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सूचीपत्र

ईमानदार व्यक्ति और धोखेबाज व्यक्ति में क्या अंतर है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

मैं उन लोगों की बहुत अधिक सराहना करता हूँ जो दूसरों के बारे में संदेह को आश्रय नहीं देते हैं और उन्हें भी बहुत पसंद करता हूँ जो सहजता से सत्य को स्वीकार करते हैं; इन दो तरह के मनुष्यों के लिए मैं बहुत अधिक परवाह दिखाता हूँ, क्योंकि मेरी दृष्टि में वे ईमानदार मनुष्य हैं। यदि तुम बहुत धोखेबाज हो, तो तुम्हारे पास एक संरक्षित हृदय होगा और सभी मामलों और सभी लोगों के बारे में संदेह के विचार होंगे। इसी कारण से, मुझ में तुम्हारा विश्वास संदेह कि नींव पर बना है। इस प्रकार के विश्वास को मैं कभी भी स्वीकार नहीं करूँगा। सच्चे विश्वास का अभाव होने पर, तुम सच्चे प्रेम से और भी अधिक दूर होगे। और यदि तुम परमेश्वर पर भी संदेह करने और अपनी इच्छानुसार उसके बारे में अनुमान लगाने में समर्थ हो, तो तुम संदेह से परे, मनुष्यों में सबसे अधिक धोखेबाज हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें" से उद्धृत

कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं और विशेष रूप से "शिष्ट" व्यवहार करते हैं, मगर पवित्रात्मा की उपस्थिति में वे अवज्ञाकारी हो जाते हैं और सभी संयम खो देते हैं। क्या तुम लोग ऐसे मनुष्य की गिनती ईमानदार लोगों की श्रेणी में करोगे? यदि तुम एक पाखंडी हो और ऐसे व्यक्ति हो जो लोगों से घुलने-मिलने में दक्ष है, तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को तुच्छ समझता है। यदि तुम्हारे वचन बहानों और अपने महत्वहीन तर्कों से भरे हुए हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने का अत्यधिक अनिच्छुक है। यदि तुममें ऐसे बहुत से आत्मविश्वास हैं जिन्हें साझा करने के लिए तुम अनिच्छुक हो, और यदि तुम अपने रहस्यों को—कहने का अर्थ है, अपनी कठिनाइयों को—दूसरों के सामने प्रकट करने के अत्यधिक अनिच्छुक हो ताकि प्रकाश का मार्ग खोजा जा सके, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और जो आसानी से अंधकार से नहीं निकलेगा। यदि सत्य का मार्ग खोजने से तुम लोगों को प्रसन्नता मिलती है, तो तुम उसके समान हो जो सदैव प्रकाश में जीवन व्यतीत करता है। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवा करने वाला और काम करने वाला बन कर प्रसन्न हो, गुमनामी में कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण के साथ काम करते हो, हमेशा अर्पित करते हो और कभी भी लेते नहीं हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक वफादार संत हो, क्योंकि तुम किसी प्रतिफल की खोज नहीं करते हो और तुम मात्र एक ईमानदार मनुष्य बने रहते हो। यदि तुम निष्कपट बनने के इच्छुक हो, यदि तुम अपना सर्वस्व खर्च करने के इच्छुक हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन बलिदान करने और उसका गवाह बनने में समर्थ हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम केवल परमेश्वर को प्रसन्न करना जानते हो, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे लोगों में से हो जो प्रकाश में पोषित हैं और सदा के लिए राज्य में रहेंगे। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हारे भीतर सच्चा विश्वास और सच्ची वफादारी है कि नहीं, परमेश्वर के लिए कष्ट उठाने का तुम्हारा कोई अभिलेख है कि नहीं, और तुमने परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पण किया है कि नहीं। यदि तुममें इन बातों का अभाव है, तो तुम्हारे भीतर अवज्ञा, धोखा, लालच और शिकायत बची है। चूँकि तुम्हारा हृदय ईमानदार नहीं है, इसलिए तुमने कभी भी परमेश्वर से सकारात्मक स्वीकृति प्राप्त नहीं की है और कभी भी प्रकाश में जीवन नहीं बिताया है। अंत में किसी व्यक्ति का भाग्य कैसे सम्पन्न होता है यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके पास एक ईमानदार और रक्तिम हृदय है कि नहीं, और उसके पास एक शुद्ध आत्मा है कि नहीं। यदि तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो अत्यधिक बेईमान है, जिसके पास दुर्भावनापूर्ण हृदय है, और कोई ऐसे व्यक्ति हो जिसकी आत्मा अशुद्ध है, तो तुम्हारे भाग्य का अभिलेख निश्चित रूप से ऐसी जगह में है जहाँ मनुष्य को दण्ड दिया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तीन चेतावनियाँ" से उद्धृत

एक धोखेबाज़ व्यक्ति किसी पर भी अपनी चालें आज़माता है, वह अपने रिश्तेदारों—यहां तक कि अपने बच्चे भी नहीं छोड़ता है। भले ही तुम उसके साथ कितने भी साफ़दिल से पेश आओ, वह तुम्हारे साथ चाल चलने की कोशिश करेगा। यह उसके स्वभाव का असली चेहरा है, और वह इसी प्रकृति का व्यक्ति है। इसे बदलना मुश्किल है और वह हर समय इसी तरह रहता है। ईमानदार लोग कभी-कभी धूर्त और धोखेबाज़ शब्द कह सकते हैं, लेकिन ऐसा व्यक्ति आम तौर पर ईमानदार रहता है; वह दूसरों के साथ अपने संबंधों में बिना उनका अनुचित लाभ उठाए ईमानदारी से काम करता है। जब वह अन्य लोगों के साथ बात करता है, तो वह उन्हें आज़माने के लिए जानबूझकर कुछ बातें नहीं बोलता है; वह तब भी काफ़ी ईमानदार रहता है और खुले दिल से दूसरों के साथ संवाद कर सकता है। हर कोई कहता है कि वह काफ़ी ईमानदार व्यक्ति है, लेकिन फिर भी कभी ऐसा समय होता है जब वह थोड़ी-बहुत धोखेबाज़ी से बात करता है। यह केवल एक दूषित स्वभाव का प्रकटन है और यह उसकी प्रकृति का प्रतिनिधित्व नहीं करता, क्योंकि वह उस प्रकार का व्यक्ति नहीं है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें" से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

ईमानदार लोगों और धोखेबाज लोगों की प्रकृति में अंतर की वजह से, उनके व्यवहार और आचरण भी बहुत हद तक भिन्न होते हैं। कलीसिया के भीतर, ईमानदार लोग आसानी से सिद्ध बन जाते हैं, जबकि धोखेबाज लोग आसानी से सिद्ध नहीं बनते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ईमानदार लोग सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार होते हैं और सत्य को अभ्यास में ला सकते हैं, जबकि धोखेबाज लोगों को सत्य को अभ्यास में लाना मुश्किल लगता है, भले ही वे सत्य को स्वीकार करते हों। ईमानदार लोग परमेश्वर में अपनी आस्था में परमेश्वर को अपना हृदय समर्पित कर पाते हैं, जबकि धोखेबाज लोग नहीं कर पाते। ईमानदार लोग परमेश्वर के लिए स्वयं को व्यय करने के लिए सब कुछ समर्पित करने में सक्षम होते हैं, जबकि धोखेबाज लोग बदले में कुछ माँगने और शर्तें रखने को तत्पर रहते हैं। ईमानदार लोगों के हृदय शुद्ध और ईमानदार होते हैं, जबकि धोखेबाज लोगों के हृदय विश्वासघाती और अधीर होते हैं। परमेश्वर को जब भी ईमानदार लोगों से कोई अपेक्षा होती है, तो वे परमेश्वर को संतुष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, जबकि धोखेबाज लोग किसी भी कर्तव्य को करने में बेपरवाह होते हैं और वे यह सुनिश्चित करने के लिए एक पैर दरवाजे में रखते हैं कि उनके पास एक रास्ता रहे। ईमानदार लोग भाषण और कृत्य दोनों में विश्वसनीयता का विशेष ध्यान रखते हैं, और वे परमेश्वर या अन्य लोगों को धोखा देने की कोशिश नहीं करते हैं, जबकि धोखेबाज लोग ढिठाई से सभी को धोखा देते हैं, और जब तक इससे उनका अपना स्वार्थ सधता है, तब तक वे इसे उचित समझते हैं। ईमानदार लोग दूसरों के साथ संगति करते समय उदारचरित होते हैं, वे व्यक्तिगत नुकसान या लाभ के बारे में बखेड़ा खड़ा नहीं करते हैं, और वे भावना पर जोर देने के साथ वफादारी को बढ़ावा देते हैं, जबकि धोखेबाज लोग हमेशा किसी लाभ को हासिल करने के लिए दूसरों के साथ स्पर्धा करते हैं, और वे दूसरे लोगों में ऊपरी तौर पर दिलचस्पी लेते हैं। ईमानदार लोग दूसरों के साथ अपने व्यवहार में अपना हृदय खोल पाते हैं और वह बोल पाते हैं जो उनके हृदयों में होता है, और ईमानदार और निष्कपट हो पाते हैं, जबकि धोखेबाज लोग बहुत बुरे मंसूबों को आश्रय देते हैं जो वे अन्य लोगों से छिपाकर रखते हैं, और वे दूसरों के साथ मेल-मिलाप करने में असमर्थ होते हैं। ईमानदार लोग अपने भाषण और आचरण में सीधे और सरल होते हैं, और तथ्यात्मक एवं स्पष्टभाषी होते हैं, जबकि धोखेबाज लोग अपने भाषण और आचरण में अस्पष्ट होते हैं और विश्वासघाती इरादे को आश्रय देते हैं, और वे कहते कुछ और करते कुछ हैं। ईमानदार लोग शुद्ध और स्पष्ट, निर्दोष और जीवंत होते हैं, और परमेश्वर और अन्य लोग दोनों उन्हें प्रेम करते हैं, जबकि धोखेबाज लोग पापी उद्देश्यों को आश्रय देते हैं, वे परिस्थितियों के अनुसार चलते हैं, उनकी भाव-भंगिमा बहुत भव्य होती है, उनमें बहुत अधिक झूठ और पाखंड होता है और परमेश्वर और अन्य लोग दोनों ही उनसे घृणा करते हैं। ये सभी अभिव्यक्तियाँ ईमानदार लोगों और धोखेबाज लोगों के बीच अंतर हैं।

— ऊपर से संगति में से उद्धृत

अगर लोग ईमानदार नहीं हैं, तो परमेश्वर उनसे प्रसन्न नहीं है, और वे भीड़ में मजबूती से खड़े नहीं हो पाएंगे। ईमानदार लोग परमेश्वर द्वारा न केवल पसंद किए जाते हैं, बल्कि लोगों के द्वारा भी पसंद किए जाते हैं। लोग ईमानदार लोगों को क्यों पसंद करते हैं? इसका एक पहलू यह है कि ईमानदार लोग भरोसेमंद होते हैं। जब तुम उनके साथ सम्बद्ध होते हो, तो तुम्हारा हृदय शांत और स्थिर होता है; तुम्हें कोई शक नहीं होता है, भविष्य की परेशानियों के बारे में तुम्हें कोई चिंता नहीं होती है, तुम यह चिंता नहीं करते हो कि वे तुम्हें धोखा देने या तुम्हें नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेंगे। मुख्य बात यह है कि ईमानदार लोग दूसरों की सहायता करने की कोशिश करते हैं, वे दूसरों के लिए अपना हृदय खोल कर रख देते हैं, वे इस तरह सहायता करते हैं कि दूसरों को लाभ हो। परमेश्वर ईमानदार लोगों से प्रेम करता है, क्योंकि परमेश्वर पर विश्वास करने में ईमानदार लोग सत्य से प्रेम करते हैं, और सत्य का अभ्यास कर सकते हैं; इस प्रकार पवित्र आत्मा उन पर कार्य करता है। जब पवित्र आत्मा ईमानदार लोगों पर कार्य करता है, तो वे परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करेंगे, वे सत्य को समझ सकते हैं, वे एक वास्तविक इंसान की तरह जिंदगी जी सकते हैं; इयही कारण है कि ईमानदार लोगों को लोग पसंद करते हैं। इसके अलावा, ईमानदार लोगों से संबद्ध हो कर कोई यह भी सीख सकता है कि स्वयं कैसे आचरण करें,कार्य कैसे करें, सत्य का कैसे अभ्यास करें, और अंत में तुम उनके साथ मिलकर, एक सामान्य इंसान की तरह जिंदगी कैसे जी सकते हो। क्यों लोग कपटी लोगों को नापसंद करते हैं? क्यों परमेश्वर कपटी लोगों से घृणा करता है? कपटी लोगों के अधम व्यवहार क्या हैं? उनकी प्रकृति और सार क्या है? वे लोगों के लिए क्या ला सकते हैं? एक कुटिल, चालाक व्यक्ति के लिए, उसके भ्रष्ट स्वभाव का सार क्या है? वह अत्यंत स्वार्थी होता है। वह सब कुछ अपने लिए करता है, वे दूसरों के बारे में विचार नहीं करते हैं, वे केवल अपने ही सुखों की तलाश करते हैं, उन्हें कोई परवाह नहीं है कि दूसरे जीएँ या मरें। इस तरह का व्यक्ति सर्वाधिक स्वार्थी और घृणित व्यक्ति है। यदि कोई व्यक्ति ईमानदार नहीं है, और वह कलीसिया में कोई बड़ा पद पाता है, तो क्या परमेश्वर के चुने हुए लोगों को कोई लाभ मिलेगा? वह यह विचार नहीं करता है कि क्या परमेश्वर के चुने हुए लोग सत्य को प्राप्त कर सकते हैं या नहीं, क्या परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने का परिणाम मिलेगा या नहीं, क्या परमेश्वर के चुने हुए लोग सत्य को प्राप्त कर सकते हैं या नहीं, क्या वे वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं या नहीं, क्या वे परमेश्वर में आस्था के सही मार्ग में प्रवेश कर सकते हैं या नहीं, क्या वे बचाए जा सकते हैं या नहीं। वह जिस पर विचार करता है वह है, "जब तक मुझे ख़ुशी मिलती है, जब तक मेरी हैसियत है, जब तक मैं हर किसी से अलग हूँ, मेरा हर किसी पर नियंत्रण है, और जब तक मैं संतुष्ट हूँ, तब तक यह सब ठीक है!" अगर उसकी अपनी दैहिक इच्छाएँ पूरी होती हैं तब उसका मतलब पूरा होता है, वह परमेश्वर के चुने हुए लोगों की स्थितियों पर विचार नहीं करता है, चाहे वे जीएं या मर जाएं। क्या यह एक कुटिल व्यक्ति का मुख्य सार नहीं है? तो कपटी लोग केवल स्वयं में ही रुचि रखते हैं। स्वयं के लिए दैहिक सुख को पाने की कोशिश करते हैं, और दूसरों की भावनाओं का ख्याल नहीं रखते हैं।

— जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (XIII) में "केवल एक ईमानदार व्यक्ति के पास ही एक सच्चे मानव की सदृशता है" से उद्धृत

ईमानदार लोग सत्य का अनुसरण करते हैं क्योंकि वे सत्य से प्रेम करते हैं। बेईमान लोगों के बारे में क्या कहा जा सकता है? वे सत्य से प्रेम नहीं करते हैं। वे सिद्धांतों को पसंद करते हैं। वे लोगों को चीज़ें समझाना पसंद करते हैं और लोगों के लिए काम करना पसंद करते हैं। वे दिखावा करना चाहते हैं। इसलिए, वे बोलने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। क्या यह एक नक़ली व्यक्ति होना नहीं है? क्या यह एक चालाक व्यक्ति होना नहीं है? चालाक लोग अपने बाहरी रूप की चिंता करते हैं। बिल्कुल फरीसियों की तरह, जो ऐसे प्रार्थना करते थे ताकि दूसरे उन्हें देख सकें। वे चौराहों पर प्रार्थना करते थे, ताकि हर कोई उन्हें देख सके, ताकि हर जगह लोग उन पर ध्यान दे सकें। वे बाहर से बहुत भक्तिपूर्ण लगते थे! लेकिन वे वास्तव में क्या कर रहे थे? वे पूरे धोखेबाज़ और पूरे कपटी बन रहे थे। ईमानदार लोग सत्य से प्रेम करते हैं। जब वे परमेश्वर की उपस्थिति में होते हैं, तो सत्य का अनुसरण करने, परमेश्वर की इच्छा को समझने, और परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा के अलावा उनके पास कोई अन्य विचार नहीं होते हैं। वे तरह-तरह की चालाक साज़िशों को आश्रय नहीं देते हैं, उनके पास बहुत से स्वार्थी और नीच विचार नहीं होते हैं। उनके पास शुद्ध हृदय होते हैं। हर चीज में, वे केवल इस एक बात का ही विचार करते हैं: "मैं परमेश्वर को कैसे संतुष्ट कर सकता हूँ? परमेश्वर की सच्ची इच्छा क्या है?" यदि उनकी समझ में नहीं आता है, तो वे निरंतर प्रार्थना करते हैं और उस पर लगातार विचार करते हैं, जब तक कि यह उनकी समझ में नहीं आ जाता है। क्या इस तरह के लोग ईमानदार व्यक्ति नहीं हैं? ईमानदार लोग सत्य से प्रेम करते हैं, इसलिए वे निश्चित रूप से सत्य का अनुसरण करेंगे। परमेश्वर के सामने अपनी प्रार्थनाओं में, वे सत्य का अनुसरण करने और सत्य की कोशिश करने के अलावा अन्य कुछ नहीं माँगते हैं। यदि तुम उनसे कहो कि वे सत्य की तलाश न करें या अपनी प्रार्थनाओं में परमेश्वर की इच्छा को न समझें, तो उन्हें लगेगा है कि उनके पास कहने को कुछ है ही नहीं, क्योंकि वे महसूस करते हैं कि उनके पास केवल ये ही चीजें हैं जो वे परमेश्वर के सामने कर सकते हैं, उन्हें लगता है कि इन बातों के अलावा कुछ और करना अर्थहीन और खोखला है। वे झूठी बातें करने के लिए तैयार नहीं हैं। चालाक लोग इस तरह के नहीं होते हैं। वे परमेश्वर के सामने हमेशा शेखी बघारते हैं और आडम्बर करते हैं, अपने स्वयं के तर्क के बारे में बोलते हैं, अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करते हैं, और अपनी उपलब्धियों का दिखावा करते हैं। वास्तव में, वे जो कुछ भी करते हैं, वह सब दूसरों के देखने के लिए होता है, वे चाहते हैं कि दूसरे उनका अनुमोदन करें, उनकी प्रशंसा करें और उनकी बात सुनें। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, जो परमेश्वर की इच्छा को समझने की कोशिश नहीं करते हैं, जो सत्य के प्यासे नहीं होते हैं, वे सभी चालाक, नक़ली, पाखंडी लोग हैं...।

— जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (V) में "एक ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए प्रवेश और अभ्यास के दस पहलू" से उद्धृत

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