा सकता है? अपने जीवन की मंजिल खोजने के लिए कोई कहाँ जा सकता है? लंबे समय से शैतान के पैरों के नीचे रौंदी हुई मानवजाति शैतान की छवि लिए एक प्रस्तोता रही है—इससे भी अधिक, मानवजाति शैतान का मूर्त रूप है और वह शैतान की ओर से “जबरदस्त गवाही” देने वाले प्रमाण के रूप में काम करती है। ऐसी मानवजाति, ऐसे अधम लोगों का झुंड, भ्रष्ट मानव-परिवार की ऐसी संतान परमेश्वर की गवाही कैसे दे सकती है? मेरी महिमा कहाँ से आती है? क्या मेरी ऐसी कोई गवाही है जिसके बारे में बात की जा सके? क्योंकि उस शत्रु ने, जो मेरे खिलाफ खड़ा है और जिसने मानवजाति को भ्रष्ट किया है, पहले ही उस मानवजाति को—जिसे मैंने बहुत पहले बनाया था और जो मेरी महिमा और मेरे जीवन यापन से भरी थी—दूषित कर दिया है। उसने मेरी महिमा छीन ली है और मनुष्य में जो चीज भर दी है, वह शैतान की कुरूपता की भारी मिलावट वाला जहर और अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष के फल का रस है। आरंभ में मैंने मानवजाति का सृजन किया; अर्थात् मैंने मानवजाति के पूर्वज, आदम का सृजन किया। वह रूप और छवि से संपन्न, जीवन शक्ति से भरपूर, जोश से भरपूर था और इससे भी बढ़कर, वह मेरी महिमा के साहचर्य में था। वह महिमामय दिन था, जब मैंने मनुष्य का सृजन किया। इसके बाद आदम के शरीर से हव्वा उत्पन्न हुई, वह भी मनुष्य की पूर्वज थी। इस प्रकार जिन लोगों का मैंने सृजन किया था, वे मेरे श्वास से भरे थे और मेरी महिमा से भरपूर थे। आदम मूल रूप से मेरे हाथ से “पैदा हुआ” और वह मेरी छवि का प्रतिनिधित्व था। इसलिए “आदम” का मूल अर्थ था मेरे द्वारा सृजित किया गया प्राणी, जो मेरी जीवन-ऊर्जा से भरा हुआ, मेरी महिमा से भरा हुआ, रूप और छवि से युक्त, आत्मा और श्वास से युक्त था। आत्मा से संपन्न वह एकमात्र सृजित प्राणी था, जो मेरा प्रतिनिधित्व करने और मेरी छवि धारण करने में सक्षम था, जिसने मेरा श्वास प्राप्त किया। आरंभ में, हव्वा दूसरी ऐसी इंसान थी जो श्वास से संपन्न थी, जिसका सृजन मैंने नियत किया था, इसलिए “हव्वा” का मूल अर्थ था, ऐसा सृजित प्राणी जो मेरी महिमा जारी रखेगा, जो मेरी जीवन शक्ति से भरा हुआ है और इससे भी बढ़कर, मेरी महिमा से संपन्न है। हव्वा आदम से आई, इसलिए उसने भी मेरी छवि धारण की, क्योंकि वह मेरी छवि में सृजित की जाने वाली दूसरी इंसान थी। “हव्वा” का मूल अर्थ था आत्मा, देह और हड्डियों से युक्त एक जीवित मनुष्य। वह मेरी दूसरी गवाही और साथ ही मानवजाति के बीच मेरी दूसरी छवि थी। वे मानवजाति के पूर्वज थे, मानवजाति में बहुमूल्य और शुद्ध मनुष्य थे और मूल रूप से आत्माओं से संपन्न जीवित प्राणी थे। किंतु उस दुष्ट ने मानवजाति के पूर्वजों की संतान को कुचल दिया और उन्हें बंदी बना लिया, उसने मानव-संसार को पूर्णतः अंधकार में डुबो दिया, और हालात ऐसे बना दिए कि उनकी संतान मेरे अस्तित्व में विश्वास नहीं करती। इससे भी अधिक घिनौनी बात यह है कि जहाँ दुष्ट ने लोगों को भ्रष्ट किया और उन सभी को कुचल दिया, वहीं उसने मेरी महिमा, मेरी गवाही, वह प्राणशक्ति जो मैंने उन्हें प्रदान की थी, वह श्वास और जीवन जो मैंने उनमें फूँका था, मानव-संसार में मेरी समस्त महिमा, और हृदय का समस्त रक्त जो मैंने मानवजाति पर खर्च किया था, वह सब भी क्रूरतापूर्वक छीन लिया। मानवजाति अब प्रकाश में नहीं है, लोगों ने वह सब खो दिया है जो मैंने उन्हें प्रदान किया था, और उन्होंने उस महिमा को भी छोड़ दिया है जो मैंने उन्हें प्रदान की थी। वे कैसे स्वीकार कर सकते हैं कि मैं समस्त सृष्टि का प्रभु हूँ? वे स्वर्ग में मेरे अस्तित्व में कैसे विश्वास कर सकते हैं? कैसे वे पृथ्वी पर मेरी महिमा की अभिव्यक्तियों को देख सकते हैं? ये पोते-पोतियाँ परमेश्वर को वह परमेश्वर कैसे मान सकते हैं जिसका भय उनके पूर्वज ऐसे प्रभु के रूप में मानते थे जिसने उनका सृजन किया था? इन बेचारे पोते-पोतियों ने वास्तव में वह महिमा, छवि, और वह गवाही जो मैंने आदम और हव्वा को प्रदान की थी, और वह जीवन जो मैंने मानवजाति को प्रदान किया था और जिस पर वे अपने अस्तित्व के लिए निर्भर हैं, काफी उदारता के साथ उस दुष्ट को “भेंट कर दिया”; और वे उस दुष्ट की उपस्थिति की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते और मेरी सारी महिमा उसे दे देते हैं। क्या यह “अधम लोगों का झुंड” शब्द का स्रोत नहीं है? ऐसी मानवजाति, ऐसे दुष्ट राक्षस, ऐसी चलती-फिरती लाशें, ऐसे शैतान, मेरे ऐसे शत्रु मेरी महिमा से कैसे संपन्न हो सकते हैं? मैं अपनी महिमा वापस पा लूँगा, मनुष्यों के बीच अपनी गवाही और वह सब वापस पा लूँगा, जो मूल रूप से मेरा था और जिसे मैंने बहुत पहले मानवजाति को दे दिया था—मैं मानवजाति को पूरी तरह से जीत लूँगा। किंतु तुम्हें पता होना चाहिए कि जिन मनुष्यों का मैंने सृजन किया था, वे शुद्ध मनुष्य थे जो मेरी छवि और मेरी महिमा धारण करते थे। वे शैतान के नहीं थे, न ही वे उससे कुचले जाने के भागी थे, बल्कि शैतान के लेशमात्र जहर से भी मुक्त, शुद्ध रूप से मेरी ही अभिव्यक्ति थे। और इसलिए, मैं मानवता को यह बताता हूँ : मैं केवल उन शुद्ध लोगों को चाहता हूँ जिन्हें मेरे हाथ से रचा गया था और जिनसे मैं प्रेम करता हूँ और जो किसी अन्य इकाई के नहीं हैं और मैं उनसे आनंद प्राप्त करूँगा और उन्हें अपनी महिमा मानूँगा; हालाँकि, मैं उस मानवजाति को नहीं चाहता जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, जो आज शैतान की है और जो अब मेरी मूल सृष्टि नहीं है। चूँकि मैं मानव-संसार में अपनी महिमा वापस पाना चाहता हूँ, इसलिए मैं शैतान को पराजित करने में अपनी महिमा के प्रमाण के रूप में, मानवजाति के शेष उत्तरजीवियों को पूर्ण रूप से जीत लूँगा। मैं सिर्फ अपनी गवाही को अपनी कड़ी मेहनत का नतीजा, अपनी आनंद की वस्तु मानता हूँ। यही मेरा इरादा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक वास्तविक व्यक्ति होने का क्या अर्थ है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 349

आज के दिन तक मानवजाति के विकास के इतिहास के दसियों हजार साल पहले ही बीत चुके हैं। और फिर भी जिस मानवजाति को मैंने शुरुआत में रचा था वह बहुत पहले ही पतन में डूब चुकी है और मानवजाति अब वह मानवजाति नहीं है जिसकी मैं इच्छा करता हूँ और इस प्रकार, मेरी आँखों में, लोगों ने बहुत पहले ही मानवजाति के रूप में जाने जाना बंद कर दिया है। बल्कि वे मानवजाति के अधम लोगों का झुंड हैं जिन्हें शैतान ने बंदी बना लिया है, वे चलती-फिरती सड़ी हुई लाशें हैं जिनमें शैतान बसा हुआ है और जिनसे शैतान स्वयं को आवृत करता है। लोगों को मेरे अस्तित्व में बिल्कुल भी कोई विश्वास नहीं है, न ही वे मेरे आने का स्वागत करते हैं। मानवजाति केवल बेमन से मेरी अपेक्षाओं के साथ लापरवाही से पेश आती है, अस्थायी रूप से उन्हें मान लेती है और सच्चे मन से मेरे आनंद और क्लेशों में भागीदार नहीं होती है। चूँकि लोग मुझे अबोधगम्य समझते हैं, इसलिए वे मुझे अनिच्छुक मुस्कान देते हैं, वे किसी सत्ताधारी का अनुग्रह प्राप्त करने का हाव-भाव दिखाते हैं, क्योंकि लोगों को मेरे कार्य का कोई ज्ञान नहीं है, मेरे वर्तमान इरादे तो वे बिल्कुल भी नहीं जानते। मैं तुम लोगों से सच कहूँगा : जब वह दिन आएगा, तो मेरी आराधना करने वाले हर उस व्यक्ति का दुःख तुम लोगों के दुःख की तुलना में सहने में अधिक आसान होगा। मुझमें तुम्हारी आस्था का स्तर, वास्तव में, अय्यूब की आस्था से अधिक नहीं है—यहाँ तक कि यहूदी फरीसियों की आस्था भी तुम लोगों की आस्था से बढ़कर है—और इसलिए, यदि आग का दिन आता है, तो तुम लोगों के दिन यीशु से फरीसियों को मिली फटकार से, मूसा का विरोध करने वाले 250 अगुआओं द्वारा सहे गए कष्टों से और अपने विनाश के दौरान सदोम को जिस आग में जलना पड़ा था उससे भी बदतर होंगे। जब मूसा ने चट्टान पर प्रहार किया, और यहोवा द्वारा प्रदान किया गया पानी उसमें से बहने लगा, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब दाऊद ने—आनंद से भरे अपने हृदय के साथ—मुझ यहोवा की स्तुति में तंतुवाद्य और वीणा बजाई, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब अय्यूब ने पहाड़ों में भरे अपने पशु और संपदा के अनगिनत ढेर खो दिए, और उसका शरीर पीड़ादायक फोड़ों से भर गया, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब वह मुझ यहोवा की वाणी सुन सका, और मेरी महिमा देख सका, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। पतरस उसकी आस्था के कारण ही यीशु मसीह का अनुसरण कर सका था। वह जो मेरे वास्ते सलीब पर चढ़ाया जा सका और महिमामयी गवाही दे सका, यह भी उसकी आस्था के कारण ही था। जब यूहन्ना ने मनुष्य के पुत्र की महिमामयी छवि देखी, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब उसने अंत के दिनों का दर्शन देखा, तो यह सब और भी ज्यादा उसकी आस्था के कारण था। इतने सारे तथाकथित अन्य-जाति राष्ट्रों के लोगों ने मेरा प्रकाशन प्राप्त कर लिया है और वे जान गए हैं कि मैं मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने के लिए देह में लौट आया हूँ, यह भी उनकी आस्था के कारण ही है। वे सब जो मेरे कठोर वचनों द्वारा मार खाते हैं और फिर भी इससे सांत्वना पाते हैं और बचाए जाते हैं—क्या उन्होंने ऐसा अपनी आस्था के कारण ही नहीं किया है? जो लोग मुझमें विश्वास करते हुए भी कठिनाइयों का सामना करते हैं, क्या वे भी संसार द्वारा अस्वीकृत नहीं किए गए हैं? जो लोग मेरे वचन से बाहर जी रहे हैं और परीक्षण के कष्टों से भाग रहे हैं, क्या वे सभी संसार में उद्देश्यहीन नहीं भटक रहे हैं? वे पतझड़ के पत्तों के सदृश इधर-उधर फड़फड़ा रहे हैं, जिनके पास आराम के लिए कोई जगह नहीं है, मेरी सांत्वना के वचन तो बिल्कुल भी नहीं हैं। यद्यपि मेरी ताड़ना और शोधन उनका पीछा नहीं करते, फिर भी क्या वे ऐसे भिखारी नहीं हैं, जो स्वर्ग के राज्य के बाहर सड़कों पर, एक जगह से दूसरी जगह उद्देश्यहीन भटक रहे हैं? क्या संसार सच में तुम्हारे आराम करने की जगह है? क्या तुम वास्तव में, मेरी ताड़ना से बचकर संसार से संतुष्टि की कमजोर-सी मुसकराहट प्राप्त कर सकते हो? क्या तुम वास्तव में अपने क्षणभंगुर आनंद का उपयोग अपने हृदय के खालीपन को ढकने के लिए कर सकते हो, उस खालीपन को, जिसे छिपाया नहीं जा सकता? तुम अपने परिवार में हर किसी को धोखा दे सकते हो, लेकिन मुझे कभी धोखा नहीं दे सकते। चूँकि तुम्हारी आस्था बहुत कम है इसलिए तुम आज भी जीने का आनंद नहीं पा सकते। तुम्हारे लिए मेरा प्रोत्साहन यह है : देह की खातिर अपना पूरा जीवन निरर्थक स्थिति में बिताने और उन सभी कष्टों को सहने के बजाय जिन्हें एक व्यक्ति मुश्किल से ही सह सकता है, तुम्हारे लिए बेहतर होगा कि तुम अपना आधा जीवन सच्चे मन से मेरे लिए खुद को खपाने में बिताओ। अपने आप को इतना अधिक सँजोने और मेरी ताड़ना से भागने से कौन-सा उद्देश्य पूरा होता है? केवल अनंतकाल की शर्मिंदगी, अनंतकाल की ताड़ना का फल भुगतने के लिए मेरी क्षणिक ताड़ना से अपने आप को छिपाने से कौन-सा उद्देश्य पूरा होता है? मैं अपनी अपेक्षाएँ मनुष्य पर नहीं थोपता। यदि कोई सच में मेरी सभी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने का इच्छुक है, तो मैं उसके साथ खराब बरताव नहीं करूँगा। परंतु मैं अपेक्षा करता हूँ कि सभी लोग मुझमें विश्वास करें, वैसे ही जैसे अय्यूब ने मुझ यहोवा में विश्वास किया था। यदि तुम लोगों की आस्था थोमा की आस्था से बढ़कर होगी, तो तुम लोगों की आस्था मेरी स्वीकृति प्राप्त करेगी, तुम लोगों की निष्ठा मुझे खुश करेगी और तुम लोग अपने दिनों में मेरी महिमा निश्चित रूप से प्राप्त करोगे। लेकिन जो लोग संसार और दुष्ट दानव पर विश्वास करते हैं, उनके हृदय ठीक सदोम शहर के लोगों की तरह कठोर बन गए हैं, जिनकी आँखों में हवा से उड़े हुए रेत के कण और जिनके मुँह में दुष्ट दानव से मिली भेंट भरी हुई थी, जिनके अस्पष्ट मन बहुत पहले ही उस दुष्ट द्वारा कब्जे में कर लिए गए हैं जिसने संसार को हड़प लिया है। उनके विचार लगभग पूरी तरह से प्राचीन काल के दुष्ट दानव के वश में आ गए हैं। इसलिए मानवजाति की आस्था हवा के झोंके के साथ उड़ गई है, और वे लोग मेरे कार्य पर ध्यान देने में भी असमर्थ हैं। वे केवल इतना ही कर सकते हैं कि मेरे कार्य के साथ अनमने ढंग से पेश आएँ या उसका एक मोटे तौर पर विश्लेषण करें, क्योंकि वे लंबे समय से शैतान के जहर से ग्रस्त हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक वास्तविक व्यक्ति होने का क्या अर्थ है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 350

मैं मानवजाति को जीत लेता हूँ, क्योंकि लोग मेरे द्वारा बनाए गए थे, और इसके अलावा, उन्होंने मेरी सृष्टि की सभी भरपूर वस्तुओं का आनंद लिया है। किंतु लोगों ने मुझे अस्वीकार भी किया है; मैं उनके हृदय से अनुपस्थित हूँ, और वे मुझे अपने अस्तित्व पर एक बोझ के रूप में देखते हैं, और यहाँ तक कि वास्तव में मुझे देखने के बाद भी मुझे अस्वीकार कर देते हैं और मुझे हराने के हर संभव तरीके पर विचार करते हुए अपने दिमाग खँगालते हैं। लोग मुझे अपने साथ गंभीरता से व्यवहार करने या अपने से सख्त अपेक्षाएँ नहीं करने देते, न ही वे मुझे अपनी अधार्मिकता का न्याय करने या उसके लिए ताड़ना देने देते हैं। इसे नया मानने की तो बात ही छोड़ दो, वे इससे ऊब चुके हैं। और इसलिए मेरा कार्य उस मानवजाति को हराना है जो मुझे खाती, पीती और मेरा आनंद लेती है लेकिन मुझे नहीं जानती; मेरा कार्य उसे अपने हथियार डालने और अपमानित होकर भागने पर मजबूर करना है। फिर, अपने स्वर्गदूतों को लेकर, अपनी महिमा को लेकर, मैं अपने निवास स्थान पर लौट जाऊँगा। लोगों के क्रियाकलापों ने मेरा हृदय बहुत पहले ही तोड़ दिया है और मेरे कार्य को टुकड़े-टुकड़े कर दिया है, इसलिए मैं खुशी-खुशी जाने से पहले अपनी वह महिमा वापिस पाना चाहता हूँ, जिसे उस दुष्ट ने छीन लिया है, और मानवजाति को उनका जीवन जीते रहने देना, “शांति और संतुष्टि में रहने और कार्य करते रहने” देना, “अपने खेतों में खेती करते रहने” देना चाहता हूँ, और मैं उनके जीवन में अब और हस्तक्षेप नहीं करूँगा। किंतु अब मेरा इरादा अपनी महिमा उस दुष्ट के हाथ से पूरी तरह से वापस ले लेने का है, वह संपूर्ण महिमा वापस लेने का है जो मैंने संसार के सृजन के समय मनुष्य में गढ़ी थी। मैं दोबारा कभी इसे पृथ्वी पर मानवजाति को प्रदान नहीं करूँगा। क्योंकि लोग न केवल मेरी महिमा बनाए रखने में असफल रहे हैं, बल्कि उन्होंने उसे शैतान की छवि से बदल लिया है। लोग मेरे आने को सँजोते नहीं, न ही वे मेरी महिमा के दिन को महत्व देते हैं। वे मेरी ताड़ना को स्वीकार करने में खुश नहीं हैं, मेरी महिमा मुझे लौटाने के इच्छुक तो बिल्कुल भी नहीं हैं, न ही वे उस दुष्ट का जहर निकाल फेंकने के इच्छुक हैं। इंसान उसी पुराने तरीके से मुझे धोखा देता रहता है, लोग अभी भी उसी पुराने तरीके से उज्ज्वल मुसकराहट और खुशनुमा चेहरे बनाए रहते हैं। वे अंधकार की उन गहराइयों से अनजान हैं जो मानवजाति पर उस समय उतरेंगी जब मेरी महिमा उसे छोड़ देगी। विशेष रूप से, वे इस बात से अनजान हैं कि जब समस्त मानवजाति के सामने मेरा दिन आएगा, तब वह उनके लिए नूह के समय के लोगों से भी अधिक कठिन होगा, क्योंकि वे नहीं जानते हैं कि जब इस्राएल से मेरी महिमा चली गई थी, तो वह कितना अंधकारमय हो गया था, क्योंकि भोर होते ही मनुष्य भूल जाता है कि घोर अँधेरी रात गुजारना कितना मुश्किल था। जब सूर्य वापस छिप जाएगा और अँधेरा मनुष्य पर उतरेगा, तो वह फिर से रोएगा और अंधेरे में अपने दाँत पीसेगा। क्या तुम लोग भूल गए हो, जब मेरी महिमा इस्राएल से चली गई, तो इस्राएलियों के लिए दुःख के वे दिन सहना कितना मुश्किल हो गया था? अब वह समय है, जब तुम लोग मेरी महिमा देखते हो, और यह वह समय भी है, जब तुम लोग मेरी महिमा का दिन साझा करते हो। जब मेरी महिमा गंदी धरती को छोड़ देगी, तब मनुष्य अँधेरे में रोएगा। अब महिमा का वह दिन है जब मैं अपना कार्य करता हूँ, और यह वह दिन भी है जब मैं मानवजाति को कष्टों से मुक्त करता हूँ, क्योंकि मैं उसके साथ यातना और कष्ट के पल साझा नहीं करूँगा। मैं सिर्फ मानवजाति को पूरी तरह से जीत लूँगा और मानवजाति के उन दुष्टों को पूरी तरह से हरा दूँगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक वास्तविक व्यक्ति होने का क्या अर्थ है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 351

मैंने अपने अनुयायी बनाने के लिए पृथ्वी पर बहुत लोगों की तलाश की है। इन सभी अनुयायियों में वे लोग हैं जो याजकों की तरह सेवा करते हैं, जो अगुआई करते हैं, जो परमेश्वर के पुत्र हैं, जो परमेश्वर के लोग हैं, और जो सेवा करते हैं। वे मेरे प्रति जो निष्‍ठा दिखाते हैं, उसके अनुसार मैं उन्‍हें श्रेणियों में वर्गीकृत करता हूँ। जब सभी मनुष्यों को अपनी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा, यानी जब हर प्रकार के मनुष्य की प्रकृति का खुलासा कर दिया जाएगा, तब मैं उनमें से प्रत्येक को उसकी उचित श्रेणी के समूह में रखूँगा और हर प्रकार को उसके उपयुक्त स्थान पर रखूँगा, ताकि मैं लोगों को बचाने का अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकूँ। मैं जिन्हें बचाना चाहता हूँ, उन्हें समूहों में अपने घर बुलाता हूँ और फिर उनसे अपने अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करवाता हूँ। साथ ही, मैं उन्हें उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करता हूँ, फिर उनके कर्मों के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति को पुरस्कृत या दंडित करता हूँ। ऐसे हैं वे कदम, जो मेरे कार्य में शामिल हैं।

आज मैं पृथ्वी पर रहता हूँ, और मनुष्यों के बीच रहता हूँ। लोग मेरे कार्य का अनुभव करते हैं और मुझे बोलते हुए देखते हैं और इसके साथ ही मैं अपने प्रत्येक अनुयायी को सभी सत्य प्रदान करता हूँ, ताकि वह मुझसे जीवन प्राप्त कर सके और अनुसरण का मार्ग पा सके। क्योंकि मैं परमेश्वर हूँ, जीवन प्रदाता हूँ। मेरे कार्य के कई वर्षों के दौरान मनुष्य ने बहुत-कुछ प्राप्त किया है और बहुत-कुछ त्यागा है, फिर भी मैं कहता हूँ कि वे मुझ पर वास्तव में विश्वास नहीं करते। क्योंकि लोग केवल मुख से यह मानते हैं कि मैं परमेश्वर हूँ, जबकि मेरे द्वारा व्यक्त सत्यों से वे असहमत होते हैं और इतना ही नहीं, वे उन सत्‍यों का अभ्‍यास भी नहीं करते, जिनकी मैं उनसे अपेक्षा करता हूँ। कहने का अर्थ है कि लोग केवल परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, लेकिन सत्य के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते; लोग केवल परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, जीवन के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते; लोग केवल परमेश्वर के नाम को स्वीकार करते हैं, उसके सार को नहीं। मैं उनके उत्साह के कारण उनसे नफरत करता हूँ, क्योंकि वे केवल मुझे धोखा देने के लिए कानों को अच्छे लगने वाले शब्द बोलते हैं और उनमें से कोई भी सच्चे हृदय से मेरी आराधना नहीं करता। तुम लोगों के शब्‍दों में सर्प का प्रलोभन है और वे बेहद अहंकारी हैं, प्रधान दूत की यह पक्की उद्घोषणा है। इतना ही नहीं, तुम लोगों के कर्म शर्मनाक हद तक तार-तार हो चुके हैं और तुम लोगों की अत्यधिक इच्छाएँ और लोभी मंशाएँ सुनने में घृणित लगती हैं। तुम सब लोग मेरे घर में कीड़े बन गए हो, मेरे तिरस्कार के पात्र बन गए हो। क्योंकि तुम लोगों में से कोई भी सत्य से प्रेम नहीं करता; इसके बजाय तुम आशीष पाना पसंद करते हो, स्वर्गारोहण करना चाहते हो, पृथ्वी पर अपने सामर्थ्य का उपयोग करते मसीह के भव्य दर्शन करना चाहते हो। लेकिन क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि तुम लोगों जैसा कोई व्यक्ति, कोई इतनी गहराई तक भ्रष्ट व्यक्ति, जो नहीं जानता कि परमेश्वर क्या है, परमेश्वर का अनुसरण करने योग्य कैसे हो सकता है? तुम स्वर्गारोहण कैसे कर सकते हो? तुम उस अभूतपूर्व, भव्य दर्शन के सुंदर दृश्य को निहारने के योग्य कैसे हो सकते हो? तुम्हारे मुँह मुझे धोखा देने वाले शब्दों, गंदगी के शब्दों, मेरे साथ विश्वासघात करने वाले शब्दों और अहंकार के शब्दों से भरे हैं। तुमने मुझसे कभी ईमानदारी के शब्द नहीं कहे, कोई पुनीत शब्द नहीं कहे, न ही मेरे वचनों का अनुभव करने और मेरे प्रति समर्पण के कोई शब्द कहे। आखिरकार तुम्हारी आस्था कैसी है? तुम लोगों के हृदय में इच्छा और धन के सिवाय कुछ नहीं है; और तुम लोगों के मस्तिष्क में भौतिक वस्‍तुओं के सिवाय कुछ नहीं है। हर दिन तुम हिसाब लगाते हो कि मुझसे कुछ कैसे प्राप्त किया जाए। हर दिन तुम गणना करते हो कि तुमने मुझसे कितनी संपत्ति और कितनी भौतिक वस्तुएँ प्राप्त की हैं। हर दिन तुम लोग खुद पर और अधिक आशीष बरसने की प्रतीक्षा करते हो, ताकि तुम लोग अधिक आनंद ले सको, और उन उच्चतर चीजों का आनंद ले सको, जिनका आनंद लिया जा सकता हो। तुम लोगों के विचारों में हर क्षण मैं या मुझसे आने वाला सत्य नहीं, बल्कि तुम लोगों के पति या पत्नी, बच्चे और तुम लोगों के खाने और पहनने की चीजें रहती हैं। तुम लोग यही सोचते हो कि तुम और बेहतर तथा और ऊँचा आनंद कैसे पा सकते हो। लेकिन यदि तुम लोग अपना पेट फटने की हद तक भर लेते हो, क्या तुम अब भी महज लाश नहीं हो? भले ही तुम लोग खुद को बाहर से इतने सुंदर परिधानों से सजा लेते हो, तब भी क्या तुम लोग बस एक चलती-फिरती लाश नहीं हो, जिसमें जीवन नहीं है? तुम लोग पेट के लिए इतनी मेहनत करते रहते हो कि तुम्हारे बाल सफेद हो जाते हैं, लेकिन मेरे कार्य के लिए तुममें से कोई तिनके के बराबर भी त्याग नहीं करता। तुम लोग अपनी देह और अपने बेटे-बेटियों के लिए लगातार दौड़-भाग करते रहते हो, अपने शरीरों को थकाते रहते हो और अपने मस्तिष्कों को कष्ट देते रहते हो—लेकिन मेरे इरादों के लिए तुममें से कोई एक भी चिंता या परवाह नहीं दिखाता। वह क्या है, जो तुम अब भी मुझसे प्राप्त करने की आशा रखते हो?

जब मैं कार्य करता हूँ, तो कभी भी जल्दबाजी नहीं करता हूँ। लोग चाहे जैसे भी मेरा अनुसरण करें, मैं अपना कार्य अपने चरणों और अपनी योजना के अनुसार करता हूँ। इसलिए, भले ही तुम लोग मेरे प्रति इतने विद्रोही हो, मैं अभी भी बिना रुके कार्य करता हूँ और मैं अभी भी वे वचन कहना जारी रखता हूँ जो मैं कहना चाहता हूँ। मैं उन्हें अपने घर में बुलाता हूँ जिन्हें मैंने पूर्व-निर्धारित किया है, ताकि वे मेरे वचनों के श्रोता हो सकें। फिर, जो मेरे वचनों के प्रति समर्पण करते हैं, जो मेरे वचनों के लिए लालायित रहते हैं, उन सबको मैं अपने सिंहासन के सम्मुख लाता हूँ; जो मेरे वचनों के प्रति विश्वासघात करते हैं, जो मेरी आज्ञा का पालन या मेरे प्रति समर्पण नहीं करते और जो खुलेआम मेरा प्रतिरोध करते हैं, उन्‍हें मैं अंतिम दंड की प्रतीक्षा करने के लिए एक ओर कर देता हूँ। सभी लोग भ्रष्टता के बीच और उस दुष्ट के अधीन रहते हैं, इसलिए मेरा अनुसरण करने वालों में से बहुत कम लोग सत्य के लिए लालायित रहते हैं। कहने का अर्थ है कि अधिकतर लोग वास्तव में मेरी आराधना नहीं करते; वे सत्य के साथ मेरी आराधना नहीं करते, बल्कि भ्रष्टता और विद्रोह के जरिए, कपटपूर्ण उपायों से मेरा विश्वास जीतने की कोशिश करते हैं। इसीलिए मैं कहता हूँ : बुलाए बहुत जाते हैं, पर चुने कुछ ही जाते हैं। बुलाए जाने वाले सभी बेहद भ्रष्ट हैं और सभी एक ही युग में रहते हैं—लेकिन चुने जाने वाले उनका केवल एक हिस्‍सा हैं, वे वो हैं जो सत्य पर विश्वास करते हैं और उसे स्वीकारते हैं, और जो सत्य का अभ्यास करते हैं। ये लोग तो पूर्ण का केवल एक बहुत छोटा हिस्सा हैं, और उनमें से मैं और अधिक महिमा प्राप्त करूँगा। इन वचनों की कसौटी पर, क्या तुम लोग जानते हो कि तुम लोग चुने हुए लोगों में से हो या नहीं? तुम लोगों का परिणाम कैसा होगा?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बुलाए बहुत जाते हैं, पर चुने कुछ ही जाते हैं

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 352

जैसा कि मैंने कहा, मेरा अनुसरण करने वाले बहुत हैं, लेकिन मुझे वास्तव में प्रेम करने वाले बहुत कम हैं। शायद कुछ लोग कह सकते हैं, “यदि मैं तुमसे प्रेम न करता, तो क्या मैं इतनी सारी कीमतें चुकाता? यदि मैं तुमसे प्रेम न करता, तो क्या मैंने इस बिंदु तक तुम्हारा अनुसरण किया होता?” बेशक तुम्हारे पास कई कारण हैं और तुम्हारा प्रेम बहुत बड़ा है, लेकिन मेरे लिए तुम्हारे प्रेम का सार कहाँ है? “प्रेम,” जैसा कि कहा जाता है, ऐसे स्नेह को कहते हैं जो शुद्ध और निष्कलंक है, जहाँ तुम अपने हृदय का उपयोग प्रेम करने, महसूस करने और विचारशील होने के लिए करते हो। प्रेम में कोई शर्त, कोई बाधा और कोई दूरी नहीं होती। प्रेम में कोई संदेह, कोई कपट और कोई चालाकी नहीं होती। प्रेम में कोई लेन-देन नहीं होता और इसमें कोई मिलावट नहीं होती। यदि तुम प्रेम करते हो, तो तुम धोखा नहीं दोगे, शिकायत, विश्वासघात, विद्रोह नहीं करोगे, कुछ माँग रखने, कुछ पाने या किसी चीज की एक निश्चित मात्रा पाने की कोशिश नहीं करोगे। यदि तुम्हारे पास प्रेम है, तो खुशी-खुशी खुद को समर्पित करोगे और खुशी-खुशी कष्ट सहोगे, मेरे अनुरूप हो जाओगे और मेरे लिए अपना सर्वस्व त्याग दोगे, तुम अपना परिवार, अपनी संभावनाएँ, अपनी जवानी और अपना विवाह त्याग दोगे। वरना तुम्हारा प्रेम, प्रेम बिल्कुल नहीं होगा, बल्कि कपट और विश्वासघात होगा! तुम्हारा प्रेम किस प्रकार का है? क्या वह सच्चा प्रेम है? या वह झूठा प्रेम है? तुमने कितना त्याग किया है? तुमने कितना अर्पित किया है? मुझे तुमसे कितना प्रेम प्राप्त हुआ है? क्या तुम जानते हो? तुम लोगों का हृदय बुराई, विश्वासघात और कपट से भरा हुआ है—तो तुम लोगों के प्रेम में कितनी अशुद्धता है? तुम लोग सोचते हो कि तुमने पहले ही मेरे लिए पर्याप्त त्याग कर दिया है; तुम लोग सोचते हो कि मेरे लिए तुम लोगों का प्रेम पहले से ही पर्याप्त है। लेकिन फिर तुम लोगों के वचन और कार्य में हमेशा विद्रोहशीलता और कपट क्यों शामिल होते हैं? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, लेकिन तुम मेरे वचन को स्वीकार नहीं करते। क्या यह प्रेम है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, लेकिन फिर भी मुझे अस्वीकार कर देते हो। क्या इसे प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, लेकिन मुझ पर संदेह रखते हो। क्या इसे प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, लेकिन तुम मेरे अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पाते। क्या इसे प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी मेरे साथ मेरे अनुरूप व्यवहार नहीं करते और हर मोड़ पर मेरे लिए चीजें मुश्किल कर देते हो। क्या इसे प्रेम कहा जा सकता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, लेकिन मुझे मूर्ख बनाने और हर मामले में धोखा देने का प्रयास करते हो। क्या इसे प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरी सेवा करते हो, लेकिन तुम्हें मेरा खौफ नहीं है। क्या इसे प्रेम माना जाता है? तुम लोग हर तरह से और हर चीज में मेरा विरोध करते हो। क्या इनमें से कुछ भी प्रेम है? तुम लोगों ने बहुत-कुछ समर्पित किया है, यह सच है, लेकिन तुम लोगों ने उसका अभ्‍यास कभी नहीं किया, जो मैं तुम लोगों से चाहता हूँ। क्या यह प्रेम हो सकता है? ध्यानपूर्वक किया गया आकलन दर्शाता है कि तुम लोगों में मेरे लिए प्रेम का जरा-सा भी संकेत नहीं है। इतने वर्षों के कार्य और मेरे द्वारा आपूर्ति किए गए बहुत सारे वचनों के बाद, तुम लोगों ने वास्तव में कितना प्राप्त किया है? क्या यह सावधानी से पीछे मुड़कर देखने लायक नहीं है? मैं तुम लोगों को चेतावनी देता हूँ : मैं अपने पास उन्हें नहीं बुलाता, जो कभी भ्रष्‍ट नहीं किए गए; बल्कि मैं उन्हें चुनता हूँ जो मुझसे वास्तव में प्रेम करते हैं। इसलिए, तुम लोगों को अपने शब्दों और कर्मों में सजग रहना चाहिए, और अपने इरादे और विचार जाँचने चाहिए, ताकि वे सीमा पार न करें। अंत के दिनों में, मेरे सम्मुख अपना प्रेम अर्पित करने का अधिकतम प्रयास करो, वरना मेरा कोप तुम लोगों से कभी न हटेगा!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बुलाए बहुत जाते हैं, पर चुने कुछ ही जाते हैं

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 353

प्रतिदिन प्रत्येक व्यक्ति के कर्म और विचार उस एक की आँखों के द्वारा देखे जाते हैं, और साथ ही, वे अपने कल की तैयारी कर रहे होते हैं। यही वह मार्ग है, जिस पर सभी प्राणियों को चलना चाहिए; यही वह मार्ग है, जिसे मैंने सभी के लिए पूर्वनिर्धारित कर दिया है, और कोई इससे बच या छूट नहीं सकता। मैंने जो वचन कहे हैं वे अनगिनत हैं और मैंने कार्य किए हैं वे और भी अपरिमेय हैं। प्रतिदिन मैं प्रत्येक मनुष्य को स्वाभाविक रूप से वह सब करते हुए देखता हूँ, जो उसे अपनी अंतर्निहित प्रकृति और अपनी प्रकृति के विकास के अनुसार करना है। अनजाने में अनेक लोगों ने पहले ही “सही मार्ग” पर चलना आरंभ कर दिया है, जिसे मैंने विभिन्न प्रकार के लोगों को उजागर करने के लिए निर्धारित किया है। इन विभिन्न प्रकार के लोगों को मैंने लंबे समय से विभिन्न वातावरणों में रखा है और अपने-अपने स्थान पर प्रत्येक अपने अंतर्निहित वर्गीकरण को दिखाता है। उन्हें कोई बाँध नहीं सकता और कोई उन्हें बहका नहीं सकता। वे पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं और वे जो प्रकट करते हैं वह स्वाभाविक रूप से आता है। केवल एक चीज उन्हें नियंत्रण में रखती है : मेरे वचन। इस तरह कुछ लोग मेरे वचन अनमने भाव से पढ़ते हैं, कभी उनका अभ्यास नहीं करते, वे ऐसा केवल मृत्यु से बचने के परिणाम के साथ किसी तरह जीते रहने के लिए करते हैं; जबकि कुछ लोगों के लिए मेरे वचनों के मार्गदर्शन और आपूर्ति के बिना दिन गुज़ारना कठिन होता है, और इसलिए वे स्वाभाविक तौर पर मेरे वचनों को हर समय थामे रहते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है, उन्हें मनुष्य के जीवन के रहस्य, मानव-जाति के गंतव्य और मनुष्य होने का महत्व पता चलता जाता है। मानव-जाति मेरे वचनों की उपस्थिति में इससे अलग कुछ नहीं है और मैं बस चीजों को उनके अपने हिसाब से होने देता हूँ। मैं ऐसा कोई कार्य नहीं करता, जो लोगों को मेरे वचनों को अपने अस्तित्व का आधार बनाने के लिए बाध्य करे। तो जिन लोगों में कभी विवेक नहीं रहा और जिनके अस्तित्व का कभी कोई मूल्य नहीं रहा, चुपचाप चीजों को घटित होते देखने के बाद वे बेधड़क मेरे वचनों को दरकिनार कर देते हैं और जो चाहते हैं वो करते हैं। वे सत्य से और उस सबसे जो मुझसे आता है, विमुख होने लगते हैं और वे मेरे घर में रहने से और भी विमुख महसूस करते हैं। अपने गंतव्य की खातिर और सजा से बचने के लिए ये लोग कुछ समय के लिए मेरे घर में रहते हैं, फिर भले ही वे मजदूरी कर रहे हों। परंतु उनके इरादे और कार्य कभी नहीं बदलते। इससे आशीष पाने की उनकी इच्छा और एक बार राज्य में प्रवेश करने और उसके बाद वहाँ हमेशा के लिए रहने की इच्छा—यहाँ तक कि अनंत स्वर्ग में प्रवेश करने की उनकी इच्छा बढ़ जाती है। जितना अधिक वे मेरे दिन के जल्दी आने की लालसा करते हैं, उतना ही अधिक वे महसूस करते हैं कि सत्य उनके मार्ग की बाधा और अड़चन बन गया है। वे हमेशा के लिए स्वर्ग के राज्य के आशीषों का आनंद उठाने हेतु राज्य में कदम रखने के लिए मुश्किल से इंतजार कर पाते हैं—सब-कुछ सत्य की खोज करने या न्याय और ताड़ना स्वीकार करने, यहाँ तक कि मेरे घर में हाथ-पैर जोड़ने और मेरी आज्ञा के अनुसार कार्य करने की जरूरत पड़े बिना। ये लोग न तो सत्य की खोज करने की अपनी इच्छा पूरी करने के लिए मेरे घर में प्रवेश करते हैं, न ही मेरे प्रबंधन में सहयोग करने के लिए; उनका उद्देश्य महज उन लोगों में शामिल होने का होता है, जिन्हें आने वाले युग में नष्ट नहीं किया जाएगा। इसलिए उनके हृदय ने कभी नहीं जाना कि सत्य क्या है, या सत्य को कैसे ग्रहण किया जाए। यही कारण है कि ऐसे लोगों ने कभी सत्य का अभ्यास या अपनी भ्रष्टता की गहराई का एहसास नहीं किया, और फिर भी वे मेरे घर में हमेशा “सेवकों” के रूप में रहे हैं। वे “धैर्यपूर्वक” मेरे दिन के आने का इंतज़ार करते हैं और मेरे कार्य के तरीके से यहाँ-वहाँ उछाले जाकर भी थकते नहीं। लेकिन भले ही उनकी कोशिश कितनी भी बड़ी हो और उन्होंने उसकी कुछ भी कीमत चुकाई हो, किसी ने उन्हें सत्य के लिए कष्ट उठाते हुए या मेरी खातिर कुछ देते हुए नहीं देखा। अपने हृदय में वे उस दिन को देखने के लिए बेचैन हैं, जब मैं पुराने युग का अंत करूँगा, और इससे भी बढ़कर, वे यह जानने का इंतज़ार नहीं कर सकते कि मेरा सामर्थ्य और मेरा अधिकार कितने विशाल हैं। जिस चीज के लिए उन्होंने कभी शीघ्रता नहीं की, वह है खुद को बदलना और सत्य का अनुसरण करना। वे उससे प्रेम करते हैं, जिससे मैं विमुख हूँ और वे उससे विमुख हैं, जिससे मैं प्रेम करता हूँ। वे उसकी अभिलाषा करते हैं जिससे मैं नफरत करता हूँ, लेकिन उसे खोने से डरते हैं जिससे मैं घृणा करता हूँ। वे इस बुरे संसार में रहते हुए भी इससे कभी नफरत नहीं करते, फिर भी इस बात से बहुत डरते हैं कि मैं इसे नष्ट कर दूँगा। अपने परस्पर विरोधी इरादों के बीच वे इस संसार से प्यार करते हैं जिससे मैं घृणा करता हूँ, लेकिन इस बात के लिए लालायित भी रहते हैं कि मैं इस संसार को शीघ्र नष्ट कर दूँ, और इससे पहले कि वे सच्चे मार्ग से दूर चले जाएँ, उन्हें विनाश की विपत्ति से बचा लिया जाए और अगले युग के मालिकों के रूप में रूपांतरित कर दिया जाए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते और उस सबसे विमुख हैं, जो मुझसे आता है। वे आशीष खोने के डर से थोड़े समय के लिए “आज्ञाकारी लोग” बन सकते हैं, लेकिन आशीष पाने के लिए उनकी उत्कंठा और नष्ट होने तथा जलती हुई आग की झील में प्रवेश करने का उनका भय कभी छिपाया नहीं जा सकता। जैसे-जैसे मेरा दिन नजदीक आता है, उनकी इच्छा हमेशा से अधिक उत्कट होती जाती है। और आपदा जितनी बड़ी होती है, उतना ही वह उन्हें असहाय बना देती है और वे यह नहीं जान पाते कि मुझे प्रसन्न करने के लिए एवं उन आशीषों को खोने से बचाने के लिए, जिनकी उन्होंने लंबे समय से लालसा की है, कहाँ से शुरुआत करें। जैसे ही मेरा हाथ अपना काम करना शुरू करता है, ये लोग एक अग्र-दल के रूप में कार्य करने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। इस डर से कि मैं उन्हें नहीं देखूँगा, वे बस सेना की सबसे आगे की टुकड़ी में आने की सोचते हैं। वे वही करते और कहते हैं, जिसे वे सही समझते हैं, और यह कभी नहीं जान पाते कि उनके क्रियाकलाप कभी सत्य के अनुरूप नहीं रहे, और कि उनके कर्म मेरी योजनाओं को मात्र कमजोर करते और उनमें विघ्न डालते हैं। उन्होंने कड़ी मेहनत की हो सकती है और वे कष्ट सहने के अपने संकल्प और इरादे में सच्चे हो सकते हैं, पर उनके कार्यों से मेरा कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि मैंने कभी नहीं देखा कि उनके कर्म अच्छे इरादे के साथ किए गए हैं, और उन्हें अपनी वेदी पर कुछ रखते हुए तो मैंने बिल्कुल नहीं देखा है। इन अनेक वर्षों में मेरे सामने उन्होंने ऐसे ही कार्य किए हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 354

मूल रूप से मैं तुम लोगों को और अधिक सत्य प्रदान करना चाहता था, लेकिन मुझे इससे विरत होना पड़ा, क्योंकि सत्य के प्रति तुम्हारा रवैया बहुत ठंडा और उदासीन है; मैं नहीं चाहता कि मेरे हृदय का रक्त व्यर्थ जाए, न ही मैं यह देखना चाहता हूँ कि लोग मेरे वचनों को तो थामे रहें, लेकिन काम हर लिहाज से ऐसे करें, जिनसे मेरा प्रतिरोध होता हो, जो मुझे बदनाम करते हों और ईशनिंदा करते हों। तुम लोगों के रवैये और मानवीय स्वभाव के कारण, मैं तुम्हें अपने वचनों का एक छोटा-सा भाग ही प्रदान करता हूँ, जो तुम्हारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है, और जो मनुष्यों के बीच मेरा परीक्षण-कार्य है। केवल अब मैंने वास्तव में पुष्टि की है कि जो निर्णय और योजनाएँ मैंने बनाई हैं, वे तुम लोगों की जरूरतों के अनुरूप हैं, और यह और भी पुष्टि करता है कि मानवजाति के प्रति मेरा रवैया सही है। मेरे सामने तुम लोगों के कई वर्षों के व्यवहार ने मुझे अभूतपूर्व उत्तर दे दिया, और इस उत्तर का प्रश्न यह है कि : “सत्य और सच्चे परमेश्वर के सामने मनुष्य का रवैया क्या है?” मैंने मनुष्य के लिए जो हृदय का खून उड़ेला है, यह मनुष्य के लिए मेरे प्रेम के सार को साबित करता है, और मेरे सामने मनुष्य के कार्य और कर्म सत्य से नफरत करने और मेरे विरोध में होने के उसके सार को प्रमाणित करता है। मैं हर समय उन सबके लिए चिंतित रहता हूँ, जिन्होंने मेरा अनुसरण किया, लेकिन मेरा अनुसरण करने वाले कभी मेरे वचन स्वीकारने में समर्थ नहीं होते; यहाँ तक कि वे मेरे सुझाव स्वीकार करने में भी सक्षम नहीं हैं। यह बात मुझे सबसे ज़्यादा उदास करती है। कोई भी मुझे कभी भी समझ नहीं पाया है, और कोई भी मुझे कभी स्वीकार तो और भी नहीं कर पाया है, बावजूद इसके कि मेरा रवैया सच्चा और मेरे वचन सौम्य हैं। सभी लोग मेरे द्वारा उन्हें सौंपा गया कार्य अपने इरादों के अनुसार करते हैं; वे मेरे इरादों को नहीं खोजते मेरी अपेक्षाओं के बारे में पूछने की बात तो छोड़ ही दो। वे अभी भी वफादारी के साथ मेरी सेवा करने का दावा करते हैं, जबकि वे मेरे खिलाफ विद्रोह करते हैं। बहुतों का यह मानना है कि जो सत्य उन्हें स्वीकार्य नहीं हैं या जिनका वे अभ्यास नहीं कर पाते, वे सत्य ही नहीं हैं। ऐसे लोगों में मेरे सत्य ऐसी चीज बन जाते हैं, जिन्हें नकार दिया जाता है और दरकिनार कर दिया जाता है। उसी समय, लोग मुझे वचन में परमेश्वर के रूप में स्वीकार करते हैं, परंतु साथ ही मुझे एक ऐसा बाहरी व्यक्ति मानते हैं, जो सत्य, मार्ग या जीवन नहीं है। इस सत्य को कोई नहीं जानता है : मेरे वचन सदा अपरिवर्तनीय सत्‍य हैं। मैं मनुष्य के लिए जीवन की आपूर्ति और मानवजाति के लिए एकमात्र मार्गदर्शक हूँ; मेरे वचनों का मूल्य और अर्थ इससे निर्धारित नहीं होता कि क्या उन्हें मानवजाति मानती या स्वीकार करती है, बल्कि स्वयं वचनों के सार से निर्धारित होता है; और भले ही इस पृथ्वी पर एक भी व्यक्ति मेरे वचन न स्वीकार कर सके, तो भी मेरे वचनों के मूल्य और मानवजाति के लिए उनके उपकार का आकलन करना किसी भी मनुष्य के लिए असंभव है। इसलिए मेरे वचनों के खिलाफ विद्रोह करने वाले, उनका खंडन करने वाले या उनका पूरी तरह से तिरस्कार करने वाले बहुत से लोगों से सामना होने पर मेरा रवैया केवल यह रहता है : समय और तथ्यों को मेरी गवाही देने दो और यह साबित करने दो कि मेरे वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं। उन्हें यह साबित करने दो कि जो कुछ मैंने कहा है वह सब सही है और वह ऐसा है जो मनुष्य के पास होना चाहिए और इतना ही नहीं, जो मनुष्य को स्वीकार करना चाहिए। मैं निश्चित करूँगा कि जो लोग मेरा अनुसरण करते हैं वे इस तथ्य को जान लें : जो लोग पूरी तरह से मेरे वचनों को स्वीकार नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों का अभ्यास नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों में कोई लक्ष्य नहीं खोज सकते और जो मेरे वचनों के माध्यम से उद्धार का अनुग्रह प्राप्त नहीं कर सकते, वे ऐसे लोग हैं जिनकी मेरे वचन निंदा करते हैं; यही नहीं, वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने मेरे उद्धार का अनुग्रह गँवा दिया है, और मेरा डंडा उन्हें कभी नहीं छोड़ेगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 355

सामाजिक विज्ञानों के आगमन के बाद से ही मनुष्य का दिल विज्ञान और ज्ञान से भर गया है। विज्ञान और ज्ञान तब से मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए हैं, जिससे मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश और परमेश्वर की आराधना करने के लिए उतनी अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं बची हैं। मनुष्य के हृदय में परमेश्वर की स्थिति लगातार गिरती जा रही है। अपने हृदय में परमेश्वर के लिए स्थान न होने पर मनुष्य का आंतरिक संसार अंधकारमय, निराशाजनक और खाली होता है। बाद में मनुष्य के हृदय और मन में भरने के लिए कई समाज-वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और राजनीतिज्ञों ने सामने आकर सामाजिक विज्ञान के सिद्धांत, मानव-विकास के सिद्धांत और अन्य कई सिद्धांत व्यक्त किए, जो इस सत्य का खंडन करते हैं कि परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की है, और इस तरह, यह विश्वास करने वाले बहुत कम होते गए हैं कि परमेश्वर ने सब कुछ बनाया है और विकास के सिद्धांत पर विश्वास करने वालों की संख्या और अधिक बढ़ती गई है। अधिकाधिक लोग पुराने विधान के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के अभिलेखों और उसके वचनों को मिथक और किंवदंतियाँ समझते हैं। अपने हृदयों में लोग परमेश्वर की गरिमा और महानता के प्रति उदासीन हो जाते हैं और वे परमेश्वर के अस्तित्व के प्रति उदासीन हो जाते हैं और इस सिद्धांत के प्रति भी कि परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है। मानवजाति का अस्तित्व और देशों एवं राष्ट्रों का भाग्य उनके लिए अब महत्वपूर्ण नहीं रहे, और मनुष्य केवल खाने-पीने और भोग-विलास के अनुसरण पर ध्यान लगाए एक खोखले संसार में रहता है। ... बहुत थोड़े लोग स्वयं इस बात की खोज करने की पहल करते हैं कि आज परमेश्वर अपना कार्य कहाँ करता है, या यह तलाशने की पहल कि वह किस प्रकार मनुष्य के गंतव्य पर संप्रभु है और उसकी व्यवस्था करता है। और इस तरह, मनुष्य के बिना जाने ही मानव-सभ्यता मनुष्य की इच्छाओं के अनुसार चलने में अधिक से अधिक अक्षम होती चली जाती है; कई ऐसे लोग भी हैं जो यह महसूस करते हैं कि ऐसे संसार में रहकर वे उन लोगों की तुलना में कम खुश हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है। यहाँ तक कि उन देशों के लोग भी, जो अत्यधिक सभ्य हुआ करते थे, इस तरह की शिकायतें व्यक्त करते हैं। क्योंकि परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना अगर शासक और समाजशास्त्री मानव सभ्यता को संरक्षित रखने के लिए अपना दिमाग खपा भी लें, तो भी कोई फायदा नहीं होगा। मनुष्य के हृदय का खालीपन कोई व्यक्ति नहीं भर सकता, क्योंकि कोई भी व्यक्ति मनुष्य का जीवन नहीं हो सकता और कोई भी सामाजिक सिद्धांत मनुष्य को खालीपन की परेशानियों से मुक्ति नहीं दिला सकता। विज्ञान, ज्ञान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, सुख और आराम मनुष्य को केवल अस्थायी सांत्वना देते हैं। ये चीजें होने के बावजूद मनुष्य अभी भी अपरिहार्य रूप से पाप करता है और समाज में अन्याय की शिकायत करता है। इन चीजों का होना मनुष्य की अन्वेषण की अभिलाषा और इच्छा को बाधित नहीं कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा बनाया गया था और मनुष्य के निरर्थक त्याग और अन्वेषण उसके लिए अधिकाधिक कष्ट ही लाएंगे, और मनुष्य को निरंतर व्याकुलता की स्थिति में रखेंगे, वह यह नहीं जानता कि मानवजाति के भविष्य का सामना कैसे करे या आगामी मार्ग का सामना कैसे करे, इस हद तक कि मनुष्य ज्ञान-विज्ञान से भी डरने लगता है और खालीपन के एहसास से तो और भी घबराने लगता है। इस संसार में, चाहे तुम किसी स्वतंत्र देश में रहते हो या बिना मानवाधिकारों वाले देश में, तुम मानवजाति के भाग्य से बचने में सर्वथा अक्षम हो। तुम चाहे शासक हो या शासित, तुम मानवजाति के भाग्य, रहस्यों और गंतव्य का पता लगाने की इच्छा से बचने में सर्वथा अक्षम हो, खालीपन की अव्याख्येय भावना से बचने में तो तुम और भी अधिक अक्षम हो। इस प्रकार की घटनाएँ, जो समस्त मानवजाति के लिए आम हैं, समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक घटनाएँ कही जाती हैं, लेकिन कोई भी महान व्यक्ति ऐसी समस्याओं का समाधान करने के लिए सामने नहीं आ सकता है। मनुष्य आखिर मनुष्य है; परमेश्वर के दर्जे और जीवन की जगह कोई मनुष्य नहीं ले सकता। मानवजाति को केवल एक ऐसे न्यायपूर्ण समाज की ही आवश्यकता नहीं है जिसमें हर व्यक्ति को भरपेट भोजन मिले, सभी समान और स्वतंत्र हों; मानवजाति को जिस चीज की जरूरत है वह है परमेश्वर का उद्धार और मनुष्य के लिए उसके जीवन की आपूर्ति। जब मनुष्य परमेश्वर के जीवन की आपूर्ति और उसका उद्धार प्राप्त करता है, केवल तभी उसकी आवश्यकताओं, अन्वेषण की इच्छा और दिल के खालीपन का समाधान हो सकता है। यदि किसी देश या राष्ट्र के लोग परमेश्वर का उद्धार और उसकी छत्रछाया प्राप्त करने में असमर्थ हैं तो ऐसा देश या राष्ट्र पतन की ओर, अंधकार की ओर बढ़ेगा और नतीजे में परमेश्वर द्वारा जड़ से मिटा दिया जाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 356

तुम्हारे दिल में एक बहुत बड़ा रहस्य है, जिसके बारे में तुमने कभी नहीं जाना है, क्योंकि तुम एक प्रकाशविहीन दुनिया में रह रहे हो। तुम्हारा दिल और तुम्हारी आत्मा उस दुष्ट द्वारा छीन लिए गए हैं। तुम्हारी आँखें अंधकार से ढक गई हैं, तुम न तो आकाश में सूर्य को देख सकते हो और न ही रात के उस टिमटिमाते तारे को। तुम्हारे कान भ्रामक शब्दों से बंद हो गए हैं, तुम न तो यहोवा की गरजती वाणी सुनते हो, न ही सिंहासन से बहने वाली अनेक जलसमूहों की आवाज सुनते हो। तुमने वह सब कुछ खो दिया है जिस पर तुम्हारा हक है, वह सब भी जो सर्वशक्तिमान ने तुम्हें प्रदान किया था। तुम दुःख के अनंत सागर में प्रवेश कर चुके हो, ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो तुम्हें बचा सके, न बचे रहने की कोई उम्मीद है और तुम बस संघर्ष करते हो और भाग-दौड़ करते हो...। उस क्षण से तुम उस दुष्ट के द्वारा पीड़ित होने के लिए अभिशप्त हो चुके हो और सर्वशक्तिमान के आशीषों से काफी दूर हो, सर्वशक्तिमान के प्रावधानों से काफी दूर हो, ऐसे पथ पर चल रहे हो जहाँ से लौटना संभव नहीं है। लाखों पुकार भी शायद ही तुम्हारे दिल और तुम्हारी आत्मा को जगा सकें। तुम उस दुष्ट की गोद में गहरी नींद में सो रहे हो जो तुम्हें फुसलाकर एक ऐसे असीम क्षेत्र में ले गया जहाँ न कोई दिशा है, न कोई संकेत-सूचक। उस समय तुमने अपनी मौलिक मासूमियत और शुद्धता खो दी, और सर्वशक्तिमान की देखभाल से दूर रहना शुरू कर दिया। तुम्हारे दिल के भीतर, हर मामले में तुम्हें चलाने वाला वह दुष्ट है और वह तुम्हारा जीवन बन गया है। अब तुम उससे न तो डरते हो, न बचते हो, न ही उस पर शक करते हो; इसके बजाय, तुम उसे अपने दिल में परमेश्वर मानते हो। तुमने उसे पवित्र के रूप में स्थापित करना और पूजना शुरू कर दिया है, तुम दोनों शरीर और छाया जैसे अविभाज्य हो गए हो, एक-साथ जीने मरने के लिए प्रतिबद्ध हो। तुम्हें कुछ पता नहीं है कि तुम कहाँ से आए, क्यों पैदा हुए, या तुम क्यों मरोगे। तुम सर्वशक्तिमान को एक अजनबी के रूप में देखते हो; तुम उसके उद्गम को नहीं जानते, तुम्हारे लिए जो कुछ उसने किया है, उसे जानने की तो बात ही दूर है। उससे जो कुछ भी आता है उसे तुम शत्रुता से देखते हो; तुम न तो इसकी कद्र करते हो और न ही इसकी कीमत जानते हो। तुम उस दिन से उस दुष्ट के साथ-साथ चलते हो, जबसे तुमने सर्वशक्तिमान का प्रावधान प्राप्त किया है। तुमने उस दुष्ट के साथ हजारों वर्षों के संकटों और तूफानों को सहा है, और तुम उसके साथ उस परमेश्वर के खिलाफ खड़े हो जो तुम्हारे जीवन का स्रोत था। तुम पश्चाताप करना नहीं जानते, यह जानने की तो बात ही छोड़ो कि तुम अपने पतन के कगार पर आ गए हो। तुम यह भूल गए हो कि शैतान ने तुम्हें बहकाया और पीड़ित किया है; तुम अपने आरंभ को भूल गए हो। इस तरह उस दुष्ट ने आज तक, तुम्हें पूरे रास्ते, हर कदम पर बुरी तरह नुकसान पहुँचाया है। तुम्हारा दिल और तुम्हारी आत्मा सुन्न हो गए हैं, सड़ गए हैं। तुमने इंसानी दुनिया के संताप के बारे में शिकायत करना बंद कर दिया है; तुम तो अब यह भी नहीं मानते कि दुनिया अन्यायपूर्ण है। सर्वशक्तिमान का अस्तित्व है या नहीं इसकी परवाह तो तुम्हें और भी कम है। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुमने बहुत पहले उस दुष्ट को अपना सच्चा पिता मान लिया था और तुम उससे अलग नहीं हो सकते। यह तुम्हारे दिल के भीतर का रहस्य है।

जैसे-जैसे भोर होती है, एक सुबह का तारा पूर्व में चमकने लगता है। यह एक ऐसा सितारा है जो पहले वहाँ कभी नहीं था, यह शांत, जगमगाते आसमान को रोशन करता है, मानवजाति के दिलों में बुझी हुई रोशनी को फिर से जलाता है। तुम्हारे और अन्य लोगों पर समान रूप से चमकने वाले इस प्रकाश के कारण मनुष्य अब अकेला नहीं रह गया है। फिर भी तुम इकलौते हो जो कि अंधेरी रात में सोये रहते हो। तुम न कोई ध्वनि सुनते हो और न ही कोई प्रकाश देखते हो; तुम एक नए युग के, एक नए स्वर्ग और पृथ्वी के आगमन से अनजान हो, क्योंकि तुम्हारा पिता तुमसे कहता है, “मेरे बच्चे, उठो मत, अभी दिन हुआ ही है। मौसम ठंडा है, इसलिए बाहर मत जाओ, ऐसा न हो कि तलवार और भाले तुम्हारी आंखों को बेध दें।” तुम केवल अपने पिता की सलाह पर भरोसा करते हो, क्योंकि तुम्हारा मानना है कि केवल तुम्हारा पिता सही है, क्योंकि वह तुमसे उम्र में बड़ा है और वह तुमसे बहुत प्यार करता है। इस तरह की सलाह और प्रेम तुम्हें इस किंवदंती पर विश्वास नहीं करने देते कि दुनिया में प्रकाश है; वे तुम्हें इस बात की परवाह करने से रोक देते हैं कि सत्य अभी भी इस दुनिया में मौजूद है या नहीं। अब तुम सर्वशक्तिमान द्वारा बचाये जाने की आशा करने की हिम्मत नहीं करते। तुम यथास्थिति से संतुष्ट हो, अब तुम प्रकाश के आगमन की प्रतीक्षा नहीं करते, किंवदंतियों में सर्वशक्तिमान के जिस आगमन के बारे में बताया गया है तुम उसकी राह नहीं देखते। तुम्हारे अनुसार जो भी सुंदर है उसे पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता, वह अस्तित्व में नहीं हो सकता। तुम्हारी नज़र में, मानवजाति का आने वाला कल, मानवजाति का भविष्य, बस गायब हो जाता है, मिट जाता है। तुम अपने पिता के कपड़ों से पूरी ताकत से चिपके रहते हो, उसके कष्ट साझा करने के लिए तैयार रहते हो, इस गहरे डर से कि कहीं यात्रा के अपने साथी और सुदूर की यात्रा की दिशा न खो दो। मनुष्य की विशाल और धुंधली दुनिया ने तुम जैसे कइयों को बनाया है, जो इस दुनिया की विभिन्न भूमिकाओं को निभाने में अडिग और निडर हैं। इसने कई “योद्धाओं” को बनाया है जिनमें मृत्यु का भय नहीं है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इसने सुन्न और लकवाग्रस्त मनुष्यों के एक के बाद एक कई जत्थे तैयार किए हैं जो अपनी रचना के उद्देश्य से अनभिज्ञ हैं। सर्वशक्तिमान की आंखें गहराई से पीड़ित मानवजाति के प्रत्येक सदस्य का अवलोकन करती हैं। सर्वशक्तिमान को पीड़ितों की कराहें सुनायी देती हैं, उसे पीड़ितों की बेशर्मी दिखायी देती है, और वह उस मानवजाति की लाचारी और खौफ को महसूस करता है जो उद्धार का अनुग्रह खो चुकी है। मानवजाति परमेश्वर की देखभाल को अस्वीकार कर, अपने ही रास्ते पर चलती है; उसकी आँखों की जाँच-पड़ताल से बचने का प्रयास करते हुए, दुश्मन की संगति में गहरे समुद्र की कड़वाहट की हर बूँद का स्वाद लेना पसंद करती है। अब मनुष्य को सर्वशक्तिमान की आह सुनाई नहीं देती; अब इस दुःखद मानवजाति को सहलाने के लिए सर्वशक्तिमान के हाथ तैयार नहीं हैं। वह बार-बार फिर प्राप्त करता है, और बार-बार गँवा देता है, इस तरह उसका किया कार्य दोहराया जाता है। उस क्षण से, वह थकान महसूस करने लगता है, उकताने लगता है और इसलिए वह उस काम को बंद कर देता है जो उसके हाथ में है और मानवजाति के बीच में चलना बंद कर देता है...। मनुष्य इनमें से किसी भी परिवर्तन से पूरी तरह अनजान है, सर्वशक्तिमान के आने और जाने से, उसकी उदासी और विषाद से अनजान है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सर्वशक्तिमान की आह

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 357

हालाँकि मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रबंधन गहरा है, पर यह मनुष्य की समझ से परे नहीं है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर का संपूर्ण कार्य उसके प्रबंधन और मनुष्य के उद्धार के कार्य से जुड़ा हुआ है, और मानवजाति के जीवन, रहन-सहन और मंजिल से संबंध रखता है। परमेश्वर मनुष्य के मध्य और उनपर जो कार्य करता है, उसे बहुत ही व्यावहारिक और अर्थपूर्ण कहा जा सकता है। वह मनुष्य द्वारा देखा और अनुभव किया जा सकता है, और वह कोई अमूर्त चीज नहीं है। यदि मनुष्य परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले समस्त कार्य को स्वीकार करने में अक्षम है, तो उसके कार्य का महत्व ही क्या है? और इस प्रकार का प्रबंधन मनुष्य को उद्धार की ओर कैसे ले जा सकता है? परमेश्वर का अनुसरण करने वाले बहुत सारे लोग केवल इस बात से मतलब रखते हैं कि आशीष कैसे प्राप्त किए जाएँ या आपदा को कैसे टाला जाए। जैसे ही परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन का उल्लेख किया जाता है, वे चुप हो जाते हैं और सारी रुचि खो देते हैं। उन्हें लगता है कि इस प्रकार के उबाऊ मुद्दों को समझने से उनके जीवन की प्रगति में कोई मदद नहीं मिलेगी और न ही कोई लाभ प्राप्त होगा। परिणामस्वरूप, भले ही उन्होंने परमेश्वर के प्रबंधन के बारे में जानकारी सुनी हो, वे इसके साथ अगंभीर तरीके से पेश आते हैं। वे इसे स्वीकारने योग्य कोई खजाना नहीं मानते, न ही इसे समझने के लिए अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने में इन लोगों का प्रयोजन बहुत सरल होता है और यह एक ही लक्ष्य के लिए होता है : आशीषित होना। ये लोग ऐसी किसी भी दूसरी चीज के लिए पूर्णतया उदासीन रहते हैं जो इस उद्देश्य से संबंध नहीं रखती। उनके लिए, परमेश्वर में विश्वास करने का सबसे वैध लक्ष्य आशीष प्राप्त करना है—यह उनकी आस्था का असली मूल्य है। यदि कोई चीज इस प्रयोजन को पूरा नहीं करती, तो चाहे जो भी हो वे उससे अप्रभावित रहते हैं। आज परमेश्वर में विश्वास करने वाले अधिकांश लोगों का यही हाल है। उनका प्रयोजन और इरादा न्यायोचित प्रतीत होते हैं, क्योंकि जब वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो वे परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते भी हैं, परमेश्वर के प्रति समर्पित भी होते हैं और अपना कर्तव्य भी निभाते हैं। वे अपनी जवानी न्योछावर कर देते हैं, परिवार और आजीविका त्याग देते हैं, यहाँ तक कि दौड़-धूप करने के लिए वर्षों अपने घर से दूर बिताते हैं। अपने परम प्रयोजन के लिए वे अपनी रुचियाँ बदल डालते हैं, अपने जीवन का दृष्टिकोण बदल देते हैं, यहाँ तक कि अपने अनुसरण की दिशा तक बदल देते हैं, किंतु परमेश्वर पर अपने विश्वास करने के प्रयोजन को नहीं बदल सकते। वे अपनी आकांक्षाओं के प्रबंधन के लिए दौड़-धूप करते हैं; चाहे मार्ग कितना भी दूर क्यों न हो, और मार्ग में कितनी भी कठिनाइयाँ, खतरे और अवरोध क्यों न आएँ, वे दृढ़ रहते हैं और मृत्यु से नहीं डरते। इस तरह से अपने आप को समर्पित रखने के लिए उन्हें कौन-सी ताकत बाध्य करती है? क्या यह उनकी अंतरात्मा है? क्या यह उनका महान और कुलीन चरित्र है? क्या यह बुराई की शक्तियों से बिल्कुल अंत तक लड़ने का उनका दृढ़ संकल्प है? क्या यह प्रतिफल की आकांक्षा के बिना परमेश्वर के लिए गवाही देने की जो आस्था उनके पास है, वह है? क्या यह परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए सब कुछ बेहिचक त्याग देने की उनकी लगन है? या यह विलासितापूर्ण व्यक्तिगत माँगें हमेशा त्यागने की उनकी समर्पित भावना है? ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए, जिसने कभी परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य को नहीं समझा, उसका इतना सारा हृदय का रक्त खपाने में सक्षम होना एक बहुत बड़ा चमत्कार है! फिलहाल, आओ इसकी चर्चा न करें कि इन लोगों ने कितना कुछ दिया है। किंतु उनका व्यवहार हमारे गहन-विश्लेषण के बहुत योग्य है। उनके साथ इतनी निकटता से जुड़े उन लाभों के अतिरिक्त, परमेश्वर को कभी नहीं समझने वाले लोगों द्वारा उसके लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाने का क्या कोई अन्य कारण हो सकता है? यहाँ हमें एक ऐसी समस्या का पता चलता है जिसे मनुष्य पहले पता नहीं लगा सका है : परमेश्वर के साथ मनुष्य का संबंध केवल नग्न स्वार्थ पर आधारित है। यह आशीष लेने वाले और देने वाले के मध्य का संबंध है। स्पष्ट रूप से कहें तो यह एक कर्मचारी और एक नियोक्ता के मध्य का संबंध है। कर्मचारी केवल नियोक्ता द्वारा दिए जाने वाले प्रतिफल प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम करता है। इस प्रकार के स्वार्थ आधारित संबंध में कोई आत्मीय स्नेह नहीं होता, केवल लेन-देन होता है। प्रेम करने या प्रेम पाने जैसी कोई बात नहीं होती, केवल दान और दया होती है। कोई समझ नहीं होती, केवल असहाय दबा हुआ आक्रोश और धोखा होता है। कोई अंतरंगता नहीं होती, केवल एक अगम खाई होती है। अब जबकि चीजें इस बिंदु तक आ गई हैं तो ऐसी राह को कौन उलट सकता है? और कितने लोग इस बात को वास्तव में समझने में सक्षम हैं कि यह संबंध कितना भयावह बन चुका है? मेरा मानना है कि जब लोग आशीष प्राप्त होने के आनंदपूर्ण वातावरण में निमग्न हो जाते हैं तो कोई यह कल्पना नहीं कर सकता कि परमेश्वर के साथ ऐसा संबंध कितना अटपटा और भद्दा है।

परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास के बारे में सबसे दुःखद बात यह है कि परमेश्वर के कार्य के बीच मनुष्य अपने खुद के उद्यम में जुटा रहता है, जबकि परमेश्वर के प्रबंधन पर कोई ध्यान नहीं देता। परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास की सबसे बड़ी असफलता यह है कि जब वह परमेश्वर के प्रति समर्पित होने और उसकी आराधना करने का अनुसरण करता है, उसी समय वह एक महत्वाकांक्षी मंजिल के अपने सपने का निर्माण कर रहा होता है और इस बात की साजिश रचता है कि सबसे बड़ा आशीष और सर्वोत्तम मंजिल कैसे हासिल की जाए। भले ही लोग समझते हैं कि वे कितने दीन-हीन, घृणास्पद और दयनीय हैं, फिर भी ऐसे कितने लोग अपनी आकांक्षाओं और आशाओं को आसानी से त्याग सकते हैं? और कौन अपने कदमों को रोकने और अपनी ओर से योजनाएँ बनाना बंद करने में सक्षम है? परमेश्वर को उन लोगों की ज़रूरत है, जो उसके प्रबंधन को पूरा करने के लिए उसके साथ निकटता से सहयोग करेंगे। उसे उन लोगों की जरूरत है जो उसके प्रति समर्पण करने की खातिर अपने पूरे तन-मन को उसके प्रबंधन के कार्य के प्रति समर्पित करेंगे। उसे ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो हर दिन उससे भीख माँगने के लिए अपने हाथ फैलाए रहते हैं और उनकी तो बिल्कुल भी जरूरत नहीं है जो उसके लिए खुद को थोड़ा-सा खपाते हैं और फिर उससे भुगतान अदायगी की माँग करने का इंतजार करते हैं। परमेश्वर उन लोगों से नफरत करता है जो तुच्छ योगदान करते हैं और फिर अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट हो जाते हैं। वह उन निष्ठुर लोगों से नफरत करता है जो उसके प्रबंधन-कार्य को अत्यधिक नापसंद करते हैं और केवल स्वर्ग जाने और आशीष प्राप्त करने के बारे में बात करना चाहते हैं। वह उन लोगों से और भी अधिक नफरत करता है जो उसके उद्धार के कार्य से प्राप्त अवसर का लाभ अपने फायदे के लिए उठाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन लोगों ने कभी इस बात की परवाह नहीं की है कि परमेश्वर अपने प्रबंधन के कार्य के माध्यम से क्या हासिल और प्राप्त करना चाहता है। उनकी रुचि केवल इस बात में होती है कि किस प्रकार वे परमेश्वर के कार्य द्वारा प्रदान किए गए अवसर का उपयोग आशीष प्राप्त करने के लिए कर सकते हैं। वे परमेश्वर के हृदय के प्रति बिल्कुल भी विचारशील नहीं हैं और पूरी तरह से अपने भविष्य और भाग्य में तल्लीन रहते हैं। जो लोग परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के प्रति विमुख होते हैं और जो इस बात में जरा-सी भी रुचि नहीं रखते कि परमेश्वर मानवजाति को कैसे बचाता है और उसके इरादे क्या हैं, वे सभी परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के दायरे से बाहर वही चीजें कर रहे हैं जिन्हें वे करना चाहते हैं। उनके क्रियाकलापों को परमेश्वर द्वारा न तो याद किया जाता है और न ही अनुमोदित किया जाता है, परमेश्वर द्वारा इन्हें मूल्यवान माना जाना तो दूर की बात है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 358

जल्द ही मेरा कार्य पूरा हो जाएगा और कई वर्ष जो हमने एक साथ बिताए हैं वे असहनीय यादें बन गए हैं। मैंने अनवरत अपने वचनों को दोहराया है और लगातार अपने नए कार्य को आगे बढ़ाया है। निस्संदेह, जब भी मैं कार्य करता हूँ तो मेरा परामर्श उसका एक आवश्यक घटक होता है। इसके बिना तुम लोग भटक जाओगे और इससे भी ज्यादा पूरी तरह किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाओगे। मेरा कार्य अब समाप्त होने ही वाला है और अपने अंतिम चरण में है। मैं अभी भी परामर्श देने का कुछ कार्य करना चाहता हूँ, अर्थात्, तुम लोगों के सुनने के लिए परामर्श के वचन पेश करना चाहता हूँ। मैं केवल यह आशा करता हूँ कि तुम लोग इसमें सक्षम हो कि मेरी कोशिश बेकार नहीं जाने दोगे और इसके अलावा, तुम लोग मेरे श्रमसाध्य इरादों को समझ पाओगे और मेरे वचनों को तुम लोग अपने स्व-आचरण का आधार बना सकोगे। चाहे ये वचन ऐसे हों जिन्हें तुम लोग सुनना चाहो या न चाहो, चाहे ये वचन ऐसे हों जिन्हें तुम लोग खुशी-खुशी स्वीकार करते हो या ऐसे जिन्हें तुम बेमन से स्वीकार करते हो, तुम्हें उन्हें गंभीरता से लेना चाहिए। अन्यथा, तुम लोगों के लापरवाह और उदासीन स्वभाव और व्यवहार मुझे बहुत ज्यादा चोट पहुँचाएँगे और इससे भी बढ़कर वे मुझे घोर घृणा महसूस कराएँगे। मुझे बहुत आशा है कि तुम लोग मेरे वचनों को बार-बार—हजारों बार—पढ़ सकते हो, इस हद तक कि वे तुम्हारे दिलों में उत्कीर्ण हो जाएँ। केवल इसी तरीके से तुम लोग तुमसे की गई मेरी अपेक्षाओं पर खरे उतरने में विफल नहीं होगे। हालाँकि, अभी तुम लोगों में से कोई भी इस तरह से नहीं जी रहा है। इसके विपरीत, तुम सभी एक ऐयाश जीवन में डूबे हुए हो, जी-भर कर खाने-पीने का जीवन, और तुम लोगों में से कोई भी अपने हृदय और आत्मा को समृद्ध करने के लिए मेरे वचनों का उपयोग नहीं करता। यही कारण है कि मैंने मनुष्‍य जाति के असली चेहरे के बारे में यह निष्कर्ष निकाला है : मनुष्‍य कभी भी मेरे साथ विश्वासघात कर सकता है और कोई भी मेरे वचनों के प्रति पूर्णतः वफादार नहीं हो सकता।

“मनुष्य को शैतान ने इतना भ्रष्ट कर दिया है कि अब वह मनुष्य जैसा नहीं रहा।” इस वाक्यांश को अब अधिकांश लोग थोड़ी-बहुत मान्यता देते हैं। मैं ऐसा इसलिए कहता हूँ क्योंकि मैं जिस “मान्यता” की बात कर रहा हूँ वह वास्तविक ज्ञान के विपरीत केवल सतही अभिस्वीकृति है। चूँकि तुम में से कोई भी स्वयं का सही तरीके से मूल्यांकन या पूरी तरह से गहन-विश्लेषण नहीं कर सकता है, इसलिए तुम लोग मेरे वचनों पर आधा-अधूरा ही विश्वास करते हो। लेकिन इस बार मैं तुम लोगों में मौजूद सबसे गंभीर समस्या की व्याख्या करने के लिए तथ्यों का उपयोग कर रहा हूँ। वह समस्या है “विश्वासघात”। तुम सभी लोग “विश्वासघात” शब्द से परिचित हो क्योंकि अधिकांश लोगों ने दूसरों के साथ विश्वासघात करने वाला कुछ काम किया है, जैसे कि किसी पति का अपनी पत्नी के साथ विश्वासघात करना, किसी पत्नी का अपने पति के साथ विश्वासघात करना, किसी बेटे का अपने पिता के साथ विश्वासघात करना, किसी बेटी का अपनी माँ के साथ विश्वासघात करना, किसी नौकर का अपने मालिक के साथ विश्वासघात करना, दोस्तों का एक दूसरे के साथ विश्वासघात करना, रिश्तेदारों का एक दूसरे के साथ विश्वासघात करना, विक्रेताओं का क्रेताओं के साथ विश्वासघात करना, इत्यादि। इन सभी उदाहरणों में विश्वासघात का सार निहित है। संक्षेप में, विश्वासघात व्यवहार का वह रूप है जो वादा तोड़ता है, नैतिक मानदंडों का उल्लंघन करता है या मानवीय मूल्यों के विरुद्ध काम करता है, मानवता का ह्रास प्रदर्शित करता है। मनुष्यों के रूप में चाहे तुम लोगों को याद हो या नहीं कि तुमने किसी दूसरे व्यक्ति के साथ विश्वासघात किया है या तुम लोगों ने पहले कई बार दूसरों से विश्वासघात किया है, इस दुनिया में जन्म लेने के कारण तुम सभी ने कुछ-न-कुछ ऐसा अवश्य किया है जो सत्य का उल्लंघन है। चूँकि तुम अपने माता-पिता या दोस्तों से विश्वासघात करने में सक्षम हो, तो तुम दूसरों के साथ भी विश्वासघात करने में सक्षम हो और इससे भी ज्यादा तुम मेरे साथ विश्वासघात करने और उन चीजों को करने में सक्षम हो जिनसे मैं नफरत करता हूँ। दूसरे शब्दों में, विश्वासघात महज़ एक सतही अनैतिक व्यवहार नहीं है, बल्कि इससे भी ज्यादा यह ऐसी चीज है जो सत्य के विपरीत है। यह वास्तव में मानव जाति के मेरे प्रति प्रतिरोध और विद्रोह का स्रोत है। यही कारण है कि मैंने निम्‍नलिखित कथन में इसका सारांश दिया है : विश्वासघात मनुष्य की जन्मजात प्रकृति है और यह प्रकृति प्रत्येक व्यक्ति के मेरे साथ अनुरूपता हासिल करने की प्रक्रिया की जन्मजात शत्रु है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (1)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 359

ऐसा व्यवहार जो पूरी तरह से मेरे प्रति समर्पण नहीं कर सकता है, विश्वासघात है। ऐसा व्यवहार जो मेरे प्रति निष्ठावान नहीं हो सकता, वह है विश्वासघात। मेरे साथ धोखा करना और मेरे साथ छल करने के लिए झूठ का उपयोग करना, विश्वासघात है। धारणाओं से भरा होना और हर जगह उन्हें फैलाना विश्वासघात है। मेरी गवाहियों और हितों की रक्षा नहीं कर पाना विश्वासघात है। दिल में मुझसे दूर होते हुए भी झूठमूठ मुस्कुराना विश्वासघात है। ये सभी विश्वासघात के काम हैं जिन्हें करने में तुम लोग हमेशा सक्षम रहे हो, और ये तुम लोगों के बीच आम बात है। तुम लोगों में से शायद कोई भी इसे समस्या न माने, लेकिन मैं ऐसा नहीं सोचता हूँ। मैं अपने साथ किसी व्‍यक्ति के विश्वासघात को एक तुच्छ बात नहीं मान सकता हूँ, और इससे भी बढ़कर, मैं इसे अनदेखा नहीं कर सकता। अब भी, जबकि मैं तुम लोगों के बीच कार्य कर रहा हूँ, तो तुम लोग इस तरह से व्‍यवहार कर रहे हो—यदि कभी ऐसा दिन आए जब तुम लोगों की निगरानी करने के लिए कोई न हो, तो क्या तुम लोग उन डाकुओं जैसे नहीं बन जाओगे जिन्होंने खुद को अपने छोटे-से इलाकों का राजा घोषित कर दिया है? जब ऐसा होगा और तुम विनाश का कारण बनोगे, तब तुम्हारे पीछे उस गंदगी को कौन साफ करेगा? अगर तुम लोग सोचते हो कि विश्वासघात के कुछ कार्य तुम लोगों के सतत व्यवहार नहीं, बल्कि मात्र कभी-कभार होने वाले क्रियाकलाप हैं, जिन्हें इतनी सख्ती से नहीं उठाया जाना चाहिए जिससे तुम्हारे स्वाभिमान को ठेस पहुँचे, और यदि तुम लोग वास्तव में ऐसा ही मानते हो तो तुम समझ से बिल्कुल कोरे हो। कोई व्यक्ति जितना ज्यादा इस तरीके से सोचता है, वह विद्रोह का उतना ही बड़ा आदर्श और नमूना होता है। मनुष्य की प्रकृति उसका जीवन है; यह एक सिद्धांत है जिस पर वह जीवित रहने के लिए निर्भर करता है और वह इसे बदलने में असमर्थ है। विश्वासघात की प्रकृति का उदाहरण लो। यदि तुम अपने किसी रिश्तेदार या मित्र से विश्वासघात करने के लिए चीजें कर सकते हो, तो यह साबित करता है कि यह तुम्हारे जीवन और तुम्हारी प्रकृति का हिस्सा है जिसके साथ तुम पैदा हुए थे। यह कुछ ऐसा है जिससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति अन्य लोगों की चीजें चुराना पसंद करता है, तो यह चुराना पसंद करना उसके जीवन का एक हिस्सा है, भले ही कभी-कभी वह चोरी करता है, और अन्य समय वह नहीं करता है। चाहे वह चोरी करता है अथवा नहीं, इससे यह साबित नहीं हो सकता कि उसका चोरी करना केवल एक प्रकार का व्यवहार है। बल्कि, इससे साबित होता है कि उसका चोरी करना उसके जीवन का एक हिस्सा, अर्थात्, उसकी प्रकृति है। कुछ लोग पूछेंगे : चूँकि यह उसकी प्रकृति है, तो ऐसा क्यों है कि वह कभी-कभी अच्छी चीजें देखता है लेकिन उन्हें चोरी नहीं करता है? उत्तर बहुत आसान है। उसके चोरी नहीं करने के कई कारण हैं। हो सकता है कि वह इसलिए चोरी न करता हो क्‍योंकि चौकस निगाहों के नीचे से निकाल ले जाने के लिए वस्तु बहुत बड़ी हो, या चोरी करने के लिए उपयुक्त समय न हो, या वस्तु बहुत महँगी हो, बहुत कड़े पहरे में हो, या शायद उसकी इस चीज में विशेष रूप से रुचि न हो, या उसे यह न समझ आये कि उसके लिए इसका क्‍या उपयोग है, इत्यादि। ये सभी कारण संभव हैं। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कोई वस्तु चुराता है या नहीं, इससे यह साबित नहीं होता है कि यह विचार उसके अंदर केवल क्षण भर के लिये रहता है, एक पल के लिए कौंधता है। इसके विपरीत, यह उसकी प्रकृति का एक हिस्सा है—ऐसी प्रकृति, जिसे बदलना कठिन है। ऐसा व्यक्ति केवल एक बार चोरी करके संतुष्ट नहीं होता है; बल्कि जब भी कोई अच्छी वस्तु या उपयुक्त स्थिति उसके सामने आती है, तो दूसरों की चीजों को अपनी बना लेने के ऐसे विचार उसमें जाग जाते हैं। इसीलिए मैं कहता हूँ कि यह विचार ऐसा नहीं है जिसे यह व्यक्ति बस कभी-कभार अपना लेता हो, बल्कि ऐसा है जो इसकी प्रकृति से ही आता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (1)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 360

कोई भी अपना सच्चा चेहरा दर्शाने के लिए अपने स्वयं के शब्दों और क्रियाओं का उपयोग कर सकता है। यह सच्चा चेहरा निश्चित रूप से उसकी प्रकृति है। यदि तुम बहुत कुटिल ढंग से बोलने वाले व्यक्ति हो, तो तुम कुटिल प्रकृति के हो। यदि तुम्हारी प्रकृति कपटपूर्ण है, तो तुम कपटी ढंग से काम करते हो, और दूसरे बहुत आसानी से तुम्हारे झाँसे में आ जाते हैं और ठगे जाते हैं। यदि तुम्हारी प्रकृति अत्यंत क्रूर है, तो हो सकता है कि तुम्हारे वचन सुनने में सुखद हों, लेकिन तुम्हारे कार्य तुम्हारी क्रूर चालों को छिपा नहीं सकते हैं। यदि तुम्हारी प्रकृति आलसी है, तो तुम जो कुछ भी कहोगे, उससे खुद को अपने लापरवाह और आलसी होने से दोषमुक्त कराने की कोशिश कर रहे होगे, और तुम्हारे कार्य बहुत धीमे और लापरवाही से भरे होंगे, और सत्य छिपाने में बहुत अच्छे होंगे। यदि तुम्हारी प्रकृति सहानुभूतिपूर्ण है, तो तुम्हारे वचन तर्कसंगत होंगे और तुम्हारे कार्य भी सत्य के अत्यधिक अनुरूप होंगे। यदि तुम्हारी प्रकृति सबके प्रति वफादार रहने की है, तो तुम्हारे वचन निश्‍चय ही खरे होंगे और जिस तरीके से तुम कार्य करते हो, वह भी व्यावहारिक और यथार्थवादी होगा, जिसमें ऐसा कुछ न होगा जिससे तुम्हारे मालिक को असहजता महसूस हो। यदि तुम्हारी प्रकृति कामुक या धन लोलुप है, तो तुम्हारा हृदय प्रायः इन चीजों से भरा होगा और तुम बेइरादा कुछ विकृत, अनैतिक काम करोगे, जिन्हें भूलना लोगों के लिए कठिन होगा और वे काम उनमें घृणा पैदा करेंगे। जैसा कि मैंने कहा है, यदि तुम्हारी प्रकृति विश्वासघात की है तो तुम मुश्किल से ही स्वयं को इससे छुड़ा सकते हो। यह मानकर ख्याली पुलाव पकाने की मानसिकता मत पालो कि चूँकि तुमने दूसरों के साथ गलत नहीं किया है, इसलिए तुम्हारी प्रकृति विश्वासघात की नहीं है। यदि तुम ऐसा ही सोचते हो तो तुम घृणित हो। जब भी मैं बोलता हूँ, तो मेरे वचन सभी लोगों पर लक्षित होते हैं, न कि केवल एक व्यक्ति या एक प्रकार के व्यक्ति पर। यह तथ्य कि तुमने मेरे साथ एक मामले में विश्वासघात नहीं किया है, यह साबित नहीं करता कि तुम मेरे साथ किसी मामले में विश्वासघात नहीं करोगे। कुछ लोग अपने विवाह में असफलताओं के दौरान सत्य की तलाश करने में अपनी आस्था खो देते हैं। कुछ लोग परिवार के टूटने के दौरान मेरे प्रति निष्ठावान होने के अपने दायित्व को त्याग देते हैं। कुछ लोग खुशी और उत्तेजना के एक पल की तलाश करने के लिए मेरा परित्याग कर देते हैं। कुछ लोग प्रकाश में रहने और पवित्र आत्मा के कार्य का आनंद प्राप्त करने के बजाय एक अंधेरी खोह में पड़े रहना पसंद करेंगे। कुछ लोग धन की अपनी लालसा को संतुष्ट करने के लिए दोस्तों की सलाह पर ध्यान नहीं देते हैं, और अब भी अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं कर सकते हैं और अपनी दिशा में बदलाव नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग मेरा संरक्षण प्राप्त करने के लिए केवल अस्थायी रूप से मेरे नाम के अधीन रहते हैं, जबकि अन्य लोग बेमन से मेरे प्रति थोड़ा-सा समर्पित होते हैं क्योंकि वे जीवन से चिपके रहते हैं और मृत्यु से डरते हैं। क्या ये और ऐसे अन्य क्रियाकलाप जो अनैतिक हैं और इससे भी बढ़कर सत्यनिष्ठा से रहित हैं, ऐसे व्यवहार नहीं हैं जिनसे लोग लंबे समय पहले अपने दिलों की गहराई में मेरे साथ विश्वासघात करते आ रहे हैं? निस्संदेह, मुझे पता है कि लोग मुझसे विश्वासघात करने की पहले से योजना नहीं बनाते, लेकिन उनका विश्‍वासघात उनकी प्रकृति का स्वाभाविक रूप से प्रकट होना है। कोई मेरे साथ विश्वासघात नहीं करना चाहता, और इस बात से खुश तो कोई बिल्कुल भी नहीं होता कि उसने मेरे साथ विश्वासघात का कोई काम किया है। इसके विपरीत, वे डर से काँप रहे हैं, है ना? तो क्या तुम लोग इस बारे में सोच रहे हो कि तुम लोग इन विश्वासघातों की भरपाई कैसे कर सकते हो, और कैसे तुम लोग वर्तमान परिस्थिति को बदल सकते हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (1)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 361

मनुष्य की प्रकृति मेरे सार से काफी भिन्न है, क्योंकि मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति पूरी तरह से शैतान से उत्पन्न होती है; मनुष्य की प्रकृति को शैतान द्वारा संसाधित और भ्रष्ट किया गया है। अर्थात्, मनुष्य इसकी बुराई और कुरूपता के प्रभाव के अधीन जीता है। मनुष्य सत्य के संसार या पवित्र वातावरण में बड़ा नहीं होता है और प्रकाश में जीना तो दूर की बात है। इसलिए किसी व्यक्ति के पास जन्म से ही प्रकृति के भीतर सत्य का होना संभव नहीं है और किसी व्यक्ति का परमेश्वर का भय मानने और उसके प्रति समर्पण करने के सार के साथ पैदा होना और भी संभव नहीं है। इसके विपरीत, लोग एक ऐसी प्रकृति से युक्त होते हैं जो परमेश्वर का विरोध करती है, परमेश्वर से विद्रोह करती है और जिसमें सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं होता। यही प्रकृति वह समस्या है जिसके बारे में मैं बात करना चाहता हूँ—विश्वासघात। विश्वासघात प्रत्येक व्यक्ति के परमेश्वर के विरोध का स्रोत है। यह एक ऐसी समस्या है जो केवल मनुष्य में विद्यमान है और मुझमें नहीं है। कुछ लोग पूछेंगे : चूँकि सभी लोग दुनिया में वैसे ही रह रहे हैं जैसे मसीह रहता है तो ऐसा क्यों है कि सभी लोगों की ऐसी प्रकृति है जो परमेश्वर से विश्वासघात करती है, लेकिन मसीह की प्रकृति ऐसी नहीं है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसे तुम लोगों को स्पष्ट रूप से अवश्य समझाया जाना चाहिए।

मानवजाति के अस्तित्व का आधार आत्मा का बार-बार पुनर्जन्म है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक व्यक्ति तब देह में मानव जीवन प्राप्त करता है जब उसकी आत्मा का पुनर्जन्म होता है। एक व्यक्ति की देह का जन्म होने के बाद उसका जीवन तब तक रहता है जब तक देह की अंतिम सीमा नहीं आ जाती है जो कि वह अंतिम क्षण होता है जब आत्मा अपना आवरण छोड़ देती है। यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है, व्यक्ति की आत्मा बारंबार आती और जाती है और इस प्रकार मानवजाति का अस्तित्व बना रहता है। शरीर का जीवन मनुष्य की आत्मा का भी जीवन है और मनुष्य की आत्मा मनुष्य के शरीर के अस्तित्व को सहारा देती है। अर्थात्, प्रत्येक व्यक्ति का जीवन उसकी आत्मा से आता है, यह देह में अंतर्निहित नहीं होता है। इस प्रकार, मनुष्य की प्रकृति उसकी आत्मा से आती है, न कि उसके शरीर से। प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा ही जानती है कि कैसे उसने शैतान के प्रलोभनों, यातना और भ्रष्टता का अनुभव किया है। मनुष्य के शरीर के लिए ये बातें ज्ञानातीत हैं। इसलिए, मानवजाति अनजाने ही उत्तरोत्तर अधिक अंधकारमय, अधिक कलुषित और कहीं अधिक बुरी बनती जाती है, जबकि मेरे और मनुष्य के बीच की दूरी अधिक से अधिक बढ़ती जाती है, और मानवजाति के लिए जीवन और अधिक अंधकारमय होता जाता है। मानवजाति की आत्माएँ शैतान की मुट्ठी में हैं तो कहने की ज़रूरत नहीं कि मनुष्य का शरीर भी शैतान द्वारा कब्जे में कर लिया गया है। इस तरह का शरीर और इस तरह की मानवजाति परमेश्वर का विरोध कैसे नहीं कर सकते? वे उसके साथ स्वाभाविक रूप से सुसंगत कैसे हो सकते हैं? मैंने इस कारण से शैतान को नीचे बीच हवा में फेंका था क्योंकि उसने मेरे साथ विश्वासघात किया था। तो फिर मनुष्य अपनी संलग्नता से कैसे मुक्त हो सकते हैं? यही कारण है कि विश्वासघात मनुष्य की प्रकृति है। मुझे विश्वास है कि एक बार जब तुम लोग इस तर्क को समझ लोगे तो तुम लोगों में कुछ मात्रा में मसीह के सार के प्रति विश्वास भी आ जाना चाहिए। परमेश्वर के आत्मा द्वारा धारण की हुई देह परमेश्वर की अपनी देह है। परमेश्वर का आत्मा सर्वोच्च है; वह सर्वशक्तिमान, पवित्र और धार्मिक है। इसी तरह, उसकी देह भी सर्वोच्च, सर्वशक्तिमान, पवित्र और धार्मिक है। इस तरह की देह केवल वह करने में सक्षम है जो मानवजाति के लिए धार्मिक और लाभकारी है, वह जो पवित्र, महिमामय और प्रतापी है; वह ऐसी किसी भी चीज को करने में असमर्थ है जो सत्य का उल्लंघन करती हो, नैतिक न्याय का उल्लंघन करती हो, वह ऐसी किसी चीज को करने में तो और भी समर्थ नहीं है जो परमेश्वर के आत्मा के साथ विश्वासघात कर दे। परमेश्वर का आत्मा पवित्र है और इसलिए उसकी देह शैतान द्वारा भ्रष्ट नहीं की जा सकती; उसकी देह का सार मनुष्य की देह के सार से भिन्न है। क्योंकि यह परमेश्वर नहीं बल्कि मनुष्य है जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया है और शैतान का स्वयं परमेश्वर की देह को भ्रष्ट करना संभव नहीं हो सकता। इस प्रकार, इस तथ्य के बावजूद कि मनुष्य और मसीह एक ही स्थान में रहते हैं, वह केवल मनुष्य ही है जिसे शैतान कब्जे में कर सकता है, जिसका वह उपयोग कर सकता है और जिसे शैतान की चालों से नुकसान होता है। इसके विपरीत, मसीह शैतान की भ्रष्टता के प्रति शाश्वत रूप से अभेद्य है, क्योंकि शैतान कभी भी उच्चतम स्थान तक आरोहण करने में सक्षम नहीं होगा और कभी भी परमेश्वर के निकट नहीं पहुँच पाएगा। आज, तुम सभी लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि यह केवल शैतान द्वारा भ्रष्ट मानवजाति ही है जो मेरे साथ विश्वासघात करती है। विश्वासघात ऐसा मुद्दा कभी नहीं होगा जिसमें मसीह थोड़ा-भी शामिल हो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 362

शैतान द्वारा भ्रष्ट की गई सभी आत्माएँ, शैतान की सत्ता के नियंत्रण में हैं। केवल वे लोग जो मसीह में विश्वास करते हैं उन्हें ही अलग किया गया है, शैतान के शिविर से बचाया गया है और वे आज के राज्य में लाए गए हैं। अब ये लोग शैतान के प्रभाव में नहीं रहते हैं। फिर भी, मनुष्य की प्रकृति अभी भी मनुष्य के शरीर में जड़ जमाए हुए है, कहने का अर्थ है कि भले ही तुम लोगों की आत्माएँ बचा ली गई हैं, तुम लोगों की प्रकृति अभी भी पहले जैसी ही है और इस बात की अभी भी सौ प्रतिशत संभावना है कि तुम लोग मेरे साथ विश्वासघात करोगे। यही कारण है कि मेरा कार्य इतने लंबे समय तक चलता है, क्योंकि तुम लोगों की प्रकृति अड़ियल है। तुम लोग अपने कर्तव्य निभाते हुए अभी अपनी पूरी क्षमता से कष्ट उठा रहे हो, फिर भी यह एक अखंडनीय तथ्य है कि तुम लोगों में से प्रत्येक मुझे धोखा देने और शैतान की सत्ता में लौटने, उसके शिविर में लौटने, और अपने पुराने जीवन में वापस जाने में सक्षम है। उस समय, तुम लोगों के लिए संभव नहीं होगा कि तुम लेशमात्र भी वैसी इंसानियत या मनुष्य से समानता दिखा सको, जैसी तुम अब दिखा रहे हो। गंभीर मामलों में, तुम लोगों को नष्ट कर दिया जाएगा और इससे भी बढ़कर तुम लोगों को अनंत सर्वनाश के हवाले कर दिया जाएगा, गंभीर रूप से दंडित किया जाएगा, फिर कभी भी पुनर्जन्म लेने नहीं दिया जाएगा। यह तुम लोगों के सामने रखी गई समस्या है। मैं तुम लोगों को इस तरह से याद दिला रहा हूँ ताकि पहले तो, मेरा कार्य व्यर्थ नहीं जाएगा और दूसरे, ताकि तुम सभी लोग प्रकाश के दिनों में रह सको। वास्तव में, मेरा कार्य व्यर्थ होगा या नहीं, यह महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि तुम लोग एक खुशहाल जीवन और एक अद्भुत भविष्य पाने में सक्षम हो। मेरा कार्य लोगों की आत्माओं को बचाने का कार्य है। यदि तुम्हारी आत्मा शैतान के हाथों में पड़ जाती है तो तुम्हारी देह शांति में नहीं रहेगी। यदि मैं तुम्हारी देह की रक्षा कर रहा हूँ तो तुम्हारी आत्मा भी निश्चित रूप से मेरी देखभाल के अधीन होगी। यदि मैं तुमसे सच में घृणा करूँ तो तुम्हारी देह और आत्मा तुरंत शैतान के हाथों में पड़ जाएँगे। क्या तुम कल्पना कर सकते हो कि तब तुम्हारी दशा किस तरह की होगी? यदि किसी दिन मेरे वचनों का तुम पर कोई असर न हुआ तो या तो मैं तुम सभी लोगों को शैतान को सौंप दूँगा और तुम्हें दी जाने वाली यातना को प्रचंड करने की अनुमति दे दूँगा जब तक कि मेरा गुस्सा पूरी तरह से खत्म नहीं हो जाता, अथवा मैं कभी न सुधर सकने योग्य तुम मानवों को व्यक्तिगत रूप से दंडित करूँगा क्योंकि मेरे साथ विश्वासघात करने वाले तुम लोगों के हृदय कभी नहीं बदले होंगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 363

अब तुम सभी लोगों को यथाशीघ्र अपनी जाँच करनी चाहिए कि तुम लोगों के अंदर मेरे प्रति कितना विश्वासघात बाकी है। मैं उत्सुकता से तुम्हारी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। मेरे साथ अपने व्यवहार में लापरवाह मत होना। मैं कभी भी लोगों के साथ खेल नहीं खेलता हूँ। यदि मैं कहता हूँ कि मैं कुछ करूँगा तो मैं निश्चित रूप से ऐसा करूँगा। मुझे आशा है कि तुम सभी ऐसे लोग होगे जो मेरे वचनों को गंभीरता से लेते हो और यह नहीं सोचते हो कि वे मात्र वैज्ञानिक कपोल कथाएँ हैं। मैं तुम लोगों से ठोस कार्रवाई चाहता हूँ, न कि तुम लोगों की कल्पनाएँ। इसके बाद, तुम लोगों को मेरे प्रश्नों के उत्तर देने होंगे, जो इस प्रकार हैं :

1. यदि तुम सचमुच सेवाकर्ता हो तो क्या तुम बिना किसी अनमनेपन या नकारात्मक तत्व के समर्पित होकर मुझे सेवा प्रदान कर सकते हो?

2. यदि तुम्हें पता चले कि मैंने कभी भी तुम्हारी सराहना नहीं की है तो क्या तब भी तुम जीवन भर टिके रहकर मुझे सेवा प्रदान कर पाओगे?

3. यदि तुम्हारे काफी प्रयास करने के बावजूद मैं तुम्हारे प्रति बहुत रूखा रहूँ तो क्या तुम गुमनाम रहकर मेरे लिए कार्य करना जारी रख पाओगे?

4. यदि तुम्हारे द्वारा मेरे लिए कुछ खपने के बाद मैं तुम्हारी छोटी-सी माँगें पूरी नहीं करता हूँ तो क्या तुम मेरे प्रति निरुत्साहित और निराश हो जाओगे या यहाँ तक कि गुस्से से फूलने लगोगे और गालियाँ भी बकने लगोगे?

5. यदि तुम हमेशा बहुत वफादार रहे हो, मेरे लिए तुममें बहुत प्रेम रहा है, मगर फिर भी तुम बीमारी की पीड़ा, वित्तीय तनाव, अपने दोस्तों और रिश्तेदारों द्वारा त्याग दिए जाने या जीवन में किसी भी अन्य दुर्भाग्य को सहन करते हो तो क्या तब भी मेरे लिए तुम्हारी वफादारी और प्रेम बना रहेगा?

6. यदि जिसकी तुमने अपने हृदय में कल्पना की है उसमें से कुछ भी मेरे किए से मेल नहीं खाता है तो तुम्हें अपने भविष्य के मार्ग पर कैसे चलना चाहिए?

7. यदि तुम्हें वह कुछ भी प्राप्त नहीं होता है जो तुमने प्राप्त करने की आशा की थी तो क्या तुम मेरे अनुयायी बने रह सकते हो?

8. यदि तुम्हें मेरे कार्य का उद्देश्य और महत्व कभी भी समझ में न आया हो तो क्या तुम ऐसे समर्पणशील व्यक्ति हो सकते हो जो मनमानी राय न बनाता हो और निष्कर्ष न निकालता हो?

9. मनुष्य के साथ रहते हुए मैंने जो वचन कहे हैं और जो कार्य किया है क्या तुम वह सब सँजोए रख सकते हो?

10. क्या तुम मेरे निष्ठावान अनुयायी बने रहने में सक्षम हो और आजीवन मेरे लिए कष्ट भुगतने को तैयार हो, भले ही तुम्हें कुछ प्राप्त न हो?

11. क्या तुम मेरे वास्ते अपने जीवित रहने के भविष्य के मार्ग पर विचार न करने, योजना न बनाने या तैयारी न करने में सक्षम हो?

ये प्रश्न तुम लोगों से मेरी अंतिम माँगें दर्शाते हैं और मुझे आशा है कि तुम सभी लोग मुझे उत्तर दे सकते हो। यदि तुम इन प्रश्नों में पूछी गई एक या दो चीजों को पूरा कर चुके हो तो तुम्हें अभी भी अपना प्रयास जारी रखने की आवश्यकता है। यदि तुम इनमें से कोई एक भी माँग पूरी नहीं कर सकते हो तो तुम निश्चित रूप से उस प्रकार के हो जिसे नरक में डाला जाएगा। ऐसे लोगों से मुझे अब कुछ और कहने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे निश्चित रूप से ऐसे लोग हैं जो मेरे अनुरूप नहीं हो सकते। मैं किसी ऐसे व्यक्ति को अपने घर में कैसे रख सकता हूँ जो किसी भी परिस्थिति में मेरे साथ विश्वासघात कर सकता है? जहाँ तक ऐसे लोगों की बात है जो अधिकांश परिस्थितियों में मेरे साथ विश्वासघात कर सकते हैं, मैं अन्य व्यवस्थाएँ करने से पहले उनका प्रदर्शन देखूँगा। लेकिन, चाहे जो भी परिस्थिति हो, वे सब लोग जो मेरे साथ विश्वासघात करने में सक्षम हैं, मैं उन्हें कभी भी नहीं भूलूँगा; मैं उनमें से प्रत्येक को अपने मन में याद रखूँगा और उनके बुरे कार्यों का बदला चुकाने के अवसर की प्रतीक्षा करूँगा। मैंने जो अपेक्षाएँ की हैं वे सभी ऐसे मुद्दे हैं जिनकी जाँच तुम लोगों को स्वयं में करनी चाहिए। मुझे आशा है कि तुम सभी लोग उन पर गंभीरता से विचार कर सकते हो और मेरे साथ लापरवाही से व्यवहार नहीं करोगे। निकट भविष्य में, मैं अपनी अपेक्षाओं को सामने रखकर तुम्हारे द्वारा दिए गए उत्तरों की जाँच करूँगा। उस समय तक मैं तुम लोगों से कुछ भी अधिक माँग नहीं करूँगा और तुम्हें अधिक गंभीर नसीहत नहीं दूँगा। इसकी बजाय, मैं अपने अधिकार का प्रयोग करूँगा : जिन्हें रखा जाना चाहिए उन्हें रखा जाएगा, जिन्हें पुरस्कृत किया जाना चाहिए उन्हें पुरस्कृत किया जाएगा, जिन्हें शैतान को दिया जाना चाहिए, उन्हें शैतान को दिया जाएगा, जिन्हें भारी दंड मिलना चाहिए, उन्हें भारी दंड दिया जाएगा और जिनका नाश हो जाना चाहिए, उन्हें नष्ट कर दिया जाएगा। इस तरह, मेरे दिनों में मुझे परेशान करने वाला कोई भी नहीं होगा। क्या तुम मेरे वचनों पर विश्वास करते हो? क्या तुम प्रतिकार में विश्वास करते हो? क्या तुम विश्वास करते हो कि मैं उन सभी बुरे लोगों को दंड दूँगा जो मुझे धोखा देते हैं और मेरे साथ विश्वासघात करते हैं? तुम उस दिन के जल्दी आने की आशा करते हो या देर से आने की? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सज़ा से बहुत भयभीत है, या ऐसे व्यक्ति हो जो मेरा प्रतिरोधी होना पसंद करेगा, भले ही इसका अर्थ दंड भुगतना हो? जब वह दिन आएगा तो क्या तुम कल्पना कर सकते हो कि तुम हँसी-खुशी के बीच रह रहे होगे या रो रहे होगे और अपने दांत पीस रहे होगे? तुम क्या आशा करते हो कि तुम किस तरह के परिणाम का सामना करोगे? क्या तुमने कभी गंभीरता से विचार किया है कि तुम मुझ पर शत प्रतिशत विश्वास करते हो या मुझ पर शत प्रतिशत संदेह करते हो? क्या तुमने कभी ध्यान से विचार किया है कि तुम्हारे कार्य और व्यवहार तुम्हारे लिए किस प्रकार के नतीजे और परिणाम लाएँगे? क्या तुम दृढ़ता से आशा करते हो कि मेरे सभी वचन एक-एक करके पूरे होंगे या तुम बहुत डरे हुए हो कि मेरे वचन एक-एक करके पूरे होंगे? यदि तुम आशा करते हो कि अपने वचनों को पूरा करने के लिए मैं शीघ्र ही प्रस्थान करूँ तो तुम्हें अपने स्वयं के शब्दों और कार्यों से कैसे पेश आना चाहिए? यदि तुम मेरे प्रस्थान की आशा नहीं करते हो और यह आशा नहीं करते हो कि मेरे सभी वचन तुरंत पूरे हो जाएँ तो तुम मुझ पर विश्वास ही क्यों करते हो? क्या तुम सचमुच जानते हो कि तुम मेरा अनुसरण क्यों कर रहे हो? यदि यह केवल तुम्हारे ज्ञान का विस्तार करने के लिए है तो तुम्हें इतनी मुश्किलें उठाने की आवश्यकता नहीं है। यदि यह आशीष पाने और भविष्य की आपदा से बचने के लिए है तो तुम अपने स्वयं के आचरण के बारे में चिंतित क्यों नहीं हो? तुम अपने आपसे क्यों नहीं पूछते हो कि क्या तुम मेरी अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हो? तुम अपने आपसे क्यों नहीं पूछते कि तुम भविष्य के आशीषों को प्राप्त करने के योग्य हो या नहीं?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 364

मेरे सभी लोगों को जो मेरे सम्मुख सेवा करते हैं, अतीत के बारे में सोचना चाहिए कि क्या मेरे लिए तुम्हारे प्रेम में अशुद्धता थी? क्या मेरे प्रति तुम्हारी निष्ठा शुद्ध और सम्पूर्ण थी? क्या मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान सच्चा था? तुम लोगों के हृदय में मेरा स्थान कितना था? क्या मैंने तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से भर दिया? मेरे कितने वचन तुम लोगों के भीतर पूरे हुए? मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश मत करो! मैं ये सब बातें अच्छी तरह समझता हूँ! आज, जब मेरे उद्धार की वाणी व्यक्त होती है, तो क्या मेरे प्रति तुम लोगों के प्रेम में कुछ वृद्धि हुई है? क्या मेरे प्रति तुम लोगों की निष्ठा का कुछ भाग शुद्ध हुआ है? क्या मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान अधिक गहरा हुआ है? क्या अतीत की प्रशंसा ने तुम लोगों के आज के ज्ञान की एक मजबूत नींव डाली है? तुम्हारे भीतर मेरे आत्मा का कितना स्थान है? तुम लोगों के भीतर मेरी छवि को कितना स्थान दिया गया है? क्या मेरे कथनों ने तुम लोगों के मर्मस्थल पर चोट की है? क्या तुम लोग सचमुच महसूस करते हो कि अपनी लज्जा को छिपाने के लिए तुम लोगों के पास कोई स्थान नहीं है? क्या तुम्हें सचमुच लगता है कि तुम मेरे लोग होने के अपात्र हो? यदि तुम उपरोक्त प्रश्नों के प्रति पूर्णतः अनजान हो, तो यह दिखाता है कि तुम मौकापरस्त हो, तुम केवल संख्या बढ़ाने के लिए हो, मेरे द्वारा पूर्वनियत समय पर, तुम्हें निश्चित रूप से हटा दिया जाएगा और दूसरी बार अथाह कुंड में डाल दिया जाएगा। ये मेरे चेतावनी भरे वचन हैं, और जो कोई भी इन्हें हल्के में लेगा, उस पर मेरे न्याय की चोट पड़ेगी, और, नियत समय पर उस पर आपदा टूट पड़ेगी। क्या ऐसा ही नहीं है? क्या यह समझाने के लिए मुझे उदाहरण देने की आवश्यकता है? क्या तुम लोगों को कोई मिसाल देने के लिए मुझे और अधिक स्पष्ट रूप से बोलना होगा? सृष्टि के सृजन से लेकर आज तक, बहुत-से लोगों ने मेरे वचनों के खिलाफ विद्रोह किया है और इस तरह उन्हें प्रतिलाभ की मेरी धारा से त्याग दिया गया है और हटा दिया गया है; अंततः उनके शरीर नष्ट हो जाते हैं और उनकी आत्माएँ अधोलोक में डाल दी जाती हैं, आज भी वे भयंकर सज़ा भुगत रहे हैं। बहुत-से लोगों ने मेरे वचनों का अनुसरण किया है, परंतु वे मेरी प्रबुद्धता और रोशनी के विरोध में चले गए हैं, इसलिए मैंने उन्हें अलग कर दिया है, वे शैतान की सत्ता में गिरकर मेरे विरोधी बन गए हैं। (आज सीधे तौर पर मेरा विरोध करने वाले सभी लोग केवल सतही तौर पर मेरे वचनों का पालन करते हैं, और मेरे वचनों के सार के खिलाफ विद्रोह करते हैं।) बहुत-से ऐसे भी हैं जिन्होंने केवल मेरे उन वचनों को ही सुना है जो मैंने कल बोले थे, जिन्होंने अतीत के “कूड़े” को पकड़कर रखा है, और वर्तमान “उपज” को नहीं सँजोया है। ये लोग न केवल शैतान के द्वारा बंदी बना लिए गए हैं, बल्कि अनंतकाल के लिए पापी और मेरे शत्रु भी बन गए हैं, और सीधे तौर पर मेरा विरोध करते हैं। ऐसे लोग मेरे क्रोध की पराकाष्ठा पर मेरे दण्ड के भागी होते हैं, और वे अभी तक भी अंधे बने हुए हैं, आज भी अँधेरी कालकोठरियों में हैं (जिसका मतलब है कि ऐसे लोग शैतान द्वारा नियंत्रित सड़ी, सुन्न पड़ चुकी लाशों में हैं; क्योंकि उनकी आँखों पर मैंने परदा डाल दिया है, इसलिए मैं कहता हूँ कि वे अंधे हैं)। तुम लोगों के संदर्भ के लिए एक उदाहरण देना बेहतर होगा, ताकि तुम लोग उससे सीख सको :

पौलुस का उल्लेख करने पर, तुम लोग उसके इतिहास के बारे में, और उसके विषय में कुछ ऐसी कहानियों के बारे में सोचोगे जो त्रुटिपूर्ण और वास्तविकता से भिन्न हैं। उसे छोटी उम्र से ही माता-पिता द्वारा शिक्षित कर दिया गया था, उसने मेरा जीवन प्राप्त कर लिया था, और मेरे द्वारा पूर्वनिर्धारण के परिणाम स्वरूप वह मेरी अपेक्षा के अनुसार क्षमता से सम्पन्न था। 19 वर्ष की आयु में, उसने जीवन के बारे में विभिन्न पुस्तकें पढ़ीं; इसलिए मुझे इस विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं कि कैसे, अपनी योग्यता, मेरी प्रबुद्धता और रोशनी की वजह से, वह न केवल आध्यात्मिक विषयों पर कुछ अंर्तदृष्टि के साथ बोल सकता था, बल्कि वह मेरे इरादों को समझने में भी समर्थ था। निस्सन्देह, इसमें आन्तरिक व बाहरी वजहें भी शामिल हैं। तथापि, उसकी एक अपूर्णता यह थी कि अपनी प्रतिभा की वजह से, वह प्रायः बकवादी और डींगें मारने वाला बन जाया करता था। परिणाम स्वरूप, उसकी विद्रोहशीलता के कारण, जिसका एक हिस्सा प्रधान स्वर्गदूत का प्रतिनिधित्व करता था, मेरे प्रथम देहधारण के समय, उसने मेरी अवहेलना का हर प्रयास किया। वह उनमें से था जो मेरे वचनों को नहीं जानते, और उसके हृदय से मेरा स्थान पहले ही तिरोहित हो चुका था। ऐसे लोग सीधे तौर पर मेरी दिव्यता का विरोध करते हैं, और मेरे द्वारा मार दिए जाते हैं, तथा अन्त में सिर झुका कर अपने पापों को स्वीकार करते हैं। इसलिए, जब मैंने उसकी दमदार बातों का उपयोग कर लिया—जिसका अर्थ है कि जब उसने कुछ समय तक मेरे लिए काम कर लिया—तो वह एक बार फिर अपने पुराने मार्ग पर चला गया, हालाँकि उसने सीधे तौर पर मेरे वचनों के खिलाफ विद्रोह नहीं किया, फिर भी उसने मेरे आंतरिक मार्गदर्शन और प्रबुद्धता के खिलाफ विद्रोह किया, और इसलिए पहले उसने जो कुछ भी किया वह व्यर्थ हो गया; दूसरे शब्दों में, जिस महिमा के मुकुट के बारे में उसने कहा था, वे खोखले वचन उसकी कल्पना बनकर रह गए थे, क्योंकि आज भी वह मेरे बंधनों के बीच मेरे न्याय के अधीन है।

उपरोक्त उदाहरण से देखा जा सकता है कि जो कोई भी मेरा विरोध करता है (न केवल मेरे देह रूप का बल्कि उससे भी अधिक अहम, मेरे वचनों और मेरे आत्मा का—कहने का अर्थ है, मेरी दिव्यता का विरोध करता है), वह अपनी देह में मेरा न्याय प्राप्त करता है। जब मेरा आत्मा तुम्हें छोड़ देता है, तो तुम सीधे नीचे गिरते हुए अधोलोक में उतर जाते हो। यद्यपि तुम्हारी देह पृथ्वी पर होती है, फिर भी तुम किसी मानसिक विकार से पीड़ित व्यक्ति के समान होते हो : तुम अपनी समझ खो चुके हो, और तुरंत ऐसा महसूस करते हो मानो कि तुम कोई लाश हो, इतना अधिक कि तुम अपनी देह को अविलंब नष्ट कर देने के लिए मुझसे याचना करते हो। तुम में से अधिकांश आत्मवान लोग इन परिस्थितियों की गहरी समझ रखते हैं, इसलिए मुझे विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। अतीत में, जब मैंने सामान्य मानवता में कार्य किया, तो अधिकांश लोग मेरे कोप और प्रताप के विरूद्ध अपना आकलन पहले ही कर चुके थे, और मेरी बुद्धि व स्वभाव की थोड़ी समझ रखते थे। आज, मैं सीधे तौर पर दिव्यता में बोलता और कार्य करता हूँ, और अभी भी कुछ लोग हैं जो अपनी आँखों से मेरे कोप और न्याय को देखेंगे; इसके अतिरिक्त, न्याय के युग के दूसरे भाग का मेरा मुख्य कार्य अपने सभी लोगों को सीधे तौर पर देह में मेरे कर्मों का ज्ञान करवाना, और तुम लोगों को मेरे स्वभाव का अवलोकन करवाना है। तो भी, चूँकि मैं देह में हूँ, इसलिए मैं तुम लोगों की कमज़ोरियों के प्रति विचारशील हूँ। मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग अपनी आत्मा, प्राण और देह से खिलवाड़ करते हुए इन्हें लापरवाही से शैतान को न सौंप दो। जो कुछ तुम लोगों के पास है उसे सँजो कर रखने, और इसे मज़ाक में न लेने में ही भलाई है, क्योंकि ऐसी बातों का संबंध तुम लोगों के भविष्य से है। क्या तुम लोग वास्तव में मेरे वचनों का सही अर्थ समझने में समर्थ हो? क्या तुम लोग वास्तव में मेरी सच्ची भावनाओं के बारे में विचारशील होने में सक्षम हो?

क्या तुम लोग पृथ्वी पर मेरे आशीष का आनंद लेना चाहते हो, ऐसे आशीष का जो स्वर्ग के समान है? क्या तुम लोग मेरी समझ को, मेरे वचनों के आनंद को और मेरे बारे में ज्ञान को, अपने जीवन की सर्वाधिक बहुमूल्य और सार्थक वस्तु के रूप संजोने को तैयार हो? क्या तुम लोग, अपने भविष्य की संभावनाओं पर विचार किए बिना, वास्तव में मेरे प्रति पूरी तरह से समर्पण कर सकते हो? क्या तुम लोग सचमुच अपना जीवन-मरण मेरे अधीन करके एक भेड़ के समान मेरी अगुआई में चलने को राज़ी हो? क्या तुम लोगों में ऐसा कोई है जो यह करने में समर्थ है? क्या ऐसा हो सकता है कि ऐसे सभी लोग जो मेरे द्वारा स्वीकार किए जाते हैं और मेरी प्रतिज्ञाओं को प्राप्त करते हैं, वे ही ऐसे लोग हैं जो मेरा आशीष पाते हैं? क्या तुम लोग इन वचनों से कुछ समझे हो? यदि मैं तुम लोगों की परीक्षा लूँ, तो क्या तुम लोग सचमुच मेरी मर्जी के मुताबिक खुद को आयोजित करने दे सकते हो, और इन परीक्षणों के बीच, मेरे इरादों की खोज और मेरे हृदय को महसूस कर सकते हो? मैं नहीं चाहता कि तुम अधिक मर्मस्पर्शी बातें कहने, या बहुत-सी रोमांचक कहानियाँ सुनाने लायक बनो; बल्कि, मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी उत्तम गवाही देने लायक बनो, पूरी तरह और गहराई से वास्तविकता में प्रवेश कर सको। यदि मैं सीधे तौर पर तुम से न बोलता, तो क्या तुम अपनी सभी बाहरी चीजों को त्याग कर मुझे अपना उपयोग करने दे सकते थे? क्या मुझे इसी वास्तविकता की अपेक्षा नहीं है? मेरे वचनों के अर्थ को कौन ग्रहण कर सकता है? फिर भी मैं कहता हूँ कि तुम लोग अब गलतफहमी में न पड़ो, अपने प्रवेश में एक सकारात्मक तरीका अपनाओ और मेरे वचनों के सार को ग्रहण करो। ऐसा करना तुम लोगों को मेरे वचनों के मिथ्याबोध और मेरे अर्थ के विषय में अस्पष्ट होने से और इस प्रकार मेरे प्रशासनिक आदेशों के उल्लंघन से बचाएगा। मैं चाहता हूँ कि तुम लोग मेरे वचनों में तुम्हारे लिए मेरे जो इरादे हैं, उन्हें ग्रहण करो। अब केवल अपनी भविष्य की संभावनाओं पर ही विचार न करो, और तुम लोगों ने मेरे सम्मुख सभी चीज़ों में परमेश्वर को अपने लिए आयोजन करने देने का जो संकल्प लिया है, ठीक उसी के अनुरूप कार्य करो। वे सभी जो मेरे कुल के भीतर हैं उन्हें जितना अधिक संभव हो उतना करना चाहिए; पृथ्वी पर मेरे कार्य के अंतिम भाग में तुम्हें अपना सर्वोत्तम अर्पण करना चाहिए। क्या तुम वास्तव में ऐसी बातों को अभ्यास में लाने के लिए तैयार हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 4

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 365

पृथ्वी पर सब प्रकार की बुरी आत्माएँ हमेशा किसी विश्राम-स्थल की तलाश में रहती हैं; वे निरंतर उन लोगों के शवों की खोज करती रहती हैं जिन्हें वे निगल सकें। मेरे लोगो! तुम्हें मेरी देखभाल और सुरक्षा के भीतर रहना चाहिए। कभी उच्छृंखल न बनो! कभी दुस्साहसपूर्ण व्यवहार न करो! तुम्हें मेरे घर में अपनी निष्ठा अर्पित करनी चाहिए और केवल निष्ठा से ही तुम दानवों के षड्यंत्रों के विरुद्ध पलटवार कर सकते हो। किन्हीं भी परिस्थितियों में तुम्हें वैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए जैसा तुमने अतीत में किया था, मेरे सामने कुछ करना और मेरी पीठ पीछे कुछ और करना; यदि तुम इस तरह करते हो, तो तुम पहले ही छुटकारे से परे हो। क्या मैं इस तरह के वचन बहुत बार नहीं कह चुका हूँ? बिलकुल इसीलिए क्योंकि मनुष्य की पुरानी प्रकृति सुधार से परे है, मुझे लोगों को बार-बार स्मरण दिलाना पड़ा है। ऊब मत जाना! जो मैं कहता हूँ, वह पूरी तरह से तुम लोगों की नियति की खातिर है! गंदा और मैला-कुचैला स्थान ही वह स्थान होता है जो शैतान को चाहिए होता है; तुम जितने अधिक दयनीय ढंग से सुधार के अयोग्य होते हो, और जितने अधिक उच्छृंखल होते हो और संयम के आगे समर्पण करने से इनकार करते हो, सभी प्रकार की अशुद्ध आत्माएँ तुम्हारे भीतर घुसपैठ करने के किसी भी अवसर का उतना ही अधिक लाभ उठाएँगी। यदि तुम इस बिंदु तक पहुँच चुके हो तो तुम लोगों की निष्ठा कोरी बकवास के अलावा और कुछ नहीं होगी, जिसमें किसी भी प्रकार की कोई वास्तविकता नहीं होगी और तुम लोगों का संकल्प अशुद्ध आत्माओं द्वारा निगल लिया जाएगा और उसे विद्रोह तथा मेरे कार्य में गड़बड़ करने के शैतान के षड्यंत्रों में बदल दिया जाएगा, जिससे तुम किसी भी समय और किसी भी स्थान पर मेरे द्वारा मार गिराए जाओगे। कोई भी इस स्थिति की गंभीरता को नहीं समझता है; वे सब कुछ सुनकर भी इसके लिए बहरे बने रहते हैं और ज़रा भी चौकन्ने नहीं रहते हैं। मैं वह याद नहीं रखता, जो अतीत में किया गया था; क्या तुम सच में अब भी एक बार और “याद न रखकर” अपने प्रति मेरे उदार होने की प्रतीक्षा कर रहे हो? यद्यपि मानवों ने मेरा विरोध किया है, फिर भी मैं इसे उनके विरुद्ध स्मरण नहीं रखूँगा, क्योंकि उनका बहुत छोटा आध्यात्मिक कद है और इसलिए मैंने उनसे अत्यधिक ऊँची अपेक्षाएँ नहीं रखी हैं। मैं बस यही अपेक्षा करता हूँ कि वे उच्छृंखल न हों और यह कि वे संयम के अधीन रहें। क्या ऐसा हो सकता है कि इस एक शर्त को पूरा करना तुम लोगों की क्षमता से बाहर हो? अधिकांश लोग मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं कि मैं उनके लिए और अधिक रहस्य प्रकट करूँ, जिन्हें देखकर वे अपनी आँखें निहाल कर सकें। फिर भी, यदि तुम स्वर्ग के सारे रहस्य समझ भी जाओ, तो क्या? क्या यह मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम बढ़ाएगा? क्या यह मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम जगाएगा? मैं मानवों को कम नहीं आँकता हूँ, न ही मैं बिना सोचे-विचारे उनके बारे में किसी निर्णय पर पहुँचता हूँ। यदि मानवों की वास्तविक परिस्थितियाँ ये नहीं होतीं, तो मैं इतनी आसानी से उन्हें ऐसे तमगों के मुकुट नहीं पहनाता। पीछे मुड़कर अतीत के बारे में सोचो : कितनी बार मैंने तुम लोगों पर लाँछन लगाए हैं? कितनी बार मैंने तुम लोगों को कम आँका है? कितनी बार मैंने तुम लोगों की वास्तविक परिस्थितियों पर ध्यान दिए बिना तुम लोगों की पड़ताल की है? कितनी बार मेरे कथन तुम लोगों को पूरे हृदय से जीतने में विफल रहे हैं? कितनी बार मैंने तुम लोगों के भीतर के तारों को गहराई से छेड़े बिना कोई बात की है? तुम लोगों में से किसने मेरे वचन भय और सिहरन के बिना पढ़े हैं, इस बात को लेकर अत्यंत भयभीत महसूस करते हुए कि मैं तुम्हें अथाह कुंड में मार गिराऊँगा? कौन मेरे वचनों के कारण परीक्षण नहीं सहता है? मेरे कथनों के भीतर अधिकार विद्यमान है, किंतु यह मानवों पर यूँ ही न्याय पारित करने के लिए नहीं है; बल्कि उनकी असल परिस्थितियों को देखते हुए मैं निरंतर उनके सामने अपने वचनों में निहित अर्थ प्रकट करता रहता हूँ। तथ्य की बात करें, तो क्या कोई ऐसा है, जो मेरे वचनों से मेरी सर्वशक्तिमत्ता को जानने में सक्षम हो? क्या कोई ऐसा है, जो मेरे वचनों में मौजूद शुद्ध सोने को समझ सके? मैंने अनगिनत वचन कहे हैं—क्या किसी ने कभी उन्हें सँजोया है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 10

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 366

मैं प्रतिदिन खड़े होकर ब्रह्मांड को देखता हूँ, और मनुष्य के जीवन का अनुभव करते हुए तथा मनुष्य के हर कर्म का नजदीक से अध्ययन करते हुए विनम्रतापूर्वक खुद को अपने निवास-स्थान में छिपा लेता हूँ। किसी ने भी कभी अपने आपको वास्तव में मुझे अर्पित नहीं किया है; किसी ने भी कभी सत्य का अनुसरण नहीं किया है। कोई भी कभी मेरे प्रति ईमानदार नहीं रहा है, न ही किसी ने भी कभी मेरे सम्मुख संकल्प किए हैं और फिर अपने कर्तव्य का पालन किया है। किसी ने भी कभी मुझे अपने भीतर निवास नहीं करने दिया है, न ही मुझे उतना महत्त्व दिया है जितना वह अपने जीवन को देता है। किसी ने भी कभी, व्यावहारिक वास्तविकता में, वह सब नहीं देखा है जो मेरी दिव्यता है; कोई भी कभी स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर के संपर्क में रहने का इच्छुक नहीं रहा है। जब समुद्र मनुष्यों को पूर्णतः लील लेता है, तो मैं उन्हें उस ठहरे हुए समुद्र से बचाता हूँ और नए सिरे से जीने का अवसर देता हूँ। जब लोग जीने का आत्मविश्वास खो देते हैं, तो मैं उन्हें जीने का साहस देते हुए मृत्यु के कगार से खींच लाता हूँ, ताकि वे मेरा अपने अस्तित्व की नींव के रूप में इस्तेमाल कर सकें। जब लोग मेरे खिलाफ विद्रोह करते हैं, तो मैं उन्हें उनके विद्रोह में से अपने आप को ज्ञात करवाता हूँ। उनकी पुरानी प्रकृति और अपनी दया के आलोक में, मैं उन्हें मृत्यु प्रदान करने के बजाय पश्चात्ताप करने और नई शुरुआत करने देता हूँ। जब वे अकाल से पीड़ित होते हैं, तो भले ही उनके शरीर में एक ही साँस बची हो, मैं उन्हें शैतान की प्रवंचना का शिकार बनने से बचाते हुए मृत्यु से छुड़ा लेता हूँ। कितनी ही बार लोगों ने मेरा हाथ देखा है; कितनी ही बार उन्होंने मेरी दयालु मुखाकृति और मेरा मुस्कुराता हुआ चेहरा देखा है; और कितनी ही बार उन्होंने मेरा प्रताप और कोप देखा है। यद्यपि मनुष्यों ने मुझे कभी नहीं जाना है, फिर भी मैं उनकी कमजोरियों का लाभ उठाते हुए जानबूझकर उत्तेजित नहीं होता। मनुष्यों के कष्टों के अनुभव ने मुझे उनकी कमजोरियों के प्रति सहानुभूति रखने में सक्षम बनाया है। मैं केवल लोगों के विद्रोह और उनकी कृतघ्नता की प्रतिक्रिया में ही विभिन्न मात्राओं में ताड़ना देता हूँ।

जब लोग व्यस्त होते हैं तो मैं अपने आपको छिपा लेता हूँ, और उनके खाली समय में अपने आपको प्रकट करता हूँ। लोग कल्पना करते हैं कि मैं सब कुछ जानता हूँ; वे मुझे ऐसा स्वयं परमेश्वर मानते हैं, जो सभी प्रार्थनाएँ स्वीकार करता है। इसलिए अधिकतर लोग मेरे सामने केवल परमेश्वर की सहायता माँगने आते हैं, मुझे जानने की इच्छा से नहीं। बीमारी की तीव्र वेदना में लोग अविलंब मेरी सहायता के लिए याचना करते हैं। विपत्ति के समय वे अपनी पीड़ा से बेहतर ढंग से छुटकारा पाने के लिए अपनी सारी परेशानियाँ अपनी पूरी शक्ति से मुझे बताते हैं। लेकिन एक भी मनुष्य सुख की स्थिति में होने पर मुझसे प्रेम करने में समर्थ नहीं हुआ है; एक भी व्यक्ति ने अपने शांति और आनंद के समय में मुझसे संपर्क नहीं किया है, ताकि मैं उसकी खुशी में शामिल हो सकूँ। जब लोगों के छोटे परिवार खुशहाल और सकुशल होते हैं, तो वे मुझे बहुत पहले ही दरकिनार कर देते हैं या मेरा प्रवेश निषिद्ध करते हुए मुझ पर अपने द्वार बंद कर देते हैं, ताकि वे अपने परिवारों की समृद्ध खुशी का आनंद ले सकें। मनुष्य का मन अत्यंत संकीर्ण है, इतना संकीर्ण कि मुझ जैसे प्यारे, दयालु और सुगम परमेश्वर को भी स्वीकार नहीं कर पाता। कितनी बार मनुष्यों द्वारा अपनी हँसी-खुशी की बेला में मुझे अस्वीकार किया गया है; कितनी बार लड़खड़ाते हुए मनुष्य ने बैसाखी की तरह मेरा सहारा लिया है; कितनी बार बीमारी से पीड़ित मनुष्यों द्वारा मुझे चिकित्सक की भूमिका निभाने के लिए बाध्य किया गया है। मनुष्य कितने क्रूर हैं! वे सर्वथा अविवेकी और अनैतिक हैं। यहाँ तक कि उनमें वे भावनाएँ भी महसूस नहीं की जा सकतीं जिनसे मनुष्यों के सुसज्जित होने की अपेक्षा की जाती है; उनमें मानवता का नामोनिशान भी लगभग नहीं है। अतीत का विचार करो और वर्तमान से उसकी तुलना करो : क्या तुम लोगों के भीतर कोई बदलाव हो रहा है? क्या तुमने अपने अतीत की कुछ चीजें छोड़ी हैं? या वह अतीत अभी बदला जाना बाकी है?

मैंने मनुष्यों के संसार की ऊँच-नीच का अनुभव करते हुए पर्वत-शृंखलाएँ और नदियों की घाटियाँ लाँघी हैं। मैं उनके बीच घूमा हूँ और कई वर्षों तक उनके बीच रहा हूँ, फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्यों का स्वभाव थोड़ा-सा ही बदला है। और यह ऐसा है, मानो लोगों की पुरानी प्रकृति ने उनमें जड़ पकड़ ली हो और अंकुरित हो गई हो। वे उस पुराने स्वभाव को कभी नहीं बदल पाते, वे उसे केवल उसकी मूल नींव पर थोड़ा-सा सुधारते हैं। जैसा कि लोग कहते हैं, सार नहीं बदला है, किंतु रूप बहुत बदल गया है। सभी लोग मुझे मूर्ख बनाने और चकित करने का प्रयास करते प्रतीत होते हैं, ताकि झाँसा देकर मेरी सराहना पा सकें। मैं मनुष्य की चालबाजी की न तो प्रशंसा करता हूँ, न ही उस पर ध्यान देता हूँ। अचानक आगबबूला होने के बजाय मैं देखने किंतु ध्यान न देने का रवैया अपनाता हूँ। मैं मानवजाति को एक निश्चित मात्रा तक छूट देने और तत्पश्चात् सभी मनुष्यों से एक-साथ व्यवहार करने की योजना बनाता हूँ। चूँकि सभी मनुष्य बेकार अभागे हैं, जो स्वयं से प्रेम नहीं करते और स्वयं को बिल्कुल भी नहीं सँजोते, तो फिर वे मुझसे एक बार फिर दया और प्रेम दिखाने की अपेक्षा क्यों करते हैं? बिना अपवाद के, मनुष्य स्वयं को नहीं जानते, न ही वे अपना मोल समझते हैं। उन्हें अपने आप को तराजू में रखकर तोलना चाहिए। मनुष्य मुझ पर कोई ध्यान नहीं देते, इसलिए मैं भी उन्हें गंभीरता से नहीं लेता हूँ। वे मुझ पर कोई ध्यान नहीं देते, इसलिए मुझे भी उन पर ज्यादा परिश्रम से कार्य करने की आवश्यकता नहीं है। क्या यह दोनों ही स्थितियों में लाभ पाना नहीं है? क्या यह तुम लोगों का, मेरे लोगों का वर्णन नहीं करता? तुममें से किसने मेरे सम्मुख संकल्प लेकर उन्हें बाद में छोड़ा नहीं है? किसने निरंतर नए संकल्प लेने के बजाय मेरे सामने टिकाऊ संकल्प लिए हैं? मनुष्य हमेशा अपनी सहूलियत के समय मेरे सम्मुख संकल्प करते हैं और विपत्ति के समय उन्हें छोड़ देते हैं; फिर, बाद में, वे अपना संकल्प दोबारा उठा लेते हैं और मेरे सम्मुख स्थापित कर देते हैं। क्या मैं इतना अधम हूँ कि मनुष्य द्वारा कूड़े के ढेर से उठाए गए इस कचरे को यूँ ही स्वीकार कर लूँगा? कुछ मनुष्य अपने संकल्पों पर अडिग रहते हैं, कुछ अटल बने रहते हैं और कुछ बलिदान के रूप में मुझे अपनी सबसे बहुमूल्य चीजें अर्पित करते हैं। क्या तुम सभी लोग इसी तरह के नहीं हो? यदि, तुम राज्य में मेरे लोगों के एक सदस्य के रूप में, अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो, तो तुम लोग मेरे द्वारा ठुकरा दिए जाओगे!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 14

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 367

समस्त मनुष्य आत्मज्ञान से रहित प्राणी हैं, और वे स्वयं को जानने में असमर्थ हैं। फिर भी, वे अन्य सभी को बहुत करीब से जानते हैं, मानो दूसरों के द्वारा की और कही गई हर चीज़ का “निरीक्षण” पहले उन्होंने ही ठीक उन्हीं के सामने किया हो और करने से पहले उनका अनुमोदन प्राप्त किया गया हो। परिणामस्वरूप, ऐसा लगता है, मानो उन्होंने अन्य सभी की, उनकी मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं तक, पूरी नाप-तौल कर ली हो। सभी मनुष्य ऐसे ही हैं। भले ही उन्होंने राज्य के युग में प्रवेश कर लिया है, परंतु उनका स्वभाव अपरिवर्तित बना हुआ है। वे मेरे सामने अब भी वैसा ही करते हैं, जैसा मैं करता हूँ, परंतु मेरी पीठ पीछे वे अपने विशिष्ट “व्यापार” में संलग्न होना आरंभ कर देते हैं। लेकिन बाद में जब वे मेरे सम्मुख आते हैं, तो वे पूर्णतः भिन्न व्यक्तियों के समान होते हैं, प्रत्यक्षतः शांत और अविचलित, प्रकृतिस्थ चेहरे और संतुलित धड़कन के साथ। क्या वास्तव में यही चीज़ मनुष्यों को हेय नहीं बनाती? बहुत-से लोग दो पूर्णतः भिन्न चेहरे रखते हैं—एक जब वे मेरे सामने होते हैं, और दूसरा जब वे मेरी पीठ पीछे होते हैं। उनमें से कई लोग मेरे सामने नवजात मेमने के समान आचरण करते हैं, किंतु मेरी पीठ पीछे वे भयानक शेरों में बदल जाते हैं, और बाद में वे पहाड़ी पर आनंद से उड़ती छोटी चिड़ियों के समान व्यवहार करते हैं। बहुत-से लोग मेरे सामने उद्देश्य और संकल्प प्रदर्शित करते हैं। बहुत-से लोग प्यास और लालसा के साथ मेरे वचनों की तलाश करते हुए मेरे सामने आते हैं, किंतु मेरी पीठ पीछे वे उनसे अरुचि महसूस करते हैं और उन्हें त्याग देते हैं, मानो मेरे कथन कोई बोझ हों। मैंने कई बार अपने शत्रु द्वारा भ्रष्ट की गई मनुष्यजाति को देखकर उससे आशा रखना छोड़ा है। कई बार मैंने उन्हें रो-रोकर क्षमा माँगते हुए अपने सामने आता देखकर, उनमें आत्मसम्मान के अभाव और उनकी अड़ियल असाध्यता के कारण, क्रोधवश उनके कार्यों के प्रति अपनी आँखें बंद कर ली हैं, यहाँ तक कि उस समय भी, जब उनका हृदय सच्चा और अभिप्राय ईमानदार होता है। कई बार मैंने लोगों को अपने साथ सहयोग करने के लिए पर्याप्त आत्मविश्वास से भरा देखा है, जो मेरे सामने, मेरे आगोश में, उसकी गर्माहट का स्वाद लेते प्रतीत होते हैं। कई बार, अपने चुने हुए लोगों का भोलापन, उनकी जीवंतता और मनोहरता देखकर क्यों नहीं मैं अपने हृदय में इन चीज़ों का खूब आनंद ले पाता। मनुष्य मेरे हाथों में अपने पूर्वनियत आशीषों का आनंद लेना नहीं जानते, क्योंकि वे यह नहीं समझते कि “आशीषों” या “पीड़ा”, दोनों का ठीक-ठीक क्या तात्पर्य है। इस प्रकार लोग मेरा अनुसरण करने में सच्चे नहीं हैं। यदि आने वाला कल नहीं होता, तो मेरी उपस्थिति में तुम लोगों में से कौन गिरती हुई बर्फ जैसा शुद्ध और हरिताश्म जैसा बेदाग होता? क्या ऐसा हो सकता है कि मेरे प्रति तुम लोगों के प्रेम का सौदा स्वादिष्ट भोजन या उत्तम दर्जे के कपड़े के सूट या उच्च पद या शानदार वेतन के बदले किया जाए? क्या इसका सौदा उस प्रेम के बदले किया जा सकता है जो दूसरे तुम्हारे लिए रखते हैं? क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है कि परीक्षणों से गुजरना लोगों से मेरे प्रति उनके प्रेम को छुड़वा देगा? या क्या कष्ट और क्लेश मेरी व्यवस्थाओं के बारे में उनसे शिकायत करवाएंगे? मेरे मुख में स्थित धारदार तलवार को कभी किसी ने वास्तव में समझा नहीं है : वे वास्तव में इसका सच्चा अर्थ समझे बिना केवल इसका सतही अर्थ जानते हैं। यदि मनुष्य वास्तव में मेरी तलवार की धार देखने में सक्षम होते, तो वे चूहों की तरह तेजी से दौड़कर अपने बिलों में घुस जाते। अपने सुन्नपन के कारण मनुष्य मेरे वचनों का कुछ भी सच्चा अर्थ नहीं जानते हैं, और इसलिए वे नहीं जानते हैं कि मेरे कथन कितने विकट हैं या वे मनुष्य की प्रकृति को कितना उजागर करते हैं और उन वचनों द्वारा उनकी भ्रष्टता का कितना न्याय हुआ है। इस प्रकार, मेरे वचनों के प्रति अपनी अधूरी समझ के फलस्वरूप अधिकतर लोगों ने उदासीन रवैया अपना लिया है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 15

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 368

युगों-युगों से, बहुत-से लोग निराश होकर, और अनिच्छा से, इस संसार से चले गए हैं, और बहुत-से लोग आशा और आस्था के साथ इसमें आए हैं। मैंने बहुतों के आने की व्यवस्था की है, और बहुतों को दूर भेजा है। अनगिनत लोग मेरे हाथों से होकर गुज़रे हैं। बहुत-सी आत्माएँ रसातल में डाल दी गई हैं, बहुतों ने देह में जीवन जिया है, और बहुत-सी मर गईं और पृथ्वी पर पुनः जन्मी हैं। परंतु उनमें से किसी को भी आज राज्य के आशीषों का आनंद उठाने का अवसर नहीं मिला। मैंने मनुष्य को इतना अधिक दिया है, फिर भी उसने कम ही कुछ प्राप्त किया है; शैतान की शक्तियों के आक्रमण की वजह से वह मेरी सारी संपदा का आनंद उठा पाने में असमर्थ हो गया है। उसके पास केवल उन्हें देखने का सौभाग्य ही है, किंतु वह उनका पूरा आनंद कभी नहीं उठा पाया। मनुष्य ने स्वर्ग की धन-संपत्ति पाने के लिए अपने शरीर के ख़ज़ाने के भंडार की खोज कभी नहीं की, और इसलिए उसने वे आशीष गँवा दिए जो मैंने उसे दिए थे। क्या मनुष्य का आत्मा बिल्कुल वही अंग नहीं है जो उसे मेरे आत्मा से जोड़ता है? क्यों मनुष्य ने कभी मुझसे अपनी आत्मा के द्वारा मेलजोल नहीं किया है? ऐसा क्यों है कि वह देह में मेरे करीब आता है, किंतु आत्मा में ऐसा नहीं कर पाता है? क्या मेरा सच्चा चेहरा देह है? मनुष्य मेरा सार क्यों नहीं जानता? क्या मनुष्य की आत्मा में सचमुच कभी मेरी कोई छाप नहीं रही है? क्या मैं मनुष्य की आत्मा से पूरी तरह लुप्त हो चुका हूँ? यदि मनुष्य आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश नहीं करता, तो वह मेरे इरादों को कैसे समझ सकता है? मनुष्य की दृष्टि में, क्या वहाँ वह है जो सीधे आध्यात्मिक क्षेत्र को बेध सके? कई बार ऐसा हुआ कि मैंने अपने आत्मा से मनुष्य को पुकारा है, फिर भी मनुष्य ऐसे व्यवहार करता है मानो मैंने उसे डँक मार दिया हो, दूर से मुझे देखते हुए, अत्यधिक डर से कि मैं उसे किसी और संसार में ले जाऊँगा। कई बार ऐसा हुआ कि मैंने मनुष्य की आत्मा में पूछताछ की, फिर भी वह अनजान बना रहता है, गहराई से भयभीत कि मैं उसके घर में घुस जाऊँगा और अवसर का लाभ उठाकर उसका सारा सामान छीन लूँगा। इस प्रकार, वह मुझे बाहर रोक देता है, वहाँ छोड़ देता है जहाँ मेरे सामने एक ठंडे, कसकर बंद दरवाज़े के सिवा कुछ नहीं होता। कई बार ऐसा हुआ कि मनुष्य गिर गया है और मैंने उसे बचाया है, फिर भी वह जागने के बाद तुरंत मुझे छोड़ देता है और, मेरी प्रेमपूर्ण उदारता से अनछुआ, चौकन्नी नज़र से मुझे देखता है; मनुष्य के हृदय को मैंने कभी गरमाया नहीं है। मनुष्य भावनाहीन है, ठंडे खून वाला पशु है। मेरे आलिंगन की गरमाहट में भी वह इससे कभी गहराई से द्रवित नहीं हुआ है। मनुष्य पहाड़ी बनैले इंसान के समान है। उसने मानवजाति के प्रति मेरे दुलार को कभी संजोकर नहीं रखा है। वह मेरे पास आने से आनाकानी करता है, और पहाड़ों के बीच रहना पसंद करता है, जहाँ वह जंगली जानवरों का खतरा झेलता है—फिर भी वह मुझमें शरण लेने का अनिच्छुक है। मैं किसी मनुष्य को बाध्य नहीं करता हूँ : मैं बस अपना कार्य करता हूँ। वह दिन आएगा जब मनुष्य शक्तिशाली महासागर के बीच से तैरकर मेरी तरफ आ जाएगा, ताकि वह पृथ्वी पर सकल संपदा का आनंद उठाए और समुद्र के द्वारा निगले जाने का जोखिम पीछे छोड़ दे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 20

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 369

बहुत से लोग मुझसे सच में प्रेम करना चाहते हैं, किन्तु क्योंकि उनके हृदय उनके स्वयं के नहीं हैं, इसलिए उनका स्वयं पर कोई नियंत्रण नहीं है। बहुत से लोग मेरे द्वारा दिए गए परीक्षणों का अनुभव कर सच में मुझसे प्रेम करते हैं, फिर भी वे यह समझने में अक्षम हैं कि मैं वास्तव में विद्यमान हूँ, और मात्र खालीपन में मुझसे प्रेम करते हैं, ना कि मेरे वास्तविक अस्तित्व के कारण। बहुत से लोग अपने हृदय मेरे सामने रखते हैं और फिर उन पर कोई ध्यान नहीं देते, और इस प्रकार शैतान को जब भी अवसर मिलता है उनके हृदय उसके द्वारा छीन लिए जाते हैं, और तब वे मुझे छोड़ देते हैं। जब मैं अपने वचनों को प्रदान करता हूँ तो बहुत से लोग मुझसे सच में प्रेम करते हैं, मगर मेरे वचनों को अपनी आत्मा में सँजोते नहीं हैं; उसके बजाय वे उनका सार्वजनिक संपत्ति की तरह यूँ ही उपयोग करते हैं और जब उनका मन होता है, तब उन्हें वापस वहीं फेंक देते हैं जहाँ से वे आए थे। सभी लोग दर्द के बीच मुझे खोजते हैं, और परीक्षणों के बीच मेरी ओर देखते हैं; शांति के समय वे मेरा आनंद उठाते हैं, संकट के समय वे मुझे नकारते हैं, जब वे व्यस्त होते हैं मुझे भूल जाते हैं और अपने फुर्सत के समय में वे मुझसे निपटने के लिए कुछ लापरवाही से प्रयास करते हैं। और फिर भी किसी ने भी अपने संपूर्ण जीवन भर मुझसे प्रेम नहीं किया है। मैं चाहता हूँ कि लोग मेरे सम्मुख ईमानदार हों। मैं नहीं कहता कि वे मुझे कोई चीज़ दें, बस इतना ही कहता हूँ कि वे सभी मुझे गंभीरता से लें, कि, मुझे फुसलाने के बजाए, वे बदले में मुझे अपनी ईमानदारी प्राप्त करने दें। मेरी प्रबुद्धता, मेरी रोशनी और मेरे हृदय का रक्त सभी लोगों के बीच व्याप्त है, लेकिन साथ ही मनुष्य के प्रत्येक कार्य का वास्तविक तथ्य और मेरे प्रति उनका धोखा भी सभी लोगों के बीच व्याप्त है। यह ऐसा है मानो मनुष्य के धोखे के अवयव उसके गर्भ में आने के समय से ही उसके साथ रहे हैं, मानो उसने चालबाजी के विशेष कौशल जन्म से ही धारण कर रखे हैं। इसके अलावा, उसने कभी भी इरादों को प्रकट नहीं किया है; किसी ने भी कभी इन चालबाजियों के कौशलों के स्रोत की असलियत नहीं देखी है। परिणामस्वरूप, मनुष्य धोखे का एहसास किए बिना इसके बीच रहता है, और यह ऐसा है मानो वह अपने आपको क्षमा कर देता है, मानो यह उसके द्वारा मुझे जानबूझ कर दिए गए धोखे के बजाए परमेश्वर की व्यवस्था है। क्या यह मनुष्य का मुझसे धोखे का वास्तविक स्रोत नहीं है? क्या यह उसकी चाल नहीं है? मैं कभी भी मनुष्य की झूठी मीठी बातों से संभ्रमित नहीं हुआ हूँ, क्योंकि मैंने बहुत पहले ही उसके सार को जान लिया था। कौन जानता है कि उसके खून में कितनी गंदगी है, और शैतान का कितना ज़हर उसकी मज्जा में है? यह हर गुजरते दिन के साथ बढ़ता जाता है और मनुष्य इसका अभ्यस्त हो जाता है। उसे शैतान की पीड़ाओं का बिल्कुल भी एहसास नहीं होता और इस प्रकार “स्वस्थ अस्तित्व की कला” जानने का उसका मन ही नहीं होता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 21

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 370

मनुष्य प्रकाश के बीच जीता है, फिर भी वह प्रकाश की बहुमूल्यता से अनभिज्ञ है। वह प्रकाश के सार तथा उसके स्रोत से और इस बात से भी अनजान है कि यह प्रकाश किसका है। जब मैं इंसान को प्रकाश देता हूँ, तो मैं तुरन्त ही लोगों की स्थितियों का अवलोकन करता हूँ : प्रकाश के कारण सभी लोग बदल रहे हैं, पनप रहे हैं और उन्होंने अन्धकार को छोड़ दिया है। मैं ब्रह्माण्ड के हर कोने में नज़र डालकर देखता हूँ और पाता हूँ कि पर्वत कोहरे में समा गए हैं, समुद्र शीत में जम गए हैं, और प्रकाश के आगमन की वजह से लोग पूरब की ओर देखते हैं कि शायद उन्हें कुछ अधिक मूल्यवान मिल जाए—फिर भी वे कोहरे के बीच एक सही दिशा पहचान पाने में असमर्थ रहते हैं। चूँकि सारा संसार कोहरे से आच्छादित है, इसलिए जब मैं बादलों के बीच से देखता हूँ, तो मुझे कोई ऐसा इंसान नज़र नहीं आता जो मेरे अस्तित्व को खोज निकालता हो। इंसान पृथ्वी पर किसी चीज़ की तलाश कर रहा है; वह भोजन की तलाश में घूमता-फिरता हुआ प्रतीत होता है; लगता है उसका इरादा मेरे आने का इन्तज़ार करने का है—फिर भी वह मेरे दिन से अनजान है और वह अक्सर पूर्व में केवल प्रकाश की झिलमिलाहट को ही देख पाता है। मेरे चुने असंख्य लोगों के बीच मैं उन लोगों को खोजता हूँ जो सचमुच मेरे इरादों के अनुकूल हैं। मैं अपने चुने असंख्य लोगों के बीच घूमता-फिरता हूँ, उनके बीच रहता हूँ, लेकिन इंसान पृथ्वी पर सुरक्षित और स्वस्थ है, इसलिए ऐसा कोई नहीं जो मेरे इरादों के अनुकूल हो। लोग नहीं जानते कि मेरे इरादों के प्रति विचारशीलता कैसे दिखाएँ, वे मेरे क्रियाकलापों को नहीं देख पाते, वे प्रकाश के भीतर चल-फिर नहीं पाते और प्रकाश से दीप्त नहीं हो पाते। भले ही इंसान कभी मेरे वचनों को सँजोकर रखता था, वह शैतान की साजिशों की असलियत जानने में असमर्थ है; चूँकि इंसान का आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, इसलिए वह वैसा नहीं कर पाता है जैसा उसका दिल चाहता है। इंसान ने कभी भी मुझसे सच्चे दिल से प्रेम नहीं किया है। जब मैं उसे ऊँचा उठाता हूँ, वह अपने आपको अयोग्य समझता है, लेकिन यह कारण उसे प्रेरित नहीं करता कि वह मुझे संतुष्ट करने की कोशिश करे। वह मात्र उस “रुतबे” को अपने हाथों में पकड़े रहता है जो मैंने उसे दिया है और उसे बारीकी से देखता रहता है; मेरी मनोहरता के प्रति असंवेदनशील रहता है और इसके बजाय रुतबा होने के फायदों में लिप्त रहता है। क्या यह मनुष्य की कमी नहीं है? जब पहाड़ खिसकते हैं तो क्या वे तुम्हारे रुतबे की खातिर तुम्हारे अगल-बगल अपना रास्ता बदल सकते हैं? जब पानी बहता है तो क्या वह मनुष्य के रुतबे के सामने रुक सकता है? क्या मनुष्य के रुतबे के द्वारा आकाश और पृथ्वी पलटे जा सकते हैं? मैंने कभी मनुष्य के प्रति बार-बार दया दिखाई थी—फिर भी किसी ने इसे न सँजोया, न ही अनमोल माना। उन्होंने इसे मात्र एक कहानी की तरह सुना या उपन्यास की तरह पढ़ा। क्या मेरे वचन सचमुच इंसान के हृदय को नहीं छूते हैं? क्या मेरे कथनों का वास्तव में कोई प्रभाव नहीं पड़ता है? क्या ऐसा हो सकता है कि कोई भी मेरे अस्तित्व में विश्वास ही नहीं करता है? इंसान खुद से प्रेम नहीं करता है; बल्कि वह मुझ पर आक्रमण करने के लिए शैतान के साथ मिल जाता है और मेरी सेवा करने के लिए शैतान को एक “परिसम्पत्ति” के रूप में इस्तेमाल करता है। मैं शैतान की सभी साजिशों को भाँप लूँगा, ताकि आज के बाद से पृथ्वी के लोग उसके द्वारा गुमराह न हों और उसके अस्तित्व की वजह से मेरा विरोध न करें।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 22

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 371

मेरी नजर में, मनुष्य सभी चीज़ों का शासक है। मैंने उसे कोई कम अधिकार नहीं दिए हैं, उसे पृथ्वी पर सभी चीज़ों, पहाड़ों की घास, जंगल के जानवरों, और जल की मछलियों का प्रबन्ध करने की अनुमति दी है। लेकिन वह इन चीज़ों से खुश होने के बजाए, चिंता से व्याकुल रहता है। उसका पूरा जीवन दुख और भागने-दौड़ने में बीतता है और अपने खालीपन में थोड़ी मौज-मस्ती भी करता रहता है; उसके पूरे जीवन में न तो कोई नए आविष्कार हैं और न ही कोई नया सृजन है। कोई भी अपने आप को इस खोखले जीवन से मुक्त नहीं कर पाता, किसी ने भी सार्थक जीवन की खोज नहीं की है, और न ही किसी ने कभी वास्तविक जीवन का अनुभव नहीं किया है। हालाँकि आज सभी लोग मेरे चमकते हुए प्रकाश में रहते हैं, लेकिन वे स्वर्ग के जीवन के बारे में कुछ नहीं जानते। यदि मैं मनुष्य के प्रति दयालु न रहूँ और उसे न बचाऊँ, तो सबका आना निरर्थक हो जाए, पृथ्वी पर उनके जीवन का कोई अर्थ न रहे, वे यूँ ही व्यर्थ में चले जाएँगे, उनके पास गर्व करने को कुछ न होगा। हर धर्म, समाज के हर वर्ग, हर राष्ट्र और हर सम्प्रदाय के लोग पृथ्वी पर खालीपन को जानते हैं, और वे सभी मुझे खोजते हैं और मेरी वापसी का इंतजार करते हैं—लेकिन जब मैं आता हूँ तो कौन मुझे जान पाता है? मैंने सभी चीज़ें बनायी हैं, इंसान को बनाया है, और आज मैं मनुष्य के बीच आया हूँ। लेकिन, मनुष्य पलटकर मुझ पर ही वार करता है, और मुझसे बदला लेता है। क्या जो कार्य मैं मनुष्य पर करता हूँ वह उसके किसी लाभ का नहीं है? क्या मैं वाकई मनुष्य को संतुष्ट करने योग्य नहीं? मनुष्य मुझे अस्वीकार क्यों करता है? वह मेरे प्रति इतना निरूत्साहित और उदासीन क्यों है? पृथ्वी लाशों से क्यों भरी हुई है? क्या जिस संसार को मैंने मनुष्य के लिए बनाया था उसकी स्थिति वास्तव में ऐसी है? ऐसा क्यों हैं कि मैंने मनुष्य को अतुलनीय समृद्धि दी है, फिर भी वह बदले में मुझे अपने दोनों खाली हाथ दिखा देता है? मनुष्य मुझसे गंभीरता से प्रेम क्यों नहीं करता? मेरी मौजूदगी में वह कभी भी क्यों नहीं होता? क्या मेरे सारे वचन वास्तव में व्यर्थ हैं? क्या मेरे वचन पानी की भाप बनकर उड़ गए? क्यों मनुष्य मेरे साथ सहयोग क्यों नहीं करना चाहता? क्या मेरे दिन का आगमन मनुष्य के लिए वास्तव में मृत्यु का पल है? क्या मैं वास्तव में उस समय मनुष्य को नष्ट कर सकता हूँ जब मेरे राज्य का गठन होता है? मेरी प्रबन्धन योजना के दौरान, कभी किसी ने मेरे इरादों को क्यों नहीं समझा? मनुष्य मेरे मुँह से निकले वचनों को सँजोने के बजाए, उन्हें ठुकराता क्यों है? मैं कभी किसी की निंदा नहीं करता, बस लोगों से इतना कहता हूँ कि वे शांत रहकर आत्म-चिंतन करे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 25

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 372

मनुष्य ने मेरी गर्मजोशी महसूस की है, मनुष्य ने सचमुच मेरी सेवा की है और मनुष्य ने सचमुच मेरे सम्मुख समर्पण किया है, मेरी उपस्थिति में मेरे लिए सब कुछ किया है। फिर भी आज के लोगों द्वारा यह अप्राप्य है; वे अपनी आत्मा में रोने के सिवा कुछ नहीं करते, मानो उन्हें भूखे भेड़िये ने झपट लिया हो, और वे लालसाभरी लाचारी से मुझे बस ताक सकते हैं, बिना रुके मुझे पुकारते हैं। परंतु अंत में, वे अपनी दुर्दशा से बच नहीं पाते हैं। मैं बीती बातों पर सोचता हूँ कि अतीत में किस तरह लोगों ने मेरी उपस्थिति में प्रतिज्ञाएँ की थीं, मेरी उपस्थिति में स्वर्ग और पृथ्वी के नाम पर कसमें खाते थे कि मेरी दयालुता को अपने स्नेह से चुकाएंगे। वे मेरे सम्मुख बिलख-बिलखकर रोते थे, और उनके रोने की चीखें हृदय-विदारक थीं, उन्हें सह पाना कठिन था। उनके संकल्प के कारण, मैं प्रायः लोगों को सहायता प्रदान करता था। अनगिनत बार, लोग मेरे प्रति समर्पण करने के लिए मेरे सम्मुख आए हैं, उनका प्यारा-सा अंदाज भूल पाना कठिन है। अनगिनत बार, उन्होंने मुझसे प्रेम किया है, वे अपनी निष्ठा में अविचल हैं, उनकी सच्ची भावना प्रशंसनीय है। अनगिनत बार, उन्होंने अपने जीवन का बलिदान करने की हद तक मुझसे प्रेम किया है, उन्होंने खुद से अधिक मुझसे प्रेम किया है—और उनकी नेकनीयती देखकर मैंने उनका प्रेम स्वीकार किया है। अनगिनत बार, उन्होंने मेरी उपस्थिति में स्वयं को अर्पित किया है, मेरी खातिर मृत्यु के सामने बेपरवाह रहे हैं, और मैंने उनके ललाट से चिंता मिटाई है और उनके मुखमंडलों को बड़े ध्यान से देखा है। ऐसा अनगिनत बार हुआ है जब मैंने एक संजोए हुए खजाने की तरह उन्हें प्रेम किया है, और ऐसा भी अनगिनत बार हुआ है जब मैंने उनसे अपने शत्रु की तरह नफरत की है। फिर भी, मेरे मन में जो है वह मनुष्य की समझ से बाहर है। जब लोग दुखी होते हैं, मैं उन्हें सांत्वना देने आता हूँ, और जब वे कमजोर होते हैं, उनकी सहायता के लिए मैं उनके पास आ जाता हूँ। जब वे भटक जाते हैं, मैं उन्हें दिशा देता हूँ। जब वे बिलख-बिलखकर रोते हैं, मैं उनके आँसू पोंछता हूँ। परंतु जब मैं उदास होता हूँ, तब कौन मुझे अपने हृदय से सांत्वना दे सकता है? जब मैं चिंता से व्यग्र होता हूँ, तब कौन मेरे हृदय के प्रति विचारशील है? जब मैं दुखी होता हूँ, तब कौन मेरे हृदय के घाव ठीक कर सकता है? जब मुझे किसी की आवश्यकता होती है, तब कौन मेरे साथ सहयोग करने के लिए स्वेच्छा से आगे आता है? क्या ऐसा हो सकता है कि मेरे प्रति लोगों का पूर्व रवैया अब हमेशा के लिए समाप्त हो चुका है? ऐसा क्यों है कि इसका लेशमात्र भी उनकी स्मृतियों में नहीं बचा है? ऐसा कैसे है कि लोग इन सब चीजों को भूल गए हैं? क्या यह सब मानवजाति के शत्रु द्वारा उसकी भ्रष्टता की वजह से नहीं है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 27

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 373

परमेश्वर ने मानवजाति बनाई, किन्तु जब वह मानव दुनिया में आता है, तो वही लोग उसका विरोध करने की कोशिश करते हैं, उसे अपने इलाके से निकाल देते हैं, मानो कि वह दुनिया में भटकता कोई अनाथ हो, या राष्ट्रविहीन वैश्विक व्यक्ति हो। किसी को भी परमेश्वर से लगाव नहीं है, कोई भी वास्तव में उसे सच्चा प्यार नहीं करता, किसी ने भी उसके आने का स्वागत नहीं किया है। बल्कि जब वे परमेश्वर को आता देखते हैं, तो उनके हर्षित चेहरे पलक झपकते ही उदास हो जाते हैं, मानो अचानक कोई तूफान आ रहा हो, या परमेश्वर उनके परिवार की खुशियाँ छीन लेगा, मानो परमेश्वर ने मानवजाति को कभी भी आशीष नहीं दिया हो, बल्कि मानवजाति को केवल दुख ही दिया हो। इसलिए, लोगों के मन में, परमेश्वर उनके लिए वरदान न होकर, कोई ऐसा है जो हमेशा उन्हें शाप देता रहता है। इसलिए, लोग न तो उस पर ध्यान देते हैं, न ही उसका स्वागत करते हैं, वे उसके प्रति हमेशा उदासीन रहते हैं, हमेशा से ऐसा ही रहा है। क्योंकि मानवजाति के हृदय में ये बातें बैठी हुई हैं, इसलिए परमेश्वर कहता है कि वे अविवेकी और अनैतिक हैं, यहाँ तक कि उनमें वे भावनाएँ भी महसूस नहीं की जा सकतीं जिनसे मनुष्यों के सुसज्जित होने की अपेक्षा की जाती है। इंसान को परमेश्वर की भावनाओं की कोई कद्र नहीं है, बल्कि वह परमेश्वर से निपटने के लिए तथाकथित “धार्मिकता” का उपयोग करता है। मानवजाति कई वर्षों से ऐसी ही है, यही कारण है कि परमेश्वर ने कहा है कि उसका स्वभाव नहीं बदला है। यह दिखाता है कि उसमें कोई सार नहीं है। ऐसा कहा जा सकता है कि मनुष्य निकम्मा और नाकारा है, क्योंकि उसने स्वयं को सँजोकर नहीं रखा है। यदि वह स्वयं से प्यार करके खुद को ही रौंदता है, तो क्या यह उसके निकम्मेपन को नहीं दिखाता? मानवजाति एक ऐसी अनैतिक स्त्री की तरह है जो स्वयं के साथ खेल खेलती है और दूषित किए जाने के लिए स्वेच्छा से स्वयं को दूसरों को सौंप देती है। किन्तु फिर भी, लोग नहीं जानते हैं कि वे कितने अधम हैं। उन्हें दूसरों के लिए कार्य करने, या दूसरों के साथ बातचीत करने, स्वयं को दूसरों के नियंत्रण में करने में खुशी मिलती है; क्या यह वास्तव में मानवजाति की गंदगी नहीं है? यद्यपि मैंने मानवजाति के बीच जीवन का अनुभव नहीं किया है, और मुझे वास्तव में मानव जीवन का अनुभव नहीं रहा है, फिर भी मुझे मनुष्य की हर हरकत, उसके हर क्रिया-कलाप, हर वचन और हर कर्म की एकदम स्पष्ट समझ है। मैं मानवजाति का उसके बेहद शर्मिंदा करने की हद तक गहन-विश्लेषण कर सकता हूँ, इस सीमा तक कि वे अपनी चालाकियाँ दिखाने का और अपनी वासना को हवा देने की धृष्टता फिर न करे। इंसान घोंघे की तरह, जो अपने खोल में छिपा रहता है, अब कभी अपनी बदसूरत स्थिति को उजागर करने का धृष्टता नहीं करता। चूँकि मानवजाति स्वयं को नहीं जानती, इसलिए उसका सबसे बड़ा दोष अपने आकर्षण का दूसरों के सामने स्वेच्छा से जुलूस निकालनाहै, अपने कुरूप चेहरे का जूलूस निकालना है; परमेश्वर इस चीज़ से सबसे ज्यादा घृणा करता है। क्योंकि लोगों के आपसी संबंध असामान्य हैं, लोगों का आपसी व्यवहार ही सामान्य नहीं है, तो परमेश्वर और इंसान के बीच सामान्य संबंध की तो बात ही दूर है। परमेश्वर ने बहुत कुछ कहा है, और ऐसा करने में उसका मुख्य उद्देश्य इंसान के हृदय में अपनी जगह बनाना है, लोगों को उनके हृदय में बसी सभी मूर्तियों से मुक्त करना है। ताकि परमेश्वर समस्त मानवजाति पर सामर्थ्य का उपयोग कर सके और पृथ्वी पर अपने होने का उद्देश्य पूरा कर सके।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों का अनावरण, अध्याय 14

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