अनुग्रह के युग की तुलना में राज्य के युग में, कलीसियाई जीवन में क्या अंतर है?

17 मार्च, 2018

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"जब वे खा रहे थे तो यीशु ने रोटी ली, और आशीष माँगकर तोड़ी, और चेलों को देकर कहा, 'लो, खाओ; यह मेरी देह है।' फिर उसने कटोरा लेकर धन्यवाद किया, और उन्हें देकर कहा, 'तुम सब इसमें से पीओ, क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त बहाया जाता है'" (मत्ती 26:26-28)।

"मैं ने स्वर्गदूत के पास जाकर कहा, 'यह छोटी पुस्तक मुझे दे।' उसने मुझ से कहा, 'ले, इसे खा ले; यह तेरा पेट कड़वा तो करेगी, पर तेरे मुँह में मधु सी मीठी लगेगी'" (प्रकाशितवाक्य 10:9)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जब, अनुग्रह के युग में, परमेश्वर तीसरे स्वर्ग में लौटा, तो समस्त मानव जाति के छुटकारे का परमेश्वर का कार्य वास्तव में पहले से ही अपनी समापन की क्रिया में चला गया था। धरती पर जो कुछ भी शेष रह गया था वह था सलीब जिसे यीशु ने ढोया था, बारीक सन का कपड़ा जिसमें यीशु को लपेटा गया था, और काँटों का मुकुट और लाल रंग का लबादा जो यीशु ने पहना था (ये वे वस्तुएँ थीं जिन्हें यहूदियों ने उसका मज़ाक उड़ाने के लिए उपयोग किया था)। अर्थात्, यीशु के सलीब पर चढ़ने का कार्य, एक समय के लिए कोहराम का कारण बना था और फिर शांत हो गया था। तब से, यीशु के शिष्यों ने, कलीसियाओं में चरवाही करते हुए और सींचते हुए, हर कहीं उसके कार्य को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। उनके कार्य की विषय-वस्तु यह थी: सभी लोगों से पश्चाताप करवाना, उनके पापों को स्वीकार करवाना और बपतिस्मा दिलवाना; सभी प्रेरितों ने यीशु के सलीब पर चढ़ने की अंदर की कहानी को और जो वास्तव में हुआ था उसे फैलाया, हर कोई अपने पापों को स्वीकार करने के लिए यीशु के सामने गिरने से रोक नहीं पाया, और इसके अलावा प्रेरित सभी जगह उन वचनों को जो यीशु ने बोले थे, फैला रहे थे। उस क्षण से अनुग्रह के युग में कलीसियाओं का निर्माण होना शुरू हुआ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (6)' से उद्धृत

अतीत में, विशेष सभाओं या विशाल सभाओं के दौरान जो विभिन्न स्थानों में होती थीं, अभ्यास के मार्ग के केवल एक पहलू के बारे में ही बोला जाता था। इस प्रकार का अभ्यास ऐसा था जिसे अनुग्रह के युग के दौरान अभ्यास में लाया जाना था, और इसका परमेश्वर के ज्ञान से शायद ही कोई सम्बन्ध था, क्योंकि अनुग्रह के युग का दर्शन केवल यीशु के सलीब पर चढ़ने का दर्शन था, और उससे बड़े कोई दर्शन नहीं थे। मनुष्य से अपेक्षा की गई थी कि वह सलीब पर चढ़ने के माध्यम से मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर के छुटकारे के कार्य से अधिक कुछ न जाने, और इसलिए अनुग्रह के युग के दौरान मनुष्य के जानने के लिए कोई अन्य दर्शन नहीं थे। इस तरह, मनुष्य के पास परमेश्वर का सिर्फ थोड़ा सा ही ज्ञान था, और यीशु के प्रेम और अनुकम्पा के ज्ञान के अलावा, उसके लिए अभ्यास में लाने हेतु केवल कुछ साधारण और दयनीय चीजें ही थीं, ऐसी चीज़ें जो आज की अपेक्षा एकदम अलग थीं। अतीत में, उसकी सभा भले ही कोई भी रूप क्यों न ले, मनुष्य परमेश्वर के कार्य के व्यावहारिक ज्ञान के बारे में बात करने में असमर्थ था, और कोई भी स्पष्ट रूप से यह कहने के योग्य तो बिलकुल नहीं था कि मनुष्य के लिए प्रवेश करने हेतु अभ्यास का सबसे उचित मार्ग कौन सा है। उसने सहनशीलता और धैर्य की एक नींव में मात्र कुछ साधारण विवरणों को जोड़ दिया; उसके अभ्यास के सार में बस कोई परिवर्तन नहीं था, क्योंकि उसी युग के भीतर परमेश्वर ने कोई और नया कार्य नहीं किया था, और जो अपेक्षाएँ उसने मनुष्य की थीं वे मात्र सहनशीलता और धैर्य थीं, या सलीब को वहन करना था। ऐसे अभ्यासों के अलावा, यीशु के सलीब पर चढ़ने की तुलना में कोई ऊँचे दर्शन नहीं थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

जब कभी भी ऐसे धार्मिक लोग जमा होते हैं, वे पूछते हैं, "बहन, इन दिनों तुम कैसी रही हो?" वह उत्तर देती है, "मैं परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ महसूस करती हूँ और कि मैं उसके हृदय की इच्छा को पूरा करने में असमर्थ हूँ।" दूसरी कहती है, "मैं भी परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हूँ और उसे संतुष्ट करने में असमर्थ हूँ।" ये कुछ वाक्य और वचन अकेले ही उनके हृदयों की गहराई की अधम चीजों को व्यक्त करते हैं। ऐसे वचन अत्यधिक घृणित और अत्यंत अरुचिकर हैं। ऐसे मनुष्यों की प्रकृति परमेश्वर का विरोध करती है। जो लोग वास्तविकता पर ध्यान केन्द्रित करते हैं वे वही संचारित करते हैं जो उनके हृदयों में होता है और संवाद में अपने हृदय को खोल देते हैं। उनमें एक भी झूठा श्रम, कोई शिष्टताएँ या खोखली मधुर बातें नहीं होती है। वे हमेशा स्पष्ट होते हैं और किसी पार्थिव नियम का पालन नहीं करते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिनमें, बिना किसी समझ के, बाह्य प्रदर्शन की प्रवृत्ति होती है। जब कोई दूसरा गाता है, तो वह नाचने लगता है, यहाँ तक कि यह समझे बिना कि उसके बरतन का चावल पहले से ही जला हुआ है। लोगों के इस प्रकार के चाल-चलन धार्मिक या सम्माननीय नहीं हैं, और बहुत ही तुच्छ हैं। ये सब वास्तविकता के अभाव की अभिव्यक्तियाँ है! जब कुछ लोग आत्मा में जीवन के मामलों के बारे में संगति करने के लिए इकट्ठा होते हैं, यद्यपि वे परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ होने की बात नहीं करते हैं, फिर भी वे अपने हृदयों में उसके प्रति एक सच्चे प्यार को कायम रखते हैं। परमेश्वर के प्रति तुम्हारी कृतज्ञता का दूसरों से कोई लेना देना नहीं है; तुम परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हो, न कि किसी मनुष्य के प्रति। इसलिए इस बारे में लगातार दूसरों से कहना तुम्हारे किस उपयोग का है? तुम्हें अवश्य सत्य में प्रवेश करने को महत्व देना चाहिए, न कि बाहरी उत्साह या प्रदर्शन को।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विश्वास में, वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, धार्मिक रीति-रिवाजों में संलग्न होना विश्वास नहीं है' से उद्धृत

"अनुभव साझा करने और संगति करने" का अर्थ है अपने हृदय के हर विचार, अपनी अवस्था, अपने अनुभवों और परमेश्वर के वचनों के ज्ञान, और साथ ही अपने भीतर के भ्रष्ट स्वभाव के बारे में बात करना और उसके बाद, अन्य लोग इन बातों को समझते हैं, और सकारात्मक को स्वीकार करते हैं और जो नकारात्मक है उसे पहचानते हैं। केवल यही साझा करना है, और केवल यही वास्तव में संगति करना है। इसका अर्थ सिर्फ परमेश्वर के वचनों में या भजन के किसी हिस्से में अंतर्दृष्टि का होना नहीं है, और अपनी इच्छानुसार संगति करना, फिर इसे आगे नहीं ले जाना, और अपने स्वयं के वास्तविक जीवन से संबंधित कुछ भी नहीं कहना नहीं है। हर कोई सिद्धांत संबंधी और सैद्धांतिक ज्ञान के बारे में बात करता है और वास्तविक अनुभवों से प्राप्त ज्ञान के बारे में कोई बात नहीं करता है। तुम सभी इस तरह की बातों के बारे में, अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में, अपने भाइयों और बहनों के साथ कलीसिया में अपने जीवन के बारे में, और अपनी खुद की आंतरिक दुनिया के बारे में बात करने से बचते हो। ऐसा करने से, लोगों के बीच सच्ची संगति कैसे हो सकती है? वास्तविक विश्वास कैसे हो सकता है? कोई विश्वास नहीं हो सकता है! अगर कोई पत्नी अपने हृदय की कोई बात अपने पति से कभी न कहे, तो क्या वे हमराज़ हैं? क्या वे एक दूसरे को मन की बात बताते हैं? मान लीजिए कि पूरे दिन वे कहते हैं, "मैं तुम्हें प्रेम करता/करती हूँ!" वे केवल यही कहते हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने कभी नहीं जाहिर किया है कि वे अपने हृदय में क्या सोच रहे हैं, वे एक-दूसरे से क्या चाहते हैं, या उन्हें क्या समस्याएँ हैं। उन्होंने कभी एक-दूसरे से ऐसी बातें नहीं बताई हैं, न उन्होंने कभी भी एक-दूसरे को अपने मन की बात बताई है—और अगर दोनों कभी भी एक दूसरे को मन की बात नहीं बताते हैं, तो क्या वे ऐसे दम्पति हैं जो एक दूसरे से प्रेम करते हैं? एक दूसरे के साथ रहते समय अगर उनके पास एक दूसरे के प्रति बड़ी बड़ी बातों के अलावा कुछ नहीं है, तो क्या वे वास्तविक पति और पत्नी हैं? बिल्कुल नहीं! यदि भाई-बहनों को एक-दूसरे में विश्वास करने में सक्षम होना है, एक-दूसरे की सहायता करनी है और जब साथ होने पर एक-दूसरे का भरण-पोषण करना है, तो प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य अपने स्वयं के वास्तविक अनुभवों के बारे में बात करनी चाहिए। यदि तू अपने स्वयं के सच्चे अनुभवों के बारे में बात नहीं करता है, और केवल आडंबर-पूर्ण बातें ही करता है, और ऐसे वचन बोलता है जो सिद्धांत संबंधी और सतही हैं, तो तू एक ईमानदार व्यक्ति नहीं है, और तू ईमानदार होने में असमर्थ है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

जब तुम परमेश्वर के लिए गवाही देते हो, तो तुमको मुख्य रूप से इस बारे में अधिक बात करनी चाहिए कि परमेश्वर कैसे न्याय करता है और लोगों को कैसे दंड देता है, मनुष्यों का शुद्धिकरण करने और मनुष्यों के स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए किन परीक्षणों का उपयोग करता है। तुमको इस बारे में भी बात करनी चाहिए कि तुमने कितना सहन किया है, तुम लोगों के भीतर कितने भ्रष्टाचार को प्रकट किया गया है, और आखिरकार परमेश्वर ने कैसे तुमको जीता था; परमेश्वर के कार्य का कितना वास्तविक ज्ञान तुम्हारे पास है और तुमको परमेश्वर के लिए कैसे गवाही देनी चाहिए और परमेश्वर के प्रेम का मूल्य कैसे चुकाना चाहिए। तुम लोगों को इन बातों को सरल तरीके से प्रस्तुत करते हुए, इस प्रकार की भाषा का अधिक व्यावहारिक रूप से प्रयोग करना चाहिए। खोखले सिद्धांतों की बातें मत करो। वास्तविक बातें अधिक किया करो; दिल से बातें किया करो। तुम्हें इसी प्रकार अनुभव करना चाहिए। अपने आपको बहुत ऊंचा दिखाने की कोशिश न करो, और खोखले सिद्धांतों के बारे में बात न करो; ऐसा करने से तुम्हें बहुत घमंडी और तर्कहीन माना जाएगा। जिन वास्तविक, यथार्थ बातों का तुम दिल से और असल में अनुभव करते हो उनके बारे में ज़्यादा बात करो; यह दूसरों के लिए बहुत लाभकारी होगा और उनके समझने के लिए सबसे उचित होगा। तुम लोग परमेश्वर के सबसे कट्टर विरोधी थे और उनके प्रति समर्पित होने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन अब परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम जीत लिए गए हो, इसे कभी नहीं भूलो। इस प्रकार के मामलों में तुमको अनवरत विचार और मंथन की आवश्यकता होती है। एक बार जब तुम इसे समझ जाओगे, तो तुमको गवाही देने का तरीका पता चल जाएगा; अन्यथा तुम और अधिक बेशर्म और मूर्खतापूर्ण कृत्य कर बैठोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही तू अपने स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त कर सकता है' से उद्धृत

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