32. दूसरों की नाकामियों से सीखा सबक
अक्तूबर 2022 में, वीडियो कार्य के दो पर्यवेक्षक बर्खास्त कर दिए गए। क्योंकि अगुआ के बार-बार काम का महत्व जताने के बावजूद उन्होंने इस काम में तत्परता नहीं दिखाई। उन्होंने बस आम काम देखे और समस्याएँ हल नहीं कीं, न ही वीडियो निर्माण में हिस्सा लिया जिससे काम रुक गया। अगुआ बहुत नाराज़ हुआ और उसने कहा कि ऐसे लोग धूर्त और गैर-जिम्मेदार होते हैं, काम से जी चुराते हैं और पर्यवेक्षक होने लायक नहीं हैं, लिहाजा उसने उन्हें तुरंत ही बर्खास्त कर दिया। यह सुनकर मुझे धक्का लगा। मुझे लगता था कि वे सामान्य रूप से कर्तव्य कर रहे थे। भले ही वे थोड़े से अकुशल, निष्क्रिय थे और बोझ नहीं उठाते थे, लेकिन यह इतनी बड़ी बात तो नहीं थी। सभी कुछ हद तक ऐसे थे। क्या इसके लिए उन्हें वाकई बर्खास्त करना चाहिए था? बाद में, अगुआ ने पूछा कि हम आमतौर पर अपना कर्तव्य कैसे करते हैं : क्या हम खुद को झोंक रहे हैं, अपना सर्वस्व दे रहे हैं और वाकई मेहनत कर रहे हैं? हम जितने कुशल और कारगर हो सकते हैं, क्या भरसक उतने जतन कर रहे हैं? ये सवाल सुनकर मैं इतनी घबरा गई कि अपना सिर उठाने की हिम्मत तक नहीं कर सकी। मैं जानती थी कि मैं इन मानकों पर खरी उतरने के करीब भी नहीं हूँ और अगुआ को उन पर्यवेक्षकों को अपने कर्तव्यों के प्रति विरत, गैर-जिम्मेदार और कोई तात्कालिकता की भावना न रखने वाले के रूप में उजागर करते और उनका गहन-विश्लेषण करते सुना तो मैं और भी घबरा गई। मुझे एहसास हुआ कि मैं भी अपना कर्तव्य इसी तरह से निभाती आ रही थी। कुछ समय पहले ही, अगुआ ने मुझे वीडियो कार्य की खोज-खबर लेने को कहा था, शुरुआत में मैंने सिद्धांतों को खोजा, उससे संबंधित कौशल का अध्ययन किया और सोचा कि काम कैसे तेजी से पूरा कराया जाए। लेकिन कुछ दिन बाद ही मैं सक्रिय रूप से विचार करने लगी : “वीडियो निर्माण का काम खासा जटिल है। मैंने अभी-अभी शुरुआत की है और काफी चीजों से वाकिफ नहीं हूँ; समस्याएँ तो रहेंगी ही। मैं जितना कर सकती हूँ, बस उतना करूँगी। बाद में अगुआ इसकी जाँच तो करेगा ही। अगर समस्याएँ हुईं भी तो वह समझ जाएगा।” लिहाजा मैं रोज तय ढर्रे पर काम करने लगी। वैसे तो मैं कहती थी कि काम जल्दी करना है लेकिन जब अगुआ ने दबाव नहीं डाला तो अनजाने ही हमारी कार्यक्षमता कम हो जाती थी। जो काम एक हफ्ते में हो सकता था, उसमें दुगना वक्त लगा। जिस सिंचन कार्य का जिम्मा मुझ पर था, मैंने उसकी खोज-खबर लेनी भी बंद कर दी। कभी-कभी मुझे अपराध बोध होता, लेकिन मुझे लगता काम में ज्यादा देरी नहीं हो रही थी, इसलिए मैंने फिक्र नहीं की। बाद में अगुआ ने मुझे एक और काम का प्रभारी बना दिया, लेकिन मेरा रवैया वैसा ही रहा। बाहर से तो मैं व्यस्त नजर आती थी, लेकिन मैं न तो तत्परता दिखाती थी, न मैंने ज्यादा असल समस्याएँ हल कीं। कभी-कभी मैं सोचती : “मेरे जिम्मे काम ज्यादा है, इसलिए मेरी व्यस्तता ज्यादा होनी चाहिए, मुझे ज्यादा चीजों की चिंता होनी चाहिए और मुझे ज्यादा दबाव भी महसूस करना चाहिए। तो मुझे ऐसा महसूस क्यों नहीं होता? दिन भर के काम के बाद भी निश्चिंत रहती हूँ।” मैंने और होशियारी से समय का उपयोग करने और दिनचर्या चुस्त करने की सोची, ताकि मेरी कार्य कुशलता बढ़ जाए और मैं ज्यादा काम करा सकूँ। लेकिन फिर सोचा, “मैं पहले ही काफी व्यस्त हूँ। खुद से इतनी उम्मीदें क्यों पालूँ?” इसलिए मैंने यह विचार त्याग दिया। उन दो सुपरवाइजरों की बर्खास्तगी तक मैंने अपने कर्तव्य की तात्कालिकता को नहीं समझा। अगुआ ने हमारे कर्तव्यों के लिए दो मानक तय कर रखे थे : हमें अपनी सीमाओं का विस्तार करना था और अपना सब कुछ झोंकना था और भरसक कार्यकुशल और नतीजे देने वाला होना था। मैं दोनों ही मानकों में फिसड्डी साबित हो रही थी। अपने कर्तव्य में मैं आमतौर पर धूर्त और बेपरवाह रहती थी। मेरे पास परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं था, परमेश्वर के लिए निष्ठा होना तो दूर की बात है। मुझे इतना डर लगा कि बता नहीं सकती। अगर अगुआ को मेरे रवैये का पता लग गया तो क्या बर्खास्तगी की बारी मेरी होगी? अगर मैंने अपने तौर-तरीके नहीं बदले तो किसी भी पल मेरा खुलासा हो सकता था। मैं प्रार्थना करने परमेश्वर के सामने आई : “हे परमेश्वर, मैं कुछ दिनों से अपने कर्तव्य में ज्यादा ही धूर्तता कर रही हूँ। डर है कि एक दिन मुझे प्रकट कर हटा दिया जाएगा। लेकिन मुझे दिल में जो ज्यादा महसूस होता है वह है, भय, व्याकुलता और मुझे अपने भ्रष्ट स्वभाव का न तो सच्चा ज्ञान है, न ही इससे कोई नफरत करती हूँ। मुझे रास्ता दिखाओ ताकि खुद को समझ सकूँ और अपनी गलत दशा बदल पाऊँ।”
बाद में मैंने सोचा, “इन सुपरवाइजरों की बर्खास्तगी ने मुझे परमेश्वर से इतना क्यों डरा दिया, मैं उससे इतनी सावधान क्यों हूँ?” मुझे लगा, इसका एक कारण तो यह है कि मैं उनकी समस्याओं के सार की असलियत नहीं जान पा रही थी। मैं सोचती थी कि उनके मसले इतने गंभीर नहीं हैं, इसलिए उनके साथ जो हुआ, मैं उसे वाकई स्वीकार नहीं सकी। मैंने इससे जुड़े परमेश्वर के वचन पढ़े। परमेश्वर के वचन कहते हैं : “परमेश्वर के सभी चुने हुए लोग अब अपने कर्तव्य निभाने का अभ्यास कर रहे हैं और लोगों के अपने कर्तव्य निर्वहन के माध्यम से परमेश्वर लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाता है और दूसरे समूह को हटा देता है। तो यह कर्तव्य निर्वहन ही है, जो हर तरह के व्यक्ति को प्रकट कर देता है, और हर तरह का कपटी, छद्म-विश्वासी और बुरा व्यक्ति अपने कर्तव्य निर्वहन में बेनकाब हो जाता है और उसे हटा दिया जाता है। जो अपने कर्तव्य समर्पित होकर निभाते हैं वे ईमानदार लोग होते हैं; निरंतर अपने कार्य में लापरवाह रहने वाले लोग धोखेबाज और धूर्त होते हैं और वे छद्म-विश्वासी होते हैं; अपने कर्तव्य निर्वहन में विघ्न-बाधाएँ पैदा करने वाले और जरा-सा भी पश्चात्ताप करने से इनकार करने वाले लोग बुरे और मसीह-विरोधी होते हैं। इस समय, कर्तव्य निभाने वाले बहुत-से लोगों में सभी तरह की समस्याएँ अभी भी मौजूद हैं। कुछ लोग अपने कर्तव्यों में हमेशा निष्क्रिय रहते हैं, हमेशा बैठे रहकर प्रतीक्षा करते हैं और दूसरों पर निर्भर रहते हैं। यह कैसा रवैया है? यह गैर-जिम्मेदारी है। परमेश्वर के घर ने तुम्हारे लिए एक कर्तव्य निभाने की व्यवस्था की है, फिर भी कई दिन बीत जाने के बाद भी तुमने कोई ठोस काम नहीं किया है। तुम कार्यस्थल में कहीं भी दिखाई नहीं देते और जब कई लोगों को समस्याएँ होती हैं जिन्हें हल करना आवश्यक होता है, तो वे तुम्हें नहीं ढूँढ़ पाते। तुमने इस कार्य को अपने कंधों पर नहीं लिया है। अगर कोई अगुआ काम के बारे में पूछता है, तो तुम उन्हें क्या बताओगे? तुम अच्छी तरह से जानते हो कि यह काम तुम्हें करना ही होगा, लेकिन तुम इसे नहीं करते। आखिर तुम सोच क्या रहे हो? क्या तुम कोई काम इसलिए नहीं करते, क्योंकि तुम उसमें सक्षम नहीं हो? या तुम सिर्फ आरामतलब हो? वास्तव में अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा क्या रवैया है? तुम केवल शब्दों और सिद्धांतों के बारे में बात करते हो और केवल कर्ण-प्रिय बातें कहते हो, लेकिन तुम कोई असल कार्य नहीं करते। यदि तुम अपना कर्तव्य नहीं निभाना चाहते, तो तुम्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। कोई वास्तविक काम न करते हुए अपने पद पर मत बने रहो। क्या यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नुकसान पहुँचाना और कलीसिया के काम में देरी करना नहीं है? तुम जिस तरह से बातें करते हो, ऐसा लगता है जैसे तुम सभी तरह के सिद्धांत समझते हो, लेकिन जब कर्तव्य निभाने के लिए कहा जाता है, तो तुम अनमने हो जाते हो, और जरा भी कर्तव्यनिष्ठ नहीं रहते। क्या यही परमेश्वर के लिए ईमानदारी से खुद को खपाना है? जब परमेश्वर की बात आती है तो तुम ईमानदार नहीं होते, फिर भी तुम ईमानदारी का दिखावा करते हो। क्या तुम उसे धोखा दे सकते हो? जिस तरह से तुम आमतौर पर बातचीत करते हो, ऐसा लगता है कि तुममें बहुत आस्था है और तुम कलीसिया के स्तंभ और उसकी चट्टान बनने की आकांक्षा रखते हो। लेकिन जब तुम कोई कर्तव्य निभाते हो, तो माचिस की तीली से भी कम उपयोगी होते हो। क्या यह बेशर्मी से परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश करना नहीं है? क्या तुम जानते हो कि तुम्हारे परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश करने का क्या परिणाम होगा? वह तुम्हें ठुकरा देगा और तुम्हें हटा देगा! अपना कर्तव्य निभाने से सभी लोग प्रकट हो जाते हैं—जब तक किसी व्यक्ति ने कोई कर्तव्य सँभाला है, यह खुलासा होने में अधिक समय नहीं लगेगा कि वह व्यक्ति ईमानदार है या कपटी, और वह सत्य से प्रेम करता है या नहीं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल एक ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई सच्चे मानव के समान जी सकता है)। परमेश्वर के वचनों ने स्पष्ट किया : जो हमेशा अपने कर्तव्य में बेपरवाह और धूर्त होते हैं और थोड़े-बहुत काम से कलीसिया में मुफ्तखोरी करके संतुष्ट रहते हैं, उनकी मानवता खराब होती है, वे प्रकृति से धूर्त और धोखेबाज होते हैं और परमेश्वर के लिए खुद को सचमुच नहीं खपाते। अंत में परमेश्वर उन सबको हटा देता है। मैंने बर्खास्त सुपरवाइजरों के बारे में दोबारा सोचा। वे इतने अहम काम के प्रभारी थे लेकिन उन्होंने सिर्फ “पर्यवेक्षक” का तमगा लिया। उनके दिल में कोई बोझ नहीं था, वे रोज अपने कर्तव्य तय ढर्रे पर करते रहे, कभी नहीं जाँचा कि उनका काम इतना बेअसर क्यों है, दूसरों को अपने कर्तव्यों में क्या समस्याएँ आ रही हैं या उन्हें काम में कैसे मार्गदर्शन देना या खोज-खबर लेनी चाहिए। दूसरे लोग याद दिलाते रहे कि वे और सक्रिय हों, समझदारी से कार्य-योजना बनाएँ, कार्यकुशलता बढ़ाएँ। ऐसा करने का उन्होंने वादा तो किया लेकिन बिल्कुल भी नहीं बदले। वे निष्क्रिय थे, काम कराने के लिए उन्हें ठेलना पड़ता था। खास तौर पर उनमें से एक अच्छा बोलती थी, प्रतिभाशाली और काबिल थी, लेकिन पर्यवेक्षक बनने के एक माह बाद भी वह न तो काम की मूल बातें सीख पाई, न ही कि कैसे टीम के सदस्यों की व्यवस्था की जाती है। वह बहुत ही अनमनी और गैर-जिम्मेदार थी। मैंने सोचा कि परमेश्वर के वचन कितनी सफाई से अगुआ के दायित्व पर संगति करते हैं, और कैसे हमारे अगुआओं ने भी अक्सर कर्तव्य करने का अर्थ और महत्व बताया था। ये सब जानकर भी वे बेपरवाह बने रहे। ये लोग न सत्य से प्यार करते थे, न उसका अनुसरण करते थे, उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल था ही नहीं। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “यदि तुम परमेश्वर के आदेशों के साथ हल्के में पेश आते हो, तो यह परमेश्वर के साथ अत्यन्त भयंकर विश्वासघात है। ऐसा करने में तुम यहूदा से भी अधिक शोचनीय हो और तुम्हें शाप दिया जाना चाहिए” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें)। पहले मैं सोचती थी, जो लोग कर्तव्य करने से इनकार कर देते या हाथ खींच लेते थे वे परमेश्वर को धोखा दे रहे थे, लेकिन परमेश्वर के वचनों से मैंने जाना कि जब कलीसिया किसी को कोई अहम काम सौंपती है, तब अगर वे आलसी, लापरवाह होकर हमेशा बेपरवाह रवैया अपनाते हुए काम का नुकसान करते हैं तो यह लापरवाही और धोखा है। उन सुपरवाइजरों को बर्खास्त करके अगुआ ने कठोरता नहीं दिखाई थी। यह तो परमेश्वर के वचनों और सिद्धांतों के अनुरूप था। मैं इसे स्वीकार नहीं पाई क्योंकि मैं लोगों और चीजों को परमेश्वर के वचनों के अनुरूप नहीं देख रही थी जिससे मैं परमेश्वर से सावधान रहने लगी। मैं बड़ी अज्ञानी थी! मुझे एहसास हुआ कि मेरा बर्ताव भी काफी कुछ उन्हीं जैसा था, इसलिए मुझे अपने कर्तव्य में आ रही समस्याओं पर फौरन चिंतन करने की जरूरत थी।
बाद में, मुझे कर्तव्य के प्रति अपनी दशा और अपने रवैये के संबंध में अभ्यास और प्रवेश के लिए परमेश्वर के वचन मिले। परमेश्वर का वचन कहता है : “यदि लोग परमेश्वर के वचन पढ़ने में अपना दिल नहीं लगाते हैं और सत्य को नहीं समझते हैं, तो वे आत्म-चिंतन नहीं करेंगे और खुद को नहीं जानेंगे। अपना कर्तव्य निभाते समय, वे केवल कुछ प्रयास करने, बुराई न करने और कोई अपराध न करने से ही संतुष्ट हो जाएँगे, इसे अपनी पूँजी मानेंगे। वे हर दिन एक भ्रमित, चकित, यांत्रिक तरीके से काम करेंगे; वे कभी भी खुद की जाँच करने में अपना दिल नहीं लगाएँगे या खुद को जानने का प्रयास नहीं करेंगे और वे सत्य सिद्धांतों की तलाश करने में भी अपना दिल नहीं लगाएँगे। वे हमेशा लापरवाह रहेंगे। यदि वे इस तरह से अपना कर्तव्य करते हैं, तो उनका प्रदर्शन कभी भी मानक स्तर का नहीं होगा। अपना कर्तव्य इस तरह से करने के लिए जो मानक स्तर का हो, व्यक्ति को पहले सत्य को समझना चाहिए और सिद्धांतों को ग्रहण करना चाहिए, फिर वे इसे अपने पूरे दिल और अपनी पूरी क्षमता से कर सकते हैं। केवल जब लोग सत्य को समझते हैं तभी उनके दिलों में प्रेरणा होती है, केवल तभी वे अपने पूरे दिल और अपनी पूरी क्षमता से काम कर सकते हैं। आज, कुछ ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपना कर्तव्य निभाने में अपना दिल लगाना शुरू कर दिया है और यह सोचना शुरू कर दिया है कि परमेश्वर के दिल को संतुष्ट करने के लिए एक सृजित प्राणी का कर्तव्य ठीक से कैसे निभाएँ। वे नकारात्मक और सुस्त नहीं हैं, वे निष्क्रिय होकर ऊपरवाले के आदेश की प्रतीक्षा नहीं करते, बल्कि थोड़ी-सी पहल करते हैं। तुम लोगों के कर्तव्य प्रदर्शन को देखते हुए, तुम पहले की तुलना में थोड़े अधिक प्रभावी हो। हालाँकि यह अभी भी मानक से नीचे है, फिर भी इसमें थोड़ा-बहुत सुधार तो हुआ है—जो कि अच्छा है। लेकिन तुम्हें यथास्थिति से संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए, तुम्हें खोजते और बढ़ते रहना चाहिए—तभी तुम अपना कर्तव्य बेहतर और एक ऐसे ढंग से निभाओगे जो मानक स्तर का हो। हालाँकि, जब कुछ लोग अपना कर्तव्य निभाते हैं, तो वे कभी भी पूरी कोशिश नहीं करते और अपना सब कुछ नहीं देते, वे केवल अपने प्रयास का 50 या 60 प्रतिशत ही देते हैं, बस काम चला लेते हैं और उसे पूरा मान लेते हैं। वे कभी भी एक सामान्य दशा बनाए नहीं रख सकते : जब उन पर नजर रखने या सहारा देने वाला कोई नहीं होता है, तो वे ढीले पड़ जाते हैं और अपनी प्रेरणा खो देते हैं; जब उनके साथ सत्य पर संगति करने वाला कोई होता है, तो वे प्रेरित हो जाते हैं, लेकिन यदि कुछ समय के लिए कोई उनके साथ सत्य पर संगति नहीं करता, तो वे निरुत्साह हो जाते हैं। वे हमेशा इस तरह आगे-पीछे होते रहते हैं—यहाँ क्या समस्या है? ऐसा तब होता है जब लोगों ने सत्य प्राप्त नहीं किया होता और वे सभी उत्साह से जीते हैं, जिसे बनाए रखना बेहद कठिन है। उन्हें हर दिन किसी न किसी से उपदेश और संगति की आवश्यकता होती है; एक बार जब उन्हें सींचने और आपूर्ति करने वाला कोई नहीं होता और उन्हें सहारा देने वाला कोई नहीं होता, तो उनके दिल फिर से ठंडे पड़ जाते हैं, वे एक बार फिर ढीले पड़ जाते हैं। जब किसी का दिल ढीला पड़ जाता है, तो वह अपने कर्तव्य में कम प्रभावी हो जाता है; यदि वह खुद को अधिक लगाता है, तो उसकी प्रभावशीलता बढ़ जाती है, उसके कर्तव्य से अधिक नतीजे मिलते हैं और वह अधिक प्राप्त करता है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर पर विश्वास करने में सबसे महत्वपूर्ण उसके वचनों का अभ्यास और अनुभव करना है)। परमेश्वर के वचनों से मैंने सीखा कि अपने मानक स्तरीय ढंग से कर्तव्य करने के लिए पहल करना जरूरी है। हमें कड़ी मेहनत करने, कष्ट सहने और कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए। साथ ही, हम जो कुछ कर सकते हैं उसमें सर्वोत्तम करें, अपना दिल झोंक दें, जिम्मेदारियाँ पूरी करें, नतीजे लाएँ और बस दूसरों को बेवकूफ न बनाएँ या आधे-अधूरे मन से न चलें। यही है कर्तव्य मानक स्तरीय ढंग से निभाना। जब अगुआ ने मुझे वीडियो कार्य का प्रभार सौंपा तो पहले मैं काम की खोज-खबर लेने में बेहतर बनना चाहती थी, मैंने हुनर और सिद्धांतों का अध्ययन किया, लेकिन कुछ समय के बाद, मुझे वीडियो कार्य बहुत कठिन लगा। मैंने शुरुआत की ही थी, सीखने के लिए बहुत कुछ था, मुझे कष्ट सहने थे और कीमत चुकानी थी, इसलिए मैं ढिलाई करने लगी और मेरा कार्यक्रम भी ढीला था। भले ही मैं रोज व्यस्त नजर आती थी, लेकिन मैं न तो कुशलता से काम कर रही थी, न ज्यादा वास्तविक कार्य कर रही थी। यहाँ तक कि मुझे खाने-पीने के बारे में सोचने की फुर्सत थी, जब भी मौका मिलता, मैं आराम करने, टहलने या कुछ मजे लेने निकल जाती। मेरे पास पर्यवेक्षक का पद था, लेकिन कर्तव्य के मामले में दूसरों से ज्यादा निठल्ली थी। जब काम में दिक्कतें आने लगीं, मैंने न सिद्धांत खोजे, न ही उन्हें समझने वाले व्यक्ति को मदद के लिए खोजा, मेरा लक्ष्य सिर्फ “ठीक-ठाक” और “थोड़ा बहुत” काम करना था और बाकी जाँच का जिम्मा अगुआ पर डाल देती थी। अपने कर्तव्य में बेपरवाह होने और वास्तविक नतीजे लाने के प्रयास न करने के कारण अगुआ को हमेशा दिक्कतें दिख जातीं और इसे सुधार के लिए वापस भेजना पड़ता, जिससे वीडियो कार्य की प्रगति धीमी हो रही थी। पूरे दिल से कर्तव्य करना तो दूर रहा, मैं पूरे प्रयास तक नहीं कर रही थी। मैं अनमने और खोटे ढंग से काम करके वास्तव में कोई कीमत नहीं चुका रही थी। अगर मैंने कुछ प्रयास किए भी तो मुझे वास्तविक नतीजे नहीं मिले। यह कर्तव्य निभाना कैसे हुआ? मैं परमेश्वर को साफ-साफ बेवकूफ बना रही थी और उसे धोखा दे रही थी। इसका एहसास होने पर मुझे बहुत अपराध बोध हुआ। कलीसिया मुझे पर्यवेक्षक के रूप में विकसित कर रही थी, इस उम्मीद से कि मैं जिम्मेदार बनकर उसका काम ठीक से कराऊँगी, लेकिन मैं तो बस आलसी बनी रही। मैं बहुत अंतरात्मा विहीन थी। मैं अपने कर्तव्य में ऐसे पेश आ रही थी, जैसे एक अविश्वासी अपने बॉस के लिए काम करता है और मेरा प्रदर्शन श्रम के मानक पर भी खरा नहीं उतरता है। मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया : “तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन के लिए परमेश्वर इस मानदंड की माँग करता है कि यह ‘मानक स्तर का’ हो। ‘मानक स्तर का’ होने का क्या मतलब है? इसका मतलब है परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करना और उसे संतुष्ट करना। तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन को परमेश्वर द्वारा मानक स्तर का कहा जाना चाहिए और इसे उसकी स्वीकृति मिलनी चाहिए। तभी यह निर्वहन मानक स्तर का होगा। यदि परमेश्वर कहता है कि यह मानक स्तर का नहीं है तो तुम चाहे जितने समय से अपना कर्तव्य निभा रहे हो या चाहे तुमने जितनी भी कीमत चुकाई हो, यह मानक स्तर का नहीं है। तो फिर नतीजा क्या होगा? यह सब श्रम की श्रेणी में रखा जाएगा। लगन वाले श्रमिकों का एक छोटा-सा वर्ग ही जीवित रह पाएगा। यदि कोई व्यक्ति श्रम करने के प्रति समर्पित नहीं है तो उसके जीवित बचने की कोई आशा नहीं है। स्पष्ट रूप से कहूँ तो वे आपदा में नष्ट हो जाएँगे” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने कर्तव्य का मानक स्तर का निर्वहन क्या है?)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे एहसास कराया कि अपने कर्तव्य में मेरा जमीर बुनियादी स्तर का भी नहीं था। इस रवैये से परमेश्वर घृणा करता है और इसने मुझे उद्धार के लायक नहीं छोड़ा। दोनों सुपरवाइजरों की बर्खास्तगी मेरे लिए एक चेतावनी थी। मैंने देखा कि जो लोग अपने कर्तव्य में अनमने और लापरवाह होते हैं वे कलीसिया में अडिग नहीं रह पाते हैं। अंत में उन्हें प्रकट किया और हटाया जाता है। भले ही मैं कलीसिया में कर्तव्य कर रही थी, इसका यह अर्थ नहीं था कि मैं इसे मानक स्तरीय ढंग से कर रही थी। अगर मैंने जल्द से जल्द अपनी दशा नहीं सुधारी तो भले ही मुझे कलीसिया न हटाए, परमेश्वर मुझे हटा देगा। इसे परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव तय करता है। यह एहसास होने पर मैंने प्रार्थना की : “हे परमेश्वर, अपने कर्तव्य में मैं सच्ची कीमत अदा नहीं कर रही हूँ, मैं इतनी बेपरवाह हूँ, मुझे बहुत पछतावा है। अब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मेरी दशा कितनी खतरनाक है, मैं अपने कर्तव्य में अब और ऐसा रवैया नहीं रख सकती हूँ। मैं पश्चात्ताप करके भरसक अच्छे ढंग से अपना कर्तव्य निभाना चाहती हूँ।”
इसके बाद मैंने सोचा, “मैं जानती हूँ कि मेरी जिम्मेदारियाँ कितनी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मैं अक्सर आलसी होने से बच नहीं पाती, अपने कर्तव्य में कीमत नहीं चुकाना चाहती। इसका कारण क्या है?” मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “जो लोग अत्यधिक आलसी होते हैं, वे किस प्रकार की अभिव्यक्तियाँ और विशेषताएँ प्रदर्शित करते हैं? पहले, वे जो कुछ भी करते हैं, बेमन से करते हैं, उसे जैसे-तैसे निपटाते हैं, धीमी गति से चलते हैं, आराम फरमाते हैं और जब भी संभव होता है उसे टाल देते हैं। दूसरे, वे कलीसिया के कार्य पर ध्यान नहीं देते। उनके विचार से, जो कोई इस काम के बारे में चिंता करना पसंद करता है, कर सकता है। वे नहीं करेंगे। अगर वे खुद किसी काम के बारे में चिंता करते भी हैं, तो यह उनकी अपनी शोहरत, लाभ और रुतबे के लिए होता है—उनके लिए बस यही मायने रखता है कि वे रुतबे के लाभ उठा पाएँ। तीसरे, वे अपने काम में कठिनाई से दूर भागते हैं; यह स्वीकार नहीं कर सकते कि उनका कार्य थोड़ा भी थकाने वाला हो; ऐसा होने पर वे बहुत नाराज हो जाते हैं और कठिनाई सहने या कीमत चुकाने को तैयार नहीं होते। चौथे, वे जो भी कार्य करते हैं उसमें जुटे रहने में असमर्थ होते हैं, उसे हमेशा आधे में ही छोड़ देते हैं और पूरा नहीं कर पाते। अगर वे अस्थायी रूप से अच्छी मनःस्थिति में हैं तो मौज-मजे के लिए कुछ काम कर सकते हैं, लेकिन अगर किसी चीज के लिए दीर्घकालिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता हो और वह उन्हें व्यस्त रखती हो, उसमें बहुत ज्यादा सोचने-विचारने की जरूरत हो और वह उनकी देह थका देती हो तो समय बीतने के साथ वे बड़बड़ाना शुरू कर देते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ अगुआ कलीसियाई कार्य के प्रभारी होते हैं और उन्हें पहले-पहल यह नया और ताजा लगता है। वे सत्य की अपनी संगति में बहुत अभिप्रेरित होते हैं और जब वे देखते हैं कि भाई-बहनों को समस्याएँ हैं तो वे उनकी मदद कर उनका समाधान करने में सक्षम रहते हैं। लेकिन कुछ समय तक लगे रहने के बाद उन्हें अगुआई का काम बहुत थकाऊ लगता है और वे नकारात्मक हो जाते हैं—वे इसके बदले कोई आसान काम पकड़ लेना चाहते हैं और कठिनाई सहने को तैयार नहीं होते। ऐसे लोगों में लगन की कमी होती है। पाँचवें, एक और विशेषता जो आलसी लोगों को अलग करती है, वह है वास्तविक कार्य करने की उनकी अनिच्छा। जैसे ही उनकी देह को कष्ट होता है, वे अपने काम से बचने और भागने के बहाने बनाते हैं और वह काम किसी और को सौंप देते हैं। लेकिन जब वह व्यक्ति काम पूरा कर देता है तो वे बेशर्मी से पुरस्कार खुद बटोर लेते हैं। आलसी लोगों की ये पाँच प्रमुख विशेषताएँ हैं। तुम लोगों को यह जाँच करनी चाहिए कि क्या कलीसियाओं में अगुआओं और कार्यकर्ताओं के बीच ऐसे आलसी लोग हैं। अगर तुम्हें कोई मिले तो उसे तुरंत बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए। क्या आलसी लोग अगुआओं के रूप में अच्छा काम कर सकते हैं? चाहे उनमें किसी भी प्रकार की काबिलियत हो या उनकी मानवता की गुणवत्ता कैसी भी हो, अगर वे आलसी हैं तो वे अपना काम ठीक से नहीं कर पाएँगे और वे काम और महत्वपूर्ण मामलों में देरी करेंगे। कलीसिया का कार्य बहुआयामी होता है; इसके हर पहलू में कई विस्तृत काम शामिल होते हैं और समस्याएँ हल करने के लिए सत्य के बारे में संगति करने की आवश्यकता होती है, ताकि उसे अच्छी तरह से किया जा सके। इसलिए अगुआओं और कार्यकर्ताओं को कर्मठ होना चाहिए—काम की प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए उन्हें हर दिन ढेर सारी संगति करनी पड़ती है और ढेर सारा कार्य करना पड़ता है। अगर वे बहुत कम संगति करें या बहुत कम कार्य करें तो कोई परिणाम नहीं निकलेगा। इसलिए अगर कोई अगुआ या कार्यकर्ता आलसी व्यक्ति है तो वह निश्चित रूप से नकली अगुआ है और वास्तविक कार्य करने में अक्षम है। आलसी लोग वास्तविक कार्य नहीं करते, खुद कार्य-स्थलों पर जाना तो दूर की बात है और वे समस्याएँ हल करने या किसी विशिष्ट कार्य में स्वयं को संलग्न करने के इच्छुक नहीं होते। उन्हें किसी भी कार्य में आने वाली समस्याओं की जरा भी समझ या पकड़ नहीं होती। उन्हें दूसरों की बातें सुनकर, जो चल रहा है उसका केवल सतही और अस्पष्ट अंदाजा होता है और वे थोड़े-से धर्म-सिद्धांत का उपदेश देकर जैसे-तैसे काम निपटाते हैं। क्या तुम लोग इस तरह के अगुआ का भेद पहचानने में सक्षम हो? क्या तुम यह भेद पहचानने में सक्षम हो कि वह नकली अगुआ है? (एक हद तक।) आलसी लोग जो कोई भी कर्तव्य निभाते हैं उसमें लापरवाह होते हैं। कर्तव्य चाहे कोई भी हो, उनमें लगन नहीं होती, वे रुक-रुककर काम करते हैं और जब भी उन्हें कोई कष्ट होता है तो वे अंतहीन शिकायतें करते जाते हैं। जो भी उनकी आलोचना या काट-छाँट करता है, वे उसे अपशब्द कहते हैं जैसे कोई कर्कशा सड़कों पर लोगों का अपमान कर रही हो, हमेशा दूसरों पर अपना गुस्सा निकालना चाहते हैं और अपना कर्तव्य नहीं निभाना चाहते हैं। उनके अपना कर्तव्य न निभाना चाहने से क्या पता चलता है? इससे पता चलता है कि वे बोझ नहीं उठाते, जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं होते और वे आलसी लोग हैं। वे कष्ट सहना या कीमत चुकाना नहीं चाहते। यह बात खासकर अगुआओं और कार्यकर्ताओं पर लागू होती है : अगर अगुआ और कार्यकर्ता बोझ नहीं उठाते तो क्या वे अगुआओं या कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ पूरी कर सकते हैं? बिल्कुल भी नहीं” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (4))। परमेश्वर के वचनों पर सोच-विचार के बाद मुझे समझ आया कि मैं कर्तव्य में दृढ़ क्यों नहीं थी और थोड़ा-सा उत्साह दिखाने के बाद मैं कीमत नहीं चुकाना चाहती थी। इसका मुख्य कारण था मेरा अत्यधिक आलस्य और देह के आराम की तलब। मैंने अपने काम में दक्षता लाने का प्रयास नहीं किया। अगुआ अगर दबाव न डाले और काट-छाँट न करे तो मैं काम तत्परता से नहीं करती। खास तौर पर, जब काम में मुझे कोई समस्याएँ होतीं तो मैं उन पर दिमागी मेहनत करने की इच्छुक नहीं थी, हमेशा यह बहाना बनाते हुए खुद को खुश रखती कि अभी तो मैंने काम शुरू ही किया है और समस्याएँ अगुआ के पास सरका देती थी। मैं मन में सोचा करती थी, “जब तक हम जिंदा हैं, तब तक मौज-मस्ती से जिएँ। काम चाहे जितना जरूरी हो, अपने साथ बुरा बर्ताव न करो, न अपने पर बोझ लादो। मैं जब तक हटाई नहीं जाती, थोड़ा-बहुत प्रयास और काम करके ठीक हूँ।” मैंने कभी प्रगति करनी नहीं चाही, लिहाजा मुझमें धीमी गति से सुधार हुआ। मैंने भाई-बहनों के बारे में सोचा : इनमें से कुछ काम पूरा करने में काफी समय और मेहनत झोंकते हैं, हमेशा कर्तव्यों पर ध्यान देते हैं। अपना काम पूरा करने के बाद भी वे सोचते रहते थे कि इसमें कोई विचलन या समस्या तो नहीं रह गई और इसे कैसे सुधार सकते हैं। वे बस यही सोचते थे कि अपने कर्तव्य कैसे ठीक से निभाएँ। वे अच्छे से काम करते थे, उनमें मानवता थी और अपने कर्तव्य के प्रति वफादार भी थे। उन्हें अपने काम में आसानी से पवित्र आत्मा का मार्गदर्शन मिला और समय के साथ उन्होंने सुधार किया और उपलब्धियाँ पाईं। लेकिन, मुझे कलीसिया ने वीडियो कार्य का जिम्मा सौंपा, पर मुझमें कोई अंतरात्मा नहीं थी, मेरे अनुसरण के परिप्रेक्ष्य जानवरों जैसे थे। जब मुझे फुर्सत मिलती, मैं देह की इच्छाओं के बारे में सोचती, कर्तव्य के बारे में नहीं। ओहदा तो था, पर मैं असल काम नहीं करती थी, जो हमें न सिर्फ अच्छे नतीजे पाने से रोक रहा था, बल्कि काम भी लटक गया। मैं इतनी स्वार्थी और घृणित थी! अगर मेरा यही रवैया रहता तो मैं कोई भी काम सँभालने लायक नहीं रहती, मुझे कुछ भी हासिल नहीं होता, परमेश्वर मुझे जरूर हटा देता। मैं प्रार्थना करने परमेश्वर के सामने गई : “हे परमेश्वर, मेरी यह नीच प्रकृति बहुत गंभीर है। मैं ऐसे अहम काम को लेकर भी गैर-जिम्मेदार और धूर्त बनी हुई हूँ, मेरे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बिल्कुल नहीं था। पहले मैं जानती थी कि यह नीचता बहुत गंभीर है, लेकिन मैंने सच्चे मन से इसका तिरस्कार नहीं किया। अब मैं यह जानती हूँ। परमेश्वर, मैं बदलना चाहती हूँ। अपना रवैया और विचार बदलकर उचित ढंग से कर्तव्य निभाना चाहती हूँ। भ्रष्ट स्वभाव दूर करने और थोड़ा-बहुत मनुष्यों के समान जीने की मुझे राह दिखाओ।”
फिर मुझे परमेश्वर के वचनों का एक और अंश याद आया : “अपना कर्तव्य करते समय तुम्हें कम से कम साफ जमीर वाला व्यक्ति होना चाहिए, और तुम्हें कम से कम दिन में तीन बार भोजन करने के लायक होना चाहिए और मुफ्तखोर नहीं होना चाहिए। इसे जिम्मेदारी की भावना होना कहते हैं। चाहे तुम्हारी काबिलियत ज्यादा हो या कम और चाहे तुम सत्य समझते हो या नहीं, जो भी हो, तुम्हारा यह रवैया होना चाहिए : ‘चूँकि यह कार्य मुझे करने के लिए दिया गया था, इसलिए मुझे इसे गंभीरता से लेना चाहिए; मुझे इसे दिल से लेना चाहिए और इसे अच्छी तरह से करने के लिए अपना पूरा दिल और ताकत लगा देनी चाहिए। रही यह बात कि मैं इसे पूर्णतया अच्छी तरह से कर सकता हूँ या नहीं, तो मैं कोई गारंटी देने की कल्पना तो नहीं कर सकता, लेकिन मेरा रवैया यह है कि मैं इसे अच्छी तरह से करने के लिए अपना भरसक प्रयास करूँगा, और मैं यकीनन इसके बारे में लापरवाह नहीं होऊँगा। अगर काम में कोई समस्या आती है, तो मुझे जिम्मेदारी लेनी चाहिए, और सुनिश्चित करना चाहिए कि मैं इससे सबक सीखूँ और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करूँ।’ यह सही रवैया है। क्या तुम लोगों का रवैया ऐसा है? कुछ लोग कहते हैं, ‘जरूरी नहीं कि जो काम मुझे सौंपा गया है, उसे मैं अच्छी तरह से करूँ। मैं वही करूँगा, जो मैं कर सकता हूँ और अंतिम उत्पाद वही होगा, जो होना होगा। मुझे खुद को इतना थकाने या कोई गलती करने पर चिंता से बिखर जाने की जरूरत नहीं है और मुझे इतना तनाव लेने की जरूरत नहीं है। खुद को इतना थका देने में क्या रखा है? आखिरकार, मैं निरंतर काम कर रहा हूँ और मुफ्तखोरी नहीं कर रहा।’ अपने कर्तव्य के प्रति इस तरह का रवैया गैर-जिम्मेदाराना है। ‘अगर मेरा काम करने का मन होगा, तो मैं कुछ काम कर दूँगा। मैं सिर्फ वही करूँगा, जो मैं कर सकता हूँ और अंतिम उत्पाद वही होगा, जो होना होगा। इसे इतनी गंभीरता से लेने की कोई जरूरत नहीं है।’ ऐसे लोगों का अपने कर्तव्य के प्रति जिम्मेदाराना रवैया नहीं होता और उनमें जिम्मेदारी की भावना का अभाव होता है। तुम लोग किस तरह के व्यक्ति हो? अगर तुम पहली तरह के व्यक्ति हो, तो तुम विवेक और मानवता वाले व्यक्ति हो। अगर तुम दूसरी तरह के व्यक्ति हो, तो तुम लोग उस तरह के नकली अगुआओं से अलग नहीं हो, जिनका मैंने अभी-अभी गहन-विश्लेषण किया है। तुम बस आराम और मौजमस्ती करके अपने दिन बिताए जा रहे हो। ‘मैं थकान और कठिनाई से बचूँगा और बस ज्यादा आनंद लूँगा। भले ही एक दिन मुझे बर्खास्त कर दिया जाए, तो भी मेरा कोई नुकसान न होगा। मैंने कम-से-कम कुछ दिनों के लिए रुतबे के फायदे तो उठा लिए होंगे, यह मेरे लिए घाटे का सौदा नहीं होगा। अगर मुझे अगुआ के रूप में चुना गया, तो मैं इसी तरह कार्य करूँगा।’ इस किस्म के व्यक्ति की मानसिकता के बारे में तुम क्या सोचते हो? ऐसे लोग छद्म-विश्वासी होते हैं जो सत्य का जरा सा भी अनुसरण नहीं करते हैं। अगर तुममें सही मायने में जिम्मेदारी की भावना है, तो इससे पता चलता है कि तुम्हारे पास जमीर और विवेक है। काम चाहे कितना भी बड़ा या छोटा हो, चाहे तुम्हें वह कार्य कोई भी सौंपे, चाहे परमेश्वर का घर तुम्हें वह कार्य सौंपे या कलीसिया का अगुआ या कार्यकर्ता उसे तुम्हें सौंपे, तुम्हारा यह रवैया होना चाहिए : ‘चूँकि यह कर्तव्य मुझे सौंपा गया है, इसलिए यह परमेश्वर द्वारा ऊँचा उठाया जाना और अनुग्रह है। मुझे इसे सत्य सिद्धांतों के अनुसार अच्छी तरह से करना चाहिए। औसत काबिलियत होने के बावजूद मैं यह जिम्मेदारी लेने और इसे अच्छी तरह से निभाने के लिए अपना सब कुछ झोंकने को तैयार हूँ। अगर मैंने खराब काम किया, तो मुझे उसके लिए जिम्मेदार होना चाहिए और अगर मैंने अच्छा काम किया, तो वह मेरे लिए श्रेय की बात नहीं होगी। मुझे यही करना चाहिए।’ मैं यह क्यों कहता हूँ कि व्यक्ति अपने कर्तव्य को कैसे लेता है, यह सिद्धांत का मामला है? अगर तुममें वास्तव में जिम्मेदारी की भावना है और तुम एक जिम्मेदार व्यक्ति हो, तो तुम कलीसिया के कार्य की जिम्मेदारी उठा सकोगे और वह कर्तव्य पूरा कर सकोगे, जो तुम्हें करना चाहिए। अगर तुम अपना कर्तव्य हल्के में लेते हो, तो परमेश्वर में विश्वास के बारे में तुम्हारा दृष्टिकोण गलत है, और परमेश्वर और अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा रवैया समस्यात्मक है” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (8))। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा कि जिम्मेदार लोग कर्मठता से काम करते हैं। काम चाहे पसंद आए या नहीं, वे इसमें पारंगत हों या नहीं, चाहे जितने भी काबिल हों, काम को लेकर उनका ईमानदार रवैया होता है और इसे ठीक से पूरा करने के लिए वे मन लगाकर अपना सर्वोत्तम देते हैं। ये लोग जुबान के पक्के और भरोसेमंद होते हैं और परमेश्वर की स्वीकृति पा सकते हैं। इसके उलट, अगर कोई व्यक्ति कोई कर्तव्य करने की हामी भरता है, लेकिन केवल सतही काम ही करता है, वास्तविक कार्य नहीं करता, नतीजे लाने या दक्षता पाने की कोशिश नहीं करता तो फिर वह इस दुनिया के लफंगों और कामचोरों जैसा ही है। ऐसे लोग भरोसे और विश्वास के लायक नहीं होते हैं। मैं अपना कर्तव्य इसी तरह निभा रही थी। मैंने हमेशा देह की सोची और शायद ही कभी सत्य का अभ्यास किया। मेरा मनुष्यों की भाँति जीना निरंतर कम होता जा रहा था। मुझे कर्तव्य को लेकर अपना रवैया ठीक करना था। मेरी कार्यक्षमताएँ चाहे जो भी हों, कलीसिया ने मुझे यह काम सौंपा था, इसलिए इसे अच्छे से करने के लिए मुझे भरसक कठोर प्रयास करना था और इसमें अपनी सारी ताकत झोंकनी थी। अब अपना कर्तव्य निभाने का अहम समय है। अगर मैं अपना सर्वोत्तम काम न करूँ, ज्यादा प्रयास करने के लिए परमेश्वर का कार्य खत्म होने का इंतजार करती रहूँ तो फिर पश्चात्ताप के लिए बहुत देर हो जाएगी। यह सोचने के बाद मैंने अपनी दिनचर्या दोबारा तय की, ताकि अधिक से अधिक काम कर सकूँ। जब मुझे आलस घेरने लगता, मैं परमेश्वर से प्रार्थना करती और उसके वचनों के बारे में सोचती, जिससे मैं चौकस हुई और अपने देह के खिलाफ विद्रोह कर सकी। काम से पहले मैं प्रार्थना करती कि परमेश्वर मेरे हृदय की पड़ताल करता रहे, ताकि मैं आधे-अधूरे प्रयास करने के बजाय अच्छा काम करूँ। इस तरह अभ्यास करने से मैं अधिक सहज महसूस करती हूँ।
भले ही मैं अपना काम उचित ढंग से करना चाहती थी, लेकिन कभी-कभी कमी रह जाती थी। जैसे एक दिन मैं सिंचन कार्य की जाँच कर रही थी : एक नए सदस्य की अभी भी कई धार्मिक धारणाएँ दूर नहीं हुई थीं, जिसके लिए सिंचनकर्ता ने मुझसे मदद माँगी। पहले-पहल, मैंने भरसक मदद की कोशिश करनी चाही, कामयाबी की परवाह नहीं की। लेकिन जब मैंने नए सदस्य से बात की तो कुछ समस्याओं की आधी-अधूरी जानकारी होने से मैं स्पष्ट संगति नहीं कर सकी। मैं यह सोचने से खुद को रोक नहीं सकी : “मेरी सत्य की समझ उथली है; मैं बस इतना ही हासिल कर सकती हूँ। अगुआ इसकी खोज-खबर लेंगे ही। मैं इन समस्याओं का समाधान उसे ही करने दूँगी।” लेकिन अगुआ व्यस्त था और आ नहीं सका, इसलिए समाधान का जिम्मा हम पर आ गया। मैं जानती थी कि इस स्थिति के पीछे परमेश्वर का इरादा है। मैं आसान और सीधे-सपाट कर्तव्य चुना करती थी और कड़ी मेहनत और पूरा प्रयास नहीं करती थी। इस बार मैं देह के बारे में सोचने या आराम में लिप्त रहने की नहीं सोच सकती। मुझे भरसक काम करना होगा, चाहे जितनी कामयाबी मिले। फिर, मैंने और मेरी सहयोगी बहन ने संगति के लिए सिंचनकर्ता को खोजा और हमने नवागंतुक की धार्मिक धारणाओं के संबंध में परमेश्वर के वचन और सुसमाचारों के वीडियो खोजे। कुछ चर्चा के बाद हम सब सत्य के इस पहलू को स्पष्ट समझ गए और अंत में नए सदस्य की समस्याएँ हल हो गईं। यह अनुभव करने के बाद मुझे समझ आ गया कि कुछ चीजें मुश्किल लग सकती हैं, लेकिन परमेश्वर पर भरोसा रखूँ, वाकई कीमत चुकाऊँ तो मैं भी अच्छे नतीजे हासिल कर सकती हूँ। अगर मैं कड़ी मेहनत करूँ और फिर भी कमी रह जाए तो कम से कम मेरी अंतरात्मा तो साफ रहेगी।
अपने आसपास के कुछ भाई-बहनों की नाकामियाँ देखकर मैंने कुछ सबक सीखे हैं, कर्तव्य को लेकर अपने रवैये के बारे में आत्म-चिंतन किया और देखा है कि इसे मानक स्तरीय ढंग से अंजाम देने से मैं कितनी दूर हूँ। मैंने देखा है कि मेरी नीच प्रकृति की पैठ कितनी गहरी है। यद्यपि मुझे पछतावा है, लेकिन अब भी मैं परमेश्वर की अपेक्षाओं से काफी दूर हूँ। अब से मुझे परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकारनी होगी और मानक स्तरीय ढंग से अपना कर्तव्य निभाने का प्रयास करना होगा!