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परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

जो लोग शैतान के अफवाहों को मानकर परमेश्वर से मुँह फेर लेते हैं, उनके साथ परमेश्वर कैसा व्यवहार करता है?

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संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"तब सर्प ने स्त्री से कहा, 'तुम निश्‍चय न मरोगे! वरन् परमेश्‍वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्‍वर के तुल्य हो जाओगे।' अत: जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने के लिए अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहनेयोग्य भी है; तब उसने उसमें से तोड़कर खाया, और अपने पति को भी दिया, और उसने भी खाया। …इसलिये यहोवा परमेश्‍वर ने उसको अदन की वाटिका में से निकाल दिया कि वह उस भूमि पर खेती करे जिस में से वह बनाया गया था" (उत्पत्ति 3:4-6, 23)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जो मुझसे संबंधित नहीं हैं वे मेरे विरूद्ध हैं; जो मुझसे संबंधित हैं ये वे लोग हैं जो मेरे साथ संगत हैं। यह पूरी तरह से संदेह रहित है, और यह शैतान के मेरे न्याय का सिद्धांत है। यह सिद्धांत सभी को ज्ञात होना चाहिए ताकि वे मेरी धार्मिकता और न्याय्यता को देख सकें—वे सभी जो शैतान से आते हैं, उनका न्याय किया जाएगा और उन्हें जला दिया जाएगा और राख में बदल दिया जाएगा। यह मेरा कोप भी है, और इससे कोई मेरा स्वभाव और अधिक देख सकता है।

वचन देह में प्रकट होता है में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 108" से

जो शैतान के साथ हैं, वे शैतान के पास ही वापिस चले जायेंगे और जो परमेश्वर के साथ हैं, वे सत्य के अन्वेषण में लग जायेंगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होगा। शैतान का अनुसरण करने वालों को नष्ट हो जाने दो! ऐसे लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जायेगा। और जो सत्य के खोजी हैं, उनके लिये पूर्ण व्यवस्था की जाये और उन्हें परमेश्वर के वचनों का भरपूर आनंद प्राप्त करने की अनुमति दी जाये। परमेश्वर न्यायी है और वो किसी के साथ भी अन्याय नहीं करता।

…………

जो लोग विवेकशून्य होंगे, वे अपनी तुच्छ चालाकी के कारण दुष्ट लोगों के हाथों विनाश को प्राप्त होंगे और ऐसे लोग दुष्ट लोगों के द्वारा पथभ्रष्ट कर दिये जायेंगे तथा उनके लिये फिर लौटकर आना संभव न होगा। ऐसे लोगों के साथ इसी प्रकार पेश आना चाहिये, क्योंकि इन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, क्योंकि ये सत्य के पक्ष में खड़े रहने के योग्य नहीं हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों का अनुसरण करते हैं, ये दुष्ट लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों के साथ सांठ-गांठ करते हैं और परमेश्वर की अवमानना करते हैं। वे अच्छी तरह से जानते हैं कि दुष्ट लोगों के अंदर से दुष्टता प्रसारित होती है लेकिन वे अपना हृदय कड़ा कर लेते हैं और उन्हीं का अनुसरण करते हैं और सत्य के विपरीत चलते हैं। क्या ये तमाम लोग जो सत्य अनुसरण नहीं करते लेकिन विनाशकारी और घृणास्पद कार्यों में लगे हुए हैं, निंदनीय कार्य नहीं कर रहे हैं? हालांकि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो "शासकों" की तरह पेश आते हैं और कुछ ऐसे हैं जो उनके पीछे चलते हैं, क्या परमेश्वर की अवमानना करने कि उनकी प्रवृत्ति एक-सी नहीं है? उनके पास यह कहने का क्या बहाना है कि परमेश्वर उनकी रक्षा नहीं करता? उनके पास यह कहने का क्या बहाना है कि परमेश्वर धर्मी नहीं है? क्या उनकी अपनी बुराई नहीं जो उनका विनाश कर देगी? क्या उनके खुद के विद्रोही तेवर ही उन्हें नरक में नहीं धकेल देंगे? जो सत्य का अभ्यास करते हैं, उन्हें अंत में बचा लिया जायेगा और सत्य के द्वारा उन्हें पूर्णता प्रदान कर दी जायेगी। जो सत्य का पालन नहीं करते, वे अंत में सत्य के द्वारा ही अपने विनाश को प्राप्त होंगे। जो सत्य का अनुसरण करते हैं और जो नहीं करते, इस प्रकार का अंत उनकी प्रतीक्षा कर रहा है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "जो सत्य का पालन नहीं करते, उनके लिये चेतावनी" से

मेरी चिंता उस तरीके को ले कर बनी रहती है जिसमें तुम लोगों में से प्रत्येक कार्य करता है और अपने आप को व्यक्त करता है, जिसके आधार पर मैं तुम लोगों अंत निर्धारित करूँगा। हालाँकि, मुझे तुम लोगों को यह स्पष्ट अवश्य कर देना चाहिए कि: मैं क्लेश के दिनों में उन लोगों पर और अधिक दया नहीं करूँगा जिन्होंने मुझे रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दी है, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी ही दूर तक है। साथ ही साथ, मुझे ऐसा कोई पसंद नहीं है जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो, ऐसे लोगों के साथ संबद्ध होना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है जो अपने मित्रों के हितों को बेच देते हैं। यही मेरा स्वभाव है, इस बात की परवाह किए बिना कि व्यक्ति कौन हो सकता है। मुझे तुम लोगों को अवश्य बना देना चाहिए कि: जो कोई भी मेरा दिल तोड़ता है, उसे दूसरी बार मुझसे क्षमा प्राप्त नहीं होगी, और जो कोई भी मेरे प्रति निष्ठावान रहा है वह सदैव मेरे हृदय में बना रहेगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "अपनी मंज़िल के लिए तुम्हें पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करनी चाहिए" से

उन लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति जो उसके कार्य के दौरान भाग जाते हैं

तुम इस प्रकार के व्यक्तियों को हर जगह पाओगे: जब वे परमेश्वर के मार्ग के बारे में सुनिश्चित हो जाते हैं उसके पश्चात्, विभिन्न कारणों से, वे चुपचाप और बिना कुछ कहे चले जाते हैं और जो कुछ उनका हृदय चाहता है वही करते हैं। फिलहाल, हम इस बात पर नहीं जाएँगे कि क्यों ऐसा व्यक्ति छोड़कर चला जाता है। पहले हम देखेंगे कि इस प्रकार के व्यक्ति के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है। यह बिलकुल स्पष्ट है! जिस क्षण ऐसे व्यक्ति छोड़कर चले जाते हैं, परमेश्वर की नज़रों में, उनके विश्वास की अवधि समाप्त हो जाती है। ये वे व्यक्ति नहीं हैं जिन्होंने इसे समाप्त किया है, बल्कि परमेश्वर ने समाप्त किया है। यह कि ऐसे व्यक्तियों ने परमेश्वर को छोड़ दिया था, इसका अर्थ है उन्होंने पहले से ही परमेश्वर को अस्वीकृत कर दिया है, कि वे पहले से ही परमेश्वर को नहीं चाहते हैं। इसका अर्थ है कि वे पहले से ही परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार नहीं करते हैं। चूँकि ऐसे व्यक्ति परमेश्वर को नहीं चाहते हैं, तो क्या परमेश्वर तब भी उन्हें चाहता है? इसके अतिरिक्त, जब ऐसे व्यक्तियों की ऐसी प्रवृत्ति, ऐसा दृष्टिकोण हैं, और वे परमेश्वर को छोड़ने पर दृढ़ हैं, तो उन्होंने पहले से ही परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर दिया है। यद्यपि वे आवेश में नहीं आए थे और परमेश्वर को कोसते नहीं थे, यद्यपि वे किसी अधम या चरम व्यवहार में संलग्न नहीं हुए थे, और यद्यपि ऐसा व्यक्ति सोच रहा होता है: यदि ऐसा दिन आता है जब मैं बाह्य रुप से आनन्द से भर जाता हूँ, या जब किसी चीज़ के लिए मुझे अभी भी परमेश्वर की आवश्यकता होती है, तो मैं वापस आऊँगा। या यदि परमेश्वर मुझे बुलाता है, तो मैं वापस आऊँगा। या वे कहते हैं: जब मैं बाहर से चोट खाता हूँ, जब मैं देखता हूँ कि बाहरी संसार अत्यंत अंधकारमय और अत्यंत दुष्ट है और मैं बहाव के साथ अब और बहना नहीं चाहता हूँ, तो मैं परमेश्वर के पास वापस आऊँगा। यद्यपि ऐसे व्यक्तियों ने अपने मन में गणना कर ली होती है कि वे किस समय पर वापस लौट रहे हैं, यद्यपि वे अपनी वापसी के लिए द्वार को खुला छोड़ देते हैं, फिर भी वे अनुभव नहीं करते हैं कि चाहे वे किसी भी प्रकार से क्यों न सोचें और किसी भी प्रकार से योजना क्यों न बनाएँ, यह सब बस ख्याली पुलाव है। उनकी सबसे बड़ी ग़लती यह है कि वे इस बारे में अस्पष्ट हैं कि जब वे छोड़कर जाना चाहते हैं तो परमेश्वर को कैसा महसूस होता है। उस क्षण की शुरूआत से जब यह व्यक्ति परमेश्वर को छोड़ने का निश्चय करता है, परमेश्वर ने उन्हें पूरी तरह से छोड़ दिया है; परमेश्वर ने पहले से ही अपने हृदय में उनका परिणाम निर्धारित कर दिया है। वह परिणाम क्या है? कि यह व्यक्ति हैमस्टर (चूहे की एक प्रजाति) में से एक है, और वह उनके साथ ही नष्ट हो जाएगा। इस प्रकार, लोग प्रायः इस प्रकार की स्थिति को देखते हैं: कोई परमेश्वर का परित्याग कर देता है, परन्तु वह दण्ड नहीं पाता है। परमेश्वर अपने स्वयं के सिद्धान्तों के अनुसार संचालन करता है। लोग कुछ चीज़ों को ही देख पाते हैं, और कुछ चीज़ों का निष्कर्ष केवल परमेश्वर के हृदय में ही निकाला जाता है, इसलिए लोग परिणाम को नहीं देख सकते हैं। जिसे लोग देखते हैं वह आवश्यक रूप से चीज़ों का सच्चा पक्ष नहीं है; परन्तु अन्य पक्ष है, ऐसा पक्ष जिसे तुम नहीं देखते हो—यही परमेश्वर के हृदय के सच्चे विचार और निष्कर्ष हैं।

जो लोग परमेश्वर के कार्य के दौरान भाग जाते हैं वे ऐसे लोग हैं जो सच्चे मार्ग का परित्याग कर देते हैं

इसलिए परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को ऐसा गंभीर दण्ड क्यों दे सकता है? क्यों परमेश्वर उनके प्रति बहुत क्रोधित है? सबसे पहले हम जानते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव प्रताप है, कोप है। वह वध किए जाने की कोई भेड़ नहीं है; इससे भी अधिक, वह कोई कठपुतली नहीं है कि लोग जैसा चाहें वैसा उसे नियन्त्रित करें। वह कोई खाली हवा भी नहीं है कि लोगों के द्वारा धौंस दी जाए। यदि तुम वास्तव में विश्वास करते हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है, तो तुम्हारे पास ऐसा हृदय होना चाहिए जो परमेश्वर का भय मानता हो, और तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर के सार को क्रोधित नहीं करना है। यह क्रोध कदाचित् किसी किसी शब्द; कदाचित् किसी विचार; कदाचित् किसी प्रकार के अधम व्यवहार; कदाचित् हल्के व्यवहार, ऐसे व्यवहार जो मनुष्य की नज़रों में और नैतिकता में कामचलाऊ हो, के द्वारा उत्पन्न हुआ हो; या कदाचित् किसी मत, किसी सिद्धान्त के द्वारा उत्पन्न हुआ हो। हालाँकि, जब एक बार तुम परमेश्वर को क्रोधित कर देते हो, तो तुम्हारा अवसर खो जाता है और तुम्हारे अन्त के दिन आ जाते हैं। यह एक भयानक बात है! यदि तुम नहीं समझते हो कि परमेश्वर को अपमानित नहीं किया जा सकता है, तो हो सकता है तुम परमेश्वर से नहीं डरते हो, और हो सकता है तुम उसे हर समय अपमानित करते हो। यदि तुम नहीं जानते कि परमेश्वर का भय कैसे मानें, तो तुम परमेश्वर का भय मानने में असमर्थ हो, और तुम नहीं जानते हो कि परमेश्वर के मार्ग में चलने के पथ—परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना—पर स्वयं को कैसे रखना है। जब एक बार तुम जान जाते हो, तो तुम सचेत रह सकते हो कि परमेश्वर को अपमानित नहीं किया जा सकता है, तब तुम जानोगे कि परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना क्या होता है।

परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग पर चलना आवश्यक रूप से इस बारे में नहीं है कि तुम कितनी अधिक सच्चाई को जानते हो, तुमने कितने अधिक परीक्षणों का अनुभव किया है, या तुम्हें कितना अधिक अनुशासित किया गया है। इसके बजाए, यह इस बात पर निर्भर है कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारे हृदय का सार क्या है, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति क्या है। लोगों का सार और उनकी आत्मनिष्ठ प्रवृत्तियाँ—ये अत्यंत महत्वपूर्ण, अत्यंत प्रमुख बाते हैं। उन लोगों के संबंध में जिन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया है और छोड़कर चले गये हैं, परमेश्वर के प्रति उनकी कुत्सित प्रवृत्ति ने और सत्य से घृणा करने वाले उनके हृदय ने परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित किया है, इसलिए जहाँ तक परमेश्वर की बात है उन्हें कभी भी क्षमा नहीं किया जाएगा। उन्होंने परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में जाना है, उनके पास वह जानकारी है कि परमेश्वर का आगमन पहले ही हो चुका है, यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर के नए कार्य का भी अनुभव किया है। उनका चला जाना भ्रमित होने का एक मामला नहीं है, और न ही ऐसा है कि वे इसके बारे में अस्पष्ट हैं। यह उन्हें इसमें जबरदस्ती इसमें धकेले जाने का मामला तो बिल्कुल नहीं है। बल्कि उन्होंने सचेत रूप से, और स्पष्ट मन से, परमेश्वर को छोड़कर जाना चुना है। उनका चले जाना अपने मार्ग को खोना नहीं है; यह उन्हें फेंक दिया जाना नहीं है। इसलिए, परमेश्वर की दृष्टि में, वे ऐसा, मेम्ना नहीं हैं जो झुण्ड से भटक गया है, फजूल-खर्च पुत्र की तो बात ही छोड़ दो जिसने अपने मार्ग को गँवा दिया है। वे दण्डमुक्ति के साथ चले गए, और ऐसी दशा, ऐसी स्थिति परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करती है, और यह इस क्रोध के कारण ही है कि वह उन्हें एक आशाहीन परिणाम देता है। क्या इस प्रकार का परिणाम भयावह नहीं है? इसलिए यदि लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं, तो वे परमेश्वर को अपमानित कर सकते हैं। यह कोई छोटी बात नहीं है! यदि कोई परमेश्वर की प्रवृत्ति को गंभीरता से नहीं लेते हैं, और तब भी मानते हैं कि परमेश्वर उनके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा है—क्योंकि वे परमेश्वर की खोई हुई भेड़ों में से एक हैं और परमेश्वर अभी भी उनका हृदय परिवर्तन होने की प्रतीक्षा कर रहा है—तो ऐसे व्यक्ति अपने दण्ड के दिन से बहुत दूर नहीं किए गए हैं। परमेश्वर उन्हें स्वीकार करने से यूँही मना नहीं करेगा। यह दूसरी बार है जब उन्होंने उसके स्वभाव को क्रोधित किया है; यह और भी अधिक भयानक बात है! इस व्यक्ति की श्रद्धाहीन प्रवृत्ति ने पहले से ही परमेश्वर के प्रशासनिक आदेश को अपमानित किया है। क्या परमेश्वर अब भी उसे स्वीकार करेगा? इस मामले के बारे में परमेश्वर के सिद्धान्त हैं: यदि कोई व्यक्ति सच्चे मार्ग के विषय में निश्चित है फिर भी वह जानबूझ कर और स्पष्ट मन से परमेश्वर को अस्वीकार कर सकता है, और स्वयं को परमेश्वर से दूर कर सकता है, तो परमेश्वर उसके उद्धार के मार्ग को अवरुद्ध कर देगा, और इसके बाद राज्य के दरवाजे को उसके लिए बन्द कर दिया जाएगा। जब यह व्यक्ति एक बार फिर द्वार खटखटाते हुए आता है, तो परमेश्वर उसके लिए पुनः द्वार नहीं खोलेगा। इस व्यक्ति को सदा के लिए निकाल दिया जाएगा। कदाचित् तुम लोगों में से कुछ ने बाईबिल में मूसा की कहानी को पढ़ा हो। मूसा को परमेश्वर के द्वारा अभिषिक्त कर दिए जाने के पश्चात्, 250 अगुवे मूसा से उसके कार्यकलापों और अन्य विभिन्न कारणों की वजह से असंतुष्ट थे। उन्होंने किसका आज्ञापालन करने से मना किया था? वह मूसा नहीं था। उन्होंने परमेश्वर की व्यवस्थाओं को मानने से इनकार किया था; उन्होंने इस मामले पर परमेश्वर के कार्य को मानने से मना किया था। उन्होंने निम्नलिखित बातें कही थीं: "तुम ने बहुत किया, अब बस करो; क्योंकि सारी मण्डली का एक एक मनुष्य पवित्र है, और यहोवा उनके मध्य में रहता है …।" मनुष्य की नज़रों में, क्या ये वचन बहुत गंभीर हैं? वे गंभीर नहीं हैं! कम से कम शब्दों का शाब्दिक अर्थ तो गंभीर नहीं है। वैधानिक अर्थ में, वे किसी नियम को नहीं तोड़ते हैं, क्योंकि बिल्कुल सतही तौर पर यह कोई शत्रुतापूर्ण भाषा या शब्दावली नहीं है, और इसमें ईश निन्दा सम्बन्धी अर्थ तो बिल्कुल भी नहीं है। यहाँ केवल एक साधारण सा वाक्य है, इससे अधिक कुछ नहीं। फिर भी ऐसा क्यों है कि ये वचन परमेश्वर के इतने क्रोध को भड़का सकते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें लोगों के लिए नहीं कहा गया है, बल्कि परमेश्वर के लिए कहा गया है। उनके द्वारा व्यक्त की गई प्रवृत्ति और स्वभाव निश्चित रूप से वही है जो परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करता है, विशेषरूप से परमेश्वर के उस स्वभाव को क्रोधित करता है जिसे अपमानित नहीं किया जा सकता है। हम सब जानते हैं कि अन्त में उनका परिणाम क्या हुआ था। ऐसे लोगों के बारे में जो परमेश्वर का परित्याग कर दिया है, उनका दृष्टिकोण क्या है? उनकी प्रवृत्ति क्या है? और क्यों उनका दृष्टिकोण और प्रवृत्ति ऐसा कारण बनता है कि परमेश्वर उनके साथ इस तरह से निपटता है? कारण यह है कि वे स्पष्ट रूप से जानते हैं कि वह परमेश्वर है मगर तब भी वे परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना चुनते हैं। इसीलिए उन्हें उद्धार के उनके अवसर से पूरी तरह से वंचित कर दिया जाता है। ठीक जैसे कि बाईबिल कहती है: "क्योंकि सच्चाई की पहचान प्राप्त करने के बाद यदि हम जानबूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिए फिर कोई बलिदान बाकी नहीं रहा।" क्या अब तुम लोग इस विषय पर स्पष्ट हो?

"वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें" से

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