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अय्यूब के बारे में (I)

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इस बारे में जानने के बाद कि अय्यूब किस प्रकार परीक्षाओं से होकर गुज़रा, तुम में से अधिकांश की स्वयं अय्यूब के बारे में और भी अधिक विवरणों को जानने की संभावना है, खासतौर पर उस रहस्य के सम्बन्ध में जिसके द्वारा उसने परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त की थी। इसलिए आज, आओ हम अय्यूब के बारे में बात करें!

अय्यूब के दैनिक जीवन में हम उसकी सिद्धता, खराई, परमेश्वर का भय, और दुष्टता से दूर रहना देखते हैं

यदि हमें अय्यूब के बारे में चर्चा करनी है, तो हमें उसके बारे में उस आँकलन से शुरु अवश्य करनी चाहिए जो परमेश्वर के मुख से कहा गया था: "उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।"

आओ हम सबसे पहले अय्यूब की खराई और सिद्धताके बारे में जाने।

तुम लोग "सिद्ध" और "खरा" शब्दों के बारे में क्या समझ रखते हो? क्या तुम लोग यह मानते हो कि अय्यूब दोष रहित था, और आदरणीय था? वास्तव में, यह "सिद्ध" और "खरा" का एक शाब्दिक अनुवाद और समझ होगी। वास्तविक जीवन अय्यूब की सच्ची समझ का अभिन्न भाग है—केवल वचन, किताबें, और सिद्धान्त कोई उत्तर प्रदान नहीं करेंगे। हम अय्यूब के पारिवारिक जीवन पर, जीवन के दौरान उसका सामान्य आचरण किसके जैसा था इस पर नज़र डालते हुए शुरुआत करेंगे। यह हमें जीवन में उसके सिद्धान्तों और उद्देश्यों, और साथ ही उसके व्यक्तित्व और उसकी खोज के बारे में भी बताएगा। अब, आओ हम अय्यूब 1:3 के अंतिम वचनों को पढ़ें: "पूर्वी देशों के लोगों में वह सबसे बड़ा था।" ये वचन यह कह रहे हैं कि अय्यूब की हैसियत और प्रतिष्ठा बहुत ऊँची थी, और यद्यपि हमें यह नहीं बताया गया है कि वह अपनी प्रचुर धन-सम्पत्ति के कारण पूर्वी देशों के लोगों में सबसे बड़ा था या इसलिए क्योंकि वह सिद्ध और खरा था, और परमेश्वर का भय मानता था और दुष्टता से दूर रहता था, इसलिए कुल मिलाकर, हम यह जानते हैं कि अय्यूब की हैसियत और प्रतिष्ठा बहुत ही मूल्यवान थी। जैसा कि बाइबल में दर्ज है, अय्यूब के बारे में लोगों की पहली धारणा यह थी कि अय्यूब सिद्ध था, यह कि वह परमेश्वर का भय मानता और दुष्टता से दूर रहता था, और यह कि उसके पास बहुत धन-सम्पत्ति और सम्माननीय हैसियत थी। एक साधारण मनुष्य के लिए जो ऐसे परिवेश में और ऐसी परिस्थितियों के तहत रहता हो, अय्यूब का आहार, जीवन की गुणवत्ता, और उसके व्यक्तिगत जीवन के विभिन्न पहलू अधिकांश लोगों के ध्यान का केन्द्र बिन्दु होंगे; इसलिए हमें पवित्र शास्त्र को पढ़ना अवश्य जारी रखना चाहिए: "उसके बेटे बारी-बारी से एक दूसरे के घर में खाने-पीने को जाया करते थे; और अपनी तीनों बहिनों को अपने संग खाने-पीने के लिये बुलवा भेजते थे। जब जब भोज के दिन पूरे हो जाते, तब तब अय्यूब उन्हें बुलवाकर पवित्र करता, और बड़े भोर को उठकर उनकी गिनती के अनुसार होमबलि चढ़ाता था; क्योंकि अय्यूब सोचता था, 'कदाचित् मेरे लड़कों ने पाप करके परमेश्‍वर को छोड़ दिया हो।" इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था' (अय्यूब 1:4-5)। यह अंश हमें दो चीज़ें बताता है: पहला है कि अय्यूब के पुत्र और पुत्रियाँ नियमित रूप से भोज, खाना और पीना करते थे; दूसरा है कि अय्यूब प्रायः होमबलियाँ चढ़ाता था क्योंकि वह प्रायः उन लोगों के लिए चिंतित रहता था, इस बात से भयभीत रहता था कि वे पाप कर रहे हैं, यह कि उन्होंने अपने हृदय में परमेश्वर को कोसा था। इसमें दो अलग-अलग प्रकार के लोगों के जीवन का वर्णन किया गया है। पहला, अय्यूब के पुत्र और पुत्रियाँ, जो, भौतिक सम्पत्ति के द्वारा आयी उच्च जीवनशैली का आनन्द उठाते हुए, अपनी सम्पन्नता के कारण अक्सर भोज करते थे, वे फिज़ूलखर्ची का जीवन जीते थे, वे अपने मन की संतुष्टि तक दाखरस पीते और भोजन करते थे। ऐसा जीवन जीते हुए, यह अपरिहार्य था कि वे अक्सर पाप करेंगे और परमेश्वर का अपमान करेंगे—मगर इसके परिणामस्वरूप उन्होंने अपने आपको शुद्ध नहीं किया या होमबलि नहीं चढ़ाई। तो तुम देखो कि उनके हृदय में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं था, कि उन्होंने परमेश्वर के अनुग्रह के प्रति कोई विचार नहीं किया, न ही वे परमेश्वर का अपमान करने से डरे, वे अपने हृदय से परमेश्वर को त्यागने से बिलकुल भी भयभीत नहीं हुए। निस्संदेह, हमारा ध्यान अय्यूब के बच्चों पर नहीं है, बल्कि हमारा ध्यान उस पर है जो अय्यूब ने तब किया जब उसने ऐसी चीज़ों का सामना किया; यह दूसरा मामला है जिसका इस अंश में वर्णन किया गया है, और जिसमें अय्यूब का दैनिक जीवन और उसकी मानवता का सार शामिल है। जब बाइबल अय्यूब के पुत्र और पुत्रियों के भोज का जिक्र करती है, तो वहाँ अय्यूब का कोई जिक्र नहीं है; केवल ऐसा कहा गया है कि उसके पुत्र और पुत्रियाँ ही अक्सर एक साथ मिलकर खाया और पीया करते थे। दूसरे शब्दों में, उसने भोजों का आयोजन नहीं किया, न ही वह फिज़ूलखर्ची करने के लिए अपने पुत्र और पुत्रियों के साथ खाने-पीने में शामिल हुआ। यद्यपि वह समृद्ध था, और उसके पास कई सम्पत्तियाँ और सेवक थे, फिर भी अय्यूब का जीवन विलासिता का नहीं था। वह जीवन जीने के अपने सर्वोत्कृष्ट परिवेश से मोहित नहीं हुआ था, और उसने देह के सुख विलासों से अपने आपको ठूँस-ठूँस कर नहीं भरा या वह अपनी सम्पत्ति की वजह से होमबलि चढ़ाना नहीं भूला, और इससे वह अपने हृदय में धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर तो बिलकुल भी नहीं हुआ। तो स्पष्ट रूप से, अय्यूब अपनी जीवनशैली में अनुशासित था, और वह लोभी या सुखवादी नहीं था, न ही उसके लिए परमेश्वर के आशीषों के परिणामस्वरूप जीवन की गुणवत्ता से, वह ग्रस्त हुआ। इसके बजाए, वह नम्र और शालीन रहा, और परमेश्वर के सामने सतर्क और सावधान रहा, वह अक्सर परमेश्वर के अनुग्रह और आशीषों पर विचार करता, और वह परमेश्वर से लगातार भयभीत रहता था। अपने दैनिक जीवन में, अय्यूब प्रायः अपने पुत्र और पुत्रियों के लिए होमबलि चढ़ाने के लिए जल्दी उठा जाता था। दूसरे शब्दों में, न केवल अय्यूब स्वयं परमेश्वर का भय मानता था, बल्कि वह यह आशा भी करता था कि उसके बच्चे भी उसी प्रकार परमेश्वर का भय मानेंगे और परमेश्वर के विरूद्ध पाप नहीं करेंगे। अय्यूब की भौतिक सम्पत्ति का उसके हृदय में कोई स्थान नहीं था, न ही वह परमेश्वर के स्थान को बदल सकती थी; चाहे वह स्वयं के वास्ते हो या उसके बच्चों के वास्ते, अय्यूब के दैनिक सभी कार्य परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने से जुड़े थे। यहोवा परमेश्वर का उसका भय उसके मुँह तक नहीं रुका, बल्कि अमल में लाया गया, और वह उसके दैनिक जीवन के हर एक भाग में प्रतिबिम्बित होता था। अय्यूब का यह वास्तविक आचरण हमें दिखाता है कि वह ईमानदार था, और एक सार को धारण करता था जो न्याय और उन चीज़ो से प्रेम करता था जो सकारात्मकता थीं। यह कि अय्यूब अपने पुत्रों और पुत्रियों को प्रायः भेजा और पवित्र किया करता था इसका अर्थ है कि वह अपने बच्चों के व्यवहार को स्वीकृतया अनुमोदित नहीं करता था; इसके बजाए, अपने हृदय में वह उनके व्यवहार से उकता गया था, और उनकी निन्दा करता था। उसने यह निष्कर्ष निकाला कि उसके पुत्र और पुत्रियों का व्यवहार यहोवा परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला नहीं था, और इसलिए वह प्रायः उनसे यहोवा परमेश्वर के सामने जाने और अपने पापों का अंगीकार करने के लिए कहता था। अय्यूब के कार्यकलाप हमें उसकी मानवता का दूसरा पक्ष दिखाते हैं: एक जिसमें वह कभी भी उनके साथ नहीं चलता था जो अक्सर पाप करते थे और परमेश्वर का अपमान करते थे, बल्कि इसके बजाय वह उनसे दूर रहता था और उनसे परहेज करता था। भले ही ये लोग उसके पुत्र और पुत्रियाँ थे, फिर भी उसने अपने सिद्धान्तों को इसलिए नहीं छोड़ा कि वे उसके स्वयं के सगे सम्बन्धी थे, न ही वह अपनी स्वयं की भावनाओं के कारण उनके पापों में लिप्त हुआ। इसके बजाए, उसने उनसे पापों को अंगीकार करने और यहोवा परमेश्वर के धैर्य को प्राप्त करने का आग्रह किया था, और उसने उन्हें चेताया था कि वे अपने स्वयं के लोभी सुख-विलासों के वास्ते परमेश्वर को न छोड़ें। अय्यूब दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करता था इस बात के सिद्धान्त परमेश्वर के प्रति उसके भय और दुष्टता से दूर रहने के सिद्धान्तों से अवियोज्य हैं। वह उसे प्रेम करता था जो परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किया जाता था, और उससे घृणा करता था जिससे परमेश्वर को नफ़रत थी, और वह उनसे प्रेम करता था जो अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानते थे, और उनसे घृणा करता था जो परमेश्वर के विरुद्ध दुष्टता और पाप करते थे। ऐसा प्रेम और ऐसी घृणा उसके दैनिक जीवन में प्रदर्शित होती थी, और यह अय्यूब का वही खराई थी जिसे परमेश्वर की नज़रों से देखा गया था। स्वाभाविक रुप से, अपने दैनिक जीवन में दूसरों के साथ अपने रिश्तों के सम्बन्ध में यह अय्यूब की सच्ची मानवता की अभिव्यक्ति और उसे जीना भी है जिसके बारे में हमें अवश्य सीखना चाहिए।

अय्यूब की परीक्षाओं के दौरान उसकी मानवता की अभिव्यक्तियाँ (अय्यूब की परीक्षाओं के दौरान उसकी खराई, सीधापन, परमेश्वर का भय, और दुष्टता से दूर रहने को समझना)

जो हमने ऊपर साझा किया है वे अय्यूब की मानवता के विभिन्न पहलू हैं जो उसकी परीक्षा से पहले उसके दैनिक जीवन में प्रदर्शित हुए थे। बिना किसी सन्देह के, ये विभिन्न अभिव्यक्तियाँ अय्यूब के सीधेपन, परमेश्वर के भय, और दुष्टता से दूर रहने के बारे में एक आरम्भिक जानकारी और समझ प्रदान करती हैं, और स्वाभाविक रूप से एक आरम्भिक पुष्टिकरण प्रदान करती हैं। क्यों मैं "आरम्भिक" कहता हूँ इसका कारण है कि अधिकांश लोगों को अभी भी अय्यूब के व्यक्तित्व और उस स्तर की सही समझ नहीं है जिस तक उसने परमेश्वर का आज्ञापालन और परमेश्वर का भय मानने के तरीके की खोज की। कहने का तात्पर्य है कि, अय्यूब के बारे में अधिकांश लोगों की समझ उसके बारे में कुछ अनुकूल धारणा से परे नहीं जाती है जो बाइबल में उसके वचनों के द्वारा प्रदान की गई है कि "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है" और "क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" इस प्रकार, हमें यह समझने की अत्यंत आवश्यकता है कि अय्यूब ने अपनी मानवता को किस प्रकार जीया जब उसने परमेश्वर की परीक्षाओं को प्राप्त किया; इस तरह से, अय्यूब की सच्ची मानवता को उसकी सम्पूर्णता में सभी को दिखाया जाएगा।

जब अय्यूब ने यह सुना कि उसकी सम्पत्ति को चुरा लिया गया है, कि उसके पुत्र और पुत्रियों ने अपने जीवन गँवा दिए हैं, और उसके सेवकों को मार दिया गया है, तो उसने निम्नलिखित रूप से प्रतिक्रिया की: "तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् करके कहा" (अय्यूब 1:20)। ये वचन हमें एक तथ्य बताते हैं: इस समाचार को सुनने के बाद, अय्यूब घबराया नहीं, वह रोया नहीं, या उन सेवकों पर दोष नहीं लगाया जिन्होंने उसे समाचार दिया था, और उसने वारदात के दृश्य का मुआयना तो बिलकुल नहीं किया ताकि वह वारदात के पीछे के कारण की जाँच कर सके, उसे सत्यापित कर सके और यह पता लगा सके कि वास्तव में क्या हुआ था। उसने अपनी सम्पत्ति के खो जाने पर किसी पीड़ा या खेद का प्रदर्शन नहीं किया, न ही वह अपने बच्चों के, अपने प्रियजनों के खो जाने के कारण फूट-फूटकर रोया। इसके विपरीत, उसने अपना बागा फाड़ा, और अपना सिर मुँडाया, और भूमि पर गिर गया, और आराधना की। अय्यूब के कार्यकलाप किसी भी समान्य मनुष्य के कार्यकलापों से भिन्न थे। वे बहुत से लोगों को भ्रमित करते हैं, और अय्यूब की "निष्ठुरता" के कारण उनके मन में उसे झिड़की का पात्र बनाते हैं। अपनी सम्पत्ति को अचानक खो देने पर, साधारण लोग टूटे दिल वाले, या निराश दिखाई देते हैं—या, कुछ लोगों तो गहरे विषाद में भी आ जाते। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि लोगों के हृदय में उनकी सम्पत्ति जीवनभर के प्रयास को दर्शाती है, यह ऐसा है जिस पर उनका जीवित रहना निर्भर होता है, यह वह आशा है जो उन्हें जीवित रखती है; उनकी सम्पत्ति के खोने का अर्थ है कि उनके प्रयास निरर्थक रहे हैं, यह कि उन्हें कोई आशा नहीं है, और यहाँ तक कि उनका कोई भविष्य भी नहीं है। अपनी सम्पत्ति और नज़दीकी रिश्ते के प्रति जो इसके साथ उनका होता है यह किसी भी समान्य व्यक्ति की प्रवृत्ति होती है, और यही लोगों की नज़रों में सम्पत्ति का महत्व भी है। वैसे तो, अधिकांश लोग अय्यूब की सम्पत्ति के नुकसान[क] के प्रति उसकी उदासीन प्रवृत्ति से भ्रमित महसूस करते हैं। आज, अय्यूब के हृदय के भीतर क्या कुछ चल रहा था उसका वर्णन करके हम इन सभी लोगों के भ्रम को दूर करने जा रहे हैं।

व्यावहारिक ज्ञान कहता है कि, परमेश्वर के द्वारा इतनी सारी सम्पत्ति दिए जाने के बाद, इन सम्पत्तियों को गँवाने की वजह से अय्यूब को परमेश्वर के सामने शर्मिन्दगी महसूस करनी चाहिए, क्योंकि उसने उनकी देखरेख नहीं की थी या उनका ख्याल नहीं रखा था, वह परमेश्वर के द्वारा दी हुई सम्पत्तियों को सँभालकर नहीं रखा था। इसलिए, जब उसने यह सुना कि उसकी सम्पत्ति चुरा ली गई है, उसकी सबसे पहली प्रतिक्रिया यह होनी चाहिए थी कि वह वारदात के स्थल पर जाता और जो चला गया था[ख] उन सामानों की सूची बनाता, और उसके बाद परमेश्वर के सामने अंगीकार करता ताकि वह एक बार फिर से परमेश्वर के आशीषों को प्राप्त कर सके। हालाँकि, अय्यूब ने ऐसा नहीं किया—और ऐसा न करने के उसके पास स्वाभाविक रूप से उसके स्वयं के कारण थे। अपने हृदय में, अय्यूब गहराई से विश्वास करता था कि जो कुछ भी उसके पास था वह उसे परमेश्वर के द्वारा प्रदान किया गया था, और उसके स्वयं के परिश्रम से नहीं आया था। इसलिए, उसने इन आशीषों को एक ऐसी चीज़ के रूप में नहीं देखा था कि उससे लाभ उठाया जाए, बल्कि अपने जीवन के सिद्धान्तों के रूप में वह उस मार्ग पर जी जान से मज़बूती से बना रहा जिस पर उसे बने रहना चाहिए था। उसने परमेश्वर की आशीषों को सँजोकर रखा, और उनके लिए धन्यवाद दिया, परन्तु वह और अधिक आशीषों के लिए अनुरक्त नहीं हुआ, न ही उसने और आशीषों की खोज की। सम्पत्ति के प्रति उसकी ऐसी प्रवृत्ति थी। न तो उसने आशीषें प्राप्त करने के लिए कुछ किया, न ही वह परमेश्वर के आशीषों की कमी या नुकसान से दुःखित हुआ; वह न तो परमेश्वर के आशीषों की वजह से बेतहाशा और उन्मत रूप से प्रसन्न हुआ, न ही उसने उन आशीषों के कारण जिनका वह बार-बार आनन्द उठता था परमेश्वर के मार्गों की उपेक्षा की या परमेश्वर के अनुग्रह को भुलाया। अपनी सम्पत्ति के प्रति अय्यूब की प्रवृत्ति लोगों के लिए उसकी सच्ची मानवता को प्रकट करती है: पहली बात, अय्यूब एक लोभी मनुष्य नहीं था, और वह अपने भौतिक जीवन में उदार था। दूसरी बात, अय्यूब ने इस बात की कभी चिंता नहीं की या इससे कभी नहीं डरा कि परमेश्वर वह सब ले लेगा जो उसके पास है, जो परमेश्वर के प्रति उसके हृदय में आज्ञाकारिता की उसकी प्रवृत्ति थी; अर्थात्, इस बारे में उसकी कोई माँग या शिकायतें नहीं थीं कि कब या क्या परमेश्वर उससे सब कुछ ले लेगा, और उसने कारण नहीं पूछा कि क्यों, बल्कि उसने केवल परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन करने की कोशिश की। तीसरी बात, उसने कभी भी यह नहीं माना कि उसकी सम्पत्तियाँ उसके अपने प्रयासों से आई थीं, बल्कि यह कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा उसे प्रदान किया गया था। यह परमेश्वर पर अय्यूब का विश्वास था, और उसके दृढ़ विश्वास का एक संकेत है। क्या अय्यूब की मानवता और उसकी दैनिक सच्ची खोज को उसके बारे में इस तीन-सूत्रीय सारांश में स्पष्ट कर दिया गया है? अय्यूब की मानवता और खोज उसके उदासीन आचरण से अभिन्न थे जब उसने अपनी सम्पत्ति के खो जाने का सामना किया था। यह निश्चित रूप से उसकी प्रतिदिन की खोज की वजह से था कि परमेश्वर की परीक्षाओं के दौरान अय्यूब के पास ऐसी कद-काठी और दृढ़ विश्वास था कि उसने कहा, "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है," इन वचनों को रातों-रात प्राप्त नहीं किया गया था, न ही वे बस यूँ ही अय्यूब के दिमाग में उछले थे। ये ऐसी बातें थीं जिन्हें उसने कई सालों तक जीवन का अनुभव करने के दौरान देखा और अर्जित किया था। उन सभी लोगों की तुलना में जो केवल परमेश्वर के आशीषों को ही खोजते हैं, और जो इस बात से डरते हैं कि परमेश्वर उन्हें उनसे ले लेगा, वे इस बात से नफरत करते हैं और इसके बारे में शिकायत करते हैं, क्या अय्यूब की आज्ञाकारिता एकदम वास्तविक नहीं है? उन सभी लोगों की तुलना में जो यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर है, परन्तु जिन्होंने कभी यह विश्वास नहीं किया है कि परमेश्वर सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है, क्या अय्यूब बड़ी ईमानदारी और खराई धारण नहीं करता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

फुटनोट:

क. मूल पाठ में "के नुकसान" यह वाक्यांश नहीं है।

ख. मूल पाठ में "जो चला गया था" यह वाक्यांश नहीं है।

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