सत्य का अनुसरण कैसे करें (19)

सकारात्मक चीजों के विषय के संबंध में, पिछली बार हमने संगति की थी कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और उनकी एक परिभाषा दी थी। सकारात्मक चीजें क्या हैं? (परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं।) तुम लोगों ने सकारात्मक चीजों की परिभाषा को याद रखा है, लेकिन क्या तुम दिए गए उदाहरणों को समझ सकते हो? (हम उन्हें कुछ हद तक समझ सकते हैं।) सकारात्मक चीजों की यह परिभाषा, यह अवधारणा—क्या यह एक सत्य है? (यह एक सत्य है।) क्या तुम निश्चित हो? परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, तुम्हें लगता है कि यह परिभाषा एक सत्य है और सटीक है, लेकिन जब तुम्हारा सामना किसी ऐसी चीज से होता है जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, तब तुम इसे समझ नहीं पाते और सत्य नहीं स्वीकारते। लोगों की धारणाओं के अनुसार चाहे किसी चीज को सकारात्मक चीज के रूप में देखा जाए या नकारात्मक चीज के रूप में, संक्षेप में, अगर यह परमेश्वर की परिभाषा के अनुसार सकारात्मक चीज नहीं है, तो यह सकारात्मक चीज नहीं बल्कि नकारात्मक चीज है। क्या तुम इस तरह से चीजों का भेद पहचानने में समर्थ हो? (हाँ, अगर परमेश्वर ने किसी चीज को सकारात्मक चीज के रूप में परिभाषित किया है, और यह मेरी अपनी धारणाओं के अनुरूप नहीं है और मेरे दिमाग में यह बात नहीं बैठ रही है—लेकिन मैं जानता हूँ कि परमेश्वर जो कहता है वह निश्चित रूप से सत्य है—तो मैं खुद को नकारना सीख जाऊँगा।) अगर यह चीज तुम्हें नुकसान पहुँचाती है या यहाँ तक कि सभी लोगों को नुकसान पहुँचाती है—लोगों की धारणाओं के अनुसार यह उन्हें फायदा नहीं देती है और कोई खुशी या आनंद नहीं लाती है, बल्कि पीड़ा और दुर्भाग्य का कारण बनती है—तो तुम इसे कैसे देखोगे? क्या तुम तब भी अपने इस दृष्टिकोण पर कायम रहोगे कि “सकारात्मक चीजों के बारे में परमेश्वर की परिभाषा वास्तव में सटीक है; लोग अपनी धारणाओं से आकलन नहीं कर सकते, न ही वे इस आधार पर किसी चीज का आकलन कर सकते हैं कि उन्हें इससे फायदा होता है या नहीं”? तुम इस बारे में निश्चित नहीं हो सकते, है ना? (हम निश्चित नहीं हो सकते।) सत्य का कोई भी पहलू सिर्फ सैद्धांतिक स्तर पर समझ में आने वाली या खरी उतरने वाली चीज नहीं है; बल्कि असल जिंदगी में सभी तथ्यों के सामने यह एक कभी नहीं बदलने वाला कथन है। अगर तुम इस बारे में निश्चित नहीं हो सकते, तो तुम्हारे दिल में सत्य के बारे में तुम्हारी अवधारणा वास्तव में अस्पष्ट है। सत्य के विभिन्न पहलू जिन पर हम संगति करते हैं, उन सभी में विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों के बारे में दृष्टिकोण शामिल हैं; उनमें विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों का सार और वास्तविक परिस्थितियाँ शामिल होती हैं; साथ ही, ये लोगों को यह भी देखने देते हैं कि परमेश्वर इन लोगों, घटनाओं और चीजों के साथ कैसा व्यवहार करता है—उन सब के बारे में उसके क्या दृष्टिकोण और रवैये हैं। चूँकि सकारात्मक चीजों की परिभाषा एक सत्य है, तो बेशक इसमें इस परिभाषा के दायरे में आने वाले अलग-अलग लोगों, घटनाओं और चीजों की वास्तविक परिस्थितियाँ और सार भी शामिल हैं; साथ ही, इन अलग-अलग चीजों के बारे में परमेश्वर के रवैये, परिप्रेक्ष्य और कथन भी शामिल हैं। तो चाहे लोग अपनी धारणाओं के अनुसार सकारात्मक चीजों की परिभाषा को सही मानें या गलत, और चाहे लोगों का अपनी पारंपरिक संस्कृति या दैनिक जीवन के संदर्भ में सकारात्मक चीजों की परिभाषा के बारे में शुरुआती परिप्रेक्ष्य कुछ भी हो, संक्षेप में, चूँकि सकारात्मक चीजों की यह परिभाषा एक सत्य है, तो इसमें शामिल लोग, घटनाएँ और चीजें सभी सकारात्मक चीजें हैं और जो इसके विपरीत हैं, वे सभी नकारात्मक चीजें हैं। यह बिना किसी संदेह के निश्चित है। तुम्हें इस मामले की स्पष्ट समझ होनी चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कब या किस सामाजिक परिवेश में और किस सकारात्मक चीज का तुम पर क्या प्रभाव होता है या उसके बारे में तुम्हारा रवैया और परिप्रेक्ष्य क्या है, सकारात्मक चीजों की परिभाषा और उस परिभाषा में शामिल लोगों, घटनाओं और चीजों का सार नहीं बदलता। समझ गए? (हाँ।)

पिछली बार हमने मुख्य रूप से “परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं” इस कथन से जुड़े कुछ खास उदाहरणों पर संगति की थी। हमने “परमेश्वर द्वारा सृजित सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं” वाले हिस्से के बारे में अधिक विस्तार से संगति नहीं की थी। तो क्या तुम लोग संगति के जरिए या बरसों से समझे गए सत्यों के जरिए पुष्टि कर सकते हो कि यह कथन सही है? या फिर, क्या तुम उन लोगों, घटनाओं और चीजों के आधार पर जो तुमने जीवन में देखी हैं और अनुभव की हैं, यह पुष्टि कर सकते हो कि परमेश्वर द्वारा सृजित सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं? क्या तुम चीजों को इस तरह समझ पाते हो? क्या तुम इस तरह सत्य खोज पाते हो? (हम कुछ आसान चीजों को इस तरह समझ सकते हैं।) यहाँ एक सिद्धांत है। ऊपरी तौर पर देखें तो परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन चीजें क्या हैं” ये विषय बहुत व्यापक दायरे को समेटते हैं और अत्यंत अमूर्त हैं, लेकिन असल में, वे उन अलग-अलग लोगों, घटनाओं और चीजों से गहराई से जुड़े हुए हैं जिनके संपर्क में लोग असल जिंदगी में आते हैं—यह भी कहा जा सकता है कि वे बहुत करीब से जुड़े हुए हैं; वे वास्तविकता से अलग नहीं हैं। इसका संबंध एक मुद्दे से है। जब तुम अपने जीवन में कई अप्रत्याशित लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करते हो, तब तुम यह तय नहीं कर पाते कि वे सकारात्मक चीजें हैं या नकारात्मक चीजें। भले ही तुम सकारात्मक और नकारात्मक चीजों का भेद पहचानने का सिद्धांत समझते हो, फिर भी तुम इसे तय नहीं कर पाते। भले ही वे ऐसी चीजें हों जो सकारात्मक चीजों के दायरे में आती हैं, तुम उन्हें अपनी धारणाओं में सकारात्मक चीजें नहीं मानते, तुम उनसे दूर भागते हो और अपने दिल में उनसे नफरत करते हो; यहाँ तक कि सोचते हो कि वे सकारात्मक चीजों के दायरे में शामिल होने के बिल्कुल भी लायक नहीं हैं, फिर भी वे वास्तव में परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं और वे सकारात्मक चीजों की श्रेणी में आती हैं। यहीं पर, लोगों को इस तरह की चीजों का सामना कैसे करना चाहिए इसके अभ्यास के सिद्धांत काम आते हैं। अभ्यास का सबसे सरल सिद्धांत यह है : सबसे पहले, तुम्हें यह पक्का करना होगा कि विचाराधीन चीज सकारात्मक चीजों की परिभाषा के दायरे में आने वाली चीज है। भले ही लोगों की धारणाओं के हिसाब से यह कोई सकारात्मक चीज जैसी नहीं लगती, लेकिन अगर यह परमेश्वर द्वारा परिभाषित सकारात्मक चीजों की श्रेणी में आती है, तो सबसे पहले तुम्हें निश्चित होना चाहिए कि यह एक सकारात्मक चीज है, और इसके बारे में कोई बिल्कुल भी गलती नहीं है। परमेश्वर द्वारा इसके सृजन का कोई महत्व है; यह लोगों के लिए है ताकि वे इससे कुछ सबक सीख सकें। इस बारे में निश्चित होना जरूरी है। यह अभ्यास का एक सिद्धांत है। दूसरा, इस चीज या इस तरह के मामले के बारे में, हमें वैज्ञानिकों की तरह होने की जरूरत नहीं है और इसकी प्रकृति या कार्यप्रणाली के बारे में या यह मानव जीवन या पूरी खाद्य श्रृंखला में क्या भूमिका निभाता है, इसका अध्ययन करने की जरूरत नहीं है। बस यह निश्चित होना काफी है कि यह एक सकारात्मक चीज है। कुछ लोग कहते हैं, "अगर यह सकारात्मक चीज अक्सर लोगों की जिंदगी में आती है और उनकी जिंदगी में दखल देती है, जिससे उनका यह दृष्टिकोण बदल जाता है कि यह सकारात्मक चीज है, तो इसके साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए?" इससे निपटना आसान है। अगर तुम्हें इसे अपने जीवन में इस्तेमाल करने की जरूरत है, तो जरूरत के हिसाब से इसका इस्तेमाल करो; इसे तुम्हारे लिए काम करने दो। अगर तुम्हें इसका इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है और यह अक्सर तुम्हारे मामले में दखल देती है या तुम्हारी किसी भी शारीरिक इंद्री को बाधित करती है, तो तुम इसे दूर भगा सकते हो और इससे दूर रह सकते हो। बस इसे अपने मामले में दखल मत देने दो या तुम्हें शारीरिक दर्द मत देने दो। यह दूसरा सिद्धांत है। साथ ही, तुम्हें पता होना चाहिए कि अगर यह परमेश्वर की सृष्टि, परमेश्वर के विधान या परमेश्वर की संप्रभुता से आती है, तो तुम्हें इसे घिनौना नहीं समझना चाहिए, इससे नफरत नहीं करनी चाहिए या इसे नकारना नहीं चाहिए। इसके बजाय, तुम्हें इसे स्वीकारना चाहिए और इसे मानना चाहिए। इससे भी बेहतर यह है कि इसे संभालो और इसका विवेकशील तरीके से इस्तेमाल करो। ये अभ्यास के कुल तीन सिद्धांत हैं। ये तीन सिद्धांत क्या हैं? (पहला यह है कि जब तक कोई चीज परमेश्वर द्वारा परिभाषित सकारात्मक चीजों के दायरे में है, हमें निश्चित होना चाहिए कि वह एक सकारात्मक चीज है। परमेश्वर द्वारा उसके सृजन का कोई महत्व है; यह लोगों के लिए है ताकि वे उससे कुछ सबक सीख सकें। दूसरा, यह निश्चित होने के आधार पर कि यह एक सकारात्मक चीज है, जरूरत होने पर इसका इस्तेमाल किया जाए। अगर हमें इसका इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है और यह हमारे जीवन में दखल देती है, तो हम इसे दूर भगा सकते हैं और इससे दूर रह सकते हैं, इसे अपनी जिंदगी में दखल मत देने दो। तीसरा, अगर यह परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है, तो हमें इसे घिनौना नहीं मानना चाहिए या इससे नफरत नहीं करनी चाहिए; हमें इसे स्वीकारना चाहिए और मानना चाहिए। इससे भी बेहतर यह है कि हम इसे संभालें और इसका विवेकशील तरीके से इस्तेमाल करें।) क्या इन तीनों सिद्धांतों को लागू करना आसान है? यह इतना आसान नहीं है, है ना? (नहीं।) अगर कोई मच्छर तुम्हारे कान में भिनभिना रहा है, तो तुम उसे यह सोचकर भगा दोगे, “परमेश्वर ने जो भी बनाया है वह अच्छा है; मैं बस इसे भगा दूँगा और बात खत्म”—तुम इन तीनों सिद्धांतों के अनुसार काम कर पाओगे। लेकिन अगर तुम उसे भगा देते हो और वह वापस आकर तुम्हें काटता है, तो तुम जितना अधिक इसके बारे में सोचोगे, उतना ही अधिक गुस्सा आएगा : “मैंने तुम्हें जाने दिया, लेकिन तुम मुझे अकेला नहीं छोड़ोगे। इस बार, मैं तुम्हें निश्चित रूप से मार डालूँगा!” क्या उसे मार डालना सही है? असल में, उसे मार डालना गलत नहीं है; इसे उचित प्रबंधन माना जा सकता है। लेकिन साथ ही, क्या तुम्हें इस बात पर संदेह नहीं होने लगेगा कि मच्छर सकारात्मक चीज है? खासकर जब उसके काटने वाली जगह पर और ज्यादा खुजली होने लगती है, इतनी ज्यादा खुजली कि बरदाश्त ही न हो, तो तुम मन ही मन सोचोगे : “परमेश्वर ने मच्छर क्यों बनाए? अगर मच्छर नहीं होते तो क्या लोगों को यह कष्ट होता? यह तो बिल्कुल भी सकारात्मक चीज नहीं लगती!” तुम्हारी तर्कशक्ति तुम्हें बताएगी कि इस तरह सोचना गलत है, मच्छर एक अच्छी चीज है क्योंकि यह परमेश्वर द्वारा सृजित सकारात्मक चीजों के दायरे में एक छोटा-सा जीव है। लेकिन फिर भी तुम्हें यह समझ नहीं आएगा : “इससे लोगों को कोई फायदा नहीं होता, तो परमेश्वर ने इसे क्यों बनाया?” भले ही मच्छर के काटने का निशान बड़ा नहीं होता, लेकिन खुजली बहुत अधिक होती है। जिन्हें एलर्जी की समस्या है, खुजलाने से उनकी त्वचा लाल हो सकती है और उन्हें सूजन हो सकती है, यहाँ तक कि संक्रमण और बुखार भी हो सकता है। इस समय, तुम्हारे मन में कुछ धारणाएँ आएँगी और तुम्हें इसे स्वीकारना मुश्किल लगेगा : “मच्छर मुझे सकारात्मक चीज नहीं लगते। अगर वे सकारात्मक होते, तो वे लोगों को परेशान करके उन्हें दर्द कैसे पहुँचा सकते थे? क्या सकारात्मक चीजों के सकारात्मक प्रभाव नहीं होने चाहिए? यह प्रभाव सकारात्मक नहीं है; वे नकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं और लोगों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं। मच्छरों को सकारात्मक चीजों की श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है? यह समझ से परे है। परमेश्वर ने जो किया है, वह मेरी धारणाओं से मेल नहीं खाता!” तुम्हारे दिल में, मच्छरों के सकारात्मक चीजें होने के बारे में धारणाएँ विकसित होंगी। तुम जोर देकर कहोगे, “सबसे पहले, तुम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि मच्छर सकारात्मक चीजें हैं। दूसरा, अगर तुम नहीं चाहते कि वे तुम्हें परेशान करें, तो तुम उन्हें भगा सकते हो और उनसे दूर रह सकते हो। आखिरकर, तुम्हें उनसे नफरत नहीं करनी चाहिए, बल्कि उन्हें स्वीकारना चाहिए, उन्हें मानना चाहिए और उन्हें समझदारी से संभालना चाहिए।” भले ही तुम कहोगे कि यह आखिरी सिद्धांत तुम्हारे लिए लागू करना बहुत मुश्किल है। फायदेमंद कीटों को स्वीकारना तुम्हारे लिए काफी आसान है। लेकिन जब मच्छरों की बात आती है, अगर तुम उन्हें स्वीकारने की कोशिश करो, उन्हें विवेकशील तरीके से संभालो और उन्हें कोसो नहीं, तो क्या तुम ऐसा कर सकते हो? (परमेश्वर की संगति से पहले, कभी-कभी जब मेरा मूड खराब होता था और मुझे मच्छर काट लेता था, तो मुझे विशेष रूप से नफरत होती थी और मैं कुछ बुरी बातें कहता था। भविष्य में, मैं इससे बचने की पूरी कोशिश करूँगा और अब ऐसी बातें नहीं कहूँगा।) तुम्हें उन्हें कोसना नहीं चाहिए; तुम्हें उन्हें स्वीकारना चाहिए, उनके साथ सही व्यवहार करना चाहिए और उन्हें विवेकशील तरीके से संभालना चाहिए। विवेकशील तरीके से संभालने वाला यह हिस्सा लागू करना बहुत मुश्किल है, है ना? (हाँ।) अगर तुम्हें उन्हें मौखिक रूप से और धर्म-सिद्धांत के तौर पर मानना और स्वीकारना हो, तो ऐसा करना कुछ हद तक आसान होगा। अगर वे तुम्हें नुकसान पहुँचाते हैं, तो तुम उनसे दूर भी रह सकते हो और उनसे बच सकते हो। लेकिन तुम्हें उन्हें दिल से स्वीकारना और मानना, उनके साथ सही व्यवहार करना और इसके अलावा, उन्हें विवेकशील तरीके से संभालना—यह तुम्हारे लिए मुश्किल होगा। यह मुश्किल क्यों होगा? क्योंकि जब वे तुम्हें नुकसान पहुँचाते हैं, तो तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि तुम्हें उनसे कोई फायदा हो रहा है, बल्कि तुम्हें लगता है कि उनसे नुकसान हो रहा है। यानी, तुम्हारी धारणाओं के अनुसार, सकारात्मक चीजों का सकारात्मक प्रभाव होना चाहिए; लेकिन मच्छरों से कोई सकारात्मक फायदा मिलने के बजाय, तुम्हें लगता है कि उनका तुम पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इस समय, तुम्हारे लिए उन्हें घिनौना या नफरत के लायक नहीं समझना, बल्कि उन्हें स्वीकारना और यहाँ तक कि उन्हें विवेकशील तरीके से संभालना आसान नहीं होगा। भले ही लोग धर्म-सिद्धांत के स्तर पर यह मान सकते हैं कि मच्छर सकारात्मक चीजें हैं और वे बमुश्किल मच्छरों के साथ सही व्यवहार करने की कोशिश भी कर पाते हैं, लेकिन जब वे असल जिंदगी में मच्छरों से परेशान होते हैं, तब उनके लिए सिद्धांतों के अनुसार उनके साथ व्यवहार करना बहुत मुश्किल होता है। इसके लिए लोगों को सत्य समझने की जरूरत है; कई खास लोगों, घटनाओं और चीजों की प्रकृति को समझने की जरूरत है जो सकारात्मक चीजों के तीन पहलुओं के तहत आती हैं—जो "परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं"—साथ ही यह कि वे मानव जीवन और अस्तित्व के मामले में किस तरह की भूमिकाएँ निभाती हैं; परमेश्वर का उन्हें बनाने और उनके जीने का तरीका देने के पीछे असली उद्देश्य क्या था। ये वो बातें हैं जिन्हें लोगों को समझने की जरूरत है। अगर लोग परमेश्वर के असली उद्देश्य और उसके इरादों की मुख्य बातों और बुनियादी सिद्धांतों को समझ लें, तो कुछ सकारात्मक चीजें जो उनकी धारणाओं से मेल नहीं खातीं, शायद उनसे दूर रहने के अलावा, वे—अलग-अलग हद तक—उन्हें स्वीकार भी सकते हैं, उन्हें मान सकते हैं, उन्हें विवेकशील तरीके से संभाल सकते हैं और उनका सही इस्तेमाल कर सकते हैं। हम धीरे-धीरे इस विषय पर चर्चा करेंगे।

“जो परमेश्वर द्वारा सृजित है,” इस विषय का दायरा बहुत बड़ा है, इसलिए हमें पहले कुछ उदाहरण देने होंगे और फिर उन पर थोड़ी-थोड़ी चर्चा करनी होगी। हमने अभी मच्छरों के बारे में बात की। यह कहना सही होगा कि किसी को भी मच्छर पसंद नहीं हैं या कोई भी उनके साथ अपनी इच्छा से रहना नहीं चाहता; इसके विपरीत, हर कोई मच्छरों से नफरत करता है और यहाँ तक कि अपनी पूरी जिंदगी में उन्हें कभी भी नहीं देखने की इच्छा रखता है। भले ही मच्छरों का मामला कोई बड़ा मामला नहीं है, लेकिन इसमें एक खास तरह की चीज शामिल है; इसमें परमेश्वर द्वारा सृजित लोगों, घटनाओं और चीजों में एक खास तरह की चीज की प्रकृति के बारे में लोगों की समझ भी शामिल है। बेशक, यहाँ मुख्य बात यह है कि इसमें लोगों का एक सत्य को जानना और समझना शामिल है; इसमें लोगों के जीवन में लोगों, घटनाओं और चीजों में एक खास तरह की चीज के साथ कैसा व्यवहार करना है, इसके अभ्यास के सिद्धांत भी शामिल हैं। इसलिए, भले ही मच्छर कोई बड़ा जीव नहीं है, लेकिन इसमें शामिल मामले छोटे नहीं हैं; लोगों के लिए उन्हें समझने और जानने की कोशिश करना सार्थक है। “जो परमेश्वर द्वारा सृजित है” की सामग्री में स्थूल और सूक्ष्म दोनों तरह के विषय शामिल हैं। अभी हमने सूक्ष्म पहलू की एक छोटी प्रजाति, मच्छर पर संक्षेप में संगति की। यह एक अपेक्षाकृत छोटा जीव है जिसे लोग खुली आँखों से देख सकते हैं; मच्छर से छोटी किसी भी चीज पर चर्चा करना सार्थक नहीं है। मच्छर एक ऐसा जीव है जिसके संपर्क में लोग अक्सर आते हैं, एक अपेक्षाकृत सूक्ष्म जीव जो खुली आँखों से दिखाई देता है। चूँकि यह मुद्दा सूक्ष्म स्तर का है, इसलिए हम इस पर बाद में चर्चा करेंगे। तो हमें सबसे पहले किस पहलू पर संगति करनी चाहिए? (स्थूल।) आओ, पहले स्थूल चीजों पर संगति करें। स्थूल चीजें बहुत-सी हैं। उनमें से जो लोगों के जीवन के सबसे करीब है या जिसके संपर्क में लोग आ सकते हैं, जिसे लोग महसूस कर सकते हैं, देख सकते हैं और जो हर किसी के लिए परिचित है—परमेश्वर द्वारा मनुष्य के जीने के लिए बनाए गए परिवेश में मौजूद वस्तुओं के अलावा—वह स्वयं मानवजाति है। जब मानवजाति की बात आती है, विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों में से, जिन्हें लोग देख सकते हैं, किनके बारे में बात करना सार्थक है? किन्हें समझना सार्थक है? मानव समाज की बात करें तो सबसे ज्यादा समझने लायक विषय तथाकथित मानव सभ्यता है। इस सभ्यता में शामिल मुख्य विषय अलग-अलग संस्कृतियाँ हैं। अलग-अलग संस्कृतियों का उदय विभिन्न समाजों की शिक्षा से होता है; विभिन्न समाजों की शिक्षा से अलग-अलग संस्कृतियाँ बनती हैं और इन अलग-अलग संस्कृतियों की पृष्ठभूमि में, अलग-अलग युगों में मानवजाति की तथाकथित सभ्यताएँ उभरी हैं। यही मानव सभ्यता का स्रोत और मूल है। पूर्वी समाज की अपनी सभ्यता है और बेशक उसकी अपनी तथाकथित संस्कृति भी है। इस संस्कृति का उदय पूर्वी समाज द्वारा अपने लोगों को शिक्षित करने के तरीके से होता है। इसी तरह, पश्चिमी समाज की भी अपनी तथाकथित सभ्यता है। पश्चिमी सभ्यता भी उसकी संस्कृति से आती है और उसकी संस्कृति का उदय भी पश्चिमी समाज की शिक्षा से होता है। कहने का मतलब यह है कि अलग-अलग युगों में पश्चिमी समाज की शिक्षा ने पश्चिमी संस्कृति को जन्म दिया है और ऐसी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में पश्चिमी सभ्यता धीरे-धीरे उभरी है, आकार लिया है और आज तक विकसित हुई है। चाहे पूर्वी संस्कृति हो या पश्चिमी संस्कृति, दोनों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने-अपने संबंधित लोगों को इसी तरह शिक्षित किया है। अलग-अलग युगों में, उन्होंने लगातार एक-एक करके अगली पीढ़ी को शिक्षित और प्रभावित किया है और अलग-अलग युगों में इसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक फैलाया है; साथ ही, यह लगातार विकसित होती रही है और आगे बढ़ती रही है। इस तरह, पूर्वी और पश्चिमी संस्कृतियों और सभ्यताओं ने धीरे-धीरे आकार लिया है और विकसित हुई हैं, धीरे-धीरे लोगों द्वारा पहचानी और स्वीकारी गई हैं, धीरे-धीरे पूर्वी और पश्चिमी समाजों में आकार लेकर स्थापित हुई हैं। इससे पूर्व और पश्चिम की मुख्यधारा की संस्कृतियों और सभ्यताओं का निर्माण हुआ है। पूर्व की अपनी मुख्यधारा की संस्कृति और सभ्यता है, उसी तरह पश्चिम की भी अपनी मुख्यधारा की संस्कृति और सभ्यता है। पूर्वी और पश्चिमी समाजों ने सार, स्वरूप और मानवजाति पर अपने प्रभाव के मामले में अलग-अलग संस्कृतियों और सभ्यताओं का निर्माण किया है। चाहे पूर्वी संस्कृति हो या पश्चिमी संस्कृति, दोनों का लोगों के जीवन, अस्तित्व, विचारों और दृष्टिकोणों पर एक अमिट, अप्रतिरोध्य या अपूरणीय प्रभाव पड़ा है। चूँकि हम पूर्वी और पश्चिमी संस्कृतियों के बारे में बात कर रहे हैं, इसलिए निश्चित रूप से उनमें भिन्नताएँ हैं। पूर्वी संस्कृति के अपने प्राथमिक विचार और दृष्टिकोण हैं जिन्हें वह महत्व देती है, जबकि पश्चिमी संस्कृति की अपनी विशेषताएँ, प्राथमिक विचार और दृष्टिकोण हैं जिन्हें वह महत्व देती है। तो पूर्वी संस्कृति किस चीज को महत्व देती है? पूर्वी संस्कृति मुख्य रूप से क्या सिखाती है? अधिकाँश लोग इस पहलू को ठीक से नहीं समझते। तुममें से कुछ लोग पूरी तरह हैरान हो सकते हैं : "तुम इस समय से सकारात्मक चीजों के बारे में क्यों बात कर रहे हो?" कई स्थूल चीजों में स्वाभाविक रूप से कई अमूर्त घटक होते हैं। भले ही तुम लोग अभी तक इस पहलू को नहीं समझते, लेकिन अगर तुम ध्यान से सुनोगे, तो समझ जाओगे।

आओ, पहले पूर्वी संस्कृति के बारे में बात करते हैं। पूर्वी संस्कृति किस बात को महत्व देती है? इसका सार क्या है? लोगों पर इसका क्या प्रभाव है? पूर्वी संस्कृति की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं जिन्हें तुमने व्यक्तिगत रूप से महसूस किया है या जिन्हें तुमने लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने के सूक्ष्म प्रभाव के जरिए देखा, समझा या एहसास किया और सीखा है? जब हम संस्कृति की बात करते हैं, इसका संबंध शिक्षा से होता है। चाहे वह शिक्षा परिवारों से मिले, स्कूल से मिले या समाज से, इन सबका संबंध संस्कृति से है; यह किसी राष्ट्र या लोगों के किसी खास समूह की शिक्षा से संबंधित है। शिक्षा एक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि बनाती है—यह निश्चित है। क्या तुम लोग जानते हो कि पूर्वी संस्कृति किस तरह की शिक्षा को महत्व देती है? (पूर्वी संस्कृति परंपरा को बहुत महत्व देती है।) तो परंपरा का सार क्या है? "परंपरा" एक अवधारणा है। इस अवधारणा में कौन-सी विशिष्ट बातें शामिल हैं? इसमें ये अपेक्षाएँ शामिल हैं कि तुम्हें कैसे सोचना चाहिए, तुम्हें क्या करना चाहिए और तुम्हें किस दिशा में और किस लक्ष्य की ओर खुद को आगे बढ़ाना चाहिए। यही इसकी शिक्षा का विशिष्ट सार है। पूर्वी समाज जिस शिक्षा को महत्व देता है, वह सामाजिक नैतिक शिक्षा है और इस सामाजिक नैतिक शिक्षा में भी विशिष्ट बातें शामिल हैं। उदाहरण के लिए, पूर्वी समाज में अक्सर प्रचारित की जाने वाली एक वैचारिक प्रवृत्ति है दूसरों को मनाने के लिए सूझ-बूझ का उपयोग करना। क्या यह उनमें से एक है? (हाँ।) बल से पहले शालीनता, शालीनता से दूसरों के सामने झुकना और “प्रधानमंत्री का दिल इतना बड़ा होता है कि उसमें एक नाव चल जाए” भी उनमें हैं। इसके अलावा, “सामंजस्य एक निधि है; धीरज एक गुण है,” और “समझौते से संघर्ष सुलटना आसान हो जाएगा" भी हैं। और क्या? “सज्जन के बदला लेने में देर क्या और सबेर क्या,” “जहाँ जीवन है वहाँ आशा है,” "एक महान व्यक्ति जानता है कि कब झुकना है और कब खुद को साबित करना है" और "एक सच्चे इंसान की महत्वाकांक्षा दूरगामी होती है।" और क्या? (क्या “संतानोचित धर्मनिष्ठा का गुण सबसे ऊपर रखना चाहिए” को भी गिना जाएगा?) उसे भी गिना जाएगा। साथ ही, “जब कोई दोस्त दूर से आता है तो कितना आनंद होता है” भी है, जो मेहमाननवाजी से संबंधित है। और क्या? (“मैं अपने दोस्त के लिए गोली भी खा लूँगा” और “दूसरों पर वह मत थोपो जो तुम अपने लिए नहीं चाहते।”) पूर्वी शिक्षा में इन सभी अवधारणाओं के मार्फत जो प्रभाव हासिल करने का इरादा होता है वह यह कि लोग सामाजिक नैतिकता को महत्व दें; ये अवधारणाएँ लोगों को सिखाती हैं कि उन्हें समाज में शिष्टाचार के किन नियमों का पालन करना चाहिए और ये लोगों को इस तथाकथित शिष्टाचार को व्यक्ति के चरित्र के प्रतीक के रूप में मानने के लिए मजबूर करती हैं। पूर्वी शिक्षा लोगों के व्यवहार का नियमन करने के लिए इन चीजों का इस्तेमाल करती है। अगर कोई व्यक्ति समाज में स्थापित होना चाहता है, तो उसे सबसे पहले यह पक्का करना होगा कि वह सभी मामलों में दूसरों से सराहना, उच्च सम्मान और आदर प्राप्त करे। मानवता के ऐसे गुणों वाले नैतिक चरित्र को प्राप्त करने पर ही किसी व्यक्ति को सच में एक अच्छा इंसान माना जा सकता है। ऐसी शिक्षा प्राप्त करने के बाद, लोग तथाकथित नैतिक चरित्र के बारे में इन विचारों का उपयोग खुद को बाधित करने के लिए करते हैं और इन अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करते हैं। यह पूर्वी शिक्षा लोगों को बाहरी तौर पर शिष्टाचार का पालन करना सिखाती है, ताकि वे शालीन, अच्छे व्यवहार वाले लोग, उत्तम नैतिक चरित्र वाले लोग दिखें। लोग अंदर से क्या सोच रहे हैं, इस बारे में मानवता की जो भी जरूरतें, कामनाएँ या यहाँ तक कि महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ उनके पास हैं, उन सभी को दबा दिया जाना चाहिए और उनके दिलों में गहराई से दफन कर दिया जाना चाहिए, ताकि वे उजागर न हों। हमने पहले भी पूर्वी शिक्षा के इस पहलू पर काफी संगति की है। वैचारिक शिक्षा की इन सभी अवधारणाओं की प्रकृति क्या है? क्या वे मानवता की जरूरतों के अनुरूप हैं? क्या वे मानवता के सार के अनुरूप हैं? (नहीं।) ठीक इसी वजह से कि इस पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा के तहत लोगों द्वारा जिया गया और प्रकट किया गया व्यवहार लोगों के सार और उनकी मानवता की जरूरतों के बिल्कुल विपरीत है, इससे एक बात पूरी तरह से साबित होती है : यह पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा जिन विभिन्न विचारों की हिमायत करती है वे लोगों की वास्तविक स्थितियों और उनकी मानवता के भीतर वास्तव में मौजूद चीजों के खिलाफ जाते हैं। लोगों की वास्तविक समस्याओं को छिपाने और उन्हें समाज में अधिक सम्मानजनक तरीके से जीने देने, अधिक श्रेष्ठ और दूसरों की स्वीकृति के अधिक योग्य दिखने के लिए, यह सामाजिक नैतिक शिक्षा पूर्वी समाज में अस्तित्व में आई। इस प्रकार, यह कहा जाना चाहिए कि इस तरह के संदर्भ में शिक्षा दिखावे की शिक्षा है। इस दिखावे की शिक्षा का सार या अभिप्रेत प्रभाव, हर व्यक्ति को यह सलाह देना है कि वे दूसरों के सामने अपना असली चेहरा उजागर न करें—चाहे उनका चरित्र कैसा भी हो और उनकी पृष्ठभूमि कुछ भी हो, उन्हें खुद को छिपाना और मुखौटा लगाना सीखना चाहिए, ताकि वे दूसरों के सामने अधिक गरिमा और गौरव के साथ रह सकें, आत्म-सम्मान के साथ रह सकें और इस तरह से जी सकें कि उन्हें समादर और स्वीकृति मिले।

दिखावे वाली इस पूर्वी शिक्षा के संदर्भ में, पूरब के लोगों ने क्या सीखा है? उन्होंने दबना और सहना सीखा है। पूर्वी वैचारिक शिक्षा ने पूरब के लोगों की मानवता के अंदर एक खास गुण पैदा किया है और इस गुण का परिणाम—चाहे सोच के स्तर पर देखा जाए या व्यवहार के मामले में—यह है कि यह लोगों को सिखाता है कि कैसे दबना और सहना है। विशिष्ट तौर पर, किसी भी सामाजिक दौर में, किसी भी शासक वर्ग के अधीन और किसी भी जीवन परिवेश में, सभी तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना होने पर, लोगों को सीखना चाहिए कि कैसे दबना और सहना है और अपनी सच्ची भावनाओं और विचारों को प्रकट नहीं करना है। इसे "दबना और सहना" कहना तो बात को अच्छा बनाकर कहना है; असल में यह दिखावा है। और लोग इस दिखावे के लिए किस चीज का इस्तेमाल करते हैं? वे खुद को छिपाने के लिए पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा या पूर्वी संस्कृति से लिए गए अलग-अलग विचारों, दृष्टिकोणों, स्व-आचरण की युक्तियों और सांसारिक आचरण के फलसफों का इस्तेमाल करते हैं, ताकि बाहर से वे शालीन, अच्छे व्यवहार वाले लोग, सत्यनिष्ठा और गरिमा से युक्त उत्तम नैतिक चरित्र वाले लोग दिखें, जो दूसरों का उच्च सम्मान, स्वीकृति और समादर हासिल करने में सक्षम हों। यह लोगों पर पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा का प्रभाव है; इसका मुख्य प्रभाव यह है कि लोग आखिर में दबना और सहना सीख जाते हैं। "दबना और सहना" शब्द में लोगों को सभी चीजें सहने देना, दूसरों को मनाने के लिए सूझ-बूझ का इस्तेमाल करना और लोगों से व्यवहार करते समय बल का सहारा लेने से पहले शालीन बनना, दूसरों के साथ अत्यधिक दयालुता से पेश आने की कोशिश करना शामिल है। यह ऐसा है जैसे वे खास तौर पर बहुत उदार हैं, उनमें दया और सहनशीलता वाला दिल है; वे खुद को खास तौर पर महान और श्रेष्ठ दिखाते हैं, यहाँ तक कि इंसानी नैतिकता की ऊँचाई से सभी चीजों को तुच्छ समझते हैं। इसलिए, इस पूर्वी सांस्कृतिक संदर्भ में, पूरब के लोगों का सांस्कृतिक जीवन मूल रूप से इन विचारों और अवधारणाओं से भरा हुआ है। साथ ही, इस संस्कृति का इस्तेमाल अगली पीढ़ी को लगातार शिक्षित और प्रभावित करने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, फिल्म और टेलीविजन नाटकों में, कुछ विचारों को अक्सर बढ़ावा दिया जाता है, जिनमें से एक है, “महान शूरवीर अपने देश और लोगों के लिए अपनी भूमिका निभाते हैं।” लोगों के मन में एक महान शूरवीर नायक की छवि क्या है? मार्शल आर्ट फिल्मों में तुम देखते हो कि ज्यादातर महान शूरवीर नायक आकर्षक और सुसंस्कृत होते हैं, सिर पर बाँस की टोपी पहने होते हैं और कमर में तलवार या कटार होती है। वे भावहीन और निस्वार्थ होते हैं; दुनिया, आम लोगों और सभी जीवों को अपने दिल में रखते हैं; वे न्याय को कायम रखते हुए, अच्छे काम करते हुए और पुण्य कमाते हुए घूमते हैं। जब वे अन्याय देखते हैं, तब मदद के लिए अपनी तलवारें निकाल लेते हैं, जरूरत पड़ने पर कार्रवाई करते हैं। यह लोगों के मन में एक महान शूरवीर नायक की छवि है और यही वह मूल्य भी है जो ऐसे किरदारों का लोगों के मन में होता है। फिल्म और टेलीविजन नाटकों में ऐसे किरदार गढ़ने का कारण यह है कि पूरब के सभी लोगों के दिलों में समाज और मानवजाति के प्रति ऐसी ही चाहत होती है। वे चाहते हैं कि ऐसे लोग समाज या जीवन में मौजूद हों, ताकि उन्हें खुद दबने और सहने की जरूरत न पड़े, वे इस सामाजिक संस्कृति से बंधे और जकड़े न रहें। लोगों की ठीक इसी जरूरत के कारण कुछ साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं में ऐसे किरदार लगातार गढ़े जाते हैं। यह सांस्कृतिक प्रचार की जरूरतों को पूरा करता है और यह दर्शकों की जरूरतों को भी पूरा करता है। आम लोग समाज में बहुत लंबे समय से और बहुत दर्दनाक तरीके से दबते और सहते रहे हैं; उन्हें एक रास्ता चाहिए, लेकिन उनके पास कोई रास्ता नहीं है। वे केवल इन साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं में गढ़े गए नायक किरदारों और महान शूरवीरों में ही संतुष्टि पा सकते हैं। इसलिए, फिल्म और टेलीविजन की ऐसी रचनाएँ और ऐसे किरदार जनता द्वारा स्वीकारे जाते हैं और उनकी प्रशंसा की जाती है। जब जनता देखती है कि फिल्मों और टेलीविजन नाटकों में इन महान शूरवीर नायकों के धार्मिक कर्म—या अन्याय देखकर मदद के लिए तलवारें निकालने के उनके कृत्य—उनकी मनोवैज्ञानिक जरूरतों से पूरी तरह मेल खाते हैं, तब वे सभी ताली बजाते हैं और जय-जयकार करते हैं, चिल्लाते हैं, “तुम्हारे साथ यही होना चाहिए! बुराई करने का यही नतीजा मिलता है! लोगों को नुकसान पहुँचाने का यही नतीजा मिलता है!” उनकी जय-जयकार दबने और सहने के उस दर्द को दर्शाती है जिसका पूरब के लोग अपने दैनिक जीवन में अनुभव करते हैं; साथ ही, यह समाज और शासक वर्ग की वजह से होने वाले भारी, कई तरह के दबावों और बड़े नुकसान को भी दर्शाती है। इसलिए, मनोरंजन की ऐसी रचनाओं का आम लोग दिल से स्वागत करते हैं, उन्हें स्वीकृति देते हैं और उनकी चाहत रखते हैं।

इस पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा से पैदा हुई दबने और सहने की शक्ति ने ही पूरब के लोगों को उनकी सोच और मानवता के मामले में काफी हद तक बाँध दिया है और सीमित कर दिया है, जिससे उनकी मानवता और सोच बहुत विकृत हो गई है। यह विकृति कैसे अभिव्यक्त होती है? यह इस तथ्य में अभिव्यक्त होती है कि हर कोई अपने मन में अधिकारियों और अमीरों के लिए नफरत पालता है; जब वे कुछ अन्याय देखते हैं, तब उन्हें अंदर से नफरत महसूस होती है और वे तुरंत इसे शासक वर्ग या अमीरों से जोड़ देते हैं, यह महसूस करते हुए कि उनका सारा दर्द उन्हीं की वजह से है। यह एक पहलू है। इसके अलावा, क्योंकि पूरब की सामाजिक नैतिक शिक्षा लोगों में दबने और सहन करने वाला चरित्र पैदा करती है, इसलिए पूरब के लोगों के विचार काफी हद तक बंधे हुए और जकड़े हुए हैं। पश्चिमी लोगों की तुलना में, पूरब के लोगों के लिए सोच के स्तर पर स्वतंत्र सोच या विचारों की स्वतंत्रता हासिल करना मुश्किल है; यानी, वे मुक्त भाव से, स्वायत्त रूप से और स्वतंत्र रूप से सोचने और तर्क करने में समर्थ नहीं हैं। इसलिए, पूरब के सामाजिक परिवेश में बच्चों से लेकर बड़ों तक हर किसी में गुलामी का गुण होता है; उनके लिए किसी समस्या के बारे में स्वतंत्र रूप से सोचना या सिद्धांतों और योजनाओं के अनुसार स्वतंत्र रूप से कोई काम पूरा करना मुश्किल होता है। एक और पहलू यह है कि पूरब के लोगों की दबने और सहने की शक्ति उन्हें समाज, मानवजाति और हर सामाजिक वर्ग के प्रति दुश्मन बना देती है। इससे उनमें अपनी मानवता के संदर्भ में अपेक्षाकृत धूर्तता का गुण भी विकसित हो गया है, जिसे एक तरह का घटियापन कहा जा सकता है। क्योंकि यह दुनिया इतनी अन्यायपूर्ण है, लोगों को समाज, अपने काम के परिवेश और अपने परिवारों से अलग-अलग दबावों और बंधनों का सामना करना पड़ता है और इसका नतीजा यह होता है कि उनकी मानवता की सामान्य जरूरतें—उनकी सामान्य भावनात्मक और भौतिक जरूरतें—उचित या निष्पक्ष रूप से पूरी नहीं हो पाती हैं। इस तरह, हर कोई अपने जीवन के प्रति लापरवाह, सनकी या दुनिया से ऊबा हुआ रवैया रखता है। यह रवैया पूरब के लोगों को महसूस कराता है कि जीने की उम्मीद बहुत कम है; उन्हें जीने की कोई प्रेरणा महसूस नहीं होती और वे जो भी करते हैं उसमें उनका दिल नहीं लगता। इस तरह, वे दुनिया से निपटने के लिए एक चालाक और धूर्त रवैया अपना लेते हैं और इस चालाकी और धूर्तता को "घटियापन" कहा जा सकता है। इस "घटियापन" का क्या मतलब है? इसका मतलब है हर काम में लापरवाह रवैया अपनाना। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों का अपना कर्तव्य निभाने के प्रति रवैया यह होता है कि वे मनमाने ढंग से काम करते हैं—अगर उनका मन करता है, तो वे थोड़ा काम करते हैं; अगर उनका मन नहीं करता है, तो काम नहीं करते। जब उनके काम में थोड़ा भी दबाव आता है तब वे शिकायत करते हैं कि यह कितना मुश्किल है, और वे आराम करना चाहते हैं। अगर तुम उनके साथ सत्य पर संगति करते हो और उन्हें बताते हो कि इस तरह वे काम में देरी करेंगे, तो वे कहते हैं, “जो भी हो। मुझे अभी आराम करने का मन है। मैं थोड़ी देर मजे करना चाहता हूँ!” वे जो भी करते हैं उसमें उनका रवैया गंभीर और जिम्मेदार नहीं होता। चाहे वह काम की बात हो, उनके दैनिक जीवन की बात हो या यहाँ तक कि उनके पूरे जीवन और उनकी आस्था की बात हो, वे भ्रमित होते हैं, उनका रवैया गंभीर नहीं होता और वे लापरवाह रवैया अपनाते हैं। वे जहाँ भी जाते हैं, सीधे घुस जाना चाहते हैं। जब वे विफल होते हैं, तब उन्हें बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ता; वे यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि उनका नियमन किया जाए, और वे आजादी का आनंद लेना चाहते हैं। अगर उन्हें आजादी मिलती है, तो वे लापरवाही से बुरे कर्म करते हैं; अगर वे अपनी आजादी खो देते हैं, तो हर किसी के बारे में और हर चीज के बारे में शिकायत करते हैं। उनका रवैया ऐसा ही होता है। क्या यह घटियापन नहीं है? (हाँ।) यही वह अनूठा चरित्र है जो पूरब के लोगों ने पूरब के सामाजिक परिवेश में विकसित किया है। कुछ लोग दबने और सहने में भी माहिर होते हैं; वे कुछ भी सह सकते हैं और काफी लंबे समय तक ऐसा कर सकते हैं। उनमें असाधारण सहनशक्ति और लचीलापन होता है, वे किसी भी कठिनाई को सह सकते हैं, किसी भी परिवेश में जीवित रह सकते हैं, किसी भी परिवेश में मुस्कुरा सकते हैं और तब भी रात को सोने का समय होने पर बिना एक भी आंसू बहाए सो सकते हैं। उदाहरण के लिए, जब बाढ़ आती है और कुछ लोगों के घर, खेत और मवेशी सब डूब जाते हैं, तो उन्हें ज्यादा दर्द नहीं होता। वे केवल बाढ़ में कीमती चीजें उठाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, अमीर बनने की योजना बनाते हैं। दूसरे उन्हें चेतावनी देते हैं, “इस तरह चीजें उठाते हुए अपनी जान जोखिम में डालना सुरक्षित नहीं है!” वे जवाब देते हैं, “बाढ़ आना अमीर बनने का एक सही अवसर है। ऐसा अवसर मुश्किल से मिलता है!” दूसरे कहते हैं, “हमारे खेत डूब गए हैं, हमारा सारा अनाज पानी में बह गया है, सरकार कोई राहत नहीं दे रही है और कोई मदद करने नहीं आ रहा है। हम कैसे जिएँगे? इस दुनिया में जीवन बहुत मुश्किल है। इससे अच्छा तो हम मर ही जाएँ!” लेकिन वे कहते हैं, “जब आपदा आती है, तो तुम्हें खुद पर भरोसा करना होता है। स्वर्ग हमेशा मनुष्य के लिए एक रास्ता छोड़ेगा। बाढ़ आना अमीर बनने का एक शानदार अवसर है। यह बिना पूँजी के किया जाने वाला और बहुत अधिक मुनाफा देने वाला कारोबार है। भले ही हमने कुछ चीजें खो दी हों, हम कुछ दूसरी चीजें वापस हासिल कर लेंगे—इससे नुकसान की भरपाई अच्छे से हो जाएगी और शायद थोड़ा मुनाफा भी हो जाए!” तुम देखो, आम लोगों को आपदा आने और नुकसान होने पर दर्द होता है, लेकिन पूरब के लोगों में ऐसे “शूरवीर लोग” भी होते हैं—उन पर चाहे कोई भी आपदा आए, वे धारा के साथ चल सकते हैं और अमीर होने के अवसर भी ढूँढ़ सकते हैं। वे परेशान नहीं होते और न ही दुखी महसूस करते हैं; अगर सरकार उन्हें राहत नहीं देती है या उनकी समस्याएँ हल नहीं करती है, तो भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। यह कुछ ऐसा है जैसे इतनी सारी आपदाएँ झेलने के बाद उन्हें इसकी आदत हो गई है। क्या चीनी समाज ऐसा ही नहीं है? तो चीनी समाज में इस तरह की शिक्षा को देखते हुए, लोग जिन साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं में अपना खाली समय व्यतीत करते हैं या जिस तरह से वे आराम करते हैं, वे ज्यादातर खुद को नीचा दिखाने और खुद का मजाक उड़ाने के तरीके होते हैं। इस तरह चीनी लोग अपना मनोरंजन करते हैं और अपने दिलों में बने हुए दबाव से थोड़ी राहत पाते हैं। लेकिन बाद में, दैनिक जीवन में वे पहले की तरह दिखावा करते रहते हैं और दबते और सहन करते रहते हैं। सरकार उनके साथ कैसा भी व्यवहार करे, आम लोगों को इस तरह के व्यवहार की आदत-सी हो गई है। जब तक वे भूखे नहीं मरते, वे संतुष्ट महसूस करते हैं; जब तक मौत के आसन्न होने का खतरा न हो, वे विद्रोह करने के बारे में नहीं सोचते। आम लोगों ने ऐसी बातों को मान लिया है: बुरा जीवन भी अच्छी मृत्यु से बेहतर है; स्वर्ग हमेशा मनुष्य के लिए एक रास्ता छोड़ेगा। चलो बस ऐसे ही जीते हैं! मानवाधिकार? लोकतंत्र? ये तो फिजूल इच्छाएँ हैं। हम चीनी लोग इसी दुर्भाग्य के साथ पैदा हुए हैं। जब तक हम जीवित रह सकते हैं, बस वही काफी है!” क्या यह हद से ज्यादा मंदबुद्धि और सुन्न होना नहीं है? क्या उनमें इंसान के तौर पर कोई गरिमा बची है? (नहीं।) यह एक काफी दयनीय स्थिति है।

पूरब में बनी अधिकाँश साहित्यिक और कलात्मक रचनाएँ पश्चिम की रचनाओं से इस मामले में बहुत अलग हैं कि वे क्या प्रतिबिंबित करती हैं और किस चीज की हिमायत करती हैं। हालाँकि पूर्वी साहित्यिक और कलात्मक रचनाएँ कुछ सामाजिक अन्यायों को अवश्य प्रतिबिंबित करती हैं, लेकिन यह वह सोच नहीं है जिसकी निर्देशक या पटकथा लेखक सच में हिमायत करते हैं, और यह दर्शकों की कुछ जरूरतों को संतुष्ट करने के लिए नहीं किया जाता है। वे इन रचनाओं में वास्तव में किस चीज की हिमायत करते हैं? वे अभी भी पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा की हिमायत करते हैं। इसकी मुख्य अभिव्यक्तियाँ देशभक्ति की भावनाएँ हैं, इस बात की हिमायत करना है कि लोगों को अपने देश से प्यार करना चाहिए, अपने देश और लोगों की चिंता करनी चाहिए, “दूरगामी महत्वाकांक्षाओं वाला असली इंसान” बनना चाहिए, अन्याय देखने पर मदद के लिए तलवार निकालनी चाहिए और दोस्त के लिए गोली भी खा लेनी चाहिए। वे और किस चीज की हिमायत करते हैं? “समझौते से संघर्ष सुलटना आसान हो जाएगा” और “सज्जन के बदला लेने में देर क्या और सबेर क्या।” जिस मानवता का वे समर्थन करते हैं, वह असल में खोखली है; यह बस लोगों की कल्पनाएँ और अनुमान हैं। वे सिर्फ शासक वर्ग के शासन की स्थिरता की खातिर इसका समर्थन करते हैं, ताकि लोग बिना किसी प्रतिरोध की अनुमति के, हमेशा शासक वर्ग के लिए बोझ ढोने वाले जानवरों की तरह गुलामी करते रहें। इन खोखले विचारों का इस्तेमाल लोगों को सुन्न करने और गुमराह करने के लिए, उनकी मनोरंजन की जरूरत और उनके दिलों की अस्थायी जरूरतों को संतुष्ट करने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, मार्शल आर्ट वाले उपन्यासों या फिल्म और टेलीविजन नाटकों में किस चीज की हिमायत की जाती है? शूरवीरता की भावना की, एक महान शूरवीर नायक बनने की, जो अमीरों को लूटकर गरीबों की मदद करता है और दूसरों की मदद के लिए अपनी तलवार निकालता है। तथाकथित महान शूरवीर नायक इस कहावत में दिखता है, “महान शूरवीर अपने देश और लोगों के लिए अपनी भूमिका निभाते हैं।” शूरवीरता की भावना को बढ़ावा देने से आम लोग न केवल ऐसे किरदारों की प्रशंसा करते हैं, बल्कि इस तरह का इंसान बनने की इच्छा भी रखते हैं और उसका अनुसरण करते हैं। पूर्वी साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं में और किस चीज की हिमायत की जाती है? वे नायक बनने की हिमायत करती हैं: देश के लिए, राष्ट्र के लिए और किसी क्षेत्र और उसके लोगों की भलाई के लिए अपने दिल और दिमाग को खपाने, राष्ट्र के महान उद्देश्य के लिए अपनी जवानी और जीवन बलिदान करने की हिमायत करती हैं। संक्षेप में, पूर्वी—और खासकर चीनी—सामाजिक परिवेश में बनी मार्शल आर्ट हस्तियों की ये जीवनियाँ और किंवदंतियाँ, चाहे वे पारंपरिक हों या आधुनिक, काल्पनिक हों या असली ऐतिहासिक हस्तियों और घटनाओं पर आधारित हों, सभी लोगों को निस्वार्थता और आत्म-त्याग के लिए प्रयास करना सिखाती हैं। वे सभी इसे अपनी थीम और मुख्य शिक्षा मानती हैं, जिसका लक्ष्य लोगों में उत्तम सामाजिक नैतिक मूल्य पैदा करना है। निस्वार्थता और आत्म-त्याग का मतलब है खुद का कोई अस्तित्व नहीं होना; वे इस बात की हिमायत करती हैं कि बड़ा स्वार्थ छोटे स्वार्थ से पहले आता है, अपना देश अपने परिवार से पहले आता है और केवल इसी तरह से कोई व्यक्ति अच्छा जीवन जी सकता है। यही सोच वे लोगों में डालती हैं। यानी, वे तुम्हें स्वार्थी नहीं बनना, सिर्फ अपने बारे में नहीं सोचना, अपने जीवन, अपनी उत्तरजीविता या खुद से जुड़ी किसी भी चीज के लिए कोई त्याग या प्रयास नहीं करना और यहाँ तक कि इन चीजों के लिए किसी भी तरह से संघर्ष नहीं करना सिखाती हैं। इसके बजाय, तुम्हें अपने देश के लिए, समाज के लिए, मानवजाति के लिए और राष्ट्र के महान उद्देश्य के लिए खुद को बलिदान करना और योगदान देना है। इन शिक्षाओं को सामूहिक रूप से दिखावे की शिक्षा कहा जाता है। यह तथाकथित दिखावे की शिक्षा गैर-यथार्थवादी है और मानवता की जरूरतों के अनुरूप नहीं है; लोगों की मानवता की जरूरतों, उनकी सहज प्रवृत्ति और जीने के उनके मौलिक अधिकार को छीनकर, यह लोगों को देश और राष्ट्र के लिए, एक खोखले, बेमतलब के उद्देश्य के लिए निरर्थक त्याग करने को मजबूर करती है। आत्म-त्याग का यह गुण पूरी तरह से कुछ ऐसा है जिसे पूर्वी समाज ने लोगों की मानवता में जबरन डाला है। "जबरन डालने" का मतलब है कि यह कुछ ऐसा नहीं है जो मानवता से स्वाभाविक रूप से पैदा होता है, यह मानवता की सहज प्रवृत्ति का हिस्सा नहीं है, यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे सहज प्रवृत्ति हासिल कर सकती है और यह कुछ ऐसा भी नहीं है जिसे किसी की सहज स्वतंत्र इच्छा या व्यक्तिपरक इच्छा हासिल करना चाहेगी। बल्कि यह कुछ ऐसा है जिसे शासक वर्ग या समाजशास्त्री लोगों के मन में जबरन डालते हैं, उन्हें ऐसे सामाजिक दायित्वों और जिम्मेदारियों को स्वीकारने के लिए गुमराह या मजबूर करते हैं और फिर उन्हें तथाकथित "महान नैतिक चरित्र" के विशाल बैनर तले शिक्षित करते हैं, जिससे वे आजाद होने की ताकत खो देते हैं और कोशिश करने से भी डरते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अगर तुम इस शिक्षा से आजाद हो जाते हो या इससे बाहर निकल जाते हो, अगर तुम इस शिक्षा को नहीं स्वीकारते हो, तो तुम पूरे समाज और पूरे राष्ट्र के दुश्मन बन जाते हो—तुम घोर विद्रोही, अमानवीय और एक अजीब इंसान बन जाते हो और तुम्हें ऐसे जीवन परिवेश का सामना करना पड़ेगा जिसमें तुम अकेले पड़ जाओगे। इसलिए, भले ही लोग अपने दिलों में कुछ असंतोष महसूस करें, भले ही वे इस समाज और इस तरह की शिक्षा से नफरत करें, उनमें इससे आजाद होने की न तो ताकत है और न ही हिम्मत; इसे "ना" कहने की हिम्मत तो और भी नहीं है। वे बस मुस्कुराकर इसे सह सकते हैं—उनमें प्रतिरोध करने की शक्ति नहीं है और वे बस चुपचाप इसे सह सकते हैं। अगर तुम सहन नहीं करते हो, तो बड़े पैमाने पर, समाज तुम्हें बुरा-भला कहेगा और तुम्हें ठुकरा देगा; और छोटे पैमाने पर, तुम्हारा परिवार और परिजन तुम्हें ठुकरा देंगे, तुमसे दूरी बना लेंगे और तुम्हें अलग-थलग कर देंगे, यहाँ तक कि तुम्हें अत्यंत विद्रोही कहकर तुम्हारी निंदा करेंगे। आओ, एक उदाहरण देखते हैं। मान लो कि जब तुम बच्चे थे, तो तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें यह सिखाया: “जब तुम बाहर जाओ और बड़ों को देखो, तो उनका अभिवादन करना। हमसे छोटे लोगों को ‘अंकल’ या ‘आंटी’ कहना और बुजुर्गों को ‘दादाजी’ या ‘दादीजी’ कहना। जब कोई तुम्हें कुछ दे, तो तुम्हें ‘धन्यवाद’ कहना है। अगर कोई दूसरा बच्चा तुम्हें मारे, तो तुम्हें इसे सहन करना होगा; पलटवार तभी करना जब तुम वास्तव में और सहन नहीं कर सको। तुम्हें बहुत ज्यादा संयम दिखाना होगा।” और एक दिन, तुम बाहर गए और किसी को देखा, लेकिन क्योंकि तुम शर्मीले थे, इसलिए तुमने उनका अभिवादन करने की हिम्मत नहीं की। तुम्हारे माता-पिता को लगा कि उनकी बेइज्जती हुई है, इसलिए जब तुम घर आए तो उन्होंने तुम्हें अनुशासित किया और तब से जब भी तुम किसी को देखते हो तो जल्दी से अभिवादन करते हो। मार खाने से बचने के लिए, चाहे तुम्हें कितनी भी शर्म महसूस हो या अंदर से तुम कितने भी अनिच्छुक हो, फिर भी तुम्हें अपनी इच्छा के खिलाफ जाकर लोगों का अभिवादन करना पड़ा। ऐसे परिवेश में बड़े होकर, सब कुछ सहन करने के अलावा कोई चारा नहीं होता। इतनी मामूली-सी बात में भी तुम्हें यही करना पड़ता है; चाहे घर पर हो या समाज में, तुम बस यही कर सकते हो। अगर तुम्हें असहज महसूस होता है और तुम एक बार अपनी मनमानी करना चाहते हो, समाज के बुरा-भला कहने की तो बात ही छोड़ो—तुम्हारा परिवार और माता-पिता भी तुम्हें नसीहत देंगे और डाँटेंगे। बड़े होने के बाद, तुम्हें एहसास होता है कि लोगों का अभिवादन करना इज्जत बचाने और समाज में अपनी जगह बनाना आसान करने की खातिर होता है। लेकिन जब तुम बच्चे थे, तुम इसे समझ नहीं पाते थे, फिर भी तुम्हें यही करना पड़ता था। अगर तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम्हें अनुशासित किया जाता और कभी-कभी तुम्हारे माता-पिता दूसरों के सामने तुम्हें डाँटते या मारते भी थे, जिसे तुम जीवन भर कभी नहीं भूलोगे। इसलिए, व्यापक सामाजिक संदर्भ में, तुम इस शिक्षा को सिर्फ तथाकथित "उत्तम नैतिक चरित्र" के रूप में ही स्वीकार सकते हो। इसे स्वीकारने के परिणामों की परवाह किए बिना, इस बात की परवाह किए बिना कि यह आखिर में तुम्हारी मानवता को कैसे प्रभावित करती है और इस बात की परवाह किए बिना कि यह तुममें मानवता के कैसे चरित्र या गुण विकसित करती है—आखिर में, तुम्हें अकेले ही इन परिणामों को भुगतना होगा।

पूर्वी समाज में पूरब के लोग अपनी शिक्षा से मानवता का जो विशिष्ट गुण विकसित करते हैं, वह है दबना और सहना। इस दबने और सहने के पीछे असल में कई तरह के विशिष्ट विचार, दृष्टिकोण, आचरण के तरीके और सभी तरह की चीजों के प्रति अलग-अलग रवैये होते हैं जो पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा में पाए जाते हैं। पूर्वी समाज ऐसा ही है। इसी तरह, पश्चिमी समाज की भी अपनी मुख्यधारा की सांस्कृतिक शिक्षा है, जिसके जरिए पश्चिमी लोग भी मानवता के अपने-अपने विशिष्ट गुण विकसित करते हैं। तो यह मुख्यधारा की पश्चिमी सांस्कृतिक शिक्षा क्या है? यह मुख्य रूप से स्वायत्तता और आजादी को महत्व देती है। यह पूर्वी समाज की उस स्थिति से अलग है, जो लोगों से देश और समाज के लिए खुद को बलिदान करने और योगदान देने की अपेक्षा रखता है, ऐसे चीजें करने की उम्मीद करता है जो उनके व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी हुई नहीं हैं। इसके विपरीत, पश्चिमी समाज लोगों को जो सिखाता है वह, पूर्वी समाज उनसे जो करने की अपेक्षा रखता है उसके ठीक उल्टा है। पश्चिमी समाज तुमसे समाज, मानवजाति या देश से जुड़े बड़े उद्देश्य के लिए कुछ भी योगदान देने की अपेक्षा नहीं करता; पश्चिमी शिक्षा के मूल में तुम्हें अपने बारे में सोचने, अपनी समस्याओं को खुद हल करना सीखने और दूसरों के लिए, समाज या देश के लिए मुसीबत न बनने की शिक्षा देना है। यह तुम्हें स्वतंत्र अधिकार, सोचने के लिए स्वतंत्र जगह और स्वतंत्र व्यक्तिगत स्थान देता है; साथ ही, यह तुम्हारी स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता और समस्याओं के बारे में स्वतंत्र रूप से सोचने और उन्हें हल करने की क्षमता को विकसित करता है। तुम्हें अपनी समस्याएँ खुद हल करनी होंगी; तुम्हें स्वतंत्र, स्वायत्त और आत्मनिर्भर होना चाहिए। पश्चिम में इस तरह की वैचारिक शिक्षा की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है और इस सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के सामने पश्चिमी लोग भी अपनी शैक्षिक विचारधारा के मूल से संबंधित मानवता के कुछ विशिष्ट गुण विकसित करते हैं। पूरब के लोगों ने पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा की पृष्ठभूमि में पूरब की शैक्षिक और सांस्कृतिक विशेषताएँ विकसित की हैं। चूँकि पश्चिमी लोगों में पश्चिमी समाज का विशिष्ट शैक्षिक गुण होता है, इसलिए उनमें उस विशिष्ट गुण से संबंधित सार भी होता है। पश्चिमी लोगों में जो विशिष्ट शैक्षिक गुण है उसका सार, असल में पूरब के लोगों में मौजूद विशिष्ट शैक्षिक गुण से अलग है। पूरब के लोगों में जो विशिष्ट शैक्षिक गुण है, वह दिखावे की शिक्षा है, जबकि पश्चिमी लोगों में जो विशिष्ट शैक्षिक गुण है, वह स्वार्थ की शिक्षा है। पश्चिमी शिक्षा का हर एक विषय लोगों को आजाद और स्वायत्त होना, अपनी समस्याओं के बारे में सोचना और अपने मामलों से खुद निपटना और उनका प्रबंध करना सिखाता है। इसलिए, पश्चिमी शिक्षा में स्वार्थ की शिक्षा होने का विशिष्ट गुण है। स्वार्थ की यह शिक्षा पूर्वी शिक्षा से पूरी तरह अलग है; यह एक अलग तरह का विशिष्ट गुण है। इस विशिष्ट गुण की वजह से पश्चिमी लोग व्यक्तिगत स्वतंत्र स्थान; व्यक्तिपरक इच्छाशक्ति, सोच, विचारों, दृष्टिकोणों और खयालों; और इसके अलावा अपने खुद के अधिकारों, अपने मौजूदा जीवन परिवेशों, अपनी मौजूदा मनोदशा और भावनाओं को प्राथमिकता देते हैं। उन्हें दूसरी चीजों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत नहीं होती, न ही किसी सामाजिक या पारिवारिक जिम्मेदारी पर ध्यान देने की जरूरत होती है। उन्हें सबसे पहले अपनी समस्याओं को समझना होता है, अपनी भावनाओं को संभालना होता है और अपने तात्कालिक मामलों को सुलझाना होता है; बाकी सब कुछ उसके बाद ही आता है। पूर्वी शिक्षा ने पूरब के लोगों को दबना और सहना सिखाया है, जबकि पश्चिमी शिक्षा ने पश्चिमी लोगों को अपने अधिकारों की रक्षा करना सिखाया है। इस मामले में पश्चिमी लोग और पूरब के लोग पूरी तरह से अलग हैं। जब पूरब के लोगों के सामने कुछ आता है, तब वे बस उसे सहते रहते हैं। जब वे सच में उसे और नहीं सह पाते, तब वे खुद से कहते हैं, “बुरा जीवन भी अच्छी मृत्यु से बेहतर है। जीवित रहने के लिए सहना पड़ता है।” पूरब के लोगों के दबने और सहने के गुण के उलट, पश्चिमी लोगों में एक अलग विशिष्ट गुण होता है : स्वायत्तता और स्वतंत्रता में अपनी सामाजिक शिक्षा के जरिए, उन्होंने अपने अधिकारों की रक्षा करना सीखा है। पूरब के लोगों के दबने और सहने की तुलना में, क्या पश्चिमी लोगों द्वारा अपने अधिकारों की रक्षा करने में कुछ हद तक अधिक आत्म-सम्मान और गरिमा नहीं है? यानी, इसमें थोड़ी ज्यादा स्वायत्तता शामिल है, है ना? (हाँ।) अपने अधिकारों की रक्षा करना एक पूर्णतया मौलिक अवधारणा है; इसका मतलब है अपने मौलिक मानवाधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाना, जिसमें विश्वास का अधिकार, जीवन का अधिकार, बोलने की आजादी का अधिकार वगैरह शामिल हैं। तो फिर, अधिकारों की इस बुनियादी रक्षा का मुख्य रूप से क्या अर्थ है? इसका अर्थ है लोगों के पास सोचने के लिए स्वतंत्र स्थान होना, किसी भी सामाजिक परिवेश या आस-पास के लोगों, घटनाओं और चीजों से प्रभावित या नियंत्रित हुए बिना मुद्दों पर मुक्त रूप से और स्वतंत्र रूप से विचार करने में समर्थ होना। चाहे मुद्दों पर विचार करने से उत्पन्न होने वाले दृष्टिकोण सही हो या गलत या फिर सोचने का तरीका सही हो या नहीं, स्वायत्तता और आजादी हासिल करना सबसे अधिक मायने रखता है। संक्षेप में, पश्चिमी लोग स्वतंत्र समाजों में रहते हैं और पश्चिमी सामाजिक शिक्षा के सांस्कृतिक संदर्भ में, उनके मन बहुत सक्रिय होते हैं और अक्सर स्वतंत्र होते हैं। इसलिए, पूर्वी समाज के लोगों की तुलना में, पश्चिमी लोग अपनी सोच में अधिक साहसी होते हैं, सोचने के लिए ज्यादा इच्छुक और ज्यादा सक्षम होते हैं, जबकि पूरब के लोगों की सोच ज्यादातर समय बंधी हुई, सूत्र-आधारित या दबी हुई होती है। सामान्य परिस्थितियों में, पश्चिमी लोगों के मन स्वतंत्र, सक्रिय होते हैं और वे समस्याओं के बारे में सोचने के इच्छुक रहते हैं। इसे थोड़ा अनुचित तरीके से कहें तो वे अजीब और असामान्य चीजों पर विचार करने के अधिक इच्छुक रहते हैं, यहाँ तक कि वे बहुत ज्यादा गहराई में जाने के भी इच्छुक रहते हैं। यह मानवता के उन विशिष्ट गुणों की अभिव्यक्ति है जो वे पश्चिमी सामाजिक शिक्षा के अंदर विकसित करते हैं और मानवता की यह अभिव्यक्ति पूरब के लोगों की तुलना में अधिक प्रगतिशील है। एक तरफ, वे अपने जीवन के अधिकार की रक्षा करते हैं और दूसरी तरफ, वे अपने स्वतंत्र विचारों से उत्पन्न होने वाले विभिन्न दृष्टिकोणों की भी रक्षा करते हैं। नतीजतन, पश्चिमी साहित्यिक रचनाओं में या पश्चिमी कला और मनोरंजन से जुड़े जीवन में दिखाए गए विचारों, दृष्टिकोणों और कलात्मक रूपों में विविधता और व्यापकता होती है। पूरी मानवजाति में, पश्चिमी साहित्यिक रचनाएँ और मनोरंजन से जुड़ा जीवन अपेक्षाकृत स्वतंत्र और अग्रगामी होते हैं; लोग उनसे प्रेरणा ले सकते हैं और बहुत लाभ उठा सकते हैं। देखो—कुछ पूर्वी साहित्यिक और कलात्मक रचनाएँ किन विचारों की हिमायत करती हैं? देशभक्ति, परिवार के लिए प्यार, माता-पिता के लिए प्यार, वगैरह। ये सभी चीजें पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा में पाई जाती हैं या पूर्वी संस्कृति के सत्व का हिस्सा हैं। पश्चिमी संस्कृति ने पश्चिमी लोगों को सोचने के लिए स्वतंत्र और स्वायत्त जगह दी है, उनके अंदर मानवता का यह विशिष्ट गुण पैदा किया है और उन्हें स्वतंत्र रूप से सोचने का यह अधिकार दिया है, इसलिए पश्चिमी लोगों के साहित्यिक और कलात्मक जीवन में पूरब के लोगों की तुलना में अधिक बौद्धिक सार होता है; साथ ही, उनकी सोच का दायरा भी व्यापक होता है। देखो, पूरब के लोगों की सोच का दायरा या जो विचार वे अपने साहित्यिक और कलात्मक जीवन में व्यक्त करते हैं और जिनकी वे हिमायत करते हैं, वे बहुत सीमित, संकीर्ण और प्रतिबंधित होते हैं, जबकि पश्चिमी लोगों के साहित्यिक और कलात्मक जीवन में दिखाई देने वाले विभिन्न विषय काफी व्यापक और सरकारी प्रतिबंधों से मुक्त होते हैं। इनमें से कुछ विषय किसी अवधि में सरकार द्वारा लागू किए गए किसी विशेष कानून पर लोगों की मानवता के संदर्भ में चिंतन से जुड़े होते हैं, या समाज पर या यहाँ तक कि किसी व्यक्ति के जीवन और परिवार पर इसके प्रभाव से संबंधित चिंतन से जुड़े होते हैं। अन्य विषय, स्कूली शिक्षा और मानवाधिकारों से संबंधित चिंतन से जुड़े होते हैं, साथ ही कई दूसरे मुद्दे भी होते हैं, जैसे कि नस्लीय समानता, नस्लीय भेदभाव और अलग-अलग रंग के लोगों के बीच संबंधों पर आप्रवासियों सहित सभी सामाजिक वर्गों के लोगों के बीच चर्चा करना। इससे यह देखा जा सकता है कि पश्चिमी साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं में जिन विभिन्न विषयों को दिखाया गया है, उनका दायरा बहुत व्यापक है; यही बात इसमें शामिल विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों पर भी लागू होती है। वे कुछ कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा व्यापक कानूनी ढांचे के अंदर इस्तेमाल किए जाने वाले तरीकों और साधनों के कारण पड़ने वाले सामाजिक प्रभाव, साथ ही जनता पर पड़ने वाले विभिन्न मनोवैज्ञानिक बोझों या लोगों के जीवन पर बाद में पड़ने वाले विभिन्न प्रभावों को भी दर्शाते हैं। ये सभी ऐसे विचार और दृष्टिकोण हैं जो विभिन्न पश्चिमी साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं में प्रस्तुत किए गए हैं। एक बात तो यह है कि ये ऐसे विचार हैं जिनकी पश्चिमी सांस्कृतिक संदर्भ में हिमायत की जाती है; दूसरी बात, ये ऐसे विचार और दृष्टिकोण हैं जो इसलिए सामने आते हैं क्योंकि पश्चिमी सांस्कृतिक शिक्षा के संदर्भ में लोगों को सोचने की आजादी है। संक्षेप में, अपनी साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं में पश्चिमी लोगों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले विभिन्न विचार, साथ ही विभिन्न सामाजिक वर्गों और विभिन्न उद्योगों में पश्चिमी लोगों के विचार, दृष्टिकोण, सांसारिक आचरण के फलसफे और सभी तरह की चीजों से व्यवहार करने के उनके रवैये, पूरब के लोगों से पूरी तरह अलग हैं। इसका एक सरल उदाहरण है : पूरब में, जब कोई कर्मचारी किसी कंपनी में काम करता है, तब उसकी आजीविका उसके मालिक से आती है, इसलिए उसे वही करना होता है जो उसका मालिक उसे करने के लिए कहता है। भले ही उसे अपने मालिक के लिए कुछ घरेलू काम करने के लिए कहा जाए, जैसे कि उसके बच्चों को लाना या किराने का सामान खरीदना, उसे पूरी तरह आज्ञाकारी होना पड़ता है और उसमें मना करने की हिम्मत नहीं होती है। उसे अपनी छुट्टी के समय भी फोन पर उपलब्ध रहना पड़ता है। वह अपने मालिक का मुलाजिम, मातहत और गुलाम होता है। पूरब में कर्मचारी और कंपनी के मालिक के बीच वरिष्ठ-अधीनस्थ का संबंध ऐसा ही होता है। हो सकता है कर्मचारी असहज, परेशान और अनिच्छुक महसूस करता हो, लेकिन उसके पास कोई चारा नहीं होता—वह केवल सहन कर सकता है। वह उसका मालिक है, जो उसे आजीविका प्रदान करता है, इसलिए वह खुद को उसकी दया पर ही छोड़ सकता है। पूरब में, कोई मालिक अपने कर्मचारियों का कितना भी शोषण करे और उसके काम कितने भी अनुचित क्यों न हों, कर्मचारी केवल इसे सहन कर सकते हैं; उनके पास इस स्थिति से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं होता। कुछ पूर्वी देशों में श्रम कानून भी हो सकते हैं, जो हर नागरिक के कानूनी अधिकारों और हितों की रक्षा करने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन सामाजिक स्तर पर, क्योंकि यह पूरब है, कोई भी कर्मचारी अपने मालिक पर मुकदमा करने की हिम्मत नहीं करता, भले ही वह श्रम कानूनों को तोड़े। चाहे उसे अधिकारों से कैसे भी वंचित किया जाए या मालिक द्वारा उसका कितना भी शोषण किया जाए, वह कुछ भी नहीं कर सकता। श्रम कानून होने के बावजूद, वह अपने अधिकारों और हितों की रक्षा करने के लिए कानून का इस्तेमाल नहीं कर सकता। वह बस हालात के साथ चलता रहता है और हालात को वैसे ही बने रहने देता है। दूसरी ओर, पश्चिम में स्थिति अलग है। पश्चिम में कर्मचारी और मालिक के बीच वरिष्ठ-अधीनस्थ का संबंध केवल काम के स्तर पर और काम के घंटों के दौरान ही होता है। काम के बाहर, उनके बीच कोई व्यक्तिगत, भावनात्मक संबंध नहीं होता। अगर तुम्हारा मालिक तुमसे ओवरटाइम करने को कहता है, तो तुम मना कर सकते हो। अगर तुम्हारा मालिक तुमसे अपने बच्चों को लाने या किराने का सामान खरीदने में मदद करने को कहता है, तो तुम कह सकते हो, "आपको मुझसे यह सब करने के लिए कहने का कोई अधिकार नहीं है। यह मेरा काम नहीं है। मैं आपकी सेवा करने के लिए बाध्य नहीं हूँ।" तुम मना कर सकते हो। अगर तुम्हारा मालिक बार-बार और जबरन तुमसे यह सब करने को कहता है, तो तुम उस पर मुकदमा कर सकते हो; इसमें पश्चिमी श्रम कानून लागू होंगे; कानून इस पर उचित कार्रवाई करेगा। पश्चिमी लोग ऐसा करने में समर्थ हैं और वे ऐसा करने से डरते नहीं हैं, लेकिन पूरब के लोग डरते हैं। पूरब के लोगों की धारणाओं के अनुसार, तुम्हारा वरिष्ठ या कोई रुतबे वाला या मशहूर व्यक्ति तुमसे जो कुछ भी करने को कहे, तुम्हें वह करना चाहिए और उसे मुफ्त में सेवाएँ प्रदान करनी चाहिए। तुम्हें तो यह भी कहना होगा, "मैं आपकी सेवा करने की खातिर, आपके लिए अपनी जान भी देने को तैयार हूँ और बदले में कुछ नहीं चाहूँगा। आपकी सेवा करना मेरा सम्मान है!" चाहे वह तुम्हारे श्रम का शोषण करे या तुम्हें तुम्हारे मानवाधिकारों से वंचित करे, तुम्हें इसे स्वीकार करना चाहिए और किसी भी पारिश्रमिक की माँग नहीं करनी चाहिए। अगर तुम ऐसा करते हो, तो इसका मतलब है कि तुम एहसानफरामोश हो, उसकी इज्जत खराब कर रहे हो और वह तुम्हें इसकी सजा देगा। दूसरी ओर, पश्चिमी लोग अलग हैं। उन्होंने अपने अधिकारों की रक्षा करना और इन अधिकारों का अत्यंत प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करना सीख लिया है; वे इन्हें जितना हो सके उतना आगे ले जाते हैं। अगर प्रेसिडेंट या कोई मशहूर व्यक्ति खाने के बाद टिप नहीं देता है, तो भी शिकायत दर्ज की जाएगी—यह श्रम कानूनों द्वारा श्रमिकों को दिया गया अधिकार है। जब पूरब के लोग ऐसी स्थितियों का सामना करते हैं, तब वे शिकायत करने की हिम्मत तक नहीं करते। वे सोचते हैं, “वह एक अधिकारी है, एक मशहूर इंसान है। क्या मैं उसके खिलाफ मुकदमा जीत पाऊँगा? अगर मैं सचमुच जीत भी गया, फिर अगर वह पर्दे के पीछे से मेरे लिए मुश्किलें खड़ी करेगा तो मैं क्या करूँगा? अगर मैंने उस पर मुकदमा किया, तो मैं बड़ी मुसीबत में पड़ जाऊँगा और शायद मेरी जान भी जा सकती है।” इसलिए, पूरब के लोग टिप माँगने की हिम्मत करने के बजाय नुकसान उठाना पसंद करते हैं। इसे ही सहना कहते हैं। लेकिन पश्चिमी लोग अलग होते हैं। वे सोचते हैं, “मैं इसे क्यों सहूँ? मैं किसी और की खातिर अपना जीवन जीने के लिए पैदा नहीं हुआ हूँ—मैं अपने लिए जीता हूँ। मुझे अपने अधिकारों की रक्षा करनी है। यह पैसा मेरा हक है। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कोई जाने-माने व्यक्ति या बड़े आदमी हो, तुम्हें पैसे देने होंगे। हर कोई बराबर है। टिप नहीं देने का अधिकार तुम्हें किसने दिया? अगर तुमने टिप नहीं दी, तो मैं तुम पर मुकदमा कर दूँगा!” और एक बार जब उसे टिप मिल जाती है, तो मामला निपट जाता है। ये अलग-अलग सोच, दृष्टिकोण और लोगों, घटनाओं और चीजों से निपटने के तरीके हैं जो पूरब के लोगों और पश्चिमी लोगों में अपनी-अपनी संबंधित सांस्कृतिक शिक्षाओं से आते हैं।

पूरब और पश्चिम के लोग सांस्कृतिक शिक्षा के अपने तरीकों और उस शिक्षा की विशिष्ट विषय-वस्तु के मामले में अलग-अलग हैं। शिक्षा के इन अलग-अलग रूपों ने अलग-अलग इंसानी संस्कृतियों के साथ-साथ अलग-अलग जातीय समूहों में मानवता के विशिष्ट गुण भी पैदा किए हैं। मानवता के इन विशिष्ट गुणों के साथ, पूरब के लोगों की अपनी जीवनशैली, जीवन की स्थितियाँ, सोचने के तरीके और सांसारिक आचरण के प्रति उनके रवैये होते हैं, जबकि पश्चिमी लोगों की अपनी अलग जीवनशैली, जीवन की स्थितियाँ, सोचने के तरीके और सांसारिक आचरण के लिए उनके तरीके और रवैये होते हैं। बेशक सांसारिक आचरण के इन दो रवैयों में से एक है दबना और सहना; और यह खास तौर पर संयमी होना है; दूसरा, लोगों की अपनी व्यक्तिगत मर्जी और इच्छाओं के अधिकारों की रक्षा करने पर खास जोर देता है। एक दिखावे की शिक्षा से पैदा होता है और दूसरा स्वार्थ की शिक्षा से पैदा होता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मानवता के ये विशिष्ट गुण किस तरह की शिक्षा से पैदा होते हैं—चाहे वह दबने और सहने का गुण हो या अपने अधिकारों की रक्षा करना, सुरक्षित रहना या खुलापन हो—इनमें से कौन-सी सकारात्मक चीजें हैं? (चाहे पूर्वी हो या पश्चिमी, मानवता के इनमें से कोई भी विशिष्ट गुण सकारात्मक चीजें नहीं हैं।) तुम ऐसा क्यों कहते हो कि वे सकारात्मक चीजें नहीं हैं? आओ, हम तुम्हारे विशिष्ट कारणों के बारे में सुनते हैं। तुममें से कोई भी नहीं बता सकता कि ऐसा क्यों, है ना? (हम नहीं बता सकते।) मामला चाहे जो भी हो, तुम सभी डरते हो कि दूसरे लोग बारीकियों पर बहुत ज्यादा ध्यान देंगे और जब वे ऐसा करते हैं, तो तुम भ्रमित हो जाते हो और चीजों को साफ-साफ समझा नहीं पाते। इससे साबित होता है कि तुममें उस मामले में स्पष्टता की कमी है, इसलिए तुम्हें इस पर संगति करनी चाहिए। जो सवाल मैंने तुमसे पूछा है, वह संगति करने लायक विषय है, है ना? (हाँ।) इस विषय में "परमेश्वर द्वारा सृजित क्या है" शामिल है। तो आओ, पहले देखते हैं : परमेश्वर द्वारा सृजित इंसान किस तरह का प्राणी है? परमेश्वर जो भी बनाता है, वे सकारात्मक चीजें होती हैं। एक इंसान में कौन-सी चीजें परमेश्वर द्वारा सृजित हैं? (एक इंसान की स्वतंत्र इच्छाशक्ति और वह बुद्धि जो परमेश्वर उसे देता है।) मोटे तौर पर, एक इंसान की सभी जन्मजात स्थितियाँ परमेश्वर द्वारा दी गईं और उसके द्वारा सृजित हैं। अगर हम "सृजित" शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो यह थोड़ा भावात्मक हो सकता है, क्योंकि हर कोई अपने माता-पिता से पैदा होता है, न कि परमेश्वर के अपने हाथों से बनाया जाता है। "परमेश्वर द्वारा सृजित क्या है" वाक्यांश का इस्तेमाल थोड़ा व्यापक है; यह पूरी तरह से उपयुक्त नहीं है। ऐसे में, "परमेश्वर द्वारा लोगों को दी गई जन्मजात स्थितियाँ" कहना अधिक विशिष्ट और वस्तुनिष्ठ है। परमेश्वर द्वारा लोगों को दी गई जन्मजात स्थितियों में “परमेश्वर द्वारा सृजित क्या है” विषय शामिल है। तो क्या हम कह सकते हैं कि किसी व्यक्ति की सभी जन्मजात स्थितियाँ सकारात्मक चीजें हैं? (हाँ।) किसी व्यक्ति की शक्ल-सूरत, उसकी भाषाई क्षमता, उसकी सभी इंद्रियाँ और शारीरिक विशेषताएँ, साथ ही उसकी स्वतंत्र इच्छाशक्ति, वह क्षमता जिससे वह सोचता और विचार करता है, उसकी स्वाभाविक खूबियाँ और गुण; साथ ही जीवित प्राणी के तौर पर वह जीवन जीने के जो भी नियम मानता है—ये सभी सकारात्मक चीजें हैं। यानी, परमेश्वर द्वारा लोगों को दी गई सभी जन्मजात स्थितियाँ सकारात्मक चीजें हैं। तो क्या इन सकारात्मक चीजों में वे अलग-अलग विचार शामिल हैं जो किसी व्यक्ति के मन में आते हैं या जिन्हें वह समाज से और अलग-अलग युगों से अपनाता है? (नहीं।) जो कुछ भी लोग समाज से या मानवजाति से हासिल करते हैं, वह परमेश्वर ने नहीं दिया है, न ही यह मूल रूप से परमेश्वर द्वारा सृजित है। यह कहा जा सकता है कि अगर कोई चीज समाज या मानवजाति से आती है, तो वह सकारात्मक चीज नहीं है। इसे मोटे तौर पर, अवधारणात्मक तरीके से सारांशित करें तो हम यही कहेंगे। और विशिष्ट तौर पर कहें तो? क्या पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा के सांस्कृतिक संदर्भ में पैदा हुए मानवता के विशिष्ट गुण और सोचने के तरीके कुछ हद तक विकृत नहीं हैं? इसे ऐसे भी कहा जा सकता है : पूर्वी समाज में, लोगों के मन जकड़े हुए और बिगड़े हुए हैं; वे समाज के और शैतान के कुछ विचारों और दृष्टिकोणों से भ्रष्ट और प्रभावित हुए हैं। क्या इसका मतलब यह नहीं है कि उनके मन शैतान की प्रक्रिया से होकर गुजरे हैं? (हाँ।) लोगों के मन प्रक्रिया से होकर गुजरे हैं और उनके विचार उनकी मानवता से पैदा नहीं हुए हैं। ये शिक्षाएँ सकारात्मक चीजों से नहीं आतीं, न ही ये परमेश्वर से आती हैं। चूँकि वे परमेश्वर से नहीं आतीं हैं, तो वे जो भी विचार, दृष्टिकोण और सोचने के तरीके पैदा करती हैं—और वे अंततः मानवता के जो भी विशिष्ट गुण पैदा करती हैं—बाद में उनसे निकलने वाली अन्य सभी चीजें, वे सब नकारात्मक चीजें होती हैं, सकारात्मक नहीं। यह एक ऐसी बात है जिसके बारे में तुम निश्चित हो चुके हो, है ना? (हाँ।) पूर्वी लोगों के मन जकड़े हुए और बिगड़े हुए हैं; वे कुछ पूर्वी विचारों और दृष्टिकोणों से भी प्रभावित हैं, इसलिए उनकी मानवता के विशिष्ट गुणों से जो चीजें अभिव्यक्त होती हैं, वे सभी नकारात्मक हैं। अब पश्चिम को देखते हैं। पश्चिमी लोगों की वैचारिक शिक्षा की विषय-वस्तु क्या है? क्या इसका सत्य से कोई लेना-देना है? क्या पश्चिमी शिक्षा की विषय-वस्तु और मानवता की जिन अभिव्यक्तियों के लिए यह लोगों को प्रयास करना सिखाती है, क्या वे परमेश्वर के वचनों से आती हैं? (नहीं।) इसे और स्पष्ट कहने के लिए, मैं तुम लोगों से एक सवाल पूछता हूँ : क्या यह शिक्षा—जीवन, जीवित बचे रहने और सांसारिक मामलों से निपटने के पीछे के ये सिद्धांत और दृष्टिकोण और उन चीजों से निपटने के ये तरीके—परमेश्वर के वचनों से मेल खाते हैं? क्या यह शिक्षा सत्य से मेल खाती है? (नहीं।) यह किस तरह से मेल नहीं खाती? (यह स्वार्थ की पश्चिमी शिक्षा की तरह है—भले ही यह सोचने की आजादी का सम्मान करती है, यह लोगों को केवल अपने बारे में सोचना और दूसरों के बारे में नहीं सोचना सिखाती है। यह परमेश्वर के वचनों और सत्य के अनुरूप नहीं है।) तो परमेश्वर के वचन और सत्य क्या कहते हैं? (आपस में बातचीत करते समय, लोगों को केवल अपने हितों या भावनाओं के बारे में नहीं सोचना चाहिए; बल्कि उन्हें यह सोचना चाहिए कि उनके क्रियाकलाप दूसरों को कैसे उन्नत कर सकते हैं और साथ ही कैसे सत्य के अनुरूप भी हो सकते हैं।) परमेश्वर के वचन तुम्हें बताते हैं कि चाहे तुम समस्याओं के बारे में स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से सोचो या किसी खास सोच या दृष्टिकोण के प्रभाव में रहो, तुम्हें ऐसा केवल अपने हितों की रक्षा करने या अपनी गरिमा और गौरव की रक्षा करने की खातिर नहीं करना चाहिए—यह वह सिद्धांत नहीं है जिसके अनुसार परमेश्वर के विश्वासियों को समस्याओं पर विचार करना चाहिए। समस्याओं पर विचार करते समय तुम्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि तुम्हारा तरीका सत्य के अनुरूप है या नहीं, क्या इन समस्याओं को सत्य का उपयोग करके हल किया जा सकता है और क्या तुम्हारा तरीका सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है और परमेश्वर के प्रति समर्पण की ओर ले जाता है। यह समस्याओं पर विचार करने का सिद्धांत है। चाहे तुम लोगों से निपट रहे हो या अपने परिवार या अपने आस-पास की अन्य चीजों से संबंधित समस्याओं से निपट रहे हो, तुम्हें बस अपने अधिकारों और हितों की रक्षा करने के बजाय, परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों के अनुसार काम करना चाहिए। ये परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार आचरण करने के सिद्धांत हैं। तो ऊपरी तौर पर, पूर्वी संस्कृति की शिक्षा की तुलना में पश्चिमी सांस्कृतिक शिक्षा मानव अधिकारों और लोगों के अधिकारों की रक्षा को अधिक महत्व देती है। यह पूर्वी संस्कृति से बेहतर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह सत्य की जगह ले सकती है। तुम्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि यह पूर्वी संस्कृति से बेहतर है या यह मानव अधिकारों का सम्मान करती है और लोगों को स्वतंत्र और मुक्त बनाती है, बस इसलिए यह सत्य सिद्धांतों की जगह ले सकती है और इसका वर्णन कुछ हद तक सकारात्मक के रूप में किया जा सकता है। पश्चिमी सांस्कृतिक शिक्षा पूर्वी सांस्कृतिक शिक्षा से बस बेहतर है और मानवता की जरूरतों के अधिक अनुरूप है, लेकिन इसे सत्य सिद्धांतों के बराबर नहीं माना जा सकता, न ही यह उनकी जगह ले सकती है। कुछ हद तक, यह बस मानवता की जरूरतों, साथ ही लोगों की गरिमा, उनके अधिकारों और हितों को बनाए रखती है और उनका सम्मान करती है। हालाँकि, यह सम्मान केवल मानवता के संदर्भ में प्रासंगिक है। सत्य और न्याय के संदर्भ में, यह इनमें से किसी भी चीज को बनाए नहीं रखती है। इसलिए, पश्चिमी सांस्कृतिक शिक्षा स्वार्थ की शिक्षा है। स्वार्थ की शिक्षा का मतलब है, “हर किसी को मेरे हितों की रक्षा करनी चाहिए। कुछ भी करने से पहले मुझे खुद सब कुछ भलीभाँति सोच लेना चाहिए। मेरे निजी हित, मेरे मानवाधिकार और मेरे व्यक्तिगत अधिकार सर्वोपरि हैं।” क्या यहाँ किसी नैतिक न्याय की बात की जा सकती है? क्या यहाँ किसी निष्पक्षता की बात की जा सकती है? (नहीं।) अगर निष्पक्षता या नैतिक न्याय की बात नहीं है, तो यह कैसे संभव है कि यह सत्य सिद्धांतों के साथ मेल खा सकती है? कुछ हद तक, पश्चिमी सांस्कृतिक शिक्षा तुम्हारे मानवाधिकारों का सम्मान करती है; यह तुम्हें समस्याओं के बारे में सोचने और खुलकर अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार देती है। इस तरह, यह मूल रूप से लोगों की गरिमा और मानवाधिकारों की रक्षा कर सकती है। इसलिए, पश्चिमी शिक्षा कुछ हद तक मानवता की जरूरतों के अधिक अनुरूप है। लेकिन क्या पश्चिमी शिक्षा लोगों को जीवन में सही रास्ते पर ले जा सकती है? क्या यह लोगों को, सभी लोगों के साथ सत्य सिद्धांतों के अनुसार पेश आने और सभी चीजों को सत्य सिद्धांतों के अनुसार करने में समर्थ बना सकती है? यह ऐसा नहीं कर सकती। पश्चिमी शिक्षा यह गारंटी दे सकती है कि हर किसी के पास मानवाधिकार हैं और अपनी गरिमा की रक्षा करने का अधिकार है—यह पूरी तरह से मानवता की जरूरतों के अनुरूप है। लेकिन समाज की वास्तविक स्थिति के हिसाब से देखें तो कुछ ही देश मानवाधिकारों की गारंटी देने के मानक को पूरी तरह से पूरा कर पाते हैं। यथार्थवादी तरीके से बोलें तो आज के समाज में यह एक बहुत अच्छी सामाजिक व्यवस्था है जो लोगों को समस्याओं के बारे में मुक्त रूप से सोचने और खुलकर अपनी राय व्यक्त करने की अनुमति देती है। परमेश्वर ने लोगों को स्वतंत्र इच्छाशक्ति और समस्याओं के बारे में स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता दी; यह उसके द्वारा दी गई काबिलियत का बस एक पहलू है। लेकिन परमेश्वर ने तुमसे यह कभी नहीं कहा, “स्वार्थी बनो, स्वायत्त बनो। सब कुछ तुम्हारे अपने हितों पर केंद्रित होना चाहिए। तुम्हारे अपने हित सर्वोपरि हैं। सभी मामलों में तुम्हें स्वतंत्र होना चाहिए और अपना मालिक खुद होना चाहिए; सत्य खोजने, स्वर्ग की इच्छा के बारे में जानने या दूसरों के हितों पर विचार करने की कोई जरूरत नहीं है।” परमेश्वर ने कभी किसी को इस तरह से नहीं सिखाया। लोगों के जीवन में परमेश्वर के मार्गदर्शन की शुरुआत से ही, उसने जीवन जीने और सभी पहलुओं में आचरण करने के विशिष्ट तरीके बताए हैं, लोगों से सत्य का अनुसरण करने, उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने, ईमानदार लोग बनने, सृजित प्राणियों का कर्तव्य पूरा करने और इसी तरह की बातें कही हैं। ये सभी व्यक्ति के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण अनुसरण हैं। परमेश्वर द्वारा व्यक्त बहुत-सारे सत्यों के बीच, उसने कभी भी तुमसे अपने अधिकारों की रक्षा करने के लिए नहीं कहा, न ही उसने कभी तुमसे समस्याओं के बारे में मुक्त रूप से सोचने और अपनी स्वतंत्र जगह की रक्षा करने के लिए कहा है। परमेश्वर ने कभी भी ऐसा कुछ नहीं कहा। परमेश्वर ने तुम्हें केवल समस्याओं के बारे में मुक्त रूप से सोचने की क्षमता दी है—बस इतना ही। तुम्हारे पास यह क्षमता है और तुम्हारे पास स्वतंत्र इच्छाशक्ति की जन्मजात स्थिति भी है। हालाँकि, लोगों को ऐसी जन्मजात स्थितियाँ देने के बाद, परमेश्वर ने उनके लिए व्यवस्थाएँ और आज्ञाएँ भी बनाईं, उन्हें विभिन्न सत्यों की आपूर्ति की, बताया कि उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिए और कैसे परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए—सभी मामलों में सत्य सिद्धांत हैं जिनका लोगों को पालन करना चाहिए। लेकिन परमेश्वर के सभी वचनों और लोगों को दी गई उसकी चेतावनियों में, उसने कभी भी लोगों से स्वायत्त होने, स्वतंत्र होने या अपने अधिकारों की रक्षा करना सीखने के लिए नहीं कहा। ऐसे विचार, दृष्टिकोण या ऐसी बातें और शिक्षाएँ परमेश्वर के वचनों या सत्य में कभी नहीं देखी गई हैं। इसके उलट, जिन वचनों में परमेश्वर लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करता है, वह उनके घमंड और स्वार्थ को उजागर करता है। यह स्वार्थ एक ऐसा गुण है जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद लोगों की मानवता में प्रकट होता है। कुछ लोगों में, यह तब प्रदर्शित होता है जब वे शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद अपने हितों को सुरक्षित करने की कोशिश करते हैं; दूसरों में, यह शुद्ध रूप से इस समाज की शिक्षा का नतीजा है। दोनों ही मामलों में, यह स्वार्थ है। चाहे यह कैसे भी पैदा हुआ हो, संक्षेप में, अगर तुम स्वार्थी हो, तो यह मानवता का एक गुण और उसका प्रकाशन है जिसे तुम भ्रष्ट स्वभावों में जीते समय प्रदर्शित करते हो। क्या अब यह स्पष्ट है? (हाँ।)

परमेश्वर लोगों को जो जन्मजात स्थितियाँ देता है उनमें शामिल विभिन्न क्षमताओं का या लोगों में जो भी काबिलियत और क्षमताएँ जन्मजात होती हैं उनका, पश्चिमी या पूर्वी शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं है। लोगों को परमेश्वर द्वारा दी गई जन्मजात स्थितियों में मौजूद अलग-अलग क्षमताएँ सकारात्मक चीजें हैं। मैं क्यों कहता हूँ कि वे सकारात्मक चीजें हैं? क्योंकि ये जन्मजात स्थितियाँ परमेश्वर से आती हैं। विशिष्ट तौर पर, इन जन्मजात स्थितियों के होने से एक सृजित इंसान सकारात्मक चीजों को स्वीकार पाता है और वास्तविक जीवन में सामने आने वाले विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों से सीख पाता है, उनके आधार पर आत्म-चिंतन कर पाता है, उन पर पकड़ बना पाता है और उन्हें समझ पाता है। इसे परमेश्वर ने लोगों के लिए व्यवस्थित और तैयार किया है, इसलिए ये सकारात्मक चीजें हैं। चाहे पूर्वी शिक्षा हो या पश्चिमी शिक्षा, चाहे पूर्वी संस्कृति हो या पश्चिमी संस्कृति, दोनों का उस सत्य से कोई लेना-देना नहीं है जो परमेश्वर लोगों को सिखाता और देता है। यहाँ तक कि यह, सत्य और उस मानवता के खिलाफ है जो परमेश्वर लोगों में देखना चाहता है। इसलिए न तो पूर्वी शिक्षा और न ही पश्चिमी शिक्षा सकारात्मक चीज है। चाहे समाज से आए, बुरी प्रवृत्तियों से आए या किसी शासक वर्ग से, यह सकारात्मक नहीं है। हालाँकि पश्चिमी शिक्षा पूर्वी शिक्षा की तुलना में थोड़ी अधिक उन्नत और बेहतर है, लोगों को थोड़ी आजादी देने और उनकी कुछ जरूरतें पूरी कर पाने में समर्थ है, लेकिन यह केवल लोगों की स्वतंत्र इच्छाशक्ति का और समस्याओं के बारे में सोचने और अपनी राय खुलकर व्यक्त करने की उनकी क्षमता का इस्तेमाल करती है। यानी, यह सकारात्मक चीजों का इस्तेमाल करती है, लेकिन यह जिन विचारों की हिमायत करती है और जिन लक्ष्यों को हासिल करना चाहती है, वे लोगों को सही रास्ते पर ले जाने के लिए नहीं हैं, न ही वे उन्हें परमेश्वर जैसा चाहता है वैसे सच्चे सृजित इंसान बनने में मदद करने के लिए हैं। इसलिए, इस बात को ध्यान में रखते हुए, हालाँकि पश्चिमी शिक्षा पूर्वी शिक्षा से बेहतर है या यह मानवता की जरूरतें पूरी करती है, लेकिन इसने लोगों की स्वतंत्र इच्छाशक्ति या कुछ निश्चित क्षमताओं का इस्तेमाल करके उन्हें परमेश्वर के सामने समर्पण करने, सृजित प्राणी के तौर पर सही तरीके से काम करने और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करने में समर्थ नहीं बनाया है। यह शिक्षा लोगों को परमेश्वर के सामने भी नहीं लाई है, न ही इसने परमेश्वर की आराधना करने और बुराई से दूर रहने में समर्थ बनने में उनकी मदद की है। पूर्वी शिक्षा और पश्चिमी शिक्षा का काम एक ही है : दोनों ही, लोगों को परमेश्वर से और सत्य से दूर कर देती हैं। चाहे पूर्वी संस्कृति हो या पश्चिमी संस्कृति, दोनों ही मानवजाति पर शैतान के शासन की व्यापक सामाजिक पृष्ठभूमि में और शैतान द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट करने की प्रक्रिया से उभरी हैं। इसलिए, चाहे पूर्वी संस्कृति के रूप में शिक्षा हो या पश्चिमी संस्कृति के रूप में, हर कोई शैतान की भ्रष्टता वाले इस मानव संसार में जीता है। इसी तरह, अलग-अलग समाजों में या समाज के अलग-अलग रूपों की शिक्षा के तहत मानवजाति भी भ्रष्ट हो गई है और इस भ्रष्टता का नतीजा यह है कि लोगों में एक ऐसी मानवता आ गई है जिसने—संस्कृति के अलग-अलग स्तरों और रूपों में—भ्रष्ट स्वभावों को अपना जीवन बना लिया है। पूरब के लोगों में पूर्वी संस्कृति से पैदा हुए मानवता के विशिष्ट गुणों के भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, जबकि पश्चिमी लोगों में पश्चिमी संस्कृति की पृष्ठभूमि में पैदा हुए मानवता के विशिष्ट गुणों के भ्रष्ट स्वभाव होते हैं। हालाँकि पूरब और पश्चिम के लोग अपनी मानवता के विशिष्ट गुणों के मामले में, अपने भ्रष्ट स्वभावों के मामले में अलग दिख सकते हैं, लेकिन चूँकि वे सभी शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं, पूरब और पश्चिम दोनों के लोग एक समान भ्रष्ट स्वभावों में जीते हैं और दोनों में ऐसी मानवता है जहाँ समान भ्रष्ट स्वभाव उनका जीवन हैं। इस तरह, पूरब और पश्चिम के लोगों का प्रकृति सार एक जैसा है : दोनों ही सत्य और परमेश्वर के दुश्मन हैं। इसलिए, पूरब या पश्चिम के लोगों के बारे में कुछ भी प्रशंसा के लायक नहीं है। चाहे पूर्वी संस्कृति हो या पश्चिमी संस्कृति, परमेश्वर और सत्य की उपस्थिति में दोनों ही नकारात्मक चीजें हैं, जिनमें कुछ भी सराहनीय नहीं है। पूर्वी और पश्चिमी दोनों सभ्यताएँ मानवजाति के सृजन में परमेश्वर के मूल इरादे के खिलाफ हैं, जो यह था कि मानवजाति उसकी आराधना करे; वे इंसानों को, जो प्राणियों की श्रेणी में आते हैं, परमेश्वर की उपस्थिति से दूर करने के लिए सांस्कृतिक शिक्षा के अपने-अपने संबंधित रूपों का इस्तेमाल करते हैं। इस मामले में, पूरब और पश्चिम एक जैसे हैं, हैं ना? (हाँ।) पूरब और पश्चिम में कुछ भी प्रशंसा के लायक नहीं है। देखो, हालाँकि दोनों ने अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार लिया है, लेकिन पूरब के लोग इसे स्वीकारने के बाद तुरंत भाई-बहनों की मेजबानी करना शुरू कर देते हैं और सक्रिय होकर उन्हें अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को सुसमाचार का उपदेश देने के लिए ले जाते हैं; उनमें सुसमाचार प्रचार के काम के प्रति बहुत जोश और उत्साह होता है—दूसरी ओर, पश्चिमी लोग अलग होते हैं। वे सुसमाचार प्रचार के काम को लेकर बहुत सतर्क रहते हैं। आधे साल या एक साल तक परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकारने के बाद भी, जब तुम उनसे पूछते हो कि क्या उन्होंने अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को सुसमाचार का प्रचार किया है, तब वे कहते हैं, “मेरे माता-पिता, रिश्तेदार, दोस्त और कलीसिया जाने वाले ज्यादातर लोग प्रभु की वापसी के मामले में अपने अलग विचार और दृष्टिकोण रखते हैं। मुझे इस पर सावधानी से सोचना होगा और उनसे बात करनी होगी, तभी मैं उन्हें संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ता के तौर पर तुम लोगों को दे पाऊँगा। हम पश्चिम में जिस तरह से आचरण करते हैं, उसकी मुख्य खासियत यह है कि अपने अधिकारों का बचाव करना और अपने स्वतंत्र स्थान की अधिक से अधिक सीमा तक रक्षा करना हमारे लिए अनिवार्य है। तुम बिना सोचे-समझे लोगों को सुसमाचार का उपदेश कैसे दे सकते हो?” तुम कहते हो, “हम उन्हें सुसमाचार का उपदेश इसलिए देते हैं ताकि वे प्रभु का स्वागत कर सकें, अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सत्यों को प्राप्त कर सकें और उनके पास उद्धार पाने और आपदाओं में जीवित रहने का अवसर हो। यह परमेश्वर का आदेश है और यह वह जिम्मेदारी है जो हमें पूरी करनी ही होगी।” वे जवाब देते हैं, “ठीक है, मुझे अभी भी पहले खुद की रक्षा करनी है; परमेश्वर का आदेश इंतजार कर सकता है। मैं इस मामले में खुद फैसला ले सकता हूँ। मेरे अपने स्वतंत्र विचार होने चाहिए और मैं तुम लोगों के बहकावे में नहीं आ सकता। हम पश्चिम के लोग लोकतंत्र और आजादी को महत्व देते हैं; हममें अपने अधिकारों की रक्षा करने की जागरूकता है। हम तुम पूरब के लोगों जैसे नहीं हैं जो बिना सोचे-समझे जोश दिखाते हैं। हम सभी का अपना निजी जीवन स्थान है और कोई किसी को परेशान नहीं करता।” देखा? ऐसे ही अहम पलों में पूरब और पश्चिम के लोगों की मानवता के विशिष्ट गुणों में भिन्नता और अंतर का पता चलता है। लेकिन किसी भी मामले में, चाहे मानवता के विशिष्ट गुण पूर्वी शिक्षा से आए हों या पश्चिमी शिक्षा से—चाहे वह उत्साह हो या उदासीनता—जब तक कोई इंसान शैतान के भ्रष्ट स्वभावों में जीता है, तब तक वह भ्रष्ट मानवजाति का हिस्सा है। यहाँ ऊँच-नीच का कोई अंतर नहीं है; हर किसी को सत्य की समझ, परमेश्वर के वचनों के प्रावधान, परमेश्वर के उद्धार और साथ ही, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना की जरूरत है।

हालाँकि पूरब और पश्चिम के लोगों की संस्कृतियाँ अलग-अलग हैं और वे परमेश्वर के प्रभुत्व और संप्रभुता के अधीन अलग-अलग सभ्यताओं में रहते हैं, लेकिन परमेश्वर के सामने उनकी केवल एक ही पहचान है और वह है सृजित प्राणियों की पहचान। सृजित प्राणियों की समानता का आधार यह है कि परमेश्वर ने लोगों के लिए जो जन्मजात स्थितियाँ बनाई हैं, वे एक समान हैं। पूरब और पश्चिम के लोगों के बीच चाहे कितने भी सांस्कृतिक भेद हों; चाहे उनके रूप-रंग, उनकी भाषा, या समस्याओं के बारे में सोचने के उनके ढंग और तरीके कितने भी अलग हों, जब तक परमेश्वर के सामने तुम उसके बनाए हुए सृजित प्राणी हो, तब तक तुम्हारे पास जो एकमात्र सकारात्मक चीज है वह है वे जन्मजात स्थितियाँ जो उसने तुम्हें दी हैं; बाकी सब कुछ नकारात्मक है। यह तुम लोगों को थोड़ी सामान्य बात लग सकती है, इसलिए विशेष रूप से कहें तो, परमेश्वर द्वारा दी गई जन्मजात स्थितियों को छोड़कर, तुममें जो कुछ भी है वह कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर बदलना चाहता है; यह कुछ ऐसा है जिसे तुम्हें सत्य स्वीकार करके बदलना और त्याग देना चाहिए। तुम्हें क्या जानने की जरूरत है? मानवजाति की तथाकथित संस्कृति, चाहे वह पूर्वी हो या पश्चिमी, उन विचारों और दृष्टिकोणों या सिद्धांतों और कथनों से बनी है जिन्हें अलग-अलग दौर के शासक वर्गों ने जनता को शिक्षित करने के लिए डिजाइन किया है। लेकिन चाहे वह पूर्वी संस्कृति हो या पश्चिमी, इसका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है। भले ही इसका सत्य से टकराव न हो, फिर भी इसे सकारात्मक चीज नहीं कहा जा सकता। कोई संस्कृति कितनी भी अच्छी हो, वह सत्य के बराबर नहीं हो सकती, सत्य का प्रतिनिधित्व करना तो दूर की बात है। भले ही लोग इसे नकारात्मक चीज न मानते हों, फिर भी इसे सकारात्मक चीजों की श्रेणी में बिल्कुल नहीं रखा जा सकता। तुम्हें इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए। भले ही कोई विचारधारा मानवजाति के बीच अपेक्षाकृत उन्नत और प्रगतिशील हो, वह लोगों के अधिकारों और हितों के साथ-साथ उनके अस्तित्व की रक्षा करती हो और उसका किसी भी तरह से सत्य से टकराव न हो, फिर भी इसे सकारात्मक चीजों की श्रेणी में बिल्कुल नहीं रखा जा सकता। क्यों नहीं रखा जा सकता? क्योंकि केवल वही चीजें जो परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत और परमेश्वर की संप्रभुता के दायरे में हैं, सकारात्मक चीजें हैं। तो इस दायरे की चीजों को सकारात्मक चीजों की श्रेणी में क्यों रखा गया है? क्योंकि उनमें सत्य शामिल है। व्यापक दृष्टिकोण से, इसे परमेश्वर के स्तर से और परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से देखने पर, उनमें परमेश्वर की सामर्थ्य और अधिकार; परमेश्वर का स्वभाव; परमेश्वर की सृष्टि, विधान और इन सभी चीजों पर उसकी संप्रभुता के पीछे के सिद्धांत और मूल इरादे; वह उद्देश्य जिसे वह हासिल करना चाहता है, और जिन सकारात्मक चीजों को वह बनाए रखना चाहता है उनसे होने वाले सभी प्रभाव शामिल हैं। चूँकि परमेश्वर के स्तर से, इनमें परमेश्वर का अधिकार, सामर्थ्य और विचार शामिल हैं, साथ ही परमेश्वर द्वारा यह सब करने में शामिल निर्धारित नियम और कानून और इसका मानवजाति पर पड़ने वाला प्रभाव भी शामिल है, इसलिए इस दायरे में आने वाली चीजें निश्चित रूप से सकारात्मक चीजें हैं। मानवीय परिप्रेक्ष्य से, परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत और परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हर एक चीज लोगों के लिए फायदेमंद है; यह सब मानवजाति की व्यवस्थित उत्तरजीविता और प्रजनन को बनाए रखने और कायम रखने के लिए मौजूद है। एक दूसरी, और अधिक विशिष्ट, बात भी है, जो परमेश्वर के प्रबंधन से संबंधित है : ये चीजें लोगों को सत्य समझने और परमेश्वर को बेहतर ढंग से जानने में, आखिरकार उद्धार पाने के मार्ग पर चलने में, और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने वाले लोग बनने में समर्थ बनाने के लिए मौजूद हैं—यही वह नतीजा है जिसे हासिल किया जाना है। इसलिए, चाहे परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से देखा जाए या मानवीय परिप्रेक्ष्य से, परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत और परमेश्वर की संप्रभुता के दायरे में आने वाले लोग, घटनाएँ और चीजें सभी सकारात्मक चीजें हैं। इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता। जरा सोचो—क्या मानव सभ्यता और संस्कृति उन चीजों के बराबर हो सकती हैं जो परमेश्वर के वचनों और मनुष्य के लिए परमेश्वर की अपेक्षाओं के स्तर की हैं? वे निश्चित रूप से ऐसी चीजों के बराबर नहीं हो सकतीं या उन तक नहीं पहुँच सकतीं। मानवीय शिक्षा या संस्कृति की विषय-वस्तु में परमेश्वर का सार, परमेश्वर का स्वभाव या परमेश्वर द्वारा मानवजाति के लिए निर्धारित नियम और कानून शामिल नहीं हैं, सभी चीजों को बनाने में परमेश्वर का मूल इरादा शामिल होना तो दूर की बात है। इसके अलावा, मानवीय परिप्रेक्ष्य से, इस तरह की शिक्षा और संस्कृति मानवजाति को सृष्टिकर्ता, परमेश्वर को जानने में मदद नहीं कर सकतीं, न ही वे मानवजाति को बेहतर ढंग से जीने या सामान्य और व्यवस्थित तरीके से प्रजनन करने और जीवित रहने में मदद कर सकती हैं। इसके विपरीत, इस तरह की संस्कृति और सभ्यता के शैक्षिक परिवेश में मानवजाति पतन और विनाश की ओर बढ़ेगी। एक और अधिक महत्वपूर्ण पहलू है : इस तथाकथित "सांस्कृतिक शिक्षा" और "सामाजिक सभ्यता" के अधीन, मानवजाति सत्य, अपने जीवित रहने का महत्व या जीवित बचे रहने का तरीका नहीं समझ सकती। इसके माध्यम से लोग जीवन के प्रति सही नजरिया भी हासिल नहीं कर सकते और उद्धार पाने के मार्ग पर नहीं चल सकते, न ही वे परमेश्वर की आराधना करने या परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में समर्थ हो सकते हैं। इसके उलट, ऐसी सांस्कृतिक शिक्षा और सभ्यता वाले सामाजिक परिवेश में, मानवजाति उत्तरोत्तर अधिक भ्रष्ट और दुष्ट बनती जाती है, परमेश्वर से और दूर होती जाती है और बहुत अधिक बुराई करने लगती है। आखिरकार, भले ही परमेश्वर मानवजाति को नष्ट न करे, फिर भी मानवजाति खुद ही अपना विनाश कर लेगी। अगर मानवजाति खुद को शासित करने लगे, तो वह विनाश की ओर बढ़ेगी; यह होना ही है। मानवजाति के पास इतनी उच्च स्तर की संस्कृति है, इतना सारा ज्ञान है, इतनी महान सभ्यता है, वह विज्ञान पर विश्वास करती है और उस पर निर्भर रहती है—तो फिर भी वह खुद ही अपना विनाश क्यों करेगी? मानवजाति ज्ञान के पीछे भागती है और विज्ञान का इतना अधिक सम्मान करती है, फिर भी न केवल उसने सत्य नहीं समझा है और वह परमेश्वर में विश्वास करने, परमेश्वर का अनुसरण करने और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से बचने के रास्ते पर नहीं चली है, बल्कि वह खुद ही अपनी बरबादी भी ला सकती है। यहाँ क्या हो रहा है? मानवजाति के धरती का प्रबंधन करने के कारण अब इसका क्या हाल हो गया है? पूरी धरती का पानी, मिट्टी और हवा प्रदूषित हो गई है, पारिस्थितिक पर्यावरण बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया है और पूरी मानवजाति का जीवन धीरे-धीरे एक निराशाजनक स्थिति में आ गया है। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे हर कोई देख सकता है, इसलिए विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है, है ना? (हाँ।) तो चाहे पूर्वी संस्कृति हो या पश्चिमी संस्कृति, चाहे मानवजाति की सभ्यता कैसी भी हो, भले ही वह किसी भी तरह से सत्य से न टकराती हो, फिर भी उसे सकारात्मक चीज की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। “मानव संस्कृति और सभ्यता" के विषय में शामिल किए गए दृष्टिकोण, विचार, सिद्धांत, धर्म-सिद्धांत, तर्क और व्यवहार; इस विषय के अंतर्गत निर्मित कोई भी उत्पाद, कृतियाँ या सुधार आदि सकारात्मक चीजें नहीं हैं। कुछ लोग कहते हैं, "चूँकि ये सकारात्मक चीजें नहीं हैं, तो क्या इसका मतलब है कि हमें इनकी आलोचना करनी होगी और इन्हें नकारात्मक चीजों की श्रेणी में रखना होगा?" मैंने इसे इतने शाब्दिक तरीके से नहीं कहा। हो सकता है इन चीजों में सकारात्मक या नकारात्मक चीजें शामिल नहीं हों, लेकिन किसी भी मामले में, वे निश्चित रूप से सकारात्मक चीजें नहीं हैं। यानी, भले ही ये चीजें सत्य से न टकराती हों और परमेश्वर की सृष्टि, विधान और संप्रभुता के सिद्धांत का उल्लंघन न करती हों—अगर वे नकारात्मक चीजें नहीं हैं—फिर भी वे बिल्कुल भी सकारात्मक चीजें नहीं हैं। संक्षेप में, मैं तुम्हें बता दूँ : भले ही कोई चीज सत्य से न टकराए, जब तक वह परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन नहीं है, तब तक वह सकारात्मक चीज नहीं है। यह इस बात का भेद पहचानने का सिद्धांत है कि कोई चीज सकारात्मक है या नहीं; तुम्हें इस सिद्धांत के आधार पर चीजों में खुद भेद करना चाहिए। यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है? वह यह है कि तुम्हारे दिल में यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि जब तुम साफ-साफ नहीं देख पाते कि कोई चीज सकारात्मक है या नकारात्मक, तो तुम पहले उसे किनारे कर सकते हो और उसे अनदेखा कर सकते हो। जब तुम्हारा आध्यात्मिक कद बढ़ जाएगा और सत्य तुम्हारे लिए स्पष्ट हो जाएगा, तब तुम स्वाभाविक रूप से उसका भेद पहचान पाओगे। लेकिन अभी के लिए, तुम्हें स्पष्ट रूप से यह पहचानना होगा कि कौन-सी चीजें सकारात्मक चीजें हैं जो परमेश्वर से आती हैं; तुम्हें उन्हें सही तरीके से स्वीकार करना होगा और उनके साथ सही तरीके से व्यवहार करना होगा। यह तुम्हारे जीवन की प्रगति के लिए फायदेमंद है। एक और महत्वपूर्ण बात है : अगर कोई चीज सकारात्मक चीजों की परिभाषा के दायरे में आती है, तो तुम्हें उसे बिल्कुल भी नकारात्मक चीज नहीं मानना चाहिए। यह सिद्धांत की बात है और तुम्हें इसके बारे में स्पष्ट होना चाहिए।

अब जब हमने मानव सभ्यता और संस्कृति पर चर्चा पूरी कर ली है, तो आगे हम परमेश्वर द्वारा सृजित इस मानवजाति की उत्तरजीविता और सभी चीजों के लिए परमेश्वर द्वारा बनाए गए जीवन जीने के नियमों और कानूनों के बीच संबंध के बारे में बात करेंगे। एक व्यापक परिप्रेक्ष्य से, परमेश्वर द्वारा बनाई गई दुनिया में पहाड़, नदियाँ, झीलें, जंगल, महासागर, धरती और रेगिस्तान हैं; साथ ही सूरज, चाँद, तारे, पृथ्वी पर मौजूद स्थान और वह ब्रह्मांड भी है जिसे लोग देख नहीं सकते। और एक सूक्ष्म परिप्रेक्ष्य से क्या है? छोटे-छोटे कण, हवा में मौजूद कण और अलग-अलग सूक्ष्मजीव हैं। चाहे व्यापक परिप्रेक्ष्य से देखा जाए या सूक्ष्म परिप्रेक्ष्य से, यह सब परमेश्वर की रचना है—परमेश्वर के हाथों और परमेश्वर के विचारों से सृजित रचना। परमेश्वर के सृजन के परिप्रेक्ष्य से, पृथ्वी और उस पर रहने वाली सभी सजीव चीजें पृथ्वी पर मानवजाति की उत्तरजीविता को बनाए रखने के उद्देश्य से मौजूद हैं और परमेश्वर पृथ्वी पर मौजूद लोगों में से उन सृजित इंसानों को प्राप्त करना चाहता है जिनको पाने की उसकी इच्छा है। इसलिए, सभी चीजों के लिए परमेश्वर द्वारा बनाए गए उत्तरजीविता के नियम और कानून मानव जीवन के लिए सबसे बुनियादी स्थितियाँ हैं। इसलिए, यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वे सकारात्मक चीजें हैं, है ना? (हाँ।) मानव जीवन की उत्तरजीविता के लिए सबसे बुनियादी स्थितियाँ क्या हैं? पानी, हवा, सूरज की रोशनी, भोजन—क्या ये चीजें परमेश्वर द्वारा बनाई गई हैं? (हाँ।) क्या वे सकारात्मक चीजें हैं? (हाँ।) तो फिर इन चीजों के अस्तित्व को सकारात्मक चीज क्यों कहा जाता है? इसका एक कारण है : इन चीजों का अस्तित्व सभी चीजों के लिए उत्तरजीविता के नियमों और कानूनों के अस्तित्व पर निर्भर करता है। सभी चीजों में उत्तरजीविता के कौन-से नियम और कानून हैं? चार ऋतुएँ; दिन और रात; हवा, पाला, बर्फ और बारिश—ये सभी नियम हैं। और क्या? तुम लोग भी कुछ सोचो। (सौर ऋतु-चक्र भी हैं।) सौर ऋतु-चक्र चार ऋतुओं में शामिल हैं। और क्या? चाँद का बढ़ना और घटना, ज्वार का उठना और गिरना। यह भी है, "बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है"—यह उत्तरजीविता का एक नियम और कानून है; यह कोई नकारात्मक चीज नहीं है। लोग "बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है" वाक्यांश का इस्तेमाल मानव संसार की गलाकाट प्रकृति का वर्णन करने के लिए करते हैं; यह एक सकारात्मक चीज की सामान्य परिघटना को लेकर उसे नकारात्मक चीज कहना है। सजीव चीजों की गतिविधि के भी कई पैटर्न हैं। जरा सोचो कि उसमें क्या-क्या शामिल है। (क्या “ताकतवर कमजोर का शिकार करता है” को उत्तरजीविता का नियम माना जा सकता है?) नहीं, यह लोगों द्वारा इसे कहने का एक निंदात्मक तरीका है; यह “योग्यतम की उत्तरजीविता” होना चाहिए। (मुझे याद है परमेश्वर ने एक बार संगति की थी कि सभी चीजें एक-दूसरे को मजबूत करती हैं, एक-दूसरे का प्रतिरोध करती हैं और एक साथ मौजूद रहती हैं। क्या यह गिना जाएगा?) हाँ, यह गिना जाएगा। वे सभी एक-दूसरे को मजबूत करती हैं, एक-दूसरे का प्रतिरोध करती हैं और एक साथ मौजूद रहती हैं—यह एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है। एक और उदाहरण है, “टिड्डा सिकाडा का शिकार करता है, पर इस बात से बेखबर रहकर कि ओरियल पक्षी उसके पीछे है”; यह कुछ हद तक चीजों के एक-दूसरे को मजबूत करने और प्रतिरोध करने से संबंधित है। (क्या जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु भी इसमें शामिल है?) हाँ, यह है। “कौए अपनी माँओं को खाना दे कर उनका कर्ज चुकाते हैं, और मेमने अपनी माँओं से दूध पाने के लिए घुटने टेकते हैं,” जो एक स्तनपायी और एक पक्षी के बारे में है—यह पशु जगत की एक परिघटना है, यह प्रकृति का एक नियम है। वास्तव में सभी चीजों के लिए, उत्तरजीविता के कई नियम और कानून हैं : चार ऋतुओं का बदलना; हवा, पाला, बर्फ और बारिश का आना; दिन और रात का चक्र; चंद्रमा का बढ़ना और घटना; ज्वार का उठना और गिरना; सभी चीजों का एक दूसरे को मजबूत करना, प्रतिरोध करना और एक साथ मौजूद रहना; साथ ही मनुष्यों और अन्य सभी जीवों का जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु, और विभिन्न जीवों की गतिविधि के पैटर्न। कुछ जीव दिन में सोते हैं और रात में सक्रिय रहते हैं, जबकि अन्य दिन में सक्रिय रहते हैं और रात में सोते हैं, जैसे मनुष्य। कुछ जीव समूहों में रहते हैं, जबकि अन्य अकेले रहते हैं; उदाहरण के लिए, चीलें आमतौर पर अकेले उड़ती हैं, जबकि जंगली हंस झुंड में उड़ते हैं और वे सामाजिक प्राणी हैं। सजीव जगत में यह प्रवृत्ति भी है कि कौए अपनी माँओं को खाना दे कर उनका कर्ज चुकाते हैं, और मेमने अपनी माँओं से दूध पाने के लिए घुटने टेकते हैं। ये सभी चीजें विभिन्न प्रकार की परिघटनाएँ और अभिव्यक्तियाँ हैं जिन्हें वास्तविक जीवन में देखा और महसूस किया जा सकता है। इन सभी स्थूल और सूक्ष्म परिघटनाओं का घटना परमेश्वर द्वारा निर्धारित नियमों और कानूनों का पालन करता है। इन सभी नियमों और कानूनों की शुरुआत, मौजूदगी और निरंतरता एक ही उद्देश्य को पूरा करती है : मानवजाति की उत्तरजीविता के स्थान, इस पृथ्वी के सबसे बुनियादी जीवन परिवेश को बनाए रखना। इस सबसे बुनियादी जीवन परिवेश में, मानवजाति के पास पृथ्वी उस स्थान के रूप में है जिस पर वह उत्तरजीविता के लिए निर्भर है, जो उसे प्रजनन करना और जीवन जीना जारी रखने में सक्षम बनाती है। यह मानवजाति के लिए जरूरी पानी, हवा, सूरज की रोशनी और भोजन की भी लगातार आपूर्ति करती रहती है। इसी लगातार आपूर्ति की वजह से ही परमेश्वर द्वारा सृजित प्राणियों, मनुष्यों का भौतिक जीवन अस्तित्व में रह सकता है, वे बच्चे पैदा कर सकते हैं और लगातार बने रह सकते हैं; इसकी वजह से ही मनुष्यों को परमेश्वर के सामने आने और जब वह अपना प्रबंधन कार्य करता है, तब उसके उद्धार को स्वीकारने का अवसर मिलता है और वे ऐसे सृजित प्राणी बनते हैं जिन्हें परमेश्वर स्वीकार करता है। इसलिए, परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों में, चाहे किसी भी सजीव प्राणी का कोई भी रूप हो, चाहे उसकी उत्तरजीविता के नियम और कानून कुछ हों और चाहे उसका सभी दूसरी चीजों के साथ कैसा भी संबंध हो, संक्षेप में, वह परमेश्वर द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों के बीच जीवित रहता है। यानी, हर सजीव प्राणी, परमेश्वर द्वारा सृजित होने के आधार पर, उसके द्वारा निर्धारित नियमों और कानूनों का पालन करता है और उनके बीच अपनी अनिवार्य भूमिका निभाता है। यह वह खाद्य श्रृंखला है जो परमेश्वर द्वारा मानवजाति के लिए निर्धारित नियमों और कानूनों के माध्यम से बनती है और यह खाद्य श्रृंखला मानवजाति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। खाद्य श्रृंखला के होने की पूर्व-शर्त यह है कि सभी चीजों को परमेश्वर द्वारा निर्धारित नियमों और कानूनों का पालन करना चाहिए। अगर वे इन नियमों और कानूनों को अनदेखा करती हैं और मनमानी करती हैं, तो इसका परिणाम यह होगा कि परमेश्वर द्वारा सृजित सभी चीजों के बीच मौजूद खाद्य श्रृंखला टूट जाएगी। एक बार जब यह खाद्य श्रृंखला टूट जाती है, तो पानी, हवा, सूरज की रोशनी और भोजन, जिस पर इंसान उत्तरजीविता के लिए निर्भर है, धीरे-धीरे या एक-एक करके अलग-अलग स्तर तक प्रभावित होंगे। इसलिए, परमेश्वर द्वारा सभी चीजों के लिए निर्धारित सभी नियमों और कानूनों का और परमेश्वर द्वारा सृजित हर सजीव प्राणी का खाद्य श्रृंखला पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। अगर सभी चीजों की उत्तरजीविता के किसी भी नियम में कोई समस्या आती है, तो इसका खाद्य श्रृंखला के अस्तित्व और निरंतरता पर श्रृंखलाबद्ध प्रभाव पड़ेगा; इसलिए इंसान के लिए आवश्यक बुनियादी पानी, हवा, सूरज की रोशनी और भोजन में कमी आएगी। इस तरह, खाद्य श्रृंखला इस बात का एक मुख्य स्रोत और महत्वपूर्ण सूचक है कि इंसान जीवित रह सकता है या नहीं। यह खाद्य श्रृंखला वास्तव में क्या है? खाद्य श्रृंखला में परमेश्वर की रचना शामिल है। परमेश्वर द्वारा सृजित सभी चीजों में, कुछ मूर्त चीजें हैं और कुछ ऐसी चीजें भी हैं जो खुली आँखों से दिखाई नहीं देती हैं। इन मूर्त चीजों में पहाड़, नदियाँ, जंगल, मिट्टी, रेगिस्तान, उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव, सूरज, तारे और चंद्रमा, साथ ही अलग-अलग जानवर और पौधे वगैरह शामिल हैं। अमूर्त यानी न दिखने वाली चीजों में सूक्ष्मजीव, हवा, यहाँ तक कि सूरज की रोशनी में मौजूद पराबैंगनी किरणें, साथ ही इंसानों द्वारा आविष्कार की गई चीजें—तथाकथित परमाणु और ऊर्जा, हवा और पानी में मौजूद न दिखने वाले कुछ पोषक तत्व वगैरह शामिल हैं। ये सभी स्थूल, मूर्त चीजें, साथ ही सूक्ष्मजीव, धूप और हवा जैसी चीजों में मौजूद पदार्थ जिन्हें लोग नहीं देख सकते—ये सभी चीजें मिलकर इंसान की उत्तरजीविता के लिए अनिवार्य जीवन परिवेश बनाती हैं। अगर इस जीवन परिवेश में कोई समस्या आती है, तो इंसान की उत्तरजीविता और उसके भविष्य को चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा और खतरा पैदा हो जाएगा। इसलिए, सभी चीजों की उत्तरजीविता के नियम और कानून खाद्य श्रृंखला को बनाए रखने के लिए जरूरी एक बुनियादी शर्त है; वहीं खाद्य श्रृंखला का होना इंसान की उत्तरजीविता के लिए एक बुनियादी शर्त है। इस तरह, चाहे वह नियम और कानून हों, खाद्य श्रृंखला हो या पानी, हवा, सूरज की रोशनी और भोजन हो, अगर इनमें से किसी में भी कोई समस्या आती है, तो इसका असर निश्चित रूप से इंसान की उत्तरजीविता पर पड़ेगा—यानी, इसका असर इस सृजित प्राणी, इंसान के भौतिक जीवन के अस्तित्व पर पड़ेगा। इसलिए, परमेश्वर के लिए, सभी चीजों की उत्तरजीविता के नियमों और कानूनों, खाद्य श्रृंखला, पानी, हवा, सूरज की रोशनी और भोजन में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए; इन सभी को बनाए रखना, सहेजा जाना और एक व्यवस्थित तरीके से चलते रहना जरूरी है—केवल इसी तरीके से इंसान जीवित रह पाएगा और उसका भौतिक जीवन कायम रहेगा।

मानवजाति की सतत उत्तरजीविता में क्या समस्या शामिल है? सभी चीजों के लिए उत्तरजीविता के नियमों और कानूनों में व्यापक पहलू—जैसे दिन और रात और चार ऋतुएँ—अनिवार्य हैं। इनमें मूल रूप से ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे लोग अपनी कल्पनाओं के अनुसार बुरा समझते हों। जब पेड़ों, फूलों और पौधों जैसी विभिन्न सजीव चीजों की बात आती है, तब लोग उनके बारे में कोई धारणा नहीं बनाते क्योंकि उनका लोगों पर किसी भी तरह का घातक प्रभाव नहीं पड़ता। हालाँकि, खाद्य श्रृंखला में कुछ जहरीली और हानिकारक चीजें होती हैं; जैसे मच्छर, जिनके इंसान के शरीर पर कुछ नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं। ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें लोग अपनी धारणाओं के अनुसार नापसंद करते हैं—खासकर कुछ अत्यंत विषैले जीव; जैसे कुछ साँप, बिच्छू और कनखजूरे। तो परमेश्वर ने इन विषैली चीजों को क्यों बनाया? उन्हें बनाने के पीछे उसका क्या उद्देश्य था? वे खाद्य श्रृंखला में क्या भूमिका निभाती हैं? यह बात अहम है। भले ही उनके स्वरूप या उनकी प्रकृति को देखकर या दूसरे जीवों में उनके जीवन के कुछ लक्षणों को देखकर, ऐसा लगता है कि वे कोई सकारात्मक भूमिका नहीं निभातीं, फिर भी उन्हें सकारात्मक चीजें क्यों कहा जाता है? इसे खाद्य श्रृंखला के संदर्भ में समझाया जाना चाहिए। हम जीव विज्ञान नहीं पढ़ रहे हैं—हम वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य से चीजों पर चर्चा नहीं करेंगे, बल्कि इसे ऐसे जीवों के सृजन में परमेश्वर के इरादे के परिप्रेक्ष्य से देखेंगे। एक बात तो यह है कि परमेश्वर ने उनकी उत्तरजीविता सुनिश्चित करने के लिए उन्हें एक अनोखा हुनर दिया, जिससे वे इस तरह से अपना जीवन सुरक्षित रख पाएँ। दूसरी बात, वे खाद्य श्रृंखला में भी एक खास भूमिका निभाती हैं—उनकी उत्तरजीविता का तरीका और जो विष वे अपने शरीर से निकालती हैं, वह दूसरे जीवों के लिए आवश्यक पोषक तत्व या भोजन का स्रोत बन सकता है। इसके अलावा, वे जीवाणु के संचरण, प्रजनन, उत्पत्ति और विकास के लिए और पूरे जीवमंडल में वंशाणुओं के संचरण के लिए आवश्यक स्थितियाँ भी प्रदान करती हैं और इस संबंध में एक खास भूमिका निभाती हैं। केवल इन जीवों के अस्तित्व से ही जीवमंडल आनुवंशिक संतुलन और जीवाणु संबंधी विविधता के मामले में संतुलन बनाए रख सकता है, जिससे विभिन्न प्रकार के जीवाणु संतुलन में रहते हैं। उदाहरण के लिए, मच्छर और मक्खियों को ही ले लो। वे कुछ परजीवियों को खाते हैं और कुछ जीवाणु भी संचरित करते हैं। हम अधिक गहराई में नहीं जाएँगे; यह बस एक आसान-सी अवधारणा है। संक्षेप में, कुछ खास जीव मानवजाति के लिए कुछ खास उद्देश्य पूरे करते हैं और खाद्य श्रृंखला में भी एक अनिवार्य भूमिका निभाते हैं। यह अनिवार्य भूमिका खाद्य श्रृंखला के अस्तित्व को बनाए रखती है। सभी चीजें केवल तभी जीवित बची रह सकती हैं और व्यवस्थित ढंग से चल सकती हैं जब यह खाद्य श्रृंखला मौजूद हो और नष्ट न हो। क्योंकि सभी चीजों का एक-दूसरे से रिश्ता होता है, जिसमें वे एक-दूसरे को मजबूत करती हैं, एक-दूसरे का प्रतिरोध करती हैं और साथ-साथ मौजूद रहती हैं; इसलिए खाद्य श्रृंखला टूटनी नहीं चाहिए। खाद्य श्रृंखला में अलग-अलग जीवित चीजों के अस्तित्व का संतुलन बनाए रखा जाना चाहिए और उनके रहने की जगह और अस्तित्व को बनाए रखना चाहिए। इसलिए, परमेश्वर द्वारा सभी चीजों के लिए बनाए गए उत्तरजीविता के नियम और कानून बहुत महत्वपूर्ण हैं। केवल परमेश्वर द्वारा सभी चीजों के लिए बनाए गए उत्तरजीविता के नियमों और कानूनों का होना ही खाद्य श्रृंखला की निरंतरता को पक्का कर सकता है और यह गारंटी दे सकता है कि यह टूटेगी नहीं। खाद्य श्रृंखला का अस्तित्व, निरंतरता और सुरक्षा इस बात की मूल गारंटी है कि लोगों को पानी, हवा, धूप और भोजन मिल पाएगा। जब लोगों के पास यह मूल गारंटी होगी, केवल तभी उनका भौतिक जीवन बना रह पाएगा; तभी वे इस धरती पर, ऐसे जीवन परिवेश में प्रजनन कर पाएँगे और जीवित रह पाएँगे। केवल इसी तरह से मानवजाति के पास भविष्य हो सकता है और उम्मीद हो सकती है। चार ऋतुओं, दिन-रात और हवा, पाला, बर्फ और बारिश द्वारा पालन किए जाने वाले नियम और कानून—वे चीजें जो परमेश्वर द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों के तहत मौजूद हैं—साथ ही जिस स्वरूप में वे दिखाई देती हैं, हर तरह से परमेश्वर द्वारा बनाई गई सकारात्मक चीजें हैं। जहाँ तक विभिन्न जीवों की बात है—चाहे उनके स्वरूप कुछ भी हों, उनकी उत्तरजीविता के तरीके या उनके शिकार करने या भोजन प्राप्त करने के तरीके—संक्षेप में, जब तक वे परमेश्वर द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों के तहत जीते हैं और जब तक वे परमेश्वर द्वारा बनाई गई खाद्य श्रृंखला का एक आवश्यक, अनिवार्य हिस्सा हैं, तब तक वे परमेश्वर से आने वाली सकारात्मक चीजें हैं। लोगों को अपने नजरियों और प्राथमिकताओं के आधार पर उनके बारे में राय नहीं बनानी चाहिए। कोई कह सकता है, “तो क्या मच्छर और मक्खियाँ भी सकारात्मक चीजें हैं? विषैले साँपों, कनखजूरों और बिच्छुओं के बारे में क्या कहोगे? और खासकर मेंढक, जो इतने बदसूरत होते हैं—क्या वे भी सकारात्मक चीजें हैं?” इसे कहने का सही तरीका क्या है? परमेश्वर की बनाई इन प्रजातियों द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाएँ और वे नियम और कानून जिनका वे पालन करती हैं, वे सभी सकारात्मक चीजें हैं। और उनके भौतिक स्वरूप और रूप-रंग के बारे में क्या कहोगे—क्या वे सकारात्मक चीजें हैं? अगर तुम्हें वाकई कहना ही पड़े तो तुम उन्हें सकारात्मक चीजें कह सकते हो, लेकिन वे नकारात्मक चीजें नहीं हैं। कम से कम, उनके द्वारा पालन किए जाने वाले नियमों, इन जीवों की भूमिकाओं और खाद्य शृंखला में उनकी आवश्यकता के संदर्भ में, वे सकारात्मक चीजों के रूप में मौजूद हैं। क्या यह कहने का सही तरीका नहीं है? (हाँ, है।) सटीक तौर पर कहें तो क्योंकि ऐसे जीव परमेश्वर द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों का पालन करते हैं और परमेश्वर द्वारा उनके लिए तय की गई जिम्मेदारियों और मिशन को पूरा करते हैं—क्योंकि वे अपने मिशन को पूरा करते हैं, चाहे वह जीवाणु फैलाना हो या अलग-अलग सूक्ष्मजीवों के प्रजनन संतुलन को कायम रखना हो—उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाओं और परमेश्वर द्वारा उनके सृजन के महत्व और उद्देश्य के संदर्भ में देखें, तो उनका अस्तित्व मात्र ही एक सकारात्मक चीज है। अगर हम कहें कि मच्छर अपने आप में एक सकारात्मक चीज है, तो इसे समझना या स्वीकारना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। हालाँकि, परमेश्वर के इसे बनाने के इरादों, उन नियमों और कानूनों जिनका यह पालन करता है और खाद्य श्रृंखला में इसकी भूमिका को देखते हुए यह अपरिहार्य है—और इसलिए यह एक सकारात्मक चीज है। कुछ लोग कहते हैं, “चूँकि मच्छर सकारात्मक चीजें हैं, तो क्या इसका मतलब है कि हमें उन्हें स्वीकारना होगा और हमें उन्हें मारना नहीं चाहिए?” अगर कोई मच्छर तुम्हें काटने वाला है, तो तुम्हें उसे मार देना चाहिए। अगर तुम खाना खा रहे हो और कोई मक्खी तुम्हारे आस-पास भिनभिना रही है, तो तुम उसे भगा सकते हो या मार सकते हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि एक या दो मच्छरों या मक्खियों के कम होने से खाद्य श्रृंखला में कोई समस्या नहीं होगी और न ही इससे इन जीवों के अपने मिशन को पूरा करने पर कोई प्रभाव पड़ेगा। अगर ऐसा कोई जीव अपना मिशन पूरा करना चाहता है, तो उसे ऐसा करने के लिए सही जगह ढूँढ़नी चाहिए। इंसानों के जीवन परिवेशों में उसकी जरूरत नहीं है, इसलिए बस उसे भगा दो और बात खत्म करो—उसके साथ शांति से सह-अस्तित्व में रहो। अगर वह तुम्हारे साथ शांति से सह-अस्तित्व में नहीं रहता और तुम्हें परेशान करता रहता है, तो उसे भगा देना या मार डालना ठीक है। इसे सूझ-बूझ भरा प्रबंधन और सही व्यवहार कहते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “मच्छर मुझे हमेशा परेशान करते हैं और बहुत काटते हैं। क्या मैं उन्हें कोस सकता हूँ?” इसकी जरूरत नहीं है। तुम बस उन्हें मार सकते हो। उन्हें मारना तुम्हारे अधिकार क्षेत्र में है; यह पूरी तरह से इस सिद्धांत के अनुरूप है कि इंसान—सभी चीजों का प्रबंधक—सभी चीजों के साथ कैसे व्यवहार करे। उदाहरण के लिए, अगर कोई विषैला साँप तुम्हारे घर में घुस आता है और तुम देखते हो कि यह उसकी जगह नहीं है, तो बस उसे जंगल में भगा दो। अगर वह तुम्हें काट ले और विष फैल जाए, तो तुम्हें तुरंत इलाज का तरीका ढूँढ़ना होगा। तुम्हें बदला लेने और मार डालने के लिए उसे ढूँढ़ने की जरूरत नहीं है। अगर वह तुम्हें फिर से नुकसान पहुँचाए, तो क्या यह और भी अधिक मुसीबत की बात नहीं होगी? इसलिए, उसके साथ जैसे को तैसा मत करो; बस उससे बचने का तरीका सीखो। इस मामले से सबक सीखने में समर्थ होना ही एक बुद्धिमान व्यक्ति का काम होगा। हमने अभी जिन तीन सिद्धांतों के बारे में बात की, वे क्या थे? (पहला, पक्का करना कि यह एक सकारात्मक चीज है। दूसरा, अगर वह तुम्हारे पास आता है और तुम उससे परेशान नहीं होना चाहते, तो बस उससे दूर ही रहो—उसे पास मत आने दो और उसे तुम्हें परेशान मत करने दो। तीसरा, उसके प्रति सही दृष्टिकोण रखो। उससे घृणा या नफरत मत करो। इसके बजाय, उसे स्वीकारो और मानो और फिर उसे समझदारी से प्रबंधित करो।) उसे समझदारी से प्रबंधित करो और उसके साथ सही व्यवहार करो। परमेश्वर के बारे में शिकायत मत करो या यह राय मत बनाओ कि परमेश्वर ने उसे बनाकर गलती की या संभवतः उसने कोई गलती की होगी, सिर्फ इसलिए कि उसने तुम्हें परेशान किया है या कभी-कभी तुम्हारे लिए कुछ मुसीबत खड़ी की है या तुम्हें काट लिया है और विष फैल गया है—इस तरह से देखना गलत है। ऐसा हो सकता है कि तुमने उसे अच्छे से संभाला न हो या हो सकता है कि वह गलती से तुम्हारे घर में घुस गया हो और तुम्हें परेशान किया हो। लेकिन अगर तुम उससे नरमी से पेश आते हो, यह कहते हुए, "तुम गलत रास्ते पर आ गए हो, यह तुम्हारा घर नहीं है। अगर तुम्हारा मेरे प्रति कोई बुरा इरादा नहीं है, तो मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा। वहाँ चले जाओ जहाँ तुम्हें होना चाहिए" और वह देखता है कि तुम उसे नुकसान नहीं पहुँचाओगे, तो वह मुड़कर अपने आप चला जाएगा। तुम उससे कहते हो, "अलविदा। जब तक हम फिर न मिलें! इस बार हमारी मुलाकात होनी ही थी। अगर हमारा फिर से मिलना हुआ, तो भी मैं तुम्हें फिर से जाने दूँगा।" यह सुनकर, वह सोचेगा, "इंसान बहुत अच्छे होते हैं। वे सच में जानते हैं कि हमें कैसे संभालना है। उनमें कोई द्वेष नहीं है।" जब तक तुम उसे नुकसान नहीं पहुँचाते, वह भी तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाएगा। कुछ जानवर लोगों को नुकसान पहुँचाते हैं क्योंकि लोग हमेशा उन्हें नुकसान पहुँचाते हैं; वे लोगों से दुश्मनी पालने के बाद ही उन्हें नुकसान पहुँचाते हैं; ऐसा वे लोगों की बेवकूफी और क्रूरता की वजह से करते हैं। ऐसे जीवों के मन में, स्वाभाविक रूप से इंसानों के प्रति कोई दुश्मनी या नफरत नहीं होती। देखो, जब नूह ने नाव बनाई, तो किसी भी जानवर ने किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया, नूह जानवरों के साथ संवाद भी कर सकता था और उन्हें प्रशिक्षित भी कर सकता था। उस समय, इंसान और जानवर एक-दूसरे के दोस्त थे। बाद में, इंसान अधिक से अधिक भ्रष्ट होते गए और बेहद क्रूर बन गए, हमेशा जानवरों के मांस के लिए उनका शिकार करना चाहते थे; इसलिए इंसानों और विभिन्न जानवरों के बीच दुश्मनी बढ़ गई। मांसाहारी जानवरों को जैसे ही इंसान की गंध आती है, उन्हें लगता है कि स्वादिष्ट खाना परोसा गया है और वे पेट भरकर खाना चाहते हैं। ऐसा किस वजह से हुआ? यह पूरी तरह से मानवजाति की बेहद क्रूरता की वजह से हुआ। क्या तुम समझे? (हाँ।)

चाहे व्यापक परिप्रेक्ष्य से देखा जाए या सूक्ष्म परिप्रेक्ष्य से, परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजें निश्चित रूप से सकारात्मक चीजें हैं। चाहे उन्हें बनाने के पीछे परमेश्वर के मूल इरादों के संदर्भ में देखा जाए या, उनके लिए परमेश्वर द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों के संदर्भ में देखा जाए या अंततः हासिल किए गए उद्देश्य और प्रभाव के संदर्भ में देखा जाए, वे सभी मानवजाति के लिए अस्तित्व हैं; उन्हें सभी चीजों के प्रबंधकों के रूप में अपनी भूमिका में मनुष्यों के लिए डिजाइन किया और बनाया गया है। इस प्रकार, परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों के स्वरूप या रंग-रूप चाहे जैसे भी हों या लोगों पर उनका अस्थायी प्रभाव कैसा भी हो, लोगों को उनके साथ सही तरीके से व्यवहार करना चाहिए, उन्हें सही तरीके से प्रबंधित करना चाहिए और समझना चाहिए और उन्हें परमेश्वर से आया मानकर स्वीकारना चाहिए—यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, लोगों को यह यकीन होना चाहिए कि जब तक कोई चीज परमेश्वर द्वारा बनाई गई है—चाहे वह अच्छी हो या बुरी, सुंदर हो या कुरूप; भले ही उसका स्वरूप कैसा भी हो; और इसके अलावा, चाहे मानव देह पर उसका अस्थायी प्रभाव कैसा भी हो—संक्षेप में, जब तक वह परमेश्वर से आती है और परमेश्वर के हाथ से बनाई गई है, तब तक वह मानवजाति की मौलिक उत्तरजीविता में कुछ योगदान देती है। इसके आधार पर, लोगों को परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों को परमेश्वर से आया मानकर स्वीकारना चाहिए और मनमाने ढंग से या एकपक्षीय रूप से अपने नजरियों और प्राथमिकताओं के आधार पर यह चुनाव नहीं करना चाहिए उनकी निंदा करें या उन्हें स्वीकार करें। इसके बजाय, उन्हें एक सृजित प्राणी के परिप्रेक्ष्य से उन्हें समझना चाहिए, उन्हें प्रबंधित करना और उनके साथ सही तरीके से व्यवहार करना सीखना चाहिए और—इससे भी बेहतर—उनके साथ सही ढंग से घुलना-मिलना और संवाद करना सीखना चाहिए। यही वह जिम्मेदारी और दायित्व है जिसे लोगों यानी परमेश्वर द्वारा बनाई गई इस धरती के मालिकों और इस दुनिया के प्रबंधकों को पूरा करना चाहिए। यही वह भूमिका है जो लोगों को अन्य सभी जीवों के बीच निभानी चाहिए और यह एक ऐसा सिद्धांत भी है जिसका लोगों को मानवता के दृष्टिकोण से सबसे अधिक पालन करना चाहिए। अगर तुम्हें परमेश्वर द्वारा बनाई गई कुछ चीजें पसंद नहीं हैं, तो तुम उनसे दूर रह सकते हो। अगर तुम्हें वे पसंद हैं, तो तुम उनके साथ घनिष्ठता से मिलजुल सकते हो और उनके बारे में जानने और उन्हें प्रबंधित करने के लिए उनके पास जा सकते हो—या और भी बेहतर होगा उनके जीवन परिवेश की रक्षा करो, उनके साथ दयालुता से पेश आओ, उन्हें रहने के लिए पर्याप्त जगह दो, उनके उत्तरजीविता के अधिकार की रक्षा करो और उसे ठीक से बनाए रखो। वास्तव में, सभी चीजें मनुष्यों की तुलना में कमजोर हैं। भले ही परमेश्वर ने सभी चीजों को उत्तरजीविता के हुनर और सहज प्रवृतियाँ दी हैं, लेकिन मनुष्यों के अलावा कोई भी प्रजाति औजार और हथियार नहीं बना सकती; उनमें से किसी के पास भी परमेश्वर द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों को कमजोर करने की शक्ति नहीं है और न ही वे ऐसा करने की पहल करते हैं। केवल इंसानों में ही विभिन्न प्रकार के जीवों और सभी चीजों के प्रति—अपनी मानसिकता में भी और अपनी माँगों में भी—अंतहीन लालच होता है। साथ ही, केवल इंसान ही वैज्ञानिक शोध करते हैं, रसायन बनाते हैं और उत्तरजीविता के लिए या बेहतर जीवन के लिए तरह-तरह के औजार और हथियार बनाते हैं। और केवल इंसान ही शैक्षिक ज्ञान सीख सकते हैं और शोध कर सकते हैं या अलग-अलग जीवों के जीवन परिवेशों को बदल सकते हैं। लेकिन, विभिन्न जानवरों और जीवों की उत्तरजीविता, और खाद्य श्रृंखला के नियमों के संबंध में इंसानों ने जो कुछ भी किया है, वह फायदेमंद नहीं बल्कि अधिकतर विनाशकारी और गड़बड़ करने वाला रहा है। तो आखिर में, केवल इंसान ही एक-दूसरे को मारने और अपने मूल जीवन परिवेश को नष्ट करने के लिए हथियार बना सकते हैं। केवल इंसान ही उद्योग, खासकर रसायन उद्योग विकसित करते हैं, सभी तरह के हानिकारक पदार्थ बनाते हैं जो उस धरती को नुकसान पहुँचाते हैं और नष्ट करते हैं जिस पर इंसान रहते हैं—जो उनके जीवित बचे रहने के लिए एकमात्र घर है। और केवल इंसानों ने ही अपनी उत्तरजीविता के लिए जरूरी बुनियादी पानी, हवा, सूरज की रोशनी और भोजन को प्रदूषित और खराब किया है। इसका मतलब है कि इंसानों ने खुद ही अपनी उत्तरजीविता के रास्ते को बरबाद किया है; यह दूसरे जीवों की वजह से नहीं हुआ। इसलिए, सभी चीजों के मालिक होने के नाते, सृजित इंसानों को सभी जीवों सहित सभी चीजों को प्रबंधित करने की भूमिका ठीक से कैसे निभानी चाहिए, यह बात बहुत महत्वपूर्ण है। अगर इंसान वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल करके हथियार या तरह-तरह के औजार बनाते रहेंगे या रसायन बनाते रहेंगे, तो यह खुद उनके लिए या दूसरे जीवों के लिए विनाशकारी आपदा लाएगा। यानी, इंसानों ने खुद अपने हाथों से सभी चीजों की उत्तरजीविता के नियमों और कानूनों को रौंद दिया है और खुद ही खाद्य श्रृंखला को भी नष्ट कर दिया है। बेशक, इंसानों ने खुद ही उस धरती को बरबाद किया है जिस पर वे जीवित बचे रहने के लिए निर्भर हैं। यह बहुत दुखद है। इन सभी परिणामों के लिए कौन दोषी है? (लोग।) यह परमेश्वर द्वारा बनाई गई सकारात्मक चीजों को लोगों द्वारा बरबाद करने और नष्ट करने की वजह से है। आखिर में, लोग जो बोते हैं वही काटते हैं। अगर शुरू से ही लोग परमेश्वर की बनाई सभी चीजों की अलग-अलग भूमिकाओं को जान पाते, अलग-अलग जीवों का सम्मान कर पाते, उन्हें संजोते और उनकी परवाह कर पाते, सभी चीजों की उत्तरजीविता के लिए परमेश्वर द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों का पालन कर पाते और पृथ्वी के मूल पर्यावरण की रक्षा कर पाते, जिस पर वे जीवित बचे रहने के लिए निर्भर हैं, तो मानवजाति आज इस मुकाम पर नहीं पहुँचती। इसलिए, परमेश्वर की सभी रचनाओं के सकारात्मक चीजें होने के विषय में, लोगों को यह समझना चाहिए कि परमेश्वर ने सभी चीजों के लिए जो उत्तरजीविता के नियम और कानून बनाए हैं, उनका क्या महत्व है; साथ ही, लोगों को उनका पालन क्यों करना चाहिए और कैसे करना चाहिए। साथ ही, लोगों को यह भी जानना चाहिए कि इन सब को बनाने के पीछे परमेश्वर का उद्देश्य मानवजाति की भलाई है; इसलिए उन्हें इन्हें संजोना चाहिए और इनकी रक्षा करनी चाहिए। अगर तुम इन सबका महत्व नहीं समझ पाते हो, तो कम से कम इन्हें सकारात्मक चीज मानो; एक अनिवार्य, बेहद जरूरी सकारात्मक चीज मानो जिस पर तुम्हारा जीवन निर्भर करता है, और इसे संजोओ, इसकी परवाह करो और इसे प्रबंधित करो। तुम्हें इसके साथ सही तरीके से व्यवहार करना चाहिए और मालिक के तौर पर अपनी क्षमता और भूमिका में इसकी रक्षा करनी चाहिए। केवल इसी तरीके से मानवजाति के पास भविष्य और उम्मीद हो सकती है और वह खुशी-खुशी जीना जारी रख पाएगी, है ना? (हाँ।)

क्या अब परमेश्वर की बनाई सभी चीजों के सकारात्मक होने का विषय अधिक स्पष्ट हो गया है? (हाँ।) आओ, आखिरी बार परमेश्वर द्वारा बनाई गई विभिन्न चीजों और जीवों के साथ सही तरीके से पेश आने के तरीके की पुष्टि करते हैं। अब उन तीन सिद्धांतों को दोहराओ जिन पर हमने अभी-अभी चर्चा की। (पहला, जब तक कोई चीज परमेश्वर द्वारा परिभाषित सकारात्मक चीजों के दायरे में है, हमें अपने दिल में पक्का यकीन होना चाहिए कि यह परमेश्वर की ओर से आई है, यह एक सकारात्मक चीज है और परमेश्वर द्वारा इसे बनाए जाने के पीछे कोई गूढ़ अर्थ है; ताकि लोग इससे कुछ सबक सीख सकें। दूसरा, इस यकीन के आधार पर कि यह एक सकारात्मक चीज है, अगर हमें यह पसंद नहीं है या हम इसके संपर्क में नहीं आना चाहते, तो हम इसे अनदेखा कर सकते हैं। अगर यह हमारे जीवन में दखल देती है, तो हम इसे दूर भगा सकते हैं या इससे दूर रह सकते हैं; हमें इससे कुछ सबक भी सीखना चाहिए और इस पर थोड़ा ध्यान भी देना चाहिए। आखिर में, अगर यह परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है, तो हमें इससे नफरत या घृणा नहीं करनी चाहिए, बल्कि इसे सही रवैये के साथ स्वीकारना चाहिए और इसे मानना चाहिए और इसे सूझ-बूझ से प्रबंधित करना चाहिए।) इसे सूझ-बूझ से प्रबंधित करना बहुत महत्वपूर्ण है। अगर इंसान धरती पर परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों को प्रबंधित करना नहीं जानते, तो इसका उनकी उत्तरजीविता पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है। अगर खाद्य श्रृंखला के नियम और उसका अस्तित्व खत्म हो जाते हैं, तो मानवजाति की उत्तरजीविता खतरे में पड़ जाएगी। क्या वर्तमान में मानवजाति ऐसे ही जीवन परिवेश में नहीं जी रही है? (हाँ।) मानवजाति ने बड़े पैमाने पर उद्योग विकसित किया है, जिससे अपशिष्ट गैसें, गंदा पानी और विषैले पदार्थ निकलते हैं जिन्होंने नदियों, झीलों और यहाँ तक कि भूजल को भी प्रदूषित कर दिया है। अब पीने के लिए साफ पानी नहीं है; लोग बस कुछ पुनर्चक्रित पानी पी सकते हैं जिसे कृत्रिम तरीके से संसाधित किया गया है, जो हालाँकि विषैला नहीं है, लेकिन उसमें पोषक तत्व बहुत कम हैं। नदियों, झीलों और समुद्रों की मछलियाँ भी प्रदूषित हो गई हैं और वे अस्वस्थ हैं। ऐसा कोई भोजन ढूँढना आसान नहीं है जो दूषित न हो। क्या मानवजाति खुद को भारी मुश्किल में नहीं डाल रही है? क्या यह इंसान की वजह से ही नहीं हुआ है? न केवल पीने का पानी प्रदूषित है, बल्कि हवा भी खराब है; हवा में बहुत सारे हानिकारक पदार्थ हैं और अब अगर तुम साफ हवा में साँस लेना भी चाहो, तो यह बहुत मुश्किल है—कभी-कभी लोगों को वायरस से बचने के लिए मास्क भी पहनना पड़ता है। हवा की गुणवत्ता बेहद खराब है, लोग हर तरह का खाना खाने में सावधानी बरत रहे हैं और अब लोगों को सभी तरह की बीमारियाँ हो रही हैं, कुछ युवाओं को कैंसर या मधुमेह भी हो रहा है। इन सब परिणामों का कारण कौन है? (लोग।) यह सब लोगों की वजह से हुआ है। इस तरह लोगों ने उस धरती को प्रबंधित किया है जिसे परमेश्वर ने उनके लिए बनाया था, खुद को इतना प्रताड़ित किया है कि वे ठीक से खा-पी भी नहीं सकते, फिर भी बहुत खुश महसूस करते हैं। परमेश्वर को छोड़ने का यही नतीजा होता है; खुशी नाम की कोई चीज नहीं है। लोगों के लिए अब एकमात्र रास्ता यह है कि वे सृष्टिकर्ता के उद्धार को स्वीकारें, सत्य का अनुसरण करें और परमेश्वर का भय मानने के रास्ते पर चलें। केवल इसी तरह से तुम बचाए जा सकते हो, तुम्हें जीने की उम्मीद मिल सकती है और तुम नई मानवजाति का हिस्सा बन सकते हो। यह इतना आसान है; कोई दूसरा रास्ता नहीं है। पूरब के लोगों को लगता है कि पश्चिमी सभ्यता श्रेष्ठ है और पश्चिम के लोगों के पास जरूर कोई रास्ता होगा। क्या उनके पास कोई रास्ता है? (नहीं।) पूरब के लोगों को लगता है कि उन्होंने बहुत कष्ट झेला है, गहरी नफरत पाली है, बहुत अधिक कठिनाइयाँ सही हैं और उन्हें पश्चिम के लोगों द्वारा बचाया जाना चाहिए। वे हमेशा पश्चिम को स्वर्ग समझते हैं, पश्चिम में जाना स्वर्ग में जाना है, वे पश्चिम में स्वतंत्र और खुश रहेंगे। लेकिन पश्चिम के लोगों को नहीं लगता कि वे बहुत खुश हैं। वे कहते हैं, "भले ही हमारा जीवन पूरब के लोगों की तुलना में थोड़ा अधिक आरामदायक है, लेकिन हम शायद ही अधिक खुश हैं।" जब तक तुम इस धरती पर मौजूद एक इंसान हो, मानव जाति का हिस्सा हो, तब तक तुम्हें इस धरती पर कोई खुशी नहीं है, क्योंकि इस धरती पर रहते हुए तुम जो कुछ भी स्वीकारते हो, वह शैतान से आता है। चाहे वह इंसानी सोच और दृष्टिकोण हो या उत्तरजीविता के नियम, चाहे वह पूर्वी शिक्षा हो या पश्चिमी शिक्षा, ऐसी कोई एक चीज नहीं है जो तुम्हें एक सच्चे मानव के समान जीने दे; ऐसी कोई सामाजिक शिक्षा या सोच या दृष्टिकोण नहीं है जो तुम्हें एक सृजित प्राणी के तौर पर इंसानों की दुनिया में खुद को स्थापित करने दे। क्योंकि यह मानवजाति शैतान की शक्ति के अधीन रहती है और शैतान द्वारा नियंत्रित होती है, इसलिए लोगों के लिए जीने का एकमात्र तरीका परमेश्वर के उद्धार को स्वीकारना, परमेश्वर से आने वाले सभी सत्यों को स्वीकारना, परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना और उद्धार पाना है। केवल तभी मानवजाति सच में एक ऐसी दुनिया में लौट सकती है जहाँ सभी चीजों के लिए उत्तरजीविता के नियम और कानून स्वतंत्र रूप से काम कर सकें, और सच में एक संपूर्ण खाद्य श्रृंखला वाली दुनिया में रह सकती है—केवल इसी तरह से मानवजाति सच में सभी चीजों के प्रबंधक की भूमिका निभा सकती है और इस भूमिका की जिम्मेदारियों को पूरा कर सकती है। इसके अलावा, मानवजाति के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। यही मानवजाति के लिए एकमात्र रास्ता है, वह एकमात्र रास्ता जो मानवजाति के लिए उम्मीद और खुशी ला सकता है। क्या तुम समझ गए? (हाँ।) एक बार जब तुम समझ जाओगे, तो तुम्हारे पास एक रास्ता होगा। बस इसी दिशा में, इसी लक्ष्य की ओर प्रयास करते रहो और अनुसरण करते रहो। पीछे मुड़कर मत देखो, हार मत मानो और कभी रुको नहीं!

आओ, आज के लिए हमारी संगति यहीं समाप्त करते हैं। अलविदा!

14 अप्रैल 2024

पिछला: सत्य का अनुसरण कैसे करें (18)

अगला: सत्य का अनुसरण कैसे करें (26)

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें