चमकती पूर्वी बिजली की सफलता का उद्गम

हर बार जब चमकती पूर्वी बिजली का वर्णन होता है, प्रभु में रहने वाले कई भाई बहनें हैरानी महसूस करते हैं: ऐसा क्यों है कि जैसे-जैसे धार्मिक समुदाय पूरी तरह से उजाड़ व पति​त हो रहा है, जैसे-जैसे हर धर्म चमकती पूर्वी बिजली का विरोध करने और उसे निर्वासित करने के लिए उत्‍तरोत्‍तर सतर्क व रूढ़िवादी बन रहा है, वैसे वैसे चमकती पूर्वी बिजली न तो उजाड़ हो रही है और न ही उसकी अवनति हो रही है, वरन पूरे चीन की मुख्य भूमि में अविरल महालहर की तरह आगे बढ़ते हुए विस्तार कर रही है? विशेषकर तब जब कि इसका विस्‍तार चीन की सीमा के बाहर दूसरे देशों व क्षेत्रों में भी हो गया है, और दुनियाभर में ज्यादा से ज्यादा लोग इसे स्वीकार करते जा रहे हैं? इस तथ्य के समक्ष धार्मिक लोग पूरी तरह से परेशान है, जबकि इसका कारण काफी आसान है: हर धार्मिक संप्रदाय जिसे चमकती पूर्वी बिजली कहता है, वह अंत के दिनों के उद्धारक यीशु की वापसी है जो 'सफेद बादल' पर स्वर्ग से अवतरित हुए हैं; ये परमेश्वर स्‍वयं देह धारण कर वापिस आए हैं और वे असली व वास्तविक हैं! अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर मसीहा जो लाते हैं वह न्‍याय का कार्य है जो मानव के स्‍वभाव को बदलता है और उसे शुद्ध करता है, ताकि मानवता उद्धार पा सके और सिद्ध हो जाए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर वे सभी सत्य देते हैं जो मानवता को शुद्ध और सिद्ध कर उसे बचाते हैं। इस वजह से, भले ही पूरी दुनिया में हर धार्मिक संप्रदाय अंत के दिनों के परमेश्वर के अवतरण या उनके कार्य का विरोध, हमला, उत्पीड़न, निंदा, या आलोचना करे, ऐसा कोई भी या कोई बल नहीं है जो कभी भी उन्‍हें वह पाने से रोक या दबा सकता हो जो वे पाना चाहते हैं। शैतान का कोई भी बल परमेश्वर के अधिकार, शक्ति, और उनकी सर्वशक्तिमत्‍ता बुद्धिमत्‍ता से श्रेष्‍ठ नहीं हो सकता है।

कई लोग यह मानते हैं कि ऐसी कोई भी ​चीज जिसकी ज्यादातर लोग निंदा करते हों, वह सच्चा मार्ग नहीं हो सकता है, लेकिन क्या यह दृष्टिकोण सत्य के अनुरूप है? अनुग्रह के युग के वक्त के बारे में सोचिए, जब परमेश्वर यहूदिया में अपना नया कार्य शुरू करने के लिए देह में आए। आरंभ से अंत तक, यहूदी धार्मिक समुदाय द्वारा उन पर अत्याचार किए गए, उसकी निंदा और बदनामी की गई। प्रभु यीशु को मारने के लिए वे जो कुछ भी कर सकते थे उन्होंने किया। अंत में, उन्होंने प्रभु यीशु को पकड़ने के लिए रोमन शासन के साथ सांठ—गांठ की और उन्होंने दयालु प्रभु यीशु को सलीब पर लटका दिया। प्रभु यीशु के पुनजीर्वित होने और स्वर्गारोहण करने पर भी, उन्होंने यूहन्‍ना, पौलुस, और अन्य प्रचारकों व अनुयायियों के खिलाफ हर प्रकार की अफवाहें फैलाना, उन्हें फंसाना और कलंक लगाना जारी रख उन्‍हें 'नासरियों का संप्रदाय' और 'विधर्मी व कुपंथी' कहा। यहूदी धार्मिक समुदाय ने प्रभु यीशु के अनुयायियों को ढूंढ कर उन्हें सताने के लिए हर संभव काम किया। लेकिन परमेश्वर की बुद्धिमत्‍ता हमेशा ही शैतान की चालों का फायदा उठा कर उस पर निर्माण करती है; शैतान भला उनका काम कैसे बाधित या नष्ट कर सकता है? यह रोमन साम्राज्य के अकारण उत्पीड़न और निष्कासन की वजह से अनुयायियों को विभिन्न देशों को भागने के लिए मजबूर होना पड़ा और इस तरह प्रभु यीशु का उद्धार दूर-दूर तक पृथ्वी के चारों ओर फैल गया। भाइयों और बहनों, आइए हम इस बात पर विचार करते हैं: इतने सारे लोगों ने प्रभु यीशु का प्रतिरोध क्‍यों किया और उनकी राह में बाधा क्‍यों डाली? क्या यह हो सकता है कि प्रभु यीशु सच्चे मार्ग को नहीं ला रहे थे? क्या यह हो सकता है कि उस समय प्रभु यीशु के अनुयायियों और प्रचारकों द्वारा जिसका प्रसार किया था, वह परमेश्वर का उद्धार नहीं था? क्या यह हो सकता है कि लोगों ने जिस चीज को त्यागा और जिसका विरोध किया, वह परमेश्वर का मार्ग नहीं था? सत्‍य में, हम सच्‍चे मार्ग को इस बात पर नहीं आंक सकते हैं कि कितने लोग उसका सम​र्थन करते हैं? किसी चीज को केवल इसलिए गलत मत समझिए, क्योंकि अधिकांश लोग इसका विरोध करते हैं। जब तक यह परमेश्वर का कार्य है, तब तक भले ही पूरी दुनिया इसका विरोध करे और त्याग कर दे, परमेश्वर द्वारा लाया गया सच्चा मार्ग त्यागा नहीं जा सकता; इसमें कोई अपवाद नहीं हैं। अगर हम परमेश्वर में विश्वास करते हैं और कई वर्षों तक हमने उनका पालन किया है, फिर भी परमेश्वर के कार्य को नहीं समझते हैं, तो शैतान द्वारा आसपास फैलाए गए विभिन्न भ्रामक धोखों और अफवाहों से हमारा धोखा खाना व घिर जाना आसान हो जाता है। एक विश्‍वासी से परिवर्तित होकर शैतान का अनुयायी बनना, परमेश्वर की सेवा करने के साथ ही उनका विरोध भी करना, क्या यह एक व्यक्ति के लिए विपत्ति और दुख नहीं लाता है? बहुत से लोग विनम्र और खोजी हृदय के साथ सच्चे मार्ग का अध्ययन नहीं करते, वे तो बस झुंड का अनुसरण करते हैं और जो बाकी करते हैं वह वे भी करते हैं। अन्य लोग परमेश्वर और उनके कार्य का चाहे जिस प्रकार आकलन करें या हमला करें, वे केवल उन्हीं वचनों को रटते हैं और अंधों की तरह उसका पालन करते हैं। यह एक बहुत ही खतरनाक बात है। यदि वे इस मार्ग का हठ करते हैं तो वे अंततः खुद को ऐसे मार्ग पर पाएंगे जहां से कोई वापसी नहीं। बहुत पहले, जब प्रभु यीशु के अनुयायियों ने मंदिर में सुसमाचार का प्रचार किया था और जनता के विरोध का सामना किया, तो गमलीएल नामक एक व्‍यक्ति, जो कानून का शिक्षक था, ने यहूदी लोगों को चेताया था कि, "इसलिये अब मैं तुम से कहता हूँ, इन मनुष्यों से दूर ही रहो और इन से कुछ काम न रखो; क्योंकि यदि यह धर्म या काम मनुष्यों की ओर से हो तब तो मिट जाएगा; परन्तु यदि परमेश्‍वर की ओर से है, तो तुम उन्हें कदापि मिटा न सकोगे। कहीं ऐसा न हो कि तुम परमेश्‍वर से भी लड़नेवाले ठहरो।" क्या आज के आस्तिकों को भी यह चेतावनी के रूप में पर्याप्‍त नहीं है? अब, अंत के इन दिनों में, एक बार फिर चीन में, जो एक ऐसा राष्ट्र है जहां नास्तिक और क्रांतिकारी शक्ति रखते हैं और जो बड़े लाल अजगर का अड्डा है, परमेश्वर ने देह धारण की है ताकि अपने आवास से शुरू होने वाले न्‍याय के कार्य को कर सके। परमेश्वर मानवता का न्याय और उसे शुद्ध करने के लिए सत्य बताते हैं, जिसका उद्देश्य मानवों को शैतान के बुरे प्रभाव से पूरी तरह से बचाना है। अंत में, परमेश्वर उन्हें अपने राज्य में ले आएंगे और उन्हें एक सुंदर मंज़िल प्राप्त होगी। हालांकि, प्रभु यीशु के प्रति यहूदियों के विरोध की ऐतिहासिक त्रासदी एक बार फिर रंगमंच पर दिखाई दी है। चूंकि परमेश्वर अंत के दिनों का अपना कार्य करते हैं जो विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के लोगों की धारणाओं के विरुद्ध हमला करता है, इसलिए ये लोग प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत नहीं करते। इसके स्थान पर ये लोग सभी प्रकार की विकृत शिक्षाएं और भ्रमपूर्ण अफवाहें फैलाते हैं। ये देहधारी परमेश्वर के कार्य को "दुष्‍ट कुपंथ" या "विधर्म" के रूप में निंदा करते और परमेश्‍वर और उनके कार्य को बदनाम करते हैं। यहां तक ​​कि देहधारी परमेश्वर पर अत्याचार करने और उन्‍हें गिरफ्तार करने के लिए ये लोग चीनी कम्युनिस्ट सरकार के साथ साँठ-गाँठ भी करते हैं। इनके कर्म भी उस यहूदी धार्मिक समुदाय की ही तरह है, जिन्होंने पहले प्रभु यीशु को फंसाया व सताया था। बहरहाल, सच्चा मार्ग, आखिरकार, सच्चा मार्ग है। परमेश्वर का कार्य, आखिरकार, परमेश्वर का कार्य है। धार्मिक संप्रदाय अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य का चाहे कैसे भी विरोध या उसकी निंदा करें, धार्मिक समुदाय और पूरे विश्व को बहुत भीतर तक हिलाते हुए, उनके राज्य की अच्छी ख़बर पूरी तरह से पूरे चीन में फैल गई है।

तो, ऐसा क्यों है कि कई विश्वासी सच्चे मार्ग का विरोध करते हैं? इसके मुख्यतः दो कारण हैं: 1.) लोग पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा को समझ नहीं पाते हैं और उन्हें इस मुहावरे की कोई समझ नहीं है, "परमेश्वर का कार्य हमेशा ही आगे बढ़ता रहता है।" उन्हें इस बात की थोड़ी सी भी जानकारी नहीं हैं कि उन्हें परमेश्वर के वर्तमान कार्य को खोजना चाहिए; वे केवल परमेश्वर के पुराने कार्य के आधार पर उनके नए कार्य का आकलन करते हैं। वे जो कुछ भी देखते हैं, अगर वे उससे सहमत नहीं हुए, तो वे परमेश्वर के नये कार्य को "विधर्म" या "दुष्‍ट कुपंथ" मानेंगे। 2.) लोगों का स्वभाव अभिमानी और दंभात्‍मक होता है। वे एक विनम्र दिल से परमेश्वर के नए कार्य को बिल्कुल भी नहीं खोजते हैं। इसके बजाय, वे अड़ियल ढंग से अपने विचारों से चिपके रहते हैं और यह विश्वास करते हैं कि उनकी अपनी राय परमेश्वर की राय के समान हैं और वे पूरी तरह से सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं। इस प्रकार से, जब परमेश्वर ने अपने नए युग की शुरुआत की, तो उनके नए कार्य को लोगों के विरोध का सामना करने का कारण यह नहीं था कि परमेश्वर के मार्ग में कोई त्रुटि थी और यह भी नहीं कि उनके नये कार्य में कोई दोष था। बल्कि, इसका कारण यह है कि लोग परमेश्वर का कार्य नहीं समझते हैं और यह कि वे अपनी अहंकार और दंभात्‍मकता के कारण सत्य खोजने में सक्षम नहीं हैं। यह बेहद बेहुदा और हास्यास्पद होगा अगर हम यह फैसला करें कि यह सच्चा मार्ग नहीं है क्योंकि ज्यादातर विश्वासियों ने परमेश्वर के नये कार्य का विरोध किया है और त्याग दिया है। यदि हम इसकी वजह से अंत के दिनों के परमेश्वर के उद्धार को खो देते हैं तो यह निश्चित रूप से हमारी अनन्त हानि के लिए होगा और न निस्‍संदेह यह एक अपूरणीय और प्राणघातक त्रुटि होगी।

तो फिर हम सत्य के मार्ग और गलत मार्ग के बीच कैसे अंतर करते हैं? परमेश्वर के वचन ने हमें सिद्धांत दिया है जिससे हम यह अंतर कर सकते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "परमेश्वर के कार्यों को जानना कोई आसान बात नहीं है: तुम्हारी खोज में तुम्हारा स्तर-मान और उद्देश्य होना चाहिए, तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि सच्चे मार्ग को कैसे खोजें, और कैसे मापें कि क्या यह सच्चा मार्ग है या नहीं, और क्या यह परमेश्वर का कार्य है या नहीं। सच्चे मार्ग की तलाश करने में सबसे बुनियादी सिद्धान्त क्या है? तुम्हें देखना होगा कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है कि नहीं, क्या ये वचन सत्य की अभिव्यक्ति हैं या नहीं, किसके लिए गवाही देनी है, और यह तुम्हारे लिए क्या ला सकता है। सच्चे मार्ग और गलत मार्ग के मध्य अंतर करने के लिए बुनियादी ज्ञान के कई पहलुओं की आवश्यकता होती है, जिनमें सबसे बुनियादी है यह बताना कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं। क्योंकि परमेश्वर पर विश्वास का मनुष्य का सार पवित्र आत्मा पर विश्वास है, और यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर पर उसका विश्वास इसलिए है क्योंकि यह देह परमेश्वर के आत्मा का मूर्तरूप है, जिसका अर्थ यह है कि ऐसा विश्वास पवित्र आत्मा पर विश्वास है। आत्मा और देह के मध्य अंतर हैं, परन्तु क्योंकि यह देह पवित्रात्मा से आता है और वचन देहधारी होता है, इसलिए मनुष्य जिस में विश्वास करता है वह अभी भी परमेश्वर का अन्तर्निहित सार है। और इसलिए, इस बात का विभेद करने में कि यह सच्चा मार्ग है या नहीं, सर्वोपरि तुम्हें यह अवश्य देखना चाहिए कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, जिसके बाद तुम्हें अवश्य देखना चाहिए कि क्या इस मार्ग में सत्य है अथवा नहीं। यह सत्य सामान्य मानवता का जीवन स्वभाव है, अर्थात्, वह जो मनुष्य से तब अपेक्षित था कि जब परमेश्वर ने आरंभ में उसका सृजन किया था, यानि, सभी सामान्य मानवता (मानवीय भावना, अंतर्दृष्टि, बुद्धि और मनुष्य होने का बुनियादी ज्ञान) है। अर्थात्, तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि क्या यह मार्ग मनुष्य को एक सामान्य मानवता के जीवन ले जाता है या नहीं, क्या बोला गया सत्य सामान्य मानवता की आवश्यकता के अनुसार अपेक्षित है या नहीं, क्या यह सत्य व्यवहारिक और वास्तविक है या नहीं, और क्या यह सबसे सही समय पर है या नहीं। यदि इसमें सत्य है, तो यह मनुष्य को सामान्य और वास्तविक अनुभवों में ले जाने में सक्षम है; इसके अलावा, मनुष्य हमेशा से अधिक सामान्य बन जाता है, मनुष्य का देह में जीवन और आध्यात्मिक जीवन हमेशा से अधिक व्यवस्थित हो जाता है, और मनुष्य की भावनाएँ और हमेशा से अधिक सामान्य हो जाती हैं। यह दूसरा सिद्धान्त है। एक अन्य सिद्धान्त है, जो यह है कि क्या मनुष्य के पास परमेश्वर का बढ़ता हुआ ज्ञान है या नहीं, क्या इस प्रकार के कार्य और सत्य का अनुभव करना उसमें परमेश्वर के लिए प्रेम को प्रेरित कर सकता है या नहीं, और उसे हमेशा से अधिक परमेश्वर के निकट ला सकता है या नहीं। इसमें यह मापा जा सकता है कि क्या यह सही मार्ग है अथवा नहीं। सबसे अधिक बुनियादी बात यह है कि क्या यह मार्ग अलौकिक के बजाए यर्थाथवादी है, और क्या यह मनुष्य का जीवन प्रदान करने में सक्षम है या नहीं। यदि यह इन सिद्धान्तों के अनुरूप है, तो निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह मार्ग सच्चा मार्ग है।" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं" से). परमेश्वर के वचनों में तीन ऐसी बातें हैं जिन पर हमें विचार करना चाहिए ताकि हम यह पता कर सकें कि कौन सी चीज सच्चा मार्ग है:

सबसे पहले, यह देखें कि इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, जो एक महत्वपूर्ण बिंदु है। क्योंकि अगर यह सच्चा मार्ग है, तो यह स्वयं परमेश्वर का कार्य है, इसलिए इसमें निश्चित रूप से पवित्र आत्मा का कार्य शामिल है और पवित्र आत्मा द्वारा इसे कायम रखा जाएगा। लोगों के परमेश्वर के देह धारण करने में विश्वास करने का कारण यह है कि यह शरीर परमेश्वर की आत्मा की अभिव्यक्ति है, इसलिए वह जो सभी करता है वह पवित्र आत्मा का कार्य है और यह पवित्र आत्मा की पुष्टि करता है। इसलिए, लोग उस पर विश्वास करते हैं और उसका पालन करते हैं। यह ठीक उस तरह है जब प्रभु यीशु अपने कार्य करते हैं: भले ही ऊपरी तौर पर यह प्रकट हो सकता है कि वह सिर्फ एक आम और साधारण व्यक्ति है, फिर भी उनके वचन और उनके कार्य के माध्यम से मानव पवित्र आत्मा के कार्य और पवित्र आत्मा के रखरखाव को देखता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पूरी मानव जाति यह देख सकती है कि प्रभु यीशु का वचन और कार्य अधिकार और शक्ति से परिपूर्ण है। वह एक अंधे मनुष्‍य की आंखों को रोशनी दे सकते हैं, एक लकवाग्रस्‍त मनुष्‍य को चला सकता है, और उन्‍होंने एक कोढ़ी को पूर्णत: चंगा कर सकते हैं। वह रोटी के पांच टुकड़ों और दो मछली से पाँच हज़ार लोगों को भोजन करा सकते हैं और वह मृतकों को भी जिंदा कर सकता है। वह पुरुषों के अंधेरे रहस्यों को उजागर करने के लिए उनके दिलों की गहराई में झांक सकते हैं। इसके अलावा, वह मानव जाति को स्वर्ग के रहस्य बता सकते हैं। उनका अनुसरण करने के बाद, लोग अपने दिल में शांति और हर्ष प्राप्त करते हैं। लोगों के प्रभु यीशु का अनुसरण करने व उन्हें मसीहा मानने का कारण यह है कि वे जो कुछ करते हैं वह पवित्र आत्मा का कार्य है। हम यह देख सकते हैं कि जब तक यह सच्चा मार्ग है, इसमें पवित्र आत्मा का कार्य शामिल रहेगा। इसलिए, जब कोई किसी चीज के सच्चे मार्ग होने पर विचार कर रहा हो, तो हमें सबसे पहले देखना चाहिए कि इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं।

दूसरा पहलू यह है कि कोई चीज सच्चा मार्ग है या नहीं हमें यह विचार करते समय यह आकलन करना चाहिए कि क्या इसमें सच्चाई है और क्या यह एक व्यक्ति की मानवता को ज्यादा सामान्य बनाने के लिए धीरे-धीरे उसके जीवन स्वभाव में बदलाव ला सकता है। हम सभी जानते हैं कि परमेश्वर सत्य, मार्ग व जीवन है, और यह कि उनके नए कार्य का हर चरण उन तथ्यों पर आधारित है जिसे परमेश्वर ने मनुष्‍य को प्रस्‍तावित किया है, जो कि नए युग में अभ्यास के मार्ग को इंगित करता है। परमेश्वर यह सुनिश्चित करते हैं कि मनुष्य को जीवनयापन हेतु पर्याप्‍त आपूर्ति मिले ताकि वह धीरे-धीरे एक सामान्य मानव के रूप में जीवित रहे और उत्‍तरोत्‍र वास्तविक स्वरूप में वापस आ जाए, जब परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया था। यह सत्य के मार्ग की एक साफ खूबी है। यह उसी तरह है जब प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग में अपना कार्य शुरू किया था। उस समय, उन्होंने लोगों को अभ्यास करने के लिए कई सत्यों का प्रचालन किया था, और उन्हें दूसरों से उसी तरह से प्यार करना सिखाया जैसा कि वे खुद को प्यार करते हैं और दुख सहना, स्वयं का त्याग करना और दूसरों को सत्तर गुणा सात बार माफ करना सिखाया। प्रभु यीशु ने लोगों को आत्मा और सत्यता में परमेश्वर की पूजा करने की आज्ञा दी। हर सच्चा आस्तिक प्रभु यीशु की शिक्षाओं के माध्यम से अपने बाहरी आचरण में कुछ बदलाव ला सकता है। प्रभु यीशु के माध्यम से वे विनम्रता और धैर्य के साथ स्‍वयं का आचरण कर एक सामान्य व्यक्ति की कुछ समानता प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए, जब तक यह सच्चा मार्ग है, तब तक यहां सत्य की अभिव्यक्ति भी होगी। इससे मनुष्य की चेतना को अधिक से अधिक सामान्य बनाया जा सकता है, और वह एक वास्तविक व्यक्ति जैसा प्रतीत होगा।

सत्य के मार्ग पर विचार करते हुए जिस तीसरे पहलू पर हमें सोचना चाहिए वह यह देखना है कि क्‍या इस मार्ग से लोगों के परमेश्वर के ज्ञान में बढ़ोतरी हो सकती है और क्या यह उनमें परमेश्वर के प्रेम को प्रेरित करते हुए उन्हें परमेश्वर के और करीब ला सकता है। हम सभी जानते हैं कि चूंकि यह सत्य का मार्ग है, इसलिए यह स्वयं परमेश्वर का कार्य है और उनका कार्य अनिवार्य रूप से उनके स्‍वभाव के साथ-साथ परमेश्वर क्या हैं और उनके पास क्या है इसको भी प्रचालित करता है। जब लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं, तो वे वास्‍तविक रूप से परमेश्वर की समझ के फलस्‍वरूप अपने भीतर परमेश्‍वर के लिए एक प्रेम भरा हृदय निर्मित करते हैं। यह व्यवस्था के युग के समान है जब यहोवा परमेश्वर ने पृथ्वी पर लोगों के जीवन का मार्गदर्शन करने के लिए विधान स्‍थापित किए थे। उनके कार्य के साथ अपने अनुभव से, उन्होंने यह स्वीकार किया कि यहोवा परमेश्वर एक सच्‍चे परमेश्वर है। इससे उन्‍होंने परमेश्वर के प्रताप और श्राप को पहचाना और यह भी कि उनके स्‍वभाव का अपमान नहीं करना चाहिए, जिससे उनके भीतर परमेश्वर के प्रति श्रद्धापूर्ण हृदय बन गया। अनुग्रह के युग में, देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर मानव जाति को छुटकारा दिलाने के लिए अपने कार्य का एक चरण पूर्ण करने के लिए आए थे। प्रभु यीशु के कार्य के साथ अपने अनुभव के माध्यम से, लोगों ने परमेश्वर के प्रेमपूर्ण और दयालु स्‍वभाव को स्वीकार किया। लोगों ने यह भी देखा कि परमेश्वर एक ही समय में आत्मा होकर भी विनम्र मानव रूप ले सकते हैं, कि वे चमत्कार कर सकते हैं, रोगों का इलाज कर सकते हैं और बुरी आत्माओं को बाहर निकाल सकते हैं ...। और प्रभु यीशु ने यह सब जो कार्य किए उन्‍होंने लोगों को परमेश्वर की नई समझ प्रदान की, जिसने लोगों के दिल में परमेश्वर के प्रति भक्ति प्रेरित करी। इसलिए, अगर यह सत्य का मार्ग है तो यह लोगों को परमेश्वर के बारे में और अधिक समझ देगा और परमेश्वर के स्‍वभाव के बारे में और अधिक समझ प्रेरित करेगा।

भले ही परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे बढ़ता रहता है, पर जब तक कि यह स्वयं परमेश्वर का कार्य और सत्य का मार्ग है, तब तक यह निश्चित रूप से तीनों उपरोक्त गुणों को धारण और प्रकट करेगा। यह भी कह सकते हैं कि सत्य मार्ग निश्चित रूप से पवित्र आत्मा का कार्य होगा, जो सत्य को आगे बढ़ाएगा, और लोगों को परमेश्वर की बेहतर समझ प्रदान करेगा और उन्हें उसके करीब ले आएगा। इसलिए, यदि हम इन तीन मानकों के आकलन से सत्य के मार्ग में अंतर करेंगे, तो हम सत्य व असत्य में फर्क करने में सक्षम हो जाएंगे, जिससे हम समयपूर्वक परमेश्वर के वर्तमान कार्य के साथ तालमेल रख सकेंगे, सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त कर पाएंगे, साथ ही साथ परमेश्वर के और अधिक वचन व आशीर्वाद भी पा सकेंगे।

अंत के इन दिनों में, परमेश्वर फिर से नया काम कर रहे हैं, जिसमें भ्रष्ट मानव जाति को उनके निर्णय और शुद्धिकरण का कार्य करने के लिए उनके वचनों का प्रचालन करना शामिल है। यह कार्य उनकी योजना के अनुसार किया गया है और यह अंत के दिनों के लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं पर आधारित है। यह प्रभु यीशु के कार्य की नींव पर आधारित एक नया, उच्च कार्य है। अगर हम एक शांत दिल से सावधानीपूर्वक खोजें व अध्ययन करें, तो हम देख सकते हैं कि परमेश्वर के नए कार्य का यह चरण न केवल पवित्र आत्मा के कार्य को शामिल करता है, बल्कि इसके अलावा सत्य को भी प्रस्‍तावित करता है और हमें परमेश्वर के स्‍वभाव और उनके पास जो कुछ भी है और वह जो भी है उसके बारे में अधिक वास्तविक, व्यापक और व्यावहारिक समझ प्राप्त करने की अनुमति दे सकता है। नीचे, हम सत्य के मार्ग पर विचार करने के लिए मानक के रूप में इन पूर्व में चर्चा किए गए तीनों पहलुओं का उपयोग करते हुए, अपने अनुभवों और अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य की समझ के बारे में सहभागिता करेंगे।

सबसे पहले, सत्य के मार्ग में पवित्र आत्मा का कार्य शामिल होता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने आकर राज्‍य का युग स्थापित किया है, नया कार्य किया है, लोगों का न्याय और शुद्धिकरण करने के लिए अपना वचन जारी किया है, और मानव जाति में जीवन के नए प्रावधानों के साथ आपूर्ति की है। प्रत्येक धार्मिक समूह और संप्रदाय के विश्वासीगण, एक-एक करके, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम के तहत उनके पास वापस आ गए हैं। चाहे जो भी प्रतिरोध हो, चाहे जो भी बाधा आए, अंत के दिनों के परमेश्वर का सुसमाचार महासागर की लहरों की तरह बढ़ कर चीन की सम्‍पूर्ण मुख्य भूमि पर फैल गया है। सभी लोग एक खुशहाल दृश्य में पवित्र पर्वत के लिए बढ़े हैं। भले ही हम सभी अलग-अलग धर्मों से आए थे, फिर भी हम एक साथ सद्भाव में जीने, एक-दूसरे की सहायता करने में सक्षम हैं। यहां कोई गुट नहीं हैं और कलीसिया की जिंदगी जीवन शक्ति के साथ भरी है। यहां सभी भाई बहन मानते हैं कि हमारी सभाएं कभी पर्याप्त नहीं होती है, और यहां गाने और आनंद करने के लिए भजन और प्रबुद्ध करने के लिए प्रार्थनाएं हैं। हर बार जब हम एकत्रित होते हैं, तो हम सब सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन से नए प्रावधानों को प्राप्त करने में सक्षम होते हैं, हम अपनी कमियों को पहचान सकते हैं, और परमेश्वर के वचन से हमें अभ्यास करने का मार्ग मिल जाता है। हमारे सभी भाई बहन विश्वास से भरे हुए हैं और पूरी भक्ति से परमेश्वर का कार्यभार उठा सकते हैं। हमारी भ्रष्ट प्रवृत्ति विभिन्न प्रकार से बदलती है, और हम परमेश्वर के वचन के अनुसार सामान्य रूप से एक साथ रहते हुए एक-दूसरे से प्रेम कर सकते हैं। जब हम अलग-अलग नज़रियों का सामना करते हैं, तो हम सभी, अपने विचारों को दरकिनार करने और अन्य लोगों के विचारों को ध्यान से सुनने में सक्षम होते हैं, और हम कलीसिया में परमेश्वर के वचन में सत्य के अधिकार को स्वीकार करते हैं। भले ही कार्य के इस चरण में परमेश्वर बीमारों को चंगा करने और बुरी आत्माओं को बाहर निकालने के अनुग्रह के युग के अपने कार्य को नहीं दोहराते हैं, फिर भी, हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य से देख सकते हैं कि उनके वचन शक्तिशाली हैं और अधिकार वहन करते हैं। यदि हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य और वचनों की अधीनता को स्‍वीकार करते हैं, तो हम पवित्र आत्मा से प्रबुद्धता और प्रकाश प्राप्त करने में सक्षम हो पाएंगे और हम अपनी निष्क्रिय और कमजोर स्थिति से खुद को अलग करने में सक्षम होंगे, और परमेश्वर के इरादों को ध्यान में रखते हुए मानव होने के नाते सक्रिय रूप से अपने कर्तव्य को पूरा करने में सक्षम होंगे। इसलिए, हमारे भाई व बहन दैहिक सुखों को छोड़ कर अपने पूरे दिल से परमेश्वर के साम्राज्य के सुसमाचार का विस्तार करने के कार्य के लिए जगह—जगह जा सकते हैं। विभिन्न धार्मिक संप्रदायों द्वारा हमारे साथ चाहे जैसा भी बर्ताव किया जाए, या यदि हमें अस्वीकार कर दिया जाए, या सताया जाए, या पीटा जाए, या शाप दिया जाए, फिर भी हम किसी भी कठिनाई को सहन करने के लिए तैयार हैं और हम हमेशा परमेश्वर की इच्छा पूरी करेंगे और अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सुसमाचार का प्रचार करते रहेंगे। अन्‍य व्‍यक्ति हमारे भाइयों और बहनों के वास्तविक व्यवहार से सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अधिकार और शक्ति को देख सकता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य में पवित्र आत्मा का कार्य शामिल है और पवित्र आत्मा द्वारा इसे कायम रखा गया है। फिर भी ऐसे सभी लोग जो परमेश्वर के नये कार्य के साथ नहीं हैं, ऐसे विभिन्न धार्मिक संप्रदाय जो ईर्ष्यालु और झगड़ालू हैं; वे दूसरों के खिलाफ एक होने के लिए वह सब कुछ करते हैं जो संभव है। वे ऐसी परिस्थितियों में रहते हैं जहां वे एक ही काम कर तो सकते हैं, लेकिन एक ही कारण से नहीं और यह सब यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि उस धार्मिक समुदाय में पवित्र आत्मा के कार्य की उपस्थिति नहीं है। चूंकि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कलीसिया में पवित्र आत्मा का कार्य है, इसलिए यह इतनी जीवन शक्ति से भरा हुआ दिखता है, जबकि विभिन्न धार्मिक संप्रदाय निराशाजनक, उजाड़ हो गए हैं, और उन्होंने पवित्र आत्मा के कार्य को खो दिया है, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कलीसिया की तुलना में एकदम विपरीत स्थिति में हैं। तो, इससे स्‍वत: स्पष्ट है कि कौन सा मार्ग सत्य का मार्ग है और कौन सा पुराना मार्ग है।

दूसरा, कि सत्य के मार्ग में सत्‍य होता है और यह लोगों को नए युग में अभ्यास के मार्ग का संकेत कर सकता है और लोगों को जीवन के लिए नए प्रावधान प्राप्त करने की अनुमति दे सकता है। उनके जीवन की प्रवृत्ति अधिक से अधिक परिवर्तनों से गुजरती है और उनकी मानवता उत्‍तरोत्‍तर सामान्य हो जाती है। अंत के दिनों के अपने कार्य में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर कई अलग-अलग क्षेत्रों में कई सत्‍यों का प्रचालन करते हैं। इसमें परमेश्वर के कार्यों को समझने के सत्य और नए युग के दौरान अभ्यास और प्रवेश करने के सत्य भी शामिल है। उदाहरण के लिए इसमें शामिल हैं: परमेश्वर के प्रबंधन का उद्देश्य; उनके कार्य के पीछे के सिद्धांत; व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग में परमेश्वर के कार्यों के भीतर का सत्य; कैसे परमेश्वर अपने न्‍याय के कार्य करते हैं; परमेश्वर के देह धरने का महत्व; कैसे मानवता उस मार्ग में आई जहां वह अभी है, कैसे शैतान मानव जाति को भ्रष्ट करता है; कैसे परमेश्वर मानव जाति को बचाता है; मानव जाति के भविष्य का गंतव्य कैसा होगा; विभिन्न प्रकार के लोगों के लिए अंत कैसा होगा; आस्तिकों के किस तरह के विचार होने चाहिए; परमेश्वर में उनके विश्वास को क्या खोजना चाहिए; परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों को क्यों उनके समक्ष समर्पित होना चाहिए; क्यों परमेश्वर को प्यार करना परमेश्वर में विश्वास करने का एकमात्र तरीका है; और किस तरीके से परमेश्वर की सेवा की जाए जो उनके इरादों को पूरा करता हो। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन सत्यों के प्रचालन से हमें परमेश्वर के इरादों को बेहतर ढंग समझने की गुंजाइश मिली है, साथ ही साथ हमें हमारी प्रकृति और अस्तित्व और हमारे भ्रष्टाचार के तथ्यों को भी बेहतर ढंग से समझने की अनुमति मिली है। इसके अलावा, इन सत्यों ने हमें स्पष्ट रूप से हमारी प्रवृत्ति को बदलने का मार्ग देखने की अनुमति दी है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य और वचन का अनुभव करके, हम अंततः हमारे पुराने विश्वास के मिश्रित पहलुओं को समझ गए हैं और हम यह मानते हैं कि भले ही हमें परमेश्वर का छुटकारा और पर्याप्त अनुग्रह मिला है, फिर भी हम अब भी परमेश्वर से अधिक शारीरिक सुख और भौतिक आशीष पाने की योजना की गहरी लालसा रखते हैं और यह कि किस प्रकार हम अपने सपनों के सौभाग्य को परमेश्वर के माध्यम से हासिल कर सकें। इसके अलावा, भले ही हम परमेश्वर के लिए कार्य करने हेतु उत्‍साहित होकर पहल करते हैं, हम इसे आशीर्वाद और अभिषिक्‍त होने के लिए करते हैं। हम इसे निजी ख्याति और लाभ के लिए करते हैं और सिर्फ अपने ही हित के लिए चारों ओर दौड़ते हैं। हम यह काम एक रचे हुए प्राणी के कर्तव्य के रूप में पूरा करने के लिए नहीं करते हैं। परमेश्वर से हम चाहे कितना भी अनुग्रह या कितने भी आशीर्वाद प्राप्त कर लें, लेकिन परमेश्‍वर द्वारा किया गया कोई काम यदि हमारी अवधारणाओं की पूर्णता में थोड़ा भी विफल होता है, तो हम तुरंत विरोध करते और परमेश्वर से शिकायत करते हैं। हम यहां तक ​​कि परमेश्वर के प्रति सार्वजनिक रूप से शत्रुता निकालते या परमेश्वर का त्याग करने की हद तक चले जाते हैं। हमने बहुत पहले ही अपने मूल विवेक और परमेश्वर की उपस्थिति में तर्कसंगत विचार करने की क्षमता खो दी थी। हम शैतान द्वारा इतने भ्रष्ट कर दिए गए थे कि हमने पूरी तरह से अपनी मानवता की झलक तक को खो दिया था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा प्रचालन किए गए सत्य हमें अपने भ्रष्टाचार को सही ढंग से समझने की अनुमति देते हैं और हम देख सकते हैं कि हम स्वार्थी हैं, नीच हैं और हम में मानवता की कमी है। उसी समय, हम खुद पर किए गए परमेश्वर के उद्धार के कार्य को समझते हैं, और हम समझते हैं कि मनुष्य के लिए परमेश्वर के उद्धार को अच्छी तरह से सोचा गया था। इस प्रकार से, हमारी आत्माएं थोड़ा—थोड़ा सा जागना शुरू हो जाती है और हमारा विवेक व तर्कसंगत रूप से सोचने की क्षमता भी दिन—ब—दिन वापस लौटने लगती है। अब हम सिर्फ अपनी देह को संतुष्ट करने की कोशिश नहीं करते हैं, लेन—देन की रोशनी में अब परमेश्वर को नहीं देखते हैं। इसके स्थान पर, हम केवल परमेश्वर के प्रयोजन को संतुष्ट करने और हमारे पास जो कुछ भी है वह परमेश्वर के समक्ष समर्पित करते हैं। इस प्रकार से, रचयित प्राणियों के रूप में, हम धीरे-धीरे रचयिता के साथ एक सामान्य संबंध हासिल करते हैं। हम परमेश्वर के प्रति अधिक से अधिक स्नेही, अधिक विनम्र, अधिक उपासनापूर्ण हो जाते हैं, और अंत में हम वैसा दिखना शुरू कर देते हैं जैसा मनुष्य को होना चाहिए। संक्षेप में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर हमें, अंत के दिनों के लोगों को, वह सत्य देते हैं जिसकी हमें अविलंब जरूरत है। वे हमें नए युग में मार्ग की दिशा दिखाते हैं, वे हमें जीवन के सबसे ज़्यादा यथार्थ प्रावधान प्राप्त करने की गुंजायश देते हैं। इन सबसे यह साबित होता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का मार्ग ही सत्य का मार्ग है।

तीसरा, सच्चा मार्ग मानव को परमेश्वर के बारे में एक नई समझ प्रदान करता है। भाइयों और बहनों, यदि आप लोग व्यक्तिगत रूप से सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ सकते हैं और वास्तव में उन लोगों के संपर्क में आ सकते हैं जिन्होंने अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया है, तो यह पता लगाना मुश्किल नहीं है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के भाइयों व बहनों ने उस तरीके के माध्यम से जिससे वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सत्य को खोजना चाहते हैं, नया ज्ञान और परमेश्वर के बारे में अधिक सूक्ष्‍म समझ प्राप्त कर ली है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य और वचनों का अनुभव करके, हम परमेश्वर के धार्मिक स्‍वभाव को समझते हैं और देखते हैं कि परमेश्वर के निहित स्‍वभाव में न केवल प्यार और दया है, बल्कि प्रताप व क्रोध भी मौजूद है, और उनका स्‍वभाव मानवता द्वारा किया गया कोई भी अपराध सहन नहीं करता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य और वचनों का अनुभव करके, हम देखते हैं कि कैसे परमेश्वर एक एक कदम करके मानव को बचाते है, कैसे परमेश्वर शैतान को पराजित करने के लिए अपनी बुद्धिमत्‍ता का उपयोग करते हैं, और इस प्रकार हम परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता, बुद्धिमत्‍ता, आश्चर्यजनकता और अज्ञेयता के बारे में कुछ व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करते हैं। इसके अलावा, हम मानव जाति को बचाने के लिए परमेश्वर के नेक इरादों के बारे में भी और अधिक व्यावहारिक समझ, मानव जाति के प्रति उनके सच्‍चे प्रेम और उनकी पवित्रता और सुंदरता प्राप्‍त करते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य और वचन का अनुभव करने से हमें परमेश्वर के बारे में कई गलत धारणाओं को सुलझाने में मदद मिलती है और हमें यह भी समझने में मदद मिलती है कि परमेश्वर किसी भी देश या जातीय समूह के सदस्‍य नहीं हैं; परमेश्वर रचयिता हैं, सभी मनुष्यों के परमेश्‍वर हैं। हम यह बात भी समझते हैं कि परमेश्वर का कार्य हमेशा नया होता है और कभी पुराना नहीं होता है और वह किसी नियम से बंधा नहीं है। इससे यह देखा जा सकता है कि अनुग्रह के युग की तुलना में अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य और वचन मानव को उस परमेश्वर को अधिक गहराई से समझने की अनुमति दे सकते हैं; यह एक ऐसा ज्ञान है जो ज्यादा व्यावहारिक और अधिक व्यापक है। केवल परमेश्वर के खुद के कार्य से यह प्रभाव हो सकता है और केवल परमेश्वर ही मानव जाति के समक्ष अपने स्‍वभाव और वह सब जो वे हैं और जो उनके पास है, का प्रचालन कर सकते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का मार्ग ही सच्चा मार्ग है।

संक्षेप में, चमकती पूर्वी बिजली, धार्मिक समुदाय द्वारा जिसका विरोध और निंदा की गई है, वह प्रभु यीशु है, जो अंत के दिनों में देह धारण करके वापस आ गए हैं - ये स्‍वयं अ‍द्वितीय परमेश्वर हैं। इसलिए, चाहे कितने भी धार्मिक संप्रदायों द्वारा इसका विरोध, उस पर हमला किया गया हो और चाहे शैतान की शक्तियों द्वारा इसे जितना भी नीचा दिखाया और उसकी निंदा की गई हो, वे अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य के विस्तार में थोड़ी सी भी बाधा डालने में सक्षम नहीं हुए हैं। केवल दस वर्षों में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार पूरे चीन में फैल गया है। लाखों करोड़ों परिवारों में परमेश्वर का वचन और परमेश्वर का नाम फैल गया है। विभिन्न संप्रदायों में, जो सत्य का अनुसरण करते हैं और वास्तव में परमेश्‍वर को चाहते हैं वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के समक्ष लौट आएं हैं। लाखों लोग परमेश्वर के वचन का आनंद ले रहे हैं, परमेश्वर का निर्णय, शुद्धिकरण, उद्धार और पूर्णता पा रहे हैं, और परमेश्वर के अद्भुत कर्मों का गुणगान कर रहे हैं। परमेश्वर ने चीन में विजेताओं का एक समूह बना लिया है और उन लोगों के समूह का लाभ उठाया है जो उनके साथ एक दिल और एक दिमाग के हैं। परमेश्वर का कार्य अंततः अपनी स्तुति के साथ संपन्न हुआ है और यह तेजी से पूर्वी चीन से पश्चिमी दुनिया तक चलता है और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया ने दर्जनों देशों में शाखाएं स्थापित की हैं, जो कि प्रभु यीशु की भविष्यवाणी को पूरी तरह से पूर्ण करता है: "क्योंकि जैसे बिजली पूर्व से निकलकर पश्‍चिम तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य के पुत्र का भी आना होगा" (मत्ती 24:27)। मेरे आध्यात्मिक सहकर्मियों, आप लोग अपनी काल्पनिक अवधारणों को छोड़ दें और परमेश्वर की आवाज़ सुनने की खोज करें, कृपया परमेश्वर के समक्ष निष्‍ठापूर्वक आएं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर आपकी वापसी की प्रतीक्षा में हैं!