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परमेश्वर विभिन्न भौगोलिक परिवेशों के लिए सीमाएँ बनाता है

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आज मैं उस विषय के बारे में बात करने जा रहा हूँ कि कैसे इस प्रकार के नियम मानवजाति का पालन पोषण करते हैं जिन्हें परमेश्वर मानवजाति और समस्त जीवों के लिए लाता है। अतः यह विषय क्या है? यह ऐसा है कि इस प्रकार के नियम मनुष्य का पालन पोषण करते हैं जिन्हें परमेश्वर सभी प्राणियों के लिए लेकर आया है। यह एक बहुत बड़ा विषय है, अतः हम इसे कई हिस्सों में विभाजित कर सकते हैं और उन पर चर्चा कर सकते हैं एक समय में एक विषय पर ताकि उन्हें तुम लोगों के लिए स्पष्ट रूप से चित्रित किया जा सके। इस तरह से तुम लोगों के लिए आभास करना आसन हो जाएगा और तुम सब इसे धीरे-धीरे समझ सकते हो।

सबसे पहले, जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों को बनाया, तो उसने पहाड़ों, मैदानों, रेगिस्तानों, पहाड़ियों, नदियों और झीलों के लिए सीमाएं बनाईं। पृथ्वी पर पर्वत, मैदान, मरूस्थल, पहाड़ियां और जल के विभिन्न स्रोत हैं-ये सभी क्या हैं? क्या ये विभिन्न भूभाग नहीं हैं? परमेश्वर ने इन सभी विभिन्न भूभागों के बीच में सीमाओं को खींचा था। जब हम सीमाएं बनाने की बात करते हैं, तो उसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि पर्वतों की अपनी सीमा रेखाएं हैं, मैदानों की अपनी स्वयं की सीमा रेखाएं हैं, मरुस्थलों का एक निश्चित दायरा है, पहाड़ों का अपना एक स्थायी क्षेत्रफल है। साथ ही जल के स्रोत की भी एक स्थिर मात्रा है जैसे नदियां और झीलें। अर्थात्, जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की तब उसने हर चीज़ को बहुत स्पष्टता से बांट दिया था। परमेश्वर ने पहले से ही निर्धारित कर दिया है कि एक पहाड़ का अर्द्धव्यास कितने किलोमीटर का है, इसका दायरा क्या है। साथ ही उसने यह भी निर्धारित कर दिया है कि एक मैदान का अर्द्धव्यास कितने किलोमीटर का है, और इसका दायरा क्या है। सभी प्राणियों की रचना करते समय उसने मरुस्थल के दायरे और साथ ही साथ पहाड़ियों और उनके परिमाणों के दायरे, और वे जिसके द्वारा घिरे हुए हैं उन्हें भी निर्धारित किया था-उसने यह सब भी निर्धारित किया था। उसने नदियों और झीलों के दायरे को निर्धारित किया था जब वह उनकी रचना कर रहा था–उन सभी के पास उनकी सीमाएं हैं। तो जब हम "सीमाएं" कहते हैं तो इसका क्या अर्थ है? सभी प्राणियों के ऊपर परमेश्वर का शासन किस प्रकार सभी प्राणियों के लिए नियमों को स्थापित कर रहा है हमने बस अभी इसके विषय में बात की थी। उदाहरण के लिए, पहाड़ों के दायरे और सीमाएं पृथ्वी की परिक्रमा या समय के गुज़रने के कारण फैलेंगी या घटेंगी नहीं। यह स्थिर हैः यह "स्थिरता" परमेश्वर का नियम है। जहां तक मैदानों के क्षेत्रफल की बात है, उनका दायरा कितना है, वे किससे द्वारा सीमाबद्ध हैं, इसे परमेश्वर द्वारा स्थिर किया गया है। उनके पास एक सीमा है, और एक उभार मैदान के बीचोंबीच बस यों ही अपनी इच्छा से ऊपर नहीं आएगा। मैदान अचानक ही पर्वत में परिवर्तित नहीं होगा-ऐसा नहीं होगा। वे नियम और सीमाएं जिनके विषय में हमने बस अभी बात की थी इस ओर संकेत करते हैं। जहां तक मरुस्थल की बात है, हम यहां मरुस्थल या किसी अन्य भूभाग या भौगोलिक स्थिति की भूमिकाओं का जिक्र नहीं करेंगे, केवल इसकी सीमाओं का जिक्र करेंगे। परमेश्वर के शासन के अधीन मरुस्थल का भी दायरा नहीं बढ़ेगा। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने इसे इसका नियम और उसका दायरा दिया है। इसका क्षेत्रफल कितना बड़ा है और इसकी भूमिका क्या है, वह किसके द्वारा घिरा हुआ है, और यह कहां पर स्थित है-इसे पहले से ही परमेश्वर द्वारा तय कर दिया गया है। वह अपने दायरे से आगे नहीं बढ़ेगा, न अपनी स्थिति को बदलेगा, और न ही मनमाने ढंग से अपना क्षेत्रफल बढ़ाएगा। हालांकि, जल के प्रवाह जैसे नदियां और झीलें सभी सुव्यवस्थित और निरन्तर बने हुए हैं, फिर भी वे कभी अपने दायरे से बाहर या अपनी सीमाओं के पार नहीं गए। वे सभी एक सुव्यवस्थित तरीके से एक दिशा में बहती हैं, और उस दिशा में बहती हैं जिसमें उन्हें बहना चाहिए। अतः परमेश्वर के शासन के नियमों के अंतर्गत, कोई भी नदी या झील स्वेच्छा से नहीं सूखेगी, या स्वेच्छा से अपनी दिशा या अपने बहाव की मात्रा को पृथ्वी की परिक्रमा या समय के गुज़रने के साथ नहीं बदलेगी। यह सब परमेश्वर की समझ के अंतर्गत, और उसके शासन के अंतर्गत है। दूसरे अर्थ में, परमेश्वर के द्वारा इस मानवजाति के मध्य सृजे गए सभी प्राणियों का अपना स्थायी स्थान, क्षेत्रफल और दायरे हैं। अर्थात्, जब परमेश्वर ने सभी प्राणियों की सृष्टि की, तब उनकी सीमाओं को स्थापित किया गया था और इन्हें स्वेच्छा से पलटा, नवीनीकृत, या बदला नहीं जा सकता है। "स्वेच्छा से" किस ओर संकेत करता है? इसका अर्थ है कि वे मौसम, तापमान, या पृथ्वी के घूमने की गति के कारण बेतरतीब ढंग से अपना स्थान नहीं बदलेंगे, और नहीं फैलेंगे, या अपने मूल रूप में परिवर्तन नहीं करेंगे। उदाहरण के लिए, एक पर्वत की एक निश्चित ऊंचाई है, इसका आधार एक निश्चित क्षेत्रफल का होता है, इसकी एक निश्चित ऊंचाई है, और इसके पास एक निश्चित मात्रा में पेड़-पौधे हैं। इन सब की योजना और गणना परमेश्वर के द्वारा की गई है और इसकी ऊंचाई या क्षेत्रफल को बस यों ही स्वेच्छा से बदला नहीं जाएगा। जहां तक मैदानों की बात है, अधिकांश मनुष्य मैदानों में निवास करते हैं, और मौसम में हुआ कोई परिवर्तन उनके क्षेत्र या उनके अस्तित्व के मूल्य को प्रभावित नहीं करेगा। यहां तक कि जो कुछ इन विभिन्न भूभागों और भौगोलिक वातावरण में समाविष्ट है जिन्हें परमेश्वर द्वारा रचा गया था उसे भी स्वेच्छा से बदला नहीं जाएगा। उदाहरण के लिए, मरुस्थल के जो संघटक अंश, और जो खनिज सम्पदाएँ भूमि के नीचे हैं, इसमें जितनी बालू है, और बालू का रंग, उसकी मोटाई-ये स्वेच्छा से नहीं बदलेंगे। ऐसा क्यों है कि वे स्वेच्छा से नहीं बदलेंगे? यह परमेश्वर के शासन और उसके प्रबंधन के कारण है। परमेश्वर द्वारा सृजे गए इन सभी विभिन्न भूभागों और भौगोलिक वातावरण के अंतर्गत, वह एक योजनाबद्ध और सुव्यवस्थित तरीके से हर चीज़ का प्रबंधन कर रहा है। अतः कई हज़ार वर्षों से, और परमेश्वर द्वारा सृजे जाने के पश्चात् दस हज़ार वर्षों से ये सभी भौगोलिक पर्यावरण अभी भी अस्तित्व में हैं। वे अभी भी अपनी अपनी भूमिकाओं को निभा रहे हैं। हालांकि निश्चित समय अवधियों के दौरान ज्वालामुखी फटते हैं, निश्चित समय अवधियों के दौरान भूकंप आते हैं, और बड़े पैमाने पर भूमि की स्थितियां बदलती हैं, फिर भी परमेश्वर किसी भी प्रकार के भू-भाग को अपने मूल कार्य को छोड़ने की अनुमति बिलकुल भी नहीं देगा। यह केवल परमेश्वर के द्वारा किए गए इस प्रबंधन, और इन नियमों के ऊपर उसके शासन और इन नियमों के प्रति उसकी समझ के कारण है, कि इस में से सब कुछ-इस में से सब कुछ का आनन्द मानवजाति के द्वारा लिया जाता है और उन्हें मानवजाति के द्वारा देखा जाता है-सुव्यवस्थित तरीके से पृथ्वी पर जीवित रह सकता है। अतः परमेश्वर क्यों इन सभी अलग अलग भूभागों का प्रबंध करता है जो इस तरह से पृथ्वी पर मौज़ूद हैं? इसका उद्देश्य है कि जीवित प्राणी जो विभिन्न भौगोलिक वातावरणों में जीवित रहते हैं उन सभी के पास एक स्थायी वातावरण होगा, और यह कि वे उस स्थायी वातावरण में निरन्तर जीने और बहुगुणित होने में सक्षम हों। ये सभी प्राणी-ऐसे प्राणी जो गतिशील हैं और वे जो गतिशील नहीं हैं, वे जो अपनी नथनों से सांस लेते हैं और वे जो नहीं लेते हैं-मानवजाति के जीवित रहने के लिए एक अद्वितीय वातावरण का निर्माण करते हैं। केवल इस प्रकार का वातावरण ही पीढ़ी दर पीढ़ी मनुष्यों का पालन पोषण करने में सक्षम है, और केवल इस प्रकार का वातावरण ही मनुष्यों को पीढ़ी दर पीढ़ी निरन्तर शांतिपूर्वक जीवित रहने की अनुमति दे सकता है।

मैंने जिसके विषय में बस अभी बात की है उसमें तुम लोगों ने क्या देखा है? यह कि सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के प्रभुत्व में उसके नियम बहुत महत्वपूर्ण हैं-बहुत महत्वपूर्ण हैं! इन नियमों के अंतर्गत सभी प्राणियों के बढ़ने के लिए पूर्व शर्त क्या है? यह परमेश्वर के नियम के कारण है। यह उसके नियम के कारण है कि सभी प्राणी उसके नियम के अंतर्गत ही अपने कार्यों को अंजाम देते हैं। उदाहरण के लिए, पहाड़ जंगलों का पोषण करते हैं, फिर जंगल उसके बदले में विभिन्न पक्षियों और पशुओं का पोषण और संरक्षण करते हैं जो उनके भीतर रहते हैं। मैदान एक मंच है जिसे मनुष्यों के लिए फसलों को लगाने के लिए साथ ही साथ विभिन्न पशु और पक्षियों के लिए तैयार किया गया है। वे मानवजाति के अधिकांश लोगों को समतल भूमि पर रहने की अनुमति देते हैं और लोगों के जीवन को सहूलियत प्रदान करते हैं। और मैदानों में घास के मैदान भी शामिल हैं-घास के मैदान की विशाल पट्टियां। घास के मैदान पृथ्वी की वनस्पतियां हैं। वे मिट्टी का संरक्षण करते हैं और मवेशी, भेड़ और घोड़ों का पालन पोषण करते हैं जो घास के मैदानों में रहते हैं। साथ ही मरुस्थल भी अपना कार्य करता है। यह मनुष्यों के रहने की जगह नहीं है; इसकी भूमिका है नम जलवायु को और अधिक शुष्क करना। नदियों और झीलों का बहाव लोगों के पेयजल के लिए और सभी प्राणियों की पानी की आवश्यकताओं के लिए सुविधाजनक हैं। जहां कहीं वे बहती हैं, लोगों के पास पीने के लिए जल होगा। ये वे सीमाएं हैं जिन्हें परमेश्वर के द्वारा विभिन्न भूभागों के लिए बनाया गया है।

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से