3. अपनी आस्था में तुम न ठंडे न गर्म होकर खुद को बर्बाद कर दोगे

मु चे, चीन

फरवरी 2024 की शुरुआत में मैं कलीसिया में पाठ-आधारित कर्तव्य निभा रही थी। शुरू में मैं काफी उत्साहित थी; मुझे लगा कि मेरा जीवन प्रवेश काफी सतही है और मुझमें हर क्षेत्र में कमी है, इसलिए मैंने सोचा कि अपने पाठ-आधारित कर्तव्य में प्रशिक्षण पाकर और सत्य और सिद्धांतों को और अधिक समझकर मैं अधिक तेजी से जीवन वृद्धि हासिल कर सकती हूँ। बाद में पर्यवेक्षक ने एक टीम के धर्मोपदेश समीक्षा कार्य के प्रबंधन के लिए मुझे किन लान नाम की एक बहन का सहयोगी बना दिया। किन लान मुझसे अधिक समय से पाठ-आधारित कर्तव्य निभा रही थी और सिद्धांतों और पेशेवर कौशलों में कुछ सिद्धहस्त थी। मैं यह सोचकर बहुत खुश थी कि उसके साथ सहयोग करने का मतलब है कि मैं बहुत कुछ सीख सकती हूँ और अपने कर्तव्य में और तेजी से प्रगति कर सकती हूँ। यह जानते हुए कि मैंने अभी-अभी यह कर्तव्य शुरू किया है, किन लान ने मुझे काफी विस्तृत मार्गदर्शन दिया। धर्मोपदेशों की जाँच करते समय वह पहले उन पर मेरा दृष्टिकोण पूछती थी और अगर मुझे कोई चीज समझ में नहीं आती तो वह मेरे साथ बिंदुवार संगति करती थी। मैं लगन से अध्ययन करती और नोट्स बनाती थी, इस तरीके से अपना कर्तव्य निभाकर मुझे काफी सहज महसूस होता था। बाद में काम की समीक्षा करते समय मुझे एहसास हुआ कि करने के लिए वास्तव में बहुत अधिक है। धर्मोपदेश चुनने के अलावा हमें टीम के सदस्यों की मौजूदा स्थितियों और कार्य प्रगति से अवगत रहना था और जब काम के नतीजे खराब हों तो हमें सभी विचलनों और मसलों की समीक्षा करनी थी। हमें पेशेवर कौशलों के अध्ययन का आयोजन, लोगों को विकसित, वगैरह भी करना था। मैंने मन ही मन सोचा, “इन सभी अलग-अलग परियोजनाओं का प्रबंधन करना बहुत जटिल है; इस सारे काम को अच्छी तरह करने के लिए मुझे कितना ज्यादा सोचना होगा, ऊर्जा लगानी होगी और कितनी ज्यादा कीमत चुकानी होगी?” जैसे ही मेरे मन में ये विचार आए, मुझे यह बहुत सिरदर्द वाला और अपनी देह के लिए बहुत थकाऊ लगा। बहनों के साथ काम में विचलनों की समीक्षा करते समय मैं चाहती थी कि इसमें भाग लूँ और शामिल होऊँ लेकिन यह सोचकर कि कैसे मैं इस कर्तव्य में नई हूँ और चीजों को नहीं समझती हूँ और कैसे किन लान काम के सभी पहलुओं से परिचित है, उस पर और अधिक निर्भर रहना बेहतर लगता था, इसलिए मैं बस श्रोता की भूमिका निभाकर संतुष्ट थी। विचलनों को सुधारने के संबंध में पत्र लिखते समय मैं बस उन मुख्य बिंदुओं को व्यवस्थित कर देती थी जिनकी चर्चा किन लान और दूसरे कर चुके होते थे, जिससे मैं बहुत सारी परेशानी से बच जाती थी। जब काम के नतीजों पर असर पड़ता था तो सभी बहनें बहुत चिंतित हो जाती थीं और वे आत्म-चिंतन करती थीं और अपने काम में विचलनों का सारांश बनाती थीं लेकिन मैं यह सोचकर बेफिक्र रहती थी कि हमारे काम के नतीजों का मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। मुझे लगता था कि मैं इस कर्तव्य में नई हूँ, चीजों को समझती नहीं हूँ या कर नहीं पाती हूँ और मैं समस्याओं को सतही तौर पर देखती हूँ, इसलिए मैं एक आम पिछलग्गू बनकर रह गई। मैं हर दिन बस एक ढर्रे पर काम की जाँच करती थी, उस पर बहुत अधिक सोचना नहीं चाहती थी। कभी-कभी मुझे रात 9 बजे से पहले ही नींद आने लगती थी।

मार्च की शुरुआत में मुझे लगातार कई दिनों तक घुटनों में तेज दर्द के साथ सीने में भी दर्द हुआ। एक बहन ने मुझे चेताते हुए कहा, “तुमने हाल-फिलहाल अपने कर्तव्य में बोझ की भावना ज्यादा नहीं दिखाई है। अब जब तुम बीमार पड़ चुकी हो तो तुम कुछ आत्म-परीक्षण कर सकती हो।” उसने मेरे साथ संगति करने के लिए एक और बहन के अनुभव का भी इस्तेमाल किया, कहा कि यह बहन कैसे अपने कर्तव्य में हमेशा दूसरों की सुनती थी और उन पर निर्भर रहती थी, चीजों को लेकर उसके पास अपने दृष्टिकोण नहीं थे और बाद में अपने कर्तव्य में प्रभावी न होने के कारण उसे बरखास्त कर दिया गया। बरखास्त होने के बाद ही उसे इसका पछतावा हुआ और अपने कर्तव्य का महत्व समझ आया। इस बहन की संगति सुनने के बाद मुझे यह सोचकर बहुत डर लगा, “क्या हाल-फिलहाल मेरी भी यही दशा नहीं रही है? मैंने किसी भी चीज की परवाह नहीं करनी चाही है और मैं बस एक पिछलग्गू की तरह काम करती रही हूँ।” मैंने कुछ दिन पहले पढ़े परमेश्वर के वचनों के एक अंश के बारे में सोचा, जो मेरी दशा से काफी संबंधित था, इसलिए मैंने उसे पढ़ने के लिए ढूँढ़ निकाला। परमेश्वर कहता है : “कुछ लोगों को देखकर लगता है कि अपना कर्तव्य करने में उनमें समर्पण है, ऊपरवाला जो भी व्यवस्था करता है वे उसे करते हुए लगते हैं। लेकिन जब उनसे पूछा जाता है, ‘क्या तुम अपना कर्तव्य लापरवाही से करते हो? क्या तुम इसे सिद्धांतों के अनुसार करते हो?’ तो वे कोई निश्चित उत्तर नहीं दे पाते हैं, बस इतना कहते हैं, ‘मैं वैसा ही करता हूँ जैसा ऊपरवाला निर्देश देता है और बेतहाशा गलत कर्म करने की हिम्मत नहीं करता।’ जब उनसे पूछा जाता है कि क्या उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी की है तो वे कहते हैं, ‘खैर, मैं वही कर रहा हूँ जो मुझे करना चाहिए।’ देखा? अपना कर्तव्य करते समय उनका हमेशा इसी तरह का रवैया होता है—वे जल्दबाजी नहीं करते हैं, चीजों को धीरे-धीरे करते हैं और आधा-अधूरा मन लगाते हैं। तुम वाकई उनमें कोई गलती नहीं ढूँढ़ सकते, लेकिन अगर तुम उनके कर्तव्य-निर्वहन को सत्य सिद्धांतों की कसौटी पर मापते हो तो तुम पाते हो कि यह अकुशल है और मानक-स्तर का नहीं है। और फिर भी, उन्हें कोई परवाह नहीं है, वे पहले की तरह ही कार्य करना जारी रखते हैं और वे अब भी वे चीजें नहीं करते हैं जिन्हें करने की उन्हें पहल करनी चाहिए—वे बिल्कुल भी नहीं बदलते हैं। क्या वे चिकने घड़े नहीं होते हैं? वे हमेशा यही रवैया बनाए रखते हैं : ‘तुम्हारे पास हजारों शानदार योजनाएँ हो सकती हैं, लेकिन मेरे अपने कुछ नियम हैं। मैं बस ऐसा ही हूँ! देखते हैं तुम मेरे साथ क्या कर सकते हो। मेरा यही रवैया है!’ उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है जो अत्यंत विश्वासघाती या बुरा हो, बल्कि उन्होंने कुछ अच्छे कर्म भी किए हैं। तुम क्या कहोगे कि वे किस मार्ग पर चल रहे हैं? क्या परमेश्वर में विश्वास और अपने कर्तव्य के प्रति इस तरह का रवैया अच्छा है? (नहीं।) बाइबल में परमेश्वर यह कहता है : ‘इसलिये कि तू गुनगुना है, और न ठंडा है और न गर्म, मैं तुझे अपने मुँह में से उगलने पर हूँ’ (प्रकाशितवाक्य 3:16)गुनगुना होना, यानी न ठंडा होना और न ही गर्म—क्या यह रवैया अच्छा है? (नहीं।) कुछ लोग सोचते हैं, ‘अगर मैं बुराई करता हूँ और गड़बड़ियाँ पैदा करता हूँ तो मेरी फौरन निंदा की जाएगी। लेकिन अगर मैं सकारात्मक और सक्रिय रूप से चीजें करता हूँ तो मैं थक जाऊँगा और अगर मैं कुछ करते हुए गलती कर दूँ तो हो सकता है कि मेरी काट-छाँट कर दी जाए या यहाँ तक कि शायद मुझे बर्खास्त भी कर दिया जाए, जो कितना शर्मनाक होगा! इसलिए मैं गुनगुना रहता हूँ, न ठंडा और न ही गर्म। तुम मुझसे जो भी करने को कहोगे, मैं उसे करूँगा। लेकिन अगर तुम मुझे कुछ करने को नहीं कहोगे तो मैं दखल नहीं दूँगा। इस तरह से मुझे थकान नहीं होगी और इसके अलावा, लोग मुझमें कोई गलती नहीं ढूँढ़ पाएँगे। यह तरीका बढ़िया है!’ क्या आचरण करने का यह तरीका अच्छा है? (नहीं।)” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (11))। परमेश्वर के वचनों का मुझ पर गहरा असर हुआ। उसने मेरे कर्तव्य में मेरी असली दशा को उजागर कर दिया था। ऊपरी तौर पर पर्यवेक्षक मुझसे जो कुछ भी करने को कहता था वह मैं कर देती थी; मैं काम की जाँच करती थी और धर्मोपदेश चुनती थी, ये सारे काम करती थी और मैं बुराई नहीं करती थी या बाधाएँ पैदा नहीं करती थी। लेकिन अपने कर्तव्य में मेरा रवैया निष्क्रिय था। मैं एक महीने से अधिक समय से पाठ-आधारित कार्य कर रही थी और मैं हर दिन विवेकहीन रहकर गुजार देती थी और मुझमें तात्कालिकता की कोई भावना नहीं थी। मैं अपने कर्तव्य में बस एक पिछलग्गू की तरह काम करती थी, मैं पत्रों के जवाब में किन लान के दृष्टिकोणों के अनुसार चलती थी और काम की समीक्षा में शामिल नहीं होती थी। काम में कोई प्रगति न होने पर मुझे चिंता या व्याकुलता नहीं होती थी और मैं बस ऐसे बहाने इस्तेमाल करती थी कि “मैं इस काम के लिए नई हूँ,” “मैं यह नहीं कर सकती” या “मुझे यह समझ में नहीं आता” है। मुझमें हर चीज के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया था और मेरे कर्तव्य में जरा भी बोझ की भावना नहीं थी। जो लोग अपने कर्तव्य में बोझ उठाते हैं, वे परमेश्वर के इरादों पर विचार कर पाते हैं और यह सोचने में सक्षम होते हैं कि काम को जल्दी कैसे सँभाला जाए और वे काम के मसलों को हल करने के लिए सत्य खोज पाते हैं, उचित मामलों के बारे में सोच पाते हैं और एक सक्रिय रवैया रख पाते हैं। जहाँ तक मेरी बात है, मैं सिर्फ यह सोचती थी कि अपनी देह को कष्ट से कैसे बचाया जाए। मैं अपने सारे कार्य में अपनी साझेदार बहन पर निर्भर रहती थी और एक भी जिम्मेदारी पूरी नहीं करती थी। तभी मुझे एहसास हुआ कि इस बहन के चेताने में परमेश्वर का इरादा निहित था। अगर मैं अपने कर्तव्य के प्रति इसी रवैये के साथ चलती रही तो यह बहुत खतरनाक होगा और मैं खुद को बर्बाद कर दूँगी। यह समझने के बाद मुझे लगा कि मैं संकट में हूँ और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं दूसरों पर बहुत ही अधिक निर्भर हूँ और बस एक पिछलग्गू बनना चाहती हूँ। मैं कभी भी चीजों के बारे में चिंता करने या कष्ट सहने को तत्पर नहीं रहती और मुझमें अपने कर्तव्य को लेकर बोझ की भावना जरा भी नहीं है। हे परमेश्वर, मैं इस ‘न ठंडी न गर्म’ दशा में रहकर तेरी घृणा का पात्र नहीं बनना चाहती। मैं बदलना चाहती हूँ—कृपया मेरा मार्गदर्शन करो।” उसके बाद मैंने सचेत रूप से अपने कर्तव्य में अपना रवैया उलट दिया, गंभीर मामलों को अपने मन में रखा और शाम को ऊँघना बंद कर दिया।

क्योंकि मैंने पहले अपने कर्तव्य में उचित कार्य पर ध्यान नहीं दिया था या बोझ नहीं उठाया था, मुझे जल्द ही इसके परिणाम भुगतने पड़े। मैं जिस काम का पर्यवेक्षण करती थी उसमें कतई कोई नतीजा नहीं निकला और कुछ भाई-बहन अपने कर्तव्यों में नकारात्मक और निष्क्रिय हो गए थे। जैसी कि कहावत है, “पल्टन सिर्फ उतनी अच्छी होती है जितना अच्छा उसका सेनापति होता है।” चूँकि मैंने अपनी टीम के लिए सिद्धांतों के अध्ययन की व्यवस्था करने में कोई प्रगति नहीं की थी, इसलिए कुछ दिनों बाद पर्यवेक्षक ने इस काम का प्रभार किन लान को सौंप दिया। मुझे यह सुनकर सचमुच बहुत दुख हुआ और एहसास हुआ कि मैंने अध्ययन के लिए निश्चित समय की व्यवस्था नहीं की थी और बस निष्क्रिय रूप से यह इंतजार करती थी कि हर बार किन लान व्यवस्था कर दे। अगर मैं थोड़ी और चौकस होती, थोड़ा सा और बोझ उठाती और समय पर यह व्यवस्था और पर्यवेक्षण करती कि हर कोई सिद्धांतों का अध्ययन करे तो मेरे कर्तव्य संबंधी स्थिति में बदलाव नहीं किया जाता। परमेश्वर इस मामले के जरिए मेरा खुलासा कर रहा था और मैं यह सोचकर परेशान और आत्म-ग्लानि महसूस कर रही थी, “मैं कैसे इस तरीके से अपना कर्तव्य निभा सकती थी? क्या मैं गैर-भरोसेमंद नहीं हो रही हूँ? मेरी सत्यनिष्ठा और गरिमा कहाँ है?” बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के ये दो अंश देखे : “लोगों को उचित कर्म कैसे करने चाहिए और उन्हें ये ऐसी किस दशा और स्थिति में करने चाहिए ताकि इसे अच्छे कर्म तैयार करना माना जाए? कम-से-कम, उन्हें सकारात्मक और सक्रिय रवैया रखना चाहिए और अपना कर्तव्य करते समय वफादार होना ही चाहिए, सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने में समर्थ होना चाहिए और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करनी चाहिए। सकारात्मक और सक्रिय होना सबसे महत्वपूर्ण है; अगर तुम हमेशा निष्क्रिय रहते हो तो यह समस्या वाली बात है। यह ऐसा है मानो तुम परमेश्वर के घर के सदस्य नहीं हो और तुम अपना कर्तव्य नहीं कर रहे हो, मानो तुम्हारे पास वेतन कमाने के लिए इसे करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है क्योंकि नियोक्ता की माँग है कि तुम इसे करो—तुम इसे स्वेच्छा से नहीं कर रहे हो, बल्कि बहुत निष्क्रिय रूप से कर रहे हो। अगर इसमें तुम्हारे हित शामिल नहीं होते तो तुम ऐसा बिल्कुल भी नहीं करते। या अगर किसी ने तुमसे ऐसा करने के लिए नहीं कहा होता तो तुम ऐसा बिल्कुल भी नहीं करते। तो फिर इस दृष्टिकोण से चीजें करना अच्छे कर्म करना नहीं है। इसलिए इस तरह के लोग बहुत मूर्ख होते हैं; वे जो कुछ भी करते हैं उसमें निष्क्रिय होते हैं। वे वह चीज नहीं करते हैं जिसे वे करने के बारे में सोच सकते हैं और न ही वे वह चीज करते हैं जिसे वे समय और ऊर्जा से पूरा कर सकते हैं। वे बस प्रतीक्षा करते हैं और देखते हैं। यह परेशान करने वाली और बहुत दयनीय बात है। ... परमेश्वर ने तुम्हें पर्याप्त काबिलियत और श्रेष्ठतर स्थितियाँ दी हैं जो तुम्हें कुछ चीजें स्पष्टता से देखने देती हैं और इस कार्य के लिए योग्य बनने देती हैं। लेकिन तुम सही रवैया नहीं रखते, तुममें कोई समर्पण और ईमानदारी नहीं है और तुम इसे अच्छी तरह से करने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास नहीं करना चाहते हो। यह परमेश्वर को बहुत ही निराश करता है। इसलिए बहुत सी चीजों का सामना करने पर अगर तुम आलसी रहते हो, हमेशा परेशानी महसूस करते हो और उन्हें नहीं करना चाहते हो और तुम अंदर ही अंदर बड़बड़ाते हो कि, ‘मुझे ही क्यों यह सब करने को कहा जा रहा है, किसी और को क्यों नहीं?’ तो यह एक मूर्खतापूर्ण विचार है। जब तुम्हें कोई कर्तव्य दिया जाता है तो यह कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं है, यह एक सम्मान है और तुम्हें इसे खुशी से स्वीकार करना चाहिए। यह कार्य तुम्हें थका या मार नहीं डालेगा। बल्कि, अगर तुम अपना कर्तव्य अच्छे से निभाते हो, सत्य को समझते हो और समस्याओं का समाधान करते हो, तो तुम अपने मन में शांति और सुकून महसूस करोगे और तुमने परमेश्वर को निराश नहीं किया होगा। परमेश्वर के सामने, तुममें आस्था होगी और तुम सिर उठाकर आचरण कर सकोगे। अगर तुमने अपना कर्तव्य अच्छे से नहीं निभाया है और हमेशा अनमने रहते हो, तो भले ही तुम्हारे कारण कोई नुकसान न हुआ हो, इस अपराध के कारण तुम्हारे दिल में जीवन भर का पछतावा होगा। यह अपराध एक अथाह काले गड्ढे जैसा होगा; जब भी तुम इसके बारे में सोचोगे, तुम्हें दर्द और बेचैनी महसूस होगी, एक ऐसी वेदना जो दिल में चुभती है। तुम्हें न केवल जरा भी शांति या आनंद नहीं मिलेगा, बल्कि इसके विपरीत, पछतावे और यंत्रणा का यह दर्द तुम्हारे पूरे जीवन भर साथ रहेगा और इसे कभी मिटाया नहीं जा सकेगा। क्या यह अनंत पछतावा नहीं है? तो परमेश्वर की नज़र से क्या? परमेश्वर इस मामले को परिभाषित करने के लिए सत्य के सिद्धांतों का उपयोग करता है, इसलिए इसकी प्रकृति उससे कहीं ज़्यादा गंभीर है जो तुम महसूस करते हो। क्या तुम यह समझते हो? तो, तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो उसे देखने के लिए परमेश्वर तुम्हारे सामान्य कार्य-प्रदर्शन पर और सत्य और तुम्हारे कर्तव्य के प्रति तुम्हारे रवैये पर समग्र सोच-विचार करेगा। मान लो कि सत्य और अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा रवैया हमेशा लापरवाह होता है और तुम सतही तौर पर वादे करते हो, लेकिन पर्दे के पीछे उन पर अमल नहीं करते, तुम टालमटोल करते हो और तुममें तत्परता की भावना नहीं होती और तुममें परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होने का सकारात्मक रवैया नहीं होता। भले ही बाहरी तौर पर तुम गड़बड़ी और बाधाएं पैदा नहीं करते, बुरा काम नहीं करते हो, मनमानी और लापरवाही से काम नहीं करते हो या बुरे कर्म करते हुए निरंकुश नहीं दौड़ते हो और देखने में तुम एक नियम का पालन करने वाले काफी शिष्ट व्यक्ति लगते हो, लेकिन तुम परमेश्वर द्वारा तुमसे जो करने की माँग की जाती है उसे सकारात्मक और सक्रिय रूप से नहीं करते, बल्कि तुम धूर्त हो और कामचोरी करते हो और वास्तविक कार्य करने से बचते हो। ऐसे में आखिर तुम वाकई किस मार्ग पर चल रहे हो? अगर यह मसीह-विरोधी का मार्ग न भी हो, तो भी कम-से-कम यह नकली अगुआ का मार्ग तो है ही(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (11))। “कोई भी नष्ट किया जाना और नरक भेजा जाना नहीं चाहता है, लेकिन न चाहते हुए भी बहुत से लोग बार-बार बुराई करते हैं, उस मार्ग पर तेज रफ्तार से आगे बढ़ते हैं जो नरक की तरफ ले जाता है। कुछ लोग परमेश्वर के घर द्वारा दिए गए कर्तव्य करने के अवसरों को बार-बार अनदेखा करते हैं, पवित्र आत्मा के प्रेरित करने और पवित्र आत्मा की धिक्कार को अनदेखा करते हैं और परमेश्वर की अपेक्षाओं को अनदेखा करते हैं। वे लापरवाह होने, अँधाधुँध गलत कर्म करने, बेहूदा मनमानी से कार्य करने, गड़बड़ी और बाधा पैदा करने, सुधार से परे, बेशर्म व्यक्ति होने और बुराई करने पर अड़े रहते हैं। कोई भी तुम्हें ये चीजें करने के लिए मजबूर नहीं कर रहा है और परमेश्वर के घर में किसी ने भी तुमसे इन्हें करने की माँग नहीं की है। स्पष्ट रूप से यह तुम्हारी निजी पसंद है; यह वह है जो तुम करने को तैयार हो, जो करना तुम्हें पसंद है और जिसे करने के लिए तुम जोश से भरे रहते हो। जब यह कहा जाता है कि जिस मार्ग पर तुम चल रहे हो, वह नरक और विनाश की ओर ले जाता है तो तुम परेशान और नकारात्मक महसूस करते हो। यहाँ नकारात्मक महसूस करने की क्या बात है? क्या यह तुम्हारी अपनी गलती नहीं है? क्या यह स्वयं-प्रेरित नहीं है? क्या यह अर्जित नहीं है? कुछ लोग कहते हैं, ‘जब मैं बुराई करता हूँ तो वह इसलिए क्योंकि मैं खुद को रोक नहीं पाता। मैं हर अवसर पर अच्छे तरीके से चीजें करना चाहता हूँ, लेकिन उन्हें कर लेने के बाद मुझे एहसास होता है कि मैंने जो किया वह अच्छा नहीं था।’ तुमने बुराई की और गड़बड़ी और बाधाएँ पैदा कीं जिसके कारण कलीसिया के कार्य में नुकसान हुए। हो सकता है कि तुम्हें तुम्हारे अपराधों के लिए जवाबदेह न ठहराया जाए, लेकिन तुम्हारे अपराध छिपे हुए जोखिम उत्पन्न करते हैं और भविष्य में तुम अपने अपराध दोहरा सकते हो; यह बहुत खतरनाक है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई किसी मार्ग पर चल रहा है—और हर कदम अपने पीछे एक निशान छोड़ रहा है। क्या तुम उन अपराधों को पहचानते हो जो तुमने किए हैं? क्या तुम उनके लिए पछतावा महसूस करते हो? क्या तुम शुक्रगुजार और दुखी महसूस करते हो? क्या तुम उनके कारण फूट-फूट कर रोते हो? क्या तुमने अपना रास्ता सुधार लिया है? क्या तुम सही मायने में अपने बुरे कर्मों से नफरत करते हो? क्या तुमने अपनी बुराई को कुचल दिया है और सही मायने में परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप किया है? ... अगर तुम सही मायने में पश्चात्ताप नहीं कर सकते, बल्कि अपनी कसमों से परमेश्वर को धोखा देते हो तो तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो वह विनाश की तरफ ले जाता है। तुम्हारा हर बुरा कर्म नरक के दरवाजे पर एक दस्तक है; शायद इनमें से कोई एक दस्तक अंत में इसे खोल ही देगी और तब तुम्हारा अंत आ चुका होगा। यह कह सकते हैं कि कुछ लोगों ने जब से परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू किया है, वे तब से लेकर अब तक लगातार बुरे कर्म जमा करते जा रहे हैं और अपने सभी क्रियाकलापों और व्यवहारों से नरक के दरवाजे पर दस्तक दिए जा रहे हैं और साथ ही, परमेश्वर का गुस्सा भी जमा करते जा रहे हैं; वे परमेश्वर की सजा अपने ऊपर टूट पड़ने की प्रतीक्षा कर रहे हैं(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (11))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मेरा मन बहुत बेचैन हो गया। परमेश्वर ने कहा कि जो लोग अपने कर्तव्य में निष्क्रिय रहते हैं, वे वह भी नहीं कर पाते हैं जो वे कर सकते हैं और अपने कर्तव्य में अनमने और गैर-जिम्मेदाराना ढंग से काम करते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो वास्तविक कार्य नहीं करते, नकली अगुआओं के मार्ग पर चलते हैं और परमेश्वर द्वारा उनकी निंदा की जाती है। मैंने आत्म-चिंतन किया : कर्तव्य निभाने के बावजूद मैं खुद को परमेश्वर के घर का सदस्य नहीं समझती हूँ। मैं अपने कर्तव्य में न सिर्फ गैर-वफादार थी, बल्कि सबसे बुनियादी जिम्मेदारियाँ तक पूरी नहीं कर रही थी। मैं जिन बहनों के साथ साझेदार थी, वे विचलनों को सुधारने और हमारे कर्तव्य बेहतर ढंग से निभाने के लिए काम का सारांश तैयार करती थीं, लेकिन जहाँ तक मेरी बात है, मैं न तो भागीदारी करती थी और न ही कुछ पूछती थी। जब मैं विचलन सुधारने के लिए पत्र लिखती थी तो मैं उसमें अपना दिल नहीं लगाती थी और बस बहन के कहे अनुसार एक बिना दिमाग वाले रोबोट की तरह लिख देती थी। मैंने सभी के पेशेवर कौशलों के अध्ययन को भी गंभीरता से नहीं लिया और उनकी प्रगति में देरी की। यह सब मेरे कर्तव्य के लिए चिंता न करने और बोझ न उठाने की मेरी अनिच्छा के कारण था। इस तरह से अपना कर्तव्य करना एक ऐसी बात थी जिससे परमेश्वर घृणा करता था और लोग विकर्षित होते थे और मैं निश्चित रूप से उनके भरोसे के लायक नहीं थी। मैं जो कुछ भी करती थी उसमें सिर्फ अपनी देह के बारे में विचार करती थी, अपने कर्तव्य के बारे में विचार करना या कीमत चुकाना नहीं चाहती थी, बस एक पिछलग्गू की तरह काम करती थी और यह इंतजार करती थी कि मेरे लिए हर चीज की व्यवस्था हो जाए, कलीसिया के कार्य के बारे में बिल्कुल नहीं सोचती थी और परमेश्वर के इरादे पर विचार नहीं करती थी। कर्तव्य के प्रति मेरे इस रवैये ने परमेश्वर को बहुत निराश किया। मैं सारी चीजों में अपनी साझेदार बहन पर निर्भर रहती थी। भले ही मेरी देह को आराम महसूस हुआ हो, लेकिन मुझे अच्छे कर्म तैयार करने का जो मौका परमेश्वर ने दिया था उसे मैंने खो दिया और बिखरे हुए पानी की तरह मैं इसे कभी वापस नहीं पा सकती थी। मैंने ऋणी और पछतावा महसूस किया! परमेश्वर के वचनों की इस पँक्ति ने “तुम्हारा हर बुरा कर्म नरक के दरवाजे पर एक दस्तक है,” मुझे सचमुच झकझोर दिया। मुझे लगता था कि सिर्फ यहूदा और बुराई करने वाले दूसरे लोग ही नरक का द्वार तोड़कर खोल सकते हैं, लेकिन पता यह चला कि परमेश्वर हर उस घड़ी का हिसाब रख रहा था जब भी मैं आराम में लिप्त होती थी, अपने कर्तव्य में बोझ नहीं उठाती थी और पश्चात्ताप करने से इनकार करती थी और परमेश्वर का रखा हुआ हर हिसाब नरक के द्वार को थोड़ा और तोड़कर खोल देता था। सत्य का अभ्यास करने में बार-बार असफल होने से नरक का द्वार टूटकर खुलता है। यह परिणाम सचमुच बहुत भयानक है! इस पर चिंतन करने पर मुझे आखिरकार एहसास हुआ कि मैं सचमुच खतरे में थी और मुझे यह सोचकर थोड़ा सा पछतावा हुआ, “परमेश्वर ने मुझे अभी भी पश्चात्ताप करने का एक मौका दिया है। मुझे अपने कर्तव्य करने के अवसर को संजोना होगा और अपने अपराधों की भरपाई करनी होगी।” मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मुझमें लेशमात्र भी मानवता या विवेक नहीं है। मैं सिर्फ अपनी देह के सुखों में डूबे रहने की परवाह करती हूँ और मुझे जो कर्तव्य अच्छे से निभाने चाहिए उनमें से मैंने एक भी नहीं निभाया है। मैंने तुम्हें बहुत ही दुख पहुँचाया है! हे परमेश्वर, मैं जानती हूँ कि इस तरह से अपना कर्तव्य करना मुझे बर्बाद कर देगा और कलीसिया के कार्य को नुकसान पहुँचाएगा। मैं पश्चात्ताप करने और तुम्हारी जाँच-पड़ताल स्वीकार करने की इच्छुक हूँ। कृपया मुझे अनुशासित करो ताकि मैं खुद को समझ सकूँ और अपने भ्रष्ट स्वभाव को त्याग सकूँ।”

बाद में मैंने सोचा, “मैं चीजों के बारे में चिंता करने और अपना दिमाग लगाने के लिए हमेशा क्यों अनिच्छुक रहती हूँ? इसका मूल कारण क्या है?” मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े : “आलसी लोग कुछ भी नहीं कर सकते हैं। इसे संक्षेप में प्रस्तुत करें, तो वे बेकार लोग हैं; उनमें एक द्वितीय-श्रेणी की अक्षमता है। आलसी लोगों की काबिलियत कितनी भी अच्छी क्यों न हो, वह नुमाइश से ज्यादा कुछ नहीं होती; भले ही उनमें अच्छी काबिलियत हो, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं है। वे बहुत ही आलसी होते हैं—उन्हें पता होता है कि उन्हें क्या करना चाहिए, लेकिन वे वैसा नहीं करते हैं, और भले ही उन्हें पता हो कि कोई चीज एक समस्या है, फिर भी वे इसे हल करने के लिए सत्य की तलाश नहीं करते हैं, और वैसे तो वे जानते हैं कि कार्य को प्रभावी बनाने के लिए उन्हें क्या कष्ट सहने चाहिए, लेकिन वे इन उपयोगी कष्टों को सहने के इच्छुक नहीं होते हैं—इसलिए वे कोई सत्य प्राप्त नहीं कर पाते हैं, और वे कोई वास्तविक कार्य नहीं कर सकते हैं। वे उन कष्टों को सहना नहीं चाहते हैं जो लोगों को सहने चाहिए; उन्हें सिर्फ सुख-सुविधाओं में लिप्त रहना, खुशी और फुर्सत के समय का आनंद लेना और एक मुक्त और शांतिपूर्ण जीवन का आनंद लेना आता है। क्या वे निकम्मे नहीं हैं? जो लोग कष्ट सहन नहीं कर सकते हैं, वे जीने के लायक नहीं हैं। जो लोग हमेशा परजीवी की तरह जीवन जीना चाहते हैं, उनमें जमीर या विवेक नहीं होता है; वे पशु हैं, और ऐसे लोग श्रम करने के लिए भी अयोग्य हैं। क्योंकि वे कष्ट सहन नहीं कर पाते हैं, इसलिए श्रम करते समय भी वे इसे अच्छी तरह से करने में समर्थ नहीं होते हैं, और अगर वे सत्य प्राप्त करना चाहें, तो इसकी उम्मीद तो और भी कम है। जो व्यक्ति कष्ट नहीं सह सकता है और सत्य से प्रेम नहीं करता है, वह निकम्मा व्यक्ति है; वह श्रम करने के लिए भी अयोग्य है। वह एक पशु है, जिसमें रत्ती भर भी मानवता नहीं है। ऐसे लोगों को हटा देना चाहिए; सिर्फ यही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (8))। “किस तरह के लोग बेकार होते हैं? भ्रमित लोग, जो आराम और मौजमस्ती करके अपने दिन बिताते हैं। इस तरह के लोग अपने किसी भी कार्य में जिम्मेदार नहीं होते, और ना ही वे इसे गंभीरता से लेते हैं; वे सब-कुछ गड़बड़ कर देते हैं। वे तुम्हारी बातों पर ध्यान नहीं देते, चाहे तुम सत्य पर कैसे भी संगति क्यों ना करो। वे सोचते हैं, ‘अगर मैं चाहूँ, तो मैं इसी तरह कामचलाऊ तरीके से कार्य करूँगा। तुम जो चाहे कह लो! वैसे भी, इस समय मैं अपना कर्तव्य कर रहा हूँ और मेरे पास खाने के लिए भोजन है, इतना काफी है। कम से कम मुझे भिखारी तो बनना नहीं पड़ रहा है। अगर किसी दिन मेरे पास खाने के लिए कुछ न हुआ, तो मैं इसके बारे में सोचूँगा। स्वर्ग हमेशा मनुष्य के लिए एक रास्ता छोड़ेगा। तुम कहते हो कि मुझमें कोई जमीर या सूझ-बूझ नहीं है, और कि मैं भ्रमित हूँ—अच्छा, तो क्या हुआ? मैंने कानून नहीं तोड़ा है। ज्यादा से ज्यादा, मेरा बस चरित्र थोड़ा कमजोर है, लेकिन इससे मेरा कोई नुकसान नहीं है। जब तक मेरे पास खाने के लिए भोजन है, सब ठीक है।’ तुम इस दृष्टिकोण के बारे में क्या सोचते हो? मैं तुमसे कहता हूँ, इस तरह के भ्रमित लोग जो आराम और मौजमस्ती करके अपने दिन बिताते हैं, उनकी किस्मत में निकाल दिया जाना लिखा है, और ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे वे उद्धार प्राप्त कर सकें(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (8))। परमेश्वर के कठोर वचनों ने मेरे सुन्न दिल को झकझोर दिया और आलसी लोगों के सार को उजागर कर दिया। आलसी लोग कष्ट सहने और कीमत चुकाने के इच्छुक नहीं होते और हमेशा एक बेफिक्र जीवनशैली जीना चाहते हैं। ये लोग कुछ भी हासिल करने में सक्षम नहीं होते, इसलिए उनके लिए सत्य और उद्धार पाना तो और भी असंभव होगा। परमेश्वर कहता है कि आलसी लोग बेकार हैं, जानवर हैं और उन्हें हटा दिया जाना चाहिए और मैं ठीक ऐसे ही एक बेकार इंसान की भूमिका निभा रही थी। मैं अपने कर्तव्य के बारे में सोचना और कीमत चुकाना नहीं चाहती थी और एक परजीवी की तरह जी रही थी, हर चीज के लिए दूसरों पर निर्भर रहती थी और बस यूँ ही जीती चली जा रही थी। जब मैंने पहली बार अपना पाठ-आधारित कर्तव्य शुरू किया था तो मेरे पास ऐसा कोई नहीं था जिस पर मैं निर्भर रहूँ और मैं परमेश्वर पर निर्भर रहने, लगन से अध्ययन करने और कुछ उन्नति करने में सक्षम थी। जब मैंने बहन के साथ साझेदारी शुरू की तो मैं उतनी लगनशील नहीं थी, मैं अपने कर्तव्य में गुनगुनी हो गई और काम के बारे में सोचना या कीमत चुकाना नहीं चाहती थी, बस आराम और फुर्सत में अपने दिन बिताकर खानापूरी करने की कोशिश करती थी। मैं अपने कर्तव्य में बोझ नहीं उठाती थी, इसलिए मैंने ऐसे किसी भी काम की जिम्मेदारी नहीं ली जो मुझे सौंपा गया था। दूसरी बहनें मेरी चिंता करती थीं और उन्हें मेरा काम भी सँभालना पड़ता था। फिर भी मुझे कोई होश नहीं था। मैं स्वाभाविक रूप से अपनी बहनों पर निर्भर थी। एक महीने से भी ऊपर पाठ-आधारित कर्तव्य निभाने के बाद भी मैं अभी भी ऐसे बहाने बना रही थी कि “मैं इस काम के लिए नई हूँ,” “मैं यह नहीं कर सकती” या “मुझे यह समझ में नहीं आता” और काम का जायजा नहीं लेती थी। मैं कितनी बेशर्म थी! मैं इस शैतानी फलसफे के अनुसार जी रही थी कि “चार दिन की जिंदगी है, मौज कर लो” और “आज मौज करो, कल की फिक्र कल करना”। इन्हीं पतनशील और भ्रष्ट विचारों और धारणाओं ने मुझे एक पतित इंसान बना दिया। मैं सिर्फ यह सोचती थी कि अपनी देह को कष्ट और चिंता से कैसे बचाया जाए और इस बात पर जरा सा भी ध्यान नहीं देती थी कि अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कैसे निभाया जाए। मैंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण काम में देरी कर दी। मैं असल में कलीसिया के काम में गड़बड़ी कर रही थी और शैतान के सेवक के रूप में काम कर रही थी! परमेश्वर कहता है : “यदि तुम परमेश्वर के आदेशों के साथ हल्के में पेश आते हो, तो यह परमेश्वर के साथ अत्यन्त भयंकर विश्वासघात है। इस मामले में तुम यहूदा से भी अधिक निंदनीय हो और तुम्हें शाप दिया जाना चाहिए(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें)। इन सबके परिणामों के बारे में सोचकर मुझे काफी डर लगा। मुझ जैसा इंसान भरोसे के लायक नहीं था और अगर मैं इसी तरह चलती रही तो मुझे सचमुच हटा दिया जाएगा। मुझे ख्याल आया कि सूअर कैसे अपने बाड़े में हर दिन यह इंतजार करते हैं कि उनका मालिक उन्हें खिलाए और पेट भरने के बाद बिना किसी परवाह के गहरी नींद सो जाते हैं। अगर मैं इसी तरह जीती रहती, अपनी देह के सुखों का आनंद लेती रहती तो मैं मुझमें और एक सूअर में कोई अंतर नहीं होगा और परमेश्वर द्वारा मुझे हटाया जाना बस समय की बात रह जाएगी। मैं नहीं चाहती थी कि आलसी और बेकार बनी रहूँ, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं अब और जैसे-तैसे जिंदगी नहीं काटना चाहती हूँ। यह जीने का बहुत नीच तरीका है और इसका कोई मूल्य नहीं है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करो कि मैं और अधिक लगनशील बनूँ और अपना कर्तव्य ठीक से निभाऊँ।”

बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के एक अंश के जरिए अभ्यास का मार्ग पा लिया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “बुराई किए बिना अपना कर्तव्य निभाना कुछ ऐसा है जिसे तुम्हें एक सामान्य व्यक्ति के रूप में प्राप्त करना चाहिए। लेकिन अच्छे कर्मों की तैयारी करने का मतलब है कि तुम्हें सक्रिय और सकारात्मक रूप से सत्य का अभ्यास करना चाहिए और परमेश्वर की अपेक्षाओं और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। तुममें निष्ठा होनी चाहिए, तुम्हें कष्ट सहने और कीमत चुकाने को तैयार रहना चाहिए, जिम्मेदारी लेने को तैयार रहना चाहिए और सकारात्मक और सक्रिय रूप से कार्य करने में समर्थ होना चाहिए। इन सिद्धांतों के अनुसार किए गए सभी क्रियाकलाप बुनियादी रूप से अच्छे कर्म हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे बड़े मामले हैं या छोटे, वे लोगों द्वारा याद किए जाने लायक हैं या नहीं, उन्हें लोगों से बहुत सम्मान मिलता है या वे महत्वहीन माने जाते हैं या क्या लोग उन्हें ध्यान देने योग्य समझते हैं, परमेश्वर की नजर में वे सभी अच्छे कर्म हैं। अगर तुमने अच्छे कर्म तैयार किए हैं, तो अंत में यह तुम्हारे लिए आशीषें लेकर आएगा, विपत्तियाँ लेकर नहीं। मान लो कि तुम किसी अच्छे कर्म की तैयारी नहीं करते हो और बस निम्नलिखित से संतुष्ट रहते हो : ‘मुझे जो भी करने को कहा जाता है, मैं करता हूँ और मुझे जहाँ भी जाने को कहा जाता है, मैं चला जाता हूँ। मैं कभी भी मनमाने ढंग से कुछ नहीं बोलता या कोई कार्य नहीं करता और मैं कभी भी शरारत की भावना से परेशानी खड़ी नहीं करता या गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा नहीं करता। मैं वास्तव में आज्ञाकारी और शिष्ट हूँ।’ अगर तुम अपना कर्तव्य करने में सक्रियता से सत्य खोजे बिना और सिद्धांत कायम रखे बिना, अपने विचलनों और गलतियों का पता चलने पर उन्हें तुरंत सुधारे या बदले बिना हमेशा यही रवैया रखते हो और जब तुम्हें अपने विद्रोहीपन का पता चलता है या तुम देखते हो कि तुम भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हो तो समस्याएँ हल करने के लिए कभी भी सकारात्मक रूप से, सक्रियता से सत्य नहीं खोजते हो, बल्कि जो भी चाहते हो बस वही करते हो तो भले ही तुमने परमेश्वर के घर के हितों का कोई नुकसान न किया हो या कलीसिया के कार्य को प्रभावित न किया हो, फिर भी तुम जो कर रहे हो वह ज्यादा-से-ज्यादा सिर्फ श्रम करना है। श्रम करना, इसकी प्रकृति के अनुसार, अच्छे कर्म नहीं माना जाता है। तो आखिरकार अच्छे कर्मों को कैसे परिभाषित किया जाता है? इस तरह कि तुम जो करते हो वह कम-से-कम तुम्हारे और भाई-बहनों के जीवन प्रवेश के लिए उपयोगी होता है और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए लाभदायक होता है। अगर यह तुम्हारे लिए, दूसरों के लिए और परमेश्वर के घर के लिए लाभदायक है तो तुम्हारा कर्तव्य निर्वहन परमेश्वर के सामने प्रभावी और परमेश्वर द्वारा अनुमोदित है। परमेश्वर तुम्हें अंक देगा। इसलिए इन चीजों का मूल्यांकन करो : तुमने बीते वर्षों में कितने अच्छे कर्म तैयार किए हैं? क्या ये अच्छे कर्म तुम्हारे अपराधों की भरपाई कर सकते हैं? उनकी भरपाई करने के बाद कितने अच्छे कर्म बचते हैं? तुम्हें खुद को अंक देने और इस पर मजबूत पकड़ बनाने की जरूरत है; तुम्हें इस मामले को लेकर मानसिक भ्रम की स्थिति में नहीं होना चाहिए(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (11))। परमेश्वर के वचनों में उसका इरादा और उसकी माँगें निहित होती हैं और वह हमें अभ्यास का मार्ग भी बताता है। एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना बहुत महत्वपूर्ण है। सिद्धांत के अनुसार अपना कर्तव्य करना, मेहनती होना, कीमत चुकाना और बोझ उठाना—केवल इस तरीके से अपने कर्तव्य सक्रिय रूप से निभाकर ही व्यक्ति अच्छे कर्म तैयार कर सकता है और परमेश्वर के इरादे के अनुरूप हो सकता है। अगर तुम अपने कर्तव्य में सिर्फ खानापूरी करते हो और केवल वही करते हो जो कहा जाता है तो हो सकता है कि यह बाधा डालने या गड़बड़ी पैदा करने जैसा न लगे, लेकिन तुम अपने कर्तव्य में अपना दिल लगाने में विफल रहते हो, इसलिए परमेश्वर तुम्हारा अनुमोदन नहीं करता है। मैंने इस पर चिंतन किया कि कैसे मैं अपने कर्तव्य में न ठंडी थी न गर्म, मैं वह कार्य करने में नाकाम रही जो मुझे सौंपा गया था और मैंने अपने कर्तव्य में गड़बड़ी पैदा की और बाधा डाली। मैंने न केवल अच्छे कर्म तैयार नहीं किए थे, बल्कि मैंने अपराध भी किए थे। मेरा कर्तव्य यह था कि मैं अच्छे सुसमाचार धर्मोपदेशों का चयन करूँ, सुसमाचार का प्रचार करने, परमेश्वर की गवाही देने और उद्धार पाने के लिए और भी अधिक लोगों को परमेश्वर के सामने लाने में मदद करूँ। यह एक बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी और जरा सी भी ढिलाई अस्वीकार्य थी। मैंने अभी-अभी प्रशिक्षण लेना शुरू किया था और मुझमें अभी भी बहुत सारी कमियाँ थीं। मुझे अध्ययन करने और विचार करने में समय और प्रयास लगाना था और अपना कर्तव्य परमेश्वर की माँगों और सिद्धांतों के अनुसार निभाना था। मुझे काम की परवाह करना और उसके बारे में पूछताछ करना, अपने कर्तव्य के साथ जिम्मेदारी और लगन से पेश आना और अपने काम का बोझ उठाना भी सीखना था। केवल यही परमेश्वर के इरादे के अनुरूप होता।

उसके बाद मैंने अक्सर परमेश्वर से प्रार्थना की, अपनी देह के खिलाफ विद्रोह किया, न ठंडी न गर्म और विचारहीन होना बंद कर दिया और अपनी जिम्मेदारियों को सक्रिय रूप से सँभालने में सक्षम हो गई। मुझे यह एहसास भी हुआ कि कलीसिया ने मुझे बहन का जोड़ीदार इसलिए नहीं बनाया कि मैं देह के सुखों का आनंद ले सकूँ, बल्कि इसलिए बनाया कि हम एक-दूसरे की कमियों की भरपाई कर सकें और अपने उपयोगी विचारों को साझा कर सकें। अपना कर्तव्य का इस तरीके से निर्वहन हमारे विचलनों को कम कर देता, हमारे कर्तव्य के लिए लाभकारी होता और हमारे जीवन प्रवेश के लिए भी मददगार होता। मैं अपनी टीम के कार्य में सचेत रूप से भाग लेने लगी, अपने कार्य की समीक्षा में दिमाग लगाती थी और कुछ विचार व्यक्त करती थी और जहाँ मुझमें कमियाँ होतीं वहाँ मेरी बहनें भरपाई कर देती थीं। इस तरह मिलकर सहयोग करने से हमारी संगति और अधिक परिष्कृत और लक्षित हो गई और इस प्रक्रिया में मुझे भी चीजें हासिल हुईं। तब मैंने उतना विचारहीन होना छोड़ दिया और मैं अपने कर्तव्य में दिमाग लगाने और जो मैं जानती हूँ उसे अमल में लाने में सक्षम हो गई। इस तरीके से अभ्यास करके मैंने और अधिक सहज महसूस किया। कुछ समय के बाद मुझे यह महसूस नहीं हुआ कि मैं पहले जैसी विवेकहीन हूँ, मैंने सत्य और पेशेवर कौशलों में उन्नति की और मैं परमेश्वर के प्रबोधन और मार्गदर्शन को महसूस कर सकती थी। परमेश्वर का धन्यवाद!

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