10. समझने का ढोंग करके मैंने आफत मोल ले ली
मैं कलीसिया के लिए डिजाइन का काम कर रही थी। समय के साथ सभी तरह के डिजाइन और चित्र बनाने से मेरी कार्यकुशलता खूब बढ़ गई तो मुझे टीम अगुआ बना दिया गया। मैंने सोचा : “मुझे टीम अगुआ बनाने का मतलब ही यह है कि मुझमें कुछ हुनर और कार्यक्षमताएँ हैं, मैं दूसरे भाई-बहनों से बेहतर हूँ और इस काम को सँभाल सकती हूँ। मुझे इस कर्तव्य को सँजोना है, कड़ी मेहनत करनी है, सत्य सिद्धांत खोजने हैं और अपना भरसक देना है। मैं ऐसी गलतियाँ नहीं कर सकती जो कलीसिया के कार्य में रुकावट डालें। मुझे सबको दिखाना है कि मैं टीम अगुआ होने के लिए ही बनी हूँ।”
एक दिन कलीसिया के अगुआ ने मुझसे कहा, “कलीसिया को भजनों की एक वीडियो के लिए बैकग्राउंड तस्वीर चाहिए। इसे बनाना हमारे पहले वाले चित्रों से कठिन है। चूँकि बाकी लोग अभी दूसरे डिजाइन बनाने में व्यस्त हैं, इसलिए यह काम हम तुम्हें सौंपना चाहते हैं। क्या तुम कर पाओगी?” अगुआ की बात सुनकर मैंने सोचा, “मैंने ऐसी जटिल बैकग्राउंड पर पहले कभी काम नहीं किया, इसलिए मुझे अच्छे नतीजों की गारंटी देने का यकीन नहीं है।” लेकिन फिर मैंने सोचा, “इस प्रोजेक्ट पर अगुआ और भाई-बहनों की भी निगाह रहेगी—मैं दो साल से ऊपर से यह कर्तव्य निभाती आ रही हूँ, मैंने मुश्किल मसले और काम बखूबी सँभाले हैं और मुझमें अच्छा खासा हुनर आ चुका है। ठीक है कि इतनी कठिन बैकग्राउंड बनाने का काम पहली बार कर रही हूँ, इसमें कुछ अनजानी समस्याएँ सामने आना भी तय है, लेकिन अगर ऐसे काम को भी नहीं कर पाई तो मेरे बारे में बाकी लोग क्या सोचेंगे? अगर इसे नहीं सँभाल पाई तो क्या वे यह नहीं सोचेंगे कि मुझमें कोई कार्यक्षमता नहीं है और मैंने अपने कर्तव्य में कोई तरक्की नहीं की है? बाकी भाई-बहन अपने कामों में जुटे हुए हैं, और अगर इस मौके पर किसी और को मेरे साथ लगाया जाता है, तो हर कोई यही सोचेगा कि मैं बड़ी जिम्मेदारी नहीं सँभाल सकती, मैं महत्वपूर्ण पलों में भारी बोझ नहीं उठा सकती हूँ और मैं किसी बड़े काम के लिए नहीं बनी हूँ। मैं ऐसा नहीं होने दूँगी! चाहे जो हो, मुझे यह प्रोजेक्ट करना है। मुझे जो कुछ नहीं आता, बस उसके बारे में खोजबीन करूँगी ताकि सब कुछ ठीक से कर सकूँ और सबको दिखा दूँ कि मैं भी चुनौती वाले काम सँभाल सकती हूँ।” अपना मन मजबूत करके मैंने पूरे यकीन से कहा, “मैं इसे कर लूँगी, कोई दिक्कत नहीं होगी। यह दूसरी बैकग्राउंड से बस थोड़ी-सी ही कठिन और चुनौतीपूर्ण है। थोड़ी-सी ज्यादा कोशिश करके मैं अच्छी गुणवत्ता सुनिश्चित कर सकती हूँ।” यह देखकर कि मैं आत्मविश्वास युक्त लगती हूँ, अगुआ ने सिर हिलाकर हामी भरी और कहा, “इस पार्श्व चित्र के लिए हमारे पास एक तंग समयसीमा है और डिजाइन में भजन का अर्थ और भाव भी झलकना चाहिए। अगर डिजाइन बनाते समय कोई भी दिक्कत हो तो तुरंत हमसे बात कर लेना।” मेरे पर्यवेक्षक ने भी कहा, “अगर तुम्हें लगे कि बात नहीं बन रही है तो हमें बताना, हम तुम्हारी मदद के लिए किसी को भेज देंगे।” मैंने उत्साह और घबराहट में हामी भर दी, मेरे उत्साह का कारण यह था कि मुझे इतना अहम डिजाइन बनाना था, जिसे ठीक से बना लिया तो मुझे बहुत प्रशंसा मिलेगी, लेकिन मुझे यह चिंता भी थी कि इतना कठिन काम कर भी पाऊँगी या नहीं, और क्या मैं उनके मन मुताबिक अच्छा बना सकूँगी। लेकिन कुछ भी हो, मैं हर किसी को निराश नहीं कर सकती थी। मुझे फौरन खोजबीन शुरू करनी थी, नई चीजें आजमानी थीं ताकि कभी-कभी मिलने वाले ऐसे अवसर का फायदा उठा सकूँ। मुझे इस काम को अंजाम देना था, चाहे जितना कठिन हो।
डिजाइन बनाते समय लगा कि वक्त दौड़ता जा रहा है और कई समस्याएँ भी सामने आईं। मुझ पर दबाव बढ़ता जा रहा था। अगुआ और पर्यवेक्षक अक्सर मेरे काम की प्रगति के बारे में पूछते और जानना चाहते कि कोई दिक्कत तो नहीं आ रही है। मैं इतनी ज्यादा घबराई रहती थी कि उन्हें बस यही कह देती कि सब कुछ “ठीक चल रहा है,” जबकि हकीकत में मैं काँप रही होती थी : डिजाइन में अब भी बहुत-सी जगहें थीं जिनमें सुधार की जरूरत थी। इसमें कुछ महत्वपूर्ण तकनीकी खोज करना बाकी था। अंतिम नतीजा कैसा होगा, इस बात का मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था। अगर यह ठीक नहीं बना तो क्या सभी देख लेंगे कि मुझमें वास्तव में कौशल की कितनी कमी है और कहेंगे कि मुझमें क्षमता नहीं है और मैं दिखावा करती हूँ? चूँकि मैंने वादा किया कि मैं इसे कर लूँगी, पर अब अगर मैं कहूँ कि मैं इसे न कर पाऊँ तो क्या मैं खुद को शर्मिंदा नहीं करूँगी? लिहाजा मेरे बस में सिर्फ मजबूरी में काम करते जाना और समाधान ढूँढ़ना था। मुझे तो अभी कोई खाका भी ठीक से नहीं सूझा था, इसलिए कुछ समय माथापच्ची में लगा। एक बार अगुआ स्टूडियो में आया और उसने थोड़ी देर मुझे काम करते देखा, तो मैं जानबूझकर एक आसान हिस्से में जाकर तेजी से चित्र बनाने लगी, ताकि उसे लगे कि सब कुछ मेरे काबू में है। लेकिन हकीकत में मैं इतनी घबराई हुई थी कि मेरी हथेलियों में पसीना आ रहा था। जब अगुआ चला गया, तो मैं दुबारा कठिन हिस्से में जुटकर दिमाग दौड़ाने लगी। मैंने इस पर काफी समय तक सोचा, लेकिन मैं अभी भी इससे निपटने का कोई तरीका नहीं सोच पाई। तब भी मैं यह स्वीकार करना नहीं चाहती थी कि कोई मसला है, डरती थी कि अगुआ मेरी कार्यक्षमता पर सवाल खड़ा करेगा। मुझे लगा कि चूँकि मैं पहले ही अपनी शेखी बघार चुकी हूँ, इसलिए पीछे हटना बहुत शर्मनाक होगा। मुझे अपने दाँत भींचकर रखने थे और कदमवार समाधान खोजना था, लेकिन मैं बहुत अप्रभावी थी और मानसिक रूप से बुरी तरह थक चुकी थी। मुझे आखिरी रात में देर तक जागकर डिजाइन पूरा करना पड़ा। मेरे अगुआ और पर्यवेक्षक ने कहा कि यह अच्छा लग रहा है पर सिर्फ थोड़ा-सा सुधारना पड़ेगा। फिर भी, मैं खुद को खुश नहीं कर पाई—मैं उदास महसूस कर रही थी।
बाद में भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का अंश पढ़ा : “यदि तुम अपने हृदय में प्रायः दोषारोपण की भावना के साथ जीते हो, बेचैन महसूस करते हो, तुममें कोई शांति या आनंद नहीं है, और यदि तुम अक्सर सभी प्रकार की चीजों के बारे में चिंतित और परेशान रहते हो, तो यह क्या दर्शाता है? बस यही कि तुम सत्य का अभ्यास नहीं करते हो और तुम परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग नहीं रहते हो। जब तुम शैतानी स्वभावों के बीच जीते हो, तो तुम अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हो, सत्य का अभ्यास करना नापसंद करते हो और यहाँ तक कि सत्य के साथ विश्वासघात करते हो, अपने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए किसी भी साधन का सहारा लेते हो। तुम केवल अपने मिथ्याभिमान, मान-सम्मान, प्रतिष्ठा, रुतबे और हितों की रक्षा करते हो। क्या यह स्वार्थी और नीच होना नहीं है? जब तुम हमेशा अपने लिए और अपने हितों के लिए जीते हो, तो जीवन अत्यंत पीड़ादायक हो जाता है। तुम्हारे पास बहुत सारी स्वार्थी इच्छाएँ, उलझनें, बंधन, आशंकाएँ और परेशानियाँ होती हैं; तुममें जरा भी शांति या आनंद नहीं होता। भ्रष्ट देह के लिए जीना चरम पीड़ा सहने के सिवा और कुछ नहीं है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन प्रवेश कर्तव्य निभाने से प्रारंभ होता है)। परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचकर मैंने जाना कि डिजाइन बनाने के बाद भी मैंने खुशी नहीं, बल्कि थकावट और उदासी महसूस की, इसका कारण यह था कि मुझमें अपने रुतबे की बहुत ज्यादा चाहत थी। अपनी कमियाँ उजागर करने से बचने के लिए मैंने छद्मवेश धारण कर मुखौटा पहन लिया था। क्या यह थकाऊ नहीं था? बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अन्य अंश पढ़कर अपने भ्रष्ट स्वभाव को बेहतर ढंग से समझा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “लोग स्वाभाविक रूप से सृजित प्राणी हैं। क्या सृजित प्राणी सर्वशक्तिमत्ता प्राप्त कर सकते हैं? क्या वे पूर्णता और दोषहीनता प्राप्त कर सकते हैं? क्या वे हर चीज में निपुणता प्राप्त कर सकते हैं, सब कुछ समझ सकते हैं, सब कुछ स्पष्ट रूप से देख सकते हैं और हर चीज में सक्षम हो सकते हैं? वे नहीं हो सकते। हालाँकि, लोगों के भीतर एक भ्रष्ट स्वभाव, एक घातक कमजोरी होती है : जैसे ही वे कोई कौशल या पेशा सीखते हैं, लोगों को लगता है कि वे सक्षम हैं, वे रुतबे और मूल्य वाले लोग हैं और वे पेशेवर हैं। चाहे उनका वास्तविक कद कुछ भी हो, वे सभी खुद को कोई प्रसिद्ध या असाधारण व्यक्ति दिखाना चाहते हैं, कुछ हद तक जाने-माने व्यक्ति बनना चाहते हैं और दूसरों को यह दिखाना चाहते हैं कि वे पूर्ण और दोषहीन हैं, बिना किसी भी दोष के हैं; वे चाहते हैं कि दूसरे लोग उन्हें किसी सक्षम, शक्तिशाली, असाधारण या प्रसिद्ध और महान व्यक्ति के रूप में देखें, जिनकी एक भव्य और प्रभावशाली छवि हो, जो कुछ भी करने की क्षमता रखते हों और ऐसा कुछ भी न हो जो वे नहीं कर सकते। उन्हें लगता है कि यदि वे दूसरों की मदद माँगेंगे, तो वे अक्षम और हीन दिखाई देंगे और लोग उन्हें नीची दृष्टि से देखेंगे। इस कारण से, वे हमेशा झूठा दिखावा करना चाहते हैं। कुछ लोग, जब उनसे कुछ करने के लिए कहा जाता है, तो वे कहते हैं कि वे जानते हैं कि यह कैसे करना है, जबकि वास्तव में वे नहीं जानते। बाद में, गुप्त रूप से, वे इसे खोजते हैं और इसे करना सीखने की कोशिश करते हैं, लेकिन पता चलता है कि कई दिनों तक इसका अध्ययन करने के बाद भी, वे अभी भी नहीं समझ पाते कि इसे कैसे करना है। जब उनसे पूछा जाता है कि उनका काम कैसा चल रहा है, तो वे कहते हैं, ‘बस होने ही वाला है, लगभग हो गया!’ लेकिन अपने दिलों में, वे सोच रहे होते हैं, ‘यह पूरा होने के करीब भी नहीं है, मुझे कोई अंदाजा नहीं है, मुझे नहीं पता कि क्या करना है! मुझे अपनी असलियत सामने नहीं आने देनी चाहिए, मुझे झूठा दिखावा करते रहना चाहिए, मैं लोगों को अपनी कमियाँ और अज्ञानता देखने नहीं दे सकता, मैं उन्हें मुझे नीची दृष्टि से देखने नहीं दे सकता!’ यह क्या समस्या है? यह हर कीमत पर अपनी इज्जत बचाने के लिए कष्ट सहना है। यह किस तरह का स्वभाव है? ऐसे लोगों के घमंड की कोई सीमा नहीं है, उन्होंने सारा विवेक खो दिया है। वे आम लोग नहीं बनना चाहते, वे साधारण लोग, सामान्य लोग नहीं बनना चाहते, बल्कि महामानव, असाधारण व्यक्ति या सक्षम लोग बनना चाहते हैं। यह कितनी बड़ी समस्या है! सामान्य मानवता के भीतर की कमजोरियों, कमियों, अज्ञानता, मूर्खता और समझ की कमी के संबंध में, वे सब कुछ छिपा लेंगे और दूसरे लोगों को देखने नहीं देंगे—वे झूठा दिखावा करते रहते हैं। ... मुझे बताओ, क्या इस प्रकार के लोग हमेशा धुंध में नहीं जी रहे हैं? क्या वे सपने नहीं देख रहे हैं? वे खुद को नहीं जानते, वे नहीं जानते कि वे कौन हैं और वे नहीं जानते कि सामान्य मानवता को कैसे जीना है। उन्होंने कभी भी वह नहीं किया जो मनुष्यों को एक व्यावहारिक तरीके से करना चाहिए, न ही उन्होंने कभी एक सामान्य व्यक्ति जैसा जीवन जिया है। अगर तुम हमेशा धुंध में और एक भ्रमित तरीके से जीते हो, चीजों को व्यावहारिक तरीके से नहीं करते हो और हमेशा अपनी कल्पनाओं के सहारे जीते हो तो इसका अर्थ मुसीबत है—तुम नहीं जानते कि कैसे आचरण करना है और तुमने जो जीवन पथ चुना है वह गलत है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पाँच शर्तें, जिन्हें परमेश्वर पर विश्वास के सही मार्ग पर चलने के लिए पूरा करना आवश्यक है)। परमेश्वर के वचनों ने मेरी वर्तमान मनोदशा को उजागर कर दिया। चूँकि मैं काफी समय से डिजाइन बना रही थी, मैंने कुछ हुनर भी हासिल कर लिया था और मुझे टीम अगुआ भी बना दिया गया था, तो मुझे लगता था कि मुझमें कार्यक्षमता है और मैं एक दुर्लभ प्रतिभाशाली इंसान हूँ। अपने बारे में इस तरह सोचने के बाद मैं इस बात का खास ध्यान रखती थी कि मेरे बारे में दूसरे क्या सोचते हैं, डरती थी कि मेरी कमियाँ देखकर वे कहेंगे कि मैं इस काम के लायक नहीं हूँ। खासकर बैकग्राउंड तस्वीर को लेकर, मैंने इसके जितना कठिन काम पहले कभी नहीं किया था और मुझे कामयाब होने का यकीन भी नहीं था, फिर भी अपनी प्रतिष्ठा और रुतबा बचाने, अपने अगुआ और पर्यवेक्षक का भरोसा पाने के लिए मैंने सब कुछ नियंत्रण में होने का ढोंग किया। जब समस्याएँ सामने आईं और काम रुक गया तो मदद माँगने के बजाय मैं अकेले जूझती रही। जब मेरे अगुआ ने तरक्की या समस्याओं के बारे में पूछा तो कुछ भी समझ में न आने के बावजूद मैंने अपनी असली समस्याएँ नहीं बताईं। इसके बजाय मैंने अगुआ और पर्यवेक्षक से झूठ बोला और उन्हें धोखा दिया, यही नहीं, यह ढोंग भी किया कि मैं बहुत हुनरमंद हूँ ताकि अगुआ सोचे कि मैं काम कर सकती हूँ। अपनी कमियाँ छिपाने के लिए मैंने हर लिहाज से मुखौटा ओढ़ा। मैंने हमेशा ढोंग किया कि मैं प्रतिभाशाली कार्यकर्ता हूँ ताकि दूसरों को लगे कि मैं कुछ भी कर सकती हूँ और हर चीज जानती हूँ। मुझे एहसास हुआ कि मैं बहुत ही पाखंडी और अहंकारी हूँ। परमेश्वर के वचन कहते हैं : “लोग स्वाभाविक रूप से सृजित प्राणी हैं। क्या सृजित प्राणी सर्वशक्तिमत्ता प्राप्त कर सकते हैं? क्या वे पूर्णता और दोषहीनता प्राप्त कर सकते हैं? क्या वे हर चीज में निपुणता प्राप्त कर सकते हैं, सब कुछ समझ सकते हैं, सब कुछ स्पष्ट रूप से देख सकते हैं और हर चीज में सक्षम हो सकते हैं? वे नहीं हो सकते।” दरअसल, कोई भी भ्रष्ट व्यक्ति मुकम्मल और हर फन में माहिर कैसे हो सकता है? अपने कर्तव्य में कुछ चीजों को न समझना या कुछ चीजें करने में असक्षम होना सामान्य है, लेकिन अपनी कमियों को लेकर मेरा ऐसा नजरिया नहीं था। बल्कि, मैं खुद को प्रतिभाशाली इंसान के रूप में दिखाने में लगी रही। मैं एक औसत, दोषपूर्ण सृजित प्राणी के रूप में नहीं दिखना चाहती थी। मैं मुकम्मल और दोषरहित होना चाहती थी। इतने अहंकार से मेरी मति मारी जा चुकी थी। चूँकि मैं अपने कर्तव्य में हमेशा मुखौटा ओढ़े रहती थी, डरती थी कि दूसरे मेरी असलियत देख लेंगे और मैं कोई बात समझ में न आने पर मदद नहीं माँगती थी, इसलिए डिजाइन बनाने में देरी हुई जबकि यह काम तेजी से होना चाहिए था और मैं भावनात्मक रूप से निचुड़ गई। मुझे एहसास हुआ कि दोषरहित बनने का प्रयास मूर्खता था। मैं हमेशा अपनी कमियों को छिपाती थी, मुझमें उन्हें स्वीकारने और उनका सामना करने का साहस नहीं था। नतीजतन, मैं अपने काम में न सिर्फ निढाल और ढोंगी थी, बल्कि मैंने कलीसिया के कार्य में भी देरी कर दी थी। इसका एहसास होने पर मैंने प्रार्थना की, “प्यारे परमेश्वर! मेरा प्रबोधन और मार्गदर्शन करने के लिए शुक्रिया, जिससे मैंने जाना कि हमेशा झूठा मुखौटा पहनकर मैं कितनी दयनीय बन गई थी। मैं भविष्य में अपने अनुसरण के पीछे अपने गलत विचारों को सुधारने, अपनी कमियों को लेकर सही नजरिया अपनाने, कुछ समझ में न आने पर पूछने, दुराव-छिपाव और दिखावे से दूर रहने को राजी हूँ और जमीन से जुड़े रहते हुए अपना कर्तव्य निभाना चाहती हूँ।”
बाद में मैंने परमेश्वर के और अधिक वचन पढ़े : “चाहे तुम किन्हीं भी समस्याओं का सामना करो, तुम्हें उनका समाधान करने के लिए सत्य खोजना ही चाहिए, तुम्हें खुद को बिल्कुल भी छिपाना नहीं चाहिए या दूसरों के सामने झूठी छवि पेश नहीं करनी चाहिए। चाहे ये तुम्हारी कमियाँ हों, तुम्हारी अपर्याप्तताएँ हों, तुम्हारी खामियाँ हों या तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव हों, तुम्हें इन सभी चीजों के बारे में खुलकर बात और संगति करनी ही चाहिए। उन्हें छिपाकर मत रखो। अपनी बात खुलकर कैसे रखें, यह सीखना जीवन प्रवेश का सबसे पहला कदम है और यही वह पहली बाधा है जिसे पार करना सबसे मुश्किल है। एक बार जब तुम इस बाधा को पार कर लोगे, तो सत्य में प्रवेश करना आसान हो जाएगा। जब तुम यह कदम उठाओगे, तो इसका क्या अर्थ होगा? यह दर्शाएगा कि तुम अपना दिल खोल रहे हो, और अपने हर हिस्से को—चाहे अच्छा हो या बुरा, सकारात्मक हो या नकारात्मक—उजागर कर रहे हो और खोल रहे हो, और उस पर दूसरे लोगों और परमेश्वर के देखने के लिए रोशनी डाल रहे हो, परमेश्वर से कुछ भी छिपा या ढँक नहीं रहे हो, परमेश्वर के प्रति कोई छद्मवेश, कपट या धोखा नहीं अपना रहे हो, और इसी तरह दूसरे लोगों के साथ भी स्पष्टवादी हो। इस तरह, तुम रोशनी में जिओगे; न केवल परमेश्वर तुम्हारी पड़ताल करेगा, बल्कि दूसरे लोग भी देखेंगे कि तुम्हारे क्रियाकलापों में सिद्धांत और पारदर्शिता है। तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा, छवि और रुतबे की रक्षा के लिए किसी भी तरीके का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं है, न ही तुम्हें अपनी गलतियों को छिपाने या ढँकने की कोई जरूरत है। तुम्हें इन बेकार के प्रयासों में शामिल होने की जरूरत नहीं है। यदि तुम इन चीजों को छोड़ सकते हो, तो तुम्हारा जीवन बहुत तनावमुक्त हो जाएगा, बंधनों और दर्द से मुक्त हो जाएगा और तुम पूरी तरह से रोशनी में जिओगे” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। मैंने जाना कि अगर मैं अपना कर्तव्य ठीक से निभाना और परमेश्वर से अनुमोदन पाना चाहती हूँ तो सत्य खोजना सबसे महत्वपूर्ण है। मैंने अपने कर्तव्य में चाहे जो भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किए हों या मेरे चाहे जो भी मसले रहे हों, मुझे मार्गदर्शन माँगने के लिए परमेश्वर के सामने प्रार्थना में खुलकर बात करनी होगी, प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए अपनी लालसा छोड़नी होगी, भाई-बहनों के साथ संगति का प्रयास करना होगा, दुराव-छिपाव से बचना होगा, खुलकर बात करनी होगी, और सबके सामने असली रूप में रहना होगा, सिर्फ वही करना होगा जिसमें मैं सक्षम हूँ, जब सक्षम न हूँ तो यह स्वीकार करना होगा और दूसरों के साथ सत्य खोजना होगा। इस तरह अपना कर्तव्य निभाना कम थकावट और कम रुकावट भरा होगा—बल्कि यह आनंददायक भी होगा। यह एहसास होने के बाद मैंने भाई-बहनों के साथ संगति में पूरी डिजाइन प्रक्रिया में दिखाई अपनी भ्रष्टता पर खुलकर बात की और मुझे जो समस्याएँ आईं उन्हें चर्चा के लिए सामने रखा। भाई-बहनों ने मुझे कुछ नई सॉफ्टवेयर ऑपरेशन तकनीकें और चित्रकारी के तरीके सिखाए। उसके बाद मैंने बैकग्राउंड तस्वीर को पूरा करना जारी रखा और पूरी प्रक्रिया बेहद सहजता से हो गई। बाद में कुछ भाई-बहनों ने मुझसे कहा, “तुमने पहले से बहुत बेहतर बैकग्राउंड तस्वीर बनाई है। क्या तुम किसी समय हमारे साथ अपना अनुभव और जो तुमने सीखा वह साझा करना चाहोगी?” यह सुनकर मैं गदगद हो गई और लगा कि मैं वाकई किसी काम आई। बैकग्राउंड डिजाइन के अनुभव के बारे में विचार करने पर मुझे एहसास हुआ कि किसी में कमियाँ होना बुरा नहीं है और उनका दूसरों को पता चलने में भी नुकसान नहीं है। इनके बारे में खुलकर बात करना, सत्य खोजना, अपने अनुचित इरादों और इच्छाओं को परे रखना सबसे महत्वपूर्ण है। इस तरह से कर्तव्य निभाते हुए तुम शांत और सहज रह सकते हो।
धीरे-धीरे मैं कठिन परियोजनाओं के लिए भी उम्दा डिजाइन बनाकर देने लगी और दूसरे भाई-बहनों से ज्यादा चीजें पूरी तरह तैयार कर देने लगी। वे डिजाइन संबंधी विचारों और दूसरी तकनीकी समस्याओं पर हमेशा मुझसे राय लेने लगे। पहले तो मैं जो जानती थी उतना बता देती थी, लेकिन जब ज्यादा लोग पूछने लगे तो मैं अनजाने में ही यह सोचने लगी, “लगता है अब सब मेरी प्रतिभा पहचान गए हैं। वरना वे मेरी राय क्यों माँगते?” अनजाने में ही मैं इस संतुष्टि भरे एहसास में मगन होकर खुद से काफी खुश रहने लगी। लेकिन तभी कुछ अप्रत्याशित हो गया। भजन के लिए बनाए गए एक पार्श्व चित्र में अगुआ को सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाला एक मसला नजर आया और उसने विचलनों का विश्लेषण करने के लिए मुझे बुलाया। उसने कहा कि तस्वीर उसी दिन संपादित करनी पड़ेगी, वरना काम में देर हो जाएगी और पूछा कि क्या मैं यह काम खुद कर लूँगी या मुझे दूसरों की मदद चाहिए। मैंने सोचा : “तस्वीर मैंने डिजाइन की है, इसलिए अगर इसे दूसरों को सौंपने देती हूँ तो कहीं यह तो नहीं लगेगा कि मुझमें हुनर की कमी है? क्या लोग यह नहीं सोचेंगे कि मैं बातें तो बड़ी-बड़ी बनाती हूँ, लेकिन जब काम करने की बारी आती है तो कर नहीं पाती? ऐसा नहीं हो सकता! मैं इस मुकाम पर हार नहीं मान सकती। अगर मैं इसे खुद सुधार लेती हूँ, तो सब जानेंगे कि मैं अपना काम कर सकती हूँ, भरोसेमंद हूँ और विकसित होने लायक भी हूँ।” यह सोचकर मैंने अगुआ से कहा कि मैं इसे सिद्धांतों के अनुरूप खुद ही सुधार लूँगी। संपादन के दौरान तस्वीर के एक हिस्से के लिए मुझे कोई अच्छा विचार नहीं सूझा। चूँकि समय तेजी से कम होता जा रहा था और मैं उसी विचार पर अटकी हुई थी, मैं बुरी तरह परेशान थी, बस किसी तरह इसे जल्द से जल्द पूरा करना चाहती थी, लेकिन मैंने डिजाइन में चाहे जितनी हेर-फेर की, बात नहीं बन रही थी। मैं उस विचार पर सुबह 5 बजे तक अटकी रही, और फिर भी कुछ नहीं सूझा। मेरे विचार धुंधले-से हो गए थे। तब जाकर मैंने जाँच करनी शुरू की कि मेरे साथ यह मसला क्यों है। मुझे अचानक अहसास हुआ कि मेरे डिजाइन का सिद्धांतों का उल्लंघन करने का कारण यह है कि सिद्धांतों का कोई ऐसा पहलू है जिसे मैं समझती नहीं हूँ। संपादन के इस काम को करने की जरूरत के कारण पहले ही देर हो चुकी थी। मुझे यह भी यकीन नहीं था कि मेरे संपादन से चीजें ठीक हो ही जाएंगी, और इस तस्वीर की जरूरत भी तुरंत थी, इसलिए मैं जानती थी कि मुझे सहयोग लेने के लिए कोई व्यक्ति ढूँढ़ना चाहिए। लेकिन अपनी प्रतिष्ठा और रुतबा बचाने और कमियाँ छिपाने के लिए मैं बस अकेले ही रास्ता निकालने के लिए जूझ रही थी। क्या मैं कलीसिया के काम में देर नहीं कर रही थी? यह सोचकर मुझे बहुत ग्लानि हुई और मैंने पश्चात्ताप के लिए तुरंत प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! मैं अपने भ्रष्ट स्वभाव में जकड़ी हुई हूँ। जैसे ही मुझे कोई समस्या होती है, मैं सब कुछ ठीक होने का ढोंग करती हूँ ताकि दूसरे लोग मेरी प्रशंसा करें। मैं अपनी कमियों का सामना ठीक से नहीं कर सकती। इस तरह से अपने कर्तव्य का निर्वहन करना बहुत ही थकाऊ है! प्यारे परमेश्वर, मुझे अपनी भ्रष्टता पहचानने और घमंड छोड़ने की राह दिखाओ ताकि मैं तुम्हारे वचनों के अनुरूप अभ्यास कर सकूँ।” प्रार्थना के बाद मैंने परमेश्वर के इन वचनों के बारे में सोचा : “तुम हमेशा महानता, गरिमा और रुतबे के पीछे भागते हो; तुम हमेशा दूसरों से श्रेष्ठ बनने की कोशिश करते हो। इसे देखकर परमेश्वर को कैसा लगता है? वह इससे घृणा करता है और वह खुद को तुमसे दूर कर लेगा। तुम जितनी अधिक महानता और गरिमा के पीछे भागते हो और दूसरों से अलग दिखने, भीड़ से ऊपर उठने, असाधारण और उत्कृष्ट बनने की कोशिश करते हो, परमेश्वर तुमसे उतना ही अधिक विमुख होता है। यदि तुम आत्म-चिंतन नहीं करते और पश्चात्ताप नहीं करते, तो परमेश्वर तुमसे बेइंतहा नफरत करेगा और तुम्हें त्याग देगा। तुम्हें बिल्कुल भी ऐसा व्यक्ति नहीं बनना चाहिए जिससे परमेश्वर विमुख हो जाए; तुम्हें ऐसा व्यक्ति बनना चाहिए जिससे परमेश्वर प्रेम करे। तो तुम एक ऐसे व्यक्ति कैसे बन सकते हो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है? आज्ञाकारिता से सत्य को स्वीकार करो, एक सृजित प्राणी के रूप में अपने उचित स्थान पर रहो, परमेश्वर के वचनों के आधार पर व्यावहारिक ढंग से काम करो, अपना कर्तव्य अच्छे से निभाओ, एक ईमानदार व्यक्ति बनो और मनुष्य जैसा जीवन जियो। इतना ही काफी है और यह परमेश्वर को संतुष्ट करेगा। लोगों को बिल्कुल भी महत्वाकांक्षाएँ या व्यर्थ सपने नहीं पालने चाहिए, उन्हें प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के पीछे नहीं भागना चाहिए या भीड़ से ऊपर उठने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इससे भी बढ़कर, उन्हें अतिमानव या कोई महान व्यक्ति बनने, औरों से बेहतर बनने और दूसरों से अपनी पूजा करवाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। भ्रष्ट इंसान इसी की लालसा करते हैं और यह शैतान का मार्ग है; परमेश्वर ऐसे लोगों को नहीं बचाता। यदि लोग लगातार प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के पीछे भागते हैं और हठपूर्वक पश्चात्ताप करने से इनकार करते हैं, तो उन्हें मुक्ति नहीं मिल सकती और उनके लिए केवल एक ही परिणाम है : हटा दिया जाना” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, कर्तव्य के उचित निर्वहन के लिए सामंजस्यपूर्ण सहयोग आवश्यक है)। परमेश्वर के वचनों ने मेरी सही नब्ज पकड़ी, मैं हमेशा प्रतिष्ठा, रुतबे और प्रशंसा के पीछे भागती रहती थी। जब मैं दूसरों से ज्यादा मुकम्मल डिजाइन बनाने लगी और चुनौती भरे प्रोजेक्ट गारंटीशुदा खूबी से पूरे करने लगी, तो मैं अनजाने में ही अहंकारी बन गई। यही नहीं, जब दूसरे लोग सवाल लेकर मेरे पास आते रहे, तो मुझे संतुष्टि की एक गहरी भावना का एहसास हुआ और मैं अपनी तारीफों का मजा लेने लगी। जब मेरी तस्वीर किसी नुक्स के कारण वापस भेज दी गई और अगुआ ने समय बचाने की खातिर किसी और भाई-बहन से इसके संपादन में मदद लेने का सुझाव दिया तो मैंने कलीसिया के कार्य का विचार नहीं किया, बल्कि सिर्फ यह चिंता करती रही कि दूसरों को मेरी मदद करने देने से मेरी अयोग्यता उजागर हो जाएगी। अपनी प्रतिष्ठा और रुतबा कायम रखने और नीचा दिखने से बचने के लिए मैंने संपादन अपने हाथ में ही रखा। जब मेरे सामने समस्याएँ आईं तो मदद माँगने के बजाय मैं इस मुश्किल हालत में दाँत भींचे माथापच्ची करती रही और सब कुछ रोक दिया। ऊपरी तौर पर ऐसा लग रहा था कि मैं अपने कर्तव्य के लिए तय समयसीमा से अधिक कार्य कर रही हूँ लेकिन हकीकत में मैं तस्वीर को दुरुस्त कर बस अपनी प्रतिभा साबित करने की कोशिश करती रही, ताकि लोगों को लगे कि मैं विश्वासयोग्य और भरोसेमंद हूँ। मुझे समझ आया कि मुझमें प्रतिष्ठा और रुतबे की बहुत लालसा है। परमेश्वर हमारे विचारों की पड़ताल करता है—भले ही मैं भाई-बहनों को धोखा देने में सफल रही, लेकिन परमेश्वर को धोखा नहीं दे पाई, और मैंने चाहे जितनी खूबी से अपनी कमियाँ छिपाई हों, अगर मेरा भ्रष्ट स्वभाव अपरिवर्तित रहा और मैंने सत्य प्राप्त न किया, तो अभी भी परमेश्वर मुझसे घृणा करेगा और मुझे हटा देगा। प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे भागकर मैंने कलीसिया के कार्य में देर की थी और अगर मैंने आत्म-चिंतन न किया और परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप न किया, तो मैं खुद को और दूसरों को धोखा देकर अपना ही नुकसान करूँगी। यह एहसास होने पर मैंने डिजाइन में निपुण एक बहन से फौरन मदद माँगी। हमने तस्वीर के संपादन के बारे में चर्चा की और उसके बाद मेरी परिकल्पना काफी स्पष्ट हो गई। जल्द ही मैंने संपादन पूरा कर दिया।
बाद में मैंने अपनी कमियाँ छिपाने की आदत पर लगातार आत्मचिंतन किया। मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश देखा जिसने मुझ पर गहरा असर डाला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “क्या कुछ काम करना न आना कोई शर्मिंदगी की बात है? क्या कोई भी ऐसा है जो सारे काम कर सकता है? कुछ चीजें करना नहीं आना कोई शर्म की बात नहीं है। यह मत भूलो कि तुम बस एक साधारण व्यक्ति हो। कोई भी तुम्हें सम्मान नहीं देता या तुम्हारी आराधना नहीं करता। एक साधारण व्यक्ति बस एक साधारण व्यक्ति ही होता है। यदि तुम कोई काम करना नहीं जानते, तो बस कह दो कि तुम नहीं जानते कि इसे कैसे करते हैं। तुम अपना भेस बदलने की कोशिश क्यों करते हो? यदि तुम हमेशा भेस बदलोगे, तो लोग तुमसे चिढ़ जाएँगे। देर-सवेर, तुम्हारा खुलासा हो जाएगा, और उस वक्त, तुम अपनी गरिमा और सत्यनिष्ठा खो दोगे। यह मसीह-विरोधी लोगों का स्वभाव है—वे खुद के बारे में हमेशा सोचते हैं कि वे हरफनमौला हैं, एक ऐसा व्यक्ति जो सारे काम कर सकता है, जो सभी चीजों में सक्षम और प्रवीण है। क्या यह उन्हें मुसीबत में नहीं डाल देगा? यदि उनका ईमानदार रवैया हो तो वे क्या करेंगे? वे कहेंगे : ‘मैं इस तकनीकी कौशल में प्रवीण नहीं हूँ; मुझे बस थोड़ा-सा अनुभव है। जो भी जानता हूँ, मैंने लगा दिया है, लेकिन ये जो नई समस्याएँ हमारे सामने आ रही हैं, मैं इन्हें नहीं समझ पा रहा हूँ। इसलिए, अगर हम अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से करना चाहते हैं तो हमें कुछ पेशेवर ज्ञान सीखना होगा। पेशेवर ज्ञान में महारत हासिल करने से हम अपना कर्तव्य प्रभावी ढंग से कर पाएँगे। परमेश्वर ने हमें यह कर्तव्य सौंपा है, इसलिए इसे अच्छे ढंग से करने की जिम्मेदारी हम पर है। हमें अपने कर्तव्य की जिम्मेदारी लेने के रवैये के आधार पर इस पेशेवर ज्ञान को सीखना होगा।’ यह सत्य का अभ्यास करना है। मसीह-विरोधी के स्वभाव वाला व्यक्ति यह नहीं करेगा। यदि किसी व्यक्ति में थोड़ा विवेक है तो वह कहेगा : ‘मैं सिर्फ इतना ही जानता हूँ। तुम्हें मुझे सम्मान देने की जरूरत नहीं है, और मुझे रौब दिखाने की जरूरत नहीं है—क्या इससे चीजें आसान नहीं हो जाएँगी? हमेशा अपना भेस बदलते रहना दुखदाई होता है। अगर ऐसी कोई चीज है जो हम नहीं जानते तो हम साथ मिल कर इसे सीख सकते हैं और फिर अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से करने के लिए सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग कर सकते हैं। हमें जिम्मेदार रवैया अपनाना चाहिए।’ यह देखकर लोग सोचेंगे, ‘यह व्यक्ति हम लोगों से बेहतर है; किसी समस्या से सामना होने पर वह आँखें मूँदकर जबरन अपनी हद पार नहीं करता, न ही वह इसे दूसरों को सौंप देता है, और न ही जिम्मेदारी से जी चुराता है। इसके बजाय, वह इसकी जिम्मेदारी लेता है और इससे एक गंभीर और जिम्मेदार रवैये के नजरिए से निपटता है। वह एक नेक इंसान है जो अपने कार्य और कर्तव्य के प्रति गंभीर और जिम्मेदार है। वह भरोसेमंद है। परमेश्वर के घर ने इस व्यक्ति को यह महत्वपूर्ण काम सौंप कर सही किया। परमेश्वर सच में लोगों के दिलों की गहराई से पड़ताल करता है!’ अपना कर्तव्य इस तरह से निभा कर वे अपने कौशल सुधारेंगे और सभी की स्वीकृति प्राप्त करेंगे। यह स्वीकृति कैसे मिलती है? पहले तो वे अपने कर्तव्य के साथ गंभीर और जिम्मेदार रवैये से पेश आते हैं; दूसरे, वे एक ईमानदार इंसान बनने में सक्षम होते हैं, और वे एक व्यावहारिक और परिश्रमी रवैया रखते हैं; तीसरे, इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्हें पवित्र आत्मा का मार्गदर्शन और प्रबुद्धता प्राप्त है। ऐसे व्यक्ति को परमेश्वर का आशीष मिलता है; यह वह चीज है जो जमीर और विवेक वाला कोई व्यक्ति हासिल कर सकता है। हालाँकि उनमें भ्रष्ट स्वभाव होता है, कमियाँ और खामियाँ होती हैं, और वे बहुत-से काम करने के तरीके नहीं जानते, फिर भी वे अभ्यास के सही मार्ग पर हैं। वे अपना भेस नहीं बदलते या धोखा नहीं देते; अपने कर्तव्य के प्रति उनका एक गंभीर और जिम्मेदार रवैया होता है, सत्य के प्रति उनमें एक लालसा और श्रद्धापूर्ण रवैया होता है। मसीह-विरोधी कभी भी ये काम नहीं कर सकेंगे क्योंकि उनके सोचने का ढंग उन लोगों से हमेशा भिन्न होगा जो सत्य से प्रेम करते हैं और उसका अनुसरण करते हैं। वे अलग ढंग से क्यों सोचते हैं? इस वजह से कि उनके भीतर शैतान की प्रकृति होती है; वे शैतान के स्वभाव के अनुसार जीते हैं और हमेशा प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण करते हैं और लगातार यही चाहते हैं कि वे सत्ता हथियाने का अपना लक्ष्य प्राप्त कर लें। वे षड्यंत्रों और चालों में संलग्न होने के लिए हमेशा विभिन्न साधनों का उपयोग करने का प्रयास करते हैं, और येन केन प्रकारेण लोगों से अपनी आराधना और अपना अनुसरण करवाने के लिए उन्हें गुमराह करते हैं। इसलिए लोगों की आँखों में धूल झोंकने हेतु वे अपना भेस बदलने, चाल चलने, झूठ बोलने और धोखा देने के तमाम तरीके ढूँढ़ते हैं, जिससे दूसरे यकीन कर लें कि सभी चीजों के बारे में वे सही हैं, वे हर चीज में सक्षम हैं, और वे कोई भी काम कर सकते हैं; वे दूसरों से अधिक चतुर हैं, दूसरों से ज्यादा अक्लमंद हैं, दूसरों से ज्यादा समझते हैं, वे सभी चीजों में दूसरों से बेहतर हैं, और हर लिहाज से दूसरों से ऊपर हैं—यहाँ तक कि वे किसी भी समूह में सर्वोत्तम से भी सर्वोत्तम हैं। उनकी जरूरत ऐसी है; यह मसीह-विरोधियों का स्वभाव है। इस तरह वे कुछ ऐसा दिखना सीख लेते हैं जो वे नहीं हैं, और इन विभिन्न अभ्यासों और अभिव्यक्तियों में से हरेक को उत्पन्न करते हैं” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद आठ : वे दूसरों से केवल अपने प्रति समर्पण करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं (भाग तीन))। मसीह-विरोधी प्रकृति से धोखेबाज और दुष्ट होते हैं। अपनी प्रतिष्ठा और रुतबा कायम रखने के लिए वे कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते; मुखौटा पहन लेते हैं, झूठ बोलते हैं और दूसरों को धोखा देते हैं। मुझे एक मसीह-विरोधी का ख्याल आया जिसे हमारी कलीसिया से निष्कासित कर दिया गया था। अपने पैर जमाने और तारीफें लूटने के लिए वह समस्या सामने आने पर भी मदद नहीं माँगता था, जितना जानता था उससे ज्यादा जानने का ढोंग करता था, अपना रुतबा और छवि कायम रखने के लिए कलीसिया का काम लटकाना पसंद करता था। वह नाकामियाँ छिपाकर और सिर्फ अपनी कामयाबियाँ बताकर कई बार कलीसिया के काम का नुकसान कर चुका था, और उसने कभी पश्चात्ताप नहीं किया। इसके लिए वह आखिरकार कलीसिया से निष्कासित कर दिया गया। मैंने उसके व्यवहार की तुलना अपने व्यवहार से की : मैंने भी अपने कर्तव्य में सत्य सिद्धांत खोजने पर ध्यान नहीं दिया, परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार नहीं किया और अपना कर्तव्य व्यावहारिक तरीके से नहीं निभाया और दूसरों की तारीफ पाने के लिए हमेशा मुखौटा ओढ़े रखा। मेरे डिजाइन में साफ दिक्कत थी, लेकिन इसे संपादित करने की स्पष्ट समझ न होने के बावजूद मैंने भाई-बहनों से खोज या चर्चा नहीं की, बल्कि मैं अड़ी थी कि इसे खुद ही ठीक करूँगी। मैंने कलीसिया के कार्य पर विचार नहीं किया, और जहाँ तक अभी भी रत्तीभर भी उम्मीद थी, मैंने यह नहीं चाहा कि अपनी कमियाँ उजागर होने दूँ, मानो कलीसिया के कार्य में देरी करना कोई बड़ी बात न हो और अपनी छवि कायम रखना सबसे महत्वपूर्ण हो। जिस चीज से मेरी छवि और रुतबे को आँच आती उसे मैंने भरपूर छिपाया, भले ही यह बेहद थकाऊ और दुष्कर काम था। मुझे लगता था, अपनी तथाकथित “अच्छी छवि” खोने का मतलब अपने जीवन को ही खो बैठना है। मेरी हरकतों से मसीह-विरोधी स्वभाव दिखता था। इसका एहसास होने पर मैं डर-सी गई। संभव है, मैंने किसी मसीह-विरोधी जैसे सारे बुरे काम न किए हों, लेकिन मैं हमेशा प्रतिष्ठा, रुतबा और दूसरों की तारीफ हासिल करने में लगी रही, यहाँ तक कि छल करके दूसरों को धोखा देती रही। अगर मैंने इस स्वभाव को न बदला तो आखिरकार परमेश्वर द्वारा मुझे प्रकट कर हटा दिया जाएगा। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना कर पश्चात्ताप किया, घमंड और रुतबा त्यागने की इच्छा जताई ताकि उसके वचनों का अभ्यास कर सकूँ।
आगे चलकर जब मेरे डिजाइन में नुक्स निकलते और मैं उन्हें खुद दूर नहीं कर पाती, तो मैं तुरंत किसी से संपर्क करती और संगति में खुलकर बोलती थी, उसके सुझाव माँगती थी और ध्यान से सुनती थी। कभी-कभी मैं उसके साथ मिलकर डिजाइन तैयार करती। एक बार मुझे डिजाइन में एक और समस्या आई और काफी सोच-विचार के बाद भी मैं आगे नहीं बढ़ पाई। मेरे अगुआ ने प्रगति पूछी तो मैंने झूठा दिखावा करना चाहा, लेकिन तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से अपना रुतबा और प्रतिष्ठा कायम करने की सोचने लगी हूँ। फिर मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया : “सभी चीजों में, तुम खुद को खोलते हो और खुद पर प्रकाश डालते हो; तुम चीजों को छिपाते नहीं, भेस नहीं बदलते या चीजों को देखने से नहीं छिपाते। इसके बजाय, तुम खुद को खोलकर और खुलकर बात करते हुए भाई-बहनों के साथ संगति करते हो, जिससे वे तुम्हारे आंतरिक विचारों और सोच और तुम्हारे ईमानदार रवैये को देख पाते हैं। इस तरह, सत्य धीरे-धीरे तुममें जड़ जमाएगा, खिलेगा और फल देगा और थोड़ा-थोड़ा करके, तुम नतीजे देखोगे। तुम्हारा हृदय उत्तरोत्तर ईमानदार होता जाएगा, उत्तरोत्तर परमेश्वर की ओर आता जाएगा और तुम अपना कर्तव्य करते समय परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करना जान जाओगे और जब तुम उनकी रक्षा नहीं करोगे, तो तुम्हारी अंतरात्मा बेचैन महसूस करेगी। यह इस बात का प्रमाण होगा कि सत्य ने तुम पर प्रभाव डाला है और तुम्हारा जीवन बन गया है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों से गहरी प्रेरणा मिली। मैं जानती थी कि मुझे मुखौटे ओढ़ना बंद करना चाहिए; ईमानदारी और शांत चित्त से अपनी कमियों का सामना करना चाहिए। दूसरे लोग मेरे बारे में चाहे जो सोचें, मुझे सत्य बोलना था और दूसरों से मिलकर समाधान खोजना था। उस दिन एक सभा थी, लिहाजा मैंने संगति में अपनी कठिनाइयाँ और प्रकट हुईं भ्रष्टताएँ खुलकर सामने रखीं। यह बताकर मैं सहज हो गई। जब मैंने दूसरों के साथ हर चीज पर चर्चा की, तो उन्होंने डिजाइन को दुरुस्त करने में मेरी मदद की और जल्द ही मैंने संपादन पूरा कर लिया। मैं बेहद खुश थी! मुझे एहसास हुआ कि झूठा दिखावा न करते हुए खुलकर बोलना और ईमानदार होना सचमुच कितना अद्भुत है! परमेश्वर से उद्धार पाकर ही मैं यह एहसास कर सकी और खुद को बदल पाई। परमेश्वर का धन्यवाद!