जीवन में प्रवेश III
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 444
आत्मा के विवरण को कैसे समझा जा सकता है? पवित्र आत्मा मनुष्य में कैसे कार्य करता है? शैतान मनुष्य में कैसे कार्य करता है? दुष्ट आत्माएं मनुष्य में कैसे कार्य करती हैं? इसके प्रकटीकरण क्या हैं? जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, क्या यह पवित्र आत्मा की ओर से आता है और तुम्हें उसके प्रति समर्पण करना चाहिए या उसके खिलाफ विद्रोह करना चाहिए? लोगों के वास्तविक अभ्यास में मनुष्य की इच्छा से बहुत कुछ उत्पन्न होता है फिर भी लोगों को हमेशा लगता है कि यह पवित्र आत्मा की ओर से आता है। कुछ चीज़ें दुष्ट आत्माओं की ओर से आती हैं, फिर भी लोग हमेशा सोचते हैं कि ये पवित्र आत्मा से आई हैं और कभी-कभी पवित्र आत्मा भीतर से लोगों का मार्गदर्शन करता है, फिर भी लोग डर जाते हैं कि ऐसा मार्गदर्शन शैतान की ओर से आता है और इसलिए समर्पण करने का साहस नहीं करते, जबकि वास्तविकता में वह मार्गदर्शन पवित्र आत्मा का प्रबोधन होता है। इसलिए, अगर कोई भेद पहचानने की क्षमता का उपयोग नहीं करता है, तो वह उन वास्तविक चीज़ों का अनुभव नहीं पा सकेगा जिनसे वह गुज़रता है; अगर कोई अपने अनुभवों में भेद पहचानने की क्षमता का उपयोग नहीं करता है, तो वह जीवन नहीं पा सकेगा। पवित्र आत्मा कैसे कार्य करता है? दुष्ट आत्माएं कैसे कार्य करती हैं? मनुष्य की इच्छा से क्या आता है? और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और उसके प्रबोधन से क्या पैदा होता है? यदि तुम मनुष्य के भीतर पवित्र आत्मा के कार्य के स्वरूपों को समझ लेते हो, तब तुम अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन और अपने वास्तविक अनुभवों में अपना ज्ञान बढ़ा पाओगे और भेद पहचानने की क्षमता हासिल कर पाओगे; तुम परमेश्वर को जान पाओगे, तुम शैतान को समझने और उसका भेद पहचानने में समर्थ होगे; तुम अपने समर्पण या अनुसरण को लेकर उलझन में नहीं रहोगे, और तुम ऐसे व्यक्ति बनोगे जिसके विचार स्पष्ट हैं और जो पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति समर्पण करता है।
पवित्र आत्मा का कार्य सकारात्मक पक्ष पर मार्गदर्शन और प्रबोधन प्रदान करना है। यह लोगों को नकारात्मक नहीं बनाएगा। यह उनको सांत्वना देता है, उन्हें विश्वास और संकल्प देता है और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करने योग्य बनाता है। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तो लोग सकारात्मक तरीके से प्रवेश कर पाते हैं; वो निष्क्रिय या बाध्य नहीं होते, बल्कि अपनी पहल पर काम करते हैं। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तो लोग प्रसन्न और सहर्ष प्रस्तुत होते हैं, समर्पण करने को तैयार होते हैं और स्वयं को विनम्र रखने में प्रसन्न होते हैं। यद्यपि वे भीतर से दुखी और कमजोर होते हैं, उनमें सहयोग करने का संकल्प होता है; वे ख़ुशी-ख़ुशी दुःख सह लेते हैं, वे समर्पण करने में सक्षम होते हैं और मानवीय इच्छा से दूषित नहीं होते हैं, मनुष्य की सोच से दूषित नहीं होते हैं और इससे भी बढ़कर वे मनुष्य की अपेक्षाओं और प्रेरणाओं से दूषित नहीं होते हैं। जब लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं, तो भीतर से वे विशेष रूप से शुद्ध हो जाते हैं। जिनमें पवित्र आत्मा का कार्य है, वे परमेश्वर के प्रति प्रेम और अपने भाई-बहनों के प्रति प्रेम को जीते हैं; वे ऐसी चीज़ों को पसंद करते हैं, जो परमेश्वर को आनंदित करती हैं और उन चीज़ों से बेहद घृणा करते हैं, जिनसे परमेश्वर बेहद घृणा करता है। जो पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा स्पर्श किए जाते हैं, वे ऐसे लोग हैं जिनमें सामान्य मानवता होती है, वे सामान्यतः सत्य का अनुसरण करते हैं और उनमें मानवता होती है। जब पवित्र आत्मा लोगों के भीतर कार्य करता है, तो उनकी स्थिति बेहतर से बेहतर होती जाती है और उनकी मानवता अधिक से अधिक सामान्य होती जाती है और यद्यपि उनका कुछ सहयोग मूर्खतापूर्ण हो सकता है, परंतु फिर भी उनकी प्रेरणाएँ सही होती हैं, उनका प्रवेश सकारात्मक होता है, वे गड़बड़ियाँ करने का प्रयास नहीं करते और वे बुरे इरादे नहीं पालते। पवित्र आत्मा का कार्य सामान्य और व्यावहारिक होता है, पवित्र आत्मा मनुष्य के भीतर सामान्य लोगों की जीवन पद्धतियों के अनुसार कार्य करता है और वह सामान्य लोगों के वास्तविक अनुसरण के अनुसार लोगों में प्रबोधन और मार्गदर्शन को कार्यान्वित करता है। जब पवित्र आत्मा लोगों में कार्य करता है, तो वह सामान्य लोगों की आवश्यकता के अनुसार उनका मार्गदर्शन करता और उन्हें प्रबुद्ध करता है। वह उनकी आवश्यकताओं के अनुसार उनकी ज़रूरतें पूरी करता है और वह सकारात्मक रूप से उनकी कमियों और अभावों के आधार पर उनका मार्गदर्शन करता है और उन्हें प्रबुद्ध करता है। पवित्र आत्मा का कार्य वास्तविक जीवन में लोगों को प्रबुद्ध करने और उनका मार्गदर्शन करने का है; अगर वे अपने वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों का अनुभव करते हैं, तभी वे पवित्र आत्मा का कार्य देख सकते हैं। यदि अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में लोग सकारात्मक अवस्था में हों और उनका आध्यात्मिक जीवन सामान्य हो, तो उनमें पवित्र आत्मा का कार्य होता है। ऐसी मनोदशा में जब वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, तो उनमें आस्था होती है; जब वे प्रार्थना करते हैं, तो वे प्रेरित होते हैं और जब वे किसी कठिनाई या परिस्थिति का सामना करते हैं, तो वे नकारात्मक नहीं होते—उसके भीतर वे उन सबकों को देख पाने में समर्थ होते हैं, जो परमेश्वर चाहता है कि वे सीखें, वे नकारात्मक या कमज़ोर नहीं होते और यद्यपि उनके जीवन में वास्तविक कठिनाइयाँ होती हैं, वे परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने के लिए तैयार रहते हैं।
पवित्र आत्मा के कार्य से क्या प्रभाव प्राप्त होते हैं? तुम मूर्ख हो सकते हो या तुम भेद पहचानने की क्षमता से रहित हो सकते हो, परंतु पवित्र आत्मा को बस तुम्हारे भीतर कार्य करना है और तुम्हारे भीतर आस्था उत्पन्न हो जाएगी, तुम हमेशा महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर से पर्याप्त प्रेम नहीं कर सकते और तुम सहयोग करने के लिए तैयार होगे। आगे चाहे कितनी भी बड़ी कठिनाइयाँ आएँ, तुम फिर भी सहयोग करने के लिए इच्छुक होगे। जब तुम्हारे साथ चीजें घटित होंगी, तो तुम्हें यह स्पष्ट नहीं होगा कि वे परमेश्वर की ओर से आई हैं या शैतान की ओर से, परंतु तुम प्रतीक्षा कर पाओगे; तुम न तो नकारात्मक होगे और न ही बेपरवाह। यह पवित्र आत्मा का सामान्य कार्य है। जब पवित्र आत्मा तुम्हारे अंदर कार्य करेगा, तब भी तुम वास्तविक कठिनाइयों का सामना करोगे : कभी-कभी तुम्हारे आँसू निकल आएंगे और कभी-कभी ऐसी बातें होंगी, जिन पर तुम काबू नहीं पा सकते—यह सब पवित्र आत्मा के साधारण कार्य का एक चरण मात्र है। भले ही तुम उन चीजों पर काबू पाने में विफल रहोगे और भले ही उस समय तुम कमज़ोर होगे और शिकायत करोगे, फिर भी बाद में तुम आस्था से लबरेज होकर परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम होगे। तुम्हारी नकारात्मकता तुम्हें सामान्य अनुभव प्राप्त करने से नहीं रोक पाएगी और इसकी परवाह किए बिना कि लोग क्या कहते हैं और कैसे हमला करते हैं, तुम फिर भी परमेश्वर से प्रेम कर पाओगे। प्रार्थना के दौरान तुम हमेशा महसूस करोगे कि अतीत में तुम परमेश्वर के बहुत ऋणी थे और जब भी तुम इस तरह की चीज़ों का फिर से सामना करोगे, तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने और देह के खिलाफ विद्रोह करने का संकल्प लोगे। यह प्रेरणा दिखाती है कि तुम्हारे भीतर पवित्र आत्मा का कार्य है। यह पवित्र आत्मा के कार्य की सामान्य अवस्था है।
शैतान की ओर से कौन-सा कार्य आता है? शैतान से आने वाले काम में लोगों के भीतर के दर्शन अस्पष्ट होते हैं; लोगों में सामान्य मानवता नहीं होती, उनके कार्यों के पीछे की प्रेरणाएँ गलत होती हैं और यद्यपि वे परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, फिर भी उनके भीतर सदैव दोषारोपण बने रहते हैं, और ये दोषारोपण तथा विचार उनके मन में निरंतर अशांति उत्पन्न करते हैं, उनके जीवन के विकास को बाधित कर देते हैं और उन्हें परमेश्वर के समक्ष सामान्य स्थिति में रहने से रोकते हैं। कहने का अर्थ है कि जैसे ही लोगों में शैतान का कार्य आरंभ होता है, तो उनके हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रह सकते। वे नहीं जानते कि वे स्वयं के साथ क्या करें—जब वे लोगों को इकट्ठा होते देखते हैं, वे भाग जाना चाहते हैं और जब दूसरे प्रार्थना करते हैं तो वे अपनी आँखें बंद नहीं रख पाते। दुष्ट आत्माओं का कार्य मनुष्य और परमेश्वर के बीच का सामान्य संबंध बर्बाद कर देता है और लोगों के पिछले दर्शनों या उनके जीवन प्रवेश के पिछले मार्ग को उलट देता है; अपने हृदयों में वे कभी परमेश्वर के क़रीब नहीं आ सकते, वे लगातार किसी चीज से बाधित और नियंत्रित होते हैं और उनके हृदय शांति प्राप्त नहीं कर पाते। उनमें परमेश्वर से प्रेम करने की शक्ति नहीं बचती और उनकी आत्माएँ पतन की ओर जाने लगती हैं। शैतान के कार्य की अभिव्यक्तियाँ ऐसी ही हैं। शैतान के कार्य की अभिव्यक्तियाँ हैं : अपने स्थान पर डटे रह पाने और अपनी गवाही में अडिग रहने में असमर्थ होना, यह तुम्हें परमेश्वर के समक्ष एक गलत व्यक्ति बनाता है और ऐसा व्यक्ति बनाता है जो परमेश्वर के प्रति कोई निष्ठा नहीं रखता। जब शैतान तुम्हारे लिए व्यवधान डालता है, तुम अपने भीतर परमेश्वर के प्रति प्रेम और वफादारी खो देते हो, तुम्हारा परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध खत्म हो जाता है, तुम सत्य या स्वयं के सुधार का अनुसरण नहीं करते, तुम पीछे हटने लगते हो और नकारात्मक बन जाते हो, तुम देह की इच्छाओं के आगे झुक जाते हो, तुम पाप के फैलाव को खुली छूट दे देते हो और पाप से घृणा नहीं करते। इसके अलावा, यह तुम्हें स्वच्छंद बना देता है, इसकी वजह से तुम्हारे भीतर से परमेश्वर का स्पर्श हट जाता है और तुम्हें परमेश्वर के बारे में शिकायत करने और उसका विरोध करने को प्रेरित करता है, जिससे तुम परमेश्वर पर सवाल उठाते हो; यहाँ तक कि तुम्हारे छोड़कर चले जाने का खतरा भी होता है। यह सब शैतान की ओर से आता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 445
जब तुम्हारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, तुम्हें यह भेद कैसे पहचानना चाहिए कि यह पवित्र आत्मा के कार्य से आता है या शैतान के कार्य से? जब लोगों की स्थितियाँ सामान्य होती हैं, उनके आध्यात्मिक जीवन और दैहिक जीवन भी सामान्य होते हैं, उनका विवेक सामान्य और व्यवस्थित होता है। जब वो इस दशा में होते हैं, जो वे अपने भीतर अनुभव करते या जान पाते हैं, उसके विषय में कहा जा सकता है कि वह पवित्र आत्मा के स्पर्श से आया है (जब वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, तो अंतर्दृष्टि रखना या कुछ सतही ज्ञान प्राप्त करना या कुछ मामलों में निष्ठावान होना या कुछ चीजों में परमेश्वर से प्रेम करने की सामर्थ्य रखना—यह सब पवित्र आत्मा से आता है)। मनुष्य में पवित्र आत्मा का कार्य विशेष रूप से सामान्य है; मनुष्य इसको महसूस करने में असमर्थ है और यह स्वयं मनुष्य द्वारा ही आता प्रतीत होता है—परंतु वास्तव में यह पवित्र आत्मा का कार्य होता है। दिन-प्रतिदिन के जीवन में पवित्र आत्मा प्रत्येक व्यक्ति में कार्य करता है, जो बड़ा या छोटा हो सकता है और केवल इस कार्य की मात्रा में भिन्नता होती है। कुछ लोगों की काबिलियत अच्छी होती है और वे चीजों को जल्दी समझ लेते हैं और उनके भीतर पवित्र आत्मा विशेष प्रबोधन प्रदान करता है। इस बीच, कुछ लोगों की काबिलियत कम होती है और उन्हें चीजों को समझने में अधिक समय लगता है, परंतु पवित्र आत्मा उन्हें भीतर से स्पर्श करता है और वे भी परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होने में सक्षम होते हैं—पवित्र आत्मा उन सबमें कार्य करता है जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। जब दिन-प्रतिदिन के जीवन में लोग परमेश्वर का विरोध नहीं करते या परमेश्वर के ख़िलाफ विद्रोह नहीं करते, ऐसे कार्य नहीं करते, जो परमेश्वर के प्रबंधन में गड़बड़ी करें और परमेश्वर के कार्य में विघ्न नहीं डालते, तो उनमें से प्रत्येक में परमेश्वर का आत्मा अधिक या कम मात्रा तक काम करता है; वह उन्हें स्पर्श करता है, प्रबुद्ध करता है, उन्हें आस्था प्रदान करता है, शक्ति देता है और सकारात्मक तरीके से प्रवेश करने के लिए प्रेरित करता है, आलसी नहीं बनने देता, देह-सुखों का लोभ नहीं करने देता, सत्य का अभ्यास करने के लिए इच्छुक बनाता है और परमेश्वर के वचनों की चाहत रखने वाला बनाता है। यह सब ऐसा कार्य है, जो पवित्र आत्मा की ओर से आता है।
जब लोगों की दशाएँ सामान्य नहीं होती हैं, तब वे पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिए जाते हैं। उनके दिलों के भीतर की शिकायतें, उनके गलत इरादे, उनका आलसीपन, देह की इच्छाओं को तुष्ट करने की उनकी प्रवृत्ति और सत्य से विश्वासघात करने की उनकी इच्छा—यह सब कुछ शैतान की ओर से आता है। जब लोगों की स्थितियाँ सामान्य नहीं होतीं, जब वे भीतर से अंधकारमय होते हैं और अपना सामान्य विवेक खो चुके होते हैं, पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिए गए होते हैं और अपने भीतर परमेश्वर को महसूस नहीं कर पाते, तभी शैतान उनके भीतर कार्य कर रहा होता है। यदि लोगों के भीतर सदैव सामर्थ्य रहे और सदैव परमेश्वर से प्रेम करें, तो सामान्यतः जब उनके साथ चीजें घटित होती हैं, तो वे चीजें पवित्र आत्मा की ओर से आती हैं और वे जिससे मिलते हैं, वह मुलाकात परमेश्वर के प्रबंधनों का नतीजा होता है। कहने का अर्थ है कि जब तुम्हारी स्थितियाँ सामान्य होती हैं, जब तुम पवित्र आत्मा के महान कार्य में होते हो, तो शैतान के लिए तुम्हें डगमगाना असंभव हो जाता है। इस बुनियाद पर यह कहा जा सकता है कि सब कुछ पवित्र आत्मा की ओर से आता है और यद्यपि तुम्हारे मन में ग़लत विचार हो सकते हैं, तुम उनके खिलाफ विद्रोह करने में सक्षम होते हो और उनका अनुसरण नहीं करते। यह सब पवित्र आत्मा के कार्य से आता है। किन परिस्थितियों में शैतान हस्तक्षेप करता है? जब तुम्हारी स्थितियाँ सामान्य न हों, जब तुम्हें परमेश्वर का स्पर्श न मिला हो और तुम परमेश्वर के कार्य से रहित हो, जब तुम भीतर से सूखे और बंजर हो, जब परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए तुम्हें कुछ समझ न आए और जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाओ और पियो पर प्रबुद्ध या रोशन न हो तो ऐसे समय पर शैतान के लिए तुम्हारे भीतर कार्य करना आसान हो जाता है। दूसरे शब्दों में, जब तुम पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिए गए हो और तुम परमेश्वर को महसूस नहीं कर पाते, तो तुम्हारे साथ बहुत सी चीजें घटित होती हैं, जो शैतान के लालच से आती हैं। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, शैतान भी उसी दौरान कार्य कर रहा होता है। पवित्र आत्मा मनुष्य को आंतरिक रूप से स्पर्श करता है, जबकि उसी समय शैतान मनुष्य के भीतर व्यवधान डालता है। हालाँकि ऐसी स्थिति में पवित्र आत्मा का कार्य अग्रणी स्थान ले लेता है, और जिन लोगों की स्थितियाँ सामान्य होती हैं, वे इस पर काबू पाते हैं; यह शैतान के कार्य के ऊपर पवित्र आत्मा के कार्य की विजय है। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तब भी लोगों में भ्रष्ट स्वभाव मौजूद रहते हैं; हालाँकि पवित्र आत्मा के कार्य के दौरान, लोगों के लिए अपने विद्रोह, प्रेरणाओं और मिलावटों की खोज करना और पहचानना आसान हो जाता है। केवल तभी लोगों को पछतावा महसूस होता है और वे प्रायश्चित करने को तैयार होते हैं। इस तरह, उनके विद्रोहीपन और भ्रष्ट स्वभाव धीरे-धीरे परमेश्वर के कार्य के भीतर त्याग दिए जाते हैं। पवित्र आत्मा का कार्य विशेष रूप से सामान्य होता है; जब वह लोगों में कार्य करता है, तब भी उन्हें कठिनाइयाँ होती हैं, वे तब भी रोते हैं, तब भी दुःख उठाते हैं, तब भी वे कमज़ोर होते हैं और तब भी बहुत-सी ऐसी बातें होती हैं जो उनके लिए अस्पष्ट होती हैं। फिर भी जब वे ऐसी दशाओं में होते हैं, तो वे स्वयं को पीछे हटने से रोक सकते हैं और अभी भी परमेश्वर से प्रेम कर सकते हैं और यद्यपि वे रोते हैं और व्याकुल रहते हैं, फिर भी उनमें परमेश्वर की प्रशंसा करने का सामर्थ्य होता है; पवित्र आत्मा का कार्य विशेष रूप से सामान्य होता है और उसमें थोड़ा-सा भी अलौकिक नहीं होता। अधिकांश लोग सोचते हैं कि जैसे ही पवित्र आत्मा कार्य करना आरंभ करता है, वैसे ही लोगों की दशा बदल जाती है और जो चीजें उनका सार होती हैं, वे त्याग दी जाती हैं। ऐसी समझ विकृत होती है। जब पवित्र आत्मा मनुष्य के भीतर कार्य करता है, तो मनुष्य की नकारात्मक चीजें उसमें बनी रहती हैं और उसका आध्यात्मिक कद वही रहता है, लेकिन वह पवित्र आत्मा की रोशनी और प्रबोधन प्राप्त कर लेता है और इसलिए वह अधिकाँश समय सकारात्मक दशा में रहता है, उसके भीतर की स्थितियाँ सामान्य हो जाती हैं और वह अधिक तेजी से बदल जाता है। लोगों के वास्तविक अनुभवों में प्राथमिक रूप से या तो वे पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं या शैतान के कार्य का और यदि वे इन दशाओं को समझने में सक्षम नहीं होते और उनमें उनका भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है, तो व्यावहारिक अनुभवों में प्रवेश का तो सवाल ही नहीं उठता, स्वभाव में बदलाव की तो बात ही दूर है। इस प्रकार परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने की कुँजी ऐसी चीजों की असलियत जानना ही है; इस रूप में, उनके लिए यह अनुभव करना सहज होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 446
पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को सकारात्मक और प्रेरित बनाता है, जबकि शैतान का कार्य उन्हें नकारात्मक बनाता और पीछे धकेलता है, उनसे परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और विरोध कराता है, उसमें अपनी आस्था छोड़ने पर मजबूर करता है और अपना कर्तव्य करने में कमज़ोर बना देता है। वह सब कुछ जो पवित्र आत्मा के प्रबोधन से उपजता है, वह काफ़ी स्वाभाविक होता है; यह तुम पर थोपा नहीं जाता। यदि तुम इसका पालन करते हो, तो तुम्हें शांति मिलेगी; और यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो फिर बाद में तुम्हें फटकारा गया महसूस करोगे। यदि यह पवित्र आत्मा का प्रबोधन है, तो तुम जो भी करते हो, उसमें बाधित या नियंत्रित नहीं होगे; तुम स्वतंत्र होगे, तुम्हारे क्रियाकलापों में अभ्यास का एक मार्ग होगा और तुम अबाध होगे और परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य करने के योग्य होगे। शैतान का कार्य तुम्हें बहुत-से मामलों में परेशान करता है; यह तुम्हें प्रार्थना करने से विमुख करता है, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने में बहुत आलसी बनाता है, कलीसिया का जीवन जीने से विमुख करता है, और यह आध्यात्मिक जीवन से दूर कर देता है। पवित्र आत्मा का कार्य तुम्हारे दैनिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता और तुम्हारे सामान्य आध्यात्मिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता। तुम बहुत-सी चीज़ों का भेद उसी क्षण पहचानने में असमर्थ रहते हो, जब वे घटित होती हैं; फिर भी कुछ दिन बाद, तुम्हारा हृदय अधिक उज्ज्वल तथा मन अधिक स्पष्ट हो जाता है। तुम्हें आत्मा की चीजों के बारे में कुछ समझ आने लगती है और धीरे-धीरे तुम पहचान सकते हो कि कोई विचार परमेश्वर से आया है या शैतान की ओर से। कुछ बातें तुमसे परमेश्वर का विरोध करवाती हैं और परमेश्वर के ख़िलाफ विद्रोह करवाती हैं, या परमेश्वर के वचनों को कार्य में लाने से तुम्हें रोकती हैं; ये सभी बातें शैतान की ओर से आती हैं। कुछ बातें स्पष्ट नहीं होतीं और उस समय तुम उनका भेद नहीं पहचान सकते; बाद में, तुम उनके प्रकटीकरणों को देख पाते हो, तत्पश्चात विवेक का इस्तेमाल कर पाते हो। अगर तुम स्पष्ट रूप से यह भेद पहचान सकते हो कि कौन-सी बातें शैतान की ओर से आती हैं और कौन-सी पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित होती हैं, तो तुम अपने अनुभवों में आसानी से नहीं भटकोगे। कभी-कभी तुम्हारी स्थिति अच्छी नहीं होती और तुम्हें ऐसे विचार आते हैं जो तुम्हें तुम्हारी नकारात्मक दशा से बाहर निकालते हैं। यह दिखाता है कि जब तुम्हारी स्थिति प्रतिकूल होती है, तब भी तुम्हारे कुछ विचार पवित्र आत्मा से आ सकते हैं। ऐसा नहीं है कि जब तुम नकारात्मक होते हो, तो तुम्हारे सारे विचार शैतान के भेजे हुए हों; यदि यह सच होता, तो तुम सकारात्मक अवस्था की ओर कब मुड़ पाते? जब तुम कुछ समय तक नकारात्मक रहते हो, पवित्र आत्मा तुम्हें पूर्ण बनाए जाने का अवसर देता है; वह तुम्हें स्पर्श करता है, जिसकी वजह से तुम अपनी नकारात्मक दशा से बाहर आते हो और तुम एक सामान्य दशा में प्रवेश कर जाते हो।
यह जानना कि पवित्र आत्मा का कार्य क्या है और शैतान का कार्य क्या है, तुम इनकी तुलना अपने अनुभवों के दौरान अपनी स्वयं की दशा से और अपने अनुभवों के साथ कर सकते हो और इस तरह तुम्हारे अनुभवों में सिद्धांत से संबंधित और अधिक सत्य होंगे। सिद्धांत के बारे में इन सत्यों को समझकर तुम अपनी वास्तविक दशा को समझ पाओगे, तुम लोगों एवं घटनाओं का भेद पहचान पाओगे और तुम्हें पवित्र आत्मा का कार्य पाने के लिए बहुत अधिक प्रयास नहीं करने होंगे। निःसंदेह, यह तुम्हारी प्रेरणाओं के सही होने और तुम्हारी खोजने और अभ्यास करने की तत्परता पर निर्भर है। इस प्रकार की भाषा—वह भाषा जो सिद्धांतों से संबंधित है—वह चीज है जो तुम्हारे अनुभवों में दिखनी चाहिए। इसके बिना तुम्हारे अनुभव शैतान के विघ्न और मूर्खतापूर्ण ज्ञान से भरपूर होंगे। यदि तुम यह नहीं समझते कि पवित्र आत्मा कैसे कार्य करता है, तो तुम यह नहीं समझते कि परमेश्वर से प्रार्थना कैसे करें और तुम्हें प्रवेश कैसे करना चाहिए, और यदि तुम यह नहीं जानते कि शैतान लोगों को गुमराह और बाधित करने के लिए कैसे कार्य करता है, तो तुम यह नहीं जानते कि शैतान को कैसे नकारें और अपनी गवाही में दृढ़ कैसे रहें। पवित्र आत्मा कैसे कार्य करता है और शैतान कैसे कार्य करता है, ये वे चीजें हैं जिन्हें लोगों को समझना चाहिए, और ये वे चीजें हैं जिन्हें लोगों द्वारा परमेश्वर पर अपने विश्वास में अनुभव किया जाना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 447
सामान्य मानवता में कौन-से पहलू शामिल हैं? अंतर्दृष्टि, समझ, विवेक और चरित्र। अगर तुम इनमें से हर पहलू में सामान्यता हासिल कर सको, तो तुम्हारी मानवता मानक के अनुरूप हो जाएगी। तुम्हें एक सामान्य इंसान के समान होना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर का विश्वासी लगना चाहिए। तुम्हें बहुत अधिक हासिल नहीं करना है या कूटनीति में संलग्न नहीं होना है; तुम्हें बस एक सामान्य इंसान बनना है, जिसमें सामान्य व्यक्ति की समझ हो, ताकि तुम चीजों की असलियत देख पाओ, और कम से कम एक सामान्य इंसान दिखाई दो। यह पर्याप्त होगा। आज तुमसे अपेक्षित हर चीज तुम्हारी क्षमताओं के भीतर है; यह किसी को उसकी क्षमता से बड़ा कार्य करने के लिए बाध्य करने का मामला नहीं है। कोई अनुपयोगी वचन या अनुपयोगी कार्य तुम पर नहीं किया जाएगा। तुम्हारे जीवन में व्यक्त या प्रकट होने वाली समस्त कुरूपता से छुटकारा मिल जाना चाहिए। तुम लोग शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए हो और शैतान के जहर से भरे हुए हो। तुमसे केवल इस भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से छुटकारा पाने के लिए कहा जाता है। तुमसे कोई उच्च कोटि का व्यक्ति या कोई प्रसिद्ध या महान व्यक्ति बनने के लिए नहीं कहा जाता। इसका कोई अर्थ नहीं है। तुम लोगों पर जो कार्य किया जाता है, उसमें इस बात का ध्यान रखा जाता है कि तुम लोगों में क्या अंतर्निहित है। मैं लोगों से जो अपेक्षा करता हूँ, वह सीमाओं में परिभाषित होता है। अगर तुमने उस तरीके और लहजे से अभ्यास किया है, जिससे बुद्धिजीवी बात करते हैं, तो इससे काम नहीं चलेगा; तुम इसे नहीं कर पाओगे। तुम लोगों की क्षमता को देखते हुए, तुम्हें कम से कम बुद्धिमानी और कुशलता के साथ बोलने और चीजों को स्पष्ट रूप से और समझ में आने लायक तरीके से समझाने में सक्षम होना चाहिए। अपेक्षाएँ पूरी करने में बस इतना ही लगता है। अगर कम से कम तुम अंतर्दृष्टि और समझ प्राप्त कर लेते हो, तो यह पर्याप्त है। अभी सबसे महत्वपूर्ण है अपना भ्रष्ट शैतानी स्वभाव दूर करना। तुम्हें खुद में व्यक्त होने वाली कुरूपता त्याग देनी चाहिए। अगर तुम उसे नहीं त्यागते, तो सर्वोच्च समझ और सर्वोच्च अंतर्दृष्टि की बात कैसे कर सकते हो? अनेक लोगों में, यह देखते हुए कि युग बदल गया है, विनम्रता या धैर्य का अभाव हो गया है, और हो सकता है कि उनमें कोई प्रेम या संतों वाली शालीनता भी न हो। कितने बेतुके हैं ऐसे लोग! क्या उनमें रत्ती भर भी सामान्य मानवता है? क्या उनके पास कोई बताने लायक गवाही है? उनमें अंतर्दृष्टि या समझ बिल्कुल नहीं है। निस्संदेह, लोगों के अभ्यास के कुछ विकृत पहलू सही किए जाने आवश्यक हैं; उदाहरण के लिए, उनका पहले का कठोर आध्यात्मिक जीवन और उनका संवेदनशून्य और अल्पबुद्धि रूप—इन सभी को बदलना होगा। बदलाव का यह मतलब नहीं कि तुम्हें स्वच्छंद या देह में आसक्त होने दिया जाए या तुम जो चाहो, वह बोलने दिया जाए। तुम्हें कच्ची बात नहीं बोलनी चाहिए। एक सामान्य इंसान जैसी वाणी और व्यवहार होना सुसंगत रूप से बोलना है, जब तुम्हारा आशय “हाँ” हो तो “हाँ” बोलना, और “नहीं” हो तो “नहीं” बोलना। तथ्यों पर टिके रहो और उचित तरीके से बोलो। कपट मत करो, झूठ मत बोलो। वे सीमाएँ समझनी चाहिए, जिन तक सामान्य व्यक्ति स्वभाव में बदलाव के संबंध में पहुँच सकता है। नहीं तो तुम वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाओगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, काबिलियत बढ़ाना परमेश्वर का उद्धार पाने के लिए है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 448
मनुष्य द्वारा अपना कर्तव्य निभाना वास्तव में उस सबकी सिद्धि है, जो मनुष्य के भीतर अंतर्निहित है, अर्थात् जो सहज रूप से मनुष्य के लिए संभव है। इसके बाद उसका कर्तव्य पूरा हो जाता है। जहाँ तक मनुष्य की सेवा में कमियों की बात है, इनमें उसके क्रमिक अनुभव और न्याय से गुजरने की प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे कमी आती जाती है; वे मनुष्य के कर्तव्य में बाधा या विपरीत प्रभाव नहीं डालते। वे लोग, जो इस डर से सेवा करना बंद कर देते हैं या हार मानकर पीछे हट जाते हैं कि उनकी सेवा में कमियाँ हो सकती हैं, वे सबसे ज्यादा कायर होते हैं। यदि लोग वह व्यक्त नहीं कर सकते, जो उन्हें सेवा के दौरान व्यक्त करना चाहिए या वह हासिल नहीं कर सकते, जो उनके लिए सहज रूप से संभव है, और इसके बजाय वे लापरवाही से काम करते हैं, तो उन्होंने अपना वह प्रयोजन खो दिया है, जो एक सृजित प्राणी में होना चाहिए। ऐसे लोग “औसत दर्जे के” माने जाते हैं; वे बेकार का कचरा हैं। इस तरह के लोग सही मायनों में सृजित प्राणी कैसे कहे जा सकते हैं? क्या वे सड़ी हुई चीजें नहीं हैं जो बाहर से तो चमकती हैं, परंतु भीतर से सड़ी हुई होती हैं? यदि कोई व्यक्ति अपने आपको परमेश्वर कहता है, मगर अपनी दिव्यता व्यक्त करने, स्वयं परमेश्वर का कार्य करने या परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है, तो वह निःसंदेह परमेश्वर नहीं है, क्योंकि उसमें परमेश्वर का सार नहीं है और परमेश्वर जो सहज रूप से हासिल कर सकता है, वह उसके भीतर विद्यमान नहीं है। यदि मनुष्य वह खो देता है, जो उसके द्वारा सहज रूप से प्राप्य है, तो वह अब और मनुष्य नहीं समझा जा सकता, और वह सृजित प्राणी के रूप में खड़े होने या परमेश्वर के सामने आकर उसकी सेवा करने के योग्य नहीं है, और वह परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने या परमेश्वर द्वारा ध्यान रखे जाने, सुरक्षा किए जाने और पूर्ण बनाए जाने के योग्य तो बिल्कुल भी नहीं है। कई लोग जो परमेश्वर का भरोसा खो चुके हैं, परमेश्वर का अनुग्रह भी खोते चले जाते हैं। वे न केवल अपने बुरे कर्मों से घृणा नहीं करते, बल्कि ढिठाई से इस बात का प्रचार भी करते हैं कि परमेश्वर का मार्ग गलत है, और वे विद्रोही परमेश्वर के अस्तित्व तक से इनकार कर देते हैं। इस प्रकार की विद्रोहशीलता रखने वाले लोग परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने के पात्र कैसे हो सकते हैं? जो लोग अपना कर्तव्य नहीं निभाते, वे परमेश्वर के खिलाफ बहुत विद्रोही और उसके बहुत ऋणी होते हैं, फिर भी वे पलट जाते हैं और हमलावर होकर कहते हैं कि परमेश्वर गलत है। इस तरह का व्यक्ति पूर्ण बनाए जाने के लिए उपयुक्त कैसे हो सकता है? क्या यह हटा दिए जाने और दंडित किए जाने का संकेत नहीं है? जो लोग परमेश्वर के सामने अपना कर्तव्य नहीं निभाते, वे पहले से ही सर्वाधिक जघन्य अपराधों के दोषी हैं, जिसके लिए मृत्यु भी अपर्याप्त सज़ा है, फिर भी वे परमेश्वर के साथ बहस करने और उसके साथ होड़ करने की धृष्टता करते हैं। ऐसे लोगों को पूर्ण बनाने का क्या मूल्य है? जब लोग अपना कर्तव्य पूरा करने में विफल होते हैं, तो उन्हें दोषी और ऋणी महसूस करना चाहिए; उन्हें अपनी कमजोरी और अनुपयोगिता, अपनी विद्रोहशीलता और भ्रष्टता से घृणा करनी चाहिए; इससे भी बढ़कर, उन्हें परमेश्वर को सब कुछ अर्पित कर देना चाहिए, यहाँ तक कि अपना जीवन भी। केवल तभी वे सृजित प्राणी होते हैं, जो परमेश्वर से सच्चा प्रेम करते हैं और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के आशीषों और वादों का आनंद लेने और उसके द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए उपयुक्त हैं। और तुम लोगों में से अधिकतर क्या हैं? तुम लोग उस परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करते हो, जो तुम लोगों के मध्य रहता है? तुम लोगों ने उसके सामने अपना कर्तव्य किस तरह निभाया है? क्या तुमने, अपने जीवन की कीमत पर भी, वह सब कर लिया है, जिसे तुम संभवतः कर सकते हो? तुम लोगों ने क्या बलिदान किया है? क्या तुम लोगों को मुझसे बहुत कुछ नहीं मिला है? क्या तुम लोग विवेक से परख सकते हो? तुम लोग मेरे प्रति कितने वफादार हो? तुम लोगों ने मेरी किस प्रकार से सेवा की है? और मैंने जो कुछ तुम लोगों को दिया है और तुम्हारे लिए किया है, उसका क्या? क्या तुम लोगों ने यह सब माप लिया है? क्या तुम सभी लोगों ने इसका आकलन और तुलना उस जरा-सी अंतरात्मा के साथ कर ली है, जो तुम लोगों के भीतर है? तुम्हारे शब्द और कार्य किसके योग्य हो सकते हैं? क्या तुम लोगों का इतना छोटा-सा बलिदान उस सबके बराबर है, जो मैंने तुम लोगों को दिया है? मैं पूरे हृदय से, बिना किसी हिचकिचाहट के, तुम लोगों के प्रति समर्पित रहा हूँ, फिर भी तुम लोग मेरे बारे में दुष्ट इरादे रखते हो और मेरे प्रति अनमने रहते हो। तुम लोगों ने यही कर्तव्य निभाया है, तुम लोगों ने यही छटाँक भर भूमिका निभाई है। क्या ऐसा नहीं है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने में बिल्कुल असफल हो गए हो? तुम लोग सृजित प्राणी कैसे माने जा सकते हो? क्या तुम लोगों को यह स्पष्ट नहीं है कि तुम क्या व्यक्त कर रहे हो और क्या जी रहे हो? तुम लोग अपना कर्तव्य पूरा करने में असफल रहे हो, पर तुम परमेश्वर की सहनशीलता और भरपूर अनुग्रह प्राप्त करना चाहते हो। इस प्रकार का अनुग्रह तुम जैसे बेकार और अधम लोगों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए तैयार किया गया है, जो कुछ नहीं माँगते और खुशी से बलिदान करते हैं। तुम जैसे मामूली लोग स्वर्ग के अनुग्रह का आनंद लेने के बिल्कुल भी योग्य नहीं हैं। केवल कठिनाई और अनंत सज़ा ही तुम लोगों को अपने जीवन में मिलेगी! यदि तुम लोग मेरे प्रति समर्पित नहीं हो सकते, तो तुम लोगों के भाग्य में पीड़ा ही होगी। यदि तुम लोग मेरे वचनों और कार्यों के प्रति जवाबदेह नहीं हो सकते, तो तुम्हारा परिणाम दंड होगा। राज्य के समस्त अनुग्रह, आशीषों और अद्भुत जीवन का तुम लोगों के साथ कोई लेना-देना नहीं होगा। यही वह अंत है, जिसके तुम काबिल हो और जो तुम लोगों की अपनी करतूतों का परिणाम है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 449
वे अज्ञानी घमंडी लोग न केवल पूरी कोशिश नहीं करते या अपना कर्तव्य नहीं निभाते, बल्कि वे अनुग्रह के लिए अपने हाथ तक पसार देते हैं, मानो वे जो माँगते हैं, उसके योग्य हों। और यदि वे वह प्राप्त नहीं कर पाते, जो वे माँगते हैं, तो वे और भी ज्यादा धोखेबाज बन जाते हैं। ऐसे लोगों को विवेक युक्त कैसे माना जा सकता है? तुम लोग कमजोर काबिलियत के और विवेकशून्य हो; प्रबंधन के कार्य के दौरान तुम लोगों को जो कर्तव्य उचित रूप से निभाना चाहिए, उसे निभाने में तुम पूर्णतः अक्षम हो। तुम लोगों का मूल्य पहले ही तेजी से घट चुका है। तुम्हारे प्रति दिखाए गए उपकार के लिए मेरा बदला चुकाने की तुम लोगों की विफलता पहले ही चरम विद्रोह का कृत्य है, जो तुम्हारी निंदा करने के लिए पर्याप्त है और तुम्हारी कायरता, अक्षमता, अधमता और अनैतिकता प्रदर्शित करता है। कौन-सी चीज़ तुम लोगों को अपने हाथ पसारे रखने का अधिकार देती है? तुम लोगों का मेरे कार्य के लिए रत्तीभर सहायक न हो पाना, समर्पित न हो पाना और मेरी गवाही देने में अडिग न हो पाना तुम्हारे कुकर्म और असफलताएँ हैं, इसके बावजूद तुम लोग मुझ पर आक्रमण करते हो, झूठा दावा करते हो कि मैं गलत करता हूँ, और शिकायत करते हो कि मैं अधार्मिक हूँ। क्या यही तुम्हारी निष्ठा है? क्या यही तुम्हारा प्रेम है? इससे अधिक तुम लोग और क्या कार्य कर सकते हो? जो भी कार्य किया गया है, उसमें तुम लोगों ने क्या योगदान दिया है? तुमने खुद को कितना खपाया है? तुम लोगों को कोई दोष न देकर मैंने पहले ही बड़ी सहनशीलता दिखाई है, फिर भी तुम लोग बेशर्मी से मुझसे बहाने बनाते हो और निजी तौर पर मेरी शिकायत करते हो। क्या तुम लोगों में मानवता का हलका-सा भी निशान है? यद्यपि मनुष्य के कर्तव्य में उसके विचारों और उसकी धारणाओं की मिलावट होती है, फिर भी तुम्हें अपना कर्तव्य निभाना चाहिए और समर्पित होना चाहिए। मनुष्य के कार्य में अशुद्धताएँ उसकी काबिलियत की समस्या हैं, जबकि, यदि मनुष्य अपना कर्तव्य नहीं निभाता, तो यह उसकी विद्रोहशीलता दर्शाता है। मनुष्य के कर्तव्य और उसे आशीष प्राप्त होने या उसके संताप का सामना करने के बीच कोई सह-संबंध नहीं है। कर्तव्य वह है, जो मनुष्य के लिए निभाना आवश्यक है; यह उसका स्वर्ग द्वारा प्रदत्त बुलावा है, उसे प्रतिफल खोजे बिना, और बिना शर्तों या बहानों के इसे करना चाहिए। केवल इसे अपना कर्तव्य निभाना कहा जा सकता है। आशीष प्राप्त होना उन आशीषों को संदर्भित करता है जिनका कोई व्यक्ति तब आनंद लेता है जब उसे न्याय का अनुभव करने के बाद पूर्ण बनाया जाता है। संताप का सामना करने का अभिप्राय उस दंड से है जो एक व्यक्ति को तब मिलता है जब ताड़ना और न्याय से गुजरने के बाद भी उसका स्वभाव नहीं बदलता—अर्थात् जब उसे पूर्ण नहीं बनाया जाता। लेकिन सृजित प्राणियों को चाहे आशीष प्राप्त हों या संताप का सामना करना पड़े, सृजित प्राणियों को अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए; वह करना जो उन्हें करना चाहिए और वह करते हुए, जिसे करने में वे सक्षम हैं। यह तो कम से कम व्यक्ति को, परमेश्वर का अनुसरण करने वाले व्यक्ति को करना ही चाहिए। तुम्हें अपना कर्तव्य आशीष प्राप्त करने की खातिर नहीं निभाना चाहिए और तुम्हें संताप का सामना करने के भय से अपना कर्तव्य निभाने से इनकार नहीं करना चाहिए। मैं तुम लोगों को यह बात बताता हूँ : मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य का निर्वाह ऐसी चीज है, जो उसे करनी ही चाहिए और यदि वह अपना कर्तव्य नहीं निभाता है, तो यह उसकी विद्रोहशीलता है। अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया के माध्यम से मनुष्य धीरे-धीरे बदलता है, और इसी प्रक्रिया के माध्यम से वह अपनी वफ़ादारी प्रदर्शित करता है। इस प्रकार, जितना अधिक तुम अपना कर्तव्य निभाओगे, उतने ही अधिक सत्य प्राप्त करने में सक्षम होगे और उतनी ही अधिक तुम्हारी अभिव्यक्ति व्यावहारिक हो जाएगी। जो लोग अपना कर्तव्य निभाने में महज खानापूर्ति करते हैं और सत्य की खोज नहीं करते, वे अंत में निकाल दिए जाएँगे, क्योंकि ऐसे लोग सत्य के अभ्यास में अपना कर्तव्य नहीं निभाते और अपना कर्तव्य निभाने में सत्य का अभ्यास नहीं करते। ये वे लोग हैं जो अपरिवर्तित रहते हैं और जिन्हें संताप का सामना करना पड़ेगा। उनकी न केवल अभिव्यक्तियाँ अशुद्ध हैं, बल्कि वे जो कुछ भी व्यक्त करते हैं, वह दुष्टतापूर्ण होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 450
अगर तुम्हें परमेश्वर के काम का ज्ञान नहीं है, तो तुम्हें यह नहीं पता होगा कि परमेश्वर के साथ सहयोग कैसे करना है। अगर तुम परमेश्वर के काम के सिद्धांतों को नहीं जानते और इस बात से अनजान हो कि शैतान मनुष्य पर कैसे काम करता है, तो तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होगा। मात्र उत्साह भरा अनुसरण तुम्हें वे परिणाम नहीं पाने देगा, जिनकी माँग परमेश्वर करता है। अनुभव करने का यह तरीका लॉरेंस के तरीके के समान है : किसी तरह का कोई फर्क न करना और केवल अनुभव पर ध्यान केंद्रित करना, इन बातों से पूरी तरह से अनजान रहना कि शैतान का क्या काम है, पवित्र आत्मा का क्या काम है, परमेश्वर की उपस्थिति के बिना मनुष्य किस स्थिति में होता है, और किस तरह के लोगों को परमेश्वर पूर्ण बनाना चाहता है। विभिन्न प्रकार के लोगों से व्यवहार करते हुए किन सिद्धांतों को अपनाना चाहिए, वर्तमान में परमेश्वर के इरादों को कैसे समझें, परमेश्वर के स्वभाव को कैसे जानें, और परमेश्वर की दया, उसकी महिमा और धार्मिकता किन लोगों, परिस्थितियों और युग पर निर्देशित की जाती हैं—वह इनमें से किसी में अंतर नहीं करता। अगर लोगों के पास अपने अनुभवों के लिए नींव के रूप में अनेक दर्शन नहीं हैं, तो जीवन नामुमकिन है, और अनुभव उससे भी ज्यादा नामुमकिन; वे मूर्खतापूर्ण ढंग से किसी के भी प्रति समर्पित होते रहते हैं और सब-कुछ सहते रहते हैं। ऐसे लोगों को पूर्ण बनाया जाना बहुत मुश्किल है। यह कहा जा सकता है कि अगर तुम्हारे पास उपर्युक्त में से कोई दर्शन नहीं है, तो यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि तुम महामूर्ख हो, नमक के खंभे के समान, जो हमेशा इजराइल में खड़ा रहता है। ऐसे लोग बेकार और निकम्मे हैं! कुछ लोग केवल आँख मूँदकर समर्पण कर देते हैं, वे हमेशा अपने आपको जानते हैं और नए मामलों से निपटने के लिए हमेशा आचार-व्यवहार के अपने ही तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, या उल्लेख के भी योग्य न होने वाले तुच्छ मामलों से निपटने के लिए “बुद्धि” का उपयोग करते हैं। ऐसे लोग विवेकहीन होते हैं, मानो उनका स्वभाव ही चुने जाने से इनकार कर देने वाला हो, और वे हमेशा एक जैसे रहते हैं, कभी नहीं बदलते। ऐसे लोग मूर्ख होते हैं, जिनके पास थोड़ा भी विवेक नहीं होता। वे कभी भी परिस्थितियों या विभिन्न लोगों के लिए उपयुक्त उपाय करने की कोशिश नहीं करते। ऐसे लोगों के पास अनुभव नहीं है। मैंने कुछ ऐसे लोगों को देखा है, जो स्वयं के ज्ञान से इतने बँधे हुए हैं कि जब उनका बुरी आत्माओं के काम से जुड़े लोगों से सामना होता है, तो वे अपना सिर झुका लेते हैं और पाप स्वीकार कर लेते हैं, खड़े होकर उनकी निंदा करने का साहस नहीं करते। और जब उनका ज़ाहिर तौर पर पवित्र आत्मा के कार्य से सामना होता है, तो वे उसके प्रति समर्पण करने की हिम्मत नहीं करते। वे यह विश्वास करते हैं कि बुरी आत्माएँ भी परमेश्वर के हाथों में हैं, और उनमें खड़े होकर उनका विरोध करने का ज़रा-सा भी साहस नहीं होता। ऐसे लोग परमेश्वर पर अपमान लाते हैं, और वे उसके लिए भारी बोझ सहन कर पाने में बिलकुल असमर्थ हैं। ऐसे भ्रमित लोग किसी प्रकार का भेद नहीं करते। अनुभव करने के इस तरह के तरीके को इसलिए त्याग दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह परमेश्वर की दृष्टि में असमर्थनीय है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अनुभव पर
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 451
वर्तमान धारा में उन सभी के पास, जो सच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं, उसके द्वारा पूर्ण किए जाने का अवसर है। चाहे वे युवा हों या वृद्ध, अगर उनके पास परमेश्वर के प्रति समर्पित होने और उसका भय मानने वाला हृदय है, तो वे उसके द्वारा पूर्ण किए जा सकते हैं। परमेश्वर लोगों को उनके भिन्न-भिन्न कार्यों के अनुसार पूर्ण करता है। जब तक तुम अपनी पूरी शक्ति लगाते हो और परमेश्वर के कार्य के लिए प्रस्तुत रहते हो, तुम उसके द्वारा पूर्ण किए जा सकते हो। वर्तमान में तुम लोगों में से कोई भी पूर्ण नहीं है। कभी तुम एक प्रकार का कार्य करने में सक्षम होते हो, और कभी तुम दो कार्य कर सकते हो। जब तक तुम अपने आपको परमेश्वर के लिए खपाने की पूरी कोशिश करते हो, तब तक तुम अंततः परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाओगे।
युवा लोगों के पास सांसारिक आचरण के फलसफे कम हैं, और उनमें बुद्धि और अंतर्दृष्टि की कमी है। परमेश्वर मनुष्य की बुद्धि और अंतर्दृष्टि को पूर्ण करने के लिए आता है। उसका वचन उनकी कमियाँ पूरी करता है। फिर भी, युवा लोगों का स्वभाव चंचल होता है, और उसे परमेश्वर द्वारा रूपांतरित किया जाना आवश्यक है। युवा लोगों में धार्मिक धारणाएँ और सांसारिक आचरण के फलसफे कम होते हैं; वे हर चीज़ के बारे में सरल ढंग से सोचते हैं, और उनके विचार जटिल नहीं होते। यह उनकी मनुष्यता का अंग है, जिसने अभी तक आकार नहीं लिया है, और यह एक वांछनीय अंग है; किंतु युवा लोग अबोध हैं और उनमें विवेक की कमी है। यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की आवश्यकता है। परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने से तुम लोग विवेक विकसित करने में सक्षम होगे। तुम अनेक आध्यात्मिक चीज़ें स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम होगे, और धीरे-धीरे ऐसे व्यक्ति के रूप में परिवर्तित हो जाओगे, जो परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने के लिए उपयुक्त हो। वृद्ध भाई-बहनों के पास भी करने के लिए अपने काम हैं, और परमेश्वर ने उन्हें त्यागा नहीं है। वृद्ध भाई-बहनों में भी वांछनीय और अवांछनीय दोनों पहलू हैं। उनके पास सांसारिक आचरण के बहुत-से फलसफे और बहुत-सी धार्मिक धारणाएँ होती हैं। अपने क्रियाकलापों में, वे कई कठोर परंपराओं का पालन करते हैं, और वे हमेशा विनियम लागू करने के प्रति प्रवृत्त होते हैं—उनकी यांत्रिक रूप से नकल करते हैं और उन्हें कठोरता से लागू करते हैं, और उनमें लचीलेपन की कमी होती है। यह एक अवांछनीय पहलू है। किंतु ये वृद्ध भाई और बहन हर परिस्थिति में शांत और दृढ़ बने रहते हैं; उनके स्वभाव स्थिर होते हैं, और वे गुस्से से उबल नहीं पड़ते और फिर अचानक शांत नहीं हो जाते। वे चीज़ों को समझने में धीमे हो सकते हैं, पर यह कोई बड़ा दोष नहीं है। जब तक तुम लोग समर्पित हो सकते हो; जब तक तुम परमेश्वर के वर्तमान वचनों को स्वीकार कर सकते हो और उनकी छानबीन नहीं करते; जब तक तुम केवल समर्पण और अनुसरण से ताल्लुक रखते हो, और परमेश्वर के वचनों पर कभी कोई निर्णय नहीं देते या उनके बारे में कोई अन्य बुरे विचार नहीं रखते; जब तक तुम उसके वचनों को स्वीकार करते हो और उन्हें अभ्यास में लाते हो—तब तक, ये शर्तें पूरी करने पर तुम पूर्ण किए जा सकते हो।
चाहे तुम युवा या वृद्ध भाई या बहन हो, तुम्हें उस कार्य को जानना चाहिए जो तुम्हें करना है। जो युवा हैं उन्हें ढीठ नहीं होना चाहिए; जो वृद्ध हैं उन्हें नकारात्मक नहीं होना चाहिए या पीछे नहीं हटना चाहिए। इसके अलावा, उन्हें अपनी कमज़ोरियों की भरपाई करने के लिए एक-दूसरे की खूबियों का उपयोग करने में सक्षम होना चाहिए, और उन्हें बिना किसी पूर्वाग्रह के एक-दूसरे के काम आना चाहिए। युवा और वृद्ध भाई-बहनों के बीच मित्रता का एक पुल बनाया जाएगा, और परमेश्वर के प्रेम के कारण, तुम लोग एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझ पाओगे। युवा भाई-बहन वृद्ध भाई-बहनों को नीची नज़र से नहीं देखेंगे और वृद्ध भाई-बहन आत्मतुष्ट नहीं होंगे : क्या यह एक सामंजस्यपूर्ण सहयोग नहीं है? यदि तुम सभी का यही संकल्प हो, तो तुम लोगों की पीढ़ी में परमेश्वर की इच्छा निश्चित रूप से पूरी होगी।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सभी के द्वारा अपना कार्य करने के बारे में
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 452
भविष्य में तुम्हें आशीष मिलेगा या संताप, यह तुम्हारे आज के क्रियाकलापों और व्यवहार के आधार पर तय होगा। यदि तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना है, तो यह इस वर्तमान युग में ही होना चाहिए; भविष्य में दूसरा कोई अवसर नहीं होगा। परमेश्वर तुम लोगों को सच में अभी पूर्ण बनाना चाहता है और यह केवल कहने की बात नहीं है। भविष्य में तुम पर चाहे जो भी परीक्षण आएँ, चाहे कैसी भी घटनाएँ घटें या तुम्हें कैसी भी आपदाओं का सामना करना पड़े, परमेश्वर तुम लोगों को पूर्ण बनाना चाहता है; यह एक निश्चित और निर्विवाद तथ्य है। इसे कहाँ देखा जा सकता है? इसे इस तथ्य में देखा जा सकता है कि युगों और पीढ़ियों से परमेश्वर के वचन ने ऐसी महान ऊँचाई कभी प्राप्त नहीं की और ऐसे उच्चतम क्षेत्र में प्रवेश नहीं किया, जैसा कि उसने आज किया है। सभी लोगों पर पवित्र आत्मा का कार्य आज अभूतपूर्व है। पिछली पीढ़ियों में से शायद ही किसी को ऐसा अनुभव हुआ था; यहाँ तक कि यीशु के युग में भी आज के प्रकाशन विद्यमान नहीं थे। तुम लोगों से बोले गए वचन, जो तुम लोग समझते हो और तुम लोगों के अनुभव, सब एक शीर्षबिंदु पर पहुँच गए हैं। यहाँ तक कि परीक्षणों और ताड़नाओं के बीच भी तुम लोग छोड़कर जाते नहीं हो, यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि परमेश्वर के कार्य ने एक अभूतपूर्व वैभव प्राप्त कर लिया है। यह कोई ऐसी बात नहीं है जिसे मनुष्य कर सकता है। यह कोई ऐसी बात नहीं है जिसे मनुष्य बनाए रखता है; बल्कि यह स्वयं परमेश्वर का कार्य है। इस तरह परमेश्वर के कार्य के अनेक तथ्यों से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाना चाहता है और वह निश्चित रूप से तुम लोगों को पूर्ण करने में सक्षम है। यदि तुम लोगों में यह अंतर्दृष्टि है और तुम यह नई खोज करते हो, तो तुम यीशु के दूसरे आगमन की प्रतीक्षा नहीं करोगे, बल्कि तुम सब परमेश्वर को इसी युग में स्वयं को पूर्ण करने दोगे। इसलिए, तुम लोगों में से प्रत्येक को अपना अधिकतम प्रयास करना चाहिए, कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए, ताकि तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जा सको।
अब तुम्हें नकारात्मक चीजों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। कुछ समय के लिए, हर उस चीज को अलग रख दो और उसकी उपेक्षा करो, जो तुम्हें नकारात्मक महसूस कराए। जब तुम काम करते हो, तो ऐसे दिल से करो, जो खोज करता हो और सावधानी से आगे बढ़ता हो, परमेश्वर के प्रति समर्पण करता हो। जब तुम लोग अपने भीतर कोई कमज़ोरी खोजते हो लेकिन उसे खुद को बाधित नहीं करने देते, और तुम लोग वे कार्य करते हो जो तुम्हें करने चाहिए, तो यह सकारात्मक रूप से प्रयास करना है। उदाहरण के लिए, तुम वृद्ध भाई-बहनों की धार्मिक धारणाएँ हैं, फिर भी तुम लोग प्रार्थना कर सकते हो, समर्पण कर सकते हो, परमेश्वर के वचन खा-पी सकते हो, और भजन गा सकते हो...। संक्षेप में, तुम लोग जो कुछ भी करने में सक्षम हो, जो कोई भी कार्य तुम कर सकते हो, तुम्हें अपनी पूरी शक्ति के साथ उसके प्रति समर्पित हो जाना चाहिए। निष्क्रियता से प्रतीक्षा न करो। अपने कर्तव्य के निर्वहन में परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम होना पहला कदम है। फिर, एक बार जब तुम सत्य को समझने में सक्षम हो जाओगे और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश हासिल कर लोगे, तब तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जा चुके होगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सभी के द्वारा अपना कार्य करने के बारे में
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 453
प्रत्येक व्यक्ति जिसके पास संकल्प है, परमेश्वर की सेवा कर सकता है—परंतु जो परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाते हैं और परमेश्वर के इरादों को समझते हैं, केवल वे ही परमेश्वर की सेवा करने के योग्य हैं और उन्हें उसकी सेवा करने का अधिकार है। मैंने तुम लोगों में यह पाया है : बहुत-से लोगों का मानना है कि जब तक वे परमेश्वर के मार्ग का उत्साहपूर्वक प्रचार करते हैं, परमेश्वर के लिए सड़क पर जाते हैं, परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते एवं चीज़ों का त्याग करते हैं, इत्यादि, तो यह परमेश्वर की सेवा करना है। अधिकांश धार्मिक लोग मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ बाइबल हाथ में लेकर यहाँ-वहाँ भागना, स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का प्रचार करना और पश्चात्ताप तथा पाप स्वीकार करवाकर लोगों को बचाना है। बहुत-से धार्मिक अधिकारी हैं, जो सोचते हैं कि सेमिनरी में उन्नत अध्ययन करने और प्रशिक्षण लेने के बाद चैपलों में उपदेश देना और बाइबल के पदों को पढ़कर लोगों को शिक्षा देना परमेश्वर की सेवा करना है। इतना ही नहीं, गरीब इलाकों में ऐसे भी लोग हैं, जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ बीमार लोगों की चंगाई करना और अपने भाई-बहनों में से दुष्टात्माओं को निकालना है, उनके लिए प्रार्थना करना और उनकी सेवा करना है। तुम लोगों के बीच ऐसे बहुत-से लोग हैं, जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना तथा प्रतिदिन परमेश्वर से प्रार्थना करना, और साथ ही हर जगह कलीसियाओं में जाकर कार्य करना है। कुछ ऐसे भाई-बहन भी हैं, जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ कभी भी विवाह न करना और परिवार न शुरू करना, और अपने संपूर्ण अस्तित्व को परमेश्वर के प्रति समर्पित कर देना है। बहुत कम लोग जानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का वास्तविक अर्थ क्या है। यद्यपि परमेश्वर की सेवा करने वाले इतने लोग हैं, जितने कि आकाश में तारे, किंतु ऐसे लोगों की संख्या नगण्य है—दयनीय रूप से कम है, जो प्रत्यक्षतः परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं, और जो परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने में समर्थ हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मैं ऐसा इसलिए कहता हूँ, क्योंकि तुम लोग “परमेश्वर की सेवा करना”, इस वाक्यांश के सार को नहीं समझते, और यह बात तो बहुत ही कम समझते हो कि परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा कैसे की जाए। लोगों को यह समझने की तत्काल आवश्यकता है कि वास्तव में परमेश्वर की किस प्रकार की सेवा उसके इरादों के अनुसार हो सकती है।
यदि तुम लोग परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करना चाहते हो, तो तुम लोगों को पहले यह समझना होगा कि किस प्रकार के लोग परमेश्वर को प्रिय होते हैं, किस प्रकार के लोगों से परमेश्वर नफरत करता है, किस प्रकार के लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं, और किस प्रकार के लोग परमेश्वर की सेवा करने की योग्यता रखते हैं। तुम लोगों को कम से कम इस ज्ञान से लैस होना चाहिए। अधिक महत्वपूर्ण रूप से, तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य जानने चाहिए, और उस कार्य को भी जानना चाहिए, जिसे परमेश्वर वर्तमान में करेगा। इसे समझने के पश्चात्, और परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन के माध्यम से तुम लोगों को पहले प्रवेश पाना चाहिए और पहले परमेश्वर का आदेश स्वीकार करना चाहिए। जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों का व्यावहारिक अनुभव कर लोगे, और जब तुम वास्तव में परमेश्वर के कार्य को जान लोगे, तो तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने योग्य हो जाओगे। और जब तुम लोग परमेश्वर की सेवा करोगे, तब वह तुम लोगों की आध्यात्मिक आँखें खोल देगा, और तुम्हें अपने कार्य की अधिक समझ प्राप्त करने और उसे अधिक स्पष्टता से देखने देगा। जब तुम इस वास्तविकता में प्रवेश करोगे, तो तुम्हारे अनुभव अधिक गहरे और व्यावहारिक हो जाएँगे, और तुम लोगों में से वे सभी, जिन्हें इस प्रकार के अनुभव हुए हैं, कलीसियाओं के बीच आने-जाने और अपने भाई-बहनों को आपूर्ति प्रदान करने में सक्षम हो जाएँगे, ताकि तुम लोग अपनी खामियाँ दूर करने के लिए एक-दूसरे की खूबियों का इस्तेमाल कर सको, और अपनी आत्माओं में अधिक समृद्ध ज्ञान प्राप्त कर सको। केवल यह परिणाम प्राप्त करने के बाद ही तुम लोग परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने योग्य बन पाओगे और अपनी सेवा के दौरान परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाओगे।
जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, वे परमेश्वर के अंतरंग होने चाहिए, वे परमेश्वर को प्रिय होने चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के प्रति परम निष्ठा रखने में सक्षम होना चाहिए। चाहे एकांत में हो या सार्वजनिक रूप से, परमेश्वर की उपस्थिति में तुम्हारे कार्य उसे प्रसन्न करने में सक्षम होने चाहिए और वे सभी उसके सामने अडिग रहने में सक्षम होने चाहिए; दूसरे लोग तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार क्यों न करें, तुम्हें परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील होने के लिए हमेशा उस मार्ग पर चलना चाहिए जिस पर तुम्हारा चलना अपेक्षित है। केवल इसी तरह के लोग परमेश्वर के अंतरंग होते हैं। परमेश्वर के अंतरंग सीधे उसकी सेवा करने में इसलिए समर्थ हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर का महान आदेश और परमेश्वर का बोझ दिया गया है, वे परमेश्वर के हृदय को अपना हृदय बनाने और परमेश्वर के बोझ को अपने बोझ की तरह लेने में समर्थ हैं और वे अपने भविष्य की संभावनाओं को होने वाले लाभ या हानि पर कोई विचार नहीं करते—यहाँ तक कि जब संभावना हो कि उनके पास कुछ नहीं होगा और उन्हें कुछ भी नहीं मिलेगा, तब भी वे हमेशा एक परमेश्वर-प्रेमी हृदय से परमेश्वर में विश्वास करते हैं। और इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अंतरंग होता है। परमेश्वर के अंतरंग उसके विश्वासपात्र भी हैं; केवल परमेश्वर के विश्वासपात्र ही उसकी तात्कालिकता की भावना और उसके विचार साझा कर सकते हैं, और यद्यपि उनकी देह पीड़ायुक्त और कमजोर होती है, फिर भी वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए पीड़ा सह पाते हैं और उस चीज को छोड़ पाते हैं जिससे वे प्रेम करते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को और अधिक बोझ देता है और जो कुछ परमेश्वर करना चाहता है, वह ऐसे लोगों की गवाही से प्रकट होता है। इस प्रकार, ये लोग परमेश्वर को प्रिय हैं, ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की सेवा करते हैं और जो उसके इरादों के अनुरूप होते हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के साथ राजाओं की तरह शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं। जब तुम वास्तव में परमेश्वर के अंतरंग बन जाते हो तो बिल्कुल यही वह समय है जब तुम परमेश्वर के साथ एक राजा जैसे शक्ति का प्रयोग करोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के इरादों के अनुरूप सेवा कैसे करें
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 454
यीशु परमेश्वर का आदेश—समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य—पूरा करने में समर्थ था, सटीक तौर पर इसलिए क्योंकि वह अपने लिए कोई योजना या व्यवस्था किए बिना परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाने में समर्थ था। वह परमेश्वर का अंतरंग था जिसे तुम लोग अच्छी तरह से समझते हो—स्वयं परमेश्वर। (वास्तव में वह स्वयं परमेश्वर था जिसकी गवाही परमेश्वर के द्वारा दी गई थी। मैंने इसका उल्लेख यहाँ मुद्दे को उदाहरण के साथ समझाने हेतु यीशु के तथ्य का उपयोग करने के लिए किया है।) वह परमेश्वर की प्रबंधन योजना को बिल्कुल केंद्र में रखने में समर्थ था और हमेशा स्वर्गिक पिता से प्रार्थना करता था और स्वर्गिक पिता की इच्छा खोजता था। उसने प्रार्थना की और कहा : “परमपिता परमेश्वर! जो तेरी इच्छा है उसे पूरा कर और मेरी इच्छाओं के अनुसार नहीं, बल्कि अपनी योजना के अनुसार कार्य कर। हो सकता है मनुष्य कमजोर हो, किंतु तुम्हें उसकी परवाह क्यों करनी चाहिए? मनुष्य, जो तेरे हाथों में एक चींटी के समान है, तेरी परवाह के योग्य कैसे हो सकता है? मैं अपने हृदय में केवल तेरी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ, और चाहता हूँ कि तुम वह पूरा करो जो तुम अपनी इच्छाओं के अनुसार मुझमें पूरा करना चाहते हो।” यरूशलम जाने के मार्ग पर यीशु बहुत संतप्त था, मानो उसके हृदय में कोई चाकू मरोड़ दिया गया हो, फिर भी उसका पीछे हटने का जरा-सा भी इरादा नहीं था; एक सामर्थ्यवान ताकत उसे लगातार उस ओर बढ़ने के लिए बाध्य कर रही थी जहाँ उसे सलीब पर चढ़ाया जाना था। अंततः उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया और वह पापी देह की छवि बन गया, और इस प्रकार उसने मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा किया। उसने मृत्यु एवं रसातल के सभी बंधनों का अतिक्रमण किया। उसके सामने मृत्यु, नरक और रसातल ने अपना सामर्थ्य खो दिया और ये उससे परास्त हो गए। वह तैंतीस वर्षों तक जीवित रहा और इस पूरी अवधि में उसने परमेश्वर के उस वक्त के कार्य के अनुसार परमेश्वर के इरादों को पूरा करने के लिए हमेशा अपना अधिकतम प्रयास किया, कभी अपने व्यक्तिगत लाभ या नुकसान के बारे में विचार नहीं किया और हमेशा परमपिता परमेश्वर के इरादों की खातिर योजनाएँ बनाईं। इस प्रकार उसका बपतिस्मा हो जाने के बाद परमेश्वर ने कहा : “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।” परमेश्वर के सामने उसकी सेवा के कारण जो परमेश्वर के इरादों के अनुसार थी, परमेश्वर ने उसके कंधों पर समस्त मानवजाति के छुटकारे का भारी बोझ डाल दिया और उससे यह पूरा कराया और वह इस महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के योग्य था और उसे इसे करने का अधिकार था। जीवन भर उसने परमेश्वर के लिए अपरिमित कष्ट सहा, उसे शैतान द्वारा अनगिनत बार प्रलोभन दिया गया, किंतु वह कभी भी निरुत्साहित नहीं हुआ। परमेश्वर ने उसे इतना महत्वपूर्ण कार्य इसलिए दिया क्योंकि वह उस पर भरोसा करता था, उससे प्रेम करता था और इसलिए परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से कहा : “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।” उस समय केवल यीशु ही इस आदेश को पूरा कर सकता था और यह अनुग्रह के युग में परमेश्वर द्वारा पूरी मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा करने की वास्तविक परिस्थितियों का एक पहलू था।
यदि यीशु के समान तुम लोग परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील हो सको और अपनी देह के खिलाफ विद्रोह कर सको तो परमेश्वर अपनी भारी जिम्मेदारी तुम लोगों को सौंप देगा, ताकि तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने की शर्तें पूरी कर सको। केवल ऐसी परिस्थितियों में ही तुम लोग यह कहने का साहस करोगे कि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलता है, ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के आदेश को पूरा करता है और ऐसे व्यक्ति हो जो सचमुच परमेश्वर की सेवा करता है। यीशु के उदाहरण की तुलना में, क्या तुममें यह कहने का साहस है कि तुम परमेश्वर के अंतरंग हो? क्या तुममें यह कहने का साहस है कि तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने वाले व्यक्ति हो? क्या तुम यह कहने का साहस करते हो कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सचमुच परमेश्वर की सेवा करता है? आज, जबकि तुम यह तक नहीं समझते कि परमेश्वर की सेवा कैसे की जाए, क्या तुममें यह कहने का साहस है कि तुम परमेश्वर के अंतरंग हो? यदि तुम कहते हो कि तुम वह व्यक्ति हो जो परमेश्वर की सेवा करता है, तो क्या तुम उसकी ईशनिंदा नहीं करते हो? इस बारे में विचार करो : तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो या अपनी? तुम शैतान की सेवा करते हो, फिर भी तुम ढिठाई से कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो—इससे क्या तुम परमेश्वर की ईशनिंदा नहीं करते हो? बहुत-से लोग—मेरी पीठ पीछे—रुतबे के लाभों का आनंद लेते हैं; खाने में लिप्त रहते हैं, सोना पसंद करते हैं और वे देह की देखभाल पर पूरा ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह के बच निकलने का कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना कार्य उचित रूप से नहीं करते, पर मुफ्त में कलीसिया से खाते हैं, या फिर मेरे वचनों से अपने भाई-बहनों को उपदेश देते हैं और ऊँचे पायदान से दूसरों को नियंत्रित करते हैं। ये लोग निरंतर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने वाले लोग हैं और हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम्हारी मंशा सही है, पर तुम परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्खतापूर्ण व्यवहार कर रहे हो। किंतु यदि तुम्हारी मंशा सही नहीं है और फिर भी तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करने वाले व्यक्ति हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ्तखोरी करते हैं, हमेशा देह की सुख-सुविधाओं में लिप्त रहते हैं, और परमेश्वर के हितों का कोई विचार नहीं करते हैं। वे हमेशा व्यक्तिगत लाभ ही खोजते हैं और परमेश्वर के इरादों पर कोई ध्यान नहीं देते। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें परमेश्वर के आत्मा की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं कर सकते। वे कुटिल और धोखेबाज बनकर हमेशा अपने भाई-बहनों को धोखा देते हैं और वे दोमुँहे होते हैं। वे अंगूर के बाग में एक लोमड़ी की तरह होते हैं जो हमेशा अंगूर चुराती है और बाग को बर्बाद कर देती है। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर के आशीष विरासत में पाने लायक हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई बोझ नहीं उठाते, क्या तुम परमेश्वर का आदेश लेने के लायक हो? तुम जैसे व्यक्ति पर कौन भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो तो क्या परमेश्वर तुम्हें कोई अधिक बड़ा काम सौंप सकता है? क्या इससे कार्य में विलंब नहीं होगा?
मैं ऐसा इसलिए कहता हूँ, ताकि तुम लोग जान सको कि परमेश्वर के इरादों के अनुरूप सेवा करने के लिए कौन-सी शर्तें पूरी करनी आवश्यक हैं। यदि तुम लोग अपने दिल परमेश्वर को नहीं देते, यदि तुम यीशु की तरह परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता नहीं दिखाते, तो तुम लोगों के लिए परमेश्वर का विश्वास प्राप्त करना मुश्किल होगा और अंततः परमेश्वर द्वारा तुम लोगों का न्याय किया जाएगा। शायद आज, परमेश्वर के प्रति तुम्हारी सेवा में, तुम हमेशा परमेश्वर को धोखा देने का इरादा रखते हो और उसके साथ हमेशा अनमने ढंग से पेश आते हो। संक्षेप में, चाहे कुछ भी हो, यदि तुम परमेश्वर को धोखा देते हो, तो तुम पर निर्मम न्याय आएगा। अभी, जब तुम लोगों ने परमेश्वर की सेवा करने के सही रास्ते पर अभी-अभी प्रवेश किया है, तो पहले अपने दिल परमेश्वर को दो; तुम्हारा दिल बिल्कुल भी बँटा हुआ नहीं होना चाहिए। चाहे तुम परमेश्वर के सामने हो या दूसरे लोगों के सामने, तुम्हारा दिल हमेशा परमेश्वर की ओर लगा रहना चाहिए और तुम्हें यीशु की तरह परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प रखना चाहिए। इस तरह, परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा, ताकि तुम परमेश्वर की सेवा करने वाले ऐसे व्यक्ति बन जाओ जो उसके इरादों के अनुरूप हो। यदि तुम वास्तव में यह चाहते हो कि तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाओ और तुम्हारी सेवा उसके इरादों के अनुरूप हो, तो तुम्हें परमेश्वर में आस्था के बारे में अपने पिछले विचारों को बदलना चाहिए और परमेश्वर की सेवा करने के अपने पुराने तरीकों को बदलना चाहिए, ताकि परमेश्वर द्वारा तुम्हारे भीतर के और अधिक पहलू पूर्ण बनाए जा सकें। इस तरह, परमेश्वर तुम्हें नहीं त्यागेगा और पतरस की तरह, तुम उन लोगों में सबसे आगे होगे जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं। यदि तुम पश्चात्ताप नहीं करते, तो तुम्हारा परिणाम यहूदा के समान होगा। इसे उन सभी लोगों को समझ लेना चाहिए, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के इरादों के अनुरूप सेवा कैसे करें
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 455
जबसे परमेश्वर ने जगत में अपना कार्य शुरू किया, उसने अनेक लोगों को अपनी सेवा के लिए पूर्व-निर्धारित किया है, जिसमें जीवन के हर क्षेत्र के लोग शामिल हैं। इसमें उसका यह प्रयोजन है कि उसके इरादे पूरे होंगे और पृथ्वी पर उसका कार्य सुचारु रूप से पूरा किया जाएगा—परमेश्वर का लोगों को अपनी सेवा के लिए चुनने का यही प्रयोजन है। परमेश्वर की सेवा करने वाले हर व्यक्ति को उसका यह इरादा समझना चाहिए। परमेश्वर के इस कार्य के माध्यम से लोग उसकी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को तथा पृथ्वी पर उसके कार्य के सिद्धांतों को और अधिक स्पष्टता के साथ देखते हैं। व्यावहारिक रूप में परमेश्वर अपना कार्य करने और लोगों के साथ जुड़ने के लिए पृथ्वी पर आया है, ताकि वे उसके कर्मों को अधिक स्पष्ट रूप से जान सकें। आज तुम लोग—लोगों का यह समूह—भाग्यशाली हो कि तुम व्यावहारिक परमेश्वर की सेवा कर रहे हो। यह तुम लोगों के लिए एक अनंत आशीष है—यह वास्तव में, परमेश्वर द्वारा तुम लोगों का उन्नयन है। अपनी सेवा के लिए किसी व्यक्ति को चुनने में परमेश्वर के सदैव अपने सिद्धांत होते हैं। जैसा कि लोग सोच लेते हैं वैसी बात बिल्कुल भी नहीं है कि अगर किसी व्यक्ति में उत्साह है तो वह परमेश्वर की सेवा कर सकता है। आज तुम लोग देखते हो कि जो परमेश्वर के समक्ष सेवा करते हैं, वे सब ऐसा परमेश्वर के मार्गदर्शन के कारण और अपने पास पवित्र आत्मा का कार्य होने और सत्य का अनुसरण करने वाले लोग होने के कारण करते हैं। ये परमेश्वर की सेवा करने वाले सभी लोगों के लिए न्यूनतम शर्तें हैं।
परमेश्वर की सेवा करना कोई सरल कार्य नहीं है। जिनका भ्रष्ट स्वभाव अपरिवर्तित रहता है, वे परमेश्वर की सेवा कभी नहीं कर सकते हैं। यदि परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम्हारे स्वभाव का न्याय नहीं हुआ है और उसे ताड़ित नहीं किया गया है, तो तुम्हारा स्वभाव अभी भी शैतान का प्रतिनिधित्व करता है जो यह प्रमाणित करता है कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारी सेवा बस तुम्हारा अपने अच्छे इरादों को अर्पित करना है, कि तुम्हारी सेवा तुम्हारी शैतानी प्रकृति पर आधारित है। तुम परमेश्वर की सेवा अपने स्वाभाविक चरित्र से और अपनी व्यक्तिगत पसंदगियों के अनुसार करते हो। यही नहीं, तुम्हें हमेशा यह लगता है कि तुम जिन चीजों को करने के इच्छुक हो वे परमेश्वर को पसंद हैं, और तुम जिन चीजों को नहीं करना चाहते हो वे परमेश्वर के लिए घृणित हैं, और तुम पूर्णतः अपनी पसंदगियों के अनुसार कार्य करते हो। क्या इसे परमेश्वर की सेवा करना कह सकते हैं? अंततः तुम्हारे जीवन स्वभाव में रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं आएगा; बल्कि तुम्हारी सेवा इसे और भी अधिक जिद्दी बना देगी और इससे तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव गहराई तक जड़ें जमा लेगा। इस तरह, परमेश्वर की सेवा के बारे में तुम्हारे अंदर ऐसे नियम बन जाएंगे जो मुख्यतः तुम्हारे अपने चरित्र पर आधारित होते हैं और ऐसा अनुभव अर्जित होगा जो तुम्हारे अपने स्वभाव के अनुसार की गई तुम्हारी सेवा से प्राप्त होता है। ये मनुष्य के अनुभव और सबक हैं। यह मनुष्य के सांसारिक आचरण का फलसफा है। इस तरह के लोग फरीसी और धार्मिक अधिकारी हैं। यदि वे नहीं जागते और अभी पश्चात्ताप नहीं करते, तो वे निश्चित रूप से झूठे मसीह और मसीह-विरोधी बन जाएँगे, जो अंत के दिनों में लोगों को गुमराह करते हैं। झूठे मसीह और मसीह-विरोधी, जिनके बारे में कहा गया था, इसी प्रकार के लोगों में से उठ खड़े होंगे। जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, यदि वे अपने चरित्र का अनुसरण करते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं, तब वे किसी भी समय निकाल दिए जाने के खतरे में होते हैं। जो दूसरों का दिल जीतने, उन्हें नसीहत देने और नियंत्रित करने तथा ऊँचाई पर खड़े होने के लिए परमेश्वर की सेवा करने के अपने बहुत-से वर्षों के अनुभव पर निर्भर करते हैं—और जो कभी पश्चात्ताप नहीं करते हैं, कभी अपने पाप कबूल नहीं करते हैं, रुतबे के लाभों को कभी नहीं छोड़ते हैं—उनका परमेश्वर के सामने पतन हो जाएगा। ये बिल्कुल पौलुस की किस्म के लोग हैं, अपनी वरिष्ठता का घमंड दिखाते हैं और दूसरों पर अपनी योग्यताओं का रौब जमाते हैं। परमेश्वर इस तरह के लोगों को पूर्ण नहीं बनाता। इस प्रकार की सेवा तो परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी डालने के समान है। लोग हमेशा पुराने से चिपके रहते हैं। वे अतीत की धारणाओं और अतीत की हर चीज से चिपके रहते हैं। यह उनकी सेवा में एक बड़ी बाधा है। यदि तुम उन्हें नहीं छोड़ते हो, तो ये चीजें तुम्हारे पूरे जीवन को बर्बाद कर देंगी। भले ही तुम दौड़-भाग करके अपनी टाँगें तोड़ लो या मेहनत करके अपनी कमर तोड़ लो, या यहाँ तक कि परमेश्वर की “सेवा” की खातिर शहीद भी हो जाओ, परमेश्वर तुम्हें जरा-सी भी स्वीकृति नहीं देगा। बल्कि इसका ठीक उलटा होगा : वह कहेगा कि तुम एक कुकर्मी हो।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, धार्मिक सेवा का उन्मूलन अवश्य होना चाहिए
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 456
आज से, परमेश्वर विधिवत् रूप से उन्हें पूर्ण बनाएगा जिनकी कोई धार्मिक धारणाएँ नहीं हैं, जो अपनी पुरानी अस्मिताओं को एक ओर रखने के लिए तैयार हैं, और जो एक सरल-हृदय से परमेश्वर के सामने समर्पण करते हैं। वह उन्हें पूर्ण बनाएगा जो परमेश्वर के वचन की लालसा करते हैं। ऐसे लोगों को आगे आना चाहिए और परमेश्वर की सेवा करनी चाहिए। परमेश्वर में अनंत विपुलता और असीम बुद्धि है। उसका अद्भुत कार्य और उसके बहुमूल्य वचन अधिकाधिक लोगों द्वारा उनका आनंद लिए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वर्तमान स्थिति को देखें तो, जो धार्मिक धारणाओं वाले लोग हैं, जो वरिष्ठता ओढ़ लेते हैं, और जो स्वयं को दरकिनार नहीं कर सकते हैं, उन्हें ये नई चीजें स्वीकार करना मुश्किल लगता है। पवित्र आत्मा के पास ऐसे लोगों को पूर्ण बनाने का कोई अवसर नहीं है। यदि किसी व्यक्ति में समर्पण करने का संकल्प नहीं है और वह परमेश्वर के वचनों का प्यासा नहीं है, तो वह इन नयी बातों को स्वीकारने में असमर्थ रहेगा; वह बस और भी ज्यादा विद्रोही, और भी ज्यादा चालाक बनता जाएगा, और इस प्रकार गलत मार्ग पर पहुँच जाएगा। अब अपना कार्य करने में, परमेश्वर और अधिक लोगों को ऊँचा उठाएगा जो उससे सच्चा प्रेम करते हैं और नई रोशनी स्वीकार कर सकते हैं, और वह उन धार्मिक अधिकारियों को पूरी तरह हटा देगा जो अपनी वरिष्ठता का घमंड करते हैं; जो लोग हठपूर्वक परिवर्तन का प्रतिरोध करते हैं वह ऐसे लोगों में से एक को भी नहीं चाहता है। क्या तुम इन लोगों में से एक बनना चाहते हो? तुम अपनी सेवा अपनी पसंदगियों के अनुसार देते हो या परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार? यह ऐसी चीज है जिसे तुम्हें स्वयं जानना है। क्या तुम एक धार्मिक अधिकारी हो अथवा क्या तुम कोई नवजात शिशु हो जिसे परमेश्वर पूर्ण बनाता है? तुम्हारी कितनी सेवा को पवित्र आत्मा के द्वारा स्वीकृति दी जाती है? इसमें से कितनी सेवा को परमेश्वर द्वारा बिल्कुल भी याद नहीं रखा जाएगा? वर्षों की सेवा के बाद तुम्हारे जीवन में कितना अधिक बदलाव हुआ है? क्या तुम इस सबके बारे में स्पष्ट हो? यदि तुम्हारे पास सचमुच आस्था है, तो तुम अतीत की अपनी पुरानी धार्मिक धारणाओं को छोड़ दोगे और एक नए तरीके से परमेश्वर की बेहतर ढंग से सेवा करोगे। उठ खड़े होने के लिए अभी बहुत देरी नहीं हुई है। पुरानी धार्मिक धारणाएँ व्यक्ति के पूरे जीवन को नष्ट कर सकती हैं। व्यक्ति द्वारा प्राप्त किया गया अनुभव उसे परमेश्वर से भटका सकता है और चीजों को करने के लिए अपने पर निर्भर करवा सकता है। यदि तुम ऐसी चीजों को दरकिनार नहीं करते हो तो ये तुम्हारे जीवन की संवृद्धि में बाधा बन जाएँगी। परमेश्वर सदैव उन्हें पूर्ण बनाता है जो उसकी सेवा करते हैं और उन्हें आसानी से नहीं हटाता है। यदि तुम परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को सच में स्वीकार करते हो, यदि तुम अपने विगत धार्मिक तौर-तरीकों और विनियमों को एक ओर रख सकते हो और पिछली धार्मिक धारणाओं को परमेश्वर के वर्तमान वचनों के मापदंड के रूप में उपयोग करना बंद कर सकते हो, केवल तभी तुम्हारे पास कोई उल्लेखनीय संभावनाशील भविष्य होगा। किन्तु यदि तुम अतीत की पुरानी चीजों से चिपके रहते हो, यदि तुम उन्हें अभी भी संजोकर रखते हो, तो तुम्हें किसी भी तरह बचाया नहीं जा सकता है। परमेश्वर इस तरह के लोगों पर कोई ध्यान नहीं देता है। यदि तुम वास्तव में पूर्ण बनाए जाने के इच्छुक हो तो तुम्हें पहले की हर चीज को पूरी तरह से त्यागने के लिए अवश्य ही कृतसंकल्प होना चाहिए। भले ही पहले जो किया गया था वह सही था, भले ही वह परमेश्वर द्वारा किया गया था, तब भी तुम्हें इसे दरकिनार करने और इससे चिपके रहना बंद करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। भले ही यह स्पष्ट रूप से पवित्र आत्मा का कार्य था, प्रत्यक्ष रूप से पवित्र आत्मा द्वारा किया गया था, तब भी आज तुम्हें इसे अवश्य एक ओर कर देना चाहिए। तुम्हें इसे पकड़े नहीं रहना चाहिए। परमेश्वर यही अपेक्षा करता है। हर चीज का नवीकरण किया जाना चाहिए। परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के वचनों में, वह अतीत की पुरानी चीजों का कतई कोई संदर्भ नहीं देता है, वह पुराने इतिहास का संदर्भ नहीं लेता है। परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है जो सदैव नया है और कभी भी पुराना नहीं पड़ता है। वह अतीत के अपने स्वयं के वचनों से भी नहीं चिपकता है, जिससे स्पष्ट होता है कि परमेश्वर किन्हीं विनियमों का पालन नहीं करता है। इसलिए एक मनुष्य के रूप में यदि तुम सदैव अतीत की बातों से चिपके रहते हो और उन्हें त्यागते नहीं हो और उन्हें नियमबद्ध तरीके से कठोरता से लागू करते हो, लेकिन परमेश्वर उन तरीकों से कार्य नहीं करता है जिनसे उसने पहले किया था, तो क्या तुम्हारे वचन और कार्य गड़बड़ी पैदा करने वाले नहीं हैं? क्या वे परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण नहीं हैं? क्या तुम इन पुरानी चीजों को लेकर अपने पूरे जीवन को नष्ट होने देना चाहते हो? ये पुरानी बातें तुम्हें ऐसा व्यक्ति बना देंगी जो परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी पैदा करता है। क्या तुम इस प्रकार का व्यक्ति बनना चाहते हो? यदि तुम सच में ऐसा नहीं चाहते हो, तो जो तुम कर रहे हो उसे तुरंत रोक दो और मुड़ जाओ; सब कुछ पुनः आरंभ करो। परमेश्वर तुम्हारी अतीत की सेवा को याद नहीं रखेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, धार्मिक सेवा का उन्मूलन अवश्य होना चाहिए
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 457
कार्य के संबंध में, मनुष्य का विश्वास है कि परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ना, सभी जगहों पर प्रचार करना और परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाना ही कार्य है। यद्यपि यह विश्वास सही है, फिर भी यह अत्यधिक एकतरफा है; परमेश्वर इंसान से जो माँगता है, वह उसके लिए केवल इधर-उधर दौड़ना नहीं है, बल्कि यह आत्मा के भीतर अधिक सेवकाई और पोषण है। कई भाई-बहनों ने इतने वर्षों के अनुभव के बाद भी परमेश्वर के लिए कार्य करने के बारे में कभी नहीं सोचा है, क्योंकि मनुष्य द्वारा कल्पित कार्य परमेश्वर द्वारा की गई माँग के साथ असंगत है। इसलिए, मनुष्य को कार्य के मामले में किसी भी तरह की कोई दिलचस्पी नहीं है, और ठीक इसी कारण से मनुष्य का प्रवेश भी काफ़ी एकतरफा है। तुम सभी लोगों को परमेश्वर के लिए कार्य करने से अपने प्रवेश की शुरुआत करनी चाहिए, ताकि तुम लोग अनुभव के हर पहलू से बेहतर ढंग से गुज़र सको। यही है वह, जिसमें तुम लोगों को प्रवेश करना चाहिए। कार्य परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ने को संदर्भित नहीं करता, बल्कि इस बात को संदर्भित करता है कि मनुष्य का जीवन और जिसे वह जीता है, वे परमेश्वर को आनंद देने में सक्षम हैं या नहीं। कार्य परमेश्वर की गवाही देने और मनुष्य की सेवकाई के लिए लोगों द्वारा परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी और परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान के उपयोग को संदर्भित करता है। यह मनुष्य की जिम्मेदारी है और इसे सभी लोगों को समझना चाहिए। कहा जा सकता है कि तुम लोगों का प्रवेश ही तुम लोगों का कार्य है, और तुम लोग परमेश्वर के लिए कार्य करने के दौरान प्रवेश करने का प्रयास कर रहे हो। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का अर्थ मात्र यह नहीं है कि तुम जानते हो कि उसके वचन को कैसे खाएँ और पिएँ; बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि तुम्हें यह जानना चाहिए कि परमेश्वर की गवाही कैसे दें और परमेश्वर की सेवा करने तथा मनुष्य की सेवकाई और आपूर्ति करने में सक्षम कैसे हों। यही कार्य है, और यही तुम लोगों का प्रवेश भी है; इसे ही हर व्यक्ति को संपन्न करना चाहिए। कई लोग हैं, जो केवल परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ने, और हर जगह उपदेश देने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, किंतु अपने व्यक्तिगत अनुभव को अनदेखा करते हैं और आध्यात्मिक जीवन में अपने प्रवेश की उपेक्षा करते हैं। यही कारण है कि परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग परमेश्वर का विरोध करने वाले बन जाते हैं। कई वर्षों से परमेश्वर की सेवा और मनुष्य की सेवकाई करने वालों ने कार्य करने और उपदेश देने को ही प्रवेश मान लिया है, और किसी ने भी अपने व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव को महत्वपूर्ण प्रवेश के रूप में नहीं लिया है। इसके बजाय, उन्होंने पवित्र आत्मा के कार्य से प्राप्त प्रबुद्धता को दूसरों को सिखाने के लिए पूँजी के रूप में लिया है। उपदेश देते समय उन पर बहुत ज़िम्मेदारी होती है और वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करते हैं, और इसके माध्यम से वे पवित्र आत्मा की वाणी को प्रकाशित कर रहे हैं। इस समय, जो लोग कार्य करते हैं, वे आत्मसंतोष से भर जाते हैं, मानो पवित्र आत्मा का कार्य उनका व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव बन गया हो; उन्हें लगता है कि उनके द्वारा बोले जा रहे सभी शब्द उनका अपना अस्तित्व हैं, लेकिन फिर मानो उनका स्वयं का अनुभव उतना स्पष्ट नहीं होता, जितना उन्होंने वर्णन किया होता है। और तो और, बोलने से पहले उन्हें पता भी नहीं होता कि क्या बोलना है, किंतु जब पवित्र आत्मा उनमें कार्य करता है, तो उनके वचन अनवरत रूप से धाराप्रवाह बह निकलते हैं। एक बार जब तुम इस तरह उपदेश दे लेते हो, तो तुम्हें लगता है कि तुम्हारा वास्तविक आध्यात्मिक कद उतना छोटा नहीं है, जितना तुम मानते थे और जब पवित्र आत्मा द्वारा तुम पर कार्य करने के ऐसे कई उदाहरण हो जाते हैं, तो तुम यह निश्चित कर लेते हो कि तुम्हारे पास पहले से ही आध्यात्मिक कद है और ग़लत ढंग से यह मान लेते हो कि पवित्र आत्मा का कार्य तुम्हारा स्वयं का प्रवेश और तुम्हारा स्वयं का अस्तित्व है। जब तुम लगातार इस तरह अनुभव करते हो, तो तुम अपने स्वयं के प्रवेश के बारे में सुस्त हो जाते हो, अनजाने ही आलस्य में फिसल जाते हो, और अपने स्वयं के प्रवेश को महत्व देना बंद कर देते हो। इसलिए, दूसरों की सेवकाई करते समय तुम्हें अपने आध्यात्मिक कद और पवित्र आत्मा के कार्य के बीच स्पष्ट रूप से अंतर करना चाहिए। यह तुम्हारे प्रवेश को बेहतर तरीके से सुगम बना सकता है और तुम्हारे अनुभव को अधिक लाभ पहुँचा सकता है। जब मनुष्य पवित्र आत्मा के कार्य को अपना व्यक्तिगत अनुभव मान लेता है, तो यह भ्रष्टता का स्रोत बन जाता है। इसीलिए मैं कहता हूँ, तुम लोग जो भी कर्तव्य करो, तुम लोगों को अपने प्रवेश को एक महत्वपूर्ण सबक समझना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (2)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 458
व्यक्ति परमेश्वर के इरादे पूरे करने, परमेश्वर के इरादों के अनुरूप चलने वाले सभी लोगों को उसके सामने लेकर आने, मनुष्य को परमेश्वर के समक्ष लाने, और मनुष्य को पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर के मार्गदर्शन से परिचित कराने के लिए कार्य करता है, और इस प्रकार वह परमेश्वर के कार्य के परिणामों को पूरा करता है। इसलिए, यह अनिवार्य है कि तुम लोग कार्य के सार पर पूरी तरह से स्पष्ट रहो। परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जाने वाला प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के लिए कार्य करने के योग्य है, अर्थात्, हर एक के पास पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने का अवसर है। किंतु एक बात का तुम लोगों को अवश्य एहसास होना चाहिए : जब मनुष्य परमेश्वर द्वारा आदेशित कार्य करता है, तो मनुष्य को परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने का अवसर दिया गया होता है, किंतु मनुष्य द्वारा जो कहा और जाना जाता है, वह पूर्णतः मनुष्य का आध्यात्मिक कद नहीं होता। तुम लोग बस यही कर सकते हो कि अपने कार्य के दौरान बेहतर ढंग से अपनी कमियों के बारे में जानो और पवित्र आत्मा से अधिक प्रबुद्धता प्राप्त करो। इस प्रकार, तुम लोग अपने कार्य के दौरान बेहतर प्रवेश प्राप्त करने में सक्षम होगे। यदि मनुष्य परमेश्वर से प्राप्त मार्गदर्शन को अपना स्वयं का प्रवेश और स्वयं में अंतर्निहित चीज समझता है, तो मनुष्य के आध्यात्मिक कद के विकसित होने की कोई संभावना नहीं है। लोगों में पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता तब होती है जब वे एक सामान्य स्थिति में होते हैं; ऐसे समय पर, मनुष्य प्रायः स्वयं को प्राप्त होने वाली प्रबुद्धता को अपना वास्तविक आध्यात्मिक कद समझने की गलती कर बैठता है, क्योंकि जिस रूप में पवित्र आत्मा प्रबुद्ध करता है, वह अत्यंत सामान्य होता है, और वह मनुष्य के भीतर जो अंतर्निहित है, उसका उपयोग करता है। जब लोग कार्य करते और बोलते हैं, या जब वे प्रार्थना या अपनी आध्यात्मिक भक्ति कर रहे होते हैं, तो एक सत्य अचानक उन पर स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन वास्तव में, मनुष्य जो देखता है, वह केवल पवित्र आत्मा द्वारा प्रदान की जाने वाली प्रबुद्धता होती है (स्वाभाविक रूप से यह प्रबुद्धता मनुष्य के सहयोग से जुड़ी है) जो मनुष्य का सच्चा आध्यात्मिक कद नहीं दर्शाती। अनुभव की एक अवधि के बाद, जिसमें मनुष्य कुछ कठिनाइयों और परीक्षणों का सामना करता है, ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य के वास्तविक आध्यात्मिक कद का खुलासा हो जाता है। केवल तभी मनुष्य को पता चलता है कि मनुष्य का आध्यात्मिक कद बहुत बड़ा नहीं है और उसकी स्वार्थी इच्छाएँ, व्यक्तिगत हित, लालच और ऐसी अन्य चीजें उभर आती हैं। केवल इस तरह के अनुभवों के कई चक्रों के बाद ही कई लोग, जो अपनी आत्माओं के भीतर जाग गए होते हैं, महसूस करेंगे कि अतीत में जो उन्होंने अनुभव किया था, वह उनकी अपनी वास्तविकता नहीं थी, बल्कि पवित्र आत्मा से प्राप्त एक क्षणिक रोशनी थी, और मनुष्य को केवल यह रोशनी प्राप्त हुई थी। जब पवित्र आत्मा मनुष्य को सत्य को समझने के लिए प्रबुद्ध करता है, तो ऐसा प्रायः स्पष्ट और विशिष्ट तरीके से होता है, यह समझाए बिना कि चीजें किस तरह घटित हुई हैं या किस ओर जा रही हैं। अर्थात्, इस प्रकाशन में मनुष्य की कठिनाइयों को शामिल करने के बजाय वह सत्य को सीधे प्रकट करता है। जब मनुष्य प्रवेश की प्रक्रिया में कठिनाइयों का सामना करता है, और फिर पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता को शामिल करता है, तो यह मनुष्य का व्यावहारिक अनुभव बन जाता है। ... इसलिए, जब तुम लोगों को पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त हो, तो उसी समय तुम्हें, यह देखते हुए कि वास्तव में पवित्र आत्मा का कार्य क्या है और तुम लोगों का प्रवेश क्या है, और साथ ही अपने प्रवेश में पवित्र आत्मा के कार्य को शामिल करते हुए, तुम लोगों को अपने प्रवेश पर और अधिक ध्यान देना चाहिए, ताकि तुम लोग पवित्र आत्मा की ज्यादा पूर्णता प्राप्त कर सको और पवित्र आत्मा के कार्य का सार तुम लोगों में गढ़ा जा सके। पवित्र आत्मा के कार्य के अपने अनुभव के दौरान तुम लोग पवित्र आत्मा को और साथ ही स्वयं को भी जान जाओगे, और इतना ही नहीं, क्या पता गहन कष्टों के कितने दौरों के बीच तुम लोग परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध विकसित कर लोगे, और तुम्हारे और परमेश्वर के बीच का संबंध दिन-ब-दिन घनिष्ठ होता जाएगा। असंख्य बार की काट-छाँट और शोधन के बाद तुम लोगों में परमेश्वर के प्रति एक सच्चा प्रेम विकसित हो जाएगा। यही कारण है कि तुम लोगों को यह महसूस करना चाहिए कि कष्ट, दंड और क्लेशों से डरना नहीं है; डरने की बात तो केवल तुम लोगों द्वारा पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करना, किंतु प्रवेश न करना है। जब परमेश्वर का कार्य पूरा होने का दिन आएगा, तो तुम लोगों का कार्य व्यर्थ हो जाएगा; भले ही तुमने परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लिया होगा, किंतु तुम पवित्र आत्मा को नहीं जान पाए होगे या तुमने स्वयं प्रवेश नहीं किया होगा। पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्य में गढ़ी गयी प्रबुद्धता मनुष्य के जुनून को बनाए रखने के लिए नहीं है, बल्कि मनुष्य के प्रवेश के लिए एक मार्ग खोलने के लिए है, और साथ ही मनुष्य को पवित्र आत्मा को जानने देने और इसलिए है कि वे इस बिंदु से परमेश्वर के प्रति भय और श्रद्धा का हृदय विकसित करें।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (2)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 459
उन लोगों के कार्य में बहुत कम विचलन होते हैं, जो काट-छाँट, न्याय और ताड़ना से गुजर चुके होते हैं और उनके कार्य की अभिव्यक्ति भी कहीं अधिक सटीक होती है। जो लोग कार्य करने की अपनी स्वाभाविकता पर निर्भर करते हैं, उनमें काफी बड़े विचलन होते हैं। अपूर्ण लोगों के कार्य में उनकी स्वाभाविकता बहुत अधिक अभिव्यक्त होती है, जो पवित्र आत्मा के कार्य में बहुत बड़ा अवरोध उत्पन्न करती है। किसी व्यक्ति की काबिलियत कितनी ही अच्छी क्यों न हो, उसे भी परमेश्वर के आदेश का कार्य करने से पहले काट-छाँट और न्याय से गुजरना ही चाहिए। यदि वह ऐसे न्याय से होकर नहीं गुजरा है, तो उसका कार्य, चाहे कितनी भी अच्छी तरह से क्यों न किया गया हो, सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हो सकता, वह हमेशा उसकी अपनी स्वाभाविकता और मानवीय भलाई का परिणाम होता है। काट-छाँट और न्याय से होकर गुजर चुके लोगों का कार्य उन लोगों के कार्य से कहीं अधिक सटीक होता है, जिनकी काट-छाँट और न्याय नहीं किया गया है। जो लोग न्याय से होकर नहीं गुजरे हैं, वे मानव-देह और विचारों के सिवाय और कुछ भी व्यक्त नहीं करते, जिनमें बहुत सारी मानव-बुद्धि और जन्मजात प्रतिभा मिली होती है। यह मनुष्य द्वारा परमेश्वर के कार्य की सटीक अभिव्यक्ति नहीं है। जो लोग ऐसे लोगों का अनुसरण करते हैं, वे उनकी जन्मजात काबिलियत द्वारा उनके सामने लाए जाते हैं। चूँकि वे मनुष्य की अंतर्दृष्टि और अनुभव को बहुत अधिक व्यक्त करते हैं, जो परमेश्वर के मूल इरादे से लगभग कटे हुए और उससे बहुत भटके हुए होते हैं, इसलिए इस प्रकार के व्यक्ति का कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख नहीं ला पाता, बल्कि वह उन्हें मनुष्य के सामने ले आता है। इसलिए, जो लोग न्याय और ताड़ना से होकर नहीं गुजरे हैं, वे परमेश्वर के आदेश के कार्य को क्रियान्वित करने योग्य नहीं हैं। मानक स्तर के कर्मी का कार्य लोगों को सही मार्ग पर लाने और सत्य में ज्यादा गहराई से प्रवेश करने में मदद कर सकता है। उसका कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है, वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न हो सकता है और वह विनियमों से बँधा हुआ नहीं होता, उन्हें मुक्ति और स्वतंत्रता, जीवन में क्रमिक विकास और सत्य में उत्तरोत्तर अधिक गहन प्रवेश करने की क्षमता प्रदान करता है। जो कर्मी मानक स्तर का नहीं है उसका कार्य इससे कहीं दूर होता है। उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल विनियमों के भीतर ला सकता है और लोगों से उसकी अपेक्षाएँ हर व्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न नहीं होतीं; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता। इस प्रकार के कार्य में बहुत अधिक विनियम और बहुत अधिक सिद्धांत होते हैं और वह लोगों को वास्तविकता में नहीं ला सकता, न ही वह उन्हें जीवन में विकास के सामान्य अभ्यास में ला सकता है। वह लोगों को केवल कुछ बेकार विनियमों का पालन करने में ही सक्षम बना सकता है। ऐसा मार्गदर्शन लोगों को भटका सकता है। वह तुम्हें अपने जैसा बनाने में तुम्हारी अगुआई करता है, उसके पास जो है और जो वह है उसमें ला सकता है। इस बात का भेद पहचानने के लिए कि अगुआ मानक स्तर के हैं या नहीं, इसकी कुंजी यह देखना है कि अगुआ दूसरों को किस मार्ग पर ले जाते हैं और उनके कार्य के परिणाम क्या हैं, और यह भी देखना चाहिए कि अनुयायी सत्य के अनुसार सिद्धांत पाते हैं या नहीं और अपने रूपांतरण के लिए उपयुक्त अभ्यास के तरीके प्राप्त करते हैं या नहीं। तुममें विभिन्न प्रकार के लोगों के विभिन्न कार्यों के बीच भेद पहचानने की क्षमता होनी चाहिए; तुम्हें भ्रमित अनुयायी नहीं बनना चाहिए। यह लोगों के प्रवेश के मामले पर प्रभाव डालता है। यदि तुम यह भेद पहचानने में असमर्थ हो कि किस व्यक्ति की अगुआई में मार्ग है और किसकी अगुआई में नहीं, तो तुम आसानी से गुमराह हो जाओगे। इस सबका तुम्हारे अपने जीवन के साथ सीधा संबंध है। अपूर्ण लोगों के कार्य में बहुत अधिक स्वाभाविकता होती है; उसमें बहुत अधिक मानवीय इच्छा मिली हुई होती है। उनका अस्तित्व स्वाभाविकता है—जिसके साथ वे पैदा हुए हैं। यह काट-छाँट किए जाने के बाद का जीवन या रूपांतरित किए जाने के बाद की वास्तविकता नहीं है। ऐसा व्यक्ति उन्हें सहारा कैसे दे सकता है, जो जीवन की खोज कर रहे हैं? मनुष्य का मूल जीवन उसकी जन्मजात बुद्धि या प्रतिभा है। इस प्रकार की बुद्धि या प्रतिभा मनुष्य से परमेश्वर की सटीक अपेक्षाओं से काफी दूर होती है। यदि किसी मनुष्य को पूर्ण नहीं बनाया गया है और उसके भ्रष्ट स्वभावों की काट-छाँट नहीं की गई है तो वह जो व्यक्त करता है उसके और सत्य के बीच एक बहुत बड़ा अंतर होगा; वह जो व्यक्त करता है उसमें अस्पष्ट चीजें मिली होंगी, जैसे कि उसकी कल्पनाएँ और एकतरफा अनुभव। इतना ही नहीं, वह चाहे कुछ भी करे, लोग यही महसूस करते हैं कि उसमें कोई समग्र लक्ष्य और कोई सत्य नहीं है जो सभी लोगों के प्रवेश करने के लिए उपयुक्त हो। लोगों से जो अपेक्षाएँ की जाती हैं, उनमें से ज्यादातर उनकी योग्यता से परे होती हैं, मानो वे जमीन पर जीने के लिए मजबूर की जा रही मछली हों। यह मनुष्य की इच्छा का कार्य है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव, उसके विचार और उसकी धारणाएँ उसके शरीर के सभी अंगों में व्याप्त हैं। मनुष्य सत्य का अभ्यास करने की सहज-प्रवृत्ति के साथ पैदा नहीं होता, न ही उसमें सीधे तौर पर सत्य को समझने की सहज-प्रवृत्ति होती है। उसमें मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव जोड़ दो—जब इस प्रकार का स्वाभाविक व्यक्ति कार्य करता है, तो क्या इससे गड़बड़ियाँ नहीं होतीं? परंतु पूर्ण बनाए जा चुके व्यक्ति के पास उस सत्य का अनुभव होता है जिसे लोगों को समझना चाहिए और उसके पास उनके भ्रष्ट स्वभावों का ज्ञान होता है। उसके कार्य में अस्पष्ट और अवास्तविक चीजें धीरे-धीरे कम हो जाती हैं, मानवीय मिलावटें पहले से कम हो जाती हैं और उसका काम और सेवा परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के अधिक करीब पहुँच जाते हैं। इस प्रकार, उसका काम सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर गया है और वह वास्तविक भी बन गया है। मनुष्य के मन के विचार विशेष रूप से पवित्र आत्मा के कार्य को अवरुद्ध कर देते हैं। मनुष्य के पास समृद्ध कल्पना और उचित तर्क होते हैं, और उसके पास मामलों से निपटने का लंबा अनुभव होता है। यदि मनुष्य के ये पहलू काट-छाँट और सुधार से होकर नहीं गुजरते, तो वे सभी कार्य की बाधाएँ हैं। इसलिए मनुष्य का कार्य सटीकता के सर्वोच्च स्तर तक नहीं पहुँच सकता, विशेषकर अपूर्ण लोगों का कार्य।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 460
तुम्हें उन अनेक स्थितियों की समझ होनी चाहिए, जिनमें लोग तब होते हैं, जब पवित्र आत्मा उन पर काम करता है। विशेषकर, जो लोग परमेश्वर की सेवा में समन्वय करते हैं, उन्हें इन स्थितियों की और भी गहरी समझ होनी चाहिए। यदि तुम बहुत सारे अनुभवों या प्रवेश पाने के कई तरीकों के बारे में केवल बात ही करते हो, तो यह दिखाता है कि तुम्हारा अनुभव बहुत ज्यादा एकतरफा है। अपनी वास्तविक अवस्था को जाने बिना और सत्य सिद्धांतों को समझे बिना स्वभाव में परिवर्तन हासिल करना संभव नहीं है। पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को जाने बिना या उसके फल को समझे बिना तुम्हारे लिए बुरी आत्माओं के कार्य को पहचानना मुश्किल होगा। तुम्हें बुरी आत्माओं के कार्य के साथ-साथ लोगों की धारणाओं को बेनकाब कर सीधे मुद्दे के केंद्र में पैठना चाहिए; तुम्हें लोगों के अभ्यास में आने वाले अनेक भटकावों या लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने में होने वाली समस्याओं को भी इंगित करना चाहिए, ताकि वे उन्हें पहचान सकें। कम से कम, तुम्हें उन्हें नकारात्मक या निष्क्रिय महसूस नहीं कराना चाहिए। हालाँकि, तुम्हें उन कठिनाइयों को समझना चाहिए, जो अधिकांश लोगों के लिए समान रूप से मौजूद हैं, तुम्हें विवेकहीन नहीं होना चाहिए या “भैंस के आगे बीन बजाने” की कोशिश नहीं करनी चाहिए; यह मूर्खतापूर्ण व्यवहार है। लोगों द्वारा अनुभव की जाने वाली अनेक कठिनाइयों को हल करने के लिए तुम्हें पहले पवित्र आत्मा के काम की गतिशीलता को समझना चाहिए; तुम्हें समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा विभिन्न लोगों पर कैसे काम करता है, तुम्हें लोगों के सामने आने वाली कठिनाइयों और उनकी कमियों को समझना चाहिए, तुम्हें समस्या के मूल की असलियत को समझना चाहिए और बिना विचलित हुए या बिना कोई त्रुटि किए, समस्या के स्रोत पर पहुँचना चाहिए। केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति होगे जो परमेश्वर की सेवा में सहयोग करने के संदर्भ में मानक स्तर का है।
तुम प्रमुख मुद्दों को समझने और बहुत-सी चीजों को स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम हो पाते हो या नहीं, यह तुम्हारे व्यक्तिगत अनुभवों पर निर्भर करता है। जिस तरीके से तुम अनुभव करते हो, उसी तरीके से तुम अन्य लोगों की अगुआई भी करते हो। यदि तुम शब्द और धर्म-सिद्धांत ही समझते हो, तो तुम दूसरों को भी शब्द और धर्म-सिद्धांत समझने के लिए ही प्रेरित करोगे। तुम जिस तरीके से परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता का अनुभव करते हो, उसी तरीके से तुम दूसरों को परमेश्वर के कथनों की वास्तविकता में प्रवेश कराने के लिए उनकी अगुआई करोगे। यदि तुम बहुत-से सत्यों को समझते हो और परमेश्वर के वचनों से कई चीजों में स्पष्ट रूप से अंतर्दृष्टि प्राप्त कर लेते हो, तो तुम दूसरों को भी बहुत-से सत्य समझाने के लिए उनका नेतृत्व कर पाने में सक्षम हो, और जिन लोगों का तुम नेतृत्व कर रहे हो, उन्हें दर्शनों की स्पष्ट समझ होगी। यदि तुम अलौकिक भावनाओं को समझने पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो तुम जिन लोगों का नेतृत्व करते हो, वे भी वैसा ही करेंगे। यदि तुम अभ्यास की उपेक्षा करते हो और उसके बजाय चर्चा पर ज़ोर देते हो, तो जिन लोगों का तुम नेतृत्व करते हो, वे भी बिना कोई अभ्यास किए, या बिना अपने स्वभाव में कोई परिवर्तन लाए, चर्चा पर ही ध्यान केंद्रित करेंगे; वे बिना किसी सत्य का अभ्यास किए, केवल सतही तौर पर उत्साहित होंगे। सभी लोग दूसरों को वही देते हैं, जो उनके पास होता है। व्यक्ति जिस प्रकार का होता है, उसी से वह मार्ग निर्धारित होता है, जिस पर वह दूसरों का मार्गदर्शन करता है, और साथ ही उन लोगों का प्रकार भी, जिनका वह नेतृत्व करता है। परमेश्वर के उपयोग हेतु वास्तव में उपयुक्त होने के लिए, तुम्हारे भीतर न केवल आकांक्षा होनी चाहिए, बल्कि तुम्हें बड़ी मात्रा में परमेश्वर की प्रबुद्धता, परमेश्वर के वचनों से मार्गदर्शन, परमेश्वर द्वारा काट-छाँट किए जाने का अनुभव, और उसके वचनों के शुद्धिकरण की भी आवश्यकता है। एक नींव के रूप में इसके साथ, साधारण समय में, तुम लोगों को अपने अवलोकनों, विचारों, चिंतनों और निष्कर्षों पर ध्यान देना चाहिए, और तदनुसार आत्मसात या उन्मूलन करने में संलग्न होना चाहिए। ये सभी तुम लोगों के वास्तविकता में प्रवेश करने के रास्ते हैं, और इनमें से प्रत्येक अनिवार्य है। परमेश्वर इसी तरह काम करता है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य करने की पद्धति में प्रवेश करते हो, तो तुम्हारे पास हर दिन उसके द्वारा पूर्ण किए जाने के अवसर हो सकते हैं। और किसी भी समय, चाहे तुम्हारा वातावरण कठोर हो या अनुकूल, चाहे तुम्हारी परीक्षा ली जा रही हो या तुम्हें प्रलोभन दिया जा रहा हो, चाहे तुम काम कर रहे हो या नहीं कर रहे हो, चाहे तुम एक व्यक्ति के रूप में जी रहे हो या किसी समूह के अंग के रूप में, तुम्हें हमेशा परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के अवसर मिलेंगे और तुम उनमें से किसी एक को भी कभी नहीं चूकोगे। तुम उन सभी को खोज पाने में सक्षम होगे—और इस तरह तुम परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने का रहस्य पा लोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो चरवाहा उपयोग के लिए उपयुक्त है उसके पास क्या होना चाहिए
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 461
इन दिनों, कई लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं कि दूसरों के साथ सहयोग करते समय क्या सबक सीखे जाने चाहिए। मैंने देखा है कि तुम लोगों में से कई लोग दूसरों के साथ सहयोग करते समय बिल्कुल सबक नहीं सीख पाते; तुममें से ज़्यादातर लोग अपने ही विचारों से चिपके रहते हैं। कलीसिया में काम करते समय, तुम अपनी बात कहते हो और दूसरे लोग उनकी बातें कहते हैं। एक की बात का दूसरे की बात से कोई संबंध नहीं होता है; दरअसल, तुम लोग बिल्कुल भी सहयोग नहीं करते। तुम लोग केवल अपनी खुद की अंतर्दृष्टियों पर संगति करने और अपने भीतर के “बोझ” को उतारने से मतलब रखते हो, और जीवन का ज़रा-सा भी अनुसरण नहीं करते। यह सब ऐसा है मानो तुम अपने काम में केवल अनमने ढंग से काम कर रहे हो, हमेशा यह मानते हुए कि दूसरे चाहे जैसे भी हों, तुम्हें उस मार्ग पर चलना चाहिए जिस पर तुम्हारा चलना अपेक्षित है, और दूसरे चाहे जैसे भी हों, तुम्हें वैसे ही संगति करनी चाहिए जैसे पवित्र आत्मा तुम्हारा मार्गदर्शन करता है। तुम दूसरों की क्षमताओं का पता लगाने में सक्षम नहीं हो और ना ही तुम खुद की जाँच करने में सक्षम हो। चीजों को लेकर तुम लोगों की समझ वास्तव में विकृत है। यह कहा जा सकता है कि अब भी तुम लोग अक्सर दंभ की दशा में रहते हो, मानो कि तुम्हें वही पुरानी बीमारी फिर से लग गई है। तुम लोग एक दूसरे के साथ इस तरीके से संगति नहीं करते हो जिसमें पूरा खुलापन हो, उदाहरण के लिए, किसी कलीसिया में काम करके तुमने किस तरह का परिणाम हासिल किया या तुम्हारी आंतरिक स्थिति हाल में कैसी रही है, वगैरह; तुम लोग ऐसी चीज़ों के बारे में कभी संगति ही नहीं करते। तुम लोग अपनी धारणाएँ त्यागने या खुद से विद्रोह करने जैसे अभ्यासों में बिल्कुल भी नहीं लगे रहते हो। अगुआ और कार्यकर्ता सिर्फ़ अपने भाई-बहनों को नकारात्मकता से दूर रखने और कैसे उनसे उत्साहपूर्वक अनुसरण करवाया जाए, इसके बारे में सोचते हैं। हालाँकि तुम सब लोग सोचते हो कि उत्साहपूर्वक अनुसरण करना अपने आप में काफी है और बुनियादी तौर पर तुम्हें इस बात की कोई समझ नहीं है कि स्वयं को जानने और खुद से विद्रोह करने का क्या अर्थ है, दूसरों के साथ सहयोग में सेवा करने का क्या अर्थ है यह तो तुम और भी नहीं जानते। तुम बस स्वयं को परमेश्वर के प्रेम का मूल्य चुकाने का संकल्प रखने की सोचते हो, पतरस की शैली में जीवन जीने का संकल्प रखने की सोचते हो। इन चीज़ों के अलावा, तुम और कुछ भी नहीं सोचते। तुम तो यह भी कहते हो कि दूसरे चाहे जो भी करें, तुम मूर्खतापूर्ण ढंग से आज्ञापालन नहीं करोगे और दूसरे लोग चाहे जैसे भी हों, तुम खुद ही परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की खोज करोगे, और ऐसा करना ही काफ़ी होगा। हालाँकि, सच तो यह है कि तुम्हारे संकल्प को किसी भी तरह वास्तविकता में ठोस अभिव्यक्ति नहीं मिली है। क्या तुम लोग आजकल इसी तरह का व्यवहार नहीं करते हो? तुम लोगों में से हर कोई खुद की समझ से चिपका हुआ है और तुम सभी चाहते हो कि तुम्हें पूर्ण किया जाए। मैं देख रहा हूँ कि तुम लोगों ने काफ़ी लंबे समय से सेवा की है, लेकिन कोई प्रगति नहीं की; खास तौर पर, सामंजस्यपूर्ण सहयोग के इस सबक में, तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया है! कलीसियाओं में जाते हुए तुम अपने ही तरीके से संगति करते हो और दूसरे लोग उनके तरीके से संगति करते हैं। सामंजस्यपूर्ण सहयोग तो शायद ही कभी होता है और तुम्हारे अधीन सेवा करने वाले अनुयायियों के बारे में तो यह बात और भी सच है। कहने का मतलब है कि तुम लोगों में से शायद ही कोई इस बात को समझता है कि परमेश्वर की सेवा करना क्या है या परमेश्वर की सेवा कैसे करनी चाहिए। तुम लोग उलझन में हो और इस तरह के सबकों को छोटी-मोटी बात मानते हो। कई लोग तो ऐसे भी हैं जो न केवल सत्य के इस पहलू का अभ्यास करने में विफल रहते हैं, बल्कि जानबूझकर गलती भी करते हैं। यहाँ तक कि जिन लोगों ने कई सालों तक सेवा की है वे भी एक दूसरे से लड़ते-झगड़ते और एक दूसरे के खिलाफ़ षड्यंत्र करते हैं और ईर्ष्यालु और प्रतिस्पर्धात्मक होते हैं; हर कोई अपना काम कारता है और वे ज़रा-भी सहयोग नहीं करते। क्या ये सारी चीज़ें तुम लोगों के वास्तविक आध्यात्मिक कद को नहीं दर्शाती हैं? तुम लोग प्रतिदिन साथ मिलकर सेवा करते हो, ठीक जैसे इस्राएली हर दिन मंदिर जाकर सीधे तौर पर परमेश्वर स्वयं की सेवा करते थे। ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम लोग जो परमेश्वर की सेवा करते हो, बिल्कुल नहीं जानते कि सहयोग या सेवा कैसे करनी है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, इस्राएलियों की तरह सेवा करो
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 462
आज तुम लोगों से जो अपेक्षित है—कि तुम सामंजस्यपूर्ण सहयोग करो—वह बिल्कुल वैसा ही है जिसकी अपेक्षा यहोवा ने अपनी सेवा में इस्राएलियों से की थी; अन्यथा, बस सेवा करना बंद कर दो। चूँकि तुम ऐसे लोग हो जो सीधे परमेश्वर की सेवा करते हैं, तुम्हें कम से कम अपनी सेवा में वफ़ादारी और समर्पण में सक्षम होना चाहिए। साथ ही, तुम्हें एक व्यावहारिक तरीके से सबक सीखने में भी सक्षम होना चाहिए। खास तौर पर अगर तुममें से जो लोग कलीसिया में काम करते हैं उनकी बात की जाए तो क्या तुम्हारे अधीन काम करने वाले भाई-बहनों में से कोई भी तुम लोगों की काट-छाँट की हिम्मत कर पाता है? क्या कोई भी तुम्हारे सामने तुम्हारी गलतियों के बारे में तुम्हें बताने की हिम्मत कर पाता है? तुम लोग बाकी सभी लोगों के ऊपर खड़े हो; तुम राजाओं की तरह सत्ता का उपयोग करते हो! तुम लोग तो सीखते या इस तरह के व्यावहारिक सबकों में प्रवेश भी नहीं करते हो, फिर भी तुम परमेश्वर की सेवा करने की बात करते हो! वर्तमान में, तुम्हें कई कलीसियाओं की अगुआई करने के लिए कहा जाता है, लेकिन न केवल तुम खुद का त्याग नहीं करते, बल्कि तुम अपनी ही धारणाओं और विचारों से चिपके भी रहते हो और इस तरह की बातें कहते हो, “मुझे लगता है यह काम इस तरह से किया जाना चाहिए। परमेश्वर ने कहा है कि हमें दूसरों से बेबस नहीं होना चाहिए और आजकल हमें आँखें मूँदकर आज्ञापालन नहीं करना चाहिए।” इसलिए, तुम में से हर कोई अपनी राय पर अड़ा रहता है और कोई भी एक दूसरे की बात नहीं मानता है। हालाँकि तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि तुम्हारी सेवा एक विकट स्थिति में पहुँच गयी है, फिर भी तुम कहते हो, “मेरे हिसाब से, मेरा रास्ता बहुत गलत नहीं है। जो भी हो, हम में से हर एक का अपना पक्ष होता है : तुम अपने पक्ष पर संगति करो और मैं अपने पर संगति करूँगा; तुम अपने दर्शनों के बारे में सहभागिता करो और मैं अपने प्रवेश पर संगति करूँगा।” तुम कभी भी ऐसी किसी चीज़ की जिम्मेदारी नहीं लेते हो जिनका निपटारा किया जाना चाहिए या तुम बस अनमने ढंग से उनसे निपटते हो, तुम में से हर कोई अपनी ही राय व्यक्त करता है और दिमाग लगाकर अपने ही रुतबे, प्रतिष्ठा और साख को बचाने में लगा रहता है। तुममें से कोई भी विनम्र बनने का इच्छुक नहीं है और कोई भी पक्ष पीछे हटने और एक दूसरे की कमियों को दूर करने की पहल नहीं करेगा, ताकि जीवन ज़्यादा तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ सके। जब तुम लोग एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हो, तो तुम्हें सत्य खोजना सीखना चाहिए। तुम कह सकते हो, “मुझे सत्य के इस पहलू की स्पष्ट समझ नहीं है। तुम्हें इसके साथ क्या अनुभव हुआ है?” या तुम लोग शायद कहो, “इस पहलू के संबंध में तेरे अनुभव मुझसे अधिक हैं; क्या तू कृपा करके मुझे कुछ मार्गदर्शन दे सकता है?” क्या यह एक अच्छा तरीका नहीं होगा? तुम लोगों ने ढेर सारे उपदेश सुने होंगे, और सेवा करने के बारे में तुम सबको कुछ अनुभव होंगे। अगर कलीसियाओं में काम करते समय तुम लोग एक दूसरे से नहीं सीखते, एक दूसरे की मदद नहीं करते या एक दूसरे की कमियों को दूर नहीं करते हो, तो तुम कैसे कोई सबक सीख पाओगे? जब भी किसी चीज़ से तुम्हारा सामना होता है, तुम लोगों को एक दूसरे से सहभागिता करनी चाहिए ताकि तुम्हारे जीवन को लाभ मिल सके। तुम लोगों को किसी भी चीज़ के बारे में कोई भी निर्णय लेने से पहले, उसके बारे में ध्यान से सहभागिता करनी चाहिए। सिर्फ़ ऐसा करके ही तुम लापरवाही से काम करने के बजाय कलीसिया की जिम्मेदारी उठा सकते हो। सभी कलीसियाओं में जाने के बाद, तुम्हें एक साथ इकट्ठा होकर उन सभी मुद्दों और समस्याओं के बारे में सहभागिता करनी चाहिए जो अपने काम के दौरान तुम्हें पता चली हैं; तुम्हें उस प्रबुद्धता और रोशनी के बारे में संगति करनी चाहिए जो तुम्हें प्राप्त हुई हैं—यह सेवा का एक अनिवार्य अभ्यास है। परमेश्वर के कार्य के प्रयोजन के लिए, कलीसिया के फ़ायदे के लिए और अपने भाई-बहनों को आगे बढ़ाने के वास्ते प्रोत्साहित करने के लिए तुम लोगों को सामंजस्यपूर्ण सहयोग हासिल करना होगा। तुम्हें एक दूसरे के साथ सहयोग करना चाहिए, एक दूसरे की कमियों की भरपाई करनी चाहिए और कार्य में बेहतर नतीजे हासिल करने चाहिए, ताकि परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखा सको। यही सच्चा सहयोग होता है और जो लोग इसमें निरत होते हैं वे ही सच्चा प्रवेश प्राप्त करते हैं। सहयोग करते समय, तुम्हारे द्वारा बोली गई कुछ बातें अनुपयुक्त हो सकती हैं, लेकिन उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इनके बारे में बाद में सहभागिता करो, और इनके बारे में अच्छी समझ हासिल करो, इन्हें अनदेखा मत करो। इस तरह की सहभागिता करने के बाद, तुम जाकर अपने भाई-बहनों की कमियों को दूर कर सकते हो। केवल इस तरह से अपने काम की अधिक गहराई में उतर कर ही तुम बेहतर नतीजे हासिल कर सकते हो। तुम में से हर व्यक्ति, परमेश्वर की सेवा करने वाले के तौर पर अपने हितों के बारे में सोचने के बजाय, हर चीज में कलीसिया के हितों की रक्षा करने में सक्षम होना चाहिए। तुम अकेले अपना काम बिल्कुल नहीं कर सकते। इस तरह का व्यवहार करने वाले लोग परमेश्वर की सेवा करने के लायक नहीं हैं! ऐसे लोगों का स्वभाव बहुत बुरा होता है; उनमें ज़रा सी भी मानवता नहीं बची है। वे सौ फीसदी शैतान हैं! वे जंगली जानवर हैं! अब भी, इस तरह की चीज़ें तुम लोगों के बीच होती हैं; तुम लोग तो सहभागिता के दौरान एक दूसरे पर हमला करने की हद तक चले जाते हो, जानबूझकर कपट करना चाहते हो और किसी छोटी सी बात पर बहस करते हुए भी गुस्से से तमतमा उठते हो, तुममें से कोई भी स्वयं को त्यागने को तैयार नहीं है, हर व्यक्ति अपने इरादे पाले बैठा है, दूसरे पक्ष को ध्यान से देख रहा है और सतर्क रहता है। क्या इस तरह का स्वभाव परमेश्वर की सेवा करने के लिए उपयुक्त है? क्या तुम्हारा इस तरह का कार्य तुम्हारे भाई-बहनों को कुछ भी दे सकता है? तुम न केवल लोगों को जीवन के सही मार्ग पर ले जाने में असमर्थ हो, बल्कि वास्तव में तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को अपने भाई-बहनों में डालते हो। क्या तुम दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचा रहे हो? तुम्हारा ज़मीर बहुत बुरा है और यह पूरी तरह से सड़ चुका है! तुम वास्तविकता में प्रवेश नहीं करते हो, तुम सत्य का अभ्यास भी नहीं करते हो। इसके अतिरिक्त, तुम बेशर्मी से दूसरों के सामने अपनी शैतानी प्रकृति को उजागर करते हो। तुम्हें कोई शर्म है ही नहीं! इन भाई-बहनों की जिम्मेदारी तुम्हें सौंपी गई है, फिर भी तुम उन्हें नरक की ओर ले जा रहे हो। क्या तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जिसका ज़मीर सड़ चुका है? तुम्हें बिल्कुल भी शर्म नहीं है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, इस्राएलियों की तरह सेवा करो
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 463
क्या तू हर युग में परमेश्वर द्वारा व्यक्त स्वभाव को ठोस ढंग से ऐसी भाषा में बता सकता है जो उपयुक्त हो और जो उस युग की सार्थकता रखती हो? क्या तू, जो अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है, परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का विस्तार से वर्णन कर सकता है? क्या तू परमेश्वर के स्वभाव की गवाही स्पष्ट और सटीक ढंग से दे सकता है? तू जो देख और अनुभव कर चुका है उस बारे में उन दयनीय, दरिद्र और धर्मनिष्ठ धार्मिक विश्वासियों को कैसे बताएगा जो धार्मिकता के भूखे-प्यासे हैं और यह प्रतीक्षा कर रहे हैं कि तू उनकी चरवाही करेगा? किस प्रकार के लोग तेरी चरवाही की प्रतीक्षा कर रहे हैं? क्या तू कल्पना कर सकता है? क्या तू अपने कंधों के बोझ, अपने आदेश और अपने उत्तरदायित्व से अवगत है? ऐतिहासिक मिशन का तेरा बोध कहाँ है? तू अगले युग के स्वामी के रूप में उचित ढंग से सेवा कैसे करेगा? क्या तुझमें स्वामी होने का प्रबल बोध है? सभी चीजों के स्वामी की व्याख्या कैसे की जानी चाहिए? क्या वास्तव में वही संसार के समस्त सजीव प्राणियों और सभी भौतिक वस्तुओं का स्वामी है? कार्य के अगले चरण की प्रगति के लिए तेरे पास क्या योजनाएँ हैं? कितने लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं कि तू उनकी चरवाही करे? क्या तेरा काम बहुत भारी है? वे दरिद्र, दयनीय, अंधे और असहाय हैं और अंधकार में विलाप कर रहे हैं—मार्ग कहाँ है? वे कैसे लालायित रहते हैं कि रोशनी एक टूटते तारे की तरह अचानक नीचे उतरे और अंधकार की उन शक्तियों को भगा दे जिन्होंने इतने सारे वर्षों से मनुष्यों का दमन किया है। वे इसके लिए दिन-रात व्याकुल होकर आस लगाए रहते हैं और लालायित रहते हैं—इसे पूरी तरह कौन जान सकता है? उस दिन भी जब रोशनी कौंधकर जाती है, गहन कष्ट सहते ये लोग रिहाई की उम्मीद के बिना अंधेरी कालकोठरी में कैद रहते हैं; वे कब रोना बंद करेंगे? भयावह है दुर्भाग्य इन दुर्बल आत्माओं का जिन्हें कभी विश्राम नहीं मिला है और बहुत समय से ये क्रूर बंधनों और जमे हुए इतिहास में जकड़ी हुई हैं। और किसने उनके विलाप की आवाज सुनी है? किसने उनकी दयनीय दशा देखी है? क्या तूने कभी सोचा है कि परमेश्वर का हृदय कितना दुखी और चिंतित है? जिस मासूम मानवजाति को उसने अपने हाथों से रचा, उसे वह ऐसी पीड़ा भोगते देखना कैसे सह सकता है? मनुष्य आखिरकार वे पीड़ित हैं जिन्हें जहर दिया गया है। और यूँ तो मनुष्य आज तक बचा हुआ है, लेकिन कौन जान सकता था कि मानवजाति को बहुत पहले ही उस दुष्ट के द्वारा जहर दिया जा चुका है? क्या तू भूल चुका है कि तू भी पीड़ित लोगों में से एक है? क्या तू इन सारे जीवित बचे लोगों को बचाने के लिए परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम की खातिर प्रयास करने का इच्छुक नहीं है? क्या तू उस परमेश्वर को प्रतिफल देने के लिए अपनी सारी शक्ति समर्पित करने का इच्छुक नहीं है जो अपनी देह और लहू के समान मानवजाति से प्रेम करता है? अपना असाधारण जीवन जीने के लिए तुम अपने को परमेश्वर द्वारा उपयोग में लाए जाने को वास्तव में कैसे समझते हो? क्या तुम्हारे पास सचमुच यह संकल्प और आस्था है कि तुम एक धर्मपरायण, परमेश्वर-सेवी व्यक्ति का सार्थक जीवन जी सको?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुझे अपने भविष्य के मिशन से कैसे पेश आना चाहिए?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 464
लोग मुझ पर विश्वास करते हैं, लेकिन वे मेरे लिए गवाही देने में असमर्थ हैं, न ही वे मेरे द्वारा स्वयं को प्रकट किए जाने से पहले मेरी गवाही दे सकते हैं। लोग केवल यह देखते हैं कि मैं सभी सृजित प्राणियों और सभी पवित्र लोगों से श्रेष्ठ हूँ, और यह देखते हैं कि मैं जो काम करता हूँ, उसे मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता। इसलिए, यहूदियों से लेकर आज के लोगों तक, जिन्होंने भी मेरे गौरवशाली कर्मों को देखा है, वे मेरे प्रति जिज्ञासा से भर जाते हैं, फिर भी, एक भी सृजित प्राणी अपने मुँह से मेरी गवाही नहीं दे सकता। केवल मेरे पिता ने मेरी गवाही दी थी और सभी सृजित प्राणियों के बीच मेरे लिए मार्ग बनाया था। अगर वह न होता, तो चाहे मैं जैसा भी कार्य करता, मनुष्य कभी नहीं जान पाता कि मैं ही सृष्टिकर्ता हूँ, क्योंकि मनुष्य केवल मुझसे लेना ही जानता है और मेरे कार्य के परिणामस्वरूप मुझ पर विश्वास नहीं करता। मनुष्य मुझे केवल इसीलिए जानता है, क्योंकि मैं निर्दोष हूँ और किसी भी तरह से पापी नहीं हूँ, क्योंकि मैं अनेक रहस्यों को स्पष्ट कर सकता हूँ, क्योंकि मैं भीड़ से ऊपर हूँ, या क्योंकि मनुष्य ने मुझसे लाभ प्राप्त किया है, फिर भी कुछ ही लोग यह विश्वास करते हैं कि मैं सृष्टिकर्ता हूँ। इसीलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य नहीं जानता कि उसे मुझमें आस्था क्यों रखनी चाहिए; वह मुझमें आस्था रखने का प्रयोजन या महत्व नहीं जानता। मनुष्य की वास्तविकता में बहुत कमी है, इतनी कि मुश्किल से ही वह मेरी गवाही देने के लायक है। तुम लोगों के पास सच्चा विश्वास बहुत ही कम है और तुम लोगों ने बहुत ही कम ग्रहण किया है, इसलिए तुम लोगों के पास बहुत ही कम गवाही है। इतना ही नहीं, तुम लोग बहुत कम समझते हो और तुम सबमें बहुत कमी है, इतनी कि तुम सभी लोग मेरे कर्मों की गवाही देने में सक्षम होने के लिए जो भी आवश्यक है उससे पीछे रह जाते हो। तुम लोगों का संकल्प सचमुच दृढ़ है, लेकिन क्या तुम लोग वाकई निश्चित हो कि तुम परमेश्वर के सार की गवाही देने में सक्षम होगे? जो कुछ तुम लोगों ने अनुभव किया और देखा है, वह हर युग के संतों और पैगंबरों के अनुभवों से बढ़कर है, लेकिन क्या तुम लोग मुझे अतीत के इन संतों और पैगंबरों के वचनों से बड़ी गवाही देने में सक्षम हो? अब जो कुछ मैं तुम लोगों को देता हूँ, वह उससे बढ़कर है जो मैंने मूसा और दाऊद को दिया था, उसी प्रकार मैं अपेक्षा करता हूँ कि तुम लोगों की गवाही मूसा की गवाही से बढ़कर हो और तुम लोगों के शब्द दाऊद के शब्दों से बड़े हों। मैं तुम लोगों को सौ गुना देता हूँ—अतः उसी प्रकार मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि मुझे सौ गुना वापस करो। तुम्हें पता होना चाहिए कि वह मैं ही हूँ, जो मनुष्य को जीवन देता है, और तुम्हीं लोग हो, जो मुझसे जीवन प्राप्त करते हो और तुम्हें मेरी गवाही अवश्य देनी चाहिए। यह तुम लोगों का वह कर्तव्य है, जिसे मैं नीचे तुम लोगों के लिए भेजता हूँ और जिसे तुम लोगों को मेरे लिए अवश्य निभाना चाहिए। मैंने अपनी सारी महिमा तुम लोगों को दे दी है, मैंने तुम लोगों को वह जीवन दिया है, जो इस्राएल के चुने हुए लोगों को भी कभी नहीं मिला। तुम लोगों को मेरे लिए गवाही देनी चाहिए, अपनी युवावस्था मुझे समर्पित कर दो और अपना जीवन मुझ पर कुर्बान कर दो। जिस किसी को मैं अपनी महिमा दूँगा, वह मेरे लिए गवाही देगा और मेरे लिए अपना जीवन देगा—इसे मैंने पूर्वनियत किया हुआ है। यह एक आशीष है कि मैं अपनी महिमा तुम्हें देता हूँ और यह तुम लोगों का कर्तव्य है कि तुम लोग मेरी महिमा की गवाही दो। अगर तुम लोग केवल आशीष प्राप्त करने की खातिर मुझ पर विश्वास करते हो, तो मेरे कार्य का ज़्यादा महत्व नहीं रह जाएगा, और तुम लोग अपना कर्तव्य नहीं कर रहे होगे। इस्राएलियों ने केवल मेरी दया, प्रेमपूर्ण दयालुता और महानता को देखा था, और यहूदी केवल मेरे धीरज और छुटकारे के गवाह बने थे। उन्होंने मेरे आत्मा के कार्य का बहुत ही छोटा भाग देखा था; और यहाँ तक कि उन्होंने जो समझा था, वह तुम लोगों द्वारा देखी और सुनी गई बातों का केवल दस-हज़ारवाँ हिस्सा ही था। जो कुछ तुम लोगों ने देखा है, वह उससे भी बढ़कर है, जो उनके बीच के महायाजकों ने देखा है। आज तुम लोग जिन सत्यों को समझते हो, वह उनके द्वारा समझे गए सत्यों से बढ़कर है; जो कुछ तुम लोगों ने आज देखा है, वह उससे बढ़कर है जो व्यवस्था के युग में देखा गया था, साथ ही अनुग्रह के युग में भी, और जो कुछ तुम लोगों ने अनुभव किया है, वह उससे कहीं बढ़कर है जो मूसा और एलियाह ने अनुभव किया था। क्योंकि जो कुछ इस्राएलियों ने समझा था, वह केवल यहोवा की व्यवस्था थी, और जो कुछ उन्होंने देखा था, वह केवल यहोवा की पीठ की झलक थी; जो कुछ यहूदियों ने समझा था, वह केवल यीशु का छुटकारा था, जो कुछ उन्होंने प्राप्त किया था, वह केवल यीशु द्वारा दिया गया अनुग्रह था, और जो कुछ उन्होंने देखा था, वह केवल यहूदियों के घर के भीतर यीशु की छवि थी। आज तुम लोग जो देखते हो वह यहोवा की महिमा, यीशु का छुटकारा और वे सारे कर्म हैं जो मैं अब कर रहा हूँ। तुम लोग अपने कानों से मेरे आत्मा के वचनों को भी सुनते हो। और मेरी बुद्धि का अनुभव भी कर चुके हो, मेरी अद्भुतता को जान चुके हो और मेरे स्वभाव के बारे में जान चुके हो। मैंने तुम सब लोगों को अपनी पूरी प्रबंधन योजना भी बताई है। तुम लोगों ने मात्र एक प्रेममय और दयालु परमेश्वर ही नहीं, बल्कि धार्मिकता से भरा हुआ परमेश्वर देखा है। तुम मेरे कार्य की अद्भुतता देख चुके हो और यह जान गए हो कि मैं प्रताप और क्रोध से भरपूर हूँ; इतना ही नहीं, तुम लोग जानते हो कि मैंने एक बार इस्राएल के घराने पर अपना क्रोध बरसाया था और अब यह तुम लोगों पर आ गया है। तुम लोग मेरे स्वर्ग के रहस्यों को यशायाह और यूहन्ना की तुलना में अधिक समझते हो; पिछली पीढ़ियों के सभी संतों की अपेक्षा तुम लोग मेरी मनोहरता और पूजनीयता को कहीं ज्यादा जानते हो। तुम लोगों ने जो प्राप्त किया है वह केवल मेरा सत्य, मेरा मार्ग और मेरा जीवन नहीं है, बल्कि उनसे भी बड़े दर्शन और प्रकाशन हैं जो यूहन्ना ने प्राप्त किए थे। तुम लोग और भी बहुत सारे रहस्य समझते हो और तुम लोगों ने मेरे सच्चे मुखमंडल को भी देखा है; तुम लोगों ने मेरे न्याय को और अधिक स्वीकार किया है और तुम मेरे धार्मिक स्वभाव को और अधिक जानते हो। और इसलिए, यद्यपि तुम लोग अंत के दिनों में जन्मे थे, फिर भी तुम लोग पहले आ चुकी चीजों और अतीत की चीजों को समझते हो और तुम लोगों ने आज की चीजों का भी अनुभव किया है, जो व्यक्तिगत रूप से मेरे द्वारा की गई थीं। जो मैं तुम लोगों से माँगता हूँ वह अत्यधिक नहीं है, क्योंकि मैंने तुम लोगों को इतना ज़्यादा दिया है और तुम लोगों ने मुझमें इतना अधिक देखा है। इसलिए मैं तुम लोगों से अपेक्षा करता हूँ कि बीते युगों के संतों के सामने मेरी गवाही दो, और यह मेरे हृदय की एकमात्र इच्छा है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम आस्था के बारे में क्या जानते हो?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 465
अब क्या तुम सच में जानते हो कि तुम्हें मुझ पर क्यों विश्वास करना चाहिए? क्या तुम सच में मेरे कार्य के उद्देश्य और महत्व को जानते हो? क्या तुम सच में अपने कर्तव्य को जानते हो? क्या तुम सच में जानते हो कि मेरी गवाही क्या है? अगर तुम केवल मुझमें विश्वास करते हो, फिर भी तुममें मेरी महिमा या गवाही का लेशमात्र भी अंश नहीं है, तो मैंने तुम्हें बहुत पहले ही निकाल दिया है। जहाँ तक सब कुछ समझने वालों का सवाल है, वे और भी ज्यादा मेरी आँख के काँटे हैं और मेरे घर में वे मेरे रास्ते की अड़चनों से ज्यादा कुछ नहीं हैं। वे मेरे कार्य से पूरी तरह निकाल दिए जाने वाले खरपतवार हैं, वे बिल्कुल भी किसी काम के नहीं हैं, उनका कोई महत्व नहीं है और मैंने लंबे समय से उनसे घृणा की है। अक्सर मेरा क्रोध उन सभी पर टूटता है जिनके पास गवाही नहीं है और मेरी लाठी कभी उन पर से नहीं हटती। मैंने बहुत पहले ही उन्हें बुरे लोगों के हाथों में दे दिया है; वे मेरे आशीषों से पूरी तरह वंचित हैं। जब दिन आएगा, उनकी ताड़ना मूर्ख, जिद्दी स्त्रियों की ताड़ना से भी कहीं अधिक पीड़ादायक होगी। आज मैं केवल वही काम करता हूँ जो मेरा कर्तव्य है; मैं सारे गेहूँ को उन खरपतवार के साथ गठरियों में बाँधता हूँ। आज मेरा यही कार्य है। ओसाई के समय वह सारी खरपतवार मेरे द्वारा पछोरकर निकाल दी जाएगी, फिर गेहूँ के दानों को भंडार-गृह में इकट्ठा किया जाएगा और पछोरी गई उस खरपतवार को जलाकर राख कर देने के लिए आग में डाल दिया जाएगा। अब मेरा कार्य मात्र सभी लोगों को एक गठरी में बाँधना है, अर्थात् उन सभी को पूरी तरह से जीतना है। तब सभी लोगों के परिणामों का खुलासा करने के लिए मैं ओसाई शुरू करूँगा। इसलिए तुम्हें जानना चाहिए कि अब तुम मुझे कैसे संतुष्ट कर सकते हो और तुम्हें किस तरह मेरे प्रति आस्था में सही मार्ग पर आना चाहिए। अब मैं तुम्हारी निष्ठा और समर्पण, तुम्हारा प्रेम और गवाही चाहता हूँ। यहाँ तक कि अगर तुम इस समय नहीं जानते कि गवाही क्या होती है या प्रेम क्या होता है, तो तुम्हें अपना सब कुछ मेरे पास ले आना चाहिए और जो एकमात्र खजाना तुम्हारे पास है, यानी तुम्हारी निष्ठा और समर्पण मुझे सौंप देना चाहिए। तुम्हें जानना चाहिए कि मेरे द्वारा शैतान को हराए जाने की गवाही मनुष्य की निष्ठा और समर्पण में निहित है, साथ ही मनुष्य के ऊपर मेरी संपूर्ण विजय की गवाही भी। मुझ पर तुम्हारी आस्था का कर्तव्य है मेरे लिए गवाही देना, किसी अन्य के प्रति नहीं बल्कि मेरे प्रति वफादार होना और अंत तक समर्पित बने रहना। इससे पहले कि मैं अपने कार्य का अगला चरण आरंभ करूँ, तुम्हें मेरी गवाही कैसे देनी चाहिए? तुम्हें मेरे प्रति वफादार और समर्पित कैसे होना चाहिए? क्या तुम अपने कार्य के प्रति अपनी लगन दिखाओगे या उसे ऐसे ही छोड़ दोगे? क्या तुम मेरी हर व्यवस्था (चाहे वह मृत्यु हो या विनाश) के प्रति समर्पित होना चाहोगे, या मेरी ताड़ना से बचने के लिए बीच रास्ते से ही भाग जाओगे? मैं तुम्हें ताड़ना देता हूँ ताकि तुम मेरी गवाही दो, मेरे प्रति निष्ठावान और समर्पित बनो। यह भी कहा जा सकता है कि वर्तमान ताड़ना मेरे कार्य के अगले चरण को करने देने के लिए और भविष्य के कार्य को निर्बाध रूप से आगे बढ़ने देने के लिए है। अतः मैं तुम्हें प्रोत्साहित करता हूँ कि तुम बुद्धिमान हो जाओ और अपने जीवन या अस्तित्व के महत्व को बेकार रेत की तरह मत समझो। क्या तुम सही-सही जान सकते हो कि मेरा आने वाला काम क्या होगा? क्या तुम जानते हो कि आने वाले दिनों में मैं किस तरह काम करूँगा और मेरा कार्य कैसे पूरा किया जाएगा? तुम्हें मेरे कार्य का अनुभव करने का महत्व और इससे भी बढ़कर मुझमें विश्वास रखने का महत्व जानना चाहिए। मैंने इतना कुछ किया है—मैं उसे बीच में कैसे छोड़ सकता हूँ, जैसा कि तुम सोचते हो? मैंने इतनी बड़ी परियोजना शुरू की है—मैं उसे नष्ट कैसे कर सकता हूँ? यह सही है कि मैं इस युग को समाप्त करने आया हूँ, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात जो तुम्हें जाननी चाहिए कि मैं एक नए युग का आरंभ करने वाला हूँ, एक नया कार्य करने वाला हूँ, और इससे भी बढ़कर, राज्य के सुसमाचार को फैलाने वाला हूँ। अतः तुम्हें जानना चाहिए कि वर्तमान कार्य केवल एक युग का आरंभ करने तथा आने वाले समय में सुसमाचार फैलाने और भविष्य में इस युग को समाप्त करने के लिए नींव डालने का कार्य है। मेरा कार्य उतना सरल नहीं है जितना तुम सोचते हो, और न ही वैसा बेकार और निरर्थक है, जैसा तुम्हें लग सकता है। इसलिए मैं अब भी तुमसे कहूँगा : तुम्हें मेरे कार्य के लिए स्वयं को समर्पित करना चाहिए और इससे भी बढ़कर तुम्हें मेरी महिमा के लिए अपने आपको समर्पित करना चाहिए। मेरी लंबे समय से यह लालसा रही है कि तुम मेरी गवाही दो, और इससे भी बढ़कर मैंने लंबे समय से यह देखने के लिए प्रतीक्षा की है कि तुम मेरा सुसमाचार फैलाओ। तुम्हें यह समझना चाहिए कि मेरे हृदय में क्या है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम आस्था के बारे में क्या जानते हो?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 466
यद्यपि तुम लोगों की आस्था बहुत सच्ची है, फिर भी तुम लोगों में से कोई भी मेरी पूरी तरह व्याख्या नहीं कर सकता, कोई भी उन सारे तथ्यों की गवाही नहीं दे सकता जिन्हें तुम देखते हो। इस बारे में सोचो : आज तुममें से अधिकतर लोग उचित कार्यों पर ध्यान नहीं देते हैं, इसके बजाय देह का अनुसरण करते हैं, देह को तृप्त करते हैं और देह में लिप्त रहते हैं। तुम्हारे पास बहुत कम सत्य है। तो फिर तुम लोग उस सबकी गवाही कैसे दे सकते हो जो तुमने देखा है? क्या तुम लोग सचमुच आश्वस्त हो कि तुम मेरे गवाह बन सकते हो? अगर कोई ऐसा दिन आता है जब तुम उस सबकी गवाही नहीं दे पाओगे जो तुमने आज देखा है तो तुम सृजित प्राणी का प्रकार्य खो चुके होगे और तुम्हारे अस्तित्व का कतई कोई अर्थ नहीं होगा। तुम मनुष्य होने के लायक नहीं होगे। यहाँ तक कहा जा सकता है कि तुम मनुष्य नहीं होगे! मैंने तुम लोगों पर अथाह कार्य किया है, लेकिन चूँकि तुम अभी कुछ भी सीखने का प्रयास नहीं करते हो और हर चीज के प्रति अनजान रहते हो और व्यर्थ परिश्रम करते हो, जब मेरे कार्य को फैलाने का समय होगा, तब तुम बस भावशून्य दृष्टि से ताकोगे, तुम्हारे मुँह से आवाज नहीं निकलेगी और तुम बिल्कुल बेकार होगे। क्या तब तुम इतिहास में एक पापी के रूप में याद नहीं किए जाओगे? जब वह समय आएगा, तो क्या तुम्हें सबसे गहरा पछतावा नहीं होगा? क्या तुम उदासी में नहीं डूब जाओगे? आज मेरा सारा कार्य बेकारी और ऊब के कारण नहीं, बल्कि भविष्य के मेरे कार्य की नींव रखने के लिए किया जाता है। ऐसा नहीं है कि मेरे सामने गतिरोध है और मुझे कुछ नया करने की जरूरत है। मैं जो कार्य करता हूँ, उसे तुम्हें समझना चाहिए; यह गली में खेल रहे किसी बच्चे द्वारा की गई कोई चीज नहीं है, बल्कि मेरे पिता के प्रतिनिधित्व में किया जाने वाला कार्य है। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि यह सब मैं स्वयं नहीं कर रहा हूँ; बल्कि मैं अपने पिता का प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ। इस बीच, तुम लोगों की भूमिका बस अनुगमन करने, समर्पण करने, बदलने और गवाही देने की है। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि तुम लोगों को मुझमें विश्वास क्यों करना चाहिए; यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है जो तुम लोगों में से प्रत्येक को समझना चाहिए। मेरे पिता ने अपनी महिमा के वास्ते तुम सब लोगों को उसी क्षण से मेरे लिए पूर्व-निर्धारित कर दिया था, जिस क्षण उसने इस संसार की सृष्टि की थी। मेरे कार्य और अपनी महिमा के वास्ते उसने तुम लोगों को पूर्व-निर्धारित किया था। यह मेरे पिता के कारण ही है कि तुम लोग मुझमें विश्वास करते हो; यह मेरे पिता द्वारा पूर्व-निर्धारित करने के कारण ही है कि तुम मेरा अनुसरण करते हो। इसमें से कुछ भी तुम लोगों का अपना चुनाव नहीं है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि तुम लोग यह समझो कि तुम लोग वही हो, जिन्हें मेरे लिए गवाही देने के उद्देश्य से मेरे पिता ने मुझे प्रदान किया था। चूँकि उसने तुम लोगों को मुझे दिया था, इसलिए तुम लोगों को उन मार्गों का पालन करना चाहिए, जो मैं तुम लोगों को प्रदान करता हूँ, साथ ही उन मार्गों और वचनों का भी, जो मैं तुम लोगों को सिखाता हूँ, क्योंकि मेरे मार्गों का पालन करना तुम लोगों का कर्तव्य है और यही मुझमें तुम लोगों की आस्था का मूल उद्देश्य है। इसलिए मैं तुम लोगों से कहता हूँ : तुम लोग बस मेरे पिता द्वारा मेरे मार्गों का पालन करने के लिए मुझे प्रदान किए गए लोग हो। यूँ तो तुम लोग सिर्फ मुझमें विश्वास करते हो, लेकिन तुम मेरे नहीं हो, क्योंकि तुम लोग इस्राएली परिवार के नहीं हो, और इसके बजाय प्राचीन साँप की किस्म के हो। मैं तुम लोगों से सिर्फ इतना करने के लिए कह रहा हूँ कि मेरे लिए गवाही दो, लेकिन आज तुम लोगों को मेरे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। यह सब भविष्य की गवाही के वास्ते है। अगर तुम लोग केवल मेरे वचन सुनते हो तो वह बेकार है और मेरे पिता द्वारा तुम लोगों को मुझे प्रदान किए जाने का महत्त्व खो जाएगा। मैं तुम लोगों को जो अभी भी बताना चाहता हूँ वह यह है : तुम लोगों को मेरे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 467
पवित्र आत्मा वर्तमान समय में कलीसिया के भीतर किस प्रकार से कार्य कर रहा है? क्या तुम्हें इस प्रश्न की कोई ठोस समझ है? तुम्हारे भाइयों और बहनों की सबसे बड़ी कठिनाइयाँ क्या हैं? उनमें सबसे अधिक किस चीज की कमी है? वर्तमान में, कुछ लोग परीक्षणों से गुजरते हुए नकारात्मक होते हैं और कुछ शिकायत तक करते हैं। अन्य लोग अब आगे नहीं बढ़ रहे हैं, क्योंकि परमेश्वर ने बोलना समाप्त कर दिया है। लोगों ने परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश नहीं किया है। वे स्वतंत्र रूप से नहीं जी सकते, और वे अपना आध्यात्मिक जीवन नहीं बनाए रख सकते। कुछ लोग साथ-साथ पीछे चलते हैं और अनुसरण करने की प्रेरणा रखते हैं, और जब परमेश्वर बोलता है तब अभ्यास करने के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन जब परमेश्वर नहीं बोलता, तो वे और आगे नहीं बढ़ते। लोगों ने अभी भी परमेश्वर के इरादों को अपने दिल में नहीं समझा है और उनमें परमेश्वर के लिए स्वतःस्फूर्त प्रेम नहीं है; अतीत में उन्होंने परमेश्वर का अनुसरण इसलिए किया था, क्योंकि वे मजबूर थे। अब कुछ लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर के कार्य से ऊब चुके हैं। क्या ऐसे लोग खतरे में नहीं हैं? बहुत सारे लोग सिर्फ निभाने की स्थिति में रहते हैं। यूँ तो वे परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हैं और उससे प्रार्थना करते हैं, पर वे ऐसा आधे-अधूरे मन से करते हैं, और उनमें अब वह पहले जैसी अंतःप्रेरणा नहीं रह गई है। अधिकतर लोग शोधन और पूर्ण बनाने के परमेश्वर के कार्य में रुचि नहीं रखते, और ऐसा लगता है मानो वे लगातार किसी अंतःप्रेरणा से रहित हों। जब वे अपराधों के वशीभूत हो जाते हैं, तो वे परमेश्वर के प्रति ऋणी महसूस नहीं करते हैं, न ही उनमें पश्चात्ताप महसूस करने की जागरूकता होती है। वे सत्य नहीं खोजते हैं, न ही कलीसिया को छोड़ते हैं, बल्कि केवल क्षणिक सुखों का अनुसरण करते हैं। ये लोग सबसे बड़े मूर्ख हैं! जब समय आएगा तो इन सभी को त्याग दिया जाएगा! एक भी व्यक्ति नहीं बचाया जाएगा! क्या तुम्हें लगता है कि यदि किसी को एक बार बचाया गया है, तो उसे हमेशा बचाया जाएगा? यह विश्वास शुद्ध धोखा है! जो लोग जीवन प्रवेश का अनुसरण नहीं करते, उन सभी को ताड़ना दी जाएगी। अधिकतर लोगों को जीवन प्रवेश में, दर्शनों में या सत्य का अभ्यास करने में बिल्कुल भी रुचि नहीं है। वे प्रवेश का अनुसरण नहीं करते, ज्यादा गहरी प्रगति की तो बात ही छोड़ दो। क्या वे स्वयं को बरबाद नहीं कर रहे हैं? अभी कुछ लोग हैं, जिनकी स्थितियाँ लगातार बेहतर हो रही हैं। पवित्र आत्मा जितना अधिक कार्य करता है, उतनी ही अधिक आस्था वे प्राप्त करते हैं, और जितना अधिक वे अनुभव करते हैं, उतना ही अधिक उन्हें लगता है कि परमेश्वर का कार्य बहुत रहस्यपूर्ण है। वे जितने गहरे प्रवेश करते हैं, उतना ही अधिक वे समझते हैं। वे अनुभव करते हैं कि परमेश्वर का प्रेम बहुत ही महान है, और वे आंतरिक स्थिरता और स्पष्टता महसूस करते हैं। उन्हें परमेश्वर के कार्य की समझ है। ये ही वे लोग हैं, जिनमें पवित्र आत्मा कार्य कर रहा है। कुछ लोग कहते हैं : “यद्यपि परमेश्वर की ओर से कोई नए वचन नहीं हैं, फिर भी मुझे सत्य में और गहरे जाने का प्रयास करना चाहिए, मुझे अपने वास्तविक अनुभव में हर चीज के बारे में गंभीर होना चाहिए और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए।” इस तरह के व्यक्ति में पवित्र आत्मा का कार्य होता है। यद्यपि परमेश्वर अपना चेहरा नहीं दिखाता और हर एक व्यक्ति से छिपा रहता है, और यद्यपि वह बोलता नहीं और अपनी आवाज नहीं निकालता और कई बार लोग कुछ आंतरिक शोधन का अनुभव करते हैं, फिर भी परमेश्वर ने लोगों को पूरी तरह से नहीं छोड़ा है। यदि कोई व्यक्ति उस सत्य को बरकरार नहीं रख सकता, जिसका उसे अभ्यास करना चाहिए, तो उसके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। शोधन की अवधि के दौरान, परमेश्वर के स्वयं को न दिखाने के दौरान, यदि तुम आस्था नहीं रखते हो, बल्कि पीछे हट जाते हो, यदि तुम उसके वचनों का अनुभव करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हो, तो तुम परमेश्वर के कार्य से भाग रहे हो। बाद में, तुम उन लोगों में से एक होगे, जिन्हें त्याग दिया जाता है। जो लोग परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने का प्रयास नहीं करते, वे उसके प्रति अपनी गवाही में अडिग रह नहीं सकते हैं। जो लोग परमेश्वर की गवाही देने और उसके इरादे पूरे करने में सक्षम हैं, वे सभी पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों का अनुसरण करने की अपनी अंतःप्रेरणा पर निर्भर हैं। परमेश्वर द्वारा लोगों पर किया जाने वाला कार्य मुख्य रूप से उन्हें सत्य प्राप्त करवाने के लिए है, तुमसे जीवन का अनुसरण करवाना तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए है, और यह सब तुम्हें परमेश्वर के उपयोग के लायक बनाने के लिए है। अभी तुम जो कुछ अनुसरण कर रहे हो, वह बस रहस्यों को सुनना, परमेश्वर के वचनों को सुनना, अपनी आँखों को आनंदित करना और आसपास यह देखना है कि नया क्या है या क्या चल रहा है, और उससे अपनी जिज्ञासा संतुष्ट करना है। यदि यही इरादा तुम्हारे दिल में है, तो तुम्हारे पास परमेश्वर की आवश्यकताएँ पूरी करने का कोई रास्ता नहीं है। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे अंत तक अनुसरण नहीं कर सकते। अभी, ऐसा नहीं है कि परमेश्वर कुछ नहीं कर रहा है, बल्कि लोग उसके साथ सहयोग नहीं कर रहे। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे उसके कार्य से विमुख हैं और केवल उसके आशीषों के वचन सुनना चाहते हैं, जबकि उसके न्याय और ताड़ना के वचन सुनने के अनिच्छुक हैं। इसका क्या कारण है? इसका कारण यह है कि लोगों की आशीष प्राप्त करने की इच्छा पूरी नहीं हुई है और इसलिए वे नकारात्मक और कमजोर हो गए हैं। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर जानबूझकर लोगों को अपना अनुसरण नहीं करने देता, और न ऐसा है कि वह उन पर जानबूझकर आघात कर रहा है। लोग नकारात्मक और कमजोर केवल इसलिए हैं, क्योंकि उनके इरादे गलत हैं। परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मनुष्य को जीवन देता है और वह मनुष्य को मृत्यु में नहीं ला सकता है। लोगों की नकारात्मकता, कमजोरी, और पीछे हटना सब उनकी अपनी करनी के नतीजे हैं।
परमेश्वर का वर्तमान कार्य लोगों में कुछ शोधन लाता है, और जो शोधन के बीच अडिग रह सकते हैं, वे ही परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करेंगे। चाहे वह खुद को कैसे भी छिपाए, चाहे न बोलकर या कार्य न करके, यदि तुम फिर भी अनुसरण करते रह सकते हो और यदि तुम तब भी उसका अनुसरण कर सकते हो जब वह कहे कि वह तुम्हें नहीं चाहता है, तो यह परमेश्वर के प्रति अपनी गवाही में अडिग रहना है। यदि परमेश्वर स्वयं को तुमसे छिपाता है और तुम उसका अनुसरण करना बंद कर देते हो, तो क्या यह परमेश्वर की गवाही में अडिग रहना है? यदि लोगों के पास वास्तविक प्रवेश नहीं है, तो उनके पास असली आध्यात्मिक कद नहीं है, और जब वे वास्तव में किसी महान परीक्षण का सामना करते हैं, तो वे लड़खड़ा जाते हैं। अब जबकि परमेश्वर बोल नहीं रहा या परमेश्वर तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप क्रियाकलाप नहीं कर रहा, तो तुम टूट जाते हो; यदि परमेश्वर वर्तमान में तुम्हारी धारणाओं के अनुसार क्रियाकलाप कर रहा होता और तुम्हारी इच्छा पूरी कर रहा होता, तो तुम खड़े हो पाते और तुममें अनुसरण करने की प्रेरणा होती। तो फिर वह नींव वास्तव में क्या है जिस पर तुम जीते हो? मैं कहता हूँ कि बहुत लोग उस ढंग से जी रहे हैं, जो पूरी तरह से मानव-जिज्ञासा पर आधारित है। उनमें वास्तव में अनुसरण करने की इच्छा बिल्कुल नहीं है। जो लोग सत्य में प्रवेश का प्रयास नहीं करते, बल्कि जीवन में अपनी जिज्ञासा पर निर्भर करते हैं, वे सब अधम लोग हैं और वे खतरे में हैं! परमेश्वर के विभिन्न प्रकार के सभी कार्य मानवजाति को पूर्ण बनाने के लिए हैं। हालाँकि, लोग हमेशा उत्सुक होते हैं; वे हमेशा सुनी-सुनाई बातों के बारे में पूछताछ करना चाहते हैं; वे हमेशा विदेशों के वर्तमान मामलों के बारे में चिंतित होते हैं—उदाहरण के लिए, इस्राएल में क्या हो रहा है, या क्या मिस्र में भूकंप आया है। अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाएँ पूरी करने के लिए वे हमेशा कुछ नई, अजीब-सी चीजों की तलाश करते रहते हैं। वे जीवन का अनुसरण नहीं करते, न ही वे पूर्ण बनाए जाने का प्रयास करते हैं। वे केवल परमेश्वर के दिन के शीघ्र आगमन की चाह रखते हैं, ताकि उनका सुंदर सपना पूरा हो जाए और उनकी असंयमित इच्छाएँ पूरी हो सकें। इस प्रकार का व्यक्ति व्यावहारिक नहीं होता—वह एक अनुचित परिप्रेक्ष्य वाला व्यक्ति होता है। केवल सत्य की तलाश ही परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास की नींव है, और यदि लोग जीवन प्रवेश का प्रयास नहीं करते, यदि वे परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करते, तो वे दंड के भागी होंगे। जिन्हें दंडित किया जाना है, वे ऐसे लोग हैं, जिन पर परमेश्वर के कार्य के समय के दौरान पवित्र आत्मा का कार्य नहीं हुआ था।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी कायम रखनी चाहिए
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 468
परमेश्वर के कार्य के इस चरण के दौरान लोगों को उसके साथ कैसे सहयोग करना चाहिए? परमेश्वर वर्तमान में लोगों का परीक्षण कर रहा है। वह एक वचन भी नहीं कह रहा। वह स्वयं को छिपा रहा है और लोगों से सीधे संपर्क नहीं कर रहा है। बाहर से ऐसा लगता है, मानो वह कोई कार्य नहीं कर रहा, लेकिन सच्चाई यह है कि वह अभी भी मनुष्य के भीतर कार्य कर रहा है। जीवन प्रवेश का प्रयास करने वाले हर किसी के पास अपने जीवन की खोज के लिए एक दर्शन होता है, और उसे संदेह नहीं होता, भले ही वह परमेश्वर के कार्य को पूरी तरह से न समझता हो। परीक्षणों से गुजरते हुए, यहाँ तक कि जब तुम नहीं जानते कि परमेश्वर क्या करना चाहता है और वह क्या कार्य निष्पादित करना चाहता है, तब भी तुम्हें पता होना चाहिए कि मानवजाति के लिए परमेश्वर के विचार हमेशा अच्छे होते हैं। यदि तुम सच्चे दिल से उसका अनुसरण करते हो, तो वह तुम्हें कभी नहीं छोड़ेगा, और अंत में वह निश्चित रूप से तुम्हें पूर्ण बनाएगा, और लोगों को एक उचित मंजिल तक ले जाएगा। चाहे परमेश्वर वर्तमान में लोगों का कैसे भी परीक्षण कर रहा हो, एक दिन ऐसा आएगा जब वह लोगों को उचित परिणाम प्रदान करेगा और उनके द्वारा किए गए कार्य के आधार पर उन्हें उचित प्रतिफल देगा। परमेश्वर लोगों को एक निश्चित बिंदु तक ले जाकर एक तरफ फेंक नहीं देगा और उन्हें अनदेखा नहीं करेगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर वफादार है। इस चरण में पवित्र आत्मा शोधन का कार्य कर रहा है। वह हर एक व्यक्ति का शोधन कर रहा है। मृत्यु और ताड़ना के परीक्षणों से युक्त कार्य के चरणों में शोधन वचनों के माध्यम से किया गया था। लोगों को परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के लिए सबसे पहले उसके वर्तमान कार्य को समझना चाहिए और यह भी कि लोगों को कैसे सहयोग करना चाहिए। यह ऐसी चीज है, जिसे हर किसी को समझना चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर क्या करता है, चाहे वह लोगों का शोधन कर रहा हो या बोल न रहा हो, परमेश्वर के कार्य का एक भी चरण मानवजाति की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता। उसके कार्य का प्रत्येक चरण लोगों की धारणाओं को चकनाचूर कर और तोड़ देता है। यह उसका कार्य है। लेकिन तुम्हें विश्वास करना चाहिए कि अब परमेश्वर का कार्य एक निश्चित चरण में पहुँच गया है, इसलिए चाहे जो हो जाए, वह सारी मानवजाति को मौत के घाट नहीं उतारेगा। वह मानवजाति को वादे और आशीष दोनों देता है, और वे सभी जो उसका अनुसरण करते हैं, उसके आशीष प्राप्त करने में सक्षम होंगे, लेकिन जो अनुसरण नहीं करते, वे परमेश्वर द्वारा निकाल दिए जाएँगे। यह तुम्हारे अनुसरण पर निर्भर करता है। चाहे कुछ भी हो, तुम्हें विश्वास करना चाहिए कि जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा, तो हर एक व्यक्ति की उचित मंजिल होगी। परमेश्वर ने मनुष्यों को सुंदर आकांक्षाएँ प्रदान की हैं, लेकिन अनुसरण के बिना वे अप्राप्य हैं। तुम्हें अब इसे देखने में सक्षम होना चाहिए—परमेश्वर द्वारा लोगों का शोधन और ताड़ना उसका कार्य है, लेकिन लोगों को अपनी तरफ से हर समय अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने की कोशिश करनी चाहिए। अपने वास्तविक अनुभवों में तुम्हें पहले जानना चाहिए कि परमेश्वर के वचनों को कैसे खाएँ और पीएँ; तुम्हें उसके वचनों में यह ढूँढ़ना चाहिए कि तुम्हें किस चीज में प्रवेश करना चाहिए और तुम्हारी कमियाँ क्या हैं; तुम्हें अपने वास्तविक अनुभवों का ध्यान रखते हुए प्रवेश करना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों के उस भाग को लेना चाहिए, जिसे अभ्यास में लाया जाना चाहिए, और वैसा करने का प्रयास करना चाहिए। परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना एक पहलू है। उसके अतिरिक्त, कलीसिया का जीवन बनाए रखा जाना चाहिए, तुम्हें एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीना चाहिए, और तुम्हें अपनी सभी वर्तमान अवस्थाओं को परमेश्वर को सौंपने में सक्षम होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि उसका कार्य कैसे बदलता है, तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन सामान्य रहना चाहिए। आध्यात्मिक जीवन तुम्हारे सामान्य प्रवेश को बनाए रख सकता है। परमेश्वर चाहे कुछ भी करे, तुम्हें अपना आध्यात्मिक जीवन निर्बाध जारी रखना और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। यही काम है, जो लोगों को करना चाहिए। यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है, लेकिन सामान्य स्थिति वाले लोगों के लिए यह पूर्ण बनाया जाना है, जबकि एक असामान्य स्थिति वाले लोगों के लिए यह एक परीक्षण है। पवित्र आत्मा के शोधन के कार्य के वर्तमान चरण में, कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर का कार्य बहुत महान है और कि लोगों को पूरी तरह से शोधन की आवश्यकता है, अन्यथा उनका अध्यात्मिक कद बहुत छोटा होगा और उनके पास परमेश्वर के इरादे पूरे करने का कोई उपाय नहीं होगा। हालाँकि, जिन लोगों की स्थिति अच्छी नहीं है, उनके लिए यह परमेश्वर का अनुसरण न करने और सभाओं में भाग न लेने या परमेश्वर के वचन को न खाने-पीने का एक कारण बन जाता है। परमेश्वर के कार्य में, चाहे वह कुछ भी करे या कोई भी बदलाव लाए, लोगों को कम से कम सामान्य आध्यात्मिक जीवन अवश्य बनाए रखना चाहिए। शायद तुम अपने आध्यात्मिक जीवन के इस वर्तमान चरण में शिथिल नहीं हुए हो, लेकिन तुमने अभी भी बहुत-कुछ प्राप्त नहीं किया है, और बहुत अच्छी फसल नहीं काटी है। इस तरह की परिस्थितियों में, भले ही तुम अपने आध्यात्मिक जीवन को ऐसे थामे रहते हो मानो किसी विनियम का पालन कर रहे हो, तब भी तुम्हें इसे थामे ही रखना चाहिए; तुम्हें इस विनियम के अनुसार चलना ही होगा, ताकि तुम अपने जीवन में नुकसान न झेलो और ताकि तुम परमेश्वर के इरादे पूरे करो। यदि तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन असामान्य है, तो तुम परमेश्वर का वर्तमान कार्य स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते; बल्कि हमेशा महसूस करते हो कि यह पूरी तरह से तुम्हारी धारणाओं से बेमेल है और यद्यपि तुम उसका अनुसरण करने के इच्छुक होते हो, लेकिन तुममें अंतःप्रेरणा का अभाव होता है। तो भले ही परमेश्वर वर्तमान में कुछ भी कर रहा हो, लोगों को सहयोग अवश्य करना चाहिए। यदि लोग सहयोग नहीं करते, तो पवित्र आत्मा अपना कार्य नहीं कर सकता, और यदि लोगों के पास सहयोग करने वाला दिल नहीं है, तो वे शायद ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हैं। यदि तुम अपने अंदर पवित्र आत्मा का कार्य चाहते हो, और यदि तुम परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के सम्मुख अपनी मूल वफादारी बनाए रखनी चाहिए। अब, तुम्हारे पास गहन समझ, उच्च सिद्धांत, या ऐसी अन्य चीजों का होना आवश्यक नहीं है—बस इतना ही आवश्यक है कि तुम परमेश्वर के वचन को मूल आधार पर बनाए रखो। यदि लोग परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं करते और गहरे प्रवेश की कोशिश नहीं करते, तो परमेश्वर उन चीजों को छीन लेगा, जो मूलतः उनकी थीं। अंदर से लोग हमेशा आराम के लोभी होते हैं और उसका आनंद लेते हैं, जो पहले से ही उपलब्ध होता है। वे बिना कोई भी कीमत चुकाए परमेश्वर के वादे प्राप्त करना चाहते हैं। ये ऐसे असंयमित विचार हैं जो मनुष्य रखता है। बिना कोई कीमत चुकाए स्वयं जीवन प्राप्त करना—पर क्या कभी कुछ भी इतना आसान रहा है? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास करता है और जीवन प्रवेश का अनुसरण करता है और अपने स्वभाव में बदलाव का अनुसरण करता है, तो उसे उसकी कीमत अवश्य चुकानी चाहिए और वह दशा प्राप्त करनी चाहिए जहाँ वह हमेशा परमेश्वर का अनुसरण करेगा, फिर चाहे परमेश्वर कुछ भी करे। यह ऐसी चीज है जो लोगों को अवश्य करनी चाहिए। भले ही तुम एक विनियम के रूप में इस सबका पालन करो, तो भी तुम्हें हमेशा इसका पालन करना चाहिए और चाहे परीक्षण कितने भी बड़े हों, तुम परमेश्वर के साथ अपने सामान्य संबंध को छोड़ नहीं सकते हो। तुम्हें प्रार्थना करने, अपने कलीसिया-जीवन को बनाए रखने, और अपने भाइयों और बहनों को कभी न छोड़ने में सक्षम होना चाहिए। जब परमेश्वर तुम्हारा परीक्षण करे, तब भी तुम्हें सत्य खोजना चाहिए। एक आध्यात्मिक जीवन के लिए यह न्यूनतम अपेक्षा है। हमेशा खोज करने की इच्छा रखना, सहयोग करने का भरसक प्रयास करना, अपनी समस्त ऊर्जा लगा देना—क्या यह किया जा सकता है? यदि लोग इसे आधार के रूप में लें, तो वे आसानी से भेद पहचानने की क्षमता और वास्तविकता में प्रवेश हासिल कर लेंगे। तुम्हारी अपनी दशा सामान्य होने पर परमेश्वर का वचन स्वीकार करना आसान होता है; इन परिस्थितियों में सत्य का अभ्यास करना मुश्किल नहीं लगता, और तुम्हें लगता है कि परमेश्वर का कार्य महान है। लेकिन यदि तुम्हारी हालत खराब है, तो परमेश्वर का कार्य कितना भी महान क्यों न हो, और चाहे कोई कितनी भी खूबसूरती से क्यों न बोलता हो, तुम उस पर कोई ध्यान नहीं दोगे। जब किसी व्यक्ति की स्थिति असामान्य होती है, तो परमेश्वर उसमें कार्य नहीं कर सकता है और वह अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं ला सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी कायम रखनी चाहिए
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 469
यदि लोगों में कोई आस्था नहीं है, तो उनके लिए इस मार्ग पर चलते रहना आसान नहीं है। अब हर कोई देख सकता है कि परमेश्वर का कार्य लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप जरा-सा भी नहीं है। परमेश्वर ने इतना अधिक कार्य किया है और इतने सारे वचनों को कहा है, और भले ही लोग मानें कि वे सत्य हैं, पर परमेश्वर के बारे में धारणाएँ अभी भी पैदा हो सकती हैं। अगर लोग सत्य को समझना और पाना चाहते हैं, तो उनमें आस्था और इच्छाशक्ति होनी चाहिए और वे उस चीज पर टिके रहने में सक्षम होने चाहिए जिसे वे पहले ही देख चुके हैं और अपने अनुभवों से प्राप्त कर चुके हैं। चाहे परमेश्वर लोगों के साथ कुछ भी करे, उन्हें वह बनाए रखना चाहिए जो उनके पास है, उन्हें परमेश्वर के सामने सच्चे दिल का होना चाहिए और उसके प्रति बिल्कुल अंत तक वफादार रहना चाहिए। यह मनुष्य का कर्तव्य है। लोगों को जो करना चाहिए, उसे उन्हें बनाए रखना चाहिए। परमेश्वर पर विश्वास के लिए उसके प्रति समर्पण करना और उसके कार्य का अनुभव करना आवश्यक है। परमेश्वर ने इतना अधिक कार्य किया है—कहा जा सकता है कि लोगों के लिए यह सब पूर्ण बनाना, शोधन और इससे भी बढ़कर, ताड़ना है। परमेश्वर के कार्य का एक भी चरण ऐसा नहीं रहा है, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप रहा हो; लोगों ने जिस चीज का आनंद लिया है, वह है परमेश्वर के कठोर वचन। जब परमेश्वर आता है, तो लोगों को उसके प्रताप और उसके कोप का आनंद लेना चाहिए। लेकिन उसके वचन चाहे कितने ही कठोर क्यों न हों, वह मनुष्य को बचाने और पूर्ण बनाने के लिए आता है। सृजित प्राणियों के रूप में लोगों को वे कर्तव्य पूरे करने चाहिए, जो उनसे अपेक्षित हैं, और शोधन के बीच परमेश्वर के प्रति अपनी गवाही में अडिग रहना चाहिए। हर परीक्षण में उन्हें उस गवाही पर कायम रहना चाहिए जो कि उन्हें देनी चाहिए और परमेश्वर के लिए गूँजती हुई गवाही देनी चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति विजेता होता है। परमेश्वर चाहे तुम्हारा कैसे भी शोधन करे, तुम्हें आस्था से भरा रहना चाहिए और उसमें कभी आस्था नहीं खोनी चाहिए और तुम्हें वह भी करना चाहिए जो मनुष्य को करना चाहिए। परमेश्वर मनुष्य से बस यही अपेक्षा करता है—वह अपेक्षा करता है कि मनुष्य का हृदय पूरी तरह से उसकी ओर लौट सके और हर पल उसकी ओर मुड़ सके। ऐसा व्यक्ति विजेता होता है। जिन्हें परमेश्वर “विजेता” कहता है, वे ऐसे लोग हैं जो शैतान के प्रभाव में और शैतान द्वारा घेरे जाने के दौरान—अर्थात्, जब वे अंधकार की शक्तियों के बीच होते हैं, तब भी अपनी गवाही में अडिग रह सकते हैं, अपनी आस्था और परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी बनाए रख सकते हैं और चाहे कुछ भी हो, परमेश्वर के सामने एक शुद्ध हृदय बनाए रख सकते हैं और परमेश्वर के प्रति अपना सच्चा प्रेम बनाए रख सकते हैं। इस तरह, वे परमेश्वर के सामने अपनी गवाही में अडिग रहे हैं। ऐसे लोग वे हैं जिन्हें परमेश्वर “विजेता” कहता है। यदि परमेश्वर द्वारा तुम्हें आशीष दिए जाने पर तुम्हारा अनुसरण उत्कृष्ट होता है, लेकिन उसके आशीष न मिलने पर तुम पीछे हट जाते हो, तो क्या यह शुद्धता है? चूँकि तुम निश्चित हो कि यह मार्ग सच्चा है, इसलिए तुम्हें अंत तक इसका अनुसरण करना चाहिए; तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी कायम रखनी चाहिए। चूँकि तुमने देखा है कि परमेश्वर तुम्हें स्वयं पूर्ण बनाने के लिए पृथ्वी पर आया है, इसलिए तुम्हें अपना दिल पूरी तरह से उसे दे देना चाहिए। चाहे परमेश्वर कुछ भी करे—भले ही अंत में तुम्हें प्रतिकूल परिणाम ही क्यों न दे—यदि तुम फिर भी उसका अनुसरण कर सकते हो, तो इसका मतलब है कि तुमने परमेश्वर के सामने अपनी शुद्धता बनाए रखी है। परमेश्वर को एक पवित्र आध्यात्मिक शरीर और एक शुद्ध कुँवारी की भेंट, जिसके बारे में कहा गया है, इसका मतलब है परमेश्वर के सामने एक निष्कपट दिल रखना। मनुष्य की निष्कपटता ही शुद्धता है और जो परमेश्वर के प्रति निष्कपट हो सकते हैं, उन्होंने शुद्धता बनाए रखी है। यही वह चीज है, जिसे तुम्हें अभ्यास में लाना चाहिए। जब तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए, तब तुम प्रार्थना करो; जब तुम्हें संगति में एक-साथ इकट्ठे होना चाहिए, तो तुम इकट्ठे हो जाओ; जब तुम्हें भजन गाने चाहिए, तो तुम भजन गाओ; और जब तुम्हें देह के खिलाफ विद्रोह करना चाहिए, तो तुम देह के खिलाफ विद्रोह करो। जब तुम अपना कर्तव्य करते हो तो तुम लापरवाह नहीं रहते; जब तुम्हें परीक्षणों का सामना करना पड़ता है तो तुम मजबूती से खड़े रहते हो। यह परमेश्वर के प्रति वफादारी है। लोगों को जो करना चाहिए, यदि तुम वह बनाए नहीं रखते, तो तुम्हारी पिछली सभी पीड़ाएँ और संकल्प व्यर्थ रहे हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी कायम रखनी चाहिए
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 470
परमेश्वर के कार्य के हर चरण के लिए एक तरीका है, जिसमें लोगों को सहयोग करना चाहिए। परमेश्वर लोगों का शोधन करता है, ताकि शोधनों से गुज़रने पर उनमें आस्था रहे। परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, ताकि उनमें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की आस्था हो और वे उसके शोधन को स्वीकार करने और उसके द्वारा काट-छाँट किए जाने के लिए तैयार हो जाएँ। परमेश्वर का आत्मा लोगों में प्रबुद्धता और रोशनी लाने और उनसे परमेश्वर के साथ सहयोग करवाने और अभ्यास करवाने के लिए उनके भीतर कार्य करता है। शोधन के दौरान परमेश्वर बोलता नहीं या अपनी आवाज नहीं निकालता, फिर भी, ऐसा कार्य है जिसे लोगों को करना चाहिए। तुम्हें वह बनाए रखना चाहिए जो तुम्हारे पास पहले से है, और तुम्हें फिर भी परमेश्वर से प्रार्थना करने, परमेश्वर के निकट होने और परमेश्वर के सामने अपनी गवाही में अडिग रहने में सक्षम होना चाहिए; इस तरह तुम अपना कर्तव्य पूरा करोगे। तुम सभी ने परमेश्वर के कार्य से यह स्पष्ट रूप से देख लिया है कि लोगों की आस्था और प्रेम के उसके परीक्षण यह अपेक्षा करते हैं कि वे परमेश्वर से अधिक प्रार्थना करें, और कि वे परमेश्वर के सामने उसके वचनों का अधिक बार स्वाद लें। यदि परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध करता है और तुम्हें अपने इरादे समझाता है, लेकिन फिर भी तुम अभ्यास बिल्कुल नहीं करते, तो तुम कुछ भी प्राप्त नहीं करोगे। जब तुम उसके वचनों का अभ्यास करते हो तब भी तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करने में सक्षम होना चाहिए, जब तुम उसके वचनों का आनंद लेते हो तब तुम्हें हमेशा परमेश्वर के सामने खोज करनी चाहिए और तुम्हें उसमें आस्था से भरा होना चाहिए, हताश या उदासीन नहीं होना चाहिए। जो लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं लाते, वे सभाओं के दौरान तो ऊर्जा से भरे होते हैं, लेकिन घर लौटकर अंधकार में गिर जाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो एक साथ इकट्ठे भी नहीं होना चाहते। इसलिए तुम्हें स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि वह कौन-सा कर्तव्य है, जिसे लोगों को निभाना चाहिए। हो सकता है तुम न जानते हो कि परमेश्वर के इरादे वास्तव में क्या हैं, लेकिन तुम्हें अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए, जब तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए तब तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए और जब तुम्हें सत्य को अभ्यास में लाना चाहिए तब तुम्हें सत्य को अभ्यास में लाना चाहिए। यदि तुम वह सब करते हो जो लोगों को करना चाहिए और अपना मूल दर्शन बनाए रखते हो, तो तुम परमेश्वर के कार्य का अगला कदम स्वीकार करने में अधिक सक्षम होगे। जब परमेश्वर छिपे तरीके से कार्य करता है, तब यदि तुम अनुसरण नहीं करते तो यह एक समस्या है। जब वह सभाओं के दौरान बोलता और उपदेश देता है, तो तुम उत्साह से सुनते हो, लेकिन जब वह नहीं बोलता, तो तुममें ऊर्जा की कमी हो जाती है और तुम पीछे हट जाते हो। ऐसा किस तरह का व्यक्ति करता है? वह ऐसा व्यक्ति है जो सिर्फ झुंड के पीछे चलता है। उसका कोई रुख नहीं होता है, कोई गवाही नहीं होती और कोई दर्शन नहीं होता! ज्यादातर लोग ऐसे ही होते हैं। यदि तुम इस तरह से जारी रखते हो, तो एक दिन जब तुम पर कोई महान परीक्षण आएगा, तो तुम्हें सजा भोगनी पड़ जाएगी। परमेश्वर द्वारा लोगों को पूर्ण बनाने की प्रक्रिया में किसी रुख का होना सबसे महत्वपूर्ण है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य के एक कदम पर भी शक नहीं करते, यदि तुम मनुष्य का कर्तव्य पूरा करते हो, तुम सच्चे दिल से उस चीज को कायम रखते हो जिसका परमेश्वर ने तुमसे अभ्यास करवाया है—अर्थात् यदि तुम परमेश्वर की नसीहतों को याद रखते हो और वह चाहे वर्तमान में जो भी करता हो, तुम उसकी नसीहतों को भूलते नहीं हो, उसके कार्य को लेकर कोई संदेह नहीं रखते हो, अपना रुख कायम रखते हो, अपनी गवाही बनाए रखते हो, और मार्ग के हर चरण में विजय प्राप्त करते हो—तो अंत में तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण कर दिए जाओगे और एक विजेता बना दिए जाओगे। यदि तुम परमेश्वर के परीक्षणों के हर चरण में दृढ़तापूर्वक खड़े रहने में सक्षम हो, और तुम अभी भी बिल्कुल अंत तक दृढ़तापूर्वक खड़े रह सकते हो, तो तुम एक विजेता हो, और तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है। यदि तुम अपने वर्तमान परीक्षणों में दृढ़तापूर्वक खड़े नहीं रह सकते, तो भविष्य में यह और भी अधिक मुश्किल हो जाएगा। यदि तुम केवल मामूली पीड़ा से ही गुजरते हो और सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो अंततः तुम्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। तुम खाली हाथ रह जाओगे। कुछ लोग जब यह देखते हैं कि परमेश्वर बोल नहीं रहा, तो वे अपना अनुसरण छोड़ देते हैं और उनका दिल बिखर जाता है। क्या ऐसा व्यक्ति मूर्ख नहीं है? इस तरह के लोगों में कोई वास्तविकता नहीं होती। जब परमेश्वर बोल रहा होता है, तो वे हमेशा बाहर से व्यस्त और उत्साही दिखते हुए, भाग-दौड़ करते रहते हैं, लेकिन अब जबकि वह बोल नहीं रहा, तो वे अनुसरण करना बंद कर देते हैं। इस तरह के व्यक्ति का कोई भविष्य नहीं है। शोधनों के दौरान तुम्हें सकारात्मक दृष्टिकोण से प्रवेश करना चाहिए और जो सबक सीखने चाहिए, उन्हें सीखना चाहिए; जब तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और उसके वचन पढ़ते हो, तो तुम्हें इनसे अपनी स्वयं की दशा की तुलना करनी चाहिए, अपनी कमियों का पता लगाना चाहिए और जानना चाहिए कि तुम्हारे पास सीखने के लिए अभी भी बहुत-से सबक हैं। शोधनों से गुज़रने पर जितनी अधिक ईमानदारी से तुम अनुसरण करोगे, उतना ही अधिक तुम स्वयं को अपर्याप्त पाओगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि शोधन किए जाने के दौरान तुम कई ऐसे मुद्दों का सामना करते हो जिन्हें तुम स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते और तुम शिकायत कर सकते हो और अपनी देह प्रकट कर सकते हो। केवल तभी तुम यह पता लगा सकते हो कि तुम्हारे भीतर बहुत अधिक भ्रष्ट स्वभाव हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी कायम रखनी चाहिए
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 471
अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को बहुत बड़ी आस्था की आवश्यकता है, अय्यूब की आस्था से भी बड़ी आस्था की। आस्था के बिना लोग अनुभव प्राप्त करते रहने में सक्षम नहीं होंगे और इसलिए वे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने में असमर्थ रहेंगे। जब बड़े परीक्षणों का दिन आएगा, तो ऐसे लोग होंगे जो कलीसियाओं को छोड़ देंगे—कुछ यहाँ, कुछ वहाँ। कुछ ऐसे लोग होंगे, जो पिछले दिनों में अपनी खोज में काफी अच्छा कर रहे थे और यह स्पष्ट नहीं होगा कि वे अब विश्वास क्यों नहीं करते। बहुत-सी चीजें होंगी, जिन्हें तुम नहीं समझ पाओगे, और परमेश्वर कोई चिह्न या चमत्कार नहीं दिखाएगा, न कुछ अलौकिक ही करेगा। यह इस बात को देखने के लिए है कि क्या तुम अडिग रह सकते हो—परमेश्वर लोगों का शोधन करने के लिए तथ्यों का उपयोग करता है। तुमने अभी तक बहुत ज्यादा कष्ट नहीं भोगे हैं। भविष्य में जब बड़े परीक्षण आएँगे, तो कुछ जगहों पर कलीसिया में से हर एक व्यक्ति चला जाएगा, और जिन लोगों के साथ तुम्हारा अच्छा संबंध रहा था, वे छोड़ जाएँगे और अपना विश्वास त्याग देंगे। क्या तुम तब मजबूती से खड़े रह पाओगे? अभी तक तुमने जिन परीक्षणों का सामना किया है, वे मामूली परीक्षण रहे हैं, और तुम शायद उनका मुश्किल से सामना कर पाए हो। इस चरण में केवल वचनों के माध्यम से शोधन और पूर्ण बनाया जाना शामिल है। अगले चरण में, तुम्हारा शोधन करने के लिए तुम पर तथ्य आएँगे और तब तुम खतरे के बीच होगे। एक बार जब यह वास्तव में गंभीर हो जाएगा, तो परमेश्वर तुम्हें जल्दी करने और चले जाने की सलाह देगा, और धार्मिक लोग तुम्हें अपने साथ चलने के लिए फुसलाने का प्रयास करेंगे। यह देखा जाना है कि क्या तुम मार्ग पर चलते रह सकते हो, और ये सब चीजें परीक्षण हैं। वर्तमान परीक्षण मामूली हैं, लेकिन एक दिन आएगा, जब कुछ घर ऐसे होंगे, जहाँ माता-पिता अब और विश्वास नहीं करेंगे और कुछ घर ऐसे होंगे, जहाँ बच्चे अब और विश्वास नहीं करेंगे। क्या तुम जारी रख पाओगे? जितना आगे तुम बढ़ोगे, तुम्हारे परीक्षण उतने बड़े होते जाएँगे। परमेश्वर लोगों की आवश्यकताओं और उनके आध्यात्मिक कद के अनुसार उनका शोधन करने का अपना कार्य करता है। परमेश्वर द्वारा लोगों को पूर्ण बनाने के चरण के दौरान यह असंभव है कि लोगों की संख्या बढ़ती रहेगी—वह केवल कम होगी। केवल इन्हीं शोधनों के माध्यम से लोगों को पूर्ण बनाया जा सकता है। काट-छाँट किया जाना, अनुशासित किया जाना, परीक्षण किया जाना, ताड़ना दिया जाना, श्राप दिया जाना—क्या तुम यह सब सहन कर सकते हो? जब तुम किसी ऐसी कलीसिया को देखते हो, जो विशेष रूप से अच्छी स्थिति में है, जिसमें सभी भाई-बहनें महान ऊर्जा के साथ अनुसरण करते हैं, तो तुम स्वयं को उत्साहित महसूस करते हो। जब वह दिन आता है कि वे सब चले गए होते हैं, उनमें से कुछ अब और विश्वास नहीं करते, कुछ व्यवसाय करने या विवाह करने के लिए चले गए होते हैं और कुछ धर्म में शामिल हो गए होते हैं, तब भी क्या तुम मजबूती से खड़े रह पाओगे? क्या तुम अंदर से परेशान हुए बिना रह पाओगे? परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाना इतनी आसान चीज नहीं है! वह लोगों का शोधन करने के लिए बहुत-सी चीजों का उपयोग करता है। लोग इन्हें तरीकों के रूप में देखते हैं, लेकिन परमेश्वर के मूल इरादे में ये तरीके बिल्कुल भी नहीं हैं, बल्कि तथ्य हैं। अंत में, जब वह लोगों का एक निश्चित बिंदु तक शोधन कर लेगा और उनमें कोई शिकायतें नहीं रहेंगी, तो उसके कार्य का यह चरण पूरा हो जाएगा। पवित्र आत्मा का महान कार्य तुम्हें पूर्ण बनाना है, और जब वह कार्य नहीं करता और स्वयं को छिपाता है, तो यह और भी ज्यादा तुम्हें पूर्ण बनाने के उद्देश्य से है, और यह देखने में और अधिक सक्षम होने के लिए है कि क्या लोगों में परमेश्वर के लिए प्रेम है, क्या उनकी परमेश्वर में सच्ची आस्था है। जब परमेश्वर स्पष्ट रूप से बोलता है, तो तुम्हें खोजने की कोई आवश्यकता नहीं होती; जब वह छिपा होता है, केवल तभी तुम्हें खोजने और अपना मार्ग टटोलने की आवश्यकता होती है। तुम्हें एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करने में सक्षम होना चाहिए, और चाहे तुम्हारा भावी परिणाम और तुम्हारी मंजिल कुछ भी हो, तुम्हें अपने जीवनकाल के दौरान परमेश्वर के बारे में ज्ञान और उसके प्रति प्रेम का अनुसरण कर पाने में सक्षम होना चाहिए, और चाहे परमेश्वर तुम्हारे साथ कैसे भी पेश आए, तुम्हें शिकायत करने से बचने में सक्षम होना चाहिए। लोगों के भीतर पवित्र आत्मा के कार्य करने की एक शर्त है। उनमें प्यास होनी चाहिए और उन्हें खोज करनी चाहिए तथा उन्हें परमेश्वर के कार्यकलापों के बारे में आधे-अधूरे मन वाले या संशययुक्त नहीं होना चाहिए, और उन्हें हर समय अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम होना चाहिए; केवल इसी तरह से वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हैं। परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में लोगों से जो अपेक्षित है, वह है बहुत बड़ी आस्था और खोजने के लिए परमेश्वर के सामने आना—केवल अनुभव के माध्यम से ही लोग यह पता कर सकते हैं कि परमेश्वर कितना प्यारा है और पवित्र आत्मा लोगों में कैसे कार्य करता है। यदि तुम अनुभव नहीं करते, यदि तुम उसके माध्यम से अपना मार्ग नहीं टटोलते हो, यदि तुम खोजते नहीं हो तो तुम्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। तुम्हें अपने अनुभवों के माध्यम से अपना मार्ग टटोलना चाहिए, और केवल अपने अनुभवों के माध्यम से ही तुम परमेश्वर के कार्यों को देख सकते हो और यह पहचान सकते हो कि वह कितना चमत्कारी और अथाह है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी कायम रखनी चाहिए
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 472
परमेश्वर तुम्हें सभी तरह की दुरावस्थाओं, कुंठाओं और क्लेशों के साथ-साथ बहुत सारी असफलताओं और रुकावटों का अनुभव करने देता है। आखिर में, परमेश्वर तुम्हें एहसास कराता है—जैसे-जैसे तुम इन चीजों का अनुभव करते हो—कि उसने जो कुछ कहा है, वह सब सही और सत्य है। साथ ही, वह तुम्हें इसका भी बोध कराएगा कि तुम जो सोचते हो और कल्पना करते हो उनके साथ-साथ तुम्हारी धारणाएँ, ज्ञान, दार्शनिक सिद्धांत, फलसफे और जो चीजें तुमने दुनिया से सीखीं और जो चीजें तुम्हारे माता-पिता द्वारा सिखाई गईं, वे सभी गलत हैं और ये चीजें तुम्हें जीवन में सही रास्ते पर नहीं ले जा सकतीं और वे सत्य को समझने और परमेश्वर के सम्मुख आने में तुम्हारी अगुआई नहीं कर सकतीं। अगर तुम अब भी इन चीजों के अनुसार जी रहे हो तो तुम विफलता की राह पर चल रहे हो और परमेश्वर के प्रतिरोध और उससे विश्वासघात करने की राह पर हो। आखिर में, परमेश्वर तुम्हें यह सब साफ-साफ दिखाएगा। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका तुम्हें अनुभव होना चाहिए और सिर्फ इसी तरीके से नतीजे हासिल किए जा सकते हैं, पर यह सब देखना परमेश्वर के लिए हृदयविदारक भी है। लोग विद्रोही और भ्रष्ट स्वभाव के हैं, इसलिए उन्हें थोड़ी पीड़ा सहनी होगी और इन अड़चनों का अनुभव करना होगा। यह कष्ट सहे बिना उनके पास शुद्ध होने का कोई उपाय नहीं होगा। अगर किसी व्यक्ति के पास सचमुच सत्य से प्रेम करने वाला दिल है और वह सचमुच परमेश्वर के उद्धार के विभिन्न तरीकों को स्वीकार करने और मूल्य चुकाने को तैयार है, तो उसे परीक्षणों और शोधन से इतना कष्ट सहने की जरूरत नहीं है। परमेश्वर वास्तव में लोगों को इतनी अधिक पीड़ा सहन कराना नहीं चाहता है और वह उन्हें इतनी रुकावटों और विफलताओं का अनुभव नहीं कराना चाहता है। किंतु, लोग बहुत ज्यादा विद्रोही हैं; वे जैसा उनसे कहा जाए वैसा करने के अनिच्छुक होते हैं, समर्पण करने के अनिच्छुक होते हैं और सही रास्ते पर चलने या छोटा रास्ता अपनाने में असमर्थ हैं; वे सिर्फ अपने तरीके से चलकर पथभ्रष्ट हो जाते हैं और परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करते हैं और उसका प्रतिरोध करते हैं। लोग भ्रष्ट हैं। परमेश्वर बस इतना कर सकता है कि वह उन लोगों को शैतान के हवाले कर दे और उन्हें निरंतर तपाने के लिए विभिन्न परिस्थितियों में डालता रहे ताकि वे तमाम तरह का अनुभव प्राप्त कर सकें, सबक ले सकें और दुष्ट चीजों के सार को समझ सकें। इसके बाद, जब लोग पीछे मुड़कर देखेंगे तो उन्हें एहसास होगा कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, वे स्वीकार करेंगे कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं और स्वीकार करेंगे कि केवल परमेश्वर ही सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता है और एक वही है जो लोगों से सचमुच प्रेम करता है, उनकी चिंता करता है और उन्हें बचा सकता है। परमेश्वर नहीं चाहता कि लोग इतना कष्ट झेलें, लेकिन मनुष्य बहुत ज्यादा विद्रोही होते हैं, चक्करदार मार्ग पर चलना चाहते हैं और यह कष्ट सहने के इच्छुक होते हैं। परमेश्वर के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है कि वह लोगों को विभिन्न परिस्थितियों में डालकर उन्हें निरंतर तपाता रहे। लोग अंततः किस हद तक तपाए जाते हैं? इस सीमा तक कि तुम कहो, “मैंने हर तरह की परिस्थिति का अनुभव किया है, और अंततः अब मैं समझ गया हूँ कि परमेश्वर के अलावा कोई भी व्यक्ति, घटना या चीज ऐसी नहीं है जो मुझे सत्य को समझा सके, जो मुझे सत्य का आनंद दिला सके या जो मुझे सत्य वास्तविकता में प्रवेश करा सके। अगर मैं आज्ञाकारितापूर्वक परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करूँ, आज्ञाकारिता के साथ मनुष्य के रूप में अपनी उचित स्थिति बनाए रखूँ, एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी स्थिति और कर्तव्य को निभाऊँ, आज्ञाकारितापूर्वक परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को स्वीकार करूँ, परमेश्वर से कोई और शिकायत न रखूँ और अत्यधिक या अतिरेक इच्छाओं से मुक्त रहूँ, और सृष्टिकर्ता के समक्ष सचमुच समर्पण कर सकूँ, तभी मैं सचमुच परमेश्वर के प्रति समर्पित व्यक्ति बनूँगा।” जब लोग इस स्तर तक पहुँच जाते हैं, तब वे परमेश्वर के सामने सचमुच शीश झुकाते हैं और परमेश्वर को उन्हें अनुभव करवाने के लिए और अधिक स्थितियों का निर्माण करने की आवश्यकता नहीं होती। तो, तुम लोग कौन-सा पथ अपनाना चाहते हो? कोई भी अपनी व्यक्तिपरक इच्छाओं में कष्ट नहीं उठाना चाहता और कोई भी नुकसान, विफलता, कठिनाई, हताशाओं या प्रतिकूलता का अनुभव नहीं करना चाहता, किंतु कोई दूसरा मार्ग नहीं है। लोगों की शैतानी प्रकृति होती है; वे बहुत विद्रोही होते हैं, उनके विचार और मत अत्यधिक जटिल होते हैं। प्रतिदिन तुम्हारा हृदय निरंतर विरोधाभास, कलह और उथल-पुथल में रहता है। तुम कुछ ही सत्यों को समझते हो, तुम्हारा जीवन प्रवेश उथला है, और तुम्हारे भीतर धारणाओं, कल्पनाओं और देह के भ्रष्ट स्वभावों पर विजय पाने की शक्ति का अभाव है। तुम केवल इतना कर सकते हो कि मनुष्य का सामान्य तरीका अपना लो : लगातार विफलता और हताशा झेलना, लगातार नीचे गिरना, विपत्तियों में फँसे रहना और कीचड़ में लोटते रहना, जब तक कि वह दिन न आ जाए जब तुम कहो, “मैं थक गया हूँ, मैं तंग आ गया हूँ, मैं इस तरह नहीं जीना चाहता। मैं इन विफलताओं का अनुभव नहीं करना चाहता। मैं आज्ञाकारी बनकर सृष्टिकर्ता के सम्मुख आने का इच्छुक हूँ; परमेश्वर जो कहेगा मैं सुनूँगा, और वही करूँगा जो वह कहे। जीवन का यही सही रास्ता है।” जिस दिन तुम पूरी तरह से मन से मान जाओगे और हार स्वीकार कर लोगे, उसी दिन तुम परमेश्वर के सामने आ सकोगे। क्या इससे तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में कुछ समझ सके? लोगों के प्रति परमेश्वर का रवैया क्या है? परमेश्वर चाहे कुछ भी करे, लेकिन वह लोगों का सर्वाधिक हित चाहता है। वह तुम्हारे लिए चाहे जिस स्थिति का निर्माण करे या वह तुमसे कुछ भी करने के लिए कहे, वह हमेशा सर्वोत्तम परिणाम देखना चाहता है। मान लो, तुम्हारे ऊपर कुछ बीतता है और तुम बाधाओं तथा विफलताओं का सामना करते हो। परमेश्वर यह नहीं देखना चाहता कि विफल होने पर तुम निराश हो जाओ और सोचो कि तुम समाप्त हो गए हो और तुम्हें शैतान ने झपट लिया है, फिर तुम अपने आप से हार मान लो, दोबारा कभी आत्मविश्वास से खड़े न हो पाओ और गहरी मायूसी में डूब जाओ—परमेश्वर यह परिणाम नहीं देखना चाहता। परमेश्वर क्या देखना चाहता है? वह देखना चाहता है कि इस मामले में तुम भले ही विफल हो गए हो पर तुम सत्य को तलाशने और आत्मचिंतन करने एवं अपनी विफलता का कारण पता करने में समर्थ हो, तुम इस विफलता से मिली सीख को स्वीकारते हो, भविष्य में इसे याद रखते हो, जानते हो कि इस तरह से कार्य करना गलत है और केवल परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना ही सही है और महसूस करते हो कि “मैं बुरा व्यक्ति हूँ। मेरा भ्रष्ट शैतानी स्वभाव है। मुझमें विद्रोहीपन है। परमेश्वर जिन धार्मिक लोगों की बात करता है, मैं उनसे दूर हूँ और मेरे अंदर परमेश्वर से डरने वाला हृदय नहीं है।” तुमने इस तथ्य को साफ-साफ देखा है; तुम इस मामले के सत्य को पहचान गए हो और इस रुकावट, इस विफलता के माध्यम से तुम थोड़े समझदार बन गए हो और परिपक्व हो गए हो। परमेश्वर यही देखना चाहता है। परिपक्व होने का क्या अर्थ है? इसका मतलब है कि परमेश्वर तुम्हें ग्रहण कर सकता है, कि तुम्हें बचाया जा सकता है, कि तुम सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश कर सकते हो, और तुम परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रह रहे हो। परमेश्वर लोगों को सही रास्ते पर चलते देखने की उम्मीद करता है। परमेश्वर चीजें श्रमसाध्य इरादों के साथ करता है, यह सब उसका छिपा हुआ प्रेम होता है, पर लोग अक्सर इसे समझ नहीं पाते। लोग संकीर्ण मानसिकता वाले और अत्यंत तुच्छ होते हैं। जब भी उन्हें परमेश्वर के अनुग्रह और आशीषों का आनंद नहीं मिलता, वे परमेश्वर के बारे में शिकायत करते हैं, नकारात्मक हो जाते हैं और चिड़चिड़े होकर काम करते हैं, पर परमेश्वर इसकी गाँठ नहीं बाँधता। वह उनसे ऐसे पेश आता है जैसे वे नादान बच्चे हों और उनके दोष नहीं गिनवाता। वह ऐसी स्थितियाँ निर्मित करता है जिनमें उन्हें पता चल जाता है कि अनुग्रह और आशीष कैसे प्राप्त किए जाते हैं और उन्हें समझने देता है कि मनुष्य के लिए अनुग्रह का क्या अर्थ है और मनुष्य उससे क्या प्राप्त कर सकता है। मान लो, तुम्हें कोई ऐसी चीज खाना पसंद है जिसे परमेश्वर कहता है कि अधिक मात्रा में खाना तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए बुरा है। तुम नहीं सुनते, और उसी चीज को खाने पर अड़े रहते हो और परमेश्वर तुम्हें मुक्त रूप से ऐसा करने देता है। नतीजतन, तुम बीमार हो जाते हो। कई बार ऐसा अनुभव करने के बाद तुम्हें बोध होता है कि परमेश्वर जो बात कहता है वही वास्तव में सही है, कि वह जो कुछ कहता है वही सत्य है, कि तुम्हें उसके वचनों के अनुसार ही अभ्यास करना चाहिए और यही सही पथ है। तो, जिन अड़चनों, असफलताओं और कष्टों का तुम अनुभव करते हो, उनसे क्या मिलता है? एक बात तो यह है कि तुम परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों को समझ सकते हो। दूसरे कि यह तुम्हें विश्वास दिलाता है और पक्के तौर पर महसूस करवाता है कि परमेश्वर के वचन सही हैं और वे सभी व्यावहारिक हैं, परमेश्वर में तुम्हारी आस्था बढ़ जाती है। इसके अलावा, विफलता की इस अवधि का अनुभव करके तुम परमेश्वर के वचनों की सत्यता और सटीकता को पहचानने लगते हो, तुम देखते हो कि परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं और तुम सत्य का अभ्यास करने का सिद्धांत समझने लगते हो। और इसलिए, लोगों के लिए विफलता का अनुभव करना अच्छा है, लेकिन साथ ही इससे उन्हें कष्ट भी होता है—यह एक प्रकार का तपाना है। किंतु यदि इस प्रकार तपाना अंततः तुम्हें परमेश्वर के समक्ष वापस लाता हो, तुम्हें उसके वचनों को समझने और उन्हें अपने हृदय में सत्य के रूप में स्वीकार करने में सक्षम बनाता हो, और तुम्हें परमेश्वर को जानने देता हो, तो तुमने जो तपिश, अड़चनें और विफलताएँ सहीं, वे व्यर्थ नहीं होंगी। परमेश्वर यही परिणाम देखना चाहता है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पौलुस के प्रकृति सार का भेद कैसे पहचानें
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 473
तुम्हें यह याद रखना चाहिए कि ये वचन अब कहे जा चुके हैं : बाद में, तुम अधिक बड़े क्लेश और अधिक बड़ी पीड़ा का अनुभव करोगे! पूर्ण बनाया जाना सरल या आसान बात नहीं है। कम से कम तुममें अय्यूब की आस्था होनी चाहिए या उससे भी कहीं बड़ी आस्था। तुम्हें जानना चाहिए कि भविष्य में परीक्षण अय्यूब के परीक्षणों से भी बड़े होंगे, और तुम्हें लम्बे समय की ताड़ना से होकर गुजरना होगा। क्या यह एक सरल बात है? यदि तुम्हारी काबिलियत में सुधार नहीं हो सकता, अगर तुम्हारी बोध क्षमता में कमी है, और अगर तुम बहुत ही कम जानते हो, तो फिर उस समय तुम्हारे पास कोई गवाही नहीं होगी, बल्कि तुम उपहास का पात्र बन जाओगे, शैतान के लिए एक खिलौना बन जाओगे। यदि तुम अभी दर्शनों को थामे नहीं रह सकते, तो तुम्हारी कतई कोई नींव नहीं है, और भविष्य में तुम नाकारे मान लिए जाओगे! मार्ग का कोई भी हिस्सा चलने के लिए सरल नहीं होता, इसलिए इसे हल्के में न लो। सावधानीपूर्वक तौलो और इस बात की तैयारी करो कि इस मार्ग के अंतिम चरण में सही ढंग से कैसे चलना है। यही वह मार्ग है जिस पर भविष्य में चलना है, वह मार्ग है जिस पर सब लोगों को चलना है। तुम्हें यह ज्ञान अनसुना नहीं रहने देना है; यह न सोचो कि मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ वह सब व्यर्थ की बात है। वह दिन आएगा जब तुम इसका सदुपयोग करोगे—मेरे वचन व्यर्थ में नहीं कहे जा सकते हैं। यह अपने आपको सुसज्जित करने का समय है, यह भविष्य के लिए मार्ग प्रशस्त करने का समय है। तुम्हें उस मार्ग को तैयार करना चाहिए जिस पर तुम्हें भविष्य में चलना है; तुम्हें इस बात के प्रति चिंतित और व्याकुल होना चाहिए कि भविष्य में तुम कैसे अडिग रह पाओगे और अपने भविष्य के मार्ग के लिए अच्छी तरह तैयारी करो। पेटू और आलसी मत बनो! तुम्हें अपने समय का सर्वोत्तम इस्तेमाल करने के लिए बिल्कुल वह सब कुछ करना होगा जो तुम कर सकते हो, ताकि तुम्हें वह सब कुछ प्राप्त हो जिसकी तुम्हें जरूरत है। मैं तुम्हें सब कुछ दे रहा हूँ ताकि तुम समझ सको। तुम लोगों ने अपनी आँखों से देखा है कि तीन वर्षों से भी कम समय में मैंने बहुत सी बातें कहीं है और बहुत सा कार्य किया है। इस रीति से कार्य करने का एक पहलू यह है कि लोगों में बहुत घटी है, और दूसरा पहलू यह है कि समय बहुत कम है और इसमें और देरी नहीं की जा सकती। तुम जिस प्रकार से इसकी कल्पना करते हो, उसके आधार पर लोगों को गवाही देने और उपयोग में लाए जाने के पहले पूर्ण आंतरिक स्पष्टता पानी होगी—क्या यह बहुत धीमा नहीं है? अतः मुझे कितनी देर तक तुम्हारे साथ चलना होगा? यदि तुम चाहते हो मैं तब तक तुम्हारे साथ चलूँ जब तक कि तुम बूढ़े और सफेद बालों वाले न हो जाओ, तो यह असंभव है! अधिक बड़े क्लेश से होकर गुजरने से सब लोगों के भीतर सच्चा बोध आ जाएगा। ये कार्य के चरण हैं। जब तुम उन दर्शनों को अच्छी तरह समझ लेते हो जिन पर आज संगति हुई है और तुम सच्चा आध्यात्मिक कद पा लेते हो तो भविष्य में तुम चाहे जिस भी पीड़ा से होकर गुजरो वह तुम पर भारी नहीं पड़ेगी और तुम अडिग रह पाओगे। जब मैं कार्य के इस अंतिम चरण को पूरा कर लूँगा और अंतिम वचन कहना समाप्त कर लूँगा, तो भविष्य में लोगों को अपने-अपने मार्ग पर चलना होगा। यह पहले कहे वचनों को पूरा करेगा : पवित्र आत्मा के पास हर व्यक्ति के लिए आदेश है और हर एक व्यक्ति पर किया जाने वाला कार्य है। भविष्य में, प्रत्येक व्यक्ति पवित्र आत्मा की अगुआई के द्वारा उस मार्ग पर चलेगा जिस पर उन्हें चलना चाहिए। क्लेश से गुजरते हुए कौन दूसरों को संभाल पाएगा? हरेक व्यक्ति के अपने दुःख हैं, और हरेक व्यक्ति का अपना आध्यात्मिक कद है। किसी का आध्यात्मिक कद किसी दूसरे जैसा नहीं होता। पति अपनी पत्नियों का ख्याल नहीं रख पाएँगे या माता-पिता अपने बच्चों का ख्याल नहीं रख पाएँगे; कोई किसी को नहीं संभाल पाएगा। यह आज के जैसा नहीं होगा—जब पारस्परिक परवाह और सहयोग आज भी संभव है। वह ऐसा समय होगा जब हर प्रकार के व्यक्ति का खुलासा किया जाएगा। कहने का अर्थ यह है कि जब परमेश्वर चरवाहों को मारेगा तो झुंड की भेड़ें तितर-बितर हो जाएँगी, और उस समय तुम लोगों के पास कोई सच्चा अगुआ नहीं होगा। लोगों में फूट पड़ जाएगी—यह आज के जैसा नहीं होगा, जहाँ तुम लोग एक साथ सभा कर सकते हो। बाद में, जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा वे अपने वास्तविक रंग को दिखाएँगे। पति अपनी पत्नियों से गद्दारी करेंगे, पत्नियाँ अपने पतियों से गद्दारी करेंगी, बच्चे अपने माता-पिता से गद्दारी करेंगे, माता-पिता अपने बच्चों को सताएँगे—मानवीय हृदय का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता! केवल यह किया जा सकता है कि एक व्यक्ति उसी को थामे रहे जो उसके पास है, और मार्ग के अंतिम चरण में अच्छी तरह से चले। अभी तुम लोग इसे स्पष्टता से नहीं देखते और तुम सब निकटदर्शी हो। कार्य के इस चरण में से सफलतापूर्वक होकर जाना कोई सरल कार्य नहीं है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपने मार्ग के अंतिम चरण में तुम्हें कैसे चलना चाहिए
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 474
अधिकांश लोग अपनी भविष्य की मंज़िल के लिए, या अल्पकालिक आनंद के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं। उन लोगों की बात करें जो किसी काट-छाँट से नहीं गुजरे हैं, तो वे स्वर्ग में प्रवेश करने के लिए, पुरस्कार प्राप्त करने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं। वे पूर्ण बनाए जाने के लिए या सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि अधिकांश लोग अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाने के लिए, या अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं। सार्थक जीवन जीने के लिए वे विरले ही कभी परमेश्वर में विश्वास करते हैं, न ही ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि जब तक मनुष्य जीवित है, उसे परमेश्वर से इसलिए प्रेम करना चाहिए क्योंकि यह पूरी तरह स्वाभाविक है और ऐसा करना न्यायोचित है और यह मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है। इस प्रकार, यद्यपि विभिन्न लोग अपने-अपने लक्ष्यों का अनुसरण करते हैं, फिर भी उनके अनुसरण का उद्देश्य और उसके पीछे की प्रेरणा सब लगभग समान होते हैं, और इतना ही नहीं, उनमें से अधिकांश लोगों के लिए उनकी आराधना के विषय बहुत कुछ समान हैं। पिछले कई हज़ार वर्षों के दौरान, बहुत-से विश्वासी मर चुके हैं, और बहुत-से मरकर पुनः जन्म ले चुके हैं। मात्र एक या दो लोग नहीं हैं जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, न ही एक या दो हज़ार लोग हैं, फिर भी इनमें से अधिकांश लोग भविष्य के लिए अपनी संभावनाओं या अपनी शानदार आशाओं की खातिर अनुसरण करते हैं। वे जो मसीह के प्रति समर्पित हैं, बिरले और बहुत कम हैं। अनेक विश्वासी समर्पित होकर भी अपने ही बिछाए जालों में फँसकर मर चुके हैं, और यही नहीं, जो लोग विजेता रहे हैं उनकी संख्या महत्वहीन होने की हद तक कम है। आज भी, लोग अपनी विफलता के कारणों से, या अपनी विजय के रहस्यों से अनजान ही बने हुए हैं। वे लोग, जिन पर मसीह का अनुसरण करने की धुन सवार है, अब तक जागे नहीं हैं और वे इन रहस्यों की तह तक नहीं पहुँचे हैं, क्योंकि वे कुछ जानते ही नहीं हैं। यद्यपि वे अपने अनुसरण में कष्टसाध्य प्रयास करते हैं, किंतु वे जिस पथ पर चलते हैं वह विफलता का वही पथ है जिस पर कभी उनसे पहले के लोग चले थे, और सफलता का मार्ग नहीं है जिस पर पहले आए अन्य लोग चले थे। इस तरह, वे चाहे जैसे अनुसरण करते हों, क्या वे उस पथ पर नहीं चलते हैं जो अंधकार की ओर ले जाता है? वे जो प्राप्त करते हैं क्या वह कड़वा फल नहीं है? यह पहले से बता पाना काफ़ी कठिन है कि वे लोग जो बीते हुए समयों में सफल रहे लोगों का अनुकरण करते हैं, अंततः आशीष पाएँगे या दुर्भाग्य। ऐसे में, विफल लोगों के पदचिह्नों पर चलकर अनुसरण करने वाले लोगों के सफल होने की संभावना कितनी कम है? क्या उनकी विफलता की संभावना और भी अधिक नहीं है? उस पथ का भला क्या मूल्य है जिस पर वे चलते हैं? क्या वे अपने प्रयास बेकार नहीं कर रहे हैं? संक्षेप में, लोग अपने अनुसरण में सफल हों या विफल, उनके ऐसा करने का एक कारण है, और बात यह नहीं है कि उनका लाभ या हानि उनके द्वारा किसी भी मनचाहे ढंग से किए गए अनुसरण से निर्धारित होती है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 475
परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास की सबसे मूलभूत आवश्यकता यह है कि उसका हृदय ईमानदार हो और वह स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर सके और सच्चे मन से समर्पण कर सके। मनुष्य के लिए जो चीज सबसे कठिन है वह है सच्चे विश्वास के बदले अपना संपूर्ण जीवन प्रदान करना, जिसके माध्यम से वह समूचा सत्य प्राप्त कर सकता है और सृजित प्राणी होने के नाते अपना कर्तव्य निभा सकता है। यह वह चीज है जो उन लोगों को हासिल नहीं हो सकती जो विफल रहते हैं और उन लोगों को तो और भी हासिल नहीं हो सकती जो मसीह को पा नहीं सकते हैं। चूँकि मनुष्य परमेश्वर के प्रति स्वयं को पूर्णतः समर्पित करने में अच्छा नहीं है, चूँकि मनुष्य सृष्टिकर्ता के लिए अपना कर्तव्य निभाने का इच्छुक नहीं है, चूँकि मनुष्य ने सत्य देखा तो है किंतु उससे बचता है और अपने ही पथ पर चलता है, चूँकि मनुष्य हमेशा उन लोगों के पथ पर चलकर अनुसरण करता है जो विफल हो चुके हैं, चूँकि मनुष्य हमेशा स्वर्ग के खिलाफ विद्रोह करता है, ठीक इसी कारण मनुष्य हमेशा विफल होता है, हमेशा शैतान की चालबाजी में और अपने ही जाल में फँस जाता है। चूँकि मनुष्य मसीह को नहीं जानता है, चूँकि मनुष्य सत्य को समझने और उसका अनुभव करने में पारंगत नहीं है, चूँकि मनुष्य पौलुस के प्रति बहुत अधिक आराधना के भाव से भरा है और स्वर्ग जाने की अत्यधिक कामना रखता है, चूँकि मनुष्य हमेशा माँग करता रहता है कि मसीह उसकी आज्ञा माने और परमेश्वर को जहाँ-तहाँ आदेश देता रहता है, इसलिए वे सब ऊँची-ऊँची महान हस्तियाँ और वे लोग जिन्होंने संसार के उतार-चढ़ावों का अनुभव किया है अब भी मृत्यु से बचने में असमर्थ हैं और परमेश्वर की ताड़ना के बीच मर जाते हैं। ऐसे लोगों के विषय में मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि वे एक अप्राकृतिक मौत मरते हैं। वे जिस परिणाम का सामना करते हैं—अपनी मृत्यु का—वह औचित्य से रहित नहीं है और इसके अलावा, क्या उनकी विफलता स्वर्ग की व्यवस्था के लिए और भी अधिक असहनीय नहीं है? सत्य मनुष्य के संसार से आता है, किंतु मनुष्य के बीच सत्य मसीह द्वारा लाया जाता है। यह मसीह से, अर्थात् स्वयं परमेश्वर से उत्पन्न होता है और यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसमें मनुष्य समर्थ हो। फिर भी मसीह बस सत्य प्रदान कर रहा है; वह यह तय करने के लिए यहाँ नहीं आया है कि मनुष्य सत्य के अपने अनुसरण में सफल होगा या नहीं। इसलिए सत्य के मामले में मनुष्य सफल होता है या नहीं, यह पूरी तरह उसके अनुसरण पर निर्भर करता है। यह एक ऐसा मामला है जिसका मसीह के साथ कभी कोई लेना-देना नहीं रहा है, बल्कि यह मनुष्य के अनुसरण से निर्धारित होता है। मनुष्य की मंजिल और उसकी सफलता या विफलता, सारी परमेश्वर के मत्थे नहीं मढ़ी जा सकती, ताकि स्वयं परमेश्वर से ही इसका बोझ उठवाया जाए, क्योंकि यह स्वयं परमेश्वर का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध उस कर्तव्य से है जो सृजित प्राणियों को निभाना चाहिए। अधिकांश लोगों को पौलुस और पतरस के अनुसरण और मंजिल का थोड़ा-सा ज्ञान अवश्य है, फिर भी लोग पतरस और पौलुस के परिणामों से अधिक कुछ नहीं जानते हैं, और वे पतरस की सफलता के पीछे के रहस्य, या पौलुस को विफलता की ओर ले गई कमियों से अनजान हैं। और इसलिए, यदि तुम लोग उनके अनुसरण का सार अच्छी तरह समझ पाने में पूरी तरह असमर्थ हो, तो तुम लोगों में से अधिकांश का अनुसरण अब भी विफल हो जाएगा, और यदि तुममें से एक छोटी-सी संख्या सफल भी हो जाती है, तब भी वे पतरस के समकक्ष नहीं होंगे। यदि तुम्हारे अनुसरण का पथ सही पथ है, तो तुम्हारे पास सफलता की आशा है; सत्य का अनुसरण करते हुए तुमने जिस पथ पर क़दम रखा है यदि वह ग़लत पथ है, तो तुम सदा सफल होने में असमर्थ होगे, और वही परिणाम प्राप्त करोगे जो पौलुस ने किया था।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 476
पतरस वह मनुष्य था जिसे पूर्ण बनाया गया था। ताड़ना और न्याय का अनुभव करने, और इस प्रकार विशुद्ध परमेश्वर-प्रेमी हृदय प्राप्त करने के बाद ही, उसे पूरी तरह पूर्ण बनाया गया था; वह जिस पथ पर चला वह पूर्ण किए जाने का पथ था। कहने का तात्पर्य यह है, बिल्कुल शुरुआत से ही, पतरस जिस पथ पर चला वह सही पथ था, और परमेश्वर में विश्वास करने के लिए उसकी प्रेरणा सही प्रेरणा थी, और इसलिए वह ऐसा व्यक्ति बना जिसे पूर्ण बनाया गया था; उसने एक नए पथ पर क़दम रखा जिस पर मनुष्य पहले कभी नहीं चला था। परंतु पौलुस शुरुआत से ही जिस पथ पर चला था वह मसीह के विरोध का पथ था, और केवल इसलिए कि पवित्र आत्मा अपने कार्य के लिए उसका उपयोग करना चाहता था, और उसकी सभी प्रतिभाओं और उसके सभी गुणों का लाभ उठाना चाहता था, उसने कई दशकों तक मसीह के लिए कार्य किया। वह मात्र ऐसा व्यक्ति था जिसका पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया था, और उसका उपयोग इसलिए नहीं किया गया था कि यीशु उसकी मानवता को स्वीकृति देता था, बल्कि उसकी प्रतिभाओं के कारण उसका उपयोग किया गया था। वह यीशु के लिए कार्य कर पाया तो इसलिए कि उस पर प्रहार किया गया था, इसलिए नहीं कि वह ऐसा करते हुए प्रसन्न था। वह ऐसा कार्य कर पाया तो पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन के कारण कर पाया था, और उसने जो कार्य किया वह किसी भी तरह उसके अनुसरण, या उसकी मानवता को नहीं दर्शाता था। पौलुस का कार्य एक सेवक का कार्य दर्शाता था, जिसका तात्पर्य है कि उसने एक प्रेरित का कार्य किया था। हालाँकि पतरस भिन्न था : उसने भी कुछ कार्य किया था, यह पौलुस के कार्य जितना बड़ा नहीं था, किंतु उसने अपने प्रवेश का अनुसरण करते हुए कार्य किया था, और उसका कार्य पौलुस के कार्य से भिन्न था। पतरस का कार्य एक सृजित प्राणी के कर्तव्य का निर्वहन था। उसने प्रेरित की भूमिका में कार्य नहीं किया था, बल्कि परमेश्वर के प्रति प्रेम का अनुसरण करते हुए कार्य किया था। पौलुस के कार्य के क्रम में उसका व्यक्तिगत अनुसरण भी निहित था : उसका अनुसरण भविष्य की उसकी आशाओं, और एक अच्छी मंज़िल की उसकी इच्छा से अधिक किसी चीज के लिए नहीं था। उसने अपने कार्य के दौरान शुद्धिकरण स्वीकार नहीं किया था, न ही उसने काट-छाँट स्वीकार की थी। वह मानता था कि उसने जो कार्य किया वह जब तक परमेश्वर के इरादों को पूरा करता था, और उसने जो कुछ किया वह सब जब तक परमेश्वर को प्रसन्न करता था, तब तक पुरस्कार अंततः उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। उसके कार्य में कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं थे—यह सब कार्य के लिए था, और परिवर्तन के अनुसरण के बीच नहीं किया गया था। उसके कार्य में सब कुछ एक सौदा था, इसमें सृजित प्राणी का एक भी कर्तव्य या समर्पण निहित नहीं था। अपने कार्य के क्रम के दौरान, पौलुस के पुराने स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। उसका कार्य दूसरों की सेवा मात्र का था, और उसके स्वभाव में बदलाव लाने में असमर्थ था। पौलुस ने खुद को पूर्ण बनाए या अपनी काट-छाँट कराए बिना ही अपना कार्य सीधे किया था और वह पुरस्कार से प्रेरित था। पतरस भिन्न था : वह ऐसा व्यक्ति था जो काट-छाँट और शुद्धिकरण से गुजरा था। पतरस के कार्य का लक्ष्य और प्रेरणा पौलुस के कार्य के लक्ष्य और प्रेरणा से आधारभूत रूप से भिन्न थे। यद्यपि पतरस ने बडी मात्रा में काम नहीं किया था, किंतु उसका स्वभाव कई बदलावों से होकर गुजरा था, और उसने जिसका अनुसरण किया, वह सत्य और वास्तविक बदलाव था। उसका कार्य मात्र कार्य करने की ख़ातिर नहीं किया गया था। यद्यपि पौलुस ने बहुत कार्य किया था, किंतु वह सब पवित्र आत्मा का कार्य था, और यद्यपि पौलुस ने इस कार्य में सहयोग किया था, किंतु यह उसके अनुभव का परिणाम नहीं था। पतरस ने कम कार्य किया तो केवल इसलिए कि पवित्र आत्मा ने उस पर अधिक कार्य नहीं किया था। उनके कार्य की मात्रा ने यह निर्धारित नहीं किया कि उन्हें पूर्ण बनाया गया या नहीं बनाया गया; एक का अनुसरण पुरस्कार प्राप्त करने के लिए था, और दूसरे का अनुसरण परमेश्वर के प्रति सर्वोत्तम प्रेम प्राप्त करने के लिए और सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के लिए था, ताकि वह परमेश्वर के इरादे पूरे करने के लिए एक प्यारी छवि जी सके। बाहर से वे भिन्न थे, और इसलिए उनके सार भी भिन्न-भिन्न थे। इस आधार पर कि उन्होंने कितना कार्य किया था, तुम यह निर्धारित नहीं कर सकते कि उनमें से किसे पूर्ण बनाया गया था। पतरस ने प्रयास किया कि वह ऐसे व्यक्ति की छवि जिए जो परमेश्वर से प्रेम करता है, ऐसा व्यक्ति बने जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करता था, ऐसा व्यक्ति बने जो काट-छाँट स्वीकार करता था, और ऐसा व्यक्ति बने जिसने सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाया था। वह परमेश्वर के प्रति अपने को समर्पित करने, अपने को संपूर्णता में परमेश्वर के हाथों में सौंप देने और मृत्युपर्यंत उसके प्रति आज्ञाकारी होने में सक्षम था। उसका ऐसा ही संकल्प था और उसने उसे पूरा भी किया। यही कारण है कि उसका परिणाम अंततः पौलुस के परिणाम से भिन्न था। पवित्र आत्मा ने पतरस पर जो कार्य किया था वह उसे पूर्ण बनाना था, और पवित्र आत्मा ने पौलुस पर जो कार्य किया था वह उसका उपयोग करना था। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी प्रकृति और उनके अनुसरणों के नजरिये एकसमान नहीं थे। दोनों में पवित्र आत्मा का कार्य था। पतरस ने यह कार्य अपने पर लागू किया था, और इसे दूसरों को भी प्रदान किया था; जबकि पौलुस ने पवित्र आत्मा का समूचा कार्य दूसरों को प्रदान कर दिया था, और इसमें से कुछ भी स्वयं अपने लिए प्राप्त नहीं किया था। इस तरह, पवित्र आत्मा के कार्य का इतने अधिक वर्षों तक अनुभव कर चुकने के बाद भी, पौलुस में हुए बदलाव न के बराबर थे। वह अब भी लगभग अपनी प्राकृतिक अवस्था में ही था, और वह अब भी पहले का पौलुस ही था। बात बस इतनी थी कि कई वर्षों के कार्य की तक़लीफ सहने के बाद, उसने सीख लिया था कि कैसे “कार्य करना” है, और सहनशीलता सीख ली थी, किंतु उसकी पुरानी प्रकृति—उसकी अत्यधिक प्रतिस्पर्धात्मक और स्वार्थलोलुप प्रकृति—अब भी कायम थी। इतने वर्षों तक कार्य करने के बाद भी, वह अपना भ्रष्ट स्वभाव नहीं जानता था, न ही उसने अपना पुराना स्वभाव त्यागा था जो उसके कार्य में अब भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता था। उसके पास बस कार्य का अधिक अनुभव था, किंतु इतना थोड़ा-सा अनुभव मात्र उसे बदलने में असमर्थ था और अस्तित्व के बारे में उसके दृष्टिकोण या उसके अनुसरण के महत्व को नहीं बदल सकता था। हालाँकि उसने मसीह के लिए कई सालों तक कार्य किया था, और प्रभु यीशु को फिर कभी सताया नहीं था, लेकिन उसके हृदय में परमेश्वर के उसके ज्ञान में कोई परिवर्तन नहीं आया था। इसका अर्थ है कि उसने स्वयं को परमेश्वर के प्रति समर्पित करने के लिए कार्य नहीं किया, बल्कि इसके बजाय वह भविष्य की अपनी मंज़िल के ख़ातिर कार्य करने के लिए बाध्य था। क्योंकि, आरंभ में, उसने मसीह को सताया था, और मसीह के प्रति समर्पित नहीं हुआ था; वह स्वाभाविक रूप से विद्रोही था जो जानबूझकर मसीह का विरोध करता था, और ऐसा व्यक्ति जिसे पवित्र आत्मा के कार्य का कोई ज्ञान नहीं था। जब उसका कार्य लगभग समाप्त हो चुका था, तब भी वह पवित्र आत्मा का कार्य नहीं जानता था, और पवित्र आत्मा के इरादों पर रत्ती भर भी ध्यान दिए बिना, केवल स्वयं अपने चरित्र के अनुसार स्वयं अपनी इच्छा से काम करता था। और इसलिए उसकी प्रकृति मसीह के प्रति शत्रुतापूर्ण थी और सत्य के प्रति समर्पण नहीं करती थी। इस तरह का कोई व्यक्ति, जिसे पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा त्याग दिया गया था, जो पवित्र आत्मा का कार्य नहीं जानता था, और जो मसीह का विरोध भी करता था—ऐसे व्यक्ति को कैसे बचाया जा सकता था? मनुष्य को बचाया जा सकता है या नहीं, यह इस पर निर्भर नहीं करता है कि उसने कितना कार्य किया है या वह कितना समर्पण करता है, बल्कि इसके बजाय इससे निर्धारित होता है कि वह पवित्र आत्मा के कार्य को जानता है या नहीं, वह सत्य को अभ्यास में ला सकता है या नहीं, और अनुसरण का उसका नजरिया सत्य के अनुरूप है या नहीं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 477
यद्यपि यीशु का अनसुरण करते हुए पतरस में भ्रष्टता के स्वाभाविक खुलासे हुए थे, फिर भी प्रकृति से वह, बिल्कुल आरंभ से ही, ऐसा व्यक्ति था जो पवित्र आत्मा के प्रति समर्पित होने और मसीह का अनुसरण करने का इच्छुक था। पवित्र आत्मा के प्रति उसका समर्पण शुद्ध था : उसने प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण नहीं किया, बल्कि उसने उद्देश्यपूर्वक सत्य के प्रति समर्पण किया। यद्यपि तीन बार ऐसा हुआ कि पतरस ने यीशु को जानने से इनकार कर दिया था, और यद्यपि उसने प्रभु यीशु की परीक्षा ली थी, किंतु ऐसी हल्की-सी मानवीय कमजोरी का उसकी प्रकृति से कोई संबंध नहीं था, इसने उसके भविष्य के अनुसरण को प्रभावित नहीं किया था, और यह समुचित रूप से सिद्ध नहीं कर सकता कि उसकी जाँच-परख किसी मसीह-विरोधी का कार्य था। सामान्य मानवीय कमजोरी कुछ ऐसी चीज़ है जो संसार के सभी लोगों द्वारा साझा की जाती है—क्या तुम पतरस के ज़रा भी भिन्न होने की अपेक्षा करते हो? क्या पतरस के बारे में लोगों के कुछ निश्चित विचार इसलिए नहीं हैं क्योंकि उसने अनेक मूर्खतापूर्ण चीजें की थीं? और क्या लोग पौलुस की इतनी आराधना उसके द्वारा किए गए कार्य की मात्रा और उसके द्वारा लिखी गई पत्रियों की संख्या के कारण नहीं करते? मनुष्य के सार को अच्छी तरह समझने में भला मनुष्य कैसे सक्षम हो सकता है? निश्चित रूप से जिनमें वास्तव में विवेक है, वे ऐसी महत्वहीन चीज की असलियत जान सकते हैं? यद्यपि पतरस के दर्दनाक अनुभवों के कई वर्ष बाइबल में दर्ज़ नहीं किए गए हैं, किंतु इससे यह साबित नहीं होता है कि पतरस को वास्तविक अनुभव नहीं हुए थे, या पतरस को पूर्ण नहीं बनाया गया था। मनुष्य परमेश्वर के कार्य की पूरी थाह कैसे ले सकता है? बाइबल के अभिलेख यीशु द्वारा व्यक्तिगत रूप से नहीं चुने गए थे, बल्कि बाद की पीढ़ियों द्वारा संकलित किए गए थे। ऐसा होने से, क्या वह सब जो बाइबल में दर्ज़ किया गया था मनुष्य के विचारों के अनुसार नहीं चुना गया था? इतना ही नहीं, पतरस और पौलुस के परिणाम पत्रियों में स्पष्ट रूप से नहीं बताए गए हैं, अतः मनुष्य पतरस और पौलुस को स्वयं अपने नजरिये के अनुसार, और स्वयं अपनी वरीयताओं के अनुसार परखता है। और चूँकि पौलुस ने इतना अधिक कार्य किया था, चूँकि उसके “योगदान” इतने बड़े थे, इसलिए उसने जनसमुदाय का भरोसा जीत लिया था। क्या मनुष्य केवल बाहरी चीजों पर ही ध्यान केंद्रित नहीं करता? मनुष्य का सार अच्छी तरह समझने में भला मनुष्य कैसे सक्षम हो सकता है? इसके साथ ही, इस बात को देखते हुए कि पौलुस हज़ारों सालों से आराधना का विषय रहा है, भला कौन उसके कार्य को यूँ ही नकारने की हिम्मत करेगा? पतरस मात्र एक मछुआरा था, तो उसका योगदान पौलुस के योगदान जितना बड़ा कैसे हो सकता था? उनके द्वारा दिए गए योगदान की दृष्टि से, पौलुस को पतरस से पहले पुरस्कृत किया जाना चाहिए था, और उसे वह व्यक्ति होना चाहिए था जो परमेश्वर की स्वीकृति बेहतर ढंग से प्राप्त कर सकता था। कौन यह कल्पना कर सकता था कि पौलुस के प्रति अपने बर्ताव में परमेश्वर ने बस उससे काम करवाने के लिए उसके उपहार प्राप्त किए थे, जबकि परमेश्वर ने पतरस को पूर्ण बना दिया था। बात निश्चित रूप से यह नहीं है कि प्रभु यीशु ने, बिल्कुल शुरुआत से ही, पतरस और पौलुस के लिए योजनाएँ बना ली थीं : इसके बजाय उन्हें उनकी अंतर्निहित प्रकृतियों के अनुसार पूर्ण बनाया गया था या कार्य में लगाया गया था। और इसलिए, लोग जो देखते हैं वे मनुष्य के बाह्य योगदान मात्र हैं, जबकि परमेश्वर जो देखता है वह मनुष्य का सार है, साथ ही वह पथ है जिसका मनुष्य आरंभ से अनुसरण करता है, और मनुष्य के अनुसरण के पीछे निहित प्रेरणा है। लोग व्यक्ति को अपनी धारणाओं के अनुसार और अपने नजरिये के अनुसार आँकते हैं, फिर भी व्यक्ति का परिणाम उसकी बाहरी चीजों के अनुसार निर्धारित नहीं होता। और इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम शुरुआत से जो मार्ग अपनाते हो यदि वह सफलता का मार्ग है, और अनुसरण के पीछे का तुम्हारा दृष्टिकोण शुरुआत से ही सही है, तो तुम पतरस के समान हो; तुम जिस पथ पर क़दम रखते हो यदि वह विफलता का पथ है, तो तुम चाहे जो क़ीमत चुकाओ, तुम्हारा परिणाम फिर भी वही होगा जो पौलुस का हुआ था। जो भी स्थिति हो, तुम्हारी मंज़िल, और तुम सफल होते हो या विफल होते हो, दोनों तुम्हारे समर्पण या तुम्हारे द्वारा चुकाई गई क़ीमत के बजाय इससे निर्धारित होते हैं कि तुम जिस पथ का अनुसरण करते हो वह सही है या नहीं। पतरस और पौलुस के सार, और वे लक्ष्य जिनका उन्होंने अनुसरण किया था, भिन्न-भिन्न थे; मनुष्य इन चीजों की खोज कर पाने में असमर्थ है, और केवल परमेश्वर ही इन्हें उनकी संपूर्णता में जान सकता है। क्योंकि परमेश्वर जो देखता है वह मनुष्य का सार है, जबकि मनुष्य स्वयं अपने सार के बारे में कुछ भी नहीं जानता है। मनुष्य, मनुष्य के भीतर के सार या उसके वास्तविक आध्यात्मिक कद को देख पाने में असमर्थ है, और इस प्रकार वह पौलुस और पतरस की विफलता और सफलता के कारणों की पहचान करने में असमर्थ है। अधिकांश लोग पौलुस की आराधना क्यों करते हैं और पतरस की क्यों नहीं, इसका कारण यह है कि पौलुस का सार्वजनिक कार्य के लिए उपयोग किया गया था, और मनुष्य इस कार्य का बोध कर पाता है, और इसलिए लोग पौलुस की “कार्यसिद्धियों” को स्वीकार करते हैं। जबकि पतरस के अनुभव मनुष्य के लिए अदृश्य हैं, और उसने जिसका अनुसरण किया वह मनुष्य के द्वारा अप्राप्य है, और इसलिए पतरस में मनुष्य की कोई रुचि नहीं है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 478
पतरस को काट-छाँट और शुद्धिकरण का अनुभव करने के माध्यम से पूर्ण बनाया गया था। उसने कहा था, “मुझे हर समय परमेश्वर के इरादे पूरे करने ही चाहिए। मैं जो भी करता हूँ उस सबमें मैं केवल परमेश्वर के इरादे पूरे करने का प्रयास करता हूँ, और भले ही मुझे ताड़ना दी जाए या मेरा न्याय किया जाए, तो भी मैं ऐसा करके प्रसन्न हूँ।” पतरस ने अपना सब कुछ परमेश्वर को दे दिया था, और उसका कार्य, वचन, और संपूर्ण जीवन सब परमेश्वर को प्रेम करने के लिए थे। वह ऐसा व्यक्ति था जो पावनीकरण का अनुसरण करता था, और जितना अधिक उसने अनुभव किया, उसके हृदय की गहराई के भीतर परमेश्वर के लिए उसका प्रेम उतना ही अधिक बढ़ता गया। जबकि पौलुस ने बस बाहरी कार्य ही किया था, और यद्यपि उसने भी कड़ी मेहनत की थी, किंतु उसका परिश्रम अपना कार्य उचित ढंग से करने और इस तरह पुरस्कार पाने के लिए था। अगर वह जानता कि उसे कोई पुरस्कार नहीं मिलेगा, तो उसने अपना काम छोड़ दिया होता। पतरस जिस चीज की परवाह करता था वह उसके हृदय के भीतर सच्चा प्रेम था, और वह था जो व्यावहारिक था और जिसे प्राप्त किया जा सकता था। उसने इसकी परवाह नहीं की कि उसे पुरस्कार मिलेगा या नहीं, बल्कि इसकी परवाह की कि उसके स्वभाव को बदला जा सकता है या नहीं। पौलुस ने अपने कार्य में और अधिक मेहनत करने पर ध्यान दिया, उसने बाहरी कार्य और समर्पण पर और सामान्य लोगों द्वारा अनुभव न किए जाने वाले धर्मसिद्धांतों पर ध्यान दिया। वह न तो अपने भीतर गहराई में बदलावों की और न ही परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम की परवाह करता था। पतरस के अनुभव परमेश्वर का सच्चा प्रेम और सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए थे। उसके अनुभव परमेश्वर के साथ निकटतर संबंध पाने के लिए और व्यावहारिक जीवन यापन करने के लिए थे। पौलुस का कार्य इसलिए किया गया था क्योंकि वह उसे यीशु ने सौंपा था; और उसे उसने उन चीजों को पाने के लिए किया था जिनकी वह लालसा करता था, फिर भी ये स्वयं अपने और परमेश्वर के विषय में उसके ज्ञान से असंबद्ध थे। उसका कार्य केवल ताड़ना और न्याय से बचने के लिए था। पतरस ने जिसका अनुसरण किया वह शुद्ध प्रेम था और पौलुस ने जिसका अनुसरण किया वह धार्मिकता का मुकुट था। पतरस ने पवित्र आत्मा के कार्य का कई वर्षों का अनुभव प्राप्त किया था, और उसे मसीह का व्यावहारिक ज्ञान, साथ ही स्वयं अपना गहन ज्ञान भी था। और इसलिए, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम शुद्ध था। कई वर्षों के शोधन ने यीशु के बारे में उसके ज्ञान और उसके जीवन को उन्नत बना दिया था, और उसका प्रेम बिना शर्त प्रेम था, यह स्वैच्छिक प्रेम था, और उसने बदले में कुछ नहीं माँगा, न ही उसने किसी लाभ की आशा की थी। पौलुस ने कई वर्ष काम किया, फिर भी उसने मसीह का अत्यधिक ज्ञान प्राप्त नहीं किया, और अपने बारे में उसका ज्ञान दयनीय रूप से कम था। उसमें मसीह के प्रति कोई प्रेम ही नहीं था, और उसका कार्य और जिस राह पर वह चला अंतिम कीर्ति पाने के लिए थे। उसने जिसका अनुसरण किया वह श्रेष्ठतम मुकुट था, शुद्धतम प्रेम नहीं। उसने सक्रिय रूप से नहीं, बल्कि निष्क्रिय रूप से अनुसरण किया; वह अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर रहा था, बल्कि पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा पकड़ लिए जाने के बाद अपने अनुसरण में बाध्य था। और इसलिए, उसका अनुसरण यह साबित नहीं करता कि वह मानक के अनुरूप सृजित प्राणी था—पतरस मानक के अनुरूप सृजित प्राणी था और उसने अपना कर्तव्य निभाया था। मनुष्य सोचता है कि उन सभी को पुरस्कार मिलना चाहिए जो परमेश्वर के लिए कोई न कोई योगदान देते हैं; योगदान जितना अधिक होता है, उतना ही अधिक यह स्वाभाविक और सही है कि उनसे परमेश्वर प्रसन्न हो। मनुष्य के दृष्टिकोण का सार लेन-देन से संबंधित है, और वह सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य पूरा करने की सक्रिय रूप से खोज नहीं करता है। परमेश्वर के लिए, लोग परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम का और परमेश्वर के प्रति संपूर्ण समर्पण का जितना अधिक अनुसरण करते हैं, जिसका अर्थ सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने का प्रयास करना है, उतनी ही अधिक वे परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर पाते हैं। परमेश्वर का दृष्टिकोण यह माँग करना है कि मनुष्य अपना मूल कर्तव्य और हैसियत पुनः प्राप्त करे। मनुष्य सृजित प्राणी है और इसलिए मनुष्य को परमेश्वर से कोई भी माँग करके अपनी सीमा नहीं लाँघनी चाहिए और सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने से अधिक कुछ नहीं करना चाहिए। पतरस और पौलुस की मंजिलों को, उनके योगदान की महानता के अनुसार नहीं, बल्कि इस बात के अनुसार आँका गया था कि सृजित प्राणियों के रूप में वे अपना कर्तव्य पूरा कर सकते थे या नहीं; उनकी मंजिलें उससे निर्धारित हुई थीं जिसका उन्होंने शुरुआत से अनुसरण किया था, इसके अनुसार नहीं कि उन्होंने कितना कार्य किया था, या उनके बारे में अन्य लोगों का आकलन क्या था। और इसलिए, सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य सक्रिय रूप से निभाने का प्रयास करना ही सफलता का मार्ग है; परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम का अनुसरण करने का पथ ही सबसे सही पथ है; अपने पुराने स्वभाव में बदलावों और परमेश्वर के प्रति शुद्ध प्रेम का अनुसरण करना ही सफलता का मार्ग है। सफलता का ऐसा मार्ग ही मूल कर्तव्य की पुनः प्राप्ति का और साथ ही सृजित प्राणी के मूल अवस्था की पुनः प्राप्ति का पथ भी है। यह पुनः प्राप्ति का पथ है, और यह आरंभ से अंत तक परमेश्वर के समस्त कार्य का उद्देश्य भी है। यदि मनुष्य का अनुसरण व्यक्तिगत असंयमी माँगों और अनुचित लालसाओं से कलंकित है और इससे प्राप्त होने वाला प्रभाव मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन नहीं है, तो यह पुनः प्राप्ति के कार्य के विपरीत है। यह निस्संदेह पवित्र आत्मा द्वारा किया गया कार्य नहीं है, और इसलिए यह साबित करता है कि इस प्रकार के अनुसरण को परमेश्वर स्वीकार नहीं करता। उस अनुसरण का भला क्या महत्व है जिसे परमेश्वर स्वीकार नहीं करता?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 479
पौलुस द्वारा किया गया कार्य मनुष्य के सामने प्रदर्शित किया गया था, किंतु जहाँ तक यह बात है कि परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम कितना शुद्ध था और अपने हृदय की गहराई में वह परमेश्वर से कितना प्रेम करता था—तो ये चीजें मनुष्य देख नहीं सकता है। मनुष्य केवल वह कार्य देख सकता है जो उसने किया था, जिससे मनुष्य जान जाता है कि उसका पवित्र आत्मा द्वारा निश्चय ही उपयोग किया गया था, और इसलिए मनुष्य सोचता है कि पौलुस पतरस से बेहतर था, कि उसका कार्य अधिक बड़ा था, क्योंकि वह कलीसियाओं का पोषण कर पाता था। पतरस ने केवल अपने व्यक्तिगत अनुभवों पर ही ध्यान देता था और अपने आकस्मिक कार्य के दौरान बस थोड़े-से लोग ही प्राप्त किए थे और उसकी बस कुछ ही अल्पज्ञात पत्रियाँ हैं। किंतु कौन जानता है कि उसके हृदय के भीतर गहराई में परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम कितना अधिक था? पौलुस दिन-रात लगातार परमेश्वर के लिए काम करता था : जब तक करने के लिए काम था, उसने वह किया। उसे लगा कि इस तरह वह मुकुट प्राप्त कर पाएगा और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकेगा, फिर भी अपना कार्य करते हुए उसने स्वयं को बदलने के तरीकों का अनुसरण नहीं किया। पतरस के जीवन की ऐसी कोई भी चीज जो परमेश्वर के इरादों को पूरा नहीं करती थी उसे असहज महसूस करवाती थी। यदि वह परमेश्वर के इरादे पूरे न कर पाता तो वह ग्लानि से भरा महसूस करता, और ऐसे उपयुक्त रास्ते की तलाश करता जिसके द्वारा वह परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए पूरा ज़ोर लगा पाता। अपने जीवन के सबसे छोटे और महत्वहीन मामलों में भी वह परमेश्वर के इरादे पूरे करने की स्वयं से अपेक्षा करता था। जब उसके पुराने स्वभाव की बात आती तब भी वह स्वयं से ज़रा भी कम अपेक्षा नहीं करता था, सत्य में अधिक गहराई तक आगे बढ़ने के लिए स्वयं से अपनी अपेक्षाओं में सदैव अत्यधिक कठोर होता था। पौलुस केवल सतही प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण करता था। वह मनुष्य के सामने स्वयं का दिखावा करने की चेष्टा करता था, और जीवन प्रवेश में ज़रा भी अधिक गहरी प्रगति करने की तलाश नहीं करता था। वह जिसकी परवाह करता था, वह सिद्धांत था, वास्तविकता नहीं। कुछ लोग कहते हैं, “पौलुस ने परमेश्वर के लिए इतना अधिक कार्य किया था, तो उसे परमेश्वर द्वारा याद क्यों नहीं रखा गया? पतरस ने परमेश्वर के लिए बस थोड़ा-सा ही कार्य किया था, और कलीसिया के लिए कोई बड़ा योगदान नहीं दिया था, तो उसे पूर्ण क्यों बनाया गया?” पतरस एक निश्चित बिंदु तक परमेश्वर से प्रेम करता था, यही परमेश्वर चाहता था; केवल ऐसे लोगों के पास ही गवाही होती है। और पौलुस के विषय में क्या? पौलुस किस सीमा तक परमेश्वर से प्रेम करता था? क्या तुम जानते हो? पौलुस का कार्य किस लिए किया गया था? और पतरस का कार्य किस लिए किया गया था? पतरस ने अधिक कार्य नहीं किया था, लेकिन क्या तुम जानते हो कि उसके हृदय के भीतर गहराई में क्या था? पौलुस का कार्य कलीसियाओं के पोषण, और कलीसियाओं की सहायता से संबंधित था। पतरस ने जो अनुभव किया वे उसके जीवन स्वभाव में हुए परिवर्तन थे; उसने परमेश्वर के प्रति प्रेम अनुभव किया। अब जब तुम उनके सार में अंतर जानते हो, तब तुम देख सकते हो कि अंततः कौन परमेश्वर में सचमुच विश्वास करता था, और कौन परमेश्वर में सचमुच विश्वास नहीं करता था। उनमें से एक परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करता था, और दूसरा परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम नहीं करता था; एक अपने स्वभाव में परिवर्तनों से गुजरा था, और दूसरा नहीं गुज़रा था; एक ने विनम्रतापूर्वक सेवा की थी, और आसानी से लोगों के ध्यान में नहीं आता था, और दूसरे की लोगों द्वारा आराधना की जाती थी, और वह महान छवि वाला था; एक पावनीकरण का अनुसरण करता था, और दूसरा नहीं करता था, और यद्यपि वह अशुद्ध नहीं था, किंतु वह शुद्ध प्रेम से युक्त नहीं था; एक सच्ची मानवता से युक्त था, और दूसरा नहीं था; एक सृजित प्राणी के विवेक से युक्त था, और दूसरा नहीं था। ऐसी हैं पतरस और पौलुस के सार की भिन्नताएँ। पतरस जिस पथ पर चला वह सफलता का पथ था, जो सामान्य मानवता की पुनः प्राप्ति अर्जित करने का पथ भी था और सृजित प्राणी के कर्तव्य की पुनः प्राप्ति का भी। पतरस उन सभी का प्रतिनिधित्व करता है जो सफल हैं। पौलुस जिस पथ पर चला वह विफलता का पथ था, और वह उन सभी का प्रतिनिधित्व करता है जो केवल ऊपरी तौर पर समर्पण करते हैं और स्वयं को खपाते हैं, और जिनके पास सच्चा परमेश्वर-प्रेमी हृदय नहीं होता है। पौलुस उन सबका प्रतिनिधित्व करता है जिनके पास सत्य नहीं है। परमेश्वर में अपने विश्वास में, पतरस ने प्रत्येक चीज में परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास किया और उस सबके प्रति समर्पण करने का प्रयास किया जो परमेश्वर से आया था। वह ताड़ना और न्याय के साथ ही शोधन, क्लेश और अपने जीवन में भौतिक वस्तुओं का अभाव स्वीकार कर पाया और उसने एक भी शिकायत नहीं की। इसमें से कुछ भी उसके परमेश्वर-प्रेमी हृदय को नहीं बदल सका। क्या यह परमेश्वर के प्रति परम प्रेम नहीं था? क्या यह सृजित प्राणी के कर्तव्य का अच्छे से निर्वहन नहीं था? चाहे यह ताड़ना में हो, न्याय में हो, या क्लेश में हो, तुम मृत्युपर्यंत समर्पण प्राप्त करने में सक्षम हो, और यह वह है जो सृजित प्राणी को प्राप्त करना चाहिए, यह परमेश्वर के प्रति प्रेम की शुद्धता है। यदि मनुष्य इस हद तक प्राप्त कर सकता है, तो वह मानक स्तर का सृजित प्राणी है, और सृष्टिकर्ता के इरादों को पूरा करने के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता है। कल्पना करो कि तुम परमेश्वर के लिए कार्य कर पाते हो, किंतु तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते हो और तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम नहीं कर सकते हो। इस ढंग से, तुमने न केवल सृजित प्राणी के अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं किया होगा, बल्कि तुम परमेश्वर द्वारा दोषी भी ठहराए जाओगे, क्योंकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास सत्य नहीं है, जो परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं कर सकता है और जो परमेश्वर से विद्रोह करता है। तुम परमेश्वर के लिए कार्य करने की ही परवाह करते हो, सत्य को अभ्यास में लाने या स्वयं को जानने की नहीं; तुम सृष्टिकर्ता को समझते या जानते नहीं हो, तुम सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पण या उससे प्रेम नहीं करते हो और तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के प्रति स्वाभाविक रूप से विद्रोही है। इन्हीं कारणों से ऐसे लोग सृष्टिकर्ता द्वारा पसंद नहीं किए जाते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 480
कुछ लोग कहते हैं, “पौलुस ने अत्यधिक मात्रा में कार्य किया था, और उसने कलीसियाओं के लिए बड़े बोझ उठाए थे और उन्हें बहुत लाभ पहुँचाया था। पौलुस की तेरह पत्रियों ने 2,000 वर्षों के अनुग्रह के युग को सँभाले रखा, और वे चार सुसमाचारों के ही पीछे हैं। कौन उसके साथ तुलना कर सकता है? कोई भी यूहन्ना के प्रकाशितवाक्य के गूढ़ अर्थ समझ नहीं सकता है, जबकि पौलुस की पत्रियाँ जीवन प्रदान करती हैं, और उसने जो कार्य किया था वह कलीसियाओं के लिए लाभकारी था। भला दूसरा कौन ऐसी चीजें प्राप्त कर सकता था? और पतरस ने क्या काम किया था?” जब मनुष्य दूसरों को आँकता है, तो वह उनके योगदान के अनुसार उन्हें आँकता है। जब परमेश्वर मनुष्य को आँकता है, तो वह मनुष्य की प्रकृति के अनुसार उन्हें आँकता है। उन लोगों में जो जीवन का अनुसरण करते हैं, पौलुस ऐसा व्यक्ति था जो अपने ही सार को नहीं जानता था। वह किसी भी तरह विनम्र या समर्पणशील नहीं था, और उसे अपने उस सार का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था, जो कि परमेश्वर के विरुद्ध था। और इसलिए, वह ऐसा व्यक्ति था जो विस्तृत अनुभवों से नहीं गुजरा था, और ऐसा व्यक्ति था जो सत्य को अभ्यास में नहीं लाया था। पतरस भिन्न था। उसे अपनी कमियों, कमजोरियों और सृजित प्राणी के रूप में अपने भ्रष्ट स्वभाव का ज्ञान था और इसलिए उसके पास अभ्यास का एक मार्ग था जिसके माध्यम से वह अपने स्वभाव को बदल सके; वह उन लोगों में से नहीं था जिनके पास केवल सिद्धांत था किंतु जो वास्तविकता से युक्त नहीं थे। वे लोग जो परिवर्तित होते हैं नए लोग हैं जिन्हें बचा लिया गया है, वे ऐसे लोग हैं जो मानक स्तर के अनुरूप हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं। वे लोग जो नहीं बदलते, ऐसे लोग हैं जो अपनी प्राकृतिक अवस्था में रहते हैं और वही पुराने लोग बने रहते हैं; ये वे लोग हैं जिन्हें बचाया नहीं गया है, अर्थात्, वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर द्वारा तिरस्कृत किया जाता है। उनका कार्य चाहे जितना भी बड़ा हो, उन्हें परमेश्वर द्वारा याद नहीं रखा जाएगा। जब तुम इसकी तुलना स्वयं अपने अनुसरण से करते हो, तब यह स्वतः स्पष्ट हो जाना चाहिए कि क्या तुम अंततः उसी प्रकार के व्यक्ति हो जैसे पतरस या पौलुस थे। यदि तुम्हारे अनुसरण में अब भी कोई सत्य नहीं है और यदि तुम आज भी उतने ही अहंकारी और अभद्र हो जितना पौलुस था, और अब भी उतने ही आडंबरपूर्ण हो जितना वह था, तो तुम बिना किसी संदेह के पतित व्यक्ति हो जो विफल होता है। यदि तुम उसी तरीके से अनुसरण करते हो जैसे पतरस करता था, अभ्यासों और सच्चे बदलावों का अनुसरण करते हो, अहंकारी या उद्दंड नहीं हो, और इसके बजाय अपना कर्तव्य निभाने का प्रयास करते हो, तो तुम सृजित प्राणी होगे जो विजय प्राप्त कर सकता है। पौलुस स्वयं अपना सार या भ्रष्टता नहीं जानता था, वह अपने विद्रोहीपन को तो और भी नहीं जानता था। उसने मसीह के प्रति अपने कुत्सित विरोध का कभी उल्लेख नहीं किया, न ही उसे इसका बहुत ज्यादा पछतावा था। उसने बस छोटा-सा स्पष्टीकरण दिया, और, अपने हृदय की गहराई में, वह परमेश्वर के प्रति पूर्ण रूप से नहीं झुका था। यद्यपि वह दमिश्क के रास्ते पर जमीन पर गिर गया था, फिर भी उसने अपने दिल की गहराई से खुद की जाँच नहीं की। वह मात्र काम करते रहने से ही संतुष्ट था, और वह स्वयं को जानने और अपना पुराना स्वभाव बदलने को सबसे महत्वपूर्ण विषय नहीं मानता था। वह तो बस सत्य बोलकर, स्वयं अपने अंतःकरण के लिए औषधि के रूप में दूसरों को पोषण देकर, और अपने अतीत के पापों के लिए अपने को सांत्वना देने और अपने को माफ करने की ख़ातिर यीशु के शिष्यों को अब और न सताकर ही संतुष्ट था। उसने जिस लक्ष्य का अनुसरण किया वह भविष्य के मुकुट और क्षणिक कार्य से अधिक कुछ नहीं था, उसने जिस लक्ष्य का अनुसरण किया वह भरपूर अनुग्रह था। उसने पर्याप्त सत्य का अनुसरण नहीं किया था, न ही उसने उस सत्य की अधिक गहराई में जाने का निरंतर प्रयास किया था जिसे वह पहले समझता नहीं था। इसलिए स्वयं के विषय में उसके ज्ञान को नकली कहा जा सकता है, और उसने ताड़ना और न्याय स्वीकार नहीं किया था। वह कार्य करने में सक्षम था इसका अर्थ यह नहीं है कि वह स्वयं अपनी प्रकृति या सार के ज्ञान से युक्त था; उसका ध्यान केवल बाहरी अभ्यासों पर था। यही नहीं, उसने जिसके लिए कठिन परिश्रम किया था वह बदलाव नहीं, बल्कि ज्ञान था। उसका कार्य पूरी तरह दमिश्क के मार्ग पर यीशु के प्रकटन का परिणाम था। यह कोई ऐसी चीज नहीं थी जिसे उसने मूल रूप से करने का संकल्प लिया था, न ही अपने पुराने स्वभाव की काट-छाँट स्वीकार करने के बाद वह कार्य कर रहा था। उसने चाहे जिस प्रकार कार्य किया, उसका पुराना स्वभाव नहीं बदला था, और इसलिए उसके कार्य ने उसके अतीत के पापों का प्रायश्चित नहीं किया बल्कि उस समय की कलीसियाओं के मध्य एक निश्चित भूमिका मात्र निभाई थी। ऐसे व्यक्ति का, जिसका पुराना स्वभाव नहीं बदला था—कहने का तात्पर्य यह है कि, जिसने उद्धार प्राप्त नहीं किया था, तथा सत्य से और भी अधिक रहित था—उसका प्रभु यीशु द्वारा स्वीकार किए गए लोगों में से एक बनना बिल्कुल असंभव था। वह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसमें यीशु मसीह के लिए प्रेम और भय समाया था, न ही वह ऐसा व्यक्ति था जो सत्य की खोज करने में पारंगत था, वह ऐसा व्यक्ति तो और भी नहीं था जो देहधारण के रहस्य की खोज करता था। वह मात्र ऐसा व्यक्ति था जो मिथ्या वाद-विवाद में निपुण था, और जो किसी के भी आगे झुकता नहीं था जो उससे ऊपर थे या जो सत्य से युक्त थे। वह उन लोगों या सत्यों से ईर्ष्या करता था जो उसके विपरीत थे, या उसके प्रति शत्रुतापूर्ण थे, वह उन विद्वान् लोगों को प्राथमिकता देता था जो बहुत अच्छी छवि प्रस्तुत करते थे और गहन ज्ञान से युक्त थे। वह उन गरीब लोगों से बातचीत करना पसंद नहीं करता था जो सच्चे मार्ग की खोज करते थे और सत्य के अलावा किसी भी चीज से प्रेम नहीं करते थे, इसके बजाय उसने धार्मिक संगठनों के वरिष्ठ व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जो केवल धर्मसिद्धांतों की बात करते थे, और जो भरपूर ज्ञान से युक्त थे। उसमें पवित्र आत्मा के नए कार्य के प्रति कोई प्रेम नहीं था, और उसने पवित्र आत्मा के नए कार्य की हलचल की परवाह नहीं की। इसके बजाय, उसने उन विनियमों और धर्म-सिद्धांतों की तरफदारी की जो सामान्य सत्यों से कहीं अधिक ऊँचे थे। अपने जन्मजात सार और अपने संपूर्ण अनुसरण में, वह सत्य का अनुसरण करने वाला ईसाई कहलाने योग्य नहीं था, परमेश्वर के घर में वफादार सेवक कहलाने योग्य तो और भी नहीं था, क्योंकि उसका पाखंड बहुत अधिक था, और उसका विद्रोहीपन बहुत ज्यादा था। यद्यपि वह प्रभु यीशु के सेवक के रूप में जाना जाता है, किंतु वह स्वर्ग के राज्य के दरवाज़े में प्रवेश करने योग्य बिल्कुल नहीं था, क्योंकि आरंभ से अंत तक उसके कार्यकलापों को धार्मिक नहीं कहा जा सकता है। उसे बस ऐसे मनुष्य के रूप में देखा जा सकता है जो पाखंडी था, जिसने अधार्मिकता की थी, किंतु जिसने मसीह के लिए कार्य किया था। यद्यपि उसे दुष्ट नहीं कहा जा सकता है, फिर भी उसे उपयुक्त रूप से ऐसा मनुष्य कहा जा सकता है जिसने अधार्मिकता की थी। उसने बहुत कार्य किया था, फिर भी उसे उसके द्वारा किए गए कार्य की मात्रा के आधार पर नहीं ही परखा जाना चाहिए, बल्कि केवल उसकी गुणवत्ता और सार के आधार पर ही परखा जाना चाहिए। केवल इसी ढंग से इस मामले की तह तक पहुँचना संभव है। वह हमेशा मानता था : “मैं कार्य करने में सक्षम हूँ, मैं अधिकांश लोगों से बेहतर हूँ; मैं प्रभु के बोझ के प्रति उतना विचारशील हूँ जितना कोई और नहीं है, और कोई भी उतनी गहराई से पश्चात्ताप नहीं करता है जितना मैं करता हूँ, क्योंकि बड़ी ज्योति मेरे ऊपर चमकी थी, और मैं बड़ी ज्योति देख चुका हूँ, और इसलिए मेरा पश्चात्ताप किसी भी अन्य की अपेक्षा अधिक गहरा है।” यही वह है जो उसने उस समय अपने हृदय के भीतर सोचा था। अपने कार्य के अंत में, पौलुस ने कहा : “मैं लड़ाई लड़ चुका हूँ, मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, और मेरे लिए धर्म का मुकुट रखा हुआ है।” उसकी लड़ाई, कार्य और दौड़ पूरी तरह धार्मिकता के मुकुट के लिए थे, और वह सक्रिय रूप से आगे नहीं निकला था। यद्यपि वह अपने कार्य में असावधान नहीं था, फिर भी यह कहा जा सकता है कि उसका कार्य बस उसकी ग़लतियों की भरपाई करने के लिए, और उसके अंतःकरण के आरोपों की क्षतिपूर्ति करने के लिए था। वह बस यथासंभव जल्दी से जल्दी अपना कार्य पूरा करने, अपनी दौड़ समाप्त करने और अपनी लड़ाई खत्म करने की आशा करता था, ताकि वह अपना इच्छित धार्मिकता का मुकुट जल्द से जल्द प्राप्त कर सके। वह जिस चीज के लिए लालायित था वह अपने अनुभवों और सच्चे ज्ञान के साथ प्रभु यीशु से मिलना नहीं था, बल्कि यथासंभव जल्द से जल्द अपना कार्य समाप्त करना था, ताकि प्रभु यीशु से मिलने पर वह वे पुरस्कार प्राप्त करेगा जो उसने अपने कार्य से कमाए थे। उसने अपने कार्य का उपयोग खुद को आराम देने के लिए और एक तरह के लेनदेन के तौर पर किया और आशा की कि भविष्य में वह इसे मुकुट से बदल लेगा। उसने जिसका अनुसरण किया वह सत्य या परमेश्वर नहीं था, बल्कि केवल मुकुट था। ऐसा अनुसरण मानक स्तर का कैसे हो सकता है? उसकी प्रेरणा, उसका कार्य, उसने जो मूल्य चुकाया और वह सब जिसका उसने त्याग किया—उसकी अद्भुत कल्पनाएँ इन सबमें व्याप्त थीं, और उसने पूरी तरह स्वयं अपनी इच्छाओं के अनुसार कार्य किया था। उसके कार्य की संपूर्णता में, वह मूल्य चुकाने की रत्ती भर इच्छा नहीं थी जो उसने चुकाया था; वह तो बस इसे एक लेनदेन के तौर पर कर रहा था। उसने त्याग अपने कर्तव्य की खातिर स्वेच्छा से नहीं किए थे, बल्कि लेनदेन करने का अपना उद्देश्य हासिल करने के लिए स्वेच्छा से किए गए थे। क्या ऐसे त्यागों का कोई मोल है? कौन उसके अशुद्ध त्यागों को स्वीकृति देगा? किसे ऐसे त्यागों में रुचि है? उसका कार्य भविष्य के स्वप्नों से भरा था, अद्भुत योजनाओं से भरा था, और उसमें ऐसा कोई मार्ग नहीं था जिससे मानव स्वभाव को बदला जा सके। वह झूठी परोपकारिता से लबालब भरा था; उसका कार्य जीवन प्रदान नहीं करता था, बल्कि एक बनावटी शिष्टाचार था; वह लेनदेन पर आधारित था। इस जैसा कार्य मनुष्य को अपने मूल कर्तव्य की पुनः प्राप्ति के पथ पर कैसे ले जा सकता है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 481
पतरस ने जिस चीज का भी अनुसरण किया वह सब कुछ परमेश्वर के इरादों के अनुरूप था। वह परमेश्वर के इरादे पूरे करने का अनुसरण करता था और भले ही उसे कठिनाई और विपत्ति सहनी पड़े, तो भी वह हर हाल में परमेश्वर के इरादे पूरे करने का इच्छुक था। परमेश्वर के किसी विश्वासी द्वारा इससे बड़ा कोई अनुसरण नहीं है। पौलुस ने जिस चीज का अनुसरण किया वह उसकी अपनी देह, अपनी धारणाओं और अपनी योजनाओं तथा साजिशों से दूषित थी। वह किसी भी तरह मानक स्तर का सृजित प्राणी नहीं था; वह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो परमेश्वर के इरादे पूरे करने का प्रयास करता हो। पतरस खुद को परमेश्वर के आयोजनों की दया पर रखने का अनुसरण करता था, और यद्यपि उसने जो कार्य किया वह बड़ा नहीं था, फिर भी उसके अनुसरण के पीछे की प्रेरणा सही थी और वह जिस पथ पर चला वह सही था; यानी, भले ही वह बहुत सारे लोगों को प्राप्त नहीं कर पाया, फिर भी वह सत्य के मार्ग का अनुसरण कर पाया। इसी कारण से कहा जा सकता है कि वह मानक स्तर का सृजित प्राणी था। आज, भले ही तुम कार्यकर्ता नहीं हो, तब भी तुम्हें सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करने और सब कुछ परमेश्वर के आयोजनों की दया पर छोड़ने का अनुसरण करने में सक्षम होना चाहिए। परमेश्वर जो भी कहता है तुम्हें उसके प्रति समर्पण कर पाना, और सभी प्रकार के क्लेशों और शोधन का अनुभव कर पाना, और तुम्हें अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम कर पाना यद्यपि तुम कमजोर हो। जो स्वयं अपने जीवन की जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं वे सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करने के इच्छुक होते हैं और ऐसे लोगों के अनुसरण के पीछे का परिप्रेक्ष्य सही होता है। यही वे लोग हैं जिनकी परमेश्वर को जरूरत है। यदि तुमने बहुत सारा कार्य किया है और दूसरों ने तुमसे मार्गदर्शन प्राप्त किया है, किंतु तुम स्वयं नहीं बदले हो और तुमने कोई गवाही नहीं दी है या कोई सच्चा अनुभव नहीं लिया है, यहाँ तक कि अपने जीवन के अंत में भी, तुमने जो कुछ किया उसमें से किसी कार्य ने भी गवाही नहीं दी है, तो क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो बदलाव से गुजरा है? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अनुसरण करता है? उस समय, पवित्र आत्मा ने तुम्हारा उपयोग किया था, किंतु जब उसने तुम्हारा उपयोग किया, तब उसने तुम्हारे उस भाग का उपयोग किया था जिसका कार्य के लिए उपयोग किया जा सकता था, और उसने तुम्हारे उस भाग का उपयोग नहीं किया जिसका उपयोग नहीं किया जा सकता था। यदि तुम बदलाव का अनुसरण करते, तो तुम्हें उपयोग करने की प्रक्रिया के दौरान धीरे-धीरे पूर्ण बनाया गया होता। परंतु पवित्र आत्मा इस बात के लिए पूरी तरह जिम्मेदार नहीं है कि तुम्हें अंततः प्राप्त किया जाता है या नहीं—यह इस बात पर निर्भर करता है कि वास्तव में तुम्हारा अनुसरण कैसा चलता है। यदि तुम्हारे व्यक्तिगत स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया है, तो इसलिए क्योंकि तुम्हारे अनुसरण के पीछे का परिप्रेक्ष्य गलत है। यदि तुम्हें कोई पुरस्कार नहीं दिया गया है, तो यह तुम्हारी अपनी समस्या है, क्योंकि तुमने स्वयं सत्य का अभ्यास नहीं किया है और तुम परमेश्वर के इरादे पूरे नहीं कर पाए हो। और इसलिए, तुम्हारे व्यक्तिगत अनुभवों से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है, और तुम्हारे व्यक्तिगत प्रवेश से अधिक अत्यावश्यक कुछ भी नहीं है! कुछ लोग अंततः कहेंगे, “मैंने तुम्हारे लिए इतना अधिक कार्य किया है, और भले ही मैंने कुछ हासिल न किया हो, फिर भी मैंने कठिनाई सही है। क्या तुम मुझे बस जीवन का फल खाने के लिए स्वर्ग में प्रवेश करने नहीं दे सकते?” तुम्हें जानना ही चाहिए कि मैं किस प्रकार के लोगों को चाहता हूँ; वे जो गंदे हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, वे जो गंदे हैं उन्हें पवित्र भूमि को अपवित्र करने की अनुमति नहीं है। तुमने भले ही बहुत कार्य किया हो, और कई सालों तक कार्य किया हो, किंतु अंत में तुम अब भी बुरी तरह मैले हो और यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय है कि तुम मेरे राज्य में प्रवेश करना चाहते हो! संसार की रचना से लेकर आज तक, मैंने अपने राज्य में उन्हें कभी ऐसा आसान प्रवेश नहीं दिया जो मेरी चापलूसी करते हैं। यह स्वर्गिक नियम है, और कोई इसे तोड़ नहीं सकता है! तुम्हें जीवन का अनुसरण करना ही चाहिए। आज, जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा वे उसी प्रकार के हैं जैसा पतरस था : ये वे लोग हैं जो स्वयं अपने स्वभाव में बदलाव लाने का अनुसरण करते हैं और जो परमेश्वर के लिए गवाही देने और सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के लिए तैयार रहते हैं। केवल ऐसे लोगों को ही पूर्ण बनाया जाएगा। यदि तुम केवल पुरस्कारों की प्रत्याशा करते हो और स्वयं अपने जीवन स्वभाव को बदलने का अनुसरण नहीं करते, तो तुम्हारे सारे प्रयास व्यर्थ होंगे—यह अटल सत्य है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 482
पतरस और पौलुस के सार में अंतर से तुम्हें समझना चाहिए कि जो लोग जीवन का अनुसरण नहीं करते, वे व्यर्थ में कड़ी मेहनत करते हैं! परमेश्वर में विश्वास करने और परमेश्वर का अनुसरण करने में तुम्हारे पास परमेश्वर-प्रेमी हृदय होना चाहिए, तुम्हें अपना भ्रष्ट स्वभाव छोड़ देना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के इरादे पूरे करने का अनुसरण अवश्य करना चाहिए और तुम्हें सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छे से निभाना ही चाहिए। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो और उसका अनुसरण करते हो, तुम्हें सब कुछ उसे अर्पित कर देना चाहिए, और व्यक्तिगत चुनाव या माँगें नहीं करनी चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर के इरादे पूरे करने चाहिए। चूँकि तुम एक सृजित मनुष्य हो, इसलिए तुम्हें उस प्रभु के प्रति समर्पण करना चाहिए जिसने तुम्हें सृजित किया है, क्योंकि तुम खुद को नियंत्रित करने में स्वाभाविक रूप से असमर्थ हो और तुममें अपनी नियति को नियंत्रित करने की कोई स्वाभाविक क्षमता नहीं है। चूँकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर में विश्वास करता है, इसलिए तुम्हें पावनीकरण और परिवर्तन का अनुसरण करना चाहिए। चूँकि तुम सृजित प्राणी हो, इसलिए तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, और अपनी स्थिति के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए, और तुम्हें अपने कर्तव्य का अतिक्रमण कदापि नहीं करना चाहिए। यह तुम्हें सिद्धांत के माध्यम से बाध्य करने, या तुम्हें दबाने के लिए नहीं है, बल्कि इसके बजाय यह वह पथ है जिसके माध्यम से तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकते हो, और यह उन सभी के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है—और प्राप्त किया जाना चाहिए—जो धार्मिकता का पालन करते हैं। यदि तुम पतरस और पौलुस के सार की तुलना करो, तो तुम्हें पता चलेगा कि तुम्हें किस प्रकार अनुसरण करना चाहिए। पतरस और पौलुस जिन पथों पर चले थे, उनमें से एक पूर्ण बनाए जाने का पथ है, और एक निकाले जाने का पथ है; पतरस और पौलुस दो भिन्न-भिन्न पथों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यद्यपि प्रत्येक ने पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त किया था, और प्रत्येक ने पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त की था, और प्रत्येक ने वह स्वीकार किया था जो प्रभु यीशु द्वारा उन्हें सौंपा गया था, किंतु प्रत्येक में उत्पन्न फल समान नहीं था : एक ने सचमुच फल उत्पन्न किया था, और दूसरे ने नहीं किया था। उनके सार से, उन्होंने जो कार्य किया उससे, उनके द्वारा बाह्य रूप में जो अभिव्यक्त किया गया उससे और उनके अंतिम परिणामों से तुम्हें समझना चाहिए कि तुम्हें कौन-सा पथ अपनाना चाहिए, चलने के लिए तुम्हें कौन-सा पथ चुनना चाहिए। वे दो बिल्कुल भिन्न पथों पर चले थे। पौलुस और पतरस, वे प्रत्येक पथ के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण थे, और इसलिए बिल्कुल आरंभ से ही उन्हें उदाहरणों के रूप में प्रस्तुत किया गया। पौलुस के अनुभवों के मुख्य बिंदु क्या हैं, और वह सफल क्यों नहीं हुआ? पतरस के अनुभवों के मुख्य बिंदु क्या हैं, और उसने पूर्ण बनाए जाने का अनुभव कैसे किया? यदि तुम उसकी तुलना करो जिसकी उनमें से प्रत्येक ने परवाह की थी, तो तुम्हें पता चलेगा कि परमेश्वर ठीक किस प्रकार का व्यक्ति चाहता है, के इरादे क्या हैं, परमेश्वर का स्वभाव क्या है, किस प्रकार के व्यक्ति को अंततः पूर्ण बनाया जाएगा, और यह भी कि किस प्रकार के व्यक्ति को पूर्ण नहीं बनाया जाएगा; तुम्हें पता चलेगा कि उन लोगों का स्वभाव कैसा है जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा, और उन लोगों का स्वभाव कैसा है जिन्हें पूर्ण नहीं बनाया जाएगा—सार के ये मुद्दे पतरस और पौलुस के अनुभवों में देखे जा सकते हैं। परमेश्वर ने सभी चीजों की सृष्टि की थी, और इसलिए वह समूची सृष्टि को अपने प्रभुत्व के अधीन लाता और अपने प्रभुत्व के प्रति समर्पण करवाता है; वह सभी चीजों पर शासन करेगा, ताकि सभी चीजें उसके हाथों में हों। परमेश्वर की सारी सृष्टि, पशुओं, पेड़-पौधों, मानवजाति, पहाड़ तथा नदियों, और झीलों सहित—सभी को उसके प्रभुत्व के अधीन आना ही होगा। आकाश में और धरती पर सभी चीजों को उसके प्रभुत्व के अधीन आना ही होगा। उनके पास कोई विकल्प नहीं हो सकता है और सभी को उसके आयोजनों के समक्ष समर्पण करना ही होगा। इसकी आज्ञा परमेश्वर द्वारा दी गई थी, और यह परमेश्वर का अधिकार है। परमेश्वर सभी चीजों पर शासन करता है और इस तरह करता है कि सभी चीजें व्यवस्थित और श्रेणीबद्ध हों, जिसमें प्रत्येक को परमेश्वर की इच्छाओं के अनुसार उसकी किस्म के आधार पर छाँटा जाता है और उससे संबंधित स्थान प्रदान किया जाता है। चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, कोई भी चीज परमेश्वर से बढ़कर नहीं हो सकती है, और सभी चीजें परमेश्वर द्वारा सृजित मानवजाति की सेवा करती हैं, और कोई भी चीज परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करने या परमेश्वर से कोई भी माँग करने की हिम्मत नहीं करती है। इसलिए मनुष्य को भी सृजित प्राणी होने के नाते मनुष्य का कर्तव्य निभाना ही चाहिए। वह चाहे सभी चीजों का मालिक हो या प्रबंधक, सभी चीजों के बीच मनुष्य का दर्जा चाहे जितना भी ऊँचा हो, वह फिर भी परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन एक अदना-सा मानव भर है; वह एक अदने से मनुष्य, एक सृजित प्राणी से अधिक कुछ नहीं है, और वह कभी परमेश्वर से ऊपर नहीं होगा। सृजित प्राणी के रूप में मनुष्य को सृष्टिकर्ता को जानने और सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करने का प्रयास करना चाहिए; सबसे महत्वपूर्ण बात है कि बिना किसी अन्य विकल्प के परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर मनुष्य के प्रेम के योग्य है। जो लोग परमेश्वर से प्रेम करने का अनुसरण करते हैं, उन्हें किसी व्यक्तिगत लाभ के पीछे नहीं भागना चाहिए या व्यक्तिगत आशाएँ नहीं रखनी चाहिए; यह अनुसरण का सबसे सही तरीका है। यदि तुम जिसका अनुसरण करते हो वह सत्य है, तुम जिसे अभ्यास में लाते हो वह सत्य है और यदि तुम जो प्राप्त करते हो वह तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन है, तो तुम जिस पथ पर कदम रखते हो वह सही पथ है। यदि तुम जिनका अनुसरण करते हो वे देह के आशीष हैं और तुम जिसे अभ्यास में लाते हो वह तुम्हारी अपनी धारणाओं का सत्य है और यदि तुम्हारे स्वभाव में बिल्कुल कोई भी परिवर्तन नहीं होता है और तुम देहधारी परमेश्वर के प्रति बिल्कुल भी समर्पित नहीं हो और तुम अभी भी अस्पष्टता में जीते हो, तो तुम जिसका अनुसरण कर रहे हो वह निश्चय ही तुम्हें नरक में ले जाएगा, क्योंकि जिस पथ पर तुम चल रहे हो वह विफलता का पथ है। तुम्हें पूर्ण बनाया जाएगा या हटा दिया जाएगा यह तुम्हारे अपने अनुसरण पर निर्भर करता है, जिसका तात्पर्य यह भी है कि सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है