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परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III

इन अनेक संगतियों का हर एक व्यक्ति पर एक बड़ा प्रभाव रहा है। फ़िलहाल, लोग वास्तव में परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व को महसूस कर सकते हैं और यह महसूस कर सकते हैं कि परमेश्वर वास्तव में उनके अति निकट है। यद्यपि लोगों ने बहुत वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास किया है, फिर भी उन्होंने उसके विचारों और मतों को सही मायनों में उस तरह से कभी भी नहीं समझा है जिस तरह से वे अब समझते हैं, और न ही उन्होंने उसके व्यावहारिक कर्मों को सही अर्थों में उस तरह से अनुभव किया है जैसे वे अब करते हैं। चाहे यह ज्ञान हो या वास्तविक अभ्यास, अधिकतर लोगों ने कुछ नया सीखा है और एक ऊँची समझ प्राप्त की है, और अतीत की अपनी खोजों में त्रुटियों का एहसास किया है, अपने अनुभव के उथलेपन का एहसास किया है और यह एहसास किया है कि किसी चीज़ की अति परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं होती है, और यह एहसास किया कि जिस बात की मनुष्य में सब से ज़्यादा कमी है वह है परमेश्वर के स्वभाव का ज्ञान। लोगों में ऐसा ज्ञान एक प्रकार का बोधात्मक ज्ञान है; तर्कसंगत ज्ञान के स्तर तक ऊँचा उठने के लिए उन्हें अपने अनुभवों के द्वारा धीरे-धीरे गहरा और मज़बूत होने की आवश्यकता है। मनुष्य के द्वारा सचमुच में परमेश्वर को समझे जाने से पहले, व्यक्तिपरक ढंग से ऐसा कहा जा सकता है कि वे अपने हृदय में परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास तो करते हैं, किन्तु उन्हें विशिष्ट प्रश्नों की वास्तविक समझ नहीं है जैसे कि वह वास्तव में किस प्रकार का परमेश्वर है, उसकी इच्छा क्या है, उसका स्वभाव क्या है, और मनुष्य-जाति के प्रति उसका वास्तविक रवैया क्या है। यह बृहद् रूप से परमेश्वर पर लोगों के विश्वास के साथ समझौता करता है—उन का विश्वास मात्र शुद्धता और सिद्धता प्राप्त नहीं कर सकता है। भले ही तुम परमेश्वर के वचन के आमने सामने हो, या यह महसूस करते हो कि तुमने अपने अनुभवों के माध्यम से परमेश्वर का सामना किया है, तब भी यह नहीं कहा जा सकता है कि तुम उसे पूर्णत: समझते हो। क्योंकि तुम परमेश्वर के विचारों को नहीं जानते हो, या नहीं जानते हो कि वह किससे प्रेम करता है और किससे नफ़रत करता है, कौन सी चीज़ उसे क्रोधित करती है और किससे उसे खुशी मिलती है, इसलिए तुम्हें उसकी सही समझ नहीं है। तुम्हारा विश्वास, तुम्हारी व्यक्तिपरक इच्छाओं के आधार पर, अस्पष्टता और कल्पना की नींव पर बना हुआ है। यह अभी भी एक प्रामाणिक विश्वास से दूर है, और तुम अभी भी एक सच्चे अनुयायी बनने से दूर हो। बाइबल की इन कहानियों के उदाहरणों की व्याख्याओं ने मनुष्यों को परमेश्वर के हृदय को जानने में और यह जानने में सहायता की है, कि अपने कार्य के हर कदम पर वह क्या सोच रहा था और उसने इस कार्य को क्यों किया, और जब उसने ऐसा किया तो उसका मूल इरादा और योजना क्या थी, उसने अपने मतों को कैसे प्राप्त किया, और उसने अपनी योजना को कैसे तैयार किया और उसे कैसे विकसित किया। इन कहानियों के माध्यम से, हम परमेश्वर के छः हज़ार वर्षों के प्रबंधन के कार्य के दौरान उसकी प्रत्येक विशिष्ट इच्छा और प्रत्येक वास्तविक विचार, और विभिन्न समयों और विभिन्न युगों में मनुष्यों के प्रति उसके रवैया की एक विस्तृत और विशिष्ट समझ प्राप्त कर सकते हैं। परमेश्वर क्या सोच रहा था, उसका रवैया क्या था, और वह स्वभाव क्या था जिसे उसने हर परिस्थिति का सामना करते हुए प्रकट किया था, इस बात की समझ परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व का अधिक गहराई से एहसास करने में, तथा परमेश्वर की यथार्थता और प्रामाणिकता को अधिक गहराई से महसूस करने में हर एक व्यक्ति की सहायता कर सकती है। इन कहानियों को बताने का मेरा उद्देश्य यह नहीं है कि लोग बाइबल के इतिहास को समझ सकें, न ही लोगों को बाइबल की पुस्तकों से या उस में दिए गए लोगों से परिचित होने में उनकी सहायता करना है, और विशेष रूप से लोगों को परमेश्‍वर ने व्‍यवस्‍था के युग में क्‍या किया इस बारे में बाइबल की पृष्ठभूमि को समझने में सहायता करना तो बिल्‍कुल नहीं है। यह परमेश्वर की इच्छा, उसके स्वभाव, और उसके छोटे-से-छोटे भाग को समझने में, और परमेश्वर के बारे में और अधिक प्रामाणिक तथा सटीक समझ और ज्ञान प्राप्त करने में लोगों को सहायता करने के लिए है। इस तरह, लोगों का हृदय थोड़ा-थोड़ा करके परमेश्वर के प्रति खुल जाता है, परमेश्वर निकट हो जाता है और वे उसे, उसके स्वभाव को, उसके सार को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं, और स्वयं सच्चे परमेश्वर को बेहतर ढंग से जान सकते हैं।

परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप के ज्ञान का मनुष्यों के ऊपर एक सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यह परमेश्वर पर और अधिक विश्वास करने में उनकी सहायता कर सकता है, और उसके प्रति सच्ची आज्ञाकारिता और भय प्राप्त करने में उनकी सहायता कर सकता है। तब, वे अब और अंधे अनुयायी नहीं होते हैं, या अंधेपन से उसकी आराधना नहीं करते हैं। परमेश्वर मूर्खों को या उन्हें नहीं चाहता है जो अंधेपन से भीड़ का अनुसरण करते हैं, बल्कि ऐसे लोगों के एक समूह को चाहता है जिनके हृदय में परमेश्वर के स्वभाव की एक स्पष्ट समझ और ज्ञान हो और जो परमेश्वर के गवाह के रूप में कार्य कर सकते हों, ऐसे लोग जो परमेश्वर के प्रेमीपन की वजह से, उसके स्वरूप की वजह से, और उसके धार्मिक स्वभाव की वजह से परमेश्वर का कभी भी परित्याग नहीं करेंगे। परमेश्वर के अनुयायी के रूप में, यदि तुम्हारे हृदय में अभी भी स्पष्टता की कमी है, या परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व, उसके स्वभाव, उसके स्वरूप, और मनुष्य-जाति के उद्धार की उसकी योजना के बारे में अनिश्चितता या भ्रम है, तो तुम्हारा विश्वास परमेश्वर की प्रशंसा को प्राप्त नहीं कर सकता है। परमेश्वर नहीं चाहता कि इस प्रकार के लोग उसका अनुसरण करें, और इस प्रकार के लोगों का उसके सामने आना उसे पसंद नहीं है। क्योंकि इस प्रकार के व्यक्ति परमेश्वर को नहीं समझते हैं, वे अपना हृदय परमेश्वर को नहीं दे सकते हैं—उनका हृदय उसके लिए बंद है, इसलिए परमेश्वर के प्रति उनका विश्वास अशुद्धताओं से भरा हुआ है। उनका परमेश्वर का अनुसरण करना केवल अंधापन ही कहा जा सकता है। लोग केवल तभी सच्चा विश्वास प्राप्त कर सकते हैं और सच्चे अनुयायी बन सकते हैं यदि उन्हें परमेश्वर की सच्ची समझ और ज्ञान हो, जो उसके बारे में सच्ची आज्ञाकारिता और भय को उत्पन्न करता हो। केवल इसी तरह से ही वे अपना हृदय परमेश्वर को दे सकते हैं, और उसके लिए अपना हृदय खोल सकते हैं। यही परमेश्वर चाहता है, क्योंकि जो कुछ भी वे करते और सोचते हैं वह परमेश्वर की परीक्षा का सामना कर सकता है, और परमेश्वर की गवाही दे सकता है। परमेश्वर के स्वभाव, या उसके स्वरूप, या जो कुछ भी वह करता है उसमें उसकी इच्छा और उसके विचारों के बारे में जो कुछ भी मैंने तुम लोगों के साथ संवाद किया है, और चाहे मैंने किसी भी परिप्रेक्ष्य से, किसी भी कोण से इसके बारे में बात की है, यह सब परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व के बारे में तुम लोगों के और अधिक निश्चित हो जाने में, और मनुष्य-जाति के लिए उसके प्रेम को सचमुच में और अधिक समझने और सराहने में, और मनुष्यों के लिए परमेश्वर की चिंता और मनुष्य-जाति को बचाने और उसके प्रबंधन के लिए उसकी ईमानदार इच्छा को सचमुच में और अधिक समझने और सराहने में तुम लोगों की सहायता के लिए है।

आज हम सबसे पहले मनुष्यों के सृजन के बाद से परमेश्वर के विचारों, मतों, और प्रत्येक कार्य का सार निकालने जा रहे हैं, और इस पर एक नज़र डालने जा रहे हैं कि उसने संसार की रचना करने से लेकर अनुग्रह के युग के आधिकारिक आरम्भ तक कौन सा कार्य कार्यान्वित किया था। तब हम खोज कर सकते हैं कि परमेश्वर के कौन से विचार और मत मनुष्यों के लिए अज्ञात हैं, और वहाँ से हम प्रबन्धन के लिए परमेश्वर की योजना के क्रम को स्पष्ट कर सकते हैं, और उस सन्दर्भ को विस्तारपूर्वक समझ सकते हैं जिसमें परमेश्वर ने अपने प्रबन्धन के कार्य, उसके स्रोत और विकास की प्रक्रिया को बनाया था, और विस्तारपूर्वक यह भी समझ सकते हैं कि वह अपने प्रबन्धन के कार्य से कौन से परिणामों को चाहता है—अर्थात्, उसके प्रबन्धन के कार्य का मर्म और उद्देश्य क्‍या है। इन चीज़ों को समझने के लिए हमें एक सुदूर, स्थिर और मौन समय में जाने की आवश्यकता है जब कोई मनुष्य नहीं था ...

जब परमेश्वर अपने सेज से उठा, पहला विचार जो उसके मन में आया वह यह थाः एक जीवित व्यक्ति, एक वास्तविक, जीवित मनुष्य को बनाना—कोई ऐसा जिसके साथ वह रहे और जो उसका निरन्तर साथी बने। वह व्यक्ति उसे सुन सके, और परमेश्वर उस पर भरोसा कर सके और उसके साथ बात कर सके। तब, पहली बार, परमेश्वर ने एक मुट्ठीभर धूल उठायी और सबसे पहला जीवित व्यक्ति बनाने के लिए उसका उपयोग किया जिसकी उसने कल्पना की थी, और तब उस जीवित प्राणी को एक नाम दिया—आदम। एक बार जब परमेश्वर ने इस जीवित और साँस लेते हुए प्राणी को प्राप्त कर लिया था, तो उसने कैसा महसूस किया? पहली बार, उसने एक प्रियजन, एक साथी को पाने का आनन्द महसूस किया। उसने पहली बार एक पिता होने के उत्तरदायित्व को और उस चिन्ता को भी महसूस किया जो उसके साथ आयी। यह जीवित और साँस लेता हुआ प्राणी परमेश्वर के लिए प्रसन्नता और आनन्द लाया; उसने पहली बार चैन का अनुभव किया। यह वह पहला कार्य था जो परमेश्वर ने कभी किया था जिसे परमेश्वर ने अपने विचारों या यहाँ तक कि वचनों से भी सम्पन्न नहीं किया था, बल्कि जो उसके स्वयं के दोनों हाथों से किया गया था। जब इस प्रकार का प्राणी—एक जीवित और साँस लेता हुआ व्यक्ति—परमेश्वर के सामने खड़ा हो गया, जो माँस और लहू से बना हुआ, शरीर और आकार के साथ, और परमेश्वर से बातचीत करने में सक्षम था, तो उसने एक प्रकार का ऐसा आनन्द महसूस किया जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। उसने सचमुच में अपना उत्तरदायित्व महसूस किया और इस जीवित प्राणी ने न केवल उसके हृदय को आकर्षित कर लिया, बल्कि उसकी हर एक छोटी सी हलचल ने भी उसे द्रवित कर दिया और उसके हृदय को उत्साह से भर दिया था। इसलिए जब यह जीवित प्राणी परमेश्वर के सामने खड़ा हुआ, तो पहली बार उस तरह के और लोगों को प्राप्त करने का विचार उसे आया। यह घटनाओं की श्रृंखला थी जो उस पहले विचार के साथ आरम्भ हुई जो परमेश्वर को आया था। परमेश्वर के लिए, ये सभी घटनाएँ पहली बार घटित हो रही थीं, किन्तु इन पहली घटनाओं में, भले ही उसने उस समय कैसा ही महसूस क्यों न किया हो—आनन्द, उत्तरदायित्व, चिन्ता—उसके पास साझा करने के लिए वहाँ कोई नहीं था। उस पल से आरम्भ करके, परमेश्वर ने सचमुच में एकाकीपन और उदासी महसूस की जो उसने पहले कभी भी महसूस नहीं की थी। उसे महसूस हुआ कि मानव जाति उसके प्रेम और चिन्ता, और मनुष्य-जाति के लिए उसके इरादों को स्वीकार नहीं कर सकती है या समझ नहीं सकती है, इसलिए उसे तब भी अपने हृदय में दुःख और दर्द महसूस हुआ। यद्यपि उसने इन चीज़ों को मनुष्य के लिए किया था, फिर भी मनुष्य इससे अवगत नहीं था और उसने इसे नहीं समझा था। प्रसन्नता के अलावा, वह आनन्द और संतुष्टि जो मनुष्य उसके लिए लाया था वह शीघ्रता से अपने साथ उसके लिए उदासी और एकाकीपन की प्रथम भावना भी साथ लेकर आयी। ये उस समय परमेश्वर के विचार और भावना थीं। जब परमेश्वर इन सब चीज़ों को कर रहा था, तो अपने हृदय में वह आनन्द से दुःख की ओर, और दुःख से पीड़ा की ओर चला गया, सब कुछ चिंता में घुल मिल गया। जो कुछ भी वह करना चाहता था वह था कि जल्दी ही यह व्यक्ति, यह मानव जाति जान ले कि परमेश्वर के हृदय में क्या है और उसकी इच्छाओं को शीघ्रता से समझ ले। तब, वे उसके अनुयायी बन सकते हैं और उसके अनुरूप हो सकते हैं। वे परमेश्वर को बोलते हुए अब और नहीं सुनेंगे लेकिन मूक बने रहेंगे; वे अब और अनजान नहीं होंगे कि कैसे परमेश्वर के साथ उसके कार्य में जुड़ें; और ख़ास कर के, वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के प्रति अब और उदासीन लोग नहीं रहेंगे। ये पहली चीज़ें जिन्हें परमेश्वर ने पूर्ण किया बहुत ही अर्थपूर्ण हैं और उसकी प्रबंधन योजना के लिए और आज मनुष्यों के लिए बड़ा मूल्य रखती हैं।

सभी चीज़ों और मनुष्यों का सृजन करने के बाद, परमेश्वर ने आराम नहीं किया। वह अपने प्रबन्धन को कार्यान्वित करने की प्रतीक्षा नहीं कर सका, और न ही वह ऐसे लोगों को प्राप्त करने की प्रतीक्षा कर सका जिन्हें उसने मनुष्य-जाति के बीच में बहुत प्रेम किया था।

आगे, परमेश्वर के द्वारा मनुष्यों को रचने के कुछ ही समय बाद, हम बाइबल में देखते हैं कि पूरे संसार में एक बड़ा जल प्रलय आया था। जल प्रलय के अभिलेख में नूह का उल्लेख है, और ऐसा कहा जा सकता है कि नूह वह पहला व्यक्ति था जिसने परमेश्वर के एक कार्य को पूर्ण करने हेतु उसके साथ काम करने के लिए परमेश्वर का बुलावा प्राप्त किया था। वास्तव में, यह पहली बार भी था जब परमेश्वर ने अपनी आज्ञानुसार कुछ करने के लिए पृथ्वी पर किसी इंसान को बुलाया था। जब नूह ने जहाज़ बनाना पूरा कर लिया, तो परमेश्वर ने पहली बार पृथ्वी पर जल प्रलय की। जब परमेश्वर ने पृथ्वी को जल प्रलय से नष्ट कर दिया, तो यह उन्हें सृजन करने के समय से लेकर अब तक पहली बार हुआ था कि उसने अपने आप को मानव जाति के प्रति घृणा से वशीभूत महसूस किया था; इसी ने परमेश्वर को इस मानव जाति को जल प्रलय के द्वारा नष्ट करने का दर्दनाक निर्णय लेने के लिए मजबूर किया था। जल प्रलय के द्वारा पृथ्वी को नष्ट करने के बाद, परमेश्वर ने मनुष्यों के साथ अपनी पहली वाचा बाँधी कि वह ऐसा फिर कभी नहीं करेगा। उस वाचा का चिन्ह एक इंद्रधनुष था। यह मनुष्य-जाति के साथ परमेश्वर की पहली वाचा थी, इसलिए वह इंद्रधनुष परमेश्वर के द्वारा दी गई वाचा का पहला चिह्न था; यह इंद्रधनुष एक वास्तविक, और भौतिक चीज़ है जो अस्तित्व में रहती है। यह इस धनुष का ही अस्तित्व है जो परमेश्वर को पूर्ववर्ती मानव जाति के लिए, जिसे उसने खो दिया था, अक्सर उदास महसूस करवाता है, और उसके लिए एक निरंतर अनुस्मारक के रूप में काम करता है कि उनके साथ क्या हुआ था...। परमेश्वर अपनी गति को धीमा नहीं करेगा—वह अपने प्रबन्धन में अगला कदम उठाने की प्रतीक्षा नहीं कर सकता है। तत्पश्चात्, परमेश्वर ने सम्पूर्ण इस्राएल में अपने कार्य को करने के लिए अपनी पहली पसंद के रूप में अब्राहम को चुना। यह भी पहली बार था कि परमेश्वर ने ऐसे किसी उम्मीदवार को चुना था। परमेश्वर ने इस व्यक्ति के माध्यम से मनुष्य-जाति को बचाने के अपने कार्य को शुरू करने, और इस व्यक्ति के वंशजों के बीच अपने कार्य को जारी रखने का संकल्प लिया। हम बाइबल में देख सकते हैं कि यही परमेश्वर ने अब्राहम के साथ किया था। तब परमेश्वर ने इस्राएल को अपनी प्रथम चुनी हुई भूमि बनाया, और अपने चुने हुए लोगों, इस्राएलियों, के माध्यम से व्यवस्था के युग के अपने कार्य को आरम्भ किया। एक बार फिर पहली बार, परमेश्वर ने इस्राएलियों को स्पष्ट नियम और व्यवस्थाएँ प्रदान की जिनका अनुसरण मानव जाति को करना चाहिए, और उन्हें विस्तार से समझाया। यह पहली बार था कि परमेश्वर ने मनुष्यों को ऐसे विशिष्ट, मानक नियम प्रदान किए थे कि उन्हें किस प्रकार बलिदान करना चाहिए, उन्हें किस प्रकार जीवन जीना चाहिए, उन्हें क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए, उन्हें कौन से त्‍यौहारों और दिनों को मानना चाहिए, और वह हर चीज़ जो वे करते हैं उसमें किन सिद्धांतों का अनुसरण करना चाहिए। यह पहली बार था कि परमेश्वर ने मनुष्य-जाति को उनके जीवन के लिए इतने विस्तृत, मानक विधि-विधान और सिद्धांत दिए थे।

जब मैं "पहली बार" कहता हूँ, तो इसका मतलब है कि परमेश्वर ने इस तरह का कार्य पहले कभी पूर्ण नहीं किया था। यह कुछ ऐसा है जो पहले अस्तित्व में नहीं था, और यद्यपि परमेश्वर ने मनुष्यजाति का सृजन किया था और उसने सब प्रकार के जीवों और जीवित प्राणियों का सृजन किया था, फिर भी उसने उस प्रकार का कार्य कभी पूर्ण नहीं किया था। इस समस्त कार्य में परमेश्वर के द्वारा मनुष्यों का प्रबन्धन शामिल था; यह सब मनुष्यों, मनुष्यों के परमेश्वर के द्वारा उद्धार प्रबन्धन से सम्बन्धित था। अब्राहम के बाद, परमेश्वर ने एक बार फिर एक चुनाव किया—उसने व्यवस्था के अधीन होने के लिए अय्यूब को चुना जो निरन्तर परमेश्वर का भय मानते हुए और बुराई से दूर रहते हुए और उसकी गवाही देते हुए शैतान के प्रलोभनों का सामना कर सकता था। यह भी पहली बार ही था कि परमेश्वर ने शैतान को किसी इंसान को प्रलोभित करने दिया था, और पहली बार उसने शैतान के साथ शर्त लगाई थी। अंत में, पहली बार, परमेश्वर ने किसी ऐसे को प्राप्त किया जो शैतान का सामना करते हुए परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम था—ऐसा व्यक्ति जो उसके लिए गवाही दे सकता था और शैतान को पूर्णत: शर्मिन्दा कर सकता था। जब से परमेश्वर ने मनुष्य-जाति को बनाया, तब से यही वह पहला व्यक्ति था जिसे उसने प्राप्त किया था जो उसके लिए गवाही देने में समर्थ था। एक बार जब उसने इस व्यक्ति को प्राप्त कर लिया, तो परमेश्वर अपने प्रबन्धन को आगे बढ़ाने और, अपनी अगली पसंद और अपने कार्य स्थल की तैयारी करते हुए, अपने कार्य के अगले चरण को करने के लिए और भी अधिक उत्सुक हो गया था।

इस सब के बारे में संगति करने के बाद, क्या तुम लोगों को परमेश्वर की इच्छा की सही समझ है? परमेश्वर मनुष्य-जाति के प्रबन्धन, और मनुष्यों को बचाने की इस घटना को किसी भी अन्य चीज़ से कहीं ज़्यादा महत्पूर्ण के रूप में देखता है। वह इन चीज़ों को केवल अपने मस्तिष्क से नहीं करता है, और न ही उसे अपने वचनों से करता है, और वह विशेष रूप से इन चीज़ों को यूँ ही नहीं करता है—वह इन सभी चीज़ों को एक योजना के साथ, एक लक्ष्य के साथ, एक मानक के साथ, और अपनी इच्छा के साथ करता है। यह स्पष्ट है कि मनुष्यजाति को बचाने का यह कार्य परमेश्वर और मनुष्य दोनों के लिए बड़ा महत्व रखता है। वह कार्य चाहे कितना ही कठिन क्यों न हो, बाधाएँ कितनी ही बड़ी क्यों न हों, मनुष्य चाहे कितने ही कमज़ोर क्यों न हों, या मनुष्य-जाति की विद्रोहशीलता चाहे कितनी ही गहरी क्यों न हो, इसमें से कुछ भी परमेश्वर के लिए कठिन नहीं हैं। अपने परिश्रमी प्रयास व्यय करते हुए और जिस कार्य को वह स्वयं कार्यान्वित करना चाहता है उसका प्रबन्धन करते हुए, परमेश्वर अपने आप को व्यस्त रखता है। वह सभी चीज़ों की व्यवस्था भी कर रहा है, और सभी लोगों पर और उस कार्य पर जिसे वह पूर्ण करना चाहता है शासन कर रहा है—इसमें से कुछ भी पहले नहीं किया गया है। यह पहली बार है कि परमेश्वर ने इन पद्धतियों का उपयोग किया है और मनुष्यजाति को बचाने और उसका प्रबन्धन करने की मुख्य परियोजना के लिए एक बड़ी कीमत चुकाई। जब परमेश्वर इस कार्य को कार्यान्वित कर रहा होता है, तो वह थोड़ा-थोड़ा करके बिना छिपाव के मनुष्यों के सामने अपने कठिन कार्य को, अपने स्वरूप को, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को, और अपने स्वभाव के हर एक पहलू को प्रदर्शित कर रहा होता है। इन चीज़ों को उस तरह से प्रकाशित और व्यक्त करते हुए जैसे उसने पहले कभी भी नहीं किया है, वह थोड़ा-थोड़ा करके इस सब को मनुष्यजाति के सामने बिना छिपाव के प्रकाशित करता है। इसलिए, पूरे विश्व में, परमेश्वर जिन लोगों को बचाने और जिनका प्रबन्धन करने का उद्देश्य रखता है उनके अलावा, कोई भी प्राणी परमेश्वर के इतना करीब नहीं रहा है, जिसका उसके साथ इतना अंतरंग रिश्ता हो। अपने हृदय में, जिस मनुष्यजाति का वह प्रबन्धन और उद्धार करना चाहता है, वह सबसे महत्वपूर्ण है, और वह इस मनुष्यजाति को अन्य सभी से अधिक मूल्य देता है; भले ही उसने उनके लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है, और भले ही उनके द्वारा उसे लगातार ठेस पहुँचाई जाती है और उसकी अवज्ञा की जाती है, फिर भी वह उन्हें कभी भी नहीं त्यागता है और लगातार अथक रूप से बिना कोई शिकायत या पछतावे के अपने कार्य में लगा रहता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह जानता है कि आज नहीं तो कल मनुष्य एक न एक दिन उसके बुलावे के प्रति जागरूक हो जाएँगे और उस के वचनों से प्रेरित हो जाएँगे, और पहचान जाएँगे कि वही सृष्टि का प्रभु है, और उस की ओर लौट जाएँगे ...

आज यह सब कुछ सुनने के बाद, तुम लोग ऐसा महसूस कर सकते हो कि हर चीज़ जो परमेश्वर करता है वह बिल्कुल सामान्य होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर के वचनों से, और उसके कार्य से मनुष्यों ने हमेशा उसकी इच्छा को कुछ-कुछ महसूस किया है, लेकिन उनकी भावनाओं या उनके ज्ञान और जो परमेश्वर सोच रहा है उनके बीच हमेशा से एक निश्चित दूरी रही है। इसलिए, मैं सोचता हूँ कि सभी लोगों के साथ इस बारे में संवाद करना आवश्यक है कि क्यों परमेश्वर ने मनुष्यजाति को बनाया, और उन लोगों को प्राप्त करने हेतु उसकी इच्छा के पीछे की पृष्ठभूमि क्या थी जिनकी उसने आशा की थी। इसे हर किसी के साथ साझा करना आवश्यक है, ताकि हर एक को अपने हृदय में स्पष्ट हो जाए। क्योंकि परमेश्वर का हर एक विचार और मत, और उसके कार्य का हर एक चरण और हर अवधि उसके सम्पूर्ण प्रबन्धन के कार्य से बँधी, और करीब से जुड़ी हुई है, जब तुम परमेश्वर के कार्य के हर कदम में उसके विचारों, मतों और उसकी इच्छा को समझते हो, तो यह उसकी प्रबन्धन योजना के कार्य के स्रोत को समझने के समान है। यह इसी बुनियाद पर है कि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ गहरी होती है। यद्यपि वह सब कुछ जो परमेश्वर ने किया जब उसने पहली बार संसार को बनाया जिसका जिक्र मैंने पहले किया था, वह लोगों के लिए अब मात्र कुछ जानकारी है और सच्चाई की खोज करने में असम्बद्ध प्रतीत होती है, फिर भी तुम्हारे अनुभव के दौरान एक ऐसा दिन आएगा जब तुम नहीं सोचोगे कि यह जानकारी के कुछ भागों के समान इतना साधारण है और न ही यह कुछ रहस्यों के समान इतना सरल है। जैसे-जैसे तुम्हारा जीवन प्रगति करेगा और जब परमेश्वर के लिए तुम्हारे हृदय में थोड़ी सी जगह हो जाएगी, या जब तुम पूरी तरह से और गहराई से उस की इच्छा को समझ जाओगे, तब तुम उसके महत्व और उसकी आवश्यकता को सचमुच में समझ पाओगे जिसके बारे में मैं आज कह रहा हूँ। चाहे तुम लोगों ने जिस भी हद तक इसे स्वीकार किया हो; यह आवश्यक है कि तुम लोग इन चीज़ों को समझो और जानो। जब परमेश्वर कुछ करता है, जब वह अपने कार्य को कार्यान्वित करता है, चाहे यह उसके अपने मतों से है या उसके स्वयं के हाथ से, चाहे उसने इसे पहली बार किया है या अन्तिम बार—अंततः, परमेश्वर की एक योजना है, और हर चीज़ जो वह करता है उसमें उसके उद्देश्य और उसके विचार होते हैं। ये उद्देश्य और विचार परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाते हैं, और ये उसके स्वरूप को प्रकट करते हैं। ये दोनों चीज़े—परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप—हर एक व्यक्ति के द्वारा अवश्य समझा जाना चाहिए। एक बार जब कोई व्यक्ति उसके स्वभाव और उसके स्वरूप को समझ जाता है, तो वह धीरे-धीरे समझ सकता है कि परमेश्वर जो करता है वह क्यों करता है और जो वह कहता है वह क्यों कहता है। उससे, तब उन्हें परमेश्वर का अनुसरण करने, सत्य की खोज करने, और स्वभाव में किसी परिवर्तन को खोजने का और अधिक विश्वास हो सकता है। अर्थात्, परमेश्वर के बारे में मनुष्य की समझ और परमेश्वर में उसका विश्वास अवियोज्य हैं।

यद्यपि लोग जिसके बारे में सुनते हैं या जिसकी समझ प्राप्त करते हैं वह परमेश्वर का स्वभाव, उसका स्वरूप है, किन्तु जो वे प्राप्त करते हैं वह जीवन है जो परमेश्वर से आता है। एक बार जब यह जीवन तुम्हारे भीतर गढ़ दिया जाएगा, तो परमेश्वर के प्रति तुम्हारा भय उत्तरोत्तर बड़ा होता जाएगा, और इस फसल को काटना बहुत ही स्वाभाविक रूप से घटित होता है। यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव या उसके सार के बारे में समझना और जानना नहीं चाहते हो, और यदि तुम इन चीज़ों के ऊपर मनन करना और ध्यान केन्द्रित करना भी नहीं चाहते हो, तो मैं निश्चित रूप से तुम्हें बता सकता हूँ कि जिस तरह से तुम वर्तमान में परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास की खोज कर रहे हो वह तुम्हें कभी भी उसकी इच्छा को संतुष्ट करने और उसकी प्रशंसा को प्राप्त करने नहीं दे सकता है। उससे अधिक, तुम कभी भी सचमुच में उद्धार तक नहीं पहुँच सकते हो—ये अन्तिम परिणाम हैं। जब लोग परमेश्वर को नहीं समझते हैं और उसके स्वभाव को नहीं जानते हैं, तो उनका हृदय कभी भी परमेश्वर के लिए सचमुच में नहीं खुल सकता है। एक बार जब वे परमेश्वर को समझ जाएँगे, तो वे रूचि और विश्वास के साथ जो कुछ परमेश्वर के हृदय में है उसे समझना और उसका स्वाद लेना आरम्भ कर देंगे। जब तुम जो परमेश्वर के हृदय में है उसे समझने और उसका स्वाद लेने लगोगे, तो तुम्हारा हृदय धीर-धीरे, थोड़ा-थोड़ा करके, उसके लिए खुलता जाएगा। जब तुम्हारा हृदय उसके लिए खुल जाएगा, तो तुम्हें महसूस होगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारे लेन-देन, परमेश्वर से तुम्हारी माँगें, और तुम्हारी स्वयं की अनावश्यक अभिलाषाएँ कितनी शर्मनाक और घृणित थी। जब तुम्हारा हृदय सचमुच में परमेश्वर के लिए खुल जाएगा, तो तुम देखोगे कि उसका हृदय इतना असीमित संसार के जैसा है, और तुम एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करोगे जिसे तुमने पहले कभी अनुभव नहीं किया है। इस क्षेत्र में कोई धोखेबाज़ी नहीं है, कोई धूर्तता नहीं है, कोई अंधकार नहीं है, और कोई दुष्टता नहीं है। वहाँ केवल ईमानदारी और विश्वसनीयता है; केवल प्रकाश और सत्यपरायणता है; केवल धार्मिकता और दयालुता है। यह प्रेम और देख-रेख से भरा हुआ है, अनुकम्पा और सहिष्णुता से भरा हुआ है, और उसके माध्यम से तुम जिन्दा रहने की प्रसन्नता और आनन्द महसूस करोगे। ये वे चीज़े हैं जिन्हें वह तुम्हारे लिए तब प्रकट करेगा जब तुम अपने हृदय को उसके लिए खोलोगे। यह असीमित संसार परमेश्वर की बुद्धि से भरा हुआ है, और उसकी सर्वशक्तिमत्ता से भरा हुआ है; वह उसके प्रेम और अधिकार से भी भरा हुआ है। यहाँ तुम परमेश्वर के स्वरूप के और इस बात के हर पहलू को देख सकते हो कि किस बात से वह आनन्दित होता है, क्यों वह चिन्ता करता है और क्यों वह उदास होता है, और क्यों वह क्रोधित होता है...। यही वह है जिसे हर एक ऐसा इंसान देख सकता है जो अपने हृदय को खोलता है और परमेश्वर को भीतर आने देता है। परमेश्वर तभी तुम्हारे हृदय के भीतर आ सकता है जब तुम अपने हृदय को उसके लिए खोल देते हो। तुम केवल तभी परमेश्वर के स्वरूप को देख सकते है, केवल तभी तुम अपने लिए उसकी इच्छा को देख सकते हो जब वह तुम्हारे हृदय के भीतर प्रवेश कर चुके। उस समय, तुम्हें यह पता चलेगा कि परमेश्वर के बारे में हर चीज़ बहुत बहुमूल्य है, कि उसका स्वरूप सँजोये रखने के बहुत लायक है। उसकी तुलना में, वे लोग जो तुम्हें घेरे रहते हैं, तुम्हारे जीवन की वस्तुएँ और घटनाएँ, और यहाँ तक कि तुम्हारे प्रियजन, तुम्हारा जीवनसाथी, और ऐसी चीज़े जिनसे तुम प्रेम करते हो, वे मुश्किल से उल्लेख करने के लायक भी नहीं हैं। वे बहुत छोटे हैं, और बहुत निम्न हैं; तुम महसूस करोगे कि कोई भौतिक पदार्थ फिर से तुम्हें उसमें खींचने में कभी भी समर्थ नहीं होगा, और तुम्हें फिर से उनके लिए कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी। परमेश्वर की दीनता में तुम उसकी महानता, और उसकी सर्वोच्चता को देखोगे; इसके अतिरिक्त, यदि उसने कुछ किया था जिसके बारे में तुम यह विश्वास करते थे कि वह काफी छोटा था, तो उसमें तुम उसकी असीमित बुद्धि और उसकी सहिष्णुता को देखोगे, और उसके धैर्य, उसकी सहनशीलता, और तुम्हारे प्रति उसकी समझ को देखोगे। यह तुममें उसके लिए प्रेम उत्पन्न करेगा। उस दिन, तुम्हें लगेगा कि मनुष्यजाति कितने गंदे संसार में रह रही है, यह कि जो लोग तुम्हारे आस-पास रहते हैं और जो चीज़े तुम्हारे जीवन में घटित होती हैं, और यहाँ तक कि जिनसे तुम प्रेम करते हो, तुम्हारे लिए उनका प्रेम, और उनकी तथाकथित सुरक्षा या तुम्हारे लिए उनकी चिन्ता भी इस योग्य नहीं हैं कि उनका उल्लेख भी किया जाए—केवल परमेश्वर ही तुम्हारा प्रियजन है, और यह केवल परमेश्वर ही है जिसे तुम सब से ज़्यादा सँजोते हो। जब वह दिन आएगा, तो मैं मानता हूँ कि कुछ लोग होंगे जो कहेंगेः परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और उसका सार बहुत पवित्र है—परमेश्वर में कोई धूर्तता नहीं है, कोई दुष्टता नहीं है, कोई ईर्ष्या नहीं है, और कोई कलह नहीं है, बल्कि केवल धार्मिकता और प्रामाणिकता है, और मनुष्यों को परमेश्वर के स्वरूप की हर चीज़ की लालसा करनी चाहिए। मनुष्यों को उसके लिए प्रयास करना चाहिए और उसकी आकांक्षा करनी चाहिए। किस आधार पर मनुष्यजाति की इसे प्राप्त करने की योग्यता निर्मित होती है? यह मनुष्यों की परमेश्वर के स्वभाव की समझ, और उनकी परमेश्वर के सार की समझ के आधार पर निर्मित होती है। इसलिए परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझना, प्रत्येक इंसान के लिए आजीवन शिक्षा है, और यह प्रत्येक उस व्यक्ति के द्वारा खोज किया जाने वाला एक आजीवन लक्ष्य है जो अपने स्वभाव को बदलने का प्रयास करते हैं, और परमेश्वर को जानने का प्रयास करते हैं।

हमने अभी-अभी उस समस्त कार्य के बारे में जिसे परमेश्वर ने पूर्ण किया गया था, उन चीज़ों की श्रृंखला के बारे में जिन्हें उसने पहली बार किया था बात की। इन में से हर एक चीज़ परमेश्वर की प्रबन्धन योजना, और परमेश्वर की इच्छा के लिए प्रासंगिक है। ये परमेश्वर के स्वयं के स्वभाव और उसके सार के भी प्रासंगिक हैं। यदि हम परमेश्वर के स्वरूप को बेहतर ढंग से समझना चाहते हैं, तो हम पुराने नियम या व्यवस्था के युग पर नहीं रुक सकते हैं, किन्तु हमें उन कदमों के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है जिन्हें परमेश्वर ने अपने कार्य के दौरान उठाया था। इसलिए, जैसे-जैसे परमेश्वर ने व्यवस्था के युग का अन्त किया और अनुग्रह के युग का आरम्भ किया, वैसे-वैसे हमारे स्वयं के कदम अनुग्रह के युग में आ गए हैं—एक ऐसा युग जो अनुग्रह और छुटकारे से भरपूर है। इस युग में, परमेश्वर ने एक बार फिर से पहली बार कुछ बहुत महत्वपूर्ण किया। इस नए युग का कार्य परमेश्वर और मनुष्यजाति दोनों के लिए एक नया शुरूआती बिन्दु था। यह नया शुरूआती बिन्दु एक बार फिर से एक नया कार्य था जिसे परमेश्वर ने पहली बार किया था। यह नया कार्य कुछ अभूतपूर्व था जिसे परमेश्वर ने कार्यान्वित किया था जिसकी कल्पना मनुष्यों, और समस्त प्राणियों के द्वारा नहीं की जा सकती थी। यह कुछ ऐसा है जिसे अब सभी लोग अच्छी तरह से जानते हैं—यह पहली बार था कि परमेश्वर एक मानव बन गया, पहली बार उसने एक मानव के रूप, एक मानव की पहचान के साथ, अपना कार्य आरम्भ किया। यह नया कार्य इस बात को प्रकट करताथा कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में अपना कार्य पूरा कर लिया था, और यह कि वह व्यवस्था के अधीन अब और कुछ नहीं करेगा या बोलेगा। न ही वह व्यवस्था के रूप में या व्यवस्था के नियमों और सिद्धांतों के अनुसार कुछ बोलेगा या करेगा। अर्थात्, व्यवस्था पर आधारित उसका समस्त कार्य हमेशा के लिए रूक गया था और जारी नहीं रह गया था, क्योंकि परमेश्वर नया कार्य आरम्भ करना और नई चीज़ों को करना चाहता था, और उसकी योजनाओं का एक बार फिर से एक नया शुरूआती बिन्दु था। इसलिए, परमेश्वर को मनुष्यजाति की एक नए युग में अगुवाई करनी थी।

चाहे यह मनुष्य के लिए एक आनन्ददायक समाचार हो या अशुभ समाचार यह इस बार पर निर्भर करता था कि उनका सार क्या है। ऐसा कहा जा सकता है कि यह एक आनन्ददायक समाचार नहीं था, बल्कि यह कुछ लोगों के लिए एक अशुभ समाचार था, क्योंकि जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य शुरू किया, तो वे लोग जिन्होंने बस व्यवस्थाओं और नियमों का अनुसरण किया था, और जिन्होंने बस सिद्धांतों का अनुसरण किया था किन्तु परमेश्वर का भय नहीं माना था वे परमेश्वर के नए कार्य पर दोष लगाने के लिए उसके पुराने कार्य के उपयोग की ओर प्रवृत्त होने लगे। इन लोगों के लिए, यह एक अशुभ समाचार था; परन्तु हर उस व्यक्ति के लिए जो निर्दोष और साफ़दिल का था, जो परमेश्वर के प्रति ईमानदार था और उसके छुटकारे को पाने की इच्छा करता था, परमेश्वर का पहला देहधारण बहुत आनन्ददायक समाचार था। क्योंकि जब से मनुष्य रहे हैं, यह पहली बार था कि परमेश्वर एक ऐसे रूप में जो पवित्रात्मा नहीं था मनुष्यजाति के बीच प्रकट हुआ और जीया था; बल्कि, वह मनुष्य से जन्मा था और मनुष्य के पुत्र के रूप में लोगों के बीच रहता था, और उनके बीच काम करता था। इस "पहली बार" ने लोगों की धारणाओं को तोड़ डाला और यह सभी कल्पनाओं से परे भी था। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के सभी अनुयायियों ने एक वास्‍तविक लाभ प्राप्त किया। परमेश्वर ने न केवल पुराने युग को खत्म किया, बल्कि उसने काम करने की पुरानी पद्धतियों, और कार्यशैली को भी समाप्त कर दिया था। उसने अपने सन्देशवाहकों को उसकी इच्छा को अब और संप्रेषित नहीं करने दिया, और वह बादलों में अब और छिपा हुआ नहीं था, और न ही वह अब और गर्जना के माध्यम से आज्ञा देते हुए मनुष्यों के समक्ष प्रकट हुआ या उनसे बोला। पहले की किसी भी चीज़ के असदृश, एक ऐसी पद्धति के माध्यम से जो मनुष्यों के लिए अकल्पनीय थी और जिसे समझना और स्वीकार करना उनके लिए कठिन था—देह बनना—वह उस युग के कार्य को विकसित करने के लिए मनुष्य का पुत्र बना। इस कदम से मनुष्य-जाति आश्चर्यचकित रह गयी, और यह उनके लिए बहुत असुविधाजनक था, क्योंकि परमेश्वर ने एक बार फिर एक नया कार्य शुरू किया जिसे उसने पहले कभी नहीं किया था। आज, हम इस पर एक नज़र डालेंगे कि परमेश्वर ने इस नए युग में कौन सा नया कार्य शुरू किया था, और इस पूरे नए कार्य में, हम परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप के बारे में क्या समझ सकते हैं?

निम्नलिखित वचन बाइबल के नए नियम में दर्ज़ हैं।

1. मत्ती 12:1 उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।

2. मत्ती 12:6-8 पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं," तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।

आओ पहले हम इस अंश को देखें: "उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।"

हमने इस अंश को क्यो चुना है? इसका परमेश्वर के स्वभाव से क्या सम्बन्ध है? इस पाठ में, पहली चीज़ जो हम जानते हैं वह है कि यह सब्त का दिन था, परन्तु प्रभु यीशु बाहर गया और अपने चेलों को अनाज के खेतों में ले गया। इससे ज्यादा "चौंका देने वाली बात" क्या हो सकती है कि वे मकई की "बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।" व्यवस्था के युग में, यहोवा परमेश्वर की व्यवस्था थी कि लोग सब्त के दिन यूँ ही बाहर नहीं जा सकते थे और गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते थे—बहुत सी ऐसी बातें थीं जिन्हें सब्त के दिन नहीं किया जा सकता था। प्रभु यीशु की ओर से किया गया यह कार्य उनके लिए पेचीदा था जो एक लम्बे समय से व्यवस्था के अधीन जीवन बिता रहे थे, और इसने आलोचना को भी भड़काया था। जहाँ तक उनके भ्रम और इस बात का संबंध है कि यीशु ने जो किया उसके बारे में उन्होंने किस प्रकार बात की, हम फिलहाल उसे एक ओर रखेंगे और पहले यह चर्चा करेंगे कि प्रभु यीशु ने, सभी दिनों में से, सब्त के दिन ही ऐसा करना क्यों चुना, और इस कार्य के द्वारा वह उन लोगों से क्या कहना चाहता था जो व्यवस्था के अधीन रह रहे थे। यह इस अंश और परमेश्वर के स्वभाव के बीच का संबंध है जिसके बारे में मैं तुमसे बात करना चाहता हूँ।

जब प्रभु यीशु मसीह आया, तो उसने लोगों से संवाद करने के लिए अपने व्यावहारिक कार्यों का उपयोग कियाः परमेश्वर ने व्यवस्था के युग को अलविदा किया था और नए कार्य का प्रारम्भ किया था, और इस नए कार्य को सब्त का पालन करने की आवश्यकता नहीं थी; जब परमेश्वर सब्त के दिन की सीमाओं से बाहर आ गया, तो यह उसके नए कार्य का बस एक पूर्वानुभव था, और उसका सचमुच का महान कार्य लगातार जारी हो रहा था। जब प्रभु यीशु ने अपना कार्य प्रारम्भ किया, तो उसने पहले से ही व्यवस्था की जंज़ीरों को पीछे छोड़ दिया था, और उस युग के विधि-विधानों और सिद्धांतों को तोड़ दिया था। उसमें, व्यवस्था से जुड़ी किसी भी बात का निशान नहीं था; उसने उसे पूर्णत: उतार कर फेंक दिया था तथा उसका अब और अनुसरण नहीं करता था, और उसने मनुष्यजाति से उसका अब और अनुसरण करने की अपेक्षा नहीं की थी। इसलिए तुम यहाँ देखते हो कि प्रभु यीशु सब्त के दिन मकई के खेतों से होकर गुज़रा, प्रभु ने आराम नहीं किया, बल्कि बाहर काम करता रहा। उसका यह कार्य लोगों की धारणाओं के लिए एक आघात था और इसने उन्हें सूचित किया कि वह व्यवस्था के अधीन अब और जीवन नहीं बिताएगा, और यह कि उसने सब्त की सीमाओं को छोड़ दिया है और एक नई कार्यशैली के साथ वह मनुष्यजाति के सामने और उनके बीच एक नई छवि में प्रकट हुआ है। उसके इस कार्य ने लोगों को बताया कि वह अपने साथ एक नया कार्य लाया है जो व्यवस्था से बाहर जाने और सब्त से बाहर जाने से आरम्भ हुआ था। जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य कार्यान्वित किया, तो वह अतीत से अब और नहीं चिपका रहा, और वह व्यवस्था के युग की विधियों के बारे में अब और चिन्तित नहीं था। न ही वह पूर्ववर्ती युग के अपने कार्य से प्रभावित था, बल्कि उसने सब्त के दिन में भी सामान्य रूप से कार्य किया और जब उसके चेले भूखे थे, तो वे मकई की बालें तोड़कर खा सकते थे। यह सब कुछ परमेश्वर की निगाहों में बिल्कुल सामान्य था। परमेश्वर के पास अधिकांश कार्य करने के लिए जिसे वह करना चाहता है और अधिकांश बातें कहने के लिए जिन्‍हें वह कहना चाहता है, एक नई शुरूआत हो सकती है। एक बार जब उसने एक नई शुरूआत कर दी, तो वह न तो फिर से अपने पिछले कार्य का उल्लेख करता है और न ही उसे जारी रखता है। क्योंकि परमेश्वर के पास उसके कार्य के स्वयं के सिद्धांत हैं। जब वह नया कार्य शुरू करना चाहता है, तो यह तब होता है जब वह मनुष्यजाति को अपने कार्य के एक नए स्तर में पहुँचाना चाहता है, और जब उसका कार्य एक उच्चतर चरण में प्रवेश कर लेता है। यदि लोग लगातार पुरानी कहावतों या विधि-विधानों के अनुसार काम करते रहेंगे या उन्हें निरन्तर मज़बूती से पकड़ें रहेंगे, तो इसे याद नहीं रखेगा या इसकी प्रशंसा नहीं करेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह पहले से ही एक नए कार्य को ला चुका है, और अपने कार्य में एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। जब वह एक नए कार्य को आरम्भ करता है, तो वह मनुष्यजाति के सामने पूर्णतः नई छवि में, पूर्णतः नए कोण से, और पूर्णतः नए तरीके से प्रकट होता है ताकि लोग उसके स्वभाव के भिन्न-भिन्न पहलुओं को और उसके स्वरूप को देख सकें। यह उसके नए कार्य में उसके लक्ष्यों में से एक है। परमेश्वर पुराने को थामे नहीं रहता है या घिसे-पिटे मार्ग को नहीं लेता है; जब वह कार्य करता और बोलता है तो यह उतना निषेधात्मक नहीं होता है जितना लोग कल्पना करते हैं। परमेश्वर में, सभी स्वतंत्र और मुक्त हैं, और कोई निषेधात्मकता नहीं है, कोई लाचारी नहीं है—जो वह मनुष्यजाति के लिए लाता है वह सम्पूर्ण आज़ादी और मुक्ति है। वह एक जीवित परमेश्वर है, एक ऐसा परमेश्वर जो असलियत में, और सचमुच में अस्तित्व में है। वह कोई कठपुतली या मिट्टी की मूर्ति नहीं है, और वह उन मूर्तियों से बिल्कुल भिन्न है जिन्हें लोग प्रतिष्ठापित करते हैं और जिनकी आराधना करते हैं। वह जीवित और जीवन्त है और उसके कार्य और वचन मनुष्यों के लिए जो लेकर आते हैं वे हैं सम्पूर्ण जीवन और ज्योति, सम्पूर्ण स्वतन्त्रता और मुक्ति, क्योंकि वह सत्य, जीवन, और मार्ग को धारण करता है—और वह अपने किसी भी कार्य में किसी भी चीज़ के द्वारा विवश नहीं होता है। लोग चाहे कुछ भी क्यों न कहें और चाहे वे उसके नए कार्य को किसी भी प्रकार से क्यों न देखें या कैसे भी उसका आकलन क्‍यों न करें, वह बिना किसी रुकावट के अपने कार्य को पूरा करेगा। वह किसी की भी धारणाओं या उसके कार्य और वचनों पर उठी अँगुलियों के बारे में, या अपने नए कार्य के लिए उनके कठोर विरोध और प्रतिरोध की भी चिन्ता नहीं करेगा। जो परमेश्वर करता है उसे मापने या परिभाषित करने, उसके कार्य को बदनाम करने, या तितर-बितर करने या उसमें तोड़फोड़ करने के लिए, संपूर्ण सृष्टि में कोई भी मानवीय तर्क, या मानवीय कल्पनाओं, ज्ञान, या नैतिकता का उपयोग नहीं कर सकता है। उसके कार्य में और जो वह करता है उसमें कोई निषेधात्मकता नहीं है, और उसे किसी मनुष्य, चीज़ या पदार्थ के द्वारा लाचार नहीं किया जाएगा, और उसे किसी शत्रुतापूर्ण ताक़तों के द्वारा तितर-बितर नहीं किया जाएगा। अपने नए कार्य में, वह एक सर्वदा विजयी राजा है, और किन्हीं भी शत्रुतापूर्ण ताक़तों और मनुष्यजाति में से सभी विधर्मों और भ्रांतियों को उसकी चरण-पीठ के नीचे कुचल दिया जाता है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह अपने कार्य के किस नए स्तर पर काम कर रहा है, इसे मनुष्यजाति के बीच विकसित और विस्तारित अवश्य होना चाहिए, इसे संपूर्ण विश्व में तब तक अबाधित रूप से अवश्य कार्यान्वित किया जाना चाहिए जब तक कि उसका महान कार्य पूर्ण नहीं हो जाता है। यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि, और उसका अधिकार और उसकी सामर्थ्य है। इस प्रकार, प्रभु यीशु मसीह खुलकर बाहर जा सकता था और सब्त के दिन कार्य कर सकता था क्योंकि उसके हृदय में कोई नियम नहीं थे, और वहाँ मनुष्यजाति से उत्पन्न कोई ज्ञान और सिद्धांत नहीं था। उसके पास जो था वह परमेश्वर का नया कार्य और उसका मार्ग था, और उसका कार्य मनुष्यजाति को स्वतन्त्र करना था, उसे मुक्त करना था, उन्हें प्रकाश में बने रहने की अनुमति देना था, और उन्हें जीने की अनुमति देना था। और जो मूर्तियों या झूठे ईश्वरों की पूजा करते हैं वे, सभी प्रकार के नियमों और वर्जनाओं से नियंत्रित, हर दिन शैतान के बन्धनों में जीते हैं—आज एक चीज़ का निषेध होता है, कल किसी दूसरी चीज़ का निषेध होता है—उनके जीवन में कोई स्वतन्त्रता नहीं है। वे जंज़ीरों में जकड़े हुए कैदियों के समान हैं जिनके पास कोई खुशी नहीं है जिसके बारे में वे बात करें। "निषेध" क्या दर्शाता है? यह विवशता, बन्धनों, और दुष्टता को दर्शाता है। जैसे ही कोई व्यक्ति किसी मूर्ति की आराधना करता है तो वह एक झूठे ईश्वर की आराधना कर रहा होता है, वह एक दुष्ट आत्मा की आराधना कर रहा होता है। प्रतिबन्ध इसके साथ आता है। तुम यह या वह नहीं खा सकते हो, तुम आज बाहर नहीं जा सकते हो, तुम कल अपना चूल्हा नहीं जला सकते हो, तुम अगले दिन नए घर में नहीं जा सकते हो, विवाह तथा अन्तिम क्रिया के लिए, और यहाँ तक कि बच्चे को जन्म देने के लिए भी कुछ निश्चित दिनों को ही चुनना होगा। यह क्या कहलाता है? यही प्रतिबन्ध कहलाता है; यह मनुष्यजाति का बंधन है, और ये शैतान की जंज़ीरें हैं और दुष्ट आत्माएँ इन्हें नियन्त्रित कर रही हैं, और उनके हृदयों और शरीरों को अवरुद्ध कर रही हैं। क्या ये प्रतिबन्ध परमेश्वर के साथ विद्यमान रहते हैं? जब परमेश्वर की पवित्रता की बात करते हैं, तो तुम्हें सबसे पहले यह सोचना चाहिएः कि परमेश्वर के साथ कोई भी निषेध नहीं है। परमेश्वर के वचनों और कार्य में उसके सिद्धांत हैं, किन्तु कोई निषेध नहीं हैं, क्योंकि परमेश्वर स्वयं सत्य, मार्ग, और जीवन है।

आओ हम निम्नलिखित अंश को देखें: "पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, 'मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,' तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" (मत्ती 12:6-8)। यहाँ "मन्दिर" किस का इशारा करता है? आसान शब्दों में कहें तो, "मन्दिर" एक शोभायमान, ऊँची इमारत का इशारा करता है, और व्यवस्था के युग में, मन्दिर परमेश्वर की आराधना हेतु याजकों के लिए एक स्थान था। जब प्रभु यीशु ने कहा, "कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है," यहाँ "वह" किसकी ओर इशारा करता है? स्पष्ट रूप से "वह" प्रभु यीशु है जो देह में है, क्योंकि केवल वही मन्दिर से बड़ा था। उन वचनों ने लोगों से क्या कहा? उन्होंने लोगों को मन्दिर से बाहर आने के लिए कहा—परमेश्वर पहले ही बाहर आ चुका था और उसमें अब और कार्य नहीं कर रहा था, इसलिए लोगों को मन्दिर के बाहर परमेश्वर के पदचिह्नों को ढूँढ़ना चाहिए और उसके नए कार्य में उसके कदमों का अनुसरण करना चाहिए। प्रभु यीशु मसीह के इस कथन की पृष्ठभूमि यह थी कि व्यवस्था के अधीन, लोग किसी ऐसी चीज़ के रूप में मन्दिर को देखने के लिए आए थे जो स्वयं परमेश्वर से भी बड़ा था। अर्थात्, लोग परमेश्वर की आराधना करने के बजाए मन्दिर की आराधना करते थे, इसलिए प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें सावधान किया कि वे मूर्तियों की आराधना न करें, बल्कि परमेश्वर की आराधना करें क्योंकि वह सर्वोच्च है। इसलिए उसने कहाः "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं।" यह स्पष्ट है कि प्रभु यीशु की नज़रों में, व्यवस्था के अधीन अधिकांश लोग यहोवा की अब और आराधना नही करते थे, बल्कि मात्र बलिदान की प्रक्रिया से होकर जाते थे, और प्रभु यीशु ने निर्धारित किया था कि यह प्रक्रिया मूर्ति पूजा है। इन मूर्ति पूजकों ने मन्दिर को परमेश्वर से अधिक महान और उच्चतर रूप में देखा था। उनके हृदयों में केवल मन्दिर था, न कि परमेश्वर, और यदि वे मन्दिर को खो देते हैं, तो वे अपने निवास स्थान को भी खो देते हैं। मन्दिर के बिना उनके पास आराधना के लिए कोई जगह नहीं थी और वे बलिदानों को कार्यान्वित नहीं कर सकते थे। उनका तथाकथित निवास स्थान वहाँ है जहाँ से वे यहोवा परमेश्वर की आराधना के झण्डे तले संचालन करते थे, जहाँ उन्हें मन्दिर के टिके रहने और अपने स्वयं के क्रियाकलापों को करने की अनुमति दी जाती थी। उनके तथाकथित बलिदानों को चढ़ाना मन्दिर में उनकी सेवा आयोजित करने के बहाने बस उनके स्वयं के व्यक्तिगत शर्मनाक व्यवहारों को कार्यान्वित करने के लिए था। यही वह कारण था कि उस समय लोग मन्दिर को परमेश्वर से भी बड़ा देखते थे। क्योंकि वे मन्दिर को एक आड़ के रूप में, और बलिदानों को लोगों को धोखा देने और परमेश्वर को धोखो देने के लिए एक बहाने के रूप में उपयोग करते थे, इसलिए प्रभु यीशु ने लोगों को चेतावनी देने के लिए ऐसा कहा था। यदि तुम लोग इन वचनों को वर्तमान में लागू करते हो, तब भी वे उतने ही प्रामाणिक और उतने ही उचित हैं। यद्यपि आज लोगों ने व्यवस्था के युग के लोगों के अनुभव की तुलना में अलग परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, फिर भी उनके स्वभाव का सार एक समान है। आज के कार्य के सन्दर्भ में, लोग अभी भी उसी प्रकार की चीज़ों को करेंगे जैसे कि "मन्दिर परमेश्वर से बड़ा है।" उदाहरण के लिए, लोग अपने कर्तव्यों के निर्वहन को अपनी नौकरी के रूप मे देखते हैं; वे परमेश्वर के लिए गवाही देने और बड़े लाल अजगर से युद्ध करने को, प्रजातंत्र और स्वतन्त्रता के लिए, मानवाधिकारों के बचाव में एक राजनैतिक आन्दोलन के रूप में देखते हैं; वे अपने कर्तव्य को जीवनवृत्तियों के लिए अपने कौशलों का उपयोग करने की ओर मोड़ देते हैं, बल्कि वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने को और कुछ नहीं बल्कि धार्मिक सिद्धांत के पालन के एक अंश के रूप में लेते हैं; इत्यादि। क्या मनुष्यों की ये अभिव्यक्तियाँ आवश्यक रूप से वैसी ही नहीं हैं जैसे कि "मन्दिर परमेश्वर से बढ़कर है"? सिवाय इसके कि दो हज़ार वर्ष पहले, लोग भौतिक मन्दिर में अपने व्यक्तिगत व्यवसाय को कर रहे थे, बल्कि आज, लोग अमूर्त मन्दिरों में अपने व्यक्तिगत व्यवसाय करते हैं। जो लोग नियमों को बहुमूल्य समझते हैं वे नियमों को परमेश्वर से बढ़कर देखते हैं, जो लोग हैसियत से प्रेम करते हैं वे हैसियत को परमेश्वर से बढ़कर मानते हैं, जो लोग अपनी जीवनवृत्ति से प्रेम करते हैं वे जीवनवृत्ति को परमेश्वर से बढ़कर मानते हैं, इत्यादि—उनकी सभी अभिव्यक्तियाँ मुझे यह कहने की ओर ले जाती हैं: "लोग अपने वचनों से परमेश्वर की सबसे बड़े के रूप में स्तुति करते हैं, किन्तु उनकी नज़रों में हर चीज़ परमेश्वर से बढ़कर है।" ऐसा इसलिए है क्योंकि जैसे ही लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करने के अपने मार्ग के साथ-साथ अपनी प्रतिभाओं को प्रदर्शित करने, या अपने व्यवसाय या अपनी स्वयं की जीवनवृत्ति के प्रदर्शन का अवसर मिलता है, तो वे अपने आप को परमेश्वर से दूर कर देते हैं और अपने आप को उन जीवनवृत्तियों में झोंक देते हैं जिनसे वे प्रेम करते हैं। जहाँ तक जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें सौंपा है उसका, और उसकी इच्छा का संबंध है, उन चीज़ों को बहुत पहले ही फेंक दिया गया है। इस परिदृश्य में, इन लोगों के बारे में और जो लोग दो हज़ार वर्ष पहले मन्दिर में अपना स्वयं का व्यवसाय कर रहे थे उनके बारे में क्या अन्तर है?

आगे, आओ हम पवित्रशास्त्र के इस अंश के इस अन्तिम वाक्य पर एक नज़र डालें: "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।" क्या इस वाक्य का कोई व्यावहारिक पक्ष है? क्या तुम लोग इसके व्यावहारिक पक्ष को देख सकते हो? हर एक बात जो परमेश्वर कहता है उसके हृदय से आती है, तो उसने ऐसा क्यों कहा? तुम लोग इसे कैसे समझते हो? हो सकता है तुम लोग इस वाक्य का अर्थ अब समझते हों, परन्तु उस समय बहुत से लोग नही समझते थे क्योंकि मनुष्यजाति बस उसी समय व्यवस्था के युग से बाहर निकली थी। उनके लिए, सब्त से बाहर निकलना एक कठिन बात थी, और सच्चा सब्त क्या होता है इसे समझने का तो ज़िक्र ही मत करो।

यह वाक्य "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" लोगों को बताता है कि परमेश्वर का सब कुछ अभौतिक है, और यद्यपि परमेश्वर तुम्हारी सारी भौतिक आवश्यकताओं को प्रदान कर सकता है, फिर भी जब एक बार तुम्हारी भौतिक आवश्यकताएँ पूरी कर दी जाती हैं, तो क्या इन चीज़ों से सन्तुष्टि तुम्हारी सत्य की खोज का स्थान ले सकती है? यह निःसन्देह संभव नहीं है! परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप जिसके बारे में हमने संगति की है दोनों सत्य हैं। इसे भौतिक वस्तुओं की भारी कीमत के साथ भी नहीं तौला जा सकता है और न ही इसके मूल्य की पैसों में मात्रा निर्धारित की जा सकती है, क्योंकि यह कोई भौतिक वस्तु नहीं है, और यह हर एक व्यक्ति के हृदय की आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है। प्रत्येक मनुष्य के लिए, इन अमूर्त सच्चाईयों का मूल्य ऐसी किसी भी भौतिक चीज़ से बढ़कर होना चाहिए जिसे तुम अच्छा समझते हो, ठीक है न? यह कथन कुछ ऐसा है जिस पर तुम लोगों को टिके रहने की आवश्यकता है। जो कुछ मैंने कहा है उसका मुख्य बिन्दु यह है कि परमेश्वर का स्वरूप और उसका सब कुछ हर एक व्यक्ति के लिए अति महत्वपूर्ण चीज़ें हैं और इन्हें किसी भौतिक पदार्थ के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। मैं तुम्हें एक उदाहरण दूँगाः जब तुम्हें भूख लगती है, तो तुम्हें भोजन की आवश्यकता होती है। यह भोजन सापेक्ष रूप से अच्छा हो सकता है, या सापेक्ष रूप से कमी वाला हो सकता है, किन्तु जब तुम अपना पेट भर लेते हो, तो भूखे होने का वह अप्रिय एहसास अब और नहीं होगा—वह चला जाएगा। तुम वहाँ आराम से बैठ सकते हो, और तुम्हारा शरीर आराम में होगा। लोगों की भूख का भोजन से समाधान किया जा सकता है, किन्तु जब तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, और तुम्हें यह एहसास होता है कि तुम्हें उसके बारे में कोई समझ नहीं है? तो तुम अपने हृदय के खालीपन का समाधान कैसे करोगे? क्या इसका समाधान भोजन से किया जा सकता है? या जब तुम परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हो और उसकी इच्छा तुम्हारी समझ में नहीं आती है, तो तुम अपने हृदय की उस भूख को मिटाने के लिए किस चीज़ का उपयोग कर सकते हो? परमेश्वर के माध्यम से उद्धार के तुम्हारे अनुभव की प्रक्रिया में, अपने स्वभाव में किसी परिवर्तन की खोज करने के दौरान, यदि तुम उसकी इच्छा को नहीं समझते हो या यह नहीं जानते हो कि सत्य क्या है, और यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते हो, तो क्या तुम बहुत व्याकुलता महसूस नहीं करते हो? क्या तुम अपने हृदय में एक बड़ी भूख और प्यास महसूस नहीं करते हो? क्या ये एहसास तुम्हें तुम्हारे हृदय में शांति महसूस करने से रोकते नहीं हैं? तो कैसे तुम अपने हृदय की उस भूख की क्षतिपूर्ति कर सकते हो—क्या इसका समाधान करने का कोई तरीका है? कुछ लोग खरीददारी करने के लिए बाज़ार चले जाते हैं, कुछ लोग भरोसा करने के लिए मित्रों को ढूँढ़ लेते हैं, कुछ लोग जी भरकर सोते हैं, अन्य लोग परमेश्वर के वचनों को और अधिक पढ़ते हैं, या अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए कठिन मेहनत और अधिक प्रयास व्यय करते हैं। क्या ये चीज़े तुम्हारी वास्तविक कठिनाईयों का समाधान कर सकती हैं? तुम लोगों में से सभी इस प्रकार के अभ्यासों को पूर्णत: समझ लो। जब तुम निर्बलता महसूस करते हो, जब तुम परमेश्वर से प्रबुद्धता पाने की दृढ़ इच्छा महसूस करते हो ताकि वह तुम्हें उसकी सच्चाई और उसकी इच्छा की वास्तविकता को जानने की अनुमति दे सके, तो तुम्हें सबसे ज़्यादा किसकी आवश्यकता होती है? तुम्हें जिसकी आवश्यकता होती है वह भरपेट आहार नहीं है, और यह कुछ भले वचन नहीं हैं। उससे बढ़कर, यह देह का क्षणिक आराम और देह की सन्तुष्टि नहीं है—तुम्हें जिसकी आवश्यक है वह है कि परमेश्वर तुम्हें सीधे और स्पष्ट रूप से बताए कि तुम्हें क्या करना चाहिए और तुम्हें इसे कैसे करना करना चाहिए, और तुम्हें स्पष्ट रूप से बताए कि सत्य क्या है। तुम्हारे द्वारा इसे समझ लेने के बाद, भले ही यह थोड़ा सा ही क्यों ना हो, क्या तुम एक अच्छा भोजन कर लेने की तुलना में अपने हृदय में अधिक सन्तुष्टि महसूस नहीं करते हो? जब तुम्हारा हृदय सन्तुष्ट होता है, तो क्या तुम्हारा हृदय, तुम्हारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व सच्ची शांति प्राप्त नहीं करता है? इस दृष्टान्त और विश्लेषण के द्वारा, क्या तुम लोगों को अब समझ में आया कि क्यों मैं तुम लोगों के साथ इस वाक्य को साझा करना चाहता था कि, "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है"? इसका वह अर्थ है जो परमेश्वर से आता है, जो उसका स्वरूप है, और उसका सब कुछ किसी भी अन्य चीज़ से बढ़कर है, जिसमें वह चीज़ या वह व्यक्ति भी शामिल है जिस पर तुमने किसी समय विश्वास किया था और जिसे तुमने सबसे अधिक सँजोया था। अर्थात्, यदि मनुष्य परमेश्वर के मुँह के वचन प्राप्त नहीं कर सकते हैं या वे उसकी इच्छा को नहीं समझते हैं, तो वे शांति प्राप्त नहीं कर सकते हैं। अपने भविष्य के अनुभवों में, तुम लोग समझोगे कि मैं क्यों चाहता था कि आज तुम लोग इस अंश को देखो—यह बहुत महत्वपूर्ण है। सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह सत्य और जीवन है। मनुष्य-जाति के लिए सत्य कोई ऐसी चीज़ है जिसकी उनके जीवन में कमी नहीं हो सकती है, जिसके बिना वे कभी कुछ नहीं कर सकते हैं; तुम ऐसा भी कह सकते हो कि यह सबसे बड़ी चीज़ है। यद्यपि तुम उसे देख या उसे छू नहीं सकते हो, फिर भी तुम्हारे लिए उसके महत्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती है; यही वह एकमात्र चीज़ है जो तुम्हारे हृदय में शांति ला सकती है।

क्या सत्य के बारे में तुम लोगों की समझ तुम्हारी स्वयं की अवस्थाओं के साथ एकीकृत है? वास्तविक जीवन में, तुम्हें पहले यह सोचना है कि कौन से सत्‍य उन लोगों, चीज़ों, और वस्तुओं से सम्बन्ध रखते हैं जिनके समक्ष तुम आए हो; इन्हीं सत्‍यों के बीच तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हो और जिसके समक्ष तुम आए हो उसे उसकी इच्छा के साथ जोड़ सकते हो। यदि तुम नहीं जानते हो कि सत्‍य का कौन सा पहलू उन चीज़ों से सम्बन्ध रखता है जिनका तुमने सामना किया है किन्तु सीधे जाकर परमेश्वर की इच्छा को खोजते हो, तो ऐसा दृष्टिकोण पूरी तरह से भुलावा है और परिणामों को प्राप्त नहीं कर सकता है। यदि तुम सत्य की खोज करना और परमेश्वर की इच्छा को जानना चाहते हो, तो पहले तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि किस प्रकार की चीज़े तुम्हारे ऊपर आयी हैं, वे सत्य के किस पहलू से सम्बन्ध रखती हैं, और परमेश्वर के वचनों में उस सत्य को देखना है जो तुम्‍हारे अनुभव से सम्बन्ध रखता है। तब तुम उस सत्‍य में अभ्यास के उस मार्ग को खोजते हो जो तुम्हारे लिए सही है; और इस तरह से तुम परमेश्वर की इच्छा की अप्रत्यक्ष समझ प्राप्त कर सकते हो। सत्य की खोज करना और उसका अभ्यास करना यांत्रिक रूप से किसी सिद्धांत को लागू करना या किसी सूत्र का अनुसरण करना नहीं है। सत्य सूत्रित नहीं होता है, न ही कोई व्यवस्था है। यह मृत नहीं है—यह जीवन है, यह एक जीवित चीज़ है, और यह वह नियम है जिसका अनुसरण प्राणी को अवश्य करना चाहिए और वह नियम है जिसे मनुष्य को अपने जीवन में अवश्य रखना चाहिए। यह कुछ ऐसा है जिसे तुम्हें अनुभव से और अधिक समझना होगा। तुम अपने अनुभव की किसी भी अवस्था पर क्यों न पहुँच चुके हो, तुम परमेश्वर के वचनों या सत्य से अवियोज्य हो, और तुम जो कुछ परमेश्वर के स्वभाव के बारे में समझते हो और तुम परमेश्वर के स्वरूप के बारे में जो कुछ समझते हो वे सभी परमेश्वर के वचनों में व्यक्त होते है; और वे सत्य से विकट रूप से जुड़े हुए हैं। परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप सभी अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप की एक प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। यह परमेश्वर के स्वरूप को साकार करता है और इसे स्पष्ट रूप से बताता है; यह तुम्हें और अधिक सीधी तरह से बताता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है, और वह क्या पसंद नहीं करता है, वह तुमसे क्या कराना चाहता है और वह तुम्हें क्या करने की अनुमति नहीं देता है, वह किस प्रकार के लोगों से घृणा करता है और वह किस प्रकार के लोगों से प्रसन्न होता है। जिन सत्‍यों को परमेश्वर प्रकट करता है उनके पीछे लोग उसके आनन्द, क्रोध, दुःख, और खुशी, और साथ ही उसके सार को देख सकते हैं—यह उसके स्वभाव का प्रकट होना है। परमेश्वर के स्वभाव को जानने, और उसके वचन से उसके स्वभाव को समझने के अलावा, जो सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है वह है व्यावहारिक अनुभव के द्वारा इस समझ तक पहुँचने की आवश्यकता। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को जानने के लिए अपने आप को वास्तविक जीवन से हटा लेता है, तो वह उसे प्राप्त नहीं कर पाएगा। भले ही कुछ लोग हों जो परमेश्वर के वचन से कुछ समझ प्राप्त कर सकते हों, फिर भी यह सिद्धांतों और वचनों तक ही सीमित रहता है, और परमेश्वर वास्तव में जैसा है यह उसके साथ असमानता है।

हम अभी जिस बारे में संवाद कर रहे हैं वह सब बाइबल में दर्ज कहानियों के दायरे में है। इन कहानियों के माध्यम से, और घटित हुई इन चीज़ों के विश्लेषण के माध्यम से, लोग उसके स्वभाव और उसके स्वरूप को जो उसने प्रकट किया है समझ सकते हैं, जो उन्हें परमेश्वर के हर पहलू को और अधिक खुल कर, अधिक गहराई से, अधिक व्यापकता से, और अधिक अच्छी तरह से समझने देता है। तो, क्या परमेश्वर के स्वभाव के हर पहलू को जानने का एकमात्र तरीका इन कहानियों के माध्यम से ही है? नहीं, ऐसा नहीं है! क्योंकि जो परमेश्वर कहता है और राज्य के युग में जो कार्य वह करता है वे परमेश्वर के स्वभाव को जानने, और इसे अधिक पूरी तरह से जानने में लोगों की और अधिक सहायता कर सकते हैं। हालाँकि, मैं सोचता हूँ कि कुछ ऐसे उदाहरणों और बाइबल में दर्ज कहानियों के माध्यम से जिनसे लोग परिचित हैं परमेश्वर के स्वभाव को जानना और उसके स्वरूप को समझना थोड़ा आसान है। यदि मैं तुम्हें परमेश्वर ज्ञात करवाने के लिए न्याय और ताड़ना के वचनों और उन सत्यों को जिन्हें आज परमेश्वर प्रकट करता है शब्दशः लेता हूँ, तो तुम इसे बहुत सुस्त और बहुत थका देने वाला महसूस करोगे, और कुछ लोग तो यहाँ तक महसूस करेंगे कि परमेश्वर के वचन सूत्रित प्रतीत होते हैं। परन्तु यदि हम बाइबल की इन कहानियों को परमेश्वर के स्वभाव को जानने में लोगों को सहायता करने वाले उदाहरणों के रूप में लेते हैं, तो वे इसे अरुचिकर नहीं पाएँगे। तुम कह सकते हो कि इन उदाहरणों की व्याख्या करने के दौरान, उस समय जो परमेश्वर के हृदय में था उसके विवरण—उसकी मनोदशा या मनोभाव, या उसके विचार और मत—लोगों को मानवीय भाषा में बताए गए हैं, और इस सब का उद्देश्य उन्हें सराहना करने देना, और यह महसूस करने देना है कि परमेश्वर का स्वरूप कोई सूत्र नहीं है। यह कोई पौराणिक, या कुछ ऐसा नहीं है जिसे लोग देख और छू नहीं सकते हैं। यह कुछ ऐसा है जो सचमुच में अस्तित्व में है जिसे लोग महसूस कर सकते हैं, और जिसकी सराहना कर सकते हैं। यह चरम लक्ष्य है। तुम कह सकते हो कि जो लोग इस युग में रह रहे हैं वे धन्य हैं। वे परमेश्वर के पिछले कार्य की विस्तृत समझ प्राप्त करने के लिए बाइबल की कहानियों का उपयोग कर सकते हैं; वे उस कार्य के द्वारा उसके स्वभाव को देख सकते हैं जो उसने किया है। और वे इन स्वभावों के द्वारा जिन्हें उसने प्रकट किया है मनुष्य-जाति के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव के एक अधिक विस्तृत और गहरे ज्ञान तक पहुँचने के लिए, उसकी पवित्रता की मूर्त अभिव्यक्ति और मनुष्यों के लिए उसकी देखरेख को समझ सकते हो। मुझे विश्वास है कि तुम सभी लोग इसे महसूस कर सकते हो!

उस कार्य के क्षेत्र के भीतर जिसे प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग में पूर्ण किया था, तुम परमेश्वर के स्वरूप के अन्य पहलू को देख सकते हो। यह उसकी देह के द्वारा व्यक्त किया गया था, और उसकी मानवता के माध्यम से लोगों के लिए देखना और सराहना करना संभव बनाया गया था। मनुष्य के पुत्र में, लोगों ने देखा कि किस प्रकार देह में परमेश्वर ने अपनी मानवता में जीवन बिताया था, और उन्होंने देह के माध्यम से व्यक्त परमेश्वर की दिव्यता को देखा था। इन दो प्रकार की अभिव्यक्तियों ने लोगों को एक बिल्कुल सच्चे परमेश्वर को देखने दिया, और उन्हें परमेश्वर के बारे में एक भिन्न अवधारणा बनाने दी। हालाँकि, संसार के सृजन और व्यवस्था के युग के अन्त के बीच की समयावधि में, अर्थात्, अनुग्रह के युग से पहले, लोगों के द्वारा जो देखा, सुना, और अनुभव किया जाता था वह केवल परमेश्वर का दिव्य पहलू था। यह वह था जो परमेश्वर ने अमूर्त क्षेत्र में किया और कहा था, और वे चीज़े थीं जिन्हें उसने अपने सच्चे व्यक्तित्व से व्यक्त किया था जिन्हें देखा और छुआ नहीं जा सकता है। प्रायः, ये चीज़े लोगों को यह महसूस कराती थीं कि परमेश्वर बहुत महान है, और यह कि वे उसके नज़दीक नहीं जा सकते हैं। वह प्रभाव जो परमेश्वर सामान्यतः लोगों के ऊपर डालता था वह था कि वह भीतर और बाहर जगमगाता था, और लोग यहाँ तक महसूस करते थे कि उसके हर एक विचार और मत इतने रहस्यमयी और इतने मायावी थे कि उन तक पहुँचने का कोई तरीका नहीं था, और वे उनको समझने और उनकी सराहना करने का प्रयास तो बिल्कुल भी नहीं करते थे। लोगों के लिए, परमेश्वर के बारे में सब कुछ बहुत दूर था—इतना दूर कि लोग उसे देख नहीं सकते थे, और उसे छू नहीं सकते थे। ऐसा लगता था कि वह ऊपर आकाश में है, और ऐसा प्रतीत होता था कि वह बिल्कुल भी अस्तित्व में नहीं है। इसलिए लोगों के लिए, परमेश्वर के हृदय और मन को या उसकी किसी सोच को समझना भी पहुँच के बाहर था, और यहाँ तक कि अगम्य था। यद्यपि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में कुछ ठोस कार्य किए थे, और उसने कुछ विशेष वचन जारी किए थे और कुछ विशेष स्वभावों को व्यक्त किया था ताकि लोग उसके सच्चे ज्ञान की सराहना करें और उसे देखें, फिर भी अंत में, यह एक अमूर्त क्षेत्र में परमेश्वर के स्वरूप की उसकी अभिव्यक्ति थी, और जो लोगों ने समझा था, जो वे जानते थे वह तब भी उसके स्वरूप का दिव्य पहलू था। परमेश्वर के स्वरूप की इस अभिव्यक्ति[क] से मनुष्य-जाति ठोस धारणा प्राप्त नहीं कर सकी, और परमेश्वर के बारे में उनकी पहली छाप अभी भी इसी दायरे के भीतर अटकी हई थी कि "एक पवित्रात्मा जिसके करीब जाना कठिन है, जो भीतर और बाहर जगमगाता है।" क्योंकि लोगों को दिखाई देने के लिए परमेश्वर ने भौतिक क्षेत्र की किसी विशिष्ट वस्तु या किसी छवि का उपयोग नहीं किया था, इसलिए वे अभी भी मानवीय भाषा का उपयोग करके उसे परिभाषित नहीं कर सकते थे। लोग अपने हृदय और मस्तिष्क में, परमेश्वर के लिए एक मानक स्थापित करने, उसे मूर्त बनाने और उसे मानवीय बनाने के लिए हमेशा अपनी स्वयं की भाषा का उपयोग करना चाहते थे, जैसे कि वह कितना ऊँचा है, वह कितना बड़ा है, वह कैसा दिखाई देता है, वह विशेष रूप से क्या पसंद करता है और उसका विशिष्ट व्यक्तित्व क्या है। वास्तव में, अपने हृदय में परमेश्वर जानता था कि लोग इस तरह से सोचते है। वह लोगों की आवश्यकताओं के बारे में बहुत स्पष्ट था, और निस्संदेह वह यह भी जानता था कि उसे क्या करना चाहिए, इसलिए उसने अनुग्रह के युग में एक अलग तरीके से अपने कार्य को कार्यान्वित किया था। यह दिव्य और मानवीय दोनों था। जिस समयावधि में प्रभु यीशु काम कर रहा था, उस समय लोग यह देख सकते थे कि परमेश्वर की अनेक मानवीय अभिव्यक्तियाँ थीं। उदाहरण के लिए, वह नृत्य कर सकता था, वह विवाहों में शामिल हो सकता था, वह लोगों के साथ संगति कर सकता था, उनसे बात कर सकता था, और चीज़ों की उनके साथ चर्चा कर सकता था। इसके अतिरिक्त, प्रभु यीशु ने बहुत से कार्यों को भी पूर्ण किया था जो उसकी दिव्यता को दर्शाते थे, और निस्संदेह यह समस्त कार्य परमेश्वर के स्वभाव की एक अभिव्यक्ति और प्रकाशन थे। इस समय के दौरान, जब परमेश्वर की दिव्यता एक साधारण सी देह में साकार हुई थी जिसे लोग देख और छू सकते थे, वे अब और यह महसूस नहीं करते थे कि वह भीतर और बाहर जगमगा रहा है, जिसके करीब वे नहीं जा सकते थे। इसके विपरीत, वे मनुष्य के पुत्र की हरकत, उसके वचनों, और कार्य के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा को ग्रहण करने या उसकी दिव्यता को समझने की कोशिश कर सकते थे। देहधारी मनुष्य के पुत्र ने अपनी मानवता के माध्यम से परमेश्वर की दिव्यता को व्यक्त किया था और परमेश्वर की इच्छा को मनुष्यजाति तक पहुँचाया था। और परमेश्वर की इच्छा और स्वभाव की अभिव्यक्ति के माध्यम से, उसने लोगों के सामने उस परमेश्वर को प्रकट किया जिसे आध्यात्मिक क्षेत्र में देखा और छुआ नहीं जा सकता है। जो लोगों ने देखा वह, मूर्त और हड्डियों तथा माँस वाला, स्वयं परमेश्वर था। तो देहधारी मनुष्य के पुत्र ने परमेश्वर की स्वयं की पहचान, हैसियत, छवि, स्वभाव, और उसके स्वरूप जैसी चीज़ों को ठोस और मानवीय बना दिया। यद्यपि परमेश्वर की छवि के बारे में मनुष्य के पुत्र के बाहरी रूप-रंग की कुछ सीमाएँ थीं, फिर भी उसका सार और स्वरूप पूर्णत: परमेश्वर की स्वयं की पहचान और हैसियत को दर्शाने में पूर्णतः समर्थ थे—अभिव्यक्ति के रूप में मात्र कुछ भिन्नताएँ थीं। चाहे यह मनुष्य के पुत्र की मानवता हो या उसकी दिव्यता, हम नकार नहीं सकते कि वह स्वयं परमेश्वर की पहचान और उसकी हैसियत को दर्शाता था। हालाँकि इस समय के दौरान, परमेश्वर ने देह के माध्यम से कार्य किया, देह के परिप्रेक्ष्य से बात की, और मनुष्य-जाति के सामने मनुष्य के पुत्र की पहचान और हैसियत के साथ खड़ा हुआ, और उसने लोगों को मनुष्यजाति के बीच परमेश्वर के सच्चे वचनों और कार्य का सामना और अनुभव करने का अवसर दिया। उसने लोगों को विनम्रता के बीच उसकी दिव्यता और उसकी महानता में अंतर्दृष्टि, और साथ ही परमेश्वर की प्रामाणिकता और वास्तविकता की एक प्रारम्भिक समझ और एक प्रारम्भिक परिभाषा भी प्राप्त करने दी। भले ही प्रभु यीशु के द्वारा पूर्ण किया गया कार्य, कार्य करने के उसके तरीके, और जिस परिप्रेक्ष्य से उसने बोला था वे आध्यात्मिक क्षेत्र में परमेश्वर के सच्चे व्यक्तित्व से भिन्न थे, फिर भी उसके बारे में हर चीज़ सचमुच में स्वयं परमेश्वर को दर्शाती थी जिसे मनुष्यों ने पहले कभी नहीं देखा था—इसे नकारा नहीं जा सकता है! अर्थात्, चाहे परमेश्वर किसी भी रूप में प्रकट हो, चाहे वह किसी भी परिप्रेक्ष्य में बात करे, या वह किस छवि में मनुष्य-जाति के सामने आता है, परमेश्वर और किसी को नहीं बल्कि स्वयं को दर्शाता है। वह किसी मनुष्य को नहीं दर्शा सकता है—वह किसी भ्रष्ट मनुष्य को नहीं दर्शा सकता है। परमेश्वर स्वयं परमेश्वर है, और इसे नकारा नहीं जा सकता है।

आगे हम अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के द्वारा बोले गए दृष्टान्त पर नज़र डालेंगे।

3. खोई हुई भेड़ का दृष्टान्त

मत्ती 18:12-14 तुम क्या सोचते हो? यदि किसी मनुष्य की सौ भेड़ें हों, और उनमें से एक भटक जाए, तो क्या वह निन्यानबे को छोड़कर, और पहाड़ों पर जाकर, उस भटकी हुई को न ढूँढ़ेगा? और यदि ऐसा हो कि उसे पाए, तो मैं तुम से सच कहता हूँ कि वह उन निन्यानबे भेड़ों के लिये जो भटकी नहीं थीं, इतना आनन्द नहीं करेगा जितना कि इस भेड़ के लिये करेगा। ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।

यह एक रूपक है—इस अंश से लोग किस प्रकार की भावना प्राप्त करते हैं? जिस तरह से इस रूपक को व्यक्त किया जाता है उसमें मानवीय भाषा में एक अलंकार का उपयोग किया जाता है; यह कुछ ऐसा है जो मनुष्य के ज्ञान के दायरे के भीतर है। यदि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में ऐसा ही कुछ कहा होता, तो लोगों ने महसूस किया होता कि यह वास्तव में परमेश्वर जो है उसके अनुरूप नहीं है, लेकिन जब अनुग्रह के युग में मनुष्य के पुत्र ने इस अंश को प्रदान किया, तब यह लोगों को सुकून देने वाला, जोशपूर्ण, और अंतरंग महसूस हुआ। जब परमेश्वर देह बन गया, जब वह एक मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ, तो उसने मानवता पर अपने हृदय की आवाज़ को व्यक्त करने के लिए एक बहुत ही उचित रूपक का उपयोग किया। इस आवाज़ ने परमेश्वर की स्वयं की आवाज़ का और उस कार्य का प्रतिनिधित्व किया जो वह उस युग में करना चाहता था। अनुग्रह के युग के लोगों के प्रति परमेश्वर की जो रवैया था यह उसे भी दर्शाता था। लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये के परिप्रेक्ष्य से देखें तो, उसने हर व्यक्ति की तुलना एक भेड़ से की है। यदि एक भेड़ खो जाती है, तो उसे खोजने के लिए जो कुछ कर सकता है वह करेगा। यह इस बार मनुष्यों के बीच देह में परमेश्वर के कार्य के सिद्धांत को दर्शाता है। परमेश्वर ने इस कार्य में अपना संकल्प और अपने रवैये की व्याख्या करने के लिए इस दृष्टान्त को उपयोग किया। यह परमेश्वर के देह बनने का लाभ थाः वह मनुष्यजाति के ज्ञान का लाभ उठा सका था और लोगों से बात करने, और अपनी इच्छा को प्रकट करने के लिए मानवीय भाषा का उपयोग कर सका था। उसने मनुष्यों के लिए अपनी गहरी, दिव्य भाषा की व्याख्या की अथवा "अनुवाद" किया जिसे मानवीय भाषा, मानवीय तरीके से समझने में लोगों को संघर्ष करना पड़ता था। इससे लोगों को उसकी इच्छा को समझने में और यह जानने में सहायता मिली कि वह क्या करना चाहता था। वह मानवीय भाषा का प्रयोग करके, मानवीय परिप्रेक्ष्य से लोगों के साथ वार्तालाप कर सकता था, और लोगों के साथ उस तरीके से बातचीत कर सकता था जिसे वे समझ सकते थे। वह मानवीय भाषा और ज्ञान का उपयोग करके भी बातचीत और कार्य कर सकता था जिसकी वजह से लोग परमेश्वर की दयालुता और घनिष्ठता महसूस कर सकते थे, जिससे वे उसके हृदय को देख सकते थे। तुम लोग इसमें क्या देखते हो? यह कि परमेश्वर के वचनों और क्रियाओं में कोई निषेधात्मकता नहीं है। जिस तरह से लोग इसे देखते हैं, हो ही नहीं सकता था कि जो बात परमेश्वर स्वयं कहना चाहता था, और जो कार्य वह करना चाहता था उसके बारे में बात करने के लिए, या अपनी स्वयं की इच्छा को प्रकट करने के लिए परमेश्वर मनुष्यों के ज्ञान, भाषा, या बोलने के तरीकों का उपयोग कर सकता था; यह ग़लत सोच है। परमेश्वर ने इस प्रकार के रूपक का उपयोग किया जिससे लोग परमेश्वर की वास्तविकता और ईमानदारी को महसूस कर सकें, और उस समयावधि के दौरान लोगों के प्रति उसके रवैये को देख सकें। इस दृष्टान्त ने उन लोगों को स्वप्न से जगा दिया था जो लम्बे समय से व्यवस्था के अधीन जीवन व्यतीत कर रहे थे, और इसने अनुग्रह के युग में रहने वाले लोगों को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रेरित किया। इस दृष्टान्त के अंश को पढ़ कर, लोग मनुष्यजाति को बचाने हेतु परमेश्वर की ईमानदारी को जान जाते हैं और उसके हृदय में मनुष्यजाति का जो महत्व है उसे समझ जाते हैं।

आओ हम इस अंश के अंतिम वाक्य पर एक नज़र डालें: "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।" क्या ये प्रभु यीशु के स्वयं के वचन थे, या उसके स्वर्गिक पिता के वचन थे? सतही तौर पर, ऐसा लगता है कि यह प्रभु यीशु है जो बात कर रहा है, किन्तु उसकी इच्छा स्वयं परमेश्वर की इच्छा को प्रकट करती है, यही वजह है कि उसने कहा थाः "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।" उस समय लोग केवल स्वर्गिक पिता को ही परमेश्वर के रूप में मानते थे, और इस व्यक्ति को जिसे वे अपनी आँखों के सामने देखते थे उसे बस उसके द्वारा भेजा हुआ मानते थे, और यह कि वह स्वर्गिक पिता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। इसी लिए प्रभु यीशु को ऐसा भी कहना पड़ा था, ताकि वे सचमुच में मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर की इच्छा को अनुभव कर सकें, और जो कुछ उसने कहा था उसकी प्रामाणिकता और सटीकता को महसूस कर सकें। भले ही कहने के लिए यह एक साधारण बात थी, किन्तु यह बहुत परवाह करने वाली बात थी और यह प्रभु यीशु की दीनता और आंतरिकता को प्रकट करती थी। इससे फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर देह बना या उसने आध्यात्मिक क्षेत्र में कार्य किया, वह मनुष्य के हृदय को सर्वोत्तम ढंग से जानता था, और सर्वोत्तम ढंग से समझता था कि लोगों को किस चीज़ की आवश्यकता है, और जानता था कि लोग किस बारे में चिंता करते हैं, और क्या चीज़ उन्हें भ्रम में डालती है, इसलिए उसने इस एक पंक्ति को जोड़ दिया था। इस पंक्ति ने मनुष्यजाति में छिपी एक समस्या को विशिष्ट रूप से दर्शा दिया: मनुष्य के पुत्र ने जो कुछ भी कहा था उसको लेकर लोग सन्देह में थे, कहने का मतलब है कि, जब प्रभु यीशु बोल रहा था उसे यह जोड़ना पड़ा थाः "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।" केवल इस आधार पर ही उसके वचन, लोगों को उनकी परिशुद्धता का विश्वास दिलाने तथा उनकी विश्वसनीयता को सुधारने का, परिणाम दे सकते थे। यह दिखाता है कि जब परमेश्वर मनुष्य का एक सामान्य पुत्र बन गया, तब परमेश्वर और मनुष्यजाति के बीच एक बड़ा बेढंगा रिश्ता था, और यह कि मनुष्य के पुत्र की स्थिति बहुत शर्मनाक थी। यह इस बात को भी दर्शाता है कि उस समय मनुष्यों के बीच प्रभु यीशु की हैसियत कितनी महत्वहीन थी। जब उसने ऐसा कहा, तो यह वास्तव में लोगों को बताने के लिए था कि: तुम लोग निश्चिंत हो सकते हो—यह उसे नहीं दर्शाता है जो मेरे स्वयं के हृदय में है, बल्कि यह उस परमेश्वर की इच्छा है जो तुम लोगों के हृदय में है। मनुष्यजाति के लिए, क्या यह एक व्यंग्यात्मक बात नहीं थी? भले ही देह में रह कर काम कर रहे परमेश्वर को अनेक फायदे थे जो उसके पास उसके व्यक्तित्व में नहीं थे, फिर भी उसे उनके सन्देहों और अस्वीकृति का और साथ ही उनकी संवेदनशून्यता और मूढ़़ता का भी सामना करना पड़ा था। ऐसा कहा जा सकता है कि मनुष्य के पुत्र के कार्य की प्रक्रिया मनुष्यजाति के द्वारा अस्वीकृत किए जाने के अनुभव करने की प्रक्रिया, और मनुष्यजाति के द्वारा उसके विरूद्ध प्रतिस्पर्धा किए जाने का अनुभव करने की प्रक्रिया थी। उससे भी बढ़कर, यह मनुष्यजाति के भरोसे को निरन्तर जीतने और अपने स्वरूप के माध्यम से, अपने स्वयं के सार के माध्यम से मनुष्यजाति पर विजय पाने के लिए कार्य करने की प्रक्रिया थी। यह इतना ही नहीं था कि देहधारी परमेश्वर आम लोगों के बीच शैतान के विरूद्ध युद्ध कर रहा था; यह उससे अधिक था कि परमेश्वर एक सामान्य मनुष्य बन गया और उसने उनके साथ संघर्ष करना आरम्भ कर दिया जो उसका अनुसरण करते थे, और इस संघर्ष में मनुष्य के पुत्र ने अपनी दीनता के साथ, अपने स्वरूप के साथ, और अपने प्रेम और बुद्धि के साथ अपना कार्य पूर्ण किया। उसने उन लोगों को प्राप्त किया जिन्हें वह चाहता था, उस पहचान और हैसियत को प्राप्त किया जिसके वह योग्य था, और अपने सिंहासन की ओर लौट गया।

आगे, आओ हम पवित्रशास्त्र के निम्नलिखित दो अंशों को देखें।

4. सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा करो

मत्ती 18:21-22 तब पतरस ने पास आकर उस से कहा, "हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? क्या सात बार तक?" यीशु ने उससे कहा, "मैं तुझ से यह नहीं कहता कि सात बार तक वरन् सात बार के सत्तर गुने तक।"

5. प्रभु का प्रेम

मत्ती 22:37-39 उसने उससे कहा, "तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।"

इन दोनों अंशों में, एक क्षमा के बारे में बात करता है और दूसरा प्रेम के बारे में बात करता है। ये दोनों विषय वास्तव में प्रभु यीशु के कार्यों की विशिष्टता से दर्शाते हैं जिन्हें यीशु अनुग्रह के युग में कार्यान्वित करना चाहता था।

जब परमेश्वर देह बन गया, तो वह उसके साथ अपने कार्य का एक चरण ले कर आया—वह उसके साथ विशिष्ट कार्य और उस स्वभाव को लेकर आया जिसे वह इस युग में व्यक्त करना चाहता था। उस अवधि में, वह सब कुछ जो मनुष्य के पुत्र ने किया वह उस कार्य के चारों ओर घूमता था जिसे परमेश्वर इस युग में करना चाहता था। वह न इससे कुछ ज़्यादा करेगा न कम। हर एक बात जो उसने कही और हर एक प्रकार का कार्य जो उसने किया वह सब इस युग से सम्बंधित था। इस बात की परवाह किए बिना कि उसने इसे मानवीय तरीके से मानवीय भाषा में व्यक्त किया या दिव्य भाषा के माध्यम से—भले ही कोई सा भी तरीका, या किसी भी परिप्रेक्ष्य से क्यों न रहा हो—उसका उद्देश्य था कि जो वह करना चाहता था, जो उसकी इच्छा थी, और लोगों से जो उसकी अपेक्षाएँ थीं उन्हें समझने में लोगों की सहायता करे। वह परमेश्वर की इच्छा को समझने और जानने में, मनुष्यजाति को बचाने के उसके कार्य को समझने में लोगों की सहायता करने के लिए विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से विभिन्न उपायों का उपयोग कर सकता था। इसलिए अनुग्रह के युग में हम देखते हैं कि प्रभु यीशु जो कुछ मनुष्यजाति को बताना चाहता था उसे व्यक्त करने के लिए बार-बार मानवीय भाषा का उपयोग करता है। उससे भी बढ़कर, हम उसे एक साधारण मार्गदर्शक के परिप्रेक्ष्य से देखते हैं जो लोगों के साथ बात कर रहा होता है, उनकी आवश्यकताओं की आपूर्ति कर रहा होता है, और जिसके लिए उन्होंने विनती की है उसमें उनकी सहायता कर रहा होता है। कार्य करने का यह तरीका व्यवस्था के युग में देखने में नहीं आता था जो अनुग्रह के युग के पहले आया था। वह मनुष्यजाति के साथ और ज़्यादा अंतरंग तथा उनके प्रति और अधिक करुणामय, और साथ ही रूप और तरीके दोनों में व्यावहारिक परिणामों को प्राप्त करने में और अधिक समर्थ हो गया था। सात बार के सत्तर गुने तक लोगों को क्षमा करने की अभिव्यक्ति वास्तव में इस बिन्दु को स्पष्ट करती है। इस अभिव्यक्ति की संख्या द्वारा प्राप्त उद्देश्य लोगों को प्रभु यीशु ने जब ऐसा कहा तब उनके क्‍या इरादे थे, यह समझने देना था। उसका इरादा था कि लोगों को दूसरों को क्षमा कर देना चाहिए—एक या दो बार नहीं, यहाँ तक कि सात बार भी नहीं, बल्कि सात बार के सत्तर गुने तक। "सात बार के सत्तर गुने तक" यह किस प्रकार का मत है? यह लोगों से क्षमा को उनका स्वयं का उत्तरदायित्व बनवाने के लिए है, ऐसा कुछ है जिसे उन्हें अवश्य सीखना चाहिए, और एक ऐसा मार्ग है जिस पर उन्हें अवश्य चलना चाहिए। भले ही यह मात्र एक अभिव्यक्ति थी, किन्तु इसने एक निर्णायक बिन्दु की भूमिका निभायी थी। इसने उस बात की गहराई से सराहना करने में जो परमेश्वर कहना चाहता था और अभ्यास के उचित तरीकों और अभ्यास में सिद्धांतों और मानकों की खोज करने में लोगों की सहायता की। इस अभिव्यक्ति ने स्पष्ट रूप से समझने में लोगों की सहायता की और उन्हें एक बिल्कुल परिशुद्ध धारणा दी कि उन्हें क्षमा सीखनी चाहिए—बिना किसी शर्त और बिना किसी सीमाओं के, लेकिन दूसरों के प्रति सहिष्‍णुता का रवैया और समझ के साथ। जब प्रभु यीशु ने ऐसा कहा, तब उसके हृदय में क्या था? क्या वह वास्तव में सात बार के सत्तर गुने तक के बारे में सोच रहा था? वह नहीं सोच रहा था। क्या उन समयों की कोई संख्या है कि कितनी बार परमेश्वर मनुष्य को क्षमा करेगा। ऐसे बहुत से लोग हैं जो उल्लेख किए गए "समयों की संख्या" में रूचि रखते हैं, जो वास्तव में इस संख्या के उद्गम और अर्थ के बारे में समझना चाहते हैं। वे समझना चाहते हैं कि यह संख्या प्रभु यीशु के मुँह से क्यों निकली थी; वे मानते हैं कि इस संख्या का कोई अधिक गहरा निहितार्थ है। वास्तव में, यह सिर्फ मानवता में परमेश्वर की अभिव्यक्ति थी। किसी भी अभिप्राय या अर्थ को मनुष्यजाति के प्रति प्रभु यीशु की आकांक्षाओं के साथ-साथ अवश्य लिया जाना चाहिए। जब परमेश्वर देह नहीं बना था, तब जो कुछ वह कहता था लोग उसे काफी हद तक नहीं समझते थे क्योंकि वह पूर्ण दिव्यता से आया था। जो वह कहता था उसका परिप्रेक्ष्य और संदर्भ मनुष्यजाति के लिए अदृश्य और अगम्य था; वह आध्यात्मिक क्षेत्र से प्रकट होता था जिसे लोग देख नहीं सकते थे। जो लोग देह में जीवन बिताते थे, वे आध्यात्मिक क्षेत्र से होकर नहीं गुज़र सकते थे। परन्तु परमेश्वर के देह बनने के बाद, उसने मानवीय परिप्रेक्ष्य से मनुष्‍य जाति से बात की, और वह आध्यात्मिक क्षेत्र के दायरे से बाहर आया और उससे आगे बढ़ गया। मनुष्यजाति को उस अंश तक जिस तक वे समर्थ हैं परमेश्वर को समझने और जानने देने, और उनकी क्षमता के दायरे के भीतर उसके इरादे और उसके अपेक्षित मानकों को बूझने देने के लिए, उन चीज़ों के द्वारा जिनकी कल्पना मनुष्य कर सकते थे और उन चीज़ों के द्वारा जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में देखा और सामना किया था, और ऐसी पद्धतियों के उपयोग के द्वारा जिन्हें मनुष्य स्वीकार कर सकते थे, एक ऐसी भाषा में जिसे वे समझ सकते थे, और ऐसे ज्ञान के द्वारा जिसे वे समझ सकते थे, वह अपने दिव्य स्वभाव, इच्छा, और रवैये को व्यक्त कर सकता था। यह मानवता मे परमेश्वर के कार्य की पद्धति और सिद्धांत थे। यद्यपि देह में होकर कार्य करने से परमेश्वर के तरीकों और सिद्धांतों को मुख्यतः उसकी मानवता के द्वारा या माध्यम से प्राप्त किया गया था, फिर भी इसने सचमुच में ऐसे परिणामों को प्राप्त किया जिन्हें सीधे दिव्यता में होकर कार्य करने से प्राप्त नहीं किया जा सकता था। मानवता में परमेश्वर का कार्य ज़्यादा ठोस, प्रामाणिक, और लक्षित था, और पद्धतियाँ कहीं ज़्यादा लचीली थीं, तथा आकार में यह व्यवस्था के युग से बढ़कर था।

नीचे, आओ हम प्रभु से प्रेम करने और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के बारे में बात करें। क्या यह कुछ ऐसा है जो सीधे तौर पर दिव्यता में प्रकट होता है? स्पष्ट रूप से नहीं! ये सब वे चीज़े थीं जिन्हें मनुष्य के पुत्र ने मानवता में कहा था; केवल लोग ही कुछ ऐसा कहेंगे "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर। दूसरों से प्रेम करना अपने स्वयं के जीवन को दुलारने के समान है," और केवल लोग ही इस तरह से बात करेंगे। परमेश्वर ने कभी भी इस तरह बात नहीं की है। कम से कम, परमेश्वर के पास अपनी दिव्यता में इस प्रकार की भाषा नहीं होती है क्योंकि उसे मनुष्यजाति के प्रति अपने प्रेम को नियंत्रित करने के लिए इस प्रकार के सिद्धांत की आवश्यकता नहीं होती है कि "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर," क्योंकि मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम उसके स्वभाव का प्राकृतिक प्रकाशन है। क्या तुम लोगों ने कभी सुना है कि परमेश्वर ने ऐसा कुछ कहा कि "मैं मनुष्य से ऐसा प्रेम करता हूँ जैसा मैं अपने आप से प्रेम करता हूँ"? क्योंकि प्रेम परमेश्वर के सार में, और उसके स्वरूप में है। मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम और वह जिस तरह से लोगों के साथ व्यवहार करता है और उसका रवैया उसके स्वभाव की प्राकृतिक अभिव्यक्ति और प्रकाशन है। उसे जानबूझकर किसी निश्चित तरीके से ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है, या अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना प्राप्त करने के लिए जानबूझकर किसी निश्चित तरीके या एक नैतिक संहिता का अनुसरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है—उसके पास पहले से ही इस प्रकार का सार है। तुम इसमें क्या देखते हैं? जब परमेश्वर ने मानवता में होकर काम किया, तो उसकी बहुत सी पद्धतियाँ, उसके बहुत से वचन, और उसके बहुत से सत्य सब कुछ मानवीय तरीके से व्यक्त हुए थे। परन्तु साथ ही परमेश्वर का स्वभाव, और परमेश्वर का स्वरूप, और उसकी इच्छा, लोगों के जानने और समझने के लिए व्यक्त हुए थे। जो कुछ उन्होंने जाना और समझा था वह वास्तव में उसका सार और उसका स्वरूप था, जो स्वयं परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान और हैसियत को दर्शाते थे। अर्थात्, देह में मनुष्य के पुत्र ने स्वयं परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव और सार को अधिकतम संभव सीमा तक और यथासंभव परिशुद्ध तरीके से व्यक्त किया था। न केवल मनुष्य के पुत्र की मानवता स्वर्गिक परमेश्वर के साथ मनुष्य के संवाद और अंतः-क्रिया में कोई व्यवधान या कोई बाधा नहीं थी, बल्कि वह मनुष्यजाति के लिए सृष्टि के प्रभु से जुड़ने का एकमात्र माध्यम और एकमात्र सेतु थी। इस बिन्दु पर, क्या तुम लोग यह महसूस नहीं करते हो कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति और पद्धतियों और कार्य के वर्तमान चरण के बीच बहुत सी समानताएँ हैं? कार्य का यह वर्तमान चरण परमेश्वर के स्वभाव को व्यक्त करने के लिए ढेर सारी मानवीय भाषाओं का भी उपयोग करता है, और यह परमेश्वर की स्वयं की इच्छा को व्यक्त करने के लिए मनुष्यजाति के दैनिक जीवन और मानवीय ज्ञान में से ढेर सारी भाषाओं और पद्धतियों का प्रयोग करता है। एक बार जब परमेश्वर देह बन जाता है, तो फिर चाहे वह मानवीय परिप्रेक्ष्य या दिव्य परिप्रेक्ष्य से ही क्यों न बात करे, प्रकटीकरण की उसकी ढेर सारी भाषा और पद्धतियाँ सभी मानवीय भाषा और पद्धतियों के माध्यम से होती हैं। अर्थात्, जब परमेश्वर देह बन गया, तो यह तुम्हारे लिए उसकी सर्वशक्तिमत्ता और उसकी बुद्धि को देखने और परमेश्वर के प्रत्येक सच्चे पहलू को जानने का बेहतरीन अवसर था। जब परमेश्वर देह बन गया, उसके बड़े होने के दौरान, उसने मनुष्यजाति के ज्ञान, व्यावहारिक ज्ञान, भाषा, और मानवता में अभिव्यक्ति की पद्धतियों को समझा, सीखा, और ग्रहण किया। देहधारी परमेश्वर इन चीज़ों को धारण करता था जो उन मनुष्यों से आयी थीं जिन्हें उसने सृजित किया था। वे उसके स्वभाव और उसकी दिव्यता को व्यक्त करने के लिए देहधारी परमेश्वर के साधन बन गए, और जब वह मानवीय परिप्रेक्ष्य से और मानवीय भाषा का उपयोग करते हुए मनुष्यजाति के बीच कार्य कर रहा था, तब उन्होंने उसे उसके कार्य को अधिक उचित, अधिक प्रामाणिक, और अधिक सटीक बनाने दिया। इसने लोगों के लिए इसे और अधिक सुगम और आसानी से समझने योग्य बनाया, इस प्रकार ऐसे परिणामों को प्राप्त किया जिन्हें परमेश्वर चाहता था। क्या इस तरह देह में कार्य करना परमेश्वर के लिए अधिक व्यावहारिक नहीं है? क्या यह परमेश्वर की बुद्धि नहीं है? जब परमेश्वर देहधारी हुआ, और जब परमेश्वर का देह उस कार्य को सँभालने में समर्थ हुआ जिसे वह करना चाहता था, ऐसा तब है कि वह व्यावहारिक रूप से अपने स्वभाव और अपने कार्य को व्यक्त करता, और यही वह समय भी था जब वह मनुष्य के पुत्र के रूप में आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई की शुरूआत कर सकता था। इसका मतलब था कि परमेश्वर और मनुष्यों के बीच अब और कोई खाई नहीं थी, और यह कि परमेश्वर जल्द ही सन्देशवाहकों के माध्यम से संवाद करने के अपने कार्य को रोक देगा, और स्वयं परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से सभी वचनों को प्रकट करेगा और देह में होकर काम करेगा जिसे वह करना चाहता था। इसका अर्थ यह भी था कि जिन लोगों को परमेश्वर बचाता है वे उसके अधिक करीब थे, और यह कि उसके प्रबन्धन के कार्य ने एक नए क्षेत्र में प्रवेश कर लिया था, और यह कि संपूर्ण मनुष्यजाति का सामना एक नए युग से होने ही वाला था।

जिसने बाइबल पढ़ा है वह हर कोई जानता है कि जब यीशु का जन्म हुआ था तो बहुत सी चीज़े घटित हुई थीं। उनमें से सबसे बड़ी थी शैतानों के राजा के द्वारा शिकार किया जाना, यहाँ तक कि उस स्थिति तक कि उस क्षेत्र के दो वर्ष या उस से नीचे के सभी बच्चों का भी वध किया जा रहा था। यह स्पष्ट है कि मनुष्यों के बीच देह होकर परमेश्वर ने बड़ा जोखिम अपनाया था; और मनुष्यजाति को बचाने के अपने प्रबन्धन को पूरा करने के लिए उसने जो बड़ी कीमत चुकाई वह भी स्पष्ट है। वे बड़ी आशाएँ जो परमेश्वर को अपने कार्य के ऊपर थी जिसे उसने देह में होकर मनुष्यजाति के बीच किया था वे भी स्पष्ट हैं। जब परमेश्वर का देह मनुष्यजाति के बीच अपने कार्य को सँभालने में समर्थ था, तो वह कैसा महसूस कर रहा था? लोगों को उसे थोड़ा बहुत समझना चाहिए, ठीक है न? कम से कम परमेश्वर प्रसन्न था क्योंकि वह मनुष्यजाति के बीच अपने नए कार्य का विकास करना आरम्भ कर सकता था। जब प्रभु यीशु का बपतिस्मा हुआ था और उसने आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई को पूरा करने के अपने कार्य को आरम्भ किया था, तो परमेश्वर का हृदय आनन्द से अभिभूत हो गया था क्योंकि इतने वर्षों की प्रतीक्षा और तैयारी के बाद, वह अंततः एक औसत इन्सान की देह को पहन सका था और लहू और माँस के एक मनुष्य के रूप में अपने नए कार्य को आरम्भ कर सका था जिसे लोग देख और छू सकते थे। वह अंततः मनुष्य की पहचान के माध्यम से लोगों के साथ आमने-सामने और खुलकर बात कर सकता था। परमेश्वर मानवीय भाषा में, मानवीय तरीके से, मनुष्यजाति के साथ रूबरू हो सकता था; वह मनुष्यजाति का भरण-पोषण कर सकता था, उन्हें प्रबुद्ध कर सकता था, और मानवीय भाषा का उपयोग कर उनकी सहायता कर सकता था; वह उनके साथ एक ही मेज़ पर बैठ कर भोजन कर सकता था और उसी जगह पर उनके साथ रह सकता था। वह मनुष्यों को भी देख सकता था, चीज़ों को देख सकता था, और चीज़ को उसी तरह से देख सकता था जैसे मनुष्य देखते हैं और वो भी स्वयं अपनी आँखों से। परमेश्वर के लिए, यह पहले से ही देह में उसके कार्य की उसकी पहली विजय थी। ऐसा भी कहा जा सकता है कि यह एक महान कार्य की पूर्णता थी—यह निस्संदेह वह था जिसके बारे में परमेश्वर सबसे अधिक प्रसन्न था। तब से शुरू हो कर यह पहली बार था कि परमेश्वर ने मनुष्यजाति के बीच अपने कार्य में एक प्रकार का सुकून महसूस किया। ये सभी घटनाएँ बहुत व्यावहारिक और बहुत स्वाभाविक थी, और जो सुकून परमेश्वर ने महसूस किया था वह बहुत ही प्रामाणिक था। मनुष्यजाति के लिए, हर बार जब भी परमेश्वर के कार्य का एक नया चरण पूरा होता है, और हर बार जब परमेश्वर संतुष्टि महसूस करता है, ऐसा तब होता है जब मनुष्यजाति परमेश्वर के करीब आ सकती है, और जब लोग उद्धार के निकट आ सकते हैं। परमेश्वर के लिए, यह उसके नए कार्य की शुरूआत भी है, जब उसकी प्रबन्धन योजना एक कदम आगे प्रगति करती है, और इसके अतिरिक्त, जब उसकी इच्छा पूर्ण निष्पादन तक पहुँचती है। मनुष्यजाति के लिए, इस प्रकार के अवसर का आगमन सौभाग्यशाली, और बहुत अच्छा है; उन सबके लिए जो परमेश्वर से उद्धार की प्रतीक्षा करते हैं, यह एक महत्वपूर्ण समाचार है। जब परमेश्वर कार्य के एक नए चरण को कार्यान्वित करता है, तब वह एक नई शुरूआत करता है, और जब मनुष्यजाति के बीच इस नए कार्य और नई शुरूआत को आरम्भ और प्रस्तुत किया जाता है, तो ऐसा तब होता है जब इस कार्य के चरण के परिणाम को पहले से ही निर्धारित कर दिया जाता है, और इसे पूर्ण कर लिया जाता है, और परमेश्वर पहले से ही उसके प्रभावों और परिणाम को देख लेता है। ऐसा भी तब होता है जब ये प्रभाव परमेश्वर को सन्तुष्टि महसूस कराते हैं, और उसका हृदय, वास्तव में, प्रसन्न होता है। क्योंकि, परमेश्वर की नज़रों में, उसने पहले से ही उन लोगों को देख और निर्धारित कर दिया है जिन्हें वह ढूँढ़ रहा है, और पहले से ही इस समूह को प्राप्त कर लिया है, एक ऐसा समूह जो उसके कार्य को सफल करने में और उसे सन्तुष्टि प्रदान करने में समर्थ है, परमेश्वर आश्वस्त महसूस करता है, वह अपनी चिन्ताओं को एक ओर रख देता है, और वह प्रसन्नता महसूस करता है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर का देह मनुष्यों के बीच एक नया कार्य आरम्भ करने में समर्थ है, और वह उस कार्य को करना आरम्भ कर देता है जिसे उसे बिना किसी अड़चन के अवश्य करना चाहिए, और जब उसे महसूस होता है कि सब कुछ पूर्ण किया जा चुका है, तो उसने अन्त को पहले से ही देख लिया होता है। और इस अन्त के कारण वह सन्तुष्ट है, प्रसन्न हृदय वाला है। परमेश्वर की प्रसन्नता किस प्रकार व्यक्त होती है? क्या तुम लोग उसकी कल्पना कर सकते हो? क्या परमेश्वर रोयेगा? क्या परमेश्वर रो सकता है? क्या परमेश्वर अपने हाथों से ताली बजा सकता है? क्या परमेश्वर नृत्य कर सकता है? क्या परमेश्वर गाना गा सकता है? वह गीत कौन सा होगा? निस्संदेह परमेश्वर एक सुन्दर और द्रवित कर देने वाला गीत गा सकता है, ऐसा गीत जो उसके हृदय के आनन्द और प्रसन्नता को व्यक्त कर सकता है। वह उसे मनुष्यजाति के लिए गा सकता है, उसे अपने आप के लिए गा सकता है, और सभी चीज़ों के लिए गा सकता है। परमेश्वर की प्रसन्नता किसी भी तरीके से व्यक्त हो सकती है—यह सब कुछ सामान्य है क्योंकि परमेश्वर के पास आनन्द और दुःख है, और उसकी विभिन्न भावनाओं को विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया जा सकता है। यह उसका अधिकार है और यह अत्यधिक सामान्य चीज़ है। तुम लोगों को इस बारे में कुछ और नहीं सोचना चाहिए, और तुम लोगों को उसकी प्रसन्नता या उसकी किसी भी भावना को सीमित करने के लिए उससे यह कहते हुए कि उसे यह नहीं करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए, उसे इस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए या उस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए, तुम लोगों को अपने स्वयं के निषेधों को परमेश्वर पर प्रक्षेपित नहीं करना चाहिए। लोगों के हृदयों में परमेश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता है, वह आँसू नहीं बहा सकता है, वह विलाप नहीं कर सकता है—वह किसी मनोभाव को व्यक्त नहीं कर सकता है। जिन बातों के माध्यम से हमने इन दोनों बार संवाद किया है, उससे मैं यह विश्वास करता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर को अब और इस तरह से नहीं देखोगे, बल्कि परमेश्वर को कुछ स्वतन्त्रता और राहत लेने दोगे। यह एक बहुत अच्छी बात है। भविष्य में यदि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर की उदासी को महसूस कर पाओ जब तुम उसकी उदासी के बारे में सुनो, और तुम लोग सचमुच में उसकी प्रसन्नता को महसूस कर पाओ जब तुम लोग उसकी प्रसन्नता के बारे में सुनो—तो कम से कम, तुम लोग स्पष्ट रूप से यह जानने और समझने में समर्थ हो कि क्या चीज़ परमेश्वर को प्रसन्न करती है और क्या चीज़ उसे उदास करती है—जब तुम उदास महसूस कर पाते हो क्योंकि परमेश्वर उदास है, और तुम प्रसन्न महसूस कर पाते हो क्योंकि परमेश्वर प्रसन्न है, तो उसने तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा और उसके साथ अब और कोई बाधा नहीं होगी। तुम मानवीय कल्पनाओं, धारणाओं, और ज्ञान से परमेश्वर को अब और विवश करने की कोशिश नहीं करोगे। उस समय, परमेश्वर तुम्हारे हृदय में जीवित और जीवंत होगा। वह तुम्हारे जीवन का परमेश्वर होगा और तुम्हारी हर चीज़ का स्वामी होगा। क्या तुम्हारी इस प्रकार की आकांक्षा है। क्या तुम लोगों को विश्वास है कि तुम लोग इसे प्राप्त कर सकते हो?

आगे, आओ निम्नलिखित अंशों को पढ़ें।

6. यीशु का पहाड़ी उपदेश

धन्य वचन (मत्ती 5:3-12)

नमक और ज्योति (मत्ती 5:13-16)

व्यवस्था की शिक्षा (मत्ती 5:17-20)

क्रोध और हत्या (मत्ती 5:21-26)

व्यभिचार (मत्ती 5:27-30)

तलाक (मत्ती 5:31-32)

शपथ (मत्ती 5:33-37)

प्रतिशोध (मत्ती 5:38-42)

शत्रुओं से प्रेम (मत्ती 5:43-48)

दान (मत्ती 6:1-4)

प्रार्थना (मत्ती 6:5-8)

7. प्रभु यीशु के दृष्टान्त

बीज बोने वाले का दृष्टान्त (मत्ती 13:1-9)

जंगली बीज का दृष्टान्त (मत्ती 13:24-30)

राई के बीज का दृष्टान्त (मत्ती 13:31-32)

खमीर का दृष्टान्त (मत्ती 13:33)

जंगली बीज के दृष्टान्त की व्याख्या (मत्ती 13:36-43)

छिपे हुए खजाने का दृष्टान्त (मत्ती 13:44)

अनमोल मोती का दृष्टान्त (मत्ती 13:45-46)

जाल का दृष्टान्त (मत्ती 13:47-50)

8. आज्ञाएँ

मत्ती 22:37-39 उसने उससे कहा, "तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।"

आओ सबसे पहले "यीशु का पहाड़ी उपदेश" के प्रत्येक भाग को देखें। ये सब किससे सम्बन्धित हैं? ऐसा निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि ये सभी व्यवस्था के युग के विधि-विधानों की तुलना में अधिक उन्नत, अधिक ठोस, और लोगों के जीवन के अधिक निकट हैं। आधुनिक शब्दावलियों में कहा जाए, तो यह लोगों के वास्तविक अभ्यास के अधिक प्रासंगिक है।

आओ हम निम्नलिखित के विशिष्ट सन्दर्भ को पढ़ें: तुम्हें धन्य वचनों को किस प्रकार समझना चाहिए? तुम्हें व्यवस्था के बारे में क्या जानना चाहिए? क्रोध को किस प्रकार परिभाषित किया जाना चाहिए? व्याभिचारियों से कैसे निपटा जाना चाहिए? तलाक के बारे में क्या कहा गया है, और उसके बारे में किस प्रकार के नियम हैं, और कौन तलाक ले सकता है और कौन तलाक नहीं ले सकता है? शपथ, प्रतिशोध, शत्रुओं से प्रेम, दान, इत्यादि के बारे में क्या कहेंगे। ये सब बातें मनुष्यजाति के द्वारा परमेश्वर पर विश्वास करने और परमेश्वर का अनुसरण करने के अभ्यास के प्रत्येक पहलू से सम्बन्धित है। इनमें से कुछ अभ्यास आज भी लागू हैं, परन्तु वे लोगों की वर्तमान आवश्यकताओं की अपेक्षा अल्पविकसित अधिक हैं। वे काफी हद तक अल्पविकसित सच्चाईयाँ हैं जिनका सामना लोग परमेश्वर पर विश्वास करने पर करते हैं। जिस समय से प्रभु यीशु ने काम करना आरम्भ किया तब से, वह पहले से ही मनुष्यों के जीवन स्वभाव पर काम शुरू कर रहा था, परन्तु वह व्यवस्था की नींव पर आधारित था। क्या इन विषयों पर आधारित नियमों और कथनों का सत्य के साथ कोई सम्बन्ध था? निस्संदेह था! अनुग्रह के युग के पिछले सभी विधि-विधान, सिद्धांत, और उपदेश परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप से, और निस्संदेह सत्य से सम्बन्धित थे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर क्या प्रकट करता है, वह किस तरह से प्रकट करता है, या किस प्रकार की भाषा का उपयोग करता है, उसकी नींव, उसका उद्गम, और उसका आरम्भिक बिन्दु सभी उसके स्वभाव के सिद्धांतों और उसके स्वरूप पर आधारित हैं। यह बिना किसी त्रुटि के है। इसलिए यद्यपि जिन चीज़ों को उसने कहा था अब वे थोड़ी उथली दिखाई देती हैं, फिर भी तुम नहीं कह सकते कि वे सत्य नहीं हैं, क्योंकि वे ऐसी चीज़ें थी जो परमेश्वर की इच्छा को सन्तुष्ट करने और उनके जीवन स्वभाव में एक परिवर्तन लाने के लिए अनुग्रह के युग के लोगों के लिए अति महत्वपूर्ण थीं। क्या तुम ऐसा कह सकते हो कि उपदेश की बातें सत्य के अनुरूप नहीं है? तुम नहीं कह सकते हो! इनमें से प्रत्येक सत्‍य है क्योंकि वे सभी मनुष्यजाति से परमेश्वर की अपेक्षाएँ हैं; वे सभी किसी व्‍यक्ति को किस प्रकार आचारण करना चाहिए, इस बारे में परमेश्वर के द्वारा दिए गए सिद्धांत और एक अवसर हैं, और वे परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाते हैं। हालाँकि, उस समय के उनके जीवन के विकास के स्तर के आधार पर, वे केवल इन चीज़ों को ही स्वीकार करने और समझने में समर्थ थे। क्योंकि अभी तक मनुष्यजाति के पापों का समाधान नहीं हुआ था, इसलिए प्रभु यीशु केवल इन वचनों को ही जारी कर सकता था, और वह इस प्रकार के दायरे के भीतर ही केवल ऐसी साधारण शिक्षाओं का उपयोग कर सकता था जिससे उस समय के लोगों को बताए कि उन्हें किस प्रकार कार्य करना चाहिए, उन्हें क्या करना चाहिए, उन्हें किन सिद्धांतों और दायरे के भीतर चीज़ों को करना चाहिए, और उन्हें किस प्रकार परमेश्वर पर विश्वास करना है और उसकी अपेक्षाओं को पूरा करना चाहिए। इन सब को उस समय की मनुष्यजाति की कद-काठी के आधार पर निर्धारित किया गया था। व्यवस्था के अधीन जीवन जीने वाले लोगों के लिए इन शिक्षाओं को ग्रहण करना आसान नहीं था, इसलिए जो प्रभु यीशु ने शिक्षा दी थी उसे इसी क्षेत्र के भीतर बने रहना था।

इसके बाद, आओ हम "प्रभु यीशु के दृष्टान्तों" पर एक नज़र डालें।

पहला बीज बोने वाले का दृष्टान्त है। यह वास्तव में एक रूचिकर दृष्टान्त हैः बीज बोना लोगों के जीवन में एक सामान्य घटना है। दूसरा जंगली बीज का दृष्टान्त है। जहाँ तक जंगली बीज की बात है कि वे क्या होते हैं, जिन्होंने भी फसलें लगाई हैं और वयस्क हैं वे जान जाएँगे। तीसरा राई के बीज का दृष्टान्त है। तुम सभी लोग जानते हो कि राई क्या होती है, ठीक है न? यदि तुम लोग नहीं जानते हो, तो तुम लोग बाइबल में एक दृष्टि डाल सकते हो। चौथा, ख़मीर के दृष्टान्त के लिए, अधिकतर लोग जानते हैं कि खमीर को किण्वन के लिए उपयोग किया जाता है; यह कुछ ऐसा है जिसे लोग अपने दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं। नीचे दिए गए सभी दृष्टान्त, जिसमें छठा छिपे हुए खजाने का दृष्टान्त, सातवाँ अनमोल मोती का दृष्टान्त, और आठवाँ जाल का दृष्टान्त भी शामिल है, उन सभी को लोगों के जीवन से लिया गया है; वे सभी लोगों के वास्तविक जीवन से आते हैं। ये दृष्टान्त किस प्रकार की तस्वीर चित्रित करते हैं? यह परमेश्वर के एक सामान्य व्यक्ति बनने और मनुष्यों के साथ-साथ रहने, सामान्य जीवन की भाषा का उपयोग करने, मनुष्यों से बात करने के लिए मानवीय भाषा का उपयोग करने और उन्हें वह प्रदान करने की एक तस्वीर है जिसकी उन्हें आवश्यकता है। जब परमेश्वर देहधारी हुआ और लम्बे समय तक मनुष्यों के बीच रहा, तो लोगों की विभिन्न जीवन-शैलियों का अनुभव करने और उन्हें देखने के बाद, ये अनुभव उसकी दिव्य भाषा को मानवीय भाषा में रूपान्तरित करने के लिए उसकी पाठ्यपुस्तकें बन गए। निस्संदेह, ये चीज़ें जो उसने जीवन में देखी और सुनी उन्होंने भी मनुष्य के पुत्र के मानवीय अनुभव को समृद्ध किया। जब वह लोगों को कुछ सत्‍यों को समझाना, परमेश्वर की कुछ इच्छाओं को समझाना चाहता था, तो वह परमेश्वर की इच्छा और मनुष्यजाति के प्रति उस की अपेक्षाओं को बताने के लिए वह उपरोक्त के समान दृष्टान्तों का उपयोग कर सकता था। ये दृष्टान्त लोगों के जीवन से सम्बन्धित थे; और ऐसा एक भी दृष्टान्त नहीं था जो मनुष्य के जीवन से अछूता था। जब प्रभु यीशु मनुष्यजाति के साथ रहता था, वह किसानों को अपने खेतों में देखभाल करते हुए देखता था, वह जानता था कि जंगली बीज क्या है और खमीर उठना क्या है; वह समझता था कि मनुष्य छिपे हुए खजाने को पसंद करते हैं, इसलिए उसने छिपे हुए खजाने और अनमोल मोती दोनों उपमाओं का उपयोग किया; और उसने मछुआरों को बार-बार जाल फैलाते हुए देखा था; इत्यादि। प्रभु यीशु ने मनुष्यजाति के जीवन में इन गतिविधियों को देखा था; और उसने भी उस प्रकार के जीवन का अनुभव किया। वह किसी अन्य मनुष्य के समान एक साधारण व्यक्ति था, जो मनुष्यों के तीन वक्त के भोजन और दिनचर्या का अनुभव कर रहा था। उसने व्यक्तिगत रूप से एक औसत इंसान के जीवन का अनुभव किया, और उसने दूसरों की ज़िन्दगियों को भी देखा। जब उसने यह सब कुछ देखा और व्यक्तिगत रूप से इनका अनुभव किया, तो उसने जो सोचा वह इस बारे में नहीं था कि किस प्रकार एक अच्छा जीवन पाया जाए या वह किस प्रकार और अधिक स्वतन्त्रता से, अधिक आराम से जीवन बिता सकता है। जब वह प्रामाणिक मानवीय जीवन का अनुभव ले रहा था, तो प्रभु यीशु ने लोगों के जीवन की कठिनाई को देखा, उसने शैतान की भ्रष्टता के अधीन लोगों की कठिनाई, संताप, और उदासी को देखा, उसने देखा कि वे शैतान के अधिकार क्षेत्र में जी रहे हैं, और पाप में जी रहे हैं। जब वह व्यक्तिगत रूप से मानवीय जीवन का अनुभव ले रहा था, तब उसने यह भी अनुभव किया कि जो लोग भ्रष्टता के बीच जीवन बिता रहे थे वे कितने असहाय हैं, उसने उन लोगों की दुर्दशा को देखा और अनुभव किया जो पाप में जीवन बिताते थे, जो शैतान के द्वारा, दुष्टता के द्वारा लाए गए अत्याचार में खो गए थे। जब प्रभु यीशु ने इन चीज़ों को देखा, तो क्या उसने उन्हें अपनी दिव्यता में देखा या अपनी मानवता में? उसकी मानवता सचमुच में अस्तित्व में थी—वह बिल्कुल जीवन्त थी—वह इस सब का अनुभव कर सकता था और देख सकता था, और निस्संदेह वह इसे अपने सार में, उसने अपनी दिव्यता में इसे देखा। अर्थात्, स्वयं मसीह, उस मनुष्य प्रभु यीशु ने इसे देखा, और जो कुछ उसने देखा उससे उसने उस कार्य के महत्व और आवश्यकता को महसूस किया जिसे उसने इस बार अपनी देह में सँभाला था। यद्यपि वह स्वयं जानता था कि वह उत्तरदायित्व जिसे उसे देह में लेने की आवश्यकता थी बहुत बड़ा है, और वह पीड़ा जिसका वह सामना करेगा कितनी बेरहम होगी, फिर भी जब उसने पाप में जी रही मनुष्यजाति को असहाय देखा, जब उसने उनकी ज़िन्दगियों में संताप को और व्यवस्था के अधीन उनके कमज़ोर संघर्ष को देखा, तो उसने और अधिक पीड़ा का अनुभव किया, और मनुष्यजाति को पाप से बचाने के लिए अधिकाधिक चिन्तित हो गया। चाहे उसने किसी भी प्रकार की कठिनाइयों का सामना किया हो या किसी भी प्रकार की पीड़ा को सहा हो, वह पाप में जी रही मनुष्यजाति को बचाने के लिए और अधिक कृतसंकल्प हो गया। इस प्रक्रिया के दौरान, तुम कह सकते हो कि प्रभु यीशु ने उस कार्य को और अधिक स्पष्टता से समझना आरम्भ कर दिया था जो उसे करने की आवश्यकता थी और जो उसे सौंपा गया था। और वह उस कार्य को पूर्ण करने के लिए और भी अधिक उत्सुक हो गया जो उसे लेना था—मनुष्यजाति के सभी पापों को लेने के लिए, मनुष्यजाति के लिए प्रायश्चित करने के लिए ताकि वे पाप में और अधिक न जीएँ और परमेश्वर पापबलि की वजह से मनुष्य के पापों को भुलाने में समर्थ हो, और इससे उसे मनुष्यजाति को बचाने के अपने कार्य को आगे बढ़ाने कि अनुमति मिले। ऐसा कहा जा सकता है कि प्रभु यीशु अपने हृदय में, अपने आप को मनुष्यजाति के प्रति अर्पित करने, अपना स्‍वयं का बलिदान करने का इच्छुक था। वह एक पापबलि के रूप में कार्य करने, सूली पर चढ़ाए जाने का भी इच्छुक था, और वह इस कार्य को पूर्ण करने का उत्सुक था। जब उसने मनुष्यों के जीवन की दयनीय दशा को देखा, तो वह, बिना एक मिनट या क्षण की देरी के, जितना जल्दी हो सके अपने लक्ष्य को और भी अधिक पूरा करना चाहता था। जब उसे ऐसी अत्यावश्यकता महसूस हुई, तो वह यह नहीं सोच रहा था कि उसका दर्द कितना भयानक होगा, और न ही उसने अब और यह सोचा कि उसे कितना अपमान सहना होगा—उसने बस अपने हृदय में एक दृढ़-विश्वास रखाः जब तक वह अपने को अर्पित किए रहेगा, जब तक उसे पापबलि के रूप में सूली पर चढ़ा कर रखा जाएगा, परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित किया जाएगा और वह अपने नए कार्य को शुरू कर पाएगा। पाप में मनुष्यजाति की ज़िन्दगियाँ, और पाप में अस्तित्व में रहने की उसकी अवस्था पूर्णत: बदल जाएगी। उसका दृढ़-विश्वास और जो उसने करने का निर्णय लिया था वे मनुष्यजाति को बचाने से सम्बन्धित थे, और जो करने के लिए वह दृढ़-संकल्पी था वह मनुष्य को बचाने से संबंधित था, और उसके पास केवल एक उद्देश्य थाः परमेश्वर की इच्छा को पूरा करना, ताकि वह अपने कार्य के अगले चरण की सफलतापूर्वक शुरूआत कर सके। यह वह था जो उस समय प्रभु यीशु के मन में था।

देह में जीवन बिताते हुए, देहधारी परमेश्वर ने सामान्य मानवता को धारण किया; उसके अंदर एक सामान्य व्यक्ति की भावनाएँ और तर्कशक्ति थी। वह जानता था कि खुशी क्या होती है, पीड़ा क्या होती है, और जब वह मनुष्यजाति को इस प्रकार के जीवन में देखता, तो वह गहराई से महसूस करता था कि लोगों को मात्र कुछ शिक्षाएँ देने से, और उन्हें कुछ प्रदान करने या उन्हें कुछ सिखाने से उन्हें पाप से बाहर नही निकाला जा सकता है। ना ही उनसे कुछ आज्ञाओं का पालन करवाने से उन्हें पापों से छुटकारा दिया जा सकता था—जब उसने मानवजाति के पापों को ग्रहण कर लिया और पापमय देह की सदृशता में आ गया केवल तभी वह इसे मानवता की स्वतन्त्रता से अदला-बदली कर सकता था, और इसे मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर की क्षमा से अदला-बदली कर सकता था। इसलिए जब प्रभु यीशु ने मनुष्यों की पापमय ज़िन्दगियों अनुभव कर लिया और उसे देख लिया, तो उसके हृदय में एक प्रबल इच्छा अभिव्यक्‍त हुई—मनुष्यों को उनकी ज़िन्दगियों में पाप में संघर्ष से छुटकारा देने की। इस इच्छा ने उसे अधिकाधिक यह महसूस करवाया कि उसे अवश्य सूली पर जाना और यथाशीघ्र मनुष्यजाति के पापों को अपने ऊपर लेना चाहिए। लोगों के साथ रहने और उनके पापमय जीवन की दुर्गति को देखने, सुनने और महसूस करने के बाद, उस समय ये प्रभु यीशु के विचार थे। यह कि देहधारी परमेश्वर की मनुष्यजाति के प्रति इस प्रकार की इच्छा हो सकती थी, कि वह इस प्रकार के स्वभाव को प्रकट और प्रदर्शित कर सकता था—क्या यह कुछ ऐसा है जो एक औसत इंसान के पास हो सकता है? इस प्रकार के परिवेश में रहते हुए एक औसत इंसान क्या देखेगा? वे क्या सोचेंगे? यदि किसी औसत इंसान ने इन सबका सामना किया होता, तो क्या वह समस्याओं को उच्च परिप्रेक्ष्य से देख पाता? निश्चित रूप से नहीं! यद्यपि देहधारी परमेश्वर का रूप-रंग ठीक मनुष्य के समान है, फिर भी वह मानवीय ज्ञान को सीखता है और मानवीय भाषा बोलता है और कभी-कभी अपने मतों को मनुष्यजाति के उपायों या अभिव्यक्तियों के माध्यम से भी व्यक्त करता है, जिस तरह से वह मनुष्यों, और चीज़ों के सार को देखता है, और जिस तरह से भ्रष्ट लोग मनुष्यजाति और चीज़ों के सार को देखते हैं वे बिल्कुल एक-से नहीं हैं। उसका परिप्रेक्ष्य और वह ऊँचाई जिस पर वह खड़ा होता है वह कुछ ऐसा है जो किसी भ्रष्ट व्यक्ति के द्वारा अप्राप्य है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर सत्य है, और जिस देह को वह पहनता है वह भी परमेश्वर के सार को धारण करता है, और उसके विचार तथा जो उसकी मानवता के द्वारा प्रकट किया जाता है वे भी सत्य हैं। भ्रष्ट लोगों के लिए, जो कुछ वे देह में व्यक्त करते हैं वे सत्य के, और जीवन के प्रावधान हैं। ये प्रावधान केवल एक व्यक्ति के लिए नहीं हैं, बल्कि पूरी मनुष्यजाति के लिए हैं। किसी भी भ्रष्ट व्यक्ति के लिए, उसके हृदय में केवल थोड़े से ही वे लोग ही होते हैं जो उससे सम्बद्ध होते हैं। केवल कुछ ही ऐसे लोग होते हैं जिनके बारे में वह चिन्ता करता है, या जिनकी वह परवाह करता है। जब आपदा आने ही वाली होती है, तो वह सबसे पहले अपने बच्चों, जीवन साथी, या माता-पिता के बारे में सोचता है, और एक अधिक लोकहितैषी व्यक्ति अधिक से अधिक कुछ रिश्तेदारों या किसी अच्छे मित्र के बारे में सोचता है; क्या वह अधिक सोचता है? कभी भी नहीं! क्योंकि मनुष्य अंततः मनुष्य ही हैं, और वे सब कुछ एक व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से और ऊँचाई से ही देख सकते हैं। हालाँकि, देहधारी परमेश्वर भ्रष्ट व्यक्ति से पूर्णत: अलग है। देहधारी परमेश्वर का देह कितना ही सामान्य, कितना ही साधारण, कितना ही अधम क्यों न हो, या यहाँ तक कि लोग उसे कितनी ही नीची दृष्टि से क्यों न देखते हों, मनुष्यजाति के प्रति उसके विचार और उसका रवैया ऐसी चीज़ें है जिन्हें कोई भी मनुष्य धारण नहीं कर सकता है, और कोई मनुष्य उसका अनुकरण नहीं कर सकता है। वह हमेशा दिव्यता के परिप्रेक्ष्य से, और सृजनकर्ता के रूप में अपने पद की ऊँचाई से मनुष्यजाति का अवलोकन करेगा। वह हमेशा परमेश्वर के सार और परमेश्वर की मानसिकता से मनुष्यजाति को देखेगा। वह एक औसत व्यक्ति की ऊँचाई से, और एक भ्रष्ट व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से मनुष्यजाति को बिल्कुल नहीं देख सकता है। जब लोग मनुष्यजाति को देखते हैं, तो वे मानवीय दृष्टि से देखते हैं, और वे मानवीय ज्ञान और मानवीय नियमों और सिद्धांतों जैसी चीज़ों को एक पैमाने के रूप में उपयोग करते हैं। यह उस दायरे के भीतर है जिसे लोग अपनी आँखों से देख सकते हैं; यह उस दायरे के भीतर है जिसे भ्रष्ट लोग प्राप्त कर सकते हैं। जब परमेश्वर मनुष्यजाति को देखता है, तो वह दिव्य दर्शन के साथ देखता है, और अपने सार और अपने स्वरूप को एक माप के रूप में लेता है। इस दायरे में वे चीज़ें शामिल हैं जिन्हें लोग नहीं देख सकते हैं, और यहीं पर देहधारी परमेश्वर और भ्रष्ट मनुष्य पूरी तरह से भिन्न हैं। यह अन्तर मनुष्यों और परमेश्वर के भिन्न-भिन्न सार के द्वारा निर्धारित होता है, और ये भिन्न-भिन्न सार ही हैं जो उनकी पहचानों और स्थितियों को और साथ ही उस परिप्रेक्ष्य और ऊँचाई को निर्धारित करते हैं जिससे वे चीज़ों को देखते हैं। क्या तुम लोग प्रभु यीशु में स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्ति और प्रकाशन को देखते हो? तुम लोग कह सकते हो कि जो प्रभु यीशु ने किया और कहा वह उसकी सेवकाई से और परमेश्वर के स्वयं के प्रबन्धन कार्य से संबंधित था, कि यह सब परमेश्वर के सार की अभिव्यक्ति और प्रकाशन था। यद्यपि उसकी मानवीय अभिव्यक्ति थी, किन्तु उसके दिव्य सार और उसकी दिव्यता के प्रकाशन को नकारा नहीं जा सकता है। क्या यह मानवीय अभिव्यक्ति वास्तव में मानवता की अभिव्यक्ति थी? उसकी मानवीय अभिव्यक्ति अपने मूल सार में, भ्रष्ट लोगों की मानवीय अभिव्यक्ति से बिल्कुल भिन्न थी। प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर था, यदि वह सचमुच में एक सामान्य, भ्रष्ट मनुष्य रहा होता, तो क्या वह दिव्य परिप्रेक्ष्य से पापमय मनुष्यजाति के जीवन को देख सकता था? बिल्कुल नहीं! मनुष्य के पुत्र और एक सामान्य मनुष्य के बीच यही अन्तर है। सभी भ्रष्ट लोग पाप में जीते हैं, और जब कोई पाप को देखता है, तो उन्हें उसके बारे में कोई विशेष भावना नहीं होती है; वे सभी एक समान होते हैं, कीचड़ में रहने वाले एक सूअर के समान जिसे बिल्कुल भी किसी असुविधा या गन्दगी का एहसास नहीं होता है—वह अच्छी तरह से खाता है, और गहरी नींद में सोता है। यदि कोई सूअरों के बाड़े को साफ करता है, तो सूअर को वास्तव में सहज महसूस नहीं होगा, और वह साफ सुथरा नहीं रहेगा। जल्दी ही, वह एक बार फिर से, पूरी तरह आराम से, कीचड़ में लोट-पोट कर रहा होगा, क्योंकि वह एक गन्दा जीव है। जब मनुष्य सूअर को देखते हैं, तो वे महसूस करते हैं कि वह गन्दा है, और यदि तुम उसे साफ करते हो, तो सूअर को अच्छा महसूस नहीं होता है—इसीलिए कोई भी सूअर को अपने घर में नहीं रखता है। जिस तरह से मनुष्य सूअरों को देखते हैं वह हमेशा उससे भिन्न होगा जैसा सूअर अपने आप के लिए महसूस करते हैं, क्योंकि मनुष्य और सूअर एक ही किस्म के नहीं हैं। और क्योंकि देहधारी मनुष्य का पुत्र उसी किस्म का नहीं है जैसे मनुष्य हैं, इसलिए केवल देहधारी परमेश्वर ही दिव्य परिप्रेक्ष्य से खड़ा हो सकता है, और मनुष्यजाति को देखने के लिए, सब कुछ देखने के लिए परमेश्वर की ऊँचाई से खड़ा हो सकता है।

जब परमेश्वर देह बनता है और मनुष्यजाति के बीच रहता है, तो वह देह में किस प्रकार की पीड़ा का अनुभव करता है? क्या कोई सचमुच में समझता है? कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर बड़ी पीड़ा सहता है, और यद्यपि वह स्वयं परमेश्वर है, फिर भी लोग उसके सार को नहीं समझते हैं और हमेशा उसके साथ एक मनुष्य के समान व्यवहार करते हैं, जो उन्हें वह दुःखित और ग़लत महसूस कराता है—वे कहते हैं कि परमेश्वर की पीड़ा सचमुच बहुत बड़ी है। अन्य लोग कहते हैं कि परमेश्वर निर्दोष और निष्पाप है, परन्तु वह मनुष्य के समान पीड़ा भुगतता है और मनुष्यजाति के साथ-साथ उत्पीड़न, बदनामी, और अपमान भुगतता है; वे कहते हैं कि वह अपने अनुयायियों की ग़लतफहमियों और अवज्ञा को भी सहता है—परमेश्वर की पीड़ा को सचमुच में मापा नहीं जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर को नहीं समझते हो। वास्तव में, वह दुःख जिसके बारे में तुम लोग बात करते हो उसे परमेश्वर के लिए सच्चे दुःख के रूप में नहीं गिना जाता है, क्योंकि इससे कहीं बढ़कर पीड़ा है। तो स्वयं परमेश्वर के लिए सच्ची पीड़ा क्या है? देहधारी परमेश्वर की देह के लिए सच्ची पीड़ा क्या है? परमेश्वर के लिए, मनुष्यजाति का उसे नहीं समझना पीड़ा के रूप में नहीं लिया जाता है, और लोगों की परमेश्वर के बारे में कुछ ग़लतफहमियाँ होना और उसे परमेश्वर के रूप में नहीं देखना पीड़ा के रूप में नहीं लिया जाता है। हालाँकि, लोग प्रायः महसूस करते हैं कि परमेश्वर ने अवश्य कोई बहुत बड़ा अन्याय सहा होगा, यह कि जितने समय तक परमेश्वर देह में रहता है वह अपने व्यक्तित्व को मनुष्यजाति को नहीं दिखा सकता है और उन्हें अपनी महानता को नहीं देखने दे सकता है, और परमेश्वर विनम्रता से एक मामूली देह में छिपा रहता है, इसलिए यह उसके लिए अवश्य यंत्रणादायी रहा होगा। लोग परमेश्वर की पीड़ा के बारे में जो कुछ समझ सकते हैं और जो कुछ देख सकते हैं उसे हृदय से लगा लेते हैं, और परमेश्वर पर हर प्रकार की सहानुभूति थोप देते हैं और प्रायः यहाँ तक कि उसके लिए एक छोटी सी स्तुति भी प्रस्तुत कर देते हैं। वास्तविकता में, लोग परमेश्वर की पीड़ा के बारे में जो कुछ समझते हैं और वह सचमुच में जो महसूस करता है उसके बीच एक अन्तर है, एक अंतराल है। मैं तुम लोगों को सच बता रहा हूँ—परमेश्वर के लिए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह परमेश्वर का आत्मा है या देहधारी परमेश्वर की देह, वह पीड़ा सच्ची पीड़ा नहीं है। तो यह क्या है जो परमेश्वर सचमुच में भुगतता है? आओ हम केवल देहधारी परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर की पीड़ा के बारे में बात करें।

जब परमेश्वर देहधारी बनता है, तो एक औसत, सामान्य व्यक्ति बन कर, मनुष्यजाति के बीच, लोगों के आसपास रह कर, क्या वह लोगों के जीने के तरीकों, व्यवस्थाओं, और फ़लसफ़ों को देख नहीं सकता है और महसूस नहीं कर सकता है? जीने के ये तरीके और व्यवस्थाएँ उसे कैसा महसूस कराते हैं? क्या वह अपने हृदय में घृणा महसूस करता है? क्यों वह घृणा का एहसास करता है? मनुष्यजाति के जीने के लिए क्या पद्धतियाँ और व्यवस्थाएँ हैं? वे किन सिद्धांतों में जड़ पकड़े हुए थे? वे किस पर आधारित थे? जीने के लिए मनुष्यजाति की पद्धतियों, नियमों इत्यादि के लिए—यह सब कुछ शैतान की तर्क, ज्ञान, और फ़लसफ़े पर सृजित है। इस प्रकार की व्यवस्थाओं के अधीन जीने वाले मनुष्यों में कोई मानवता, कोई सच्चाई नहीं होती है—वे सभी सत्य की उपेक्षा करते हैं, और परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं। यदि हम परमेश्वर के सार पर एक नज़र डालें, तो हम देखते हैं कि उसका सार शैतान के तर्क, ज्ञान, और फ़लसफ़े के ठीक विपरीत है। उसका सार धार्मिकता, सत्य, और पवित्रता, और सभी सकारात्मक चीज़ों की अन्य वास्तविकताओं से भरा हुआ है। परमेश्वर, जो इस सार को धारण किए हुए है और ऐसी मनुष्यजाति के बीच रहता है—वह अपने हृदय में क्या सोचता है? क्या वह दर्द से भरा हुआ नहीं है? उसके हृदय में दर्द है, और यह दर्द कुछ ऐसा है जिसे कोई इंसान समझ नहीं सकता है या अनुभव नहीं कर सकता है। क्योंकि सब कुछ जिसका वह सामना करता है, मुक़ाबला करता है, जिसे सुनता, देखता, और अनुभव करता है वह सब मनुष्यजाति की भ्रष्टता, दुष्टता, और सत्य के विरुद्ध उनका विद्रोह और सत्य के प्रति प्रतिरोध है। जो कुछ मनुष्यों से आता है वह उसकी पीड़ा का स्रोत है। अर्थात्, क्योंकि उसका सार भ्रष्ट मनुष्यों के समान नहीं है, इसलिए मनुष्यों की भ्रष्टता उसकी सबसे बड़ी पीड़ा का स्रोत बन जाती है। जब परमेश्वर देह बनता है, तो क्या वह ऐसे किसी को ढूँढ़ पाता है जो उसके साथ एक सामान्य भाषा साझा करता है? ऐसा मनुष्यजाति में नहीं पाया जा सकता है। ऐसे किसी को भी नहीं पाया जा सकता है जो परमेश्वर के साथ संवाद कर सकता हो, इस प्रकार आदान प्रदान कर सकता हो—तो तुम क्या कहोगे कि परमेश्वर को कैसा महसूस होता है? जिन चीज़ों के बारे में लोग चर्चा करते हैं, जिनसे वे प्रेम करते हैं, जिनके पीछे वे भागते हैं और जिनकी वे लालसा करते हैं वे सभी पाप से, और दुष्ट प्रवृतियों से जुड़ी हुई हैं। परमेश्वर इन सबका सामना करता है, तो क्या यह उसके हृदय में एक कटार के समान नहीं है? इन चीज़ों का सामना करके, क्या उसे अपने हृदय में आनन्द मिल सकता है? क्या वह सान्त्वना पा सकता है? जो उसके साथ रह रहें हैं वे विद्रोहशीलता और दुष्टता से भरे हुए मनुष्य हैं—तो उसका हृदय पीड़ित कैसे नहीं हो सकता है? यह पीड़ा वास्तव में कितनी बड़ी है, और कौन इसकी परवाह करता है? कौन ध्यान देता है? और कौन इस की सराहना कर सकता है? लोगों के पास परमेश्वर के हृदय को समझने का कोई तरीका नहीं है। उसकी पीड़ा कुछ ऐसी है जिसकी सराहना करने में लोग विशेष रूप से असमर्थ हैं, और मानवता की उदासीनता और संवेदनशून्यता परमेश्वर की पीड़ा को और अधिक गहरा करती है।

कुछ ऐसे भी लोग हैं जो मसीह की दुर्दशा पर अक्सर सहानुभूति दिखाते हैं क्योंकि बाइबल में एक छंद है जो कहता हैः "लोमड़ियों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं; परन्तु मनुष्य के पुत्र के लिये सिर धरने की भी जगह नहीं है।" जब लोग इसे सुनते हैं, तो वे इसे हृदय में ले लेते हैं और विश्वास करते हैं कि यही सबसे बड़ी पीड़ा है जिसे परमेश्वर सहता है, और सबसे बड़ी पीड़ा है जिसे मसीह सहता है। अब, तथ्यों के परिप्रेक्ष्य से इसे देखते हुए, क्या मामला ऐसा ही है? परमेश्वर यह नहीं मानता है कि ये कठिनाईयाँ पीड़ा हैं। उसने कभी देह की पीड़ाओं के लिए अन्याय के विरूद्ध चीख पुकार नहीं की है, और उसने कभी भी अपने लिए मनुष्यों से किसी चीज़ का प्रतिफल या पुरस्कार नहीं लिया है। हालाँकि, जब वह मनुष्यजाति की हर चीज़, मनुष्यों के भ्रष्ट जीवन और दुष्टता को देखता है, और जब वह देखता है कि मनुष्यजाति शैतान के चंगुल में है और शैतान की क़ैद में है और बचकर नहीं निकल सकती है, कि पाप में रहने वाले लोग नहीं जानते हैं कि सत्य क्या है—तो वह इन सब पापों को सहन नहीं कर सकता है। मनुष्यजाति के बारे में उसकी घृणा हर दिन बढ़ती जाती है, किन्तु उसे इस सब को सहना पड़ता है। यह परमेश्वर की सबसे बड़ी पीड़ा है। परमेश्वर अपने अनुयायियों के बीच खुलकर अपने हृदय की आवाज़ या अपनी भावनाओं को भी व्यक्त नहीं कर सकता है, और उसके अनुयायियों में से कोई भी उसकी पीड़ा को वास्तव में समझ नहीं सकता है। कोई भी उसके हृदय को समझने या दिलासा देने की कोशिश भी नहीं करता है—उसका हृदय दिन प्रतिदिन, लगातार कई वर्षों से, बार-बार इस पीड़ा को सहता है। तुम लोग इन सब में क्या देखते हो? परमेश्वर ने जो कुछ दिया है उसके बदले में वह मनुष्यों से किसी चीज़ की अपेक्षा नहीं करता है, किन्तु परमेश्वर के सार की वजह से, वह मनुष्यजाति की दुष्टता, भ्रष्टता, और पाप को बिल्कुल भी सहन नहीं कर सकता है, बल्कि अत्यधिक नफ़रत और अरुचि महसूस करता है, जो परमेश्वर के हृदय और उसकी देह को अनन्त पीड़ा की ओर ले जाती है। क्या तुम लोग यह सब देख सकते हो? ज़्यादा संभावना है, कि तुम लोगों में से कोई भी इसे देख नहीं सकता है, क्योंकि तुम लोगों में से कोई भी वास्तव में परमेश्वर को नहीं समझता है। समय के साथ तुम लोग धीर-धीरे इसे अपने आप समझ सकते हो।

आगे, आओ हम पवित्रशास्त्र के निम्नलिखित अंशों को देखें।

9. यीशु अद्भुत काम करता है

1) यीशु पाँच हज़ार पुरुषों को खिलाता है

यूहन्ना 6:8-13 उसके चेलों में से शमौन पतरस के भाई अन्द्रियास ने उससे कहा, "यहाँ एक लड़का है जिसके पास जौ की पाँच रोटी और दो मछलियाँ हैं; परन्तु इतने लोगों के लिये वे क्या हैं?" यीशु ने कहा, "लोगों को बैठा दो।" उस जगह बहुत घास थी: तब लोग जिनमें पुरुषों की संख्या लगभग पाँच हज़ार की थी, बैठ गए। तब यीशु ने रोटियाँ लीं, और धन्यवाद करके बैठनेवालों को बाँट दीं; और वैसे ही मछलियों में से जितनी वे चाहते थे बाँट दिया। जब वे खाकर तृप्‍त हो गए तो उसने अपने चेलों से कहा, "बचे हुए टुकड़े बटोर लो कि कुछ फेंका न जाए।" अत: उन्होंने बटोरा, और जौ की पाँच रोटियों के टुकड़ों से जो खानेवालों से बच रहे थे, बारह टोकरियाँ भरीं।

2) लाज़र का पुनरूत्थान परमेश्वर की महिमा करता है

यूहन्ना 11:43-44 यह कहकर उसने बड़े शब्द से पुकारा, "हे लाज़र, निकल आ!" जो मर गया था वह कफन से हाथ पाँव बँधे हुए निकल आया, और उसका मुँह अँगोछे से लिपटा हुआ था। यीशु ने उनसे कहा, "उसे खोल दो और जाने दो।"

प्रभु यीशु के द्वारा किए गए चमत्कारों में से, हमने सिर्फ इन दो को ही चुना है क्योंकि ये उस बात को प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त हैं जिसके बारे में मैं यहाँ बात करना चाहता हूँ। ये दोनों चमत्कार वास्तव में बहुत ही आश्चर्यजनक हैं, और अनुग्रह के युग में वे प्रभु यीशु के चमत्कार के सच्चे प्रतिनिधि हैं।

पहले, आओ प्रथम अंश पर एक नज़र डालें: यीशु पाँच हज़ार पुरुषों को खिलाता है।

"पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ" किस प्रकार की धारणा है? पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ आमतौर पर कितने लोगों के लिए पर्याप्त होंगी। यदि तुम लोग एक औसत इंसान की भूख के आधार पर माप करो, तो यह केवल दो व्यक्तियों के लिए ही पर्याप्त होंगी। यही पाँच रोटियों और दो मछलियों की मुख्य धारणा है। हालाँकि, यह इस अंश में लिखा है कि पाँच रोटियों और दो मछलियों ने कितने लोगों को खिलाया? यह पवित्रशास्त्र में इस प्रकार दर्ज हैः "उस जगह बहुत घास थी: तब लोग जिनमें पुरुषों की संख्या लगभग पाँच हज़ार की थी, बैठ गए।" पाँच रोटियों और दो मछलियों की तुलना में, क्या पाँच हज़ार एक बड़ी संख्या है? इसका क्या मतलब है कि यह संख्या इतनी बड़ी थी? मानवीय परिप्रेक्ष्य से, पाँच हज़ार लोगों के बीच पाँच रोटियों और दो मछलियों को बाँटना असंभव होगा, क्योंकि उनके बीच का अंतर बहुत बड़ा है। यहाँ तक कि यदि प्रत्येक व्यक्ति को बस एक छोटा सा टुकड़ा ही मिलता, तब भी यह पाँच हज़ार लोगों के लिए काफी नहीं होता। परन्तु यहाँ, प्रभु यीशु ने एक चमत्कार किया—उसने न केवल पाँच हज़ार लोगों को भरपेट खाने दिया, बल्कि कुछ अतिरिक्त भी था। पवित्रशास्त्र कहता हैः "जब वे खाकर तृप्‍त हो गए तो उसने अपने चेलों से कहा, 'बचे हुए टुकड़े बटोर लो कि कुछ फेंका न जाए।' अत: उन्होंने बटोरा, और जौ की पाँच रोटियों के टुकड़ों से जो खानेवालों से बच रहे थे, बारह टोकरियाँ भरीं।" इस चमत्कार ने लोगों को प्रभु यीशु की पहचान और स्थिति को देखने दिया, और इसने उन्हें यह देखने दिया कि परमेश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है—उन्होंने परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की सच्चाई को देखा। पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ पाँच हज़ार को खिलाने के लिए पर्याप्त थी, परन्तु वहाँ यदि कोई भोजन ही नहीं होता तो क्या परमेश्वर पाँच हज़ार लोगों को खिला सकता था? निस्संदेह वह खिला सकता था! यह एक चमत्कार था, इसलिए लोगों ने आवश्यक रूप से महसूस किया कि यह समझ से बाहर है और महसूस किया कि यह अविश्वसनीय और रहस्यमय है, परन्तु परमेश्वर के लिए, ऐसी चीज़ करना कोई बड़ी बात नहीं थी। चूँकि परमेश्वर के लिए एक सामान्य चीज़ थी, तो व्याख्या करने के लिए इसे क्यों चुना गया होगा? क्योंकि इस चमत्कार के पीछे जो निहित है वह प्रभु यीशु की इच्छा से युक्त है, जिसे मनुष्यजाति के द्वारा कभी नहीं खोजा गया है।

पहले, आओ यह समझने का प्रयास करें कि ये पाँच हज़ार लोग किस प्रकार के लोग थे। क्या वे प्रभु यीशु के अनुयायी थे? पवित्रशास्त्र से, हम जानते हैं कि वे उसके अनुयायी नहीं थे। क्या वे जानते थे कि प्रभु यीशु कौन है? निश्चित रूप से नहीं! कम से कम, वे यह तो नहीं जानते थे कि जो व्यक्ति उनके सामने खड़ा है वह प्रभु यीशु है, या हो सकता है कि कुछ लोग केवल इतना ही जानते हों कि उसका नाम क्या है, और उन चीज़ों के बारे जो उसने की थीं कुछ जानते हों या उन्होंने कुछ सुना हो। वे मात्र कहानियों से प्रभु यीशु के बारे में उत्सुक थे, परन्तु तुम लोग निश्चित रूप से यह नहीं कह सकते हो कि वे उसका अनुसरण करते थे, और उसे समझते तो बिल्कुल भी नहीं थे। जब प्रभु यीशु ने इन पाँच हज़ार लोगों को देखा, तो वे भूखे थे और केवल भरपेट भोजन करने के बारे में ही सोच सकते थे, इसलिए यह इस सन्दर्भ में था कि प्रभु यीशु ने उनकी इच्छाओं को तृप्त किया। जब उसने उनकी इच्छाओं को तृप्त कर दिया, तो उसके हृदय में क्या था? इन लोगों के प्रति उसका रवैया क्या था जो केवल भरपेट भोजन करना चाहते थे? इस समय, प्रभु यीशु के विचार और उसके रवैये का परमेश्वर के स्वभाव और सार के साथ संबंध था। इन खाली पेट वाले पाँच हज़ार लोगों का सामना करते हुए जो केवल एक बार भर-पेट भोजन खाना चाहते थे, उसके बारे में उत्सुकता और आशाओं से भरे इन लोगों का सामना करते हुए, प्रभु यीशु ने केवल उन पर अनुग्रह प्रदान करने के लिए इस चमत्कार का उपयोग करने के बारे में सोचा था। हालाँकि, उसने अपनी आशाएँ नहीं बढ़ाई कि वे उसके अनुयायी बन जाएँगे, क्योंकि वह जानता था कि वे मौज-मस्ती करना और पेट भरकर खाना चाहते थे, इसलिए वहाँ जो कुछ उसके पास था उसने उसे बेहतरीन बनाया, और पाँच हज़ार को खिलाने के लिए पाँच रोटियों और दो मछलियों का उपयोग किया। उसने उन लोगों की आँखें खोल दीं जो मनोरंजन का आनंद लेते थे, जो चमत्कार देखना चाहते थे, और उन्होंने अपनी आँखों से उन चीज़ों को देखा जिन्हें देहधारी परमेश्वर पूर्ण कर सकता था। यद्यपि प्रभु यीशु ने उनकी उत्सुकता को सन्तुष्ट करने के लिए कुछ मूर्त चीज़ों का उपयोग किया था, क्योंकि वह पहले से ही अपने हृदय में जानता था कि ये पाँच हज़ार लोग बस एक बढ़िया भोजन करना चाहते थे, इसलिए उसने उन्हें कुछ भी नहीं कहा या उन्हें बिल्कुल भी उपदेश नहीं दिया—उसने बस उन्हें उस चमत्कार को घटित होते हुए देखने दिया। वह इन लोगों से वैसा बर्ताव बिल्कुल नहीं कर सका जैसा वह अपने चेलों के साथ करता था जो सचमुच में उसका अनुसरण करते थे, परन्तु परमेश्वर के हृदय में, सभी प्राणी उसके शासन के अधीन थे, और वह अपनी दृष्टि में सभी जीवधारियों को जब आवश्यक हो परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने की अनुमति देगा। भले ही ये लोग नहीं जानते थे कि वह कौन है या वे उसे समझते नहीं थे, या रोटियों और मछलियों को खाने के बाद भी उनके ऊपर उसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था या उसके प्रति उनकी कोई कृतज्ञता नहीं थी, फिर भी यह कुछ ऐसा नहीं था जो परमेश्वर के लिए मुद्दा हो—उसने उन्हें परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने के लिए एक अद्भुत अवसर दिया था। कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है उसमें उसके सिद्धान्त होते हैं, और वह अविश्वासियों की निगरानी या उनकी सुरक्षा नहीं करता है, और वह विशेष रूप से उन्हें अपने अनुग्रह का आनंद उठाने नहीं देता है। क्या मामला वास्तव में ऐसा ही है? परमेश्वर की नज़रों में, जब तक वे ऐसे जीवित प्राणी हैं जिन्हें उसने स्वयं बनाया है, वह उनका प्रबन्धन और उनकी परवाह करेगा; वह भिन्न तरीके से उनके साथ व्यवहार करेगा, उनके लिए योजना बनाएगा, और उन पर शासन करेगा। इन सभी चीज़ों के प्रति परमेश्वर के विचार और उसका रवैया हैं।

यद्यपि पाँच हज़ार लोग जिन्होंने रोटियों और मछलियों को खाया उनकी प्रभु यीशु का अनुसरण करने की योजना नहीं थी, फिर भी वह उनके प्रति कठोर नहीं था; एक बार जब उन्होंने भर पेट खा लिया, तो क्या तुम लोग जानते हो कि प्रभु यीशु ने क्या किया? क्या उसने उन्हें किसी चीज़ का उपदेश दिया? इसे करने के बाद वह कहाँ चला गया? पवित्रशास्त्र मे दर्ज नहीं है कि प्रभु यीशु ने उनसे कुछ कहा था; जब उसने अपना चमत्कार पूर्ण कर लिया तो वह चुपके से चला गया। तो क्या उसने इन लोगों से कुछ अपेक्षाएँ कीं? क्या कोई नफ़रत थी? इनमें से कुछ भी नहीं था—वह बस इन लोगों पर अब और कोई ध्यान देना नहीं चाहता था जो उसका अनुसरण नहीं कर सकते थे, और इस समय उसका हृदय दर्द में था। क्योंकि उसने मनुष्यजाति की चरित्रहीनता को देखा था और उसने मनुष्यजाति के द्वारा ठुकराया जाना महसूस किया था, और जब उसने इन लोगों को देखा या जब वह उनके साथ था, तो मनुष्य की मूढ़ता और अज्ञानता ने उसे बहुत ही दुःखी कर दिया और उसके हृदय को पीड़ित कर दिया, इसलिए वह इन लोगों को जितना जल्दी हो सके छोड़कर चला जाना चाहता था। प्रभु को अपने हृदय में इनसे कोई अपेक्षाएँ नहीं थीं, वह उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहता था, विशेषकर वह अपनी ऊर्जा को उन पर व्यय नहीं करना चाहता था, और वह जानता था कि वे उसका अनुसरण नहीं करेंगे—इस सब के बावजूद, उनके प्रति उसका रवैया अभी भी बिल्कुल स्पष्ट था। वह बस उनके साथ दयालु बर्ताव करना चाहता था, उन्हें अनुग्रह प्रदान करना चाहता था—अपने शासन के अधीन प्रत्येक प्राणी के प्रति यह परमेश्वर का रवैया था: प्रत्येक प्राणी के लिए, उनके साथ अच्छा बर्ताव करना, उनका भरण पोषण करना, उनका पालन-पोषण करना। जिस मुख्य कारण के लिए प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर था उसके लिए, उसने बहुत ही प्राकृतिक ढंग से स्वयं परमेश्वर के सार को प्रकट किया और इन लोगों के साथ दयालु बर्ताव किया। उसने उनके साथ करुणा और सहिष्णुता वाले हृदय से दयालु व्यवहार किया था। इससे फर्क नहीं पड़ता है कि इन लोगों ने प्रभु यीशु को किस प्रकार देखा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि किस प्रकार का परिणाम होता, उसने बस हर प्राणी के साथ समस्त सृष्टि के प्रभु के रूप में अपने पद के आधार पर व्यवहार किया। उसने जो प्रकट किया वह था, बिना किसी अपवाद के, परमेश्वर का स्वभाव, और परमेश्वर का स्वरूप। इसलिए प्रभु यीशु ने खामोशी से कुछ किया था, फिर वह खामोशी से चला गया—यह परमेश्वर के स्वभाव का कौन सा पहलू है? क्या तुम लोग कह सकते हो कि यह परमेश्वर के प्रेम के कारण दयालु चीज़ों को करना है? क्या तुम लोग कह सकते हो कि परमेश्वर निःस्वार्थ है? क्या कोई सामान्य व्यक्ति ऐसा कर सकता है? निश्चित रूप से नहीं! सार रूप में, ये पाँच हज़ार लोग कौन थे जिन्हें प्रभु यीशु ने पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ खिलायी थीं? क्या तुम लोग कह सकते हो कि वे ऐसे लोग थे जो उसके अनुकूल थे? क्या तुम लोग कह सकते हो कि वे सभी परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण थे? ऐसा निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि वे प्रभु यीशु के बिल्कुल अनुरूप नहीं थे, और उनका सार बिल्कुल परमेश्वर के विरूद्ध था। परन्तु परमेश्वर ने उनके साथ कैसा बर्ताव किया? उसने परमेश्वर के प्रति लोगों के विरोध को शांत करने के लिए एक तरीके का उपयोग किया था—इस तरीके को "दयालुता" कहते हैं। अर्थात्, यद्यपि प्रभु यीशु ने उन्हें पापियों के रूप में देखा, फिर भी परमेश्वर की नज़रों में वे तब भी उसकी रचना थे, इसलिए उसने इन पापियों के साथ तब भी दयालु व्यवहार किया। यह परमेश्वर की सहिष्णुता है, और यह सहिष्णुता स्वयं परमेश्वर की पहचान और सार से निर्धारित होती है। इसलिए, यह कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर के द्वारा सृजित कोई भी मनुष्य नहीं कर सकता है—केवल परमेश्वर ही इसे कर सकता है।

जब तुम परमेश्वर के विचारों और मनुष्यजाति के प्रति उसके रवैये को सचमुच में समझने में समर्थ होते हो, और जब तुम सचमुच में प्रत्येक प्राणी के प्रति परमेश्वर की भावनाओं और चिंता को समझ सकते हो, तो तुम सृजनकर्ता के द्वारा सृजित हर एक मनुष्य के ऊपर व्यय की गई लगन और प्रेम को समझने में भी समर्थ हो जाओगे। जब ऐसा होगा, तो तुम परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए दो शब्दों का उपयोग करोगे—वे दो शब्द क्या हैं? कुछ लोग कहते हैं "निःस्वार्थ," और कुछ लोग कहते हैं "लोकहितैषी।" इन दोनों में "लोकहितैषी" वह शब्द है जो परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने के लिए सबसे कम उपयुक्त है। यह ऐसा शब्द है जिसे लोग किसी व्यक्ति के उदार विचारों और भावनाओं का वर्णन करने के लिए उपयोग करते हैं। मैं वास्तव में इस शब्द से घृणा करता हूँ, क्योंकि यह यूँ ही, विवेकहीनता से, और सिद्धांतों की परवाह किए बिना उदारता बाँटने की ओर संकेत करता है। यह मूर्ख और भ्रमित लोगों की अति भावनात्मक अभिव्यक्ति है। जब इस शब्द का उपयोग परमेश्वर के प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है, तो इसमें अपरिहार्य रूप से एक ईशनिंदा का इरादा होता है। मेरे पास दो शब्द हैं जो अधिक उचित रूप से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करते हैं—वे दो शब्द क्या हैं? पहला है "विशाल" क्या यह शब्द बहुत उद्बोधक नहीं है? दूसरा है "असीम।" इन दोनों शब्दों के पीछे वास्तविक अर्थ है जिन्हें मैं परमेश्वर के प्रेम को दर्शाने के लिए उपयोग करता हूँ। शब्दशः लेने पर, "विशाल" किसी चीज़ के आयतन और क्षमता का वर्णन करता है, पर वह चीज़ कितनी ही बड़ी क्यों न हो—यह कुछ ऐसी है जिसे लोग छू और देख सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह अस्तित्व में है, यह कोई अमूर्त पदार्थ नहीं है, और यह लोगों को वह आभास देती है जो अपेक्षाकृत परिशुद्ध और व्यावहारिक होता है। इससे फर्क नहीं पड़ता है कि तुम इसे किसी समतल से देखो या त्रिआयामी कोण से; तुम्हें इसके अस्तित्व की कल्पना करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह ऐसी चीज़ है जो वास्तव में अस्तित्व में है। यद्यपि परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने के लिए "विशाल" शब्द का उपयोग करने से ऐसा महसूस होता है कि उसके प्रेम का परिमाण करना है, हालाँकि, यह इस बात का एहसास भी देता है कि परिमाणनीय नहीं है। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम का परिमाण किया जा सकता है क्योंकि उसका प्रेम एक प्रकार से अनस्तित्व नहीं है, और न ही वह किसी पौराणिक कथा से निकलता है। बल्कि, यह कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर की अधीनता में सभी प्राणियों के द्वारा साझा किया जाता है, और यह कुछ ऐसा है जिसका आनंद सभी प्राणियों के द्वारा विभिन्न अंशों में और विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से लिया जाता है। यद्यपि लोग इसे देख या छू नहीं सकते हैं, फिर भी यह प्रेम सभी चीज़ों के लिए जीवनाधार और जीवन लाता है क्यों कि यह थोड़ा-थोड़ा करके उनकी जिन्दगियों में प्रकट होता है, और वे परमेश्वर के उस प्रेम को गिनते हैं और उसकी गवाही देते हैं जिसका वे हर क्षण आनंद लेते हैं। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर का प्रेम अपरिमाणनीय है क्योंकि परमेश्वर का सभी चीज़ों का भरण-पोषण और पालन-पोषण करने का रहस्य कुछ ऐसा है जिसकी थाह पाना मनुष्यजाति के लिए उतना ही कठिन है, जितना कि सभी चीज़ों के लिए परमेश्वर के विचारों की, और विशेष रूप से उन विचारों की जो मनुष्यजाति के लिए हैं। अर्थात्, उस लहू और आसूँओं को कोई नहीं जानता है जो परमेश्वर ने मनुष्यजाति के लिए बहाये हैं। उस मनुष्यजाति के लिए सृजनकर्ता के प्रेम की गहराई और महत्व को कोई नहीं बूझ सकता है, कोई नहीं समझ सकता है, जिसे उसने अपने हाथों से बनाया। परमेश्वर के प्रेम को अपार के रूप में वर्णन करना इसके अस्तित्व के विस्तार और इसकी सच्चाई की सराहना करने और समझने में लोगों की सहायता करना है। यह इसलिए भी है ताकि लोग "सृजनकर्ता" शब्द के वास्तविक अर्थ को अधिक गहराई से समझ सकें, और ताकि लोग संज्ञा "सृष्टि" के सच्चे अर्थ की एक गहरी समझ प्राप्त कर सकें। "असीम" शब्द सामान्यतः किस चीज़ का वर्णन करता है? यह साधारणतः महासागरों या ब्रह्माण्ड के लिए प्रयुक्त होता है, जैसे असीम ब्रह्माण्ड, या असीम महासागर। ब्रह्माण्ड की व्यापकता और शांत गहराई मनुष्य की समझ से परे है, और यह कुछ ऐसा है जो मनुष्य की कल्पनाओं को ऐसा आकर्षित करता है, कि वे उसके प्रति प्रशंसा से भर जाते हैं। उसका रहस्य और उसकी गहराई दृष्टि के तो भीतर हैं किन्तु पहुँच से बाहर हैं। जब तुम महासागर के बारे में सोचते हो, तुम उसके विस्तार के बारे में सोचते हो—तो वह असीम दिखाई देता है, और तुम उसकी रहस्यमयता और उसकी समग्रता को महसूस कर सकते हो। इसीलिए मैंने परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए "असीम" शब्द का उपयोग किया है। यह लोगों को इस बात को महसूस करने में कि वह कितना बहुमूल्य है, और उसके प्रेम की अगाध सुंदरता को महसूस करने में सहायता करने के लिए है, और यह कि परमेश्वर के प्रेम की ताक़त अनन्त और विस्तृत है। यह उसके प्रेम की पवित्रता, और परमेश्वर की प्रतिष्ठा और उसका अपमान नहीं किए जाने की योग्यता को महसूस करने में उनकी सहायता करता है जो उसके प्रेम के माध्यम से प्रकट होता है। अब क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए "असीम" एक उपयुक्त शब्द है? क्या परमेश्वर का प्रेम इन दो शब्दों "विशाल" और "असीम" के अनुसार खरा उतरता है? बिल्कुल! मानवीय भाषा में, केवल ये दो शब्द ही अपेक्षाकृत उचित हैं, परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के अपेक्षाकृत करीब हैं। क्या तुम लोग ऐसा नहीं सोचते हो? यदि मैं तुम लोगों से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करवाता, तो क्या तुम लोग इन दो शब्दों का उपयोग करते? बहुत संभव है कि तुम लोग नहीं कर सकते थे, क्योंकि परमेश्वर के प्रेम की तुम लोगों की समझ और सराहना एक समतल परिप्रेक्ष्य तक सीमित है, और त्रि-आयामी स्तर की ऊँचाई तक नहीं पहुँची है। इसलिए यदि मैं तुम लोगों से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करवाता, तो तुम लोग महसूस करते कि तुम लोगों के पास शब्दों का अभाव है; और यहाँ तक कि तुम लोग अवाक् भी हो जाते। हो सकता है कि आज जिन दो शब्दों के बारे में मैंने बात की है वे तुम लोगों के लिए समझने में कठिन हों, या हो सकता है कि तुम लोग ऐसे ही उससे सहमत न हों। यह बस उस सच्चाई को बता सकता है कि परमेश्वर के प्रेम के बारे में तुम लोगों की सराहना और समझ सतही और एक संकीर्ण दायरे के भीतर है। मैं पहले कह चुका हूँ कि परमेश्वर निःस्वार्थ है—तुम लोगों को निःस्वार्थ शब्द याद है। क्या ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के प्रेम का केवल निःस्वार्थ के रूप में वर्णन किया जा सकता है? क्या यह एक बहुत संकीर्ण दायरा नहीं है? इससे कुछ प्राप्त करने के लिए तुम लोगों को इस मामले पर अधिक मनन करना चाहिए।

ऊपर वह है जो प्रथम चमत्कार से हम परमेश्वर के स्वभाव और उसके सार को देखते हैं। भले ही यह एक कहानी है जिसे लोगों ने कई हज़ार वर्षों से पढ़ा है, इसका एक सामान्य सा कथानक है, और यह लोगों को एक सामान्य घटना को देखने देती है, फिर भी इस सामान्य कथानक में हम कुछ ऐसा देख सकते हैं जो अधिक बहुमूल्य है, जो कि परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप है। ये चीज़ें जो उसका स्वरूप हैं स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करती हैं, और स्वयं परमेश्वर के विचारों की एक अभिव्यक्ति हैं। जब परमेश्वर अपने विचारों को व्यक्त करता है, तो यह उसके हृदय की आवाज़ की अभिव्यक्ति है। वह आशा करता है कि ऐसे लोग होंगे जो उसे समझ सकते हैं, उसे जान सकते हैं, और उसकी इच्छा को बूझ सकते हैं, और वह आशा करता है कि ऐसे लोग होंगे जो उसके हृदय की आवाज़ को सुन सकते हैं और उसकी इच्छा को संतुष्ट करने के लिए सक्रियता से सहयोग कर सकेंगे। और ये चीज़ें जिन्हें प्रभु यीशु ने किया वे परमेश्वर की मूक अभिव्यक्ति थीं।

इसके बाद, आओ हम इस अंश पर नज़र डालें: लाज़र का पुनरूत्थान परमेश्वर की महिमा करता है।

इस अंश को पढ़ने के बाद इसका तुम लोगों के ऊपर क्या प्रभाव पड़ा? प्रभु यीशु के द्वारा किए गए इस चमत्कार का महत्व पहले वाले से बहुत अधिक था क्योंकि कोई भी चमत्कार किसी मरे हुए इंसान को क़ब्र से बाहर लाने से बढ़कर विस्मयकारक नहीं हो सकता है। प्रभु यीशु का ऐसा कुछ करना उस युग में बहुत ही ज़्यादा महत्वपूर्ण था। क्योंकि परमेश्वर देहधारी हो गया था, इसलिए लोग केवल उसके शारीरिक रूप-रंग, उसके व्यावहारिक पक्ष, और उसके महत्वहीन पक्ष को ही देख सकते थे। भले ही कुछ लोगों ने उसके कुछ गुणों या कुछ ताक़तों को देखा और समझा जो उसमें दिखाई देते थे, फिर भी कोई नहीं जानता था कि प्रभु यीशु कहाँ से आया, उसका सार वास्तव में कौन है, और वह वास्तव में और अधिक क्या कर सकता है। यह सब कुछ मनुष्यजाति के लिए अज्ञात था। बहुत से लोग इस चीज़ का प्रमाण चाहते थे, और सत्य को जानना चाहते थे। क्या अपनी पहचान को साबित करने के लिए परमेश्वर कुछ कर सकता था? परमेश्वर के लिए, यह आसान बात थी—बच्चों का खेल था। वह अपनी पहचान और सार को साबित करने के लिए कहीं पर भी, किसी भी समय कुछ भी कर सकता था, परन्तु परमेश्वर ने चीज़ों को एक योजना के साथ, और चरणों में किया था। उसने चीज़ों को विवेकहीनता से नहीं किया; उसने ऐसा कुछ करने के लिए जो मनुष्यजाति के देखने के लिए अर्थपूर्ण हो सही समय, और सही अवसर का इंतज़ार किया। इसने उसके अधिकार और उसकी पहचान को साबित किया। इसलिए तब, क्या लाज़र का पुनरूत्थान प्रभु यीशु की पहचान को प्रमाणित कर सका था? आओ हम पवित्रशास्त्र के इस अंश को देखें: "और यह कहकर, उसने बड़े शब्द से पुकारा, हे लाज़र, निकल आ! जो मर गया था निकल आया...।" जब प्रभु यीशु ने ऐसा किया, उसने बस एक बात कहीः "हे लाज़र, निकल आ!" तब लाजर अपनी क़ब्र से बाहर निकल आया—यह प्रभु के द्वारा बोली गयी एक पंक्ति के कारण पूरा हुआ था। इस अवधि के दौरान, प्रभु यीशु ने कोई वेदी स्थापित नहीं की, और उसने कोई अन्य गतिविधि नहीं की। उसने बस एक बात कही। क्या इसे एक चमत्कार कहा जाएगा या एक आज्ञा? या यह किसी प्रकार की जादूगरी थी? सतही तौर पर, ऐसा प्रतीत होता है कि इसे एक चमत्कार कहा जा सकता है, और यदि तुम लोग इसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य से देखो तो, निस्संदेह तुम लोग इसे तब भी एक चमत्कार ही कह सकते हो। हालाँकि, इसे किसी आत्मा को मृत से वापस बुलाने का जादू निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है, और कोई जादू-टोना तो बिल्कुल भी नहीं। यह कहना सही है कि यह चमत्कार सृजनकर्ता के अधिकार का अत्यधिक सामान्य, एक छोटा सा प्रदर्शन था। यह परमेश्वर का अधिकार, और उसकी क्षमता है। परमेश्वर के पास किसी व्यक्ति के मरने का अधिकार है, और उसकी आत्मा का उसके शरीर को छोड़ने और अधोलोक में, या जहाँ कहीं भी उसे जाना चाहिए, भेजने का अधिकार है। कोई कब मरता है, और मृत्यु के बाद वह कहाँ जाता है—यह सब परमेश्वर के द्वारा निर्धारित किया जाता है। वह इसे किसी भी समय और कहीं भी कर सकता है। वह मनुष्यों, घटनाओं, पदार्थों, अंतरिक्ष, या स्थान के द्वारा विवश नहीं होता है। यदि वह इसे करना चाहता है तो वह इसे कर सकता है, क्योंकि सभी चीज़ें और जीवित प्राणी उसके शासन के अधीन हैं, और सभी चीज़ें उसके वचन, और उसके अधिकार के द्वारा जीवित रहते हैं और मरते हैं। वह एक मृत व्यक्ति का पुनरुत्थान कर सकता है—यह भी कुछ ऐसा है जिसे वह किसी भी समय, कहीं भी कर सकता है। यह वह अधिकार है जो केवल सृजनकर्ता के पास है।

जब प्रभु यीशु ने लाज़र को मृतक में से वापस लाने जैसा कुछ किया, तो उसका उद्देश्य मनुष्यों और शैतान को दिखाने के लिए, तथा मनुष्य और शैतान को जानने देने के लिए प्रमाण देना था कि मनुष्यजाति की सभी चीज़ें, और मनुष्यजाति का जीवन और उसकी मृत्यु परमेश्वर के द्वारा निर्धारित होते हैं, और यह कि भले ही वह देहधारी हो गया था, फिर भी हमेशा की तरह, उसने इस भौतिक संसार को जिसे देखा जा सकता है और साथ ही आध्यात्मिक संसार को जिसे मनुष्य देख नहीं सकते हैं, अपने नियंत्रण में बनाए रखा था। यह इसलिए था कि मनुष्य और शैतान जान लें कि मनुष्यजाति का सब कुछ शैतान के नियंत्रण में नहीं है। यह परमेश्वर के अधिकार का प्रकाशन और प्रदर्शन था, और यह सभी चीज़ों को संदेश देने का परमेश्वर का एक तरीका भी था कि मनुष्यजाति का जीवन और उनकी मृत्यु परमेश्वर के हाथों में है। प्रभु यीशु के द्वारा लाज़र का पुनरूत्थान—इस प्रकार का दृष्टिकोण मनुष्यजाति को शिक्षा और निर्देश देने के लिए सृजनकर्ता का एक तरीका था। यह एक ठोस कार्य था जिसमें उसने मनुष्यजाति को निर्देश देने, और मनुष्यों के भरण पोषण के लिए अपनी क्षमता और अधिकार का उपयोग किया था। सभी चीज़ों के उसके नियंत्रण में होने के सत्य को मनुष्यजाति को देखने देने का यह सृजनकर्ता का एक वचनों से रहित तरीका था। यह व्यावहारिक कार्यों के माध्यम से मनुष्यजाति को यह बताने का उसका एक तरीका था कि उसके माध्यम के अलावा कोई उद्धार नहीं है। मनुष्यजाति को इस प्रकार का मूक निर्देश देने का उसका उपाय सर्वदा बने रहता है—यह अमिट है, और इसने मनुष्य के हृदय को एक आघात और प्रबुद्धता दी है जो कभी धूमिल नहीं हो सकती है। लाज़र के पुनरूत्थान ने परमेश्वर की महिमा की—इसका परमेश्वर के हर एक अनुयायी पर एक गहरा प्रभाव पड़ा है। यह ऐसे प्रत्येक व्यक्ति में जो गहराई से इस घटना को समझता है, इस समझ को, दर्शन को मज़बूती से जड़ देता है कि केवल परमेश्वर ही मनुष्यजाति के जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण कर सकता है। यद्यपि परमेश्वर के पास इस प्रकार का अधिकार है, और यद्यपि उसने मनुष्यजाति के जीवन और मृत्यु के ऊपर अपनी सर्वोच्चता के बारे में लाज़र के पुनरूत्थान के जरिए एक सन्देश भेजा था, फिर भी यह उसका प्राथमिक कार्य नहीं था। परमेश्वर कोई कार्य बिना किसी आशय के कभी नहीं करता है। हर एक चीज़ जो वह करता है उसका बड़ा महत्व है; यह सब एक अति उत्कृष्ट निधि है। वह किसी व्यक्ति के क़ब्र से बाहर आने को अपने कार्य का प्राथमिक या एकमात्र उद्देश्य या चीज़ बिल्कुल भी नहीं बनाएगा। परमेश्वर ऐसा कुछ भी नहीं करता है जिसका कोई आशय ना हो। लाज़र का एक पुनरूत्थान परमेश्वर के अधिकार को प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त था। यह प्रभु यीशु की पहचान को साबित करने के लिए पर्याप्त था। इसीलिए प्रभु यीशु ने इस प्रकार के चमत्कार को फिर से नहीं दोहराया था। परमेश्वर अपने स्वयं के सिद्धांतों के अनुसार चीज़ों को करता है। मानवीय भाषा में, ऐसा होगा कि परमेश्वर गंभीर कार्य के बारे में सचेत है। अर्थात्, जब परमेश्वर चीज़ों को करता है तब वह अपने कार्य के उद्देश्य से भटकता नहीं है। वह जानता है कि इस चरण में वह कौन सा कार्य करना चाहता है, वह क्या पूरा करना चाहता है, और वह कड़ाई से अपनी योजना के अनुसार कार्य करेगा। यदि किसी भ्रष्ट व्यक्ति के पास इस प्रकार की क्षमता होती, तो वह बस अपनी योग्यता को प्रदर्शित करने के तरीकों के बारे में ही सोच रहा होता ताकि अन्य लोगों को पता चल जाए कि वह कितना भयंकर है, जिससे वे उसके सामने झुक जाएँ, ताकि वह उन्हें नियन्त्रित कर सके और उन्हें निगल सके। यही वह बुराई है जो शैतान से आती है—इसे भ्रष्टता कहते हैं। परमेश्वर का इस प्रकार का स्वभाव नहीं है, और उसका इस प्रकार का सार नहीं है। चीज़ों को करने में उसका उद्देश्य अपना दिखावा करना नहीं है, बल्कि मनुष्यजाति को और अधिक प्रकाशन और मार्गदर्शन प्रदान करना है, इसलिए लोग बाइबल में इस तरह की चीज़ों के बहुत कम ही उदाहरणों को देखते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रभु यीशु की क्षमताएँ सीमित थीं, या वह इस प्रकार की चीज़ को नहीं कर सकता था। केवल इतना ही है कि परमेश्वर ऐसा नहीं करना चाहता था, क्योंकि प्रभु यीशु का लाज़र का पुनरूत्थान करने का बहुत ही व्यावहारिक महत्व था, और साथ ही क्योंकि परमेश्वर के देहधारी होने का प्राथमिक कार्य चमत्कार करना नहीं था, यह मुर्दों को जीवित करना नहीं था, बल्कि यह मनुष्यजाति के छुटकारे के कार्य को करना था। इसलिए, प्रभु यीशु के द्वारा पूर्ण किए गए कार्य में से अधिकांश लोगों को शिक्षा देना, उनका भरण पोषण करना, और उनकी सहायता करना, और ऐसी चीज़ें जैसे लाज़र का पुनरूत्थान करना उस सेवकाई का मात्र एक छोटा सा अंश था जिसे प्रभु यीशु ने कार्यान्वित किया था। उससे भी अधिक, तुम लोग कह सकते हो कि "दिखावा करना" परमेश्वर के सार का एक भाग नहीं है, इसलिए अधिक चमत्कारों को नहीं दिखाना जानबूझकर किया गया संयम नहीं था, न ही यह पर्यावरणीय सीमाओं के कारण था, और यह क्षमता की कमी तो बिल्कुल भी नहीं था।

जब प्रभु यीशु ने लाज़र को मृत से वापस जीवित किया, तो उसने एक पंक्ति का उपयोग किया: "हे लाज़र, निकल आ!" उसने इसके अलावा कुछ नहीं कहा—ये शब्द क्या दर्शाते हैं? ये दर्शाते हैं कि परमेश्वर बोलने के द्वारा कुछ भी पूरा कर सकता है, जिसमें एक मरे हुए इंसान को जीवित करना भी शामिल है। जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों का सृजन कर लिया, जब उसने जगत को बना लिया, तो उसने ऐसा अपने वचनों—मौखिक आज्ञाओं, अधिकार युक्त वचनों का उपयोग करके किया था, और ठीक उसी तरह सभी चीज़ों का सृजन हुआ था। यह उसी तरह से पूरा हुआ था। प्रभु यीशु के द्वारा कही गयी यह एक मात्र पंक्ति परमेश्वर के द्वारा उस समय कहे गए वचनों के समान थी जब उसने आकाश और पृथ्वी और सभी चीज़ों का सृजन किया था; उसमें परमेश्वर के समान अधिकार, और सृजनकर्ता के समान क्षमता थी। परमेश्वर के मुँह के वचनों की वजह से सभी चीज़ें बनी और डटी थी, और बिल्कुल वैसे ही, जैसे प्रभु यीशु के मुँह के वचनों की वजह से लाज़र अपनी क़ब्र से बाहर आया। यह परमेश्वर का अधिकार था, जो उसके देहधारी देह में प्रदर्शित और साकार हुआ था। इस प्रकार का अधिकार और क्षमता सृजनकर्ता, और मनुष्य के पुत्र से संबंधित थी जिसमें सृजनकर्ता साकार हुआ था। यही वह समझ है जो परमेश्वर के द्वारा लाज़र को मृत से वापस लाकर मनुष्यजाति को सिखायी गयी है। इस विषय पर बस इतना ही। इसके बाद, आओ हम पवित्रशास्त्र को पढ़ें।

10. फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना

मरकुस 3:21-22 जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो वे उसे पकड़ने के लिए निकले; क्योंकि वे कहते थे कि उसका चित ठिकाने नहीं है। शास्त्री भी जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, "उसमें शैतान है," और "वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है।"

11. यीशु की फरीसियों को डाँट

मत्ती 12:31-32 इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।

मत्ती 23:13-15 हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

ऊपर दो अलग अलग अंश हैं—आओ पहले हम पहले वाले पर एक नज़र डालें: फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना।

बाइबल में, फरीसियों के द्वारा स्वयं यीशु का और उसके द्वारा कही गई चीज़ों का मूल्यांकन यह था: "क्योंकि वे कहते थे, कि उसका चित्त ठिकाने नहीं है। ...उसमें शैतान है, और वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है" (मरकुस 3:21-22)। शास्त्रियों और फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाना रट्टू तोते की तरह बोलना या शून्य में कल्पना करना नहीं था—उसके कार्यों के बारे में जो कुछ उन्होंने देखा और सुना था उसके आधार पर यह प्रभु यीशु के बारे में उनका निष्कर्ष था। यद्यपि उनका निष्कर्ष दिखावे के रूप में न्याय के नाम पर लिया गया था और लोगों को ऐसा दिखता था मानो कि उन्हें अच्छे प्रमाणों से स्थापित किया गया है, किन्तु वह अहंकार जिसके साथ उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाया था उस पर काबू पाना स्वयं उनके लिए भी कठिन था। प्रभु यीशु के लिए उनकी उन्मत्त ऊर्जा ने स्वयं उनकी खतरनाक महत्वाकांक्षाओं और उनके दुष्ट शैतानी चेहरे, और साथ ही परमेश्वर का विरोध करने के उनके द्वेषपूर्ण स्वभाव को भी उजागर कर दिया था। ये बातें जो उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाते हुए कही थीं वे उनकी खतरनाक महत्वाकांक्षाओं, ईर्ष्या, और परमेश्वर तथा सच्चाई के प्रति उनकी शत्रुता के कुरूप और द्वेषपूर्ण स्वभाव से प्रेरित थीं। उन्होंने प्रभु यीशु के कार्यों के स्रोत की खोज नहीं की, और ना ही उन्होंने जो कुछ उसने कहा या किया था उसके सार की खोज की। परन्तु जो कुछ उसने किया था उस पर उन्होंने बिना देखे, अधीरता से, सनक और जानबूझकर किए गए द्वेष के साथ आक्रमण किया और उसे बदनाम किया। यह यहाँ तक कि उसके आत्मा, अर्थात् पवित्र आत्मा, परमेश्वर के आत्मा को विवेकहीन तरीके से बदनाम करने की हद तक था। यही उनका मतलब था जब उन्होंने कहा था "उसका चित ठिकाने नहीं है," "बालज़बूल" और "दुष्टात्माओं का सरदार।" अर्थात्, उन्होंने कहा कि परमेश्वर का आत्मा बालज़बूल और दुष्टात्माओं का सरदार है। उन्होंने उस देह के कार्य को जिसे परमेश्वर के आत्मा ने पहना हुआ था पागलपन कहा। उन्होंने ना केवल बालज़बूल और दुष्टात्माओं का सरदार कहकर परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की, बल्कि उन्होंने परमेश्वर के कार्य की भी निंदा की। उन्होंने प्रभु यीशु मसीह पर दोष लगाया और उसकी ईशनिंदा की। उनके प्रतिरोध का सार और परमेश्वर की ईशनिंदा पूरी तरह से शैतान के सार और परमेश्वर के प्रति दुष्टात्मा के प्रतिरोध और परमेश्वर की निंदा के समान था। वे न केवल भ्रष्ट मनुष्यों को दर्शाते थे, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा वे शैतान के मूर्त रूप थे। वे मनुष्यजाति के बीच शैतान के लिए एक माध्यम थे, और वे शैतान के सहअपराधी और सन्देशवाहक थे। उनकी ईशनिंदा का सार और उनके द्वारा प्रभु यीशु मसीह की अवमानना हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ उनका संघर्ष, परमेश्वर के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा, परमेश्वर की परीक्षा लेने की उनकी कभी न खत्म होने वाली इच्छा थी। परमेश्वर के उनके प्रतिरोध का सार और उसके प्रति उनकी शत्रुता का रवैया, और साथ ही उनके वचनों और उनके विचारों ने सीधे-सीधे परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की और उसे क्रोधित किया। इसलिए, जो कुछ उन्होंने कहा और किया था उसके लिए परमेश्वर ने एक उचित दण्ड का निर्धारण किया, और उनके कर्मों को पवित्र आत्मा के विरूद्ध पाप के रूप में निर्धारित किया। यह पाप इस संसार और आने वाले संसार में, दोनों में अक्षम्य है, बिल्कुल वैसे ही जैसा कि पवित्रशास्त्र का निम्नलिखित अंश कहता हैः "मनुष्य द्वारा की गई पवित्र आत्मा की निंदा क्षमा न की जाएगी" और "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" आज, आओ हम परमेश्वर के इन वचनों के सच्चे अर्थ के बारे में बातें करें "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" यह इस बात का रहस्य खोलना है कि परमेश्वर किस प्रकार वचनों को पूरा करता है "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।"

प्रत्येक चीज़ जिसके बारे में हम बात कर चुके हैं वह परमेश्वर के स्वभाव, और लोगों, मामलों, और चीज़ों के प्रति उसके रवैया से संबंधित है। स्वाभाविक रूप से, ऊपर दिए गए दोनों अंश अपवाद नहीं हैं। क्या तुम लोगों ने पवित्रशास्त्र के इन दोनों अंशों में किसी चीज़ पर ध्यान दिया? कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के क्रोध को देखते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के स्वभाव के उस पक्ष को देखते हैं जो मनुष्यजाति से अपमान को सहन नहीं कर सकता है, और यह कि यदि लोग ऐसा कुछ करते हैं जिससे परमेश्वर की ईशनिंदा होती है, तो वे उसकी क्षमा को प्राप्त नहीं करेंगे। इस तथ्य के बावजूद कि लोग इन दोनों अंशों में परमेश्वर के क्रोध और उसकी असहिष्णुता को देखते और महसूस करते हैं, तब भी उसका रवैया सचमुच में उनकी समझ में नहीं आता है। ये दोनों अंश उन लोगों के प्रति परमेश्वर के सच्‍चे रवैये और दृष्टिकोण के निहितार्थ से युक्त हैं जो उसकी ईशनिंदा और उसे क्रोधित करते हैं। पवित्रशास्त्र का यह अंश उसके रवैये और दृष्टिकोण के सच्चे अर्थ को धारण करता हैः "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" जब लोग परमेश्वर की ईशनिंदा करते हैं, जब वे उसे क्रोधित करते, तो वह एक निर्णय जारी करता है, और यह निर्णय उसका अंतिम परिणाम होता है। यह बाइबल मे इस प्रकार से वर्णित हैः "इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी" (मत्ती 12:31), और "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय!" (मत्ती 23:13)। हालाँकि, यह बाइबल में दर्ज है कि उन शास्त्रियों और फरीसियों का, और साथ ही उन लोगों का क्या परिणाम हुआ था जिन्होंने प्रभु यीशु के द्वारा इन बातों को कहे जाने के बाद कहा था कि वह पागल है? क्या यह दर्ज है कि उन्होंने किसी प्रकार का दण्ड सहा था या नहीं? यह निश्चित है कि यह दर्ज नहीं था। यहाँ यह कहना कि "दर्ज नहीं था" क्या यह कहना नहीं है कि इसे दर्ज नहीं किया गया था, बल्कि वास्तव मे वहाँ कोई परिणाम नहीं था जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता था। यह "दर्ज नहीं था" एक मसले को स्पष्ट करता है, अर्थात् कुछ चीज़ों को सँभालने के लिए परमेश्वर की रवैया और सिद्धांत। परमेश्वर का उन लोगों के साथ व्यवहार जो उसकी निंदा करते हैं या उसका प्रतिरोध करते हैं उन लोगों के साथ भी उसका व्यवहार जो उसे बदनाम करते हैं—जो लोग जानबूझकर उस पर हमला करते हैं, उसे बदनाम करते हैं, और उसे कोसते हैं—वह उनकी ओर आँख या कान बंद नहीं करता है। उनके प्रति उसका एक स्पष्ट रवैया होता है। वह इन लोगों से घृणा करता है, अपने हृदय में उनकी निन्दा करता है। यहाँ तक कि उनके परिणाम की खुल कर घोषणा भी करता है, ताकि लोग जानें कि जो उसकी निंदा करते हैं उनके प्रति उसका एक स्पष्ट रवैया है, और ताकि वे जानें कि वह उनका कैसा परिणाम निर्धारित करता है। हालाँकि, परमेश्वर के इन बातों को कहने के बाद, अभी भी लोग शायद ही उस सच्चाई को देख सकते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार ऐसे लोगों को सँभालेगा, और वे परमेश्वर के परिणामों के पीछे के सिद्धांतों, उनके लिए उसके निर्णय को नहीं समझ सकते हैं। अर्थात्, मनुष्यजाति उस विशेष रवैये और पद्धतियों को नहीं देख नहीं सकती है जो उन्हें सँभालने के लिए परमेश्वर के पास है। इसका चीज़ों को करने के परमेश्वर के सिद्धांतों से संबंध है। कुछ लोगों के दुष्ट व्यवहार से निपटने के लिए परमेश्वर तथ्यों के आगमन का उपयोग करता है। अर्थात्, वह उनके पाप की घोषणा नहीं करता है और उनके परिणाम निर्धारित नहीं करता है, बल्कि उन्हें दण्डित किए जाने, और उनका उचित प्रतिफल प्राप्त करने की अनुमति देने के लिए वह प्रत्यक्ष रूप से तथ्यों के आगमन का उपयोग करता है। जब ये तथ्य घटित होते हैं, तो लोगों की देह कष्ट भुगतती है; यह सब कुछ ऐसा है जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता है। कुछ लोगों के दुष्ट व्यवहार से निपटते समय, परमेश्वर बस वचनों से शाप देता है, परन्तु साथ ही, परमेश्वर का क्रोध उनके ऊपर पड़ता है, और वह दण्ड जिसे वे प्राप्त करते हैं वह कुछ ऐसा हो सकता है जिसे लोग देख नहीं सकते हैं, परन्तु इस प्रकार का परिणाम उन परिणामों से कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकता है जिसे लोग देख सकते हैं कि उन्हें दण्डित किया या मारा जा रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उस परिस्थिति के अन्तर्गत जिसमें परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि इस प्रकार के व्यक्तियों को बचाना नहीं है, और उन पर अब और कोई दया और सहिष्णुता नहीं दिखानी है, उन्हें कोई अवसर अब और नहीं देने हैं, उनके लिए उसका रवैया उन्हें अलग कर देने की होता है। "अलग कर देने" का अर्थ क्या है? अपने आप में इस शब्दावली का अर्थ है किसी चीज़ को एक ओर रखना, इस पर अब और कोई ध्यान नहीं देना। यहाँ, जब परमेश्वर "अलग कर देता है" तो इसके अर्थ की दो भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ होती हैं: पहली व्याख्या है कि उसने उस व्यक्ति के जीवन, और उस व्यक्ति की हर चीज़ को शैतान को दे दिया है ताकि वह उसके साथ निपटे। परमेश्वर अब ओर उत्तरदायी नहीं होगा तथा अब और उसका प्रबन्धन नहीं करेगा। चाहे वे व्यक्ति पागल या मूर्ख हो जाएँ, और चाहे जीवित रहें या मर जाएँ, या भले ही वे अपने दण्ड के लिए नरक में उतर जाएँ, इससे परमेश्वर का कोई लेन-देना नहीं होगा। इसका मतलब होगा कि उस प्राणी का परमेश्वर के साथ कोई संबंध नहीं होगा। दूसरी व्याख्या है कि परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि वह स्वयं इस व्यक्ति के साथ, अपने हाथों से, कुछ करना चाहता है। यह संभव है कि वह इस प्रकार के व्यक्ति की सेवा का उपयोग करेगा, या यह कि वह इस व्यक्ति को एक विषम तुलना के रूप में उपयोग करेगा। यह संभव है कि इस प्रकार के व्यक्ति से निपटने के लिए परमेश्वर के पास एक विशेष तरीका होगा, उसके साथ व्यवहार करने का एक विशेष तरीका होगा—बिल्कुल पौलुस के समान। यह परमेश्वर के हृदय का सिद्धांत और उसका रवैया है कि उसने इस प्रकार के व्यक्ति से किस तरह निपटना निर्धारित किया है। इसलिए जब लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, और उसे बदनाम करते हैं और उसकी ईशनिंदा करते हैं, तो यदि वे उसके स्वभाव को भड़काते हैं, या यदि वे परमेश्वर की सहनशीलता की सीमा तक पहुँच जाते हैं, तो परिणाम अकल्पनीय होते हैं। सबसे कठोर परिणाम यह होता है कि परमेश्वर हमेशा के लिए उनकी ज़िन्दगियों और उनकी हर चीज़ को शैतान को सौंप देता है। वे पूरी अनंतता तक क्षमा नहीं किए जाएँगे। इसका अर्थ है कि ऐसे व्यक्ति शैतान के मुँह का निवाला, और उसके हाथ का खिलौना बन चुके हैं, और उस समय के बाद से परमेश्वर का उनके साथ कुछ लेना-देना नहीं है। क्या तुम लोग कल्पना कर सकते हो कि जब शैतान ने अय्यूब को प्रलोभित किया था तो यह किस प्रकार की दुर्गति थी? इस शर्त के अधीन जिसमें शैतान को अय्यूब के जीवन को नुकसान पहुँचाने की अनुमति नहीं थी, अय्यूब ने तब भी बड़ी कठिन पीड़ा सही थी। और क्या शैतान के उन विध्वंसों की कल्पना करना और भी अधिक कठिन नहीं है जिसके अधीन किसी व्यक्ति को कर दिया जाएगा, जिसे पूर्णत: शैतान को सौंपा जा चुका है, जो पूर्णत: शैतान के चंगुल में है, जिसने परमेश्वर की देखरेख और करुणा को पूर्णत: गँवा दिया है, जो सृजनकर्ता के शासन के अधीन अब और नहीं है, जिससे परमेश्वर की आराधना करने का अधिकार, और परमेश्वर के शासन के अधीन एक प्राणी होने का अधिकार छीना जा चुका है, जिसका रिश्ता सृष्टि के प्रभु के साथ पूर्णत: विच्छेद कर दिया गया है? शैतान के द्वारा अय्यूब की प्रताड़ना कुछ ऐसी ही थी जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता था, परन्तु यदि परमेश्वर किसी व्यक्ति के जीवन को शैतान को सौंप देता है, तो इसका परिणाम कुछ ऐसा होगा जिसके बारे में कोई कल्पना नहीं कर सकता है। यह बस कुछ लोगों का एक गाय, या एक गधे के रूप में फिर से जन्म लेने, या कुछ लोगों पर अशुद्ध, दुष्ट आत्माओं के द्वारा कब्जा कर लिए जाने, इत्यादि के समान है। यह कुछ लोगों का परिणाम, अन्त है जिन्हें परमेश्वर के द्वारा शैतान को सौंपा जाता है। बाहरी तौर पर, ऐसा दिखाई देता है जैसे कि जिन लोगों ने प्रभु यीशु का उपहास किया था, उसे बदनाम किया था, उसकी निंदा की थी, और उसकी ईशनिन्दा की थी, उन्होंने कोई परिणाम नहीं भुगता। हालाँकि, सच्चाई यह है कि हर एक चीज़ से निपटने की परमेश्वर का एक रवैया है। परमेश्वर जिस प्रकार हर तरह के लोगों से निपटता है उसके परिणाम को लोगों को बताने के लिए हो सकता है कि वह स्पष्ट भाषा का उपयोग न करे। कभी-कभी वह प्रत्यक्ष रूप से बात नहीं करता है, परन्तु वह चीज़ों को प्रत्यक्ष रूप से करता है। यह कि वह इसके बारे में बात नहीं करता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि इसका कोई परिणाम नहीं है—यह संभव है कि परिणाम बहुत ही ज़्यादा गंभीर हो। प्रकट रूप से देखने से, ऐसा लगता है कि परमेश्वर अपने रवैये को प्रकट करने के लिए कुछ लोगों से बात नहीं करता है; वस्तुतः परमेश्वर लम्बे समय तक उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहा है। वह उनको अब और देखना नहीं चाहता है। उनके द्वारा की गई चीज़ों, उनके व्यवहार की वजह से, और उनकी प्रकृति और उनके सार की वजह से, परमेश्वर केवल इतना चाहता है कि वे उसकी नज़रों से ओझल हो जाएँ, उन्हें सीधे शैतान को सौंप देना चाहता है, उनकी आत्मा, प्राण, और शरीर को शैतान को देना चाहता है, शैतान को जो चाहे वह करने देना चाहता है। यह स्पष्ट है कि परमेश्वर किस हद तक उनसे नफ़रत करता है, वह किस हद तक उनसे उकता गया है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को इस हद तक क्रोधित कर देता है कि परमेश्वर उन्हें दुबारा देखना भी नहीं चाहता, कि वह उन्हें पूर्णत: छोड़ देगा, उस हद तक क्रोधित कर देता है कि परमेश्वर स्वयं उनसे निपटना भी नहीं चाहता है—यदि यह उस स्थिति तक पहुँच जाता है कि वह इसके लिए उसे शैतान को सौंप देगा ताकि वह जैसा चाहे वैसा करे, और वह शैतान को उस पर नियंत्रण करने, उसे भस्म करने, और जैसा चाहे वैसा व्यवहार करने देगा—तो ऐसा व्यक्ति पूर्णत: समाप्त हो जाता है। मनुष्य होने का उसका अधिकार स्थायी रूप से रद्द कर दिया गया है, और एक प्राणी के रूप में उसका अधिकार समाप्त हो गया है। क्या यह सर्वाधिक गंभीर परिणाम नहीं है?

उपरोक्त सभी इन वचनों की पूर्ण व्याख्या हैः "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा," और यह पवित्रशास्त्र के इन अंशों पर एक सरल समीक्षा भी है। मुझे लगता है कि अब तुम लोगों के पास इन बातों की समझ है!

अब आओ हम नीचे दिए पवित्रशास्त्र के अंशों को पढ़ें।

12. अपने पुनरूत्थान के बाद अपने चेलों के लिए यीशु के वचन

यूहन्ना 20:26-29 आठ दिन के बाद उसके चेले फिर घर के भीतर थे, और थोमा उनके साथ था; और द्वार बन्द थे, तब यीशु आया और उनके बीच में खड़े होकर कहा, "तुम्हें शान्ति मिले।" तब उसने थोमा से कहा, "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्‍वासी नहीं परन्तु विश्‍वासी हो।" यह सुन थोमा ने उत्तर दिया, "हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्‍वर!" यीशु ने उससे कहा, "तू ने मुझे देखा है, क्या इसलिये विश्‍वास किया है? धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्‍वास किया।"

यूहन्ना 21:16-17 उसने फिर दूसरी बार उससे कहा, "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" उसने उससे कहा, "हाँ, प्रभु; तू जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।" उसने उससे कहा, "मेरी भेड़ों की रखवाली कर।" उसने तीसरी बार उससे कहा, "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?" पतरस उदास हुआ कि उसने उससे तीसरी बार ऐसा कहा, "क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?" और उससे कहा, "हे प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है; तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।" यीशु ने उससे कहा, "मेरी भेड़ों को चरा।"

ये अंश जो बताते हैं वे कुछ ऐसी चीज़ें हैं जो प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद की थीं और अपने चेलों से कही थीं। पहले, आओ हम पुनरूत्थान से पहले के और बाद के प्रभु यीशु के बीच किसी भी भिन्नता पर एक नज़र डालें। क्या वह अभी भी अतीत के दिनों के प्रभु यीशु के समान ही था? पवित्रशास्त्र में पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु का वर्णन करने वाली निम्नलिखित पंक्ति हैः "और द्वार बन्द थे, तब यीशु आया और उनके बीच में खड़े होकर कहा, 'तुम्हें शान्ति मिले।'" इससे बिल्कुल स्पष्ट है कि उस समय प्रभु यीशु देह में अब और नहीं था, बल्कि एक आध्यात्मिक देह था। ऐसा इसलिए था क्योंकि वह देह की सीमाओं से पार चला गया था, और जब द्वार बन्द था तब भी वह लोगों के बीच में भीतर आ सकता था और उन्हें अपने आपको देखने दे सकता था। यह पुनरूत्थान के बाद के प्रभु यीशु और पुनरूत्थान के पहले के देह में रहने वाले प्रभु यीशु के बीच सबसे बड़ा अन्तर है। यद्यपि उस समय की आध्यात्मिक देह के रूप-रंग और उससे पहले के प्रभु यीशु के रूप-रंग के बीच में कोई अंतर नहीं था, फिर भी उस पल यीशु एक ऐसा यीशु बन गया था जो लोगों को एक अजनबी के समान लगता था, क्योंकि मृतक से जी उठने के बाद वह एक आध्यात्मिक देह बन गया था, और उसकी पिछली देह की तुलना में, यह आध्यात्मिक देह लोगों के लिए कहीं ज़्यादा रहस्यमय और भ्रमित करने वाला था। इसने प्रभु यीशु और लोगों के बीच की दूरियों को और अधिक बढ़ा दिया, और लोगों ने अपने हृदयों में महसूस किया कि उस समय प्रभु यीशु कहीं ज़्यादा रहस्यमयी बन गया था। लोगों की ऐसी समझ और भावनाओं ने उन्हें अचानक परमेश्वर पर विश्वास करने के एक ऐसे युग में पहुँचा दिया जिसे देखा और छुआ नहीं जा सकता था। इसलिए, वह पहली चीज़ जो प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद की वह थी कि उसने इस बात की पुष्टि करने के लिए कि वह अस्तित्व में है, और अपने पुनरूत्थान को साबित करने के लिए हर एक को उसे देखने दिया था। इसके अतिरिक्त, उसने लोगों के साथ अपने रिश्ते को फिर से उस रिश्ते के साथ पुनर्स्थापित किया जैसा उसका उनके साथ तब था जब वह देह में कार्य कर रहा था, और वह उनका मसीह था जिसे वे देख और छू सकते थे। इस तरह, एक परिणाम यह हुआ कि लोगों को सन्देह नहीं रहा कि प्रभु यीशु को क्रूस पर कीलों से ठोंके जाने के बाद उसका मृत्यु से पुनरूत्‍थान हुआ था, और मनुष्य-जाति को छुड़ाने के प्रभु यीशु के कार्य में कोई सन्देह नहीं रहा था। और दूसरा परिणाम यह हुआ कि पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु का लोगों के सामने प्रकट होने और लोगों को उसे देखने और छूने देने के तथ्य ने मनुष्यजाति को अनुग्रह के युग में दृढ़ता से सुरक्षित किया। इस समय के बाद से, प्रभु यीशु के "अन्तर्धान" या "छोड़कर चले जाने" की वजह से, लोग पिछले युग, व्यवस्था के युग, में नहीं लौट सकते थे, लेकिन वे प्रभु यीशु की शिक्षाओं और उसके द्वारा किए गए कार्य का अनुसरण करके लगातार आगे बढ़ना जारी रख सकते थे। इस प्रकार, अनुग्रह के युग के कार्य में औपचारिक रूप से एक नये चरण का मार्ग प्रशस्त हो चुका था, और जो लोग व्यवस्था के अधीन रहे थे वे उसके बाद औपचारिक रूप से व्यवस्था से बाहर आ गए, और उन्होंने एक नए युग में, एक नई शुरूआत के साथ प्रवेश किया। पुनरूत्थान के बाद मनुष्यजाति के सामने प्रभु यीशु के प्रकट होने के ये बहुआयामी अर्थ हैं।

चूँकि वह एक आध्यात्मिक देह था, तो लोग उसे कैसे छू, और देख सकते थे? इसका मनुष्यजाति के सामने प्रभु यीशु के प्रकटन के महत्व से संबंध है। क्या तुम लोगों ने पवित्रशास्त्र के इन अंशों में किसी चीज़ पर ध्यान दिया? सामान्यतः आध्यात्मिक देहों को देखा या छुआ नहीं जा सकता है, और पुनरूत्थान के बाद जो कार्य प्रभु यीशु ने सँभाला था वह पहले ही पूर्ण हो चुका था। तो सैद्धांतिक रूप से, उसे लोगों के बीच उनसे मिलने के लिए अपनी मूल छवि में वापस आने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं थी, बल्कि थोमा जैसे लोगों के सामने प्रभु यीशु की आध्यात्मिक देह के प्रकटन ने उसके महत्व को और भी ज़्यादा दृढ़ कर दिया, और यह लोगों के हृदयों में अधिक गहराई तक घुस गई। जब वह थोमा के पास आया, तो उसने सन्देह करने वाले थोमा को अपने हाथों को छूने दिया, और उससे कहाः "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्‍वासी नहीं परन्तु विश्‍वासी हो।" ये वचन, और ये कार्यकलाप ऐसी चीज़ें नहीं थीं जिन्हें प्रभु यीशु केवल अपने पुनरूत्थान के बाद कहना या करना चाहता था, बल्कि ये वे चीज़ें थीं जिन्हें वह क्रूस पर कीलों से ठोके जाने से पहले करना चाहता था। यह स्पष्ट है कि जब प्रभु यीशु को क्रूस पर कीलों से ठोका भी नहीं गया था तब से उसे थोमा जैसे लोगों की पहले से ही समझ थी। तो हम इससे क्या देख सकते हैं? अपने पुनरूत्थान के बाद भी वह वही प्रभु यीशु था। उसका सार नहीं बदला था। थोमा के सन्देह अभी-अभी शुरू नहीं हुए थे बल्कि जब से वह प्रभु यीशु का अनुसरण कर रहा था तब से हर समय उसके साथ थे, परन्तु यह प्रभु यीशु था जो मृत से जी उठा था और आध्यात्मिक संसार से अपनी मूल छवि के साथ, अपने मूल स्वभाव के साथ, और अपने देह में रहने के अपने समय से मनुष्यजाति की अपनी समझ के साथ लौट चुका था, इसलिए प्रभु यीशु थोमा से अपने पंजर पर हाथ रखवाने, पुनरूत्थान के बाद न केवल उसे अपनी आध्यात्मिक देह दिखाने, बल्कि अपनी आध्यात्मिक देह के अस्तित्व को स्पर्श और महसूस कराने, और उसके सन्देहों को पूर्णत: हटाने के लिए पहले उसे ढूँढ़ने गया। प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ाए जाने से पहले, थोमा ने हमेशा सन्देह किया था कि वह मसीह है कि नहीं, और उस पर विश्वास नहीं कर सका था। जो कुछ वह अपनी आँखों से देख सका था, जो कुछ वह अपने हाथों से छू सका था केवल उसके आधार पर ही परमेश्वर के प्रति उसका विश्वास स्थापित हुआ था। इस प्रकार के व्यक्ति के विश्वास के बारे में प्रभु यीशु के पास एक अच्छी समझ थी। वे मात्र स्वर्गिक परमेश्वर पर विश्वास करते थे, और जिसे परमेश्वर ने भेजा है, या मसीह जो देह में है उस पर बिलकुल भी विश्वास नहीं करते थे, और उसे स्वीकार करना नहीं चाहते थे। उसे प्रभु यीशु के अस्तित्व को और यह कि वही सचमुच में देहधारी परमेश्वर है इस बात को स्वीकार कराने और विश्वास दिलाने के लिए, उसने थोमा को अपना हाथ बढ़ा कर अपने पंजर को छूने दिया। क्या प्रभु यीशु के पुनरूत्थान के पहले और बाद में थोमा के सन्देह करने में कुछ अंतर था? वह हमेशा सन्देह करता था, और उसके सामने प्रभु यीशु के आध्यात्मिक देह के व्यक्तिगत रूप से प्रकट होने और अपनी देह में कीलों के निशानों को थोमा को छूने देने के अलावा, कोई भी उसके सन्देहों का समाधान नहीं कर सकता था, और कोई उन्हें उससे नहीं छुड़वा सकता था। इसलिए उस समय से जब प्रभु यीशु ने उसे अपने पंजर को छूने दिया और उसे कीलों के निशानों की मौज़ूदगी को वास्तव में महसूस कराया, थोमा के सन्देह गायब हो गए, और उसने सचमुच में जाना कि प्रभु यीशु मृत से जी उठा है और उसने स्वीकार किया और विश्वास किया कि प्रभु यीशु ही सच्चा मसीह है, और यह कि वह देहधारी परमेश्वर है। यद्यपि इस समय थोमा ने अब और सन्देह नहीं किया, फिर भी उसने मसीह से मिलने का अवसर हमेशा के लिए गँवा दिया था। उसने उसके साथ इकट्ठे होने का, उसका अनुसरण करने का, और उसे जानने का अवसर हमेशा के लिए गँवा दिया था। उसने प्रभु यीशु के द्वारा उसे सिद्ध बनाए जाने का अवसर गँवा दिया था। प्रभु यीशु के प्रकटन और उसके वचनों ने उन लोगों के विश्वास पर एक निष्कर्ष, और एक निर्णय प्रदान किया जो सन्देहों से भरे हुए थे। उसने सन्देह करने वालों को बताने के लिए, उन लोगों को बताने के लिए जो केवल स्वर्गिक परमेश्वर पर विश्वास करते थे किन्तु मसीह पर विश्वास नहीं करते थे, अपने मूल वचनों और कार्यों का उपयोग किया: परमेश्वर ने उनके विश्वास की प्रशंसा नहीं की, न ही उसने उनके अनुसरण की प्रशंसा की जो सन्देहों से भरा हुए थे। जिस दिन उन्होंने परमेश्वर और मसीह पर पूर्णत: विश्वास किया था केवल यही वह दिन हो सकता था कि परमेश्वर ने अपने महान कार्य को पूर्ण किया था। निस्संदेह, यही वह दिन भी था कि उनके सन्देहों ने एक निर्णय प्राप्त किया था। मसीह के प्रति उनके रवैये ने उनके भाग्य का निर्धारण किया था, उनके ढीठ सन्देह का अभिप्राय था कि उनके विश्वास से उन्हें कोई परिणाम प्राप्त नहीं हुआ था, और उनकी कठोरता का अभिप्राय था कि उनकी आशाएँ व्यर्थ थीं। क्योंकि स्वर्गिक परमेश्वर पर उनका विश्वास भ्रान्तियों पर पला था, और मसीह के प्रति उनका सन्देह वास्तव में परमेश्वर के प्रति उनका वास्तविक रवैया था, इसलिए भले ही उन्होंने प्रभु यीशु की देह के कीलों के निशानों को छुआ था, फिर भी उनका विश्वास बेकार ही था और उनके परिणाम को हवा में घूँसेबाजी करने—व्यर्थ—के रूप में दर्शाया जा सकता था। जो कुछ प्रभु यीशु ने थोमा से कहा वह हर एक व्यक्ति को भी स्पष्ट रूप से कह गया थाः पुनरूत्थित प्रभु यीशु ही वह प्रभु यीशु है जिसने आरम्भ में साढ़े तैंतीस वर्ष मनुष्यजाति के बीच काम करते हुए बिताए थे। यद्यपि उसे क्रूस पर कीलों से जड़ दिया गया था और उसने मृत्यु की छाया की घाटी का अनुभव किया था, और उसने पुनरूत्थान का अनुभव किया था, फिर भी उसके हर एक पहलू में कोई बदलाव नहीं हुआ था। यद्यपि अब उसके शरीर में कीलों के निशान थे, और यद्यपि वह पुनरूत्थित हो चुका था और क़ब्र से बाहर आ गया था, फिर भी उसका स्वभाव, मनुष्यजाति की उसकी समझ, और मनुष्यजाति के प्रति उसका इरादा थोड़ा सा भी नहीं बदला था। साथ ही, वह लोगों से कह रहा था कि वह क्रूस से नीचे आ गया है, उसने पाप पर विजय पाई है, कठिनाईयों पर विजय पाई है, और मुत्यु पर विजय पाई है। कीलों के निशान शैतान पर उसके विजय के प्रमाण मात्र थे, संपूर्ण मनुष्यजाति को सफलतापूर्वक छुड़ाने के लिए एक पाप बलि होने का प्रमाण थे। वह लोगों से कह रहा था कि उसने पहले से ही मनुष्यजाति के पापों को ग्रहण कर लिया है और उसने छुटकारे के अपने कार्य को पूर्ण कर लिया है। जब वह अपने चेलों को देखने के लिए लौटा, तो उसने अपने प्रकटन के साथ उनसे कहाः "मैं अभी भी जीवित हूँ, मैं अभी भी अस्तित्व में हूँ; आज मैं सचमुच में तुम लोगों के सामने खड़ा हूँ ताकि तुम लोग मुझे देख और छू सको। मैं हमेशा तुम लोगों के साथ रहूँगा।" प्रभु यीशु भविष्य के लोगों को चेतावनी देने के लिए भी थोमा के उदाहरण का उपयोग करना चाहता था: यद्यपि तुम प्रभु यीशु में विश्वास करते हो, फिर भी तुम उसे न तो देख सकते हो और न ही छू सकते हो, तब भी तुम अपने सच्चे विश्वास के द्वारा धन्य किए जा सकते हो, और तुम अपने सच्चे विश्वास के माध्यम से प्रभु यीशु को देख सकते हो: इस प्रकार का व्यक्ति धन्य है।

बाइबल में दर्ज ये वचन जिन्हें प्रभु यीशु ने तब कहा था जब वह थोमा के सामने प्रकट हुआ था अनुग्रह के युग में सभी लोगों के लिए एक बड़ी सहायता हैं। थोमा के सामने उसका प्रकटन और उसके वचनों का भविष्य की पीढ़ियों के ऊपर एक गहरा प्रभाव पड़ा है, और उनका सर्वकालिक महत्व है। थोमा उस प्रकार के व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है जो परमेश्वर पर विश्वास तो करते हैं मगर उस पर सन्देह भी करते हैं। वे शंकालु प्रकृति के होते हैं, उनका कुटिल हृदय होता है, वे विश्वासघाती होते हैं, और उन चीज़ों पर विश्वास नहीं करते हैं जिन्हें परमेश्वर पूर्ण कर सकता है। वे परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और उसके शासन पर विश्वास नहीं करते हैं, और वे देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं। हालाँकि, प्रभु यीशु का पुनरूत्थान उनके चेहरों पर एक तमाचा था, और इसने उन्हें अपने स्वयं के सन्देह की खोज करने, अपने सन्देह को पहचानने, और अपने स्वयं के विश्वासघात को स्वीकार करने, फलस्वरूप प्रभु यीशु के अस्तित्व और पुनरूत्थान पर सचमुच विश्वास करने का, एक अवसर भी प्रदान किया था। थोमा के साथ जो कुछ हुआ था वह बाद की पीढ़ियों के लिए एक चेतावनी और सावधानी थी ताकि अधिक-से-अधिक लोग अपने आपको सावधान कर सकें कि वे थोमा के समान सन्देह ना करें, और यदि वे सन्देह करेंगे, तो वे अंधकार में डूब जाएँगे। यदि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, किन्तु बिल्कुल थोमा के समान, यह पुष्टि करने, सत्यापित करने, और यह अंदाज़ा लगाने के लिए कि परमेश्वर का अस्तित्व है कि नहीं, तुम हमेशा प्रभु के पंजर को छूना और उसके कीलों के निशानों को महसूस करना चाहते हो, तो परमेश्वर तुम्हें छोड़ देगा। इसलिए, प्रभु यीशु लोगों से अपेक्षा करता है कि वे थोमा के समान न बनें, जो केवल उसी बात पर विश्वास करते हैं जिसे वे अपनी आँखों से देख सकते हैं, बल्कि एक शुद्ध, और ईमानदार इंसान बनें, परमेश्वर के प्रति सन्देहों को आश्रय न दें, बल्कि केवल उस पर विश्वास करें और उसका अनुसरण करें। इस प्रकार का व्यक्ति धन्य है। यह लोगों से प्रभु यीशु की एक छोटी सी अपेक्षा है, और यह उसके अनुयायियों के लिए एक चेतावनी है।

जो लोग सन्देहों से भरे हुए हैं उनके प्रति यह प्रभु यीशु का रवैया है। अतः प्रभु यीशु ने उन्हें क्या कहा, और उनके लिए क्या किया जो उस पर ईमानदारी से विश्वास करने और उसका अनुसरण करने में समर्थ हैं? इसके बाद हम, जो कुछ प्रभु यीशु ने पतरस से कहा कुछ उस पर विचार करने जा रहे हैं।

इस वार्तालाप में, प्रभु यीशु ने लगातार पतरस से एक बात पूछीः "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" यह वह उच्चतर मानक है जिसकी प्रभु यीशु अपने पुनरूत्थान के बाद पतरस के समान लोगों से अपेक्षा करता है, जो सचमुच में मसीह पर विश्वास करते हैं और प्रभु से प्रेम करने का प्रयत्न करते हैं। यह प्रश्न एक प्रकार की खोजबीन थी, एक प्रकार की पूछताछ थी, परन्तु इससे भी अधिक, यह पतरस के समान लोगों से एक माँग और एक अपेक्षा थी। उसने प्रश्न पूछने के इस तरीके का उपयोग किया ताकि लोग स्वयं पर विचार करें और स्वयं के भीतर झाँकें: लोगों से प्रभु यीशु की अपेक्षाएँ क्या हैं? क्या मैं प्रभु से प्रेम करता हूँ? क्या मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जो प्रभु से प्रेम करता है? कैसे मुझे प्रभु से प्रेम करना चाहिए? भले ही प्रभु यीशु ने यह प्रश्न केवल पतरस से पूछा था, परन्तु सत्‍य यह है कि अपने हृदय में, वह पतरस से पूछने के इस अवसर का लाभ उठाना चाहता था ताकि पतरस अधिक से अधिक लोगों से इस प्रकार का प्रश्न पूछे जो परमेश्वर से प्रेम करने की खोज करते हैं। यह सिर्फ इतना ही है कि पतरस इस प्रकार के व्यक्ति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने, प्रभु यीशु के स्वयं के मुँह से प्रश्न को प्राप्त करने के लिए आशीषित था।

"अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्‍वासी नहीं परन्तु विश्‍वासी हो," की तुलना में, प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद थोमा से जो कहा था, उसका पतरस से तीन बार प्रश्न पूछना: "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" लोगों को प्रभु यीशु के रवैये की कठोरता, और उस अत्यावश्यकता को बेहतर ढंग से महसूस करने देता है जो उसने प्रश्न पूछने के समय महसूस की थी। जहाँ तक धोखेबाज प्रकृति वाले सन्देह करने वाले थोमा की बात है, प्रभु यीशु ने उसे उसका हाथ बढ़ाने और अपनी कीलों के निशान को छूने दिया, जिसने उसे विश्वास दिलाया कि प्रभु यीशु ही मनुष्य का पुत्र है जो पुनरूत्थित हुआ है और उसने मसीह के रूप में प्रभु यीशु की पहचान को स्वीकार किया। और यद्यपि प्रभु यीशु ने थोमा को सख्ती से नहीं डाँटा था, न ही उसने मौखिक रूप से उसके बारे में स्पष्ट रूप से कोई न्याय व्यक्त किया था, फिर भी उसने उसे जानने दिया कि वह उसे व्यावहारिक कार्यकलापों के माध्यम से समझ चुका था, जब वह उस प्रकार के व्यक्ति के प्रति अपने रवैये और निर्धारण को प्रदर्शित कर रहा था। इस प्रकार के व्यक्ति से प्रभु यीशु की माँगों और अपेक्षाओं को जो कुछ उसने कहा था उसके आधार पर देखा नहीं जा सकता है। क्योंकि थोमा जैसे लोगों के पास महज़ सच्चे विश्वास की डोर नहीं होती है। उनके लिए प्रभु यीशु की माँगें केवल इसी में थीं, लेकिन वह रवैया जो उसने पतरस जैसे लोगों के लिए प्रकट किया वह बिल्कुल भिन्न था। उसने यह माँग नहीं की थी कि पतरस अपना हाथ बढ़ाए और उसके कीलों के निशानों को छुए, न ही उसने पतरस से कहा: "अविश्वासी नहीं परन्तु, विश्वासी हो।" उसके बजाए, उसने लगातार पतरस से वही प्रश्न पूछा। यह विचारोत्तेजक, अर्थपूर्ण प्रश्न था जो मसीह के प्रत्येक अनुयायी को ग्लानि, और भय महसूस कराने, बल्कि प्रभु यीशु की चिन्ता, दुःखित मनोदशा को भी महसूस कराने के अलावा कोई सहायता नहीं कर सकता है। और जब वे अत्यधिक पीड़ा और कष्ट में होते हैं, तब वे प्रभु यीशु की चिन्ता और उसकी देखरेख को और अधिक समझ पाते है; वे शुद्ध, और ईमानदार लोगों से उसकी ईमानदार शिक्षाओं और सख्त माँगों को समझते हैं। प्रभु यीशु का प्रश्न लोगों को यह एहसास करने देता है कि इन सामान्य वचनों में प्रकट प्रभु की लोगों से अपेक्षाएँ मात्र उनमें विश्वास करने और उसका अनुसरण करने के लिए नहीं हैं, बल्कि प्रेम को पाने, अपने प्रभु से प्रेम करने, और अपने परमेश्वर से प्रेम करने के लिए है। इस प्रकार का प्रेम देखरेख करने वाला और आज्ञाकारी होता है। यह मनुष्यों का परमेश्वर के लिए जीना, परमेश्वर के लिए मरना, परमेश्वर के प्रति सर्वस्व समर्पित करना है, और परमेश्वर के लिए सब कुछ व्यय करना और सब कुछ दे देना है। इस प्रकार का प्रेम परमेश्वर को आराम देना, उसे गवाही का आनंद लेने देना, और उसे विश्राम में होने देना भी है। यह मनुष्यजाति की परमेश्वर को चुकौती, उनका उत्तरदायित्व, दायित्व और कर्त्तव्य है, और यह एक मार्ग है जिसका अनुसरण मनुष्यजाति को जीवन भर अवश्य करना चाहिए। ये तीनों प्रश्न एक माँग और प्रोत्साहन थे जिन्हें प्रभु यीशु ने पतरस और उन सभी लोगों से किए थे जिन्हें सिद्ध बनाया जाएगा। ये वे तीन प्रश्न थे जिन्होंने पतरस को जीवन में अपने मार्ग को पूर्ण करने के लिए अगुवाई और प्रेरणा दी, और ये प्रभु यीशु के जाने पर वे प्रश्न थे जिन्होंने सिद्ध बनाए जाने की उसकी यात्रा को शुरू करने में पतरस की अगुवाई की, जिन्होंने, प्रभु के प्रति उसके प्रेम की वजह से, प्रभु के हृदय का ख़्याल रखने, प्रभु का आज्ञापालन करने, प्रभु को आराम प्रदान करने, और इस प्रेम की वजह से अपने सम्पूर्ण जीवन और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को अर्पित करने में उसकी अगुवाई की।

अनुग्रह के युग के दौरान, परमेश्वर का कार्य प्राथमिक रूप से दो प्रकार के लोगों के लिए था। पहला उस प्रकार के लोगों के लिए था जो उस पर विश्वास करते थे और उसका अनुसरण करते थे, जो उसकी आज्ञाओं को मान सकते थे, जो क्रूस को उठा सकते थे और अनुग्रह के युग के मार्ग को थामे रह सकते थे। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के आशीष प्राप्त करेगा और परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द उठाएगा। दूसरे प्रकार का व्यक्ति पतरस के समान था, कोई ऐसा जिसे सिद्ध बनाया जाएगा। इसलिए प्रभु यीशु के पुनरूत्थान के बाद, उसने सबसे पहले इन दो अर्थपूर्ण चीज़ों को किया। एक थोमा के साथ, और दूसरा पतरस के साथ। ये दोनों चीज़ें क्या दर्शाती हैं? क्या ये मनुष्यजाति को बचाने के परमेश्वर के सच्चे इरादों को दर्शाती हैं? क्या ये मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर की ईमानदारी को दर्शाती हैं? जो कार्य उसने थोमा के साथ किया वह लोगों की चेतावनी के लिए था कि वे सन्देह न करें, बल्कि बस विश्वास करें। जो कार्य उसने पतरस के साथ किया वह पतरस जैसे लोगों के विश्वास को दृढ़ करने, और इस प्रकार के लोगों के बारे में अपेक्षाओं को स्पष्ट करने, और यह दिखाने के लिए था कि उन्हें किन लक्ष्यों का अनुसरण करना चाहिए।

प्रभु यीशु के पुनरूत्थित होने के बाद, वह उन लोगों के सामने प्रकट हुआ जिन्हें वह आवश्यक समझता था, उनसे बातें की, और उनसे माँगें की, लोगों के बारे में अपने इरादों, और उनसे अपनी अपेक्षाओं को छोड़ कर चला गया। कहने का अर्थ है, कि देहधारी परमेश्वर के रूप में, इससे फर्क नहीं पड़ता है कि यह उसके देह में रहने के समय के दौरान था, या क्रूस पर ठोके जाने और मृत से जी उठने के बाद आध्यात्मिक देह में रहने के समय था—मनुष्यजाति के लिए उसकी चिन्ता और लोगों से उसकी माँगें नहीं बदली थीं। क्रूस के ऊपर चढ़ाए जाने से पहले वह इन चेलों के बारे में चिंतित था; अपने हृदय में, वह हर एक व्यक्ति की अवस्था को लेकर स्पष्ट था, वह प्रत्येक व्यक्ति की कमी को समझता था, और वास्तव में उसकी मृत्यु, पुनरूत्थान, और आध्यात्मिक शरीर बनने के बाद भी प्रत्येक व्यक्ति के बारे में उसकी समझ वही थी जैसी तब थी जब वह देह में था। वह जानता था कि लोग मसीह के रूप में उसकी पहचान को लेकर पूर्णत: निश्चित नहीं थे, परन्तु देह में रहने के उसके समय के दौरान उसने लोगों से कठोर अपेक्षाएँ नहीं कीं। परन्तु पुनरूत्थित हो जाने के बाद वह उनके सामने प्रकट हुआ, और उसने उन्हें पूर्णत: निश्चित किया कि प्रभु यीशु परमेश्वर से आया है, यह कि वह देहधारी परमेश्वर है, और उसने मनुष्यजाति के द्वारा जीवन भर अनुसरण करने हेतु सबसे बड़े दर्शन और अभिप्रेरणा के रूप में अपने प्रकटन और अपने पुनरूत्थान के तथ्य का उपयोग किया। मृत्यु से उसके पुनरूत्थान ने न केवल उन सभी को मज़बूत किया जो उसका अनुसरण करते थे, बल्कि अनुग्रह के युग के उसके कार्य को पूर्णत: मनुष्यजाति के बीच प्रभावी कर दिया था, और इस प्रकार अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के उद्धार का सुसमाचार धीरे-धीरे मानवजाति के हर छोर तक पहुँच गया। क्या तुम कहोगे कि पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु के प्रकटन का कोई महत्व था? उस समय यदि तुम थोमा या पतरस होते, और तुमने अपने जीवन में इस एक चीज़ का सामना किया होता जो इतना अर्थपूर्ण होता, तो इसका तुम्हारे ऊपर किस प्रकार का प्रभाव पड़ता? क्या तुम इसे परमेश्वर पर विश्वास करने के अपने जीवन के सबसे बेहतरीन और सबसे बड़े दर्शन के रूप में देखते? क्या तुम, उसे सन्तुष्ट करने का प्रयत्न करते हुए, और अपने जीवन में उसे प्रेम करने की खोज करते हुए, इसे परमेश्वर का अनुसरण करने की एक प्रेरक शक्ति के रूप में देखते? क्या इस सबसे बड़े दर्शन को फैलाने के लिए तुम जीवन भर का प्रयास व्यय करते? क्या तुम प्रभु यीशु के उद्धार के सुसमाचार को फैलाने को परमेश्वर से प्राप्त एक महान आदेश के रूप में लेते? भले ही तुम लोगों ने इसका अनुभव नहीं किया है, फिर भी आधुनिक लोगों के लिए परमेश्वर की इच्छा को और परमेश्वर को स्पष्ट रूप से समझने के लिए थोमा और पतरस के दो मामले काफी हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के देहधारी हो जाने के बाद, उसके द्वारा मनुष्यजाति के बीच जीवन का और एक मानवीय जीवन का व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर लेने के बाद, और उसके द्वारा मनुष्यजाति की चरित्रहीनता और मानवीय जीवन की दशा को देखने के बाद, देहधारी परमेश्वर ने मनुष्यजाति की असहायता, उदासी, और दयनीयता को और गहराई से महसूस किया था। देह में रहते हुए अपनी मानवता की वजह से, और देह में अपने सहजज्ञान की वजह से, परमेश्वर को मानवता की हालत पर और अधिक करूणा उमड़ी। इससे वह अपने अनुयायियों को लेकर और अधिक चिंतित हो गया। शायद ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें तुम लोग नहीं समझ सकते हो, परन्तु मैं इस वाक्यांश से उसके हर एक अनुयायी के लिए देहधारी परमेश्वर की चिंता और देखरेख का वर्णन कर सकता हूँ: गहन चिंता। यद्यपि यह शब्द मानवीय भाषा से आता है, और यद्यपि यह बिल्कुल मानवीय वाक्यांश है, फिर भी यह अपने अनुयायियों के लिए परमेश्वर की भावनाओं को सचमुच में व्यक्त और वर्णित करता है। जहाँ तक मनुष्यों के लिए परमेश्वर की गहन चिन्ता की बात है, अपने अनुभवों के दौरान तुम लोग धीरे-धीरे इसे महसूस करोगे और इसका स्वाद चखोगे। हालाँकि, इसे केवल अपने स्वभाव में परिवर्तन की खोज करने के आधार पर परमेश्वर के स्वभाव को धीरे-धीरे समझने के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। प्रभु यीशु के प्रकटन ने मानवजाति में उसके अनुयायियों के लिए उसकी अत्यधिक चिन्ता को मूर्तरूप दिया और इसे उसकी आध्यात्मिक देह को, या तुम लोग यह कह सकते हो कि उसकी दिव्यता को सौंप दिया था। उसके प्रकटन ने लोगों को परमेश्वर की चिन्ता और देखरेख को एक अन्य अनुभव और एहसास करने दिया जबकि सामर्थ्यपूर्ण ढंग से यह भी प्रमाणित किया कि परमेश्वर ही वह एक है जो एक युग का मार्ग प्रशस्त करता है, जो एक युग को विकसित करता है, और वही एकमात्र है जो एक युग को समाप्त करता है। अपने प्रकटन के माध्यम से उसने लोगों के विश्वास को मज़बूत किया, और अपने प्रकटन के माध्यम से उसने संसार के सामने उस तथ्य को साबित किया कि वह स्वयं परमेश्वर है। इससे उसके अनुयायियों को अनंत पुष्टि मिली, और अपने प्रकटन के माध्यम से उसने नए युग में अपने कार्य के एक चरण का मार्ग प्रशस्त किया।

13. अपने पुनरूत्थान के बाद यीशु रोटी खाता है और पवित्रशास्त्रों को समझाता है

लूका 24:30-32 जब वह उनके साथ भोजन करने बैठा, तो उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया और उसे तोड़कर उनको देने लगा। तब उनकी आँखें खुल गईं; और उन्होंने उसे पहचान लिया, और वह उनकी आँखों से छिप गया। उन्होंने आपस में कहा, "जब वह मार्ग में हम से बातें करता था और पवित्रशा स्त्र का अर्थ हमें समझाता था, तो क्या हमारे मन में उत्तेजना न उत्पन्न हुई?"

14. चेलों ने यीशु को खाने के लिए भुनी हुई मछली दी

लूका 24:36-43 वे ये बातें कह ही रहे थे कि वह आप ही उनके बीच में आ खड़ा हुआ, और उनसे कहा, "तुम्हें शान्ति मिले।" परन्तु वे घबरा गए और डर गए, और समझे कि हम किसी भूत को देख रहे हैं। उसने उनसे कहा, "क्यों घबराते हो? और तुम्हारे मन में क्यों सन्देह उठते हैं? मेरे हाथ और मेरे पाँव को देखो कि मैं वही हूँ। मुझे छूकर देखो, क्योंकि आत्मा के हड्डी माँस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो।" यह कहकर उसने उन्हें अपने हाथ पाँव दिखाए। जब आनन्द के मारे उनको प्रतीति न हुई, और वे आश्‍चर्य करते थे, तो उसने उनसे पूछा, "क्या यहाँ तुम्हारे पास कुछ भोजन है?" उन्होंने उसे भुनी हुई मछली का टुकड़ा दिया। उसने लेकर उनके सामने खाया।

इसके बाद, अब हम ऊपर दिए गए पवित्रशास्त्र के अंशों पर एक नज़र डालेंगे। पहला अंश पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु के रोटी खाने और पवित्रशास्त्र को समझाने का वर्णन है, और दूसरा अंश प्रभु यीशु के भुनी हुई मछली खाने का वर्णन है। ये दोनों अंश परमेश्वर के स्वभाव को जानने के लिए किस प्रकार की सहायता प्रदान करते हैं? क्या तुम लोग इसकी कल्पना कर सकते हो कि प्रभु यीशु के रोटी और फिर भुनी हुई मछली खाने के इन विवरणों में तुम लोग किस प्रकार की तस्वीरों को प्राप्त करते हो? क्या तुम लोग कल्पना कर सकते हो कि, यदि प्रभु यीशु तुम लोगों के सामने रोटी खाता हुआ खड़ा होता, तो तुम लोगों को कैसा महसूस होता? अथवा यदि वह तुम लोगों के साथ एक ही मेज पर भोजन कर रहा होता, लोगों के साथ मछली और रोटी खा रहा होता, तो उस समय तुम्हें किस प्रकार की भावना आती? यदि तुम महसूस करते कि तुम प्रभु के बेहद करीब होते, कि वह तुम्हारे साथ बेहद अंतरंग होता, तब यह भावना सही है। यह बिल्कुल वही परिणाम है जो पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु भीड़ के सामने रोटी और मछली खाने के द्वारा दिखाना चाहता था। यदि प्रभु यीशु पुनरूत्थान के बाद सिर्फ लोगों से बात करता, यदि उन्होंने उसकी देह और हड्डियों को महसूस नहीं किया होता, बल्कि यह महसूस किया होता कि वह एक अगम्य पवित्रात्मा है, तो वे कैसा महसूस करते? क्या वे निराश नहीं हो जाते? जब लोग निराश हो जाते, तो क्या वे परित्यक्त महसूस नहीं करते? क्या वे प्रभु यीशु मसीह से एक दूरी का एहसास नहीं करते? परमेश्वर के साथ लोगों के रिश्ते पर यह दूरी किस प्रकार का नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करती? लोग निश्चित रूप से भयभीत हो जाते, कि वे उसके करीब आने की हिम्मत नहीं करते, और उनका उसे एक सम्मानित दूरी पर रखने का रवैया होता। उसके बाद से, वे प्रभु यीशु मसीह के साथ अपने अंतरंग रिश्ते को तोड़ देते, और मनुष्यजाति और ऊपर स्वर्ग के परमेश्वर के बीच रिश्ते की ओर वापस लौट जाते, जैसा कि अनुग्रह के युग के पहले था। जिस आध्यात्मिक देह को लोग स्पर्श और महसूस नहीं कर सकते थे वह परमेश्वर के साथ उनकी अंतरंगता का उन्मूलन कर देती, और यह उस अंतरंगता के अस्तित्व को भी—जो प्रभु यीशु मसीह के देह में रहने के समय स्थापित हुई थी, जिसमें मनुष्यजाति और उसके बीच कोई दूरी नहीं थी—खत्म कर देती। आध्यात्मिक देह के प्रति लोगों की भावनाएँ केवल भय, बचते रहना, और निःशब्द टकटकी है। वे उसके करीब आने या उससे बात करने की हिम्मत नहीं करते हैं, उसका अनुसरण करने, उस पर भरोसा करने, या उससे आशा करने की तो बात ही छोड़ दो। परमेश्वर इस प्रकार की भावना को देखने का अनिच्छुक था जो मनुष्यों के मन में उसके लिए थी। वह यह नहीं देखना चाहता था कि लोग उसे बच कर निकलें या अपने आप को उससे दूर हटा दें; वह केवल इतना चाहता था कि लोग उसे समझें, उसके करीब आएँ, और उसका परिवार बन जाएँ। यदि तुम्हारे स्वयं के परिवार ने, तुम्हारे बच्चों ने तुम्हें देखा परन्तु तुम्हें पहचाना नहीं, और तुम्हारे करीब आने की हिम्मत नहीं की बल्कि हमेशा तुमसे बचते रहे, और जो कुछ भी तुमने उनके लिए किया उसके लिए तुम उनकी समझ को प्राप्त नहीं कर सके, तो इससे तुम्हें कैसा महसूस होगा? क्या यह दुःखदायी नहीं होगा? क्या तुम्हारा हृदय नहीं टूट जाएगा? बिल्कुल ऐसा ही परमेश्वर महसूस करता है जब लोग उससे बचते हैं। इसलिए, अपने पुनरूत्थान के बाद, प्रभु यीशु तब भी लोगों के सामने माँस और लहू के अपने रूप में प्रकट हुआ, और उसने उनके साथ खाया और पीया। परमेश्वर लोगों को एक परिवार के रूप में देखता है और वह चाहता है कि मनुष्यजाति भी उसे इसी तरह से देखे; केवल इसी तरह से परमेश्वर सचमुच में लोगों को प्राप्त कर सकता है, और लोग सचमुच में उससे प्रेम और उसकी आराधना कर सकते हैं। अब क्या तुम लोग पवित्रशास्त्र के इन दो अंशों का उद्धरण देने के मेरे इरादे को समझ सकते हो जहाँ प्रभु यीशु रोटी खाता है, अपने पुनरूत्थान के बाद पवित्रशास्त्र को समझाता है, और चेले उसे खाने के लिए भुनी हुई मछली देते हैं?

ऐसा कहा जा सकता है कि कार्यों की श्रृंखलाएँ जो प्रभु यीशु ने पुनरूत्थान के बाद कही और की वे विचारपूर्ण थीं, और वे दयालु इरादों से की गई थीं। वे दयालुता और स्नेह से भरी हुई थीं जो परमेश्वर मानवजाति के प्रति रखता है, और प्रशंसा और कुशल देखरेख से भरी हुई थीं जो उस अंतरंग सम्बन्ध के लिए थीं जिसे उसने देह में रहने के दौरान मनुष्यजाति के साथ स्थापित किया था। उससे भी अधिक, वे अतीत की ललक और अपने अनुयायियों के साथ खाने-पीने के उस जीवन की आशा से भरी हुई थीं जो उसके देह में रहने के समय के दौरान थी। इसलिए, परमेश्वर नहीं चाहता था कि लोग परमेश्वर और मनुष्य के बीच दूरी महसूस करें, और न ही वह यह चाहता था कि मनुष्यजाति स्वयं को परमेश्वर से दूर रखे। इससे भी बढ़कर, वह नहीं चाहता था कि मनुष्यजाति यह महसूस करे कि प्रभु यीशु पुनरूत्थान के बाद अब और वह प्रभु नहीं है जो लोगों से बहुत अंतरंग था, कि वह मनुष्यजाति के साथ अब और नहीं है क्योंकि वह आध्यात्मिक संसार में लौट गया है, और उस पिता के पास लौट गया है जिसे लोग कभी देख नहीं सकते थे और जिस तक कभी नहीं पहुँच सकते हैं। वह नहीं चाहता था कि लोग यह महसूस करें कि उसके और मनुष्यजाति के बीच पद का कोई अंतर है। जब परमेश्वर उन लोगों को देखता है जो उसका अनुसरण करना चाहते हैं परन्तु उसे एक सम्मानित दूरी पर रखते हैं, तो उसके हृदय में पीड़ा होती है क्योंकि इसका मतलब है कि उनके हृदय उससे बहुत दूर है, इसका मतलब है कि उसके लिए उनके हृदयों को पाना बहुत कठिन होगा। इसलिए यदि वह लोगों के सामने एक आध्यात्मिक देह में प्रकट हो जाता जिसे वे छू और देख नहीं सकते, तो इसने एक बार फिर मनुष्य को परमेश्वर से दूर कर दिया होता, और इसने मनुष्यजाति की ग़लत ढंग से यह देखने की ओर अगुआई की होती कि पुनरूत्थान के बाद मसीह अभिमानी, मनुष्यों से भिन्न प्रकार का, और ऐसा बन गया है, जो मनुष्य के साथ मेज पर अब और नहीं बैठ सकता था और उनके साथ नहीं खा सकता है क्योंकि मनुष्य पापी और गन्दे हैं, और कभी भी परमेश्वर के करीब नहीं आ सकते हैं। मनुष्यजाति की इन ग़लतफहमियों को दूर करने के लिए, प्रभु यीशु ने कई चीज़ें की जिन्हें वह देह में प्रायः करता था, जैसा कि बाइबल में दर्ज है, "उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया और उसे तोड़कर उनको देने लगा।" उसने उन्हें पवित्रशास्त्र भी समझाया, जैसा कि वह किया करता था। यह सब कुछ जो प्रभु यीशु ने किया उसने प्रत्येक व्यक्ति को जिसने उसे देखा था यह महसूस कराया कि प्रभु नहीं बदला है, यह कि वह अभी भी वही प्रभु यीशु है। भले ही उसे सूली पर चढ़ा दिया गया था और उसने मृत्यु का अनुभव किया था, फिर भी वह पुनर्जीवित हो चुका है, और उसने मनुष्यजाति को नही छोड़ा था। वह मनुष्यों के बीच रहने के लिए लौट आया था, और उसमें कुछ भी नहीं बदला था। लोगों के सामने खड़ा मनुष्य का पुत्र वही प्रभु यीशु था। लोगों के साथ उसका व्यवहार और उसकी बातचीत बहुत परिचित लगती थी। वह तब भी सहृदयता और सोच-विचार, अनुग्रह और सहिष्णुता से उतना ही भरपूर था—वह तब भी वही प्रभु यीशु था जो लोगों से वैसा ही प्रेम करता था जैसा वह अपने आप से करता था, जो मनुष्यजाति को सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा कर सकता था। हमेशा की तरह, उसने लोगों के साथ खाया, उनके साथ पवित्रशास्त्र पर चर्चा की, और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण, वह पहले के समान ही, माँस और लहू से बना था और उसे छुआ और देखा जा सकता था। इस तरह मनुष्य के पुत्र ने लोगों को उस अंतरंगता को महसूस करने, और सहज महसूस करने, और किसी खोयी हुई चीज़ को पुनः प्राप्त करने का आनंद लेने दिया, और उन्होंने भी हिम्मत और दृढ़ विश्वास के साथ इस मनुष्य के पुत्र के ऊपर भरोसा और उसका आदर करना आरम्भ करने में पर्याप्त रूप से सहज महसूस किया जो मनुष्यजाति को उनके पापों के लिए क्षमा कर सकता था। वे निःसंकोच रूप से प्रभु यीशु के नाम से उसका अनुग्रह, उसका आशीष प्राप्त करने के लिए, और उससे शांति और आनन्द प्राप्त करने के लिए, और उससे देखरेख और सुरक्षा प्राप्त करने के लिए प्रार्थना भी करने लगे, तथा प्रभु यीशु के नाम से चंगाई करने लगे और दुष्टात्माओं को निकालने लगे।

जिस दौरान प्रभु यीशु देह में होकर काम करता था, उसके अधिकतर अनुयायी उसकी पहचान और उसके द्वारा कही गई चीज़ों को पूरी तरह से सत्यापित नहीं कर सकते थे। जब वह क्रूस पर चढ़ गया, तो उनके चेलों का रवैया अपेक्षा का था; जब उसे क्रूस पर कीलों से ठोंक दिया गया था उस समय से लेकर उसे क़ब्र में डाले जाने तक, उसके प्रति लोगों का निराश रवैया था। इस समय के दौरान, लोगों ने पहले से ही अपने हृदय में उन चीज़ों के बारे में सन्देह करने से नकारने की ओर जाना आरम्भ कर दिया था जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने देह में रहने के दिनों के दौरान कहा था। और जब वह क़ब्र से बाहर आया, और एक-एक करके लोगों के सामने प्रकट हुआ, तो वे अधिकांश लोग जिन्होंने उसे अपनी आँखों से देखा था या उसके पुनरूत्थान के समाचार को सुना था धीरे-धीरे नकारने से संशय की ओर आने लगे थे। अपने पुनरूत्थान के बाद जिस समय प्रभु यीशु ने अपने पंजर में थोमा से उसका हाथ डलवाया, जिस समय प्रभु यीशु ने भीड़ के सामने रोटी तोड़ी और खायी, और उसके बाद उनके सामने भुनी हुई मछली खायी, केवल तभी उन्होंने सचमुच में उस तथ्य को स्वीकार किया कि प्रभु यीशु ही देह में मसीह है। तुम लोग ऐसा कह सकते हो कि यह ऐसा था मानो कि तब माँस और रक्त वाला यह आध्यात्मिक शरीर उन लोगों के सामने खड़ा हुआ उन्हें किसी स्वप्न से जगा रहा थाः मनुष्य का पुत्र जो उनके सामने खड़ा था वही एक था जो अतिप्रचीन समय से अस्तित्व में था। उसका एक आकार, और माँस और हड्डियाँ थीं, और वह पहले से ही मनुष्यजाति के साथ लम्बे समय तक रह और खा चुका था...। इस समय, लोगों ने महसूस किया कि उसका अस्तित्व बहुत यथार्थ, और बहुत अद्भुत था; वे भी बहुत आनन्दित और प्रसन्न थे, और साथ ही मनोभाव से भी भरे थे। और उसके पुनः-प्रकटन ने सचमुच में लोगों को उसकी विनम्रता को देखने, और उसकी नज़दीकी, और उसकी चाहत, और मनुष्यजाति के प्रति उसकी अनुरक्ति को महसूस करने दिया। इस संक्षिप्त पुनर्मिलन ने उन लोगों को जिन्होंने प्रभु यीशु को देखा था यह महसूस कराया मानो कि एक पूरा जीवन काल गुज़र चुका हो। उनके खोए हुए, भ्रमित, भयभीत, चिन्तित, लालायित और संवेदनशून्य हृदय को आराम मिला। वे अब और सन्देहपूर्ण या निराश नहीं थे क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि अब उनके पास आशा थी और कुछ ऐसा था जिस पर वे भरोसा कर सकते थे। उनके सामने खड़ा मनुष्य का पुत्र पूरी अनन्तता तक उनके पीछे रहेगा, वह उनका दृढ़ दुर्ग, और हमेशा के लिए उनका आश्रय होगा।

यद्यपि प्रभु यीशु पुनरूत्थित हो चुका था, फिर भी उसके हृदय और उसके कार्य ने मनुष्यजाति को नहीं छोड़ा था। उसने अपने प्रकटन से लोगों को बताया कि वह भले ही किसी भी रूप में अस्तित्व में क्यों न हो, वह हर समय और हर जगह लोगों का साथ देगा, उनके साथ चलेगा, और उनके साथ रहेगा। और वह हर समय और हर जगह, वह मनुष्यजाति का भरण-पोषण करेगा और उनकी चरवाही करेगा, उन्हें उसे देखने और छूने देगा, और यह सुनिश्चित करेगा कि वे कभी पुनः असहाय महसूस न करें। प्रभु यीशु यह भी चाहता था कि लोग यह जानें: इस संसार में उनके जीवन अकेले नहीं हैं। मनुष्यजाति के पास परमेश्वर की देखरेख है, परमेश्वर उनके साथ है; लोग हमेशा परमेश्वर पर आश्रित हो सकते हैं; वह अपने प्रत्येक अनुयायी का परिवार है। परमेश्वर पर आश्रित होने के साथ, मनुष्यजाति अब और एकाकी या असहाय नहीं होगी, और जो उसे अपनी पापबलि के रूप में स्वीकार करते हैं वे अब और पाप में बँधे नहीं रहेंगे। मनुष्य की नज़रों में, उसके कार्य के ये भाग जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद किया बहुत छोटी चीज़ें थीं, परन्तु जिस तरह से मैं उन्हें देखता हूँ, हर एक छोटी सी चीज़ भी बहुत अर्थपूर्ण थी, और बहुत मूल्यवान थी, और वे सभी बहुत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली थीं।

यद्यपि देह में काम करने का प्रभु यीशु का समय कठिनाईयों और पीड़ा से भरा हुआ था, फिर भी माँस और रक्त की अपनी आध्यात्मिक देह के प्रकटन के माध्यम से, उसने उस समय के मनुष्यजाति को छुड़ाने के देह के अपने कार्य को पूर्णता और सिद्धता से पूरा किया था। उसने देह बन कर अपनी सेवकाई की शुरूआत की, और मनुष्यों के सामने अपने दैहिक रूप में प्रकट होकर उसने अपनी सेवकाई का समापन किया। वह अनुग्रह के युग का अग्रदूत था, उसने मसीह के रूप में अपनी पहचान के माध्यम से अनुग्रह के युग की शुरूआत की। उसने मसीह के रूप में अपनी पहचान के माध्यम से अनुग्रह के युग में अपने कार्य को पूरा किया और उसने अनुग्रह के युग में अपने सभी अनुयायियों को मज़बूत किया और उनकी अगुवाई की। परमेश्वर के कार्य के बारे में ऐसा कहा जा सकता है कि वह जिसे आरम्भ करता है उसे वास्तव में पूरा करता है। इसमें कदम और योजना होते हैं, और यह परमेश्वर की बुद्धि, उसकी सर्वशक्तिमत्ता, और उसके अद्भुत कर्मों से भरपूर होता है। यह परमेश्वर के प्रेम और करुणा से भी भरपूर होता है। निस्संदेह, परमेश्वर के समस्त कार्य की मुख्य डोर मनुष्यजाति के लिए उसकी देखभाल है; यह उसकी परवाह की भावनाओं से व्याप्त है जिसे वह कभी अलग नहीं रख सकता है। बाइबल के इन छन्दों में, अपने पुनरूत्थान के बाद हर एक चीज़ में जो प्रभु यीशु ने की, जो प्रकट हुआ वह मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर का न बदलने वाला प्रेम और चिन्ता थे, और साथ ही मनुष्यों के लिए परमेश्वर की कुशल देखरेख और दुलारना था। अब तक, इसमें से कुछ भी नहीं बदला है—क्या तुम लोग इसे देख सकते हो? जब तुम लोग इसे देखते हो, तो क्या तुम लोगों का हृदय स्वतः ही परमेश्वर के करीब नहीं आ जाता है? यदि तुम लोग उस युग में रहते और प्रभु यीशु पुनरूत्थान के बाद तुम लोगों के सामने प्रकट होता, मूर्त रूप में ताकि तुम लोग देख सकते, और यदि वह तुम लोगों के सामने बैठ जाता, रोटी और मछली खाता और तुम लोगों को पवित्रशास्त्र समझाता, तुम लोगों से बातचीत करता, तो तुम लोग कैसा महसूस करते? क्या तुम खुशी महसूस करते? दोषी के बारे में क्या कहेंगे? परमेश्वर के बारे में पिछली ग़लतफहमियाँ और उससे बचना, परमेश्वर के साथ टकराव और उसके बारे में सन्देह—क्या ये सब ग़ायब नहीं हो जाते? क्या परमेश्वर और मनुष्य के बीच का रिश्ता और अधिक उचित नहीं हो जाता?

बाइबल के इन सीमित अध्यायों की व्याख्या के माध्यम से, क्या तुम लोगों को परमेश्वर के स्वभाव में किसी खोट का पता लगा? क्या तुम लोगों को परमेश्वर के प्रेम में मिलावट का पता लगा! क्या तुम लोगों ने परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि में कोई धूर्तता या दुष्टता देखी? निश्चित रूप से नहीं? अब क्या तुम लोग निश्चितता के साथ कह सकते हो कि परमेश्वर पवित्र है? क्या तुम लोग निश्चितता के साथ कह सकते हो कि परमेश्वर के मनोभाव उसके सार और उसके स्वभाव के प्रकाशन हैं। मैं आशा करता हूँ कि इन वचनों को पढ़ लेने के बाद, जो कुछ तुम लोगों ने इससे समझा है उससे तुम लोगों को सहायता मिलेगी और यह स्वभाव में परिवर्तन की तुम लोगों की खोज और परमेश्वर से भय मानने में तुम लोगों को लाभ पहुँचाएगा। मैं यह भी आशा करता हूँ कि ये वचन तुम लोगों के लिए परिणाम उत्पन्न करेंगे जो दिन प्रति दिन बढ़ते ही जाएँगे, इस प्रकार खोज की यह प्रक्रिया तुम लोगों को परमेश्वर के और करीब ले आएगी, और उस उच्च मानक के और करीब ले आएगी जिसकी अपेक्षा परमेश्वर करता है, ताकि तुम लोग सत्य की खोज करने में अब और ऊबा हुआ महसूस न करो और तुम लोग अब और ऐसा महसूस न करो कि सत्य की और स्वभाव में परिवर्तन की खोज एक कष्टप्रद या निरर्थक चीज़ है। इसके बजाए, यह परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और परमेश्वर के पवित्र सार की अभिव्यक्ति है जो तुम लोगों को ज्योति की लालसा करने, और न्याय की लालसा करने, और सत्य की खोज करने, परमेश्वर की इच्छा की सन्तुष्टि की खोज करने, और परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किया गया मनुष्य बनने, और एक वास्तविक मनुष्य बनने की अभिलाषा करने के लिए अभिप्रेरित करती है।

आज हमने कुछ चीज़ों के बारे में बात की है जो परमेश्वर ने अनुग्रह के युग में की थीं जब वह पहली बार देहधारी बना था। इन चीज़ों से, हमने उस स्वभाव को जो उसने देह में व्यक्त और प्रकट किया था, और साथ ही उसके स्वरूप के प्रत्येक पहलू को देखा है। उसके स्वरूप के ये सभी पहलू बहुत ही मानवीय प्रतीत होते हैं, परन्तु वास्तविकता यह है कि उसने जो कुछ भी प्रकट और व्यक्त किया उसका सार उसके स्वयं के स्वभाव से अवियोज्य है। देहधारी परमेश्वर की हर पद्धति और उसका हर पहलू जो मानवता में उसके स्वभाव को व्यक्त करता है उसके स्वयं के सार से जटिल रूप से जुड़ा हुआ है। इसलिए, यह बहुत महत्वपूर्ण है कि परमेश्वर मनुष्य के पास देहधारण के तरीके से आया और जो कार्य उसने देह में किया वह भी बहुत महत्वपूर्ण है। और, उसने जो स्वभाव प्रकट किया और जो इच्छा उसने अभिव्यक्त की वे देह में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए, भ्रष्टता में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए, और भी अधिक महत्वपूर्ण हैं। क्या यह कुछ ऐसा है जिसे तुम लोग समझने में समर्थ हो? परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझने के बाद, क्या तुम लोगों ने कोई निष्कर्ष निकाले हैं कि तुम लोगों को परमेश्वर के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए? इस प्रश्न के उत्तर में, निष्कर्ष के रूप में मैं तुम लोगों को तीन चेतावनी देना चाहूँगाः पहली, परमेश्वर की परीक्षा मत लो। चाहे तुम परमेश्वर के बारे में कितना ही समझते हो, चाहे तुम उसके स्वभाव के बारे में कितना ही जानते हो, उसकी परीक्षा बिल्कुल मत लो। दूसरी, हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ संघर्ष मत करो। चाहे परमेश्वर तुम्हें किसी भी प्रकार की हैसियत दे या वह तुम्हें कैसे भी कार्य सौंपे, चाहे वह तुम्हें किसी भी प्रकार के कर्तव्य को करने के लिए बड़ा करता हो, और चाहे तुमने परमेश्वर के लिए कितना ही खर्च और बलिदान किया है, उसके साथ हैसियत के लिए संघर्ष बिल्कुल मत करो। तीसरी, परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा मत करो? चाहे जो भी तुम्हारे साथ परमेश्वर करता है, जो भी वह तुम्हारे लिए व्यवस्थित करता है, और वे चीज़ें जो वह तुम पर लाता है तुम उसे समझते या उसका पालन करते हो या नहीं, किन्तु परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा बिल्कुल मत करो। यदि तुम इन तीन चेतावनियों का पालन कर सकते हो, तो तुम अपेक्षाकृत रूप से सुरक्षित रहोगे, और तुम परमेश्वर को आसानी से क्रोधित नहीं करोगे। आज साझा करने के लिए बस इतना ही!

23 नवंबर, 2013

फुटनोट:

क. मूल पाठ में "की इस अभिव्यक्ति" वाक्यांश नहीं है।

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