जीवन में प्रवेश II
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 406
जब लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उससे प्रेम करते हैं और उसे संतुष्ट करते हैं, तो वे अपने हृदय से परमेश्वर के आत्मा से जुड़ते हैं और इसके द्वारा उसकी संतुष्टि प्राप्त करते हैं; परमेश्वर के वचनों से जुड़ने के लिए वे अपने हृदय का उपयोग करते हैं और इस प्रकार वे उसके आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाते हैं। अगर तुम एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीना और परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले उसे अपना हृदय देना चाहिए। अपने हृदय को उसके सामने शांत करने और जब तुम्हारा पूरा हृदय उसकी ओर झुक जाएगा, उसके बाद ही तुम धीरे-धीरे एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन विकसित करने में सक्षम होगे। अगर परमेश्वर में अपने विश्वास में लोग उसे अपना हृदय नहीं देते, अगर उनका हृदय उसके साथ नहीं होता और वे उसके दायित्व को अपना दायित्व नहीं मानते, तो जो कुछ भी वे करते हैं, वह सब परमेश्वर को धोखा देने का कार्य है और वही कार्य है जो धार्मिक लोग करते हैं, और इसे परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं होगी। परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति से कुछ हासिल नहीं कर सकता, वह परमेश्वर के काम में केवल एक विषमता का कार्य कर सकता है। वे लोग परमेश्वर के घर में सजावट की तरह होते हैं—वे जगह घेरने वाले होते हैं, कचरा होते हैं, और परमेश्वर उनका कोई उपयोग नहीं करता। न केवल उनमें पवित्र आत्मा के काम करने की कोई संभावना नहीं है, बल्कि उन्हें पूर्ण किए जाने का भी कोई मूल्य नहीं है। इस प्रकार का व्यक्ति असली चलती-फिरती लाश होता है। उसका कोई भी हिस्सा पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता—उसे शैतान द्वारा पूरी तरह से अधिकृत और गहराई से भ्रष्ट किया जा चुका है। परमेश्वर इन लोगों को निकाल देगा। आज जब पवित्र आत्मा लोगों का इस्तेमाल करता है, तो काम पूरे करवाने के लिए वह न सिर्फ उनके वांछित हिस्सों का उपयोग करता है—बल्कि वह उनके उन हिस्सों को पूर्ण भी करता और बदलता है, जो अवांछित हैं। अगर तुम अपना हृदय परमेश्वर में उँडेलने और उसे उसके सामने शांत करने में सक्षम हो, तो तुम्हारे पास पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने और उसकी प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करने का अवसर और योग्यता होगी। इससे भी बढ़कर तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हारी कमियों की भरपाई किए जाने का अवसर मिलेगा। जब तुम अपना हृदय परमेश्वर को देते हो, तो सकारात्मक पक्ष में, तुम अधिक गहन प्रवेश और अंतर्दृष्टि का एक उच्च तल प्राप्त कर सकोगे। नकारात्मक पक्ष में, तुम्हें अपनी कमियों और खामियों का बहुत अधिक ज्ञान प्राप्त हो जाएगा और परमेश्वर के इरादे पूरे करने के लिए ज्यादा लालायित होगे और ज्यादा खोजोगे। इसके अलावा, तुम नकारात्मक नहीं रहोगे, सक्रिय रूप से प्रवेश कर पाओगे। यह दर्शाता है कि तुम एक सही व्यक्ति हो। उस स्थिति में, जब तुम्हारा हृदय परमेश्वर के सामने शांत हो, तब तुम पवित्र आत्मा से स्वीकृति प्राप्त करते हो या नहीं, और तुम परमेश्वर को खुश कर पाते हो या नहीं, यह महत्वपूर्ण रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि तुम सक्रिय रूप से प्रवेश कर सकते हो या नहीं। जब पवित्र आत्मा लोगों को प्रबुद्ध कर उनका उपयोग करता है, तो वह उन्हें कभी नकारात्मक नहीं बनाता, वह हमेशा उन्हें अग्रसक्रिय बनाता है और सुधरने के लिए प्रयास करने हेतु प्रेरित करता है। और जब वह ऐसा करता है, तब भी लोगों में कमजोरियाँ होती हैं, लेकिन वे उनके अनुसार नहीं जीते। वे अपनी जीवन-प्रगति ताक पर नहीं रखते और परमेश्वर के इरादे पूरे करने की कोशिश जारी रखते हैं। यह एक मानक है। अगर तुम इसे प्राप्त कर सकते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने पवित्र आत्मा की उपस्थिति प्राप्त कर ली है। अगर कोई व्यक्ति हमेशा नकारात्मक रहता है और प्रबुद्धता प्राप्त करने तथा स्वयं को जानने के बाद भी नकारात्मक और निष्क्रिय बना रहता है और उठ खड़ा होकर परमेश्वर के साथ सहयोग करने में अक्षम रहता है, तो उसने केवल परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त किया है, लेकिन पवित्र आत्मा की उपस्थिति प्राप्त नहीं की है। उसकी नकारात्मकता का अर्थ है कि उसका हृदय परमेश्वर की तरफ नहीं मुड़ा और उसकी आत्मा परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित नहीं की गई है। इसे सभी को समझना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 407
अनुभव के जरिये यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर के सामने अपना हृदय शांत करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह लोगों के आध्यात्मिक जीवन और उनकी जीवन-प्रगति के मुद्दों से संबंधित है। तुम्हारे द्वारा सत्य का अनुसरण और स्वभावगत परिवर्तन तभी फलदायक होगा, जब तुम्हारा हृदय परमेश्वर के सामने शांत रहेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम परमेश्वर के सामने एक बोझ लेकर आए हो, क्योंकि तुम हमेशा महसूस करते हो कि तुममें बहुत कमी है, कि ऐसे कई सत्य हैं जिन्हें तुम्हें जानने की जरूरत है, ऐसी बहुत ज्यादा वास्तविकता है जिसका तुम्हें अनुभव करने की आवश्यकता है, और कि तुम्हें परमेश्वर के इरादे के प्रति विचारशीलता दिखानी चाहिए। ये बातें हमेशा तुम्हारे दिमाग में रहती हैं, ऐसा लगता है मानो वे तुम पर इतने जोर से दबाव डाल रही हों कि तुम्हारे लिए साँस लेना मुश्किल हो गया हो और इस प्रकार तुम्हारा हृदय बोझिल महसूस करता हो (हालाँकि तुम नकारात्मक दशा में नहीं होते)। केवल ऐसा व्यक्ति ही परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता स्वीकार करने और परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने के योग्य है। यह उसके बोझ के कारण है, क्योंकि उसका हृदय बोझिल महसूस करता है, और यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के सामने जो कीमत उसने चुकाई है और जो पीड़ा झेली है, उसके कारण वह उसकी प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करता है। कारण, परमेश्वर किसी के साथ विशेष व्यवहार नहीं करता। लोगों के प्रति अपने व्यवहार में वह हमेशा निष्पक्ष रहता है, लेकिन वह लोगों को मनमाने ढंग से और बिना किसी शर्त के भी नहीं देता। यह उसके धार्मिक स्वभाव का एक पहलू है। वास्तविक जीवन में अधिकांश लोग अभी तक इस स्तर तक नहीं पहुँचे हैं। कम से कम, उनका हृदय अभी पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ना बाकी है, इसलिए उनके जीवन स्वभाव में अभी तक ज्यादा परिवर्तन नहीं आया है। इसका कारण यह है कि वे केवल परमेश्वर के अनुग्रह में रहते हैं और उन्हें अभी पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करना शेष है। परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने के लिए लोगों को जो मानदंड पूरे करने चाहिए, वे इस प्रकार हैं : उनका हृदय परमेश्वर की ओर मुड़ना चाहिए, उन्हें उसके वचनों का बोझ उठाना चाहिए, उनके हृदय में तड़प होनी चाहिए और उनमें सत्य खोजने का संकल्प होना चाहिए। केवल ये लोग ही पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हैं और ये ही अक्सर उसकी प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करते हैं। जिन लोगों का परमेश्वर इस्तेमाल करता है, वे बाहर से विवेकहीन प्रतीत होते हैं और दूसरों के साथ उनके संबंध सामान्य नहीं होते, लेकिन वे सावधानी से, मर्यादा के साथ बोलते हैं और परमेश्वर के सामने हमेशा शांत हृदय रख पाते हैं। यह ठीक वैसा ही व्यक्ति है, जो पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने के योग्य है। ये लोग जो “विवेकहीन” हैं, जिनके बारे में परमेश्वर बात करता है, दूसरों के साथ सामान्य संबंध रखते प्रतीत नहीं होते, और वे बाहरी प्रेम या बाहरी अभ्यासों की परवाह नहीं करते, लेकिन जब वे आध्यात्मिक मामलों पर संगति करते हैं, तो वे अपना हृदय खोल पाने में सक्षम होते हैं और निस्स्वार्थ भाव से दूसरों को वह रोशनी और प्रबुद्धता प्रदान करते हैं, जो उन्होंने परमेश्वर के सामने अपने वास्तविक अनुभवों से हासिल की होती है। इस तरह वे परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करते हैं और उसके इरादे पूरे करते हैं। जब दूसरे लोग उनकी निंदा और उपहास करते हैं, तो वे बाहरी लोगों, घटनाओं या चीजों से अप्रभावित रह सकते हैं और परमेश्वर के सामने शांत रह सकते हैं। ऐसा लगता है, मानो उनके पास अपनी अनूठी अंतर्दृष्टियाँ हों। दूसरे लोग चाहे कुछ भी करें, उनका हृदय कभी परमेश्वर को नहीं छोड़ता। जब दूसरे लोग बात कर रहे और हँस रहे होते हैं, उनका हृदय परमेश्वर के सामने रहता है; वे उसके वचनों पर विचार करते रहते हैं या अपने हृदय में चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना करते रहते हैं, उसकी इच्छाओं का पता लगाते रहते हैं। ये लोग दूसरों के साथ सामान्य पारस्परिक संबंध बनाए रखने को महत्व नहीं देते और ऐसा लगता है कि उनके पास सांसारिक आचरण का कोई फलसफा नहीं है। वे जीवंत, प्यारे और मासूम दिखाई देते हैं, लेकिन उनमें एक खास किस्म की शांति भी रहती है। यह उस जैसे व्यक्ति का स्वरूप है जिसका उपयोग परमेश्वर करता है। सांसारिक आचरण के फलसफे या “सामान्य समझ” जैसी चीजें इस प्रकार के व्यक्ति में काम ही नहीं करतीं। उसने अपना पूरा हृदय परमेश्वर के वचनों में उँड़ेल दिया है, और लगता है, उसके हृदय में सिर्फ परमेश्वर है। यह उस प्रकार का व्यक्ति है, जिसे परमेश्वर “विवेकहीन” व्यक्ति के रूप में संदर्भित करता है और ठीक इसी प्रकार के व्यक्ति का परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जाता है। परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति की पहचान इस प्रकार है : चाहे कोई भी समय या जगह हो, उसका हृदय हमेशा परमेश्वर के सामने रहता है, और दूसरे चाहे जितने भी अनैतिक हों, या दूसरे लोग जितने भी कामवासना में लिप्त हों और जितने भी देह में लिप्त हों, इस व्यक्ति का हृदय कभी भी परमेश्वर को नहीं छोड़ता, और वह भीड़ के पीछे नहीं जाता। केवल ऐसा ही व्यक्ति परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त होता है, और केवल इसी प्रकार का व्यक्ति पवित्र आत्मा द्वारा पूर्ण किया जाता है। अगर तुम इसे प्राप्त करने में असमर्थ हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने या पवित्र आत्मा द्वारा पूर्ण किए जाने के योग्य नहीं हो।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 408
अगर तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना चाहते हो तो तुम्हारा हृदय उसकी तरफ मुड़ना चाहिए; फिर इसी बुनियाद पर तुम दूसरे लोगों के साथ भी सामान्य संबंध रखोगे। अगर परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य संबंध नहीं है तो चाहे तुम दूसरों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए कुछ भी कर लो, चाहे तुम जितनी भी मेहनत कर लो या जितना भी प्रयास लगा दो, यह सब सांसारिक आचरण का इंसानी फलसफा होगा। तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार सामान्य पारस्परिक संबंध स्थापित करने के बजाय लोगों के बीच अपनी स्थिति कायम रख रहे होगे और इंसानी दृष्टिकोणों और इंसानी फलसफों के जरिये उनकी प्रशंसा प्राप्त कर रहे होगे। अगर तुम दूसरे लोगों के साथ अपने संबंधों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हो, बल्कि इसके बजाय परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाए रखते हो और तुम परमेश्वर को अपना हृदय देने और उसके प्रति समर्पण करना सीखने के लिए तैयार हो, तो सभी लोगों के साथ तुम्हारे संबंध भी स्वाभाविक रूप से सामान्य हो जाएँगे। तब ये संबंध देह पर नहीं, बल्कि परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर निर्मित होंगे। दूसरे लोगों के साथ तुम्हारा लगभग कोई दैहिक मिलना-जुलना नहीं होगा, बल्कि आध्यात्मिक स्तर पर संगति होगी और साथ ही आपसी प्रेम, सांत्वना और आपूर्ति होगी। यह सब परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा की बुनियाद पर किया जाता है—ये संबंध इंसानी सांसारिक आचरण के फलसफों के जरिये नहीं बनाए रखे जाते पर ये स्वाभाविक रूप से तब बनते हैं, जब तुम्हारे पास परमेश्वर के लिए बोझ की भावना होती है। उनके लिए तुम्हारी ओर से किसी इंसानी प्रयास की आवश्यकता नहीं होती और तुम्हें सिर्फ परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता होती है। क्या तुम परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होने के लिए तैयार हो? क्या तुम उसके सामने “विवेक रहित” व्यक्ति बनने के लिए तैयार हो? क्या तुम अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को देने और अन्य लोगों के बीच अपनी स्थिति की परवाह न करने के लिए तैयार हो? तुम जिन लोगों से बातचीत करते हो, उन सभी में से किसके साथ तुम्हारे सबसे अच्छे संबंध हैं? किसके साथ तुम्हारे सबसे खराब संबंध हैं? क्या लोगों के साथ तुम्हारे संबंध सामान्य हैं? क्या तुम सभी लोगों से समान व्यवहार करते हो? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध तुम्हारे सांसारिक आचरण के फलसफे के अनुसार निभाए जाते हैं, या वे परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर बने हैं? जब लोग परमेश्वर को अपना हृदय नहीं देते, तो उनकी आत्मा सुस्त, सुन्न और अचेत हो जाती है। ऐसे लोग कभी परमेश्वर के वचनों को नहीं समझेंगे, उनका परमेश्वर के साथ कभी सामान्य संबंध नहीं होगा, और वे कभी अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल नहीं करेंगे। अपना स्वभाव बदलना अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को देने और उसके वचनों से प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करने की प्रक्रिया है। परमेश्वर का कार्य लोगों को सक्रिय रूप से प्रवेश करने देता है और अपने उन नकारात्मक हिस्सों को जान लेने के बाद उन्हें उनका त्याग करने में सक्षम बनाता है। जब तुम अपना हृदय परमेश्वर को दे देते हो, तो तुम हर बार यह महसूस करने में सक्षम होगे कि तुम्हारी आत्मा थोड़ी प्रेरित हुई है, और अगर परमेश्वर तुम्हें जरा-सी भी प्रबुद्धता और रोशनी प्रदान करता है, तो तुम उसे जानने में सक्षम होगे। अगर तुम दृढ़ रहते हो, तो तुम धीरे-धीरे पवित्र आत्मा द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश कर जाओगे। तुम्हारा हृदय परमेश्वर के सामने जितना शांत होगा, तुम्हारी आत्मा उतनी ही अधिक संवेदनशील और नाज़ुक होगी, उतनी ही अधिक वह यह महसूस कर पाएगी कि पवित्र आत्मा किस तरह उसे प्रेरित करता है, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध उतना ही अधिक सामान्य हो जाएगा। सामान्य पारस्परिक संबंध अपना हृदय परमेश्वर की ओर मोड़ने की नींव पर स्थापित होते हैं, इंसानी प्रयासों के जरिये नहीं। अगर व्यक्ति के हृदय से परमेश्वर अनुपस्थित है, तो अन्य लोगों के साथ उसके संबंध केवल दैहिक हैं। वे सामान्य नहीं हैं, वे कामुक आसक्तियाँ हैं, परमेश्वर उनसे घृणा और बेइंतहा नफरत करता है। अगर तुम कहते हो कि तुम्हारी आत्मा प्रेरित हुई है, लेकिन तुम केवल उन्हीं लोगों के साथ संगति करना चाहते हो जो तुम्हें पसंद हैं और जिनका तुम सम्मान करते हो, और जो लोग तुम्हें पसंद नहीं हैं, जब वे तुमसे कुछ खोजने के लिए आते हैं तो तुम उनके प्रति पूर्वाग्रह रखते हो और उनसे बात करने से भी इनकार कर देते हो, तो यह इस बात का और भी अधिक प्रमाण है कि तुम अपनी भावनाओं से नियंत्रित हो और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध बिल्कुल भी सामान्य नहीं है। यह दर्शाता है कि तुम परमेश्वर को मूर्ख बनाने और अपनी कुरूपता छिपाने का प्रयास कर रहे हो। तुम अपना कुछ ज्ञान साझा करने में सक्षम हो सकते हो, लेकिन अगर तुम्हारे इरादे गलत हैं, तो जो कुछ भी तुम करते हो, वह केवल इंसानी मानकों से ही अच्छा है, और परमेश्वर तुम्हें स्वीकृति नहीं देता। तुम्हारे कार्य तुम्हारी देह से संचालित होते हैं, परमेश्वर के बोझ से नहीं। तुम केवल तभी परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त होते हो, जब तुम परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करने में सक्षम रहते हो और उन सभी के साथ सामान्य संबंध रखते हो जो उससे प्रेम करते हैं। अगर तुम ऐसा कर सकते हो, तो तुम चाहे दूसरों के साथ कैसे भी बातचीत करो, तुम किसी सांसारिक आचरण के फलसफे के अनुसार कार्य नहीं कर रहे होगे, तुम परमेश्वर के बोझ का विचार कर रहे होगे और उसके सामने जी रहे होगे। तुम लोगों के बीच ऐसे कितने लोग हैं? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध वास्तव में सामान्य हैं? वे किस बुनियाद पर बने हैं? तुम्हारे भीतर सांसारिक आचरण के कितने फलसफे हैं? क्या तुमने उन्हें त्याग दिया है? अगर तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ पाता, तो तुम परमेश्वर द्वारा चुने गए नहीं हो—तुम शैतान से आए हो, तुम अंततः शैतान के पास लौट जाओगे, और तुम परमेश्वर के लोगों में से एक होने के योग्य नहीं हो। तुम्हें इन चीजों की सावधानी से जाँच करनी चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 409
परमेश्वर में विश्वास करने में, तुम्हें कम से कम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रखने के मुद्दे का समाधान करना आवश्यक है। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य संबंध नहीं है, तो परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का अर्थ खो जाता है। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध स्थापित करना पूरी तरह से परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करने के माध्यम से किया जाता है। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का अर्थ है परमेश्वर के किसी भी कार्य पर संदेह न करने या उससे इनकार न करने और उसके कार्य के प्रति समर्पित रहने में सक्षम होना। इसका अर्थ है परमेश्वर की उपस्थिति में सही इरादे रखना और स्वयं के लिए योजनाएँ न बनाना; इसका अर्थ परमेश्वर के घर के हितों को प्राथमिकता देना, परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करना और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना भी है, चाहे तुम कुछ भी कर रहे हो। तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें तुम्हें परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के इरादों को नहीं भी समझते, तो भी तुम्हें अपनी सर्वोत्तम योग्यता के साथ अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को पूरा करना चाहिए। एक बार परमेश्वर के इरादे तुम पर प्रकट हो जाते हैं, तो फिर उनके अनुसार अभ्यास करो, यह बहुत विलंब नहीं होगा। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाता है, तब लोगों के साथ भी तुम्हारा संबंध सामान्य होगा। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध बनाने के लिए, सब कुछ परमेश्वर के वचनों की नींव पर बनाया जाना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य करना चाहिए, तुम्हें अपने विचार सही रखने चाहिए, हर चीज में सत्य खोजना चाहिए और जब तुम सत्य समझ जाओ, तो तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए। चाहे तुम्हारे साथ कुछ भी घटित हो, तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर की आज्ञा मानने वाले दिल से खोजना चाहिए। इस प्रकार अभ्यास करते हुए, तुम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध बनाए रख पाओगे। साथ ही अपने कर्तव्य को उचित ढंग से निभाते समय ही तुम्हें यह सुनिश्चित भी करना चाहिए कि तुम ऐसा कुछ भी न करो जिससे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश को लाभ न हो, और ऐसा कुछ भी न कहो जो भाई-बहनों के लिए उन्नतिप्रद न हो। कम से कम तुम्हें ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जो तुम्हारे जमीर के विरुद्ध हो और तुम्हें कतई कुछ भी ऐसा नहीं करना चाहिए जो शर्मनाक हो। खासकर तुम्हें कतई कुछ ऐसा नहीं करना चाहिए जो परमेश्वर से विद्रोह करता हो या उसका प्रतिरोध करता हो, न ही कुछ ऐसा करना चाहिए जो कलीसिया के कार्य या जीवन में बाधा डालता हो। अपने हर कार्य में खुले दिल वाले और सच्चे रहो और सुनिश्चित करो कि तुम्हारा हर क्रियाकलाप परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने योग्य हो। यद्यपि कभी-कभी देह कमज़ोर हो सकती है, फिर भी तुम्हें अपने व्यक्तिगत लाभ का लालच न करते हुए, कोई भी स्वार्थी या नीच कार्य न करते हुए, अक्सर आत्म-चिंतन करते हुए परमेश्वर के घर के हितों को पहले रखना चाहिए। इस तरह तुम अक्सर परमेश्वर के सामने रह सकते हो, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पूरी तरह सामान्य हो जाएगा।
अपने हर कार्य में तुम्हें यह जाँचना चाहिए कि क्या तुम्हारे इरादे सही हैं। यदि तुम परमेश्वर की माँगों के अनुसार कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है। यह न्यूनतम मापदंड है। अगर, अपने इरादों की जाँच करते हुए, तुम यह पाते हो कि तुममें गलत इरादे पैदा हो गए हैं, और तुम उनके खिलाफ विद्रोह कर और परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य कर पाते हो तो तुम परमेश्वर के समक्ष एक सही व्यक्ति बन जाओगे। यह दर्शाता है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, और तुम जो कुछ करते हो वह परमेश्वर के लिए है, न कि तुम्हारे अपने लिए। तुम जो कुछ भी करते या कहते हो, उसमें अपने हृदय को सही बनाने और अपने कार्यों में न्यायपूर्ण होने में सक्षम बनो, और कार्य करते हुए अपनी भावनाओं या अपनी इच्छा से संचालित मत होओ। ये वे सिद्धांत हैं, जिनके अनुसार परमेश्वर के विश्वासियों को कार्य करना चाहिए। यहाँ तक कि एक छोटी-सी बात भी व्यक्ति के इरादों और आध्यात्मिक कद को प्रकट कर सकती है, और इसलिए, परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश करने के लिए व्यक्ति को पहले अपने इरादे और परमेश्वर के साथ अपना संबंध सुधारना चाहिए। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होता है, केवल तभी तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जा सकते हो; केवल तभी तुममें परमेश्वर की काट-छाँट, अनुशासन और शोधन अपना अपेक्षित प्रभाव हासिल कर पाएगा। कहने का अर्थ यह है कि यदि मनुष्य अपने हृदय में परमेश्वर को रखने में सक्षम हैं और वे व्यक्तिगत लाभ के पीछे नहीं भागते या अपनी संभावनाओं पर (यानी देह के बारे में) विचार नहीं करते, बल्कि जीवन प्रवेश के लिए बोझ उठाते हैं, सत्य का अनुसरण करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करते हैं और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करते हैं—अगर तुम ऐसा कर सकते हो, तो जिन लक्ष्यों का तुम अनुसरण करते हो, वे सही होंगे और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाएगा। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के साथ अपना संबंध सही करना व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा में प्रवेश करने का पहला कदम है। यद्यपि मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है और वह परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित है, और मनुष्य द्वारा उसे बदला नहीं जा सकता, तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जा सकते हो या नहीं अथवा तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं। तुम्हारे कुछ हिस्से ऐसे हो सकते हैं, जो कमज़ोर या विद्रोही हों—परंतु जब तक तुम्हारे दृष्टिकोण और इरादे सही हैं, और जब तक परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सही और सामान्य है, तब तक तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य हो। यदि तुम्हारा परमेश्वर के साथ सही संबंध नहीं है, और तुम देह के लिए या अपने परिवार के लिए कार्य करते हो, तो चाहे तुम जितनी भी मेहनत करो, यह व्यर्थ ही होगा। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, तो बाकी सब चीजें भी ठीक हो जाएँगी। परमेश्वर कुछ और नहीं देखता, केवल यह देखता है कि क्या परमेश्वर में विश्वास करते हुए तुम्हारे दृष्टिकोण सही हैं : अंततः तुम किस पर विश्वास करते हो, तुम किसके लिए विश्वास करते हो और तुम क्यों विश्वास करते हो। यदि तुम इन चीजों को स्पष्ट रूप से देख पाते हो और अपने दृष्टिकोण अच्छी तरह से रखते हुए अभ्यास करते हो, तो तुम अपने जीवन में उन्नति करोगे, और तुम्हें सही मार्ग पर प्रवेश की गारंटी भी दी जाएगी। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं है, और परमेश्वर में विश्वास के तुम्हारे दृष्टिकोण विकृत हैं, तो बाकी सब कुछ बेकार है; तुम अपनी आस्था का कितना भी अभ्यास क्यों न करो, तुम कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाओगे। परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होने के बाद, जब तुम देह के खिलाफ विद्रोह करोगे, प्रार्थना करोगे, दुःख उठाओगे, सहन करोगे, समर्पण करोगे, अपने भाई-बहनों की सहायता करोगे, परमेश्वर के लिए खुद को अधिक खपाओगे, और ऐसी अन्य चीजें करोगे, केवल तभी तुम उसकी स्वीकृति प्राप्त करोगे। तुम्हारे कुछ करने की कोई कीमत या महत्व है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्हारे इरादे ठीक और विचार सही हैं या नहीं। आजकल बहुत-से लोग परमेश्वर पर विश्वास इस तरह करते हैं, जैसे घड़ी देखने के लिए सिर उठा रहे हों—उनके परिप्रेक्ष्य विकृत होते हैं और उन्हें बस इस समस्या को हल करने की जरूरत है। अगर यह समस्या हल हो गई, तो सब कुछ सही हो जाएगा; और अगर नहीं हुई, तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा। कुछ लोग मेरी उपस्थिति में अच्छा व्यवहार करते हैं, परंतु मेरी पीठ पीछे वे केवल मेरा विरोध ही करते हैं। यह कुटिलता और धोखे का प्रदर्शन है, और इस तरह के व्यक्ति शैतान के सेवक हैं; वे परमेश्वर की परीक्षा लेने के लिए आए शैतान के विशिष्ट रूप हैं। तुम केवल तभी एक सही व्यक्ति हो, जब तुम मेरे कार्य और मेरे वचनों के प्रति समर्पित रह सको। जब तक तुम परमेश्वर के वचनों को खा-पी सकते हो; जब तक तुम जो करते हो वह परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने योग्य है और अपने समस्त कार्यों में तुम खुले और सच्चे दिल से व्यवहार करते हो; जब तुम निंदनीय अथवा दूसरों के जीवन को नुकसान पहुँचाने वाले कार्य नहीं करते; और जब तुम प्रकाश में रहते हो और शैतान को अपना शोषण नहीं करने देते, तब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सुव्यवस्थित होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 410
परमेश्वर में विश्वास करने के लिए तुम्हें अपने इरादों और दृष्टिकोणों को सही करना आवश्यक है; तुम्हें परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर जिन समस्त परिवेशों का इंतजाम करता है, जिस व्यक्ति के बारे में परमेश्वर गवाही देता है और व्यावहारिक परमेश्वर की सही समझ और उनके प्रति व्यवहार का सही तरीका होना आवश्यक है। तुम्हें अपने विचारों के अनुसार अभ्यास नहीं करना चाहिए, और न ही अपनी क्षुद्र योजनाएँ बनानी चाहिए। तुम जो कुछ भी करो, तुम्हें सत्य को खोजने, और एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी स्थिति में परमेश्वर के सब कार्यों के प्रति समर्पित रहने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करना और जीवन के सही मार्ग में प्रवेश करना चाहते हो, तो तुम्हारा हृदय सदैव परमेश्वर की उपस्थिति में रहना आवश्यक है। बेलगाम मत बनो, शैतान का अनुसरण मत करो, शैतान को अपना काम करने का कोई अवसर मत दो, और शैतान को अपना इस्तेमाल मत करने दो। तुम्हें स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर को सौंप देना चाहिए और परमेश्वर को अपने ऊपर शासन करने देना चाहिए।
क्या तुम शैतान के सेवक बनना चाहते हो? क्या तुम शैतान द्वारा अपना शोषण करवाना चाहते हो? क्या तुम परमेश्वर पर विश्वास और उसका अनुसरण इसलिए करते हो ताकि तुम उसके द्वारा पूर्ण बनाए जा सको या इसलिए कि तुम उसके कार्य की विषमता बन सको? इस जीवन में, क्या तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने और अर्थपूर्ण जीवन जीने के इच्छुक हो या तुम इसके बजाय एक बेकार और खाली जीवन जीना पसंद करोगे? तुम परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया जाना पसंद करोगे, या शैतान द्वारा अपना शोषण करवाना? तुम परमेश्वर के वचनों और सत्य से ओतप्रोत होना पसंद करोगे या फिर पाप और शैतान से ओतप्रोत होना? इन बातों पर ध्यान से विचार करो। अपने दैनिक जीवन में तुम्हें यह समझना आवश्यक है कि तुम्हारे द्वारा कहे जाने वाले कौन-से शब्द और तुम्हारे द्वारा किए जाने वाले कौन-से कार्य परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं रहने देंगे, और फिर सही तरीका अपनाने के लिए स्वयं को सुधारो। हर वक्त अपने शब्दों, अपने कार्यों, अपने हर कदम और अपने समस्त विचारों और भावों की जाँच करो। अपनी वास्तविक स्थिति की सही समझ हासिल करो और पवित्र आत्मा के कार्य के तरीके में प्रवेश करो। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का यही एकमात्र तरीका है। इसका आकलन करके कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं, तुम अपने इरादों को सुधार पाओगे, मनुष्य के प्रकृति सार को समझ पाओगे, और स्वयं को वास्तव में समझ पाओगे, और ऐसा करने पर तुम वास्तविक अनुभवों में प्रवेश कर पाओगे, स्वयं के खिलाफ वास्तविक तरीके से विद्रोह कर पाओगे और स्वेच्छा से समर्पण कर पाओगे। जब तुम इस बात से संबंधित इन मामलों का अनुभव करते हो कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं, तो तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर प्राप्त करोगे और पवित्र आत्मा के कार्य की कई दशाओं को समझने में सक्षम होगे। तुम शैतान की कई साजिशों को भी देख पाओगे और उसके षड्यंत्रों को समझ पाओगे। केवल यही मार्ग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की ओर ले जाता है। परमेश्वर के साथ अपना संबंध सही करो ताकि तुम अपने आपको परमेश्वर के सभी प्रबंधनों के प्रति उनकी पूर्णता में समर्पित कर सको, और वास्तविक अनुभवों में और भी गहराई से प्रवेश कर सको और पवित्र आत्मा का कार्य और अधिक प्राप्त कर सको। जब तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का अभ्यास करते हो, तो अधिकांश मामलों में सफलता देह के खिलाफ विद्रोह करने और परमेश्वर के साथ वास्तविक सहयोग करने से मिलेगी। तुम्हें यह समझना चाहिए कि “सहयोगी हृदय के बिना परमेश्वर के कार्य को प्राप्त करना कठिन है; यदि देह पीड़ा का अनुभव नहीं करती, तो परमेश्वर से आशीषें प्राप्त नहीं होंगी; यदि आत्मा संघर्ष नहीं करती, तो शैतान शर्मिंदा नहीं होगा।” यदि तुम इन सिद्धांतों का अभ्यास करो और इन्हें अच्छी तरह से समझ लो, तो परमेश्वर में विश्वास करने के तुम्हारे दृष्टिकोण सही हो जाएँगे। अपने वर्तमान अभ्यास में तुम लोगों को “भरपेट निवाले खाने की कोशिश में रहने” की मानसिकता को छोड़ना आवश्यक है; तुम्हें इस मानसिकता को छोड़ना भी आवश्यक है कि “सब कुछ पवित्र आत्मा द्वारा किया जाता है और लोग उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते।” जो भी लोग ऐसा कहते हैं, वे सब यह सोचते हैं, “लोग वह सब कर सकते हैं जो वे करना चाहते हैं, और जब समय आएगा तो पवित्र आत्मा अपना कार्य करेगा। लोगों को देह को नियंत्रित करने या सहयोग करने की आवश्यकता नहीं है; महत्त्वपूर्ण यह है कि पवित्र आत्मा द्वारा उन्हें प्रेरित किया जाए।” ये मत बेतुके हैं। इन परिस्थितियों में पवित्र आत्मा कार्य करने में असमर्थ है। इस प्रकार का दृष्टिकोण पवित्र आत्मा के कार्य के लिए एक बड़ी रुकावट बन जाता है। अक्सर पवित्र आत्मा का कार्य लोगों के सहयोग से प्राप्त किया जाता है। लोग सहयोग नहीं करते और उनमें कोई संकल्प नहीं होता है, फिर भी अपने स्वभाव में बदलाव लाना चाहते हैं और पवित्र आत्मा का कार्य तथा परमेश्वर से प्रबोधन और रोशनी प्राप्त करना चाहते हैं; ये वाकई अवास्तविक अपेक्षाएँ हैं। इसे “अपने प्रति उदार होना और शैतान को क्षमा करना” कहा जाता है। ऐसे लोगों का परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध नहीं होता। तुम्हें अपने भीतर शैतानी स्वभाव के कई खुलासे और अभिव्यक्तियाँ ढूँढ़नी चाहिए और अपने ऐसे अभ्यास तलाशने चाहिए, जो अब परमेश्वर की आवश्यकताओं के प्रतिकूल हैं। क्या तुम अब शैतान के खिलाफ विद्रोह कर सकोगे? तुम्हें परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना चाहिए, परमेश्वर की इच्छाओं के अनुसार कार्य करना चाहिए और नए जीवन के साथ एक नया व्यक्ति बनना चाहिए। अपने पिछले अपराधों पर ध्यान मत दो; अनुचित रूप से पश्चातापी न बनो; ऊपर उठने और परमेश्वर के साथ सहयोग करने में सक्षम बनो और जो कर्तव्य तुम्हें अच्छे से निभाने हैं उन्हें अच्छे से निभाओ। इस प्रकार परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 411
यदि इसे पढ़ने के बाद तुम केवल शब्दों को स्वीकार करने का दावा करते हो, और अभी भी तुम्हारा हृदय द्रवित नहीं होता, और तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का प्रयास नहीं करते, तो यह प्रमाणित हो जाता है कि तुम परमेश्वर के साथ अपने संबंध को महत्व नहीं देते। यह प्रमाणित हो जाता है कि तुम्हारे दृष्टिकोण अभी तक सही नहीं हुए हैं, तुम्हारे इरादे परमेश्वर द्वारा तुम्हें प्राप्त किए जाने और उसके लिए महिमा लाने की ओर निर्दिष्ट नहीं किए गए हैं, बल्कि शैतान के षड्यंत्र जारी रहने और तुम्हारे व्यक्तिगत उद्देश्य पूरे करने के लिए निर्दिष्ट किए गए हैं। ऐसे व्यक्ति गलत इरादे और गलत दृष्टिकोण रखते हैं। परमेश्वर चाहे जो भी कहे या वह इसे कैसे भी कहे, ऐसे लोग पूरी तरह से उदासीन रहते हैं और उनमें जरा-सा भी परिवर्तन नहीं देखा जा सकता है। वे निडर और निर्लज्ज दोनों होते हैं। ऐसा व्यक्ति मृत आत्मा वाला और भ्रमित होता है। परमेश्वर के हर कथन को एक बार जब तुम पढ़ और समझ लेते हो, तो उसे अभ्यास में लाओ। अतीत में तुमने कैसा भी व्यवहार क्यों न किया हो, शायद ऐसे अवसर आए हों जब तुम्हारी देह कमजोर थी या तुम विद्रोही थे या तुमने प्रतिरोध किया था; इसका कोई खास महत्व नहीं है और यह आज तुम्हारे जीवन को परिपक्व होने से नहीं रोक सकता है। अगर आज तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रख सकते हो, तो आशा की किरण बाकी है। यदि हर बार परमेश्वर के वचन पढ़ने पर तुममें परिवर्तन होता है, और दूसरे लोग बता सकते हैं कि तुम्हारा जीवन बदलकर बेहतर हो गया है, तो यह दिखाता है कि अब तुम्हारा परमेश्वर के साथ संबंध सामान्य है और उसे सही रखा गया है। परमेश्वर लोगों से उनके अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। एक बार जब तुम समझ जाते हो और जागरूक हो जाते हो, जब तुम विद्रोही नहीं रहते और प्रतिरोध करना छोड़ देते हो, तो परमेश्वर फिर भी तुम पर दया करता है। जब तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करने की समझ और संकल्प होता है, तो परमेश्वर की उपस्थिति में तुम्हारी स्थिति सामान्य हो जाएगी। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, बस इन बातों पर ध्यान दो : यदि मैं यह कार्य करूँगा, तो परमेश्वर क्या सोचेगा? क्या इससे मेरे भाई-बहनों को लाभ पहुँचेगा? क्या यह परमेश्वर के घर के कार्य के लिए लाभकारी होगा? अपनी प्रार्थना, संगति, बोलचाल, मामलों से निपटने या लोगों के साथ संपर्क में अपने इरादों की जाँच करो और देखो कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं। यदि तुम अपने इरादों और विचारों को नहीं समझ सकते, तो इसका अर्थ है कि तुममें विवेक की कमी है, जिससे प्रमाणित होता है कि तुम सत्य को बहुत कम समझते हो। अगर तुम, जो कुछ भी परमेश्वर करता है, उसे स्पष्ट रूप से समझने और परमेश्वर के पक्ष में खड़े होकर चीजों को उसके वचनों के लेंस के माध्यम से देखने में समर्थ हुए, तो तुम्हारे दृष्टिकोण सही हो गए होंगे। अतः परमेश्वर के साथ अच्छे संबंध बनाना हर उस व्यक्ति के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है, जो परमेश्वर में विश्वास रखता है; सभी को इसे सर्वोपरि महत्त्व का कार्य और अपने जीवन की सबसे बड़ी घटना मानना चाहिए। जो कुछ भी तुम करते हो, उसे इस बात से मापा जाता है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है और तुम्हारे इरादे सही हैं, तो कार्य करो। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाए रखने के लिए तुम्हें अपने व्यक्तिगत हितों का नुकसान उठाने से डरने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है; तुम शैतान को जीतने नहीं दे सकते, तुम शैतान को अपने ऊपर पकड़ बनाने नहीं दे सकते और तुम शैतान को तुम्हें हँसी का पात्र बनाने नहीं दे सकते। ऐसे इरादे होना इस बात का संकेत है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है—यह देह के लिए नहीं है, बल्कि आत्मा की शांति के लिए है, पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने के लिए है और परमेश्वर के इरादे पूरे करने के लिए है। सही दशा में प्रवेश करने के लिए तुम्हें परमेश्वर के साथ अच्छा संबंध बनाना और उस पर विश्वास करने के अपने दृष्टिकोणों को सही रखना आवश्यक है। ऐसा इसलिए, ताकि परमेश्वर तुम्हें प्राप्त कर सके और ताकि वह अपने वचनों के फल तुममें प्रकट कर सके, तुम्हें और अधिक प्रबुद्ध और रोशन कर सके। इस प्रकार से तुम सही तरीके में प्रवेश करोगे। परमेश्वर के आज के वचनों को लगातार खाते-पीते रहो, पवित्र आत्मा के कार्य करने के मौजूदा तरीके में प्रवेश करो, परमेश्वर की आज की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करो, अभ्यास के पुराने तरीकों का पालन मत करो, कार्य करने के पुराने तरीकों से मत चिपके रहो, और जितना जल्दी हो सके, कार्य करने के आज के तरीके में प्रवेश करो। इस तरह परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पूरी तरह से सामान्य हो जाएगा और तुम परमेश्वर में विश्वास रखने के सही मार्ग पर चल पड़ोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 412
लोग परमेश्वर के वचनों को जितना अधिक स्वीकार करते हैं, वे उतने ही अधिक प्रबुद्ध होते हैं, परमेश्वर को जानने के अनुसरण में उनकी भूख और प्यास उतनी ही बढ़ती है। परमेश्वर के वचनों को स्वीकारने वाले ही अधिक समृद्ध और गहन अनुभव कर पाने के काबिल होते हैं, केवल उन्हीं लोगों का जीवन तिल के फूलों की तरह स्थिरतापूर्वक खिलता रह सकता है। जीवन का अनुसरण करने वाले सभी लोगों को इसे ही अपना पूर्णकालिक काम समझना चाहिए; उन्हें लगना चाहिए कि “परमेश्वर के बिना मैं जी नहीं सकता; परमेश्वर के बिना मैं कुछ भी नहीं कर सकता; परमेश्वर के बिना हर चीज़ खोखली है।” उसी तरह, उनमें यह संकल्प होना चाहिए कि “पवित्र आत्मा की उपस्थिति के बिना मैं कुछ भी नहीं करूँगा, और अगर परमेश्वर के वचनों को पढ़कर कोई प्रभाव नहीं होता, तो मैं कुछ भी करने से उदासीन हूँ।” स्वयं को लिप्त मत करो। जीवन-अनुभव परमेश्वर के प्रबोधन और मार्गदर्शन से आते हैं, और वे तुम लोगों के व्यक्तिपरक प्रयासों का क्रिस्टलीकरण हैं। तुम लोगों को अपने आपसे यह माँग करनी चाहिए : “जब जीवन-अनुभव की बात आती है, तो मैं स्वयं को छूट नहीं दे सकता।”
कभी-कभी, जब तुम असामान्य परिस्थितियों में होते हो, तो परमेश्वर की उपस्थिति को गँवा देते हो और जब प्रार्थना करते हो तो परमेश्वर को महसूस नहीं कर पाते। ऐसे वक्त डर लगना सामान्य बात है। तुम्हें तुरंत खोज शुरू कर देनी चाहिए। अगर तुम नहीं करोगे, तो परमेश्वर तुमसे अलग हो जाएगा और तुम पवित्र आत्मा की उपस्थिति से वंचित हो जाओगे—इतना ही नहीं, एक-दो दिन, यहाँ तक कि एक-दो महीनों के लिए पवित्र आत्मा के कार्य की उपस्थिति से वंचित रहोगे। इन हालात में, तुम बेहद सुन्न हो जाते हो और एक बार फिर से इस हद तक शैतान के बंदी बन जाते हो कि तुम हर तरह के कुकर्म करने लगते हो। तुम धन का लालच करते हो, अपने भाई-बहनों को धोखा देते हो, फिल्में और वीडियो देखते हो, जुआ खेलते हो, यहाँ तक कि बिना किसी अनुशासन के सिगरेट और शराब पीते हो। तुम्हारा दिल परमेश्वर से बहुत दूर चला जाता है, तुम गुप्त रूप से अपने रास्ते पर चल देते हो और मनमर्ज़ी से परमेश्वर के कार्य पर अपना फैसला सुना देते हो। कुछ मामलों में लोग इस हद तक गिर जाते हैं कि यौन प्रकृति के पाप करते समय न तो उन्हें कोई शर्म आती है और न ही उन्हें घबराहट महसूस होती है। पवित्र आत्मा ने इस प्रकार के व्यक्ति का त्याग कर दिया है; दरअसल, काफी समय से ऐसे व्यक्ति में पवित्र आत्मा का कार्य नदारद रहा है। ऐसे व्यक्ति को लगातार भ्रष्टता में और अधिक डूबते हुए देखा जा सकता है, क्योंकि उनके पापी हाथ निरंतर फैलते जाते हैं। अंत में, वह इस मार्ग के अस्तित्व को नकार देता है और जब वो पाप करता है तो शैतान द्वारा उसे बंदी बना लिया जाता है। अगर तुम्हें पता चले कि तुम्हारे अंदर केवल पवित्र आत्मा की उपस्थिति है, किंतु पवित्र आत्मा के कार्य का अभाव है, तो ऐसी स्थिति में होना पहले ही खतरनाक होता है। जब तुम पवित्र आत्मा की उपस्थिति को महसूस भी न कर सको, तब तुम मौत के कगार पर हो। अगर तुम प्रायश्चित न करो, तब तुम पूरी तरह से शैतान के पास लौट चुके होगे, और तुम उन व्यक्तियों में होगे, जिन्हें निकाल दिया गया है। इसलिए, जब तुम्हें पता चलता है कि तुम ऐसी स्थिति में हो, जहाँ केवल पवित्र आत्मा की उपस्थिति है (तुम पाप नहीं करते, तुम अपने आपको रोक लेते हो और तुम परमेश्वर के घोर प्रतिरोध में कुछ नहीं करते), लेकिन तुममें पवित्र आत्मा के कार्य का अभाव है (तुम प्रार्थना करते हुए प्रेरित महसूस नहीं करते, जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम्हें स्पष्टतः न तो प्रबोधन हासिल होता है, न ही प्रकाशन, तुम परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के बारे में उदासीन होते हो, तुम्हारे जीवन में कभी कोई विकास नहीं होता और तुम लंबे समय से महान प्रकाशन से वंचित रहे हो)—ऐसे समय तुम्हें अधिक सतर्क रहना चाहिए। तुम्हें स्वयं को लिप्त नहीं रखना चाहिए, तुम्हें अपने चरित्र की लगाम को और अधिक ढीला नहीं छोड़ना चाहिए। पवित्र आत्मा की उपस्थिति किसी भी समय गायब हो सकती है। इसीलिए ऐसी स्थिति बहुत ही खतरनाक होती है। अगर तुम अपने को इस तरह की स्थिति में पाओ, तो यथाशीघ्र तुम्हें चीज़ों को पलटने का प्रयास करना चाहिए। पहले, तुम्हें प्रायश्चित की प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर से कहना चाहिए कि वह एक बार और तुम पर करुणा करे। अधिक गंभीरता से प्रार्थना करो, और परमेश्वर के और अधिक वचनों को खाने-पीने के लिए अपने दिल को शांत करो। इस आधार के साथ, तुम्हें प्रार्थना में और अधिक समय लगाना चाहिए; गाने, प्रार्थना करने, परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपने प्रयासों को दुगुना कर दो। जब तुम सबसे कमज़ोर होते हो, तो उस समय शैतान तुम्हारे दिल पर बड़ी आसानी से कब्ज़ा कर लेता है। जब ऐसा होता है, तो तुम्हारा दिल परमेश्वर से लेकर शैतान को लौटा दिया जाता है, जिसके बाद तुम पवित्र आत्मा की उपस्थिति से वंचित हो जाते हो। ऐसे समय, पवित्र आत्मा के कार्य को पुनः प्राप्त करना और भी मुश्किल होता है। बेहतर है कि जब तक पवित्र आत्मा तुम्हारे साथ है, तभी पवित्र आत्मा के कार्य की खोज कर ली जाए, जिससे परमेश्वर तुम्हें अपना प्रबोधन और अधिक प्रदान करेगा है और तुम्हारा त्याग नहीं करेगा। प्रार्थना करना, भजन गाना, सेवा-कार्य करना और परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना—ये सब इसलिए किया जाता है ताकि शैतान को अपना काम करने का अवसर न मिले, और पवित्र आत्मा तुममें अपना कार्य कर सके। अगर तुम इस तरह से पवित्र आत्मा के कार्य को पुनः प्राप्त नहीं करते, अगर तुम बस प्रतीक्षा करते रहते हो, तो पवित्र आत्मा की उपस्थिति को गँवा देने के बाद पवित्र आत्मा के कार्य को पुनः प्राप्त करना आसान नहीं होगा, जब तक कि पवित्र आत्मा ने तुम्हें विशेष रूप से प्रेरित न किया हो, या खास तौर से तुम्हें प्रबुद्ध और प्रकाशित न किया हो। तब भी, तुम्हारी स्थिति महज़ एक-दो दिनों में बहाल नहीं हो जाती; कभी-कभी तो बिना बहाली के छ्ह-छह महीने निकल जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि लोग अपने साथ काफी नरमी बरतते हैं, सामान्य तरीके से चीज़ों का अनुभव लेने में सक्षम नहीं होते और इस तरह उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिया जाता है। अगर तुम पवित्र आत्मा के कार्य को पुनः प्राप्त कर भी लो, तो भी परमेश्वर का वर्तमान कार्य शायद तुम्हें ज्यादा स्पष्ट न हो, क्योंकि तुम अपने जीवन-अनुभव में बहुत पीछे छूट चुके हो, मानो तुम दस हज़ार मील पीछे रह गए हो। क्या यह भयानक बात नहीं है? लेकिन मैं ऐसे लोगों से कहता हूँ कि प्रायश्चित करने में अभी भी देर नहीं हुई है, लेकिन एक शर्त है : तुम्हें अधिक मेहनत करनी होगी और आलस्य से बचना होगा। अगर दूसरे लोग दिन में पाँच बार प्रार्थना करते हैं, तो तुम्हें दस बार प्रार्थना करनी होगी; अगर अन्य लोग परमेश्वर के वचनों को दिन में दो घंटे खाते और पीते हैं, तो तुम्हें ऐसा चार या छह घंटे करना होगा; और अगर अन्य लोग दो घंटे भजन सुनते हैं, तो तुम्हें कम से कम आधा दिन भजन सुनने होंगे। जब तक कि तुम प्रेरित न हो जाओ और तुम्हारा दिल परमेश्वर के पास लौट न आए, तब तक तुम परमेश्वर के सामने शांत रहो और परमेश्वर के प्रेम का विचार करो और परमेश्वर से दूर रहने का साहस न करो—तभी तुम्हारा अभ्यास फलीभूत होगा; तभी तुम अपनी पिछली, सामान्य स्थिति को बहाल कर पाओगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक सामान्य अवस्था में प्रवेश कैसे करें
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 413
तुम लोग परमेश्वर में विश्वास करने के मार्ग पर बहुत ही कम चले हो, और तुम लोगों का सही मार्ग पर प्रवेश करना अभी बाकी है, अतः तुम लोग परमेश्वर के मानक को प्राप्त करने से अभी भी दूर हो। इस समय, तुम लोगों का आध्यात्मिक कद उसकी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। तुम लोगों की योग्यता और जन्मजात भ्रष्ट प्रकृति के कारण, तुम लोग हमेशा परमेश्वर के कार्य के साथ लापरवाही से पेश आते हो और इसे गंभीरता से नहीं लेते। यह तुम लोगों की सबसे बड़ी खामी है। ऐसा कोई तो बिल्कुल नहीं है जो उस मार्ग को समझ सके जिस पर पवित्र आत्मा चलता है; तुममें से अधिकांश इसे नहीं समझते और इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते। इतना ही नहीं, तुम लोगों में से अधिकांश इस विषय पर कोई ध्यान भी नहीं देते, इससे कर्तव्यनिष्ठा से पेश आने की बात तो दूर रही। यदि तुम लोग इसी तरह से व्यवहार करते रहोगे और पवित्र आत्मा के कार्य से अनभिज्ञ रह कर जीते रहोगे, तो परमेश्वर के विश्वासी के रूप में जिस मार्ग पर तुम लोग चलते हो वह निरर्थक होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के इरादों को पूरा करने के प्रयास में जितना हो सके वो सब कुछ नहीं करते हो, और इसलिए भी क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के साथ अच्छी तरह से सहयोग नहीं करते। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर ने तुम पर कार्य नहीं किया है, या कि पवित्र आत्मा ने तुम्हें प्रेरित नहीं किया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम इतने लापरवाह हो कि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को गंभीरता से नहीं लेते। तुम्हें इसी समय स्थिति को उलटना होगा और पवित्र आत्मा द्वारा अगुआई किए जाने वाले मार्ग पर चलना होगा। आज का मुख्य विषय यही है। “पवित्र आत्मा द्वारा अगुआई किया जाने वाला मार्ग”—इसका अर्थ है आत्मा में प्रबुद्धता को प्राप्त करना, परमेश्वर के वचनों का ज्ञान प्राप्त करना, आगे के मार्ग के विषय में स्पष्टता प्राप्त करना, कदम-दर-कदम सत्य में प्रवेश करना और परमेश्वर का अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करना। पवित्र आत्मा द्वारा अगुआई किया जाने वाला मार्ग मुख्यतः वो मार्ग है जो परमेश्वर के वचनों की अधिक स्पष्ट समझ देता हो, जो भटकाव और बेतुकी चीजों से मुक्त हो, और जो लोग उस मार्ग पर चलते हैं वे सीधे चलते जाते हैं। इसे प्राप्त करने के लिए तुम लोगों को परमेश्वर के साथ तालमेल बनाकर सहयोग करने, अभ्यास का एक सटीक मार्ग ढूँढने और पवित्र आत्मा द्वारा अगुवाई किए जाने वाले मार्ग पर चलने की आवश्यकता होगी। इसमें मनुष्य की ओर से सहयोग शामिल है, अर्थात् : परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए तुम्हें क्या करना है और परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश करने के लिए तुम लोगों को कैसा अभ्यास करना है।
पवित्र आत्मा की अगुवाई वाले मार्ग पर चलना काफी जटिल प्रतीत हो सकता है, परंतु इस अभ्यास के मार्ग के बारे में बिलकुल स्पष्ट होने पर तुम पाओगे कि यह बहुत सरल है। तथ्य यह है कि लोग वह सब कुछ करने में सक्षम हैं जिसकी अपेक्षा परमेश्वर उनसे करता है—यह ऐसा नहीं है कि वह मछलियों को जमीन पर रहने के लिए बाध्य कर रहा है। सभी परिस्थितियों में, परमेश्वर लोगों की समस्याओं का समाधान करने और उनकी चिंताओं को दूर करने का प्रयास करता है। तुम सबको यह समझना आवश्यक है; परमेश्वर को गलत न समझो। पवित्र आत्मा जिस मार्ग पर चलता है उस पर परमेश्वर के वचन के अनुसार लोगों की अगुआई होती है। जैसा कि पहले बताया गया है, तुम लोगों को अपना हृदय परमेश्वर को देना आवश्यक है। यह पवित्र आत्मा द्वारा अगुआई किए जाने वाले मार्ग पर चलने के लिए पहली आवश्यकता है। सही मार्ग पर प्रवेश करने के लिए तुम्हें यह करना ही होगा। किस प्रकार कोई इंसान समझ-बूझकर अपना हृदय परमेश्वर को देता है? अपने दैनिक जीवन में, जब तुम लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हो और उससे प्रार्थना करते हो, तो तुम लोग इसे बड़ी लापरवाही से करते हो—तुम लोग काम करते हुए परमेश्वर से प्रार्थना करते हो। क्या इसे परमेश्वर को अपना हृदय देना कहा जा सकता है? तुम लोग परिवार के मामलों के बारे में या देह के मामलों की सोच में डूबे रहते हो; तुम लोग हमेशा ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हो। क्या इसे परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करना समझा जा सकता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि तुम्हारा हृदय हमेशा बाहरी विषयों से ग्रस्त रहता है, और यह परमेश्वर की ओर लौट नहीं पाता है। यदि तुम सचमुच अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष शांत करना चाहते हो, तो तुम्हें चेतन सहयोग का कार्य करना होगा। कहने का अर्थ यह है कि तुममें से प्रत्येक को अपनी आध्यात्मिक भक्ति के लिए समय निकालना होगा, सभी लोगों, घटनाओं और वस्तुओं से दूर रहना और अपने हृदय को शांत करना और परमेश्वर के समक्ष स्वयं को मौन करना होगा। तुममें से हर एक को अपनी व्यक्तिगत आध्यात्मिक भक्ति के नोट्स लिखने चाहिए, परमेश्वर के वचनों के अपने ज्ञान को लिखना चाहिए और यह भी कि किस प्रकार तुम्हारी आत्मा प्रेरित हुई है, इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए कि वे बातें गंभीर हैं या सतही। तुममें से प्रत्येक को इरादतन परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करना चाहिए। यदि तुम दिन के दौरान एक या दो घंटे एक सच्चे आध्यात्मिक जीवन के प्रति समर्पित कर सकते हो, तो उस दिन तुम्हारा जीवन समृद्ध महसूस होगा और तुम्हारा हृदय रोशन और स्पष्ट होगा। यदि तुम प्रतिदिन इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन जीते हो, तब तुम्हारा हृदय परमेश्वर के पास अधिक लौटने में सक्षम होगा, तुम्हारी आत्मा अधिक से अधिक सामर्थी हो जाएगी, तुम्हारी स्थिति निरंतर बेहतर होती चली जाएगी, तुम पवित्र आत्मा द्वारा अगुआई किए जाने वाले मार्ग पर चलने के और अधिक योग्य हो सकोगे, और परमेश्वर तुम्हें दोगुनी आशीषें देगा। तुम लोगों के आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य इरादतन पवित्र आत्मा की उपस्थिति को प्राप्त करना है। यह विनियमों को मानना या धार्मिक परंपराओं को निभाना नहीं है, बल्कि सच में परमेश्वर से सहयोग करना और सच में अपने शरीर को अनुशासित करना है। मनुष्य को यही करना चाहिए, इसलिए तुम लोगों को ऐसा करने का भरसक प्रयास करना चाहिए। जितना बेहतर तुम्हारा सहयोग होगा और जितना अधिक तुम प्रयास करोगे, उतना ही अधिक तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर लौट पाएगा, और उतना ही अधिक तुम अपने हृदय को परमेश्वर के सामने शांत कर पाओगे। एक निश्चित बिन्दु पर परमेश्वर तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लेगा। कोई भी तुम्हारे हृदय को हिला या उस पर कब्जा नहीं कर पाएगा, और तुम पूरी तरह से परमेश्वर के हो जाओगे। यदि तुम इस मार्ग पर चलते हो, तो परमेश्वर का वचन हर समय अपने आपको तुम पर प्रकट करेगा, और उन सभी चीज़ों के बारे में तुम्हें प्रबुद्ध करेगा जो तुम नहीं समझते—यह सब तुम्हारे सहयोग के द्वारा प्राप्त हो सकता है। इसीलिए परमेश्वर सदैव कहता है, “वे सब लोग जो मेरे साथ सहयोग करते हैं, मैं उन्हें दुगुना भेंट करूँगा।” तुम लोगों को यह मार्ग स्पष्टता के साथ देखना चाहिए। यदि तुम सही मार्ग पर चलना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए वह सब करना होगा जो तुम कर सकते हो। तुम लोगों को आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने के लिए वह सब कुछ करना होगा जो तुम कर सकते हो। आरंभ में, हो सकता है कि तुम्हें इसमें अच्छे नतीजे न मिलें, लेकिन नकारात्मक मत बनना और पीछे नहीं हटना—कड़ी मेहनत करते रहना! जितना अधिक आध्यात्मिक जीवन तुम जीओगे, उतना ही अधिक तुम्हारा हृदय परमेश्वर के वचनों से भरा रहेगा, इन बातों के प्रति हमेशा चिंतनशील रहेगा और हमेशा उन्हें तुम्हारे बोझ के रूप में उठाएगा। उसके बाद, अपने आध्यात्मिक जीवन के माध्यम से परमेश्वर को अपने सभी अंतरतम विचार बताओ; उसे बताओ कि तुम क्या करना चाहते हो, तुम किस विषय में सोच रहे हो, परमेश्वर के वचनों के बारे में अपनी समझ और उनके बारे में अपने दृष्टिकोण बताओ। कुछ भी मन में न रखो! अपने दिल के अंदर वचन कहने और अपनी सच्ची भावनाएँ परमेश्वर के सामने प्रकट करने का अभ्यास करो; तुम्हारे दिल में जो कुछ भी है, उसे व्यक्त करो। जितना अधिक तुम इस तरह बोलते हो, उतना अधिक तुम परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करोगे, और उतना ही अधिक तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर खिंचता जाएगा। जब ऐसा होगा, तो तुम्हें लगेगा कि परमेश्वर तुम्हें किसी और से ज्यादा प्रिय है, और कि तुम कभी भी परमेश्वर का साथ नहीं छोड़ सकते, चाहे कुछ भी हो जाए। अगर तुम दैनिक आधार पर इस तरह की आध्यात्मिक भक्ति करोगे, ऐसा करना कभी नहीं भूलोगे, जैसे कि यह तुम्हारे जीवन की एक बड़ी महत्वपूर्ण चीज हो, सिर्फ तभी तुम्हारा दिल परमेश्वर के वचन से भरा हो सकता है। पवित्र आत्मा के द्वारा प्रेरित किए जाने का अर्थ यही है। यह ऐसा होगा मानो तुम्हारा हृदय हमेशा परमेश्वर के नियंत्रण में हो, मानो तुम जिससे प्रेम करते हो वह सदैव तुम्हारे हृदय में हो और कोई भी उसे तुमसे छीन नहीं सकता। जब ऐसा होता है तो परमेश्वर सचमुच तुम्हारे भीतर वास करेगा और तुम्हारे हृदय में उसका एक स्थान होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन लोगों को सही मार्ग पर ले जाता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 414
परमेश्वर में विश्वास रखने के लिए एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन का होना आवश्यक है, जो कि परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने और वास्तविकता में प्रवेश करने का आधार है। क्या तुम सबकी प्रार्थनाओं, परमेश्वर के करीब जाने, भजन-गायन, स्तुति, ध्यान और परमेश्वर के वचनों पर मनन-चिंतन का समस्त अभ्यास “सामान्य आध्यात्मिक जीवन” के बराबर है? ऐसा नहीं लगता कि तुम लोगों में से कोई भी इसका उत्तर जानता है। एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन प्रार्थना करने, भजन गाने, कलीसियाई जीवन में भाग लेने और परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने जैसे अभ्यासों तक सीमित नहीं है। बल्कि, इसमें एक ताजा और जीवंत आध्यात्मिक जीवन जीना शामिल है। जो बात मायने रखती है वो यह नहीं है कि तुम अभ्यास कैसे करते हो, बल्कि यह है कि तुम्हारे अभ्यास का परिणाम क्या होता है। अधिकांश लोगों का मानना है कि एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में आवश्यक रूप से प्रार्थना करना, भजन गाना, परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना या उसके वचनों पर मनन-चिंतन करना शामिल है, भले ही ऐसे अभ्यासों का वास्तव में कोई प्रभाव हो या न हो, चाहे वे सच्ची समझ तक ले जाएँ या न ले जाएँ। ये लोग सतही प्रक्रियाओं के परिणामों के बारे में सोचे बिना उन पर ध्यान केंद्रित करते हैं; वे ऐसे लोग हैं जो धार्मिक अनुष्ठानों में जीते हैं, वे ऐसे लोग नहीं हैं जो कलीसिया के भीतर रहते हैं, वे राज्य के लोग तो बिलकुल नहीं हैं। उनकी प्रार्थनाएँ, भजन-गायन और परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना—ये सब विनियमों का अनुपालन करने का मात्र एक रूप हैं, जो मजबूरीवश और केवल चलन के साथ बने रहने के लिए किए जाते हैं। ये अपनी इच्छा से या हृदय से नहीं किए जाते हैं। ये लोग कितनी भी प्रार्थना करें या गाएँ, उनके प्रयास निष्फल होंगे, क्योंकि वे जिनका अभ्यास करते हैं, वे केवल धर्म के विनियम और अनुष्ठान हैं; वे वास्तव में परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं कर रहे हैं। वे केवल बाहरी तौर-तरीकों पर ही ध्यान केंद्रित करते रहते हैं और परमेश्वर के वचनों के साथ उन विनियमों जैसा व्यवहार करते हैं जिनका पालन किया ही जाना चाहिए। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं ला रहे हैं; वे सिर्फ देह को तृप्त कर रहे हैं और दूसरे लोगों को दिखाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। धर्म के ये विनियम और अनुष्ठान सभी मूल रूप से मानवीय हैं; वे परमेश्वर से नहीं आते हैं। परमेश्वर विनियमों का पालन नहीं करता है, न ही वह किसी व्यवस्था का पालन करता है। बल्कि वह हर दिन नई चीज़ें करता है, व्यावहारिक कार्य करता है। थ्री-सेल्फ कलीसिया के लोग, जो हर दिन सुबह की प्रार्थना में शामिल होने, शाम की प्रार्थना और भोजन से पहले आभार की प्रार्थना अर्पित करने, सभी चीज़ों में धन्यवाद देने जैसे अभ्यासों तक सीमित रहते हैं—वे इस तरह जितना भी कार्य करें और चाहे जितने लंबे समय तक अभ्यास करें, उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। जब लोग विनियमों के बीच रहते हैं और अपना ध्यान केवल अभ्यास के तरीकों पर ही केंद्रित रखते हैं, तो पवित्र आत्मा कार्य नहीं कर सकता, क्योंकि उनके हृदयों पर विनियमों और मानवीय धारणाओं का कब्जा होता है। इस प्रकार, परमेश्वर हस्तक्षेप करने और उन पर काम करने में असमर्थ है, और वे केवल व्यवस्थाओं के बंधनों में जीते रह सकते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करने में सदा के लिए असमर्थ होते हैं।
एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन परमेश्वर के सामने जिया जाने वाला जीवन है। प्रार्थना करते समय, एक व्यक्ति परमेश्वर के सामने अपना हृदय शांत कर सकता है, और प्रार्थना के माध्यम से वह पवित्र आत्मा के प्रबोधन की तलाश कर सकता है, परमेश्वर के वचनों को जान सकता है और परमेश्वर के इरादों को समझ सकता है। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने से लोग उसके मौजूदा कार्य के बारे में अधिक स्पष्ट और अधिक गहन समझ प्राप्त कर सकते हैं। वे अभ्यास का एक नया मार्ग भी प्राप्त कर सकते हैं, और वे पुराने मार्ग से चिपके नहीं रहेंगे; जिसका वे अभ्यास करते हैं, वह सब जीवन में विकास हासिल करने के लिए होगा। मिसाल के लिए, प्रार्थना का उद्देश्य कुछ अच्छे लगने वाले शब्द बोलना नहीं होता या यह जताने के लिए कि तुम परमेश्वर के कितने ऋणी हो, उसके सामने फूट-फूटकर रोना नहीं होता; बल्कि आत्मा के उपयोग में अपने आपको प्रशिक्षित करना है, परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत होने देना है, सभी मामलों में परमेश्वर के वचनों से मार्गदर्शन लेने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करना है, ताकि व्यक्ति का हृदय प्रतिदिन नई रोशनी की ओर आकर्षित हो सके, और वह नकारात्मक या आलसी न हो और परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने के सही मार्ग पर कदम रखे। आजकल अधिकांश लोग अभ्यास के तरीकों पर ध्यान केंद्रित करते हैं; उनका उद्देश्य सत्य का अनुसरण करना और जीवन विकास हासिल करना नहीं है। यहीं पर उनका भटकाव है। कुछ ऐसे भी हैं जो नई रोशनी को स्वीकारने में सक्षम हैं, लेकिन उनके अभ्यास के तरीके नहीं बदलते हैं। वे परमेश्वर के आज के वचनों को समझने की इच्छा रखते हुए अपनी पिछली धर्म-संबंधी धारणाओं को अपने साथ लाते हैं, इसलिए वे जो समझते हैं वह अभी भी धर्म-संबंधी धारणाओं से रंगे सिद्धांत हैं; वे शुद्ध और सामान्य तरीके से आज की रोशनी को स्वीकार नहीं रहे हैं। नतीजतन, उनके अभ्यास दूषित हो जाते हैं; वे पुराने सामान पर नया नाम चिपका रहे हैं। वे कितने भी अच्छे ढंग से अभ्यास करें, वे फिर भी ढोंगी ही हैं। परमेश्वर हर दिन नई चीजें करने में लोगों की अगुआई करता है, माँग करता है कि प्रत्येक दिन वे नई अंतर्दृष्टि और समझ हासिल करें और अपेक्षा करता है कि वे पुराने ढंग के और दोहराव करने वाले न हों। अगर तुमने कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है, लेकिन फिर भी तुम्हारे अभ्यास के तरीके बिलकुल नहीं बदले हैं और अगर तुम अभी भी बाहरी बातों को लेकर अत्यधिक उत्साही और व्यस्त हो, फिर भी शांत हृदय से परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने के लिए उसके सामने नहीं आते, तो तुम कुछ भी प्राप्त नहीं करोगे। जब परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने की बात आती है, तब यदि तुम अलग ढंग से योजना नहीं बनाते, अपने अभ्यास के लिए नए तरीके नहीं अपनाते और अपेक्षाकृत नई समझ पाने की कोशिश नहीं करते, बल्कि अभ्यास के अपने तरीके को बदले बिना, पुराने से चिपके रहते हो और केवल सीमित मात्रा में नई रोशनी को स्वीकारते हो, तो तुम्हारे जैसे लोग केवल नाम के लिए इस धारा में हैं; वास्तविकता में, वे मज़हबी फरीसी हैं जो पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के विषय में
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 415
सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए तुम्हें प्रतिदिन नई रोशनी को स्वीकारने और परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ का अनुसरण करने में सक्षम होना चाहिए। तुम्हें सत्य को स्पष्ट रूप से समझने लायक होना चाहिए, सभी मामलों में अभ्यास का मार्ग तलाशना चाहिए, प्रतिदिन परमेश्वर के वचनों को पढ़कर नई समस्याओं की खोज करनी चाहिए और अपनी कमियों को पहचानना चाहिए, ताकि तुम्हारे भीतर लालसा और खोज करने वाला ऐसा हृदय हो जो तुम्हारे समूचे अस्तित्व को प्रेरित करे और ताकि तुम हर समय परमेश्वर के सामने शांत रह सको तथा पीछे छूट जाने से गहराई से भयभीत रहो। इस तरह के लालायित और खोजी हृदय वाला व्यक्ति, जो लगातार प्रवेश पाने का इच्छुक है, वह आध्यात्मिक जीवन के सही मार्ग पर है। जो लोग पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने को अंगीकार करते हैं, जो बेहतर करने की इच्छा रखते हैं, जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के लिए प्रयास करने को तैयार हैं, जो परमेश्वर के वचनों की गहरी समझ के लिए लालायित हैं, जो अलौकिक का अनुसरण नहीं करते, बल्कि जो वास्तविक कीमत का भुगतान करते हैं, वास्तव में परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाते हैं और वास्तव में प्रवेश प्राप्त करते हैं, अपने अनुभवों को अधिक विशुद्ध और वास्तविक बनाते हैं, जो खोखले शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का अनुसरण नहीं करते या अलौकिक भावनाओं के पीछे नहीं भागते, जो किसी महान व्यक्तित्व की आराधना नहीं करते हैं—ये वे लोग हैं जिन्होंने एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश कर लिया है। वे जो कुछ भी करते हैं, उसका उद्देश्य जीवन में और अधिक विकास प्राप्त करना और स्वयं को आत्मा में ताज़ा और जीवंत बनाना है और वे हमेशा सक्रिय रूप से प्रवेश प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। बिना एहसास किए ही वे सत्य को समझने लगते हैं और वास्तविकता में प्रवेश करते हैं। जिनके आध्यात्मिक जीवन सामान्य हैं और जो प्रतिदिन आत्मा की मुक्ति और स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं, वे परमेश्वर की संतुष्टि के अनुसार उसके वचनों का लचीले ढंग से अभ्यास कर सकते हैं। यहाँ तक कि प्रार्थना में भी वे कोई औपचारिकता नहीं करते और वे प्रतिदिन नई रोशनी के साथ तालमेल रखने में सक्षम होते हैं। उदाहरण के लिए, लोग परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करने के लिए खुद को प्रशिक्षित करते हैं और उनका हृदय परमेश्वर के सामने वास्तव में शांत हो सकता है और उन्हें कोई परेशान नहीं कर सकता है। कोई भी व्यक्ति, घटना या वस्तु उनके सामान्य आध्यात्मिक जीवन को बाधित नहीं कर सकती है। इस तरह के प्रशिक्षण का उद्देश्य परिणाम प्राप्त करना है; इसका उद्देश्य लोगों के अनुपालन के लिए विनियम स्थापित करना नहीं है। यह अभ्यास विनियमों के अनुपालन के बारे में नहीं है, बल्कि लोगों के जीवन में विकास को बढ़ाने के बारे में है। यदि तुम इस अभ्यास को केवल विनियमों के पालन के रूप में देखते हो, तो तुम्हारा जीवन कभी नहीं बदलेगा। हो सकता है कि तुम उसी अभ्यास में लगे हुए हो जिसमें दूसरे लगे हुए हैं, लेकिन अंततः तुम पवित्र आत्मा की धारा से निकाल दिए जाते हो, जबकि अन्य लोग पवित्र आत्मा के कार्य के साथ तालमेल रखने में सक्षम हो जाते हैं। क्या तुम खुद को मूर्ख नहीं बना रहे हो? इन वचनों का उद्देश्य लोगों को परमेश्वर के सामने अपने हृदय शांत करने और अपने हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ने देना है, ताकि उन पर परमेश्वर का कार्य बिना किसी बाधा के हो सके और फलीभूत हो सके। केवल तभी लोग परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो सकते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के विषय में
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 416
तुम लोग अपने दैनिक जीवन में प्रार्थना को कोई महत्व नहीं देते। मनुष्य प्रार्थना के मामले की उपेक्षा करता है। प्रार्थनाएँ सतही हुआ करती थीं, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के सामने बस अनमना रहता था। किसी भी व्यक्ति ने कभी परमेश्वर के सामने पूरी तरह से अपना हृदय अर्पित नहीं किया और परमेश्वर से सच्ची प्रार्थना नहीं की। मनुष्य केवल तभी परमेश्वर से प्रार्थना करता जब उसे मदद चाहिए होती। इस पूरे समय में, क्या तुमने कभी परमेश्वर से सच में प्रार्थना की है? क्या कभी कोई ऐसा समय आया है, जब तुमने परमेश्वर के सामने वेदना के आँसू बहाए हों? क्या कोई ऐसा समय आया है, जब तुमने उसके सामने खुद को जाना हो? क्या तुमने कभी परमेश्वर से दिल से प्रार्थना की है? प्रार्थना अभ्यास से आती है : अगर तुम आम तौर पर घर पर प्रार्थना नहीं करते, तो तुम्हारे पास कलीसिया में प्रार्थना करने का कोई उपाय नहीं होगा, और अगर तुम सामान्यतः छोटी सभाओं में प्रार्थना नहीं करते, तो तुम बड़ी सभाओं में प्रार्थना करने में असमर्थ होगे। अगर तुम नियमित रूप से परमेश्वर के निकट नहीं आते या परमेश्वर के वचनों पर चिंतन नहीं करते, तो प्रार्थना के समय तुम्हारे पास कहने के लिए कुछ नहीं होगा, और अगर तुम प्रार्थना करते भी हो, तो तुम केवल ठकुरसुहाती कर रहे होगे; वह सच्ची प्रार्थना नहीं होगी।
सच्ची प्रार्थना क्या होती है? जब तुम परमेश्वर को यह बताते हो कि तुम्हारे हृदय में क्या है, जब तुम परमेश्वर के इरादों को समझते हो, उसके साथ संगति करते हो और परमेश्वर के वचनों के बारे में उसके साथ संगति करते हो, स्वयं को विशेष रूप से परमेश्वर के निकट महसूस करते हो, यह महसूस करते हो कि वह तुम्हारे सामने है, तुम्हें लगता है कि तुम्हें उससे कुछ कहना है, तुम अपने हृदय के भीतर काफी उजाला महसूस करते हो और यह महसूस करते हो कि परमेश्वर कितना प्यारा है—यह तुम्हें विशेष रूप से प्रेरित महसूस कराता है। तुम्हें सुनना तुम्हारे भाई-बहनों के लिए आनंद लाता है। उन्हें लगता है कि जो शब्द तुम बोल रहे हो, वे उनके दिल के भीतर के शब्द हैं, शब्द जो वे कहना चाहते हैं, और तुम्हारे शब्द उनके शब्दों के स्थानापन्न हैं। यही सच्ची प्रार्थना है। सच्ची प्रार्थना करने के बाद तुम्हारे दिल में शांति और एक आनंद का भाव होगा। तुम्हारी परमेश्वर से प्रेम करने की शक्ति बढ़ जाएगी और तुम महसूस करोगे कि जीवन में परमेश्वर से प्रेम करने से अधिक मूल्यवान या महत्वपूर्ण और कुछ नहीं है। यह सब साबित करता है कि तुम्हारी प्रार्थनाएँ प्रभावी रही हैं। क्या तुमने कभी इस तरह से प्रार्थना की है?
और प्रार्थना की विषयवस्तु के बारे में क्या खयाल है? तुम्हारी प्रार्थना तुम्हारे हृदय की सच्ची दशा और पवित्र आत्मा के कार्य के अनुरूप, कदम-दर-कदम आगे बढ़नी चाहिए और तुम्हें परमेश्वर के इरादों और मनुष्य से उसकी अपेक्षाओं के अनुसार परमेश्वर के साथ संगति करनी चाहिए। जब तुम प्रार्थना करने के लिए खुद को प्रशिक्षित करना शुरू करते हो, तो सबसे पहले अपना हृदय परमेश्वर को दो। परमेश्वर के इरादों को समझने का लक्ष्य मत रखो—बस अपने हृदय की बातों को परमेश्वर से कहने का लक्ष्य रखो। जब तुम परमेश्वर के समक्ष आओ, तो इस तरह बोलो : “परमेश्वर, आज ही मुझे एहसास हुआ कि मैं तुम्हारे खिलाफ विद्रोह किया करता था। मैं वास्तव में भ्रष्ट और घृणा के योग्य हूँ। मैं केवल अपना जीवन बरबाद करता रहा हूँ। आज से मैं तुम्हारे लिए जीऊँगा। मैं एक अर्थपूर्ण जीवन जीऊँगा और तुम्हारे इरादे पूरे करूँगा। तुम्हारा आत्मा मुझे लगातार रोशन और प्रबुद्ध करता हुआ हमेशा मेरे अंदर काम करे। मुझे अपने सामने मजबूत और जबरदस्त गवाही देने दो। शैतान तुम्हारी महिमा, तुम्हारी गवाही और तुम्हारी विजय का प्रमाण हम में अभिव्यक्त होता देखे।” जब तुम इस तरह से प्रार्थना करोगे, तो तुम्हारा हृदय पूरी तरह से मुक्त हो जाएगा। इस तरह से प्रार्थना करने के बाद तुम्हारा हृदय परमेश्वर के ज्यादा करीब हो जाएगा, और अगर तुम अकसर इस तरह से प्रार्थना कर सको, तो पवित्र आत्मा तुममें अनिवार्य रूप से काम करेगा। अगर तुम हमेशा इस तरह से परमेश्वर को पुकारोगे, और उसके सामने अपना संकल्प करोगे, तो एक दिन आएगा जब तुम्हारा संकल्प परमेश्वर के सामने स्वीकार्य होगा, जब तुम्हारा हृदय और तुम्हारा पूरा अस्तित्व परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिया जाएगा, और तुम अंततः उसके द्वारा पूर्ण कर दिए जाओगे। तुम लोगों के लिए प्रार्थना का अत्यधिक महत्व है। जब तुम प्रार्थना करते हो और पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करते हो, तो तुम्हारा हृदय परमेश्वर द्वारा प्रेरित होगा, और तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने की ताकत मिलेगी। अगर तुम अपने हृदय से प्रार्थना नहीं करते, अगर तुम परमेश्वर से संगति करने के लिए अपना हृदय नहीं खोलते, तो परमेश्वर के पास तुममें कार्य करने का कोई तरीका नहीं होगा। अगर प्रार्थना करने और अपने हृदय की बात कहने के बाद परमेश्वर के आत्मा ने अपना काम शुरू नहीं किया है, और तुम्हें कोई प्रेरणा नहीं मिली है, तो यह दर्शाता है कि तुम्हारे हृदय में ईमानदारी की कमी है, तुम्हारे शब्द असत्य और अभी भी अशुद्ध हैं। अगर प्रार्थना करने के बाद तुम्हें आनंद का एहसास हो, तो तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर को स्वीकार्य हैं और परमेश्वर का आत्मा तुममें काम कर रहा है। परमेश्वर के सामने सेवा करने वाले के तौर पर तुम प्रार्थना से रहित नहीं हो सकते। अगर तुम वास्तव में परमेश्वर के साथ संगति को ऐसी चीज के रूप में देखते हो, जो सार्थक और मूल्यवान है, तो क्या तुम प्रार्थना को त्याग सकते हो? कोई भी परमेश्वर के साथ संगति किए बिना नहीं रह सकता। प्रार्थना के बिना तुम देह में जीते हो, शैतान के बंधन में रहते हो; सच्ची प्रार्थना के बिना तुम अँधेरे के प्रभाव में रहते हो। मुझे आशा है कि तुम भाई-बहन हर दिन सच्ची प्रार्थना करने में सक्षम हो। यह विनियमों का पालन करने के बारे में नहीं है, बल्कि एक निश्चित परिणाम प्राप्त करने के बारे में है। क्या तुम सुबह की प्रार्थनाएँ करने और फिर परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने के लिए अपनी थोड़ी-सी नींद त्यागने को तैयार हो? अगर तुम शुद्ध हृदय से प्रार्थना करते हो और इस तरह परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम उसे अधिक स्वीकार्य होगे। अगर तुम हर सुबह ऐसा अभ्यास करते हो, अगर तुम हर दिन अपना हृदय देने परमेश्वर को देने को प्रशिक्षित करते हो, उससे संगति करने और जुडने की कोशिश करते हो, तो परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान निश्चित रूप से बढ़ेगा, और तुम परमेश्वर के इरादे बेहतर ढंग से समझ पाओगे। तुम कहते हो : “परमेश्वर! मैं अपना कर्तव्य पूरा करने को तैयार हूँ। मैं केवल तुम्हें ही अपना पूरा अस्तित्व समर्पित करने में सक्षम हूँ, ताकि तुम हमसे महिमा प्राप्त कर सको, ताकि तुम हमारे इस समूह द्वारा दी गई गवाही का आनंद ले सको। मैं तुमसे हम पर कार्य करने की विनती करता हूँ, ताकि मैं तुमसे सच्चा प्रेम करने, तुम्हें संतुष्ट करने और तुम्हारा अपने लक्ष्य के रूप में अनुसरण करने में सक्षम हो सकूँ।” जैसे ही तुम यह दायित्व उठाते हो, परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें पूर्ण बनाएगा। तुम्हें केवल अपने लिए ही प्रार्थना नहीं करनी चाहिए, बल्कि परमेश्वर की इच्छा का पालन करने और उससे प्रेम करने के लिए भी प्रार्थना करनी चाहिए। यह सबसे सच्ची प्रार्थना है। क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर की इच्छा का पालन करने के लिए प्रार्थना करता है?
अतीत में तुम लोग नहीं जानते थे कि प्रार्थना कैसे करनी चाहिए, और तुमने प्रार्थना के मामले की उपेक्षा की। अब तुम्हें खुद को प्रार्थना करने के लिए प्रशिक्षित करने की भरसक कोशिश करनी चाहिए। अगर तुम अपने भीतर परमेश्वर से प्रेम करने की ताकत जुटाने में असमर्थ हो, तो तुम प्रार्थना कैसे करते हो? तुम कहते हो : “परमेश्वर, मेरा हृदय तुमसे सच्चा प्रेम करने में असमर्थ है। मैं तुमसे प्रेम करना चाहता हूँ, लेकिन मेरे पास ताकत की कमी है। मैं क्या करूँ? तुम मेरी आध्यात्मिक आँखें खोल दो और तुम्हारा आत्मा मेरे हृदय को प्रेरित करे। इसे ऐसा बना दो कि जब मैं तुम्हारे सामने आऊँ, तो सारी नकारात्मक दशाएँ त्याग दूँ, किसी भी व्यक्ति, घटना या चीज से विवश होना छोड़ दूँ, और अपना हृदय तुम्हारे सामने पूरी तरह से खोलकर रख दूँ, और ऐसा कर दो कि मैं अपना संपूर्ण अस्तित्व तुम्हारे सामने अर्पित कर सकूँ। तुम चाहे जैसे मेरा परीक्षण करो, मैं तैयार हूँ। अब मैं अपनी भविष्य की संभावनाओं पर कोई ध्यान नहीं देता, और न ही मैं मृत्यु के जुए से बँधा हूँ। ऐसे हृदय के साथ, जो तुमसे प्रेम करता है, मैं जीवन के मार्ग की तलाश करने को तैयार हूँ। हर घटना, हर चीज—सब तुम्हारे हाथों में है; मेरा भाग्य तुम्हारे हाथों में है और मेरा पूरा जीवन और भी तुम्हारी हथेली में है। अब मैं तुमसे प्रेम करना चाहता हूँ, और चाहे तुम मुझे अपने से प्रेम करने दो या न करने दो, चाहे शैतान कितना भी विघ्न डाले, मैं तुमसे प्रेम करने के लिए दृढ़-संकल्प हूँ।” जब तुम्हारे सामने इस तरह की समस्या आए, तो इस तरह से प्रार्थना करो। अगर तुम हर दिन इस तरह प्रार्थना करोगे, तो धीरे-धीरे परमेश्वर से प्रेम करने की तुम्हारी ताकत बढ़ती जाएगी।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रार्थना के अभ्यास के बारे में
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 417
व्यक्ति सच्ची प्रार्थना में कैसे प्रवेश करता है?
प्रार्थना करते समय तुम्हारे पास ऐसा हृदय होना चाहिए, जो परमेश्वर के सामने शांत रहे, और एक ईमानदार हृदय होना चाहिए, और तुम्हें सच में परमेश्वर के साथ संगति और उससे सच में प्रार्थना करनी ही चाहिए—तुम्हें प्रीतिकर वचनों से परमेश्वर को फुसलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। प्रार्थना उस पर केंद्रित होनी चाहिए, जिसे परमेश्वर अभी पूरा करना चाहता है। परमेश्वर से कहो कि वह तुम्हें अधिक प्रबुद्धता और रोशनी प्रदान करे, और प्रार्थना करते समय अपनी वास्तविक अवस्थाएँ और कठिनाइयाँ उसके सामने लाओ, और वह संकल्प भी, जो तुमने परमेश्वर के सामने लिया था। प्रार्थना प्रक्रिया का पालन करना नहीं है; वह सच्चे हृदय से परमेश्वर को खोजना है, परमेश्वर को तुम्हारे हृदय की रक्षा करने के लिए कहते हुए, ताकि तुम्हारा हृदय अकसर उसके सामने शांत हो सके, ताकि जिन परिवेशों का उसने तुम्हारे लिए इंतजाम किया है उसमें तुम खुद को जान पाओ, खुद से नफरत कर पाओ, और स्वयं के खिलाफ विद्रोह कर पाओ, और इस प्रकार परमेश्वर के साथ सामान्य रिश्ता बना पाओ और वास्तव में ऐसे व्यक्ति बन पाओ, जो परमेश्वर से प्रेम करता है।
प्रार्थना का क्या महत्व है?
प्रार्थना उन तरीकों में से एक है जिनमें मनुष्य परमेश्वर से सहयोग करता है, यह एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को पुकारता है, और यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य को परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित किया जाता है। यह कहा जा सकता है कि जो लोग प्रार्थना नहीं करते, वे आत्मा से रहित मृत लोग हैं, जिससे साबित होता है कि उनमें परमेश्वर द्वारा प्रेरित किए जाने की क्षमता की कमी है। प्रार्थना के बिना सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीना असंभव होगा, पवित्र आत्मा के कार्य के साथ बने रहने की तो बात ही छोड़ दो। प्रार्थना से रहित होना परमेश्वर के साथ अपना संबंध तोड़ना है, और उसके बिना परमेश्वर की स्वीकृति पाना असंभव होगा। परमेश्वर के विश्वासी के तौर पर, व्यक्ति जितना अधिक प्रार्थना करता है, अर्थात् व्यक्ति परमेश्वर द्वारा जितना अधिक प्रेरित किया जाता है, उतना ही अधिक उसके पास संकल्प होगा और उतना ही अधिक वह परमेश्वर से नवीनतम प्रबुद्धता प्राप्त करने में सक्षम होगा। नतीजतन, केवल इस तरह का व्यक्ति पवित्र आत्मा द्वारा जल्द से जल्द पूर्ण बनाया जा सकता है।
प्रार्थना का उद्देश्य क्या प्रभाव हासिल करना है?
लोग प्रार्थना का अभ्यास करने और प्रार्थना का महत्व समझने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन प्रार्थना का प्रभावी होना कोई सरल बात नहीं है। प्रार्थना यंत्रवत् काम करने, प्रक्रिया का पालन करने या परमेश्वर के वचनों का पाठ करने का मामला नहीं है। अर्थात्, प्रार्थना कुछ वचनों को रटना नहीं है और दूसरों की नकल करना नहीं है। प्रार्थना में व्यक्ति को उस दशा तक पहुँचना चाहिए, जहाँ अपना हृदय परमेश्वर को दिया जा सके, जहाँ वह अपना हृदय खोलकर रख सके, ताकि उसे परमेश्वर द्वारा प्रेरित किया जा सके। अगर प्रार्थना को प्रभावी होना है, तो उसे परमेश्वर के वचन पढ़ने पर आधारित होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचनों के भीतर से प्रार्थना करने से ही व्यक्ति अधिक प्रबुद्धता और प्रकाश प्राप्त कर सकता है। सच्ची प्रार्थना की अभिव्यक्तियाँ हैं : एक ऐसा हृदय होना, जो उस सबके लिए तरसता है जो परमेश्वर कहता है, और यही नहीं, जो वह चाहता है उसे पूरा करने की इच्छा रखता है; उससे नफरत करना जिससे परमेश्वर नफरत करता है, और फिर इस नींव पर इसकी कुछ समझ प्राप्त करना, और परमेश्वर द्वारा प्रतिपादित सत्यों के बारे में कुछ ज्ञान और स्पष्टता हासिल करना। प्रार्थना के बाद संकल्प, आस्था, ज्ञान और अभ्यास का मार्ग होने पर ही उसे सच्ची प्रार्थना कहा जा सकता है, और केवल इस प्रकार की प्रार्थना ही प्रभावी हो सकती है। फिर भी, प्रार्थना परमेश्वर के वचनों के आनंद पर निर्मित होनी चाहिए, उसे परमेश्वर के साथ उसके वचनों में संगति करने की नींव पर स्थापित होना चाहिए, और हृदय परमेश्वर की खोज करने और उसके समक्ष शांत होने में सक्षम होना चाहिए। इस तरह की प्रार्थना पहले ही परमेश्वर के साथ सच्ची संगति के चरण में प्रवेश कर चुकी है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रार्थना के अभ्यास के बारे में
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 418
प्रार्थना के बारे में सबसे बुनियादी ज्ञान :
1. जो भी मन में आए, उसे आँख मूँदकर मत कहो। तुम्हारे हृदय पर एक बोझ होना चाहिए, अर्थात् प्रार्थना करते समय तुम्हारे पास एक उद्देश्य होना चाहिए।
2. प्रार्थना में परमेश्वर के वचन शामिल होने चाहिए; उसे परमेश्वर के वचनों पर आधारित होना चाहिए।
3. प्रार्थना करते समय तुम्हें घिसी पिटी बातें नहीं करनी चाहिए। तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के वर्तमान वचनों से संबंधित होनी चाहिए, और जब तुम प्रार्थना करो, तो परमेश्वर को अपने अंतरतम विचार बताओ।
4. समूह-प्रार्थना एक केंद्र के इर्द-गिर्द घूमनी चाहिए, जो आवश्यक रूप से, पवित्र आत्मा का वर्तमान कार्य है।
5. सभी लोगों को मध्यस्थतापरक प्रार्थना सीखनी है। यह परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाने का एक तरीका भी है।
व्यक्ति का प्रार्थना का जीवन प्रार्थना के महत्व की समझ और प्रार्थना के मूलभूत ज्ञान पर आधारित होता है। दैनिक जीवन में अक्सर अपनी कमियों की खातिर परमेश्वर से विनती और प्रार्थना करो, जीवन स्वभाव में बदलाव लाने के लिए प्रार्थना करो, और परमेश्वर के वचनों के अपने ज्ञान के आधार पर प्रार्थना करो। प्रत्येक व्यक्ति को प्रार्थना का अपना जीवन स्थापित करना चाहिए, उसे परमेश्वर के वचनों को जानने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, और उसे परमेश्वर के कार्य का ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। परमेश्वर के सामने अपनी व्यक्तिगत परिस्थितियाँ खोलकर रख दो और प्रार्थना करने के तरीके की चिंता किए बिना वास्तविक बनो, और मुख्य बात परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ और उनका व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करना है। आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश का अनुसरण करने वाले व्यक्ति को बहुत सारे विभिन्न तरीकों से प्रार्थना करने में सक्षम होना चाहिए। मौन प्रार्थना, परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करना, परमेश्वर के कार्य को जानना—ये सभी सामान्य आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक संगति के उद्देश्यपूर्ण कार्य के उदाहरण हैं, जो हमेशा परमेश्वर के सामने व्यक्ति की स्थितियों में सुधार करते हैं और व्यक्ति को जीवन में और अधिक प्रगति करने के लिए प्रेरित करते हैं। संक्षेप में, तुम जो कुछ भी करते हो, चाहे वह परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना हो, या चुपचाप प्रार्थना करना हो, या जोर-जोर से घोषणा करना हो, वह सब तुम्हें परमेश्वर के वचनों, उसके कार्य और जो कुछ वह तुममें हासिल करना चाहता है, उसे स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम बनाने के लिए है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम जो कुछ भी करते हो, वह परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों तक पहुँचने और अपना जीवन नई ऊँचाइयों तक ले जाने के लिए किया जाता है। परमेश्वर मनुष्य से जिस न्यूनतम मानक की माँग करता है वह यह है कि मनुष्य उसके प्रति अपना हृदय खोल पाए। अगर मनुष्य अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को देता है और जो वास्तव में उसके हृदय में है वह बोलता है तो परमेश्वर उसमें कार्य करने का इच्छुक होता है। परमेश्वर जो चाहता है वह मनुष्य का वक्र हृदय नहीं है बल्कि एक शुद्ध और ईमानदार हृदय है। अगर मनुष्य अपने हृदय से परमेश्वर से बात नहीं करता है, तो परमेश्वर उसके हृदय को प्रेरित नहीं करेगा और न ही उसमें कार्य करेगा। इसलिए, प्रार्थना का मर्म है परमेश्वर के साथ अपने हृदय से बात करना, उसे अपनी कमियाँ या अपना विद्रोही स्वभाव बताना, अपने आपको उसके सामने पूरी तरह से खोलकर रखना; केवल तभी परमेश्वर को तुम्हारी प्रार्थनाओं में रुचि होगी, अन्यथा वह तुमसे अपना चेहरा छिपा लेगा। प्रार्थना के लिए न्यूनतम मानक यह है कि तुम परमेश्वर के सामने अपना हृदय शांत अवश्य रख पाओ और तुम्हारा हृदय परमेश्वर से दूर न हटे। हो सकता है, इस चरण के दौरान तुम्हें पहले से अधिक नई या ऊँचे स्तर की कोई अंतर्दृष्टि प्राप्त न हो, लेकिन तब तुम्हें प्रार्थना के माध्यम से अपनी वर्तमान स्थिति बनाए रखनी चाहिए—तुम्हें पीछे नहीं हटना चाहिए। कम से कम यह तो तुम्हें प्राप्त करना ही चाहिए। अगर तुम यह भी नहीं कर सकते, तो यह साबित करता है कि तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन सही रास्ते पर नहीं है। परिणामस्वरूप, तुम उस दृष्टि को बनाए रखने में असमर्थ होगे, जो तुम्हारे पास पहले थी, तुम परमेश्वर में आस्था खो दोगे, और इसके बाद तुम्हारा संकल्प नष्ट हो जाएगा। तुमने आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश किया है या नहीं, इसका एक चिह्न यह देखना है कि तुम्हारी प्रार्थनाएँ सही रास्ते पर हैं या नहीं। सभी लोगों को इस वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए; उन सभी को प्रार्थना में स्वयं को लगातार सजगता से प्रशिक्षित करने का काम करना चाहिए, निष्क्रिय रूप से प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि सचेत रूप से पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित होने का प्रयास करना चाहिए। तभी वे ऐसे लोग होंगे, जो वास्तव में परमेश्वर की तलाश करते हैं।
जब तुम प्रार्थना करना शुरू करो, तो अयथार्थवादी मत बनो और एक ही झटके में सब-कुछ हासिल करने की उम्मीद मत करो। तुम इस बात की उम्मीद रखते हुए असाधारण माँगें नहीं कर सकते कि जैसे ही तुम मुँह खोलोगे, वैसे ही तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित कर दिया जाएगा, या कि तुम्हें प्रबुद्धता और रोशनी मिल जाएगी, या परमेश्वर तुम्हें महान अनुग्रह देगा। ऐसा नहीं होगा; परमेश्वर अलौकिक चीजें नहीं करता। परमेश्वर लोगों की प्रार्थनाएँ अपने हिसाब से स्वीकार करता है, और कभी-कभी वह यह देखने के लिए कि तुम उसके प्रति वफादार हो या नहीं, तुम्हारी आस्था का परीक्षण करता है। जब तुम प्रार्थना करते हो, तो तुममें विश्वास, दृढ़ता और संकल्प होना चाहिए। अधिकतर लोग प्रशिक्षित होना शुरू करते ही आसानी से हतोत्साहित हो जाते हैं, क्योंकि वे पवित्र आत्मा के स्पर्श को महसूस करने में विफल रहते हैं। इससे काम नहीं चलेगा! तुम्हें दृढ़ रहना चाहिए; तुम्हें पवित्र आत्मा के स्पर्श का एहसास करने और खोजने व छानबीन करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। कभी तुम्हारे अभ्यास का मार्ग सही नहीं होता, और कभी तुम्हारे व्यक्तिगत उद्देश्य और धारणाएँ परमेश्वर के सामने टिक नहीं पातीं, और इसलिए परमेश्वर का आत्मा तुम्हें प्रेरित नहीं करता है। अन्य अवसरों पर परमेश्वर यह देखता है कि तुम वफादार हो या नहीं। संक्षेप में, प्रशिक्षण में तुम्हें ऊँची कीमत चुकानी चाहिए। अगर तुम्हें पता चले कि तुम्हारे अभ्यास के मार्ग में विचलन है, तो तुम अपना प्रार्थना करने का तरीका बदल सकते हो। अगर तुम सच्चे हृदय से खोज करते हो और प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हो, तो पवित्र आत्मा तुम्हें निश्चित रूप से इस वास्तविकता में ले जाएगा। कभी-कभी तुम सच्चे हृदय से प्रार्थना करते हो, लेकिन ऐसा महसूस नहीं करते कि तुम विशेष रूप से प्रेरित किए गए हो। ऐसे समय में तुम्हें आस्था पर निर्भर रहना चाहिए, इस बात पर विश्वास करना चाहिए कि परमेश्वर तुम्हारी प्रार्थनाओं की पड़ताल कर रहा है; तुम्हें अपनी प्रार्थनाओं में दृढ़ रहना चाहिए।
ईमानदार व्यक्ति बनो; अपने हृदय में मौजूद धूर्तता से छुटकारा दिलाने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करो। हर समय प्रार्थना के माध्यम से खुद को शुद्ध करो और प्रार्थना के माध्यम से परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित होओ। इस प्रकार तुम्हारा स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा। सच्चा आध्यात्मिक जीवन प्रार्थना का जीवन है—यह पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने का जीवन है। पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने की प्रक्रिया मनुष्य का स्वभाव बदले जाने की प्रक्रिया है। जिस जीवन में व्यक्ति पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित नहीं होता, वह एक आध्यात्मिक जीवन नहीं होता है; बल्कि धार्मिक अनुष्ठान का जीवन होता है। जो लोग अक्सर पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित होते हैं, उसी के द्वारा प्रबुद्ध और रोशन किए जाते हैं, केवल वही आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश कर चुके हैं। जैसे-जैसे मनुष्य प्रार्थना करता जाता है, उसका स्वभाव लगातार बदलता जाता है। उसे परमेश्वर का आत्मा जितना अधिक प्रेरित करता है, वह उतना ही अधिक सकारात्मक और समर्पणशील होता जाता है। इसलिए उसका हृदय भी धीरे-धीरे शुद्ध होता जाएगा और उसका स्वभाव भी धीरे-धीरे बदलता जाएगा। ऐसा होता है सच्ची प्रार्थना का प्रभाव।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रार्थना के अभ्यास के बारे में
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 419
परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने से अधिक महत्वपूर्ण कदम कोई नहीं है। यह वह सबक है, जिसमें वर्तमान में सभी लोगों को प्रवेश करने की तत्काल आवश्यकता है। परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने में प्रवेश करने के निम्नलिखित मार्ग हैं :
1. अपने हृदय को बाहरी मामलों से हटा लो, परमेश्वर के समक्ष शांत रहो और अपना एकचित्त ध्यान परमेश्वर से प्रार्थना करने में लगाओ।
2. परमेश्वर के समक्ष शांत हृदय के साथ परमेश्वर के वचनों को खाओ, पीओ और उनका आनंद लो।
3. परमेश्वर के प्रेम पर ध्यानपूर्वक मनन करो और उस पर चिंतन करो और परमेश्वर के कार्य पर विचार करो।
सर्वप्रथम प्रार्थना के पहलू से आरंभ करो। एकचित्त होकर तथा नियत समय पर प्रार्थना करो। तुम्हारे पास समय की चाहे कितनी भी कमी हो, तुम कार्य में कितने भी व्यस्त हो, या तुम्हारे साथ कुछ भी क्यों ना हो, हर दिन सामान्य रूप से प्रार्थना करो, सामान्य रूप से परमेश्वर के वचनों को खाओ और पीओ। जब तक तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते रहोगे, तब तक चाहे तुम्हारा परिवेश कैसा भी क्यों ना हो, तुम्हें बहुत आत्मिक आनंद मिलेगा, और तुम लोगों, घटनाओं या अपने आसपास की चीज़ों से प्रभावित नहीं होगे। जब तुम अपने हृदय में साधारण रूप से परमेश्वर का मनन करते हो, तो बाहर जो कुछ भी होता है, वह तुम्हें परेशान नहीं कर सकता। आध्यात्मिक कद काठी प्राप्त करने का यही अर्थ है। प्रार्थना से आरंभ करो : परमेश्वर के सामने खुद को शांत करके प्रार्थना करना बहुत फलदायक है। इसके पश्चात्, परमेश्वर के वचनों को खाओ और पीओ, उसके वचनों पर मनन करके उनसे प्रकाश पाने का प्रयास करो, अभ्यास करने का मार्ग ढूँढ़ो, परमेश्वर के वचनों को कहने में उसके उद्देश्य को जानो, और उन्हें बिना भटके समझो। साधारणतया, बाहरी चीज़ों से विक्षुब्ध हुए बिना तुम्हारे हृदय को सामान्य रूप से परमेश्वर के निकट आने, परमेश्वर के प्रेम पर मनन करने और उसके वचनों पर चिंतन करने में समर्थ होना चाहिए। जब तुम्हारा हृदय एक हद तक शांत हो जाएगा, तो चाहे जैसा भी तुम्हारा परिवेश हो, तुम चुपचाप ध्यान लगाने और अपने भीतर परमेश्वर के प्रेम पर मनन करने और वास्तव में परमेश्वर के निकट आने में सक्षम हो जाओगे, जब तक कि अंततः तुम ऐसी स्थिति में नहीं पहुँच जाओगे जहाँ तुम्हारे हृदय में परमेश्वर के लिए प्रशंसा उमड़ने लगे, और यह प्रार्थना करने से भी बेहतर है। तब तुम एक निश्चित आध्यात्मिक कद काठी के हो जाओगे। यदि तुम ऊपर वर्णित अवस्थाओं में होने की स्थिति प्राप्त कर पाते हो, तो यह इस बात का प्रमाण होगा कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष सच में शांत है। यह पहला बुनियादी सबक है। जब लोग परमेश्वर के सामने शांत होने में सक्षम होते हैं, केवल तभी वे पवित्र आत्मा के द्वारा प्रेरित, प्रबुद्ध और रोशन किए जा सकते हैं, और केवल तभी वे परमेश्वर के साथ सच्ची संगति कर पाते हैं और साथ ही परमेश्वर के इरादों और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन को समझ पाते हैं। तब वे अपने आध्यात्मिक जीवन में सही राह पर प्रवेश कर चुके होंगे। परमेश्वर के सामने रहने का उनका प्रशिक्षण जब एक निश्चित गहराई तक पहुँच जाता है, और वे स्वयं के खिलाफ विद्रोह करने, स्वयं से नफरत करने और परमेश्वर के वचनों में जीने में समर्थ हो जाते हैं, तब उनके हृदय वास्तव में परमेश्वर के समक्ष शांत होते हैं। स्वयं से नफरत करने, स्वयं को कोसने और स्वयं के खिलाफ विद्रोह करने में समर्थ होना, वह प्रभाव है जो परमेश्वर के कार्य द्वारा प्राप्त होता है, और लोगों के द्वारा अपने दम पर नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार, अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष शांत करने का अभ्यास वह सबक है, जिसमें लोगों को तत्काल प्रवेश करना चाहिए। कुछ लोगों के लिए, न केवल वे साधारण तौर पर परमेश्वर के समक्ष शांत होने में असमर्थ होते हैं, बल्कि वे प्रार्थना करते समय भी अपने हृदय को शांत नहीं रख सकते। यह परमेश्वर के मानकों से बहुत कम है! यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं हो सकता, तो क्या तुम पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जा सकते हो? यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रह सकता, तो किसी के आने से या दूसरों के बात करने पर तुम्हारा ध्यान भंग हो सकता है, और जब दूसरे लोग कार्य करते हैं तो तुम्हारा हृदय दूर खिंच सकता है, ऐसे मामले में तुम परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं जीते हो। यदि तुम्हारा हृदय वास्तव में परमेश्वर के समक्ष शांत रहता है, तो बाहरी दुनिया में होने वाली किसी भी बात से तुम अशांत नहीं होगे, या तुम पर किसी भी व्यक्ति, घटना या वस्तु द्वारा कब्जा नहीं किया जा सकेगा। यदि तुम्हारा इसमें प्रवेश है, तो वे नकारात्मक अवस्थाएँ और समस्त नकारात्मक चीज़ें—मानवीय धारणाएँ, सांसारिक आचरण के फलसफे, लोगों के बीच असामान्य संबंध तथा मत और विचार, इत्यादि—स्वाभाविक रूप से गायब हो जाएँगी। चूँकि तुम सदा परमेश्वर के वचनों पर चिंतन कर रहे हो, और तुम्हारा हृदय हमेशा परमेश्वर के निकट आ रहा है और हमेशा परमेश्वर के वर्तमान वचनों से घिरा रहता है, इसलिए वे नकारात्मक चीज़ें अनजाने ही तुमसे दूर हो जाएँगी। जब नई और सकारात्मक चीज़ें तुम पर कब्जा करेंगी, तब पुरानी नकारात्मक चीज़ों के लिए कोई जगह नहीं रहेगी, इसलिए उन नकारात्मक चीज़ों पर ध्यान न दो। तुम्हें उन्हें नियंत्रित करने के लिए कोई प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें परमेश्वर के समक्ष शांत रहने, परमेश्वर के वचनों को अधिक से अधिक खाने, पीने और उनका आनंद लेने, परमेश्वर की स्तुति में अधिकाधिक भजन गाने, और परमेश्वर को अपने ऊपर कार्य करने का अवसर देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर इस समय लोगों को व्यक्तिगत रूप से पूर्ण बनाना चाहता है, और वह तुम्हारे हृदय को हासिल करना चाहता है; उसका आत्मा तुम्हारे हृदय को प्रेरित करता है, और यदि पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का अनुसरण करके तुम परमेश्वर की उपस्थिति में आ जाते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट करोगे। यदि तुम परमेश्वर के वचनों में जीने पर ध्यान देते हो, और पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करने के लिए सत्य के बारे में संगति करने में अधिक संलग्न होते हो, तो वे धार्मिक धारणाएँ और तुम्हारा दंभ और अहम्मन्यता, सब गायब हो जाएँगे, और तुम जान जाओगे कि किस प्रकार अपने आपको परमेश्वर के लिए व्यय करना है, किस प्रकार परमेश्वर से प्रेम करना है, और किस प्रकार उसे संतुष्ट करना है। और बिना तुम्हारे जाने परमेश्वर के लिए असंगत चीज़ें तुम्हारी चेतना में से गायब हो जाएँगी।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 420
परमेश्वर के वर्तमान वचनों को खाते और पीते हुए उसके वचनों पर चिंतन और प्रार्थना करना परमेश्वर के समक्ष शांत होने की ओर पहला कदम है। यदि तुम सच में परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकते हो, तो पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी तुम्हारे साथ होगी। समस्त आध्यात्मिक जीवन परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहने से प्राप्त किया जाता है। प्रार्थना करने में तुम्हें परमेश्वर के समक्ष शांत अवश्य होना चाहिए, केवल तभी तुम पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जा सकते हो। परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हुए जब तुम परमेश्वर के समक्ष शांत होते हो, तो तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन किया जा सकता है, और तुम परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ प्राप्त कर सकते हो। ध्यान, संगति और मनोयोगपूर्वक अपनी सामान्य गतिविधियों में और परमेश्वर के निकट होने में जब तुम परमेश्वर की उपस्थिति में शांत हो जाओगे, तुम परमेश्वर के साथ वास्तविक रूप से निकट आ पाओगे, परमेश्वर के प्रेम और उसके कार्य की वास्तविक समझ रख पाओगे, और परमेश्वर के इरादों के प्रति सच्ची विचारशीलता दिखा पाओगे। जितना अधिक तुम साधारणतः परमेश्वर के सामने शांत रहने में सक्षम होगे, उतना ही अधिक तुम रोशन होगे और उतना ही अधिक तुम अपने स्वयं के भ्रष्ट स्वभाव को समझ पाओगे, और समझ पाओगे कि तुममें किस चीज़ की कमी है, तुम्हें किसमें प्रवेश करना है, कौन-से कार्य में तुम्हें सेवा करनी चाहिए, और किसमें तुम्हारी कमियाँ निहित हैं। यह सब परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहने से प्राप्त होता है। यदि तुम परमेश्वर के समक्ष अपनी शांति में सच में गहराई प्राप्त कर लेते हो, तो तुम आत्मा के कुछ रहस्यों को स्पर्श कर पाओगे, यह समझ पाओगे कि वर्तमान में परमेश्वर तुम पर क्या करना चाहता है, परमेश्वर के वचनों को अधिक गहराई से समझ पाओगे, परमेश्वर के वचनों के मर्म, सार और अस्तित्व को समझ पाओगे, और तुम अभ्यास के मार्ग को अधिक स्पष्टता और परिशुद्धता से देख पाओगे। यदि तुम अपनी आत्मा में शांत रहने में पर्याप्त गहराई प्राप्त करने में असफल रहते हो, तो तुम पवित्र आत्मा द्वारा केवल थोड़ा-सा ही प्रेरित किए जाओगे; तुम अंदर से मज़बूत महसूस करोगे और एक निश्चित मात्रा में आनंद और शांति अनुभव करोगे, लेकिन तुम कुछ भी गहराई से नहीं समझोगे। मैंने पहले कहा है : यदि लोग अपना पूरा सामर्थ्य नहीं लगाते हैं, तो उनके लिए मेरी वाणी को सुनना या मेरा चेहरा देखना कठिन होगा। यह परमेश्वर के समक्ष शांति में गहराई प्राप्त करने का इशारा करता है, न कि सतही प्रयास करने का। जो व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर के समक्ष सच में शांत रह सकता है, वह खुद को समस्त सांसारिक बंधनों से मुक्त कर पाता है, और परमेश्वर द्वारा कब्जा किए जाने में समर्थ होता है। वे सभी, जो परमेश्वर के समक्ष शांत होने में असमर्थ हैं, निश्चित रूप से लंपट और स्वछंद हैं। वे सभी, जो परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में समर्थ हैं, वे लोग हैं जो परमेश्वर के समक्ष पवित्र हैं, और जो परमेश्वर के लिए लालायित रहते हैं। केवल परमेश्वर के आगे शांत रहने वाले लोग ही जीवन को महत्व देते हैं, आत्मा में संगति को महत्व देते हैं, परमेश्वर के वचनों के प्यासे होते हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं। वे सभी जो परमेश्वर के समक्ष शांत रहने को महत्व नहीं देते और इसका अभ्यास नहीं करते, वे दुनिया से मोह रखने वाले व्यर्थ और सतही लोग हैं, और ऐसे लोग हैं जिनमें जीवन नहीं है; भले ही वे कहें कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे केवल दिखावटी बात करते हैं। जिन्हें परमेश्वर अंततः सिद्ध बनाता है और पूर्णता देता है, वे लोग हैं जो परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रह सकते हैं। इसलिए जो लोग परमेश्वर के समक्ष शांत होते हैं, वे बड़े आशीषों का अनुग्रह प्राप्त करते हैं। जो लोग दिन भर में परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के लिए शायद ही समय निकालते हैं, जो पूरी तरह से बाहरी मामलों में लीन रहते हैं और जीवन में प्रवेश को थोड़ा ही महत्व देते हैं—वे सब ढोंगी हैं, जिनके भविष्य में विकास के कोई आसार नहीं हैं। जो लोग परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकते हैं और वास्तव में परमेश्वर से संगति कर सकते हैं, वे ही परमेश्वर के लोग होते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 421
परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में स्वीकार करने हेतु उसके समक्ष आने के लिए तुम्हें पहले उसके समक्ष शांत होना होगा। जब तुम परमेश्वर के समक्ष शांत होगे, केवल तभी वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा और तुम्हें ज्ञान देगा। लोग परमेश्वर के समक्ष जितना अधिक शांत होते हैं, उतना अधिक वे प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त कर पाते हैं। इस सबके लिए आवश्यक है कि लोगों में भक्ति और विश्वास हो; केवल इसी प्रकार वे सिद्ध बनाए जा सकते हैं। आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने का बुनियादी सबक परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहना है। यदि तुम परमेश्वर की उपस्थिति में शांत होगे, तो केवल तभी तुम्हारा समस्त आध्यात्मिक प्रशिक्षण प्रभावी होगा। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में असमर्थ है, तो तुम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त नहीं कर पाओगे। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत है, तो चाहे तुम जो कुछ भी करो, तब तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर की उपस्थिति में जीता है। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत है और उसके समीप जाता है, तो चाहे तुम कुछ भी करो, इससे साबित होता है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के समक्ष शांत रहता है। यदि तुम लोगों से वार्तालाप करते समय, चलते-फिरते समय यह कह पाते हो, “मेरा हृदय परमेश्वर के समीप जा रहा है और बाहरी चीज़ों पर केंद्रित नहीं है, और मैं परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकता हूँ,” तो तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के समक्ष शांत रहता है। ऐसी किसी चीज़ में, जो तुम्हारे हृदय को बाहरी मामलों की तरफ खींचती हो, या ऐसे लोगों के साथ, जो तुम्हारे हृदय को परमेश्वर से अलग करते हों, संलग्न मत हो। जो कुछ भी तुम्हारे हृदय के परमेश्वर के निकट आने में विघ्न डाल सकता है, उसे अलग रख दो, या उससे दूर रहो। यह तुम्हारे जीवन के लिए कहीं अधिक लाभदायक है। अभी निश्चित रूप से पवित्र आत्मा के महान कार्य का समय है, वह समय, जब परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से लोगों को सिद्ध बना रहा है। यदि, इस क्षण, तुम परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रह सकते हो, तो तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो, जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटा है। यदि तुम परमेश्वर के अलावा अन्य चीजों का अनुसरण करते हो, तो तुम्हें परमेश्वर द्वारा सिद्ध बनाए जाने का कोई मार्ग नहीं होगा। जो लोग परमेश्वर से ऐसे कथनों को सुन सकते हैं और फिर भी आज उसके समक्ष शांत रहने में असफल रहते हैं, वे ऐसे लोग हैं, जो सत्य और परमेश्वर से प्रेम नहीं करते। यदि इस क्षण तुम अपने आपको समर्पित नहीं करोगे, तो तुम किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो? अपने आपको समर्पित करना परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत करना है। यही एक वास्तविक बलि होगी। जो कोई भी अब सचमुच अपना हृदय परमेश्वर को समर्पित करता है, वह परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए आश्वस्त किया जाता है। कोई भी चीज, चाहे वह कुछ भी क्यों न हो, तुम्हें बाधित नहीं कर सकती है; चाहे वह तुम्हारी काट-छाँट करना हो, या चाहे तुम्हें कुंठा या असफलता का सामना करना पड़े, तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष हमेशा शांत होना चाहिए। चाहे लोग तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार करें, तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत होना चाहिए। चाहे तुम्हें कैसी भी परिस्थिति का सामना करना पड़े—चाहे तुम पर क्लेश, पीड़ा, उत्पीड़न या तमाम परीक्षण आ पड़ें—तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष हमेशा शांत होना चाहिए; सिद्ध किए जाने के ऐसे ही मार्ग हैं। जब तुम परमेश्वर के समक्ष शांत होते हो, केवल तभी परमेश्वर के वर्तमान वचन तुम्हें स्पष्ट होंगे। तब तुम अधिक सही तरीके से और बिना विचलन के पवित्र आत्मा की रोशनी और प्रबुद्धता का अभ्यास कर सकते हो, और इससे तुम परमेश्वर के इरादों को और अधिक स्पष्टता से समझ सकते हो, अपनी सेवा को एक अधिक स्पष्ट दिशा प्रदान कर सकते हो, और तुम अधिक परिशुद्धता से पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और प्रेरणा को समझ सकते हो, और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अधीन रहने के बारे में आश्वस्त हो सकते हो। परमेश्वर के समक्ष सचमुच शांत रहने के ऐसे ही परिणाम प्राप्त होते हैं। जब लोग परमेश्वर के वचनों के बारे में स्पष्ट नहीं होते, उनके पास अभ्यास करने का कोई मार्ग नहीं होता, वे परमेश्वर के इरादों को समझने में असफल रहते हैं, या उनमें अभ्यास के सिद्धांतों का अभाव होता है, तो ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि परमेश्वर के समक्ष उनका हृदय शांत नहीं होता। परमेश्वर के समक्ष शांत रहने का उद्देश्य अति सावधान और व्यावहारिक होना, परमेश्वर के वचनों में विशुद्धता और स्पष्टता ढूँढ़ना, और अंततः सत्य को समझने और परमेश्वर को जानने की स्थिति में पहुँचना है।
यदि तुम्हारा हृदय प्रायः परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रहता, तो परमेश्वर के पास तुम्हें सिद्ध करने का कोई साधन नहीं है। संकल्पहीन होना हृदयहीन होने के बराबर है, और हृदयहीन व्यक्ति परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं हो सकता; ऐसा व्यक्ति नहीं जानता कि परमेश्वर कितना कार्य करता है, या वह कितना कुछ बोलता है, न ही वह यह जानता है कि अभ्यास कैसे किया जाए। क्या यह व्यक्ति हृदयहीन नहीं है? क्या हृदयहीन व्यक्ति परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकता है? हृदयहीन लोगों को सिद्ध बनाने का परमेश्वर के पास कोई साधन नहीं है—और वे जानवरों से भिन्न नहीं हैं। परमेश्वर इतने स्पष्ट और पारदर्शी तरीके से बोला है, फिर भी तुम्हारा हृदय प्रेरित नहीं होता और तुम परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में असमर्थ रहते हो। क्या तुम एक जानवर नहीं हो? कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहने के अभ्यास में भटक जाते हैं। जब भोजन पकाने का समय होता है, तो वे भोजन नहीं पकाते, जब काम का समय होता है, तो वे काम नहीं करते, बल्कि केवल प्रार्थना और ध्यान ही करते रहते हैं। परमेश्वर के समक्ष शांत रहने का अर्थ यह नहीं है कि भोजन मत पकाओ या काम मत करो, या अपना जीवन मत जीओ; बल्कि, यह सभी सामान्य अवस्थाओं में परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत करने में सक्षम होना, और अपने हृदय में परमेश्वर के लिए एक स्थान रखना है। जब तुम प्रार्थना करते हो, तो प्रार्थना करने के लिए तुम्हें परमेश्वर के आगे ठीक तरह से घुटने टेककर झुकना चाहिए; जब तुम काम कर रहे या भोजन तैयार कर रहे होते हो, तो परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत करो, परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करो, या भजन गाओ। तुम चाहे अपने आपको किसी भी परिस्थिति में पाओ, तुम्हारे पास अभ्यास करने का अपना तरीका होना चाहिए, परमेश्वर के निकट आने के लिए तुम जो कुछ कर सकते हो, तुम्हें करना चाहिए, और परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के लिए तुम्हें अपनी पूरी ताक़त से कोशिश करनी चाहिए। जब परिस्थितियाँ अनुमति दें, तो एकचित्त होकर प्रार्थना करो; और जब परिस्थितियाँ अनुमति न दें, तो अपने हृदय में परमेश्वर के निकट जाओ साथ ही अपने हाथों से काम करते रहो। जब तुम परमेश्वर के वचनों को खा और पी सकते हो, तो उसके वचनों को खाओ और पीओ; जब तुम प्रार्थना कर सकते हो, तो प्रार्थना करो; जब तुम परमेश्वर का मनन कर सकते हो, तब उसका मनन करो। दूसरे शब्दों में, अपने परिवेश के अनुसार प्रवेश के लिए अपने आपको प्रशिक्षित करने हेतु अपनी पूरी कोशिश करो। कुछ लोग परमेश्वर के समक्ष तभी शांत हो पाते हैं, जब कोई समस्या नहीं होती, लेकिन जैसे ही कुछ होता है, उनके मन भटक जाते हैं। यह परमेश्वर के समक्ष शांत होना नहीं है। इसे अनुभव करने का सही तरीका है : किसी भी परिस्थिति में हमारा हृदय परमेश्वर से दूर न जाए, या बाहरी लोगों, घटनाओं या चीज़ों से विक्षुब्ध महसूस न करे, और केवल तभी कोई व्यक्ति ऐसा होता है, जो परमेश्वर के समक्ष सचमुच शांत होता है। कुछ लोग कहते हैं कि जब वे सभाओं में प्रार्थना करते हैं, तो परमेश्वर के सामने उनका हृदय शांत रह सकता है, किंतु दूसरों के साथ संगति में वे परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में असमर्थ रहते हैं, उनके विचार भटक जाते हैं। यह परमेश्वर के समक्ष शांत रहना नहीं है। आज अधिकांश लोग इसी अवस्था में हैं, उनके हृदय परमेश्वर के समक्ष हमेशा शांत रहने में असमर्थ हैं। इसलिए, तुम लोगों को इस क्षेत्र में प्रशिक्षण में अधिक प्रयास अवश्य लगाने चाहिए, जीवन-अनुभव के सही पथ पर कदम-दर-कदम प्रवेश करना चाहिए, और परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने के मार्ग पर चलने की शुरुआत करनी चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 422
परमेश्वर का कार्य और वचन तुम्हारे स्वभाव में बदलाव लाने के लिए हैं; उसका लक्ष्य मात्र तुम लोगों को समझ या ज्ञान प्राप्त कराना और इतना ही पर्याप्त होना नहीं है। बोध क्षमता वाले किसी भी व्यक्ति को परमेश्वर के वचनों के मामले में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर के अधिकांश वचन मानवता की भाषा में व्यक्त किए गए हैं और वह अत्यधिक स्पष्टता के साथ बोलता है। मिसाल के तौर पर, वह इस बात को जानने में सक्षम है कि परमेश्वर उसे क्या समझाना और किस चीज का अभ्यास करवाना चाहता है; यह ऐसी बात है जो बोध क्षमता रखने वाला एक सामान्य व्यक्ति करने में सक्षम है। विशेष रूप से, आज परमेश्वर के वचन और भी अधिक स्पष्ट और पारदर्शी हैं; परमेश्वर ने ऐसी कई बातों के बारे में बताया है जिन पर लोगों ने विचार नहीं किया है; साथ ही लोगों की सभी प्रकार की दशाओं के बारे में भी बताया है। उसके वचन सर्व-समावेशी हैं और पूर्णिमा के प्रकाश के समान स्पष्ट हैं। इसलिए अब, लोग कई मुद्दों के बारे में स्पष्ट हैं और उन्हें समझते हैं, उनके लिए बस उसके वचनों को अभ्यास में लाना बाकी है। सत्य के सभी पहलुओं का लोगों द्वारा विस्तार से अनुभव किया जाना चाहिए। लोगों को अधिक विशिष्ट रूप से खोजना और तलाशना होगा और केवल प्रतीक्षा और चीजें मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। यदि लोग इसी तरह चलते रहे, तो वे मुफ्तखोर बन जाएँगे। जो लोग परमेश्वर के वचन को जानते हैं लेकिन उसका अभ्यास नहीं करते वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से प्रेम नहीं करते और अंततः उन्हें हटा दिया जाएगा। तुम लोगों से 1990 के दशक की पतरस शैली बनाने के लिए कहने का अर्थ है कि तुम लोगों में से प्रत्येक को परमेश्वर के वचन का अभ्यास करना चाहिए, अपने अनुभवों में सच्चा प्रवेश करना चाहिए; साथ ही, और भी अधिक, और भी बड़ा प्रबोधन प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के साथ सहयोग करना चाहिए, जो तुम्हारे अपने जीवन के लिए अधिक लाभदायक होगा। यदि तुमने परमेश्वर के बहुत सारे वचन पढ़े हैं लेकिन केवल उनका शाब्दिक अर्थ समझते हो और वास्तविक परिस्थितियों के माध्यम से परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने का प्रयास नहीं करते, तो तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं जानोगे और तुम्हारे लिए परमेश्वर के वचन जीवन नहीं बल्कि केवल बेजान शब्द होंगे। और यदि तुम केवल बेजान शब्दों को पकड़े रहते हो, तो तुम परमेश्वर के वचनों के सार को नहीं समझ सकते और न ही तुम उसके इरादों को जानोगे। केवल जब तुम अपने वास्तविक अनुभवों में उसके वचनों का अनुभव करते हो तभी परमेश्वर के वचनों का आध्यात्मिक अर्थ तुम्हारे सामने खुलेगा। केवल अनुभव के माध्यम से ही तुम कई सत्यों के आध्यात्मिक अर्थ को समझ सकते हो और परमेश्वर के वचनों के रहस्यों को खोल सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं लाते, तो परमेश्वर चाहे कितनी भी स्पष्टता से क्यों न बोले, तुम्हारे हाथों में केवल खाली शब्द और धर्म-सिद्धांत होंगे जो तुम्हारे धार्मिक विनियम बन जाते हैं। क्या फरीसियों ने बिल्कुल ऐसा ही नहीं किया था? अगर तुम लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाओ और उनका अनुभव करो, तो ये तुम लोगों के लिए व्यावहारिक बन जाएँगे; अगर तुम इनका अभ्यास करने का प्रयास न करो, तो तुम लोगों के लिए परमेश्वर का वचन तीसरे स्वर्ग की किंवदंती से ज्यादा कुछ नहीं है। वास्तव में, तुम लोगों के लिए परमेश्वर में विश्वास करने की प्रक्रिया उसके वचनों का अनुभव करने और उसके द्वारा प्राप्त किए जाने की प्रक्रिया है। इसे थोड़ा और स्पष्ट रूप से कहें तो परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ उसके वचनों को जानना और समझना और उसके वचनों का अनुभव करना और उन्हें जीना है; यह परमेश्वर में तुम लोगों के विश्वास की वास्तविकता है। यदि तुम लोग परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने का अनुसरण किए बिना केवल अनंत जीवन की आशा में परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो तुम सभी मूर्ख हो। यह बिल्कुल ऐसा ही होगा जैसे किसी दावत में जाकर केवल भोज्य-पदार्थों को देखकर और उनमें से किसी भी चीज का स्वाद चखे बिना या उनमें से किसी को भी खाए या पिए बिना उन्हें बस ध्यान में रख लिया। क्या ऐसा व्यक्ति मूर्ख नहीं होगा?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 423
परमेश्वर के वचनों के भीतर वे सत्य हैं जो लोगों के पास होने चाहिए, वे चीजें हैं जो लोगों के लिए सबसे अधिक लाभदायक और सहायक हैं। वे ऐसे टॉनिक और पोषण हैं जिनकी तुम लोगों के शरीर को आवश्यकता है, वे ऐसी चीजें हैं जो लोगों को अपनी सामान्य मानवता बहाल करने में मदद करती हैं और वे ऐसे सत्य हैं जिनसे लोगों को लैस होना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के वचनों का जितना अधिक अभ्यास करोगे, तुम लोगों का जीवन उतनी ही तेजी से विकसित होगा; तुम लोग परमेश्वर के वचनों का जितना अधिक अभ्यास करोगे, सत्य तुम लोगों के लिए उतना ही स्पष्ट होता जाएगा। जैसे-जैसे तुम लोगों का आध्यात्मिक कद बढ़ेगा, तुम लोग आध्यात्मिक क्षेत्र की चीजों को अधिक स्पष्ट रूप से देखोगे और तुम लोगों के पास शैतान पर विजय पाने के लिए अधिक शक्ति होगी। बहुत-सा सत्य जो तुम लोग नहीं समझते हो, वह तब स्पष्ट हो जाएगा जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करोगे। अधिकांश लोग केवल परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक पहलू को समझने से संतुष्ट हो जाते हैं और अनुभव करने और अभ्यास में गहराई तक जाने के बजाय स्वयं को धर्म-सिद्धांतों से लैस करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं—क्या यह फरीसियों का तरीका नहीं है? क्या कोई ऐसा करके “परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में रखना” वाक्यांश की वास्तविकता प्राप्त कर सकता है? लोगों का जीवन केवल परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने से ही विकसित हो सकता है; यह केवल उन्हें पढ़ने से विकसित नहीं होता। यदि तुम मानते हो कि जब तक तुम परमेश्वर के वचनों को समझते हो तब तक तुम्हारे पास जीवन और आध्यात्मिक कद होगा, तो तुम्हारी समझ दोषपूर्ण है। परमेश्वर के वचनों को वास्तव में समझना तब प्राप्त होता है जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो; तुम्हें यह समझना चाहिए कि “केवल सत्य का अभ्यास करके ही इसे कभी भी समझा जा सकता है।” आज, परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, तुम केवल यह कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के वचनों से अवगत हो, लेकिन तुम यह नहीं कह सकते कि तुम उन्हें समझते हो। कुछ लोग कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति को सत्य का अभ्यास करने से पहले सत्य को समझना चाहिए, लेकिन यह बात आंशिक रूप से ही सही है, यह पूरी तरह से सही नहीं है। इससे पहले कि तुम्हें किसी निश्चित सत्य का ज्ञान हो, वह तब होता है जब तुमने उस सत्य का अनुभव नहीं किया होता है। किसी धर्मोपदेश में इसके बारे में सुनकर यह महसूस करना कि तुम उस सत्य को समझते हो, वास्तव में इसे समझना नहीं है—यह केवल उस सत्य के शाब्दिक पहलू पर अधिकार करना है, उसमें निहित सच्चे अर्थ को समझे बिना। सत्य की केवल सतही परत को जानने का अर्थ यह नहीं है कि तुम वास्तव में सत्य को समझते हो या तुम्हें इसका ज्ञान है; सत्य का सच्चा अर्थ इसका अनुभव करने से आता है। इसलिए, केवल सत्य का अनुभव करने पर ही तुम इसे समझ सकते हो, और केवल अनुभव के माध्यम से ही तुम इसके छिपे हुए हिस्सों को समझ सकते हो। सत्य के संकेतार्थों को समझने और सत्य के सार को समझने के लिए तुम्हारा अपने अनुभव को गहरा करना ही एकमात्र तरीका है। इसलिए, केवल जब तुम्हारे पास सत्य होता है तभी तुम दुनिया भर में स्वतंत्र रूप से घूमने में सक्षम होते हो। यदि तुम्हारे पास सत्य नहीं है, तो बहुत से धार्मिक लोगों को अपनी बात मनवाने की तो बात ही छोड़ दो—यहाँ तक कि तुम्हारे परिवार के सदस्य भी तुम्हारी बात नहीं मानेंगे। सत्य के बिना तुम एक उड़ते हुए हिमकण की तरह हो, लेकिन सत्य के साथ तुम प्रसन्न और मुक्त रह सकते हो और कोई तुम पर आक्रमण नहीं कर सकता। कोई सिद्धांत कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह सत्य को परास्त नहीं कर सकता। सत्य के साथ, तुम स्वर्ग और पृथ्वी को उलट-पुलट कर सकते हो और पहाड़ों और समुद्रों को हिला सकते हो; सत्य के बिना, भुनगे भी तुम्हारे शहर को भेद सकते हैं। यह एक स्पष्ट तथ्य है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 424
आज, यह बात अहम है कि सत्य को जानने के बाद तुम इसे अभ्यास में लाओ और स्वयं को अधिक सत्यों के सच्चे अर्थ से लैस करो। यही वह चीज है जिसे तुम लोगों को वास्तव में प्राप्त करना चाहिए। केवल दूसरों से अपने शब्दों का पालन करवाने का प्रयास करने के बजाय तुम्हें उनसे अपने अभ्यास का पालन करवाना चाहिए। यही वास्तव में अर्थपूर्ण है। तुम्हारे साथ चाहे जो भी हो, तुम्हारा सामना चाहे जिससे भी हो, तुम केवल तभी अडिग रह पाओगे जब तुम्हारे पास सत्य होगा। परमेश्वर के सभी वचनों का उद्देश्य लोगों को जीवित करना है, उन्हें मारना नहीं। यदि परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद तुम जीवित नहीं होते, बल्कि मृत ही रहते हो, तो तुम्हारे साथ कुछ गड़बड़ है। यदि कुछ समय बाद तुमने परमेश्वर के कई वचन पढ़े हैं और कई ऐसे धर्मोपदेश सुने जिनमें वास्तविकता है, लेकिन तुम्हारी मृत स्थिति अभी भी नहीं बदली है, तो यह साबित करता है कि तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो सत्य को सँजोता है और न ही तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अनुसरण करता है। यदि तुम लोगों के पास वास्तव में परमेश्वर को प्राप्त करने का अनुसरण करने वाला हृदय होता, तो तुम लोग स्वयं को धर्म-सिद्धांतों से लैस करने और दूसरों को ऊँचे धर्म-सिद्धांतों का उपदेश देने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, बल्कि परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने और सत्य को अभ्यास में लाने पर ध्यान केंद्रित करते। क्या अब तुम लोगों को इसमें प्रवेश करने का प्रयास नहीं करना चाहिए?
परमेश्वर मनुष्य पर जो कार्य करता है उसकी एक समय सीमा है—यदि तुम उसके साथ सहयोग नहीं करते हो, तो इसके क्या अच्छे नतीजे हो सकते हैं? ऐसा क्यों है कि एक बार जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों को समझ लेते हो, तो वह हमेशा तुम लोगों से उनका अभ्यास करने के लिए कहता है? यह दर्शाता है कि एक बार जब परमेश्वर तुम लोगों पर अपने वचन प्रकट कर देता है, तो तुम लोगों के लिए अगला कदम उनका अभ्यास करना है। जब तुम इन वचनों का अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर कार्य का एक और कदम उठाता है, तुम्हें प्रबुद्ध करता है और तुम्हारा मार्गदर्शन करता है। चीजें इस तरह से पूरी की जाती हैं। परमेश्वर के सभी वचन लोगों को जीवन में विकसित होने में मदद करते हैं; उनके भीतर ऐसा कोई तत्व नहीं है जो लोगों को भटकाए और न ही कोई ऐसा हिस्सा है जो लोगों को नकारात्मक बनाए। तुम कहते हो कि तुमने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा है और उनका अभ्यास किया है, लेकिन तुमने अभी भी पवित्र आत्मा से कोई कार्य प्राप्त नहीं किया है। तुम्हारे शब्द सिर्फ किसी बच्चे को बेवकूफ बना सकते हैं। अन्य लोगों को शायद न पता लगे कि तुम्हारे इरादे सही हैं या नहीं, लेकिन क्या तुम्हें लगता है यह संभव है कि परमेश्वर को पता नहीं चलेगा? दूसरों को परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने से पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता क्यों प्राप्त होती है? जब तुम उसके वचनों का अभ्यास करते हो, तो तुम्हें पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता प्राप्त क्यों नहीं होती? क्या परमेश्वर में दैहिक भावनाएँ हो सकती हैं? अगर तुम्हारे इरादे सचमुच सही हैं और तुम सहयोग करते हो, तो परमेश्वर का आत्मा तुम्हारे साथ होगा। कुछ लोग हमेशा अपना ही झंडा बुलंद रखना चाहते हैं, किन्तु क्यों परमेश्वर उन्हें ऊपर उठकर कलीसिया की अगुवाई नहीं करने देता? कुछ लोग मात्र अपना काम करते हैं और अपने कर्तव्यों को करते हैं, और इससे पहले कि वे इसे जानें, उन्हें परमेश्वर द्वारा योग्य मान लिया जाता है। ऐसा कैसे हो सकता है? परमेश्वर इंसान के अंतरतम हृदय की पड़ताल करता है और जो लोग सत्य का अनुसरण करते हैं उन्हें ऐसा सही इरादों के साथ करना चाहिए। जिन लोगों के इरादे सही नहीं होते, वे निश्चित रूप से अडिग नहीं रह पाते। जिस सबसे बुनियादी चीज का तुम लोगों को अनुसरण करना चाहिए वह परमेश्वर के वचनों को अपने अंदर प्रभावी होने देना है—दूसरे शब्दों में, तुम लोगों को परमेश्वर के वचनों के अपने अभ्यास में वचनों की सच्ची समझ हासिल करनी है। शायद परमेश्वर के वचनों को समझने की तुम लोगों की क्षमता कम है, लेकिन अगर तुम लोग उसके वचनों का अभ्यास करते हो, वह इस कमी को दूर कर सकता है; इसलिए तुम लोगों को न केवल बहुत-से सत्यों को जानना चाहिए, बल्कि उससे भी अधिक तुम्हें उनका अभ्यास करना चाहिए। यह सबसे महत्वपूर्ण चीज है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यीशु ने भी अपने साढ़े तैंतीस वर्षों में बहुत-से अपमान सहे और बहुत कष्ट उठाए। उसने इतने अधिक कष्ट केवल इसलिए उठाए क्योंकि उसने सत्य का अभ्यास किया, सभी चीज़ों में वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चला, और केवल परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाई। अगर उसने सत्य का अभ्यास किए बिना केवल उसे जान लिया होता तो वह इस कष्ट से होकर न गुजरता। अगर यीशु ने यहूदियों की शिक्षाओं का पालन किया होता और फरीसियों का अनुसरण किया होता, तो उसने कष्ट न उठाए होते। तुम यीशु के कर्मों से सीख सकते हो कि इंसान पर परमेश्वर के कार्य का प्रभाव इंसान के सहयोग के जरिए ही प्राप्त होता है, यह बात तुम लोगों को समझ लेनी चाहिए। अगर यीशु ने सत्य का अभ्यास न किया होता, तो क्या उसने वो दुख उठाए होते जो सूली पर उठाए? अगर उसने परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कार्य न किया होता, तो क्या वह ऐसी दुख भरी प्रार्थना कर पाता? इसलिए, तुम लोगों को सत्य के अभ्यास की खातिर कष्ट उठाने चाहिए; इंसान को इस तरह के कष्ट उठाने चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 425
व्यवहार में, आज्ञाओं के पालन को सत्य का अभ्यास करने से जोड़ा जाना चाहिए। आज्ञाओं का पालन करते हुए, एक व्यक्ति को सत्य का अभ्यास करना ही चाहिए। सत्य का अभ्यास करते समय, व्यक्ति को आज्ञाओं के सिद्धान्तों के विरुद्ध नहीं जाना चाहिए, न ही आज्ञाओं का उल्लंघन करना चाहिए; परमेश्वर तुमसे जो भी अपेक्षा करे, तुम्हें वो सब करना ही चाहिए। आज्ञाओं का पालन और सत्य का अभ्यास करना परस्पर संबद्ध हैं, विरोधी क्रियाकलाप नहीं। तुम जितना अधिक सत्य का अभ्यास करते हो, उतना ही अधिक तुम आज्ञाओं के सार को बनाए रखने में सक्षम हो जाते हो। तुम जितना अधिक सत्य का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के वचनों पर स्पष्ट होगे और समझोगे जैसा कि आज्ञाओं में अभिव्यक्त है। सत्य का अभ्यास करना और आज्ञाओं का पालन करना, परस्पर विरोधी कार्य नहीं हैं, वे परस्पर संबद्ध हैं। आरंभ में, आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन करने के बाद ही इंसान सत्य का अभ्यास कर सकता था और पवित्र आत्मा से प्रबोधन ग्रहण कर सकता था, किन्तु यह परमेश्वर का मूल इरादा नहीं है। परमेश्वर बस अच्छा व्यवहार ही नहीं चाहता, वो अपेक्षा करता है कि तुम अपना हृदय परमेश्वर की आराधना करने में लगा दो। हालाँकि, तुम्हें कम से कम बाहरी तौर पर आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन करना चाहिए। केवल जब कोई व्यक्ति क्रमिक अनुभव के दौरान परमेश्वर को अधिक स्पष्ट रूप से जानने लगता है, न तो उसके खिलाफ विद्रोह करता है और न ही उसका प्रतिरोध करता है, और उसके कार्य के बारे में कोई संदेह नहीं रखता है, तभी वह आज्ञाओं के सार का पालन कर सकता है। और इसलिए, सत्य का अभ्यास किए बिना केवल आज्ञाओं का पालन करने से अभी भी कोई फल नहीं मिलता है, और यह परमेश्वर की सच्ची आराधना नहीं है, क्योंकि तुमने अभी तक वास्तविक आध्यात्मिक कद प्राप्त नहीं किया है। सत्य के बिना केवल आज्ञाओं का पालन करना विनियमों का कठोरता से पालन करने के बराबर है। ऐसा करने से, आज्ञाएँ तुम्हारे लिए मात्र व्यवस्था बन जाएँगी, जो जीवन में विकास करने में तुम्हारी मदद करने में असमर्थ होंगी। बल्कि, वे तुम्हारा बोझ बन जाएँगी, और तुम्हें पुराने नियमों की व्यवस्थाओं की तरह मजबूती से बाँध लेंगी, जिससे तुम पवित्र आत्मा की उपस्थिति गँवा दोगे। इसलिए, केवल सत्य का अभ्यास करके ही तुम आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन कर सकते हो, और आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन करना सत्य का अभ्यास करने के लिए है। आज्ञाओं का पालन करने की प्रक्रिया में तुम और भी अधिक सत्य को अभ्यास में लाओगे, और सत्य का अभ्यास करते समय, तुम आज्ञाओं के वास्तविक अर्थ की गहरी समझ हासिल करोगे। मनुष्य आज्ञाओं का पालन करे, परमेश्वर की इस माँग के पीछे का उद्देश्य और अर्थ उससे बस विनियमों का पालन करवाना नहीं है, जैसा कि इंसान सोचता है; बल्कि इसका सरोकार उसके जीवन प्रवेश से है। जीवन में तुम्हारे विकास की सीमा से तय होता है कि तुम किस स्तर तक आज्ञाओं का पालन करने में सक्षम हो। यद्यपि आज्ञाएँ मनुष्य द्वारा पालन किए जाने के लिए होती हैं, फिर भी आज्ञाओं का सार सिर्फ मनुष्य के जीवन के अनुभव से ही स्पष्ट होता है। अधिकांश लोग मान लेते हैं कि आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन करने का अर्थ है कि वे “पूरी तरह तैयार हैं, बस अब उठाया जाना बाकी है।” इस तरह की सोच एक विलासिता है। यह परमेश्वर का इरादा नहीं है। यह उन लोगों की बात है जिनमें प्रगति करने की कोई आकांक्षा नहीं है, जो देह का लालच करते हैं। यह भ्रांति है! इसका वास्तविकता के साथ तालमेल नहीं है! वास्तव में आज्ञाओं का पालन किये बिना मात्र सत्य का अभ्यास करना, परमेश्वर का इरादा नहीं है। जो लोग ऐसा करते हैं वे विकलांग हैं—उस व्यक्ति की तरह जिसका एक पैर नहीं है। केवल आज्ञाओं का पालन करना मानो विनियमों का पालन कर रहे हों, फिर भी सत्य से युक्त न होना—यह भी परमेश्वर का इरादा पूरा नहीं कर सकता, उन लोगों की तरह जिनकी एक आँख नहीं है—वे भी विकलांग हैं। यह कहा जा सकता है कि यदि तुम आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन करते हो और व्यवहारिक परमेश्वर की स्पष्ट समझ प्राप्त कर लेते हो, तो तुम्हारे पास सत्य होगा; तुलनात्मक रूप से, तुमने वास्तविक आध्यात्मिक कद प्राप्त कर लिया होगा। यदि तुम उस सत्य का अभ्यास करते हो, जिसका तुम्हें अभ्यास करना चाहिए, तो तुम आज्ञाओं का पालन भी करोगे, ये दोनों बातें एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। सत्य का अभ्यास करना और आज्ञाओं का पालन करना दो मुख्य पद्धतियाँ हैं, दोनों ही व्यक्ति के जीवन के अनुभव का अभिन्न अंग हैं। व्यक्ति के अनुभव में आज्ञाओं का पालन और सत्य के अभ्यास का एकीकरण सम्मिलित होना चाहिए, विभाजन नहीं। हालाँकि इन दोनों चीजों के बीच में विभिन्नताएँ और संबंध दोनों हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आज्ञाओं का पालन करना और सत्य का अभ्यास करना
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 426
नए युग में आज्ञाओं की घोषणा उस तथ्य का एक प्रमाण है कि इस धारा के सभी लोग, वे सभी जो आज परमेश्वर का कथन सुनते हैं, एक नए युग में प्रवेश कर चुके हैं। यह परमेश्वर के कार्य के लिए एक नई शुरुआत है, साथ ही यह परमेश्वर की छः हज़ार वर्षों की प्रबंधकीय योजना के कार्य के अंतिम भाग का आरम्भ भी है। नए युग की आज्ञाएँ इस बात की प्रतीक हैं कि परमेश्वर और मनुष्य नए स्वर्ग और नई पृथ्वी के क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं, और जैसे यहोवा ने इस्रालियों के बीच कार्य किया था और यीशु ने यहूदियों के बीच कार्य किया था, वैसे ही परमेश्वर पृथ्वी पर और अधिक व्यवहारिक कार्य तथा और अधिक बड़े काम करेगा। ये इस बात की भी प्रतीक हैं कि लोगों का यह समूह परमेश्वर से और अधिक एवं और बड़े आदेश प्राप्त करेगा, तथा उसके द्वारा व्यवहारिक तरीके से आपूर्ति, पोषण, सहारा, देखरेख और सुरक्षा प्राप्त करेगा, वह उसके द्वारा और अधिक व्यवहारिक प्रशिक्षण ग्रहण करेगा, परमेश्वर के वचन द्वारा उसकी काट-छाँट की जाएगी, तोड़ा जाएगा और परिशुद्ध किया जाएगा। नए युग की आज्ञाओं का अर्थ सच में गहरा है। उनसे संकेत मिलता है कि परमेश्वर व्यावहारिक रूप से पृथ्वी पर प्रकट होगा, जहाँ से वह देह में अपनी सम्पूर्ण महिमा को प्रकट करते हुए समूचे विश्व को जीत लेगा। वे यह भी संकेत करती हैं कि व्यवहारिक परमेश्वर अपने चुने हुए सभी लोगों को पूर्ण बनाने के लिए, पृथ्वी पर और भी अधिक व्यवहारिक कार्य करने जा रहा है। इसके अलावा, परमेश्वर पृथ्वी पर वचनों से सब कुछ निष्पादित करेगा और उस वास्तविकता को साकार करेगा कि “देहधारी परमेश्वर सबसे ऊँचा उठकर महानता प्राप्त करेगा, और तमाम देश और लोग परमेश्वर—जिसे महान माना जाता है—उसकी आराधना करने के लिए घुटनों के बल बैठेंगे।” हालाँकि नए युग की आज्ञाएँ मनुष्य द्वारा पालन करने के लिए हैं, भले ही ऐसा करना मनुष्य का कर्तव्य और वह है जो उसे हासिल करना चाहिए, लेकिन वे जिस अर्थ का प्रतिनिधित्व करती हैं, वो इतना अगाध है कि उसे एक या दो शब्दों में पूरी तरह से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। यहोवा और यीशु के द्वारा घोषित की गईं पुराने नियमों की व्यवस्थाओं और नए नियमों के अध्यादेशों का स्थान नए युग की आज्ञाओं ने ले लिया। यह एक गहरी शिक्षा है, यह उतना सरल विषय नहीं है जितना लोग सोचते हैं। नए युग की आज्ञाओं में व्यवहारिक अर्थ का एक पहलू है। वे अनुग्रह के युग और राज्य के युग के बीच संक्रमण बिंदु हैं। नए युग की आज्ञाएँ पुराने युग की प्रथाओं और अध्यादेशों को समाप्त करती हैं, साथ ही यीशु के युग की और उससे पहले की सभी प्रथाओं को भी समाप्त करती हैं। वे मनुष्य को अधिक व्यवहारिक परमेश्वर की उपस्थिति में लाती हैं, जिससे कि वह परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से पूर्ण किए जाने को स्वीकारना शुरू कर दे; वे पूर्ण बनाए जाने के मार्ग का आरम्भ हैं। इसलिए, नए युग की आज्ञाओं के प्रति तुम लोगों का रवैया सही होना चाहिए, और न ही उनसे लापरवाही से पेश आना चाहिए, न उन्हें हल्के में लेना चाहिए। नए युग की आज्ञाएँ एक बिंदु विशेष पर जोर देती हैं : वो यह कि मनुष्य आज के व्यवहारिक स्वयं परमेश्वर की आराधना करेगा, जिसमें आत्मा के सार के प्रति और अधिक व्यवहारिक रूप से समर्पित होना शामिल है। आज्ञाएँ उस सिद्धान्त पर भी जोर देती हैं जिसके द्वारा धार्मिकता के सूर्य के रूप में प्रकट होने के बाद परमेश्वर, मनुष्य का न्याय करेगा कि वे पापी हैं या धार्मिक। आज्ञाएँ अभ्यास में लाने की अपेक्षा समझने में अधिक आसान हैं। इससे यह देखा जा सकता है कि यदि परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाना चाहता है, तो उसे ऐसा अपने वचनों और मार्गदर्शन से करना होगा, मनुष्य केवल अपनी स्वाभाविक बुद्धिमत्ता से पूर्णता हासिल नहीं कर सकता। मनुष्य नए युग की आज्ञाओं का पालन कर सकता है या नहीं, इस बात का संबंध इंसान के व्यवहारिक परमेश्वर के ज्ञान से है। इसलिए, तुम केवल कुछ ही दिनों में आज्ञाओं का पालन करने की अवस्था प्राप्त नहीं कर सकते हो। यह सीखने के लिए एक गहरा सबक है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आज्ञाओं का पालन करना और सत्य का अभ्यास करना
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 427
सत्य का अभ्यास ऐसा मार्ग है जिससे मनुष्य जीवन में उन्नति कर सकता है। यदि तुम लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हो, तो तुम्हारे पास केवल सिद्धान्त रह जायेगा और तुम लोगों के पास कोई वास्तविक जीवन नहीं होगा। सत्य मनुष्य के आध्यात्मिक कद का प्रतीक है। तुम सत्य का अभ्यास करते हो या नहीं, इसका संबंध इस बात से है कि तुम्हारा वास्तविक आध्यात्मिक कद है या नहीं। यदि तुम सत्य का अभ्यास करने में विफल रहते हो, धार्मिकता से कार्य नहीं करते हो, या भावनाओं में बह जाते हो और देह की परवाह करते हो, तो आज्ञाओं का पालन करने का तो सवाल ही नहीं उठता। यह गहनतम सबक है। प्रत्येक युग में, बहुत से सत्य होते हैं जिनमें लोगों को प्रवेश करने की जरूरत है और समझने की जरूरत है, किन्तु प्रत्येक युग में अलग-अलग आज्ञाएँ भी होती हैं जो उस सत्य के साथ होती हैं। लोग जिस सत्य का अभ्यास करते हैं और आज्ञाओं का पालन करते हैं वह एक युग विशेष से संबंधित होता है। प्रत्येक युग के अपने सत्य होते हैं जिनका अभ्यास किया जाना चाहिए और उससे भी अधिक, उसकी अपनी आज्ञाएँ होती हैं जिनका पालन किया जाना चाहिए। हालाँकि, परमेश्वर द्वारा घोषित आज्ञाओं के आधार पर, अर्थात्, विभिन्न युगों के आधार पर, मनुष्य के द्वारा सत्य के अभ्यास का लक्ष्य और प्रभाव आनुपातिक रूप में भिन्न होता है। ऐसा कहा जा सकता है कि आज्ञाएँ सत्य की सहायता के लिए हैं और सत्य आज्ञाओं को बनाए रखने के लिए विद्यमान रहता है। यदि केवल सत्य हो, तो कहने को परमेश्वर के कार्य में कोई परिवर्तन नहीं होगा। लेकिन, आज्ञाओं का हवाला देकर, मनुष्य पवित्र आत्मा के कार्य में रुझान की सीमाओं को पहचान सकता है और मनुष्य उस युग को जान सकता है जिसमें परमेश्वर कार्य करता है। धर्म में, बहुत से लोग हैं जो बहुत-से सत्य का अभ्यास कर सकते हैं जिसका अभ्यास व्यवस्था के युग के मनुष्य के द्वारा किया गया था। लेकिन, उसने अब तक नए युग की आज्ञाएँ नहीं प्राप्त की हैं, न ही वह नये युग की आज्ञाओं का पालन कर सकता है। वह अभी भी पुरानी रीति का पालन करता है और आदिम मानव बना हुआ है। उसके पास कार्य करने की नयी पद्धतियां नहीं हैं और वह नए युग की आज्ञाओं को नहीं देख सकता। इस तरह, उसमें परमेश्वर का कार्य नहीं होता। यह ऐसा है मानो वह अंडे के खाली खोलों की निगरानी कर रहा है; यदि उसके अंदर कोई चूज़ा नहीं है तो उसमें कोई आत्मा नहीं है। अधिक सटीकता से कहा जाये तो, उसमें कोई जीवन नहीं है। ऐसे लोगों ने अभी नए युग में प्रवेश नहीं किया है और वे कई कदम पीछे रह गए हैं। इसलिए, नए युग की आज्ञाओं के बगैर बस पुराने युगों के सत्यों का होना बेकार है। तुम लोगों में से अनेक लोग आज के सत्य का अभ्यास करते हैं किन्तु उसकी आज की आज्ञाओं का पालन नहीं करते। तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा, और जिस सत्य का तुम अभ्यास करते हो वह बेकार और निरर्थक होगा और परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा। सत्य का अभ्यास, पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य की पद्धतियों के मानदंडों के अंतर्गत किया जाना चाहिए; इसे आज के व्यवहारिक परमेश्वर के कथन की प्रतिक्रिया में किया जाना चाहिए। इसके बिना हर चीज़ बेकार है, जैसे बाँस की टोकरी से पानी निकालने की कोशिश करना। यह नए युग की आज्ञाओं की घोषणा का व्यवहारिक अर्थ भी है। यदि लोगों को आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन करना है, तो कम से कम उन्हें उस परमेश्वर को जानना चाहिए जो व्यावहारिक रूप से देह में प्रकट होता है, और उसके बारे में भ्रमित नहीं होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, लोगों को आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन करने के सिद्धांतों को समझना चाहिए। आज्ञाओं का पालन करने का अर्थ उनका बेतरतीब ढंग से या मनमाने ढंग से पालन करना नहीं है, बल्कि एक आधार के साथ, एक उद्देश्य के साथ और सिद्धांतों के साथ उनका पालन करना है। सबसे पहली चीज़ जो प्राप्त की जानी चाहिए वह यह है कि तुम दर्शनों के बारे में स्पष्ट हो। यदि तुम्हारे पास वर्तमान समय में पवित्र आत्मा के कार्य की पूरी समझ है और यदि तुम आज के कार्य की रीति में प्रवेश करते हो, तो तुम स्वाभाविक रूप से आज्ञाओं का पालन करने के सार की स्पष्ट समझ पा लोगे। यदि वह दिन आता है जब तुम नये युग की आज्ञाओं के सार को जान जाते हो और तुम आज्ञाओं का पालन कर सकते हो, तो उस समय तुम पूर्ण किए जा चुके होगे। सत्य का अभ्यास करने और आज्ञाओं के पालन करने का यही व्यवहारिक महत्व है। तुम आज्ञाओं का पालन कर सकते हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम किस प्रकार नए युग की आज्ञाओं के सार को समझते हो। पवित्र आत्मा का कार्य निरंतर मनुष्य के सामने प्रकट होता रहेगा, और मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाएँ धीरे-धीरे बढ़ती जाएँगी। इसलिए, जिन सत्यों का अभ्यास करने की परमेश्वर लोगों से अपेक्षा करता है, वे संख्या में और अधिक बढ़ते जाएँगे और और भी बड़े होते जाएँगे, और आज्ञाओं का पालन करने के प्रभाव और भी गहरे होते जाएँगे। इसलिए, तुम लोगों को सत्य का अभ्यास करना चाहिए और साथ ही आज्ञाओं का पालन भी करना चाहिए। किसी को भी इस मामले को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए; इस नए युग में नए सत्य और नई आज्ञाओं को एक ही समय में आरम्भ होने देना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आज्ञाओं का पालन करना और सत्य का अभ्यास करना
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 428
बहुत लोग अभ्यास के बारे में थोड़ी बात कर सकते हैं और वे अपने व्यक्तिगत विचारों के बारे में बात कर सकते हैं, लेकिन इसमें से अधिकांश दूसरों के वचनों से प्राप्त होने वाला प्रकाश होता है। इसमें उनके अपने व्यक्तिगत अभ्यासों से कुछ भी शामिल नहीं होता, न ही इसमें ऐसा कुछ शामिल होता है, जिसे उन्होंने अपने अनुभवों से देखा हो। मैं पहले इस मुद्दे की चीर-फाड़ कर चुका हूँ; यह मत सोचो कि मुझे कुछ पता नहीं है। तुम केवल कागज़ी शेर हो, फिर ही बात तुम शैतान को वश में करने की करते हो? विजय की गवाही देने की करते हो? परमेश्वर की छवि जीने की करते हो? यह सब बकवास है! क्या तुम्हें लगता है कि आज परमेश्वर द्वारा बोले गए सभी वचन तुम्हारी सराहना पाने के लिए हैं? मुँह से तुम अपने पुराने स्वभाव के खिलाफ विद्रोह करने और सत्य का अभ्यास करने की बात करते हो, फिर भी तुम्हारे हाथ दूसरे कर्म कर रहे हैं और तुम्हारा हृदय दूसरी योजनाएँ तैयार रहा है—तुम किस तरह के व्यक्ति हो? तुम्हारा हृदय और तुम्हारे हाथ एक क्यों नहीं हैं? इतने सारे उपदेश खोखले शब्द बन गए हैं; क्या यह दिल तोड़ने वाली बात नहीं है? यदि तुम परमेश्वर के वचन का अभ्यास करने में असमर्थ हो, तो इससे यह साबित होता है कि तुमने अभी तक पवित्र आत्मा के कार्य के तरीके में प्रवेश नहीं किया है, तुम्हारे अंदर अभी तक पवित्र आत्मा का कार्य नहीं हुआ है, और तुम्हें अभी तक उसका मार्गदर्शन नहीं मिला है। यदि तुम कहते हो कि तुम केवल परमेश्वर के वचन को समझने में समर्थ हो, लेकिन उसका अभ्यास करने में समर्थ नहीं हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो सत्य से प्रेम नहीं करता। परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति को छुटकारा दिलाने के लिए नहीं आता है। पापियों को छुटकारा दिलाने, गरीबों को छुटकारा दिलाने और दीनों को छुटकारा दिलाने के लिए सलीब पर चढ़ाए जाते समय यीशु ने भारी पीड़ा सही थी। उसे पाप-बलि के रूप में सलीब पर चढ़ाया गया था। यदि तुम परमेश्वर के वचन का अभ्यास नहीं कर सकते, तो तुम्हें जितनी जल्दी हो सके, चले जाना चाहिए; एक मुफ्तखोर के रूप में परमेश्वर के घर में पड़े मत रहो। बहुत-से लोग तो स्वयं को ऐसी चीज़ें करने से रोकने में भी कठिनाई महसूस करते हैं, जो स्पष्टतः परमेश्वर का विरोध करती हैं। क्या वे मृत्यु नहीं माँग रहे हैं? वे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश की बात कैसे कर सकते हैं? क्या उनमें परमेश्वर का चेहरा देखने की धृष्टता होगी? वह भोजन करना, जो परमेश्वर तुम्हें प्रदान करता है; कुटिल चीज़ें करना, जो परमेश्वर का विरोध करती हैं; दुर्भावनापूर्ण, कपटी और षड्यंत्रकारी बनना, तब भी जबकि परमेश्वर तुम्हें अपने द्वारा दिए गए आशीषों का आनंद लेने देता है—क्या तुम उन्हें प्राप्त करते हुए अपने हाथों को जलता हुआ महसूस नहीं करते? क्या तुम अपने चेहरे को शर्म से लाल होता महसूस नहीं करते? परमेश्वर के विरोध में कुछ करने के बाद, “दुष्ट बनने” के लिए षड्यंत्र रचने के बाद, क्या तुम्हें डर नहीं लगता? यदि तुम्हें कुछ महसूस नहीं होता, तो तुम किसी भविष्य के बारे में बात कैसे कर सकते हो? तुम्हारे लिए पहले से ही कोई भविष्य नहीं था, तो अभी भी तुम्हारी और बड़ी अपेक्षाएँ क्या हो सकती हैं? यदि तुम कोई बेशर्मी की बात करते हो और कोई धिक्कार महसूस नहीं करते, और तुम्हारे ह्रदय में कोई जागरूकता नहीं है, तो क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम परमेश्वर द्वारा पहले ही त्यागे जा चुके हो? मज़ा लेते हुए और अनर्गल ढंग से बोलना और कार्य करना तुम्हारी प्रकृति बन गया है; तुम इस तरह कैसे कभी परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जा सकते हो? क्या तुम दुनिया भर में चल पाने में सक्षम होगे? तुम पर कौन विश्वास करेगा? जो लोग तुम्हारी सच्ची प्रकृति को जानते हैं, वे तुमसे दूरी बनाए रखेंगे। क्या यह परमेश्वर का दंड नहीं है? कुल मिलाकर, अगर केवल बात होती है और कोई अभ्यास नहीं होता, तो कोई विकास नहीं होता। यद्यपि तुम्हारे बोलते समय पवित्र आत्मा तुम पर कार्य कर रहा हो सकता है, किंतु यदि तुम अभ्यास नहीं करते, तो पवित्र आत्मा कार्य करना बंद कर देगा। यदि तुम इसी तरह से करते रहे, तो भविष्य के बारे में या अपना पूरा अस्तित्व परमेश्वर के कार्य को सौंपने के बारे में कोई बात कैसे हो सकती है? तुम केवल अपना पूरा अस्तित्व सौंपने की बात कर सकते हो, लेकिन तुमने अपना सच्चा परमेश्वर-प्रेमी हृदय उसे नहीं दिया है। उसे तुमसे केवल बात करने का तुम्हारा इरादा मिलता है, उसे तुम्हारा सत्य का अभ्यास करने का इरादा नहीं मिलता। क्या यह तुम्हारा असली आध्यात्मिक कद हो सकता है? यदि तुम ऐसा ही करते रहे, तो तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण कब बनाए जाओगे? क्या तुम अपने अंधकारमय और विषादपूर्ण भविष्य के बारे में चिंता महसूस नहीं करते? क्या तुम्हें नहीं लगता कि परमेश्वर ने तुममें आशा खो दी है? क्या तुम नहीं जानते कि परमेश्वर अधिक और नए लोगों को पूर्ण बनाना चाहता है? क्या पुरानी चीज़ें कायम रह सकती हैं? तुम आज परमेश्वर के वचनों पर ध्यान नहीं दे रहे हो : क्या तुम कल की प्रतीक्षा कर रहे हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, वह व्यक्ति उद्धार प्राप्त करता है जो सत्य का अभ्यास करने को तैयार है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 429
परमेश्वर के वचन उठा लेना और इन्हें निर्लज्ज होकर समझा पाने का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हारे पास वास्तविकता है; चीजें इतनी सरल नहीं हैं जितनी तुम सोचते हो। तुम्हारे पास वास्तविकता होना ऐसा नहीं है कि तुम उसके बारे में बात करो, बल्कि यह ऐसी चीज है जिसे तुम जीते हो। जब परमेश्वर के वचन तुम्हारा जीवन और तुम्हारा स्वाभाविक प्रकाशन बन जाते हैं, तभी कहा जा सकता है कि तुममें वास्तविकता है और तभी कहा जा सकता है कि तुमने वास्तविक समझ और असल आध्यात्मिक कद हासिल कर लिया है। लंबी समयावधि तक परीक्षाएँ सहने की क्षमता होना और उस समानता को जीना, जिसकी परमेश्वर को अपेक्षा है—दिखावा नहीं करना, बल्कि इसका स्वाभाविक रूप से प्रकट होना—केवल इसी को सचमुच वास्तविकता होने और जीवनयुक्त होना माना जाता है। मैं सेवाकर्मियों के परीक्षण का उदाहरण देना चाहता हूँ, जिससे सभी अच्छी तरह से अवगत हैं : सेवाकर्मियों के विषय में कोई भी बड़े-बड़े सिद्धांत बता सकता है। इस विषय के बारे में सभी को अच्छा ज्ञान है; वे लोग इस विषय पर बोलते हैं और हर भाषण पिछले से बेहतर होता है, जैसे कि यह कोई प्रतियोगिता हो। परन्तु, यदि मनुष्य किसी बड़े परीक्षण से न गुजरा हो, तो यह कहना कठिन होगा कि उसके पास देने के लिए अच्छी गवाही है। संक्षेप में, मनुष्य जो जीता है वह बहुत ही खराब रहता है, और उसकी समझ से बिल्कुल विपरीत होता है। इसलिए इसका, मनुष्य का वास्तविक आध्यात्मिक कद बनना अभी शेष है, और यह अभी मनुष्य का जीवन नहीं है। क्योंकि मनुष्य के ज्ञान को वास्तविकता में नहीं लाया गया है, उसका आध्यात्मिक कद रेत पर निर्मित एक किले के समान है जो हिल रहा है और ढह जाने की कगार पर है। मनुष्य में बहुत कम वास्तविकता है। मनुष्य में कोई भी वास्तविकता पाना लगभग असम्भव है। मनुष्य स्वाभाविक रूप से जो प्रकट करता है उसमें बहुत कम वास्तविकता होती है; वह जो जीता है वह सब जबरन होता है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य में कोई वास्तविकता नहीं है। हालाँकि लोग ये दावा करते हैं कि उनके परमेश्वर-प्रेमी हृदय कभी परिवर्तित नहीं होते, लेकिन वे ऐसा परीक्षणों का सामना होने से पहले कहते हैं। एक दिन अचानक परीक्षणों से सामना हो जाने पर जो बातें वे कहते हैं, वे फिर से वास्तविकता के बिल्कुल विपरीत होंगी और यह फिर से प्रमाणित करेगा कि मनुष्य में वास्तविकता नहीं है। यह कहा जा सकता है कि जब कभी तुम्हारा सामना उन बातों से होता है, जो तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खातीं और यह माँग करती हैं कि तुम स्वयं को त्याग दो, ये ही तुम्हारे परीक्षण होते हैं। परमेश्वर के इरादे के अभिव्यक्त किए जाने से पहले, प्रत्येक मनुष्य एक कठोर परीक्षण, एक बहुत बड़े परीक्षण से गुजरता है। क्या तुम इस विषय को सुस्पष्टता से समझ सकते हो? जब परमेश्वर मनुष्य की परीक्षा लेना चाहता है, तो वह हमेशा सत्य के तथ्यों को प्रकट करने से पहले मनुष्य को चुनाव करने देता है। कहने का अर्थ यह है कि परमेश्वर जब तुम्हारा परीक्षण ले रहा होता है, तो वह कभी भी तुम्हें सत्य नहीं बताएगा; और इसी प्रकार लोगों को बेनकाब किया जाता है। यह एक विधि है, जिससे परमेश्वर यह जानने के लिए अपना कार्य करता है कि क्या तुम आज के परमेश्वर को जानते हो और साथ ही तुम में कोई वास्तविकता है या नहीं। क्या तुम परमेश्वर के कार्यों को लेकर सन्देहों से सचमुच मुक्त हो? जब तुम पर कोई बड़ा परीक्षण आयेगा तो क्या तुम दृढ़ रह सकोगे? कौन यह कहने की हिम्मत कर सकता है “मैं गारंटी देता हूँ कि कोई समस्या नहीं आएगी?” कौन दृढ़तापूर्वक कहने की हिम्मत कर सकता है, “हो सकता है दूसरों को सन्देह हो, परन्तु मैं कभी भी सन्देह नहीं करूँगा?” यह ठीक वैसे ही है जैसे जब पतरस का परीक्षण हुआ : वह हमेशा सत्य के प्रकट किए जाने से पहले बड़ी-बड़ी बातें करता था। यह पतरस की ही एक अनोखी कमी नहीं थी; यह सबसे बड़ी कठिनाई है, जिसका सामना प्रत्येक मनुष्य वर्तमान में कर रहा है। यदि परमेश्वर के आज के कार्य के तुम्हारे ज्ञान को देखने के लिए मैं कुछ स्थानों पर जाऊँ, या कुछ भाइयों और बहनों से भेंट करूँ, तो तुम सब निश्चित रूप से अपने ज्ञान के विषय में बहुत कुछ कह पाओगे, और ऐसा प्रतीत होगा कि तुम्हारे अंदर कोई सन्देह नहीं है। यदि मैं तुम से पूछूँ : “क्या तुम वास्तव में निश्चित हो सकते हो कि आज का कार्य स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया जा रहा है? बिना किसी सन्देह के?” तुम निश्चित रूप से उत्तर दोगे : “बिना किसी सन्देह के, यह कार्य परमेश्वर के आत्मा के द्वारा ही किया जा रहा है।” एक बार जब तुम इस प्रकार से उत्तर दे दोगे, तो तुम में थोड़ा-सा भी सन्देह नहीं होगा बल्कि तुम बहुत आनन्द का अनुभव कर रहे होगे, यह सोचकर कि तुम ने थोड़ी-सी वास्तविकता प्राप्त कर ली है। जो लोग बातों को इस रीति से समझते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जिनमें बहुत कम वास्तविकता होती है; जो व्यक्ति जितना अधिक सोचता है कि उसने इसे प्राप्त कर लिया है, वह परीक्षणों में उतना ही कम स्थिर रह पाता है। धिक्कार है उन पर जो अहंकारी और दंभी होते हैं, और धिक्कार है उन्हें जिन्हें स्वयं का कोई ज्ञान नहीं है; ऐसे लोग सबसे अच्छे ढंग से बातें करते हैं, परन्तु अपनी बातों पर अमल करने में ऐसे लोग बहुत ही खराब होते हैं। थोड़ी-सी बाधा नजर आते ही ये लोग सन्देह करना आरम्भ कर देते हैं और त्याग देने का विचार उनके मस्तिष्क में प्रवेश कर जाता है। उनमें कोई वास्तविकता नहीं होती; उनके पास मात्र सिद्धान्त हैं, जो धर्म से ऊपर हैं और ये उन समस्त वास्तविकताओं से रहित हैं जिनकी परमेश्वर अभी अपेक्षा करता है। मुझे उनसे सबसे अधिक घृणा होती है जो मात्र सिद्धान्तों की बात करते हैं और जिनमें कोई वास्तविकता नहीं होती। जब वे कोई कार्य करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते हैं, परन्तु जैसे ही उनका सामना वास्तविकता से होता है, वे बिखर जाते हैं। क्या यह ये नहीं दर्शाता कि इन लोगों के पास कोई वास्तविकता नहीं है? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हवा और लहरें कितनी भयंकर हैं, यदि तुम अपने मन में थोड़ा-सा भी सन्देह किए बिना खड़े रह सकते हो और तुम स्थिर रह सकते हो और उस समय भी इन्कार करने की स्थिति में नहीं रहते हो जब तुम ही अकेले बचते हो, तब यह माना जाएगा कि तुम्हारे पास सच्ची समझ है और वस्तुतः तुम्हारे पास वास्तविकता है। अगर जिधर हवा बहती है यदि तुम भी उधर ही बह जाते हो, तुम भीड़ के पीछे जाते हो और वही कहते हो जो अन्य लोग कह रहे हैं, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितनी उत्तम रीति से बातें करते हो, इसका अर्थ यह नहीं है कि तुममें वास्तविकता है। इसलिए मैं तुम्हें परामर्श देता हूँ कि निरर्थक शब्द बोलने में जल्दबाज़ी न करो। क्या तुम जानते हो परमेश्वर क्या करने वाला है? दूसरे पतरस जैसा व्यवहार मत करो, नहीं तो स्वयं को लज्जित करोगे और तुम अपनी प्रतिष्ठा को बनाए नहीं रख पाओगे—यह किसी का कुछ भला नहीं करता है। अधिकतर व्यक्तियों का कोई असल आध्यात्मिक कद नहीं होता। यद्यपि परमेश्वर ने बहुत अधिक कार्य किया है, लोगों का किसी भी वास्तविकता से बिल्कुल सामना नहीं हुआ है; अधिक सटीकता से कहा जाए तो, उसने कभी किसी को व्यक्तिगत रूप से ताड़ना नहीं दी है। कुछ लोग ऐसे परीक्षणों द्वारा बेनकाब कर दिए गए हैं, उनके पापी हाथ और अधिक आगे बढ़ते जा रहे हैं, यह सोचते हुए कि परमेश्वर का फायदा उठाया जा सकता है, और वे जो चाहते हैं वह करते हैं। चूँकि वे इस प्रकार के परीक्षण का भी सामना करने के योग्य नहीं हैं, अधिक चुनौतीपूर्ण परीक्षणों का तो सवाल ही नहीं उठता है, वास्तविकता के होने का भी सवाल नहीं उठता। क्या यह परमेश्वर को मूर्ख बनाने का प्रयास नहीं है? वास्तविकता रखना ऐसा कुछ नहीं है जिसमें जालसाजी की जा सके, और न ही यह ऐसा कुछ है, जिसे तुम जान कर प्राप्त कर सकते हो। यह तुम्हारे वास्तविक आध्यात्मिक कद पर निर्भर है, और यह इस बात पर भी निर्भर है कि तुम समस्त परीक्षणों का सामना करने के योग्य हो या नहीं। क्या तुम समझते हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल सत्य का अभ्यास करना ही इंसान में वास्तविकता का होना है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 430
मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षा मात्र वास्तविकता के विषय में बात करने के योग्य होना ही नहीं है; अगर ऐसा हो तो क्या यह अति सरल नहीं होगा? तब परमेश्वर जीवन प्रवेश के विषय में बात क्यों करता है? वह रूपांतरण के विषय में बात क्यों करता है? यदि लोग केवल वास्तविकता की खोखली बातें ही कर पायेंगे, तो क्या वे अपने स्वभाव में रूपांतरण ला सकते हैं? किसी समूह को राज्य के अच्छे सैनिक बनने के लिए प्रशिक्षित करने का अर्थ यह नहीं है कि उन्हें ऐसे लोग बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाए जो केवल वास्तविकता की बातें करें या डींगें मारें; बल्कि इसका मतलब है कि उन्हें ऐसे लोग बनने के लिए प्रशिक्षित करना जो सदैव परमेश्वर के वचनों को जी सकें, चाहे कोई भी आघात लगे हार न मानें और हर समय परमेश्वर के वचनों के अनुसार जिएँ और संसार में न लौटें। यही वह वास्तविकता है जिसकी बात परमेश्वर करता है; मनुष्य से परमेश्वर की यही अपेक्षा है। इसलिए परमेश्वर द्वारा कही गई वास्तविकता को इतना सरल न समझो। मात्र पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध होना वास्तविकता रखने के समान नहीं है। मनुष्य का आध्यात्मिक कद ऐसा नहीं है, अपितु यह परमेश्वर का अनुग्रह है और इसमें मनुष्य का कोई योगदान नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को पतरस की पीड़ाएँ सहनी होंगी और इसके अलावा उसमें पतरस का गौरव होना चाहिए जिसे वे परमेश्वर के कार्य प्राप्त कर लेने के बाद जीते हैं। मात्र इसे ही वास्तविकता कहा जा सकता है। यह मत सोचो चूँकि तुम वास्तविकता के विषय में बात कर सकते हो इसलिए तुम्हारे पास वास्तविकता है। यह एक भ्रम है। इस तरह से सोचना परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं हैं और इसका कोई वास्तविक अर्थ नहीं है। भविष्य में ऐसी बातें मत करना—ऐसी बातों को समाप्त कर दो! जो परमेश्वर के वचनों की बेतुकी समझ रखते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। उनमें कोई भी वास्तविक ज्ञान नहीं है, उनमें वास्तविक आध्यात्मिक कद होने का तो सवाल ही नहीं है; वे वो लोग हैं जिनमें अंतर्दृष्टि और वास्तविकता नहीं है। कहने का अर्थ यह है कि जो परमेश्वर के वचनों के सार से बाहर जीवन जीते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। जिन्हें मनुष्यों के द्वारा अविश्वासी समझ लिया गया है, वे परमेश्वर की दृष्टि में जानवर हैं और जिन्हें परमेश्वर के द्वारा अविश्वासी समझा गया है, वे ऐसे लोग हैं जिनके पास जीवन के रूप में परमेश्वर के वचन नहीं हैं। अतः, वे लोग जिनमें परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता नहीं है और वे जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीने में असफल हो जाते हैं, वे अविश्वासी हैं। परमेश्वर का इरादा प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा बनाना है जिससे वह परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन करे। न कि उसे ऐसा व्यक्ति बनाना कि वह केवल वास्तविकता के विषय में बात करे, बल्कि इस योग्य बनाना है कि हर कोई उसके वचनों की वास्तविकता को जी सके। वह वास्तविकता जिसे मनुष्य समझता है, बहुत ही छिछली है, इसका कोई मूल्य नहीं है, यह परमेश्वर के इरादों को पूरा नहीं कर सकते। यह अत्यधिक तुच्छ है और उल्लेख किए जाने के योग्य तक नहीं है। इसमें बहुत कमी है और यह परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों से बहुत ही दूर है। तुममें से प्रत्येक व्यक्ति की यह देखने के लिए एक बड़ी जाँच होगी कि तुम में से कौन मात्र अपनी समझ के विषय में बात करना जानता है परन्तु मार्ग नहीं दिखा पाता, और यह देखने के लिए कि तुम में से कौन अनुपयोगी कूड़ा-करकट है। इसे भविष्य में स्मरण रखना। खोखले ज्ञान के विषय में बात मत करना; मात्र अभ्यास के मार्ग, और वास्तविकता के विषय में बात करना। वास्तविक ज्ञान से वास्तविक अभ्यास में पारगमन और फिर अभ्यास करने से वास्तविकता के जीवनयापन में पारगमन। दूसरों को उपदेश मत दो और वास्तविक ज्ञान के विषय में बात मत करो। यदि तुम्हारी समझ कोई मार्ग है, तो तुम खुलकर कह सकते हो; यदि यह मार्ग नहीं है, तब कृपा करके चुपचाप बैठ जाओ और बात करना बन्द कर दो! जो कुछ तुम कहते हो वह बेकार है। तुम परमेश्वर को मूर्ख बनाने और दूसरों को जलाने के लिए समझदारी के कुछ शब्द कहते हो। क्या यही तुम्हारी अभिलाषा नहीं है? क्या यह जानबूझकर दूसरों के साथ खिलवाड़ करना नहीं है? क्या इसका कोई मूल्य है? अगर अनुभव करने के बाद तुम समझदारी की बातें करोगे तो तुम्हें डींगें मारने वाला नहीं कहा जाएगा, अन्यथा तुम मात्र एक ऐसे व्यक्ति होगे जो घमण्ड की बातें कहता है। तुम्हारे वास्तविक अनुभव में ऐसी अनेक बातें हैं जिन पर तुम काबू नहीं पा सकते और तुम अपनी देह से विद्रोह नहीं कर सकते; तुम हमेशा वही करते हो जो तुम करना चाहते हो, कभी परमेश्वर के इरादों को पूरा नहीं करते, परन्तु फिर भी तुम में सैद्धान्तिक ज्ञान की बात करने की हिम्मत है। तुम बेशर्म हो! तुम्हारी अब भी इतनी हिम्मत है कि तुम परमेश्वर के वचनों की अपनी समझ की बात करते हो—तुम कितने ढीठ हो! उपदेश देना और डींगें मारना तुम्हारी प्रवृति बन चुकी है, और तुम ऐसा करने के अभ्यस्त हो चुके हो। जब कभी भी तुम बात करना चाहते हो तो तुम सरलता से ऐसा कर लेते हो और जब अभ्यास करने की बात आती है तब तुम साज-सज्जा में डूब जाते हो। क्या यह दूसरों को मूर्ख बनाना नहीं है? तुम दूसरों को मूर्ख बना सकते हो, परन्तु परमेश्वर को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। मनुष्य को पता नहीं होता और न ही उसमें पहचानने की योग्यता होती है, परन्तु परमेश्वर ऐसे मसलों के विषय में गम्भीर है, और वह तुम्हें नहीं छोड़ेगा। हो सकता है तुम्हारे भाई और बहनें तुम्हारी वकालत करें, तुम्हारी समझ के लिए तुम्हारा गुणगान करें, तुम्हारी सराहना करें, परन्तु यदि तुममें वास्तविकता नहीं है, तो पवित्र आत्मा तुम्हें नहीं छोड़ेगा। सम्भवतः व्यवहारिक परमेश्वर तुम्हारी गलतियों को नहीं देखेगा, परन्तु परमेश्वर का आत्मा तुम्हारी ओर ध्यान नहीं देगा, और तुम इसे सह नहीं पाओगे। क्या तुम इस पर विश्वास करते हो? अभ्यास की वास्तविकता के विषय में अधिक बात करो; क्या तुम वह पहले ही भूल चुके हो? “उथले सिद्धान्तों की बात और निस्सार वार्तालाप कम करो; अभी से अभ्यास आरम्भ करना सर्वोत्तम है।” क्या तुम ये वचन भूल चुके हो? क्या तुम इसे बिल्कुल नहीं समझते? क्या तुम्हारे अंदर परमेश्वर के इरादों की कोई समझ नहीं है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल सत्य का अभ्यास करना ही इंसान में वास्तविकता का होना है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 431
तुम लोगों को वे सबक सीखने चाहिए जो अधिक यथार्थवादी हैं। उन ऊँची-ऊँची, खोखली बातों की कोई आवश्यकता नहीं है जिनकी लोग प्रशंसा करते हैं। जब ज्ञान के बारे में चर्चा करने की बात आती है, तब हर व्यक्ति पिछले से बढ़कर है, लेकिन तब भी उनके पास अभ्यास करने का मार्ग नहीं है। कितने लोगों ने अभ्यास के सिद्धांतों को समझ लिया है? कितने लोग वास्तविक सबक सीख सकते हैं? वास्तविकता के बारे में कौन सहभागिता कर सकता है? परमेश्वर के वचनों के ज्ञान की बात कर पाने का यह अर्थ यह नहीं कि तू वास्तविक आध्यात्मिक कद से युक्त है; यह बस इतना ही दिखाता है कि तू जन्म से चतुर था, और तू प्रतिभाशाली है। अगर तू मार्ग नहीं दिखा सकता तो परिणाम कुछ नहीं निकलेगा, और तू निकम्मा इंसान होगा! यदि तू अभ्यास करने के लिए व्यावहारिक मार्ग के बारे में कुछ नहीं कह सकता, तो क्या तू ढोंग नहीं कर रहा है? यदि तू अपने व्यावहारिक अनुभव दूसरों को नहीं दे सकता, जिनसे उन्हें सीखने के लिए सबक या अनुसरण के लिए मार्ग मिल सके, तो क्या तू धोखा नहीं दे रहा है? क्या तू पाखंडी नहीं है? तेरा क्या मूल्य है? ऐसा व्यक्ति केवल “समाजवाद के सिद्धांत के आविष्कारक” की भूमिका अदा कर सकता है, “समाजवाद लाने वाले योगदाता” की नहीं। वास्तविकता से रहित होना सत्य से युक्त नहीं होना है। वास्तविकता से रहित होना निकम्मा होना है। वास्तविकता से रहित होना चलती-फिरती लाश होना है। वास्तविकता से रहित होना “मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारक” होना है जिसका कोई संदर्भ मूल्य नहीं होता। मैं तुममें से प्रत्येक से आग्रह करता हूँ कि सिद्धांत के बारे में मुँह बंद करो और कुछ वास्तविक, कुछ सच्ची और ठोस चीज़ के बारे में बात करो; कुछ “आधुनिक कला” का अध्ययन करो, कुछ यथार्थवादी कहो, कुछ वास्तविक योगदान करो, और कुछ समर्पण की भावना रखो। जब तुम बोलो, वास्तविकता का सामना करो; लोगों को प्रसन्न महसूस करवाने या चौंकाकर अपने पर उनका ध्यान दिलाने के लिए अवास्तविक और अतिरंजित वार्ता में लिप्त मत होओ। उसमें मोल कहाँ है? अपने प्रति लोगों से उत्साहपूर्ण बर्ताव करवाने का क्या औचित्य है? अपनी बातचीत में थोड़े “कलात्मक” बनो, अपने आचरण में थोड़े निष्पक्ष बनो, तुम चीज़ों से निपटने के तरीके में थोड़े समझदार बनो, तुम जो कहते हो उसमें थोड़े व्यावहारिक बनो, अपने हर काम के साथ परमेश्वर के घर के हितों पर विचार करो, जब तुम्हारी भावनाएँ बाहर आएँ तो अपनी अंतरात्मा की सुनो, दयालुता का बदला नफरत से मत चुकाओ या दयालुता के प्रति कृतघ्न मत बनो, और पाखंडी मत बनो, क्योंकि ये चीज़ें करने से तुम एक बुरा प्रभाव डालते हो। जब तुम परमेश्वर के वचन खाओ और पिओ, तो उन्हें वास्तविकता के साथ अधिक जोड़ो, और जब तुम संगति करो, तब यथार्थवादी चीज़ों के बारे में अधिक बोलो। दूसरों को नीचा न दिखाओ; यह परमेश्वर को संतुष्ट नहीं करेगा। दूसरों के साथ अपनी बातचीत में थोड़ा अधिक सहिष्णु, थोड़ा अधिक लचीला, थोड़ा अधिक उदार बनो, और “प्रधानमंत्री की भावना”[क] से सीखो। जब तुम्हारे मन में बुरे विचार आएँ, तब देह-सुख के खिलाफ विद्रोह करने का अधिक अभ्यास करो। जब तुम कार्य कर रहे होते हो, तब व्यावहारिक मार्गों के बारे में अधिक बोलो, और बहुत ऊँचाई पर न चले जाओ, नहीं तो तुम्हारी बातें लोगों के सिर के ऊपर से निकल जाएँगी। आनंद कम, योगदान अधिक—अपनी निःस्वार्थ समर्पण की भावना दिखाओ। परमेश्वर के इरादों के प्रति अधिक विचारशील बनो और अपनी अंतरात्मा की अधिक सुनो। परमेश्वर हर दिन तुम लोगों से धैर्य और गंभीरता से बात करता है—इसके बारे में बार-बार अधिक सोचो और इसे मत भूलो; “पुराने पंचांग” को बार-बार पढ़ो। बार-बार अधिक प्रार्थना और अधिक संगति करो। इतने संभ्रमित होना बंद करो; कुछ विवेक दिखाओ और कुछ अंतर्दृष्टि प्राप्त करो। ज्यों ही तुम्हारा पापी हाथ बढ़े, वापस पीछे खींच लो; इसे इतना आगे जाने ही न दो। किसी काम का नहीं, और परमेश्वर से तुम्हें शापों के अलावा कुछ नहीं मिलेगा, इसलिए होशियार रहो। अपने हृदय को दूसरों पर तरस खाने दो, और हमेशा हाथ में अस्त्र लेकर टूट मत पड़ो। दूसरों की मदद करने की भावना बनाए रखते हुए, सत्य के ज्ञान के बारे में अधिक संगति और जीवन के बारे में अधिक बात करो। अधिक करो और कम बोलो। अभ्यास में अधिक और अनुसंधान तथा विश्लेषण पर कम ध्यान दो। पवित्र आत्मा द्वारा अपने को अधिक प्रेरित होने दो, और परमेश्वर को तुम्हें पूर्ण करने के अधिक अवसर दो। मानवीय तत्त्वों को अधिक मिटाओ; तुम अब भी चीज़ों को करने के बहुत सारे मानवीय तरीक़ों से युक्त हो, और चीजों को करने का तुम्हारा उथला तरीक़ा और व्यवहार अब भी दूसरों के लिए घृणास्पद है : इनमें से और अधिक मिटा दो। तुम्हारी मनःस्थिति अब भी बहुत घृणास्पद है। इसे सुधारने में अधिक समय लगाओ। तुम लोगों के दिलों में अब भी लोगों का बहुत अधिक रुतबा है; परमेश्वर को अधिक प्रतिष्ठा दो, और इतने अविवेकी न बनो। “मंदिर” हमेशा से परमेश्वर का है, और लोगों को उस पर कब्ज़ा नहीं करना चाहिए। संक्षेप में, धार्मिकता पर अधिक और भावनाओं पर कम ध्यान केंद्रित करो। देहसुख को मिटा देना ही सर्वश्रेष्ठ है; वास्तविकता के बारे में अधिक और ज्ञान के बारे में कम बात करो; मुँह बंद रखना और कुछ न कहना ही सर्वश्रेष्ठ है। अभ्यास के मार्ग की अधिक बात करो, और बेकार की डींगें कम हाँको। सर्वश्रेष्ठ तो यही है कि इसी समय अभ्यास करना आरंभ कर दो।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, वास्तविकता पर अधिक ध्यान केंद्रित करो
फुटनोट :
क. प्रधानमंत्री की भावना : प्राचीन चीनी कहावत जिसका प्रयोग खुले विचारों वाले और उदार-हृदय व्यक्ति का वर्णन करने के लिए किया जाता है।
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 432
लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएँ उतनी ऊँची भी नहीं हैं। अगर लोग लगन और ईमानदारी से अभ्यास करें, तो उन्हें “उत्तीर्ण ग्रेड” प्राप्त होगा। सच कहा जाए, तो सत्य की समझ, ज्ञान और बोध प्राप्त करना सत्य का अभ्यास करने से कहीं अधिक जटिल है। पहले जितना तू समझता है उतना अभ्यास कर, और जो तूने बूझ लिया है उसका अभ्यास कर। इस तरह तू धीरे-धीरे सत्य का सच्चा ज्ञान और समझ हासिल करने में सक्षम होगा। ये वे कदम और साधन हैं, जिनके द्वारा पवित्र आत्मा कार्य करता है। अगर तू इस तरह से समर्पण का अभ्यास नहीं करेगा, तो तू कुछ भी हासिल नहीं करेगा। अगर तू हमेशा अपनी इच्छा से कार्य करता है और समर्पण का अभ्यास नहीं करता, तो क्या पवित्र आत्मा तुझ पर कार्य करेगा? क्या पवित्र आत्मा तेरी इच्छानुसार कार्य करता है? या वह तेरी कमी के अनुसार और परमेश्वर के वचनों के आधार पर कार्य करता है? अगर तुझे यह स्पष्ट नहीं है, तो तू सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाएगा। ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोगों ने परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में काफी मेहनत की है, लेकिन इसके पश्चात उनके पास मात्र ज्ञान है और व्यावहारिक मार्ग के बारे में कुछ नहीं कह पाते? क्या तुझे लगता है कि ज्ञान से युक्त होना सत्य से युक्त होने के बराबर है? क्या यह भ्रांत दृष्टिकोण नहीं है? तू ज्ञान के उतने अंश बोल पाता है जितने समुद्र-तट पर रेत के कण होते हैं, फिर भी इसमें से कुछ भी व्यावहारिक मार्ग नहीं है। यह करके क्या तू लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयत्न नहीं कर रहा है? क्या तू खोखला प्रदर्शन नहीं कर रहा है, जिसके समर्थन के लिए कुछ भी ठोस नहीं है? ऐसा समूचा व्यवहार लोगों के लिए हानिकारक है! जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत और उतना ही अधिक यह वास्तविकता से रहित, उतना ही अधिक यह लोगों को वास्तविकता में ले जाने में अक्षम है। जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत, उतना ही अधिक यह तुझसे परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और विरोध करवाता है। आध्यात्मिक सिद्धांत में लिप्त मत हो—इसका कोई फायदा नहीं! कुछ लोग आध्यात्मिक सिद्धांत के बारे में दशकों से बात कर रहे हैं, और वे महान आध्यात्मिक हस्तियाँ बन गए हैं, लेकिन अंततः, इतने पर वे भी सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में विफल हैं। चूँकि उन्होंने परमेश्वर के वचनों का अभ्यास या अनुभव नहीं किया है, इसलिए उनके पास अभ्यास के लिए कोई सिद्धांत या मार्ग नहीं है। ऐसे लोगों के पास स्वयं सत्य वास्तविकता नहीं होती, तो वे अन्य लोगों को परमेश्वर में आस्था के सही रास्ते पर कैसे ला सकते हैं? वे केवल लोगों को गुमराह कर सकते हैं। क्या यह दूसरों को और खुद को नुकसान पहुँचाना नहीं है? कम से कम, तुझे वास्तविक समस्याएँ हल करने में सक्षम होना चाहिए, जो ठीक तेरे सामने हैं। अर्थात्, तुझे परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करने और सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम होना चाहिए। केवल यही परमेश्वर के प्रति समर्पण है। जीवन प्रवेश पा लेने पर ही तू परमेश्वर के लिए काम करने के योग्य होता है, और परमेश्वर के लिए सच्चे मन से खुद को खपाने पर ही तू परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जा सकता है। हमेशा बड़े-बड़े वक्तव्य न दिया कर और आडंबरपूर्ण सिद्धांत की बात मत किया कर; यह वास्तविक नहीं है। लोगों से अपनी प्रशंसा करवाने के लिए आध्यात्मिक सिद्धांत बघारना परमेश्वर की गवाही देना नहीं है, बल्कि अपनी शान दिखाना है। यह लोगों के लिए बिलकुल भी लाभदायक नहीं है और उन्हें कुछ सिखाता नहीं, और उन्हें आसानी से आध्यात्मिक सिद्धांत की आराधना करने और सत्य के अभ्यास पर ध्यान केंद्रित न करने के लिए प्रेरित कर सकता है—और क्या यह लोगों को गुमराह करना नहीं है? इसी तरह करते रहना कई खोखले सिद्धांतों और साथ ही बहुत-से विनियमों को जन्म देगा, जो लोगों को बाधित करेंगे और फँसाएँगे; यह वाकई शर्मनाक है। इसलिए ह ज्यादा कह जो वास्तविक है, उन समस्याओं के बारे में ज्यादा बात कर जो वास्तव में मौजूद हैं, वास्तविक समस्याएँ हल करने के लिए सत्य की खोज करने में ज्यादा समय बिता; यही सबसे महत्वपूर्ण है। सत्य का अभ्यास सीखने में देरी न कर : यह वास्तविकता में प्रवेश का मार्ग है। अन्य लोगों के अनुभवजन्य ज्ञान को अपनी निजी संपत्ति की तरह मत ले और उन्हें दूसरों की प्रशंसा पाने के लिए पकड़कर मत रख। तुम्हारे पास अपना जीवन प्रवेश होना चाहिए। केवल सत्य का अभ्यास करने का तरीका जानकर और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने से ही तुझे जीवन प्रवेश मिलेगा। प्रत्येक व्यक्ति को इसी का अभ्यास और इसी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
यदि तुम जो संगति करते हो वह लोगों को चलने के लिए मार्ग दे सकती है, तो यह तुम्हारे वास्तविकता से युक्त होने के बराबर है। तुम चाहे जो कहो, तुम्हें लोगों को अभ्यास में लाना और उन सभी को एक मार्ग देना चाहिए जिसका वे अनुसरण कर सकें। उन्हें केवल ज्ञान ही मत पाने दो; अधिक महत्वपूर्ण चलने के लिए मार्ग का होना है। परमेश्वर में अपने विश्वास में, लोगों को परमेश्वर द्वारा अपने कार्य में दिखाए गए मार्ग पर चलना चाहिए। अर्थात, परमेश्वर में विश्वास करने की प्रक्रिया पवित्र आत्मा द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलने की प्रक्रिया है। इस प्रकार, चाहे जो भी हो, तुम्हारे पास एक ऐसा मार्ग होना चाहिए जिस पर तुम चल सको; तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर चलना होगा। बहुत अधिक पीछे मत छूट जाओ, और बहुत सारी चीजों की चिंता में मत पड़ो। यदि तुम गड़बड़ियाँ उत्पन्न किए बिना परमेश्वर द्वारा दिखाए मार्ग पर चलते हो, तभी तुम पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हो और प्रवेश का मार्ग पा सकते हो। यही परमेश्वर के इरादों के अनुसार होना और मानवता का कर्तव्य पूरा करना माना जाता है। इस धारा का व्यक्ति होने के नाते, प्रत्येक व्यक्ति को अपना कर्तव्य अच्छी तरह पूरा करना चाहिए, वह और अधिक करना चाहिए जो लोगों को करना चाहिए, और मनमाने ढंग से काम नहीं करना चाहिए। कार्य कर रहे लोगों को अपने शब्द स्पष्ट करने चाहिए, अनुसरण कर रहे लोगों को कठिनाइयों का सामना करने और समर्पण करने पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए, सभी को अपनी भूमिका तक सीमित रहना चाहिए और सीमा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्पष्ट होना चाहिए कि उसे कैसे अभ्यास करना है और क्या कार्य पूरा करना है। पवित्र आत्मा द्वारा दिखाया गया मार्ग लो; भटक मत जाना या बेतुके मत बनना। तुम्हें आज का कार्य स्पष्ट रूप से देखना चाहिए। तुम लोगों को कार्य करने के आज के तरीके में प्रवेश करने का अभ्यास करना चाहिए। सबसे पहले तुम्हें इसी में प्रवेश करना चाहिए। दूसरी चीजों पर और अधिक शब्द बर्बाद मत करो। आज परमेश्वर के घर का कार्य करना तुम लोगों की जिम्मेदारी है, आज की कार्य-पद्धति में प्रवेश करना तुम लोगों का कर्तव्य है, और आज के सत्य का अभ्यास करना तुम लोगों का भार है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, वास्तविकता पर अधिक ध्यान केंद्रित करो
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 433
परमेश्वर व्यावहारिक परमेश्वर है : उसका समस्त कार्य व्यावहारिक है, उसके द्वारा कहे जाने वाले सभी वचन व्यावहारिक हैं, और उसके द्वारा व्यक्त किए जाने वाले सभी सत्य व्यावहारिक हैं। हर वह चीज, जो उसका वचन नहीं है, खोखली, अस्तित्वहीन है और टिकती नहीं है। आज पवित्र आत्मा लोगों का मार्गदर्शन करके उन्हें परमेश्वर के वचनों में प्रवेश कराता है। यदि लोगों को वास्तविकता में प्रवेश का प्रयास करना है, तो उन्हें वास्तविकता की खोज करनी होगी, वास्तविकता को जानना होगा, उसके बाद वास्तविकता का अनुभव करना होगा और वास्तविकता को जीना होगा। लोग वास्तविकता को जितना अधिक जानते हैं, उतना ही अधिक वे यह भेद पहचानने में समर्थ होते हैं कि दूसरों के शब्द वास्तविक हैं या नहीं; लोग वास्तविकता को जितना अधिक जानते हैं, उनमें धारणाएँ उतनी ही कम होती हैं; लोग वास्तविकता का जितना अधिक अनुभव करते हैं, उतना ही अधिक वे व्यावहारिक परमेश्वर के कर्मों को जानते हैं, और उनके लिए अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों से मुक्त होना उतना ही अधिक आसान होता है; लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होती है, वे उतना ही अधिक परमेश्वर को जानते हैं, और इस प्रकार उतना ही अधिक देह से घृणा और सत्य से प्रेम करते हैं; और लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होती है, वे परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के उतना ही अधिक निकट होते हैं। जो लोग परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाते हैं, वे वो लोग होते हैं जिनमें वास्तविकता होती है, जो वास्तविकता को जानते हैं और जो वास्तविकता का अनुभव करके परमेश्वर के व्यावहारिक कर्मों को जान गए हैं। तुम परमेश्वर के साथ व्यावहारिक ढंग से जितना अधिक सहयोग करोगे और अपने शरीर को जितना अधिक अनुशासित करोगे, उतना ही अधिक तुम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करोगे, उतना ही अधिक तुम वास्तविकता को प्राप्त करोगे, और उतना ही अधिक तुम परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध किए जाओगे, और इस तरह तुम्हें परमेश्वर के व्यावहारिक कर्मों का उतना ही अधिक ज्ञान होगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश में रह पाओ, तो तुम्हें अभ्यास का वर्तमान मार्ग अधिक स्पष्ट हो जाएगा, और तुम अतीत की धार्मिक धारणाओं एवं पुराने अभ्यासों से अपने आपको अलग करने में अधिक सक्षम हो जाओगे। आज असलियत पर ध्यान केंद्रित है : लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होगी, सत्य का उनका ज्ञान उतना ही अधिक स्पष्ट होगा, और परमेश्वर के इरादों की उनकी समझ अधिक बड़ी होगी। वास्तविकता सभी शब्दों और धर्म-सिद्धांतों पर विजय पा सकती है; यह समस्त सैद्धांतिक ज्ञान पर भी विजय पा सकती है और लोग जितना अधिक वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करते हैं, उतना ही अधिक वे परमेश्वर से सच्चा प्रेम कर पाते हैं और उसके वचनों के लिए लालायित रहते हैं। यदि तुम हमेशा वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो तुम्हारा सांसारिक आचरण का फलसफा, धार्मिक धारणाएँ और प्राकृतिक चरित्र परमेश्वर के कार्य के आगे बढ़ने के साथ-साथ स्वाभाविक रूप से समाप्त हो जाएँगे। जो वास्तविकता की खोज नहीं करते, और जिन्हें वास्तविकता का कोई ज्ञान नहीं है, उनके द्वारा अलौकिक चीजों की खोज किए जाने की संभावना है, और वे आसानी से छले जाएँगे। पवित्र आत्मा के पास ऐसे लोगों में कार्य करने का कोई उपाय नहीं है, और इसलिए वे खालीपन महसूस करते हैं, और उनके जीवन का कोई अर्थ नहीं होता।
पवित्र आत्मा तुममें केवल तभी कार्य कर सकता है जब तुम वास्तव में प्रशिक्षण लेते हो, वास्तव में खोजते हो, वास्तव में प्रार्थना करते हो और सत्य खोजने के लिए कष्ट सहने को तैयार रहते हो। जो सत्य की खोज नहीं करते, उनके पास शब्दों और धर्म-सिद्धांतों, और खोखले सिद्धांतों के अलावा कुछ नहीं होता, और जो सत्य से रहित होते हैं, उनमें परमेश्वर के बारे में स्वाभाविक रूप से अनेक धारणाएँ होती हैं। ऐसे लोग परमेश्वर से केवल यही लालसा करते हैं कि वह उनकी भौतिक देह को आध्यात्मिक देह में बदल दे, ताकि वे तीसरे स्वर्ग में आरोहित हो सकें। ये लोग कितने मूर्ख हैं! ऐसी बातें कहने वाले सभी लोगों को परमेश्वर का या वास्तविकता का कोई ज्ञान नहीं होता; ऐसे लोग परमेश्वर के साथ बिल्कुल भी सहयोग नहीं कर सकते और केवल निष्क्रिय होकर प्रतीक्षा ही कर सकते हैं। यदि लोगों को सत्य को समझना है, और सत्य का स्पष्ट रूप से बोध करना है, और इससे भी बढ़कर, यदि उन्हें सत्य में प्रवेश करना है, और उसे अभ्यास में लाना है, तो उन्हें वास्तव में प्रशिक्षण लेना चाहिए, वास्तव में खोजना चाहिए, और वास्तव में लालायित होना चाहिए। जब तुम लालायित होते हो, जब तुम वास्तव में परमेश्वर के साथ सहयोग करते हो, तो परमेश्वर का आत्मा निश्चित रूप से तुम्हें स्पर्श करेगा और तुम्हारे भीतर कार्य करेगा, वह तुममें और अधिक प्रबुद्धता लाएगा, और तुम्हें वास्तविकता का और अधिक ज्ञान देगा, और तुम्हारे जीवन के लिए और अधिक सहायक होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, वास्तविकता को कैसे जानें
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 434
यदि लोगों को परमेश्वर को जानना है, तो सबसे पहले उन्हें यह जानना चाहिए कि परमेश्वर व्यावहारिक परमेश्वर है, और उन्हें परमेश्वर के वचनों को, देह में परमेश्वर के व्यावहारिक प्रकटन को और परमेश्वर के व्यावहारिक कार्य को अवश्य जानना चाहिए। यह जानने के बाद ही कि परमेश्वर का समस्त कार्य व्यावहारिक है, तुम वास्तव में परमेश्वर के साथ सहयोग करने में समर्थ हो सकोगे, और केवल इसी मार्ग से तुम अपने जीवन में वृद्धि हासिल कर सकोगे। जिन्हें वास्तविकता का कोई ज्ञान नहीं है, उन सभी के पास परमेश्वर के वचनों को अनुभव करने का कोई उपाय नहीं है, वे अपनी धारणाओं में उलझे हुए हैं, अपनी कल्पनाओं में जीते हैं, और इस प्रकार उन्हें परमेश्वर के वचनों का कोई ज्ञान नहीं है। वास्तविकता का तुम्हारा ज्ञान जितना अधिक होता है, तुम परमेश्वर के उतने ही निकट होते हो, और तुम उसके उतने ही अधिक अंतरंग होते हो; और तुम जितना अधिक दूर की और अस्पष्ट चीजों का अनुसरण करते हो, धर्म-सिद्धांत का अनुसरण करते हो, तुम परमेश्वर से उतने ही दूर भटक जाओगे, और इसलिए तुम उतना ही अधिक महसूस करोगे कि परमेश्वर के वचनों को अनुभव करना श्रमसाध्य एवं कठिन है, और तुम प्रवेश करने में अक्षम हो। यदि तुम परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में और अपने आध्यात्मिक जीवन के सही मार्ग पर प्रवेश करना चाहते हो, तो तुम्हें सबसे पहले वास्तविकता को जानना और स्वयं को अस्पष्ट तथा अलौकिक बातों से अलग कर लेना चाहिए, यानी सबसे पहले तुम्हें यह समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा किस प्रकार व्यावहारिक रूप से तुम्हें प्रबुद्ध करता है और तुम्हारा मार्गदर्शन करता है। इस तरह, यदि तुम सचमुच मनुष्य के भीतर पवित्र आत्मा के व्यावहारिक कार्य को समझ सकते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के सही पथ पर प्रवेश कर चुके होगे।
आज, हर चीज़ वास्तविकता से शुरू होती है। परमेश्वर का कार्य सर्वाधिक व्यावहारिक है, और लोगों द्वारा स्पर्श किया जा सकता है; लोग उसे अनुभव कर सकते हैं और हासिल कर सकते हैं। लोगों में बहुत-कुछ अस्पष्ट और अलौकिक है, जो उन्हें परमेश्वर के वर्तमान कार्य को जानने से रोकता है। इस प्रकार उनके अनुभवों में हमेशा विचलन होते हैं और वे हमेशा महसूस करते हैं कि चीज़ें कठिन हैं और यह सब उनकी धारणाओं के कारण होता है। लोग पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को समझने में असमर्थ हैं, वे वास्तविकता को नहीं जानते, इसलिए वे प्रवेश के मार्ग पर हमेशा नकारात्मक होते हैं। वे परमेश्वर की अपेक्षाओं को दूर से देखते हैं, उन्हें हासिल करने में असमर्थ होते हैं; वे मात्र यह देखते हैं कि परमेश्वर के वचन वास्तव में अच्छे हैं, किंतु प्रवेश का मार्ग नहीं खोज पाते। पवित्र आत्मा इस सिद्धांत के द्वारा काम करता है : केवल लोगों के सहयोग से, उनके द्वारा सक्रियतापूर्वक परमेश्वर की प्रार्थना करने, उसे खोजने और उसके निकट आने से नतीजे प्राप्त किए जा सकते हैं, और पवित्र आत्मा द्वारा लोगों को प्रबुद्ध और रोशन किया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि पवित्र आत्मा अकेले ही कार्य करता है, या मनुष्य अकेला ही कार्य करता है। दोनों ही अपरिहार्य हैं, और लोग जितना अधिक सहयोग करते हैं, और वे जितना अधिक परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों को प्राप्त करने की कोशिश करते हैं, पवित्र आत्मा उतना अधिक कार्य करता है। पवित्र आत्मा के कार्य के साथ मिलकर लोगों का वास्तविक सहयोग ही व्यावहारिक अनुभव उत्पन्न कर सकता है, साथ ही परमेश्वर के वचनों के सार का ज्ञान भी। इस तरह धीरे-धीरे अनुभव करके, अंततः एक पूर्ण व्यक्ति बनता है। परमेश्वर अलौकिक काम नहीं करता; लोगों की धारणाओं के अनुसार, परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, और सब कुछ परमेश्वर के द्वारा किया जाता है—परिणामस्वरूप लोग निष्क्रिय रहकर प्रतीक्षा करते हैं, वे न तो परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, और न ही प्रार्थना करते हैं, और पवित्र आत्मा के स्पर्श की प्रतीक्षा मात्र करते रहते हैं। हालाँकि, जिनकी समझ शुद्ध है, वे यह मानते हैं : परमेश्वर के कार्यकलाप उतनी ही दूर तक जा सकते हैं, जहाँ तक मेरा सहयोग होता है, और मुझमें परमेश्वर के कार्य का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि मैं किस प्रकार सहयोग करता हूँ। जब परमेश्वर बोलता है, तो मुझे परमेश्वर के वचनों को खोजने और उनकी ओर बढ़ने का हर संभव प्रयास करना चाहिए। यही है जिसे मुझे हासिल करना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, वास्तविकता को कैसे जानें
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 435
तुम कितने धार्मिक अभ्यासों का पालन करते हो? कितनी बार तुम परमेश्वर के वचन के खिलाफ गए हो और अपने ही तरीके से चले हो? कितनी बार तुम परमेश्वर के वचनों को इसलिए अभ्यास में लाए हो क्योंकि तुम उसके भार के बारे में सच में विचारशील हो और उसके इरादों को पूरा करना चाहते हो? तुम्हें परमेश्वर के वचन को समझना चाहिए, उसके अनुसार अभ्यास करना चाहिए और अपने सारे क्रियाकलापों और कर्मों में सिद्धांतयुक्त बनना चाहिए; इसका अर्थ विनियमों का पालन करना या बेमन से बस दिखावे के लिए कुछ करना नहीं है, इसके बजाय इसका अर्थ सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के वचन के अनुसार जीना है। केवल इस प्रकार का अभ्यास ही परमेश्वर को संतुष्ट करता है। परमेश्वर को संतुष्ट करने वाला कोई भी कार्य विनियम नहीं होता, बल्कि सत्य का अभ्यास होता है। कुछ लोग दिखावा करना पसंद करते हैं। अपने भाई-बहनों की उपस्थिति में वे भले ही कहें कि वे परमेश्वर के ऋणी हैं, परंतु उनकी पीठ पीछे वे सत्य का अभ्यास नहीं करते और बिल्कुल अलग ही व्यवहार करते हैं। क्या वे धार्मिक फरीसी नहीं हैं? एक ऐसा व्यक्ति जो सच में परमेश्वर से प्यार करता है और जिसमें सत्य है, वह परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होता है, परंतु बाहर से इसका दिखावा नहीं करता। जैसे भी हालात बनें, वह सत्य का अभ्यास करने को तैयार रहता है और अपने विवेक के विरुद्ध न तो बोलता है, न ही कार्य करता है। इस तरह का व्यक्ति मामले सामने आने पर अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करता है और परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, अपने कर्मों में सिद्धांतयुक्त होता है। यह व्यक्ति उस तरह का भी होता है जो सच्ची सेवा प्रदान कर सकता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो अक्सर जुबान से परमेश्वर के प्रति अपने ऋणी होने को व्यक्त करते हैं; वे अपने दिन चिंता में भौंहें चढ़ाए गुजारते हैं, दिखावा करते हैं, और दया के पात्र होने का दिखावा करते हैं। कितनी घिनौनी बात है! यदि तुम उनसे पूछते, “क्या तुम बता सकते हो कि तुम परमेश्वर के ऋणी कैसे हो?” तो वे निरुत्तर हो जाते। यदि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो, तो तुम बाहरी तौर पर इस बारे में बात नहीं करोगे; बल्कि वास्तविक अभ्यास के तरीके से परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम दर्शाओगे और सच्चे हृदय से उससे प्रार्थना करोगे। जो लोग परमेश्वर के सामने सिर्फ जबानी जमा-खर्च करते हैं, वे सब पाखंडी हैं! कुछ लोग जब भी प्रार्थना करते हैं, तब परमेश्वर के प्रति ऋणी होने की बात करते हैं और वे जब भी प्रार्थना करते हैं, चाहे जब भी करें, पवित्र आत्मा से द्रवित हुए बिना भी रोना आरंभ कर देते हैं। इस तरह के लोग धार्मिक रिवाजों और धारणाओं से ग्रस्त होते हैं; वे लोग हमेशा इन धार्मिक रिवाजों और धारणाओं के साथ जीते हैं, और मानते हैं कि इन कामों से परमेश्वर प्रसन्न होता है और सतही धार्मिकता या दुःख भरे आँसुओं को पसंद करता है। क्या ऐसे बेतुके लोग कभी कोई महत्व रख सकते हैं? कुछ लोग विनम्रता का प्रदर्शन करने के लिए, दूसरों के सामने बोलते समय शिष्टाचार का दिखावा करते हैं। कुछ लोग दूसरों के सामने जानबूझकर किसी नितांत शक्तिहीन मेमने की तरह जी-हुजूरी करते हैं। क्या यह तौर-तरीका राज्य के लोगों के लिए उचित है? राज्य के लोगों को जीवंत और स्वतंत्र, शुद्ध और खुला, ईमानदार और प्रेमयोग्य होना चाहिए और उन्हें स्वतंत्रता की अवस्था में जीना चाहिए। उनमें सत्यनिष्ठा और गरिमा होनी चाहिए और वे जहाँ भी जाएँ, उन्हें वहाँ अपनी गवाही में दृढ़ रहने में सक्षम होना चाहिए; ऐसे लोग परमेश्वर और मनुष्य दोनों को प्रिय होते हैं। जो लोग विश्वास में नौसिखिये होते हैं, वो बहुत सारे बाहरी अभ्यास करते हैं; उन्हें सबसे पहले काट-छाँट किए और तोड़े जाने की अवधि से अवश्य गुजरना चाहिए। परमेश्वर में आंतरिक आस्था होना ऐसी चीज नहीं है जिसे दूसरे देख सकें, लेकिन ऐसा करने वाले लोगों के क्रियाकलाप और कर्म सराहनीय होते हैं। ऐसे व्यक्ति ही परमेश्वर के वचनों को जीने वाले समझे जा सकते हैं। यदि तुम विभिन्न लोगों को उद्धार में लाने के लिए प्रतिदिन सुसमाचार का उपदेश देते हो, लेकिन अंत में अभी भी विनियमों और धर्म-सिद्धांतों में ही जीते रहते हो, तो तुम परमेश्वर को गौरवान्वित नहीं कर सकते। ऐसे लोग धार्मिक शख्सियत होने के साथ ही पाखंडी भी होते हैं। जब भी वे धार्मिक लोग इकट्ठे होते हैं, तो वे पूछ सकते हैं, “बहन, आजकल तुम कैसी हो?” संभव है कि बहन उत्तर दे, “मैं महसूस करती हूँ कि मैं परमेश्वर की कर्जदार हूँ और मैं उसके इरादे पूरे नहीं कर पाती।” संभव है कि दूसरी बहन कहे, “मैं भी परमेश्वर के प्रति ऋणी महसूस करती हूँ और उसे संतुष्ट नहीं कर पाती।” ये कुछ वाक्य और शब्द ही उनके हृदय की गहराई में मौजूद अधम चीजों को व्यक्त कर देते हैं; ऐसी बातें सर्वाधिक घृणित और अत्यंत घिनौनी हैं। ऐसे लोगों की प्रकृति परमेश्वर का विरोध करने वाली होती है। जो लोग वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वे उसी पर संगति करते हैं जो उनके मन में होता है और ऐसा वे खुले दिल से करते हैं। ऐसे लोग न तो एक भी झूठी कवायद में शामिल होते हैं, न झूठा शिष्टाचार दिखाते हैं, न खोखले शिष्टाचार का प्रदर्शन करते हैं। वे हमेशा बेबाक होते हैं और किसी सांसारिक नियम का पालन नहीं करते हैं। कुछ लोगों में, विवेक के निपट अभाव के बिंदु तक, दिखावे की प्रवृत्ति होती है। जब कोई गाता है, तो वे नाचने लगते हैं, वो समझ ही नहीं पाते कि उनकी पतीलियों में चावल जल चुका है। ऐसे लोग धर्मपरायण या नेक नहीं होते, वे तो बहुत ही अगंभीर होते हैं। ये सब वास्तविकता के अभाव की अभिव्यक्तियाँ हैं। जब कुछ लोग आध्यात्मिक जीवन के मामलों के बारे में संगति करते हैं, तो यद्यपि वे परमेश्वर के प्रति ऋणी होने की बात नहीं करते, फिर भी उनके मन की गहराइयों में उसके प्रति सच्चा प्रेम होता है। परमेश्वर के प्रति तुम्हारे ऋणी महसूस करने का दूसरे लोगों से कोई लेना-देना नहीं है; तुम परमेश्वर के प्रति ऋणी हो, न कि लोगों के प्रति। इस बारे में लगातार दूसरों को बताने का क्या फायदा है? तुम्हें वास्तविकता में प्रवेश करने को महत्व देना चाहिए, न कि बाहरी उत्साह या प्रदर्शन को। इंसानों का बाहरी अच्छा व्यवहार किस चीज का प्रतिनिधित्व करता है? वह देह का प्रतिनिधित्व करता है; यहाँ तक कि सर्वोत्तम बाहरी अभ्यास भी जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करते और वे केवल तुम्हारा व्यक्तिगत स्वभाव ही दिखा सकते हैं। मनुष्य के बाहरी अभ्यास परमेश्वर के इरादों को पूरा नहीं कर सकते। तुम निरंतर परमेश्वर के प्रति अपने ऋणी होने की बातें करते रहते हो, लेकिन तुम दूसरों के जीवन की आपूर्ति नहीं कर सकते या उनके परमेश्वर-प्रेमी हृदय को उद्दीप्त नहीं कर सकते। क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारे ऐसे कार्य परमेश्वर को संतुष्ट करेंगे? तुम्हें लगता है कि तुम्हारा इस तरीके से कार्य करना परमेश्वर का इरादा है, और तुम्हारे क्रियाकलाप आध्यात्मिक हैं, किन्तु वास्तव में, वे सब बेतुके हैं! तुम मानते हो कि जो तुम्हें पसंद है और जो तुम करना चाहते हो, वे ठीक वही चीजें हैं जिनसे परमेश्वर आनंदित होता है। क्या तुम्हारी पसंद परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती है? क्या व्यक्ति का व्यक्तित्व परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? जो तुम्हें पसंद है, परमेश्वर ठीक उसी से घृणा करता है और तुम्हारी आदतें ऐसी हैं जिन्हें परमेश्वर ठुकराता है। यदि तुम खुद को ऋणी महसूस करते हो, तो परमेश्वर के सामने जाओ और प्रार्थना करो; इस बारे में दूसरों से बात करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम परमेश्वर के सामने प्रार्थना नहीं करते और इसके बजाय दूसरों की उपस्थिति में निरंतर अपना प्रदर्शन करते रहते हो, तो क्या इससे परमेश्वर के इरादे पूरे किए जा सकते हैं? यदि तुम हमेशा बाहरी तौर पर चीजें करने पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो इसका मतलब है कि तुम अत्यधिक दिखावटी हो। वे किस तरह के लोग हैं जिनका केवल बाहरी व्यवहार अच्छा होता है और जो वास्तविकता से रहित होते हैं? वे पाखंडी फरीसी और धार्मिक लोग हैं! यदि तुम लोग अपने बाहरी अभ्यासों को नहीं छोड़ते और परिवर्तन नहीं कर सकते, तो तुम लोगों में पाखंड के तत्व बढ़ते जाएँगे। तुममें पाखंड के जितने तत्व होंगे, परमेश्वर के प्रति प्रतिरोध उतना ही अधिक होगा। और अंत में, इस तरह के लोग निश्चित रूप से निकाल दिए जाएँगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, इंसान को अपनी आस्था में, वास्तविकता पर ध्यान देना चाहिए—धार्मिक रीति-रिवाजों में लिप्त रहना आस्था नहीं है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 436
एक सामान्य व्यक्ति की समानता को पुनर्स्थापित करने के लिए, अर्थात् सामान्य मनुष्यत्व को प्राप्त करने के लिए लोग केवल अपने शब्दों से परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते। ऐसा करके वे स्वयं को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं, और इससे उनके प्रवेश या परिवर्तन को कोई लाभ नहीं पहुँचता। अतः परिवर्तन लाने के लिए लोगों को थोड़ा-थोड़ा करके प्रशिक्षण लेना चाहिए। उन्हें धीरे-धीरे प्रवेश करना चाहिए, थोड़ा-थोड़ा करके खोजना और जांचना चाहिए, सकारात्मकता से प्रवेश करना चाहिए, और सत्य का व्यवहारिक जीवन जीना चाहिए; अर्थात एक संत का जीवन जीना चाहिए। उसके बाद, वास्तविक विषय, वास्तविक घटनाएँ और वास्तविक परिवेश से लोगों को वास्तविक प्रशिक्षण मिलता है। लोगों से बोलकर कुछ कहने की अपेक्षा नहीं की जाती; बल्कि उन्हें वास्तविक परिवेशों के माध्यम से प्रशिक्षण लेना है। पहले लोगों को यह पता चलता है कि उनमें क्षमता की कमी है, और फिर वे सामान्य रूप से परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, प्रवेश करते हैं और सामान्य रूप से प्रशिक्षण भी लेते हैं; केवल इसी तरीके से उनमें वास्तविकता हो सकती है, और इसी प्रकार से प्रवेश और भी अधिक तेजी से हो सकता है। लोगों को परिवर्तित करने के लिए, वास्तविकता के कुछ पहलू अवश्य होने चाहिए; उन्हें वास्तविक विषयों, वास्तविक घटनाओं और वास्तविक परिवेशों के माध्यम से प्रशिक्षण लेना चाहिए। क्या कोई केवल कलीसियाई जीवन पर निर्भर रहकर सच्चा प्रशिक्षण प्राप्त कर सकता है? क्या लोग इस तरह वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं? नहीं! यदि लोग वास्तविक जीवन में प्रवेश करने में असमर्थ हैं, तो वह कार्य करने और जीवन जीने के पुराने तरीकों को बदलने में भी असमर्थ हैं। यह पूरी तरह से लोगों के आलस्य या उच्च स्तर की निर्भरता के कारण नहीं है, बल्कि यह इसलिए है क्योंकि लोगों में बस जीने की क्षमता नहीं है, और वे यह तो और भी कम समझते हैं कि एक सामान्य व्यक्ति की छवि के लिए वह मानक क्या है जिसकी परमेश्वर लोगों से अपेक्षा करता है। अतीत में, लोग हमेशा बातें करते थे, बोलते थे, संगति करते थे—और वे “वक्ता” भी बन गए—फिर भी उनमें से किसी ने भी अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन का अनुसरण नहीं किया; इसके बजाय, वे गहन सिद्धांतों का अनुसरण करते रहे। इस प्रकार, आज, लोगों को अपने जीवन में परमेश्वर में विश्वास की इस धार्मिक शैली को अवश्य बदलना चाहिए। उन्हें एक घटना, एक चीज़, एक व्यक्ति पर ध्यान केंद्रित करके प्रवेश करना और प्रशिक्षण लेना चाहिए। उन्हें इसे ध्यान केंद्रित करके करना चाहिए—केवल तभी वे नतीजे हासिल कर सकते हैं। लोगों के परिवर्तित होने के लिए, उन्हें सार में बदलना चाहिए। कार्य का लक्ष्य लोगों का सार, उनका जीने का तरीका, उनका आलस्य, निर्भरता, और दासत्व होना चाहिए, केवल इस तरीके से वे परिवर्तित हो सकते हैं।
यद्यपि कलीसियाई जीवन कुछ क्षेत्रों में परिणाम ला सकता है, परंतु कुंजी अभी भी यही है कि वास्तविक जीवन लोगों को परिवर्तित कर सकता है। इंसान की पुरानी प्रकृति वास्तविक जीवन के बिना परिवर्तित नहीं हो सकती। उदाहरण के लिए, अनुग्रह के युग में यीशु के कार्य को लो। जब यीशु ने पुराने नियमों को हटाकर नए युग की आज्ञाएँ स्थापित कीं, तो उसने वास्तविक जीवन के असल उदाहरणों का इस्तेमाल किया। जब यीशु अपने चेलों को सब्त के दिन गेहूँ के खेत से होते हुए ले जा रहा था, तो उसके चेलों ने भूख लगने पर गेहूं की बालें तोड़कर खाईं। फरीसियों ने यह देखा तो वे बोले कि उन्होंने सब्त का पालन नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को सब्त के दिन गड्ढे में गिरे बछड़ों को बचाने की अनुमति भी नहीं है, उनका कहना था कि सब्त के दिन कोई कार्य नहीं किया जाना चाहिए। यीशु ने नए युग की आज्ञाओं को धीरे-धीरे लागू करने के लिए इन घटनाओं का प्रयोग किया। उस समय, लोगों को समझाने और परिवर्तित करने के लिए उसने बहुत-से वास्तविक विषयों का प्रयोग किया। पवित्र आत्मा इसी सिद्धांत से कार्य करता है, और केवल यही तरीका है जो लोगों को बदल सकता है। यदि कोई वास्तविक मामला नहीं है, और लोग केवल सैद्धांतिक समझ प्राप्त करते हैं और चीज़ों को केवल बौद्धिक रूप से समझ सकते हैं, तो यह लोगों को परिवर्तित करने का एक प्रभावी तरीका नहीं है। जहाँ तक प्रशिक्षण के माध्यम से बुद्धि और अंतर्दृष्टि प्राप्त करने की बात है, तो वह कैसे आती है? क्या लोग केवल सुनने, पढ़ने और कुछ चीज़ों को समझने की कोशिश करने से बुद्धि और अंतर्दृष्टि प्राप्त कर सकते हैं? ऐसा कैसे हो सकता है? लोगों को वास्तविक जीवन में समझना और अनुभव करना चाहिए! अतः इंसान को प्रशिक्षण लेना चाहिए और उसे वास्तविक जीवन से हटना नहीं चाहिए। लोगों को विभिन्न पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए और भिन्न पहलुओं में प्रवेश करना चाहिए : शैक्षणिक स्तर, अभिव्यक्ति, चीजों को देखने की योग्यता, विवेक, परमेश्वर के वचनों को समझने की योग्यता, व्यवहारिक ज्ञान, मनुष्यजाति के नियम, और मनुष्यजाति से संबंधित अन्य बातें वो चीज़ें हैं जिनसे लोगों को परिपूर्ण होना चाहिए। समझ प्राप्त करने के बाद लोगों को प्रवेश पर ध्यान देना चाहिए, तभी परिवर्तन किया जा सकता है। यदि किसी ने समझ प्राप्त कर ली है परंतु फिर भी वह अभ्यास की उपेक्षा करता है, तो परिवर्तन कैसे हो सकता है? वर्तमान में, लोग बहुत कुछ समझते हैं, परंतु उन्होंने वास्तविकता में इसे नहीं जिया है; इसलिए उनके पास परमेश्वर के वचनों के सार की केवल थोड़ी-सी समझ होती है। तुम केवल आंशिक रूप से प्रबुद्ध हुए हो; तुमने पवित्र आत्मा से केवल थोड़ा-सा प्रकाशन पाया है, फिर भी वास्तविक जीवन में तुम्हारा प्रवेश नहीं हुआ है—या शायद तुम प्रवेश की परवाह भी नहीं करते—इस प्रकार, अधिक परिवर्तन से नहीं गुजरते। इतने लंबे समय के बाद, लोग बहुत कुछ समझते हैं। वे सिद्धांतों के अपने ज्ञान के बारे में बहुत कुछ बोल सकते हैं, परंतु उनका बाहरी स्वभाव वैसा ही रहता है, और उनकी मूल क्षमता पहले जैसी ही बनी रहती है, थोड़ी सी भी आगे नहीं बढ़ती। यदि ऐसा है तो तुम अंततः कब प्रवेश करोगे?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कलीसियाई जीवन और वास्तविक जीवन पर विचार-विमर्श
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 437
कलीसियाई जीवन केवल इस प्रकार का जीवन है जहाँ लोग परमेश्वर के वचनों का स्वाद लेने के लिए एकत्र होते हैं, और यह किसी व्यक्ति के जीवन का एक छोटा-सा भाग ही होता है। यदि लोगों का वास्तविक जीवन भी कलीसियाई जीवन जैसा हो पाता, जिसमें सामान्य आत्मिक जीवन भी शामिल हो, जहाँ परमेश्वर के वचनों का सामान्य तरीके से स्वाद लिया जाए, सामान्य तरीके से प्रार्थना की जाए और परमेश्वर के निकट रहा जाए, एक ऐसा वास्तविक जीवन जिया जाए जहाँ सबकुछ परमेश्वर के इरादों के अनुसार हो, एक ऐसा वास्तविक जीवन जिया जाए जहाँ सब कुछ सत्य के अनुसार हो, प्रार्थना करने का और परमेश्वर के समक्ष शांत रहने, भक्तिगीत गाने और नृत्य का अभ्यास करने का वास्तविक जीवन जिया जाए, तो ऐसा जीवन ही लोगों को परमेश्वर के वचनों के जीवन में लेकर आएगा। अधिकाँश लोग केवल अपने कलीसियाई जीवन के कुछ घंटों के दौरान ही अपनी स्थिति पर ध्यान देते हैं, और वे उन घंटों से बाहर अपने जीवन की “सुधि” नहीं रखते, मानो उससे उनको कोई लेना-देना न हो। ऐसे भी कई लोग हैं जो केवल परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय, भजन गाते या प्रार्थना करते समय ही संतों के जीवन में प्रवेश करते हैं, उसके बाद वे उस समय से बाहर अपने पुराने व्यक्तित्व में लौट जाते हैं। इस तरह का जीवन लोगों को बिल्कुल नहीं बदल सकता, उन्हें परमेश्वर को जानने तो बिलकुल नहीं दे सकता। परमेश्वर पर विश्वास करने में, यदि लोग अपने स्वभाव में परिवर्तन की चाहत रखते हैं, तो उन्हें अपने आपको वास्तविक जीवन से अलग नहीं करना चाहिए। नियमित परिवर्तन को प्राप्त करने से पहले तुम्हें वास्तविक जीवन में स्वयं को जानने की, स्वयं की इच्छाओं के खिलाफ विद्रोह करने की, सत्य का अभ्यास करने की, और साथ ही सब बातों में सिद्धांतों, व्यवहारिक ज्ञान और हर बात में अपने आचरण के नियमों को समझने की आवश्यकता है। यदि तुम केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर ही ध्यान देते हो और वास्तविकता की गहराई में प्रवेश किए बिना, वास्तविक जीवन में प्रवेश किए बिना केवल धार्मिक अनुष्ठान का जीवन जीते हो, तो तुम कभी भी वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाओगे, तुम कभी स्वयं को, सत्य को या परमेश्वर को नहीं जान पाओगे, और तुम सदैव अंधे और अज्ञानी ही बने रहोगे। लोगों को बचाने का परमेश्वर का कार्य उन्हें छोटी अवधि के बाद सामान्य मानवीय जीवन जीने देने के लिए नहीं है, न ही यह उनकी त्रुटिपूर्ण धारणाओं और सिद्धांतों को परिवर्तित करने के लिए है। बल्कि, परमेश्वर का उद्देश्य लोगों के पुराने स्वभावों को बदलना है, उनके जीवन के पुराने तरीकों की समग्रता को बदलना है, और उनकी सारी पिछड़ी सोच और उनके मानसिक नजरिए को बदलना है। केवल कलीसियाई जीवन पर ध्यान देने से मनुष्य के जीवन की पुरानी आदतें या लंबे समय तक वे जिस तरीके से जिए हैं, वे नहीं बदलेंगे। कुछ भी हो, लोगों को वास्तविक जीवन से अलग नहीं होना चाहिए। परमेश्वर चाहता है कि लोग वास्तविक जीवन में सामान्य मनुष्यत्व को जिएँ, न कि केवल कलीसियाई जीवन जिएँ; वे वास्तविक जीवन में सत्य को जिएँ, न कि केवल कलीसियाई जीवन में; वे वास्तविक जीवन में अपने कार्य को पूरा करें, न कि केवल कलीसियाई जीवन में। वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए इंसान को सबकुछ वास्तविक जीवन की ओर मोड़ देना चाहिए। यदि परमेश्वर में विश्वास रखने में, लोग वास्तविक जीवन में प्रवेश करके खुद को न जान पाएँ, और वे वास्तविक जीवन में सामान्य इंसानियत को न जी पाएँ, तो वे विफल हो जाएँगे। जो लोग परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते हैं, वे सब ऐसे लोग हैं जो वास्तविक जीवन में प्रवेश नहीं कर सकते। वे सब ऐसे लोग हैं जो मनुष्यत्व के बारे में बात करते हैं, परंतु दुष्टात्माओं की प्रकृति को जीते हैं। वे सब ऐसे लोग हैं जो सत्य के बारे में बात करते हैं परंतु सिद्धांतों को जीते हैं। जो लोग वास्तविक जीवन में सत्य के साथ नहीं जी सकते, वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं परंतु वे उसके द्वारा ठुकरा दिए जाते हैं। तुम्हें वास्तविक जीवन में प्रवेश करने का अभ्यास करना है, अपनी कमियों, विद्रोहशीलता, और मूर्खता को जानना है, और अपने असामान्य मनुष्यत्व और अपनी कमियों को जानना है। इस तरह से, तुम्हारा ज्ञान तुम्हारी वास्तविक स्थिति और कठिनाइयों के साथ एकीकृत हो जाएगा। केवल इस प्रकार का ज्ञान वास्तविक होता है और इससे ही तुम अपनी दशा को सचमुच समझ सकते हो और स्वभाव-संबंधी परिवर्तनों को प्राप्त कर सकते हो।
अब जबकि लोगों को पूर्ण बनाने की प्रक्रिया औपचारिक रूप से आरंभ हो चुकी है, इसलिए तुम्हें वास्तविक जीवन में प्रवेश करना चाहिए। इसलिए, परिवर्तन प्राप्त करने के लिए, तुम्हें वास्तविक जीवन में प्रवेश से शुरुआत करनी चाहिए, और थोड़ा-थोड़ा करके परिवर्तित होना चाहिए। यदि तुम सामान्य मानव जीवन को समाप्त कर देते हो और केवल आध्यात्मिक मामलों के बारे में बात करते हो, तो चीज़ें नीरस और उबाऊ हो जाती हैं; वे अवास्तविक हो जाती हैं, फिर लोग कैसे परिवर्तित हो सकते हैं? अब तुम्हें प्रशिक्षण लेने के लिए वास्तविक जीवन में प्रवेश करने के लिए कहा जाता है, और यह सब व्यावहारिक अनुभव में प्रवेश करने की एक नींव स्थापित करने के लिए है। यह उस चीज़ का एक पहलू जो लोगों को करना चाहिए। पवित्र आत्मा का कार्य मुख्य रूप से मार्ग दिखाना है, जबकि बाकी सब लोगों के प्रशिक्षण और प्रवेश पर निर्भर करता है। वास्तविक जीवन में प्रवेश प्राप्त करने के लिए हर किसी को प्रवेश के विभिन्न मार्गों का अनुसरण करना चाहिए और परमेश्वर को अपने वास्तविक जीवन में लाना चाहिए, और एक वास्तविक सामान्य मानवता को जीना चाहिए। केवल यही अर्थपूर्ण जीवन है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कलीसियाई जीवन और वास्तविक जीवन पर विचार-विमर्श
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 438
पहले यह कहा गया था कि पवित्र आत्मा की उपस्थिति का होना और पवित्र आत्मा का कार्य पाना भिन्न-भिन्न हैं। पवित्र आत्मा की उपस्थिति होने की सामान्य अवस्था सामान्य सोच, सामान्य विवेक और सामान्य मानवता होने में व्यक्त होती है। व्यक्ति का व्यक्तित्व वैसा ही रहेगा जैसा वह हुआ करता था, किंतु उसके भीतर शांति होगी, और बाहरी तौर पर उसमें संत की शिष्टता होगी। वह ऐसा ही होगा, जब पवित्र आत्मा उसके साथ होता है। जब किसी के पास पवित्र आत्मा की उपस्थिति होती है, तो उसकी सोच सामान्य होती है। जब वह भूखा होता है तो वह खाना चाहता है, जब वह प्यासा होता है तो वह पानी पीना चाहता है। ... सामान्य मानवता की ये अभिव्यक्तियाँ पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता नहीं हैं, यह लोगों की सामान्य सोच और पवित्र आत्मा की उपस्थिति होने की सामान्य अवस्था है। कुछ लोग गलती से यह मानते हैं कि जिनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति होती है, उन्हें भूख नहीं लगती, उन्हें उनींदापन महसूस नहीं होता, और वे परिवार के बारे में सोचते प्रतीत नहीं होते, उन्होंने अपने आप को देह से लगभग पूरी तरह से अलग कर लिया होता है। वास्तव में, जितना अधिक पवित्र आत्मा लोगों के साथ होता है, उतना अधिक वे सामान्य होते हैं। वे परमेश्वर के लिए कष्ट उठाना और चीज़ों का त्याग करना, स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाना और उसके प्रति समर्पित होना जानते हैं; इतना ही नहीं, वे भोजन और वस्त्र जैसी बुनियादी आवश्यकताओं का भी ध्यान रखते हैं। दूसरे शब्दों में, उन्होंने उस सामान्य मानवता में से कुछ नहीं खोया होता जो मनुष्य के पास होनी चाहिए और इसके बजाय, वे विशेष रूप से विवेकशील होते हैं। कभी-कभी वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं और परमेश्वर के कार्य पर विचार करते हैं; वे अपने दिलों में आस्था प्राप्त करते हैं और सत्य का अनुसरण करने के लिए तैयार हो जाते हैं। बेशक, पवित्र आत्मा का कार्य इसी बुनियाद पर आधारित है। यदि लोग सामान्य सोच से रहित हैं, तो उनके पास कोई विवेक नहीं है—यह एक सामान्य अवस्था नहीं है। जब लोगों की सोच सामान्य होती है और पवित्र आत्मा उनके साथ होता है, तो उनमें निश्चित रूप से एक सामान्य व्यक्ति का विवेक होता है, जो एक सामान्य अवस्था है। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में, पवित्र आत्मा का कार्य कभी-कभार होता है, जबकि पवित्र आत्मा की उपस्थिति लगभग सतत रहती है। जब तक लोगों का विवेक और सोच सामान्य रहते हैं, और जब तक उनकी स्थितियाँ सामान्य होती हैं, तब पवित्र आत्मा निश्चित रूप से उनके साथ होता है। जब लोगों का विवेक और सोच सामान्य नहीं होते, तो उनकी मानवता सामान्य नहीं होती। यदि इस पल पवित्र आत्मा का कार्य तुममें है, तो पवित्र आत्मा भी निश्चित रूप से तुम्हारे साथ है। किंतु यदि पवित्र आत्मा तुम्हारे साथ है, तो इसका यह अर्थ नहीं कि पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर निश्चित रूप से कार्य कर रहा है, क्योंकि पवित्र आत्मा विशेष समयों पर कार्य करता है। पवित्र आत्मा की उपस्थिति का होना केवल लोगों का सामान्य जीवन बनाए रख सकता है, किंतु पवित्र आत्मा केवल निश्चित समयों पर ही कार्य करता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम कोई अगुआ या कार्यकर्ता हो, तो जब तुम कलीसिया को सिंचन और आपूर्ति प्रदान करते हो, तब पवित्र आत्मा तुम्हें कुछ वचनों से प्रबुद्ध करेगा, जो दूसरों के लिए शिक्षाप्रद होंगे और जो तुम्हारे भाई-बहनों की कुछ वास्तविक समस्याएँ हल कर सकते हैं—ऐसे समय पर पवित्र आत्मा कार्य कर रहा है। कभी-कभी जब तुम परमेश्वर के वचनों को खा-पी रहे होते हो, तो पवित्र आत्मा तुम्हें कुछ वचनों से प्रबुद्ध कर देता है, जो तुम्हारे अनुभवों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक होते हैं, जो तुम्हें तुम्हारी स्थितियों का अधिक ज्ञान प्राप्त करने देते हैं; यह भी पवित्र आत्मा का कार्य है। कभी-कभी, जैसे मैं बोलता हूँ, तुम लोग सुनते हो, और मेरे वचनों से अपनी अवस्थाओं को मापने में सक्षम होते हो, और कभी-कभी तुम द्रवित या प्रेरित हो जाते हो; यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है। कुछ लोग कहते हैं कि पवित्र आत्मा हर समय उनमें कार्य कर रहा है। यह असंभव है। यदि वे कहते कि पवित्र आत्मा हमेशा उनके साथ है, तो यह यथार्थपरक होता। यदि वे कहते कि उनकी सोच और विवेक हर समय सामान्य रहते हैं, तो यह भी यथार्थपरक होता और दिखाता कि पवित्र आत्मा उनके साथ है। यदि वे कहते हैं कि पवित्र आत्मा हमेशा उनके भीतर कार्य कर रहा है, कि वे हर पल परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध और पवित्र आत्मा द्वारा द्रवित किए जाते हैं, और हर समय नया ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो यह किसी भी तरह से सामान्य नहीं है! यह पूर्णतः अलौकिक है! बिना किसी संदेह के, ऐसे लोग बुरी आत्माएँ हैं! यहाँ तक कि जब परमेश्वर का आत्मा देह में आता है, तब ऐसे समय होते हैं जब उसके लिए भी भोजन करना और आराम करना जरूरी होता है—मनुष्यों की तो बात ही छोड़ दो। जो लोग बुरी आत्माओं से ग्रस्त हो गए हैं, वे देह की कमजोरी से रहित प्रतीत होते हैं। वे सब-कुछ त्यागने और छोड़ने में सक्षम होते हैं, वे भावनाओं से मुक्त होते हैं, कठिनाई सहने में सक्षम होते हैं और जरा-सी भी थकान महसूस नहीं करते, मानो वे देहातीत हो चुके हों। क्या यह नितांत अलौकिक नहीं है? दुष्ट आत्माओं का कार्य अलौकिक होता है—कोई मनुष्य ऐसी चीजें नहीं कर सकता! जिन लोगों में विवेक की कमी होती है, वे जब ऐसे लोगों को देखते हैं, तो ईर्ष्या करते हैं : वे कहते हैं कि परमेश्वर पर उनका विश्वास बहुत मजबूत है, उनकी आस्था बहुत बड़ी है, और वे कमज़ोरी का मामूली-सा भी चिह्न प्रदर्शित नहीं करते! वास्तव में, ये सब दुष्ट आत्माओं के कार्य की अभिव्यक्तियाँ हैं। क्योंकि सामान्य लोगों में अनिवार्य रूप से मानवीय कमजोरियाँ होती हैं; यह उन लोगों की सामान्य अवस्था है, जिनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति होती है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (4)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 439
अपनी गवाही में अडिग रहने का क्या अर्थ है? कुछ लोग कहते हैं कि वे बस वैसे ही अनुसरण करते हैं, जैसे अब करते हैं और इस चिंता में नहीं पड़ते कि वे जीवन प्राप्त करने में सक्षम हैं या नहीं; वे जीवन की खोज नहीं करते किंतु वे पीछे भी नहीं हटते। वे केवल यह स्वीकार करते हैं कि कार्य का यह चरण परमेश्वर द्वारा किया जा रहा है। क्या यह गवाही देने में विफलता नहीं है? ऐसे लोग जीत लिए जाने की गवाही तक नहीं देते। जो लोग जीते जा चुके हैं, वे किसी भी कठिनाई की परवाह किए बिना अनुसरण करते हैं और जीवन की खोज करने में सक्षम होते हैं। वे न केवल व्यावहारिक परमेश्वर में विश्वास करते हैं, बल्कि परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना भी जानते हैं। ऐसे हैं वे लोग, जो गवाही देते हैं। जो लोग गवाही नहीं देते, उन्होंने कभी जीवन का अनुसरण नहीं किया है और वे अभी भी बिना किसी स्पष्ट उद्देश्य के पीछे चल रहे हैं। तुम अनुसरण कर सकते हो, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम जीते जा चुके हो, क्योंकि तुम्हें परमेश्वर के आज के कार्य की कोई समझ नहीं है। जीते जाने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी आवश्यक हैं। ऐसा नहीं है कि अनुसरण करने वालों में से सभी जीत लिए गए हैं, क्योंकि अपने हृदय में तुम इस बारे में कुछ भी नहीं समझते कि तुम्हें आज के परमेश्वर का अनुसरण क्यों करना चाहिए, न ही तुम यह जानते हो कि तुम आज की स्थिति तक कैसे पहुँचे हो, किसने आज तक तुम्हें सहारा दिया है। कुछ लोग परमेश्वर में अपने विश्वास में हमेशा स्पष्ट समझ से रहित और भ्रमित होते हैं; इस प्रकार, अनुसरण करने का आवश्यक रूप से यह अर्थ नहीं है कि तुम्हारे पास गवाही है। सच्ची गवाही वास्तव में क्या है? यहाँ कही गई गवाही के दो हिस्से हैं : एक तो जीत लिए जाने की गवाही, और दूसरी पूर्ण बना दिए जाने की गवाही (जो स्वाभाविक रूप से भविष्य के अधिक बड़े परीक्षणों और क्लेशों के बाद की गवाही होगी)। दूसरे शब्दों में, यदि तुम क्लेशों और परीक्षणों के दौरान अडिग रहने में सक्षम हो, तो तुमने दूसरे कदम की गवाही दे दी होगी। आज जो महत्वपूर्ण है, वह है गवाही का पहला भाग वहन करना : ताड़ना और न्याय के परीक्षणों की हर घटना के दौरान अडिग रहने में सक्षम होना। यह जीत लिए जाने की गवाही है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह जीत का समय है। (तुम्हें पता होना चाहिए कि अब पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य का समय है; पृथ्वी पर देहधारी परमेश्वर का मुख्य कार्य पृथ्वी पर अपना अनुसरण करने वाले लोगों के समूह को न्याय और ताड़ना के माध्यम से जीतना है।) तुम जीत लिए जाने की गवाही देने में सक्षम हो या नहीं, यह न केवल इस बात पर निर्भर करता है कि तुम बिल्कुल अंत तक अनुसरण कर सकते हो या नहीं, बल्कि, इससे भी महत्वपूर्ण रूप से यह इस बात पर निर्भर करता है कि जब तुम परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण का अनुभव करते हो, तो तुम परमेश्वर की ताड़ना और उसके न्याय की सच्ची समझ प्राप्त करने में सक्षम होते हो या नहीं, और इस बात पर कि तुम इस समस्त कार्य को वास्तव में समझते हो या नहीं। सिर्फ अंत तक अनुसरण करते रहने से तुम किसी तरह बचकर नहीं निकल जाओगे। तुम्हें ताड़ना और न्याय की हर घटना के दौरान स्वेच्छा से झुकने में सक्षम होना चाहिए, कार्य के हर उस चरण को, जिसका तुम अनुभव करते हो, वास्तव में समझने में सक्षम होना चाहिए, और परमेश्वर के स्वभाव का ज्ञान प्राप्त करने और इसके प्रति समर्पण करने में सक्षम होना चाहिए। यह जीत लिए जाने की परम गवाही है, जो तुम्हारे द्वारा दी जानी अपेक्षित है। जीत लिए जाने की गवाही मुख्य रूप से देहधारी परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ज्ञान को संदर्भित करती है। महत्त्वपूर्ण रूप से, गवाही का यह चरण देहधारी परमेश्वर के बारे में है। दुनिया के लोगों या सत्ताधारी व्यक्तियों के सामने तुम क्या करते या कहते हो, यह मायने नहीं रखता; सबसे बढ़कर यह मायने रखता है कि तुम परमेश्वर के मुँह से निकले सभी वचनों और उसके समस्त कार्यों के प्रति समर्पण करने में सक्षम हो या नहीं। इसलिए गवाही के इस चरण में निशाने पर शैतान सहित परमेश्वर के सभी दुश्मन हैं—वे राक्षस और दुश्मन जो यह विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर दूसरी बार देहधारण करेगा तथा और भी बड़े कार्य करने आएगा, और इसके अतिरिक्त, जो परमेश्वर के देह में लौटने के तथ्य में विश्वास नहीं करते। दूसरे शब्दों में कहें तो इसके निशाने पर सभी मसीह-विरोधी हैं—वे सभी शत्रु जो देहधारी परमेश्वर में विश्वास नहीं करते।
परमेश्वर के बारे में सोचना और परमेश्वर के लिए तड़पना यह साबित नहीं करता कि तुम परमेश्वर द्वारा जीते जा चुके हो; यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम यह मानते हो या नहीं कि वह देहधारी मार्ग है, तुम यह मानते हो या नहीं कि वचन देहधारी हुआ है, और तुम यह मानते हो या नहीं कि आत्मा वचन बन गया है और वचन देह में प्रकट हुआ है। यही प्रमुख गवाही है। यह मायने नहीं रखता कि तुम किस तरह से अनुसरण करते हो, न ही यह कि तुम अपने आप को कैसे खपाते हो; महत्वपूर्ण यह है कि तुम इस सामान्य मानवता से यह पता लगाने में सक्षम हो या नहीं कि वचन देहधारी हुआ है और सत्य का आत्मा देह में साकार हुआ है—कि समस्त सत्य, मार्ग और जीवन देह में आ गया है, परमेश्वर के आत्मा का वास्तव में पृथ्वी पर आगमन हो गया है और आत्मा देह में आ गया है। यद्यपि, सतही तौर पर, यह पवित्र आत्मा द्वारा गर्भधारण से भिन्न प्रतीत होता है, किंतु इस कार्य से तुम और अधिक स्पष्टता से देखने में सक्षम होते हो कि आत्मा पहले ही देह में साकार हो गया है, और इसके अतिरिक्त, मार्ग देहधारी हुआ है, और वचन देह में प्रकट हो गया है। तुम इन वचनों का वास्तविक अर्थ समझने में सक्षम हो : “आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।” इसके अलावा, तुम्हें यह समझना चाहिए कि आज का वचन परमेश्वर है, कि मार्ग परमेश्वर है, और कि यह तुम्हें देखने देता है कि वचन देहधारी हुआ है। यह सर्वोत्तम गवाही है, जो तुम दे सकते हो। यह साबित करता है कि तुम्हें परमेश्वर के देहधारण का सच्चा ज्ञान है—तुम न केवल उसे जानने में सक्षम हो, बल्कि यह भी जानते हो कि आज तुम जिस मार्ग पर चलते हो, वह जीवन का मार्ग है और सत्य का मार्ग है। कार्य का जो चरण यीशु ने संपन्न किया, उसने केवल “वचन परमेश्वर के साथ था” का सार ही पूरा किया : परमेश्वर का सत्य परमेश्वर के साथ था, और परमेश्वर का आत्मा देह के साथ था और उस देह से अभिन्न था। अर्थात, देहधारी परमेश्वर का देह परमेश्वर के आत्मा के साथ था, जो इस बात का अधिक बड़ा प्रमाण है कि देहधारी यीशु परमेश्वर का प्रथम देहधारण था। कार्य का यह चरण सटीक रूप से “वचन देहधारी हुआ है” के आंतरिक अर्थ को पूरा करता है, “वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था,” को और गहन अर्थ देता है और तुम्हें इन वचनों पर दृढ़ता से विश्वास कराता है कि “आरंभ में वचन था।” कहने का अर्थ है कि सृष्टि के निर्माण के समय परमेश्वर वचनों से संपन्न था, उसके वचन उसके साथ थे और उससे अभिन्न थे, और अंतिम युग में वह अपने वचनों का सामर्थ्य और अधिकार और भी अधिक प्रकट करता है, और मनुष्य को अपना सारा मार्ग देखने—अपने सभी वचन सुनने देता है। ऐसा है अंतिम युग का कार्य। तुम्हें इन चीजों को हर पहलू से जान लेना चाहिए। यह देह को जानने का प्रश्न नहीं है, बल्कि इस बात का है कि तुम देह और वचन को और देह और मार्ग को कैसे समझते हो। यही वह गवाही है, जो तुम्हें देनी चाहिए, जिसे हर किसी को जानना चाहिए। चूँकि यह दूसरे देहधारण का कार्य है—और यह आख़िरी बार है जब परमेश्वर देहधारी होता है; दूसरे शब्दों में, यह देहधारण के महत्व को पूरा कर देता है, देह में परमेश्वर के समस्त कार्य को पूरी तरह से कार्यान्वित और प्रकट करता है, और परमेश्वर के देह में होने के युग का अंत करता है। इसलिए तुम्हें देहधारण का महत्व अवश्य जानना चाहिए। यह मायने नहीं रखता कि तुम कितनी भाग-दौड़ करते हो, या तुम अन्य बाहरी मामलों को कितनी अच्छी तरह से पूरा करते हो; जो मायने रखता है, वह यह है कि तुम वास्तव में देहधारी परमेश्वर के सामने पूरी तरह से झुकने और अपना पूरा अस्तित्व उसे अर्पित करने, और उसके मुँह से निकलने वाले सभी वचनों के प्रति समर्पण करने में सक्षम हो या नहीं। यही तुम्हें करना चाहिए और इसी का तुम्हें पालन करना चाहिए।
गवाही का आखिरी कदम इस बात की गवाही है कि तुम पूर्ण बनाए जाने में सक्षम हो या नहीं—जिसका अर्थ है कि देहधारी परमेश्वर के मुँह से बोले गए सभी वचनों को समझने के बाद तुम्हें परमेश्वर का ज्ञान हो जाता है और तुम उसके बारे में निश्चित हो जाते हो, तुम परमेश्वर के मुँह से निकले सभी वचनों को जीते हो और वे मानदंड पूरे करते हो, जिनकी परमेश्वर तुमसे अपेक्षा करता है—पतरस की शैली और अय्यूब की आस्था—ऐसे कि तुम मृत्यु होने तक समर्पण कर सको, अपने आप को पूरी तरह से उसे सौंप दो, और अंततः ऐसे व्यक्ति की छवि प्राप्त करो जो मानक पर खरा उतरता हो, अर्थात् ऐसे व्यक्ति की छवि, जिसे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का अनुभव करने के बाद जीता और पूर्ण बनाया जा चुका हो। यही परम गवाही है—जो उस व्यक्ति द्वारा दी जानी ज़रूरी है, जिसे अंततः पूर्ण बना दिया गया है। ये गवाही के दो कदम हैं, जो तुम लोगों को उठाने चाहिए, और ये परस्पर संबंधित हैं, और दोनों में से प्रत्येक अपरिहार्य है। किंतु एक बात तुम्हें अवश्य जाननी चाहिए : आज जिस गवाही की मैं तुमसे अपेक्षा करता हूँ, वह न तो दुनिया के लोगों पर निर्देशित है, न ही किसी एक व्यक्ति पर, बल्कि उस पर है जो मैं तुमसे माँगता हूँ। यह इस बात से मापी जाती है कि तुम मुझे संतुष्ट करने में सक्षम हो या नहीं, और तुम मेरे द्वारा अपेक्षित वे मानक सर्वथा पूरे करने में समर्थ हो या नहीं, जो तुम लोगों में से प्रत्येक के लिए हैं। यही वह चीज़ है, जिसे तुम लोगों को समझना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (4)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 440
इसलिए जब तुम थोड़ा-सा संयम करते या कठिनाई सहते हो, तो ये तुम लोगों के लिए अच्छा है; यदि तुम्हारे लिए सब आसान होता, तो तुम बर्बाद हो जाते, फिर तुम्हारी रक्षा कैसे होती? आज तुम लोगों को इसलिए सुरक्षा दी जाती है क्योंकि तुम लोगों को ताड़ना और शाप दिया जाता है, तुम लोगों का न्याय किया जाता है। क्योंकि तुम लोगों ने काफी कष्ट उठाया है इसलिए तुम्हें संरक्षण दिया जाता है। नहीं तो, तुम लोग बहुत समय पहले ही दुराचार में गिर गए होते। यह जानबूझकर तुम लोगों के लिए चीजों को मुश्किल बनाना नहीं है—मनुष्य की प्रकृति को बदलना मुश्किल है, और उसके स्वभाव में बदलाव आना है तो ऐसा ही होना चाहिए। आज, तुम लोगों के पास वो अंतरात्मा या विवेक भी नहीं है जो पौलुस के पास थी, और न ही तुम लोगों के पास उसका आत्म-जागरूकता है। तुम लोगों की आत्माओं को जागृत करने के लिए तुम लोगों पर हमेशा नियंत्रण रखना पड़ता है, और तुम लोगों को हमेशा ताड़ना देनी पड़ती है और तुम्हारा न्याय करना पड़ता है। ताड़ना और न्याय ही तुम लोगों के जीवन के लिए सर्वोत्तम हैं। और जब आवश्यक हो, तो तुम पर आ पड़ने वाले तथ्यों द्वारा ताड़ना भी होनी ही चाहिए; केवल तभी तुम लोग पूरी तरह से झुक जाओगे। तुम लोगों की प्रकृतियाँ ऐसी हैं कि ताड़ना और शाप के बिना तुम लोग अपने सिर झुकाने को अनिच्छुक होगे, झुकने को अनिच्छुक होगे। तुम लोगों की आँखों के सामने तथ्यों के बिना, तुम पर कोई प्रभाव नहीं होगा। तुम लोग चरित्र से बहुत नीच और बेकार हो! ताड़ना और न्याय के बिना, तुम लोगों पर विजय प्राप्त करना कठिन होगा, और तुम लोगों की अधार्मिकता और अवज्ञा को जीतना मुश्किल होगा। तुम लोगों की पुरानी प्रकृतियाँ बहुत गहराई तक जड़ें जमाए हुए हैं। यदि तुम लोगों को सिंहासन पर बिठा दिया जाए, तो तुम्हें नहीं पता होगा कि ब्रह्मांड में तुम्हारी जगह कहाँ है, तुम लोग किस ओर जा रहे हो इसके बारे में तो बिल्कुल भी अंदाजा न होगा। यहाँ तक कि तुम लोगों को यह भी नहीं पता कि तुम सब कहाँ से आए हो, तो तुम लोग सृष्टिकर्ता को कैसे जान सकते हो? आज की समयोचित ताड़ना और शापों के बिना तुम्हारा अंतिम दिन बहुत पहले ही आ चुका होता। तुम लोगों के भाग्य की तो बात ही क्या—क्या यह खतरे के और भी निकट नहीं होता? इस समयोचित ताड़ना और न्याय के बिना, कौन जाने कि तुम लोग कितने घमंडी हो गए होते, और कौन जाने तुम लोग कितने पथभ्रष्ट हो जाते। इस ताड़ना और न्याय ने तुम लोगों को आज के दिन तक पहुँचाया है, और इन्होंने तुम लोगों के अस्तित्व को संरक्षित रखा है। जिन तरीकों से तुम लोगों के “पिता” ने तुम्हें “शिक्षित” किया था, यदि उन्हीं तरीकों से तुम लोगों को अब भी “शिक्षित” किया जाता, तो कौन जाने तुम लोग किस क्षेत्र में प्रवेश करते! तुम लोगों के पास स्वयं को नियंत्रित करने और आत्मचिंतन करने की बिल्कुल कोई योग्यता नहीं है। तुम जैसे लोग अगर बस अनुसरण करें, समर्पण करें, कोई गड़बड़ी या विघ्न पैदा न करें, तो मेरे उद्देश्य पूरे हो जाएँगे। क्या तुम लोगों को आज की ताड़ना और न्याय को स्वीकारने में बेहतर नहीं करना चाहिए? तुम लोगों के पास और क्या विकल्प हैं?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (6)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 441
जब तुम स्वयं को जीवन के लिए तैयार कर रहे हो, तो तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने पर ध्यान देना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के बारे में ज्ञान के विषय में, मानवीय जीवन के विषय में और विशेष रूप से अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के विषय में बातचीत करने के योग्य होना चाहिए। चूँकि तुम जीवन का अनुसरण करते हो, तो तुम्हें खुद को इन चीजों से लैस करना होगा। जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो, तब तुम्हें उन्हें अपनी वास्तविक दशा से जोड़ना चाहिए। यानी, तुम्हें अपने वास्तविक अनुभवों के माध्यम से अपनी कमियों को खोजना चाहिए और फिर तुम्हें अभ्यास का मार्ग ढूँढने, अपनी गलत मंशाओं और धारणाओं के खिलाफ विद्रोह करने में समर्थ होना चाहिए। यदि तुम हमेशा इस संबंध में प्रयास करते हो और इन चीजों में अपना दिल लगाते हो, तो तुम्हारे पास अनुसरण करने के लिए एक मार्ग होगा, तुम्हें खालीपन महसूस नहीं होगा, और इस तरह तुम एक सामान्य दशा बनाए रखने में सक्षम होगे। तभी तुम ऐसे इंसान बन पाओगे जो अपने जीवन के लिए बोझ उठाता है, जिसमें आस्था है। ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, उन्हें अभ्यास में नहीं ला पाते? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि वे सबसे अहम बातों को समझ नहीं पाते? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि वे जीवन के मामले में लापरवाह होते हैं? वे अहम बात को समझ नहीं पाते और उनके पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होता, उसका कारण यह है कि जब वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो वे उनसे अपनी दशाओं को जोड़ नहीं पाते, न ही वे अपनी दशाओं को समझ पाते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “जब मैं परमेश्वर के वचनों को पढ़ता हूँ, तो मैं उनका संबंध अपनी स्वयं की दशा से जोड़ पाता हूँ, और मैं जानता हूँ कि मैं भ्रष्ट हूँ और मेरी काबिलियत कम है, लेकिन मैं परमेश्वर के इरादों को पूरा करने में असमर्थ हूँ।” तुमने केवल सतह को ही देखा है; वास्तविकता की और भी बहुत-सी बातें हैं जिन्हें तुम नहीं जानते : देह-सुख का त्याग कैसे करें, आत्मतुष्टता को दूर कैसे करें, स्वयं को कैसे बदलें, इन चीजों में कैसे प्रवेश करें, अपनी काबिलियत कैसे बढ़ाएँ और किस पहलू से शुरू करें। तुम केवल सतही तौर पर कुछ चीजों को समझते हो, तुम बस इतना जानते हो कि तुम वाकई बहुत भ्रष्ट हो। जब तुम अपने भाई-बहनों से मिलते हो, तो तुम अपनी भ्रष्टता के बारे में बात करते हो और ऐसा लगता है कि तुम स्वयं को जानते हो और अपने जीवन के लिए एक बड़ा भार वहन करते हो। दरअसल, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव बदले नहीं हैं, जिससे साबित होता है कि तुम्हें अभ्यास का मार्ग मिला नहीं है। अगर तुम किसी कलीसिया की अगुआई करते हो, तो तुम्हें भाई-बहनों की दशाओं को समझने और उनके बारे में उन्हें बताने में समर्थ होना चाहिए। क्या सिर्फ इतना कहना पर्याप्त होगा : “तुम लोग विद्रोही और पिछड़े हुए हो!”? तुम्हें इस बात की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ बतानी होंगी कि वे ठीक किस तरह से विद्रोही और पिछड़े हुए हैं—दूसरे शब्दों में, तुम्हें उनकी विद्रोही दशाओं, उनके विद्रोही व्यवहारों और उनके शैतानी स्वभावों के बारे में बात करनी होगी—ताकि वे पूरी तरह से कायल हो जाएँ। इस मुद्दे को समझाने के लिए तुम्हारा तथ्य और उदाहरण प्रस्तुत करने में समर्थ होना जरूरी है और अभ्यास का मार्ग बताते हुए तुम्हें ठीक-ठीक यह कहना होगा कि वे इन विद्रोही व्यवहारों से कैसे छुटकारा पा सकते हैं—केवल तभी यह बात विश्वास दिलाने वाली होगी। जो इस तरह से काम करते हैं, वही दूसरों की अगुआई कर सकते हैं; उन्हीं में सत्य वास्तविकता होती है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (7)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 442
परमेश्वर की गवाही देना मूलतः परमेश्वर के कार्य के बारे में अपने ज्ञान की बात करने का मामला है, और यह भी कि परमेश्वर कैसे लोगों को जीतता है, कैसे उन्हें बचाता है और कैसे उन्हें बदलता है; यह बताना है कि वह सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए कैसे लोगों का मार्गदर्शन करता है, उन्हें परमेश्वर के द्वारा जीते जाने, पूर्ण बनाए जाने और बचाए जाने में सक्षम बनाता है। गवाही देने का अर्थ है उसके कार्य के बारे में बोलना, और उस सब के बारे में बोलना जिसका तुमने अनुभव किया है। केवल उसका कार्य ही उसका प्रतिनिधित्व कर सकता है, उसका कार्य ही उसे सार्वजनिक रूप से उसकी समग्रता में प्रकट कर सकता है; उसका कार्य उसकी गवाही देता है। उसका कार्य और उसके कथन सीधे तौर पर आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं; वह जो कार्य करता है, उसे आत्मा द्वारा किया जाता है, और वह जो वचन बोलता है, वे आत्मा द्वारा बोले जाते हैं। बस इतना है कि ये बातें परमेश्वर के देहधारी शरीर के जरिए व्यक्त की जाती हैं। असलियत में, वे आत्मा की अभिव्यक्ति हैं। उसके द्वारा किए जाने वाले सारे कार्य और बोले जाने वाले सारे वचन उसके सार का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर, देहधारण करके और इंसान के बीच आकर, परमेश्वर न बोलता या कार्य न करता, और वह तुमसे उसकी व्यावहारिकता, उसकी सामान्यता और उसकी सर्वशक्तिमत्ता जानने के लिए कहता, तो क्या तुम ऐसा कर पाते? क्या तुम जान पाते कि आत्मा का सार क्या है? क्या तुम उसके देह के गुण जान पाते? केवल इसलिए क्योंकि तुम लोगों ने उसके कार्य के हर चरण का अनुभव कर लिया है, वह तुम लोगों को उसकी गवाही देने के लिए कहता है। अगर तुम लोगों को ऐसा कोई अनुभव न होता, तो वह तुम लोगों को अपनी गवाही देने पर ज़ोर न देता। इस तरह, जब तुम परमेश्वर की गवाही देते हो, तो तुम न केवल सामान्य मानवता के उसके बाहरी आवरण की गवाही देते हो, बल्कि उसके कार्य की और उस मार्ग की भी गवाही देते हो जो वह दिखाता है; तुम्हें इस बात की गवाही देनी होती है कि तुम्हें उसने कैसे जीता है और तुम किन पहलुओं में पूर्ण बनाए गए हो। तुम्हें इस किस्म की गवाही देनी चाहिए। मान लो कि तुम कहीं भी जाकर चिल्लाते हो, “हमारा परमेश्वर कार्य करने आया है, और उसका कार्य सचमुच व्यावहारिक है! उसने हमें बिना अलौकिक कार्यों के, बिना चमत्कारों और करामातों के प्राप्त कर लिया है!” तो लोग पूछेंगे : “तुम्हारा यह कहने का क्या मतलब है कि वो चमत्कार और करामात नहीं दिखाता? बिना चमत्कार और करामात दिखाए उसने तुम्हें कैसे जीत लिया?” और तुम कहते हो : “वह बोलता है और उसने बिना चमत्कार और करामात दिखाए, हमें जीत लिया। उसके कामों ने हमें जीत लिया।” आखिरकार, तुम सार वाली कोई भी बात कहने में असमर्थ रहते हो और तुम कोई विशिष्ट बात नहीं बता सकते हो। क्या यह गवाही है? देहधारी परमेश्वर जब लोगों को जीतता है, तो यह उसका दिव्यता में बोलना है जो उन्हें जीतता है। उसकी मानवता इस कार्य को नहीं कर सकती; इसे कोई नश्वर इंसान नहीं कर सकता, सामान्य लोगों के बीच उच्चतम काबिलियत वाले लोग भी इस कार्य को नहीं कर सकते, क्योंकि उसकी दिव्यता किसी भी सृजित प्राणी से ऊँची है। यह लोगों के लिए असाधारण है; आखिरकार, सृष्टिकर्ता सृजित प्राणी से ऊँचा है; सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता से ऊँचा नहीं हो सकता; अगर तुम उससे ऊँचे होते, तो वो तुम्हें जीत नहीं पाता, वह तुम्हें इसलिए ही जीत पाता है क्योंकि वह तुमसे ऊँचा है। जो सारी मानवता को जीत सकता है वह सृष्टिकर्ता है, और अन्य कोई नहीं, केवल वही इस कार्य को कर सकता है। यह “गवाही” है—ऐसी गवाही जो तुम्हें देनी चाहिए। तुमने कदम-दर-कदम ताड़ना, न्याय, शुद्धिकरण, परीक्षणों, विफलताओं और क्लेशों का अनुभव किया है, और तुम्हें जीता गया है; तुमने देह की संभावनाओं का, निजी अभिप्रेरणाओं का, और देह के अंतरंग हितों का त्याग किया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के वचनों ने तुम्हारे दिल को पूरी तरह से जीत लिया है। भले ही उसकी अपेक्षाओं के अनुसार तुम्हारा आध्यात्मिक विकास नहीं हुआ है, तुम ये सारी बातें जानते हो और तुम उसके काम से पूरी तरह से आश्वस्त हो। यह गवाही है—व्यावहारिक गवाही! वह मनुष्य को जीतने के लिए न्याय और ताड़ना का कार्य करने आया है; लेकिन वह अपना कार्य समाप्त करने, युग का अंत करने, और समापन का कार्य करने भी आया है—वह पूरे युग को समाप्त करने, पूरी मानवजाति को बचाने, मानवजाति को पाप से पूरी तरह बचाने, और अपनी रची गई मानवजाति को पूरी तरह से प्राप्त करने के लिए आया है। तुम्हें इस सब की गवाही देनी चाहिए। तुमने परमेश्वर के इतने सारे कार्य का अनुभव किया है, तुमने इसे अपनी आँखों से देखा है और स्वयं इसका अनुभव किया है; अंततः तुम्हें सौंपे गए कार्य को पूरा करने में असमर्थ मत हो। यह कितना दुखद होगा! भविष्य में, जब सुसमाचार फैलेगा, तो तुम्हें अपने ज्ञान के बारे में बताने में सक्षम होना चाहिए, अपने दिल में तुमने जो कुछ पाया है, उसकी गवाही देने में सक्षम होना चाहिए और कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए। एक सृजित प्राणी को यह सब हासिल करना चाहिए। वास्तव में परमेश्वर के कार्य के इस चरण के मायने क्या हैं? इसका प्रभाव क्या है? और इसका कितना हिस्सा लोगों पर पूरा किया गया है? लोगों को क्या करना चाहिए? जब तुम लोग देहधारी परमेश्वर के धरती पर आने के बाद से उसके द्वारा किए सारे कार्य को पूरी तरह से समझा सकोगे, तब तुम्हारी गवाही पूरी होगी। जब तुम इन पाँच चीजों के बारे में पूरी तरह से समझा सकोगे : उसके कार्य के मायने; उसकी विषय-वस्तु; उसका सार; वह स्वभाव जिसका प्रतिनिधित्व उसका कार्य करता है; उसके सिद्धांत, तब यह साबित होगा कि तुम परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम हो और तुम्हारे अंदर सच्चा ज्ञान है। मेरी तुम लोगों से बहुत अधिक अपेक्षाएँ नहीं हैं, जो लोग सच्चे दिल से अनुसरण करते हैं, वे उन्हें प्राप्त कर सकते हैं। अगर तुममें परमेश्वर के गवाहों में से एक होने का संकल्प है, तो तुम्हें अवश्य समझना चाहिए कि परमेश्वर को किससे बेहद घृणा है और किससे प्रेम। तुमने उसके बहुत सारे कार्य का अनुभव किया है; उसके कार्य के जरिए तुम्हें उसके स्वभाव का ज्ञान होना चाहिए, उसके इरादों को और इंसान से उसकी अपेक्षाओं को समझना चाहिए, और इस ज्ञान का उपयोग उसकी गवाही देने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए करना चाहिए। तुम इतना ही कह सकते हो : “हम परमेश्वर को जानते हैं। उसका न्याय और ताड़ना बहुत कठोर हैं। उसके वचन बहुत सख्त हैं; वह धार्मिक और प्रतापी है, और कोई भी उसके खिलाफ कोई अपमान नहीं कर सकता,” लेकिन क्या ये वचन अंततः इंसान को पोषण देते हैं? लोगों पर इनका प्रभाव क्या होता है? क्या तुम वास्तव में जानते हो कि न्याय और ताड़ना का यह कार्य तुम्हारे लिए सर्वाधिक लाभकारी है? परमेश्वर के न्याय और ताड़ना तुम्हारी विद्रोहशीलता और भ्रष्टता को उजागर करते हैं, है ना? वे तुम्हारे भीतर की उन गंदी और भ्रष्ट चीजों को साफ कर सकते हैं और बाहर निकाल सकते हैं, है न? अगर ताड़ना और न्याय न होते, तो तुम्हारा क्या होता? क्या तुम वास्तव में इस तथ्य को समझते हो कि शैतान ने तुम्हें गंभीरतम बिन्दु तक भ्रष्ट कर दिया है? आज, तुम लोगों को इन चीजों से लैस होना चाहिए और इन चीजों को अच्छी तरह जानना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (7)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 443
क्या तुम लोग जानते हो कि तुम्हें तत्काल किन चीजों से लैस होने की जरूरत है? इसके एक पहलू में कार्य के बारे में दर्शन शामिल है, और दूसरा पहलू है तुम्हारा अभ्यास। तुम्हें इन दोनों पहलुओं को समझना होगा। यदि तुममें जीवन प्रगति के अपने अनुसरण में दर्शन नहीं हैं, तो तुम्हारी कोई नींव नहीं होगी। यदि तुम्हारे पास केवल अभ्यास के मार्ग हैं और दर्शन बिल्कुल भी नहीं है, और पूरी प्रबंधन योजना के कार्य की कोई भी समझ नहीं है, तो तुम बेकार हो। तुम्हें उन सत्यों को समझना होगा जिनका संबंध दर्शनों से होता है और जहाँ तक अभ्यास से संबंधित सत्यों का प्रश्न है तो इन्हें समझ चुकने के बाद तुम्हें अभ्यास के उचित मार्ग पता लगाने की जरूरत है; तुम्हें वचनों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, और अपनी स्थितियों के अनुसार प्रवेश करना चाहिए। दर्शन नींव हैं, और यदि तुम इस तथ्य पर ध्यान नहीं देते, तो तुम अंत तक अनुसरण नहीं कर सकोगे। इस तरह अनुभव करना या तो विचलनों की ओर ले जाएगा या तुम्हें नीचे गिराकर विफल कर देगा। तुम्हारे लिए सफल होने का कोई रास्ता नहीं होगा! जिन लोगों की नींव में महान दर्शन नहीं हैं, वे विफल ही होते हैं; वे सफल नहीं हो सकते हैं। वे अडिग नहीं रह सकते हैं! क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ क्या है? क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर के अनुसरण में क्या शामिल होता है? दर्शनों के बिना, तुम किस मार्ग पर चलोगे? आज के कार्य में, यदि तुम्हारे पास कोई दर्शन नहीं है तो तुम किसी भी हाल में पूर्ण किए जाने में समर्थ नहीं होगे। तुम किस पर विश्वास करते हो? तुम उसमें आस्था क्यों रखते हो? तुम उसके पीछे क्यों चलते हो? क्या तुम्हें अपना विश्वास कोई खेल लगता है? क्या तुम अपने जीवन के साथ किसी खिलौने की तरह पेश आ रहे हो? आज का परमेश्वर सबसे महान दर्शन है। उसके बारे में तुम्हें कितना पता है? तुमने उसे कितना देखा है? आज के परमेश्वर को देखने के बाद क्या परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास की नींव मजबूत है? क्या तुम्हें लगता है कि अगर तुम इस भ्रामक ढंग से अनुसरण करोगे तो तुम उद्धार प्राप्त कर लोगे? क्या तुम्हें लगता है कि तुम भ्रामक स्थिति का फायदा उठा लोगे? क्या यह इतना सरल है? आज के परमेश्वर ने जो वचन कहे हैं उनसे संबंधित कितनी धारणाएँ तुम दरकिनार कर चुके हो? क्या तुम्हारे पास आज के परमेश्वर के दर्शन हैं? आज के परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ कहाँ निहित है? तुम हमेशा मानते हो कि उसका अनुसरण कर तुम इसे प्राप्त कर सकते हो या सिर्फ उसे देखकर इसे प्राप्त कर सकते हो और कोई भी तुम्हें हटा नहीं सकेगा। ऐसा मत सोचो कि परमेश्वर का अनुसरण करना इतनी आसान बात है। मुख्य बात यह है कि तुम्हें अवश्य ही उसे जानना चाहिए, तुम्हें उसका कार्य अवश्य जानना चाहिए और तुम में उसके वास्ते कठिनाई सहने, उसके लिए अपने जीवन का त्याग करने और उसके द्वारा पूर्ण किए जाने का संकल्प अवश्य होना चाहिए। यही वह दर्शन है जो तुम्हारे पास होना चाहिए। अगर तुम्हारे विचार हमेशा अनुग्रह का आनंद लेने पर तुले रहते हैं तो यह नहीं चलेगा। यह मानकर न चलो कि परमेश्वर यहाँ केवल लोगों के आनंद और केवल उन पर अनुग्रह बरसाने के लिए है। अगर तुम ऐसा सोचते हो तो तुम गलत होगे! अगर कोई उसका अनुसरण करने के लिए अपने जीवन को जोखिम में नहीं डाल सकता और यदि कोई अनुसरण के लिए अपनी प्रत्येक बाहरी चीज को त्याग नहीं सकता है, तो वह अंत तक कदापि अनुसरण नहीं कर पाएगा! तुम्हारे पास अवश्य ही दर्शन होने चाहिए और वे तुम्हारी नींव होने चाहिए। अगर किसी दिन तुम पर आपदा आ पड़े, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? क्या तुम तब भी उसका अनुसरण कर पाओगे? तुम अंत तक अनुसरण कर पाओगे या नहीं, इस बात को हल्के में न कहो। बेहतर होगा कि तुम पहले अपनी आँखों को अच्छे से खोलो और देखो कि अभी समय क्या है। भले ही तुम लोग वर्तमान में मंदिर के खंभों की तरह हो, परंतु एक समय आएगा जब ऐसे खंभे कीड़ों द्वारा कुतर दिये जाएंगे जिससे मंदिर ढह जाएगा, क्योंकि वर्तमान में तुम लोगों के पास बहुत-से दर्शनों का अभाव है। तुम लोग केवल अपने छोटे-से संसार पर ध्यान देते हो, तुम लोगों को नहीं पता कि अनुसरण करने का सबसे विश्वसनीय, सबसे उपयुक्त तरीका क्या है। तुम लोग आज के कार्य के दर्शन पर ध्यान नहीं देते, न ही तुम लोग इन बातों को अपने दिल में रखते हो। क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि एक दिन तुम लोगों का परमेश्वर तुम्हें एक बहुत ही अपरिचित जगह में रखेगा? क्या तुम लोग सोच सकते हो जब मैं तुम लोगों से सब कुछ छीन लूँगा, तो तुम लोगों का क्या होगा? क्या उस दिन तुम लोगों की ऊर्जस्विता वैसी ही होगी जैसी आज है? क्या तुम लोगों की आस्था फिर से प्रकट होगी? परमेश्वर के अनुसरण में तुम्हें इस सबसे महान दर्शन को जानना चाहिए जो “परमेश्वर” है : यह सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसके अलावा, यह न मान बैठो कि सांसारिक लोगों से अलगकर पवित्र ठहराए जाने से तुम लोग अनिवार्य रूप से परमेश्वर के परिवार में शामिल हो जाते हो। इन दिनों परमेश्वर स्वयं सृजित प्राणियों के बीच कार्य कर रहा है; वही लोगों के बीच अपना कार्य करने के लिए आया है—वह अभियान चलाने नहीं आया। तुम लोगों के बीच में, मुट्ठीभर भी ऐसे नहीं हैं जो जानते हों कि आज का कार्य स्वर्ग के परमेश्वर का कार्य है, जिसने देहधारण किया है। यह तुम लोगों को प्रतिभा से भरपूर उत्कृष्ट व्यक्ति बनाने के लिए नहीं है; यह मानवीय जीवन के मायने को जानने में, मनुष्यों की मंज़िल जानने के लिए, और परमेश्वर और उसकी समग्रता को जानने में तुम लोगों की मदद के लिए है। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम सृष्टिकर्ता के हाथ में एक सृजित प्राणी हो। तुम्हें क्या समझना चाहिए, तुम्हें क्या करना चाहिए और तुम्हें परमेश्वर का अनुसरण कैसे करना चाहिए—क्या ये वे सत्य नहीं हैं जिन्हें तुम्हें समझना चाहिए? क्या ये वे दर्शन नहीं हैं जिन्हें तुम्हें देखना चाहिए?
एक बार जब लोगों को दर्शन हो जाते हैं, तो उन्हें एक आधार मिल जाता है। जब तुम इस आधार पर अभ्यास करोगे, तो प्रवेश करना काफी अधिक आसान होगा। इस तरह, एक बार जब तुम्हारे पास प्रवेश करने का आधार होगा तो तुम्हें कोई आशंका नहीं रहेगी और तुम्हारे लिए प्रवेश करना बहुत आसान होगा। दर्शनों को समझना और परमेश्वर के कार्य को जानना बहुत अहम है; तुम लोगों को इससे लैस होना ही चाहिए। यदि तुम सत्य के इस पहलू से सुसज्जित नहीं हो और तुम केवल अभ्यास के मार्गों के बारे में ही बात करना जानते हो, तो तुम्हारे अंदर बहुत कमी होगी। मुझे पता चला है कि तुम लोगों में से बहुत-से लोग इस पहलू पर ध्यान नहीं देते हो, और जब तुम सत्य के इस पहलू को सुनते हो तो ऐसा लगता है कि तुम केवल शब्द और धर्म-सिद्धांत सुन रहे हो। एक दिन तुम नुकसान उठाओगे। इन दिनों कुछ ऐसे वचन हैं जिन्हें तुम ठीक से समझते नहीं हो या स्वीकार नहीं कर सकते हो; ऐसे मामलों में तुम्हें धैर्यपूर्वक खोज करनी चाहिए, और वह दिन आएगा जब तुम समझ जाओगे। थोड़ा-थोड़ा करके तुम अधिक से अधिक दर्शन-लाभ करो। अगर तुम केवल कुछ आध्यात्मिक सिद्धांतों को ही समझ लो, तो भी यह दर्शनों की ओर ध्यान न देने से बेहतर होगा, और यह किसी भी सिद्धांत को न समझने से बेहतर होगा। यह सब तुम्हारे प्रवेश के लिए सहायक है और तुम्हारे उन संदेहों को दूर कर देगा। यह तुम्हारे धारणाओं से भरा होने से बेहतर है। नींव के रूप में इन दर्शनों को रखने से तुम कहीं बेहतर स्थिति में होगे। तुम्हें किसी प्रकार की कोई आशंका नहीं होगी और तुम हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ प्रवेश कर पाओगे। हमेशा इतने भ्रमित और संदेहयुक्त होकर अनुसरण करने का क्या लाभ? क्या यह रेत में मुँह छिपाने जैसा नहीं है? विश्वास के साथ और सिर उठाकर राज्य में प्रवेश करना कितना अच्छा होगा! इतनी आशंकाओं से ओतप्रोत होने से क्या लाभ? क्या तुम खुद को बस नितांत नरक में नहीं डाल रहे हो? एक बार जब तुम्हें यहोवा के कार्य, यीशु के कार्य और कार्य के इस चरण की समझ प्राप्त हो जायेगी, तो तुम्हारे पास एक आधार होगा। इस पल हो सकता है तुम यह सोचो कि चीजें काफी सरल हैं। कुछ लोग कहते हैं, “जब समय आएगा और पवित्र आत्मा महान कार्य शुरू करेगा, तो मैं इन सभी चीज़ों पर बात कर पाऊँगा। अभी मैं इसलिए समझ नहीं पा रहा हूँ क्योंकि पवित्र आत्मा ने अभी तक मुझे उतना अधिक प्रबुद्ध नहीं किया है।” यह इतना आसान नहीं है; ऐसा कुछ नहीं है कि अगर तुम अभी सत्य[क] स्वीकार करने के लिए तैयार हो, तो समय आने पर तुम इसका कुशलतापूर्वक उपयोग करोगे। ऐसा होगा आवश्यक नहीं है! तुम मानते हो कि तुम वर्तमान में बहुत अच्छी तरह से लैस हो, और तुम्हें उन धार्मिक लोगों और महानतम सिद्धांतकारों को जवाब देने में कोई समस्या नहीं होगी, यहाँ तक कि उनका खंडन करने में भी कोई समस्या नहीं होगी। क्या तुम वास्तव में ऐसा कर पाओगे? अपने इस सतही अनुभव के साथ तुम किस समझ की बात कर सकते हो? सत्य से सुसज्जित होना, सत्य की लड़ाई लड़ना और परमेश्वर के नाम की गवाही देना वे चीजें नहीं हैं जो तुम सोचते हो—कि जब तक परमेश्वर कार्य कर रहा है, सब कुछ पूरा हो जाएगा। उस समय तक, शायद तुम कुछ प्रश्नों से स्तब्ध हो जाओ, और फिर तुम अवाक रह जाओगे। मुख्य बात यह है कि कार्य के इस चरण के बारे में तुम्हारे पास स्पष्ट समझ है या नहीं, और तुम वास्तव में इस बारे में कितना समझते हो। यदि तुम शत्रु शक्तियों पर विजय नहीं पा सकते, या तुम धार्मिक शक्तियों को पराजित नहीं कर सकते, तो फिर क्या तुम बेकार की वस्तु नहीं होगे? तुमने आज के कार्य का अनुभव किया है, इसे अपनी आंखों से देखा है और इसे अपने कानों से सुना है, लेकिन अगर अंत में तुम गवाही न दे पाओ, तो क्या फिर भी तुम्हारी इतनी जुर्रत होगी कि तुम जीवित बने रह सको? तुम किसका सामना करने के लायक होओगे? अभी ऐसा न सोचो कि यह इतना सरल होगा। भविष्य का कार्य उतना सरल नहीं होगा जितनी तुम कल्पना करते हो; सत्य की लड़ाई लड़ना इतना आसान नहीं है, इतना सीधा नहीं है। इस वक्त, तुम्हें सुसज्जित होने की जरूरत है; यदि तुम सत्य से सुसज्जित नहीं हो तो जब समय आएगा और पवित्र आत्मा अलौकिक तरीके से कार्य नहीं कर रहा होगा, तो तुम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाओगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम लोगों को कार्य को समझना चाहिए—भ्रम में अनुसरण मत करो!
फुटनोट :
क. मूल पाठ में “सत्य” शब्द शामिल नहीं है।