जीवन में प्रवेश VI

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 556

केवल सत्य का अनुसरण करके ही व्यक्ति अपने स्वभाव में बदलाव ला सकता है : यह एक ऐसी बात है, जिसे लोगों को अच्छी तरह से जानना-बूझना चाहिए, और समझना चाहिए। अगर तुम्हें सत्य की पर्याप्त समझ नहीं है, तो तुम आसानी से फिसल जाओगे और मार्ग से भटक जाओगे। यदि तुम जीवन में विकास करना चाहते हो, तो तुम्हें हर चीज में सत्य की तलाश करनी चाहिए। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, तुम्हें इस बात की खोज करनी चाहिए कि सत्य के अनुरूप जीने के लिए किस तरह व्यवहार करना चाहिए, और इस बात का पता लगाना चाहिए कि तुम्हारे भीतर क्या दोष मौजूद है, जो इसका उल्लंघन करता है; तुम्हें इन चीजों की स्पष्ट समझ होनी चाहिए। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, तुम्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि वह सत्य के अनुरूप है या नहीं और उसका कोई मूल्य और अर्थ है या नहीं। तुम वे काम कर सकते हो जो सत्य के अनुरूप हों, लेकिन तुम वो काम नहीं कर सकते जो सत्य के अनुरूप न हों। जहाँ तक उन चीजों का संबंध है, जिन्हें तुम कर भी सकते हो और नहीं भी कर सकते, उन्हें यदि जाने दिया जा सकता है, तो तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए। अन्यथा यदि तुम कुछ समय के लिए उन चीजों को करते हो और बाद में पाते हो कि तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए, तो एक त्वरित निर्णय लो और उन्हें जल्दी से जाने दो। यह वह सिद्धांत है, जिसका अनुसरण तुम्हें अपने हर काम में करना चाहिए। कुछ लोग यह प्रश्न उठाते हैं : सत्य की तलाश करना और उसे व्यवहार में लाना इतना ज्यादा मुश्किल क्यों है—मानो तुम धारा के विरुद्ध नाव खे रहे हो और अगर तुमने आगे की ओर नाव खेना बंद कर दिया, तो पीछे बह जाओगे? फिर भी, बुरी या निरर्थक चीजें करना वास्तव में बहुत आसान क्यों है—नाव को धारा के साथ खेने जितना आसान? ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना है। शैतान की प्रकृति ने मनुष्यों के भीतर एक प्रमुख भूमिका ग्रहण कर ली है, और वह एक प्रतिरोधी शक्ति है। परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने की प्रकृति वाले मनुष्य निश्चित रूप से ऐसी चीजें आसानी से कर सकते हैं, जो परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती हैं, और सकारात्मक कार्य करना उनके लिए स्वाभाविक रूप से कठिन होता है। यह पूरी तरह से मनुष्य के प्रकृति सार से तय होता है। जब तुम वास्तव में सत्य को समझ जाते हो और उसे अपने भीतर से प्यार करना शुरू कर देते हो, तो तुम उन चीजों को करना आसान पाओगे, जो सत्य के अनुरूप हैं। तुम सामान्य ढंग से अपना कर्तव्य निभाओगे और सत्य का अभ्यास करोगे—वह भी सहजता से और आनंद से, और तुम महसूस करोगे कि कोई नकारात्मक चीज करने के लिए भारी प्रयास की आवश्यकता होगी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि सत्य ने तुम्हारे दिल में एक प्रमुख भूमिका ले ली है। अगर तुम वाकई मानव-जीवन का सत्य समझते हो, तो तुम्हारे पास अनुसरण के लिए एक मार्ग होगा कि तुम्हें किस तरह का व्यक्ति होना चाहिए, कैसे ऐसा व्यक्ति बनना चाहिए जो निष्कपट और सत्यनिष्ठ हो, ऐसा व्यक्ति जो ईमानदार हो; साथ ही, तुम्हें ऐसा व्यक्ति कैसे बनना चाहिए जो परमेश्वर की गवाही देता हो और उसकी सेवा करता हो। और एक बार जब तुम इन सत्यों को समझ जाओगे, तो तुम फिर कभी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले बुरे कार्य करने में सक्षम नहीं होगे, और न ही तुम कभी एक झूठे अगुआ, झूठे कार्यकर्ता या मसीह-विरोधी की भूमिका निभाओगे। भले ही शैतान तुम्हें गुमराह करने की कोशिश करे या कोई बुरा व्यक्ति तुम्हें उकसाए, तुम बुराई नहीं करोगे या परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं करोगे; चाहे कोई भी तुम्हें गुमराह करने या भड़काने की कोशिश करे, तुम बुराई नहीं करोगे। यदि लोग सत्य प्राप्त कर लेते हैं और सत्य उनका जीवन बन जाता है, तो वे बुराई से नफरत करने और नकारात्मक चीजों से घृणा महसूस करने में सक्षम हो जाएँगे और उनके लिए बुराई करना मुश्किल हो जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके जीवन-स्वभाव बदल गए हैं और उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है।

अगर अपने हृदय में तुम वास्तव में सत्य को समझते हो तो तुम जान लोगे कि सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के प्रति समर्पण कैसे करना है और तुम स्वाभाविक रूप से सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना शुरू कर दोगे। अगर तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो वह उचित है और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है, तो पवित्र आत्मा का कार्य तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेगा—ऐसी स्थिति में तुम्हारे परमेश्वर को धोखा देने की संभावना घटती जाएगी। सत्य के बिना, बुरे काम करना आसान है और तुम न चाहते हुए भी यह करोगे। उदाहरण के लिए, यदि तुममें अहंकारी और दंभी स्वभाव होगा, तो तुम्हें परमेश्वर का प्रतिरोध न करने को कहने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि तुम खुद को नियंत्रित नहीं कर पाओगे—यह तुम्हारे लिए अनैच्छिक होगा। तुम ऐसा जानबूझकर नहीं करोगे; तुम ऐसा अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन करोगे। तुम्हारे अहंकार और दंभ के कारण तुम परमेश्वर को तुच्छ समझोगे और उसे अनदेखा कर दोगे; वे तुम्हें खुद की बड़ाई करने की ओर ले जाएँगे और उनके कारण तुम हर मोड़ पर खुद का दिखावा करोगे; वे तुम्हें दूसरों को नीची नजर से देखने के लिए मजबूर करेंगे और तुम्हारे दिल में तुम्हें छोड़कर और किसी को नहीं रहने देंगे; वे तुम्हारे दिल से परमेश्वर का स्थान छीन लेंगे और अंततः तुम्हें परमेश्वर के स्थान पर बैठने और यह माँग करने के लिए मजबूर करेंगे कि लोग तुम्हारे प्रति समर्पण करें, वे तुमसे अपने ही विचारों, ख्यालों और धारणाओं को सत्य मानकर पूजा करवाएँगे। लोग अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन इतनी बुराई करते हैं! बुरे कर्म करने की समस्या के समाधान के लिए, पहले उन्हें अपनी प्रकृति को सुधारना होगा। स्वभाव में बदलाव लाए बिना, इस समस्या का बुनियादी समाधान हासिल करना संभव नहीं होगा। जब तुम्हें परमेश्वर की कुछ समझ होगी, जब तुम अपनी भ्रष्टता को देख सकोगे, अहंकार और दंभ की कुरूपता और घिनौनेपन को पहचान सकोगे, तब तुम जुगुप्सा, घृणा और व्यथा को महसूस करोगे। तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सचेत होकर कुछ चीजें कर पाओगे और फिर तुम्हें सुकून महसूस होगा। तुम सचेत होकर परमेश्वर के वचन पढ़ने, उसका उत्कर्ष करने, परमेश्वर के लिए गवाही देने में सक्षम होगे और अपने दिल में तुम खुशी महसूस करोगे। तुम सचेत होकर अपने आपको बेनकाब करोगे, अपनी खुद की कुरूपता को उजागर करोगे और ऐसा करके तुम अंदर से अच्छा महसूस करोगे और तुम्हारी मनोदशा बेहतर हो जाएगी। अपने स्वभाव में बदलाव लाने के प्रयास करने का पहला चरण परमेश्वर के वचनों को समझने का प्रयास करना और सत्य में प्रवेश करना है। सत्य को समझकर ही तुम चीजों का भेद पहचान सकते हो; चीजों का भेद पहचानने से ही तुम चीजों की असलियत देख सकते हो; चीजों की असलियत देखकर ही तुम खुद को सचमुच जान सकते हो; जब तुम खुद को सचमुच जान लोगे केवल तभी तुम देह के खिलाफ विद्रोह कर सकते हो, सत्य को अभ्यास में ला सकते हो और धीरे-धीरे परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हो। इस तरह कदम-दर-कदम तुम परमेश्वर में अपने विश्वास के सही मार्ग पर चल पड़ोगे। यह इस पर निर्भर करता है कि सत्य का अनुसरण करने के प्रति व्यक्ति का संकल्प कैसा है। यदि किसी में वास्तव में संकल्प है तो छह महीने या एक साल के बाद वे सही रास्ते पर आने शुरू हो जाएँगे। तीन या पाँच वर्षों के भीतर, वे परिणाम देख लेंगे और महसूस करेंगे कि वे जीवन में प्रगति कर रहे हैं। यदि लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं करते, और सत्य के अभ्यास पर कभी ध्यान नहीं देते, तो दस या बीस साल विश्वास करने पर भी उन्हें किसी बदलाव का अनुभव नहीं होगा। अंत में, वे सोचेंगे कि यही परमेश्वर में विश्वास रखना है; वे सोचेंगे कि यह बहुत हद तक वैसा ही है जैसे वे पहले धर्मनिरपेक्ष दुनिया में रहते थे, और जीवित रहना अर्थहीन है। यह वास्तव में दिखाता है कि सत्य के बिना जीवन खोखला है। वे कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन उनमें अभी भी सांत्वना की कमी होगी और वे अशांत महसूस करेंगे। यदि लोगों को परमेश्वर के बारे में कुछ जानकारी है, वे जानते हैं कि एक सार्थक जीवन कैसे जीना है, और वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कुछ चीजें कर सकते हैं, तो वे महसूस करेंगे कि यही वास्तविक जीवन है, केवल इसी तरह से जीने से उनके जीवन का अर्थ है, और केवल इसी तरह से जीने से लोग परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं, उसे प्रतिफल दे सकते हैं और सहजता महसूस कर सकते हैं। यदि वे सजगतापूर्वक परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं, सत्य को अभ्यास में ला सकते हैं, अपने खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं, अपने विचारों को छोड़ सकते हैं और इस प्रकार परमेश्वर के इरादों के प्रति समर्पित और विचारशील हो सकते हैं—यदि वे इन सभी चीजों को सजगतापूर्वक करने में सक्षम हैं—तो वे सत्य को सटीक रूप से और सही मायनों में अभ्यास में लाने में सक्षम होंगे। यह पहले की तरह नहीं है, जब लोग केवल कल्पनाओं पर निर्भर रहते थे और विनियमों का पालन करते थे और सोचते थे कि यह सत्य का अभ्यास करना है। वास्तव में, कल्पनाओं पर निर्भर रहना और नियमों का पालन करना बहुत थकाऊ है, सत्य न समझना और सिद्धांतों के बिना काम करना भी बहुत थकाने वाला है, बिना लक्ष्य के आँख मूँदकर काम करना तो और भी थका देने वाला है। जब तुम सत्य समझ लेते हो, तो तुम किन्हीं भी लोगों, घटनाओं या चीजों से बाधित नहीं होगे। तुम सिद्धांत के अनुसार कार्य करोगे और तनावमुक्त और खुश रहोगे। तुम्हें ऐसा नहीं लगेगा कि तुम बहुत अधिक प्रयास कर रहे हो, न ही तुम्हें लगेगा कि तुम बहुत अधिक कष्ट सह रहे हो। यदि तुम्हारी दशा इस प्रकार की है, तो तुममें सत्य और मानवता है और तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसका स्वभाव बदल गया है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य का अनुसरण करके ही व्यक्ति स्वभाव में बदलाव ला सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 557

जीवन अनुभव की प्रक्रिया में, चाहे कुछ भी घटित हो जाए, तुम्हें सत्य खोजना सीखना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों और सत्य के अनुसार मामले पर गहराई से विचार करना चाहिए और यह जानना चाहिए कि कार्य करने का कौन-सा तरीका पूरी तरह से परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है; इस प्रकार तुम उन चीजों को एक तरफ रख सकोगे जो तुम्हारी अपनी इच्छा से आती हैं। एक बार जब तुम जान जाते हो कि परमेश्वर के इरादों के अनुसार कैसे कार्य करना है, तो तुम्हें बस उसी तरह कार्य करना चाहिए—तुम्हें ऐसा लगेगा जैसे सब कुछ स्वाभाविक रूप से हो रहा है और बहुत तनावमुक्त और सुकून महसूस होगा। सत्य समझने वाले लोग इसी ढंग से काम करते हैं। यदि तुम लोगों को दिखा सको कि तुम अपना कर्तव्य करते समय सच में प्रभावी होते हो, और जो तुम करते हो वह सिद्धांतों के अनुसार है, तुम्हारा जीवन स्वभाव वास्तव में बदल गया है, तुमने परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए कई अच्छे काम किए हैं, तो इसका अर्थ है कि तुम्हें सत्य की समझ है और निश्चित रूप से तुममें मनुष्य की छवि है; और जब तुम परमेश्वर के वचन को खाते और पीते हो, तो यकीनन उसका असर होता है। जब कोई सही मायनों में सत्य समझ लेता है, तो वह अपनी विभिन्न दशाओं का भेद पहचानने में सक्षम होगा, वह जटिल मामलों को स्पष्ट रूप से देख पाएगा और यह जान जाएगा कि कैसे सही तरीके से अभ्यास करना है। यदि कोई व्यक्ति सत्य नहीं समझता और अपनी खुद की दशा का भेद नहीं पहचान सकता, तो भले ही वह खुद के खिलाफ विद्रोह करना चाहे, वह नहीं जानता कि किसके खिलाफ विद्रोह करना है या कैसे विद्रोह करना है; भले ही वह अपनी इच्छा को छोड़ना चाहे, वह नहीं जानता कि इसमें क्या गलत है, वह अभी भी यही सोचता है कि उसकी अपनी इच्छा सत्य के बहुत अधिक अनुरूप है और शायद वह अपनी इच्छा को पवित्र आत्मा का प्रबोधन भी मानता है। तो फिर ऐसा व्यक्ति अपनी इच्छा को कैसे छोड़ सकता है? वह निश्चित रूप से ऐसा नहीं कर पाएगा, वह देह के खिलाफ विद्रोह तो बिल्कुल नहीं कर पाएगा। इसलिए, जब तुम्हें सत्य की समझ नहीं होती, तो तुम अपनी इच्छा से आई चीजों को, मानवीय धारणाओं के अनुरूप चीजों को, और मानवीय दयालुता, प्रेम, पीड़ा और त्याग को आसानी से सही और सत्य के अनुसार समझने की गलती कर सकते हो। तो फिर तुम इन मानवीय चीजों से विद्रोह कैसे कर सकते हो? तुम्हें सत्य की समझ नहीं है, तुम नहीं जानते कि सत्य का अभ्यास करने का क्या अर्थ होता है। तुम पूरी तरह अंधेरे में हो और उलझन की दशा में हो, इसलिए तुम वही कर सकते हो जो तुम्हें अच्छा लगता है; नतीजतन तुम्हारे कुछ क्रियाकलापों में विकृति आ जाती है। तुम्हारे कुछ क्रियाकलाप विनियमों के अनुसार हैं, कुछ उत्साह से किए जाते हैं और कुछ ठीक शैतान की बाधाओं से आते हैं। जो लोग सत्य नहीं समझते, वे ऐसे ही होते हैं। जब वे काम करते हैं, तो वे या तो एक तरफ या दूसरी तरफ भटक जाते हैं, उनमें हमेशा भटकाव होता है और भले ही वे सिद्धांतों को समझना चाहें, वे जरा भी सटीक नहीं होते। जो लोग सत्य नहीं समझते, वे चीजों को गैर-विश्वासियों की तरह ही बेतुके ढंग से समझते हैं। वे सत्य का अभ्यास कैसे कर सकते हैं? समस्याओं का समाधान कैसे कर सकते हैं? सत्य समझना कोई सरल बात नहीं है। किसी की काबिलियत कम हो या ज्यादा, जीवन भर के अनुभव के बाद भी, उनमें सत्य की समझ सीमित होती है, और परमेश्वर के वचनों की उनकी समझ भी सीमित ही होती है। जो लोग अपेक्षाकृत अधिक अनुभवी होते हैं वे कुछ सत्य समझते हैं, वे ज्यादातर ऐसे काम नहीं करते जो परमेश्वर के प्रतिरोधी हों और बिल्कुल बुरे काम नहीं करते। उनके लिए अपनी इच्छा की मिलावट के बिना कार्य करना असंभव है। चूँकि मनुष्यों की सोच सामान्य होती है और जरूरी नहीं कि उनके विचार हमेशा परमेश्वर के वचन के अनुरूप ही हों, तो उनकी अपनी इच्छा की मिलावट होना अपरिहार्य है। महत्वपूर्ण है उन सभी चीजों का भेद पहचानने की क्षमता होना जो अपनी इच्छा से आती हैं और परमेश्वर के वचन, सत्य और पवित्र आत्मा के प्रबोधन के विरुद्ध होती हैं। इसके लिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों को समझने में मेहनत करनी पड़ेगी; जब तुम सत्य समझ लोगे, केवल तब ही तुममें विवेक होगा और तभी तुम यह सुनिश्चित कर पाओगे कि तुम बुरे कार्य नहीं करोगे।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य का अनुसरण करके ही व्यक्ति स्वभाव में बदलाव ला सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 558

खुद को जानने के लिए, तुम्हें अपनी भ्रष्टता के खुलासों, अपने भ्रष्ट स्वभावों, अपनी घातक कमजोरियों और अपने प्रकृति सार को जानना होगा; तुम्हें अपने दैनिक जीवन में सामने आने वाले हर मामले में अपने खुलासों के आधार पर आत्म-चिंतन करना होगा। परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय, तुम्हें हर एक चीज के प्रति अपनी मंशाओं, परिप्रेक्ष्यों और रवैये की जाँच करनी होगी और इन मामलों में अपने खुलासों से खुद को जानना होगा। बेशक, खुद को गहरे स्तर पर जानने के लिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों का उपयोग करना होगा; केवल परमेश्वर के वचनों के आधार पर खुद को जानने से ही तुम नतीजे हासिल कर सकते हो। जब परमेश्वर के वचनों का न्याय स्वीकार करने की बात आती है, तो अपने दिल में दर्द सहने से मत डरो, परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर किए जाने पर अपनी गरिमा और इज्जत खोने से मत डरो और इससे भी बढ़कर, अपनी भद्दी दशाओं के उजागर होने और दूसरों द्वारा उनकी असलियत जान लिए जाने से मत डरो। केवल इन पीड़ाओं को सहकर ही तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को जान सकते हो, अपनी गहरी भ्रष्टता की सच्चाई की असलियत जान सकते हो, अपने दिल से खुद से और शैतान से नफरत कर सकते हो और आसानी से अपनी देह और शैतान के खिलाफ विद्रोह कर सकते हो। जब तुम सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम हो जाओगे, तो तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को उतारकर फेंक चुके होगे। न्याय स्वीकार करते समय लोगों के लिए इस तरह से कष्ट सहना बहुत फायदेमंद है। परमेश्वर के विश्वासी के रूप में, तुम्हें लोगों का न्याय करने और उन्हें ताड़ना देने वाले परमेश्वर के वचन अधिक पढ़ने चाहिए, विशेष रूप से वे वचन जो मानवजाति की भ्रष्टता के सार को उजागर करते हैं। तुम्हें उन्हें अपनी वास्तविक दशा से अधिक जोड़ना चाहिए और तुम्हें उन्हें खुद पर अधिक और दूसरों पर कम लागू करना चाहिए। परमेश्वर जिन विभिन्न दशाओं को उजागर करता है, वे हर व्यक्ति में काफी अधिक दिखाई देती हैं और वे सभी उनमें पाई जा सकती हैं। अगर तुम्हें इस पर विश्वास नहीं है, तो इसे अनुभव करके देखो। तुम जितना ज्यादा अनुभव करोगे, उतना ही ज्यादा खुद को जानोगे, और उतना ही ज्यादा यह महसूस करोगे कि परमेश्वर के वचन बिल्कुल सही हैं। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, कुछ लोग उन्हें खुद से जोड़ने में असमर्थ होते हैं; उन्हें लगता है कि इन वचनों के कुछ हिस्से उनके बारे में नहीं, बल्कि अन्य लोगों के बारे में हैं। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर लोगों को व्यभिचारी औरतों और वेश्याओं के रूप में उजागर करता है, तो कुछ बहनों को लगता है कि चूँकि वे अपने पति के प्रति पूरी तरह से वफादार हैं, अतः ऐसे वचन उनके संदर्भ में नहीं होने चाहिए। कुछ बहनों को लगता है कि चूँकि वे अविवाहित हैं और उन्होंने कभी यौन संबंध नहीं बनाया है, इसलिए ऐसे वचन उनके बारे में भी नहीं होने चाहिए। कुछ भाइयों को लगता है कि ये वचन केवल महिलाओं के लिए कहे गए हैं, और इनका उनसे कोई लेना-देना नहीं है। कुछ लोगों का मानना है कि मनुष्य को उजागर करने वाले परमेश्वर के वचन बहुत कठोर हैं और वे वास्तविकता से मेल नहीं खाते, इसलिए वे उन्हें स्वीकार नहीं कर सकते हैं। ऐसे भी लोग हैं, जो कहते हैं कि कुछ मामलों में परमेश्वर के वचन सही नहीं हैं। क्या परमेश्वर के वचनों के प्रति यह रवैया सही है? यह जाहिर तौर पर गलत है। सभी लोग खुद को अपने बाहरी व्यवहार के आधार पर देखते हैं। वे परमेश्वर के वचनों के बीच आत्म-चिंतन करने और अपने भ्रष्ट सार के बारे में जान पाने में सक्षम नहीं होते। यहाँ “व्यभिचारी औरत” और “वेश्या” जैसे शब्द मानवजाति की भ्रष्टता, मलिनता और व्यभिचार के सार को दर्शाने के लिए इस्तेमाल किए गए हैं। चाहे पुरुष हो या महिला, विवाहित हो या अविवाहित, हर किसी में व्यभिचार के भ्रष्ट विचार होते हैं—तो इसका तुमसे कोई लेना-देना कैसे नहीं हो सकता है? परमेश्वर के वचन लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करते हैं; चाहे पुरुष हो या स्त्री, भ्रष्टता का उनका स्तर समान है। क्या यह एक तथ्य नहीं है? हमें पहले यह समझना होगा कि परमेश्वर जो कुछ भी कहता है, वह सत्य है और तथ्यों के अनुरूप है, और लोगों का न्याय करके उन्हें उजागर करने वाले उसके वचन चाहे जितने भी कठोर क्यों न हों, या लोगों के साथ सत्य की संगति करने या उन्हें प्रोत्साहित करने वाले उसके वचन कितने भी कोमल क्यों न हों, चाहे उसके वचन न्याय हों या आशीष, चाहे वे निंदा हों या शाप, और चाहे वे लोगों को कड़वाहट का एहसास कराते हों या मिठास का, लोगों को वे सब स्वीकार करने चाहिए। यही वह रवैया है जो लोगों को परमेश्वर के वचनों के प्रति अपनाना चाहिए। यह किस प्रकार का रवैया है? क्‍या यह भक्ति का रवैया है, धैर्यशीलता का रवैया है या कष्‍ट सहने का रवैया है? तुम थोड़ी उलझन में हो। मैं तुमसे कहता हूँ कि यह इनमें से कोई नहीं है। अपनी आस्‍था में, लोगों को दृढ़ता से यह मानना चाहिए कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं और चूँकि वे सत्य हैं, लोगों को उन्हें विवेक के साथ स्वीकार कर लेना चाहिए। चाहे वे इसे पहचानने या मानने में सक्षम हों या नहीं, उनका पहला रवैया परमेश्वर के वचनों को पूरी तरह से अपने दिलों में स्वीकार करने का होना चाहिए; केवल यही परमेश्वर के प्रति समर्पण का रवैया है। यदि तुम्हें लगता है कि परमेश्वर के वचन तुम्हें उजागर नहीं कर रहे हैं—तो क्या तुम भी भ्रष्ट मानवजाति के सदस्य नहीं हो? भ्रष्ट मानवजाति के सभी सदस्यों को परमेश्वर का न्याय और ताड़ना स्वीकार करनी चाहिए—क्या तुम वास्तव में अपवाद हो सकते हो? परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर की गई समस्याओं में भ्रष्ट मानवजाति के हर एक सदस्य का हिस्सा है। परमेश्वर द्वारा बोला गया हर एक वाक्य भ्रष्ट मानवजाति को उजागर करता है और इसमें हर किसी का हिस्सा है—बेशक तुम अपवाद नहीं हो। परमेश्वर के वचनों का एक भी वाक्य बाहरी दिखावों या किसी प्रकार की दशा को उजागर नहीं करता, लोगों के बाहरी विनियम या उनके व्यवहार के साधारण रूप को तो बिल्कुल भी उजागर नहीं करता। वे ऐसे नहीं हैं। यदि तुम्हें लगता है कि परमेश्वर के वचनों का हर एक वाक्य केवल एक साधारण प्रकार के मानवीय व्यवहार या बाहरी दिखावे को उजागर कर रहा है, तो तुम्हारे पास कोई आध्यात्मिक समझ नहीं है और तुम नहीं समझते कि सत्य क्या है। परमेश्वर के वचन सत्य हैं। लोगों को लगता है कि परमेश्वर के वचन गहन हैं। वे गहन कैसे हैं? परमेश्वर का हर एक वचन लोगों के भ्रष्ट स्वभावों और उनके जीवन के भीतर गहराई से जड़ें जमाई हुई चीजों को उजागर करता है। वे सारभूत चीजें हैं, बाहरी दिखावे नहीं और विशेष रूप से बाहरी व्यवहार नहीं। यदि तुम उनके बाहरी दिखावों को देखो, तो कई व्यक्ति अच्छे लोग प्रतीत हो सकते हैं। लेकिन फिर परमेश्वर क्यों कहता है कि कुछ लोग बुरी आत्माएं हैं और कुछ अशुद्ध आत्माएं हैं? यह एक ऐसा मामला है जो तुम्हें दिखाई नहीं देता है। इसलिए व्यक्ति को परमेश्वर के वचनों को मानवीय धारणाओं या कल्पनाओं के आलोक में या मनुष्यों की सुनी-सुनाई बातों के आलोक में नहीं लेना चाहिए, और सत्तारूढ़ पार्टी के बयानों के आलोक में तो निश्चित रूप से नहीं लेना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं; मनुष्य के सभी वचन भ्रांतियाँ हैं। इस तरह से सहभागिता करने के बाद, क्या तुम लोगों ने परमेश्वर के वचनों के प्रति अपने रवैये में बदलाव का अनुभव किया है? बदलाव चाहे जितना भी छोटा या बड़ा हो, अगली बार जब तुम लोगों का न्याय और उन्हें उजागर करने वाले परमेश्वर के वचन पढ़ोगे, तो तुम्हें कम-से-कम परमेश्वर से बहस करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। तुम्हें यह कहते हुए परमेश्वर के बारे में शिकायत करना बंद कर देना चाहिए, “लोगों को उजागर और उनका न्याय करने वाले परमेश्वर के वचन वाकई कठोर हैं, मैं इस पन्ने को नहीं पढ़ने वाला। मैं इसे छोड़ दूँगा! मुझे आशीषों और वादों के बारे में पढ़ने के लिए कुछ खोजना चाहिए, ताकि कुछ सुख-शांति मिल सके।” तुम्हें अब परमेश्वर के वचनों को अपनी मर्जी से छाँट-छाँटकर नहीं पढ़ना चाहिए। तुम्हें सत्य और परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना चाहिए और आत्म-चिंतन करके खुद को जानना चाहिए; सिर्फ इसी तरीके से तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों को शुद्ध किया जा सकता है और सिर्फ इसी तरीके से तुम उद्धार प्राप्त कर सकते हो।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य के अनुसरण का महत्व और मार्ग

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 559

तुम मानव प्रकृति को कैसे समझते हो? अपनी प्रकृति को समझने का वास्तविक अर्थ है अपनी आत्मा की गहराई में मौजूद चीजों का विश्लेषण करना; उन चीजों का विश्लेषण करना जो तुम्हारे जीवन में हैं उन शैतानी तर्क और शैतान के फलसफों का विश्लेषण करना जिनके अनुसार तुम जीते आ रहे हो—जो कि शैतान का जीवन है जो तुम जी रहे हो। केवल अपने आत्मा में गहरे मौजूद चीजों को बाहर निकाल कर ही तुम अपनी प्रकृति को समझ सकते हो। इन चीजों को कैसे निकाला जा सकता है? मात्र एक या दो मामलों द्वारा, उन्हें निकाला और विश्लेषित नहीं किया जा सकता। कई बार काम खत्म कर लेने के बाद भी तुम्हारे पास कोई समझ नहीं होती। थोड़ी-सी भी पहचान या समझ प्राप्त कर सकने में तीन या पाँच वर्ष लग सकते हैं। इसलिए, बहुत-सी परिस्थितियों में तुम्हें आत्म-चिंतन कर खुद को जानना चाहिए। कोई परिणाम देखने के लिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों के अनुसार गहराई तक खोदना चाहिए और आत्म-विश्लेषण करना चाहिए। जैसे-जैसे सत्य की तुम्हारी समझ ज्यादा से ज्यादा गहरी होती जाएगी, तुम आत्मचिंतन और आत्मज्ञान के जरिये धीरे-धीरे अपने प्रकृति सार को जान जाओगे।

अपनी प्रकृति जानने के लिए, तुम्हें कुछ चीजों के द्वारा इसकी समझ हासिल करनी चाहिए : सबसे पहले, तुम्हें इस बात की स्पष्ट समझ होनी चाहिए कि तुम्हें क्या पसंद है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि तुम क्या खाना या पहनना पसंद करते हो, बल्कि इसका मतलब है कि तुम किस तरह की चीजों का आनन्द लेते हो, किन चीजों से तुम ईर्ष्या करते हो, किन चीजों की तुम आराधना करते हो, किन चीजों का तुम अनुसरण करते हो, और किन चीजों की ओर तुम अपने हृदय में ध्यान देते हो, किस प्रकार के लोगों के संपर्क में आने का तुम आनन्द लेते हो, और किस प्रकार के लोगों को तुम पसंद करते हो और अपना आदर्श मानते हो। उदाहरण के लिए, ज्यादातर लोग ऐसे लोगों को पसंद करते हैं जो महान हों, जो अपनी बोल-चाल में शानदार हों या उन लोगों को पसंद करते हैं जो चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं या उन्हें जो कि दिखावा करते हैं। यह पूर्वोक्त उस बारे में है कि वे कैसे लोगों के साथ बातचीत करना पसंद करते हैं। जहाँ तक इसकी बात है कि लोग किन चीजों को पसंद करते हैं, इसमें शामिल है ऐसी कुछ चीजों को करने के लिए तैयार होना जिन्हें करना आसान है, उन चीजों को करने में आनन्द पाना जिन्हें दूसरे अच्छा मानते हैं, और जिन्हें लोग स्वीकृति देंगे और जिनकी तारीफ करेंगे। लोगों की प्रकृति में, जिन चीजों को वे पसंद करते हैं, उनकी एक जैसी विशिष्टता होती है। अर्थात्, वे उन लोगों, घटनाओं, और चीजों को पसंद करते हैं जिनके बाहरी दिखावे की वजह से अन्य लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं, वे उन लोगों, घटनाओं और चीजों को पसंद करते हैं जो सुंदर और शानदार दिखते हैं, और वे उन लोगों, घटनाओं और चीजों को पसंद करते हैं जो लोगों से अपनी आराधना करवाते हैं। ये चीजें जिन्हें लोग अत्यधिक पसंद करते हैं वे बढ़िया, चमकदार, भव्य और आलीशान होती हैं। सभी लोग इन चीजों की आराधना करते हैं। यह देखा जा सकता है कि लोगों में कोई सच्चाई नहीं होती है, न ही उनमें वास्तविक मानव की सदृशता होती है। इन चीजों की आराधना करने का लेशमात्र भी महत्व नहीं है, मगर लोग तब भी इन चीजों को पसंद करते हैं। ये चीजें, जिन्हें लोग पसंद करते हैं, उन लोगों को विशेष रूप से अच्छी लगती प्रतीत होती हैं, जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, और ये वही चीजें होती हैं जिनका लोग विशेष रूप से अनुसरण करने के इच्छुक होते हैं। ... जिन चीजों का लोग अनुसरण और लालसा करते हैं, वे सांसारिक प्रवृत्तियों से संबंधित होती हैं, ये चीजें शैतान और दुष्टों की होती हैं, परमेश्वर उनसे घृणा करता है, वे सत्य से रहित होती हैं। जिन चीजों के लिए लोग तरसते हैं, वे उनकी प्रकृति सार का पता लगाने की अनुमति देती हैं। लोगों की पसंद उनके कपड़े पहनने के तरीके में देखी जा सकती है। कुछ लोग ध्यान खींचने वाले, रंगीन कपड़े या विचित्र पोशाक पहनने के इच्छुक होते हैं। वे ऐसी चीजें पहनने को तैयार होते हैं जो पहले किसी और ने नहीं पहनी होतीं, और वे ऐसी चीजें पसंद करते हैं जो विपरीत लिंग को आकर्षित कर सकें। उनका ये कपड़े और चीजें पहनना उनके जीवन और दिल की गहराइयों में इन चीजों के लिए उनकी प्राथमिकता दर्शाता है। जो चीजें वे पसंद करते हैं, वे गरिमापूर्ण या शालीन नहीं होतीं। वे सामान्य व्यक्ति द्वारा पसंद की जाने वाली चीजें नहीं होतीं। इन चीजों के लिए उनके लगाव में अधार्मिकता है। उनका दृष्टिकोण बिल्कुल वैसा ही है, जैसा सांसारिक लोगों का होता है। व्यक्ति उनमें ऐसा कुछ भी नहीं देख पाता जिनमें सत्य से जरा भी कोई सामंजस्य हो। इसलिए, तुम क्या पसंद करते हो, तुम किस पर ध्यान केंद्रित करते हो, तुम किसकी आराधना करते हो, तुम किससे ईर्ष्या करते हो, और रोज तुम अपने दिल में क्या सोचते हो, ये सब तुम्हारी अपनी प्रकृति का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन सांसारिक चीजों से तुम्हारा अनुराग यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि तुम्हारी प्रकृति अधार्मिकता की शौकीन है, और गंभीर परिस्थितियों में तुम्हारी प्रकृति दुष्टतापूर्ण और असाध्य है। तुम्हें इस तरह अपनी प्रकृति का विश्लेषण करना चाहिए; यह जाँचो कि तुम क्या पसंद करते हो और तुम अपने जीवन में क्या त्यागते हो। तुम कुछ समय के लिए किसी के प्रति अच्छे हो सकते हो, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि तुम उसके चाहने वाले हो। जिसके तुम वाकई शौकीन हो, वह ठीक वो है जो तुम्हारी प्रकृति में है; भले ही तुम्हारी हड्डियाँ टूट गयी हों, तुम फिर भी उसका आनंद लोगे और कभी भी इसे त्याग नहीं पाओगे। इसे बदलना आसान नहीं है। उदाहरण के लिए एक साथी को ढूँढ़ने की बात लो, लोग अपने जैसे लोगों की ही तलाश करते हैं। यदि कोई महिला वास्तव में किसी के प्यार में पड़ जाए, तो कोई भी उसे रोक नहीं पाएगा। यहाँ तक कि अगर उसकी टाँग भी तोड़ दी जाए, तब भी वह उसके साथ ही रहना चाहेगी; अगर उसे उसके साथ विवाह करने का अर्थ उस महिला की मृत्यु हो तो भी वह विवाह करना चाहेगी। यह कैसे हो सकता है? इसका कारण यह है कि कोई भी व्यक्ति उसे नहीं बदल सकता जो लोगों की हड्डियों में होता है, जो उनके दिल में होता है। यहाँ तक कि अगर कोई मर भी जाए, तो भी उसकी आत्मा बस वही चीजें ले जाएगी; ये चीजें मानव प्रकृति की हैं, और वे किसी व्यक्ति के सार का प्रतिनिधित्व करती हैं। लोग जिन चीजों के शौकीन होते हैं, उनमें कुछ अधार्मिकता होती है। कुछ लोग उन चीजों के अपने शौक में स्पष्ट होते हैं और कुछ नहीं होते; कुछ तो उन्हें अत्यधिक पसंद करते हैं और कुछ नहीं करते; कुछ लोगों में आत्म-नियंत्रण होता है और कुछ स्वयं को नियंत्रित नहीं कर पाते। कुछ लोग अंधकारपूर्ण और दुष्टतापूर्ण चीजों में डूबने के आदी होते हैं, जिससे साबित होता है कि उनके पास जीवन नहीं है। कुछ लोग देह के प्रलोभनों पर विजय पा सकते हैं और उन चीजों के वशीभूत या उनसे विवश नहीं होते, जो साबित करता है कि उनका थोड़ा आध्यात्मिक कद है और उनके स्वभाव में थोड़ा बदलाव आया है। कुछ लोग कुछ सत्य समझते हैं और महसूस करते हैं कि उनके पास जीवन है और वे परमेश्वर से प्यार करते हैं, लेकिन असल में, यह अभी भी बहुत जल्दी है, और अपने स्वभाव को बदलना कोई आसान बात नहीं है। क्या किसी व्यक्ति की प्रकृति सार को समझना आसान है? यदि कोई थोड़ा-बहुत समझता भी है, तो उस समझ को हासिल करने के लिए उस व्यक्ति को बहुत सारे घुमावदार रास्तों से गुजरना पड़ेगा और थोड़ी-बहुत समझ हो भी तो, बदलाव लाना आसान नहीं है। लोगों को इन तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, और सत्य का अनुसरण करने के संकल्प के बिना लोग खुद को नहीं जान सकते। तुम्हारे इर्द-गिर्द लोग, घटनाएँ और चीजें चाहे कैसे भी बदलें, और चाहे दुनिया कैसे भी उलट-पुलट हो जाए, अगर सत्य भीतर से तुम्हारा मार्गदर्शन कर रहा है, यदि उसने तुम्हारे भीतर जड़ें जमा ली हैं और परमेश्वर के वचन तुम्हारे जीवन, प्राथमिकताओं, अनुभवों और अस्तित्व का मार्गदर्शन करते हैं, तो उस बिंदु पर तुम वास्तव में बदल गए होगे। वर्तमान में, लोगों का तथाकथित रूपांतरण केवल थोड़ा सहयोग करना, बेमन से काट-छाँट किए जाने को स्वीकारना, सक्रियता से अपने कर्तव्यों को निभाना और थोड़े उत्साह और विश्वास का होना है, लेकिन इसे स्वभावगत रूपांतरण नहीं माना जा सकता और इससे यह साबित नहीं होता कि लोगों के पास जीवन है। ये सिर्फ लोगों की प्राथमिकताएँ और प्रवृत्तियाँ हैं—और कुछ नहीं।

अपनी प्रकृति में लोग जिन चीजों को पसंद करते हैं उनका पता लगाने के अलावा, लोगों की प्रकृति की समझ के स्तर तक पहुँचने के लिए, उनकी प्रकृति से संबंधित कई सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं का भी पता लगाने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, चीजों पर लोगों के दृष्टिकोण, लोगों के तरीके और जीवन के लक्ष्य, लोगों के जीवन के मूल्य और जीवन पर दृष्टिकोण, साथ ही सत्य से संबंधित सभी चीजों पर उनके नजरिए और राय। ये सभी चीजें लोगों की आत्मा के भीतर गहरी समाई हुई हैं और स्वभाव में परिवर्तन के साथ उनका एक सीधा संबंध है। तो फिर, भ्रष्ट मानवजाति का जीवन को लेकर क्या दृष्टिकोण है? इसे इस तरह कहा जा सकता है : “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।” सभी लोग अपने लिए जीते हैं; सरल तरीके से कहें तो वे देह के लिए जी रहे हैं और वे केवल अपने मुँह में भोजन डालने के लिए जीते हैं। उनका यह अस्तित्व पशुओं के अस्तित्व से किस तरह भिन्न है? इस तरह जीने का कोई मूल्य नहीं है, उसका कोई अर्थ होने की तो बात ही छोड़ दो। जीवन पर व्यक्ति का दृष्टिकोण इस बारे में होता है कि दुनिया में जीने के लिए वह किस पर भरोसा करता है, वह किस उद्देश्य के लिए जीता है और किस तरह जीता है—और ये सभी मानव-प्रकृति के भीतर अनिवार्य चीजें हैं। लोगों की प्रकृति का गहन-विश्लेषण करके तुम देखोगे कि सभी लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। वे सभी दानव हैं और वास्तव में कोई भी अच्छा व्यक्ति नहीं है। केवल लोगों की प्रकृति का गहन-विश्लेषण करके ही तुम वास्तव में उनकी भ्रष्टता और सार को जान सकते हो और समझ सकते हो कि लोग वास्तव में क्या हैं, उनमें वास्तव में क्या कमी है, उन्हें किस चीज से लैस होना चाहिए, और उन्हें मानव के समान कैसे जीना चाहिए। व्यक्ति की प्रकृति का वास्तव में गहन-विश्लेषण कर पाना आसान नहीं है, और वह परमेश्वर के वचनों का अनुभव किए बिना या वास्तविक अनुभव प्राप्त किए बिना नहीं किया जा सकता।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, स्वभावगत परिवर्तन के बारे में क्या जानना चाहिए

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 560

किसी की प्रकृति को कैसे जानें? किसी व्यक्ति की प्रकृति किन चीजों से मिलकर बनती है? तुम केवल मनुष्य की कमियों, दोषों, इरादों, धारणाओं, नकारात्मकता और विद्रोहीपन के बारे में जानते हो, लेकिन तुम मनुष्य की प्रकृति के भीतर की चीजों को नहीं जान पाते। उसके उद्भव को जानने में समर्थ हुए बिना तुम केवल उसकी बाहरी परत को जानते हो, और इससे मनुष्य की प्रकृति का ज्ञान नहीं होता। कुछ लोग अपनी कमियाँ और नकारात्मकताएँ स्वीकारते हैं और कहते हैं, “मैं अपनी प्रकृति समझता हूँ। देखो, मैं अपने अहंकार को स्वीकारता हूँ। क्या यह मेरा अपनी प्रकृति को जानना नहीं है?” अहंकार मनुष्य की प्रकृति का एक अंग है; यह सत्य है। लेकिन इसे केवल सैद्धांतिक अर्थ में स्वीकारना पर्याप्त नहीं है। अपनी प्रकृति को समझना क्या है? इसे कैसे जाना जा सकता है? किन पहलुओं से इसे जाना जा सकता है? एक व्यक्ति जिन चीजों को प्रकट करता है, उसके माध्यम से किसी की प्रकृति को विशिष्ट रूप से कैसे देखा जाना चाहिए? सबसे पहले, तुम व्यक्ति की प्रकृति को उसकी रुचियों के माध्यम से देख सकते हो। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों में मशहूर और विशिष्ट लोगों के लिए विशेष श्रद्धा होती है, कुछ लोगों को विशेष रूप से गायक या फिल्मी सितारे पसंद हैं, कुछ लोगों को गेम खेलने का विशेष शौक होता है। इन रुचियों से हम देख सकते हैं कि इन लोगों की प्रकृति क्या है। एक सरल उदाहरण है : कुछ लोग किसी गायक को आदर्श मान सकते हैं। वे किस हद तक उन्हें आदर्श मानते हैं? इस हद तक कि वे उस गायक की हर हरकत, मुस्कान और शब्द के प्रति आसक्त हो जाते हैं। वे उस गायक पर फिदा हो जाते हैं, यहाँ तक कि हर उस चीज की तस्वीर खींचते हैं जो वह पहनता है, और उसकी नकल करते हैं। इस स्तर का आदर्शीकरण इस व्यक्ति के बारे में किस समस्या को दर्शाता है? यह दर्शाता है कि ऐसे व्यक्ति के हृदय में केवल गैर-विश्वासी चीजें हैं, उसमें सत्य नहीं है, उसमें सकारात्मक चीजें नहीं हैं, और परमेश्वर तो उसके हृदय में बिल्कुल नहीं है। वे सभी चीजें, जिनके बारे में यह व्यक्ति सोचता है, जिनसे प्यार करता है और जिनका अनुसरण करता है, शैतान की होती हैं। ये चीजें इस व्यक्ति के हृदय पर कब्ज़ा कर लेती हैं, जो उन चीजों को अर्पित कर दिया जाता है। क्या तुम लोग बता सकते हो कि उसका प्रकृति सार क्या है? अगर किसी चीज को चरम सीमा तक प्रेम किया जाता है, तो वह चीज किसी का जीवन बन सकती है और उसके हृदय पर कब्ज़ा कर सकती है, पूरी तरह से यह साबित करती है कि वह व्यक्ति एक मूर्ति पूजक है जो परमेश्वर को नहीं चाहता है और उसके बजाय एक शैतान से प्यार करता है। इसलिए, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ऐसे व्यक्ति की प्रकृति एक शैतान से प्रेम और उसकी आराधना करने वाली होती है, जो सत्य से प्रेम नहीं करती और परमेश्वर को नहीं चाहती। क्या यह किसी व्यक्ति की प्रकृति को देखने का सही तरीका नहीं है? यह पूरी तरह सही है। मनुष्य की प्रकृति का गहन-विश्लेषण इसी तरह किया जाता है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग विशेष रूप से पौलुस की आराधना करते हैं। उन्हें बाहर जाकर भाषण देना और कार्य करना पसंद होता है, उन्हें सभाएँ आयोजित करना और प्रचार करना पसंद होता है; उन्हें अच्छा लगता है कि लोग उन्हें सुनें, उन्हें आराध्य मानें और उनके इर्दगिर्द घूमें। उन्हें पसंद होता है कि दूसरों के दिलों में उनकी एक जगह हो और दूसरे उनके द्वारा प्रदर्शित छवि पर ध्यान दें। आओ हम इन अभिव्यक्तियों से उनकी प्रकृति का गहन-विश्लेषण करें। उनकी प्रकृति कैसी है? यदि वे वास्तव में ये अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करते हैं, तो यह इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि वे अहंकारी और दंभी हैं, वे परमेश्वर की आराधना बिल्कुल नहीं करते हैं और वे ऊँचे रुतबे के पीछे भागते हैं और दूसरों पर अधिकार रखना चाहते हैं, उन्हें वश में करना चाहते हैं और उनके दिल में जगह बनाना चाहते हैं। यह शैतान की ठेठ छवि है। उनकी प्रकृति के खासकर अलग दिखने वाले पहलू ये हैं कि वे अहंकारी और दंभी हैं, वे परमेश्वर की आराधना नहीं करते हैं और दूसरों से अपनी आराधना करवाने की कोशिश करते हैं। ऐसी अभिव्यक्तियों से तुम उनकी प्रकृति को बहुत स्पष्ट रूप से देख सकते हो। उदाहरण के लिए, कुछ लोग वाकई चीजों का अनुचित लाभ उठाना पसंद करते हैं और वे सभी मामलों में अपना ही हित साधना चाहते हैं। वे सब कुछ इस आधार पर करते हैं कि इससे उन्हें लाभ होता है या नहीं। अगर इससे उन्हें लाभ होता है तो वे इसे करते हैं; अगर उनके लिए कोई लाभ नहीं है तो वे इसे नहीं करते हैं। उनके कार्यों के पीछे हमेशा गुप्त उद्देश्य होते हैं। जो व्यक्ति उन्हें लाभ पहुँचाता है, वे उसकी प्रशंसा करते हैं, और जो कोई उनकी चापलूसी करता है, उसे वे बढ़ावा देते हैं। यहाँ तक कि अगर उनके पसंदीदा लोगों में समस्याएँ भी हों, तो भी वे कहेंगे कि वे लोग सही हैं, और उनका बचाव करने और उन पर पर्दा डालने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। इस तरह के व्यक्तियों की प्रकृति क्या होती है? तुम पूरी तरह उनकी प्रकृति को इन व्यवहारों से साफ देख सकते हो। वे अपने कार्यों के माध्यम से चीजों का अनुचित लाभ लेने का प्रयास करते हैं और हर स्थिति में लेन-देन के व्यवहार में संलग्न रहते हैं, इसलिए तुम यह निश्चित रूप से कह सकते हो कि उनकी प्रकृति लाभों को सबसे पहले रखती है। वे हर चीज में स्वयं के बारे में सोचते हैं। अगर कोई फायदा न होने वाला हो तो वे एक उँगली तक नहीं उठाएँगे। वे लोगों में सबसे स्वार्थी होते हैं, और वे बेहद लालची होते हैं। उनकी प्रकृति फायदे से उनके प्रेम और सत्य से प्रेम के अभाव के जरिये प्रदर्शित होती है। कुछ लोग महिलाओं से मोहित रहते हैं, जहाँ कहीं वे जाती हैं उनके साथ घूमते-फिरते रहते हैं। सुंदर महिलाएं ऐसे व्यक्तियों की चाहत का लक्ष्य होती हैं और उनके दिल में उनके लिए अत्यधिक सम्मान होता है। वे सुंदर महिलाओं के लिए अपना जीवन देने और सब कुछ त्यागने के लिए तैयार रहते हैं। केवल महिलाएं ही उनके दिल में रहती हैं। ऐसे पुरुषों की प्रकृति क्या होती है? उनका स्वभाव है सुंदर महिलाओं से प्रेम करना, उनकी पूजा करना और दुष्टता से प्रेम करना। वे दुष्ट, लालची प्रकृति वाले अय्याश व्यक्ति होते हैं। मैं क्यों कहता हूँ कि यह उनकी प्रकृति है? क्योंकि ये इस बात की अभिव्यक्तियाँ हैं कि लालच व्यक्ति की प्रकृति बन चुका है। ये व्यवहार केवल कभी-कभी किए जाने वाले अपराध नहीं होते, न ही ऐसे लोग केवल सामान्य लोगों से थोड़े ज्यादा बुरे होते हैं, बल्कि उनका दिल पहले से ही इन चीजों से पूरी तरह से भरा होता है, जो उनकी प्रकृति, उनका सार बन जाती हैं। इस प्रकार, ये चीजें उनकी प्रकृति का प्रकटन बन गई हैं। इंसान की प्रकृति में जो कुछ है, वह हर पल प्रकट होता रहता है। इंसान चाहे जो भी करे, उसकी प्रकृति प्रकट हो जाती है। लोग जो कुछ भी करते हैं, उसके पीछे उनके अपने प्रयोजन और उद्देश्य होते हैं और चाहे मेजबानी का कर्तव्य निभाना हो, सुसमाचार का प्रचार करना हो या कोई भी दूसरी तरह का कार्य करना हो, वे अपनी प्रकृति में स्थित चीजें अनजाने में ही प्रकट करते हैं, क्योंकि इंसान की प्रकृति ही उसका जीवन है और सभी लोग अपनी प्रकृति के नियंत्रण के अधीन जीते हैं। इंसान की प्रकृति के खुलासे कभी-कभार की, क्षणिक अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं; बल्कि वे उस व्यक्ति के सार का पूरी तरह प्रतिनिधित्व करते हैं। लोगों की हड्डियों और खून के भीतर से जो कुछ प्रकट होता है, वह उनकी प्रकृति और जीवन का प्रतिनिधित्व करता है। कुछ लोगों को सुंदर महिलाएं पसंद होती हैं। कुछ लोग पैसे से प्रेम करते हैं। कुछ लोगों को रुतबे से विशेष प्रेम होता है। कुछ विशेष रूप से प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत छवि को मूल्यवान समझते हैं। कुछ विशेष रूप से मूर्तियों से प्रेम या उनकी आराधना करते हैं। और कुछ लोग, विशेष रूप से अहंकारी और दंभी होते हैं, वे अपने दिल में किसी को स्थान नहीं देते और ऊँचारुतबा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, वे दूसरों से अलग दिखना चाहते हैं और उन पर अधिकार प्राप्त करना चाहते हैं। विभिन्न प्रकार की प्रकृतियाँ होती हैं। वे लोगों में भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, लेकिन उनके साझे तत्व परमेश्वर का प्रतिरोध और उससे विश्वासघात हैं। इस मामले में वे सभी समान हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 561

सारी मानवजाति शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी है, और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना मनुष्य की प्रकृति है। किंतु, शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए सभी मनुष्यों में कुछ ऐसे भी हैं, जो परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित हो सकते हैं और सत्य स्वीकार कर सकते हैं। ये वे लोग हैं जो सत्य प्राप्त कर सकते हैं और स्वभाव में परिवर्तन हासिल कर सकते हैं। कुछ लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं और बस बहाव के साथ चलते जाते हैं। उनसे जो भी करने को कहा जाता है, वे उसे मानते और करते हैं, वे चीजें त्याग सकते हैं और खुद को खपा सकते हैं, और वे हर तरह की पीड़ा सह सकते हैं। ऐसे लोगों में थोड़ा-सा जमीर और विवेक होता है और उन्हें बचाए जाने और जीवित रहने की आशा भी होती है, लेकिन उनका स्वभाव नहीं बदल सकता क्योंकि वे सत्य का अनुसरण नहीं करते और वे केवल धर्म-सिद्धांत समझने से ही संतुष्ट रहते हैं। वे जमीर का उल्लंघन करने वाली बातें नहीं कहते या करते, वे ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हैं, और किसी भी समस्या के बारे में सत्य पर संगति स्वीकार सकते हैं। लेकिन जब सत्य की बात आती है, तो वे गंभीर प्रयास नहीं करते, उनका दिमाग भ्रमित होता है और वे कभी भी सत्य के सार को नहीं समझ सकते। उनके स्वभाव को बदलना असंभव होता है। अगर तुम भ्रष्टता से शुद्ध होना और अपने जीवन स्वभाव में बदलाव से गुजरना चाहते हो, तो तुममें सत्य के लिए प्रेम होना चाहिए और तुम्हें सत्य को स्वीकार करने में सक्षम होना चाहिए। सत्य स्वीकार करने का क्या अर्थ है? सत्य स्वीकारने का यह अर्थ है कि चाहे तुममें कोई भी भ्रष्ट स्वभाव हो या बड़े लाल अजगर के जो विष—शैतान के विष—तुम्हारी प्रकृति में हों, जब परमेश्वर के वचन इन चीजों को उजागर कर दें, तो तुम्हें उन्हें मान लेना और समर्पण कर देना चाहिए, तुम कोई और विकल्प नहीं चुन सकते, तुम्हें परमेश्वर के वचनों के अनुसार खुद को जानना चाहिए। इसका मतलब है परमेश्वर के वचनों और सत्य को स्वीकारने में सक्षम होना। मान लो कि चाहे परमेश्वर कुछ भी कहे, चाहे उसके वचन कितने भी कठोर हों, चाहे वह किन्हीं भी वचनों का उपयोग करे, तुम इन्हें तब तक स्वीकार कर सकते हो जब तक कि वह जो भी कहता है वह सत्य है, और तुम इन्हें तब तक मान सकते हो जब तक कि वे वास्तविकता के अनुरूप हैं। इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम परमेश्वर के वचनों को कितनी गहराई से समझते हो, तुम उनके प्रति समर्पण कर सकते हो; और भले ही भाई-बहन पवित्र आत्मा के प्रबोधन से प्राप्त प्रकाश के बारे में संगति करते हों, तुम अभी भी उसे स्वीकार करने और उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम हो। जब ऐसा व्यक्ति सत्य का अनुसरण एक निश्चित बिंदु तक कर लेता है, तो वह सत्य को प्राप्त कर सकता है और अपने स्वभाव के परिवर्तन को प्राप्त कर सकता है। भले ही सत्य से प्रेम न करने वाले लोगों में थोड़ी-बहुत मानवता हो, वे कुछ अच्छी चीजें कर सकते हों, त्याग कर सकते हों और परमेश्वर के लिए खुद को खपा सकते हों, फिर भी वे भ्रमित हैं और सत्य को लेकर बहुत सावधान नहीं हैं, इसलिए उनके जीवन स्वभाव कभी नहीं बदलते। तुम देख सकते हो कि पतरस और अन्य शिष्यों की मानवता लगभग एक समान थी लेकिन पतरस की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि उसने विशेष रूप से सत्य का अनुसरण किया। यीशु ने चाहे जो भी कहा उसने उस पर गंभीरता से विचार किया, इन वचनों के माध्यम से खुद पर आत्म-चिंतन किया और परमेश्वर के इरादों को खोजा। यीशु ने पूछा, “हे शमौन बारयोना, क्या तुम मुझसे प्रेम करते हो?” पतरस ने ईमानदारी से उत्तर दिया, “मैं केवल उस पिता से प्रेम करता हूँ जो स्वर्ग में है, अभी तक मैंने पृथ्वी के प्रभु से प्रेम नहीं किया है।” बाद में उसने समझा, यह सोचते हुए, “यह सही नहीं है, पृथ्वी का परमेश्वर स्वर्ग का परमेश्वर है। क्या स्वर्ग और पृथ्वी में यही एक परमेश्वर नहीं है? अगर मैं केवल स्वर्ग के परमेश्वर से प्रेम करता हूँ, तो मेरा प्रेम व्यावहारिक नहीं है। मुझे पृथ्वी के परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, और तभी मेरा प्रेम व्यावहारिक होगा।” इस प्रकार, यीशु ने जो पूछा था, उससे पतरस ने परमेश्वर के वचनों का सच्चा अर्थ जाना। परमेश्वर के प्रति व्यक्ति का प्रेम केवल तब ही व्यावहारिक होता है अगर वह पृथ्वी पर देहधारी परमेश्वर से प्रेम करता है। किसी अज्ञात और अदृश्य परमेश्वर से प्रेम करना न तो यथार्थपरक है और न ही व्यावहारिक, जबकि व्यावहारिक, दृश्यमान परमेश्वर से प्रेम करना सत्य है। यीशु के वचनों से पतरस ने सत्य को हासिल किया और परमेश्वर के इरादे की समझ प्राप्त की। स्पष्टतः, पतरस का परमेश्वर में विश्वास केवल सत्य की तलाश पर केंद्रित था। अंततः, उसने व्यावहारिक परमेश्वर—पृथ्वी के परमेश्वर—को प्रेम करने की अवस्था प्राप्त की। सत्य की तलाश में पतरस विशेष रूप से गंभीर था। जब भी यीशु ने उसे एक मार्गदर्शन दिया, उसने गंभीरतापूर्वक यीशु के वचनों पर चिंतन किया। शायद उसने महीनों, एक वर्ष, यहाँ तक कि वर्षों तक चिंतन किया और तब पवित्र आत्मा द्वारा उसे प्रबुद्ध किया गया और वह परमेश्वर के वचनों का सार समझ पाया। इस तरह, पतरस ने सत्य में प्रवेश किया, और जब उसने ऐसा किया, तो उसके जीवन के स्वभाव का रूपांतरण और नवीनीकरण हुआ। अगर कोई व्यक्ति सत्य का अनुसरण नहीं करता, तो वह इसे कभी नहीं समझेगा। तुम शब्दों और धर्म-सिद्धांतों पर दस हजार बार बोल सकते हो, लेकिन वे फिर भी केवल शब्द और धर्म-सिद्धांत ही रहेंगे। कुछ लोग बस यही कहते हैं, “मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है।” अगर तुम इन शब्दों को दस हजार बार भी दोहराते हो, तो भी यह व्यर्थ होगा; तुम्हें उसके अर्थ की कोई समझ नहीं है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है? क्या तुम इसके बारे में अपना अनुभवजन्य ज्ञान साफ-साफ बता सकते हो? क्या तुमने सत्य, मार्ग और जीवन की वास्तविकता में प्रवेश किया है? परमेश्वर ने अपने वचन इसलिए बोले हैं, ताकि तुम उन्हें अनुभव कर सको और ज्ञान प्राप्त कर सको। केवल शब्दों और धर्म-सिद्धांतों पर बोलना बेकार है। परमेश्वर के वचनों को समझने और उनमें प्रवेश करने के बाद ही तुम स्वयं को जान सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते, तो तुम स्वयं को नहीं जान सकते। तुम केवल तभी विवेक प्राप्त कर सकते हो जब तुम सत्य समझते हो। सत्य समझे बिना तुम परखने में असमर्थ रहते हो। तुम मामलों को पूरी तरह से तभी समझ सकते हो, जब तुम्हें सत्य की समझ हो। सत्य समझे बिना तुम मामलों को साफ तौर पर नहीं समझ सकते। सत्य की समझ होने पर ही तुम स्वयं को जान सकते हो। सत्य समझे बिना तुम स्वयं को नहीं जान सकते। सत्य की समझ होने पर ही तुम्हारा स्वभाव बदल सकता है। सत्य के बिना तुम्हारा स्वभाव नहीं बदल सकता। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम परमेश्वर के इरादों के अनुरूप सेवा कर सकते हो। सत्य प्राप्त किए बिना तुम परमेश्वर के इरादों के अनुरूप सेवा नहीं कर सकते। सत्य की समझ होने पर ही तुम परमेश्वर की आराधना कर सकते हो। सत्य समझे बिना, भले ही तुम उसकी आराधना करो, तुम्हारी आराधना धार्मिक कर्म-कांडों के आयोजन से ज्यादा कुछ नहीं होगी। सत्य के बिना तुम्हारा किया कोई भी काम वास्तविकता नहीं होता। सत्य प्राप्त करने से, तुम्हारे किए सभी कार्यों में वास्तविकता होती है। ये सभी चीजें परमेश्वर के वचनों से सत्य प्राप्त करने पर निर्भर हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 562

परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ पाना कोई सरल बात नहीं है। इस तरह मत सोचो : “मैं परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर सकता हूँ, और हर कोई मेरी व्याख्या को अच्छा कहता है और मुझे शाबाशी देता है, तो इसका अर्थ है कि मैं परमेश्वर के वचनों को समझता हूँ।” यह परमेश्वर के वचनों को समझने के समान नहीं है। यदि तुमने परमेश्वर के कथनों के भीतर से कुछ प्रकाश प्राप्त किया है और उसके वचनों के वास्तविक अर्थ को महसूस किया है, यदि तुम उसके वचनों के पीछे के इरादे को और वे अंततः जो प्रभाव प्राप्त करेंगे, उसको व्यक्त कर सकते हो, अगर तुम्हें इन सब बातों की स्पष्ट समझ हो, तो यह माना जा सकता है कि तुम्हारे पास कुछ अंश तक परमेश्वर के वचनों की समझ है। इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों को समझना इतना आसान नहीं है। सिर्फ इसलिए कि तुम परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की एक लच्छेदार और अतिश्योक्तिपूर्ण व्याख्या दे सकते हो, इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम इन्हें समझते हो। तुम चाहे उनके शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर पाओ, तुम्हारी व्याख्या तब भी मनुष्य की कल्पना और मनुष्य के सोचने के तरीके पर आधारित होगी। यह बेकार है! तुम परमेश्वर के वचनों को कैसे समझ सकते हो? मुख्य बात है उनके भीतर से सत्य खोजना। केवल इसी तरह तुम परमेश्वर के वचनों को सच में समझ सकते हो। परमेश्वर कभी भी खोखले शब्द नहीं बोलता। उसके द्वारा कथित प्रत्येक वाक्य में ऐसे विवरण निहित होते हैं जो उसके वचनों में निश्चित रूप से और अधिक उजागर किए जाने हैं, और वे अलग तरीके से व्यक्त किए जा सकते हैं। जिन तरीकों से परमेश्वर सत्य अभिव्यक्त करता है मनुष्य उसकी थाह नहीं पा सकता। परमेश्वर के कथन बहुत गहरे हैं और उन्हें मनुष्य की सोच से आसानी से नहीं समझा जा सकता। अगर लोग प्रयास करें, तो वे सत्य के हर पहलू का लगभग पूरा अर्थ जान सकते हैं। शेष बचे विवरण उनके बाद के अनुभव के दौरान, पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता द्वारा भरे जाने हैं। एक हिस्सा है परमेश्वर के वचनों पर चिंतन कर उन्हें समझना, उन्हें पढ़कर उनकी विशिष्ट विषयवस्तु खोजना। दूसरा हिस्सा अनुभव करके और पवित्र आत्मा से प्रबोधन प्राप्त करके परमेश्वर के वचनों के अर्थ को समझना है। इन दो पहलुओं में निरंतर प्रगति से, तुम परमेश्वर के वचनों को समझ सकते हो। यदि तुम इनका शाब्दिक अर्थ निकालोगे या अपनी सोच और कल्पनाओं से व्याख्या करोगे, तो आलंकारिक रूप से सजाकर व्याख्या करने पर भी तुम सत्य नहीं समझते और यह अब भी मानवीय सोच और कल्पनाओं पर ही आधारित होगा। यह पवित्र आत्मा के प्रबोधन से प्राप्त नहीं हुआ है। लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर परमेश्वर के वचनों की व्याख्या करने की ओर प्रवृत्त रहते हैं, वे परमेश्वर के वचनों की गलत व्याख्या भी कर सकते हैं, जिससे उनके परमेश्वर को गलत समझकर उसकी आलोचना करने की संभावना होती है, और यह कष्टप्रद है। इसलिए, सत्य मुख्यतः परमेश्वर के वचनों को समझने और पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किए जाने से प्राप्त होता है। परमेश्वर के वचनों का शाब्दिक अर्थ समझकर उसकी व्याख्या कर पाने का मतलब यह नहीं कि तुमने सत्य प्राप्त कर लिया है। अगर परमेश्वर के वचनों का शाब्दिक अर्थ समझने का मतलब यह हो कि तुमने सत्य समझ लिया है, तो तुम्हारे लिए केवल थोड़ी-बहुत शिक्षा और ज्ञान ही काफी है, फिर तुम्हें पवित्र आत्मा के प्रबोधन की क्या आवश्यकता है? क्या परमेश्वर के कार्य को इंसानी दिमाग समझ सकता है? इसलिए, सत्य समझना मानवीय धारणाओं या कल्पनाओं पर आधारित नहीं है। वास्तविक अनुभवजन्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए तुम्हें पवित्र आत्मा के प्रबोधन, प्रकाशन और मार्गदर्शन की आवश्यकता है। यह सत्य समझने और प्राप्त करने की प्रक्रिया है और यह एक आवश्यक शर्त भी है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 563

तुम मनुष्य की प्रकृति को कैसे समझते हैं? सबसे महत्वपूर्ण बात इसे मनुष्य की विश्वदृष्टि, जीवन के दृष्टिकोण और मूल्यों के परिप्रेक्ष्य से सूक्ष्मता से पहचानना है। जो लोग दानवों के हैं वे स्वयं के लिए जीते हैं। उनके जीवन के दृष्टिकोण और नीति-वाक्य मुख्यतः शैतान की कहावतों से आते हैं, जैसे कि “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” “मनुष्य धन के लिए मरता है, जैसे पक्षी भोजन के लिए मरते हैं,” और ऐसी अन्य भ्रांतियाँ। उन दानव राजाओं, महान हस्तियों और दार्शनिकों द्वारा बोले गए शब्द मनुष्य का जीवन बन गए हैं। विशेष रूप से, चीनी लोगों द्वारा “ऋषि” के रूप में प्रचारित किए जाने वाले कन्फ़्यूशियस के अधिकांश वचन, मनुष्य का जीवन बन गए हैं। ये बौद्ध धर्म और ताओवाद की मशहूर कहावतें, और प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा अक्सर दोहराई गई अनुकरणीय कहावतें हैं। ये सभी शैतान के फ़लसफों और शैतान की प्रकृति का सारांश हैं। वे शैतान की प्रकृति के सबसे अच्छे उदाहरण और स्पष्टीकरण भी हैं। ये विष, जिन्हें मनुष्य के हृदय में बैठा दिया गया है, सब शैतान से आते हैं, और उनमें से एक भी परमेश्वर से नहीं आता है। ये शैतानी वचन भी परमेश्वर के वचन के बिल्कुल विरुद्ध हैं। यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता परमेश्वर से आती है, और सभी नकारात्मक चीजें जो मनुष्य में विष भरती हैं, वे शैतान से आती हैं। इसलिए, तुम किसी व्यक्ति की प्रकृति को और वह किससे संबंधित है इस बात को उसके जीवन के दृष्टिकोण और मूल्यों को देखकर जान सकते हो। शैतान राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध एवं महान व्यक्तियों की शिक्षा और गहरे प्रभाव के माध्यम से लोगों को भ्रष्ट करता है। उनके शैतानी शब्द मनुष्य का जीवन और प्रकृति बन गए हैं। “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए” एक प्रसिद्ध शैतानी कथन है जो हर किसी में रिस चुका है और यह उसका जीवन बन गया है। सांसारिक आचरण के फलसफों के कुछ अन्य शब्द हैं जो इसी तरह के हैं। शैतान लोगों को शिक्षित करने, गुमराह करने और भ्रष्ट करने के लिए प्रत्येक देश की पारंपरिक संस्कृति का इस्तेमाल करता है, मानवजाति को विनाश की अतल खाई में गिराता है और अंत में, परमेश्वर द्वारा इसे नष्ट करा देता है क्योंकि वह शैतान की सेवा करती है और परमेश्वर का प्रतिरोध करती है। कुछ लोग समाज में दशकों से लोक अधिकारी रहे हैं। कल्पना करो कि तुम उनसे यह सवाल पूछते हो : “यह देखते हुए कि तुम एक अधिकारी बन पाए और तुम्हारा इतना सुगम करियर हो सका तो वे कौन-सी मशहूर कहावतें हैं जिनके बल पर तुमने यह हासिल किया?” वे शायद कहेंगे, “मैं तो बस एक ही बात समझता हूँ : ‘अधिकारी उपहार देने वालों के लिए मुश्किलें खड़ी नहीं करते, और जो चापलूसी नहीं करते हैं वे कुछ भी हासिल नहीं करते हैं।’” उन्होंने अधिकारी बनने के लिए इसी शैतानी फलसफे का सहारा लिया। क्या ये शब्द ऐसे लोगों की प्रकृति के परिचायक नहीं हैं? पद हासिल करने के लिए गलत हथकंडों का सहारा लेना उनकी प्रकृति बन गया है। एक ऐसा अधिकारी बनना जो सबसे अलग दिखे और तेजी से तरक्की पाए, यही उनका लक्ष्य है। लोगों के जीवन, क्रियाकलापों और स्व-आचरण में शैतान के और भी बहुत-से ज़हर हैं। उदाहरण के लिए, उनके सांसारिक आचरण के फलसफे, उनके काम करने के हथकंडे और उनके सूत्रवाक्य, ये सभी बड़े लाल अजगर के ज़हर से भरे हैं, और ये सब शैतान से आते हैं। इस प्रकार, वे सभी चीजें जो लोगों की हड्डियों और खून में समाई हुई हैं, शैतान की हैं। वे सभी अधिकारी, जो शक्ति रखते हैं, और जो कामयाब हैं, उन सभी के पास सफलता के अपने रास्ते और रहस्य होते हैं। क्या ऐसे रहस्य उनकी प्रकृति के पूर्ण परिचायक नहीं हैं? वे दुनिया में बड़े-बड़े उपक्रमों को कार्यान्वित करने में सक्षम हैं, और कोई भी उनके पीछे की साजिशों और दुरभिसंधियों की असलियत को नहीं देख पाता है। इससे पता चलता है कि उनकी प्रकृति कितनी कपटी और दुर्भावनापूर्ण है। शैतान ने मनुष्य को गंभीर ढंग से भ्रष्ट कर दिया है। शैतान का विष हर व्यक्ति के रक्त में बहता है, और यह कहा जा सकता है कि मनुष्य की प्रकृति भ्रष्ट, दुष्ट, प्रतिरोधात्मक और परमेश्वर के विरोध में है, शैतान के फलसफों और विषों से भरी हुई और उनमें डूबी हुई है। यह पूरी तरह शैतान का प्रकृति-सार बन गया है। इसी कारण लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं। अगर लोगों की प्रकृति का गहन-विश्लेषण इस तरह किया जा सके, तो वे आसानी से खुद को जानने की स्थिति में आ सकते हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 564

आत्म-चिंतन और स्वयं को जानने की कुंजी है : जितना अधिक तुम महसूस करते हो कि तुमने किसी निश्चित क्षेत्र में अच्छा किया है या सही चीज को कर लिया है, और जितना अधिक तुम सोचते हो कि तुम परमेश्वर के इरादों को पूरा कर सकते हो या तुम कुछ क्षेत्रों में शेखी बघारने में सक्षम हो, उतना ही अधिक उन क्षेत्रों में अपने आप को जानना उचित है, और यह देखने के लिए कि तुममें कौन-सी अशुद्धियाँ हैं और साथ ही तुममें कौन-सी चीजें परमेश्वर के इरादों को पूरा नहीं कर सकती हैं उतना ही अधिक उनमें खोजबीन करना उचित है। आओ, पौलुस का उदाहरण लें। पौलुस अत्यंत जानकार था, प्रचार और काम के दौरान उसने बहुत कष्ट उठाए और बहुत सारे लोग विशेष रूप से उसकी आराधना करते थे। नतीजतन, बहुत सारा काम पूरा करने के बाद, उसने मान लिया कि उसके लिए एक मुकुट पहले ही अलग करके रखा हुआ था। इससे वह गलत राह पर बढ़ते-बढ़ते बहुत दूर चला गया, और अंत में उसे परमेश्वर ने दंडित किया। यदि उसने उस समय आत्म-चिंतन किया होता और अपना गहन-विश्लेषण किया होता, तो उसने वे अहंकारी बातें नहीं कही होतीं जो विवेक से रहित थीं। सुसमाचार का प्रचार करने के अपने समय के दौरान पौलुस ने केवल कार्य करने पर ध्यान केंद्रित किया और सत्य का अनुसरण नहीं किया। पौलुस की पत्रियों से यह देखा जा सकता है कि उसने कभी प्रभु यीशु द्वारा बोले गए वचनों को नहीं खोजा या एकत्र नहीं किया, न ही उसने अपनी पत्रियों में प्रभु यीशु द्वारा बोले गए वचनों का प्रसार किया। जाहिर तौर पर, पौलुस ने कभी प्रभु यीशु के वचनों के भीतर आत्म-चिंतन नहीं किया, न ही उसने प्रभु यीशु के वचनों की बहुमूल्यता को देखा, इसलिए यह कहना कठिन है कि पौलुस को प्रभु यीशु का क्या सच्चा ज्ञान था। पौलुस ने केवल यह सोचा कि वह बाइबल को समझता है और केवल अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर विश्वास किया। उसने सोचा कि जब तक उसके पास कुछ अच्छे अभ्यास हैं और वह कुछ अच्छे व्यवहार प्रदर्शित करता है, वह परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर सकता है और परमेश्वर द्वारा पुरस्कृत किया जा सकता है। नतीजतन, वह परमेश्वर की सेवा करने और फिर भी उसका विरोध करने के मार्ग पर चल पड़ा। और फिर भी पिछले दो हजार वर्षों से प्रभु के विश्वासी उसका भेद नहीं पहचान पाए हैं। वे नहीं जानते कि पौलुस कौन था या वह किस मार्ग पर चला था। केवल इसलिए कि उसकी पत्रियाँ बाइबल में दर्ज की गई थीं, लोगों ने हमेशा पौलुस की पूजा की है, उसे अपने अनुसरण का लक्ष्य बनाया है और उसे एक ऐसा आदर्श माना है जिसकी वे आकांक्षा करते हैं और जिसके जैसा वे बनना चाहते हैं। नतीजतन, वे सभी जो पौलुस की पूजा और नकल करते हैं, मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चल पड़े हैं। पौलुस का मामला परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से प्रत्येक के लिए एक चेतावनी के रूप में कार्य करता है। विशेष रूप से जब हम, जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, अपने कर्तव्यों और परमेश्वर की अपनी सेवा में कष्ट सह सकते हैं और कीमत चुका सकते हैं और इस प्रकार महसूस करते हैं कि हम समर्पित हैं और हम ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं—ऐसे समय में, हमें उस मार्ग के संबंध में और भी अधिक आत्म-चिंतन करना चाहिए और खुद को समझना चाहिए जिस पर हम चल रहे हैं, जो कि बहुत आवश्यक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम यह निर्धारित करोगे कि जिन चीजों को तुम अपनी खूबियाँ मानते हो और जिन चीजों के बारे में तुम्हें लगता है कि तुमने सही तरीके से किया है वे सही हैं और तुम उन पर संदेह नहीं करोगे, उन पर विचार नहीं करोगे या यह गहन-विश्लेषण नहीं करोगे कि क्या उनमें ऐसा कुछ है जो परमेश्वर का विरोध करता है। उदाहरण के लिए, कुछ ऐसे लोग हैं जो खुद को बेहद नेकदिल मानते हैं। वे कभी दूसरों से नफरत या उनका नुकसान नहीं करते, और वे हमेशा ऐसे भाई या बहन की मदद करते हैं जिनका परिवार जरूरतमंद होता है, कहीं ऐसा न हो कि उनकी समस्या अनसुलझी रह जाए। उनके पास बहुत सद्भावना होती है और वे हर किसी की मदद करने की भरसक कोशिश करते हैं। फिर भी वे कभी सत्य का अभ्यास करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, और उनका कोई जीवन-प्रवेश नहीं होता। ऐसी मदद का परिणाम क्या है? वे अपने जीवन के लिए बाधा बनते हैं। फिर भी वे खुद से काफी प्रसन्न हैं, और उन सबसे बेहद संतुष्ट हैं जो उन्होंने किया है। इतना ही नहीं, वे इसमें बहुत गर्व का अनुभव करते हैं, यह विश्वास करते हुए कि उन्होंने जो कुछ भी किया है, उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो सत्य के विरुद्ध हो, और यह निश्चित रूप से परमेश्वर के इरादों को पूरा करेगा, और वे परमेश्वर के सच्चे विश्वासी हैं। वे अपनी स्वाभाविक सद्भावना को पूँजी के रूप में देखते हैं, वे इसे सत्य मानकर चलते हैं। वास्तव में, वे जो कुछ भी करते हैं, वह मानवीय भलाई है। वे सत्य का जरा भी अभ्यास नहीं करते, क्योंकि वे यह मनुष्य के सामने करते हैं, परमेश्वर के सामने नहीं, और वे परमेश्वर की अपेक्षाओं और सत्य के अनुसार अभ्यास तो बिल्कुल भी नहीं करते। इसलिए, उनका सब किया-धरा व्यर्थ हो जाता है। उनका कोई भी कार्य सत्य या परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं है, वह उसकी इच्छा का पालन तो बिल्कुल भी नहीं है; बल्कि वे मानवीय सद्भावना और अच्छे व्यवहार का उपयोग दूसरों की मदद करने के लिए करते हैं। संक्षेप में, वे अपने कार्यों में परमेश्वर के इरादे नहीं खोजते, न ही वे उसकी अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करते हैं। परमेश्वर मनुष्य के ऐसे अच्छे व्यवहार को स्वीकृति नहीं देता; परमेश्वर के लिए यह निंदनीय है, और परमेश्वर द्वारा स्मरण किए जाने योग्य नहीं है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 565

स्वभाव में बदलाव लाने की कुंजी अपनी प्रकृति को जानना है और यह परमेश्वर के प्रकाशन के अनुसार ही होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचनों में ही व्यक्ति अपनी घिनौनी प्रकृति, अपनी प्रकृति के भीतर छिपे शैतान के विभिन्न विषों, अपनी मूर्खता और अज्ञानता, और अपनी प्रकृति के कमजोर और नकारात्मक तत्वों को जान सकता है। इन बातों को तुम्हारे पूरी तरह से जानने के बाद, और तुम्हारे सच में खुद से नफरत करने, देह से विद्रोह करने, परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने में लगे रहने, स्वभाव में बदलाव लाने के लिए अपना कर्तव्य निभाते हुए सत्य के अनुसरण में लगे रहने और सच में परमेश्वर से प्रेम करने वाले व्यक्ति बनने में सक्षम हो जाने के बाद, तुम पतरस के मार्ग पर चल पड़े होगे। परमेश्वर के अनुग्रह या पवित्रात्मा से मिलने वाले प्रबोधन और मार्गदर्शन के बिना, इस मार्ग पर चलना मुश्किल होगा, क्योंकि सत्य के बिना, लोग खुद से विद्रोह नहीं कर सकते। पतरस के पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर चलना मुख्य रूप से संकल्प रखने, आस्था रखने और परमेश्वर पर निर्भर रहने पर निर्भर करता है। इसके अलावा, व्यक्ति को पवित्रात्मा के कार्य के प्रति समर्पण करना चाहिए और सभी चीजों में, परमेश्वर के वचनों से कभी भी भटकना नहीं चाहिए। ये वे महत्वपूर्ण पहलू हैं जिनका कभी भी उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए। अपने अनुभवों के दौरान, खुद को जानना बहुत मुश्किल होता है और पवित्रात्मा के कार्य के बिना, कोई परिणाम नहीं मिलेगा। पतरस के मार्ग पर चलने के लिए, व्यक्ति को खुद को जानने और अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। पौलुस का मार्ग जीवन का अनुसरण करने या आत्म-ज्ञान पर ध्यान केंद्रित करने का नहीं था, बल्कि काम करने पर और किए गए काम की भव्यता और प्रतिष्ठा पर विशेष ध्यान देने का मार्ग था। उसका इरादा अपने काम और कष्ट के बदले में परमेश्वर के आशीष और पुरस्कार पाने का था। यह इरादा गलत था। पौलुस ने जीवन पर ध्यान केंद्रित नहीं किया, न ही उसने अपने स्वभाव के बदलाव को कोई महत्व दिया। उसने केवल पुरस्कारों पर ध्यान केंद्रित किया। जिस लक्ष्य का उसने अनुसरण किया, वह गलत था; स्वाभाविक रूप से, फिर जिस मार्ग पर वह चला, वह भी गलत था। यह उसकी घमंडी और दंभी प्रकृति के कारण हुआ। स्पष्ट रूप से, पौलुस में जरा भी सत्य नहीं था, न ही उसमें कोई जमीर या विवेक था। लोगों को बचाने और बदलने में, परमेश्वर मुख्य रूप से उनके स्वभाव को बदलता है। परमेश्वर के वचनों का उद्देश्य लोगों के स्वभाव में परिवर्तन लाना है और लोगों को उसे जानने और उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम बनाना है और एक सामान्य तरीके से उसकी आराधना करने में सक्षम बनाना है। यही परमेश्वर के वचनों और कार्य का उद्देश्य है। पौलुस का अनुसरण करने का तरीका सीधे तौर पर परमेश्वर के इरादों के विरुद्ध और उनके साथ टकराव में था। यह पूरी तरह से उनके विपरीत था। हालाँकि, पतरस का अनुसरण करने का तरीका पूरी तरह से परमेश्वर के इरादों के अनुरूप था। पतरस ने जीवन पर और स्वभाव में बदलाव पर ध्यान केंद्रित किया, जो कि वास्तव में वही है जो परमेश्वर अपने कार्य से लोगों में पूरा करना चाहता है। इसलिए, पतरस का मार्ग परमेश्वर द्वारा धन्य और स्वीकृत था, जबकि पौलुस का मार्ग ठीक वही था जिससे परमेश्वर घृणा करता था और जिसे शाप देता था क्योंकि वह उसके इरादों के विपरीत था। पतरस के मार्ग पर चलने के लिए, व्यक्ति को परमेश्वर के इरादों को जानना होगा। वे किस मार्ग का अनुसरण करें, इसकी सटीक समझ उन्हें तभी हो सकती है जब वे उसके वचनों के माध्यम से परमेश्वर के इरादों को पूरी तरह से समझने में सक्षम हों—जिसका अर्थ यह समझना है कि परमेश्वर इंसान में क्या पूरा करना चाहता है और अंततः, वह किस तरह के परिणाम हासिल करना चाहता है। अगर तुम पतरस का मार्ग पूरी तरह से नहीं समझते और केवल उसका अनुगमन करना चाहते हो, तो तुम उस पर चल नहीं पाओगे। दूसरे शब्दों में, तुम बहुत सारे धर्म-सिद्धांत जान सकते हो, लेकिन अंततः, तुम वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाओगे। भले ही तुम थोड़ा-बहुत सतही प्रवेश पा भी लो, तुम कोई वास्तविक परिणाम हासिल नहीं कर पाओगे।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 566

अधिकतर लोगों को अपनी बहुत सतही समझ होती है। वे अपनी प्रकृति के भीतर की चीजों को बिल्कुल भी साफ तौर पर नहीं जानते। उन्हें अपने द्वारा प्रकट की जाने वाली कुछ भ्रष्ट दशाओं, अपने द्वारा संभावित रूप से की जाने वाली चीजों या अपनी कमियों की जानकारी होती है और इससे उन्हें लगता है कि वे खुद को जानते हैं। फिर अगर वे कुछ विनियमों का पालन कर लेते हैं, यह सुनिश्चित कर लेते हैं कि वे कुछ क्षेत्रों में गलतियाँ न करें, और कुछ अपराध करने से बच जाते हैं, तो वे सोचने लगते हैं कि परमेश्वर में उनके विश्वास में वास्तविकता है और मान लेते हैं कि वे बचा लिए जाएँगे। यह सिर्फ इंसानी कल्पना है, और कुछ नहीं। अगर तुम उन चीजों का पालन करते हो, तो क्या तुम सच में अपराध करने से बचने में समर्थ हो जाओगे? क्या तुमने सच में अपने स्वभाव में कोई बदलाव प्राप्त कर लिया होगा? क्या तुम सच में एक मानव के समान जी लिए होगे? क्या तुम सच में परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे? बिल्कुल नहीं। यह निश्चित है। लोगों के पास परमेश्वर में विश्वास करने का एक ऊँचा मानक अवश्य होना चाहिए : उन्हें अवश्य सत्य प्राप्त करना और अपने जीवन स्वभाव में कुछ बदलाव लाना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि लोग खुद को जानने की कोशिश करें। अगर किसी व्यक्ति का खुद के बारे में ज्ञान बहुत उथला है, तो इससे कोई भी समस्या कतई हल नहीं होगी और उसका जीवन स्वभाव बिल्कुल नहीं बदलेगा। तुम्हें खुद को बहुत गहराई से जानना होगा। इसका मतलब है अपनी प्रकृति को जानना, यह जानना कि उसमें कौन-से तत्व शामिल हैं, ये चीजें कहाँ से पैदा होती हैं और कहाँ से आती हैं। इसके अलावा, क्या तुम सच में इन चीजों से नफरत करने में समर्थ हो? क्या तुमने अपनी बदसूरत आत्मा और अपनी दुष्ट प्रकृति को देखा है? अगर तुम सच में अपनी सच्चाई देख लो, तो तुम खुद से नफरत करने लगोगे। जब तुम खुद से नफरत करते हो और फिर परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने की कोशिश करते हो, तो तुम देह से विद्रोह कर पाओगे और सत्य का अभ्यास करने की ताकत पा लोगे, और तब यह संघर्ष जैसा महसूस नहीं होगा। कई लोग अपनी दैहिक पसंद के अनुसार काम क्यों करते हैं? क्योंकि वे खुद को काफी अच्छा समझते हैं और महसूस करते हैं कि उनके काम काफी उचित और जायज हैं, उनमें कोई त्रुटि नहीं है और यहाँ तक कि वे पूरी तरह से सही हैं और इसलिए वे पूरी आत्म-निश्चितता से काम करते हैं। जब वे सच में जान लेंगे कि उनकी प्रकृति कैसी है—यह कितनी बदसूरत, घिनौनी और दयनीय है—तो वे खुद को इतना बड़ा समझना और इतना घमंड करना बंद कर देंगे और वे खुद से इतने खुश नहीं रहेंगे। वे सोचेंगे, “मुझे जमीन से जुड़े रहकर परमेश्वर के कुछ वचनों का अभ्यास करना चाहिए। वरना, मैं मानव होने के मानक पर खरा नहीं उतरूँगा और परमेश्वर के सामने जीने में मुझे शर्म आएगी।” वे सच में खुद को छोटा और नितांत तुच्छ समझेंगे। इस मुकाम पर, उनके लिए सत्य का अभ्यास करना आसान हो जाएगा और वे कुछ-कुछ वैसे दिखने लगेंगे जैसा एक इंसान को दिखना चाहिए। जब कोई व्यक्ति सच में खुद से नफरत करता है, केवल तभी वह देह से विद्रोह कर पाता है। अगर वह खुद से नफरत नहीं करता, तो वह देह से विद्रोह नहीं कर पाएगा। खुद से सचमुच नफरत करना कोई आसान मामला नहीं है। इसके लिए व्यक्ति को कुछ सत्य समझने की आवश्यकता होती है : सबसे पहले उन्हें अपनी प्रकृति का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। दूसरे, उसे यह देखना चाहिए कि वह दीन-हीन और दयनीय है, वह अत्यंत छोटा और तुच्छ है, और उसे अपनी दयनीय, गंदी आत्मा को देखना चाहिए। जब वह पूरी तरह से देख लेता है कि वह असल में क्या है—जब यह नतीजा हासिल हो जाता है—तो उसे सच में खुद का ज्ञान मिलता है और तब कहा जा सकता है कि खुद के बारे में उसका ज्ञान बिल्कुल सटीक है। केवल इस मुकाम पर वह खुद से नफरत कर सकता है, यहाँ तक कि खुद को कोस सकता है और सच में यह महसूस कर सकता है कि शैतान ने इंसानों को इतनी गहराई तक भ्रष्ट कर दिया है कि वे किसी भी मानवीय स्वरूप से रहित हैं। एक दिन, अगर उस पर सच में मौत का खतरा मँडराएगा, तो वह सोचेगा, “यह परमेश्वर का धार्मिक दंड है। परमेश्वर सच में धार्मिक है। मैं मरने के ही लायक हूँ!” इस मुकाम पर, वह अपनी कोई शिकायत व्यक्त नहीं करेगा, परमेश्वर की शिकायत करने की तो बात ही दूर है—वह सिर्फ यह महसूस करेगा कि वह अत्यंत दीन-हीन, दयनीय, गंदा और भ्रष्ट है और उसे परमेश्वर द्वारा हटाकर नष्ट कर दिया जाना चाहिए और वह महसूस करेगा कि उसकी जैसी आत्मा इस धरती पर जीने के लायक नहीं है। इसलिए, वह परमेश्वर की शिकायत या उसका प्रतिरोध नहीं करेगा और उसे धोखा देने का तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन अगर वह खुद को नहीं जानता और अब भी खुद को काफी अच्छा समझता है, तो जब मौत का खतरा करीब आएगा, तो वह सोचेगा, “मैंने अपनी आस्था में बहुत अच्छा किया है। मैंने इतनी मेहनत से सत्य का अनुसरण किया है, इतना कुछ त्यागा है और इतने कष्ट सहे हैं, लेकिन आखिर में, परमेश्वर मुझे मरने दे रहा है। मुझे नहीं पता कि परमेश्वर की धार्मिकता कहाँ है। वह मुझे क्यों मरने दे रहा है? अगर मुझ जैसा इंसान भी मरेगा, तो फिर कौन बचाया जा सकेगा? क्या पूरी मानवजाति का अंत नहीं हो गया?” सबसे पहले, उसके मन में परमेश्वर को लेकर धारणाएँ बनेंगी। दूसरे, वह परमेश्वर की शिकायत करेगा और उसमें जरा भी समर्पण नहीं होगा। वह बिल्कुल पौलुस की तरह है, जो मरते दम तक खुद को नहीं जान पाया। जब परमेश्वर का दंड उन पर आएगा, तब बहुत देर हो चुकी होगी।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 567

सटीक रूप से, अपने विश्वास में पतरस के मार्ग को अपनाने का अर्थ है, सत्य को खोजने के मार्ग पर चलना, जो वास्तव में स्वयं को जानने और अपने स्वभाव को बदलने का मार्ग भी है। केवल पतरस के मार्ग पर चलने के द्वारा ही कोई परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर होगा। किसी को भी इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि वास्तव में कैसे पतरस के मार्ग पर चलना है साथ ही कैसे इसे अभ्यास में लाना है। पहले तो, किसी को भी अपने स्वयं के इरादों, अनुचित प्रयासों, और यहाँ तक कि अपने परिवार और अपनी स्वयं की देह की सभी चीजों को एक ओर रखना होगा। एक व्यक्ति को पूर्ण हृदय से समर्पित अवश्य होना चाहिए, अर्थात्, स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों में सत्य और उसकी आकांक्षाओं की खोज पर अवश्य ध्यान केंद्रित करना चाहिए, और हर चीज में परमेश्वर के इरादों को समझने का प्रयास करना चाहिए। यह अभ्यास की सबसे बुनियादी और प्राणाधार पद्धति है। यह वही था जो पतरस ने यीशु को देखने के बाद किया था, और केवल इस तरह से अभ्यास करने से ही कोई सबसे अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर के वचन के प्रति हार्दिक समर्पण में मुख्यतः परमेश्वर के वचनों में सत्य और उसके आकांक्षाओं की खोज करना, परमेश्वर के इरादों को समझने पर ध्यान केंद्रित करना, और परमेश्वर के वचनों से सत्य को समझना व और अधिक प्राप्त करना शामिल है। परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, पतरस ने सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था और धर्म-विद्या का ज्ञान प्राप्त करने पर तो उसका ध्यान और भी केंद्रित नहीं था। इसके बजाय, उसने सत्य को समझने और परमेश्वर के इरादों पर पकड़ बनाने पर, साथ ही परमेश्वर के स्वभाव और मनोहरता का ज्ञान प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित किया। पतरस ने परमेश्वर के वचनों से मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट दशाओं, मनुष्य के प्रकृति सार और मनुष्य की वास्तविक कमियों को जानने का भी प्रयास किया। केवल इसी तरीके से वह परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उसकी अपेक्षाओं को आसानी से पूरा कर सकता था। जब परमेश्वर के वचनों की बात आती थी तो पतरस के पास बहुत-से सटीक अभ्यास थे। यह परमेश्वर के इरादों के सर्वाधिक अनुरूप था, और यह वो सर्वोत्तम तरीका था जिससे कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए सहयोग कर सकता था। परमेश्वर के भेजे हुए सैकड़ों परीक्षणों का अनुभव करते समय पतरस मनुष्य का न्याय और उसे उजागर करने वाले परमेश्वर के हर वचन और मनुष्य से उसकी माँगों के हर वचन से सख्ती से अपना मिलान करता था, स्वयं को जाँचता था और परमेश्वर के वचनों का अर्थ ठीक-ठीक समझने का प्रयास करता था। यीशु उससे जो कुछ कहता था, उस पर वह गंभीरता से मनन करता था, हर वचन को मन में दृढ़ता से धारण करता था—और इस तरीके से बहुत अच्छे परिणाम मिलते थे। इस तरीके से अभ्यास कर उसने परमेश्वर के वचनों के जरिए स्वयं को जान लिया और वह न केवल मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट दशाओं और कमियों को जान गया, बल्कि वह मनुष्य के सार और प्रकृति को भी जान गया। खुद को वास्तव में जानना यही होता है। परमेश्वर के वचनों से पतरस ने एक ओर अपने बारे में सच्चा ज्ञान हासिल किया और दूसरी ओर उसने देखा परमेश्वर द्वारा व्यक्त धार्मिक स्वभाव, जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, परमेश्वर के अपने कार्य के लिए इरादे और मानवजाति से परमेश्वर की माँगें। इन वचनों से उसने परमेश्वर को सच में जाना, उसका स्वभाव और उसका सार उसे पता चला; जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, वे बातें उसने जानीं और समझीं, साथ ही परमेश्वर की मनोहरता और मनुष्य से परमेश्वर की माँगें भी जानीं। भले ही परमेश्वर ने उस समय उतना नहीं बोला, जितना आज वह बोलता है, किन्तु पतरस में इन पहलुओं में परिणाम उत्पन्न हुआ था। यह एक दुर्लभ और बहुमूल्य चीज थी। पतरस सैकड़ों परीक्षणों से गुजरा; उसका कष्ट सहना व्यर्थ नहीं गया। न केवल उसने परमेश्वर के वचनों और कार्यों से स्‍वयं को जाना बल्कि उसने परमेश्वर को भी जान लिया। इसके साथ ही, परमेश्वर के वचनों में पतरस ने विशेष रूप से मनुष्य से परमेश्वर की माँगों पर और उन पहलुओं पर ध्यान दिया जिनमें मनुष्य को परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए ताकि वह परमेश्वर के इरादे के अनुसार हो सके, और वह इन बातों में अत्यधिक प्रयास लगाने में समर्थ रहा और उनमें उसे पूरी स्पष्टता प्राप्त हुई। उसके जीवन प्रवेश के लिए यह अत्‍यंत लाभकारी था। परमेश्वर के वचनों का चाहे कोई भी पहलू हो, अगर वे वचन जीवन के रूप में कार्य करने योग्य थे और सत्य थे, तो पतरस उन्हें अपने हृदय में उकेर लेता था, जहाँ वह अक्सर उन पर विचार करता और उन्हें समझता था। यीशु के वचनों को सुनकर, वह उन्‍हें अपने हृदय में उतार सका, जिससे पता चलता है कि उसका ध्‍यान विशेष रूप से परमेश्वर के वचनों पर ही था, और अंत में उसने वास्‍तव में परिणाम प्राप्‍त कर लिए। अर्थात्, वह परमेश्वर के वचनों को कुशलतापूर्वक अभ्यास में ला सका, वह सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य सटीक ढंग से कर सका, वह पूरी तरह परमेश्वर की इच्छाओं के अनुसार कार्य कर सका और अपने निजी मतों और कल्पनाओं का त्याग कर सका। इस तरीके से पतरस ने परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश किया। पतरस की सेवा परमेश्वर के इरादों के अनुसार मुख्यतः इसीलिए थी क्‍योंकि उसने ऐसा किया था।

यदि कोई अपना कर्तव्य करते हुए परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है, और अपने शब्दों और क्रियाकलापों में सिद्धांत पर चलता है और सत्य के समस्त पहलुओं की वास्तविकता में प्रवेश करता है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के कार्य और उसके वचनों ने उन पर पूरी तरह से प्रभाव प्राप्त कर लिया है : परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन गए हैं, और उन्होंने सत्य प्राप्त कर लिया है, और वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने में समर्थ हैं। इसके बाद, उनके देह की प्रकृति—अर्थात्, उनके अस्तित्व की मूल नींव—हिलकर अलग हो जाएगी और ढह जाएगी। जब लोग परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में धारण कर लेंगे, केवल तभी वे नए लोग बनेंगे। अगर परमेश्वर के वचन लोगों का जीवन बन जाते हैं; परमेश्वर के कार्य का दर्शन, उसका प्रकाशन और मानवता से उसकी अपेक्षाएँ, और मानव जीवन के वे मानक जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि वे प्राप्त करें, लोगों का जीवन बन जाते हैं, अगर लोग इन वचनों और सत्यों के अनुसार जीते हैं, तो वे परमेश्वर के वचनों द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के माध्यम से पुनर्जन्म लेते हैं और नए लोग बन गए हैं। यह वह मार्ग है जिसके द्वारा पतरस ने सत्य का अनुसरण किया। यह पूर्ण बनाए जाने का मार्ग है। पतरस परमेश्वर के वचनों द्वारा पूर्ण बनाया गया था, उसने परमेश्वर के वचनों से जीवन प्राप्त किया, परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य उसका जीवन बन गया, और तब जाकर वह ऐसा व्यक्ति बन गया जिसने सत्य को प्राप्त किया।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 568

इससे पहले कि लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करें और सत्य को समझें, शैतान की प्रकृति नियंत्रण सँभाल लेती है और उन पर भीतर से प्रभुत्व जमाती है। उस प्रकृति में विशिष्ट रूप से क्या शामिल होता है? उदाहरण के लिए, तुम स्वार्थी क्यों हो? तुम अपने रुतबे की रक्षा क्यों करते हो? तुम अपनी भावनाओं से इतने प्रभावित क्यों होते हो? तुम उन अधार्मिक और बुरी चीजों को क्यों पसंद करते हो? तुम्हें ऐसी चीजें पसंद आने का आधार क्या है? ये चीजें कहाँ से आती हैं? तुम इन्हें पसंद और स्वीकार क्यों करते हो? अब तक, तुम सब लोगों ने यह समझ लिया है : मुख्य कारण यह है कि मनुष्य के भीतर शैतान के जहर भरे हैं। तो शैतान के जहर क्या हैं? इन्हें कैसे व्यक्त किया जा सकता है? उदाहरण के लिए, यदि तुम पूछते हो, “लोगों को कैसे जीना चाहिए? लोगों को किसलिए जीना चाहिए?” तो सभी जवाब देंगे, “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।” बस यह अकेला वाक्यांश समस्या की जड़ को व्यक्त करता है। शैतान का फलसफा और तर्क लोगों का जीवन बन गए हैं। लोग चाहे जिसका भी अनुसरण करें, वास्तव में वे यह अपने लिए ही करते हैं—और इसलिए वे सभी अपने लिए जीते हैं। “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए”—यही मनुष्य का जीवन-दर्शन है, और इंसानी प्रकृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। ये शब्द पहले ही भ्रष्ट इंसान की प्रकृति बन गए हैं, और वे भ्रष्ट इंसान की शैतानी प्रकृति की सच्ची तस्वीर हैं। यह शैतानी प्रकृति पूरी तरह से भ्रष्ट मानवजाति के अस्तित्व का आधार बन चुकी है। कई हजार सालों से वर्तमान दिन तक भ्रष्ट मानवजाति ने शैतान के इस जहर के अनुसार जीवन जिया है। शैतान का हर काम अपनी आकांक्षाओं, महत्वाकांक्षाओं और उद्देश्यों के लिए होता है। वह परमेश्वर से आगे जाना चाहता है, परमेश्वर से मुक्त होना चाहता है और परमेश्वर द्वारा रची गई सभी चीजों पर नियंत्रण पाना चाहता है। आज लोग शैतान द्वारा इस हद तक भ्रष्ट कर दिए गए हैं। उन सभी में शैतानी प्रकृति है, उनमें परमेश्वर को नकारने और उसका विरोध करने की प्रवृत्ति होती है और वे अपने भाग्य का नियंत्रण अपने हाथों में रखना चाहते हैं; वे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं का विरोध करने की कोशिश करते हैं। उनकी महत्वाकांक्षाएँ और आकांक्षाएँ पहले से ही बिल्कुल शैतान की महत्वाकांक्षाओं और आकांक्षाओं जैसी हैं। इसलिए, मनुष्यों की प्रकृति शैतान की प्रकृति है। वास्तव में, लोगों के बहुत-से नीति-वाक्य और सूक्तियाँ मानव प्रकृति को दर्शाती हैं और मनुष्य के भ्रष्ट सार को प्रतिबिंबित करती हैं। लोग जो चीजें चुनते हैं वे उनकी अपनी पसंद को दर्शाती हैं और वे सभी लोगों के स्वभावों और अनुसरणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इंसान जो कुछ कहता और करता है, उसका भेष कितना भी बदला हुआ क्यों न हो, यह भेष उसकी प्रकृति नहीं छिपा सकता। जैसे, फरीसी आमतौर पर बहुत अच्छा उपदेश देते थे, लेकिन जब उन्होंने यीशु द्वारा व्यक्त धर्मोपदेश और सत्य सुने, तो उन्हें स्वीकारने के बजाय उनकी निंदा करने लगे। इसने फरीसियों के सत्य से विमुख होने और घृणा करने वाले प्रकृति सार को उजागर कर दिया। कुछ लोग बहुत अच्छा बोलते हैं और खुद को बहुत अच्छे से छिपा लेते हैं, लेकिन जब अन्य लोग कुछ समय के लिए उनसे जुड़ते हैं, तो वे जान जाते हैं कि वे लोग प्रकृति में अत्यंत धोखेबाज हैं और ज़रा भी ईमानदार नहीं हैं। लंबे समय तक उन लोगों के साथ जुड़ने के बाद, उन्हें उनके प्रकृति सार का पता चल जाता है। अंत में, वे यह निष्कर्ष निकालते हैं : वे लोग कभी एक शब्द भी सच नहीं बोलते और वे धोखेबाज हैं। यह कथन उन लोगों की प्रकृति को दर्शाता है और यह उनके प्रकृति सार का सर्वोत्तम चित्रण और सबूत है। सांसारिक आचरण का उनका फलसफा है किसी को सच न बताना, और साथ ही किसी पर विश्वास न करना। मनुष्य की शैतानी प्रकृति बड़ी मात्रा में शैतान के फलसफों और विषों से युक्त है। कभी-कभी तुम खुद भी उनसे अनजान होते हो। यदि तुम सत्य को नहीं समझते, तो तुम शैतान के स्वभाव का भेद नहीं पहचान सकते। और फिर भी, तुम हर दिन हर मिनट शैतान के स्वभाव के अनुसार जी रहे हो और तुम सोचते हो कि यह काफी सही और उचित है, यह बिल्कुल भी गलत नहीं है। यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि जब तुम शैतान के फलसफों के अनुसार जीते हो, तो तुम शैतान के स्वभाव के अनुसार जी रहे हो, और यह कि शैतान के फलसफे और स्वभाव तुम्हारी प्रकृति बन गए हैं। अक्सर, लोग शैतान के फलसफों के अनुसार जीते हैं लेकिन फिर भी इसे बहुत अच्छा मानते हैं और उनमें पश्चात्ताप की कोई भावना नहीं होती है। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग सत्य को नहीं समझते। इसलिए, वे हर मोड़ पर लगातार अपनी शैतानी प्रकृति प्रकट कर रहे हैं और वे हर मोड़ पर लगातार शैतान के फलसफों के अनुसार जी रहे हैं। शैतान की प्रकृति मनुष्य का जीवन है और यह मनुष्य का प्रकृति सार है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 569

तुम लोगों को अब स्वयं द्वारा प्रकट किए जाने वाले भ्रष्ट स्वभाव का थोड़ा-बहुत भेद पहचानने को मिला है। जब तुम यह स्पष्ट रूप से देख सकते हो कि साधारण परिस्थितियों में तुम अब भी कौन-से भ्रष्ट स्वभाव प्रकट कर सकते हो और तुम्हारे अभी भी ऐसी कौन-सी चीजें करने की संभावना है जो सत्य के अनुरूप नहीं हैं, तब अपने भ्रष्ट स्वभावों को शुद्ध करना आसान होगा। क्यों, कई मामलों में, लोग खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाते? क्योंकि हर समय, और हर तरह से, वे अपने भ्रष्ट स्वभावों के नियंत्रण में होते हैं, जो उन्हें सभी चीजों में विवश और परेशान करते हैं। जब सब कुछ अच्छा चल रहा होता है, और वे लड़खड़ाते नहीं या नकारात्मक नहीं होते, तो कुछ लोग हमेशा यह महसूस करते हैं कि उनके पास आध्यात्मिक कद है, और जब किसी कुकर्मी, झूठे अगुआ या किसी मसीह-विरोधी का खुलासा कर उसे निकाला जाता है, तो यह देखकर वे इसे कोई गंभीर बात नहीं मानते। वे सभी के सामने यह शेखी भी बघारते हैं कि, “कोई भी लड़खड़ा सकता है, लेकिन मैं नहीं। हो सकता है कि कोई और परमेश्वर से प्रेम न करे, लेकिन मैं करता हूँ।” उन्हें लगता है कि वे किसी भी स्थिति या हालात में अपनी गवाही पर अडिग रह सकते हैं। फिर भी अंत में एक दिन आता है जब उनका परीक्षण किया जाता है और वे परमेश्वर के बारे में शिकायत करते और कुड़कुड़ाते हैं। क्या यह विफल होना नहीं है, क्या यह लड़खड़ाना नहीं है? कोई चीज ऐसी नहीं है जो परीक्षणों की तुलना में लोगों का अधिक खुलासा करती हो। परमेश्वर इंसान के अंतरतम हृदय की पड़ताल करता है, और लोगों को किसी भी समय डींग नहीं मारनी चाहिए। वे जिस चीज के बारे में डींग मारते हैं, वहीं देर-सबेर, एक दिन वे लड़खड़ाएँगे। दूसरों को लड़खड़ाते और किसी परिस्थिति में असफल होते देखकर वे इसे कोई गंभीर बात नहीं मानते, और यहाँ तक सोचते हैं कि वे खुद विफल नहीं हो सकते, कि वे मजबूती से खड़े हो सकेंगे—लेकिन उस परिस्थिति में वे खुद भी लड़खड़ा जाते और असफल हो जाते हैं। यह कैसे हो सकता है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोग अपने प्रकृति सार को पूरी तरह से नहीं समझते; अपने प्रकृति सार की समस्याओं के बारे में उनके ज्ञान की गहराई अभी भी अपर्याप्त है, इसलिए सत्य को अभ्यास में लाना उनके लिए बहुत कठिन है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग बहुत धोखेबाज होते हैं, और अपनी कथनी-करनी में बेईमान होते हैं, लेकिन अगर तुम उनसे पूछो कि उनका भ्रष्ट स्वभाव किस संबंध में सबसे गंभीर है, तो वे कहेंगे, “मैं थोड़ा धोखेबाज हूँ।” वे केवल इतना कहते हैं कि वे थोड़े धोखेबाज हैं, लेकिन वे यह नहीं कहते कि उनकी प्रकृति ही धोखा देने की है, और वे यह नहीं कहते कि वे धोखेबाज हैं। अपनी भ्रष्ट अवस्था के बारे में उनका ज्ञान उतना गहरा नहीं होता, और वे उसे उतना गंभीर नहीं मानते और न ही उतना पूर्ण मानते हैं, जितना दूसरे मानते हैं। दूसरे लोगों के परिप्रेक्ष्य से, यह व्यक्ति बहुत धोखेबाज और बहुत कुटिल है, और उसके हर शब्द में चाल है, उसकी बातें और कार्य कभी ईमानदार नहीं होते—लेकिन वह व्यक्ति खुद को इतनी गहराई से नहीं जान पाता। यहाँ तक कि जब उसके पास कुछ ज्ञान होता है तो भी, वह केवल सतही होता है। जब भी वह बोलता और कार्य करता है, तो वह अपनी प्रकृति का कुछ भाग प्रकट करता है, लेकिन वह इससे अनजान होता है। वह मानता है कि उसका इस तरह से कार्य करना भ्रष्टता का खुलासा करना नहीं है, उसे लगता है कि वह पहले ही सत्य को अभ्यास में ला चुका है—लेकिन देखने वालों के लिए यह व्यक्ति बहुत कुटिल और धोखेबाज बना रहता है और इसकी बातें और काम गहरे तौर पर बेईमानी से भरे रहते हैं। कहने का अर्थ यह है कि लोगों को अपनी प्रकृति की बहुत सतही समझ होती है, और उनकी इस समझ तथा परमेश्वर के उन वचनों के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है, जो उनका न्याय कर उन्हें उजागर करते हैं। परमेश्वर जो उजागर करता है उसमें कोई गलती नहीं है, बल्कि इंसान अपनी ही प्रकृति को भली-भाँति गहराई से नहीं समझता। लोगों को स्वयं की मौलिक या सारभूत समझ नहीं है; इसके बजाय, वे अपने कार्यों और बाहरी खुलासों को जानने पर ध्यान केंद्रित करते और अपनी ऊर्जा लगाते हैं। भले ही कुछ लोग कभी कभार अपने आत्मज्ञान के बारे में कुछ कहने में समर्थ हों, यह बहुत अधिक गहरा नहीं होगा। किसी ने कभी भी नहीं सोचा है कि कोई एक काम करने या कोई चीज प्रकट करने के कारण वह एक निश्चित प्रकार का व्यक्ति है या उसकी एक निश्चित प्रकार की प्रकृति है। परमेश्वर ने मनुष्य की प्रकृति और सार को उजागर कर दिया है, लेकिन लोग समझते हैं कि उनके चीजों को करने के तरीके और बोलने के तरीके दोषपूर्ण और खराब हैं; नतीजतन, उनके लिए सत्य को अभ्यास में लाना अपेक्षाकृत अधिक मेहनत का काम होता है। लोग सोचते हैं कि उनकी गलतियाँ बस लापरवाही से प्रकट क्षणिक अभिव्यक्तियाँ हैं, न कि उनकी प्रकृति के खुलासे हैं। जब लोग इस तरह से सोचते हैं, तो उनके लिए स्वयं को वास्तव में जानना बहुत कठिन हो जाता है, और उनके लिए सत्य को समझना और उसका अभ्यास करना बहुत कठिन हो जाता है। चूँकि वे सत्य नहीं जानते और उनमें उसके लिए प्यास नहीं होती, इसलिए सत्य को अभ्यास में लाते समय वे केवल अनमने ढंग से विनियमों का पालन करते हैं। लोग अपनी स्वयं की प्रकृति को बहुत बुरा नहीं मानते हैं, और उन्हें नहीं लगता है कि वे इतने बुरे हैं कि उन्हें नष्ट या दंडित करने की माँग की जाए। लेकिन परमेश्वर के मानकों के अनुसार, लोग अत्यधिक गहराई तक भ्रष्ट कर दिए गए हैं, वे अभी भी उद्धार के मानकों से दूर हैं, क्योंकि लोगों के पास केवल कुछ तरीके हैं जो बाहर से सत्य का उल्लंघन करते नहीं प्रतीत होते, जबकि वस्तुतः वे सत्य का अभ्यास नहीं करते और परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं होते।

लोगों के व्यवहार या आचरण में बदलाव का अर्थ उनकी प्रकृति में बदलाव नहीं है। इसका कारण यह है कि लोगों के आचरण में बदलाव मौलिक रूप से उनके मूल स्वरूप को नहीं बदल सकते, उनकी प्रकृति को तो वे बिल्कुल भी नहीं बदल सकते। केवल जब लोग सत्य समझते हैं, अपने प्रकृति सार को जानते हैं, और सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम होते हैं, तभी उनका अभ्यास पर्याप्त रूप से गहरा, और कुछ तय विनियमों का पालन करने से भिन्न हो सकता है। आज जिस तरह से लोग सत्य का अभ्यास करते हैं वह अभी भी मानक स्तर पर नहीं पहुँचा है और यह वह सब पूरी तरह हासिल नहीं कर सकता जिसकी माँग सत्य करता है। लोग केवल सत्य के एक अंश का अभ्यास करते हैं, और केवल कुछ विशेष अवस्थाओं और परिस्थितियों में होने पर ही थोड़ा-सा सत्य अभ्यास में ला सकते हैं; ऐसा नहीं है कि वे सभी हालातों और परिस्थितियों में सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम होते हैं। जब किसी अवसर पर व्यक्ति खुश होता है और उसकी अवस्था अच्छी होती है, या जब वह दूसरों के साथ सहभागिता कर रहा होता है और उसके दिल में अभ्यास करने का एक मार्ग होता है, तो वह अस्थायी रूप से कुछ ऐसे काम करने में सक्षम होता है जो सत्य के अनुरूप होते हैं। लेकिन जब वह ऐसे लोगों के साथ रहता है, जो नकारात्मक होते हैं और सत्य का अनुसरण नहीं करते, और वह इन लोगों से प्रभावित हो जाता है, तो वह अपने हृदय में अपना मार्ग खो देता है और सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ हो जाता है। इससे पता चलता है कि उसका आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, और वह अभी भी वास्तव में सत्य को नहीं समझता। कुछ इंसान ऐसे होते हैं, जो सही लोगों द्वारा मार्गदर्शन और अगुआई किए जाने पर सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम होते हैं; लेकिन किसी झूठे अगुआ या मसीह-विरोधी से गुमराह और जिनके द्वारा बाधा डाली जाती है, ऐसे हालात में वे न केवल सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ होते हैं, बल्कि यह भी संभावना होती है कि वे गुमराह होकर उन्हीं लोगों का अनुसरण भी करने लगें। ऐसे लोग अभी भी खतरे में हैं, है न? ऐसे लोग, इस तरह के आध्यात्मिक कद के साथ, सभी मामलों और स्थितियों में सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हो ही नहीं सकते। अगर वे सत्य का अभ्यास करते भी हैं, तो यह केवल तभी होगा जब वे अच्छे मूड में हों या दूसरों द्वारा उनका मार्गदर्शन किया जाए; किसी अच्छे इंसान द्वारा उनकी अगुआई न किए जाने पर, वे कभी-कभार ऐसी चीजें कर सकते हैं जो सत्य का उल्लंघन करती हैं, और वे परमेश्वर के वचनों से भटक जाएँगे। और यह क्यों होता है? यह इस वजह से होता है, क्योंकि तुम केवल अपनी कुछ ही अवस्थाएँ जान पाए हो, और तुम्हें अपने प्रकृति सार का ज्ञान नहीं है, और तुम्हें अभी देह से विद्रोह करने और सत्य का अभ्यास करने वाला आध्यात्मिक कद प्राप्त करना है; इसलिए भविष्य में तुम क्या करोगे, इस पर तुम्हारा कोई नियंत्रण नहीं है, और तुम इस बात की गारंटी नहीं दे सकते कि तुम किसी भी स्थिति या परीक्षण में दृढ़ रह सकोगे। कई बार तुम ऐसी अवस्था में होते हो कि तुम सत्य को अभ्यास में ला सकते हो और ऐसा लगता है कि तुम कुछ बदल गए हो, लेकिन फिर भी, एक भिन्न परिस्थिति में तुम सत्य को अभ्यास में लाने में असमर्थ होते हो। यह कुछ ऐसा है जो तुम्हारे नियंत्रण से परे होता है। कभी तुम सत्य का अभ्यास कर पाते हो, और कभी तुम नहीं कर पाते। किसी क्षण, तुम समझते हो, और अगले ही क्षण तुम भ्रमित हो जाते हो। वर्तमान में, तुम कुछ बुरा नहीं कर रहे, लेकिन शायद कुछ ही देर में करोगे। इससे साबित होता है कि भ्रष्ट चीजें अभी भी तुम्हारे भीतर मौजूद हैं, और यदि तुम सचमुच खुद को नहीं जान पाते, तो इन चीजों का समाधान करना आसान नहीं होगा। यदि तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव की पूरी समझ हासिल नहीं कर पाते, और अंततः उन चीजों को करने में सक्षम होते हो जो परमेश्वर का विरोध करती हैं, तो तुम खतरे में हो। यदि तुम अपनी प्रकृति की असलियत समझ सकते हो और उससे नफरत कर सकते हो, तो तुम अपने आपको नियंत्रित करने, अपने आपसे विद्रोह करने और सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम होगे।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 570

सत्य की स्पष्ट रूप से संगति करने का उद्देश्य लोगों को सत्य को समझने और उसका अभ्यास करने और अपने स्वभाव में बदलाव हासिल करने में सक्षम बनाना है। यह सत्य को समझने के बाद उनके दिलों में रोशनी और थोड़ी-सी खुशी लाना भर नहीं है। अगर तुम सत्य को समझते हो लेकिन सत्य का अभ्यास नहीं करते हो तो सत्य के बारे में संगति करने और उसे समझने की सार्थकता खो जाती है। जब लोग सत्य को समझते हैं लेकिन इसे अभ्यास में नहीं लाते तो क्या समस्या है? यह इस बात का प्रमाण है कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते, कि वे अपने हृदय में सत्य को स्वीकार नहीं करते, ऐसे में वे परमेश्वर के आशीषों से और उद्धार के अवसर से चूक जाएँगे। जब यह बात आती है कि क्या लोग उद्धार हासिल करने में सक्षम हैं तो इसमें यह महत्वपूर्ण है कि क्या वे सत्य को स्वीकार और उसका अभ्यास करने में सक्षम हैं। अगर तुम उन सत्यों को अभ्यास में लाते हो जिन्हें तुम समझते हो तो तुम पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता, रोशनी और मार्गदर्शन प्राप्त करोगे और तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर लोगे, सत्य की गहरी समझ प्राप्त कर लोगे और आखिरकार सत्य और परमेश्वर का उद्धार हासिल कर लोगे। कुछ लोग सत्य का अभ्यास करने में अक्षम होते हैं, वे हमेशा शिकायत करते हैं कि पवित्र आत्मा उन्हें प्रबुद्ध या रोशन नहीं करता, कि परमेश्वर उन्हें शक्ति नहीं देता। यह गलत है; यह परमेश्वर को गलत समझना है। पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी लोगों के सहयोग की नींव पर निर्मित होती है। लोगों के पास एक सच्चा दिल होना चाहिए और उन्हें सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक होना चाहिए, और चाहे उनकी समझ गहरी हो या सतही, उन्हें सत्य को अभ्यास में लाने में अवश्य ही सक्षम होना चाहिए। तभी वे पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध और रोशन किए जाएँगे। अगर लोग सत्य को समझते हैं लेकिन उसे अभ्यास में नहीं लाते और केवल यह प्रतीक्षा करते हैं कि पवित्र आत्मा कार्य करे और उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य करे तो क्या वे अत्यधिक निष्क्रिय नहीं हो रहे हैं? परमेश्वर लोगों को कुछ करने के लिए कभी बाध्य नहीं करता। अगर लोग सत्य को समझते हैं लेकिन उसे अभ्यास में लाने के इच्छुक नहीं हैं तो यह दर्शाता है कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते या उनकी दशा असामान्य है और उन्हें कोई चीज बाधित कर रही है। लेकिन अगर लोग परमेश्वर से प्रार्थना कर पाते हैं तो परमेश्वर भी कार्य करेगा; असली चिंता यह है कि अगर वे सत्य का अभ्यास करने के अनिच्छुक हैं और परमेश्वर से प्रार्थना भी नहीं करते हैं तो पवित्र आत्मा के पास उनमें कार्य करने का कोई उपाय नहीं होता है। वास्तव में, लोगों को चाहे किसी भी प्रकार की कठिनाई हो, इसका हमेशा समाधान किया जा सकता है; मुख्य बात यही है कि वे सत्य के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम हैं कि नहीं। अब तुम लोगों में भ्रष्टता की समस्याएँ कैंसर नहीं हैं, वे लाइलाज बीमारियाँ नहीं हैं। अगर तुम लोग सत्य का अभ्यास करने का संकल्प ले सकते हो तो तुम पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करोगे और इन भ्रष्ट स्वभावों को बदलना संभव होगा। यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तुम सत्य का अभ्यास करने का संकल्प ले सकते हो—यही मुख्य बात है। अगर तुम सत्य का अभ्यास करते हो और सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलते हो तो तब तुम पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर लोगे और निश्चित रूप से बचाए जा सकते हो। अगर तुम जिस मार्ग पर चलते हो वह गलत है तो तुम पवित्र आत्मा का कार्य खो दोगे; एक गलत कदम दूसरे गलत कदम की ओर ले जाएगा और तुम्हारे लिए सब खत्म हो जाएगा और चाहे तुम कितने ही वर्षों तक विश्वास करते रहो, तुम उद्धार प्राप्त नहीं कर पाओगे। उदाहरण के लिए, कुछ लोग जब काम कर रहे होते हैं तो वे इस बारे में कभी नहीं सोचते कि काम उस तरह कैसे किया जाए जिससे परमेश्वर के घर के कार्य को लाभ हो और जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो। नतीजतन वे बहुत-सी ऐसी चीजें करते हैं जो स्वार्थपूर्ण और नीचतापूर्ण होती हैं, वे परमेश्वर का विकर्षण और घृणा प्राप्त करते हैं और इसलिए वे प्रकट कर दिए और हटा दिए जाते हैं। अगर लोग सभी चीजों में सत्य खोजने और सत्य के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम हो जाते हैं तो फिर उन्होंने पहले ही परमेश्वर पर आस्था के सही मार्ग पर प्रवेश लिया होता है और इसलिए उनके पास परमेश्वर के इरादों के अनुरूप इंसान बनने की आशा होती है। कुछ लोग सत्य को समझते हैं लेकिन इसे अभ्यास में नहीं लाते हैं। इसके बजाय, वे मानते हैं कि सत्य कोई बड़ी चीज नहीं है और यह उनकी अपनी मरजी और भ्रष्ट स्वभावों की समस्या का समाधान करने में असमर्थ है। क्या ऐसे लोग वास्तव में हँसी के पात्र नहीं हैं? क्या वे अत्यंत बेहूदे नहीं होते हैं? क्या वे खुद को बहुत ही चतुर नहीं समझते? अगर लोग सत्य के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम हैं तो तब उनके भ्रष्ट स्वभाव बदल सकते हैं। अगर परमेश्वर के प्रति उनका विश्वास और सेवा उनके अपने स्वाभाविक व्यक्तित्व के अनुसार है तो उनमें से एक भी अपने स्वभाव में बदलाव हासिल करने में सक्षम नहीं होगा। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी गलत पसंदगियों के कारण होने वाली चिंता में दिन भर फँसे रहते हैं। आसानी से उपलब्ध सत्य उन्हें दिया जाता है तो वे उसकी जाँच नहीं करते या उसे अभ्यास में लाने का प्रयास नहीं करते, बल्कि अपना ही रास्ता चुनने पर जोर देते हैं। यह कार्य करने का कैसा बेहूदा तरीका है! वे सचमुच यह नहीं जानते कि उनके पास जो आशीषें हैं उनका आनंद कैसे लिया जाए; वे पीड़ा सहने के लिए ही जन्मे हैं। सत्य का अभ्यास करना इतना सरल है; तुम अभ्यास करते हो या नहीं, बस यही मायने रखता है। अगर तुम कोई ऐसे इंसान हो जिसके पास सत्य का अभ्यास करने का संकल्प है तो फिर तुम्हारी नकारात्मकता, कमजोरी और भ्रष्ट स्वभाव धीरे-धीरे हल हो जाएँगे और बदल जाएँगे; यह इस पर निर्भर करता है कि तुम्हारा हृदय सत्य से प्रेम करता है कि नहीं, तुम सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हो कि नहीं, सत्य हासिल करने के लिए तुम पीड़ा सह और कीमत चुका सकते हो कि नहीं। अगर तुम सत्य से सचमुच प्रेम करते हो तो इसे हासिल करने के लिए तमाम तरह की पीड़ा सहने में सक्षम होगे—यानी चाहे लोग बदनाम करें, आलोचना करें या अस्वीकार करें, तुम्हें यह सब धैर्य और सहनशीलता के साथ सहन करना चाहिए। परमेश्वर तुम्हें आशीष देगा और तुम्हारी रक्षा करेगा, वह तुम्हें त्यागेगा नहीं या तुम्हारी उपेक्षा नहीं करेगा—यह पक्का है। अगर तुम परमेश्वर का भय मानने वाले हृदय से परमेश्वर से प्रार्थना करते हो, परमेश्वर पर निर्भर रहते हो और परमेश्वर की ओर देखते हो तो ऐसी कोई कठिनाई नहीं है जिससे तुम पार न पा सको। हो सकता है तुममें भ्रष्ट स्वभाव हो और तुम अपराध कर बैठो लेकिन अगर तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय है और अगर तुम सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर सावधानी से चलते हो तो तुम निर्विवाद रूप से अडिग रहने में सक्षम होगे और निर्विवाद रूप से परमेश्वर द्वारा तुम्हारी अगुआई और सुरक्षा की जाएगी।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 571

यदि तुम सत्य की समझ प्राप्त करना चाहते हो, तो यह बहुत महत्वपूर्ण है कि तुम्हें पता हो कि परमेश्वर के वचनों को कैसे खाना-पीना है। अगर तुम परमेश्वर के केवल थोड़े-बहुत वचन पढ़ते हो और उन्हें भी पूरी ईमानदारी से नहीं पढ़ते, मन से उन पर चिंतन नहीं करते, तो तुम सत्य नहीं समझ पाओगे। तब तुम केवल सिद्धांत की थोड़ी-बहुत समझ हासिल कर पाओगे। ऐसे में तुम्हारे लिए परमेश्वर के इरादों और उसके वचनों में छिपे उसके उद्देश्यों को समझना बहुत मुश्किल होगा। अगर तुम उन लक्ष्यों या परिणामों को नहीं समझते हो जिन्हें परमेश्वर के वचन प्राप्त करना चाहते हैं, अगर तुम यह नहीं समझते हो कि उसके वचन मनुष्य में क्या पूर्ण और हासिल करना चाहते हैं, तो यह साबित करता है कि तुमने अभी तक सत्य को समझा नहीं है। परमेश्वर जो कहता है उसे क्यों कहता है? वह उस लहजे में क्यों बोलता है? वह जो भी वचन बोलता है, उसमें इतना गंभीर और ईमानदार क्यों है? वह कुछ विशिष्ट वचनों को उपयोग के लिए क्यों चुनता है? क्या तुम जानते हो? अगर निश्चित होकर नहीं बता सकते, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर के इरादों या उसके उद्देश्यों को नहीं समझते हो। अगर तुम उनके वचनों के पीछे के संदर्भ को नहीं समझते हो, तो तुम सत्य को समझ या उसका अभ्यास कैसे कर सकते हो? सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें पहले परमेश्वर द्वारा कहे जाने वाले हर वचन का अर्थ समझना होगा, फिर इन वचनों को समझकर उन्हें अभ्यास में लाना होगा, जिससे तुम परमेश्वर के वचनों को अपने भीतर जी सको और वे तुम्हारी वास्तविकता बन जाएँ। ऐसा करके तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर लोगे। तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के वचन को पूरी तरह से समझ लिए जाने पर ही तुम वास्तव में सत्य को समझ सकते हो। मात्र कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत समझकर तुम सोचते हो कि तुम सत्य समझते हो और तुम्हारे पास वास्तविकता है। यह अपने आपको धोखा देना है। तुम यह भी नहीं समझते कि परमेश्वर लोगों से सत्य का अभ्यास करने की अपेक्षा क्यों करता है। इससे साबित होता है कि तुम्हें परमेश्वर के इरादों की समझ नहीं है और तुम अभी भी सत्य की समझ नहीं रखते। वास्तव में, परमेश्वर लोगों को शुद्ध करके बचाने के लिए उनसे यह अपेक्षा करता है, ताकि लोग अपना भ्रष्ट स्वभाव त्यागकर परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और उसे जानने वाले बन सकें। इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए परमेश्वर चाहता है कि लोग सत्य का अभ्यास करें।

परमेश्वर उन लोगों के लिए सत्य व्यक्त करता है जो सत्य से प्रेम करते हैं, जिनमें सत्य की प्यास है, और जो सत्य खोजते हैं। वे लोग जो शब्दों और धर्म-सिद्धांतों में उलझे रहते हैं तथा लंबे, आडंबरपूर्ण भाषण देना पसंद करते हैं, वे कभी भी सत्य प्राप्त नहीं कर पाएँगे; वे स्वयं को बेवकूफ बना रहे हैं। परमेश्वर के वचनों और सत्य के बारे में उनके दृष्टिकोण गलत हैं, जो सीधा है उसे पढ़ने के लिए वे अपनी गरदन उल्टी कर लेते हैं, उनका दृष्टिकोण पूरी तरह गलत होता है। कुछ लोग परमेश्वर के वचनों का अध्ययन करना पसंद करते हैं। वे हमेशा इस बात का अध्ययन करते हैं कि कैसे परमेश्वर के वचन गंतव्य के बारे में या आशीष प्राप्त करने के तरीके के बारे में बात करते हैं। उन्हें ऐसे वचनों में सर्वाधिक रुचि होती है। यदि परमेश्वर के वचन उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं और आशीष पाने की उनकी इच्छा पूरी नहीं करते, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं, फिर वे सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं और परमेश्वर के लिए खुद को खपाना नहीं चाहते। यह दिखाता है कि उन्हें सत्य में कोई दिलचस्पी नहीं है। परिणामस्वरूप, वे सत्य को लेकर गंभीर नहीं हैं; वे बस उन्हीं सत्य को स्वीकारने में सक्षम हैं, जो उनकी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप हैं। भले ही वे परमेश्वर में अपने विश्वास को लेकर बेहद उत्साही हैं और कुछ अच्छी चीजें करने के लिए हरसंभव तरीके से प्रयास करते हैं और खुद को अच्छे से पेश करते हैं, लेकिन वे यह सब केवल भविष्य में एक अच्छी मंजिल पाने के लिए कर रहे हैं। इस तथ्य के बावजूद कि वे कलीसियाई जीवन से जुड़े हैं, परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, वे सत्य का अभ्यास नहीं करेंगे, न उसे प्राप्त करेंगे। कुछ लोग होते हैं जो परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हैं, लेकिन वे बस लापरवाही से काम करते हैं; वे सोचते हैं कि उन्होंने बस कुछ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को समझकर सत्य पा लिया है। वे कितने बेवकूफ हैं! परमेश्वर का वचन ही सत्य है। हालाँकि, परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद यह जरूरी नहीं कि कोई सत्य समझ ही ले, और सत्य प्राप्त कर ले। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के बाद यदि तुम सत्य को हासिल करने में असफल हो जाते हो, तो तुमने बस शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को हासिल किया है। यदि तुम सत्य का अभ्यास करना या सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना नहीं जानते, तो फिर तुम सत्य वास्तविकता से वंचित रह जाते हो। भले ही तुम अक्सर परमेश्वर के वचन पढ़ते हो, लेकिन बाद में तुम परमेश्वर के इरादों को नहीं समझ पाते, तुम्हें केवल कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत ही हासिल हो पाते हैं। सत्य समझने के लिए परमेश्वर के वचनों को कैसे खाएं-पिएँ? सर्वप्रथम, तुम्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर के वचन समझने की दृष्टि से इतने सरल नहीं हैं; परमेश्वर के वचन में बहुत गहराई है। परमेश्वर के वचनों के एक वाक्य का अनुभव करने में भी पूरा जीवन लग जाता है। कुछ वर्षों के अनुभव के बगैर तुम परमेश्वर के वचनों को संभवतः कैसे समझ सकते हो? यदि परमेश्वर के वचन पढ़ते हुए, तुम परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते हो और उसके वचनों के उद्देश्यों, उनके उद्गम, उस प्रभाव को नहीं समझते जो वे प्राप्त करना चाहते हैं, या जो वे हासिल करना चाहते हैं, तो क्या इसका यह अर्थ है कि तुम सत्य समझते हो? संभवतः तुमने परमेश्वर के वचनों को कई बार पढ़ा हो और शायद तुमने इसके कई अंशों को कंठस्थ कर लिया हो, लेकिन तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर पाते और तुम बिल्कुल नहीं बदले हो, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध हमेशा की तरह दूरस्थ और विरक्त है। जब तुम्हारे सामने कोई ऐसी चीज आती है जो तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खाती, तो तुम परमेश्वर के प्रति संदेहास्पद रहते हो, तुम उसे समझ नहीं पाते, उससे तर्क करते हो, उसके बारे में धारणाएँ बना लेते हो और गलतफहमियाँ पाल लेते हो, उसका प्रतिरोध और यहाँ तक कि ईशनिंदा करते हो। यह किस तरह का स्वभाव है? यह अहंकार का, सत्य से विमुख हो जाने का स्वभाव है। जो लोग इतने अहंकारी और सत्य से विमुख हुए हों, वे इसे कैसे स्वीकार सकते हैं या कैसे इसका अभ्यास कर सकते हैं? ऐसे लोग कभी भी सत्य या परमेश्वर को प्राप्त नहीं करेंगे।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 572

यह कहा गया है कि “वह जो अंत तक अनुसरण करता है, उसे निश्चित ही बचाया जाएगा,” लेकिन क्या इसे अभ्यास में लाना आसान है? यह आसान नहीं है, और बड़ा लाल अजगर जिन कई लोगों का पीछा कर सताता है, वे बहुत डरपोक बन जाते हैं परमेश्वर का अनुसरण करने से डरते हैं। उनका पतन क्यों हुआ? क्योंकि उनमें सच्ची आस्था नहीं थी। कुछ लोग सत्य स्वीकार सकते हैं, परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं, उस पर निर्भर रह सकते हैं, परीक्षणों और क्लेशों में अडिग रह सकते हैं, कुछ लोग अंत तक अनुसरण नहीं कर पाते। परीक्षणों और क्लेशों के दौरान वे किसी एक मुकाम पर आकर गिर पड़ते हैं, अपनी गवाही गँवा देते हैं और फिर से उठकर चल नहीं पाते। हर दिन उत्पन्न होने वाली सभी चीजें, बड़ी हों या छोटी, जो तुम्हारे संकल्प को हिला सकती हैं, तुम्हारे दिल पर कब्जा कर सकती हैं या तुम्हें अपना कर्तव्य करने या आगे बढ़ने से बाधित कर सकती हैं, उन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए—तुम्हें अपनी सावधानीपूर्वक जाँच करनी चाहिए और सत्य की तलाश करनी चाहिए। ये सभी समस्याएँ हैं जिन्हें तुम्हें अनुभव करते समय हल करना चाहिए। कुछ लोग नकारात्मक हो जाते हैं, शिकायत करते हैं, कठिनाइयों का सामना करने पर अपने कर्तव्यों को छोड़ देते हैं और वे प्रत्येक असफलता के बाद अपने पैरों पर वापस खड़े नहीं हो पाते। ये सभी लोग हठी मूर्ख हैं जो सत्य से प्रेम नहीं करते और वे जीवन भर की आस्था से भी इसे प्राप्त नहीं कर पाएँगे। ऐसे हठी मूर्ख अंत तक कैसे अनुसरण कर सकते हैं? यदि तुम्हारे साथ एक ही बात दस बार होती है और हर बार तुम सत्य की तलाश नहीं करते, उससे जरा-सा भी सबक नहीं सीखते, तो तुम किसी काम के नहीं हो और सबसे बेकार व्यक्ति हो। चतुर लोग और वे जिनमें वास्तव में काबिलियत और आध्यात्मिक समझ होती है, वे सत्य के खोजी होते हैं; दस स्थितियों का सामना करने पर, शायद उन आठ मामलों में, वे कुछ प्रबुद्धता प्राप्त करेंगे, कुछ सबक सीखेंगे, कुछ सत्य समझेंगे और कुछ प्रगति करेंगे। जब किसी मूर्ख के साथ दस बार कुछ घटित होता है—जिसमें आध्यात्मिक समझ नहीं होती—एक बार भी यह उसके जीवन को लाभ नहीं पहुँचाएगा, एक बार भी यह उसे नहीं बदलेगा और एक बार भी यह उसे अपनी कुरूपता का ज्ञान नहीं कराएगा; इस तरह के लोग पूरी तरह से खत्म हो चुके हैं। हर बार जब उनके साथ कुछ घटित होता है, तो वे गिर जाते हैं और हर बार जब वे गिरते हैं, तो उन्हें किसी और के सहारे और मनाने की जरूरत होती है; सहारा दिए और मनाए जाने के बिना, वे उठ नहीं सकते और हर बार जब कुछ घटित होता है, तो उनके गिरने और पतित होने का खतरा होता है। क्या यह उनके लिए अंत नहीं है? ऐसे बेकार व्यक्ति के लिए, अभी भी उद्धार की क्या आशा हो सकती है? परमेश्वर द्वारा मानवजाति का उद्धार उन लोगों का उद्धार है, जो सत्य से प्रेम करते हैं, उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिसमें इच्छा-शक्ति और संकल्प हैं, और उनके उस हिस्से का उद्धार है जो उनके दिल में सत्य और न्याय के लिए लालायित है। किसी व्यक्ति का संकल्प उसके दिल का वह हिस्सा है, जो न्याय, अच्छाई और सत्य के लिए तरसता है और जमीर से युक्त होता है। परमेश्वर इस हिस्से को बचाता है और इसके माध्यम से, वह उनके भ्रष्ट स्वभावों को बदलता है, ताकि वे सत्य को समझ सकें और हासिल कर सकें, ताकि उनकी भ्रष्टता शुद्ध हो सके, और उनका जीवन स्वभाव रूपांतरित किया जा सके। यदि तुम्हारे भीतर ये चीजें नहीं हैं, तो तुम सुधार से परे हो। यदि तुम्हारे भीतर सत्य के लिए कोई प्रेम या न्याय और प्रकाश के लिए कोई आकांक्षा नहीं है; यदि, जब भी तुम बुरी चीजों का सामना करते हो, तब तुम्हारे पास न तो उनसे मुक्त होने की इच्छा-शक्ति होती है और न ही कष्ट सहने का संकल्प; यदि, इसके अलावा, तुम्हारा जमीर सुन्न है, सत्य को प्राप्त करने की तुम्हारी क्षमता भी सुन्न है, और तुम सत्य या होने वाली घटनाओं को महसूस करने में सक्षम नहीं हो; और यदि तुम सभी मामलों में विवेकहीन हो और तुम पर जो भी घटित होता है, उसके सामने तुम समाधान के लिए सत्य नहीं खोज पाते हो और लगातार नकारात्मक बने रहते हो, तो तुम्हें बचाए जाने का कोई रास्ता नहीं है। ऐसे व्यक्ति में कोई भी ऐसा गुण नहीं होता जो उसे योग्य ठहराए, न ही कोई ऐसा आधार होता जिस पर परमेश्वर कार्य कर सके। उनका जमीर सुन्न होता है, उनका मन अंधकारमय होता है, और वे सत्य से प्रेम नहीं करते, न ही अपने दिल की गहराई में वे न्याय के लिए तरसते हैं। परमेश्वर चाहे कितने ही स्पष्ट तरीके से या बोधगम्य रूप से सत्य समझाए, वे जरा-सी भी प्रतिक्रिया नहीं देते, मानो उनका हृदय पहले से ही मृत हो। क्या उनके लिए खेल खत्म नहीं हो गया है? यह वैसा ही है जैसे जब किसी व्यक्ति की आखिरी साँसें चल रही हों और उसे मुँह से मुँह में साँस देकर बचाया जा सकता हो, लेकिन अगर वह पहले से ही मर चुका हो और उसकी आत्मा उसे छोड़कर जा चुकी हो, तो वह तरीका आजमाने का कोई फायदा नहीं होगा। यदि समस्याओं और कठिनाइयों का सामना करने पर कोई व्यक्ति पीछे हट जाता है और उनसे बचता है, वह सत्य बिल्कुल नहीं खोजता है और अपने काम में नकारात्मक और सुस्त होने का चुनाव करता है, फिर उसकी असलियत बेनकाब कर दी जाती है। ऐसे लोगों के पास कोई अनुभवजन्य गवाही नहीं होती। वे मुफ्तखोर और कचरे होते हैं, परमेश्वर के घर में बेकार होते हैं और वे पूरी तरह बर्बाद हो चुके होते हैं। जो लोग समस्याओं के हल के लिए सत्य खोजते हैं, उन्हीं के पास आध्यात्मिक कद होता है और वही लोग दृढ़ता से गवाही दे सकते हैं। जब समस्याएँ और कठिनाइयाँ सामने आएँ तो तुम्हें उनका सामना अवश्य ही ठंडे दिमाग से करना चाहिए और उनसे सही से पेश आना चाहिए और कोई एक विकल्प चुनना चाहिए। तुम्हें समस्याओं के हल के लिए सत्य का उपयोग करना सीखना चाहिए। जिन सत्यों को तुम आमतौर पर समझते हो, वे चाहे गहन हों या उथले, तुम्हें उनका उपयोग करना चाहिए। सत्य केवल वे शब्द नहीं हैं जो तुम्हारे मुंह से उस समय निकलते हैं जब तुम्हारे साथ कुछ हो जाता है, न ही वे खास तौर पर दूसरों की समस्याओं को हल करने के लिए उपयोग किए जाते हैं; इसके बजाय, उनका उपयोग तुम्हारी समस्याओं और कठिनाइयों को हल करने के लिए किया जाना चाहिए। यही सबसे महत्वपूर्ण है। जब तुम अपनी समस्याएँ हल करोगे तभी तुम दूसरों की समस्याएँ भी हल कर पाओगे। पतरस को फल क्यों कहा जाता है? क्योंकि उसमें मूल्यवान चीजें हैं, जो पूर्ण करने के लायक हैं। उसने सभी बातों में सत्य की खोज की, उसमें संकल्प था और दृढ़ इच्छाशक्ति थी; उसमें विवेक था, वह कठिनाई सहने के लिए तैयार था और दिल से सत्य से प्रेम करता था; जब उस पर चीजें आईं तो उसने उन्हें बेकार नहीं जाने दिया और हर चीज से सबक सीख सका। ये सभी बड़ी खूबियाँ हैं। यदि तुम्हारे पास इनमें से कोई भी बड़ी खूबी नहीं है, तो यह परेशानी की बात है। तुम्हारे लिए सत्य प्राप्त करना और बचाया जाना आसान नहीं होगा। यदि तुम्हें नहीं पता कि अनुभव कैसे करना है या तुम्हें कोई अनुभव नहीं है, तो तुम अन्य लोगों की कठिनाइयों को हल करने में सक्षम नहीं होगे। चूँकि तुम परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करने में असमर्थ हो, इसलिए तुम नहीं जानते कि अगर कुछ हो जाए तो क्या करना है, जब तुम समस्याओं का सामना करते हो तो तुम परेशान हो जाते हो और आंसू बहाने लगते हो, तुम नकारात्मक हो जाते हो और छोटी-मोटी असफलता पर भाग खड़े होते हो और तुम उनसे सही से पेश आने में असमर्थ होते हो। इस कारण तुम्हारे लिए जीवन प्रवेश पाना असंभव है। तुम जीवन प्रवेश के बिना दूसरों को पोषण कैसे दे सकते हो? लोगों के जीवन को पोषण देने के लिए तुम्हें सत्य की स्पष्ट रूप से संगति करनी चाहिए और समस्याओं को हल करने के लिए अभ्यास के सिद्धांतों की स्पष्ट संगति करना आना चाहिए। जिसमें दिल और आत्मा है, उसे ज्यादा बताने की जरूरत नहीं है, वह थोड़ी बातों से ही समझ जाएगा। लेकिन केवल सत्य की थोड़ी-सी समझ से काम नहीं चलेगा। उनके पास अभ्यास के मार्ग और सिद्धांत भी होने चाहिए। इसी से उन्हें सत्य का अभ्यास करने में मदद मिलेगी। भले ही लोगों में आध्यात्मिक समझ हो और थोड़ा-सा ही बोलने पर वे समझ जाते हों, पर यदि वे सत्य का अभ्यास नहीं करते तो जीवन प्रवेश नहीं होगा। यदि वे सत्य नहीं स्वीकार पाते, तो उनके लिए सब खत्म है और वे कभी भी सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश नहीं कर पाएँगे। तुम कुछ लोगों का हाथ पकड़कर उन्हें सिखा सकते हो, उस समय तो लगेगा कि वे समझ रहे हैं, लेकिन जैसे ही तुम उनका हाथ छोड़ते हो, वे फिर से भ्रमित हो जाते हैं। यह ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसमें आध्यात्मिक समझ हो। चाहे कोई भी समस्या सामने हो, अगर तुम नकारात्मक और कमजोर होते हो, तुम्हारे पास कोई गवाही नहीं होती और जब उन चीजों की बात आती है जो चीजें लोगों को करनी चाहिए और जो चीजें लोगों को अपने हिस्से की भूमिका के रूप निभानी चाहिए तब अगर तुम अपने हिस्से की भूमिका नहीं निभाते तो इससे साबित होता है कि तुम्हारे दिल में परमेश्वर नहीं है, तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो सत्य से प्रेम करता है। पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को कैसे प्रेरित करता है इसे एक तरफ रख दें, तो केवल इतने वर्षों तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने और इतने सारे सत्यों को सुनने से, साथ ही थोड़ा जमीर होने और इच्छाशक्ति के माध्यम से खुद पर संयम रखने से, लोगों को कम से कम अपने जमीर द्वारा न धिक्कारे जाने के न्यूनतम मानक को पूरा करने में सक्षम होना चाहिए और उन्हें उतना सुन्न और कमजोर नहीं होना चाहिए जितने वे अभी हैं। यह बिल्कुल अकल्पनीय है कि वे इस दशा में हैं। शायद तुम लोग पिछले कुछ वर्षों से बस किसी तरह बिना स्पष्ट समझ के आगे बढ़ते रहे हो, सत्य का बिल्कुल भी अनुसरण नहीं कर रहे हो या कोई प्रगति नहीं कर रहे हो। वरना, तुम अभी भी इतने सुन्न और मंदबुद्धि कैसे हो सकते हो? यह पूरी तरह से तुम्हारे मूर्ख और अज्ञानी होने और सत्य को न खोजने या उसे स्वीकार न करने के कारण है और तुम किसी और को दोष नहीं दे सकते। सत्य दूसरों के मुकाबले कुछ खास लोगों के प्रति पक्षपातपूर्ण नहीं होता। यदि तुम सत्य नहीं स्वीकारते और समस्याओं को हल करने के लिए सत्य नहीं खोजते, तो तुम कैसे बदल सकते हो? कुछ लोगों को लगता है कि उनकी काबिलियत बहुत खराब है और उनमें समझने की क्षमता नहीं है, इसलिए वे अपने बारे में फैसला सुना देते हैं। उन्हें लगता है कि वे चाहे कितना भी सत्य का अनुसरण कर लें, परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते और चाहे वे कितनी भी कोशिश कर लें, वे बस ऐसे ही हैं। वे हमेशा नकारात्मक होते हैं। नतीजतन, बरसों परमेश्वर में विश्वास रखकर भी, उन्होंने सत्य प्राप्त नहीं किया है। सत्य का अनुसरण करने का प्रयास किए बिना, तुम कहते हो कि तुम्हारी काबिलियत बहुत खराब है, तुम हार मान लेते हो और हमेशा एक नकारात्मक दशा में रहते हो। नतीजतन, तुम उस सत्य को नहीं समझते जिसे तुम्हें समझना चाहिए या उस सत्य का अभ्यास नहीं करते जिसका अभ्यास करने में तुम सक्षम हो—क्या तुम खुद को रोक नहीं रहे हो? तुम हमेशा यही कहते रहते हो कि तुम्हारी काबिलियत खराब है और यह पर्याप्त नहीं है—क्या यह अपनी जिम्मेदारी से बचना और जी चुराना नहीं है? यदि तुम कष्ट उठा सकते हो, कीमत चुका सकते हो और पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हो, तो तुम निश्चित रूप से कुछ सत्य समझ पाओगे और कुछ वास्तविकताओं में प्रवेश कर पाओगे। यदि तुम परमेश्वर की ओर नहीं देखते, उस पर निर्भर नहीं रहते और बिना कोई प्रयास किए या कीमत चुकाए बस हार मान लेते हो और घुटने टेक देते हो, तो तुम किसी काम के नहीं हो और तुममें जमीर और विवेक का जरा-सा भी अंश नहीं है। तुम्हारी काबिलियत चाहे जैसी भी हो, जब तक तुममें थोड़ा-सा भी जमीर और विवेक है, तुम्हें लगन से अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए और अपना मिशन पूरा करना चाहिए। भगोड़ा होना एक घोर विद्रोही कृत्य है; जब कोई व्यक्ति परमेश्वर के साथ विश्वासघात करता है, तो यह अपरिवर्तनीय है। सत्य का अनुसरण करने के लिए एक दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है, जो लोग बहुत नाजुक होते हैं और जिनके भीतर बहुत अधिक नकारात्मकता होती है, वे कुछ भी हासिल नहीं कर पाएँगे। वे अंत तक परमेश्वर में विश्वास नहीं कर पाएँगे, उनके लिए सत्य प्राप्त करने और स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने की आशा और भी कम है। केवल वे जो सत्य का अनुसरण करते हैं और जिनमें संकल्प होता है, वे ही इसे प्राप्त कर सकते हैं और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जा सकते हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 573

ऐसे बहुत लोग हैं, जो अपने कर्तव्य में व्यस्त होते ही अनुभव करने में असमर्थ हो जाते हैं और सामान्य स्थिति बनाए नहीं रख पाते, और नतीजतन, लगातार सभा आयोजित कर अपने साथ सत्य की संगति किए जाने की माँग करते रहते हैं। यहाँ क्या चल रहा है? वे सत्य नहीं समझते, वे सच्चे मार्ग में नींव नहीं जमा पाए हैं, ऐसे लोग अपना कर्तव्य निभाते समय जोश से प्रेरित होते हैं, और लंबे समय तक नहीं टिक सकते हैं। जब लोग सत्य नहीं समझते, तो वे जो कुछ भी करते हैं उसमें कोई सिद्धांत नहीं होता। अगर उनके लिए कुछ करने की व्यवस्था की जाती है, तो वे उसमें गड़बड़ी कर देते हैं, वे जो करते हैं उसमें लापरवाह होते हैं, वे सिद्धांतों की तलाश नहीं करते हैं, और उनके दिलों में कोई आज्ञाकारिता नहीं होती है—जो यह साबित करता है कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में असमर्थ हैं। चाहे तुम कुछ भी करो, तुम्हें सबसे पहले यह समझना चाहिए कि तुम इसे क्यों कर रहे हो, किस इरादे से प्रेरित होकर कर रहे हो, तुम्हारे इसे करने का महत्व क्या है, मामले की प्रकृति क्या है और क्या यह सकारात्मक है या नकारात्मक। तुम्हें इन सभी मुद्दों पर स्पष्ट होना चाहिए; तुम्हारे लिए सिद्धांतों के साथ कार्य करने में सक्षम होने के लिए यह आवश्यक है। यदि तुम कुछ ऐसा कर रहे हो जिसे तुम्हारा कर्तव्य निभाना माना जाता है, तो तुम्हें विचार करना चाहिए : “मैं कैसे कार्य करूँ कि मैं इस कर्तव्य को पूरा करूँ और इसे बिना अनमने हुए करूँ?” तुम्हें इस मामले में प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर के करीब आना चाहिए। परमेश्वर से प्रार्थना करने का उद्देश्य सत्य, अभ्यास का मार्ग, परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर को संतुष्ट करने का तरीका खोजना है—यह इसी नतीजे को हासिल करने के लिए है। परमेश्वर से प्रार्थना करने, परमेश्वर के करीब आने और परमेश्वर के वचन पढ़ने का अभ्यास धार्मिक अनुष्ठानों या सतही कार्यों में शामिल होना नहीं है। वे परमेश्वर के इरादे खोजने और फिर सत्य के अनुसार अभ्यास करने के उद्देश्य से किए जाते हैं। यदि तुम कुछ करने से पहले हमेशा “परमेश्वर को धन्यवाद” कहते हो और तुम बहुत आध्यात्मिक और चीजों की असलियत जानने में सक्षम लगते हो, लेकिन जब कार्य करने का समय आता है तो तुम सत्य की बिल्कुल भी खोज किए बिना अपनी इच्छा का ही पालन करते हो, तो तुम्हारा यह ‘परमेश्वर को धन्यवाद’ महज एक रटा-रटाया तकियाकलाम बनकर रह गया है। यह झूठी आध्यात्मिकता है। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें हमेशा सोचना चाहिए, “मुझे यह कर्तव्य कैसे निभाना चाहिए? परमेश्वर की इच्छा क्या है? परमेश्वर की अपेक्षाएँ क्या हैं?” अपने कार्य-कलापों के लिए सत्य और सिद्धांतों को खोजने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करना और परमेश्वर के करीब आना, अपने हृदय में यह खोजना कि परमेश्वर की इच्छा क्या है और तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर के वचनों या सत्य सिद्धांतों से न भटकना—केवल ऐसा करना ही यह संकेत देता है कि तुम्हारा सचमुच परमेश्वर में विश्वास है। जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते वे ये चीजें नहीं कर सकते। बहुत-से लोग हैं जो सत्य सिद्धांतों को नहीं खोजते, चाहे वे कुछ भी कर रहे हों और इसके बजाय हमेशा अपने ही विचारों के अनुसार कार्य करते हैं। वे चीजों के बारे में बहुत सरल शब्दों में सोचते हैं और कभी इस बात पर विचार नहीं करते कि परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कैसे कार्य करें या इस तरह से कैसे कार्य करें ताकि वे परमेश्वर को संतुष्ट कर सकें। वे केवल चीजों को करते समय हठपूर्वक अपनी मर्जी के अनुसार चलना जानते हैं। ऐसे लोगों के दिलों में न तो परमेश्वर के लिए बिल्कुल भी कोई जगह होती है, न ही उनमें परमेश्वर का भय मानने वाला जरा-सा भी दिल होता है। कुछ लोग कहते हैं, “मैं केवल कठिनाइयों का सामना करने पर ही परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ, लेकिन मुझे नहीं लगता कि इससे कुछ होता है। इसलिए जब मैं सामान्य चीजों का सामना करता हूँ तो मैं परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करता क्योंकि इसका कोई फायदा नहीं है।” ऐसे लोगों के दिलों से परमेश्वर पूरी तरह से अनुपस्थित रहता है। वे साधारण समय में चाहे कुछ भी कर रहे हों, सत्य को नहीं खोजते। वे केवल अपने विचारों के अनुसार चलते हैं। तो क्या उनके क्रियाकलापों के कोई सिद्धांत हैं? निश्चित रूप से नहीं। वे हर चीज को सरल शब्दों में देखते हैं। यहाँ तक कि जब लोग सत्य सिद्धांतों पर संगति करते हैं, तो वे उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे। क्योंकि उनके क्रियाकलापों का कभी कोई सिद्धांत नहीं रहा है और उनके दिलों में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं है, केवल अपने लिए जगह है। उन्हें लगता है कि उनके विचार अच्छे हैं, वे ऐसे विचार नहीं हैं जो बुराई की ओर ले जाएँ या सत्य के खिलाफ हों। वे सोचते हैं कि अपने विचारों के अनुसार कार्य करना सत्य का अभ्यास करना है और ऐसा करना परमेश्वर के प्रति समर्पण करना है। वास्तव में, वे जिन मामलों का सामना करते हैं, उनमें वे सचमुच परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करते हैं और सत्य को नहीं खोजते हैं, बल्कि इसके बजाय अपनी मर्जी से और अपने विचारों के अनुसार कार्य करते हैं। वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य नहीं करते हैं, उनमें परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाला हृदय नहीं है और उनमें परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा तो बिल्कुल नहीं है। यह लोगों द्वारा उनके अभ्यास में की जाने वाली सबसे बड़ी गलती है। यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो फिर भी वह तुम्हारे हृदय में नहीं है, तो क्या तुम परमेश्वर को धोखा नहीं दे रहे हो? और ऐसी आस्था से क्या नतीजे निकल सकते हैं? तुम इससे ठीक-ठीक क्या प्राप्त कर सकते हो? ऐसी आस्था का क्या अर्थ है?

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 574

अगर तुमने कुछ ऐसा किया है, जो सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन कर परमेश्वर को अप्रसन्न करता है, तो तुम्हें आत्मचिंतन कैसे करना चाहिए और खुद को जानने की कोशिश कैसे करनी चाहिए? जब तुम उसे करने जा रहे थे, तब क्या तुमने उससे प्रार्थना की थी? क्या तुमने कभी यह विचार किया, “क्या चीजें इस तरह से करना सत्य के अनुरूप है? अगर यह बात परमेश्वर के सामने लाई जाएगी, तो परमेश्वर इसे कैसे देखेगा? अगर उसे इसका पता चलेगा, तो वह खुश होगा या नाराज? वह इससे घृणा करेगा या घिन करेगा?” तुमने इसकी खोज नहीं की, है ना? यहाँ तक कि अगर दूसरे लोगों ने तुम्हें याद भी दिलाया, तो तुम तब भी यही सोचोगे कि यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, और यह किसी भी सिद्धांत के खिलाफ नहीं जाता और न ही कोई पाप है। नतीजतन, तुमने परमेश्वर के स्वभाव का अपमान किया और उसे क्रोध करने के लिए उकसाया, इस हद तक कि उसे तुमसे नफरत हो जाए। यह लोगों के विद्रोहीपन से उत्पन्न होता है। इसलिए, तुम्हें सभी चीजों में सत्य खोजना चाहिए। तुम्हें इसी का पालन करना चाहिए। अगर तुम पहले से प्रार्थना करने के लिए गंभीरता से परमेश्वर के सामने आ सको, और फिर परमेश्वर के वचनों के अनुसार सत्य की तलाश कर सको, तो तुम्हारा मार्ग गलत नहीं होगा। सत्य के तुम्हारे अभ्यास में कुछ विचलन हो सकते हैं, लेकिन इससे बचना कठिन है, और कुछ अनुभव प्राप्त करने के बाद तुम सही ढंग से अभ्यास करने में सक्षम होगे। लेकिन अगर तुम जानते हो कि सत्य के अनुसार कैसे कार्य करना है, फिर भी इसका अभ्यास नहीं करते, तो समस्या सत्य के प्रति तुम्हारी नापसंदगी है। जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, वे उसे कभी नहीं खोजेंगे, चाहे उनके साथ कुछ भी हो जाए। केवल सत्य से प्रेम करने वालों के पास ही परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय होता है, और जब ऐसी चीजें होती हैं जो उन्हें समझ नहीं आतीं, तो वे सत्य की खोज करने में सक्षम होते हैं। अगर तुम परमेश्वर के इरादे नहीं समझ सकते और अभ्यास करना नहीं जानते, तो तुम्हें सत्य समझने वाले कुछ लोगों के साथ संगति करनी चाहिए। अगर तुम्हें सत्य समझने वाले लोग न मिल पाएँ, तो तुम्हें शुद्ध समझ वाले कुछ लोगों को ढूँढ़कर एकचित्त होकर एक-साथ परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए, परमेश्वर से खोजना चाहिए, परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए, और परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए एक रास्ता खोले जाने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अगर तुम सभी सत्य के लिए तरसते हो, सत्य की खोज करते हो, और सत्य पर एक-साथ संगति करते हो, तो संभव है कि एक समय आए जब तुममें से किसी को कोई अच्छा समाधान सूझ जाए। अगर तुम सभी को वह समाधान उपयुक्त लगता है और वह एक अच्छा उपाय है, तो यह पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी के कारण हो सकता है। फिर अगर तुम अभ्यास का और भी सटीक मार्ग निकालने के लिए एक-साथ संगति करते हो, तो यह निश्चित रूप से सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होगा। अपने अभ्यास में, अगर तुम पाते हो कि तुम्हारे अभ्यास का तरीका अभी भी कुछ ठीक नहीं है, तो तुम्हें उसे जल्दी से सही करने की आवश्यकता है। अगर तुम थोड़ी गलती करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें दोषी नहीं ठहराएगा, क्योंकि तुम जो करते हो उसमें तुम्हारे इरादे सही हैं, और तुम सत्य के अनुसार अभ्यास कर रहे हो। तुम बस सिद्धांतों के बारे में थोड़े भ्रमित हो और तुमने अपने अभ्यास में एक त्रुटि कर दी है, जो क्षम्य है। लेकिन जब ज्यादातर लोग चीजें करते हैं, तो वे इसे किए जाने के तरीके को लेकर अपनी कल्पना के आधार पर इसे करते हैं। सत्य के अनुसार अभ्यास कैसे करें या परमेश्वर की स्वीकृति कैसे प्राप्त करें, इस पर विचार करने के लिए वे परमेश्वर के वचनों को आधार नहीं बनाते। इसके बजाय, वे केवल इस बारे में सोचते हैं कि कैसे स्वयं को लाभ पहुँचाया जाए, कैसे दूसरों से अपना आदर करवाया जाए, और कैसे दूसरों से अपनी प्रशंसा करवाई जाए। वे चीजें पूरी तरह से अपने विचारों के आधार पर और विशुद्ध रूप से खुद को संतुष्ट करने के लिए करते हैं, जो परेशानी भरा है। ऐसे लोग कभी सत्य के अनुसार कार्य नहीं करेंगे, और परमेश्वर हमेशा उनसे घृणा करेगा। अगर वास्तव में तुम्हारे पास अंतरात्मा और विवेक है, तो चाहे कुछ भी हो जाए, तुम्हें प्रार्थना करने और खोजने के लिए परमेश्वर के सामने आने में सक्षम होना चाहिए, अपने कामों में उद्देश्यों और मिलावट की गंभीरता से जाँच करने में सक्षम होना चाहिए, यह तय करने में सक्षम होना चाहिए कि परमेश्वर के वचनों और अपेक्षाओं के अनुसार क्या करना उचित है, और बार-बार तोलना और विचारना चाहिए कि कौन-से कार्य परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं, कौन-से कार्य परमेश्वर में घृणा उत्पन्न करते हैं, और कौन-से कार्य परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करते हैं। तुम्हें मन में इन मामलों पर तब तक बार-बार विचार करना चाहिए, जब तक तुम उन्हें स्पष्ट रूप से समझ नहीं लेते। अगर तुम जान जाते हो कि कुछ करने के पीछे तुम्हारे अपने उद्देश्य हैं, तो तुम्हें इस पर चिंतन करना चाहिए कि तुम्हारे उद्देश्य क्या हैं, वे खुद को संतुष्ट करने के लिए हैं या परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए, वे तुम्हारे लिए फायदेमंद हैं या परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए, और उनके क्या परिणाम होंगे...। अगर तुम अपनी प्रार्थनाओं में इस तरह से और अधिक खोज और चिंतन करते हो और सत्य खोजने के लिए खुद से और अधिक प्रश्न पूछते हो तो तुम्हारे क्रियाकलापों में विचलन छोटे से छोटे होते जाएँगे। इस तरह से सत्य खोज सकने वाले लोग ही परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहकर उसका भय मानते हैं, क्योंकि ऐसे में तुम परमेश्वर के वचनों की अपेक्षाओं के अनुसार और आज्ञाकारी हृदय से खोजते हो, और इस तरह खोजने से तुम जिन निष्कर्षों पर पहुँचते हो, वे सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होंगे।

अगर किसी विश्वासी के कर्म सत्य के अनुरूप नहीं हैं, तो वह किसी अविश्वासी के समान ही है। वह उस तरह का इंसान है, जिसके दिल में परमेश्वर नहीं होता, और जो परमेश्वर से भटक जाता है, और ऐसा इंसान परमेश्वर के घर में काम पर रखे गए उस कर्मचारी की तरह होता है, जो अपने मालिक के लिए कोई छोटे-मोटे कार्य कर देता है, कुछ मुआवजा पाता है और फिर चला जाता है। यह ऐसा इंसान बिल्कुल नहीं है, जो परमेश्वर पर विश्वास करता है। परमेश्वर से मान्यता प्राप्त करने के लिए क्या करना है, यह वह पहली चीज है जिसकी, काम करते समय तुम्हें जाँच करनी चाहिए और जिस पर काम करना चाहिए; यह तुम्हारे क्रियाकलापों का सिद्धांत और दायरा होना चाहिए। तुम जो कर रहे हो वह सत्य के अनुरूप है या नहीं, इसका निश्चय तुम्हें इसलिए करना चाहिए, क्योंकि अगर वह सत्य के अनुरूप है, तो वह निश्चित रूप से परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है। ऐसा नहीं है कि तुम्हें यह मापना चाहिए कि यह बात सही है या गलत है, या क्या यह हर किसी की रुचि के अनुरूप है, या क्या यह तुम्हारी अपनी इच्छाओं के अनुसार है; बल्कि तुम्हें यह निश्चित करना चाहिए कि यह सत्य के अनुरूप है या नहीं, और यह कलीसिया के काम और हितों को लाभ पहुँचाता है या नहीं। अगर तुम इन बातों पर विचार करते हो, तो तुम चीज़ों को करते समय परमेश्वर के इरादों के अधिकाधिक अनुरूप होते जाओगे। अगर तुम इन पहलुओं पर विचार नहीं करते, और चीज़ों को करते समय केवल अपनी इच्छा पर निर्भर रहते हो, तो तुम्हारा उन्हें गलत तरीके से करना गारंटीशुदा है, क्योंकि मनुष्य की इच्छा सत्य नहीं है और निश्चित रूप से, वह परमेश्वर के साथ असंगत होती है। अगर तुम परमेश्वर द्वारा मान्य होने की इच्छा रखते हो, तो तुम्हें सत्य के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, न कि अपनी इच्छा के अनुसार। कुछ लोग अपने कर्तव्य करने के नाम पर कुछ निजी मामलों में संलग्न रहते हैं। उनके भाई और बहन इसे अनुचित मानते हैं और इसके लिए उन्हें टोकते हैं, लेकिन ये लोग दोष स्वीकार नहीं करते। उन्हें लगता है कि यह एक व्यक्तिगत मामला है, जिसमें कलीसिया का कार्य, वित्त या उसके लोग शामिल नहीं हैं, और यह कोई बुरा काम नहीं है, इसलिए लोगों को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कुछ चीजें तुम्हें निजी मामले लग सकती हैं, जिन पर कोई सिद्धांत या सत्य लागू नहीं होता। किंतु तुम्हारे द्वारा किए गए कार्य को देखते हुए, तुम बहुत स्वार्थी रहे। तुमने कलीसिया के कार्य या परमेश्वर के घर के हितों पर कोई ध्यान नहीं दिया, न ही इस बात पर ध्यान दिया कि क्या यह परमेश्वर के लिए संतोषजनक होगा; तुम केवल अपने फायदे पर विचार करते रहे। इसमें पहले ही संतों का उचित आचरण और साथ ही इंसान की मानवता शामिल हैं। भले ही तुम जो कर रहे थे, उससे चर्च के हित नहीं जुड़े थे, न ही उसमें सत्य शामिल था, फिर भी अपने कर्तव्य के पालन करने का दावा करते हुए एक निजी मामले में संलग्न होना सत्य के अनुरूप नहीं है। चाहे तुम कुछ भी कर रहे हो, चाहे मामला कितना भी बड़ा या छोटा हो, और चाहे वह परमेश्वर के परिवार में तुम्हारा कर्तव्य हो या तुम्हारा निजी मामला, तुम्हें इस बात पर विचार करना ही चाहिए कि जो तुम कर रहे हो वह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है या नहीं, साथ ही क्या यह ऐसा कुछ है जो किसी मानवता युक्त इंसान को करना चाहिए। अगर तुम जो भी करते हो उसमें उस तरह सत्य की तलाश करते हो तो तुम ऐसे इंसान हो जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करता है। अगर तुम हर बात और हर सत्य को इस तरह गंभीरता से लेते हो, तो तुम अपने स्वभाव में बदलाव हासिल करने में सक्षम होगे। ऐसे लोग हैं, जो सोचते हैं, “जब मैं अपना कर्तव्य करता हूँ, तब मेरा सत्य का अभ्यास करना तो ठीक है, लेकिन जब मैं अपने निजी कार्य कर रहा होता हूँ, तो मुझे परवाह नहीं कि सत्य क्या कहता है—मैं वही करूँगा जो मुझे पसंद है, जो कुछ भी मुझे अपने फायदे के लिए करना पड़े।” इन शब्दों से तुम देख सकते हो कि वे सत्य के प्रेमी नहीं हैं। वे जो कुछ करते हैं, उसमें कोई सिद्धांत नहीं होता। इस बात पर विचार तक किए बिना कि परमेश्वर के घर पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, वे जो कुछ भी उनके लिए फायदेमंद होगा, करेंगे। नतीजतन, जब वे कुछ कर लेते हैं, तो परमेश्वर उनमें मौजूद नहीं होता, और वे महसूस करते हैं कि वे अंधकार में हैं और परेशान हैं, और नहीं जानते कि क्या हो रहा है। क्या यह उनके लिए समुचित दंड नहीं हैं? अगर तुम अपने कार्यों में सत्य का अभ्यास नहीं करते और परमेश्वर का अपमान करते हो, तो तुम उसे नाराज कर रहे हो। अगर कोई इंसान सत्य से प्रेम नहीं करता और अक्सर अपने विचारों के अनुसार काम करता है, तो वह अक्सर परमेश्वर को नाराज करेगा। वह उसे ठुकरा देगा और उसे एक तरफ कर देगा। ऐसे लोगों के क्रियाकलापों को अक्सर परमेश्वर द्वारा मान्यता नहीं दी जाती और यदि वे पश्चात्ताप करना नहीं जानते, तो उन्हें जल्द ही दंड का सामना करना पड़ेगा।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 575

तुम जो भी कर्तव्य निभाते हो उसमें जीवन प्रवेश शामिल होता है। तुम्हारा कर्तव्य काफी नियमित हो या अनियमित, नीरस हो या जीवंत, तुम्हें हमेशा जीवन प्रवेश हासिल करना ही चाहिए। कुछ लोगों द्वारा किए गए कर्तव्य एकरसता वाले होते हैं; वे हर दिन वही चीज करते रहते हैं। मगर, इनको निभाते समय, ये लोग अपनी जो दशाएँ प्रकट करते हैं वे सब एक-समान नहीं होतीं। कभी-कभार अच्छी मनःस्थिति में होने पर लोग थोड़े ज्यादा लगनशील होते हैं और बेहतर काम करते हैं। अन्य समय में, किसी अज्ञात प्रभाव के कारण, उनके शैतानी भ्रष्ट स्वभाव उनमें शरारत पैदा कर देते हैं जिससे उनके विचार अनुचित हो जाते हैं; वे बुरी दशाओं और बुरी मनःस्थितियों में पड़ जाते हैं और अंततः अपने कर्तव्य लापरवाह तरीके से निभाते हैं। लोगों की आंतरिक दशाएँ उनके परिवेश के अनुसार बदलेंगी, लेकिन वे चाहे कैसे भी बदलें, यदि कोई व्यक्ति सत्य समझता है तो वह सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकता है। अपनी मनःस्थिति के आधार पर काम करना गलत है; यह अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर काम करना है। जब तुम अच्छी मनःस्थिति में होते हो, तो तुम जो करते हो उसमें थोड़ा दिल लगा सकते हो और जब तुम बुरी मनःस्थिति में होते हो, तो तुम जो करते हो उसमें अपना दिल नहीं लगाते और लापरवाही से काम करते हो—क्या यह काम करने का सैद्धांतिक तरीका है? क्या यह तरीका तुम्हें अपने कर्तव्य को एक मानक स्तरीय ढंग से निभाने देगा? मनःस्थिति चाहे जैसी हो, लोगों को परमेश्वर के सामने प्रार्थना करना और सत्य की खोज करना आना चाहिए, सिर्फ इसी तरीके से वे अपनी मनःस्थिति द्वारा बाधित होने, और उसके द्वारा इधर-उधर भटकाए जाने से बच सकते हैं। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें हमेशा खुद को जाँच कर देखना चाहिए कि क्या तुम सिद्धांत के अनुसार काम कर रहे हो, तुम्हारा कर्तव्य निर्वाह मानक स्तर का है या नहीं, कहीं तुम इसे लापरवाह ढंग से तो नहीं कर रहे हो, कहीं तुम बहानेबाज और सुस्त तो नहीं रहे हो, कहीं तुम्हारे रवैये और तुम्हारे सोचने के तरीके में कोई खोट तो नहीं। एक बार तुम्हारे आत्मचिंतन कर लेने और तुम्हारे सामने इन चीजों के स्पष्ट हो जाने से, अपना कर्तव्य निभाने में तुम्हें आसानी होगी। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हारा किसी भी चीज से सामना हो—नकारात्मकता और कमजोरी या काट-छाँट के बाद बुरी मनःस्थिति में हो—तुम्हें इससे ठीक से पेश आना चाहिए, और तुम्हें साथ ही सत्य को खोजना और परमेश्वर के इरादों को समझना चाहिए। ये काम करने से तुम्हारे पास अभ्यास का एक मार्ग होगा। अगर तुम अपना कर्तव्य निर्वाह बहुत अच्छे ढंग से करना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी मनःस्थिति से बिल्कुल प्रभावित नहीं होना चाहिए। तुम चाहे कितने भी नकारात्मक या कमजोर महसूस कर रहे हो, तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए, अपने दायित्व और जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए और अपने हर काम में सिद्धांतों पर कायम रहना चाहिए। यदि तुम ऐसा करते हो, तो न केवल अन्य लोग तुम्हें स्वीकार करेंगे, बल्कि परमेश्वर भी तुम्हें पसंद करेगा। इस प्रकार, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे जो जिम्मेदार है, जो जिम्मेदारी ले सकता है, जो वास्तव में अच्छा है और जो वास्तव में अपने कर्तव्य मानक के अनुरूप निभाता है और तुम पूरी तरह से एक सच्चे इंसान के समान जिओगे। ऐसे लोगों का शुद्धिकरण किया जाता है और वे अपने कर्तव्य निभाते समय वास्तविक बदलाव हासिल करते हैं, वे परमेश्वर की दृष्टि में ईमानदार लोग कहे जा सकते हैं। केवल ईमानदार लोग ही सत्य का अभ्यास करने में डटे रह सकते हैं ताकि वे सिद्धांत के साथ क्रियाकलाप करना हासिल कर सकें और अपने कर्तव्य मानक के अनुरूप निभाने में सक्षम हो सकें। सिद्धांत पर चलकर कर्म करने वाले लोग अच्छी मनोदशा में होने पर अपना कर्तव्य ध्यान से निभाते हैं; वे लापरवाह ढंग से कार्य नहीं करते, वे ढीठ नहीं होते और दूसरे उनके बारे में ऊँचा सोचें इसके लिए दिखावा नहीं करते। बुरी मनःस्थिति में होने पर भी वे अपने रोजमर्रा के काम को उतनी ही ईमानदारी और जिम्मेदारी से पूरा करते हैं और यदि वे किसी कष्टदायक चीज का सामना भी करते हैं जो अपने कर्तव्य निभाते समय उन पर दबाव डालती है या बाधा पहुँचाती है तो भी वे परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत रख पाते हैं और यह कहते हुए प्रार्थना करते हैं, “मेरे सामने चाहे जितनी बड़ी समस्या खड़ी हो जाए—भले ही आसमान फट कर गिर पड़े—जब तक मैं जीवित हूँ, मुझे अपना कर्तव्य पूरा करना होगा। मेरे जीवन का प्रत्येक दिन वह दिन है जब मुझे अच्छी तरह से अपना कर्तव्य निभाना होगा, ताकि मैं परमेश्वर द्वारा मुझे दिए गए इस कर्तव्य और उसके द्वारा मेरे शरीर में प्रवाहित इस साँस के योग्य बना रहूँ। चाहे जितनी भी मुश्किलों में रहूँ, मैं उन सबको परे रख दूँगा क्योंकि अपना कर्तव्य पूरा करना मेरे लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है!” जो लोग किसी व्यक्ति, घटना, चीज या माहौल से प्रभावित नहीं होते, जो किसी मनःस्थिति या बाहरी स्थिति से बेबस नहीं होते, और जो परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपे गये कर्तव्यों और आदेशों को सबसे आगे रखते हैं—वही परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं और सच्चाई के साथ उसके सामने समर्पण करते हैं। ऐसे लोगों ने जीवन प्रवेश हासिल किया है और सत्य वास्तविकता में प्रवेश किया है। यह सत्य को जीने की सबसे सच्ची और व्यावहारिक अभिव्यक्तियों में से एक है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन प्रवेश कर्तव्य निभाने से प्रारंभ होता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 576

कुछ लोग अपने कर्तव्य निभाते समय चाहे किसी भी मसले का सामना कर रहे हों, वे सत्य नहीं खोजते और हमेशा अपनी धारणाओं, कल्पनाओं, विचारों और इच्छाओं के अनुसार कार्य करते हैं। शुरू से अंत तक वे अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करते हैं और अपने भ्रष्ट स्वभावों के नियंत्रण के अधीन कार्य करते हैं। हो सकता है वे हमेशा अपने कर्तव्य निभाते प्रतीत हों, पर क्योंकि उन्होंने सत्य को कभी स्वीकार नहीं किया है और वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार चीजें करने में विफल रहे हैं, इसलिए वे आखिरकार सत्य और जीवन हासिल नहीं करते और वे सेवाकर्मियों के नाम के ही लायक बन जाते हैं। तो ऐसे लोग अपने कर्तव्यों को करते समय किस पर निर्भर करते हैं? ऐसे व्यक्ति न तो सत्य पर निर्भर करते हैं, न ही परमेश्वर पर। जिस थोड़े से सत्य को वे समझते हैं, वह उनके हृदयों में राज नहीं करता; वे अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए अपनी खुद की खूबियों और प्रतिभाओं पर, उस ज्ञान पर जो उन्होंने प्राप्त किया है, और साथ ही अपनी इच्छाशक्ति या नेक इरादों पर भरोसा कर रहे हैं। अगर बात ऐसी है, तो क्या वे अपने कर्तव्यों को मानक स्तर तक निभाने में सक्षम होंगे? जब लोग अपने कर्तव्य निभाने के लिए अपनी धारणाओं, कल्पनाओं, ज्ञान और शिक्षा पर निर्भर करते हैं तो भले ही वे बाहरी तौर पर अपने कर्तव्य निभा रहे हों और ऐसा न लगे कि उन्होंने कोई बुराई की है, उन्होंने सत्य का अभ्यास नहीं किया है। ऐसे में क्या उनका किया गया हर काम परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण है? क्या यह परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है? एक और समस्या भी है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता : अपने कर्तव्य को निभाने की प्रक्रिया के दौरान यदि तुम्हारी धारणाएँ, कल्पनाएँ और तुम्हारी अपनी इच्छा कभी नहीं बदलती है तो यह साबित करता है कि तुमने कभी सत्य को स्वीकार नहीं किया है और ऐसे में तुम जो कुछ भी करते हो वह अपनी इच्छा से कार्य करना है और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना नहीं है। तो फिर अंतिम नतीजा क्या होगा? तुम्हें जीवन प्रवेश नहीं मिलेगा, तुम एक सेवाकर्मी बन जाओगे और इस प्रकार प्रभु यीशु के ये वचन पूरे करोगे : “उस दिन बहुत-से लोग मुझ से कहेंगे, ‘हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत-से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?’ तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, ‘मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ’” (मत्ती 7:22-23)। परमेश्वर कोशिश करने वालों और सेवा करने वाले इन लोगों को कुकर्मी क्यों कहता है? एक बात को लेकर हम निश्चित हो सकते हैं और वह यह कि ये लोग चाहे कोई भी कर्तव्य निभाएँ या कोई भी काम करें, इन लोगों की अभिप्रेरणाएँ, प्रेरक शक्तियाँ, इरादे और विचार पूरी तरह से उनकी अपनी इच्छाओं से पैदा होते हैं। ये पूरी तरह से उनके अपने हितों और संभावनाओं की रक्षा की खातिर होते हैं, अपने अभिमान और रुतबे की सुरक्षा और अपने मिथ्याभिमान को संतुष्ट करने की खातिर हैं। उनकी विचारशीलता और हिसाब-किताब इन्हीं चीजों के आसपास केंद्रित होता है, उनके दिलों में कोई सत्य नहीं होता और उनके पास ऐसे दिल नहीं होते जो परमेश्वर का भय मानते हों और उसके प्रति समर्पण करते हों। समस्या की जड़ यही है। आज, तुम लोगों के लिए किस तरह अनुसरण करना बहुत जरूरी है? सभी मामलों में, तुम्हें सत्य की खोज करनी चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर के इरादों और उसकी माँग के अनुसार अपना कर्तव्य ठीक से निभाना चाहिए। अगर तुम ऐसा करोगे तो तुम परमेश्वर की स्वीकृति पाओगे। तो परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार अपना कर्तव्य निभाने में खासतौर से क्या शामिल है? तुम जो कुछ भी करो, उसमें परमेश्वर से प्रार्थना करना सीखो, तुम्हें चिंतन करना चाहिए कि तुम्हारी मंशाएँ क्या हैं, तुम्हारे विचार क्या हैं, कि क्या ये मंशाएँ और विचार सत्य के अनुसार हैं; अगर नहीं हैं तो उन्हें त्याग देना चाहिए, जिसके बाद तुम्हें सत्य सिद्धांतों के अनुसार चलना चाहिए, और परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि तुम सत्य को अभ्यास में लाओ। यदि तुम अच्छी तरह से जानते हो कि तुम्हारी कथनी और करनी के पीछे के इरादे और लक्ष्य सत्य का उल्लंघन करते हैं और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं हैं, फिर भी तुम परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करते, आत्म-चिंतन नहीं करते और उन्हें हल करने के लिए सत्य नहीं खोजते हो तो यह खतरनाक है और तुम्हारे लिए बुराई करना और परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले काम करना आसान हो जाता है। यदि तुम एक या दो बार बुराई करते हो और पश्चात्ताप करते हो तो तुम्हारे पास अभी भी उद्धार की आशा है। यदि तुम बुराई करते रहते हो और इस बिंदु पर भी पश्चात्ताप करना नहीं जानते हो तो तुम संकट में हो : परमेश्वर तुम्हें एक तरफ कर देगा या तुम्हें त्याग देगा, जिसका अर्थ है कि तुम्हें हटा दिए जाने का खतरा है; जो लोग हर तरह के बुरे कर्म करते हैं उन्हें निश्चित रूप से दंडित किया जाएगा और हटा दिया जाएगा।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 577

लोगों को यह समझना चाहिए कि सृष्टिकर्ता का सृजित प्राणियों के साथ व्यवहार करने का एक बुनियादी सिद्धांत है जो सर्वोच्च सिद्धांत भी है। सृष्टिकर्ता सृजित प्राणियों के साथ कैसा व्यवहार करता है, यह पूरी तरह से उसकी प्रबंधन योजना और उसके कार्य की जरूरतों पर आधारित है; उसे किसी व्यक्ति से सलाह लेने की जरूरत नहीं है, न ही उसे किसी व्यक्ति से स्वीकृति प्राप्त करने की आवश्यकता है। जो कुछ भी उसे करना चाहिए और जिस भी तरह से उसे लोगों से व्यवहार करना चाहिए, वह करता है और वह चाहे जो भी करता हो और जिस भी तरह से लोगों से व्यवहार करता हो, वह सब सत्य सिद्धांतों और उन सिद्धांतों के अनुरूप होता है जिनके अनुसार सृष्टिकर्ता कार्य करता है। एक सृजित प्राणी के रूप में करने के लिए केवल एक ही चीज है और वह है सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पण करना; व्यक्ति को अपने आप कोई विकल्प नहीं चुनना चाहिए। यही वह विवेक है जो सृजित प्राणियों में होना चाहिए और अगर किसी व्यक्ति के पास यह नहीं है, तो वह इंसान कहलाने योग्य नहीं है। लोगों को अवश्य ही यह समझना चाहिए : सृष्टिकर्ता हमेशा सृष्टिकर्ता ही रहेगा; उसके पास किसी भी सृजित प्राणी के बारे में जैसे चाहे वैसे आयोजन करने और उस पर संप्रभुता रखने का सामर्थ्य है और वह इसके योग्य है और ऐसा करने के लिए उसे किसी कारण की आवश्यकता नहीं होती है। यह उसका अधिकार है। सृजित प्राणियों के पास यह फैसला देने का कोई अधिकार और योग्यता नहीं है कि सृष्टिकर्ता जो कुछ भी करता है वह सही है या गलत है या उसे कैसे कार्य करना चाहिए। कोई भी सृजित प्राणी यह चुनने का हक नहीं रखता कि उसे सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को स्वीकार करना है या नहीं; किसी भी सृजित प्राणी को यह माँग करने का हक नहीं है कि सृष्टिकर्ता को उस पर संप्रभुता कैसे रखनी चाहिए या उसकी नियति की व्यवस्था कैसे करनी चाहिए। यह सर्वोच्च सत्य है। सृष्टिकर्ता ने अपने सृजित प्राणियों के साथ चाहे जो भी किया हो या उसने यह चाहे जैसे भी किया हो, सृजित मनुष्यों को केवल एक ही काम करना चाहिए : सृष्टिकर्ता द्वारा की गई हरेक चीज खोजना, इसके प्रति समर्पण करना, इसे जानना और स्वीकार करना। इसका अंतिम नतीजा यह होगा कि सृष्टिकर्ता ने अपनी प्रबंधन योजना और अपना कार्य पूरा कर लिया होगा और उसकी प्रबंधन योजना बिना किसी अवरोध के आगे बढ़ चुकी होगी; इस बीच, चूँकि सृजित प्राणियों ने सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाएँ स्वीकार कर ली हैं और उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर लिया है, इसलिए वे सत्य हासिल कर चुके होंगे, सृष्टिकर्ता के इरादे समझ चुके होंगे और उसके स्वभाव को जान गए होंगे। एक और सिद्धांत है जो मुझे तुम लोगों को बताना चाहिए : सृष्टिकर्ता चाहे जो भी करे, उसकी अभिव्यक्तियाँ जिस भी प्रकार की हों, उसका कार्य बड़ा हो या छोटा, वह फिर भी सृष्टिकर्ता ही है; जबकि समस्त मनुष्य, जिन्हें उसने सृजित किया, चाहे उन्होंने कुछ भी किया हो, या वे कितने भी प्रतिभाशाली और गुणी क्यों न हों, वे सृजित प्राणी ही रहते हैं। जहाँ तक सृजित मनुष्यों का सवाल है, चाहे जितना भी अनुग्रह और जितने भी आशीष उन्होंने सृष्टिकर्ता से प्राप्त कर लिए हों, या जितनी भी दया, प्रेमपूर्ण करुणा या अनुग्रहपूर्ण व्यवहार प्राप्त कर लिया हो, उन्हें खुद को भीड़ से अलग नहीं मानना चाहिए, या यह नहीं सोचना चाहिए कि वे परमेश्वर के बराबर हो सकते हैं और सृजित प्राणियों में ऊँचा दर्जा प्राप्त कर चुके हैं। परमेश्वर ने तुम्हें चाहे जितने उपहार दिए हों, या जितना भी अनुग्रह प्रदान किया हो, या जितनी भी दयालुता से उसने तुम्हारे साथ व्यवहार किया हो, या चाहे उसने कैसी भी विशेष प्रतिभाएँ दी हों, इनमें से कुछ भी तुम्हारी पूँजी नहीं है। तुम एक सृजित प्राणी हो, और इस तरह तुम सदा एक सृजित प्राणी ही रहोगे। तुम्हें कभी नहीं सोचना चाहिए, “मैं परमेश्वर के हाथों में उसका लाड़ला हूँ। परमेश्वर मुझे कभी नहीं त्यागेगा; परमेश्वर का रवैया मेरे प्रति हमेशा प्रेम, देखभाल और नाजुक दुलार के साथ-साथ सुकून के गर्मजोशी भरे बोलों और प्रोत्साहन का होगा।” इसके विपरीत, सृष्टिकर्ता की दृष्टि में तुम अन्य सभी सृजित प्राणियों की ही तरह हो; परमेश्वर तुम्हें जिस तरह चाहे, उस तरह इस्तेमाल कर सकता है, और साथ ही तुम्हारे लिए जैसा चाहे, वैसा आयोजन कर सकता है, और तुम्हारे लिए सभी तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों के बीच जैसी चाहे वैसी कोई भी भूमिका निभाने की व्यवस्था कर सकता है। लोगों को यह ज्ञान होना चाहिए और उनमें यह विवेक होना चाहिए। यदि लोग परमेश्वर द्वारा बोले गए इन वचनों को समझ और स्वीकार कर सकते हैं, तो परमेश्वर के साथ उनका रिश्ता सामान्य हो जाएगा; उनके और परमेश्वर के बीच सबसे सामान्य प्रकार का रिश्ता स्थापित हो जाएगा; यदि लोग परमेश्वर द्वारा बोले गए इन वचनों को समझ और स्वीकार कर सकते हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से अपनी स्थिति को फिर से संरेखित करेंगे, अपना उचित स्थान ग्रहण करेंगे, अपने कर्तव्य पर डटे रहेंगे और परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करेंगे।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल सत्य समझकर ही व्यक्ति परमेश्वर के कर्मों को जान सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 578

परमेश्वर को जानना परमेश्वर के वचनों को पढ़ने, परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करने, और साथ ही कई परीक्षणों, शोधनों और काट-छाँट का अनुभव करने के द्वारा होना चाहिए; केवल तभी परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के स्वभाव का सच्चा ज्ञान होना संभव है। कुछ लोग कहते हैं : “मैंने देहधारी परमेश्वर को नहीं देखा है, तो मुझे परमेश्वर को कैसे जानना चाहिए?” वास्तव में, परमेश्वर के वचन उसके स्वभाव की एक अभिव्यक्ति हैं। परमेश्वर के वचनों से तुम मनुष्यों के लिए उसके प्रेम और उद्धार के साथ-साथ उन्हें बचाने के उसके तरीके को भी देख सकते हो...। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर के वचन स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए जाते हैं, वे मनुष्यों द्वारा लिखे नहीं जाते। उन्हें परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से व्यक्त किया गया है; स्वयं परमेश्वर अपने वचनों और अपने दिल की आवाज़ व्यक्त कर रहा है, जिन्हें उसके दिल से निकले वचन भी कहा जा सकता है। उन्हें उसके दिल से निकले वचन क्यों कहा जाता है? वह इसलिए, क्योंकि वे बहुत गहराई से निकलते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव, उसके इरादों, उसके ख्यालों और विचारों, मानवजाति के लिए उसके प्रेम, उसके द्वारा मानवजाति के उद्धार, तथा मानवजाति से उसकी अपेक्षाओं को व्यक्त करते हैं...। परमेश्वर के कथनों में कठोर वचन, कोमल और विचारशील वचन, और साथ ही प्रकाशनात्मक वचन भी शामिल हैं, जो इंसान की भावनाओं को ध्यान में नहीं रखते हैं। यदि तुम केवल प्रकाशनात्मक वचनों को देखो, तो तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर बहुत कठोर है। यदि तुम केवल कोमल वचनों को देखो, तो तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर ज़्यादा अधिकार-संपन्न नहीं है। इसलिए तुम्हें उन्हें संदर्भ से अलग करके नहीं देखना चाहिए; बल्कि उन्हें हर कोण से देखो। कभी-कभी परमेश्वर दयापूर्ण परिप्रेक्ष्य से बोलता है, और तब लोग मानवजाति के लिए उसके प्रेम को देखते हैं; कभी-कभी वह कठोर दृष्टिकोण से बोलता है, और तब लोग देखते हैं कि उसका स्वभाव कोई अपमान सहन नहीं करता, कि मनुष्य अत्यधिक गंदा है, और वह परमेश्वर के मुख को देखने या परमेश्वर के सामने आने के योग्य नहीं है, और यह पूरी तरह से परमेश्वर के अनुग्रह की बदौलत है कि उसे अब परमेश्वर के सामने आने की जो अनुमति है। परमेश्वर के कार्य करने के तरीके और उसके कार्य के अर्थ से उसकी बुद्धि को देखा जा सकता है। लोग इन चीजों को परमेश्वर के वचनों में भी देख सकते हैं, यहाँ तक कि उसके सीधे संपर्क में आए बिना भी। जब परमेश्वर की सच्ची समझ रखने वाले व्यक्ति मसीह के संपर्क में आते हैं, तो मसीह के साथ उनका अनुभव परमेश्वर के बारे में उनकी मौजूदा समझ के साथ मेल खा सकता है, किंतु जब केवल सैद्धांतिक समझ वाले व्यक्ति मसीह के संपर्क में आते हैं, तो वे इस पारस्परिक संबंध को नहीं देख सकते। देहधारण का सत्य सबसे गंभीर रहस्य है; मनुष्य के लिए उसकी थाह पाना कठिन है। देहधारण के रहस्य पर परमेश्वर के वचनों को एक साथ एकत्रित करो, उन्हें विभिन्न कोणों से देखो, और फिर मिलकर प्रार्थना करो, विचार करो और सत्य के इस पहलू पर आगे और सहभागिता करो। इससे तुम पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता प्राप्त करने और इसे समझने में सक्षम हो जाओगे। चूँकि मनुष्यों के पास परमेश्वर के संपर्क में आने का कोई अवसर नहीं है, इसलिए उन्हें टटोलते हुए आगे बढ़ने के लिए इस तरह के अनुभव पर भरोसा करना चाहिए और अगर उन्हें अंततः परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त करना है, तो एक बार में थोड़ा-सा प्रवेश करना चाहिए।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 579

परमेश्वर को जानने का क्या अभिप्राय है? इसका अभिप्राय है उसके सुख, क्रोध, दुख और खुशी को जानना, और उसके स्वभाव का ज्ञान होना—यही है परमेश्वर को वास्तव में जानना। तुम दावा करते हो कि तुमने उसे देखा है, फिर भी तुम उसके सुख, क्रोध, दुख और खुशी को नहीं जानते हो, उसके स्वभाव को नहीं जानते हो। न तुम उसकी धार्मिकता को जानते हो, न ही उसकी दया को, न ही तुम ये जानते हो कि वह क्या पसंद करता है और किस चीज से घृणा करता है। इसे परमेश्वर का ज्ञान नहीं है। कुछ लोग परमेश्वर का अनुसरण करने में सक्षम होते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वे वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हों। परमेश्वर में वास्तव में विश्वास करना परमेश्वर के प्रति समर्पित होना है। जो लोग वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं होते, वे परमेश्वर पर वास्तव में विश्वास नहीं करते—अंतर यहीं पर है। जब तुमने कई वर्षों से परमेश्वर का अनुसरण किया होता है और तुम्हें परमेश्वर का ज्ञान और समझ होती है, जब तुम्हें परमेश्वर के इरादों की कुछ समझ और उन पर पकड़ होती है, जब तुम मनुष्य को बचाने में परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों को जानते हो तो यह तब होता है, जब तुम वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हो, वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हो, वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करते हो, और वास्तव में परमेश्वर की आराधना करते हो। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो लेकिन परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश नहीं करते, और परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर के कार्य की कोई समझ नहीं रखते, तो तुम सिर्फ एक ऐसे अनुयायी हो, जो परमेश्वर के लिए दौड़-भाग करता है और जो कुछ बहुसंख्यक लोग करते हैं, उसका अनुसरण करता है। इसे सच्चा समर्पण नहीं कहा जा सकता, सच्ची आराधना तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। सच्ची आराधना कैसे उत्पन्न होती है? बिना किसी अपवाद के, जो लोग परमेश्वर को देखते हैं और वास्तव में परमेश्वर को जानते हैं, वे सब उसकी आराधना करते और उसका भय मानते हैं; वे सभी उसके सामने झुककर उसकी आराधना करने के लिए बाध्य होते हैं। वर्तमान में, जब देहधारी परमेश्वर कार्य कर रहा है, तब लोगों के पास उसके स्वभाव की और जो उसके पास है और जो वह स्वयं है उसकी जितनी अधिक समझ होती है, उतना ही अधिक लोग इन बातों को संजोकर रखेंगे, उतना ही अधिक वे परमेश्वर का भय मानेंगे। आम तौर पर, परमेश्वर की जितनी कम समझ लोगों में होती है, वे उतना ही अधिक लापरवाह होते हैं, और इसलिए वे परमेश्वर से मनुष्य के समान बर्ताव करते हैं। अगर लोग वास्तव में परमेश्वर को जानते और देखते, तो वे भय से काँप उठते और जमीन पर गिरकर दंडवत करते। “जो मेरे बाद आने वाला है, वह मुझ से शक्तिशाली है; मैं उसकी जूती उठाने के योग्य नहीं” (मत्ती 3:11)—यूहन्ना ने ऐसा क्यों कहा? यद्यपि अंतरतम में उसके पास परमेश्वर का बहुत गहरा ज्ञान नहीं था, फिर भी वह जानता था कि परमेश्वर विस्मय की भावना जगाता है। आजकल कितने लोग परमेश्वर का भय मानने में सक्षम हैं? अगर वे परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते, तो वे किस प्रकार उसका भय मान सकते हैं? अगर लोग न तो मसीह का सार जानते हैं, न ही परमेश्वर के स्वभाव को समझते हैं, तो वे व्यावहारिक परमेश्वर की आराधना करने में और भी कम सक्षम होंगे। अगर वे सिर्फ मसीह के साधारण और सामान्य बाहरी रूप को देखते हैं फिर भी उसके सार को नहीं जानते हैं, तो मसीह के साथ मात्र एक साधारण व्यक्ति की तरह बर्ताव करना लोगों के लिए आसान है। वे उसके प्रति एक असम्मानजनक रवैया अपना सकते हैं, उसे धोखा दे सकते हैं, उसका प्रतिरोध कर सकते हैं, उसके खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं और उसकी आलोचना कर सकते हैं। वे आत्मतुष्ट हो सकते हैं और हो सकता है वे उसके वचन को गंभीरता से न लें; वे परमेश्वर के बारे में धारणाएँ भी बना सकते हैं, उस पर आरोप लगा सकते हैं और उसकी ईश-निंदा कर सकते हैं। इन मुद्दों को सुलझाने के लिए व्यक्ति को मसीह के सार, एवं मसीह की दिव्यता को अवश्य जानना चाहिए। परमेश्वर को जानने का यही मुख्य पहलू है; यही वो है जिसमें व्यावहारिक परमेश्वर में विश्वास करने वाले हर इंसान को प्रवेश करना चाहिए और जिसे उन्हें हासिल करना चाहिए।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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