98. बदला लेने के लिए दूसरों का दमन करने से सीखे गए सबक
2021 में बहन सोफिया और मैं कलीसिया के वीडियो कार्य की जिम्मेदारी सँभाल रहे थे। उसके पास मुझसे ज्यादा तकनीकी कौशल और अनुभव था, इसलिए जब भी मुझे समस्याओं या कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था तो मैं संगति करने के लिए उससे संपर्क करता था। एक बार वीडियो पर काम करते हुए मुझसे एक बुनियादी गलती हो गई और जब उसे पता चला तो वह इसे ठीक करने में मेरी मदद करने के लिए आई। उसे सँभालते समय उसने मुझसे पूछा, “तुम यह कर्तव्य काफी समय से निभा रहे हो तो फिर तुमने इतनी साधारण गलती कैसे कर दी?” यह सुनकर मुझे भीतर से प्रतिरोध महसूस हुआ—उसने मुझसे इस तरह तुरंत सवाल किया, मानो मैं सच में अकुशल था। क्या वह मुझे नीचा दिखा रही थी और जानबूझकर मुझ पर निशाना साध रही थी? मैंने बाद में उस समस्या को ठीक तो कर दिया, लेकिन ऐसा करते समय मैं भीतर से अवज्ञा महसूस कर रहा था। इसके कुछ दिनों बाद कुछ भाई-बहनों को भी ऐसी ही समस्याओं का सामना करना पड़ा। एक सभा में काम के मुद्दों का सारांश बनाते समय सोफिया ने विश्लेषण के लिए एक उदाहरण के रूप में मेरी गलती का इस्तेमाल किया। तब मैं उसके प्रति और भी अधिक विरोध महसूस करने लगा और सोचने लगा, “आखिरकार, मैं पर्यवेक्षक में से एक हूँ तो जब तुम सबके सामने मेरी गलती की बात करोगी तो बाकी लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या वे आगे भी मेरा आदर करेंगे? ऐसा लगता है कि तुम मुझे जानबूझकर शर्मिंदा कर रही हो।” उसके बाद मैं उससे और बात नहीं करना चाहता था और मैं उससे उन समस्याओं के बारे में भी पूछना नहीं चाहता था, जिन्हें हल करने में मुझे कठिनाई हो रही थी। हमारी काम से संबंधित चर्चाओं के दौरान जैसे ही बात खत्म होती, मैं तुरंत वहाँ से चला जाता था और उससे कोई और बात नहीं करना चाहता था। जब वह एक-दूसरे की मनोदशाओं पर चर्चा करने को मेरे पास आती तो मैं उससे निपटने के लिए खुद को दो-चार बातें कहने के लिए मजबूर करता और चाहता कि वह अपनी बात जल्दी से खत्म करे।
बाद में मुझे वास्तविक काम करने के बजाय प्रसिद्धि और रुतबे के पीछे भागने के कारण मेरे पद से बर्खास्त कर दिया गया। कुछ समय बाद सोफिया ने मेरी दशा के बारे में पूछा और मैंने बर्खास्त होने के बाद आत्म-चिंतन और समझ के बारे में उसके साथ खुलकर संगति की। मुझे लगा कि वह मुझे सांत्वना देगी और प्रोत्साहित करेगी, लेकिन हैरानी की बात यह है कि उसने कहा, “तुम थोड़े समय से अपने कर्तव्य में अधिक सक्रिय तो हुए हो, लेकिन तुम्हारी समझ काफी सतही है। तुमने वास्तव में अपनी असफलताओं के मूल पर आत्म-चिंतन कर उसे नहीं समझा है। मैंने इस बारे में एक और बहन से बात की और वह सहमत थी।” उसे मेरी समस्याओं को इतने सीधे तरीके से उजागर करते हुए सुनना शर्मनाक था। मैंने सोचा, “तुम मेरी भावनाओं का थोड़ा भी ख्याल नहीं रख रही हो। भाई-बहनों के सामने यह सब कहकर क्या तुम जानबूझकर मेरी छवि को ठेस पहुँचाने की कोशिश नहीं कर रही हो?” मैं उसके प्रति प्रतिरोध से भर गया और उसके बाद मैंने उसकी कोई बात नहीं सुनी। मैंने उसे बस एक छोटा-सा जवाब दिया, लेकिन भीतर ही भीतर मैं बहुत गुस्से में था। मैंने सोचा कि चूँकि उसने मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया था, इसलिए अगली बार मौका मिलने पर मैं भी उसे ऐसा ही स्वाद चखाऊँगा। उस दिन के बाद से काम से संबंधित चर्चाओं को छोड़कर मैं उससे बात न करने की पूरी कोशिश करता था। यहाँ तक कि मैं उसकी आवाज तक नहीं सुनना चाहता था।
एक दोपहर एक बहन ने हमारे बातचीत के समूह में संदेश भेजा कि उसे तुरंत मुझसे बात करनी है। मैं एक वीडियो पर काम कर रहा था और समय पर संदेश नहीं देख पाया, जिसके कारण काम रुक गया। सोफिया को इसके बारे में पता चला तो उसने मुझे फोन करके पूछा कि मैंने तुरंत जवाब क्यों नहीं दिया था, फिर कहा, “मुझे लगता है कि तुम्हारी पुरानी समस्या अब भी बनी हुई है। तुम संदेशों का समय पर जवाब नहीं देते हो और कई बार हम तुमसे संपर्क कर ही नहीं पाते हैं। यह प्रोजेक्ट जो तुम्हारे जिम्मे है वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण है—इसमें अब और देरी मत करो...।” लेकिन मैंने वास्तव में अपने अंदर बहुत प्रतिरोध महसूस किया और सोचा, “पहले मैं अपने कर्तव्य के प्रति गैर-जिम्मेदार था, सिर्फ अपने काम पर ध्यान देता था, लेकिन बर्खास्तगी के बाद से मैंने इन चीजों को सुधारने पर ध्यान दिया है। क्या यह सब कहकर तुम मेरी हाल की सारी मेहनत को नकार नहीं रही हो? क्या तुम मुझे नीचा दिखा रही हो और सोचती हो कि मैं सत्य का अनुसरण नहीं करता?” मेरा उसके प्रति पूर्वाग्रह और बढ़ गया। कभी-कभी जब मैं देखता कि उसने काम से संबंधित कोई संदेश भेजा है तो मैं उसे जवाब भी नहीं देना चाहता था। कुछ ही समय बाद अगुआ ने हमें सोफिया का मूल्यांकन लिखने के लिए कहा। मुझे लगा जैसे मुझे मौका मिल गया हो। वह हमेशा मुझे उजागर करती थी, लेकिन इस बार मैं उसकी समस्याएँ उजागर कर सकता था और उसे यह दिखा सकता था कि प्रतिष्ठा को ठेस लगने का अनुभव कैसा होता है। इसलिए मैंने उसकी समस्याओं को विस्तार से सूचीबद्ध किया और इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि कैसे उसने अपनी कथनी और करनी में मेरी भावनाओं की उपेक्षा की थी और कैसे उसने वास्तविक काम नहीं किया था। हमारे मूल्यांकनों को पढ़ने के बाद अगुआ ने सोफिया को उसकी समस्याओं के बारे में बताया और सोफिया ने इन्हें सुधारने के लिए सचेत प्रयास किया। लेकिन मैं फिर भी उसके प्रति अपने पूर्वाग्रह को छोड़ नहीं पाया। इसलिए एक बार मैंने उसके खिलाफ अपने पूर्वाग्रह और राय को व्यक्त करने के लिए एक सभा में परमेश्वर के वचनों पर संगति करने के अवसर का उपयोग किया। उस सभा के दौरान हमने दूसरों को बाधित करने से संबंधित व्यवहारों पर संगति की और मैंने इस बारे में सोचा कि कैसे सोफिया ने कभी भी अपनी किसी बात में मेरी भावनाओं का ख्याल नहीं रखा था और इसलिए मैं उसके बारे में सबके सामने टोकना चाहता था ताकि हर कोई देख सके कि उसमें भी कई समस्याएँ हैं और वह मुझसे बेहतर नहीं है। मैंने उसे परोक्ष रूप से उजागर करते हुए कहा, “एक व्यक्ति पर्यवेक्षक हो सकता है और उसमें तकनीकी कौशल भी हो सकते हैं लेकिन फिर भी वह दूसरों से बोलने और उनकी समस्याओं की ओर इशारा करने के तरीके में अपमानजनक हो सकता है। कभी-कभी तो वह बहुत ही आलोचनात्मक लहजा भी अपना सकता है और कह सकता है कि किसी में यह और वह कमी है, जिससे वह व्यक्ति अपने कर्तव्य में बाधित महसूस कर सकता है। यह भी तो लोगों को बाधित करने जैसा है और अप्रत्यक्ष रूप से कलीसिया के जीवन में बाधा डालना है। हमें इस तरह के व्यक्ति का भी भेद पहचानने की आवश्यकता है।” मुझे लगा जैसे मैंने अपनी भड़ास निकाल ली हो, लेकिन इसके बाद कुछ मिनटों तक सन्नाटा छा गया—किसी ने कोई और संगति नहीं की। मुझे थोड़ा असहज महसूस हुआ—मुझे इस बात की चिंता हुई कि शायद मेरी संगति उचित नहीं थी। लेकिन फिर मैंने सोचा, मैंने जो कहा वह सब सच था, इसलिए इसमें कुछ भी अनुचित नहीं हो सकता। मैंने इसे दिमाग से निकाल दिया।
हैरानी की बात यह थी कि कुछ दिनों बाद अगुआ ने मुझे बुलाया और यह संगति की कि मैंने उस सभा में गोलमोल ढंग से सोफिया की आलोचना की थी और कि यह उस पर हमला और उसकी निंदा करना था। यह उसके लिए हानिकारक हो सकता था और कुछ भाई-बहनों को मेरे पक्ष में कर सकता था, जिससे वे भी सोफिया के प्रति पूर्वाग्रह से भर जाते और काम में उसके साथ सहयोग करने में असमर्थ हो जाते। यह नुकसान पहुँचाने वाला और विघटनकारी था। अगुआ के इस गहन-विश्लेषण को सुनकर मैं बहुत घबरा गया और डर गया। मुझे पता था कि परमेश्वर के वचन कहते हैं कि किसी संगति में ऐसे लापरवाही से किसी की आलोचना और गहन-विश्लेषण करना कलीसिया के जीवन में गड़बड़ करने और बाधा डालने जैसा है और यह बुराई करना है। मुझे पता था कि इस मामले की प्रकृति बहुत गंभीर थी। हमारी बातचीत खत्म होने के बाद मुझे तुरंत ही परमेश्वर के कुछ प्रासंगिक वचन मिल गए। परमेश्वर के वचन कहते हैं : “किसी व्यक्ति की अकारण निंदा करने, उस पर कोई ठप्पा लगाने और उसे सताने की परिघटना अक्सर हर कलीसिया में होती है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग किसी खास अगुआ या कार्यकर्ता के खिलाफ पूर्वाग्रह रखते हैं और बदला लेने की कोशिश में उसकी पीठ पीछे उसके बारे में टिप्पणियाँ करते हैं, सत्य के बारे में संगति करने की आड़ में उसका पर्दाफाश और उसका गहन-विश्लेषण करते हैं। ऐसे कार्यों के पीछे का इरादा और उद्देश्य गलत होते हैं। अगर कोई वास्तव में परमेश्वर की गवाही देने और दूसरों को लाभ पहुँचाने के लिए सत्य पर संगति कर रहा है, तो उसे अपने स्वयं के सच्चे अनुभवों पर संगति करनी चाहिए और खुद का गहन-विश्लेषण करके और खुद को जानकर दूसरों को लाभ पहुँचाना चाहिए। इस तरह के अभ्यास से बेहतर परिणाम मिलते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोग इसे स्वीकार करेंगे। अगर किसी की संगति किसी दूसरे व्यक्ति पर हमला करने या उससे बदला लेने के प्रयास में उसे उजागर करती है, हमला करती है और उसे नीचा दिखाती है, तो संगति का इरादा गलत है, यह अनुचित है, परमेश्वर इससे घृणा करता है और भाई-बहनों को इससे कोई शिक्षा नहीं मिलती। अगर किसी का इरादा दूसरों की निंदा करना या उन्हें सताना है, तो वह एक बुरा व्यक्ति है और वह बुराई कर रहा है। जब बुरे लोगों की बात आती है तो परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों में उन्हें पहचानने की समझ होनी चाहिए। अगर कोई मनमाने ढंग से लोगों पर प्रहार करता है, उन्हें उजागर करता है या उन्हें नीचा दिखाता है, तो उसकी प्रेम से मदद की जानी चाहिए, उसके साथ संगति करनी चाहिए और उसका गहन-विश्लेषण करना चाहिए या उसकी काट-छाँट करनी चाहिए। अगर वे सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं और हठपूर्वक अपने तौर-तरीके सुधारने से इनकार करते हैं, तो वह मामला पूरी तरह से अलग होगा। जब अक्सर मनमाने ढंग से दूसरों की निंदा करने वाले, दूसरों पर कोई ठप्पा लगाने और सताने वाले बुरे लोगों की बात आती है, तो उन्हें पूरी तरह से उजागर किया जाना चाहिए, ताकि हर कोई उनका भेद पहचानना सीख सके, और फिर उन्हें प्रतिबंधित किया जाना चाहिए या कलीसिया से निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। यह आवश्यक है, क्योंकि ऐसे लोग कलीसियाई जीवन और कार्य को बाधित करते हैं और संभव है कि वे लोगों को गुमराह करें और कलीसिया में अराजकता पैदा करें” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (15))। “हमला और प्रतिशोध एक प्रकार का क्रियाकलाप और प्रकाशन है जो एक दुर्भावनापूर्ण शैतानी प्रकृति से आते हैं। वे एक क्रूर स्वभाव की अभिव्यक्तियाँ भी हैं। लोग इस तरह सोचते हैं : ‘अगर तुम मेरे प्रति निष्ठुर रहोगे तो मैं तुम्हारा बुरा करूँगा। अगर तुम मुझे मेरी इज्जत बचाने नहीं दोगे, तो मैं तुम्हें क्यों बचाने दूँगा?’ यह किस तरह की सोच है? क्या यह प्रतिशोधात्मक सोच नहीं है? एक साधारण व्यक्ति की नजर में, क्या यह एक वैध विचार और दृष्टिकोण नहीं है? क्या यह तर्कसंगत नहीं है? ‘मैं तब तक हमला नहीं करूँगा जब तक मुझ पर हमला नहीं किया जाता; यदि मुझ पर हमला किया जाता है तो मैं निश्चित रूप से जवाबी हमला करूँगा’ और ‘दूसरों को उनकी अपनी ही दवा का स्वाद चखाओ’—अविश्वासी अक्सर ऐसी बातें कहते हैं; ये सभी ऐसे फलसफे हैं जो अविश्वासियों के बीच तर्कसंगत हैं और वे पूरी तरह से मानवीय धारणाओं के अनुरूप हैं। फिर भी, जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं, उन्हें इन शब्दों को कैसे देखना चाहिए? क्या ये विचार और दृष्टिकोण सही हैं? (नहीं।) वे सही क्यों नहीं हैं? उनका भेद कैसे पहचाना जाना चाहिए? ये विचार और दृष्टिकोण कहाँ से उत्पन्न होते हैं? (शैतान से।) वे शैतान से उत्पन्न होते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। वे शैतान के कौन-से स्वभावों से आते हैं? वे शैतान की दुर्भावनापूर्ण प्रकृति से आते हैं; उनमें शैतान का दुर्भावनापूर्ण और कुरूप सार और असली चेहरा होता है। उन विचारों, दृष्टिकोणों, कथनों और यहाँ तक कि कार्यों की प्रकृति क्या है जिनमें शैतान का प्रकृति सार होता है? बेशक, यह मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव है—यह शैतान का स्वभाव है। क्या ये शैतानी चीजें परमेश्वर के वचनों के अनुरूप हैं? क्या ये सत्य के अनुरूप हैं? क्या इनका परमेश्वर के वचनों में कोई आधार है? (नहीं।) क्या ये ऐसे विचार और दृष्टिकोण हैं जो परमेश्वर के अनुयायियों में होने चाहिए और क्या ये ऐसे क्रियाकलाप हैं जिनमें उन्हें शामिल होना चाहिए? क्या ये विचार और क्रियाकलाप सत्य के अनुरूप हैं? (नहीं।) अब जब ये चीजें सत्य के अनुरूप नहीं हैं, तो क्या ये सामान्य मानवता के अंतरात्मा और विवेक के अनुरूप हैं? (नहीं।)” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करने से ही सच्चा परिवर्तन आ सकता है)। जब मैंने अपने व्यवहार की तुलना उससे की जो परमेश्वर के वचनों ने उजागर किया था तो मैं सच में डर गया। सोफिया के साथ अपनी बातचीत में जब उसने मेरे काम में होने वाली गलती को उदाहरण के रूप में इस्तेमाल करके सबके सामने उसका विश्लेषण किया था तो मुझे ऐसा लगा था जैसे उसने मुझे अपमानित किया हो और मैं उससे नफरत करने लगा था और उसके साथ बात भी नहीं करना चाहता था। काम से संबंधित बातचीत के दौरान मैं उसे बस टाल देता था। जब उसने मेरी समस्याओं को देखा था और मेरी कमियों की ओर इतने स्पष्ट रूप से इशारा किया था और यहाँ तक कि मेरी समस्याओं के बारे में एक अन्य पर्यवेक्षक से भी बात की थी तो मैं गुस्से से भर गया था। मुझे ऐसा लगा था जैसे उसने एक ही पल में मेरी वह अच्छी छवि नष्ट कर दी थी जिसे बनाने के लिए मैंने इतनी मेहनत की थी और मैं इतना प्रतिरोध से भर गया था कि मैं उसकी आवाज तक नहीं सुनना चाहता था। जब उसने कहा था कि मैंने समय पर संदेशों का जवाब नहीं दिया था और मुझे चेतावनी दी थी कि मैं काम में पहले की तरह देरी न करूँ, तो मुझे ऐसा लगा था जैसे वह मुझे सीमित कर रही है, इस बात से इनकार कर रही है कि मैं बदल गया हूँ और जानबूझकर मेरे लिए चीजों को कठिन बना रही है। इसलिए मैं अपने कर्तव्य के बहाने जानबूझकर उसके संदेशों का जवाब न देकर अपनी झुँझलाहट निकाल रहा था। सोफिया के प्रति मेरा पूर्वाग्रह और अधिक तीव्र हो गया; मेरे अंदर उसके प्रति कड़वाहट भर गई थी। जब अगुआ ने हमें उसका मूल्यांकन लिखने के लिए कहा था तो मैंने उस अवसर का दुरुपयोग अपनी व्यक्तिगत शिकायत को व्यक्त करने के लिए किया और उसकी गलतियाँ उजागर कीं ताकि अगुआ उसकी काट-छाँट करे और यहाँ तक कि उसे बर्खास्त कर दे और मैं अपनी हताशा निकाल सकूँ। उससे बदला लेने की चाहत में मैंने परमेश्वर के वचनों पर संगति करने के अवसर का दुरुपयोग किया और उसे खराब मानवता वाला व्यक्ति ठहराया, दूसरों को उसका भेद पहचानने और अलग-थलग करने के लिए उकसाया ताकि मैं अपना गुस्सा निकाल सकूँ। मैंने देखा कि मैंने एक क्रूर स्वभाव प्रकट किया था। मुझे पता था कि सोफिया द्वारा मेरी समस्याओं की ओर इशारा करना कलीसिया के काम के प्रति उसकी जिम्मेदारी थी और वह मुझे खुद को जानने में मदद कर रही थी, लेकिन मैंने इसे बिल्कुल भी न तो स्वीकार किया था और न ही इसके प्रति समर्पण किया था। मैंने गुस्से में अपने कर्तव्य का उपयोग अपनी झुँझलाहट निकालने के लिए किया, यहाँ तक कि परमेश्वर के वचनों पर अपनी संगति का उपयोग उसे दबाने और उस पर हमला करने के लिए किया। इस तरह मैं एक गुट बनाने की कोशिश कर रहा था और कलीसिया के जीवन में गड़बड़ करने और बाधा डालने का प्रयास कर रहा था। सिर्फ इसलिए कि सोफिया के कुछ शब्दों ने मेरे आत्म-सम्मान को ठेस पहुँचाई थी, मैंने बदला लेने के लिए उस पर हमला किया और उसे सताने की कोशिश की। मैं कितना भयानक व्यक्ति था! परमेश्वर के वचन कहते हैं : “यदि विश्वासी अपनी बोली और आचरण में ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो वे अविश्वासियों से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये ठेठ दुष्ट राक्षस हैं” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी)। मैंने परमेश्वर के वचनों को बहुत खाया और पिया था, लेकिन मैं कुछ सही सुझाव भी स्वीकार नहीं कर पाया। क्या मैं वास्तव में एक विश्वासी था? मैं हमेशा इन शैतानी फलसफों का अनुसरण करता रहा था : “अगर तुम निर्दयी हो तो मैं निष्पक्ष नहीं होऊँगा” और “मैं तब तक हमला नहीं करूँगा जब तक मुझ पर हमला नहीं किया जाता; यदि मुझ पर हमला किया जाता है तो मैं निश्चित रूप से जवाबी हमला करूँगा।” मैं सिर्फ अपना असंतोष जाहिर कर रहा था और मेरे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं था। मैं जो जीवन बिता रहा था, वह एक शैतानी भ्रष्ट स्वभाव था, जिसमें मानव के समान होने का अंश बिल्कुल नहीं था। मुझे बहुत अपराध बोध और दुख महसूस हुआ, इसलिए मैंने यह सोचते हुए परमेश्वर से प्रार्थना की कि मैं पश्चात्ताप करना चाहता हूँ और सोफिया के प्रति अपना पूर्वाग्रह छोड़ना चाहता हूँ। कुछ दिनों तक जब भी मेरे पास समय होता, मैंने इस बारे में सोचा कि ऐसा क्यों था कि शुरू में हमारे बीच तालमेल था, लेकिन अब मैं उसके प्रति इतना चिड़चिड़ा हो गया हूँ। मुझे पता था कि मेरी काट-छाँट करते हुए उसने सत्य बोला था—हो सकता है कि उसका स्वर थोड़ा कठोर रहा हो, लेकिन यह कोई बड़ी बात नहीं थी। मैं इसे क्यों स्वीकार नहीं कर सका और मैं बदला लेने के लिए उस पर हमला तक कैसे कर सका?
अपनी तलाश के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “जब मसीह-विरोधी काट-छाँट का सामना करते हैं, तो वे अक्सर बहुत प्रतिरोध दिखाते हैं, फिर वे अपने बचाव में बहस करने की पूरी कोशिश करने लगते हैं और लोगों को गुमराह करने के लिए कुतर्क और वाक्पटुता का उपयोग करते हैं। यह काफी आम है। मसीह-विरोधियों की सत्य को स्वीकारने से मना करने की अभिव्यक्ति सत्य से नफरत करने और उससे विमुख होने की उनकी शैतानी प्रकृति को पूरी तरह उजागर कर देती है। वे पूरी तरह से शैतान की बिरादरी के होते हैं। मसीह-विरोधी चाहे कुछ भी करें, उनका स्वभाव और सार सामने आ जाता है। विशेष रूप से वे परमेश्वर के घर में जो कुछ भी करते हैं वह सत्य के खिलाफ जाता है, परमेश्वर द्वारा उसकी निंदा की जाती है और वह परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला कुकर्म होता है, उनके द्वारा की जाने वाली ये सभी चीजें इस बात की पूरी तरह से पुष्टि करती हैं कि मसीह-विरोधी शैतान और बुरे राक्षस हैं। इसलिए, जब काट-छाँट किए जाने की बात आती है तो वे इसे बिल्कुल भी खुशी-खुशी पालन करने वाले और इच्छुक तरीके से स्वीकार नहीं करते हैं; बल्कि प्रतिरोध और विरोध के अलावा, वे काट-छाँट किए जाने से नफरत भी करते हैं, वे उनसे भी नफरत करते हैं जो उनकी काट-छाँट करते हैं और उनसे भी नफरत करते हैं जो उनके प्रकृति सार को और उनके बुरे कर्मों को उजागर करते हैं। मसीह-विरोधियों को लगता है कि जो कोई भी उन्हें उजागर करता है, वह उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है, इसलिए वे भी ऐसे किसी भी व्यक्ति से प्रतिस्पर्धा और लड़ाई करते हैं जो उन्हें उजागर करता है। अपनी इसी प्रकार की प्रकृति के कारण मसीह-विरोधी ऐसे किसी व्यक्ति के प्रति कभी दयालु नहीं होते जो उनकी काट-छाँट करता है, न ही वे ऐसा करने वाले किसी भी व्यक्ति को सहन या स्वीकार करते हैं, उसके प्रति कृतज्ञता या सराहना तो वे बिल्कुल भी अनुभव नहीं करते। इसके विपरीत, अगर कोई उनकी काट-छाँट करता है और उन्हें अपनी गरिमा और इज्जत से हाथ धोने पर विवश कर देता है तो वे उस व्यक्ति के प्रति अपने दिलों में नफरत पाल लेते हैं और उससे बदला लेने के मौके की ताक में रहते हैं। उन्हें दूसरों से कैसी नफरत होती है! यह है वो जो वे सोचते हैं और जो वे दूसरों के सामने खुलकर कह देंगे, ‘आज तुमने मेरी काट-छाँट की है, ठीक है, अब हमारी शत्रुता पक्की हो गई है। तुम अपने रास्ते जाओ, मैं अपने रास्ते जाता हूँ, लेकिन मैं कसम खाता हूँ कि तुमसे बदला लेकर रहूँगा! अगर तुम मेरे सामने अपनी गलती स्वीकार करो, मेरे सामने अपना सिर झुकाओ या घुटने टेको और मुझसे भीख माँगो तो मैं तुम्हें क्षमा कर दूँगा, वरना मैं इसे कभी नहीं भूलूँगा!’ मसीह-विरोधी चाहे कुछ भी कहें या करें, वे किसी के हाथों अपनी दयालुतापूर्ण काट-छाँट को या किसी की ईमानदार मदद को कभी भी परमेश्वर के प्रेम और उद्धार के आगमन के रूप में नहीं देखते। इसके बजाय, वे इसे अपने अपमान के संकेत के रूप में और उस क्षण के रूप में देखते हैं जब वे सबसे अधिक शर्मिंदा हुए थे। यह दर्शाता है कि मसीह-विरोधी सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते, कि उनका स्वभाव सत्य से विमुख होने और इससे नफरत करने वाला होता है” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग आठ))। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा कि काट-छाँट के प्रति मसीह-विरोधियों का रवैया इसे पूरी तरह से अस्वीकार करने, तर्क देकर इसे गलत साबित करने, अवज्ञाकारी बन जाने और यहाँ तक कि काट-छाँट करने वाले को अपना शत्रु मानने का होता है और इसलिए वे मौके ढूँढ़ते हैं कि कैसे उस पर हमला किया जाए और बदला लिया जाए। वे सत्य से विमुख होते हैं और अपनी प्रकृति से ही इससे नफरत करते हैं; वे इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। सोफिया ने मेरे कार्य में मेरी समस्याओं और भटकावों के बारे में जो कुछ कहा था, वह सब सच था, इसलिए चाहे उसने जो भी स्वर अपनाया हो या जो भी तरीका अपनाया हो, वह मुझे खुद को जानने में मदद करने के लिए था, न कि मुझे जानबूझकर निशाना बनाने के लिए। स्पष्ट था कि मैं अपने कर्तव्य में न तो लगनशील था और न व्यावहारिक और न ही मैं अपने काम का अनुवर्तन करने की जिम्मेदारी ले रहा था जिसके कारण हमारे वीडियो में कुछ समस्याएँ आईं थीं। सोफिया इन समस्याओं का विश्लेषण और गहन-विश्लेषण इसलिए कर रही थी ताकि हम बार-बार वही गलतियाँ न करें और इसके कारण पूरे काम की प्रगति में बाधा न आए। उसने यह भी गौर किया कि बर्खास्तगी के बाद से खुद को लेकर मेरी समझ काफी सतही रही थी और उसने दयालुता के कारण इसकी तरफ इशारा किया था। यह मुझे खुद को बेहतर जानने और सच्चा पश्चात्ताप करने में मदद करने के लिए था। लेकिन जहाँ उसने मेरी समस्याओं की ओर इशारा किया और बार-बार मेरी मदद की, तो न केवल मैं कृतघ्न हो गया, बल्कि मैंने सोचा कि वह मुझे जानबूझकर शर्मिंदा कर रही है और मेरे गौरव को चोट पहुँचा रही है। मैं सच में उससे बहुत नाराज था और उससे अपने दुश्मन जैसा व्यवहार कर रहा था और मैं बदला लेने के अवसर तलाशने में लगा हुआ था। यहाँ तक कि मैंने दूसरों को उसे अलग-थलग करने और अस्वीकार करने के लिए उकसाया। मेरे कर्म एक मसीह-विरोधी जैसे थे। मसीह-विरोधी चापलूसी को पसंद करते हैं और जो कोई भी उनकी स्तुति करता है, वे उससे बहुत प्यार करते हैं। लेकिन जितना कोई व्यक्ति ईमानदार होता है, वे उसे उतना ही अधिक दबाते हैं और सताते हैं। जो कोई भी उन्हें अपमानित करता है या उनके हितों को चोट पहुँचाता है, खमियाजा भुगतता है और वे तब तक चैन नहीं लेते जब तक वह व्यक्ति क्षमा न माँग ले। इसके कारण कलीसिया के काम और दूसरों के जीवन प्रवेश में बाधाएँ आती हैं और नुकसान पहुँचता है। इतना बुरा करने और परमेश्वर के स्वभाव को नाराज करने के कारण उन्हें आखिर में परमेश्वर द्वारा स्थायी रूप से निकाल दिया जाता है। सोफिया ने जो कहा था, उसने मेरी प्रतिष्ठा और रुतबे की भावना को ठेस पहुँचाई थी, इसलिए मैं उससे बदला लेना चाहता था। मुझे ऐसा लगा कि मैं तभी शांत होऊँगा जब मैं उसे तब तक सताऊँ जब तक वह अपनी गलती न स्वीकार कर ले और मुझे “उकसाना” बंद न कर दे। मैं वास्तव में बहुत दुर्भावनापूर्ण था! मैं सत्य से विमुख था और मसीह-विरोधी के मार्ग पर था। अगर मैं अपने मसीह-विरोधी स्वभाव को न बदलता तो मुझे कोई पद मिलने पर मुझे पता था कि मैं और अधिक बुराई करता और ज्यादा लोगों को सताता और दबाता और आखिरकार मुझे परमेश्वर द्वारा शाप देकर दंडित किया जाता। मैंने देखा कि इसके परिणाम वास्तव में बहुत भयावह थे। इसलिए मैंने अभ्यास और प्रवेश के मार्ग की खोज करते हुए परमेश्वर से प्रार्थना की।
बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : “अगर तुम परमेश्वर का भय मानने वाले और बुराई से दूर रहने वाले व्यक्ति हो, तो तुम्हें महसूस होगा कि तुम्हें परमेश्वर के चुने हुए लोगों के पर्यवेक्षण की जरूरत है, और कि इससे भी ज्यादा, तुम्हें उनकी सहायता की जरूरत है। अगर तुम कुकर्मी हो, और तुम्हारा जमीर दोषी है, तो तुम निगरानी किए जाने से डरोगे और इससे बचने का प्रयास करोगे; यह अवश्यंभावी है। इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो लोग परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा पर्यवेक्षण किए जाने का प्रतिरोध करते हैं और उसके प्रति विमुखता महसूस करते हैं, वे कुछ छिपा रहे होते हैं, और वे यकीनन ईमानदार लोग नहीं हैं; धोखेबाज लोग ही निगरानी से सबसे ज्यादा डरते हैं। तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा पर्यवेक्षण किए जाने के प्रति अगुआओं और कार्यकर्ताओं को क्या रवैया अपनाना चाहिए? क्या यह नकारात्मकता, सतर्कता, प्रतिरोध और द्वेष का रवैया होना चाहिए या परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति आज्ञाकारिता और विनम्र स्वीकृति का रवैया होना चाहिए? (विनम्र स्वीकृति का रवैया होना चाहिए।) विनम्र स्वीकृति का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है परमेश्वर से सब कुछ स्वीकार लेना, सत्य की तलाश करना, सही रवैया अपनाना और आवेगपूर्ण ना होना। अगर किसी को वास्तव में तुम्हारी किसी समस्या का पता चलता है और वह तुम्हें इस बारे में बताता है, इसका भेद पहचानने और इसे समझने में तुम्हारी मदद करता है, इस समस्या को सुलझाने में तुम्हारी सहायता करता है, तो वह तुम्हारे प्रति जिम्मेदार हो रहा है, और परमेश्वर के घर के कार्य और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश के प्रति जिम्मेदार हो रहा है; यही चीज करना सही है, और यह बिल्कुल स्वाभाविक और उचित है। अगर ऐसे लोग हैं जो कलीसिया द्वारा निगरानी किए जाने को शैतान से, और दुर्भावनापूर्ण इरादों से उत्पन्न होने वाली चीज मानते हैं, तो वे दानव और शैतान हैं। ऐसी शैतानी प्रकृति के साथ, वे यकीनन परमेश्वर द्वारा जाँच-पड़ताल किए जाने को स्वीकार नहीं करेंगे। अगर कोई सही मायने में सत्य से प्रेम करता है, तो उसमें परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा पर्यवेक्षण किए जाने की सही समझ होगी, वह इसे प्रेम के कारण किया जा रहा, परमेश्वर से आने वाला कार्य मान सकेगा, और वह इसे परमेश्वर से स्वीकार लेने में समर्थ होगा। वह यकीनन आवेगपूर्ण नहीं होगा या आवेश में आकर कार्य नहीं करेगा, उसके दिल में प्रतिरोध, सतर्कता या संदेह तो बिल्कुल नहीं होगा। परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा पर्यवेक्षण किए जाने के साथ पेश आने का सबसे सही रवैया यह है : कोई भी ऐसा शब्द, क्रियाकलाप, निगरानी, जाँच-परख, या सुधार—यहाँ तक कि काट-छाँट किया जाना—जो तुम्हारे लिए उपकारी है, उसे तुम्हें परमेश्वर से स्वीकार लेना चाहिए; आवेगपूर्ण मत बनो। आवेगपूर्ण होना उस दुष्ट से, शैतान से आता है, यह परमेश्वर से नहीं आता है, और लोगों को सत्य के प्रति यह रवैया नहीं रखना चाहिए” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (7))। मैंने परमेश्वर के वचनों से जाना कि जब भाई-बहन मेरी समस्याओं और भटकावों की ओर इशारा करते हैं तो उसमें कोई दुर्भावना नहीं होती है। वे मेरा मजाक नहीं उड़ा रहे होते, बल्कि कलीसिया के काम और मेरे जीवन प्रवेश के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे होते हैं। चाहे मैं उनके द्वारा प्रकट की जाने वाली समस्याओं को पूरी तरह समझूँ या न समझूँ, मुझे स्वीकार करना चाहिए कि यह परमेश्वर की ओर से हैं, पहले स्वीकार करना और आत्मसमर्पण करना चाहिए, न कि इसे लेकर उलझना या क्रोधित और प्रतिशोधात्मक होना चाहिए। अगर मैं उनकी बातों को पूरी तरह नहीं भी समझ पाऊँ, तब भी मुझे परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और आत्म-चिंतन करते रहना चाहिए या फिर संगति करने के लिए अनुभवी भाई-बहनों को ढूँढ़ना चाहिए। यही सत्य को स्वीकार करने का रवैया होता है। मुझे याद आया कि कैसे मैंने एक सभा में परोक्ष रूप से सोफिया को उजागर किया था—तब कुछ भाई-बहन जो वास्तविकता से अनजान थे, उसके प्रति अपने मन में पूर्वाग्रह विकसित कर सकते थे जिससे उनके कर्तव्यों में उसके साथ उनके सहयोग पर असर पड़ता। इसलिए एक सभा में मैंने खुद को खुलकर रखा और परमेश्वर के वचनों के आधार पर अपने कार्य-कलापों का गहन-विश्लेषण किया ताकि अन्य लोग मेरे किए का भेद पहचान सकें। बाद में सोफिया ने मुझे काम के बारे में बात करने को बुलाया और मैंने उसके प्रति अपने पूर्वाग्रह, सत्य से विमुख अपने स्वभाव और दुर्भावनापूर्ण इरादों के बारे में खुलकर बात की। मैंने देखा कि उसने मुझे दोषी नहीं ठहराया या मुझसे नफरत नहीं की। मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। उसके बाद सोफिया और मेरे बीच तालमेल फिर से बेहतर हो गया। फिर जब उसने मेरी समस्याओं को उठाया तो मैंने उसके बोलने के तरीके को लेकर अधिक परवाह नहीं की—मुझे पता था कि अगर यह मेरे कर्तव्य के लिए फायदेमंद है तो मुझे इसे पहले स्वीकार करना चाहिए। कभी-कभी किसी पल मुझे ज्ञान नहीं होता था, लेकिन मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता और खुद को एक ओर रख देता था, इज्जत की परवाह नहीं करता था या अपने लिए बहस नहीं करता था और धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगता था। इस तरह उसके साथ काम करते हुए समय के साथ मैं बहुत अधिक सहज महसूस करने लगा।
बाद में मैंने जल्दी में एक वीडियो पर काम किया ताकि समय सीमा में पूरा हो सके, लेकिन सिद्धांतों को नहीं खोजा जिससे काम में कई समस्याएँ आ गईं और उसे दोबारा करने की जरूरत थी। एक पर्यवेक्षक बहन नोरा ने मुझे एक निजी संदेश भेजकर इसे ठीक करने को कहा, इसके बाद मैंने सोचा कि बात यहीं खत्म हो जाएगी। लेकिन मैं यह देखकर हैरान था कि एक काम के सारांश के दौरान मेरी गलतियाँ फिर से विश्लेषण के लिए उठाई गईं। मैंने सोचा कि मेरी गलतियों को सबके सामने उठाना शर्मनाक बात थी! मुझे नोरा के प्रति पूर्वाग्रह महसूस होने लगा, मानो वह मामूली बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही थी और मेरी गरिमा का ध्यान नहीं रख रही थी। मैंने खुद को बचाने और सबके सामने अपनी इज्जत बनाए रखने के लिए कोई बहाना ढूँढ़ने की कोशिश की। लेकिन फिर मुझे एहसास हुआ कि मेरी दशा सही नहीं थी और मैंने तुरंत परमेश्वर से अपने खिलाफ विद्रोह करने के लिए प्रार्थना की। प्रार्थना करने के बाद मैं थोड़ा शांत हो गया। मैंने सोचा : मुझे अपनी जिम्मेदारी निभाने में कोताही करने के कारण ही काम को दोबारा करना पड़ा था। नोरा मुझे याद दिलाने के लिए इस पर इसलिए संगति कर रही थी ताकि मैं अपने कर्तव्य के प्रति अपने रवैये पर आत्म-चिंतन कर सकूँ। साथ ही दूसरे भाई-बहन इसे एक चेतावनी के रूप में ले सकते थे ताकि वे वही गलती न दोहराएँ। वह कलीसिया के हितों की रक्षा कर रही थी। अगर मैं अपनी इज्जत बचाने के लिए बहाने बनाता, खुद को सही ठहराता और नोरा के प्रति पूर्वाग्रह रखता तो क्या मैं सत्य से विमुख नहीं होता और उसे स्वीकार करने से इनकार नहीं करता? मुझे पता था कि मैं भ्रष्ट स्वभाव के आधार पर काम करते नहीं रह सकता। इसलिए मैंने सभा में सभी के सामने खुलकर अपनी गलतियों के विवरणों पर संगति की। जब मैंने अपनी बात समाप्त की तो उन्होंने ऐसी समस्याओं से निपटने के लिए कुछ उपयोगी सुझाव मेरे साथ साझा किए और मैंने अपनी बाद वाली वीडियो में उनके इन सुझावों का पालन किया और वही गलतियाँ दोबारा करने से बच गया। मैंने वास्तव में अनुभव किया कि भाई-बहनों के सुझावों को स्वीकार करने से कुछ अनावश्यक गलतियों को रोका जा सकता है और कार्यकुशलता बढ़ाई जा सकती है। साथ ही यह मुझे खुद को जानने और मेरे जीवन प्रवेश के लिए भी लाभकारी हो सकता है।
इसके माध्यम से मैंने वास्तव में अनुभव किया है कि काट-छाँट किए जाने के समय समर्पण करने का रवैया रखना कितना महत्वपूर्ण होता है। अगर दूसरों की कही गई बातें सही हैं और सत्य के अनुरूप हैं तो मुझे अपने अहंकार को छोड़कर इसे स्वीकार करना चाहिए और बिना किसी शर्त के समर्पण करना चाहिए। लेकिन अगर मैं काट-छाँट किए जाने को हठपूर्वक अस्वीकार करता हूँ और इसका विरोध करता हूँ और पक्षपाती हो जाता हूँ या यहाँ तक कि बदला लेने के लिए दूसरों पर हमला भी करता हूँ तो यह एक बुरे व्यक्ति और मसीह-विरोधी का व्यवहार है और अगर मैं पश्चात्ताप नहीं करता तो परमेश्वर मेरी निंदा करके मुझे निकाल देगा। इससे पहले शायद ही किसी ने मेरी समस्याओं की ओर इतने सीधे तरीके से इशारा किया था और मैं खुद को जान नहीं पाया था। मैं सोचता था कि मेरी मानवता अच्छी है और मैं सत्य को स्वीकार कर सकता था। अब मैं देखता हूँ कि मैं सत्य से विमुख हूँ और मेरी मानवता अच्छी नहीं है। आज जो कुछ भी मैंने प्राप्त किया है और सीखा है, वह सब परमेश्वर के वचनों के न्याय और प्रकाशन की बदौलत है। परमेश्वर का धन्यवाद!