73. स्कूल और कर्तव्य में से एक का चयन

लू यांग, चीन

जहाँ तक मुझे याद है, मेरे माँ-बाप में कभी नहीं पटी। वे आए दिन झगड़ते रहते, कभी-कभी तो पिता मेरी माँ को पीट भी देते। तलाक लेने के बजाय मेरी माँ हम दोनों बच्चों के लिए सालों तक सब कुछ सहती रही। उन्होंने अपना आधा जीवन मुझे और मेरे भाई को पालने में खपा दिया, इसलिए मुझे लगता था कि हमारे लिए उनका प्रेम वाकई महान है और बड़े होकर मुझे उनके प्रति कर्तव्यनिष्ठ होना था। बाद में मेरी माँ ने परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकारा और फिर मुझे और मेरे छोटे भाई को सुसमाचार सुनाया। हम अक्सर इकट्ठे नाच-गाकर परमेश्वर की स्तुति करते तो मैं बहुत खुश होती। लेकिन माँ ने सत्य का अनुसरण ज्यादा नहीं किया, सभाओं में आना और परमेश्वर के वचन पढ़ना कम कर दिया। कुछ साल बाद मेरे माता-पिता ने आखिरकार तलाक ले लिया। मुझे इस बात ने दुखी कर दिया कि लगभग पचास वर्ष की होने जा रही मेरी माँ का जीवन अच्छा नहीं था। मैंने खुद से वादा किया कि मेहनत से पढ़ूँगी, अच्छी-सी नौकरी करूँगी, माँ के लिए घर खरीदूँगी और उन्हें बाकी जिंदगी अधिक खुश होकर जीने दूँगी। मुझे लगता था कि यही वह संतानोचित कर्तव्य है जो मुझे निभाना चाहिए। इसके बाद मैंने सभाओं में जाना और परमेश्वर के वचन पढ़ना बहुत कम कर दिया ताकि ध्यान पढ़ाई पर लगा सकूँ। मैंने अपना सारा समय और सारी ऊर्जा स्कूली कार्य को समर्पित कर दिया।

सितंबर 2019 में मैंने दूसरे प्रांत के वोकेशनल कॉलेज में दाखिला ले लिया। मैं रोज कड़ी मेहनत से पढ़ती, यूनिवर्सिटी और ग्रेजुएट स्कूल जाने के ख्वाब देखती, ताकि अपनी माँ की जिंदगी बेहतर बना सकूँ। लेकिन कैंपस की जिंदगी ने मुझे बहुत निराश कर दिया। चापलूसी में उस्ताद छात्रों पर अध्यापक बहुत मेहरबान रहते, इसलिए उन्हें परीक्षाओं में हमेशा ज्यादा अंक मिलते, लेकिन जो सचमुच योग्य थे मगर चापलूसी नहीं करते थे उन्हें उतने अच्छे अंक नहीं मिलते थे। जिन छात्रों को देखकर लगता कि इनमें खूब पटती होगी, जो साथ-साथ हँसते-मुस्कराते बातें करते, वे पीठ पीछे बिल्कुल बदल जाते, एक दूसरे की बुराई करते। कुछ तो बिना किसी शर्म के खुलेआम किसी और की रखैल बन जातीं। कैंपस की ऐसी जिंदगी ने मुझे वाकई उदास कर दिया और वहाँ एक दिन काटना भी मुश्किल हो गया, लेकिन जब मैं माँ से किए वादे के बारे में सोचती कि मेहनत से पढ़कर नाम कमाऊँगी, उनका सिर नहीं झुकने दूँगी, तो वहीं रहने के सिवाय मेरे पास दूसरा चारा नहीं बचता।

जब सर्दियों की छुट्टी में मैं घर लौटी, तो मेरी आंटी ने परमेश्वर के वचनों पर मेरे साथ संगति की और एक वीडियो दिखाया “वह जिसका हर चीज पर प्रभुत्व है।” इसने मुझे पूरी तरह झकझोर दिया! इसने मुझे परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और संप्रभुता दिखाई, कि वह मानवजाति की किस्मत पर संप्रभु है और उसने हमेशा मानवजाति को विकास की राह दिखाई है। मैंने बढ़ती आपदाओं और वैश्विक महामारी के बारे में सोचा और यह भी कि कैसे परमेश्वर का कार्य समापन की ओर है, लेकिन चूँकि मैं पढ़ाई कर रही थी, ज्ञान पा रही थी, मैं कोई कर्तव्य नहीं निभा रही थी, कलीसिया जिंदगी में भी भाग नहीं ले पा रही थी। अंत में, मुझे सत्य हासिल नहीं होगा और आपदा में नष्ट होकर मुझे सजा मिलेगी। परमेश्वर के वचनों पर आंटी की संगति ने मेरी मदद की, मुझे सहारा दिया और मेरे दिल को सुकून पहुँचाया। मैं समझ गई कि परमेश्वर हमेशा मेरे साथ रहा है और मैंने कलीसिया में और अधिक सभाओं में जाकर कर्तव्य निभाना चाहा।

एक दिन अपनी आध्यात्मिक भक्ति में मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जिस क्षण तुम रोते हुए इस दुनिया में आते हो उसी पल से तुम अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना शुरू कर देते हो। परमेश्वर की योजना और उसके विधान की खातिर तुम अपनी भूमिका निभाते हो और अपनी जीवन यात्रा शुरू करते हो। तुम्हारी पृष्ठभूमि जो भी हो और तुम्हारी आगे की यात्रा जैसी भी हो, किसी भी स्थिति में कोई भी स्वर्ग के आयोजनों और व्यवस्थाओं से बच नहीं सकता और कोई भी अपनी नियति को नियंत्रित नहीं कर सकता, क्योंकि जो सभी चीजों का संप्रभु है सिर्फ वही ऐसा करने में सक्षम है। मनुष्य के अस्तित्व में आने की शुरुआत से ही परमेश्वर अपने कार्य को हमेशा से इसी ढंग से करता आ रहा है, ब्रह्मांड को सँभाल रहा है और सभी चीजों के लिए परिवर्तन के नियमों और उनकी गतिविधियों के पथ को संचालित कर रहा है। सभी चीजों की तरह मनुष्य भी चुपचाप और अनजाने में परमेश्वर से मिठास, बारिश और ओस से पोषित हो रहा है; सभी चीजों की तरह मनुष्य भी अनजाने में परमेश्वर के हाथ के आयोजन के अधीन रहता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है)। “जिन मनुष्यों की परमेश्वर दिन-रात निगरानी करता है उनमें से एक भी व्यक्ति उसकी आराधना करने की पहल नहीं करता है। परमेश्वर बस अपनी बनाई योजना के अनुसार उस मनुष्य पर कार्य करता है जिससे कोई अपेक्षा नहीं है। वह ऐसा इस आशा में करता है कि एक दिन मनुष्य अपने सपने से जागेगा और अचानक जीवन के मूल्य और अर्थ को समझेगा, परमेश्वर ने उसे जो कुछ दिया है, उसके लिए परमेश्वर द्वारा चुकाई गई कीमत और परमेश्वर की उस उत्सुकता को समझेगा जिसके साथ परमेश्वर मनुष्य के वापस अपनी ओर मुड़ने के लिए बेसब्री से लालायित रहता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है)। परमेश्वर के वचनों पर विचारकर मैंने बहुत भाव-विह्वल महसूस किया। याद आया कि मैंने बचपन में कैसे माँ के साथ परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकारा था, लेकिन अपनी पढ़ाई के कारण मैंने सभाओं में जाना और परमेश्वर के वचन पढ़ना बंद कर दिया, मैं परमेश्वर से अधिकाधिक दूर होती चली गई। जब मैं यह सोच रही थी कि मेरा जीवन यूँ ही चलता रहेगा, ठीक तभी अचानक परमेश्वर के वचन सुनाने और सुसमाचार का वीडियो दिखाने के लिए मेरी आंटी मुझसे मिली। मैं स्पष्ट रूप से समझ गई कि इसका आयोजन परमेश्वर द्वारा किया गया है। मेरी किस्मत हमेशा परमेश्वर के हाथ में रही है और मैं उसके शासन और पूर्व-निर्धारण के तहत जी रही हूँ। भले ही मैं बीच में परमेश्वर से दूर हो गई, लेकिन उसने मेरी आत्मा को जगाने और मुझे वापस अपने घर में लाने के लिए लोगों और परिस्थितियों का आयोजन किया। मैंने परमेश्वर का प्रेम देखा और उसकी सुरक्षा देखी। मैंने एक बार फिर परमेश्वर के वचन सुने और मैं दोबारा उसके खिलाफ विद्रोह नहीं कर सकती थी या उसे आहत नहीं कर सकती थी। मैं सचमुच परमेश्वर पर विश्वास करना और सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना चाहती थी।

इस दौरान मैं हमेशा सोचती थी, “जीवन का सच्चा मूल्य और अर्थ क्या है? क्या यह वाकई डिग्री-डिप्लोमा के पीछे भागना हो सकता है?” इस सवाल पर विचार करते हुए मैंने परमेश्वर के वचनों को याद किया : “जब कोई प्रसिद्धि और लाभ की दलदल में फँस जाता है तो फिर वह कभी उसे नहीं खोजता जो उजला है, जो न्यायोचित है या वे चीजें नहीं खोजता जो खूबसूरत और अच्छी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों के लिए प्रसिद्धि और लाभ का प्रलोभन बहुत बड़ा होता है और ये ऐसी चीजें हैं जिनका अनुसरण लोग अंतहीन ढंग से अपने पूरे जीवन भर और यहाँ तक कि अनंत काल तक कर सकते हैं। क्या यह असली स्थिति नहीं है? कुछ लोग कहेंगे कि ज्ञान अर्जित करना पुस्तकें पढ़ने और कुछ ऐसी चीजें सीखने से अधिक कुछ नहीं है जिन्हें तुम पहले से नहीं जानते हो, ताकि समय से पीछे न रह जाओ या संसार द्वारा पीछे न छोड़ दिए जाओ। ज्ञान का अर्जन केवल आजीविका जुटाने के लिए, अपने भविष्य के लिए या बुनियादी आवश्यकताएँ मुहैया कराने के लिए किया जाता है। क्या कोई ऐसा व्यक्ति है, जो मात्र मूलभूत आवश्यकताओं के लिए और मात्र भोजन का मसला हल करने के लिए एक दशक तक कठिन परिश्रम से अध्ययन करेगा? नहीं, ऐसा कोई नहीं है। तो फिर व्‍यक्ति इन सारे वर्षों तक ये कठिनाइयाँ क्‍यों सहन करता है? प्रसिद्धि और लाभ के लिए। प्रसिद्धि और लाभ आगे उसका इंतजार कर रहे हैं, उसे इशारे से बुला रहे हैं, और वह मानता है कि केवल अपने परिश्रम, कठिनाइयों और संघर्ष के माध्यम से ही वह उस मार्ग पर कदम बढ़ा सकता है जो प्रसिद्धि और लाभ की ओर ले जाएगा, जिससे उसे ये चीजें प्राप्त होंगी। ऐसे व्यक्ति को अपने भविष्य के पथ के लिए, अपने भविष्य के आनंद के लिए और एक बेहतर जिंदगी प्राप्त करने के लिए ये कठिनाइयाँ सहनी ही होंगी। भला यह ज्ञान क्या है—क्या तुम लोग मुझे बता सकते हो? क्या यह जीवन जीने के वे नियम और फलसफे नहीं हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर डालता है, जैसे ‘पार्टी से प्यार करो, देश से प्यार करो, और अपने धर्म से प्यार करो’ और ‘बुद्धिमान इंसान हालात के अनुसार अपना रुख बदलता है’? क्या ये जीवन की ‘ऊँची आकांक्षाएँ’ नहीं हैं, जिन्हें शैतान द्वारा मनुष्य के भीतर डाला गया है? जैसे, महान लोगों की सोच, प्रसिद्ध लोगों की ईमानदारी या वीर शख्सियतों की बहादुरी की भावना या मार्शल आर्ट से जुड़े उपन्यासों में शूरवीरों और तलवारबाजों का शौर्य और उदारता? ये विचार और कथन पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों को प्रभावित करते हैं; बहुत-से लोग इन विचारों को स्वीकार करते हैं, और वे इन ‘ऊँची आकांक्षाओं’ को पूरा करने के लिए उनके पीछे भागते हैं, संघर्ष करते हैं और यहाँ तक कि अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार रहते हैं। यह वह साधन और तरीका है जिसके द्वारा शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है। तो जब शैतान लोगों को इस मार्ग पर ले जाता है, तो क्या वे परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसकी आराधना कर पाते हैं? और क्या वे परमेश्वर के वचन स्वीकार कर पाते हैं और सत्य का अनुसरण कर पाते हैं? बिल्कुल नहीं—क्योंकि वे शैतान द्वारा दिग्भ्रमित किए जा चुके हैं। आओ, अब हम इस पर विचार करें : शैतान द्वारा लोगों के मन में बिठाए गए ज्ञान, विचारों और दृष्टिकोणों के भीतर क्या परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और उसकी आराधना करने के सत्य हैं? क्या परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के सत्य हैं? क्या परमेश्वर का कोई वचन है? क्या उनमें कुछ ऐसा है जो सत्य का है? बिल्कुल नहीं—ये चीजें पूरी तरह से अनुपस्थित हैं(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि लोगों को लगातार ज्ञान सीखने में लगाकर शैतान उनमें अपने विचार भरता है और लोगों को बाध्य करता है कि वे भीड़ में अलग दिखना चाहें और अपने परिवार का नाम ऊँचा करना चाहें। इससे वे कायल हो जाते हैं कि उनकी किस्मत उनके अपने हाथ में है और वे पढ़-लिखकर इसे बदल सकते हैं। ऐसे विचारों के अनुसार जिंदगी जीकर लोग परमेश्वर की अवज्ञा करते हैं और उससे दूर-दूर होने लगते हैं। जब हम पढ़ते थे तो अध्यापक अक्सर कहते : “अगर अच्छी जिंदगी चाहते हो तो हाथ में बैचलर और पोस्ट-ग्रेजुएट की डिग्री होनी चाहिए। केवल इन्हीं से साबित होगा कि तुम सक्षम हो।” इन विचारों को स्वीकार करने के बाद मैं अपने कौशल सुधारने के तरीकों के बारे में सोचने लगी और प्रतियोगिताओं में शामिल होने लगी, पेशेवर सर्टिफिकेट परीक्षाओं की तैयारी करने लगी। सोचती थी कि इसी तरह अपनी किस्मत बदल सकती हूँ। लेकिन अपनी अंधाधुंध अकादमिक दौड़ और अलग दिखने के लिए अपनी शिक्षा और अपने ज्ञान के इस्तेमाल के एकचित्त जोश में मेरा दिल धीरे-धीरे परमेश्वर से हटने लगा। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़ने बंद कर दिए, प्रार्थना भी कभी-कभार ही करती थी। मैं किसी अविश्वासी से अलग नहीं थी। सिर्फ तभी मैंने देखा कि हमारी ज्ञान की तलाश को बढ़ावा देना हमें भ्रष्ट और गुमराह करने का शैतानी तरीका है, हम जितना ज्यादा इसके पीछे भागेंगे, परमेश्वर से उतनी ही दूर जाएँगे और उसका उतना ही अधिक प्रतिरोध करेंगे। ऐसे परिणाम का ख्याल आते ही मैं उस मार्ग का पुनर्मूल्यांकन और चयन करने लगी जिसका मैं अनुसरण कर रही थी।

एक दिन मैंने परमेश्वर के वचनों का अंश पढ़ा : “मानवजाति के सदस्यों और धर्मनिष्ठ ईसाइयों के रूप में हम सबकी जिम्मेदारी और दायित्व है कि हम अपने मन और शरीर को परमेश्वर के आदेश की पूर्ति करने के लिए अर्पित करें, क्योंकि हमारा संपूर्ण अस्तित्व परमेश्वर से आया है और यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण अस्तित्व में है। यदि हमारा मन और शरीर परमेश्वर के आदेश और मानवजाति के न्यायसंगत कार्य को समर्पित नहीं है, तो हमारी आत्माएँ उन लोगों के सामने शर्मिंदा महसूस करेंगी जो परमेश्वर के आदेश के लिए शहीद हुए थे, और परमेश्वर के सामने तो और भी अधिक शर्मिंदा होंगी जिसने हमें सब कुछ प्रदान किया है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है)। परमेश्वर के वचन पढ़कर मेरा मन जिम्मेदारी के तीव्र भाव से भर उठा। मनुष्य को परमेश्वर ने बनाया। परमेश्वर पर विश्वास करना, उसकी आराधना करना और सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना पूरी तरह से सही और सहज कार्य हैं। ये सम्मानजनक चीजें हैं। परमेश्वर का इरादा है कि हम उसके सुसमाचार का प्रसार करें और उसका उद्धार पाने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को उसके सामने लाएँ। परमेश्वर का कार्य पहले प्राप्त कर मैं काफी खुशकिस्मत थी, इसलिए मुझे उसके इरादे पर विचार करना चाहिए और यह जिम्मेदारी लेनी चाहिए। अपना कर्तव्य न निभा पाना वाकई विद्रोहपूर्ण है और यह हमें इस पृथ्वी पर रहने लायक नहीं छोड़ता है। सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाकर ही हम इंसान कहलाने के हकदार हैं। तभी मैंने परमेश्वर के वचनों का एक भजन सुना, “युवाओं को जिन बातों का अनुसरण करना चाहिए।” उसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं : “युवा लोगों को चीजों के सही–गलत का स्पष्ट भेद पहचानने, न्याय और सत्य खोजने के संकल्प से रहित नहीं होना चाहिए। तुम लोगों को सभी सुंदर और अच्छी चीजों का अनुसरण करना चाहिए और सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता प्राप्त करनी चाहिए। यही नहीं, तुम लोगों को अपने खुद के जीवन के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए और इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे अभ्यास का मार्ग दिया। एक इंसान के रूप में मुझे सत्य का अनुसरण करना चाहिए, सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना चाहिए और सार्थक जीवन जीना चाहिए। अपने जीवन के लिए मुझे खुद जिम्मेदार होना था। मैं आगे नहीं पढ़ना चाहती थी। कलीसिया में कर्तव्य निभाना चाहती थी।

बाद में मैंने अपनी माँ को बताया कि मेरे मन में क्या चल रहा है। मेरी माँ तो बिफर पड़ी। उन्होंने कहा : “मैंने तुम्हारी पढ़ाई पर इतने साल इतना पैसा बहाया सिर्फ इसलिए कि तुम्हारा भविष्य सँवार सकूँ ताकि जब तुम ग्रेजुएट होकर कोई अच्छी नौकरी करने लगो तो मेरी भी इज्जत बढ़ेगी। चाहे जो कहो, मैं तुम्हें स्कूल नहीं छोड़ने दूँगी। मैं सिर्फ यह सोच रही हूँ कि तुम्हारे लिए सबसे अच्छा क्या है।” माँ की यह बात सुनकर मैं तिलमिला गई। सोचा नहीं था कि वह ऐसा जवाब देंगी। लेकिन इसी समय मैं दुविधा से घिर गई, सोचने लगी कि उन्होंने मेरे लिए कितना कुछ किया था; यह उनके लिए आसान नहीं था। अगर मैं कर्तव्य निभाना चुनती हूँ तो उन्हें निराश कर दूँगी और उनके प्रति ऋणी महसूस करूँगी, लेकिन अगर स्कूल में ही रहती हूँ और अपना सारा समय और ऊर्जा प्रसिद्धि और लाभ और रुतबे का अनुसरण करने में खपाती हूँ तो मैं अपराध-बोध महसूस करूँगी, और मैं इस ढंग से भी जीना नहीं चाहती थी। अंदरूनी लड़ाई के बाद मैंने स्कूल छोड़ने का मन बनाया। मेरा पक्का इरादा देखकर वह स्कूल छुड़ाने मेरे साथ आने को राजी हो गईं। लेकिन स्कूल में मेरे काउंसेलर ने कहा : “देखो, अच्छी तरह आगा-पीछा सोच लो। एक साल में ही ग्रेजुएट बन सकती हो और जब डिग्री हाथ में होगी तो जो चाहे कर सकती हो। तुम्हें पता होना चाहिए कि डिग्री वालों और बिना डिग्री वालों के लिए नौकरी खोजना कितना अलग होता है।” यह देखकर कि मुझ पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है, मेरी माँ ने दिल से कहा : “क्या तुम स्कूल में रुक नहीं सकती? मैंने तुमसे इतनी बड़ी उम्मीदें लगा रखी हैं। पैसों की चिंता मत करो। तुम्हारी पढ़ाई के लिए हमेशा पैसे दूँगी। तुम्हारे पिता से तलाक के बाद अब तुम ही मेरा आखिरी सहारा हो। मेरी अकेली उम्मीद हो।” यह कहते हुए माँ रोने लगी। माँ को पीड़ा भरे आँसुओं के साथ रोते देखकर मैं मर्माहत हो गई। मैंने सोचा : “मेरे ग्रेजुएट होने में एक ही साल बचा है। क्या मुझे वास्तव में अपनी डिग्री पूरी कर लेनी चाहिए? अगर मैं ग्रेजुएट होने के बाद कर्तव्य निभाना शुरू करती हूँ तो माँ भी एतराज नहीं करेगी।” इसलिए मैंने समझौता कर स्कूल में रुकने का फैसला किया। लेकिन पढ़ाई के दौरान मेरे पास अपना कर्तव्य करने के लिए बहुत समय नहीं बचता था और मुझे गहरा अपराध-बोध हुआ। इसलिए मैंने प्रार्थना की : “हे परमेश्वर, मैं बहुत कमजोर हूँ और अपने आगे के मार्ग पर चलना नहीं जानती हूँ। मुझे राह दिखाओ।”

एक दिन मैंने परमेश्वर के वचनों का अंश पढ़ा : “चीनी परंपरागत संस्कृति की शिक्षा के कारण चीनी लोगों की परंपरागत धारणाओं में यह माना जाता है कि व्यक्ति को अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा रखनी चाहिए और जो भी संतानोचित निष्ठा का पालन नहीं करता है वह विद्रोही बच्चा होता है। ये विचार बचपन से ही लोगों के मन में बिठाए गए हैं, और ये लगभग हर घर में, साथ ही हर स्कूल में और आम तौर पर समाज में सिखाए जाते हैं। जब किसी व्यक्ति का दिमाग इस तरह की चीजों से भर जाता है, तो वह सोचता है, ‘संतानोचित निष्ठा किसी भी चीज से ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर मैं संतानोचित न रहा तो मैं एक अच्छा इंसान नहीं हूँगा—मैं एक विद्रोही बच्चा हूँगा, जनमत द्वारा मेरी निंदा की जाएगी। मैं ऐसा व्यक्ति हूँगा जिसमें कोई जमीर नहीं है।’ क्या यह नजरिया सही है? लोगों ने परमेश्वर द्वारा व्यक्त इतने अधिक सत्य देखे हैं—क्या परमेश्वर ने अपेक्षा की है कि व्यक्ति अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा दिखाए? क्या यह कोई ऐसा सत्य है, जिसे परमेश्वर के विश्वासियों को समझना ही चाहिए? नहीं, यह ऐसा सत्य नहीं है। परमेश्वर ने केवल कुछ सिद्धांतों की संगति की है। परमेश्वर के वचन किस सिद्धांत द्वारा लोगों से दूसरों के साथ व्यवहार किए जाने की अपेक्षा करते हैं? परमेश्वर जिससे प्रेम करता है उससे प्रेम करो, और जिससे वह घृणा करता है उससे घृणा करो। यही वह सिद्धांत है जिसका लोगों को पालन करना चाहिए। परमेश्वर सत्य का अनुसरण करने और उसकी इच्छा का पालन कर सकने वालों से प्रेम करता है; हमें भी ऐसे लोगों से प्रेम करना चाहिए। जो लोग परमेश्वर की इच्छा का पालन नहीं कर सकते, जो परमेश्वर से नफरत और उसके खिलाफ विद्रोह करते हैं—परमेश्वर ऐसे लोगों से बेहद घृणा करता है और हमें भी उनसे बेहद घृणा करनी चाहिए। परमेश्वर इंसान से यही अपेक्षा करता है। अगर तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते, यदि वे अच्छी तरह जानते हैं कि परमेश्वर में आस्था रखना सही मार्ग है और इससे उनका उद्धार हो सकता है, फिर भी वे ग्रहणशील नहीं होते, बल्कि परमेश्वर में विश्वास करने वालों की आलोचना और निंदा भी करते हैं, तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे सत्य से विमुख रहने वाले और नफरत करने वाले लोग हैं, वे परमेश्वर का प्रतिरोध और उससे नफरत करते हैं—और बेशक परमेश्वर उनसे बेहद घृणा और नफरत करता है। क्या तुम ऐसे माता-पिता से बेहद घृणा कर सकते हो? वे परमेश्वर का विरोध करते और उसे बुरा-भला कहते हैं—ऐसे में वे निश्चित रूप से दानव और शैतान हैं। क्या तुम उनसे नफरत कर उन्हें धिक्कार सकते हो? ये सब वास्तविक प्रश्न हैं। यदि तुम्हारे माता-पिता तुम्हें परमेश्वर में विश्वास रखने से रोकें, तो तुम्हें उनके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार चलना चाहिए : परमेश्वर जिससे प्रेम करता है उससे प्रेम करो, और जिससे वह घृणा करता है उससे घृणा करो। अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु ने कहा था : ‘कौन है मेरी माता? और कौन हैं मेरे भाई?’ ‘क्योंकि जो भी मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा के अनुसार चलेगा, वही मेरा भाई, मेरी बहिन और मेरी माँ है।’ ये वचन अनुग्रह के युग में पहले से मौजूद थे, और अब परमेश्वर के वचन और भी अधिक स्पष्ट हैं : ‘परमेश्वर जिससे प्रेम करता है उससे प्रेम करो, और जिससे वह घृणा करता है उससे घृणा करो।’ ये वचन बिल्कुल सीधे हैं, फिर भी लोग अक्सर इनका वास्तविक अर्थ नहीं समझ पाते। अगर कोई व्यक्ति ऐसा है जो परमेश्वर को नकारता और उसका विरोध करता है, जो परमेश्वर द्वारा शापित है, लेकिन वह तुम्हारा पिता या माता या कोई संबंधी है और जहाँ तक तुम जानते हो वह कोई बुरा व्यक्ति प्रतीत नहीं होता है और वह तुम्हारे साथ ठीक से व्यवहार करता है तो फिर हो सकता है तुम उस व्यक्ति से घृणा करने में खुद को असमर्थ पाओ, यहाँ तक कि तुम उसके निकट संपर्क में बने रहो और तुम्हारा संबंध अपरिवर्तित रहे। जब तुम यह सुनोगे कि परमेश्वर ऐसे लोगों से नफरत करता है तो तुम परेशान महसूस करोगे, परमेश्वर के पक्ष में खड़े नहीं हो पाओगे और उन लोगों को अस्वीकार करने के लिए अपने दिल को कठोर नहीं बना पाओगे। तुम हमेशा भावनाओं के कारण बाधित रहोगे और तुम वास्तव में उनके साथ संबंध तोड़ने में सक्षम नहीं होगे। इसका क्या कारण है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि तुम्हारी भावनाएँ बहुत मजबूत हैं और ये तुम्हें सत्य का अभ्यास करने से रोकती हैं। वह व्यक्ति तुम्हारे लिए अच्छा है, इसलिए तुम उससे नफरत नहीं कर पाते। तुम उससे तभी नफरत कर पाते हो, जब उसने तुम्हें नुकसान पहुँचाया हो। क्या यह नफरत सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होगी? साथ ही, तुम अभी भी परंपरागत धारणाओं से बँधे हो, सोचते हो कि वे तुम्हारे माता-पिता या रिश्तेदार हैं और यह कि अगर तुम उनसे नफरत करोगे तो समाज तुम्हारा तिरस्कार करेगा और जनमत तुम्हें धिक्कारेगा, कपूत, अंतरात्मा से विहीन और अमानुष कहकर तुम्हारी निंदा करेगा। तुम्हें लगता है कि तुम्हें इसके लिए दैवीय निंदा और दंड भुगतना होगा। भले ही तुम उनसे नफरत करना चाहो, लेकिन तुम्हारी अंतरात्मा तुम्हें ऐसा नहीं करने देगी। तुम्हारी अंतरात्मा का यह प्रभाव कहाँ से आता है? यह एक ऐसे विचार से आता है जिसे तुम्हारी पारिवारिक विरासत, माता-पिता द्वारा तुम्हें दी गई शिक्षा और परंपरागत संस्कृति की शिक्षा के द्वारा तुम्हारे मन में बचपन से ही बैठा दिया गया है। यह विचार तुम्हारे दिल में बहुत गहराई तक बैठा हुआ है और इसके कारण तुम गलती से यह विश्वास करते हो कि संतानोचित निष्ठा पूरी तरह स्वाभाविक और उचित है और अपने पुरखों से विरासत में मिली हर चीज हमेशा अच्छी होती है। पहले तुमने इसे सीखा और फिर यह तुम पर हावी हो जाता है, तुम्हारी आस्था में और सत्य स्वीकारने में आड़े आकर व्यवधान डालता है, और तुम्हें इस लायक नहीं छोड़ता कि तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में ला सको, तुम उसके प्रति प्रेम का अभ्यास करने में असमर्थ होते हो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है और उससे घृणा करने में असमर्थ होते हो जिससे परमेश्वर घृणा करता है। ... मुझे बताओ, क्या मनुष्य दयनीय नहीं है? क्या उसे परमेश्वर के उद्धार की आवश्यकता नहीं है? कुछ लोगों ने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है, लेकिन वे अभी भी संतानोचित निष्ठा के मामले की असलियत नहीं देख पाते हैं। सत्य पर चाहे कैसे भी संगति क्यों न की जाए, वे उसे समझ नहीं सकते हैं। वे इस सांसारिक संबंध पर कभी काबू नहीं पा सकते हैं; उनमें साहस नहीं है, न ही आस्था है, और संकल्प की बात तो छोड़ ही दो, इसलिए वे परमेश्वर से प्रेम और उसके प्रति समर्पण नहीं कर सकते हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है)। परमेश्वर के वचनों से मैंने जाना कि पारंपरिक संस्कृति के गहरे पैठे हुए प्रभाव के कारण “संतानोचित धर्मनिष्ठा का गुण सबसे ऊपर रखना चाहिए” मेरे स्व-आचरण की संहिता बन गई थी। मुझे लगता था कि संतानोचित धर्मनिष्ठा सबसे महत्वपूर्ण चीज है और इसका पालन न करने का मतलब हुआ कि मैं इंसान नहीं हूँ। अपने बचपन के बारे में सोचते हुए मैंने देखा कि माँ ने बहुत कष्ट भोगे और उनके लिए यह इतना आसान नहीं रहा था, इसलिए मैंने खुद से कहा कि उनकी सुनूँगी और उनका दिल नहीं दुखाऊँगी। मेरी परवरिश करने के लिए मेरी माँ ने इतनी पीड़ा सही और अगर मैं उनके प्रति अपना बेटी होने का कर्तव्य न निभा सकी या उनकी आज्ञा न मान सकी तो मैं कृतघ्न और अंतरात्माविहीन थी, इसलिए मैंने मेहनत कर पढ़ने-लिखने और कुछ बनकर दिखाने का प्रण लिया, ताकि मेरी माँ अच्छी जिंदगी जी सके। उन्होंने जो कुछ कहा मैंने किया, ताकि उनके दिल को चोट न पहुँचे। अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य स्वीकारने के बाद मुझे समझ में आया कि कर्तव्य निभाना और सत्य का अनुसरण करना मूल्यवान और सार्थक है, लेकिन माँ के रोने-धोने और मुझसे स्कूल में रुकने की मिन्नतें करने पर मैंने समझौता कर लिया। भले ही मैं परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपना कर्तव्य करना चाहती थी, पर अपनी माँ की उम्मीदें पूरी करने के लिए मैं ऐसा नहीं कर सकी। मैं “संतानोचित धर्मनिष्ठा का गुण सबसे ऊपर रखना चाहिए” के विचार में गहराई से फँस चुकी थी। परमेश्वर माँग करता है कि वह जिस चीज से प्रेम करता है उससे हम प्रेम करें और वह जिस चीज से घृणा करता है उससे हम घृणा करें। यही हमसे परमेश्वर की माँगें हैं और ये ऐसे सिद्धांत हैं जिन पर मुझे टिके रहना चाहिए। अगर मेरे माता-पिता वाकई परमेश्वर पर आस्था रखते हैं, तो मुझे उनसे प्यार कर भाई-बहनों की तरह पेश आना चाहिए। लेकिन अगर वे परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, मुझे सताते हैं या मेरी आस्था में बाधा डालते हैं, तो वे सत्य से विमुख हैं और उससे घृणा करते हैं और परमेश्वर के खिलाफ हैं और मुझे आँख मूँदकर उनका कहना नहीं मानना चाहिए। मेरी माँ ने परमेश्वर पर विश्वास किया लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं किया और मुझे भी कर्तव्य निभाने से रोका। वह बस एक छद्म-विश्वासी और परमेश्वर की दुश्मन थी। पहले मुझमें कोई विवेकशीलता नहीं थी और मुझे लगता था कि संतान के रूप में मुझे अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए और हमेशा उनकी बात माननी चाहिए, कि यह मानवता और अंतरात्मा युक्त होना है। तभी मेरी समझ में आया कि यह गलत नजरिया सत्य के अनुरूप नहीं है। अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ होना सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए, हमें आँख बंद कर उनकी बात नहीं माननी चाहिए। यही अभ्यास का सिद्धांत है।

बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े, जो कहते हैं : “तुम्हें अब स्पष्ट रूप से यह देखना चाहिए कि वास्तव में वह कौन-सा मार्ग था जो पतरस ने पकड़ा था। यदि तुम पतरस के मार्ग को स्पष्ट रूप से देख सको, तो तुम उस कार्य के बारे में निश्चित होगे जो आज किया जा रहा है, इसलिए तुम शिकायत नहीं करोगे या नकारात्मक नहीं होगे, या किसी भी चीज की लालसा नहीं करोगे। तुम्हें उस समय की पतरस की मनोदशा का अनुभव करना चाहिए : वह दुख से व्याकुल था, वह अब भविष्य की कोई संभावना या कोई आशीष नहीं माँगता था और वह सांसारिक प्रसिद्धि, लाभ, खुशी, भाग्य या रुतबे का अनुसरण नहीं करता था; वह केवल सबसे सार्थक जीवन जीने का अनुसरण करता था, जिसमें परमेश्वर के प्रेम से उऋण होना और जो कुछ उसके पास सबसे अधिक अनमोल था उसे परमेश्वर को अर्पण करना शामिल था। तब वह अपने हृदय में संतुष्ट होता। ... उसकी परीक्षा की पीड़ा के दौरान, यीशु पुनः उसके सामने प्रकट हुआ और बोला : ‘पतरस, मैं तुझे पूर्ण बनाना चाहता हूँ, इस तरह कि तू फल का एक टुकड़ा बन जाए, जो मेरे द्वारा तेरी पूर्णता का ठोस रूप हो, और जिसका मैं आनंद लूँगा। क्या तू वास्तव में मेरे लिए गवाही दे सकता है? क्या तूने वह किया, जो मैंने तुझे करने के लिए कहा था? क्या तूने मेरे कहे वचनों को जिया है? तूने एक बार मुझे प्रेम किया, किंतु यद्यपि तूने मुझे प्रेम किया, पर क्या तूने मुझे जिया है? तूने मेरे लिए क्या किया है? तू महसूस करता है कि तू मेरे प्रेम के अयोग्य है, पर तूने मेरे लिए क्या किया है?’ पतरस ने देखा कि उसने यीशु के लिए कुछ नहीं किया था और उसने परमेश्वर के लिए अपने जीवन का बलिदान देने की पिछली शपथ याद की। और इसलिए, उसने अब और शिकायत नहीं की और बाद में उसकी प्रार्थनाएँ और काफी बेहतर हो गईं(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस ने यीशु को कैसे जाना)। यह बात प्रभु यीशु ने पतरस से पूछी थी, लेकिन मुझे लगा कि परमेश्वर भी मुझसे यही बात पूछ रहा है। मैंने खुद से पूछा : “मैंने परमेश्वर के लिए क्या किया है? पतरस प्रभु का अनुसरण करने के लिए सब कुछ त्यागने में सक्षम था। और मैं? परमेश्वर ने मुझे मेरा जीवन दिया लेकिन मैंने उसके लिए क्या किया है?” मैंने उसके लिए कुछ भी नहीं किया था। मैंने हमेशा बस अपने माता-पिता और अपने भविष्य के बारे में सोचा था। मैं तो अपना सारा समय और ऊर्जा अध्ययन करने और पैसा कमाने में लगाने को तैयार थी ताकि मैं उनकी दया का प्रतिफल चुका सकूँ। अगर मैं उनकी उम्मीदों पर खरी न उतर सकी, तो मुझे महसूस होता कि मैंने उन्हें निराश किया है और मुझे ग्लानि होती, लेकिन मैं सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य नहीं निभाती आ रही थी और फिर भी मुझे यह महसूस नहीं हुआ कि मैं परमेश्वर को निराश कर रही थी। मुझमें वाकई अंतरात्मा नहीं थी। मैं पतरस के अनुभव के बारे में सोचती हूँ तो भले ही उसके माता-पिता उसकी राह में आड़े आ गए थे, लेकिन उसने उनके विरोध की फिक्र नहीं की और प्रभु यीशु का अनुसरण करने के लिए सब कुछ त्याग दिया। उसमें सच्ची अंतरात्मा और समझ थी। हमें परमेश्वर ने रचा है, इसलिए उस पर विश्वास करना और उसकी आराधना करना पूरी तरह स्वाभाविक और न्यायोचित है। परमेश्वर ने मुझे चुना और वह मुझे अपने समक्ष ले आया, मुझे बचा लिए जाने का अवसर दिया। परमेश्वर का प्रेम सचमुच महान है! मुझे परमेश्वर के प्रेम का प्रतिफल चुकाना था और पतरस की तरह परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए सब कुछ त्याग देना था। इसके बाद मैंने परमेश्वर के वचनों के कुछ और अंश पढ़े जिनसे मुझे और प्रेरणा मिली। परमेश्वर कहता है : “जागो, भाइयो! जागो, बहनो! मेरे दिन में देरी नहीं होगी; समय जीवन है और खोए हुए समय को वापस लेना जीवन बचाना है! समय बहुत दूर नहीं है! यदि तुम लोग महाविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में असफल होते हो तो तुम इसके लिए बार-बार पढ़ाई कर सकते हो। लेकिन मेरे दिन में अब और देरी नहीं होगी। याद रखो! याद रखो! मेरे ये प्रोत्साहन के दयालु वचन हैं। दुनिया का अंत खुद तुम्हारी आँखों के सामने प्रकट हो चुका है और महाविनाश जल्द ही आएँगे। अधिक महत्वपूर्ण क्या है : तुम लोगों का जीवन या तुम्हारा सोना, तुम्हारा खाना-पीना और पहनना-ओढ़ना? समय आ गया है कि तुम इन चीजों को तोलो(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 30)। “नज़र रखो! नज़र रखो! बीता हुआ समय फिर कभी नहीं आएगा—यह याद रखो! दुनिया में ऐसी कोई दवाई नहीं है जो पछतावे का इलाज कर सके! तो, मैं तुम लोगों से भला और क्या कह सकता हूँ? क्या मेरे वचन तुम लोगों के सावधानीपूर्ण मनन, बार-बार के मनन के योग्य नहीं हैं?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 30)। परमेश्वर के हर वचन ने मेरे मन की बात कह दी। वक्त बहुत तेजी से बीत रहा है। आपदाएँ बढ़ती जा रही हैं, दुनिया भर के देश उथल-पुथल से गुजर रहे हैं। दिन एक-एक कर घटते जा रहे हैं, ऐसे में सत्य का अनुसरण सबसे महत्वपूर्ण है। अगर मैं परमेश्वर के कार्य के साथ कदमताल मिलाकर नहीं चलती हूँ और सांसारिक चीजों का अनुसरण करती रहती हूँ, अपनी पढ़ाई, भविष्य और परिवार जैसी चीजों पर ध्यान देती रहती हूँ तो परमेश्वर का कार्य खत्म होते-होते सत्य का अनुसरण करने में बहुत देर हो जाएगी। सत्य के बिना मैं आपदाओं में नष्ट हो जाऊँगी और दंड पाऊँगी और पछताने के लिए बहुत देर हो चुकी होगी। परमेश्वर का उद्धार फिर मेरे सामने था और मुझे इस अवसर को लपककर सत्य का अनुसरण करने का सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना था, सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना था ताकि परमेश्वर के प्रेम का कर्ज चुका सकूँ।

मैंने स्कूल छोड़ने का मन बना लिया तो मैंने अपनी माँ से कहा : “माँ, मैं वापस स्कूल नहीं जा रही हूँ। कोई चाहे कुछ भी कहे, मैं अपना मन नहीं बदलूँगी। मैं अपना रास्ता खुद चुन रही हूँ और उम्मीद है कि आप इसका सम्मान करेंगी।” उन्होंने कहा : “तुम्हारी आंटी पहले ही कह चुकी है कि ग्रेजुएट की डिग्री मिलते ही वह तुम्हें नौकरी दिला देगी। वह तुम्हारे लिए अच्छा-सा बॉयफ्रेंड खोजेगी और तुम सुख से जीवन जी सकती हो।” लेकिन माँ के शब्द मुझे और नहीं बहला सके, क्योंकि मुझे साफ दिख रहा था कि माँ ऐसा सच्चे प्यार के कारण नहीं कर रही थी। उन्हें तो सिर्फ मेरे फौरी हितों की फिक्र थी, मेरी जिंदगी या मेरे भविष्य की मंजिल की नहीं। उसके बाद मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद किया : “मुझे बताओ, किसी व्यक्ति के बारे में हर चीज किससे पैदा होती है? उसके जीवन के लिए सबसे बड़ा बोझ कौन वहन करता है? (परमेश्वर।) मात्र परमेश्वर ही लोगों से सबसे अधिक प्रेम करता है। क्या लोगों के माता-पिता और रिश्तेदार वास्तव में उनसे प्रेम करते हैं? वे जो प्यार देते हैं क्या वह सच्चा प्रेम होता है? क्या वह लोगों को शैतान के प्रभाव से बचा सकता है? नहीं बचा सकता। लोग सुन्न और मंदबुद्धि होते हैं, वे इन चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते और हमेशा कहते हैं, ‘मैं तो यह महसूस ही नहीं कर सकता कि परमेश्वर मुझसे कैसे प्रेम करता है। वैसे भी, मेरे माता-पिता मुझे सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। वे मेरी पढ़ाई-लिखाई का खर्च उठाते हैं, मुझे तकनीकी कौशल सिखवाते हैं ताकि मैं बड़ा होकर कुछ बन सकूँ, दूसरों से ऊपर उठ सकूँ और एक प्रसिद्ध व्यक्ति, एक हस्ती बन सकूँ। मेरे माता-पिता मुझे विकसित करने पर इतना पैसा खर्च करते हैं और मेरी शिक्षा में मेरा सहयोग करते हैं, खान-पान में कंजूसी और बचत करते हैं। वह कैसा महान प्रेम है! मैं उनका ऋण कभी नहीं चुका सकता!’ तुम्हें लगता है कि यह प्यार है? जब तुम्हारे माता-पिता तुम्हें दूसरों से ऊपर उठने, दुनिया में एक हस्ती बनने, एक अच्छी नौकरी पाने, और दुनियादारी के लायक बनने पर जोर देते हैं तो उसके क्या परिणाम होते हैं? वे लगातार तुमसे प्रयास करवाते हैं कि तुम दूसरों से ऊपर उठो, अपने परिवार को सम्मान दिलाओ और दुनिया की बुरी प्रवृत्तियों में एकीकृत हो जाओ। नतीजतन, तुम पाप के गड्ढे में जा गिरते हो, तबाही झेलते हो, नष्ट हो जाते हो और शैतान द्वारा निगल लिए जाते हो। क्या यह प्रेम है? वे तुमसे प्यार नहीं कर रहे, तुम्हारा नुकसान कर रहे हैं, तुम्हें बर्बाद कर रहे हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य प्राप्त करने के लिए अपने आसपास के लोगों, घटनाओं और चीजों से सबक सीखना चाहिए)। लगता तो था कि माँ सब कुछ मेरे भले के लिए कर रही है, अपने खाने-पहनने में कटौती कर मेरी पढ़ाई के लिए कमर-तोड़ मेहनत कर रही है, लेकिन उन्हें यह एहसास नहीं था कि मैं जो कुछ सीख रही हूँ उसमें शैतानी जहर और भ्रांतियाँ भरी हैं जो मुझे परमेश्वर से दूर कर देंगी और मैं उसके अस्तित्व को नकारने लगूँगी। स्कूल में नास्तिक वृत्ति के विचार पढ़ाए जाते हैं, जैसे “कभी भी कोई उद्धारकर्ता नहीं हुआ है,” “मनुष्य अपने स्वयं के हाथों से एक सुखद मातृभूमि का निर्माण कर सकता है,” “सबसे महान इंसान बनने के लिए व्यक्ति को सबसे बड़ी कठिनाइयाँ सहनी होंगी,” और “भीड़ से ऊपर उठो और अपने पूर्वजों का नाम करो,” और ये हम में अपने आदर्शों को हासिल करने और भीड़ से ऊपर उठकर दूसरों से आगे बढ़ने की लालसा जगाते हैं। लोग इन विचारों और दृष्टिकोणों के सहारे जीते हैं, परमेश्वर की संप्रभुता से मुक्त होने और अपने ही हाथों से अपनी किस्मत बदलने की कोशिश करते हैं। वे आखिरकार परमेश्वर का अधिकाधिक विरोध करते हैं और उसे नकारते हैं, अपने बचाए जाने का अवसर खो बैठते हैं। यह शैतान का दुष्टतापूर्ण मार्ग है। इन चीजों का अनुसरण मुझे बस परमेश्वर से और दूर ले जाता और शैतान की हानि और भ्रष्टता में डाल सकता है। यह मुझे नरक की ओर धकेल देता! इस बिंदु पर मैंने साफ देखा कि मेरे माता-पिता का प्यार सच्चा प्यार नहीं था और सिर्फ परमेश्वर का प्रेम सच्चा प्रेम है। भीड़ से अलग दिखने और अपने परिवार का नाम चमकाने का प्रयास करना जीवन का उचित मार्ग नहीं है। सत्य का अनुसरण करना और सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना ही जीवन का उचित मार्ग है और इसी के परिणामस्वरूप परमेश्वर की सुरक्षा मिलेगी और व्यक्ति महाविनाशों में बचे रहने में समर्थ होगा। यह सब समझ में आते ही मैंने स्कूल छोड़ने और खुद को परमेश्वर के कर्तव्य में समर्पित करने का फैसला किया। मैंने अपनी माँ से कहा : “माँ, आप हमेशा मुझसे यह चाहती हैं कि मैं पढ़ूँ, एक अच्छी-सी नौकरी पाऊँ और एक अच्छा-सा पति खोजूँ और सामाजिक प्रवृत्तियों का अनुसरण करूँ, लेकिन क्या आप यह गारंटी दे सकती हैं कि इस तरह से भविष्य में खुश रहूँगी? कि मेरे पास अच्छी किस्मत होगी? नहीं, गारंटी कोई नहीं दे सकता है! माँ, आपने अपनी जिंदगी में जो सबसे सही काम किया, वह था हमें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों का सुसमाचार प्रचार करना और मुझे सही मार्ग दिखाना।” एक पल के लिए मेरी माँ अवाक रह गई और फिर बोली : “अपना ख्याल रखना। मिलते रहना।” इसके बाद मैंने स्कूल जाकर अपना नाम कटा लिया। स्कूल के बाहर कदम रखते ही मैं सचमुच आजाद थी। अपनी पढ़ाई या परिवार के कारण बेबस नहीं थी और आखिर कलीसिया में कर्तव्य निभा सकती थी।

इस बात को कई साल बीत चुके हैं, लेकिन जितनी बार भी यह बात याद आती है, मुझे बेहद सौभाग्यशाली महसूस होता है। यह कदम-कदम पर मिला परमेश्वर का मार्गदर्शन ही था जिसने मुझे अपने कर्तव्य और अपनी पढ़ाई में सही चुनाव करना और जिंदगी में सही मार्ग पर चलना सिखाया। मैंने परमेश्वर के प्रेम और श्रमसाध्य इरादे को सचमुच अनुभव किया। अब मैं सृजित प्राणी के रूप में कर्तव्य निभाने में सक्षम हूँ और मेरा जीवन व्यर्थ नहीं है। मैं सचमुच खुश हूँ।

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