मंज़िलें और परिणाम

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 580

बिजली के बीच सभी प्रकार के जानवर अपने असली स्वरूप में प्रकट कर दिए जाते हैं। इसी प्रकार मेरे प्रकाश से रोशन होकर मनुष्य ने भी उस पवित्रता को वापस पा लिया है जो कभी उसके पास थी। ओह, अतीत का भ्रष्ट संसार! अंततः यह गंदे पानी में पलट गया है और सतह के नीचे डूबकर कीचड़ में बदल गया है! ओह, पूरी मानवजाति, मेरी अपनी सृष्टि! अंततः वह प्रकाश में फिर से जीवित हो गई है, उसने अस्तित्व का आधार प्राप्त कर लिया है और कीचड़ में संघर्ष करना बंद कर दिया है! ओह, वे सभी चीजें जिन्हें मैं अपने हाथों में थामे हूँ! मेरे वचनों के परिणामस्वरूप वे नवीनीकृत कैसे नहीं हो सकतीं? वे प्रकाश में अपने कार्यों को कैसे अंजाम नहीं दे सकतीं? पृथ्वी अब मौत के समान स्थिर और मूक नहीं है, स्वर्ग अब उजाड़ और नीरस नहीं है। स्वर्ग और पृथ्वी के बीच शून्य का विभाजक नहीं रह गया है, फिर कभी अलग न किए जाने के लिए वे एक हो गए हैं। इस हर्षोल्लास के अवसर पर, इस उल्लासपूर्ण क्षण में मेरी धार्मिकता और मेरी पवित्रता पूरे ब्रह्मांड के ऊपर और हर जगह फैल गई हैं और सभी लोगों के बीच निरंतर उनकी प्रशंसा की जाती है। स्वर्ग के नगर आनंद से हँस रहे हैं और पृथ्वी का राज्य आनंद से नृत्य कर रहा है। इस समय कौन आनंदित नहीं है? और कौन रो नहीं रहा है? अपनी आदिम अवस्था में पृथ्वी स्वर्ग की है और स्वर्ग पृथ्वी के साथ एक है। मनुष्य स्वर्ग और पृथ्वी को एक करने वाली डोर है। मनुष्य की पवित्रता के कारण, मनुष्य के नवीनीकरण के कारण स्वर्ग अब पृथ्वी से छिपा हुआ नहीं है और पृथ्वी अब स्वर्ग के प्रति मौन नहीं है। सभी लोगों के चेहरे संतुष्टि की मुस्कान से खिले हैं और उन सभी के दिलों में एक ऐसी मिठास छिपी है जिसकी कोई सीमा नहीं है। लोग एक-दूसरे के साथ झगड़ा या मारपीट नहीं करते हैं। क्या कोई ऐसा है जो मेरे प्रकाश में दूसरों के साथ शांति से नहीं रहता? क्या कोई ऐसा है जो मेरे दिन में मेरे नाम को कलंकित करता है? सभी अपनी भय से भरी नजरें मेरी ओर लगाते हैं और अपने दिलों में वे चुपचाप मुझे पुकारते हैं। मैंने उनके हर कार्य की पड़ताल की है : जिन लोगों को शुद्ध किया गया है उनमें से कोई भी मेरे खिलाफ विद्रोही नहीं है, कोई भी मेरी आलोचना नहीं करता। मेरा स्वभाव सभी लोगों में व्याप्त है। सभी मुझे जान रहे हैं, मेरे करीब आ रहे हैं और मेरा आदर कर रहे हैं। मैं मनुष्य की आत्मा में अडिग खड़ा हूँ, मनुष्य की आँखों में उच्चतम शिखर तक उन्नत हूँ और मनुष्य की नसों में रक्त के माध्यम से बहता हूँ। मनुष्य के दिल का आनंद पृथ्वी के हर स्थान को भर देता है, हवा तेज और ताजा है, घना कोहरा अब जमीन को नहीं ढकता और सूरज दीप्तिमान होकर चमकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 18

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 581

राज्य मानवजाति के बीच फैल रहा है, यह मानवजाति के बीच बन रहा है और यह मानवजाति के बीच खड़ा हो रहा है; ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो मेरे राज्य को नष्ट कर सके। मेरे लोग, जो आज के राज्य में हैं, तुम लोगों में से कौन मानवजाति का सदस्य नहीं है? तुममें से कौन मानवीय स्थिति के बाहर है? जब मेरा नया शुरुआती बिंदु सार्वजनिक किया जाएगा तो लोग किस तरह से प्रतिक्रिया देंगे? तुम लोगों ने अपनी आँखों से मानव दुनिया की दशा देखी है; क्या तुमने अभी तक इस दुनिया में हमेशा के लिए रहने के विचार को नहीं छोड़ा है? अभी मैं अपने लोगों के बीच चल रहा हूँ और मैं उनके बीच रहता हूँ। आज जो लोग मुझसे सच्चा प्रेम करते हैं—ऐसे लोग धन्य हैं। धन्य हैं वे लोग जो मेरे प्रति समर्पण करते हैं, वे मेरे राज्य में बने रहेंगे। धन्य हैं वे लोग जो मुझे जानते हैं, वे मेरे राज्य में सत्ता का उपयोग करेंगे। धन्य हैं वे लोग जो मेरा अनुसरण करते हैं, वे शैतान के बंधनों से मुक्त हो जाएँगे और मेरे आशीषों का आनंद लेंगे। धन्य हैं वे लोग जो अपने खिलाफ विद्रोह कर पाते हैं; वे पूरी तरह मेरे हो जाएँगे और मेरे राज्य की प्रचुरता विरासत में प्राप्त करेंगे। जो लोग मेरे लिए दौड़-धूप करते हैं, उन्हें मैं याद रखूँगा, जो लोग मेरे लिए खुद को खपाते हैं, उन्हें मैं स्वीकार करूँगा और जो लोग मुझे भेंट अर्पित करते हैं, उन्हें मैं आनंद के लिए चीजें दूँगा। जो लोग मेरे वचनों का आनंद लेते हैं, उन्हें मैं आशीष दूँगा; वे मेरे राज्य के स्तंभ होंगे, वे मेरे घर में असीम रूप से समृद्ध होंगे और कोई भी उनसे तुलना नहीं कर सकेगा। क्या तुम लोगों ने कभी वे आशीष स्वीकार किए हैं जो तुम्हारे लिए तैयार किए गए थे? क्या तुम लोगों ने कभी उन वादों का अनुसरण किया है जो तुम लोगों के लिए किए गए थे? तुम लोग मेरे प्रकाश के मार्गदर्शन में अंधकार की शक्तियों का शिकंजा तोड़कर अवश्य बाहर आ जाओगे। तुम अवश्य ही अंधकार के बीच प्रकाश का मार्गदर्शन नहीं खोओगे। तुम अवश्य ही सभी चीजों के मालिक होगे। तुम अवश्य ही शैतान के सामने विजेता होगे। तुम बड़े लाल अजगर के देश के पतन पर मेरी विजय के प्रमाण के रूप में अनगिनत लोगों के बीच अवश्य खड़े होगे। तुम लोग अवश्य ही सिनिम की जमीन पर दृढ़ और अटल रहोगे। तुम जो कष्ट सहते हो उनके परिणामस्वरूप अवश्य ही विरासत में मेरे आशीष प्राप्त करोगे और तुम पूरे ब्रह्मांड में मेरी महिमा के प्रकाश की किरणें बिखेरोगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 19

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 582

मेरे वचन ज्यों-ज्यों पूर्ण होते हैं, पृथ्वी पर धीरे-धीरे राज्य बनता जाता है और मनुष्य धीरे-धीरे सामान्यता की ओर लौटता है, और इस प्रकार पृथ्वी पर वह राज्य स्थापित हो जाता है जो मेरे हृदय में है। राज्य में, परमेश्वर के सभी लोग सामान्य मनुष्य का जीवन पुनः प्राप्त कर लेते हैं। पाले वाली शीत ऋतु विदा हो रही है, उसका स्थान वासंती नगरों का संसार ले रहा है, जहाँ पूरे साल बहार रहती है। लोग अब कभी मनुष्य के संसार की वीरानी का अनुभव नहीं करते हैं और न ही वे मनुष्य के संसार की ठंडी सिहरन सहते हैं। लोग एक दूसरे से लड़ते नहीं हैं, देश एक दूसरे के विरुद्ध युद्ध में नहीं उतरते हैं, नरसंहार अब और नहीं हैं और न वह लहू जो नरसंहार से बहता है; सारे भूभाग आनंद से भरे हैं, और हर जगह लोगों की आपसी गर्माहट से भरी है। मैं पूरे संसार में चलता हूँ, मैं ऊपर अपने सिंहासन से आनंदित होता हूँ, और मैं तारों के बीच रहता हूँ। स्वर्गदूत मेरे लिए नए-नए गीत और नए-नए नृत्य प्रस्तुत करते हैं। उनकी अपनी भंगुरता अब कभी उनकी आँखों से आँसू बहने का कारण नहीं बनती है। अब मुझे अपने सामने स्वर्गदूतों के रोने की आवाज़ नहीं सुनाई देती, और अब कोई भी मुझे अपने दुख नहीं बताता है। आज, तुम सब लोग मेरे सामने रहते हो; कल तुम सब लोग मेरे राज्य में रहोगे। क्या यह सबसे बड़ा आशीष नहीं है जो मैं मनुष्य को देता हूँ? तुम आज जो क़ीमत चुकाते हो, उसके कारण तुम लोग विरासत में भविष्य के आशीष प्राप्त करोगे और मेरी महिमामयी रोशनी के भीतर रहोगे। क्या तुम लोग अब भी मेरे आत्मा के सार से मेलजोल नहीं करना चाहते हो? क्या तुम लोग अब भी अपना वध करना चाहते हो? लोग उन प्रतिज्ञाओं के पीछे भागने को तैयार हैं जिन्हें वे देख सकते हैं, बावजूद इसके वे क्षणभंगुर हैं, परंतु कोई भी आने वाले कल की प्रतिज्ञाओं को स्वीकार करने का इच्छुक नहीं है, बावजूद इसके कि वे अनंत काल तक बनी रहेंगी। मनुष्य को जो चीज़ें दृष्टिगोचर हैं ये वही चीज़ें हैं जिन्हें मैं जड़ से मिटा दूँगा, और जो चीज़ें मनुष्य के लिए दुर्बोध हैं ये वही चीज़ें हैं जिन्हें मैं संपन्न करूँगा। परमेश्वर और मनुष्य के बीच यही अंतर है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 20

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 583

मेरे प्रकाश में, लोग फिर से रोशनी देखते हैं। मेरे वचन में, लोग अपने आनंद के लिए चीजें प्राप्त करते हैं। मैं पूरब से आया हूँ, मैं पूरब से चला हूँ। जब मेरी महिमा की रोशनी चमकती है, तो बेशुमार देश प्रकाशित हो उठते हैं, सब कुछ आलोकित हो उठता है, एक भी चीज़ अंधकार में नहीं रहती। राज्य में, परमेश्वर के साथ परमेश्वर के लोग जो जीवन जीते हैं, वह अत्यंत उल्लासमय है। जलसमूह लोगों के आशीषित जीवन पर आनंद से नृत्य करते हैं, पर्वत लोगों के साथ मेरी प्रचुरता का आनंद लेते हैं। सभी लोग प्रयास कर रहे हैं, मेहनत कर रहे हैं, मेरे राज्य में अपनी लगन दिखा रहे हैं। राज्य में, अब न विद्रोह है, न प्रतिरोध है; स्वर्ग और धरती एक-दूसरे पर निर्भर हैं, इंसान और मैं गहरी भावना के साथ निकट आते हैं, मधुरता से साथ में रहते हुए एक-दूसरे की ओर झुक रहे हैं...। इस समय, मैं औपचारिक रूप से स्वर्ग में अपना जीवन आरंभ करता हूँ। अब शैतान का व्यवधान नहीं है, और लोग विश्राम में प्रवेश करते हैं। कायनात में, मेरे चुने हुए लोग मेरी महिमा की रोशनी में जीते हैं, अतुलनीय रूप से आशीषित हैं, लोग ऐसे नहीं रहते जैसे इंसानों के बीच रहते हैं, बल्कि ऐसे रहते हैं जैसे परमेश्वर के साथ रहते हैं। सभी लोग शैतान की भ्रष्टता से गुजरे हैं, और उन्होंने पूरी तरह से जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव लिए हैं। अब, मेरी रोशनी में रहते हुए, वे आनंद कैसे न उठाएंगे? वे इस खूबसूरत पल को यों ही कैसे छोड़ देंगे और हाथ से कैसे जाने देंगे? ओ लोगो! जल्दी करो, मेरे लिए अपने दिलों के गीत गाओ और खुशी से नाचो! अपने सच्चे दिलों को उन्नत करने के लिए जल्दी करो और उन्हें मुझे अर्पित करो! जल्दी करो, अपने ढोल बजाओ और मेरे लिए खुशी से बाजे बजाओ! मैं ब्रह्मांड के ऊपर से अपनी प्रसन्नता बिखेरता हूँ! मैं सभी लोगों के सामने अपना महिमामय चेहरा प्रकट करता हूँ! मैं ऊँची आवाज़ में पुकारूँगा! मैं ब्रह्मांड के परे हो जाऊँगा! मैं पहले ही लोगों के मध्य शासन करता हूँ! लोगों ने मेरा उत्कर्ष किया है! मैं ऊपर नीले आसमान में बहता हूँ और लोग मेरे साथ चलते हैं। मैं अपने लोगों के मध्य चलता हूँ और वे मुझे घेर लेते हैं! लोगों के दिल उल्लास से भर जाते हैं, उनके जबर्दस्त गीत ब्रह्मांड को हिलाते हैं, आकाश भेद देते हैं! अब ब्रह्मांड धुंध से घिरा हुआ नहीं है; अब न कीचड़ है, न मल का जमाव है। ब्रह्मांड के पवित्र लोग! मेरे निरीक्षण में वे अपना असली चेहरा दिखाते हैं। वे गंदगी से ढके हुए लोग नहीं हैं, बल्कि हरिताश्म की तरह निर्मल पवित्र जन हैं, वे सभी मेरे प्रिय हैं, वे सभी मेरा आनंद हैं! हर चीज पुनः जीवन को प्राप्त होती है। सभी पवित्र जन स्वर्ग में मेरी सेवा के लिए लौट आए हैं, मेरे स्नेहपूर्ण आलिंगन में प्रवेश कर रहे हैं, अब वे विलाप नहीं कर रहे, अब वे चिंता नहीं कर रहे हैं, वे स्वयं को मुझे अर्पित कर रहे हैं, मेरे घर वापस आ रहे हैं, और वे अपनी जन्मभूमि में अनवरत मुझसे प्रेम करेंगे! यह अनंतकाल तक अपरिवर्तनीय होगा! कहाँ है दुख! कहाँ हैं आँसू! कहाँ है देह! धरती अब नहीं है, मगर स्वर्ग सदा के लिए है। मैं बेशुमार लोगों के समक्ष प्रकट होता हूँ और बेशुमार लोग मेरी स्तुति करते हैं। यह जीवन, यह सुंदरता, चिरकाल से समय के अंत तक, बदलेगी नहीं। यही राज्य का जीवन है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, ओ लोगो! आनंद मनाओ!

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 584

मैंने तुम लोगों के बीच बहुत काम किया है और निस्संदेह, कई वचन भी बोले हैं। फिर भी मुझे महसूस हुए बिना नहीं रहता कि मेरे वचनों और कार्य ने अंत के दिनों में मेरे कार्य का उद्देश्य पूर्णतः पूरा नहीं किया है। क्योंकि, अंत के दिनों में, मेरा कार्य किसी विशेष व्यक्ति या विशेष लोगों के लिए नहीं है, बल्कि अपना अंतर्निहित स्वभाव प्रकट करने के लिए है। लेकिन, असंख्य कारणों से—शायद समय की कमी या कार्य की व्यस्तता के कारण—लोगों ने मेरे स्वभाव से मेरे बारे में कोई ज्ञान प्राप्त नहीं किया है। इसलिए मैं अपनी नई योजना, अपना अंतिम कार्य प्रारंभ करता हूँ और अपने कार्य में एक नया पन्ना खोलता हूँ, ताकि वे सब जो मुझे देखते हैं, मेरे अस्तित्व के कारण लगातार अपनी छाती पीटें, रोएँ और निरंतर विलाप करें। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मैं संसार में मनुष्यों के कयामत का दिन लाता हूँ, और इस क्षण से, मैं मनुष्यों के सामने अपना संपूर्ण स्वभाव प्रकट करता हूँ, ताकि वे सभी लोग जो मुझे जानते हैं, और जो नहीं जानते वे भी, अपनी आँखें तृप्त कर सकें और देख सकें कि मैं वास्तव में मनुष्यों के संसार में आ गया हूँ, पृथ्वी पर आ गया हूँ जहाँ सभी चीजें फलती-फूलती रहती हैं। यह मेरी योजना है और मनुष्यों के सृजन के समय से मेरी एकमात्र “स्वीकारोक्ति” है। तुम लोग अपना पूरा ध्यान मेरी प्रत्येक गतिविधि पर दो, क्योंकि मेरी छड़ी एक बार फिर मनुष्यों के पास, उन सबके पास आती है, जो मेरे विरुद्ध जाते हैं।

स्वर्ग के साथ मिलकर मैं वह कार्य आरंभ करता हूँ जो मैं करना चाहता हूँ। इसलिए मैं लोगों की भीड़ के बीच से निकलता हूँ और आसमान और पृथ्वी के बीच विचरण करता हूँ। लोगों ने कभी मेरी गतिविधियों को नहीं जाना है या मेरे वचनों पर ध्यान नहीं दिया है। इसलिए, मेरी योजना निरंतर सुचारु रूप से आगे बढ़ रही है। इतना ही है कि तुम लोगों की सभी अंतर्निहित क्षमताएँ इतनी सुन्न हो गई हैं कि तुम मेरे कार्य के कदमों से अनजान रहते हो। किंतु, एक दिन जरूर आएगा, जब तुम लोग मेरे अभिप्राय जान जाओगे। आज, मैं तुम लोगों के साथ रहता हूँ और तुम लोगों के साथ कष्ट सहता हूँ, और मैंने बहुत पहले ही अपने प्रति इंसान की प्रवृत्ति समझ ली है। मैं इसके बारे में और बात नहीं करना चाहता, और इस कष्टदायक विषय के और उदाहरण देकर तुम्हें शर्मिंदा तो बिल्कुल नहीं करना चाहता। मैं केवल यह आशा करता हूँ कि तुम लोग अपने हृदय में वह सब याद रखो, जो तुम लोगों ने किया है, ताकि जिस दिन हम पुनः मिलें, उस दिन अपने खातों का मिलान कर सकें। मैं तुम लोगों में से किसी पर झूठा आरोप नहीं लगाना चाहता, क्योंकि मैंने सदैव निष्पक्ष रूप से, समझदारी से और ईमानदारी के साथ कार्य किया है। बेशक, मैं यह भी आशा करता हूँ कि तुम लोग खुले और ईमानदार बन सको और ऐसा कुछ न करो, जो स्वर्ग, पृथ्वी और तुम्हारे जमीर के विरुद्ध हो। यही एकमात्र चीज है, जो मैं तुम लोगों से माँगता हूँ। कई लोग बेचैनी और व्यग्रता महसूस करते हैं क्योंकि उन्होंने अत्यंत गंभीर पाप किए हैं, और कई लोग स्वयं पर शर्मिंदा होते हैं क्योंकि उन्होंने कभी एक भी अच्छी चीज नहीं की है। लेकिन ऐसे भी कई लोग हैं, जो अपने पापों पर शर्मिंदा होने के बजाय, बद से बदतर होते जाते हैं, और अपने घिनौने लक्षण पूरी तरह से बेनकाब कर देते हैं—जिनका पूरी तरह से उजागर होना अभी बाकी था—ताकि वे मेरे स्वभाव की परीक्षा ले सकें। मैं किसी एक व्यक्ति के कार्यों की न तो परवाह करता हूँ, न ही उन पर कोई ध्यान देता हूँ। बल्कि, मैं वह कार्य करता हूँ जो मुझे करना चाहिए, चाहे वह जानकारी इकट्ठी करना हो, या देश भर में घूमना हो, या अपनी रुचि का कुछ करना हो। महत्वपूर्ण समयों पर, मैं लोगों के बीच अपने कार्य को, एक भी क्षण पहले या देर से किए बिना, सहजता और संक्षिप्तता दोनों से, मूल योजना के अनुसार आगे बढ़ाता हूँ। लेकिन, मेरे कार्य के हर कदम के साथ कुछ लोगों को अलग कर दिया जाता है, क्योंकि मैं उनके चापलूसी भरे तौर-तरीकों और उनकी झूठी आज्ञाकारिता से बेइंतहा नफरत करता हूँ। जो लोग मुझे घृणित लगते हैं, वे निश्चित रूप से त्याग दिए जाएँगे; लोग चाहे कुछ भी सोचें, मैं उन सभी को, जिनसे मैं नफरत करता हूँ, खुद से दूर रखूँगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि मैं अपने घर में रहने वाले कुकर्मियों को छोड़ूँगा नहीं। क्योंकि मनुष्य को दंड देने का दिन निकट है, मैं उन सभी अत्यधिक नफरत योग्य आत्माओं को अपने घर से बहिष्कृत करने की जल्दबाजी नहीं करता, क्योंकि मेरी अपनी एक योजना है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 585

अब वह समय है जब मैं प्रत्येक व्यक्ति का परिणाम निर्धारित करता हूँ, न कि वह चरण जिसमें मैंने मनुष्य पर काम करना आरंभ किया था। मैं अपनी अभिलेख-पुस्तक में एक-एक करके प्रत्येक व्यक्ति के शब्द और कार्य, मेरा अनुसरण करने में उनका मार्ग, उनका अंतर्निहित वर्गीकरण, और उनकी अंतिम अभिव्यक्तियाँ लिखता हूँ। इस तरह, चाहे वे किसी भी तरह के व्यक्ति हों, कोई भी मेरे हाथ से नहीं बच पाएगा, और मेरे आवंटन के आधार पर सभी अपने किस्म के अनुसार छाँटे जाएँगे। मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंजिल उसकी आयु, वरिष्ठता और उसके द्वारा सही गई पीड़ा की मात्रा के आधार पर निर्धारित नहीं करता और इस आधार पर तो और भी नहीं कि वह कितना दयनीय है, बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि उसके पास सत्य है या नहीं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि जो लोग परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण नहीं करते, वे सब निरपवाद रूप से दंडित किए जाएँगे। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे कोई व्यक्ति नहीं बदल सकता। इसलिए जो लोग दंडित किए जाते हैं, वे सब इस तरह परमेश्वर की धार्मिकता के कारण और अपने अनगिनत बुरे कार्यों के प्रतिफल के रूप में दंडित किए जाते हैं। मैंने अपनी योजना के आरंभ से उसमें एक भी परिवर्तन नहीं किया है। केवल इतना है कि जहाँ तक मनुष्य का संबंध है, ऐसा प्रतीत होता है कि जिनकी ओर मैं अपने वचनों को निर्देशित करता हूँ, उनकी संख्या उसी तरह से घटती जा रही है, जैसे कि उनकी संख्या घट रही है जिन्हें मैं सही मायनों में स्वीकार करता हूँ। लेकिन, मैं अभी भी यही कहता हूँ कि मेरी योजना में कभी बदलाव नहीं आया है; बल्कि, वे तो मनुष्य की आस्था और प्रेम हैं जो हमेशा बदलते रहते हैं और सदैव घट रहे हैं, इस हद तक कि प्रत्येक मनुष्य के लिए संभव है कि वह मेरी खुशामद करना छोड़कर मेरे प्रति उदासीन हो जाए, यहाँ तक कि मुझे बहिष्कृत कर दे। जब तक मैं विकर्षण या घृणा महसूस नहीं करता, और अंततः दंड नहीं देने लगता, तब तक तुम लोगों के प्रति मेरी प्रवृत्ति न तो उत्साहपूर्ण होगी और न ही उत्साहहीन। हालाँकि, तुम लोगों के दंड के दिन भी मैं तुम लोगों को देखूँगा, लेकिन तुम लोग अब मुझे नहीं देख पाओगे। चूँकि तुम लोगों के बीच जीवन मेरे लिए पहले से ही थकाऊ और सुस्त हो गया है, इसलिए कहने की आवश्यकता नहीं कि मैंने रहने के लिए एक अलग परिवेश चुन लिया है, ताकि तुम लोगों के दुर्भावनापूर्ण शब्दों की चोट से और तुम लोगों के असहनीय रूप से गंदे व्यवहार से बेहतर ढंग से दूर रहूँ, कि तुम लोग मुझे अब और मूर्ख न बना सको या मेरे साथ अनमने ढंग से व्यवहार न कर सको। इसके पहले कि मैं तुम लोगों को छोड़कर जाऊँ, मुझे अभी भी तुम लोगों से आग्रह करना चाहिए कि तुम वह करने से बचो, जो सत्य के अनुरूप नहीं है। बल्कि, तुम्हें वह करना चाहिए जो सबके लिए सुखद हो, जो सबको लाभ पहुँचाए, और जो तुम्हारी मंजिल के लिए लाभदायक हो, अन्यथा आपदा के बीच दुःख उठाने वाला इंसान कोई और नहीं, तुम होगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 586

मेरी दया उन पर अभिव्यक्त होती है जो मुझसे प्रेम करते हैं और स्वयं का त्याग करते हैं। इस बीच, कुकर्मियों को मिला दंड निश्चित रूप से मेरे धार्मिक स्वभाव का प्रमाण है, और उससे भी बढ़कर, मेरे क्रोध की गवाही है। जब आपदा आएगी, तो मेरा विरोध करने वाले सभी अकाल और महामारी के शिकार हो जाएँगे और विलाप करेंगे। जिन्होंने कई वर्षों तक मेरा अनुसरण किया है, लेकिन सभी तरह के बुरे कर्म किए हैं, वे अपने पापों का फल भुगतने से नहीं बचेंगे; वे भी लाखों वर्षों में कभी-कभार ही दिखने वाली आपदा में डुबा दिए जाएँगे, और वे लगातार आतंक और भय की स्थिति में जिएँगे। और मेरे वे अनुयायी, जिन्होंने मेरे प्रति परम निष्ठा दर्शाई है, वे आनंद लेंगे और गुणगान करेंगे, मेरी शक्ति की प्रशंसा करेंगे। वे बेफिक्र खुशी की अवर्णनीय मनोदशा का अनुभव करेंगे और ऐसे आनंद में रहेंगे जो मैंने मानवजाति को पहले कभी प्रदान नहीं किया है। क्योंकि मैं मनुष्य के अच्छे कर्मों को सँजोकर रखता हूँ और उसके बुरे कर्मों से घृणा करता हूँ। जबसे मैंने पहली बार मानवजाति की अगुआई करनी आरंभ की, तबसे मैं उत्सुकतापूर्वक मनुष्यों के ऐसे समूह को पाने की आशा करता रहा हूँ, जो मेरे साथ एकचित्त हों। इस बीच मैं उन लोगों को कभी नहीं भूलता, जो मेरे साथ एकचित्त नहीं हैं; अपने हृदय में मैं हमेशा उनसे नफरत करता हूँ, उन्हें बुरे कर्मों के जवाब देने को मजबूर करने के अवसर की प्रतीक्षा करता हूँ, जो कुछ ऐसा है जिसे देखकर मुझे खुशी होगी। अब अंततः मेरा दिन आ गया है, और मुझे अब और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है!

मेरा अंतिम कार्य केवल मनुष्यों को दंड देने के लिए ही नहीं है, बल्कि मनुष्य की मंजिल की व्यवस्था करने के लिए भी है। इससे भी अधिक, यह सभी लोगों से मेरे कर्म और कार्य स्वीकार करवाने की खातिर है। मैं हर एक मनुष्य को दिखा दूँगा कि जो कुछ मैंने किया है, वह सही है, और वह मेरे स्वभाव की अभिव्यक्ति है, कि यह मनुष्य का कार्य नहीं है, और प्रकृति तो वह बिल्कुल भी नहीं है जिसने मानवजाति की रचना की है, और इसके बजाय यह मैं हूँ जो सभी चीजों में हर जीव का पोषण करता है। मेरे अस्तित्व के बिना मानवजाति केवल नष्ट होगी और आपदा का दंड भोगेगी। कोई भी मानव फिर कभी सुंदर सूर्य और चंद्रमा या हरे-भरे संसार को नहीं देखेगा; मानवजाति केवल काली, शीत रात्रि और मृत्यु की छाया की निर्मम घाटी देखेगी। मैं ही मानवजाति का एकमात्र उद्धार हूँ। मैं ही मानवजाति की एकमात्र आशा हूँ, और इससे भी बढ़कर, मैं ही वह हूँ जिस पर संपूर्ण मानवजाति का अस्तित्व निर्भर करता है। मेरे बिना मानवजाति तुरंत अवरुद्ध हो जाएगी, मेरे बिना मानवजाति केवल बर्बाद कर देने वाला विनाश झेलेगी और सभी प्रकार के भूतों द्वारा कुचली जाएगी, इसके बावजूद कोई मुझ पर ध्यान नहीं देता। मैंने वह काम किया है जो किसी दूसरे के द्वारा नहीं किया जा सकता, और मैं केवल यह आशा करता हूँ कि मनुष्य कुछ अच्छे कर्मों से मुझे प्रतिफल दे सके। यद्यपि कुछ ही लोग मुझे प्रतिफल दे पाए हैं, फिर भी मैं मनुष्यों के संसार में अपनी यात्रा पूरी करूँगा और अपने उस कार्य का अगला कदम आरंभ करूँगा जो अभी खुलने वाला है, क्योंकि इन अनेक वर्षों में मनुष्यों के बीच मेरे आने-जाने की सारी भागदौड़ फलदायक रही है, और मैं अति प्रसन्न हूँ। मैं जिस चीज की परवाह करता हूँ, वह मनुष्यों की संख्या नहीं, बल्कि उनके अच्छे कर्म हैं। किसी भी स्थिति में, मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करोगे। तभी मुझे संतुष्टि होगी; अन्यथा तुम लोगों में से कोई भी उस आपदा के हमले से नहीं बचेगा। आपदा मेरे द्वारा शुरू की जाती है और निश्चित रूप से मेरे द्वारा ही आयोजित की जाती है। यदि तुम लोग मेरी नजरों में अच्छे दिखाई नहीं दे सकते, तो तुम लोग आपदा भुगतने से नहीं बच सकते। क्लेश के बीच तुम लोगों के कार्य और कर्म पूरी तरह से उचित नहीं माने गए, क्योंकि तुम लोगों की आस्था और प्रेम खोखले थे और तुम लोगों ने स्वयं को केवल डरपोक या मजबूत दिखाया। इस संबंध में, मैं केवल भले या बुरे का ही न्याय करूँगा। मेरे लिए अब भी सबसे महत्वपूर्ण तुम लोगों में से प्रत्येक के क्रियाकलाप, कर्म और समस्त अभिव्यक्तियाँ ही हैं, जिनके आधार पर मैं तुम लोगों के परिणाम निर्धारित करूँगा। हालाँकि, मुझे यह स्पष्ट कर देना चाहिए : मैं उन लोगों पर अब और दया नहीं करूँगा, जिन्होंने क्लेश के समय में मेरे प्रति रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दिखाई, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी दूर तक ही है। इसके अतिरिक्त, मुझे ऐसा कोई इंसान पसंद नहीं जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो और ऐसे लोगों के साथ जुड़ना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं जो अपने मित्रों के हितों के साथ गद्दारी करते हैं। चाहे जो भी व्यक्ति हो, मेरा यही स्वभाव है। मुझे तुम लोगों को यह बता देना चाहिए : जो कोई भी पूरी तरह से मेरा दिल तोड़ता है, उसे मुझसे दूसरी बार क्षमा नहीं मिलेगी, और जो कोई मेरे प्रति वफादार रहा है, वह सदैव मेरे दिल में रहेगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 587

दुनिया के विशाल विस्तार में अनगिनत बार गाद भरने से महासागर खेतों में बदल जाते हैं और खेत बाढ़ से महासागरों में बदल जाते हैं। सिवाय उसके जो सभी चीजों पर संप्रभु है, ऐसा कोई नहीं है जो इस मानवजाति की अगुआई और मार्गदर्शन कर सके। कोई ऐसा “पराक्रमी” नहीं है जो इस मानवजाति के लिए कड़ी मेहनत या तैयारी कर सकता हो, और ऐसा तो कोई भी नहीं है जो इस मानवजाति को प्रकाश की मंज़िल की ओर ले जाने में अगुआई कर सके और इसे मानव संसार के अन्यायों से मुक्त करा सके। परमेश्वर मानवजाति के भविष्य पर विलाप करता है, वह मानवजाति के पतन पर शोक करता है, और उसे पीड़ा होती है कि मानवजाति कदम-दर-कदम क्षय और ऐसे मार्ग की ओर बढ़ रही है जहाँ से वापसी संभव नहीं है। किसी ने कभी यह नहीं सोचा है : जिस मानवजाति ने पूरी तरह परमेश्वर का दिल तोड़ दिया है और बुरे को खोजने के लिए परमेश्वर का त्याग कर दिया है, वह भला कहाँ जा रही होगी? ठीक इसी कारण से कोई परमेश्वर के क्रोध को भाँपने की कोशिश नहीं करता, उस मार्ग को नहीं खोजता जो परमेश्वर को खुश करे या परमेश्वर के करीब आने की कोशिश नहीं करता, और इससे भी अधिक, कोई परमेश्वर के दुख और दर्द को समझने की कोशिश नहीं करता। परमेश्वर की वाणी सुनने के बाद भी मनुष्य अपने मार्ग पर चलता रहता है, परमेश्वर से दूर रहने, परमेश्वर के अनुग्रह और देखभाल से बचने, उसके सत्य से कतराने में लगा रहता है, अपने आप को परमेश्वर के दुश्मन, शैतान को बेचना पसंद करता है। और किसने इस बात पर कोई विचार किया है कि अगर मनुष्य अपने हठीपन पर अड़ा रहा तो परमेश्वर इस मानवजाति के साथ कैसे पेश आएगा जो उसका इतना अत्यंत निरादर करती है? कोई नहीं जानता कि मनुष्य को लेकर परमेश्वर के बार-बार के अनुस्मारकों और गंभीर आग्रहों का कारण यह है कि उसने अपने हाथों में अभूतपूर्व विनाश तैयार कर रखे हैं, ऐसे विनाश जो मनुष्य की देह और आत्मा के लिए असहनीय होंगे, ये विनाश केवल देह का ही दंड नहीं होंगे, बल्कि मनुष्य की आत्मा को भी निशाना बनाएँगे। तुम्हें यह जानने की आवश्यकता है : जब परमेश्वर की योजना निष्फल होगी और जब उसके अनुस्मारकों और आग्रहों का कोई प्रतिदान नहीं मिलेगा, तो वह किस प्रकार का क्रोध प्रकट करेगा? यह ऐसा होगा जिसे पहले कभी किसी सृजित प्राणी ने अनुभव किया या जाना नहीं होगा। और इसलिए मैं कहता हूँ, ये विनाश पहले कभी नहीं हुए और कभी दोहराए नहीं जाएँगे। क्योंकि परमेश्वर की योजना मानवजाति का केवल इस बार सृजन करने और उसे केवल इस बार बचाने की है। यह पहली बार है और यही अंतिम बार भी है। इसलिए परमेश्वर इस बार मानवजाति को जिन श्रमसाध्य इरादों और उत्कट प्रत्याशा से बचाता है, उन्हें कोई नहीं समझ सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 588

मनुष्य को आज के कार्य और भविष्य के कार्य की कुछ समझ है, किंतु वह यह नहीं समझता कि मानवजाति किस मंज़िल में प्रवेश करेगी। एक सृजित प्राणी के रूप में मनुष्य को सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना चाहिए। जो कुछ भी परमेश्वर करता है, उसमें मनुष्य को उसका अनुसरण करना चाहिए; जैसे मैं तुम लोगों को बताता हूँ, वैसे ही तुम्हें आगे बढ़ना चाहिए। तुम्हारे पास अपने लिए चीजों का प्रबंधन करने का कोई तरीका नहीं है और तुम्हारा स्वयं पर कोई अधिकार नहीं है। सब कुछ परमेश्वर के आयोजन पर छोड़ दिया जाना चाहिए, और हर चीज उसके हाथों में है। यदि अपने कार्य में परमेश्वर ने मनुष्य को एक परिणाम, एक अद्भुत मंज़िल समय से पहले प्रदान कर दिए होते और यदि परमेश्वर ने इसका उपयोग मनुष्य को लुभाने और उससे अपना अनुसरण करवाने के लिए किया होता—यदि उसने मनुष्य के साथ कोई सौदा किया होता—तो यह विजय न होती, न ही यह मनुष्य के जीवन का निर्माण होता। यदि परमेश्वर को मनुष्य के परिणाम का उपयोग उसे नियंत्रित करने और उसके हृदय को पाने के लिए करना होता, तो इसमें वह मनुष्य को पूर्ण नहीं कर रहा होता, न ही वह मनुष्य को पाने में सक्षम होता, बल्कि इसके बजाय वह मंज़िल का उपयोग मनुष्य को नियंत्रित करने के लिए कर रहा होता। मनुष्य भविष्य के परिणाम, अंतिम मंज़िल, और आशा करने के लिए कोई अच्छी चीज है या नहीं, इससे अधिक और किसी चीज की परवाह नहीं करता। यदि विजय के कार्य के दौरान मनुष्य को एक खूबसूरत आशा दे दी जाती, और यदि मनुष्य पर विजय से पहले उसे अनुसरण के लिए उपयुक्त मंज़िल दे दी जाती, तो न केवल मनुष्य पर विजय ने अपना परिणाम प्राप्त न किया होता, बल्कि विजय के कार्य का परिणाम भी प्रभावित हो गया होता। अर्थात्, विजय का कार्य मनुष्य के भाग्य और उसके भविष्य की संभावनाओं को छीनने और मनुष्य के विद्रोही स्वभाव का न्याय और उसकी ताड़ना करने से अपना परिणाम प्राप्त करता है। इसे मनुष्य के साथ सौदा करके, अर्थात् मनुष्य को आशीष और अनुग्रह देकर प्राप्त नहीं किया जाता, बल्कि मनुष्य को उसकी “स्वतंत्रता” से वंचित करके और उसकी भविष्य की संभावनाओं को जड़ से उखाड़कर और इस प्रकार यह देखकर प्राप्त किया जाता है कि वह कितना वफादार है। यह विजय के कार्य का सार है। यदि मनुष्य को बिल्कुल आरंभ में ही एक खूबसूरत आशा दे दी गई होती, और ताड़ना और न्याय का कार्य बाद में किया जाता, तो मनुष्य इस ताड़ना और न्याय को इस आधार पर स्वीकार कर लेता कि उसके पास भविष्य की संभावनाएँ हैं, और अंत में, सृष्टिकर्ता को उसके सभी सृजित प्राणियों से बिना शर्त समर्पण और आराधना प्राप्त नहीं होती; वहाँ केवल अंधा, अज्ञानी समर्पण ही होता, या फिर मनुष्य परमेश्वर से आँख मूँदकर माँगें करता और मनुष्य के हृदय पर पूरी तरह से विजय प्राप्त करना असंभव होता। इसके परिणामस्वरूप, विजय के ऐसे कार्य के लिए मनुष्य को प्राप्त करना असंभव होगा, मनुष्य के लिए परमेश्वर की गवाही देना तो और भी असंभव होगा। ऐसे सृजित प्राणी अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ होते और वे परमेश्वर के साथ केवल मोल-भाव ही करते; यह विजय न होती, बल्कि करुणा और आशीष होते। मनुष्य की सबसे बड़ी कठिनाई यही है कि वह हमेशा अपने भाग्य और भविष्य की संभावनाओं के बारे में सोचता है और इन चीजों की पूजा करता है। मनुष्य अपने भाग्य और भविष्य की संभावनाओं के वास्ते परमेश्वर का अनुसरण करता है; वह परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम की वजह से उसकी आराधना नहीं करता। और इसलिए मनुष्य पर विजय में मनुष्य के स्वार्थ, लोभ और जो चीजें उसके द्वारा परमेश्वर की आराधना में सबसे अधिक व्यवधान डालती हैं, उन सभी से निपटा जाना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य पर विजय प्राप्त कर ली जाती है। परिणामस्वरूप, मनुष्य पर विजय के पहले चरणों में यह जरूरी है कि पहले मनुष्य की अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं और सबसे घातक कमजोरियों को दूर किया जाए, ताकि मनुष्य का परमेश्वर-प्रेमी हृदय प्रकट किया जाए और मानव-जीवन के बारे में उसके ज्ञान को, परमेश्वर के बारे में उसके दृष्टिकोण को, और उसके अस्तित्व के अर्थ को बदल दिया जाए। इस तरह से, मनुष्य का परमेश्वर-प्रेमी हृदय शुद्ध हो जाता है, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य के हृदय को जीत लिया जाता है। किंतु सभी सृजित प्राणियों के प्रति अपने दृष्टिकोण में परमेश्वर केवल जीतने के वास्ते विजय प्राप्त नहीं करता; बल्कि वह मनुष्य को पाने के लिए, अपनी स्वयं की महिमा के लिए, और मनुष्य की आदिम, मूल सदृशता पुनः हासिल करने के लिए विजय प्राप्त करता है। यदि उसे केवल विजय पाने के वास्ते ही विजय पानी होती, तो विजय के कार्य का महत्व खो गया होता। कहने का तात्पर्य है कि यदि परमेश्वर केवल मनुष्य पर विजय प्राप्त कर लेता और ऐसा करने के बाद मनुष्य से पीछा छुड़ा लेता और उसके जीवन और मृत्यु पर कोई ध्यान नहीं देता, तो यह मानव-जाति का प्रबंधन न होता, न ही यह उसके उद्धार के वास्ते होता। केवल मनुष्य पर विजय पाने के बाद उसे प्राप्त करना और अंततः मानवजाति को एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना ही उद्धार के समस्त कार्य के केंद्र में है, और केवल यही मनुष्य के उद्धार का लक्ष्य प्राप्त करता है। दूसरे शब्दों में, केवल एक अद्भुत मंज़िल पर मनुष्य का आगमन और विश्राम में उसका प्रवेश ही भविष्य की वे संभावनाएँ हैं, जो सभी सृजित प्राणियों के पास होनी चाहिए और वह कार्य है जिसे सृष्टिकर्ता द्वारा किया जाना चाहिए। यदि मनुष्य को यह कार्य करना पड़ता, तो यह बहुत ही सीमित होता : यह मनुष्य को एक निश्चित बिंदु तक ले जा सकता था, किंतु यह मनुष्य को शाश्वत मंज़िल पर ले जाने में सक्षम न होता। मनुष्य की नियति निर्धारित करने में मनुष्य सक्षम नहीं है, वह मनुष्य की भविष्य की संभावनाओं और भविष्य की मंज़िल सुनिश्चित करने में तो बिल्कुल भी सक्षम नहीं है। किंतु परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य भिन्न है। चूँकि उसने मनुष्य को सृजा है, इसलिए वह उसकी अगुआई करता है; चूँकि वह मनुष्य को बचाता है, इसलिए वह उसे पूरी तरह से बचाएगा और उसे पूरी तरह से प्राप्त करेगा; चूँकि वह मनुष्य की अगुआई करता है, इसलिए वह उसे उस उपयुक्त मंज़िल पर ले जाएगा, और चूँकि उसने मनुष्य का सृजन किया है और उसका प्रबंध करता है, इसलिए उसे मनुष्य के भाग्य और उसकी भविष्य की संभावनाओं की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। यही वह कार्य है, जिसे सृष्टिकर्ता द्वारा किया जाता है। यद्यपि विजय का कार्य मनुष्य की भविष्य की संभावनाओं को समाप्त करके प्राप्त किया जाता है, फिर भी अंततः मनुष्य को उस उपयुक्त मंज़िल पर अवश्य लाया जाना चाहिए, जिसे परमेश्वर द्वारा उसके लिए तैयार किया गया है। परमेश्वर द्वारा मनुष्य को आकार देने के कारण ही मनुष्य के पास एक मंज़िल है और उसका भाग्य सुनिश्चित है। यहाँ उल्लिखित उचित मंज़िल, पहले समाप्त की गईं मनुष्य की आशाएँ और भविष्य की संभावनाएँ नहीं हैं; ये दोनों भिन्न हैं। जिन चीजों की मनुष्य आशा और अनुसरण करता है, वे मनुष्य की नियत मंज़िल के बजाय, वे चीजें हैं जिनके लिए वह देह की असंयमी इच्छाओं के अनुसरण के दौरान तरसता है। इस बीच, जो कुछ परमेश्वर ने मनुष्य के लिए तैयार किया है, वह उसे शुद्ध किए जाने के बाद देय ऐसा आशीष और वादा है, जिसे परमेश्वर ने संसार के सृजन के बाद मनुष्य के लिए तैयार किया था, और जो मनुष्य की पसंद, धारणाओं, कल्पनाओं या देह के द्वारा दूषित नहीं है। यह मंज़िल किसी व्यक्ति-विशेष के लिए तैयार नहीं की गई है, बल्कि यह संपूर्ण मानव-जाति के लिए विश्राम का स्थल है। और इसलिए, यह मंज़िल मानव-जाति के लिए सबसे उपयुक्त मंज़िल है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 589

सृष्टिकर्ता सृजित प्राणियों का आयोजन करने का इरादा रखता है। वह जो कुछ भी करता है, तुम्हें उससे बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए—तुम्हें उसकी आज्ञा माननी चाहिए और उसके प्रति विद्रोही नहीं होना चाहिए। जब उसके द्वारा किया जाने वाला कार्य अंततः उसके लक्ष्य हासिल करेगा, तो वह इसमें महिमा प्राप्त करेगा। आज तुम्हारे मोआब का वंशज या बड़े लाल अजगर की संतान होने की बात क्यों नहीं होती है, क्यों चुने हुए लोगों के बारे में कोई बात नहीं होती है और क्यों केवल सृजित प्राणियों के बारे में ही बातचीत होती है? सृजित प्राणी—यह मनुष्य का मूल पदनाम था, उसकी मूल पहचान थी। नाम केवल इसलिए अलग-अलग होते हैं, क्योंकि कार्य की अवधियाँ और चरण अलग-अलग होते हैं; वास्तव में, मनुष्य एक साधारण सृजित प्राणी है। सभी सृजित प्राणियों को, चाहे वे अत्यंत भ्रष्ट हों या अत्यंत पवित्र, एक प्राणी का कर्तव्य अवश्य निभाना चाहिए। जब परमेश्वर विजय का कार्य करता है, तो वह तुम्हारे भविष्य की संभावनाओं, भाग्य या मंज़िल का उपयोग करके तुम्हें नियंत्रित नहीं करता। वास्तव में इस तरह से कार्य करने की कोई आवश्यकता नहीं है। विजय के कार्य का लक्ष्य मनुष्य से एक सृजित प्राणी के कर्तव्य का पालन करवाना है, उससे सृष्टिकर्ता की आराधना करवाना है; केवल इसके बाद ही वह अद्भुत मंज़िल में प्रवेश कर सकता है। मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के हाथों से नियंत्रित होता है। तुम स्वयं को नियंत्रित करने में असमर्थ हो। भले ही मनुष्य अपने लिए भाग-दौड़ करता रहे और व्यस्त रहे, फिर भी वह स्वयं को नियंत्रित करने में अक्षम रहता है। यदि तुम अपने भविष्य की संभावनाओं को जान सकते, यदि तुम अपने भाग्य को नियंत्रित कर सकते, तो क्या तुम्हें तब भी एक सृजित प्राणी कहा जाता? संक्षेप में, परमेश्वर चाहे जैसे भी कार्य करे, उसका समस्त कार्य केवल मानवजाति के वास्ते होता है। यह वैसा ही है जैसे स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों को परमेश्वर ने मनुष्य की सेवा करने के लिए सृजित किया है : परमेश्वर ने मनुष्य के लिए चंद्रमा, सूर्य और तारे बनाए, उसने मनुष्य के लिए जानवर और पेड़-पौधे बनाए, उसने मनुष्य के लिए बसंत, ग्रीष्म, शरद और शीत ऋतु इत्यादि बनाए—ये सब मनुष्य के अस्तित्व के वास्ते ही बनाए गए थे। और इसलिए, परमेश्वर मनुष्य को चाहे जैसे भी ताड़ित करता हो या चाहे जैसे भी उसका न्याय करता हो, यह सब मनुष्य के उद्धार के वास्ते ही है। यद्यपि वह मनुष्य को उसकी दैहिक आशाओं से वंचित कर देता है, फिर भी यह मनुष्य को शुद्ध करने के वास्ते है, और मनुष्य का शुद्धिकरण मनुष्य के अस्तित्व के लिए किया जाता है। मनुष्य की मंज़िल सृष्टिकर्ता के हाथ में है, तो मनुष्य स्वयं को नियंत्रित कैसे कर सकता है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 590

विजय का कार्य पूरा कर लिए जाने के बाद मनुष्य को एक सुंदर संसार में लाया जाएगा। यह जीवन बेशक अभी भी पृथ्वी पर होगा, किंतु यह मनुष्य के आज के जीवन से बिल्कुल भिन्न होगा। यह वह जीवन है जो मानवजाति के पास तब होगा जब संपूर्ण मानवजाति पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी, यह पृथ्वी पर मनुष्य के लिए एक नई शुरुआत होगी। मानवजाति के पास इस प्रकार का जीवन होना इस बात का सबूत होगा कि मानवजाति ने एक नए और सुंदर क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है; यह पृथ्वी पर परमेश्वर और मनुष्य के जीवन की शुरुआत होगी। ऐसे सुंदर जीवन के लिए यह पूर्वापेक्षा जरूर होनी चाहिए कि मनुष्य को शुद्ध कर दिए जाने और उस पर विजय पा लिए जाने के बाद वह सृष्टिकर्ता के सम्मुख समर्पण कर दे। और इसलिए, मानवजाति के अद्भुत मंजिल में प्रवेश करने से पहले विजय का कार्य परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण है। ऐसा जीवन पृथ्वी पर मनुष्य का भविष्य का जीवन है, पृथ्वी पर सबसे अधिक सुंदर जीवन है, उस प्रकार का जीवन है जिसके लिए मनुष्य लालायित रहता है और उस प्रकार का जीवन है जिसे मनुष्य ने संसार के इतिहास में पहले कभी प्राप्त नहीं किया है। यह 6,000 वर्षों के प्रबंधन के कार्य का अंतिम परिणाम है; यही वह चीज है जिसके लिए मानवजाति सर्वाधिक लालायित रहती है और यह मनुष्य से परमेश्वर का वादा भी है। किंतु यह वादा तुरंत पूरा नहीं हो सकता है : मनुष्य भविष्य की मंजिल में केवल तभी प्रवेश करेगा जब अंत के दिनों का कार्य पूरा हो चुका होगा और उस पर पूरी तरह से विजय पा ली गई होगी, अर्थात् जब शैतान पूरी तरह से पराजित किया जा चुका होगा। शोधन कर दिए जाने के बाद मनुष्य पापपूर्ण प्रकृति से रहित हो जाएगा, क्योंकि परमेश्वर ने शैतान को पराजित कर दिया होगा, अर्थात् विरोधी ताक़तों द्वारा कोई अतिक्रमण नहीं होगा, और कोई विरोधी ताक़तें नहीं होंगी जो मनुष्य की देह पर आक्रमण कर सकें। और इसलिए मनुष्य स्वतंत्र और पावनीकृत होगा—वह शाश्वतता में प्रवेश कर चुका होगा। केवल यदि अंधकार की शत्रुतापूर्ण ताकतों को बंधन में रखा जाएगा और मनुष्य जहाँ कहीं भी जाएगा, वहाँ स्वतंत्र होगा, तभी मनुष्य विद्रोहशीलता या विरोध से रहित होगा। बस शैतान को क़ैद में रखना है, और मनुष्य के साथ सब ठीक हो जाएगा; वर्तमान स्थिति इसलिए विद्यमान है, क्योंकि शैतान अभी भी पृथ्वी पर हर जगह विघ्न पैदा करता है, और क्योंकि परमेश्वर के प्रबंधन का संपूर्ण कार्य अभी तक लक्ष्य तक नहीं पहुँचा है। एक बार जब शैतान को पराजित कर दिया जाएगा, तो मनुष्य पूरी तरह से मुक्त हो जाएगा; जब मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त कर लेगा और शैतान की सत्ता से बाहर आ जाएगा, तो वह धार्मिकता के सूर्य को देखेगा। सामान्य मनुष्य के लिए उचित जीवन पुनः प्राप्त कर लिया जाएगा; वह सब, जो सामान्य मनुष्य के पास होना चाहिए—जैसे भले और बुरे में भेद करने की योग्यता, और इस बात की समझ कि किस प्रकार भोजन करना है और किस प्रकार कपड़े पहनने हैं, और सामान्य मानव-जीवन जीने की योग्यता—यह सब पुनः प्राप्त कर लिया जाएगा। सबसे पहले मनुष्य के सृजन के बाद, यदि हव्वा को साँप द्वारा प्रलोभन न दिया गया होता, तब भी मनुष्य के पास ऐसा ही सामान्य जीवन होना चाहिए था। उसे पृथ्वी पर भोजन करना, कपड़े पहनना और सामान्य मानव-जीवन जीना चाहिए था। किंतु मनुष्य के भ्रष्ट हो जाने के बाद यह जीवन एक अप्राप्य भ्रम बन गया, यहाँ तक कि आज भी मनुष्य ऐसी चीजों की कल्पना करने का साहस नहीं करता। वास्तव में, यह सुंदर जीवन, जिसकी मनुष्य अभिलाषा करता है, एक आवश्यकता है। यदि मनुष्य ऐसी मंज़िल से रहित होता, तब पृथ्वी पर उसका भ्रष्ट जीवन कभी समाप्त न होता, और यदि ऐसा कोई सुंदर जीवन न होता, तो शैतान के भाग्य का या उस युग का कोई समापन न होता, जिसमें शैतान पृथ्वी पर सामर्थ्य रखता है। मनुष्य को ऐसे क्षेत्र में पहुँचना चाहिए, जो अंधकार की ताक़तों के लिए अगम्य हो, और जब मनुष्य वहाँ पहुँच जाएगा, तो यह प्रमाणित हो जाएगा कि शैतान को पराजित कर दिया गया है। इस प्रकार, जब शैतान द्वारा कोई व्यवधान नहीं रहेगा और मानवजाति स्वयं परमेश्वर के हाथों में होगी और मनुष्य का संपूर्ण जीवन परमेश्वर की पकड़ में और उसके नियंत्रण में होगा, केवल तभी इसे शैतान की पराजय कहा जाएगा। आज मनुष्य का जीवन अधिकांशतः गंदगी का जीवन है; वह अभी भी पीड़ा और क्लेश का जीवन है। इसे शैतान की पराजय नहीं कहा जा सकता; मनुष्य को अभी भी संताप के सागर से बचना है, अभी भी जीवन के कष्टों से या शैतान के प्रभाव से बचना है, और उसे अभी भी परमेश्वर का बहुत कम ज्ञान है। मनुष्य के समस्त कष्ट शैतान द्वारा उत्पन्न किए गए थे, यह शैतान ही था जो मनुष्य के जीवन में कठिनाई लाया और शैतान को बंधन में रखने के बाद ही मनुष्य संताप के सागर से पूरी तरह से बचने में सक्षम होगा। मनुष्य को वह लाभ बनाकर जो शैतान के साथ हुए युद्ध में जीत के फलस्वरूप मिला है और मनुष्य के हृदय पर विजय पाकर और उसे प्राप्त करके शैतान को बंदी बनाया जाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 591

विजेता बनना और पूर्ण बनाया जाना ऐसी चीजें हैं जिनका अनुसरण आज मनुष्य अपने पास पृथ्वी पर सामान्य जीवन होने से पहले से कर रहा है, और ये ऐसे उद्देश्य हैं जिनका अनुसरण वह शैतान को बंधन में डाले जाने से पहले करता है। सार रूप में, विजेता बनने, पूर्ण बनाए जाने, या अपना भरपूर उपयोग किए जाने का मनुष्य का अनुसरण शैतान के प्रभाव से बचने के लिए है : मनुष्य का अनुसरण विजेता बनने के लिए है, किंतु अंतिम परिणाम उसका शैतान के प्रभाव से बचना ही होगा। जब तक मनुष्य शैतान के प्रभाव से बचता है, वह पृथ्वी पर सामान्य मानव-जीवन, परमेश्वर की आराधना करने वाला जीवन जी सकता है। विजेता बनना और पूर्ण बनाया जाना ऐसी चीजें हैं जिनका अनुसरण आज मनुष्य पृथ्वी पर सामान्य जीवन पाने से पहले से कर रहा है। उनका अनुसरण मुख्य रूप से शुद्ध किए जाने और सत्य को अभ्यास में लाने और सृष्टिकर्ता की आराधना करने के लिए किया जाता है। यदि मनुष्य पृथ्वी पर सामान्य मानव-जीवन, ऐसा जीवन जो कष्ट या क्लेश से रहित है, धारण करता है, तो वह विजेता बनने की कोशिश में संलग्न नहीं होगा। “विजेता बनना” और “पूर्ण बनाया जाना” ऐसे उद्देश्य हैं, जिन्हें परमेश्वर मनुष्य को अनुसरण करने के लिए देता है और इन उद्देश्यों के अनुसरण के माध्यम से वह मनुष्य द्वारा सत्य को अभ्यास में लाने और एक अर्थपूर्ण जीवन व्यतीत करने का कारण बनता है। इसका उद्देश्य मनुष्य को पूर्ण बनाना और प्राप्त करना है, और विजेता बनने या पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण मात्र एक साधन है। यदि भविष्य में मनुष्य अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करता है, तो वहाँ विजेता बनने और पूर्ण बनाए जाने का कोई संदर्भ नहीं होगा; वहाँ हर सृजित प्राणी केवल अपना कर्तव्य निभा रहा होगा। आज मनुष्य से इन चीजों का अनुसरण करना केवल उसके लिए एक दायरा परिभाषित करने हेतु करवाया जाता है, ताकि मनुष्य का अनुसरण अधिक लक्षित और अधिक व्यावहारिक हो सके। अन्यथा मनुष्य एक अस्पष्ट और रिक्त आध्यात्मिक अवस्था में रहता और अनंत जीवन में प्रवेश का अनुसरण करता और यदि ऐसा होता, तो क्या मनुष्य और भी अधिक दयनीय न होता? इस तरह से लक्ष्यों या सिद्धांतों के बिना अनुसरण करना—क्या यह आत्म-वंचना नहीं है? अंततः, यह अनुसरण स्वाभाविक रूप से निष्फल होता; अंत में मनुष्य अभी भी शैतान की सत्ता के अधीन जीवन बिताता और स्वयं को उससे छुड़ाने में अक्षम होता। स्वयं को ऐसे लक्ष्यहीन अनुसरण के अधीन क्यों किया जाए? जब मनुष्य अनंत मंज़िल में प्रवेश करेगा, तो मनुष्य सृष्टिकर्ता की आराधना करेगा और चूँकि मनुष्य बचाया जा चुका होगा और अनंतता में प्रवेश कर चुका होगा, इसलिए अब वह किसी लक्ष्य का अनुसरण नहीं करेगा, शैतान द्वारा घेरे जाने की चिंता करने की जरूरत पड़ना तो दूर की बात है। इस समय हर व्यक्ति अपने स्थान पर रहेगा और अपना कर्तव्य निभाएगा, और भले ही लोगों को ताड़ना न दी जाए या उनका न्याय न किया जाए, फिर भी प्रत्येक व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाएगा। उस समय मनुष्य पहचान और स्थिति दोनों में एक सृजित प्राणी होगा। तब ऊँच और नीच का भेद नहीं रहेगा; बस यह है कि प्रत्येक व्यक्ति एक भिन्न भूमिका निभाएगा। लेकिन मनुष्य अभी भी एक ऐसी मंजिल में जिएगा जो मानवजाति के लिए व्यवस्थित और उपयुक्त होगी; मनुष्य सृष्टिकर्ता की आराधना करने के वास्ते अपना कर्तव्य निभाएगा और यही वह मानवजाति होगी जो अनंतता की मानवजाति होगी। उस समय, मनुष्य ने परमेश्वर द्वारा रोशन किया गया जीवन प्राप्त कर लिया होगा, ऐसा जीवन जो परमेश्वर की देखरेख और रक्षा के अधीन हो, और वह परमेश्वर के साथ जिएगा। मानवजाति पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन जिएगी और सभी लोग उचित मार्ग में प्रवेश करेंगे। 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना शैतान को पूरी तरह से पराजित कर चुकी होगी, अर्थात् परमेश्वर मनुष्य की उस मूल छवि को बहाल कर चुका होगा जो पृथ्वी पर उसे सृजित करने के बाद थी, और इस प्रकार परमेश्वर के मूल इरादे पूरे हो चुके होंगे। शुरुआत में, शैतान द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट किए जाने से पहले, मानवजाति पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन जीती थी। बाद में जब मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया तो मनुष्य ने इस सामान्य जीवन को गँवा दिया और इसलिए मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करने के लिए परमेश्वर का प्रबंधन कार्य और शैतान के साथ उसका युद्ध शुरू हुआ। जब परमेश्वर का 6,000-वर्षीय प्रबंधन कार्य समाप्ति पर पहुँचेगा, केवल तभी पृथ्वी पर समस्त मानवजाति का जीवन आधिकारिक रूप से आरंभ होगा; केवल तभी मनुष्य के पास एक अद्भुत जीवन होगा और परमेश्वर आरंभ में मनुष्य को सृजित करने के अपने प्रयोजन को और साथ ही मानव की मूल छवि को बहाल करेगा। और इसलिए एक बार जब मनुष्य के पास पृथ्वी पर मानवजाति का सामान्य जीवन होगा तो मनुष्य विजेता बनने या पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण नहीं करेगा क्योंकि मनुष्य पावनीकृत होगा। जिस “विजेता” और “पूर्ण बनाए जाने” के बारे में लोग बात करते हैं, वे ऐसे उद्देश्य हैं, जो मनुष्य को परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध के दौरान अनुसरण करने के लिए दिए गए हैं और वे केवल इसलिए अस्तित्व में हैं, क्योंकि मनुष्य को भ्रष्ट कर दिया गया है। ऐसा है कि तुम्हें एक उद्देश्य देने और तुमसे उस उद्देश्य के लिए अनुसरण करवाने से शैतान पराजित हो जाएगा। तुमसे विजेता बनने या तुम्हें पूर्ण बनाए जाने या उपयोग किए जाने के लिए कहना यह आवश्यक बनाता है कि तुम शैतान को शर्मिंदा करने के लिए गवाही दो। अंत में, अगर लोग पृथ्वी पर सामान्य मानव-जीवन जिएँगे और हर किसी को पावनीकृत कर दिया गया होगा, क्या तब भी वे विजेता बनने का अनुसरण करेंगे? क्या वे सभी सृजित प्राणी नहीं हैं? विजेता बनने और पूर्ण होने की बात करें, तो ये वचन शैतान की ओर, और मनुष्य की मलिनता की ओर निर्देशित हैं। क्या यह “विजेता” शब्द शैतान पर और विरोधी ताक़तों पर विजय के संदर्भ में नहीं है? जब तुम कहते हो कि तुम्हें पूर्ण बना दिया गया है, तो तुम्हारे भीतर क्या पूर्ण बनाया गया है? क्या ऐसा नहीं है कि तुमने अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को उतारकर फेंक दिया है और तुम परमेश्वर से अत्यधिक प्रेम करने लगे हो? ऐसी बातें मनुष्य के भीतर की गंदी चीजों के संबंध में, और शैतान के संबंध में कही जाती हैं; उन्हें परमेश्वर के संबंध में नहीं कहा जाता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 592

जब मनुष्य पृथ्वी पर असली मानवीय जीवन प्राप्त कर लेगा और शैतान की सभी ताकतों को बंधन में डाल दिया जाएगा, तब मनुष्य बड़ी आसानी से पृथ्वी पर जीवन-यापन करेगा। चीजें उतनी जटिल नहीं होंगी, जितनी आज हैं : पारस्परिक रिश्ते, सामाजिक रिश्ते, जटिल पारिवारिक रिश्ते—वे इतनी परेशानी, इतना दर्द लेकर आते हैं! इन सबके बीच जीना कितना कष्टदायक है! एक बार मनुष्य पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी, तो उसका दिल और मन बदल जाएगा। उसके पास परमेश्वर का भय मानने वाला और परमेश्वर-प्रेमी हृदय होगा। एक बार जब समस्त विश्व में परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करने वाले लोगों पर विजय पा ली जाएगी, अर्थात् एक बार जब शैतान को हरा दिया जाएगा और एक बार जब शैतान—अंधकार की सभी शक्तियों को—बंधन में डाल दिया जाएगा, तब पृथ्वी पर मनुष्य का जीवन निर्विघ्न हो जाएगा और वह पृथ्वी पर स्वतंत्र रूप से जीवन जी सकेगा। यदि मनुष्य का जीवन दैहिक रिश्तों और देह के जटिल मामलों से रहित होता, तो यह बहुत अधिक आसान होता। मनुष्य के दैहिक रिश्ते बहुत जटिल होते हैं, और मनुष्य के लिए ऐसी चीजों का होना इस बात का प्रमाण है कि उसने स्वयं को अभी तक शैतान के प्रभाव से मुक्त नहीं किया है। यदि प्रत्येक भाई-बहन के साथ तुम्हारा रिश्ता समान होता, यदि अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य के साथ तुम्हारा रिश्ता समान होता, तो तुम्हें परेशान करने के लिए कुछ न होता और तुम्हें किसी के बारे में चिंता करने की आवश्यकता न होती। इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता था, और इस तरह से मनुष्य को उसकी आधी तकलीफों से मुक्ति मिल गई होती। पृथ्वी पर एक सामान्य मानवीय जीवन जीने से मनुष्य स्वर्गदूतों के समान होगा; यद्यपि अभी भी वह देह का प्राणी होगा, फिर भी वह स्वर्गदूत के समान होगा। यही वह अंतिम प्रतिज्ञा है, आख़िरी वादा, जो मनुष्य को प्रदान किया गया है। आज मनुष्य ताड़ना और न्याय से होकर गुजरता है; क्या तुम सोचते हो कि मनुष्य का इन चीजों का अनुभव अर्थहीन है? क्या ताड़ना और न्याय का कार्य बिना वजह किया जा सकता है? पहले ऐसा कहा गया है कि मनुष्य को ताड़ना देना और उसका न्याय करना उसे अथाह गड्ढे में डालना है, जिसका अर्थ है उसके भाग्य और उसके भविष्य की संभावनाओं को छीन लेना। यह एक चीज के वास्ते है : मनुष्य का शुद्धिकरण। ऐसा नहीं है कि मनुष्य को जानबूझकर अथाह गड्ढे में डाला जाता है, जिसके बाद परमेश्वर उससे अपना पीछा छुड़ा लेता है। बल्कि इसका उद्देश्य मनुष्य के भीतर के विद्रोहीपन की काट-छाँट करना है, ताकि अंत में मनुष्य के भीतर की चीजों को शुद्ध किया जा सके, ताकि उसे परमेश्वर का सच्चा ज्ञान हो सके और वह एक पवित्र इंसान के समान हो सके। यदि ऐसा कर लिया जाता है, तो सब कुछ पूरा हो जाएगा। वास्तव में, जब मनुष्य के भीतर की उन चीजों की काट-छाँट की जाती है जिनकी काट-छाँट की ही जानी है, और मनुष्य जबर्दस्त गवाही देता है, तो शैतान भी परास्त हो जाएगा, और यद्यपि उन चीजों में से कुछ चीजें हो सकती हैं, जो मूल रूप से मनुष्य के भीतर हों, जिन्हें पूरी तरह से शुद्ध न किया गया हो, फिर भी एक बार जब शैतान को हरा दिया जाएगा, तो वह अब और विघ्न पैदा नहीं करेगा, और उस समय मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध कर लिया गया होगा। मनुष्य ने कभी भी ऐसे जीवन का अनुभव नहीं किया है, किंतु जब शैतान को हरा दिया जाएगा, तब सब कुछ व्यवस्थित हो जाएगा और मनुष्य के भीतर की उन सभी तुच्छ चीजों का समाधान हो जाएगा; एक बार जब मुख्य समस्या को सुलझा दिया जाएगा, तो अन्य सभी परेशानियाँ समाप्त हो जाएँगी। पृथ्वी पर परमेश्वर के इस देहधारण के दौरान, जब वह मनुष्य के बीच व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है, तो वह सब कार्य जिसे वह करता है, शैतान को हराने के लिए है, और वह मनुष्य पर विजय पाने और तुम लोगों को पूर्ण करने के माध्यम से शैतान को हराएगा। जब तुम लोग जबर्दस्त गवाही दोगे, तो यह भी शैतान की हार का एक चिह्न होगा। शैतान को हराने के लिए पहले मनुष्य पर विजय पाई जाती है और अंततः उसे पूरी तरह से पूर्ण बनाया जाता है। किंतु, सार रूप में, शैतान की हार के साथ-साथ यह संताप के इस खाली सागर से संपूर्ण मानव-जाति का उद्धार भी है। कार्य चाहे संपूर्ण ब्रह्मांड में किया जाए या चीन में, यह सब शैतान को हराने और संपूर्ण मानव-जाति का उद्धार करने के लिए है, ताकि मनुष्य विश्राम के स्थान में प्रवेश कर सके। देहधारी परमेश्वर, यह सामान्य देह, निश्चित रूप से शैतान को हराने के वास्ते है। देह में परमेश्वर के कार्य का उपयोग स्वर्ग के नीचे के उन सभी लोगों का उद्धार करने के लिए किया जाता है, जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, यह संपूर्ण मानवजाति पर विजय पाने, और इससे भी बढ़कर, शैतान को हराने के वास्ते है। परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के मर्म को संपूर्ण मानव-जाति का उद्धार करने के लिए शैतान की पराजय से अलग नहीं किया जा सकता। क्यों इस कार्य में अधिकांशतः तुम लोगों से हमेशा गवाही देने की बात की जाती है? और यह गवाही किसकी ओर निर्देशित है? क्या यह शैतान की ओर निर्देशित नहीं है? यह गवाही परमेश्वर के लिए दी जाती है और यह इस बात की गवाही देने के लिए दी जाती है कि परमेश्वर के कार्य ने अपना प्रभाव प्राप्त कर लिया है। गवाही देना शैतान को हराने के कार्य से संबंधित है; यदि शैतान के साथ कोई युद्ध न होता, तो मनुष्य से गवाही देने की अपेक्षा न की जाती। ऐसा इसलिए है, क्योंकि शैतान को हराया जाना चाहिए, उसी समय, मनुष्य को बचाने के रूप में, परमेश्वर अपेक्षा करता है कि मनुष्य शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही दे, जिसका उपयोग वह मनुष्य का उद्धार करने और शैतान के साथ युद्ध करने के लिए करता है। परिणामस्वरूप, मनुष्य उद्धार का लक्ष्य और शैतान को हराने का एक साधन दोनों है और इसलिए मनुष्य परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन-कार्य के केंद्रीय भाग में है और शैतान महज विनाश का लक्ष्य है, शत्रु है। तुम्हें लग सकता है कि तुमने कुछ नहीं किया है, किंतु तुम्हारे स्वभाव में बदलावों के कारण गवाही दे दी गई है, और यह गवाही शैतान की ओर निर्देशित है और यह मनुष्य के लिए नहीं दी गई है। मनुष्य ऐसी गवाही का आनंद लेने के लिए उपयुक्त नहीं है। वह परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य को कैसे स्पष्ट रूप से देख सकता है? परमेश्वर जिससे लड़ता है वह शैतान है; इस बीच मनुष्य केवल उद्धार का पात्र है। मनुष्य में शैतानी भ्रष्ट स्वभाव हैं और वह इस कार्य को स्पष्ट रूप से देखने में अक्षम है। यह शैतान की भ्रष्टता के कारण है और मनुष्य में जन्मजात नहीं है, बल्कि शैतान द्वारा निर्देशित किया जाता है। आज परमेश्वर का मुख्य कार्य शैतान को हराना है, अर्थात् मनुष्य पर पूरी तरह से विजय पाना है, ताकि मनुष्य शैतान के सामने परमेश्वर की अंतिम गवाही दे सके। इस तरह सभी चीजें पूरी कर ली जाएँगी। बहुत-से मामलों में, तुम्हारी खुली आँखों को ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ भी नहीं किया गया है, किंतु वास्तव में कार्य पहले ही पूरा किया जा चुका होता है। मनुष्य अपेक्षा करता है कि पूर्णता का समस्त कार्य दृष्टिगोचर हो, किंतु तुम्हारे लिए इसे दृष्टिगोचर किए बिना ही मैंने अपना कार्य पूरा कर लिया है, क्योंकि शैतान ने हार मान ली है, जिसका मतलब है कि उसे पूरी तरह से पराजित किया जा चुका है, कि परमेश्वर की बुद्धि, सामर्थ्य और अधिकार सबने शैतान को परास्त कर दिया है। यह ठीक वही गवाही है, जिसे दिया जाना चाहिए, और हालाँकि मनुष्य में इसकी कोई स्पष्ट अभिव्यक्ति नहीं है, हालाँकि यह खुली आँखों से देखी नहीं जा सकती, फिर भी शैतान को पहले ही पराजित किया जा चुका है। यह संपूर्ण कार्य शैतान के विरुद्ध निर्देशित है और शैतान के साथ युद्ध के कारण किया जाता है। और इसलिए, ऐसी बहुत-सी चीजें हैं, जिन्हें मनुष्य सफल हुई नहीं देखता, किंतु जो परमेश्वर की नजरों में बहुत समय पहले ही सफलतापूर्वक पूरी कर दी गई थीं। यह परमेश्वर के समस्त कार्य के बारे में छिपे हुए तथ्यों में से एक है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 593

उन सभी लोगों के पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर है, जो पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हैं, इसलिए हर किसी को शांत हो जाना चाहिए : भविष्य में तुम सभी मंजिल में प्रवेश करोगे। किंतु यदि तुम पूर्ण बनाए जाने की इच्छा नहीं रखते और अद्भुत क्षेत्र में प्रवेश करना नहीं चाहते, तो यह तुम्हारी जिम्मेदारी है। वे सभी, जो पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हैं और परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हैं, वे सभी जो समर्पण करते हैं और वे सभी जो ईमानदार तरीके से अपना कार्य करते हैं—ऐसे सभी लोगों को पूर्ण बनाया जा सकता है। आज, वे सभी जो लगन से अपना कर्तव्य नहीं निभाते, वे सभी जो परमेश्वर के प्रति वफ़ादार नहीं हैं, वे सभी जो परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते, विशेष रूप से वे जिन्होंने पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त कर ली है किंतु उसे अभ्यास में नहीं लाते—ऐसे सभी लोग पूर्ण बनाए जाने में असमर्थ हैं। उन सभी को पूर्ण बनाया जा सकता है, जो परमेश्वर के प्रति वफादार होने और समर्पण करने की इच्छा रखते हैं, भले ही वे थोड़े अज्ञानी हों; उन सभी को पूर्ण बनाया जा सकता है, जो खोज करने की इच्छा रखते हैं। इस बारे में चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम इस दिशा में अनुसरण करने के इच्छुक हो, तो तुम्हें पूर्ण बनाया जा सकता है। मैं तुम लोगों में से किसी को भी छोड़ने या हटा देने का इच्छुक नहीं हूँ, किंतु यदि तुम अच्छा करने का प्रयास नहीं करते हो, तो तुम केवल अपने आप को नुकसान पहुँचा रहे हो; वह मैं नहीं हूँ जो तुम्हें निकाल देता है, बल्कि वह तुम स्वयं हो। यदि तुम स्वयं अच्छा करने का प्रयत्न नहीं करते—यदि तुम आलसी हो, या अपना कर्तव्य पूरा नहीं करते, या वफादार नहीं हो, या सत्य का अनुसरण नहीं करते, और तुम हमेशा अपने तरीके से चीजें करते हो, मनमाने ढंग से व्यवहार करते हो, अपनी प्रसिद्धि और लाभ के लिए लड़ते हो और विपरीत लिंग के साथ अपने संबंधों में मर्यादाहीन हो, तो तुम अपने पापों के बोझ को स्वयं वहन करोगे; तुम किसी की भी दया के योग्य नहीं हो। मेरा इरादा तुम सभी लोगों को पूर्ण बनाना है, और कम से कम तुम लोगों पर विजय पाना है, ताकि कार्य के इस चरण को सफलतापूर्वक पूरा किया जा सके। प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि उसे पूर्ण बनाया जाए, अंततः उसके द्वारा उसे प्राप्त किया जाए, उसके द्वारा उसे पूरी तरह से शुद्ध किया जाए, और वह ऐसा इंसान बने जिससे वह प्रेम करता है। चाहे मैं तुम लोगों को पिछड़ा हुआ कहता हूँ या खराब काबिलियत वाला—यह सब तथ्य है। हालाँकि मेरा ऐसा कहना यह प्रमाणित नहीं करता कि मेरा तुम लोगों को त्यागने का इरादा है, कि मैंने तुम लोगों में आशा खो दी है, और यह तो बिल्कुल नहीं कि मैं तुम लोगों को बचाना नहीं चाहता। आज मैं तुम लोगों के उद्धार का कार्य करने के लिए आया हूँ, जिसका तात्पर्य है कि जो कार्य मैं करता हूँ, वह उद्धार के कार्य की निरंतरता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर होता है : बशर्ते तुम इच्छुक हो, बशर्ते तुम अनुसरण करते हो, अंत में तुम इस परिणाम को प्राप्त करने में समर्थ होगे और तुममें से किसी एक को भी छोड़ नहीं दिया जाएगा। यदि तुम कम काबिलियत के हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी कम काबिलियत के अनुसार होंगी; यदि तुम उच्च काबिलियत के हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उच्च काबिलियत के अनुसार होंगी; यदि तुम अज्ञानी और निरक्षर हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इसी अनुसार होंगी; यदि तुम साक्षर हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारे साक्षर होने के अनुसार होंगी; यदि तुम उम्रदराज हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उम्र के अनुसार होंगी; यदि तुम मेजबानी का कर्तव्य निभाने में सक्षम हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इसी अनुसार होंगी; यदि तुम कहते हो कि तुम मेजबानी का कर्तव्य नहीं निभा सकते हो और केवल एक निश्चित भूमिका ही निभा सकते हो, चाहे वह सुसमाचार प्रचार का कार्य हो या कलीसिया की देखरेख करने का कार्य या अन्य सामान्य मामलों को करने का कार्य, तो मेरे द्वारा तुम्हारी पूर्णता भी उस कार्य के अनुसार होगी जो तुम करते हो। वफादार होना, बिल्कुल अंत तक समर्पण करना और परमेश्वर से अत्यधिक प्रेम करने का प्रयास करना—ये चीजें तुम्हें अवश्य हासिल करनी चाहिए, बस ये तीन चीजें और यही सर्वोत्तम अभ्यास हैं। अंततः लोगों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे इन तीन चीजों को हासिल करें और जो इन्हें हासिल कर सकते हैं वे पूर्ण बनाए जाएँगे। किंतु, इन सबसे ऊपर, तुम्हें सच्चे मन से अनुसरण करना होगा, तुम्हें सक्रियता से आगे और ऊपर की ओर बढ़ते जाना होगा और इस मामले में निष्क्रिय नहीं होना होगा। मैं कह चुका हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति के पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर है और प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण बनाए जाने में सक्षम है, और यह सच है, किंतु तुम ऊपर की ओर बढ़ने का प्रयास नहीं करते हो। जो इन तीन मापदंडों को हासिल नहीं करते हैं वे अंततः फिर भी हटा दिए जाएँगे। मैं चाहता हूँ कि कोई भी पीछे न रहे, मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक के पास पवित्र आत्मा का कार्य और प्रबोधन हो और वह बिल्कुल अंत तक समर्पण करने में समर्थ हो, क्योंकि यही वह कर्तव्य है जिसे तुम लोगों में से प्रत्येक को निभाना चाहिए। जब तुम सब लोग अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभा चुके होगे तो तुम सभी लोगों को पूर्ण बनाया जा चुका होगा और तुम लोगों के पास गूँजती हुई गवाही भी होगी। जिन लोगों के पास गवाही है वे सभी ऐसे लोग हैं जो शैतान पर विजयी हुए हैं और जिन्होंने परमेश्वर की प्रतिज्ञा प्राप्त कर ली है, और वही लोग बने रहेंगे और अद्भुत मंजिल में जीवन व्यतीत करेंगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 594

आरंभ में परमेश्वर विश्राम में था। उस समय पृथ्वी पर कोई मनुष्य या अन्य कुछ भी नहीं था और परमेश्वर ने तब तक किसी भी तरह का कोई कार्य नहीं किया था। उसने अपने प्रबंधन का कार्य केवल तब आरंभ किया, जब मानवता अस्तित्व में आ गई और जब मानवता भ्रष्ट कर दी गई; उस पल से, उसने विश्राम नहीं किया बल्कि उसने स्वयं को मानवता के बीच व्यस्त रखना आरंभ कर दिया। मानवता के भ्रष्ट होने के कारण परमेश्वर विश्राम खो बैठा और प्रधान स्वर्गदूत के विश्वासघात के कारण भी। यदि परमेश्वर शैतान को परास्त नहीं करता है और भ्रष्ट हो चुकी मानवता को नहीं बचाता है, तो वह पुनः कभी भी विश्राम में प्रवेश नहीं कर पाएगा। जैसे मनुष्य को विश्राम नहीं है, वैसे ही परमेश्वर को भी नहीं है और जब वह एक बार फिर विश्राम करेगा, तो मनुष्य भी विश्राम करेंगे। विश्रामरत जीवन का अर्थ है युद्ध के बिना, गंदगी के बिना और किसी अधार्मिकता के बिना जीवन। कहने का अर्थ है कि यह जीवन शैतान के विघ्नों (यहाँ “शैतान” का अर्थ शत्रुतापूर्ण शक्तियों से है) और शैतान की भ्रष्टता से मुक्त है और यह परमेश्वर विरोधी किसी भी शक्ति के अतिक्रमण से मुक्त है; यह ऐसा जीवन है जिसमें हर चीज अपनी किस्म के अनुसार छाँट दी जाती है और सृष्टिकर्ता की आराधना कर सकती है और जिसमें स्वर्ग और पृथ्वी पूरी तरह शांत होते हैं। यही मनुष्यों के लिए विश्राम का जीवन है। जब परमेश्वर विश्राम करेगा तो पृथ्वी पर अधार्मिकता नहीं रहेगी, न ही शत्रुतापूर्ण शक्तियों का फिर कोई अतिक्रमण होगा और मानवजाति एक नए क्षेत्र में प्रवेश करेगी—यह अब ऐसी मानवजाति नहीं होगी जो शैतान द्वारा भ्रष्ट बना दी गई है, बल्कि एक ऐसी मानवजाति होगी जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट बना दिए जाने के बाद बचाया गया है। मानवजाति का विश्राम का दिन परमेश्वर का विश्राम का दिन भी होगा। मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थता के कारण परमेश्वर ने अपना विश्राम खोया था; ऐसा नहीं है कि उसे शुरुआत से कोई विश्राम नहीं था। विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ यह नहीं है कि सभी चीजों की गतिविधि रुक जाती है या सभी मामलों का विकास रुक जाता है, न ही इसका यह अर्थ है कि परमेश्वर कार्य करना बंद कर देता है या मनुष्य जीना बंद कर देते हैं। विश्राम में प्रवेश करने का संकेत यह है कि शैतान नष्ट कर दिया गया है, कि उसके कुकर्म में शामिल बुरे लोग दंडित किए जा चुके हैं और मिटा दिए गए हैं और परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण सारी शक्तियों का अस्तित्व समाप्त हो गया है। परमेश्वर के विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है कि वह मानवजाति के उद्धार का कार्य अब और नहीं करेगा। मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है कि समस्त मानवजाति परमेश्वर की रोशनी के भीतर और उसके आशीष के अधीन, शैतान की भ्रष्टता के बिना जिएगी, कोई अधार्मिकता नहीं होगी और सारे मनुष्य परमेश्वर की देखरेख में सामान्य रूप से पृथ्वी पर जिएंगे। जब परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक साथ विश्राम में प्रवेश करते हैं तो इसका अर्थ है कि मानवजाति को बचा लिया गया है, शैतान को नष्ट किया जा चुका है और मनुष्यों पर परमेश्वर का कार्य पूरी तरह पूरा हो गया है। परमेश्वर अब मनुष्यों पर कार्य करना जारी नहीं रखेगा और वे अब शैतान की सत्ता के अधीन नहीं रहेंगे। इस तरह, परमेश्वर अब और व्यस्त नहीं रहेगा और मनुष्य अब लगातार भागदौड़ में नहीं रहेंगे; परमेश्वर और मानवजाति एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर अपने मूल स्थान पर लौट जाएगा और प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने संबंधित स्थान पर लौट जाएगा। ये परमेश्वर का समस्त प्रबंधन पूरा होने पर परमेश्वर और मनुष्य की संबंधित मंजिलें होंगी। परमेश्वर के पास परमेश्वर की मंजिल है और मनुष्यों के पास वह जगह है जहाँ वे जाएँगे। विश्राम करते समय, परमेश्वर पृथ्वी पर जीने के लिए सभी मनुष्यों की अगुआई करता रहेगा, जबकि उसके प्रकाश में, वे स्वर्ग के एकमात्र सच्चे परमेश्वर की आराधना करेंगे। परमेश्वर अब मानवता के बीच नहीं रहेगा, न ही मनुष्य परमेश्वर के साथ उसकी मंजिल में रहने में समर्थ होंगे। परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक ही क्षेत्र के भीतर नहीं रह सकते; बल्कि दोनों के जीने के अपने-अपने संबंधित तरीके हैं। परमेश्वर वह है जो समस्त मानवता की अगुआई करता है और समस्त मानवता परमेश्वर के प्रबंधन कार्य का मूर्त परिणाम है। मनुष्य वे हैं जिनकी अगुआई की जाती है और उनका सार परमेश्वर के सार के समान नहीं है। “विश्राम” का अर्थ है अपने मूल स्थान में लौटना। इसलिए, जब परमेश्वर विश्राम में प्रवेश करता है, तो इसका अर्थ है कि परमेश्वर अपने मूल स्थान में लौट जाता है। वह पृथ्वी पर अब और नहीं रहेगा या मानवता के बीच उसकी खुशी या पीड़ा साझा करने के लिए नहीं रहेगा। जब मनुष्य विश्राम में प्रवेश करते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे सच्चे सृजित प्राणी बन गए हैं; वे पृथ्वी से परमेश्वर की आराधना करेंगे और सामान्य मानवीय जीवन जिएंगे। लोग अब और परमेश्वर से विद्रोह या उसका प्रतिरोध नहीं करेंगे और वे आदम और हव्वा के मूल जीवन की ओर लौट जाएँगे। विश्राम में प्रवेश करने के बाद ये परमेश्वर और मनुष्य के अपने-अपने जीवन और गंतव्य होंगे। परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध में शैतान की पराजय अपरिहार्य प्रवृत्ति है। इसी तरह, अपना प्रबंधन-कार्य पूरा करने के बाद परमेश्वर का विश्राम में प्रवेश करना और मनुष्य का पूर्ण उद्धार और विश्राम में प्रवेश अपरिहार्य प्रवृत्ति बन गए हैं। मनुष्य के विश्राम का स्थान पृथ्वी पर है और परमेश्वर के विश्राम का स्थान स्वर्ग में है। मनुष्य विश्राम करते समय, पृथ्वी पर रहकर परमेश्वर की आराधना करेंगे। परमेश्वर स्वयं विश्राम करते हुए शेष मानवता की अगुआई करेगा; वह स्वर्ग से उनकी अगुआई करेगा, न कि पृथ्वी से। परमेश्वर तब भी आत्मा ही होगा, जबकि मनुष्य तब भी देह ही होंगे। परमेश्वर और मनुष्य दोनों के विश्राम करने के अपने-अपने अलग तरीके हैं। जब परमेश्वर विश्राम करता है, वह मनुष्यों के बीच आएगा और प्रकट होगा; जब मनुष्य विश्राम करते हैं, वे स्वर्ग का भ्रमण करने और साथ ही वहाँ के जीवन का आनंद उठाने के लिए परमेश्वर द्वारा ले जाए जाएँगे। परमेश्वर और मनुष्य के विश्राम में प्रवेश करने के बाद, शैतान का अस्तित्व नहीं रहेगा; उसी तरह, वे दुष्ट लोग भी अस्तित्व में नहीं रहेंगे। परमेश्वर और मानवता के विश्राम करने से पहले वे दुष्ट जिन्होंने कभी पृथ्वी पर परमेश्वर का उत्पीड़न किया था, साथ ही वे शत्रु जिन्होंने पृथ्वी पर उससे विद्रोह किया था, नष्ट किए जा चुके होंगे; अंत के दिनों के महाविनाशों द्वारा उनका उन्मूलन हो चुका होगा। उन दुष्ट लोगों के पूर्ण विनाश के बाद, पृथ्वी फिर कभी शैतान का विघ्न नहीं जानेगी। तभी मानवता पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगी और परमेश्वर का कार्य पूर्णतः समाप्त होगा। परमेश्वर और मनुष्य के विश्राम में प्रवेश करने के लिए ये पूर्व अपेक्षाएँ हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 595

सभी चीजों के परिणामों का पास आना परमेश्वर के कार्य की समाप्ति और साथ ही मानवता के विकास के अंत का संकेत करता है। इसका अर्थ है कि शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए मनुष्य अपने विकास के अंत तक पहुँच चुके हैं और आदम व हव्वा के वंशज अंत तक वंश-वृद्धि कर चुके हैं। इसका अर्थ यह भी है कि शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी ऐसी मानवता के लिए विकास करते रहना असंभव होगा। आदम और हव्वा आरंभ में भ्रष्ट नहीं हुए थे, पर जो आदम और हव्वा अदन की वाटिका से निकाले गए थे वे शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके थे। जब परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे तो आदम और हव्वा—जो अदन वाटिका से बाहर निकाले गए थे—और उनके वंशजों का अंत हो जाएगा। भविष्य की मानवता आदम और हव्वा के वंशजों से ही बनेगी, परंतु वे शैतान की सत्ता के अधीन जीने वाले लोग नहीं होंगे। बल्कि ये वे लोग होंगे जिन्हें बचाया और शुद्ध किया गया है। यह वह मानवता होगी जिसका न्याय किया गया है और जिसे ताड़ना दी गई है और जो पावनीकृत है। ये लोग आरंभ की मानवजाति के समान नहीं होंगे; लगभग कहा जा सकता है कि वे आरंभ के आदम और हव्वा से पूरी तरह भिन्न किस्म के मनुष्य होंगे। इन लोगों को उन सभी लोगों में से चुना गया होगा जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया था और ये वे लोग होंगे, जो अंततः परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के दौरान अडिग रहे हैं; वे भ्रष्ट मानवजाति में से लोगों का अंतिम शेष समूह होंगे। केवल यही लोग परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश कर पाएँगे। जो अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के दौरान अडिग रहने में समर्थ हैं—यानी, शुद्धिकरण के अंतिम कार्य के दौरान—वे लोग होंगे, जो परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे; तो वे सभी जो विश्राम में प्रवेश करेंगे, शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके होंगे और परमेश्वर के शुद्धिकरण के अंतिम कार्य से गुजरने के बाद ही उसके द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे। ये लोग, जो अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे, अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर ताड़ना और न्याय का कार्य मूलतः मानवता को शुद्ध करने और विश्राम के अंतिम दिन की खातिर करता है; अन्यथा मानवता का कोई भी सदस्य अपनी किस्म के अनुसार छांटा नहीं जा सकेगा या विश्राम में प्रवेश नहीं कर सकेगा। यह कार्य ही मानवता के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। परमेश्वर का शुद्धिकरण का कार्य ही मनुष्यों को उनकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा और उसका ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानवता के उन विद्रोही तत्वों को उजागर करेगा, और इस तरह बचाए जा सकने वालों को बचाए न जा सकने वालों से अलग करेगा और जो बचे रह सकते हैं उनसे उन्हें अलग करेगा जो बचे नहीं रह सकते हैं। इस कार्य के समाप्त होने पर जो लोग बचे रह सकते हैं वे सब शुद्ध किए जाएँगे और मानवता के उच्चतर क्षेत्र में प्रवेश करेंगे जहाँ वे पृथ्वी पर और अधिक अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का आनंद उठाएंगे; दूसरे शब्दों में, वे मानवता के विश्राम के दिन में प्रवेश करेंगे और परमेश्वर के साथ जिएंगे। जो बचे नहीं रह सकते हैं उनकी ताड़ना और उनका न्याय किए जाने के बाद उनके असली रूप पूरी तरह उजागर हो जाएँगे; उसके बाद वे सब के सब नष्ट कर दिए जाएँगे और शैतान के समान उन्हें पृथ्वी पर जीवित रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवता में इस किस्म के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ऐसे लोग अंतिम विश्राम की धरती पर प्रवेश करने के योग्य नहीं हैं, न ही वे उस विश्राम के दिन में प्रवेश के योग्य हैं जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे, क्योंकि वे दंड के लक्ष्य हैं और वे धार्मिक लोग नहीं, बल्कि बुरे लोग हैं। उन्हें एक बार छुटकारा दिया गया था और उन्हें न्याय और ताड़ना भी दी गई थी; उन्होंने एक बार परमेश्वर के लिए मजदूरी भी की थी। लेकिन जब अंतिम दिन आएगा तो उन्हें अब भी अपनी बुराई के कारण और अपनी विद्रोहशीलता और असाध्यता के परिणामस्वरूप निकाल दिया और नष्ट कर दिया जाएगा; वे भविष्य के संसार में अब कभी नहीं जिएंगे और कभी भविष्य की मानवजाति के बीच नहीं रहेंगे। जैसे ही मानवता के पावनीकृत जन विश्राम में प्रवेश करेंगे, चाहे वे मृत लोगों की आत्मा हों या अभी भी देह में रह रहे लोग, सभी बुराई करने वाले और वे सभी जिन्हें बचाया नहीं गया है, नष्ट कर दिए जाएँगे। जहाँ तक इन बुरा करने वाली आत्माओं और मनुष्यों, या धार्मिक लोगों की आत्माओं और धार्मिकता करने वालों की बात है, चाहे वे जिस युग में हों, जो भी बुरे हैं वे सभी नष्ट हो जाएँगे और जो लोग धार्मिक हैं, वे बच जाएँगे। किसी व्यक्ति या आत्मा को उद्धार प्राप्त होगा या नहीं, यह पूर्णतः अंत के युग के कार्य के आधार पर तय नहीं होता है; बल्कि यह इससे निर्धारित होता है कि क्या वह परमेश्वर का प्रतिरोध या उससे विद्रोह कर चुका है कि नहीं। पिछले युग में जिन लोगों ने बुरा किया और जो बचाए नहीं जा सके वे निःसंदेह दंड के भागी बनेंगे और वे जो इस युग में बुरा करते हैं और उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते, तो वे भी निश्चित रूप से दंड के भागी बनेंगे। मनुष्य अच्छे और बुरे के आधार पर श्रेणीबद्ध किए जाते हैं, न कि उस युग के आधार पर जिसमें वे जीते हैं। एक बार इस प्रकार वर्गीकृत किए जाने पर, उन्हें तुरंत दंड या पुरस्कार नहीं दिया जाएगा; बल्कि, परमेश्वर अंत के दिनों में अपने विजय के कार्य को समाप्त करने के बाद ही बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने का अपना कार्य करेगा। वास्तव में, वह मनुष्यों को तब से अच्छे और बुरे में पृथक कर रहा है, जबसे उसने मानवजाति के उद्धार का अपना कार्य आरंभ किया था। बात बस इतनी है कि वह धार्मिकों को पुरस्कृत और दुष्टों को दंड देने का कार्य केवल तब करेगा, जब उसका कार्य समाप्त हो जाएगा; ऐसा नहीं है कि वह अपने कार्य के पूरा होने पर उन्हें श्रेणियों में पृथक करेगा और फिर तुरंत दुष्टों को दंडित करना और धार्मिकों को पुरस्कृत करना शुरू करेगा। बल्कि, यह कार्य तभी किया जाएगा, जब उसका कार्य पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगा। बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने के परमेश्वर के अंतिम कार्य के पीछे का एकमात्र उद्देश्य, सभी मनुष्यों को पूरी तरह शुद्ध करना है, ताकि वह पूरी तरह पावनीकृत मानवता को शाश्वत विश्राम में ला सके। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण है; यह उसके समस्त प्रबंधन-कार्य का अंतिम चरण है। यदि परमेश्वर ने कुकर्मियों का नाश न किया, बल्कि उन्हें बचे रहने दिया तो सारी की सारी मानवजाति अभी भी विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थ होगी और परमेश्वर उसे एक अधिक अद्भुत क्षेत्र में नहीं ला पाएगा। ऐसा कार्य पूरी तरह समाप्त नहीं होगा। जब उसका कार्य समाप्त होगा तो संपूर्ण मानवजाति पूर्णतः पावनीकृत हो जाएगी; केवल इसी तरीके से परमेश्वर शांतिपूर्वक विश्राम में रह सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 596

आजकल लोग अभी भी देह की चीजें छोड़ने में असमर्थ हैं; वे देह के सुख नहीं छोड़ सकते, न वे संसार, धन और अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ पाते हैं। अधिकांश लोग अपने अनुसरणों को लेकर बस खानापूरी करते हैं। वास्तव में इन लोगों के हृदय में परमेश्वर बिल्कुल भी नहीं है; इससे भी बुरा यह है कि वे परमेश्वर का खौफ नहीं मानते। परमेश्वर उनके दिलों में नहीं है और इसलिए वे वह सब स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते हैं, जो परमेश्वर करता है, वे उसके द्वारा कहे गए वचनों पर विश्वास करने में तो और भी असमर्थ हैं। ऐसे लोग देह में अत्यधिक रमे होते हैं; वे आकंठ भ्रष्ट होते हैं और उनमें पूरी तरह सत्य का अभाव होता है और इससे भी बुरी बात यह है कि उन्हें विश्वास नहीं कि परमेश्वर देहधारी हो सकता है। जो कोई परमेश्वर के देहधारण पर विश्वास नहीं करता है—अर्थात्, जो कोई प्रत्यक्ष परमेश्वर के कार्य और वचनों पर विश्वास नहीं करता है या जो प्रत्यक्ष परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता है, बल्कि स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर की आराधना करता है—वह ऐसा व्यक्ति है जिसके हृदय में परमेश्वर नहीं है, एक ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के प्रति विद्रोही और प्रतिरोधी है। ऐसे लोगों में मानवता और विवेक नहीं होता है, सत्य के बारे में तो कहना ही क्या। जहाँ तक इन लोगों की बात है, प्रत्यक्ष और स्पर्शनीय परमेश्वर तो और भी विश्वास के योग्य नहीं है, जबकि वे अदृश्य और अस्पर्शनीय परमेश्वर को सर्वाधिक विश्वसनीय और सर्वाधिक खुशी देने वाला मानते हैं। वे जिस चीज को खोजते हैं वह वास्तविक सत्य नहीं है, न ही वह जीवन का असली अर्थ है; परमेश्वर के इरादे खोजने की बात तो दूर है। बल्कि वे रोमांच खोजते हैं। जो भी चीजें उन्हें अपनी इच्छाओं को पूरा करने में सर्वाधिक सक्षम बनाती हैं वे निस्संदेह उनकी आस्था और उनका अनुसरण हैं। वे परमेश्वर पर केवल इसलिए विश्वास करते हैं ताकि निजी इच्छाएँ पूरी कर पाएँ, सत्य की खोज के लिए नहीं। क्या ऐसे लोग कुकर्मी नहीं हैं? वे आत्मविश्वास से अत्यधिक भरे हैं, और वे यह बिल्कुल विश्वास नहीं करते कि स्वर्ग का परमेश्वर उन जैसे “भले लोगों” को नष्ट कर देगा। इसके बजाय, उनका मानना है कि परमेश्वर उन्हें जीवित रहने देगा और यही नहीं, उन्हें अच्छी तरह पुरस्कृत करेगा। इसका कारण यह है कि उन्हें लगता है कि उन्होंने परमेश्वर के लिए बहुत सी चीजें की हैं और उसके प्रति काफी “लगन” दिखाई है। अगर वे प्रत्यक्ष परमेश्वर का अनुसरण भी करते, तो जैसे ही उनकी इच्छाएँ पूरी न होतीं, वे तुरंत परमेश्वर के खिलाफ जवाबी हमला कर देते या बेहद नाराज हो जाते। ये बस नीच घिनौने लोग हैं जो बस अपनी इच्छाएँ पूरी करने का प्रयास करते रहते हैं; वे सत्य की खोज में लगे सत्यनिष्ठ लोग नहीं हैं। ऐसे लोग वे तथाकथित कुकर्मी हैं जो मसीह का अनुसरण करते हैं। जो लोग सत्य नहीं खोजते हैं वे बिल्कुल ही सत्य पर विश्वास नहीं कर सकते और मानवता के भविष्य का परिणाम स्पष्ट रूप से देखने में और भी अधिक असमर्थ हैं क्योंकि वे प्रत्यक्ष परमेश्वर के किसी भी कार्य या वचन पर विश्वास नहीं करते हैं, न ही वे यह विश्वास करते हैं कि मानवता का भावी गंतव्य क्या होगा। इसलिए, यदि वे प्रत्यक्ष परमेश्वर का अनुसरण करते भी हैं, तब भी वे बुरा करते हैं और सत्य बिल्कुल भी नहीं खोजते हैं, न ही वे उस सत्य का अभ्यास करते हैं जिसकी मैं माँग करता हूँ। वे लोग जो यह विश्वास नहीं करते कि वे नष्ट हो जाएँगे, उलटे वही लोग नष्ट होंगे। वे सब स्वयं को बहुत चतुर मानते हैं और वे सोचते हैं कि वे ही वो लोग हैं, जो सत्य का अभ्यास करते हैं। वे अपने बुरे कर्मों को सत्य के रूप में सँजोते हैं। ऐसे कुकर्मी लोग अत्यधिक आत्मविश्वासी होते हैं; वे सत्य को धर्म-सिद्धांत मानते हैं और अपने बुरे कर्मों को सत्य मानते हैं और अंत में वे केवल वही काटेंगे, जो उन्होंने बोया है। लोग जितना अधिक आत्मविश्वासी हैं और जितना अधिक घमंडी हैं, वे सत्य को पाने में उतना ही अधिक असमर्थ हैं; लोग जितना ज़्यादा स्वर्गिक परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे उतना अधिक परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। ये वे लोग हैं जो दंडित किए जाएँगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 597

मानवता के विश्राम में प्रवेश करने से पहले, हर किस्म के व्यक्ति का दंडित होना या पुरस्कृत होना इस आधार पर निर्धारित होगा कि क्या वह सत्य खोजता है, क्या वह परमेश्वर को जानता है और क्या वह प्रत्यक्ष परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकता है। जिन्होंने मेहनत की है, लेकिन प्रत्यक्ष परमेश्वर को न तो जानते हैं न ही उसके प्रति समर्पण करते हैं, उनमें सत्य नहीं है। ऐसे लोग कुकर्मी होते हैं और कुकर्मी निःसंदेह दंड के भागी होंगे; इसके अलावा, वे अपने बुरे कर्मों के अनुसार दंडित होंगे। परमेश्वर मनुष्यों के विश्वास करने के लिए है और वह उनके समर्पण के योग्य भी है। वे जो केवल कल्पित और अदृश्य परमेश्वर में आस्था रखते हैं, वे लोग हैं जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में असमर्थ हैं। यदि ये लोग तब भी प्रत्यक्ष परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर पाते, जब उसका विजय का कार्य समाप्त होता है और देहधारी प्रत्यक्ष परमेश्वर से विद्रोह करना और उसका प्रतिरोध करना जारी रखते हैं तो ये “कल्पनाजीवी” निस्संदेह विनाश के पात्र बन जाएँगे। यह तुम लोगों में एक जैसा है—सभी जो मौखिक रूप से देहधारी परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, फिर भी देहधारी परमेश्वर के प्रति समर्पण के सत्य का अभ्यास नहीं कर पाते, उन सबको अंततः हटाया और नष्ट किया जाना है। और सभी जो दृश्यमान परमेश्वर को मौखिक रूप से स्वीकारते हैं और उसके द्वारा व्यक्त सत्य को खाते और पीते हैं, फिर भी अज्ञात और अदृश्य परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे विनाश के और भी अधिक पात्र होंगे। इन लोगों में से कोई भी, परमेश्वर का कार्य पूरा होने के बाद आने वाले विश्राम के समय तक नहीं बचेगा, न ही इस तरह का एक भी व्यक्ति विश्राम के उस समय तक बच सकता है। जो लोग राक्षसों के हैं वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं; उनका सार परमेश्वर की ओर प्रतिरोध और विद्रोहीपन का है और उनमें परमेश्वर के प्रति समर्पण का लेशमात्र भी इरादा नहीं होता है। ऐसे सभी लोग नष्ट किए जाएँगे। क्या तुम्हारे पास सत्य है और क्या तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो, यह तुम्हारे सार पर निर्भर करता है, न कि इस बात पर कि तुम्हारा बाहरी स्वरूप क्या है या तुम यदा-कदा कैसे बोल या कार्य कर सकते हो। कोई व्यक्ति नष्ट किया जाएगा या नहीं, यह उसके सार से तय होता है; यह उसके व्यवहार और उसके सत्य के अनुसरण से प्रकट सार के अनुसार तय होता है। जो सभी लोग कार्य करते हैं और समान मात्रा में कार्य करते हैं, उनमें से मानवता के अच्छे सार वाले जिन लोगों के पास सत्य है, वे ऐसे लोग हैं जिन्हें अस्तित्व में रहने दिया जाएगा, जबकि मानवता के बुरे सार वाले जो लोग दृश्यमान परमेश्वर से विद्रोह करते हैं, वे ऐसे लोग हैं जिनका विनाश हो जाएगा। मानवजाति के गंतव्य से संबंधित परमेश्वर का समस्त कार्य या वचन प्रत्येक व्यक्ति के सार के अनुसार उचित रूप से लोगों से निपटेगा; थोड़ी-सी भी त्रुटि नहीं होगी और इससे भी बढ़कर, एक भी गलती नहीं की जाएगी। केवल जब लोग कार्य करते हैं, तभी उसमें मानवीय भावनाएँ या विचार मिश्रित होते हैं। परमेश्वर जो कार्य करता है, वह सबसे अधिक उपयुक्त होता है; वह निश्चित तौर पर किसी सृजित प्राणी पर झूठे आरोप नहीं लगाता। अभी बहुत-से लोग हैं, जो मानवजाति के भविष्य के गंतव्य को नहीं समझ सकते हैं और वे उन वचनों पर विश्वास नहीं करते जो मैं कहता हूँ। वे सभी जो विश्वास नहीं करते और वे भी जो सत्य का अभ्यास नहीं करते, राक्षस हैं!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 598

आजकल वे जो अनुसरण करते हैं और वे जो अनुसरण नहीं करते, दो प्रकार के लोग हैं, जिनकी मंजिलें अलग हैं। वे जो सत्य को जानने का अनुसरण करते हैं और सत्य का अभ्यास करते हैं, वे लोग हैं जिनका परमेश्वर उद्धार करेगा। जो सच्चे मार्ग को नहीं जानते, वे राक्षस और शत्रु हैं; वे प्रधान स्वर्गदूत के वंशज हैं और विनाश के पात्र होंगे। यहाँ तक कि एक अज्ञात परमेश्वर के धर्मपरायण विश्वासीजन—क्या वे भी राक्षस नहीं हैं? जिन लोगों के पास अच्छी अंतरात्मा है परंतु वे सच्चे मार्ग को स्वीकार नहीं करते हैं, वे राक्षस हैं; उनका सार भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने का सार है। सच्चे मार्ग को स्वीकार न करने वाले वे लोग होते हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और भले ही ऐसे लोग बहुत कष्ट झेलें, तब भी वे नष्ट किए जाएँगे। वे सभी जो संसार को त्यागना नहीं चाहते, जो अपने माता-पिता से अलग होना नहीं सह सकते और जो स्वयं को देह के सुखों से दूर रखना सहन नहीं कर सकते, परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं और वे सब विनाश के पात्र बनेंगे। जो कोई भी देहधारी परमेश्वर में विश्वास नहीं करता है वह राक्षस है और यही नहीं, उसे नष्ट कर दिया जाएगा। वे सब जो विश्वास तो करते हैं लेकिन सत्य का अभ्यास नहीं करते, वे जो परमेश्वर के देहधारण में विश्वास नहीं करते और वे जो परमेश्वर के अस्तित्व पर लेशमात्र भी विश्वास नहीं रखते, वे सब विनाश के लक्ष्य होंगे। वे सभी जो बने रह सकते हैं, वे लोग हैं जो शोधन की पीड़ा से गुजरे हैं और अडिग रहे हैं; ये वे लोग हैं जो वास्तव में परीक्षणों से गुजरे हैं। जो कोई परमेश्वर को नहीं मानता शत्रु है; यानी जो कोई भी देहधारी परमेश्वर को नहीं मानता है—चाहे वह इस धारा के भीतर हो या बाहर—मसीह-विरोधी है! भला शैतान कौन हैं, राक्षस कौन हैं और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं? क्या ये वे प्रतिरोधी लोग नहीं हैं जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं? क्या ये वे लोग नहीं हैं जो परमेश्वर के खिलाफ विद्रोही हैं? क्या ये वे नहीं हैं जो आस्था होने का दावा तो करते हैं, परंतु जिनके पास सत्य नहीं है? क्या ये वे लोग नहीं हैं जो सिर्फ आशीष पाने की फिराक में रहते हैं जबकि परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ हैं? तुम अभी भी इन राक्षसों के साथ घुलते-मिलते हो और उनसे अंतरात्मा और प्रेम से पेश आते हो, लेकिन क्या यह शैतान के प्रति दया दिखाने के बराबर नहीं है? क्या तुम राक्षसों की जमात में नहीं हो? यदि लोग इस बिंदु तक आ गए हैं और अच्छाई-बुराई में भेद नहीं कर पाते और परमेश्वर के हृदय को खोजने की इच्छा किए बिना या परमेश्वर के हृदय को अपना हृदय मानने में असमर्थ रहते हुए आँख मूँदकर प्रेम और दया दर्शाते रहते हैं तो उनका परिणाम और भी अधिक खराब होगा। जो भी व्यक्ति देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता, वह परमेश्वर का शत्रु है। यदि तुम परमेश्वर के शत्रुओं के प्रति अंतरात्मा और प्रेम से व्यवहार कर सकते हो, तो क्या तुममें न्याय की भावना की कमी नहीं है? यदि तुम उनके साथ अनुरूपता में हो जिनसे मैं घृणा करता हूँ और जिनका मैं विरोध करता हूँ, तुम तब भी उनके प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार करते हो और निजी भावनाएँ दिखाते हो, तो क्या तुम विद्रोही नहीं हो? क्या तुम जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं कर रहे हो? क्या ऐसे व्यक्ति में असल में सत्य होता है? यदि लोग परमेश्वर के शत्रुओं के प्रति अंतरात्मा रखते हैं, राक्षसों के प्रति प्रेम रखते हैं और शैतान के लिए दया रखते हैं तो क्या वे जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी पैदा नहीं कर रहे हैं? वे लोग जो केवल यीशु पर विश्वास करते हैं और अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर को नहीं मानते, और जो मौखिक रूप से देहधारी परमेश्वर में विश्वास करने का दावा करते हैं, परंतु बुरे कार्य करते हैं, वे सब मसीह-विरोधी हैं, उनकी तो बात ही क्या जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं। ये सब लोग विनाश के पात्र होंगे। मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्यों को आंकते हैं वह उनके व्यवहार पर आधारित होता है; जिनका व्यवहार अच्छा है वे धार्मिक हैं और जिनका व्यवहार घृणित है वे बुरे हैं। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्यों का न्याय करता है उसका आधार यह है कि क्या उनका सार परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है कि नहीं; जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है वह धार्मिक है और जो नहीं करता है वह शत्रु है और बुरा व्यक्ति है, फिर चाहे इस व्यक्ति का व्यवहार अच्छा हो या खराब और चाहे इस व्यक्ति की वाणी सही हो या गलत। कुछ लोग अच्छे कर्मों का उपयोग भविष्य में अच्छी मंज़िल प्राप्त करने के लिए करना चाहते हैं और कुछ लोग अच्छी वाणी का उपयोग एक अच्छी मंजिल हासिल करने में करना चाहते हैं। हर कोई यह गलत विश्वास करता है कि परमेश्वर लोगों के परिणाम उनके व्यवहार या वाणी के आधार पर निर्धारित करता है; इसलिए बहुत-से लोग अपने लिए क्षणिक अनुग्रह हथियाने के लिए इसका फायदा उठाना चाहते हैं। जो लोग आने वाले विश्राम के समय में जीवित बचेंगे उन सभी ने पीड़ा के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये सब वे लोग होंगे जिन्होंने अपने कर्तव्य अच्छे ढंग से निभा लिए होंगे और जिन्होंने सोच-समझकर परमेश्वर के प्रति समर्पण किया हुआ होगा। जो केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने के इरादे से सिर्फ सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं वे नहीं रहेंगे। प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम की व्यवस्था के लिए परमेश्वर के पास उचित मानक हैं; वह केवल यूँ ही किसी के शब्दों या आचरण के अनुसार ये निर्णय नहीं लेता, न ही वह एक अवधि के दौरान किसी के व्यवहार के अनुसार निर्णय लेता है। अतीत में किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के लिए की गई किसी सेवा की वजह से वह किसी के बुरे कर्मों के प्रति नर्मी कतई नहीं बरतेगा, न ही वह परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाने की थोड़ी-सी अवधि के कारण किसी को मृत्यु से बचाएगा। कोई भी अपनी बुराई के प्रतिफल से नहीं बच सकता है, न ही कोई अपने बुरे कर्मों को छिपा सकता है और फलस्वरूप विनाश की पीड़ा से बच सकता है। यदि लोग वास्तव में अपने कर्तव्य अच्छे ढंग से निभा सकते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे अनंतकाल तक परमेश्वर के प्रति वफादार हैं और प्रतिफल की खोज नहीं करते हैं, फिर चाहे वे आशीष प्राप्त करें या दुख सहें। यदि लोग आशीष दिखाई देने पर परमेश्वर के लिए वफादार रहते हैं और आशीष न दिखाई देने पर अपनी वफादारी खो देते हैं और अगर ये लोग—जिन्होंने कभी परमेश्वर के लिए वफादारी से श्रम किया था—अंत में परमेश्वर की गवाही देने या अपने जिम्मे आए कर्तव्य अच्छे से निभाने में असमर्थ हैं तो ऐसे लोग अभी भी विनाश के पात्र होंगे। संक्षेप में, बुरे लोग हमेशा तक जीवित नहीं रह सकते, न ही वे विश्राम में प्रवेश कर सकते हैं; केवल धार्मिक लोग विश्राम के स्वामी होंगे। जब मानवता सही रास्ते पर होगी, लोग सामान्य मानवीय जीवन जिएंगे। वे सब अपने कर्तव्य निभा पाएँगे और परमेश्वर के प्रति पूर्णतः वफादार होंगे। वे अपने विद्रोहीपन और भ्रष्ट स्वभाव को पूरी तरह उतार फेंकेंगे और वे विद्रोह और प्रतिरोध से रहित होकर परमेश्वर के लिए और परमेश्वर के कारण जिएंगे। वे परमेश्वर के प्रति पूर्णतः समर्पण कर पाएँगे। यह परमेश्वर और मानवता का जीवन होगा; यह राज्य का जीवन होगा और यह विश्राम का जीवन होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 599

जो अपने सर्वथा अविश्वासी बच्चों और रिश्तेदारों को खींचकर कलीसिया में लाते हैं, वे बेहद स्वार्थी हैं और सिर्फ़ अपनी दयालुता का प्रदर्शन कर रहे हैं। ये लोग इसकी परवाह किए बिना कि उनका विश्वास है भी या नहीं और यह परमेश्वर का इरादा है या नहीं, केवल प्रेमपूर्ण बने रहने पर ध्यान देते हैं। कुछ लोग अपनी पत्नियों को परमेश्वर के सामने लाते हैं या अपने माता-पिता को खींचकर परमेश्वर के सामने लाते हैं और चाहे पवित्र आत्मा इससे सहमत हो या नहीं और चाहे पवित्र आत्मा उन पर कार्य कर रहा हो या नहीं, वे आँखें बंदकर परमेश्वर के लिए “प्रतिभाशाली लोगों को अपनाते हैं।” इन गैर-विश्वासियों के प्रति दयालुता दिखाने से आखिर क्या लाभ मिल सकता है? भले ही ये छद्म-विश्वासी, जिनमें पवित्र आत्मा उपस्थित नहीं है, अनिच्छापूर्वक परमेश्वर का अनुसरण करें भी, तब भी उन्हें बचाया नहीं जा सकता है, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं। जो लोग उद्धार प्राप्त कर सकते हैं, उन्हें वास्तव में प्राप्त करना उतना आसान नहीं है। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य और परीक्षणों से नहीं गुजरे हैं और देहधारी परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाए गए हैं, वे पूर्ण किए जाने में सर्वथा असमर्थ हैं। इसलिए जिस क्षण से वे नाममात्र के लिए परमेश्वर का अनुसरण आरंभ करते हैं, उन लोगों में पवित्र आत्मा मौजूद नहीं होता। उनकी स्थितियों और वास्तविक दशाओं के प्रकाश में उन्हें पूर्ण किया ही नहीं जा सकता है। इसलिए, पवित्र आत्मा उन पर अधिक ऊर्जा खपाने का इरादा नहीं रखता है, न ही वह उन्हें किसी प्रकार का प्रबोधन प्रदान करता है, न उनका मार्गदर्शन करता है; वह उन्हें केवल साथ चलने की अनुमति देता है और अंततः उनके परिणाम प्रकट करेगा—यही पर्याप्त है। लोगों का उत्साह और इच्छाएँ शैतान से आती हैं और ये चीजें किसी भी तरह से पवित्र आत्मा का कार्य पूर्ण नहीं कर सकती हैं। चाहे लोग किसी भी प्रकार के हों, उनमें पवित्र आत्मा का कार्य अवश्य होना चाहिए। क्या मनुष्य दूसरे मनुष्यों को पूर्ण कर सकते हैं? पति अपनी पत्नी से क्यों प्रेम करता है? पत्नी अपने पति से क्यों प्रेम करती है? बच्चे क्यों अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित आज्ञाकारिता दिखाते हैं? माता-पिता क्यों अपने बच्चों पर प्यार न्योछावर करते हैं? वह कौन-सी मंशा है जो सारे लोग पालते हैं? क्या यह अपनी योजनाओं और स्वार्थी इच्छाओं को पूरा करने की नहीं होती है? क्या यह वास्तव में परमेश्वर की प्रबंधन योजना के लिए कार्य करने की है? क्या यह वास्तव में परमेश्वर के कार्य के लिए कार्य करने की है? क्या यह सृजित प्राणी के कर्तव्यों को अच्छे से निभाने की है? वे जो परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू करने के समय से पवित्र आत्मा की उपस्थिति को नहीं पा सके हैं, वे पवित्र आत्मा के कार्य को कभी नहीं पा सकते हैं; ये लोग निश्चित रूप से नष्ट किए जाने के पात्र हैं। इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि कोई उनसे कितना प्रेम करता है, यह पवित्र आत्मा के कार्य का स्थान नहीं ले सकता। लोगों का उत्साह और प्रेम मानवीय इच्छाओं के निरूपक हैं, पर ये परमेश्वर की इच्छाओं के निरूपक नहीं हो सकते हैं और न ही ये परमेश्वर के कार्य का विकल्प हो सकते हैं। जो नाममात्र के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं और जो परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ जाने बिना उसके अनुसरण का दिखावा करते हैं, उनके प्रति भले ही कोई व्यक्ति यथासंभव सर्वाधिक प्रेम या दया दिखा भी दे, तो भी वे परमेश्वर की सहानुभूति प्राप्त नहीं करेंगे, न ही वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करेंगे। भले ही जो लोग ईमानदारी से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं कमज़ोर काबिलियत वाले हों और बहुत-से सत्यों को न समझ पाते हों, वे तब भी कभी-कभी पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हैं; लेकिन जो काफी अच्छी काबिलियत वाले हैं, मगर ईमानदारी से विश्वास नहीं करते, वे पवित्र आत्मा की उपस्थिति प्राप्त कर ही नहीं सकते। ऐसे लोगों के उद्धार की कतई कोई संभावना नहीं है। भले ही वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ें या कभी-कभी धर्मोपदेश सुनें, या परमेश्वर की स्तुति गाएं, तब भी वे अंततः विश्राम के समय तक बच नहीं पाएँगे। लोग सच्चे दिल से अनुसरण करते हैं या नहीं, यह इससे निर्धारित नहीं होता कि दूसरे उन्हें कैसे आंकते हैं या आसपास के लोग उन्हें कैसे दृष्टिकोण से देखते हैं, बल्कि इससे निर्धारित होता है कि क्या पवित्र आत्मा उन पर कार्य करता है और क्या उनके पास पवित्र आत्मा की उपस्थिति है। इससे भी अधिक, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या एक निश्चित अवधि तक पवित्र आत्मा के कार्य से गुज़रने के बाद उनके स्वभाव बदल चुके हैं और क्या उन्होंने परमेश्वर का कुछ ज्ञान प्राप्त कर लिया है। यदि पवित्र आत्मा किसी व्यक्ति पर कार्य करता है, तो इस व्यक्ति का स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा और परमेश्वर में विश्वास करने का उसका दृष्टिकोण धीरे-धीरे अधिक शुद्ध होता जाएगा। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि लोग कितने समय से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, अगर उनमें कुछ परिवर्तन आ चुका है तो इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा उन पर कार्य कर रहा है। यदि उनमें परिवर्तन नहीं हुआ है, इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा उन पर कार्य नहीं कर रहा है। भले ही ये लोग कुछ सेवा कर लेते हों, तो भी ऐसा करने के लिए उन्हें जो चीज प्रेरित करती है वह है आशीष पाने की मंशा। कभी-कभार सेवा करना स्वभावगत बदलाव का कोई विकल्प नहीं है। आखिरकार वे अभी भी नष्ट कर दिए जाएँगे, क्योंकि राज्य में सेवाकर्ताओं की कोई आवश्यकता नहीं होगी, न ही यह जरूरत होगी कि जिनका स्वभाव नहीं बदला है वे उन लोगों की सेवा करें जिन्हें पूर्ण किया जा चुका है और जो परमेश्वर के प्रति वफादार हैं। अतीत में बोले गए ये वचन, “प्रभु में एक व्यक्ति का विश्वास पूरे परिवार के लिए आशीष लाता है” अनुग्रह के युग पर लागू होते थे, लेकिन व्यक्ति के गंतव्य से संबंधित नहीं हैं। ये केवल अनुग्रह के युग के दौरान एक चरण के लिए ही लागू होते थे। उन वचनों का अर्थ शांति और भौतिक आशीष पर आधारित था, जिनका लोगों ने आनंद लिया; उनका मतलब यह नहीं था कि प्रभु को मानने वाले का पूरा परिवार बच जाएगा, न ही उनका मतलब यह था कि जब कोई आशीष पाता है, तो पूरे परिवार को भी विश्राम में लाया जा सकता है। किसी को आशीष मिलेगा या दुर्भाग्य सहना पड़ेगा, इसका निर्धारण व्यक्ति के सार के अनुसार होता है, न कि सामान्य सार के अनुसार, जो वह दूसरों के साथ साझा करता है। इस प्रकार की लोकोक्ति या नियम का राज्य में कोई स्थान है ही नहीं। यदि कोई व्यक्ति अंततः बच पाता है, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि उसने परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा किया है और यदि कोई विश्राम के दिनों तक बचने में सक्षम नहीं हो पाता, तो ऐसा इसलिए है कि वह परमेश्वर के प्रति विद्रोही रहा है और उसने परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया है। प्रत्येक व्यक्ति की एक उचित मंजिल होती है जिसका निर्धारण प्रत्येक व्यक्ति के सार के अनुसार किया जाता है और इसका दूसरे लोगों से कोई लेना-देना नहीं होता। किसी बच्चे के बुरे कर्म उसके माता-पिता को हस्तांतरित नहीं किए जा सकते और न ही किसी बच्चे की धार्मिकता उसके माता-पिता के साथ बाँटी जा सकती है। माता-पिता के बुरे कर्म उनकी संतानों को हस्तांतरित नहीं किए जा सकते, न ही माता-पिता की धार्मिकता उनके बच्चों के साथ साझा की जा सकती है। हर कोई अपने-अपने पाप ढोता है और हर कोई अपने-अपने आशीषों का आनंद लेता है। कोई भी दूसरे व्यक्ति का स्थान नहीं ले सकता है। यही धार्मिकता है। मनुष्य के नज़रिए से, यदि माता-पिता आशीष पाते हैं, तो उनके बच्चों को भी मिलना चाहिए, यदि बच्चे बुरा करते हैं, तो उनके पापों के लिए माता-पिता को प्रायश्चित करना चाहिए। यह मनुष्य का दृष्टिकोण है और कार्य करने का मनुष्य का तरीक़ा है; यह परमेश्वर का दृष्टिकोण नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम का निर्धारण उनके कर्मों के सार के अनुसार होता है और इसका निर्धारण सदैव उचित तरीके से होता है। कोई भी दूसरे के पापों को नहीं ढो सकता; इससे भी बढ़कर, कोई भी दूसरे के बदले दंड नहीं पा सकता। यह निर्विवाद है। माता-पिता द्वारा अपनी संतान की बहुत अधिक देखभाल का अर्थ यह नहीं कि वे अपनी संतान के बदले धार्मिकता के कर्म कर सकते हैं, न ही किसी बच्चे की अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित आज्ञाकारिता का यह अर्थ है कि वह अपने माता-पिता के बदले धार्मिकता के कर्म कर सकता है। यही इन वचनों का वास्तविक अर्थ है, “उस समय दो जन खेत में होंगे, एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा। दो स्त्रियाँ चक्‍की पीसती रहेंगी, एक ले ली जाएगी और दूसरी छोड़ दी जाएगी।” लोग बुरा करने वाले बच्चों के प्रति गहरे प्रेम के आधार पर उन्हें विश्राम में नहीं ले जा सकते, न ही कोई अपनी पत्नी (या पति) को अपने धार्मिक कर्मों के आधार पर विश्राम में ले जा सकता है। यह एक प्रशासनिक नियम है; किसी के लिए कोई अपवाद नहीं हो सकता। धार्मिक कर्म करने वाले अंततः धार्मिक कर्म करने वाले होते हैं और कुकर्मी अंततः कुकर्मी ही होते हैं। धार्मिक कर्म करने वाले ही अंततः जीवित बच पाएँगे, जबकि कुकर्मी नष्ट कर दिए जाएँगे। पवित्र, पवित्र होते हैं; वे घिनौने नहीं होते हैं। घिनौने, घिनौने होते हैं और उनमें पवित्रता का एक भी अंश नहीं होता है। जो लोग नष्ट कर दिए जाएँगे वे सभी बुरे हैं और जो जीवित बचेंगे वे सभी धार्मिक हैं—फिर चाहे बुरे लोगों की संतानें धार्मिक कर्म करने वाली हों और फिर भले ही धार्मिक लोगों के माता-पिता बुरे कर्म करें। एक विश्वासी पति और अविश्वासी पत्नी के बीच मूल रूप से कोई संबंध नहीं होता और विश्वासी बच्चों और अविश्वासी माता-पिता के बीच कोई संबंध नहीं होता; ये दोनों तरह के लोग असंगत हैं। विश्राम में प्रवेश करने से पहले, लोगों में दैहिक, पारिवारिक स्नेह होता है, लेकिन एक बार जब वे विश्राम में प्रवेश कर जाते हैं, फिर दैहिक, पारिवारिक स्नेह जैसी कोई बात नहीं रह जाती। जो अपना कर्तव्य निभाते हैं वे अंतर्निहित रूप से उनके शत्रु हैं जो अपने कर्तव्य नहीं निभाते हैं; जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं और जो उससे घृणा करते हैं, वे आंतरिक रूप से एक दूसरे के विरोधी हैं। जो विश्राम में प्रवेश करेंगे और जो नष्ट किए जा चुके होंगे वे असंगत किस्म के सृजित प्राणी हैं। जो सृजित प्राणी अपने कर्तव्य निभाते हैं, वे बचे रहने में समर्थ होंगे, जबकि वे जो अपने कर्तव्य नहीं निभाते, वे विनाश के पात्र बनेंगे; यही नहीं, यह सब अनंत तक चलेगा। क्या तुम एक सृजित प्राणी के तौर पर अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपने पति से प्रेम करती हो? क्या तुम एक सृजित प्राणी के तौर पर अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपनी पत्नी से प्रेम करते हो? क्या तुम एक सृजित प्राणी के तौर पर अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपने अविश्वासी माता-पिता के प्रति संतानोचित आज्ञाकारिता दिखाते हो? क्या परमेश्वर में विश्वास करने के मामले में लोगों के दृष्टिकोण वास्तव में सही हैं या गलत? तुम वास्तव में परमेश्वर में विश्वास किसलिए करते हो? तुम वास्तव में क्या पाना चाहते हो? तुम वास्तव में परमेश्वर से कैसे प्रेम करते हो? जो लोग सृजित प्राणियों के रूप में अपने कर्तव्य अच्छे से नहीं निभा सकते और जो भरपूर प्रयास नहीं कर सकते, वे विनाश के पात्र बनेंगे। आज के लोगों के बीच दैहिक संबंध होते हैं, साथ ही खून के रिश्ते होते हैं, किंतु भविष्य में ये सब टूट जाएँगे। विश्वासी और अविश्वासी अंतर्निहित रूप से एक दूसरे के प्रति सुसंगत नहीं हैं; बल्कि वे परस्पर विरोधी हैं। जो विश्राम में हैं, वे सभी वो लोग होंगे जो यह विश्वास करते हैं कि कोई परमेश्वर है और परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं, जबकि वे जो परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं, वे सब नष्ट कर दिए गए होंगे। पृथ्वी पर परिवारों का अब और अस्तित्व नहीं होगा; तो माता-पिता या संतानों या पति-पत्नियों के बीच के रिश्ते कैसे हो सकते हैं? विश्वास और अविश्वास की असंगतता से ऐसे दैहिक संबंध पूरी तरह टूट चुके होंगे!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 600

मानवता के बीच मूल रूप से परिवार नहीं थे; केवल पुरुष थे और महिलाएँ थीं—दो भिन्न प्रकार के मनुष्य। कोई देश नहीं थे, परिवारों की तो बात ही छोड़ो, परंतु मानवता की भ्रष्टता के कारण, सभी प्रकार के लोगों ने स्वयं को व्यक्तिगत क़बीलों में संगठित कर लिया, बाद में ये देशों और जातियों में विकसित हो गए। ये देश और जातियाँ छोटे-छोटे परिवारों से मिलकर बने थे और इस तरीक़े से सभी प्रकार के लोग, भाषा की भिन्नताओं और सीमाओं के अनुसार विभिन्न नस्लों में बंट गए। वास्तव में, दुनिया में चाहे कितनी भी नस्लें हों, मानवता का अंततः केवल एक ही पूर्वज है। आरंभ में, केवल दो प्रकार के ही मनुष्य थे और ये दो प्रकार पुरुष और स्त्री थे। हालाँकि, परमेश्वर के कार्य की प्रगति, इतिहास की गति और भौगोलिक परिवर्तनों के कारण, विभिन्न अंशों तक ये दो प्रकार के लोग और अधिक प्रकारों में विकसित हो गए। आधारभूत रूप में, मानवता में चाहे कितनी नस्लें शामिल हों, समस्त मानवता अभी भी परमेश्वर का सृजन है। लोग चाहे किसी भी नस्ल से संबंधित हों, वे सब उसके सृजित प्राणी हैं; वे सब आदम और हव्वा के वंशज हैं। यद्यपि वे परमेश्वर के हाथों से नहीं बनाए गए थे, फिर भी वे आदम और हव्वा के वंशज हैं, जिन्हें परमेश्वर ने निजी तौर पर सृजित किया। लोग चाहे किसी भी प्रकार के प्राणियों से संबंधित हों, वे सब उसके सृजित प्राणी हैं; चूँकि वे सृजित प्राणी हैं, इसलिए उनकी मंजिलें होनी चाहिए जो मनुष्यों की होनी ही चाहिए और वे मनुष्यों के लिए व्यवस्थाएँ बनाने के नियमों के अनुसार विभाजित किए जाएंगे। कहने का अर्थ है कि बुरे कर्म करने वाले हों या धार्मिक कर्म करने वाले, सभी लोग अंततः सृजित प्राणी ही हैं। जो सृजित प्राणी बुरे कर्म करते हैं अंततः नष्ट किए जाएँगे, और जो सृजित प्राणी धार्मिक कर्म करते हैं, बचे रहेंगे। इन दो प्रकार के सृजित प्राणियों के लिए यह सबसे उपयुक्त व्यवस्था है। कुकर्मी अपने विद्रोहीपन के कारण इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि वे परमेश्वर के सृजित प्राणी हैं और फिर भी शैतान द्वारा बंदी बना लिए गए हैं और इस प्रकार बचाए नहीं जा सकते हैं। जो सृजित प्राणी धार्मिक कर्म करते हैं, वे इस तथ्य के आधार पर कि वे जीवित रहेंगे, इससे इनकार नहीं कर सकते कि उन्हें परमेश्वर ने बनाया है और शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद भी उन्होंने उद्धार प्राप्त किया है। बुरे कर्म करने वाले ऐसे सृजित प्राणी हैं जो परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं; ये ऐसे सृजित प्राणी हैं, जिन्हें बचाया नहीं जा सकता और वे पहले ही पूरी तरह शैतान की पकड़ में जा चुके हैं। बुराई करने वाले लोग भी मनुष्य ही हैं; वे ऐसे मनुष्य हैं, जो चरम सीमा तक भ्रष्ट किए जा चुके हैं और जो बचाए नहीं जा सकते। उसी तरह के सृजित प्राणी होने के चलते, जो लोग धार्मिकता के कर्म करते हैं वे भी भ्रष्ट किए गए हैं, परंतु ये वे लोग हैं जो अपने भ्रष्ट स्वभाव त्याग देना चाहते हैं और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम हो चुके हैं। जो लोग धार्मिक कर्म करते हैं वे धार्मिकता से भरे नहीं हैं। बल्कि वे ऐसे लोग हैं जो उद्धार प्राप्त कर चुके हैं, अपने भ्रष्ट स्वभाव त्याग चुके हैं और परमेश्वर के प्रति समर्पण कर चुके हैं, वे ऐसे लोग हैं जो अंत तक डटे रहेंगे। ऐसा नहीं है कि वे ऐसे लोग हैं जो शैतान द्वारा कभी भ्रष्ट नहीं किए गए हैं। परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाने के बाद सभी सृजित प्राणियों में वे लोग भी होंगे जो नष्ट किए जाएँगे और वे भी होंगे जो बचे रहेंगे। यह उसके प्रबंधन कार्य की एक अपरिहार्य प्रवृत्ति है; इससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता। बुरा करने वालों को बचने की अनुमति नहीं होगी; जो अंत तक परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसका अनुसरण करते हैं, उनका जीवित रहना निश्चित है। चूँकि यह कार्य मानवता के प्रबंधन का है, इसलिए कुछ होंगे जो बचे रहेंगे और कुछ होंगे जो निकाल दिए जाएँगे। ये अलग-अलग प्रकार के लोगों के लिए अलग-अलग परिणाम हैं और ये सृजित प्राणियों के लिए सबसे उपयुक्त व्यवस्थाएँ हैं। मानवजाति के लिए परमेश्वर की अंतिम व्यवस्था परिवार तोड़कर, जातीयताओं को ध्वस्त करके और राष्ट्रीय सीमाओं को तोड़कर मानवजाति को बाँटना है, ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें परिवारों और राष्ट्रों की सीमाएँ न हों क्योंकि मनुष्य अंततः एक ही पूर्वज के वंशज हैं और परमेश्वर के सृजित प्राणी हैं। संक्षेप में, बुरे कर्म करने वाले सभी सृजित प्राणी नष्ट कर दिए जाएँगे और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाले सृजित प्राणी बच जाएँगे। इस तरह, न कोई परिवार होंगे न देश होंगे, विशेष रूप से आने वाले विश्राम के समय में कोई जातियाँ नहीं होंगी; इस प्रकार की मानवता सबसे अधिक पवित्र प्रकार की मानवता होगी। आदम और हव्वा का सृजन मूल रूप से इसलिए किया गया था ताकि मानवता पृथ्वी की सभी चीजों को प्रबंधित कर सके; दूसरे शब्दों में, आरंभ में मनुष्य सभी चीजों के स्वामी थे। मनुष्य के सृजन में यहोवा की इच्छा यह थी कि मनुष्य पृथ्वी पर अस्तित्व बनाए रखे और इस पर सभी चीजें संभाले, क्योंकि आरंभ में मानवता भ्रष्ट नहीं की गई थी और बुरा करने में असमर्थ थी। हालाँकि मनुष्य भ्रष्ट हो जाने के बाद सभी चीजों का प्रबंधक नहीं रहा। परमेश्वर द्वारा उद्धार का उद्देश्य मानवता की इस भूमिका को वापस लाना है, मानवजाति की मूल समझ और मूल समर्पण को वापस लाना है; विश्राम में मानवता उस परिणाम को सटीक रूप से दर्शाती है जो परमेश्वर अपने उद्धार के कार्य से प्राप्त करने की आशा रखता है। यूँ तो यह अदन की वाटिका के जीवन के समान जीवन नहीं होगा, किंतु उसका सार वही होगा; यह अलग बात है कि मानवता अब कभी वह भ्रष्टता-रहित मानवता नहीं रहेगी, बल्कि ऐसी मानवता होगी जो भ्रष्ट हो गई थी और जिसने बाद में उद्धार प्राप्त किया। ये लोग जिन्होंने उद्धार प्राप्त कर लिया है, अंततः (यानी जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाता है) विश्राम में प्रवेश करेंगे। इसी प्रकार, जिन्हें दंड दिया जाना है, उनके परिणाम भी अंत में पूर्ण रूप से प्रकट किए जाएँगे और उन्हें केवल तभी नष्ट किया जाएगा, जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा। दूसरे शब्दों में, जब उसका कार्य समाप्त हो जाएगा, तो वे बुरा करने वाले और वे जिन्हें बचाया जा चुका है, सभी प्रकट किए जाएँगे, क्योंकि सभी प्रकार के लोगों को प्रकट करने का कार्य (चाहे वे बुरा करने वाले हों या उनमें से हों जो बचाए गए हैं) सभी मनुष्यों पर एक साथ संपन्न किया जाएगा। बुरे कर्म करने वाले निकाल दिए जाएँगे और जिन्हें बचे रहने की अनुमति है, वे साथ-साथ प्रकट किए जाएँगे। इसलिए सभी प्रकार के लोगों के परिणाम एक साथ प्रकट किए जाएँगे। कुकर्मियों को दरकिनार करने और धीरे-धीरे उनका न्याय करने या उन्हें दंडित करने से पहले परमेश्वर उद्धार पा चुके लोगों के समूह को विश्राम में प्रवेश की अनुमति नहीं देगा; ये तथ्य नहीं हैं। जब बुरा करने वाले नष्ट हो जाते हैं और जो बचे रह सकते हैं, वे विश्राम में प्रवेश करते हैं, तब ब्रह्मांड में परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा। वहाँ जो आशीष पाएँगे और जो दुर्भाग्य से पीड़ित होंगे, उनके बीच प्राथमिकता का क्रम नहीं होगा; जो आशीष पाएँगे, वे अनंतकाल तक जीवित रहेंगे जबकि जो दुर्भाग्य से पीड़ित होंगे, वे अनंतकाल तक नष्ट होते रहेंगे। कार्य के ये दोनों क़दम साथ-साथ पूर्ण होंगे। यह विद्रोही लोगों के अस्तित्व के कारण ही है कि समर्पण करने वालों की धार्मिकता प्रकट होगी, और चूँकि ऐसे लोग हैं जिन्होंने आशीष प्राप्त किए हैं, इसलिए ही दुष्टों द्वारा झेले जाने वाला दुर्भाग्य प्रकट किया जाएगा जो उन्हें उनके बुरे कर्मों के लिए मिलता है। यदि परमेश्वर ने बुरे कर्म करने वालों को प्रकट न किया, तो वे लोग, जो ईमानदारी से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं, कभी भी प्रकाश नहीं देखेंगे; यदि परमेश्वर उन्हें उचित गंतव्य पर नहीं पहुँचाता जो उसके प्रति समर्पण करते हैं, तो जो परमेश्वर से विद्रोह करते हैं, वे उचित दंड प्राप्त नहीं कर पाएँगे। यही परमेश्वर के कार्य की प्रक्रिया है। यदि वह बुरे को दंड देने एवं अच्छे को पुरस्कृत करने का यह कार्य नहीं करता, तो सृजित प्राणी कभी अपने-अपने गंतव्यों तक पहुँचने में सक्षम नहीं हो पाएँगे। जब एक बार मानवजाति विश्राम में प्रवेश कर लेगी तो बुरे कर्म करने वाले नष्ट किए जा चुके होंगे और समस्त मानवता सही मार्ग पर होगी; सभी प्रकार के लोग उन भूमिकाओं के आधार पर जो उन्हें निभानी चाहिए, अपनी-अपनी किस्म के अनुसार छाँटे जाएँगे। केवल यही मानवता के विश्राम का दिन होगा, केवल यही मानवता के विकास की अपरिहार्य प्रवृत्ति है। जब मानवता विश्राम में प्रवेश करेगी, केवल तभी परमेश्वर के महान कार्य का अंततः समापन होगा; यह उसके कार्य का अंतिम भाग होगा। यह कार्य मानवता के समस्त पतनशील दैहिक जीवन का अंत करेगा, साथ ही यह भ्रष्ट मानवता के जीवन का अंत करेगा। इसके बाद से मनुष्य एक नए क्षेत्र में प्रवेश करेंगे। यद्यपि सभी मनुष्य देह में जिएँगे, किंतु इस जीवन के सार और भ्रष्ट मानवता के जीवन में उल्लेखनीय अंतर होगा। इस अस्तित्व का अर्थ और भ्रष्ट मानवता के अस्तित्व का अर्थ भी भिन्न होगा। यूँ तो यह एक नए प्रकार के व्यक्ति का जीवन नहीं होगा, लेकिन इसे उस मानवता का जीवन कहा जा सकता है जिसे बचा लिया गया है, साथ ही एक ऐसा जीवन जिसमें मानवता और विवेक को पुनः प्राप्त कर लिया गया है। ये वे लोग होंगे जो कभी परमेश्वर के खिलाफ विद्रोहशील थे, जिन्हें परमेश्वर द्वारा जीत लिया गया है और फिर उसके द्वारा बचा लिया गया है; ये वे लोग होंगे जिन्होंने परमेश्वर का अनादर किया और बाद में उसकी गवाही दी। उसकी परीक्षा से गुजर चुकने और बचने के बाद उनका अस्तित्व सबसे अधिक सार्थक अस्तित्व होगा; ये वे लोग होंगे जिन्होंने शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही दी और वे मनुष्य होंगे जो जीने के योग्य हैं। जो नष्ट किए जाएँगे वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग नहीं रह सकते और जो जीते रहने के योग्य नहीं हैं। उनका विनाश उनके बुरे कर्मों का नतीजा होगा और ऐसा विनाश ही उनके लिए सर्वोत्तम गंतव्य है। भविष्य में जब मानवता एक सुंदर क्षेत्र में प्रवेश करेगी, तब पति-पत्नी, पिता-पुत्री या माँ-बेटे का ऐसा कोई रिश्ता नहीं रहेगा जैसा कि लोग कल्पना करते हैं। उस समय, प्रत्येक मनुष्य को उसकी अपनी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा और परिवार पहले ही ध्वस्त हो चुके होंगे। पूरी तरह असफल हो चुकने के बाद शैतान फिर कभी मानवता को परेशान नहीं करेगा और इसलिए मनुष्यों में अब और शैतानी भ्रष्ट स्वभाव नहीं होंगे। वे विद्रोही लोग पहले ही नष्ट किए जा चुके होंगे और केवल समर्पण करने वाले लोग ही बचे रहेंगे। ऐसे में बहुत थोड़े से परिवार पूरी तरह बचेंगे, तो दैहिक संबंध कैसे बने रह सकते हैं? मानवजाति का अतीत का दैहिक जीवन पूरी तरह निषिद्ध होगा; तो लोगों के बीच दैहिक संबंध कैसे अस्तित्व में रह सकते हैं? शैतानी भ्रष्ट स्वभावों के बिना, मानव जीवन अब अतीत का पुराना जीवन नहीं रहेगा, बल्कि एक नया जीवन होगा। माता-पिता बच्चों को गँवा देंगे और बच्चे माता-पिता को गँवा देंगे। पति पत्नियों को गँवा देंगे और पत्नियाँ पतियों को गँवा देंगी। अभी लोगों के बीच दैहिक संबंध विद्यमान हैं, लेकिन जब सभी विश्राम में प्रवेश कर लेंगे तो ये संबंध आगे विद्यमान नहीं रहेंगे। केवल इस प्रकार की मानवता में ही धार्मिकता और पवित्रता होगी; केवल इस प्रकार की मानवता ही परमेश्वर की आराधना कर सकती है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 601

परमेश्वर ने मनुष्यों का सृजन किया और उसने उन्हें पृथ्वी पर रखा और तब से उनकी अगुआई की है और बाद में उसने उन्हें बचाया और मानवता के लिए पाप-बलि बना और अंत में, उसे अभी भी मानवता को जीतना होगा, मनुष्यों को पूरी तरह से बचाना होगा और उन्हें उनकी मूल समानता में वापस लौटाना होगा। यही वह कार्य है जिसमें वह आरंभ से अंत तक संलग्न रहा है—मनुष्य को उसकी मूल छवि और उसकी मूल समानता में वापस लौटाना। परमेश्वर अपना राज्य स्थापित करेगा और मनुष्य की मूल समानता बहाल करेगा, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर पृथ्वी पर और समस्त सृजित प्राणियों के बीच अपने अधिकार को बहाल करेगा। मनुष्यों ने शैतान से भ्रष्ट होने के बाद सृजित प्राणियों की जो भूमिका होनी चाहिए थी उसे खोने के साथ-साथ परमेश्वर का भय मानने वाला अपना हृदय भी गँवा दिया। वे सब परमेश्वर के प्रति विद्रोही शत्रु बन गए, शैतान की सत्ता के अधीन जीते थे और शैतान की चालाकी के वश में थे; इस प्रकार, अपने सृजित प्राणियों के बीच कार्य करने का परमेश्वर के पास कोई तरीका नहीं था और वह उनका भय प्राप्त कर पाने में और भी असमर्थ हो गया। मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया था और उन्हें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए थी, पर उन्होंने वास्तव में परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया और इसके बजाय शैतान की आराधना करने लगे। शैतान उनके दिलों में आदर्श बन गया। इस प्रकार परमेश्वर ने मनुष्य के हृदय में अपना स्थान खो दिया, जिसका मतलब है कि उसके द्वारा मानवजाति के सृजन के पीछे का अर्थ खो गया। इसलिए मानवजाति के सृजन के अपने अर्थ को बहाल करने के लिए उसे उनकी मूल समानता को बहाल करना होगा और मानवजाति को उसके भ्रष्ट स्वभाव से मुक्ति दिलानी होगी। शैतान से मनुष्यों को वापस प्राप्त करने के लिए, उसे उन्हें पाप से बचाना होगा। केवल इसी तरह परमेश्वर धीरे-धीरे उनकी मूल समानता और भूमिका को बहाल कर सकता है और अंततः अपने राज्य को बहाल कर सकता है। विद्रोह करने वाले उन पुत्रों का अंत में पूर्णतया विनाश भी इसलिए होगा कि मनुष्य बेहतर ढंग से परमेश्वर की आराधना कर सकें और पृथ्वी पर बेहतर ढंग से रह सकें। चूँकि परमेश्वर ने मानवों का सृजन किया, इसलिए वह मनुष्य से अपनी आराधना करवाएगा; क्योंकि वह मानवता के मूल कार्य को बहाल करना चाहता है, वह उसे पूर्ण रूप से और बिना किसी मिलावट के बहाल करेगा। अपना अधिकार बहाल करने का अर्थ है, मनुष्यों से अपनी आराधना कराना और समर्पण कराना; इसका अर्थ है कि वह अपनी वजह से मनुष्यों को जीवित रखेगा और अपने अधिकार की वजह से अपने शत्रुओं का विनाश करेगा। इसका अर्थ है कि परमेश्वर किसी प्रतिरोध के बिना, मनुष्यों के बीच उस सब को बनाए रखेगा जो उसके बारे में है। जो राज्य परमेश्वर स्थापित करना चाहता है, वह उसका स्वयं का राज्य है। वह जिस मानवता की आकांक्षा रखता है वह ऐसी हो जो उसकी आराधना करे, जो उसके प्रति पूरी तरह समर्पण करे और जो उसकी महिमा से युक्त हो। यदि परमेश्वर ने भ्रष्ट मानवता को न बचाया तो उसके द्वारा मानवता के सृजन का अर्थ खत्म हो जाएगा; उसका मनुष्यों के बीच अब और अधिकार नहीं रहेगा और पृथ्वी पर उसके राज्य का अस्तित्व अब और नहीं रह पाएगा। यदि परमेश्वर ने उन शत्रुओं का नाश नहीं किया जो उसके प्रति विद्रोही हैं, तो वह अपनी संपूर्ण महिमा प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा, न ही वह पृथ्वी पर अपने राज्य की स्थापना कर पाएगा। मानवता में से उन सबको पूरी तरह नष्ट करना, जो उसके प्रति विद्रोही हैं और जो पूर्ण किए जा चुके हैं, उन्हें विश्राम में लाना—ये उसका कार्य पूरा होने और उसकी महान उपलब्धि के चिह्न होंगे। जब मनुष्यों को उनकी मूल समानता में बहाल कर लिया जाएगा और जब वे अपने-अपने कर्तव्य अच्छे से निभा सकेंगे, अपने उचित स्थानों पर बने रह सकेंगे और परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकेंगे, तब परमेश्वर ने पृथ्वी पर उन लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया होगा जो उसकी आराधना करते हैं और उसने पृथ्वी पर एक राज्य भी स्थापित कर लिया होगा जो उसकी आराधना करता है। पृथ्वी पर उसकी अनंत विजय होगी और वे सभी जो उसके विरोध में हैं, अनंतकाल के लिए नष्ट हो जाएँगे। इससे मनुष्य का सृजन करने की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी; इससे सब चीजों के सृजन की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी और इससे पृथ्वी पर, सभी चीजों के बीच, और शत्रुओं के बीच उसका अधिकार भी बहाल हो जाएगा। ये उसकी संपूर्ण विजय के चिह्न होंगे। इसके बाद से मानवता विश्राम में प्रवेश करेगी और ऐसे जीवन में प्रवेश करेगी, जो सही मार्ग पर है। मानवता के साथ परमेश्वर भी अनंत विश्राम में प्रवेश करेगा और एक ऐसा अनंत जीवन आरंभ करेगा जिसे स्वयं वह और मनुष्य दोनों ही साझा करते हों। पृथ्वी से गंदगी और विद्रोहीपन मिट जाएगा, पृथ्वी पर से सारा विलाप भी समाप्त हो जाएगा और परमेश्वर का विरोध करने वाली प्रत्येक चीज का अस्तित्व नहीं रहेगा। केवल परमेश्वर और वही लोग बचेंगे, जिनका उसने उद्धार किया है; केवल उसकी सृष्टि ही बचेगी।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 602

राज्य के युग में मनुष्य को पूरी तरह से पूर्ण बनाया जाएगा। विजय के कार्य के पश्चात् मनुष्य को शोधन और क्लेश से गुजारा जाएगा। जो इस क्लेश के दौरान विजय प्राप्त कर सकते हैं और अपनी गवाही में अडिग रह सकते हैं वे वो लोग हैं जिन्हें अंततः पूर्ण बनाया जाएगा; वे विजेता हैं। इस क्लेश के दौरान मनुष्य से माँग की जाती है कि वह इस शोधन को स्वीकार करे, और यह शोधन परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण है। यह अंतिम बार है कि परमेश्वर के प्रबंधन के समस्त कार्य के समापन से पहले मनुष्य का शोधन किया जाएगा, और जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं उन सभी को यह अंतिम परीक्षा अवश्य स्वीकार करनी चाहिए, और उन्हें यह अंतिम शोधन अवश्य स्वीकार करना चाहिए। जो लोग क्लेश के मध्य में हैं वे पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर के मार्गदर्शन से रहित हैं, किंतु जिन्हें सच में जीत लिया गया है और जो सच में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं वे अंततः डटे रहेंगे; ये वे लोग हैं जिनमें मानवता है, और जो सच्चे मन से परमेश्वर से प्रेम करते हैं। परमेश्वर चाहे जो करे, ये विजयी लोग दर्शनों से वंचित नहीं होंगे और ये अभी भी अपनी गवाही को गँवाए बिना सत्य को अभ्यास में लाएँगे। ये वे लोग हैं जो अंततः महाक्लेश से उभरेंगे। भले ही जो लोग केवल लाभ पाने के लिए खानापूर्ति करते हैं वे आज भी मुफ्तखोरी कर सकते हों, किंतु अंतिम क्लेश से बच निकलने में कोई सक्षम नहीं है और अंतिम परीक्षा से कोई नहीं बच सकता। जो लोग विजय प्राप्त करते हैं, उनके लिए ऐसा क्लेश जबरदस्त शोधन है; किंतु केवल लाभ पाने की खातिर खानापूर्ति करने वालों के लिए यह पूरी तरह से उन्हें हटाए जाने का कार्य है। जिनके दिलों में परमेश्वर है, उनका चाहे किसी भी प्रकार से परीक्षण क्यों न किया जाए, उनकी निष्ठा अपरिवर्तित रहती है; किंतु जिनके दिलों में परमेश्वर नहीं है, वे अपनी देह के लिए परमेश्वर का कार्य लाभदायक न रहने पर परमेश्वर के बारे में अपना दृष्टिकोण बदल लेते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर को छोड़कर चले जाते हैं। वे ऐसे लोग हैं जो अंत में दृढ़ नहीं रहेंगे, जो केवल परमेश्वर की आशीषों की तलाश करते हैं और परमेश्वर के लिए खुद को खपाने और उसके प्रति समर्पण करने की कोई इच्छा नहीं रखते। ऐसे सभी नीच लोगों को तब “बाहर निकाल दिया जाएगा” जब परमेश्वर का काम समाप्त हो जाएगा और उन पर बिल्कुल भी कोई दया नहीं दिखाई जाएगी। जिन लोगों में मानवता नहीं है, उनमें परमेश्वर के लिए बिल्कुल भी सच्चा प्रेम नहीं होता। जब परिवेश आरामदायक होता है या उनके पास कुछ प्राप्त करने का अवसर होता है, तो वे परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आज्ञाकारी होते हैं, लेकिन एक बार जब उनकी इच्छाएँ बाधित होती हैं या अंततः वे धराशायी हो जाती हैं, तो वे तुरंत विद्रोह में उठ खड़े होते हैं। यहाँ तक कि सिर्फ एक रात के अंतराल में, वे एक मुस्कुराते हुए, “दयालु” व्यक्ति से एक जंगली दिखने वाले जल्लाद में बदल जाते हैं, बिना किसी तुक या कारण के अप्रत्याशित रूप से अपने कल के उपकारी के साथ अपने घातक दुश्मन की तरह पेश आते हैं। यदि इन दुष्ट राक्षसों को जो बिना पलक झपकाए मारते हैं, बहिष्कृत नहीं किया जाता, तो क्या वे एक गंभीर अंतर्निहित खतरा नहीं बन जाएँगे? ऐसा नहीं है कि एक बार जब विजय का काम समाप्त हो जाता है, तो मनुष्य को बचाने का काम पूरी तरह से पूरा हो जाता है। यद्यपि विजय का काम समाप्त हो गया है, मनुष्य को शुद्ध करने का काम पूरा नहीं हुआ है; एक बार जब मनुष्य पूरी तरह से शुद्ध हो जाता है, एक बार जब परमेश्वर के प्रति सच्चे मन से समर्पण करने वाले पूर्ण किए जाते हैं और एक बार जब उन छद्मवेशियों को हटा दिया जाता है जिनके दिलों में परमेश्वर नहीं है, केवल तभी काम समाप्त होगा। जो लोग परमेश्वर के कार्य के अंतिम चरण में उसे संतुष्ट करने में असमर्थ हैं, उन्हें पूरी तरह हटा दिया जाएगा और जिन्हें हटा दिया जाता है, वे राक्षसों की किस्म के हैं। जो लोग परमेश्वर को संतुष्ट करने में अक्षम हैं, वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। भले ही वे लोग आज परमेश्वर का अनुसरण करते हों, फिर भी इससे यह साबित नहीं होता कि ये वो लोग हैं, जो अंततः बने रहेंगे। “जो लोग अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करेंगे, वे उद्धार प्राप्त करेंगे,” इन वचनों में “अनुसरण” का अर्थ क्लेश के बीच डटे रहना है। आज बहुत-से लोग मानते हैं कि परमेश्वर का अनुसरण करना बहुत आसान है, किंतु जब परमेश्वर का कार्य समाप्त होने वाला होगा, तब तुम “अनुसरण करने” का असली अर्थ जानोगे। सिर्फ इस बात से कि जीत लिए जाने के पश्चात् तुम आज भी परमेश्वर का अनुसरण करने में समर्थ हो, यह प्रमाणित नहीं होता कि तुम उन लोगों में से एक हो, जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा। जो लोग परीक्षणों को सहने में असमर्थ हैं, जो क्लेशों के बीच विजयी होने में अक्षम हैं, वे अंततः डटे रहने में अक्षम होंगे, और वे बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ होंगे। जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे अपने कार्य की परीक्षा लिया जाना सह पाते हैं, जबकि जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते, वे परमेश्वर के किसी भी परीक्षण को सहने में अक्षम हैं। देर-सवेर उन्हें बाहर निकाल दिया जाएगा, जबकि विजेता राज्य में बने रहेंगे। मनुष्य सच्चे मन से परमेश्वर को खोजता है या नहीं, इसका निर्धारण उसके कार्य का परीक्षण करने के द्वारा ही किया जाता है, अर्थात्, परमेश्वर के परीक्षणों द्वारा, और इसका स्वयं मनुष्य द्वारा किए गए निर्धारण से कोई लेना-देना नहीं है। परमेश्वर किसी मनुष्य को हल्के में अस्वीकार नहीं करता; वह जो कुछ भी करता है, वह मनुष्य को पूर्ण रूप से कायल कर सकता है। वह ऐसा कुछ नहीं करता, जो मनुष्य के लिए अदृश्य हो, या कोई ऐसा कार्य जो मनुष्य को कायल न कर सके। मनुष्य का विश्वास सच्चा है कि नहीं, यह तथ्यों द्वारा साबित होता है और मनुष्य द्वारा निर्धारित नहीं किया जा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि “गेहूँ को जंगली दाने नहीं बनाया जा सकता, और जंगली दानों को गेहूँ नहीं बनाया जा सकता।” जो सच्चे मन से परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे सभी अंततः राज्य में बने रहेंगे और परमेश्वर ऐसे किसी व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं करेगा जो सच्चे मन से उससे प्रेम करता है। अपने विभिन्न कार्यों और गवाहियों के आधार पर राज्य के भीतर विजेता लोग याजकों और अनुयायियों के रूप में सेवा करेंगे, और जो क्लेश के बीच विजेता होंगे, वे राज्य के भीतर याजकों का एक निकाय बन जाएँगे। याजकों का निकाय तब बनाया जाएगा, जब संपूर्ण ब्रह्मांड के भीतर सुसमाचार का कार्य समाप्ति पर आ जाएगा। जब वह समय आएगा, तब जो मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए, वह परमेश्वर के राज्य के भीतर अपने कर्तव्य का निष्पादन होगा, और राज्य के भीतर परमेश्वर के साथ उसका जीना होगा। याजकों के निकाय में महायाजक और याजक होंगे, और शेष लोग परमेश्वर के पुत्र और उसके लोग होंगे। उन्हें क्लेश के दौरान परमेश्वर के प्रति उनकी गवाहियों के आधार पर विभाजित किया जाएगा; ये सनक के आधार पर दी जाने वाली उपाधियाँ नहीं हैं। जब मनुष्य की हैसियत स्थापित कर दी जाएगी, तो परमेश्वर का कार्य रुक जाएगा, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को उसके प्रकार के अनुसार छाँट दिया जाएगा और उसकी मूल स्थिति में लौटा दिया जाएगा, यह परमेश्वर के महान कार्य के समापन का चिह्न है, यह परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के अभ्यास का अंतिम परिणाम है और यह परमेश्वर के कार्य के दर्शनों और मनुष्य के सहयोग का मूर्त परिणाम है। अंत में, मनुष्य परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करेगा और वहाँ विश्राम करेगा; साथ ही, परमेश्वर भी विश्राम करने के लिए अपने निवास-स्थान में लौट जाएगा। यह परमेश्वर और मनुष्य के बीच 6,000 वर्षों के सहयोग का अंतिम परिणाम होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 603

जो लोग भाई-बहनों के बीच हमेशा नकारात्मकता फैलाते रहते हैं वे शैतान के सेवक हैं और वे कलीसिया में बाधा डालने वाले लोग हैं। ऐसे लोगों को अवश्य ही एक दिन निष्कासित कर देना और हटा देना चाहिए। परमेश्वर में विश्वास रखते हुए अगर लोगों के पास परमेश्वर का भय मानने वाले दिल न हों, परमेश्वर के प्रति समर्पणशील दिल न हों, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिए कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि इसके उलट वे परमेश्वर के कार्य में बाधा डालने वाले और उसका प्रतिरोध करने वाले लोग बन जाएँगे। परमेश्वर में विश्वास करना किन्तु उसके प्रति समर्पण न करना या उसका भय न मानना और इसके बजाय उसका प्रतिरोध करना, किसी भी विश्वासी के लिए सबसे बड़ा कलंक है। यदि विश्वासी अपनी बोली और आचरण में ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो वे अविश्वासियों से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये ठेठ दुष्ट राक्षस हैं। जो लोग कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातें प्रकट करते हैं, जो भाई-बहनों के बीच निराधार अफवाहें फैलाते हैं, कलह के बीज बोते हैं और गुटबाजी करते हैं, ऐसे सभी लोगों को कलीसिया से निष्कासित कर दिया जाना चाहिए था। अब चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोग प्रतिबंधित हैं, क्योंकि उन्हें निश्चित रूप से निकाला जाना है। शैतान द्वारा जिन लोगों को भ्रष्ट किया जा चुका है उन सबमें भ्रष्ट स्वभाव होते हैं। लेकिन कुछ में बस भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, जबकि अन्य लोग भिन्न होते हैं : न केवल उनमें शैतानी भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी बेहद दुर्भावनापूर्ण होती है। इन लोगों की कथनी-करनी केवल शैतानी भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करने तक ही सीमित नहीं होती है; ये लोग असली दानव और शैतान होते हैं। वे बस परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी और विघ्न पैदा करते हैं, इससे भाई-बहनों के जीवन प्रवेश में विघ्न पड़ता है और कलीसिया के सामान्य जीवन को क्षति पहुँचती है। भेड़ की खाल में छिपे इन भेड़ियों का देर-सवेर सफाया किया जाना चाहिए; शैतान के इन सेवकों के प्रति एक सख्त रवैया, तिरस्कार का रवैया अपनाया जाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना है और जो ऐसा करने में विफल हैं वे शैतान के साथ कीचड़ में लोट रहे हैं। जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर उनके हृदय में बसता है और उनके भीतर हमेशा परमेश्वर का भय मानने वाला दिल, परमेश्वर से प्रेम करने वाला दिल होता है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें सावधानी और विवेकपूर्ण ढंग से कार्य करना चाहिए, और वे जो कुछ भी करें वह सब परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप और उसके दिल को संतुष्ट करने वाला होना चाहिए। उन्हें दुराग्रही नहीं होना चाहिए, जो मन करे वो नहीं करना चाहिए; ऐसा करना संतों जैसे आचरण के अनुकूल नहीं है। लोगों को परमेश्वर का ध्वज लहराते हुए चारों ओर छल-प्रपंच करते हुए और अकड़ दिखाते हुए उच्छृंखल होकर नहीं चलना चाहिए; यह सबसे विद्रोहपूर्ण ढंग का आचरण है। परिवारों के अपने नियम होते हैं और राष्ट्रों के अपने कानून; क्या परमेश्वर के घर में यह बात और भी अधिक लागू नहीं होती? क्या इसके मानक और भी अधिक कड़े नहीं हैं? क्या यह और भी जरूरी नहीं है कि इसके पास प्रशासनिक आदेश हों? लोग जो चाहें वह करने के लिए स्वतंत्र हैं, परन्तु परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों को इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता। परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मानवजाति से अपमान सहन नहीं करता है; वह ऐसा परमेश्वर है जो लोगों को मार गिराता है। क्या लोग वास्तव में यह सब पहले से ही नहीं जानते?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 604

हर कलीसिया में ऐसे लोग होते हैं जो कलीसिया के लिए विघ्न पैदा करते हैं या परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी करते हैं। ये सब शैतान हैं जो छद्म वेश में परमेश्वर के घर में घुस आए हैं। ऐसे लोग अभिनय में विशेष रूप से निपुण होते हैं : मेरे समक्ष विनीत भाव से आकर, नमन करते हुए, नत-मस्तक होते हैं, खुजली वाले कुत्ते की छवि जीते हैं, अपने मकसद को पूरा करने के लिए अपना “सर्वस्व” न्योछावर करते हैं, लेकिन भाई-बहनों के सामने उनका बदसूरत चेहरा प्रकट हो जाता है। जब वे सत्य का अभ्यास करने वाले लोगों को देखते हैं, तो उन पर आक्रमण कर देते हैं और उन्हें दरकिनार कर देते हैं; और जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो उनसे अधिक शक्तिशाली हैं, तो वे उनकी चाटुकारिता और खुशामद करने लगते हैं। कलीसिया के भीतर वे आततायियों की तरह व्यवहार करते हैं। कह सकते हैं कि ऐसे “स्थानीय गुण्डे” और ऐसे “पालतू कुत्ते” ज्यादातर कलीसियाओं में मौजूद हैं। ऐसे लोग गुप्त रूप से मिलकर काम करते हैं, आँखे झपकाकर, गुप्त संकेतों और इशारों से आपस में बात करते हैं, और इनमें से कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता। जो सबसे ज्यादा जहरीला होता है, वही “प्रधान राक्षस” होता है, और जो सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है, वह इनकी अगुवाई करता है और इनका परचम बुलंद रखता है। ऐसे लोग कलीसिया में उपद्रव मचाते हैं, नकारात्मकता फैलाते हुए मौत का तांडव करते हैं, मनमर्जी करते हैं, जो चाहे कहते हैं; किसी में इन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती है। ये शैतानी स्वभावों से भरे होते हैं। एक बार जब ये लोग व्यवधान पैदा करते हैं, कलीसिया में मुर्दनी छा जाती है। कलीसिया के भीतर के जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं उन्हें खारिज कर दिया जाता है, वे वह सब करने में असमर्थ होते हैं जिन्हें करने में सक्षम हैं, जबकि जो कलीसिया में बाधा डालते हैं और मौत फैलाते हैं वे अंदर तांडव करते फिरते हैं—और इतना ही नहीं, अधिकतर लोग उनका अनुसरण करते हैं। वास्तव में ऐसी कलीसियाओं पर शैतान शासन करता है और दानव इनका राजा होता है। यदि ऐसी कलीसियाओं में लोग आवाज नहीं उठाएँगे और उन प्रधान राक्षसों को खारिज नहीं करेंगे, तो देर-सवेर वे भी बर्बाद हो जाएँगे। अब से ऐसी कलीसियाओं के खिलाफ कदम उठाए जाने चाहिए। जो लोग थोड़ा-सा भी सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं, यदि वे खोज नहीं करते हैं, तो उस कलीसिया को समाप्त कर दिया जाएगा। यदि कलीसिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक हो, और परमेश्वर की गवाही में अडिग रह सकता हो, तो उस कलीसिया को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए और अन्य कलीसियाओं के साथ उसके संबंध समाप्त कर दिये जाने चाहिए। इसे “मृत्यु दफ़्न करना” कहते हैं; इसी का अर्थ है शैतान को अस्वीकार करना। यदि किसी कलीसिया में कई स्थानीय गुंडे हैं, और कुछ “छोटी-मोटी मक्खियों” द्वारा उनका अनुसरण किया जाता है जिनमें भेद पहचानने की क्षमता का पूर्णतः अभाव है, और यदि ऐसी कलीसियाओं में लोग सत्य जान लेने के बाद भी इन गुंडों की जकड़न और चालाकी को नकार नहीं पाते हैं, तो उन सभी भ्रमित लोगों को अंत में हटा दिया जाएगा। भले ही इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कोई बड़ा बुरा काम न किया हो, लेकिन ये और भी धूर्त, और भी ज़्यादा मक्कार होती हैं, इस तरह के सभी लोगों को निकाल दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान के हैं, उन्हें शैतान के पास भेज दिया जाएगा, जबकि जो परमेश्वर द्वारा चुने गए हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज करेंगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जाएगा। जो सत्य की खोज करते हैं उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदय के तृप्त होने तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; वह किसी के प्रति पक्षपात नहीं दिखाएगा। यदि तू दानव है, तो तू सत्य का अभ्यास नहीं कर सकता; यदि तू सत्य की खोज करने वाला व्यक्ति है, तो यह निश्चित है कि तू शैतान का बंदी नहीं बनेगा—इसमें कोई संदेह नहीं है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 605

जो प्रगति के लिए प्रयास नहीं करते हैं, वे हमेशा चाहते हैं कि दूसरे भी उन्हीं की तरह नकारात्मक और अकर्मण्य बनें। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे सत्य का अभ्यास करने वालों के प्रति ईर्ष्या-भाव रखते हैं, और हमेशा ऐसे लोगों को गुमराह करना चाहते हैं जो भ्रमित हैं और जिनमें भेद पहचानने की क्षमता की कमी है। ये लोग जो चीजें देते हैं, वे तेरे पतन का, गर्त में फिसलने का, असामान्य स्थिति में गिरने का और तुझमें अंधकार भरने का कारण बनती हैं; वे तेरे परमेश्वर से दूर जाने, देह का आनंद लेने और खुद की गलतियों के प्रति काफी उदार रहने का कारण बनती हैं। जो सत्य से प्रेम नहीं करते हैं, जो परमेश्वर के प्रति सदैव लापरवाह रवैया अपनाते हैं, उनमें आत्म-जागरूकता नहीं होती; ऐसे लोगों का स्वभाव लोगों को पाप करने और परमेश्वर का प्रतिरोध करने के लिए बहकाता है। वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और न ही दूसरों को इसका अभ्यास करने देते हैं। उन्हें पाप अच्छे लगते हैं और वे खुद से नफरत नहीं करते हैं। वे स्वयं को नहीं जानते हैं, और दूसरों को भी स्वयं को जानने से रोकते हैं; वे दूसरों को सत्य के लिए प्यासे होने से भी रोकते हैं। जो लोग उनके द्वारा गुमराह होते हैं वे प्रकाश नहीं देख सकते—वे अंधेरे में गिर जाते हैं, स्वयं को नहीं जानते, और सत्य के बारे में अस्पष्ट रहते हैं, तथा परमेश्वर से उनकी दूरी बढ़ती चली जाती है। वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और दूसरों को भी सत्य का अभ्यास करने नहीं देते हैं, और उन सभी भ्रमित लोगों को अपने सामने लाते हैं। बजाय यह कहने के कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि वे अपने पूर्वजों में विश्वास करते हैं, या कि वे जिसमें विश्वास करते हैं वे उनके दिल में बसी प्रतिमाएँ हैं। उन लोगों के लिए, जो परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करते हैं, अपनी आँखें खोलना और इस बात को ध्यान से देखना सर्वोत्तम रहेगा कि दरअसल वे किसमें विश्वास करते हैं : क्या यह वास्तव में परमेश्वर है जिस पर तू विश्वास करता है, या शैतान है? यदि तू जानता कि जिस पर तू विश्वास करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि तेरी स्वयं की प्रतिमाएँ हैं, तो फिर यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यदि तुझे वास्तव में नहीं पता कि तू किसमें विश्वास करता है, तो, फिर से, यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यह कहना कि तू विश्वासी है ईश-निंदा होगी! तुझसे कोई ज़बर्दस्ती नहीं कर रहा कि तू परमेश्वर में विश्वास कर। मत कहो कि तुम लोग मुझमें विश्वास करते हो, मैं ऐसी बहुत-सी बातें बहुत पहले खूब सुन चुका हूँ और उन्हें दुबारा सुनने की इच्छा नहीं है, क्योंकि तुम जिनमें विश्वास करते हो वे तुम लोगों के मन की प्रतिमाएँ और तुम लोगों के बीच के स्थानीय गुण्डे हैं। जो लोग सत्य को सुनकर अपनी गर्दन ना में हिलाते हैं, जो घातक बातें सुनकर अत्यधिक मुस्कराते हैं, वे शैतान की संतान हैं; और उन्हें निकाल दिया जाएगा। कलीसिया में बहुत-से लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है। जब कोई व्यक्ति लोगों को गुमराह करने की कोशिश करता है, तो वे उलटे शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं; उन्हें शैतान का सेवक कहा जाना भी अपने साथ बहुत अन्याय होना लगता है। यद्यपि लोग कह सकते हैं कि उनमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं है, वे हमेशा असत्य के पक्ष में खड़े होते हैं, वे संकटपूर्ण समय में कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं, वे कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं करते हैं। क्या उनमें सच में भेद पहचानने की क्षमता का अभाव है? वे विरोधवश शैतान का पक्ष क्यों लेते हैं? वे कभी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो सत्य के लिए निष्पक्ष और विवेकपूर्ण हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में भेद पहचानने की क्षमता की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़े हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि भेद पहचानने की क्षमता से रहित लोग पाप से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन छोटे दानवों से वाकई प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं? यदि तू वाकई ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है, तो फिर तू सत्य का अभ्यास करने वालों को अनदेखा क्यों करता है और तू तुरंत उनके मात्र एक इशारे पर ऐसे लोगों का अनुसरण क्यों करता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं? यह किस प्रकार की समस्या है? मुझे परवाह नहीं कि तुझमें भेद पहचानने की क्षमता है या नहीं। मुझे परवाह नहीं कि तूने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है। मुझे परवाह नहीं कि तेरी शक्तियाँ कितनी बड़ी हैं और न ही मुझे इस बात की परवाह है कि तू एक स्थानीय गुण्डा है या कोई ध्वज-धारी अगुआ। यदि तेरी शक्तियाँ अधिक हैं, तो वह शैतान की ताक़त की मदद से है। यदि तेरी प्रतिष्ठा अधिक है, तो वह केवल इसलिए है क्योंकि तेरे आस-पास बहुत-से ऐसे लोग हैं जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं; यदि तू निष्कासित नहीं किया गया है, तो इसलिए कि अभी निष्कासन-कार्य का समय नहीं है; बल्कि यह हटा देने के कार्य का समय है। तुझे निष्कासित करने की अभी कोई जल्दी नहीं है। मैं तो बस उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब निकाल दिए जाने के बाद, मैं तुझे दंडित करूँगा। जो कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता है, उसे निकाल दिया जाएगा!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 606

जो लोग सचमुच में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार रहते हैं, और सत्य को अभ्यास में लाने को तैयार हैं। जो लोग सचमुच परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रह सकते हैं, वे लोग भी हैं जो उसके वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार हैं और जो सचमुच सत्य के पक्ष में खड़े हो सकते हैं। जो लोग कुटिल और अधर्मी अभ्यासों में लिप्त होते हैं, उन सभी में सत्य का अभाव होता है, वे सभी परमेश्वर का अनादर करते हैं। जो लोग कलीसिया में कलह में संलग्न रहते हैं, वे शैतान के सेवक हैं, और शैतान के मूर्तरूप हैं। इस प्रकार का व्यक्ति बहुत दुर्भावनापूर्ण होता है। जिन लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है और जो सत्य के पक्ष में खड़े होने में असमर्थ होते हैं वे सभी वे लोग हैं जो दुष्ट इरादों को आश्रय देते हैं और सत्य को मलिन करते हैं। वे शैतान के अधिक ठेठ प्रतिनिधि हैं; वे छुटकारे से परे हैं और स्वाभाविक रूप से हटा दिए जाएँगे। परमेश्वर का घर उन लोगों को बने रहने की अनुमति नहीं देता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, और न ही यह उन लोगों को बने रहने की अनुमति देता है जो जानबूझकर कलीसियाओं को ध्वस्त करते हैं। हालाँकि, अभी निष्कासन के कार्य को करने का समय नहीं है; ऐसे लोगों को सिर्फ प्रकट किया जाएगा और अंत में निकाल दिया जाएगा। इन लोगों पर व्यर्थ का कार्य और नहीं किया जाना है; जो शैतान हैं, वे सत्य के पक्ष में खड़े नहीं रह सकते, जबकि जो सत्य की खोज करते हैं, वे सत्य के पक्ष में खड़े रह सकते हैं। जो लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे सत्य के वचन को सुनने के अयोग्य हैं और सत्य के लिए गवाही देने के अयोग्य हैं। सत्य बस उनके कानों के लिए नहीं है; बल्कि, यह उन पर निर्देशित है जो इसका अभ्यास करते हैं। इससे पहले कि हर व्यक्ति के परिणाम का खुलासा किया जाए, जो लोग कलीसिया में बाधा डालते हैं और कार्य में गड़बड़ी करते हैं, अभी के लिए उन्हें सबसे पहले किनारे कर दिया जाएगा और अकेला छोड़ दिया जाएगा। एक बार जब कार्य पूरा हो जाएगा, तो इन लोगों को एक-एक करके बेनकाब किया जाएगा और फिर हटा दिया जाएगा। फिलहाल, जबकि सत्य प्रदान किया जा रहा है, तो उनकी उपेक्षा की जाएगी। जब मानवजाति के सामने पूर्ण सत्य प्रकट कर दिया जाएगा, तो लोगों को हटाना शुरू कर दिया जाएगा; यही वह समय होगा जब सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा। जिन लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं है, वे अपनी तुच्छ चालाकी के कारण बुरे लोगों के हाथों विनाश को प्राप्त होंगे, और ऐसे लोग दुष्ट लोगों के द्वारा पथभ्रष्ट कर दिये जाएँगे तथा लौटकर आने में असमर्थ होंगे। इन लोगों के साथ इसी प्रकार पेश आना चाहिए, क्योंकि इन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, क्योंकि ये सत्य के पक्ष में खड़े होने में अक्षम हैं, क्योंकि ये बुरे लोगों का अनुसरण करते हैं, ये बुरे लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, परमेश्वर का प्रतिरोध करने के लिए बुरे लोगों के साथ साँठ-गाँठ करते हैं। वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि वे बुरे लोग बुराई प्रकट करते हैं, फिर भी वे अड़ियल बन जाते हैं और उनका अनुसरण करने के लिए सत्य से मुँह मोड़ लेते हैं। क्या ये लोग जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं लेकिन विनाशकारी और घृणास्पद कार्यों को करते हैं, बुराई नहीं कर रहे हैं? यद्यपि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो “सम्राटों” की तरह पेश आते हैं और कुछ ऐसे हैं जो उनका अनुसरण करते हैं, किन्तु क्या परमेश्वर का प्रतिरोध करने की उनकी प्रकृति एक-सी नहीं है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? क्या यह उनकी अपनी दुष्टता नहीं है जो उनका विनाश कर रही है? क्या यह उनकी खुद की विद्रोहशीलता नहीं है जो उन्हें नरक में धकेल रही है? जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, अंत में, उन्हें सत्य की वजह से बचा लिया जाएगा और पूर्ण बना दिया जाएगा। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, अंत में, वे सत्य की वजह से विनाश को आमंत्रण देंगे। ये वे परिणाम हैं जो उन लोगों की प्रतीक्षा में हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं और जो नहीं करते हैं। जो सत्य का अभ्यास करने की कोई योजना नहीं बना रहे, ऐसे लोगों को मेरी सलाह है कि वे यथाशीघ्र कलीसिया को छोड़ दें ताकि और अधिक पापों को करने से बचें। जब समय आएगा तो पश्चाताप के लिए भी बहुत देर हो चुकी होगी। विशेष रूप से, जो गुट बनाते हैं और विभाजन पैदा करते हैं उन्हें और कलीसिया के भीतर उन स्थानीय गुंडों को और भी जल्दी छोड़कर चले जाना चाहिए। जिनकी प्रकृति दुष्ट भेड़ियों की है ऐसे लोग बदलने में असमर्थ हैं। बेहतर होगा वे कलीसिया से तुरंत चले जाएँ और फिर कभी भाई-बहनों के सामान्य जीवन में बाधा न डालें, कहीं ऐसा न हो कि वे परमेश्वर द्वारा दंडित किए जाएँ। तुम लोगों में से जो भी उनके साथ चले गए हैं, वे आत्म-चिंतन के लिए इस अवसर का उपयोग करें। क्या तुम लोग ऐसे कुकर्मी लोगों के साथ कलीसिया से बाहर जाओगे या यहीं रहकर आज्ञाकारिता के साथ अनुसरण करोगे? तुम लोगों को इस बात पर सावधानी से विचार अवश्य करना चाहिए। मैं चुनने के लिए तुम लोगों को एक और अवसर देता हूँ; मुझे तुम लोगों के उत्तर की प्रतीक्षा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 607

परमेश्वर के विश्वासी के रूप में, तुम्हें हर चीज में परमेश्वर के अलावा अन्य किसी के प्रति वफादार नहीं होना चाहिए और हर चीज में उसके इरादों के अनुरूप होने में सक्षम होना चाहिए। यद्यपि हर कोई इस संदेश को समझता है, लेकिन इंसान की तरह-तरह की मुश्किलों—उदाहरण के लिए, उसकी अज्ञानता, बेतुकेपन और भ्रष्टता के कारण—ये सच्चाइयाँ जो एकदम सतही और बुनियादी हैं, इंसान में पूरी तरह से दिखाई नहीं देतीं। इसलिए, इससे पहले कि तुम लोगों का परिणाम निर्धारित हो, मैं पहले कुछ ऐसी बातें बता दूँ जो तुम लोगों के लिए अत्यधिक महत्व की हैं। इससे पहले कि मैं आरंभ करूँ, तुम लोगों को पहले इस बात को समझ लेना चाहिए : मैं जो वचन कहता हूँ वे सत्य हैं और समूची मानवजाति के लिए निर्देशित हैं; ये केवल किसी विशिष्ट या खास किस्म के व्यक्ति के लिए व्यक्त नहीं किए गए हैं। इसलिए, तुम लोगों को मेरे वचनों को केवल सत्य के नजरिए से समझने की चिंता करनी चाहिए और तुम्हें पूरी एकाग्रता एवं सच्चाई का रवैया रखना चाहिए; मेरे द्वारा बोले गए एक भी वचन या सत्य को अनदेखा मत करो और उन्हें हल्के में मत लो। मैं देखता हूँ कि तुम लोगों ने अपने जीवन में बहुत-सी ऐसी चीजें की हैं जो सत्य से संबंधित नहीं हैं, इसलिए मैं तुम लोगों से खास तौर से अपेक्षा करता हूँ कि तुम लोग सत्य के सेवक बनो, तुम दुष्टता और कुरूपता के दास मत बनो और यह कि तुम सत्य को मत कुचलो और परमेश्वर के घर के किसी भी कोने को दूषित मत करो। तुम लोगों के लिए यह मेरी चेतावनी है। अब मैं मौजूदा विषय पर बात करूँगा।

सबसे पहले अपनी नियति की खातिर तुम लोगों को परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करनी चाहिए। कहने का अर्थ है, चूँकि तुम लोग यह स्वीकार करते हो कि तुम परमेश्वर के घर के सदस्य हो, इसलिए तुम्हें हर तरह से परमेश्वर के मन को चिंता मुक्त करना चाहिए और सभी चीजों में उसे संतुष्ट करना चाहिए—यानी तुम लोगों को सिद्धांत के साथ और सत्य के अनुसार कार्य करना चाहिए। यदि तुम इसे हासिल नहीं कर सकते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा तिरस्कृत किए जाओगे और हर व्यक्ति द्वारा घृणापूर्वक ठुकरा दिए जाओगे। एक बार जब तुम ऐसी दुर्दशा में पड़ गए, तो फिर तुम परमेश्वर के घर के सदस्यों में नहीं गिने जा सकते, जो परमेश्वर द्वारा स्वीकृति न दिए जाने का सटीक अर्थ है।

दूसरा, तुम लोगों को पता होना चाहिए कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो ईमानदार हैं। परमेश्वर के पास विश्वासयोग्यता का सार है, अतः उसके वचनों पर हमेशा भरोसा किया जा सकता है; इसके अतिरिक्त, उसके क्रियाकलाप दोषरहित और निर्विवाद हैं। यही कारण है कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके साथ पूरी तरह से ईमानदार होते हैं। ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; किसी भी बात में परमेश्वर के प्रति झूठा न होना; हर बात में उसके साथ खुलापन रखना, कभी तथ्यों को न छुपाना; अपने से ऊपर वाले लोगों को कभी भी धोखा देने की कोशिश न करना और अपने से नीचे वालों से चीजें न छिपाना और ऐसी चीजें न करना जो मात्र परमेश्वर की चापलूसी करने की कोशिशें हों। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने क्रियाकलापों और शब्दों में शुद्ध होना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना। मैं जो कहता हूँ वह बहुत सरल है, किंतु तुम लोगों के लिए यह दोगुना मुश्किल है। बहुत-से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने के बजाय नरक में डाले जाना पसंद करेंगे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जो बेईमान हैं उनसे निपटने के लिए मेरे पास अन्य तरीके भी तैयार हैं। बेशक मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि तुम लोगों के लिए ईमानदार लोग होना कितना मुश्किल है। चूँकि तुम सभी बहुत “चतुर” हो, अपनी घटिया मानसिकता के आधार पर, उच्च नैतिक चरित्र वाले लोगों के हृदय का मूल्यांकन करने में बहुत अच्छे हो, इससे मेरा कार्य और आसान हो जाता है। और चूँकि तुममें से हरेक अपने भेदों को अपने सीने में भींचकर रखता है, तो ठीक है, मैं तुम लोगों को एक-एक करके आपदा में डाल दूँगा जिससे कि अग्नि तुम्हें “सबक सिखाए,” ताकि उसके बाद तुम मेरे वचनों पर अडिग विश्वास रखने लगो। अंततः, मैं तुम लोगों के मुँह से ये शब्द निकलवा लूँगा—“परमेश्वर एक विश्वासयोग्य परमेश्वर है,” तब तुम लोग अपनी छाती पीटोगे और विलाप करोगे, “इंसान का हृदय कितना कपटी है!” उस समय तुम्हारी मनोस्थिति क्या होगी? निश्चित रूप से तुम घमंड में उतना नहीं बहोगे जितना तुम अभी बहते हो! और तुम लोग अब की तुलना में इतने “गहन और गूढ़” तो और भी कम होगे। कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं, वे विशेष रूप से “शिष्ट व्यवहार” करते हैं, फिर भी आत्मा की उपस्थिति में वे अपने दाँत और पंजे दिखाने लगते हैं। क्या तुम लोग ऐसे इंसानों को ईमानदार लोगों की श्रेणी में गिनोगे? यदि तुम पाखंडी और ऐसे व्यक्ति हो जो “व्यक्तिगत संबंधों” में कुशल है तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर से खिलवाड़ करने का प्रयास करता है। यदि तुम्हारी बातें बहानों और बेकार तर्कों से भरी हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने में अनिच्छुक है। यदि तुम्हारे पास ऐसे बहुत-से निजी मामले हैं जिनके बारे में बात करना मुश्किल है, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने रहस्य यानी अपनी कठिनाइयाँ उजागर करना नहीं चाहते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें उद्धार प्राप्त करने में बड़ी मुश्किल आएगी और तुम्हें अंधकार से बाहर निकलने में कठिनाई होगी। यदि तुम सत्य का मार्ग खोजने में आनंदित होते हो तो तुम सदैव प्रकाश में रहने वाले व्यक्ति हो। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवाकर्मी बने रहकर बहुत प्रसन्न हो, गुमनाम बनकर कर्मठतापूर्वक और कर्तव्यनिष्ठता से काम करते हो, हमेशा देते हो, और कभी लेते नहीं, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक वफादार संत हो, क्योंकि तुम्हें किसी पारिश्रमिक की अपेक्षा नहीं है, तुम बस एक ईमानदार इंसान हो। यदि तुम स्पष्टवादी बनने को तैयार हो, अपना सर्वस्व खपाने को तैयार हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन दे सकते हो और दृढ़ता से अपनी गवाही दे सकते हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम्हें केवल परमेश्वर को संतुष्ट करना आता है, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम जैसे लोग वे हैं जो प्रकाश में पोषित किए जाते हैं और वे सदा राज्य में रहेंगे। तुम्हें पता होना चाहिए कि क्या तुम्हारे भीतर सच्ची आस्था और सच्ची वफादारी है, क्या परमेश्वर के लिए कष्ट उठाने का तुम्हारा कोई इतिहास है और क्या तुम्हारे पास परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण है। यदि तुममें ये चीजें नहीं हैं, तो तुम्हारे भीतर विद्रोहीपन, कपट, लालच और शिकायत अभी शेष हैं। चूँकि तुम्हारा हृदय ईमानदार नहीं है, इसलिए तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा सराहा नहीं गया है और तुम कभी भी प्रकाश में नहीं रहे हो। अंत में किसी व्यक्ति का भाग्य कैसा होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या उसके अंदर एक ईमानदार और रक्तिम हृदय है और क्या उसकी आत्मा शुद्ध है। यदि तुम ऐसे इंसान हो जो बहुत बेईमान है, जिसका हृदय अत्यन्त दुर्भावना से भरा है, जिसकी आत्मा अशुद्ध है, तो तुम अंत में निश्चित रूप से ऐसी जगह जाओगे जहाँ इंसान को दंड दिया जाता है, जैसा कि तुम्हारे भाग्य के अभिलेख में लिखा है। यदि तुम बहुत ईमानदार होने का दावा करते हो, मगर तुम कभी सत्य के अनुसार कार्य नहीं कर पाए हो या सत्य का एक शब्द भी नहीं बोल पाए हो, तो क्या तुम तब भी परमेश्वर से पुरस्कृत किए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हो? क्या तुम तब भी परमेश्वर से आशा करते हो कि वह तुम्हें अपनी आँख का तारा समझे? क्या ऐसी सोच हास्यास्पद नहीं है? यदि तुम हर चीज में परमेश्वर को धोखा देते हो, तो परमेश्वर का घर तुम जैसे इंसान को, जिसके हाथ अशुद्ध हैं, जगह कैसे दे सकता है?

तीसरी बात जो मैं तुम लोगों से कहना चाहता हूँ यह है : हर व्यक्ति ने परमेश्वर में आस्था का जीवन जीने के दौरान ऐसी चीजें की हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती हैं और उसे धोखा देती हैं। उनमें से कुछ चीजों को दोषों के रूप में दर्ज करने की जरूरत नहीं है, लेकिन कुछ अक्षम्य होती हैं, क्योंकि बहुत-सी ऐसी चीजें हैं जो प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करती हैं—ऐसी चीजें जो परमेश्वर के स्वभाव को नाराज़ करती हैं। अपने भाग्य को लेकर चिंतित बहुत-से लोग पूछ सकते हैं कि ये चीजें कौन-सी हैं। तुम लोगों को यह पता होना चाहिए कि तुम प्रकृति से अहंकारी और दंभी हो और तथ्यों के प्रति समर्पण करने के इच्छुक नहीं हो। यही वजह है कि जब तुम लोग आत्म-चिंतन कर लोगे, तो मैं थोड़ा-थोड़ा करके तुम लोगों को बताँऊगा। मेरी नसीहत है कि तुम लोग प्रशासनिक आदेशों की विषयवस्तु को समझने का वास्तविक प्रयास और परमेश्वर के स्वभाव को जानने का प्रयत्न करो। वरना तुम लोगों के लिए अपनी जबान बंद रखना मुश्किल होगा, तुम्हारी जबानें बहुत उन्मुक्त हो जाएंगी और तुम लंबी-चौड़ी बातें हाँकोगे, अनजाने में परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करोगे और अंधकार में जा गिरोगे, पवित्र आत्मा की उपस्थिति और रोशनी गँवा दोगे। चूँकि तुम लोग अपने क्रियाकलापों में सिद्धांतहीन हो, तुम वह करते और बोलते हो जो तुम्हें नहीं करना और बोलना चाहिए, इसलिए तुम्हें वह प्रतिफल मिलेगा जिसके तुम लायक हो। तुम्हें पता होना चाहिए कि भले ही तुम अपनी कथनी और करनी में सिद्धांतहीन हो, लेकिन इन दोनों मामलों में परमेश्वर अत्यंत सिद्धांतनिष्ठ है। तुम्हें प्रतिफल मिलने का कारण यह है कि तुमने परमेश्वर का अपमान किया है, किसी इंसान का नहीं। यदि तुम अपने जीवन में परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध बहुत-से अपमान करते हो, तो तुम निश्चित रूप से नरक की संतान ही बनोगे। इंसान को ऐसा प्रतीत हो सकता है कि तुमने कुछ ही कर्म ऐसे किए हैं जो सत्य के अनुरूप नहीं हैं और इससे अधिक कुछ नहीं किया। लेकिन क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर की निगाह में, तुम पहले ही एक ऐसे इंसान हो जिसके लिए अब कोई पाप-बलि नहीं है? क्योंकि तुमने एक से अधिक बार परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन किया है और फिर तुमने पश्चात्ताप करने या वापस लौटने का कोई लक्षण भी नहीं दिखाया है, इसलिए तुम्हारे पास नरक में फेंके जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, जहाँ परमेश्वर इंसान को दंड देता है। परमेश्वर का अनुसरण करते समय, कुछ थोड़े-से लोगों ने कुछ ऐसे कर्म किए हैं जिनसे सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ, लेकिन काट-छाँट और मार्गदर्शन के बाद, उन्हें धीरे-धीरे अपनी भ्रष्टता का पता चल गया, उसके बाद उन्होंने वास्तविकता के सही मार्ग में प्रवेश किया और आज तक व्यावहारिक हैं। वे ऐसे लोग हैं जो अंत में जीवित रहेंगे। फिर भी, मैं ईमानदार इंसान को चाहता हूँ; यदि तुम एक ईमानदार इंसान हो और सिद्धांत के अनुसार कार्य करते हो, तो तुम परमेश्वर के विश्वासपात्र हो सकते हो। यदि अपने क्रियाकलापों में तुम परमेश्वर के स्वभाव को नाराज़ नहीं करते हो और परमेश्वर की इच्छाएँ खोजते हो और तुममें परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय है, तो तुम्हारी आस्था मानक-स्तरीय है। जो भी व्यक्ति परमेश्वर का भय नहीं मानता और उसका हृदय डर से नहीं काँपता, तो इस बात की प्रबल संभावना है कि वह परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करेगा। बहुत-से लोग अपने जुनून के बल पर परमेश्वर की सेवा तो करते हैं, लेकिन उन्हें परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों की कोई समझ नहीं होती, उसके वचनों में छिपे अर्थों का तो उन्हें कोई भान तक नहीं होता। इसलिए, अपने नेक इरादों के बावजूद वे प्रायः ऐसे काम कर बैठते हैं जिनसे परमेश्वर के प्रबंधन में विघ्न पहुँचता है। गंभीर मामलों में, उन्हें परमेश्वर के घर से निष्कासित कर दिया जाता है, आगे से परमेश्वर का अनुसरण करने के किसी भी अवसर से वंचित कर दिया जाता है, नरक में फेंक दिया जाता है और परमेश्वर के घर के साथ उनके सभी संबंध समाप्त हो जाते हैं। ये लोग अपने नादान नेक इरादों की शक्ति के आधार पर परमेश्वर के घर का काम करते हैं, और अंत में परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर बैठते हैं। लोग अधिकारियों और स्वामियों की सेवा करने के अपने तरीकों को परमेश्वर के घर में ले आते हैं और व्यर्थ में यह सोचते हुए कि ऐसे तरीकों को यहाँ आसानी से लागू किया जा सकता है, उन्हें उपयोग में लाने की कोशिश करते हैं। वे यह अनुमान भी नहीं लगा सकते कि परमेश्वर का स्वभाव किसी मेमने का नहीं बल्कि एक सिंह का स्वभाव है। इसलिए, जो लोग पहली बार परमेश्वर से जुड़ते हैं, वे उससे संवाद नहीं कर पाते, क्योंकि परमेश्वर का हृदय इंसान के हृदय की तरह नहीं है। जब तुम बहुत-से सत्य समझ जाते हो, तभी तुम परमेश्वर को निरंतर जान पाते हो। यह ज्ञान शब्दों और धर्म-सिद्धांतों से नहीं बनता, बल्कि इसे एक खजाने के रूप में उपयोग किया जा सकता है जिससे तुम परमेश्वर के साथ गहरा विश्वास पैदा कर सकते हो और इसे एक प्रमाण के रूप में उपयोग कर सकते हो कि वह तुमसे प्रसन्न होता है। यदि तुममें ज्ञान की वास्तविकता का अभाव है और तुम सत्य से युक्त नहीं हो, तो उत्साह में की गई तुम्हारी सेवा से परमेश्वर को तुमसे सिर्फ घृणा और नफरत ही होगी। अब तक तो तुम समझ ही गए होगे कि परमेश्वर में विश्वास धर्मशास्त्र का अध्ययन नहीं है!

हालाँकि मैं तुम लोगों को बहुत कम शब्दों में चेतावनी देता हूँ, फिर भी जो कुछ भी मैंने बताया है उसका तुम लोगों में सबसे अधिक अभाव है। तुम लोगों को यह पता होना चाहिए कि मैं अब जिस बारे में बता रहा हूँ वह इंसानों के बीच मेरे अंतिम कार्य की खातिर है, इंसान का परिणाम निर्धारित करने की खातिर है। मैं ऐसा और कोई कार्य नहीं करना चाहता जिसका कोई प्रयोजन न हो, न ही मैं ऐसे लोगों का मार्गदर्शन करते रहना चाहता हूँ जो मृत लकड़ी के टुकड़े जैसे हैं, उनकी अगुआई तो मैं बिल्कुल नहीं करना चाहता हूँ जो गुप्त रूप से बुरे इरादे पाले रहते हैं। शायद एक दिन तुम लोग मेरे वचनों के पीछे छिपे श्रमसाध्य इरादों को और मानवजाति के लिए मेरे योगदानों को समझ पाओगे। शायद एक दिन तुम लोग उस अवधारणा को जान पाओगे जो तुम्हें अपने परिणाम के बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुँचने में सक्षम बनाएगी।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तीन चेतावनियाँ

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 608

मैंने तुम लोगों को कई चेतावनियाँ दी हैं और तुम लोगों को जीतने के इरादे से बहुत-से सत्य प्रदान किए हैं। अब तुम सभी लोग पहले की तुलना में भीतर से बहुत अधिक परिपूर्ण महसूस करते हो, स्व-आचरण के कई सिद्धांतों को समझ चुके हो और उतनी सारी सामान्य समझ हासिल कर चुके हो जो विश्वसनीय लोगों में होनी चाहिए। यह सब वह फसल है जो तुम लोगों ने कई वर्षों में प्राप्त की है। मैं तुम लोगों की उपलब्धियों से इनकार नहीं करता, लेकिन मुझे काफी स्पष्ट रूप से कहना होगा कि मैं उन अनेक विद्रोहों और विश्वासघातों से भी इनकार नहीं करता जो तुम लोगों ने इन बहुत-से वर्षों में मेरे खिलाफ किए हैं, क्योंकि तुम लोगों में एक भी व्यक्ति पवित्र नहीं है—तुम लोग, बिना किसी अपवाद के, ऐसे लोग हो जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया है, तुम लोग मसीह के दुश्मन हो। आज तक, तुम लोगों के अपराध और विद्रोह इतने अधिक हैं कि गिने नहीं जा सकते, इसलिए इसे शायद ही अजीब माना जा सकता है कि मैं हमेशा तुम लोगों को बार-बार याद कराता रहता हूँ। मैं तुम लोगों के साथ इस तरह से जुड़ना नहीं चाहता—लेकिन तुम्हारे भविष्य के लिए, तुम्हारी मंजिलों के लिए, मैं यहाँ और अभी तुम्हें एक बार फिर याद दिलाऊँगा। मुझे उम्मीद है कि तुम लोग समझ दिखाओगे, तुम लोग मेरे द्वारा कहे गए हर एक वचन पर विश्वास करोगे और मेरे वचनों के पीछे के गहरे इरादों को समझोगे। मेरे कहे पर संदेह न करो, मेरे वचनों को लापरवाही से लेकर फिर उन्हें दरकिनार तो बिल्कुल ना करो; यह मुझे असहनीय मालूम देता है। मेरे वचनों की आलोचना मत करो, उन्हें हल्के में तो और भी मत लो, यह न कहो कि मैं हमेशा तुम लोगों की परीक्षा लेता रहता हूँ, यह तो बिल्कुल ना कहो कि मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह सही नहीं है—मुझे ये चीज़ें असहनीय मालूम देती हैं। चूँकि तुम लोग हमेशा मेरे और मेरी कही बातों के बारे में संदेह से भरे रहते हो, हमेशा मुझे नज़रअंदाज़ करते हो और मेरी कही गई बातों की उपेक्षा करते हो, इसलिए मैं तुम सब लोगों से पूरी गंभीरता से कहता हूँ : मेरी कही बातों को फलसफे से मत जोड़ो; मेरे वचनों को एक धोखेबाज़ के झूठ से मत जोड़ो। तुम्हें मेरे वचनों के प्रति तिरस्कार के साथ लापरवाही तो बिल्कुल भी नहीं दिखानी चाहिए। शायद भविष्य में कोई भी तुम लोगों को वह नहीं बता पाएगा जो मैं तुम्हें बता रहा हूँ या तुम लोगों से इतनी दयालुता से बात नहीं कर पाएगा या फिर इतने धैर्य के साथ कदम-दर-कदम तुम लोगों का मार्गदर्शन करना तो और भी संभव नहीं होगा। तुम लोग आने वाले उन दिनों को अच्छे समय को याद करते हुए बिताओगे या जोर-जोर से रोते हुए या दर्द में कराहते हुए बिताओगे या फिर तुम लोग सत्य या जीवन की किसी भी आपूर्ति के बिना अंधेरी रातों में जी रहे होगे या बस इंतजार कर रहे होगे, लेकिन आशा की एक भी किरण के बिना या इतने कड़वे अफसोस में रह रहे होगे कि तुम लोग सारा विवेक खो दोगे...। तुम लोगों में से कोई भी इन संभावनाओं से बच नहीं सकता। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोगों में से कोई भी उस स्थान पर नहीं है जहाँ से तुम वास्तव में परमेश्वर की आराधना करते हो, बल्कि तुम व्यभिचार और बुराई की दुनिया में घुलमिल जाते हो, अपने विश्वास में, अपनी आत्माओं, प्राणों और शरीरों में, इतनी सारी चीजें मिलाते हो जिनका जीवन और सत्य से कोई लेना-देना नहीं है और जो वास्तव में उनके विपरीत हैं। इसलिए तुम लोगों के लिए मेरी आशा है कि तुम प्रकाश का मार्ग प्राप्त कर सको। मेरी एकमात्र आशा है कि तुम लोग खुद को संजो सको और खुद को महत्व दे सको, तुम अपने व्यवहार और अपराधों को उदासीनता से देखते हुए अपनी मंजिल पर इतना अधिक जोर न दो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 609

एक अरसे से, परमेश्वर में विश्वास करने वाले सभी लोग एक खूबसूरत मंज़िल की अत्यधिक इच्छा से आशा करते रहे हैं और परमेश्वर के सभी विश्वासियों को उम्मीद है कि सौभाग्य अचानक उनके पास आ जाएगा। उन्हें आशा है कि उन्हें पता भी नहीं चलेगा और वे शांति से स्वर्ग में किसी स्थान पर विराजमान होंगे। लेकिन मैं कहता हूँ कि अनेक प्यारे विचारों वाले इन लोगों ने कभी नहीं जाना कि वे स्वर्ग से बरसने वाले ऐसे सौभाग्य को ले पाने के या वहाँ किसी आसन पर बैठने के पात्र भी हैं या नहीं। आज तुम लोग खुद से अच्छी तरह वाकिफ़ हो, फिर भी यह उम्मीद लगाए बैठे हो कि तुम लोग अंत के दिनों की विपत्तियों और सर्वशक्तिमान के हाथों से बच जाओगे जब वह कुकर्मियों को दंड देता है। ऐसा लगता है कि सुनहरे सपने देखना और ख्याली पुलाव पकाना उन सभी लोगों की एक आम विशेषता है जिन्हें शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है, न कि किसी एक व्यक्ति की विलक्षण प्रतिभा है। फिर भी मैं तुम लोगों की इन अतिशयी इच्छाओं और साथ ही आशीष पाने की तुम्हारी उत्सुकता का अंत करना चाहता हूँ, क्योंकि तुम्हारे अपराध असंख्य हैं और तुम्हारी विद्रोहशीलता की घटनाएँ बढ़ती ही जाती हैं, ये चीज़ें तुम्हारी भविष्य की प्यारी योजनाओं में कैसे उपयुक्त बैठेंगी? यदि तुम मनमाने ढंग से गलतियाँ करना चाहते हो, तुम्हें रोकने-टोकने वाला भी कोई नहीं है और तुम फिर भी चाहते हो कि तुम्हारे सपने पूरे हों तो मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि तुम चादर में छिपना और सोना जारी रखो और कभी न जागना जारी रखो, क्योंकि तुम्हारे सपने थोथे हैं और धार्मिक परमेश्वर की मौजूदगी में वह तुम्हें कोई अपवाद नहीं बनाएगा। यदि तुम बस अपने सपने पूरे करना चाहते हो तो कभी सपने मत देखो; बल्कि हमेशा सत्य और तथ्यों का सामना करो। तुम्हारे बचने का यही एकमात्र तरीका है। ठोस रूप में इस पद्धति के क्या चरण हैं?

सबसे पहले, अपने सभी अपराधों की जाँच करो और अपने हर उस व्यवहार और विचार की जाँच करो जो सत्य के अनुरूप नहीं है।

यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे तुम आसानी से कर सकते हो और मुझे विश्वास है कि सभी लोग जिनके पास दिमाग है, यह कर सकते हैं। लेकिन जिन लोगों को यह नहीं पता कि अपराध और सत्य का क्या अर्थ है, वे अपवाद हैं क्योंकि उनके पास दिमाग है ही नहीं। मेरे वचन उन्हें संबोधित करते हैं जो परमेश्वर द्वारा स्वीकृत हैं, ईमानदार हैं, जिन्होंने परमेश्वर के किसी प्रशासनिक आदेश का गंभीर उल्लंघन नहीं किया है और जो सहजता से अपने अपराधों का पता लगा सकते हैं। हालाँकि मेरे द्वारा तुमसे अपेक्षित इस एक चीज़ को करना आसान है, लेकिन यही एकमात्र चीज़ नहीं है, जिसकी मैं तुम लोगों से अपेक्षा करता हूँ। चाहे जो भी हो, मुझे आशा है कि तुम लोग आंतरिक रूप से इस अपेक्षा पर हँसोगे नहीं और खास तौर पर तुम इसे हिकारत से नहीं देखोगे या फिर हल्के में नहीं लोगे। तुम्हें इसे गंभीरता से लेना चाहिए और उदासीन नहीं होना चाहिए।

दूसरे, तुम्हारे हर अपराध और विद्रोह के लिए, तुम्हें एक संगत सत्य ढूँढ़ लेना चाहिए जिससे उसका समाधान किया जा सके; उसके बाद अपने अपराधों और विद्रोही विचारों और कृत्यों को सत्य के अभ्यास से बदल देना चाहिए।

तीसरे, तुम्हें निष्कपट व्यक्ति बनना चाहिए; चालबाज़ी करने की कोशिश मत करो और धोखेबाज व्यक्ति मत बनो। (यहाँ मैं फिर से तुम लोगों से ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए कह रहा हूँ।)

यदि तुम इन तीनों चीजों को पूरा कर लेते हो तो तुम भाग्यशाली हो—तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसके सपने सच होते हैं और जिसे सौभाग्य प्राप्त होता है। शायद तुम लोग इन तीन सीधी-सादी अपेक्षाओं को गंभीरता से लोगे या शायद तुम बस उन पर एक बहुत ही गैर-ज़िम्मेदाराना तरीके से एक नज़र डालोगे। कुछ भी हो, मेरा उद्देश्य तुम लोगों के सपने पूरे करना और तुम्हारी आकांक्षाओं को साकार करना है, न कि तुम लोगों का मजाक उड़ाना या तुम लोगों के साथ खिलवाड़ करना।

मेरी माँगें सरल हो सकती हैं, लेकिन मैं जो तुम्हें बता रहा हूँ, वह उतना सरल नहीं है जितना एक जमा एक बराबर दो। अगर तुम लोग बस इस बारे में लापरवाही से बात करोगे, या खोखले, सुनने में ऊँचे लगने वाले वक्तव्यों के बारे में बोलते चले जाओगे तो फिर भविष्य के लिए तुम्हारी योजनाएँ और ख़्वाहिशें धरी की धरी रह जाएँगी। मुझे तुममें से ऐसे लोगों के साथ कोई सहानुभूति नहीं होगी, जो बरसों कष्ट झेलते हैं और कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन उनके पास कोई नतीजा नहीं होता। इसके विपरीत, जिन्होंने मेरी माँगें पूरी नहीं की हैं उनके लिए मेरे पास पुरस्कार नहीं केवल दंड ही है, उनसे सहानुभूति तो बिल्कुल नहीं है। तुम लोग सोचते होगे कि बरसों अनुयायी बने रहकर तुमने बहुत मेहनत कर ली है, और बात चाहे जो भी हो, तुम श्रमिक हो सकते हो और तुम्हें परमेश्वर के घर में गारंटीयुक्त जीवनयापन का स्रोत मिल जाएगा। मैं कहूँगा कि तुममें से अधिकतर ऐसा ही सोचते हैं, क्योंकि तुम लोगों ने हमेशा चीज़ों का फ़ायदा उठाने के सिद्धांत का पालन किया है, न कि अपना फायदा उठाने देने का। इस प्रकार, मैं तुम लोगों को अब पूरी गंभीरता से बता रहा हूँ : मुझे इस बात की परवाह नहीं है कि यदि तुमने बहुत कड़ी मेहनत की है और प्रमुख योगदान दिए हैं, कि तुम बहुत अधिक वरिष्ठ हो, कि तुम मेरा निकटता से अनुसरण करते हो, कि तुम बहुत प्रसिद्ध हो या कि तुम्हारा रवैया सुधर गया है; अगर तुमने मेरी माँगों के अनुसार कार्य नहीं किया है, तो तुम कभी भी मेरी स्वीकृति प्राप्त नहीं कर पाओगे। तुम लोगों के लिए बेहतर होगा कि तुम जल्द से जल्द अपने उन सभी विचारों और योजनाओं को त्याग दो और मेरी अपेक्षाओं को गंभीरता से लो। अन्यथा मैं सभी को राख में बदल दूँगा, इस प्रकार अपने काम को समाप्त कर दूँगा; ज़्यादा से ज़्यादा, मेरे वर्षों के काम और कष्ट व्यर्थ हो जाएँगे—क्योंकि मैं अपने दुश्मनों और उन लोगों को, जिनसे बुराई की दुर्गंध आती है और जिनमें वही पुरानी शैतानी छवि है, अपने राज्य में नहीं ला सकता या उन्हें अगले युग में नहीं ले जा सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 610

मुझे बहुत उम्मीदें हैं। मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग उपयुक्त और शालीन ढंग से आचरण करो, अपने कर्तव्य समर्पित होकर निभाओ, तुममें सत्य और मानवता हो, ऐसे लोग बनो जो अपने जीवन समेत अपना सर्वस्व परमेश्वर के लिए न्योछावर कर सकें, वगैरह-वगैरह। ये सारी आशाएँ तुम लोगों की कमियों, भ्रष्टता और विद्रोहीपन को ध्यान में रखकर हैं। अगर तुम लोगों से मेरी कोई भी बातचीत तुम्हारा ध्यान आकर्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं रही है तो शायद मैं यही कर सकता हूँ कि अब कुछ न कहूँ। हालाँकि, तुम लोग इसके परिणाम को समझते हो। मैं अक्सर खाली नहीं रहता, इसलिए अगर मैं बोलूँगा नहीं तो कुछ ऐसा करूँगा जिसे लोग देखें। मैं किसी की जीभ सड़ा सकता हूँ, या किसी के अंग भंग करके उसे मार सकता हूँ, या ऐसा कर सकता हूँ कि व्यक्ति का दिमाग खराब हो जाए और वह सभी प्रकार की कुरूपता दिखाए। इसके अतिरिक्त, मैं ऐसा कर सकता हूँ कि कुछ लोग बहुत-सी ऐसी यातनाएँ सहें जो मैंने उनके लिए तैयार की हैं। इस तरह मुझे बहुत ख़ुशी होगी, और मैं बहुत ज्यादा सुखी और प्रसन्न हो जाऊँगा। मामला हमेशा से यही है कि “भलाई का बदला भलाई से और बुराई का बदला बुराई से दिया जाता है”, तो फिर अभी क्यों नहीं? यदि तुम सच में मेरे खिलाफ खड़े होना चाहते हो और मेरी कुछ आलोचना करना चाहते हो तो मैं तुम्हारे मुँह को सड़ा दूँगा, और उससे मुझे अपार संतुष्टि होगी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि आख़िरकार जो कुछ तुमने किया है वह सत्य नहीं है, ज़िंदगी से उसका कुछ लेना-देना तो बिल्कुल भी नहीं है, जबकि मैं जो कुछ करता हूँ, वह सत्य होता है; मेरी समस्त क्रियाएँ मेरे कार्य के सिद्धांतों और मेरे द्वारा निर्धारित प्रशासनिक आदेशों के लिए प्रासंगिक होती हैं। अतः मैं तुम सभी से आग्रह करता हूँ कि कुछ पुण्य संचित करो, इतनी बुराई करना बंद करो और अपने फुरसत के समय में मेरी माँगों पर ध्यान दो। तब मुझे ख़ुशी होगी। तुम लोग जितना प्रयास देह के लिए भागदौड़ करने में करते हो, उसका हज़ारवाँ हिस्सा भी सत्य के लिए योगदान (बल्कि “दान”) करते तो मैं कहता हूँ कि तुम बहुधा अपराध नहीं करते और तुम्हारे मुँह भी सड़े नहीं होते। क्या यह स्पष्ट नहीं है?

तुम जितने अधिक अपराध करोगे, उतने ही कम अवसर तुम्हें अच्छी मंज़िल पाने के लिए मिलेंगे। इसके विपरीत, तुम जितने कम अपराध करोगे, परमेश्वर की स्वीकृति पाने के तुम्हारे अवसर उतने ही बेहतर हो जाएँगे। यदि तुम्हारे अपराध इतने बढ़ जाएँ कि मैं भी तुम्हें क्षमा न कर सकूँ तो तुम क्षमा किए जाने के अपने अवसर पूरी तरह से गँवा दोगे। इस तरह, तुम्हारी मंज़िल ऊपर नहीं, नीचे होगी। यदि तुम्हें मेरी बातों पर यकीन न हो तो बेधड़क गलत काम करो और उसके नतीजे देखो। यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसका सत्य का अभ्यास बहुत गंभीर है तो तुम्हें अपने अपराधों के लिए क्षमा किए जाने का अवसर अवश्य मिलेगा और विद्रोह करने की बारंबारता कम हो जाएगी। और यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो सत्य का कतई अभ्यास नहीं करना चाहता तो परमेश्वर के समक्ष तुम्हारे अपराधों की संख्या निश्चित रूप से बढ़ जाएगी और तुम तब तक अधिक निरंतरता के साथ विद्रोह करोगे जब तक कि सीमा पार नहीं कर लोगे, जो तुम्हारी पूरी तबाही का समय होगा। यह तब होगा, जब आशीष पाने का तुम्हारा सुहाना सपना चूर-चूर हो चुका होगा। अपने अपराधों को किसी अपरिपक्व या मूर्ख व्यक्ति की गलतियाँ मात्र मत समझो; यह बहाना मत करो कि तुमने सत्य का अभ्यास इसलिए नहीं किया, क्योंकि तुम्हारी ख़राब काबिलियत ने उसे असंभव बना दिया था। इससे भी अधिक, स्वयं द्वारा किए गए अपराधों को किसी अज्ञानी व्यक्ति के कृत्य भी मत समझ लेना। यदि तुम स्वयं को क्षमा करने और अपने साथ उदारता का व्यवहार करने में अच्छे हो, तो मैं कहता हूँ, तुम एक कायर हो, जिसे कभी सत्य हासिल नहीं होगा, न ही तुम्हारे अपराध तुम्हें सताना बंद करेंगे, वे तुम्हें कभी सत्य की माँगें पूरी नहीं करने देंगे और तुम्हें हमेशा के लिए शैतान का वफ़ादार साथी बनाए रखेंगे। तुम्हें मेरी सलाह अभी भी यही है : अपने गुप्त अपराधों को देखने में चूक जाते हुए केवल अपनी मंज़िल पर ध्यान मत दो; अपने अपराधों को गंभीरता से लो, अपनी मंज़िल की चिंता में उनमें से किसी को नज़रअंदाज़ मत करो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 611

आज मैं तुम लोगों को तुम्हारे ही अस्तित्व के लिए इस प्रकार इसलिए नसीहत देता हूँ, ताकि मेरा कार्य सुचारु रूप से आगे बढ़े और पूरे ब्रह्मांड के भीतर मेरा उद्घाटन कार्य अधिक उचित और उत्तम ढंग से क्रियान्वित किया जा सके। मैं प्रत्येक देश और राष्ट्र के लोगों के लिए अपने वचनों, अधिकार, प्रताप और न्याय को प्रकट करता हूँ। जो कार्य मैं तुम लोगों के बीच करता हूँ, वह संपूर्ण ब्रह्मांड के भीतर मेरे कार्य का आरंभ है। यद्यपि अभी अंत के दिन चल रहे हैं, याद रहे कि “अंत के दिन” केवल एक युग का नाम है, एक नाम जो एक युग को संदर्भित करता है; ठीक व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के समान यह अंतिम कुछ वर्षों या महीनों के बजाय एक संपूर्ण युग को इंगित करता है। फिर भी अंत के दिन अनुग्रह के युग और व्यवस्था के युग से भिन्न हैं। अंत के दिनों का कार्य इस्राएल में कार्यान्वित नहीं किया जाता है, बल्कि अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच किया जाता है; यह कार्य मेरे सिंहासन के सामने इस्राएल के बाहर के सभी राष्ट्रों और कबीलों के लोगों पर विजय प्राप्त करता है ताकि ब्रह्मांड में मेरी महिमा सृष्टिमंडल और नभमंडल को भर सके। यह इसलिए है ताकि मैं और अधिक महिमा प्राप्त कर सकूँ, ताकि पृथ्वी के सभी सृजित प्राणी मेरी महिमा को अनगिनत राष्ट्रों तक, बाद की पीढ़ियों में हमेशा के लिए फैला सकें, और स्वर्ग एवं पृथ्वी के सभी सृजित प्राणी उस समस्त महिमा को देख सकें जो मैंने पृथ्वी पर अर्जित की है। अंत के दिनों के दौरान कार्यान्वित किया जाने वाला कार्य विजय का कार्य है। यह पृथ्वी के समस्त लोगों को अपना पार्थिव जीवन जीने का मार्गदर्शन देना नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी पर मानवजाति के सहस्रों-वर्ष लंबे, अविनाशी दुःख के जीवन का अंत है। परिणामस्वरूप, अंत के दिनों का कार्य इस्राएल में हुए कार्य के समान नहीं हो सकता जो कई हजार वर्षों तक चला था और न ही यह यहूदिया में हुए कार्य के समान हो सकता है जो केवल कुछ वर्षों तक चला और फिर परमेश्वर के दूसरे देहधारण तक दो सहस्राब्दियों तक जारी रहा। अंत के दिनों के लोग केवल देह में आए मुक्तिदाता के पुनः प्रकटन से मेलजोल करते हैं, और वे परमेश्वर के व्यक्तिगत कार्य और वचन को प्राप्त करते हैं। अंत के दिनों की समाप्ति में दो हजार वर्ष नहीं लगेंगे; वे संक्षिप्त हैं, उस समय की तरह जैसे जब यीशु ने यहूदिया में अनुग्रह के युग का कार्य किया था। ऐसा इसलिए है क्योंकि अंत के दिनों का संबंध संपूर्ण युग का समापन करने से है। वे परमेश्वर की छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना को पूरा और समाप्त करने के बारे में हैं और मनुष्य के दुःखों की जीवन यात्रा का समापन करने के बारे में हैं। वे समस्त मानवजाति को अगले युग में ले जाने या मानवजाति का जीवन जारी रहने देने के बारे में नहीं हैं; इसका मेरी प्रबंधन योजना या मनुष्य के अस्तित्व के लिए कोई महत्व नहीं होगा। यदि मानवजाति इसी प्रकार चलती रही, तो वह देर-सवेर दुष्ट दानव द्वारा पूरी तरह निगल ली जाएगी और वे आत्माएँ जो मेरी हैं अंततः पूरी तरह इसके हाथों बर्बाद हो जाएँगी। मेरा कार्य केवल छह हजार वर्षों तक चलता है और मैंने समस्त मानवजाति पर उस दुष्ट का नियंत्रण भी छह हजार वर्षों तक ही चलते रहने की अनुमति दी है। इसलिए, अब समय पूरा हुआ। मैं अब और न तो जारी रखना चाहता हूँ और न ही विलंब करना चाहता हूँ : अंत के दिनों के दौरान मैं शैतान को परास्त कर दूँगा, मैं अपनी संपूर्ण महिमा वापस ले लूँगा और मैं पृथ्वी पर उन सभी आत्माओं को वापस ले लूँगा जो मेरी हैं, ताकि ये व्यथित आत्माएँ दुःख के सागर से बच सकें और इस प्रकार पृथ्वी पर मेरे समस्त कार्य का समापन होगा। इस दिन के बाद से मैं पृथ्वी पर फिर कभी देहधारी नहीं बनूँगा और फिर कभी मेरा आत्मा, जो सबका संप्रभु है, पृथ्वी पर कार्य नहीं करेगा। मैं पृथ्वी पर केवल एक मानवजाति की पुनर्रचना करूँगा, एक ऐसी मानवजाति जो पावनीकृत है और जो पृथ्वी पर मेरा विश्वासयोग्य शहर है। पर जान लो कि मैं संपूर्ण संसार को जड़ से नहीं मिटाऊँगा, न ही मैं समस्त मानवजाति का संहार करूँगा। मैं उस शेष तृतीयांश को रखूँगा—वह तृतीयांश जो मेरे द्वारा पूरी तरह से जीत लिया गया है और जो मुझसे प्रेम करता है और मैं इस तृतीयांश को पृथ्वी पर फलने-फूलने और बढ़ने दूँगा, ठीक वैसे जैसे इस्राएली व्यवस्था के तहत करते थे; उन्हें प्रचुर मात्रा में भेड़ें और मवेशी मिलेंगे जिनसे मैं उनका पोषण करता हूँ, साथ ही पृथ्वी की सारी समृद्धि मिलेगी। यह मानवजाति हमेशा मेरे साथ रहेगी, मगर यह आज की घोर रूप से गंदी मानवजाति नहीं होगी, बल्कि वह मानवजाति होगी जो मेरे द्वारा प्राप्त किए गए सभी लोगों का समूह है। इस प्रकार की मानवजाति शैतान द्वारा नष्ट, बाधित या घेरी नहीं जाएगी और वही एकमात्र मानवजाति होगी जो मेरे शैतान को हरा देने के बाद पृथ्वी पर जीना जारी रखेगी। यही वह मानवजाति है, जो आज मेरे द्वारा जीत ली गई है और जिसे मेरी प्रतिज्ञा हासिल है। और इसलिए, अंत के दिनों में जीती गई मानवजाति भी वही मानवजाति है जो बची रहेगी और जिसे मेरे अनंत आशीष प्राप्त होंगे। वे शैतान पर मेरी विजय का एकमात्र प्रमाण होंगे और शैतान से मेरे युद्ध का एकमात्र विजयोपहार। युद्ध के ये विजयोपहार मेरे द्वारा शैतान की सत्ता से बचाए गए हैं और ये मेरी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना की एकमात्र सारगर्भित निष्पत्ति और फल हैं। ये संपूर्ण ब्रह्मांड के हर राष्ट्र और संप्रदाय, हर स्थान और देश से हैं। ये भिन्न-भिन्न जातियों के हैं, भिन्न-भिन्न भाषाओं, रीति-रिवाजों और त्वचा के रंगों वाले हैं और ये विश्व के हर देश और संप्रदाय में और यहाँ तक कि संसार के हर कोने में भी फैले हैं। अंततः वे पूर्ण मानवजाति बनाने के लिए साथ आएँगे, लोगों का एक समूह, जिस तक शैतान की शक्तियाँ नहीं पहुँच सकतीं। मानवजाति के बीच जिन लोगों को मेरे द्वारा बचाया और जीता नहीं गया है, वे ख़ामोशी से समुद्र की गहराइयों में डूब जाएँगे, और मेरी भस्म करने वाली लपटों द्वारा हमेशा के लिए जला दिए जाएँगे। मैं इस पुरानी, अत्यधिक गंदी मानवजाति को जड़ से उसी तरह मिटाऊँगा, जैसे मैंने मिस्र की पहली संतानों, मवेशियों और भेड़ों को जड़ से मिटाया था, केवल इस्राएलियों को छोड़ा था, जिन्होंने मेमने का माँस खाया, मेमने का लहू पिया और अपने दरवाज़े की चौखटों को मेमने के लहू से चिह्नित किया। क्या जो लोग मेरे द्वारा जीत लिए गए हैं और मेरे परिवार के हैं, वे भी ऐसे लोग नहीं, जो उस मेमने का माँस खाते हैं जो मैं हूँ और उस मेमने का लहू पीते हैं जो मैं हूँ और जिन्हें मेरे द्वारा छुटकारा दिलाया गया है और जो मेरी आराधना करते हैं? क्या ऐसे लोगों के साथ हमेशा मेरी महिमा नहीं बनी रहती? क्या वे लोग जो उस मेमने के, यानी कि मेरे माँस के बिना हैं, बहुत पहले ही चुपचाप सागर की गहराइयों में नहीं डूब गए हैं? आज तुम मेरा प्रतिरोध करते हो और आज मेरे वचन ठीक इस्राएल के पुत्रों और पौत्रों को यहोवा द्वारा कहे गए वचनों जैसे हैं। फिर भी तुम लोगों के हृदय की गहराइयों में हठधर्मिता है और तुम मेरे क्रोध का संचय कर रहे हो, अपनी देह पर और अधिक दुःख, अपने पापों पर और अधिक न्याय और अपनी अधार्मिकता पर और अधिक क्रोध ला रहे हो। जब आज तुम लोग मुझसे ऐसा व्यवहार करते हो तो मेरे क्रोध के दिन किसे बख्शा जा सकता है? ताड़ना की मेरी आँखों से किसकी अधार्मिकता बच सकती है? किसके अधर्म मुझ सर्वशक्तिमान के हाथों से बच सकते हैं? किसका प्रतिरोध मुझ सर्वशक्तिमान के न्याय से बच सकता है? मैं, यहोवा इस प्रकार तुम लोगों से, अन्यजातियों के परिवार के वंशजों से बात करता हूँ और जिन वचनों को मैं तुम लोगों से कहता हूँ, वे व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के सभी कथनों से बढ़कर हैं, फिर भी तुम लोग मिस्र के सभी लोगों से अधिक हठधर्मी हो। जब मैं शांति से कार्य करता हूँ तो क्या तुम लोग मेरे क्रोध को संचित नहीं करते हो? कैसे तुम लोग मुझ सर्वशक्तिमान के दिन से बिना चोट खाए बच सकते हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कोई भी जो देह में है, क्रोध के दिन से नहीं बच सकता

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 612

क्या अब तुम समझ गए हो कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? अगर तुम समझ गए हो, तो मैं तुम्हें न्याय किए जाने के लिए आज्ञाकारी ढंग से समर्पित होने की सलाह देता हूँ, वरना तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किए जाने या उसके द्वारा अपने राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को स्वीकार करते हैं लेकिन कभी शुद्ध नहीं किए जा सकते, अर्थात् जो न्याय के कार्य के बीच से ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिए जाएँगे। फरीसियों के पापों की तुलना में उनके पाप अधिक गंभीर हैं और अधिक संख्या में हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। जो लोग मजदूरी के भी योग्य नहीं हैं, वे और कठोर दंड प्राप्त करेंगे, ऐसा दंड जो चिरस्थायी भी होगा। परमेश्वर ऐसे किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा, जिसने एक बार तो वचनों से वफादारी दिखाई, मगर फिर परमेश्वर को धोखा दे दिया। ऐसे लोग आत्मा, प्राण और शरीर के दंड के माध्यम से प्रतिदंड भुगतेंगे। क्या यह हूबहू परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का प्रकटन नहीं है? क्या मनुष्य का न्याय करने और उसे उजागर करने में परमेश्वर का बिल्कुल यही उद्देश्य नहीं है? परमेश्वर उन लोगों को, जो न्याय के समय के दौरान सभी प्रकार के कुकर्म करते हैं, दुष्टात्माओं से आक्रांत स्थान पर भेजता है, और उन दुष्टात्माओं को इच्छानुसार उनके दैहिक शरीर नष्ट करने देता है, और उन लोगों के शरीरों से लाश की दुर्गंध निकलती है। यही उनका उचित प्रतिदंड है। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों और झूठे कार्यकर्ताओं का हर पाप उनकी रिकॉर्ड पुस्तिकाओं में लिखता है; और जब सही समय आता है, वह उन्हें अशुद्ध आत्माओं के बीच में फेंक देता है, उन अशुद्ध आत्माओं को अपनी इच्छानुसार उनके पूरे शरीर को अपवित्र करने देता है, और ऐसी व्यवस्था करता है कि वे कभी पुनर्जन्म नहीं ले पाते हैं और फिर कभी प्रकाश नहीं देख पाते हैं। परमेश्वर बुरे लोगों की सूची में उन पाखंडियों को जोड़ता है जो कुछ समय के लिए तो सेवा करते हैं, लेकिन अंत तक वफ़ादार नहीं रहते हैं और वह उन्हें बुरे लोगों के साथ कीचड़ में लोटने और उनके साथ मिलकर विविध प्रकार के बदमाशों का गिरोह बनाने देता है और अंत में, परमेश्वर उन्हें जड़ से मिटा देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देता है और उन पर कोई ध्यान नहीं देता, जो कभी भी मसीह के प्रति वफादार नहीं रहे या जिन्होंने अपनी ताकत का बिल्कुल भी योगदान नहीं किया, और युग बदलने पर वह उन सभी को जड़ से मिटा देगा। वे अब और पृथ्वी पर मौजूद नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य का मार्ग तो बिल्कुल भी प्राप्त नहीं करेंगे। परमेश्वर अपने लोगों की सेवा करने वालों की सूची में ऐसे हर व्यक्ति को जोड़ता है, जो कभी भी परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं रहा है, बल्कि उसके पास परमेश्वर के साथ अनमने ढंग से व्यवहार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ऐसे गिने-चुने लोग ही जीवित बचेंगे, जबकि बहुसंख्यक लोग उन लोगों के साथ नष्ट कर दिए जाएँगे जिनका श्रम मानक-स्तर का भी नहीं है। अंत में, परमेश्वर उन सभी को, जो परमेश्वर के साथ एकदिल और एकमन हैं, अपने लोगों और पुत्रों को, और परमेश्वर द्वारा याजक बनाए जाने के लिए पूर्वनियत लोगों को अपने राज्य में ले आएगा। ये परमेश्वर के कार्य का सार हैं। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है, जिन्हें परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है, उन्हें अविश्वासियों की श्रेणियों में सूचीबद्ध किया जाएगा और तुम लोग निश्चित रूप से कल्पना कर सकते हो कि उनका क्या परिणाम होगा। मैं तुम सभी लोगों से पहले ही वह कह चुका हूँ, जो मुझे कहना चाहिए; तुम लोग जो मार्ग चुनते हो, वह केवल तुम्हारी पसंद है। तुम लोगों को जो समझना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी व्यक्ति की प्रतीक्षा कभी नहीं करता जो उसके साथ कदमताल नहीं कर सकता और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मनुष्य के प्रति कोई दया नहीं दिखाता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह सत्य के द्वारा न्याय का कार्य करता है

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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