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वचन देह में प्रकट होता है

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अठारहवें कथन की व्याख्या

परमेश्वर के सभी वचनों में उसके स्वभाव का एक हिस्सा समाहित होता है; उसके स्वभाव को वचनों में पूरी तरह से व्यक्त नहीं किया जा सकता है, इसलिए यह दर्शाता है कि उसमें कितनी प्रचुरता है। जिसे लोग देख और स्पर्श कर सकते हैं, अंततः, सीमित है, वैसे ही जैसे कि लोगों की क्षमता है। यद्यपि परमेश्वर के वचन स्पष्ट हैं, तब भी लोग पूरी तरह से समझने में असमर्थ हैं। ठीक इन वचनों की तरह: "बिजली की एक चमक पर, प्रत्येक जानवर अपने असली स्वरूप में प्रकट हो जाता है। उसी तरह, मेरे प्रकाश से रोशन मानवजाति ने भी उस पवित्रता को पुनःप्राप्त कर लिया है जिससे वह कभी सम्पन्न थी। ओह, अतीत का वह भ्रष्ट संसार अंतत: गंदे पानी में पलट गया है, और सतह के नीचे डूब कर, कीचड़ में घुल गया है!" परमेश्वर के सभी वचनों में उसके अस्तित्व का समावेश है, और भले ही लोग इन वचनों से अवगत हों, उन्होंने कभी उनके अर्थ को नहीं जाना है। परमेश्वर की दृष्टि में, वे सभी जो उसका विरोध करते हैं उसके शत्रु हैं, अर्थात्, जो लोग दुष्टात्माओं से संबंधित हैं वे पशु हैं। इस से कलीसिया की वास्तविक स्थिति को देखा जा सकता है। लोगों की सीधी फटकार या ताड़ना के गुज़रे बिना, लोगों के सीधे निष्कासन या मानवीय विधियों के एक हिस्से से गुज़रे बिना या लोगों द्वारा इशारा किए बिना, सभी लोग स्वयं को परमेश्वर के वचनों की रोशनी के नीचे जाँचते हैं, और "सूक्ष्मदर्शी" के परिप्रेक्ष्य में बहुत स्पष्ट रूप से देखते हैं कि उनके भीतर वास्तव में कितनी बीमारी है। परमेश्वर के वचनों में, हर प्रकार की आत्मा को वर्गीकृत किया जाता है और प्रत्येक आत्मा के मूल रूप को प्रकट किया जाता है। स्वर्गदूतों की आत्माएँ अधिकाधिक रोशन और प्रबुद्ध हो जाती हैं, इसलिए जो परमेश्वर ने कहा है, कि उन्होंने "उस पवित्रता को पुनःप्राप्त कर लिया है जिससे वह कभी सम्पन्न थी," यह परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए अंतिम परिणामों पर आधारित है। निस्संदेह अब इसे अभी तक पूरी तरह से हासिल नहीं किया जा सकता है—यह सिर्फ एक पूर्वानुभव है। परमेश्वर की इच्छा इसके माध्यम से देखी जाती है और यह दर्शाता है कि बहुत से लोग परमेश्वर के वचनों में गिरेंगे और धीरे-धीरे सभी लोगों के संत जैसा बनने की प्रक्रिया में पराजित हो जाएँगे। यहाँ उल्लिखित "कीचड़ में घुल गया है" परमेश्वर का आग से दुनिया को नष्ट करने का विरोधात्मक नहीं है, और "बिजली" परमेश्वर के कोप का संकेत करती है। जब परमेश्वर अपने महान क्रोध का उत्सर्जन करेगा, तो परिणामस्वरूप, पूरी दुनिया, ज्वालामुखी के फटने की तरह, सभी प्रकार की आपदाओं का अनुभव करेगी। आकाश से ऊपर खड़े हो कर, यह देखा जा सकता है कि पृथ्वी पर सभी प्रकार की आपदाएँ, दिन प्रति दिन मानवजाति को घेर रही हैं। ऊपर से नीचे देखने पर, पृथ्वी भूकंप से पहले के विभिन्न दृश्यों की तरह है। हर जगह भयानक पानी बढ़ रहा है, सभी जगहों पर लावा बह रहा है, पहाड़ सरक रहे हैं, और हर जगह उदासीन प्रकाश चमक रहा है। पूरी दुनिया आग में डूब गई है। यह परमेश्वर के कोप उत्सर्जन करने का दृश्य है, और यह उनके न्याय का समय है। वे सभी जो देह वाले हैं भागने में असमर्थ होंगे। इस प्रकार, पूरी दुनिया को नष्ट करने के लिए देशों के बीच युद्ध और लोगों के बीच संघर्ष की आवश्यकता नहीं होगी, किन्तु यह परमेश्वर की ताड़ना के उद्गम का "होशहवास में आनंद" लेगा। कोई भी इस से बच निकलने में सक्षम नहीं होगा और वे इससे होकर एक के बाद एक गुज़रेंगे। इसके बाद संपूर्ण ब्रह्माण्ड एक बार पुनः पवित्र कांति से जगमगाएगा और समस्त मानवजाति एक बार पुनः एक नया जीवन शुरू करेगी। और परमेश्वर ब्रह्मांड के ऊपर आराम करेगा और हर दिन मानवजाति को आशीष देगा। स्वर्ग असहनीय ढंग से उजाड़ नहीं होगा, किन्तु उस जीवन-शक्ति को पुनःप्राप्त करेगा जो दुनिया की सृष्टि के बाद से उसके पास नहीं थी, और "छठा दिन" तब होगा जब परमेश्वर एक नया जीवन शुरू करेगा। परमेश्वर और मनुष्य सभी आराम में प्रवेश करेंगे और ब्रह्मांड अब गंदा या मैला नहीं रहेगा, किन्तु यह नवीनीकरण को प्राप्त करेगा। यही कारण है कि परमेश्वर ने कहा: "पृथ्वी अब स्थिर और मूक नहीं है, स्वर्ग अब उजाड़ और दुःखी नहीं है।" स्वर्ग के राज्य में अधार्मिकता या मानवीय भावनाएँ, या मानवजाति का कोई भी भ्रष्ट स्वभाव नहीं रहा है क्योंकि वहाँ शैतान का उपद्रव मौजूद नहीं है। सभी लोग परमेश्वर के वचनों को समझने में सक्षम हैं, और स्वर्ग में जीवन खुशी से भरा जीवन है। स्वर्ग में सभी लोगों के पास परमेश्वर की बुद्धि और गरिमा है। स्वर्ग और पृथ्वी के बीच भिन्नताओं की वजह से, स्वर्ग के नागरिकों को "लोग" नहीं कहा जाता है, बल्कि उन्हें परमेश्वर द्वारा "आत्माएँ" कहा जाता है। इन दोनों शब्दों में सार-भूत अंतर हैं, और अब जिन्हें "लोगों" के रूप में संकेत किया गया है, वे सभी शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं, जबकि "आत्माएँ" नहीं हुई हैं। अंत में, परमेश्वर स्वर्ग की आत्माओं की विशेषताएँ प्राप्त करवाने के लिए पृथ्वी के सभी लोगों को परिवर्तित कर देगा और वे शैतान के उपद्रवों को अब और नहीं झेलेंगे। "मेरी पवित्रता, सम्पूर्ण बह्माण्ड में फैल गई है।" "पृथ्वी अपनी मौलिक स्थिति में स्वर्ग से सम्बंध रखती है और स्वर्ग पृथ्वी के साथ एक हो जाता है। मनुष्य, स्वर्ग और पृथ्वी को बाँधे रखने वाली डोर है, और उसकी पवित्रता के कारण, उसके नवीनीकरण के कारण, स्वर्ग अब पृथ्वी से छुपा हुआ नहीं है, और पृथ्वी स्वर्ग के प्रति अब और मूक नहीं है।" वचनों का यही सही अर्थ है। यह उन लोगों के संदर्भ में कहा जाता है, जिनके पास स्वर्गदूतों की आत्माएँ हैं, और उस बिंदु पर स्वर्गदूत एक बार पुनः शांति से मिलजुल कर एक साथ रहने और अपनी मूल अवस्था को पुनः प्राप्त करने में समर्थ होंगे, और देह की वजह से स्वर्ग और पृथ्वी के दो क्षेत्रों के बीच अब और विभाजित नहीं होंगे। धरती पर स्वर्गदूत स्वर्ग में स्वर्गदूतों के साथ संवाद करने में समर्थ होंगे, पृथ्वी पर लोग स्वर्ग के रहस्यों को जान जाएँगे, और स्वर्ग में स्वर्गदूत मानवीय दुनिया के रहस्यों को जान जाएँगे। स्वर्ग और पृथ्वी एकजुट हो जाएँगे और उनके बीच कोई दूरी नहीं रहेगी। यह राज्य के साकार होने की सुंदरता है। यही वह है जो परमेश्वर पूरा करना चाहता है, और यही है जिसकी सभी मनुष्य और आत्माएँ लालसा करती हैं। किन्तु धार्मिक दुनिया के लोग इसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं। वे पृथ्वी पर हर जगह "कचरा" छोड़ते हुए (कचरा लाशों का संकेत करता है), उनकी आत्माओं को दूर ले जाए जाने के लिए एक सफेद बादल पर उद्धारकर्ता यीशु की सिर्फ़ प्रतीक्षा कर रहे हैं। क्या यह सभी मनुष्यों की अवधारणा नहीं है? यही कारण है कि परमेश्वर ने कहा: "धार्मिक संसार—इसे कैसे पृथ्वी पर मेरी सामर्थ्य द्वारा नष्ट नहीं किया जा सकता था?" धरती पर परमेश्वर के लोगों के पूर्ण होने की वजह से धार्मिक दुनिया उलट जाएगी। उस "अधिकार" का सही अर्थ यही है जिसके बारे में परमेश्वर बात करता है। परमेश्वर ने कहा था: "क्या ऐसा कोई है जो, मेरे दिनों में, मेरे नाम का अपमान करता है? सभी मानव श्रद्धा भरी निगाहों से मुझे निहारते हैं और अपने हृदयों में वे चुपचाप मुझे पुकारते हैं।" यही है वह जो उसने धार्मिक दुनिया के विनाश के परिणामों के बारे में कहा था, उसके वचनों की वजह से वे सब परमेश्वर के सिंहासन के समक्ष समर्पण करेंगे और सफेद बादल के आने की अब और प्रतीक्षा नहीं करेंगे या आकाश को और नहीं देखेंगे, बल्कि परमेश्वर के सिंहासन के सामने जीत लिए जाएँगे। इस प्रकार, "अपने हृदयों में वे चुपचाप मुझे पुकारते हैं"— यही धार्मिक संसार का परिणाम है, जो सभी परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाएँगे, और केवल यही परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता कहलाती है—धार्मिक लोगों को, मानव जाति के सर्वाधिक विद्रोहियों को मार गिराना, ताकि वे फिर कभी अपनी अवधारणाओँ को नहीं पकड़े रहेंगे, बल्कि वे परमेश्वर को जानेंगे।

यद्यपि परमेश्वर के वचनों ने बार-बार राज्य की सुंदरता की भविष्यवाणी की है, इसके विभिन्न पहलुओं के बारे में बात की है और इसका विभिन्न दृष्टिकोणों से वर्णन किया है, किन्तु वे अभी भी राज्य की हर स्थिति को पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर सकते हैं क्योंकि लोगों में प्राप्त करने की योग्यता का बहुत अभाव है। उसके कथन के सभी वचन बोल दिए गए हैं, किन्तु लोगों ने उन्हें किसी लेंस के माध्यम से नहीं देखा है, जिसके कारण लोग अभी भी अस्पष्ट हैं और उनकी समझ में नहीं आया है, और यहाँ तक कि संभ्रमित हो गए हैं और उलझन में पड़ गए हैं। यह देह का सबसे बड़ा दोष है। यद्यपि अपने हृदयों में, लोग परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, वे शैतान के उपद्रव के कारण उसका विरोध करते हैं, इसलिए परमेश्वर ने बार-बार लोगों के सुन्न और मूर्ख हृदयों को स्पर्श किया ताकि वे पुनर्जीवित हो सकें। परमेश्वर जो कुछ भी उजागर करता है वह शैतान की कुरूपता है, इसीलिए उसके वचन जितने अधिक कठोर होते हैं, शैतान उतना ही अधिक शर्मिन्दा होता है, और उतना ही अधिक लोगों के हृदय विवश नहीं होने में समर्थ होते हैं, और उतना ही अधिक लोगों के प्यार को जगाया जा सकता है। परमेश्वर इसी तरह से कार्य करता है। क्योंकि शैतान को उजागर कर दिया गया है और क्योंकि इसकी सही प्रकृति का पता लगाया जा चुका है, इसलिए यह लोगों के हृदयों पर अब और कब्जा करने का साहस नहीं करता है, और इस प्रकार स्वर्गदूतों को अब परेशान नहीं किया जाता है। इसी तरह से वे अपने पूरे हृदय और मन से परमेश्वर को प्यार करते हैं। केवल तभी वे दिखाते हैं कि उनके असली रंग परमेश्वर से और परमेश्वर को प्यार करने से संबंधित हैं। केवल इसी मार्ग के माध्यम से वे परमेश्वर की इच्छा को प्राप्त कर सकते हैं। "उनके हृदयों में मेरे लिए एक स्थान स्थापित हो गया है। मनुष्यों के बीच द्वेष या परित्याग से मेरा अब और सामना नहीं होगा, क्योंकि मेरा महान कार्य पहले ही पूर्ण हो चुका है, और अब और कोई रूकावट नहीं है।" जो ऊपर वर्णन किया गया था यह उसी का संकेतार्थ है। शैतान के उपद्रव के कारण, लोग परमेश्वर से प्रेम करने का समय निकालने में समर्थ नहीं हैं, वे हमेशा दुनिया की चीजों में उलझे रहते हैं, और वे शैतान द्वारा बहकाए जाते हैं जिसके कारण वे भ्रम में क्रिया-कलाप कर रहे होते हैं। यही कारण है कि परमेश्वर ने कहा है कि मनुष्य "जीवन की कई कठिनाईयों से, संसार के कई अन्यायों से, संसार के कई उतार-चढ़ावों से गुज़रे हैं, किन्तु अब वे मेरी रोशनी में निवास करते हैं। कल के अन्याय पर कौन नहीं रोता है?" इन वचनों को सुनने के बाद लोग महसूस करते हैं मानो कि परमेश्वर दुःख में उनका सहभागी हैं, उनके साथ सहानुभूति प्रकट कर रहा है, और उस समय मनुष्य के साथ अपनी परेशानियों को साझा कर रहा है। वे अचानक मानवीय दुनिया की पीड़ा को महसूस करते हैं और सोचते हैं: "क्या यह सच नहीं है—मैंने दुनिया में कभी भी किसी चीज का आनंद नहीं लिया है। अपनी माँ के गर्भ से बाहर आने के बाद से अब तक मैंने मानव जीवन का अनुभव किया है और मैंने कुछ भी प्राप्त नहीं किया है, किन्तु मैंने पीड़ा काफी झेली है। यह वास्तव में खोखला है! और अब मैं शैतान द्वारा बहुत भ्रष्ट किया गया हूँ! ओह! यदि परमेश्वर द्वारा उद्धार नहीं होता, तो जब मेरी मौत का समय आएगा, तो क्या मैं पूरी ज़िंदगी व्यर्थ में नहीं जीया होता? क्या मानव जीवन का कोई अर्थ है? कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर ने कहा कि पृथ्वी पर सब कुछ खोखला है। यदि परमेश्वर ने आज मुझे प्रबुद्ध नहीं किया तो मैं अभी भी अंधकार में होता। यह बहुत दयनीय है!" जब वे इस बारे में सोचते हैं तो उनके हृदय में कुछ मनन होता है: "यदि मैं परमेश्वर के वादे को प्राप्त नहीं कर सकता हूँ तो मैं जीवन का अनुभव कैसे लेता रह सकता हूँ?" इन वचनों को पढ़ने वाला हर कोई प्रार्थना में अच्छी तरह से रोएगा। यह मानव मनोविज्ञान है। यदि तुम कहते हो कि कोई इसे पढ़ सकता है और कोई प्रतिक्रिया नहीं कर सकता है, तो यह तब तक असंभव है जब तक कि उसे मानसिक विकार न हो। परमेश्वर हर दिन हर तरह के लोगों कि स्थितियों को उजागर करता है। कभी-कभी वह उनकी ओर से शिकायतें करता है। कभी-कभी वह लोगों की एक निश्चित वातावरण को जीतने और उससे गुज़रने में सहायता करता है। कभी-कभी वह लोगों के लिए उनके रूपांतरणों को बताता है। अन्यथा, लोगों को पता नहीं चलता कि उनका जीवन कितना बड़ा था। कभी-कभी परमेश्वर वास्तविकता में लोगों के अनुभवों को बताता है, और कभी-कभी वह उनकी कमियों और दोषों को बताता है। कभी-कभी वह उनसे नई अपेक्षाएँ करता है, और कभी-कभी वह अपने बारे में उनकी समझ की हद को बताता है। हालाँकि, परमेश्वर ने यह भी कहा है: "मैंने कई लोगों के हृदय से बोले गए वचनों को, पीड़ा के बीच दर्दनाक अनुभवों के बारे में कई लोगों द्वारा कहे गए वर्णनों को सुना है; मैंने कई लोगों को, कठिन स्थितियों में, बिना नागा किए मेरे प्रति अपनी निष्ठा को अर्पित करते हुए देखा है, और कई लोगों को पथरीले मार्ग पर चलते हुए, बाहर निकलने के रास्ते के लिए संघर्ष करते हुए देखा है।" यह सकारात्मक पात्रों का वर्णन है। "ऐतिहासिक नाटक" की प्रत्येक कड़ी में सकारात्मक और नकारात्मक पात्र रहे हैं, इसीलिए इसके बाद, परमेश्वर ने नकारात्मक पात्रों की कुरूपता को भी प्रकट किया है। इस तरह, यह केवल "विश्वासघाती" के अंतर के माध्यम से है कि "ईमानदार मनुष्यों" की अटल वफादारी और निडर साहस प्रकट होता है। सभी लोगों के जीवन में नकारात्मक कारक और, बिना किसी अपवाद के, सकारात्मक कारक होते हैं। परमेश्वर इन दोनों पहलुओं से सभी लोगों के बारे में सच्चाई को प्रकट करता है ताकि विश्वासघाती अपने सिरों को झुका लेंगे और अपने पापों को स्वीकार करेंगें, ताकि ईमानदार मनुष्य प्रोत्साहन के तहत वफादार बने रहें। परमेश्वर के वचनों का अंतर्निहित अर्थ बहुत गहरा है। कभी-कभी लोग उन्हें पढ़ने के बाद हँसी से दोहरे हो जाते हैं और कभी-कभी, वे मौन हो कर अपने सिरों को लटका देते हैं। कभी-कभी वे यादें ताज़ा करते हैं, कभी-कभी वे फूट-फूट कर रोते हैं और अपने पापों को अभिस्वीकृत करते हैं, कभी-कभी वे अँधेरे में टटोलते हैं, और कभी-कभी वे तलाश करते हैं। कुल मिलाकर, परमेश्वर के वचनों की विभिन्न पृष्ठभूमियों की वजह से लोगों की प्रतिक्रियाओं में रूपांतरण होते हैं। जब कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचनों को पढ़ता है, तो कभी-कभी तमाशाई भी गलती से विश्वास कर सकते हैं कि वह व्यक्ति मानसिक रोगी है। तुम एक नज़र डाल सकते हो: "और इसलिए, विवादपूर्ण झगड़े अब और नहीं होते हैं, और उन वचनों का अनुसरण करते हुए जो मुझसे जारी होते हैं, ये आधुनिक युग के विविध प्रकार के 'हथियार' भी वापस ले लिए जाते हैं।" "हथियार" शब्द तुम्हारे पूरे दिन के लिए एक पर्याप्त मजाक है, और इसे महसूस किए बिना, जब लोग "हथियारों" के बारे में सोचेंगे तो वे चुपके से हँसेंगे । ठीक? क्या ऐसा हो सकता है कि तुम इस वजह से न हँसो?

जब तुम हँसते हो, तो मानवजाति से परमेश्वर की अपेक्षाओं को समझना न भूलो, और कलीसिया की वास्तविक परिस्थितियों को देखना न भूलो: "समस्त मानवजाति अब सामान्य हो गई है और एक नए जीवन को आरम्भ कर चुकी है। एक नए परिवेश में विद्यमान, अच्छी संख्या में लोग, ऐसा महसूस करते हुए मानो कि वे एक बिल्कुल ही नए संसार में प्रवेश कर चुके हैं, अपने आसपास देखते हैं, और इस वजह से वे तुरंत अपने वर्तमान परिवेश को अपनाने में या एक दम से सही मार्ग पर आने में समर्थ नहीं होते हैं।" ये कलीसिया की वर्तमान वास्तविक परिस्थितियाँ हैं। सभी लोगों को तुरंत सही मार्ग में प्रवेश करवाने के लिए उद्विग्न न हो। एक बार जब पवित्र आत्मा का कार्य एक निश्चित चरण तक प्रगति कर लेता है, तो सभी लोग इसे महसूस किए बिना इसमें प्रवेश करेंगे। जब तुम परमेश्वर के वचनों के सार को समझोगे, तो तुम जान जाओगे कि उसके आत्मा ने किस चरण तक कार्य कर लिया है। परमेश्वर की इच्छा है: "मैं, उसके अधार्मिक कर्मों पर निर्भर करते हुए, केवल 'शिक्षा' का एक उचित उपाय प्रशासित करता हूँ, जो हर एक को सही रास्ते पर आने में बेहतर सक्षम बनाता है।" यह परमेश्वर की बोलने और कार्य करने की विधि है, और यह मानवजाति के अभ्यास का विशिष्ट मार्ग भी है। इसके बाद, उसने लोगों के लिए मानवजाति की एक अन्य स्थिति को बताया: "यदि मानवजाति उस परमानंद का मज़ा लेने की अनिच्छुक है जो मुझ में है, तो मैं केवल इतना ही कर सकता हूँ कि उनकी अभिलाषाओं के साथ चलूँउन्हें अथाह गड्ढे में भेज दूँ।" परमेश्वर ने सुविस्तृत रूप से बोला और लोगों के पास शिकायत करने का जरा सा भी अवसर नहीं छोड़ा। परमेश्वर और मनुष्य के बीच यही सटीक अंतर है। परमेश्वर हमेशा स्पष्ट रूप से और आज़ादी से मनुष्य से बात करता है। लोगों को स्वयं को उसकी जगह पर रख कर और साथ ही परमेश्वर के देखने के लिए कि यह इंद्रधनुष का कौन सा रंग है उन्हें "अपनी भावनाओं को स्पष्ट करने" में समर्थ बना कर, उसकी ईमानदारी को उसके हर एक वचन में देखा जा सकता है। परमेश्वर ने कभी भी किसी भी व्यक्ति की आस्था या प्यार की सराहना नहीं की है, किन्तु उसने हमेशा लोगों से अपेक्षाएँ की हैं और उनकी कुरूपता को उजागर किया है। यह दर्शाता है कि लोगों के पास कितनी छोटी "कद-काठी" है और उनके "गठन" में कितना अभाव है। इसकी क्षतिपूर्ति करने के लिए उन्हें अधिक "व्यायाम" करने की आवश्यकता है, यही कारण है कि परमेश्वर लोगों से हमेशा नाराज रहता है। एक दिन जब परमेश्वर मानवजाति के बारे में पूरी सच्चाई प्रकट कर देगा, तो लोग पूर्ण हो जाएँगे, और परमेश्वर निश्चिंत हो जाएगा। लोग अब परमेश्वर के साथ विश्वासघात नहीं करेंगे और वह उन्हें अब और "शिक्षित" नहीं करेगा। तब से लोग "अपने दम पर रहने" में समर्थ होंगे, किन्तु यह वो समय नहीं है। अभी भी बहुत कुछ है जो लोगों में "नक़ली" है इसलिए उन्हें परीक्षा के कई दौरों की तथा और अधिक "जाँच की चौकियाँ" स्थापित किए जाने की आवश्यकता होती है ताकि प्रत्येक जाँच-चौकी पर मानवजाति के "करों" का भुगतान किया जा सके। यदि अभी भी नकली माल हैं, तो उन्हें जब्त कर लिया जाएगा और बेचा नहीं जा सकेगा, और तब तस्करी के सामान की उस खेप को नष्ट कर दिया जाएगा। क्या यह करने लायक अच्छी बात नहीं है?

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