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कहानी. कहानी एक बड़ा पर्वत, एक छोटी जलधारा, एक प्रचण्ड हवा और एक विशाल लहर

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एक छोटी-सी जलधारा थी जो यहाँ-वहाँ घूमती हुई बहती थी, और अन्ततः वह एक बड़े पर्वत के निचले सिरे पर पहुँचती थी। पर्वत उस छोटी जलधारा के मार्ग को रोक रहा था, अतः उस जलधारा ने अपनी कमज़ोर एवं धीमी आवाज़ में पर्वत से कहा, "कृपया मुझे गुज़रने दो, तुम मेरे मार्ग में खड़े हुए हो और मेरे आगे के मार्ग रोक रहे हो।" तब उस पर्वत ने पूछा, "तुम कहाँ जा रही हो?" इस पर उस छोटी-सी जलधारा ने जवाब दिया, "मैं अपने घर को ढूंढ़ रही हूँ।" पर्वत ने कहा, "ठीक है, आगे बढ़ो और सीधे मेरे ऊपर से बहकर निकल जाओ!" परन्तु क्योंकि वह छोटी जलधारा बहुत ही कमज़ोर थी और काफी छोटी थी, उसके लिए उस विशाल पर्वत के ऊपर से बहना सम्भव नहीं था, अतः उसके पास पर्वत के निचले सिरे पर लगातार बहते रहने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था ...

तभी वहाँ एक प्रचण्ड हवा का झोंका धूल और रेत लेकर आया और हवा पर्वत पर जोर से चीखी, "मुझे जाने दो!" पर्वत ने कहा, "तुम कहाँ जा रही हो?" हवा पलटकर चिल्लाई, "मैं पर्वत के उस पार जाना चाहती हूँ।" पर्वत ने कहा, "ठीक है, अगर तुम मेरे बीच से होकर निकल सकती हो, तो तुम जा सकती हो!" प्रचण्ड हवा ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी, लेकिन प्रचण्डता से बहने के बावजूद, वह पर्वत के बीच से होकर नहीं निकल सकी। हवा थक गई, और आराम करने के लिए रूक गई। अतः पर्वत के उस किनारे पर केवल एक कमज़ोर हवा रुक-रुककर बहने लगी, जिससे लोग प्रसन्न थे। पर्वत ने इस तरह से लोगों का सत्कार किया ...

समुद्र के तट पर, सागर की फुहार चट्टानों पर आहिस्ता-आहिस्ता लुढ़कने लगी। अचानक, एक विशाल लहर ऊपर आई और गरजती हुई पर्वत की ओर अपना मार्ग बनाने लगी। "हट जाओ!" विशाल लहर चिल्लाने लगी। पर्वत ने पूछा, "तुम कहाँ जा रही हो?" बड़ी लहर नहीं रूकी और वह लगातार उमड़ने लगी जब उसने जवाब दिया, "मैं अपनी सीमा को बढ़ा रही हूँ और मैं अपने बाजुओं को थोड़ा और फैलाना चाहती हूँ।" पर्वत ने कहा, "ठीक है, यदि तुम मेरी चोटी से गुज़र सकती हो, तो मैं तुम्हें रास्ता दे दूँगा।" विशाल लहर थोड़ा पीछे हटी, और एक बार फिर से पर्वत की ओर उमड़ने लगी। लेकिन पूरी कोशिश करके भी वह पर्वत के ऊपर से नहीं जा सकी। उसके पास इसके सिवाय कोई और विकल्प नहीं था कि धीरे से वापस वहाँ चली जाए जहाँ से वह आई थी ...

शताब्दियाँ गुज़रने के बाद, वह छोटी जलधारा आहिस्ता-आहिस्ता पर्वत के निचले सिरे के चारों ओर रिसने लगी। पर्वत ने जो रास्ता बनाया था, उसी का अनुसरण करके वह छोटी जलधारा वापस अपने निवास में पहुँच गई; वह नदी में मिल गई, और समुद्र में बह गई। पर्वत की देखरेख में वह छोटी जलधारा कभी खत्म नहीं हुई। छोटी जलधारा और पर्वत एक-दूसरे पर भरोसा करते थे, वे एक दूसरे को रोके हुए थे, और वे एक-दूसरे पर निर्भर रहे।

(छवि स्त्रोत: Megapixl)

शताब्दियों बाद भी, प्रचण्ड हवा ने पर्वत पर चीखने-चिल्लाने की अपनी आदतों को नहीं बदला। जब प्रचण्ड हवा पर्वत के पास "पहुँचती" तो वह रेत के बड़े-बड़े भँवर उड़ाने लगती, ठीक वैसे ही जैसे वह पहले किया करती थी। वह पर्वत को डराती, लेकिन पर्वत के बीच में से होकर कभी नहीं निकल पाई। प्रचण्ड हवा और बड़ा पर्वत एक दूसरे पर भरोसा करते थे, वे एक दूसरे को रोके हुए थे, और एक दूसरे पर निर्भर थे।

शताब्दियों बाद भी, विशाल लहर ने भी आराम नहीं किया, और कभी फैलना बन्द नहीं किया। वह पर्वत की ओर बार-बार गरजती और उमड़ती, फिर भी पर्वत कभी एक इंच भी नहीं हिला। पर्वत ने समुद्र की निगरानी की, और इस तरह से, समुद्र के जलचर बहुगुणित हुए और फले-फूले। विशाल लहर और बड़ा पर्वत एक दूसरे पर भरोसा करते थे, वे एक-दूसरे को रोके हुए थे, और एक-दूसरे पर निर्भर थे।

मेरी कहानी समाप्त हुई। पहले, तुम लोग मुझे इस कहानी के बारे में क्या बता सकते हो, मुख्य विषयवस्तु क्या थी? सबसे पहले, एक पर्वत था, एक छोटी जलधारा थी, प्रचण्ड हवा और एक विशाल लहर थी। पहले भाग में छोटी जलधारा और बड़े पर्वत के साथ क्या हुआ? हम क्यों बड़े पर्वत और छोटी जलधारा के विषय में बात करेंगे? (क्योंकि पर्वत ने जलधारा की सुरक्षा की, और जलधारा कभी खत्म नहीं हुई, वे एक दूसरे पर भरोसा करते थे।) तुम लोग क्या कहोगे, पर्वत ने छोटी जलधारा की सुरक्षा की या उसको बाधित किया? (उसकी सुरक्षा की।) क्या ऐसा हो सकता है कि उसने उसे बाधित किया हो? पर्वत और छोटी जलधारा एक साथ थे; उसने जलधारा की सुरक्षा की, और यह एक बाधा भी थी। पर्वत ने जलधारा की सुरक्षा की ताकि जलधारा नदी में बह सके, लेकिन साथ ही इसे उन सभी जगहों पर बहने से भी रोका जिन्हें वह जलमग्न कर सकती थी और लोगों के लिए विनाशकारी हो सकती थी। क्या यह इस अंश का मुख्य बिन्दु है? जलधारा के लिए पर्वत की सुरक्षा ने और एक अवरोध के रूप में इसके कार्य ने लोगों के घरों की हिफाज़त की। फिर तुम लोगों के पास वह छोटी जलधारा है जो पर्वत के निचले सिरे पर नदी से मिलती है और बाद में समुद्र में बह जाती है; क्या यह उस छोटी जलधारा के लिए अति आवश्यक नहीं है? जब जलधारा नदी में और उसके बाद समुद्र में बह गई, तो वह किस पर भरोसा करती थी? क्या वह पर्वत पर भरोसा नहीं करती थी? वह पर्वत की सुरक्षा पर भरोसा करती थी और पर्वत ने एक अवरोध के रूप में कार्य किया था; क्या यह मुख्य बिन्दु है? क्या तुम इस उदाहरण में जल के लिए पर्वतों के महत्व को देखते हो? पर्वतों को ऊँचा एवं नीचा बनाने में क्या परमेश्वर के पास उसका कोई उद्देश्य है? (हाँ, है।) यह कहानी का एक छोटा-सा हिस्सा है, और बस एक छोटी सी जलधारा से और एक बड़े पर्वत से हम उनके विषय में परमेश्वर की सृष्टि में इन दोनों चीज़ों के मूल्य एवं महत्व को देख सकते हैं। हम इस बात में भी उसकी बुद्धि एवं उद्देश्य को देख सकते हैं कि वह किस प्रकार इन दोनों चीज़ों पर शासन करता है? क्या यह सही नहीं है?

कहानी का दूसरा भाग किस बारे में है? (प्रचण्ड हवा और एक बड़े पर्वत के बारे में।) क्या हवा एक अच्छी चीज़ है? (हाँ।) ज़रूरी नहीं है, यदि हवा कभी बहुत तेज हुई तो यह विनाशकारी हो सकती है। यदि तुम्हें प्रचण्ड हवा में बाहर रहना पड़े तो तुम्हें कैसा महसूस होगा? यह इस बात पर निर्भर करता है कि यह कितनी तेज़ है, सही है? यदि यह हल्का-सा झोंका हो, या तीसरे-चौथे स्तर की हवा हो तो तब भी सहन की जा सकती है, अधिक से अधिक किसी व्यक्ति को अपनी आंखों को खुला रखने में तकलीफ होगी। लेकिन अगर यही हवा बवंडर बन जाए तो क्या तुम उसे सह सकते हो? तुम इसे झेल नहीं सकते। अतः लोगों का यह कहना गलत है कि हवा हमेशा अच्छी होती है, या हमेशा खराब होती है, क्योंकि यह इस बात पर निर्भर होता है कि हवा कितनी तेज है। अतः यहाँ पर्वत की क्या उपयोगिता है? क्या यह हवा के लिए एक छलनी के समान नहीं है? पर्वत इस प्रचण्ड हवा को झेलता है और उसे किस में बाँट देता है? (हवा के हल्के झोंके में।) हवा के हल्के झोंके में। अधिकांश लोग इसे उस वातावरण में स्पर्श एवं महसूस कर सकते थे जहाँ वे रहते हैं—यह प्रचण्ड हवा है या हवा का हल्का झोंका जिसे उन्होंने महसूस किया? (हवा का हल्का झोंका।) क्या यह परमेश्वर के द्वारा पर्वतों की सृष्टि के पीछे का एक उद्देश्य नहीं है? क्या यह उसका इरादा नहीं है? लोगों के लिए ऐसे वातावरण में रहना कैसा होगा जहाँ प्रचण्ड हवा रेत के कणों को चारों ओर उड़ाती हो और जहाँ उसे रोकने या छानने के लिए कोई चीज़ न हो? क्या ऐसा हो सकता है कि जहाँ रेत और पत्थर चारों तरफ उड़ते हैं, ऐसी भूमि पर लोग रहने में असमर्थ होते हों। शायद कुछ लोगों को चारों ओर उड़ते हुए पत्थरों के द्वारा सिर में चोट लग जाए, या कुछ लोगों की आँखों में रेत घुस जाए और वे देख न पाएँ। लोगों को हवा खींच ले या हवा इतनी तेजी से बहे कि वे खड़े ही न रह पाएँ। घर के घर तबाह हो जाएँ, तरह-तरह की आफ़त आए। क्या प्रचण्ड हवा का कोई मूल्य है? जब मैंने कहा कि यह बुरी है, तब शायद लोगों को लगा हो कि इसका कोई मूल्य नहीं है, लेकिन क्या यह सही है? क्या इसके हवा के हल्के झोंके में बदलने का कोई मूल्य है? लोगों को सबसे अधिक किस चीज़ की आवश्यकता होती है जब यह सीलनदार या रुखी होती है? वे चाहते हैं कि हवा का एक हल्का झोंका आए, कि उनके मन को तरोताज़ा और साफ करे, कि उनके मिज़ाज को शांत करे और उनकी मनोदशा को सुधारे। उदाहरण के लिए, तुम लोग एक कमरे में बैठे हुए हो जहाँ बहुत सारे लोग हैं और हवा घुटन भरी है, तुम लोगों को सबसे अधिक किस चीज़ की आवश्यकता है? (हवा के हल्के झोंके की।) ऐसे स्थानों में जहाँ हवा गंदी और धूल से भरी हो तो यह किसी व्यक्ति की सोच को धीमा कर सकती है, उसके रक्त प्रवाह को कम कर सकती है, और उनकी बुद्धि एकदम स्पष्ट नहीं होगी। लेकिन अगर हवा को बहने और घूमने का मौका मिले तो वह ताजी हो जाएगी और लोगों को अच्छा महसूस होगा। यद्यपि वह छोटी सी जलधारा और प्रचण्ड हवा एक आपदा बन सकती थी, लेकिन पर्वत होने की वजह से वह लोगों को फायदा पहुँचाने वाली बन गई; क्या यह सही नहीं है?

कहानी का तीसरा भाग किसके विषय में बात करता है? (बड़े पर्वत और एक विशाल लहर के बारे में।) बड़े पर्वत और एक विशाल लहर के बारे में। यहाँ दृश्य में समुद्र के किनारे पर्वत है जहाँ हम पर्वत, समुद्री फुहार, और साथ ही एक विशाल लहर को भी देख सकते हैं। इस उदाहरण में पर्वत उस लहर के लिए क्या है? (एक रक्षक और एक पर्दा।) यह एक रक्षक एवं पर्दा दोनों है। इसकी सुरक्षा करने का लक्ष्य यह है कि समुद्र के इस भाग को अदृश्य होने से बचाया जाए ताकि वे जलचर जो इसमें रहते हैं वे फल-फूल सकें। एक परदे के रूप में, पर्वत समुद्री जल—इस जलराशि—को उमड़कर बहने से और किसी आपदा को उत्पन्न करने से रोकता है, जो लोगों के घरों को नुकसान पहुँचाता और नष्ट करता है। अतः हम कह सकते हैं कि पर्वत पर्दा एवं रक्षक दोनों है।

(छवि स्त्रोत: Depositphotos)

यह उस आपसी भरोसे के महत्व को दर्शाता है जो पर्वत एवं जलधारा, पर्वत एवं प्रचण्ड हवा, और पर्वत एवं उस विशाल लहर के बीच में है और वे किस प्रकार एक-दूसरे को रोकते हैं और किस प्रकार एक-दूसरे पर निर्भर हैं, इसके बीच में है, जिसके विषय में मैंने कहा है। एक नियम एवं एक व्यवस्था है जो इन चीज़ों के अस्तित्व में बने रहने को संचालित करती है जिन्हें परमेश्वर ने सृजा था। जो कुछ कहानी में हुआ था उससे क्या तुम लोग देख सकते हो कि परमेश्वर ने क्या किया? क्या परमेश्वर ने संसार की सृष्टि की और फिर उसके बाद जो कुछ हुआ उसकी उपेक्षा की? क्या उसने उन्हें नियम दिए और जिन तरीकों से वे कार्य करते हैं उन्हें आकार दिया और फिर उसके बाद उनकी उपेक्षा की? क्या ऐसा ही हुआ था? (नहीं।) तो वह क्या है? जल, हवा एवं लहरें अभी भी परमेश्वर के नियन्त्रण में हैं। वह उन्हें अनियन्त्रित रूप से गतिमान होने नहीं देता है और वह उन्हें लोगों के घरों को नुकसान पहुँचाने और बर्बाद करने नहीं देता है, और इस कारण से लोग पृथ्वी पर निरन्तर रह सकते हैं और फल-फूल सकते हैं। जिसका मतलब यह है कि जब परमेश्वर ने संसार की सृष्टि की थी तो उसने पहले से ही अस्तित्व के लिए नियमों की योजना बना ली थी। जब परमेश्वर ने इन चीज़ों को बनाया, तो उसने सुनिश्चित किया कि वे चीज़ें मनुष्य को लाभान्वित करेंगी, और साथ ही उसने उन्हें नियन्त्रित भी किया ताकि वे मानवजाति के लिए मुसीबत एवं विनाशकारी न हों। यदि परमेश्वर के द्वारा उनका प्रबंध नहीं किया जाता, तो क्या जल हर जगह नहीं बह रहा होता? क्या हवा सभी स्थानों पर नहीं बह रही होती? क्या वे किसी नियम के अधीन हैं? यदि परमेश्वर ने उनका प्रबंधन न किया होता तो वे किसी नियम के तहत संचालित न होती, हवा चीखती-चिल्लाती और जल ऊपर उठता और हर जगह बह रहा होता। यदि विशाल लहर पर्वत से अधिक ऊँची होती तो क्या समुद्र का वह हिस्सा तब भी अस्तित्व में रहता? समुद्र अस्तित्व में बने रहने में सक्षम नहीं होता। यदि पर्वत लहर के समान ही ऊँचा नहीं होता, तो समुद्र का वह क्षेत्र अस्तित्व में नहीं रहता और पर्वत अपने मूल्य एवं महत्व को खो देता।

क्या तुम लोग इन दो कहानियों में परमेश्वर की बुद्धि को देखते हो? परमेश्वर ने संसार की सृष्टि की और वह इसका प्रभु है; वह इसका प्रभारी है और हर एक वचन एवं कार्य की निगरानी करते हुए वह इसके लिए आपूर्ति करता है। वह मानवीय जीवन के हर एक क्षेत्र का निरीक्षण भी करता है। अतः परमेश्वर ने संसार की सृष्टि की और हर एक चीज़ के महत्व एवं मूल्य को और साथ ही साथ उसकी कार्य प्रणाली, उसके स्वभाव, और जीवित रहने के लिए उसके नियमों को वह अपने हाथ की हथेली के समान स्पष्ट रूप से जानता है। परमेश्वर ने संसार की सृष्टि की; क्या तुम लोग सोचते हो कि उसे इन नियमों पर अनुसंधान करने की आवश्यकता है जो संसार को संचालित करते है? क्या परमेश्वर को अनुसंधान करने एवं इसे समझने के लिए मानवीय ज्ञान या विज्ञान को पढ़ने की ज़रूरत है? (नहीं।) क्या मानवजाति के मध्य कोई ऐसा है जिसके पास वृहद् विद्वता और प्रचुर ज्ञान है कि सभी चीज़ों को समझे जैसे परमेश्वर समझता है? कोई नहीं है। सही है? क्या कोई खगोलशास्त्री या जीव-विज्ञानी है जो सचमुच में समझता है कि किस प्रकार सभी चीज़ें जीवित रहती और बढ़ती हैं? क्या वे वाकई में हर चीज़ के अस्तित्व के मूल्य को समझ सकते हैं? (नहीं समझ सकते।) ऐसा इसलिए है क्योंकि सभी चीज़ों को परमेश्वर के द्वारा सृजा गया था, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मानवजाति कितना अधिक एवं कितनी गहराई से इस ज्ञान का अध्ययन करती है, या वे कितने लम्बे समय तक इसे सीखने के लिए प्रयत्न करते हैं, वे परमेश्वर के द्वारा रची सभी चीज़ों के रहस्य एवं उद्देश्य की थाह लेने में कभी भी सक्षम नहीं होंगे, क्या यह सही नहीं है? …

आओ हम इसी कहानी पर एक और नज़र डालें—बड़ा पर्वत एवं छोटी जलधारा। पर्वत का मूल्य क्या है? जीवित प्राणी पर्वत पर फलते-फूलते हैं अतः इसके अस्तित्व का अपने आप में ही एक मूल्य है। साथ ही, पर्वत छोटी जलधारा को रोकता है, यह सुनिश्चित करता है कि वह जहाँ चाहे वहाँ न बहे और इसके परिणामस्वरूप लोगों के लिए तबाही न लाए। क्या यह सही नहीं है? पर्वत के अस्तित्व के कारण ही, जीवित चीज़ों जैसे वृक्ष एवं घास और सभी अन्य पौधों एवं जानवरों को पर्वत पर फलने फूलने का अवसर मिलता है, साथ ही वह छोटी जलधारा को भी निर्देश देता है कि कहाँ बहे; पर्वत जलधारा के जल को एकत्रित करता है और प्राकृतिक रूप से अपने निचले सिरे पर उसका मार्गदर्शन करता है जहाँ वह नदी में जा कर मिल सकती है और अन्ततः समुद्र में मिल सकती है। इन नियमों को प्रकृति के द्वारा नहीं बनाया गया था, बल्कि परमेश्वर ने सृष्टि के समय खास तौर पर उसकी व्यवस्था की थी। जहाँ तक बड़े पर्वत एवं प्रचण्ड हवा की बात है, पर्वत को भी हवा की आवश्यकता होती है ताकि उन जीवित प्राणियों को प्रेम से स्पर्श करे जो उस पर रहते हैं, और साथ ही, पर्वत हवा को सीमित भी करता है कि वह कितनी तेजी एवं प्रचण्डता से बहे ताकि वह तबाह एवं बर्बाद न करे। यह नियम, एक तरह से, बड़े पर्वत का कर्तव्य बन गया है, अतः क्या पर्वत के कर्तव्य से सम्बन्धित इस नियम ने अपने आप ही आकार ले लिया? (नहीं।) बल्कि इसे परमेश्वर के द्वारा बनाया गया था। उस बड़े पर्वत का अपना कर्तव्य है और उस प्रचण्ड हवा का भी अपना कर्तव्य है। अब, उस बड़े पर्वत एवं विशाल लहर के विषय में, पर्वत के वहाँ न होने पर क्या जल अपने आप ही बहने की दिशा को ढूँढ़ पाता? (नहीं।) जल भी विनाश एवं बर्बादी करता। एक पर्वत के रूप में पर्वत का अपना मूल्य है, और एक समुद्र के रूप में समुद्र का अपना मूल्य है। इस प्रकार से, इन परिस्थितियों के अंतर्गत जहाँ वे एक-दूसरे के काम में हस्तक्षेप नहीं करते हैं और जहाँ वे सामान्य रूप से एक साथ मौजूद रह सकते हैं, वे एक-दूसरे को रोकते भी हैं, बड़ा पर्वत समुद्र को रोकता है ताकि वह जलमग्न न करे और इस प्रकार यह लोगों के घरों की सुरक्षा करता है, और साथ ही यह समुद्र को अनुमति भी देता है कि वह उन जीवित प्राणियों का पोषण करे जो उसके भीतर रहते हैं। क्या इस भूदृश्य ने अपने आप ही आकार लिया है? (नहीं।) इसे भी परमेश्वर के द्वारा सृजा गया था। हम इन छवियों से देखते हैं कि जब परमेश्वर ने संसार को सृजा था, तब उसने पहले से ही निर्धारित कर दिया था कि पर्वत कहाँ स्थित होगा, जलधारा कहाँ बहेगी, किस दिशा से प्रचण्ड हवा बहनी शुरू होगी और वह कहाँ जाएगी, साथ ही साथ लहरें कितनी विशाल और ऊँची होंगी। परमेश्वर के इरादे एवं उद्देश्य इन सभी चीज़ों के अंतर्गत हैं और वे उसके कार्य हैं। अब, क्या तुम लोग देख सकते हो कि परमेश्वर के कार्य सभी चीज़ों में मौजूद हैं? (हाँ।)

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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