21. क्या केवल अनुग्रह का आनंद लेने की कोशिश करना ही परमेश्वर में सच्चा विश्वास है?
प्रभु यीशु को पाने से पहले, मैंने बहुत पीड़ा, कठिन परीक्षाएँ, असफलताएँ और नाकामियाँ झेलीं। पहले, मेरे जुड़वाँ बेटे हुए जो समय से पहले पैदा हुए और बच नहीं पाए, फिर मुझे एक के बाद एक व्यापार में असफलताएँ मिलीं और लोगों ने मेरे खिलाफ साजिसें कीं, यहाँ तक कि मैं अब व्यापार में टिक ही नहीं सकी। लेकिन मेरे लिए सबसे मुश्किल मेरे पति का विश्वासघात सहना था। एक के बाद एक लगे इन आघातों ने मुझे इस हद तक तोड़ दिया कि मैं जीने का साहस लगभग खो बैठी थी। 2001 में जब मैंने प्रभु यीशु को पाया, तब जाकर मुझे आशा की किरण दिखाई दी। प्रभु को पाने के बाद, मैंने बाइबल पढ़ना, सभाओं में जाना शुरू कर दिया, मैं हर दिन प्रभु से प्रार्थना करती, अपने बोझ और दर्द उसे सौंप देती थी, अनजाने में ही मेरे दर्द और चिंताएँ गायब हो गईं, मेरे दिल को ऐसी शांति और सुकून मिला जो मैंने पहले कभी अनुभव नहीं किया था। मैं पहले से कहीं ज्यादा खुश और तनावमुक्त भी हो गई। बाद में, मेरा एक और बेटा हुआ और जीवन धीरे-धीरे सहज हो गया। इन बदलावों ने मुझे महसूस कराया कि प्रभु यीशु वास्तव में भरोसेमंद और अद्भुत है, मैं प्रभु को पाकर बहुत खुश थी और प्रभु यीशु द्वारा मुझे बचाने के लिए मैं सचमुच आभारी थी।
मई 2003 में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकारा और प्रभु की वापसी का स्वागत किया। मुझे पता चला कि यह मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण है और इसका उद्देश्य मनुष्य के पाप की जड़ और उसके भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करना है और अंततः बचाए गए लोगों को परमेश्वर के राज्य में लाना है। मैंने सचमुच धन्य महसूस किया, मैं बेहद उत्साहित और खुश थी और मैंने लगन से अनुसरण करने का मन बना लिया। उसके बाद, मैं हर दिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ती और प्रार्थना करती थी और चाहे धूप हो या बारिश, मैं बिना चूके सभाओं में जाती थी। भले ही मेरे पति ने मेरी आस्था का विरोध किया, पर मैं उससे बाधित नहीं हुई, मैंने घर पर मेजबानी का कर्तव्य निभाया और जब भी मेरे पास समय होता, मैं सुसमाचार का प्रचार करती थी। मैंने सोचा कि इतने उत्साह से अनुसरण करने से परमेश्वर निश्चित रूप से मेरा अनुमोदन करेगा, मुझे और भी अधिक अनुग्रह और आशीषें देगा, भविष्य में मुझे शांति और सुरक्षा का जीवन प्रदान करेगा।
बाद में, मेरे एक साल के बेटे को बार-बार बुखार आने लगा, कई बार तो यह 39 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता था, साथ में उसे गंभीर अस्थमा भी था। कभी-कभी वह उल्टी कर देता, बुखार की दवा का कोई असर नहीं होता और कई दिनों या यहाँ तक कि आधे महीने तक लगातार नसों में इंजेक्शन लगवाने के लिए अस्पताल ले जाने के बाद ही वह ठीक हो पाया। अपने बच्चे को हर दिन इंजेक्शन लेते या दवा खाते देखना, उसके गोल-मटोल चेहरे को लगातार दुबला होते और उसका पहले वाला गुलाबी रंग और चमक खोते देखना, इससे मेरा दिल टूट जाता था और मैं रो पड़ती थी, बस यही कामना करती थी कि उसके बजाय यह बीमारी मुझे हो जाए। डॉक्टर ने कहा कि यह जन्मजात एलर्जिक अस्थमा है और उन्होंने कहा कि यह बीमारी काफी परेशानी वाली है, क्योंकि इसका कोई विशेष उपचार उपलब्ध नहीं है, केवल स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पारंपरिक उपचार ही है, लेकिन उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे वह बड़ा होगा और उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होगी, उसकी हालत में सुधार हो सकता है। डॉक्टर की अस्पष्ट बातें सुनकर मैं दर्द और लाचारी की भावनाओं से भर गई। मैं अक्सर परमेश्वर से प्रार्थना करती, उससे अपने बच्चे की बीमारी को ठीक करने के लिए कहती। लेकिन मेरे बच्चे की बीमारी में कभी सुधार नहीं हुआ और मेरे मन में धारणाएँ आने लगीं, मैं सोचने लगी, “मैं अपने अनुसरण में हमेशा उत्साही रही हूँ, हर दिन प्रार्थना करती हूँ और परमेश्वर के वचन पढ़ती हूँ, मैंने कभी सभाओं में देरी नहीं की और मैं सक्रिय रूप से अपने कर्तव्य करती रही हूँ। परमेश्वर को मुझे आशीष देनी चाहिए, है न? जब मैं प्रभु यीशु में विश्वास करती थी, तो मुझे अनुग्रह, आशीषें, शांति और खुशी मिली थी। लेकिन अब जब मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करती हूँ, तो उसने मेरे बच्चे की बीमारी को ठीक क्यों नहीं किया है? परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, तो क्या वह एक ही वचन से मेरे बेटे की बीमारी को ठीक नहीं कर सकता? परमेश्वर मेरी प्रार्थनाएँ क्यों नहीं सुनता?” मुझे खासकर अपने एक रिश्तेदार के बच्चे की याद आई, जिसे तेज बुखार के इलाज में देरी के कारण मस्तिष्क की समस्या हो गई थी। मेरा बेटा अभी भी बहुत छोटा था और मुझे चिंता होती थी कि कहीं उसके बार-बार के तेज बुखार से उसके दिमाग को नुकसान न पहुँचे और उसकी बुद्धि पर असर न पड़े। यह सोचते ही मैं हृदय-विदारक पीड़ा से भर जाती थी। मेरे पहले के जुड़वाँ बच्चे तो जा ही चुके थे और डॉक्टर ने कहा था कि मेरे शरीर को गर्भधारण करने में कठिनाई होती है, ऐसे में अगर मेरे बेटे को कुछ हो गया, तो मैं कैसे जियूँगी? यह सब सोचकर, मैं फूट-फूट कर रोए बिना नहीं रह सकी और मैं रोते हुए परमेश्वर से बेतहाशा प्रार्थना करती रही, उससे दया करने, मेरे बेटे की रक्षा करने और उसे जल्दी ठीक करने के लिए कहती रही। लेकिन मैं चाहे जितनी भी प्रार्थना करती, ऐसा लगता था कि परमेश्वर मेरी नहीं सुन रहा है। कुछ समय बाद, न केवल मेरे बच्चे की बीमारी में सुधार नहीं हुआ, बल्कि उसे और भी ज्यादा बार बुखार आने लगा और जब भी उसे बुखार आता, वह ठीक से साँस नहीं ले पाता था, वह कुछ भी नहीं खा पाता था और खाने के बाद उल्टी कर देता था। अपने बच्चे को इतनी कम उम्र में इतना कष्ट सहते देखना मेरे लिए बहुत ज्यादा असहनीय था और मेरे मन में परमेश्वर को लेकर संदेह पैदा होने लगे, मैं सोचने लगी, “जब मैं प्रभु यीशु में विश्वास करती थी, तो बीमारी के लिए प्रार्थना करने पर वह हमेशा चंगा कर देता था, लेकिन अब जब मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने लगी हूँ, तो मेरी प्रार्थनाएँ काम क्यों नहीं कर रही हैं? क्या मैं गलत चीज में विश्वास कर रही हूँ? क्या सर्वशक्तिमान परमेश्वर सचमुच लौटकर आया प्रभु यीशु है?” चूँकि मेरा बच्चा अक्सर बीमार रहता था, मेरा सारा ध्यान उसकी देखभाल पर ही लगा रहता था। मैं नियमित रूप से सभाओं में नहीं जा रही थी, मैं परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाती थी और मेरी प्रार्थनाओं में कहने के लिए कुछ नहीं होता था। मेरा दिल परमेश्वर से दूर जा रहा था।
बाद में, कुछ बहनें मेरी मदद और सहारे के लिए आईं और उन्होंने मेरे पढ़ने के लिए परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश ढूँढ़े। मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर किए जाने वाले कार्य का हर कदम बाहर से यह लोगों के मध्य अंतःक्रिया प्रतीत होता है, मानो यह मानव-व्यवस्थाओं द्वारा या मानवीय विघ्न से उत्पन्न हुआ हो। किंतु, कार्य के प्रत्येक कदम, और घटित होने वाली हर चीज के पीछे शैतान द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाजी है और इनमें अपेक्षित है कि लोग परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब का परीक्षण हुआ : पर्दे के पीछे शैतान परमेश्वर के साथ शर्त लगा रहा था और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कर्म थे और मनुष्यों के विघ्न थे। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों पर किए गए कार्य के हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाजी होती है—इसके पीछे एक लड़ाई होती है। ... हर चीज जो लोग करते हैं, उसमें उनके हृदय के रक्त की निश्चित मात्रा की आवश्यकता होती है। बिना वास्तविक कठिनाई के वे परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर सकते; वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के करीब तक भी नहीं पहुँचते और केवल खोखले नारे लगा रहे होते हैं! क्या ये खोखले नारे परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं? जब परमेश्वर और शैतान आध्यात्मिक क्षेत्र में लड़ाई करते हैं, तो तुम्हें परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करना चाहिए और किस प्रकार उसकी गवाही में अडिग रहना चाहिए? तुम्हें यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है वह एक महान परीक्षण है और वह समय है जब परमेश्वर यह चाहता है कि तुम गवाही दो” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है)। मेरी एक बहन ने कहा, “हमारे जीवन में कई निराशाजनक बातें होंगी और हर एक के पीछे एक आत्मिक युद्ध है। परमेश्वर की ओर से, परमेश्वर हमें परीक्षणों से गुजार रहा है, यह देखने के लिए कि क्या हमें उस पर आस्था है और क्या हम अपनी गवाही में अडिग रह सकते हैं; शैतान की ओर से, शैतान हम पर हमला कर रहा है और हमें ललचा रहा है, जिसका लक्ष्य है कि हम परमेश्वर के कार्य पर संदेह करें और फिर परमेश्वर को नकार दें और उसके साथ विश्वासघात करें। यह ठीक वैसा ही था जैसा अय्यूब के साथ हुआ था। बाहर से तो ऐसा लगा कि डाकुओं ने उसकी संपत्ति लूट ली थी और वह पीड़ादायक फोड़ों से भर गया था, लेकिन असल में शैतान परमेश्वर के साथ शर्त लगा रहा था, बस यह देखने के लिए कि अय्यूब किस पक्ष में खड़ा होगा। आज, सर्वशक्तिमान परमेश्वर हमें बचाने के लिए सत्य व्यक्त करने आया है और शैतान यह बर्दाश्त नहीं कर सकता, इसलिए शैतान हम पर हमला करने और बाधा डालने के लिए हमारे बच्चों की बीमारियों का इस्तेमाल करता है, वह कोशिश करता है कि हम परमेश्वर पर संदेह करें या यहाँ तक कि उसे नकार दें और छोड़ दें। हमें शैतान की साजिशों की असलियत जानने के लिए और अधिक प्रार्थना करने और परमेश्वर पर भरोसा करने की जरूरत है।” बहन की संगति सुनने के बाद, मैंने अपने व्यवहार और जो चीजें मैं प्रकट कर रही थी, उन पर विचार किया, मैंने देखा कि मुझमें परमेश्वर के प्रति कोई सच्ची आस्था या समर्पण नहीं था और मैं शैतान की साजिशों का कोई भेद नहीं पहचानती थी। मैं अपनी आस्था में बस अपने उत्साह पर ही भरोसा कर रही थी और मैंने अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से सोचा कि प्रभु यीशु ने बीमारों को चंगा किया, राक्षसों को निकाला, अनुग्रह और आशीषें दीं और चूँकि सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटकर आया प्रभु यीशु है, तो वह निश्चित रूप से बीमारों को चंगा करने और राक्षसों को निकालने के लिए संकेत और चमत्कार दिखा सकता है, इसलिए मैं परमेश्वर से प्रार्थना करती रही, उससे अपने बच्चे को ठीक करने के लिए कहती रही। मैंने सोचा कि परमेश्वर निश्चित रूप से मेरे जोशीले अनुसरण को ध्यान में रखेगा और मेरे बच्चे को जल्दी ठीक कर देगा। लेकिन जब हकीकत मेरी सोच के बिल्कुल विपरीत थी और मेरे बच्चे की हालत में सुधार तो नहीं हुआ, बल्कि और खराब हो गई, तो मैंने परमेश्वर पर संदेह करना शुरू कर दिया और मैंने प्रार्थना करने, सभाओं में जाने और अपने कर्तव्य करने की प्रेरणा खो दी। मैंने अनजाने में ही इतनी भ्रष्टता प्रकट कर दी। मैंने तो यह भी सोचा था कि मेरे विचार पूरी तरह से सही हैं, लेकिन मुझे एहसास हुआ कि मैं परमेश्वर में अपनी आस्था को लेकर पूरी तरह से भ्रमित थी! अपनी कमियों का एहसास होने पर मैंने सचेत रूप से परमेश्वर के और अधिक वचन खाए-पिए और अधिक सभाओं में भाग लिया, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना भी की, उससे मुझे आस्था और शक्ति देने के लिए कहा ताकि मैं इस स्थिति में अडिग रह सकूँ और अपने बच्चे की बीमारी से सबक सीख सकूँ।
एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मनुष्य की धारणाओं के अनुसार, परमेश्वर को सदैव संकेत और चमत्कार दिखाने चाहिए, सदैव बीमारों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना चाहिए, और सदैव ठीक यीशु के समान होना चाहिए। परंतु इस बार परमेश्वर इसके समान बिल्कुल नहीं है। यदि अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर अब भी संकेतों और चमत्कारों को प्रदर्शित करे, और अब भी दुष्टात्माओं को निकाले और बीमारों को चंगा करे—यदि वह बिल्कुल यीशु की तरह करे—तो परमेश्वर वही कार्य दोहरा रहा होगा, और यीशु के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाएगा। इसलिए परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य का एक चरण पूरा करता है। ज्यों ही उसके कार्य का प्रत्येक चरण पूरा होता है, बुरी आत्माएँ शीघ्र ही उसकी नकल करने लगती हैं, और जब शैतान परमेश्वर के बिल्कुल पीछे-पीछे चलने लगता है, तब परमेश्वर तरीका बदलकर भिन्न तरीका अपना लेता है। ज्यों ही परमेश्वर ने अपने कार्य का एक चरण पूरा किया, बुरी आत्माएँ उसकी नकल कर लेती हैं। तुम लोगों को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए। आज परमेश्वर का कार्य यीशु के कार्य से भिन्न क्यों है? आज परमेश्वर चिह्नों और चमत्कारों का प्रदर्शन, पिशाचों का बहिष्करण और बीमारों को चंगा क्यों नहीं करता? यदि यीशु का कार्य व्यवस्था के युग के दौरान किए गए कार्य के समान ही होता, तो क्या वह अनुग्रह के युग के परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर पाता? क्या वह सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा कर पाता? यदि व्यवस्था के युग की तरह यीशु मंदिर में गया होता और उसने सब्त को माना होता, तो उसे कोई नहीं सताता और सब उसे गले लगाते। यदि ऐसा होता, तो क्या उसे सलीब पर चढ़ाया जा सकता था? क्या वह छुटकारे का कार्य पूरा कर सकता था? यदि अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर यीशु के समान चिह्न और चमत्कार दिखाता, तो इसमें भला कौन-सी खास बात होती? यदि परमेश्वर अंत के दिनों के दौरान अपने कार्य का दूसरा भाग करता है, जो उसकी प्रबंधन योजना के भाग का प्रतिनिधित्व करता है, तो केवल तभी मनुष्य परमेश्वर का अधिक गहरा ज्ञान प्राप्त कर सकता है, और केवल तभी परमेश्वर की प्रबंधन योजना पूर्ण हो सकती है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वर्तमान कार्य का ज्ञान)। “इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के लिए जीवन के वचनों का पोषण देना; मनुष्य का प्रकृति सार, और भ्रष्ट स्वभाव उजागर करना; और धर्म संबंधी धारणाओं, सामंती सोच, पुरानी पड़ चुकी सोच और मनुष्य के ज्ञान और संस्कृति को मिटाना है; ये सभी चीजें परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर किए जाने के माध्यम से शुद्ध की जानी चाहिए। अंत के दिनों में, मनुष्य को पूर्ण करने के लिए परमेश्वर चिह्नों और चमत्कारों का नहीं, वचनों का उपयोग करता है। वह मनुष्य को प्रकट करने, उसका न्याय करने, उसे ताड़ना देने और उसे पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, ताकि परमेश्वर के वचनों में मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि और मनोहरता देखने लगे, और परमेश्वर के स्वभाव को समझने लगे, और ताकि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर के कर्मों को निहारे” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वर्तमान कार्य का ज्ञान)। “आज, तुम सभी लोगों को यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा मुख्य रूप से ‘वचन देहधारी होता है’ का तथ्य साकार किया जाता है। पृथ्वी पर अपने वास्तविक कार्य के माध्यम से वह इस बात का निमित्त बनता है कि मनुष्य उसे जाने, उसके साथ जुड़े और उसके व्यावहारिक कर्मों को देखे। वह मनुष्य के लिए यह स्पष्ट रूप से देखने का निमित्त बनता है कि वह चिह्न और चमत्कार दिखाने में सक्षम है और ऐसा समय भी आता है, जब वह ऐसा करने में अक्षम होता है; यह युग पर निर्भर करता है। इससे तुम देख सकते हो कि परमेश्वर चिह्न और चमत्कार दिखाने में अक्षम नहीं है, बल्कि इसके बजाय वह अपने कार्य का ढंग, किए जाने वाले कार्य और युग के अनुसार बदल देता है। कार्य के वर्तमान चरण में वह चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता; यीशु के युग में उसने कुछ चिह्न और चमत्कार दिखाए थे, तो वह इसलिए, क्योंकि उस युग में उसका कार्य भिन्न था। परमेश्वर आज वह कार्य नहीं करता, और कुछ लोग मानते हैं कि वह चिह्न और चमत्कार दिखाने में अक्षम है, या फिर वे सोचते हैं कि यदि वह चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता, तो वह परमेश्वर नहीं है। क्या यह एक भ्रांति नहीं है? परमेश्वर चिह्न और चमत्कार दिखाने में सक्षम है, परंतु वह एक भिन्न युग में कार्य कर रहा है, और इसलिए वह ऐसे कार्य नहीं करता। चूँकि यह एक भिन्न युग है, और चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न चरण है, इसलिए परमेश्वर द्वारा प्रकट किए जाने वाले कर्म भी भिन्न हैं। परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास चिह्नों और चमत्कारों में विश्वास करना नहीं है, न ही अजूबों पर विश्वास करना है, बल्कि नए युग के दौरान उसके व्यावहारिक कार्य में विश्वास करना है। मनुष्य परमेश्वर को उसके कार्य करने के ढंग के माध्यम से जानता है, और यही ज्ञान मनुष्य के भीतर परमेश्वर में विश्वास, अर्थात परमेश्वर के कार्य और कर्मों में विश्वास, उत्पन्न करता है। कार्य के इस चरण में परमेश्वर मुख्य रूप से बोलता है। चिह्न और चमत्कार देखने की प्रतीक्षा मत करो, तुम कोई चिह्न और चमत्कार नहीं देखोगे! ऐसा इसलिए है, क्योंकि तुम अनुग्रह के युग में पैदा नहीं हुए थे। यदि हुए होते, तो तुम चिह्न और चमत्कार देख पाते, परंतु तुम अंत के दिनों के दौरान पैदा हुए हो, और इसलिए तुम केवल परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता देख सकते हो। अंत के दिनों के दौरान अलौकिक यीशु को देखने की अपेक्षा मत करो। तुम केवल व्यावहारिक देहधारी परमेश्वर को ही देखने में सक्षम हो, जो किसी भी सामान्य मनुष्य से भिन्न नहीं है। प्रत्येक युग में परमेश्वर विभिन्न कर्म प्रकट करता है। प्रत्येक युग में वह अपने कर्मों का अंश प्रकट करता है, और प्रत्येक युग का कार्य परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग का और परमेश्वर के कर्मों के एक भाग का प्रतिनिधित्व करता है। वह जिन कर्मों को प्रकट करता है, वे हर उस युग के साथ बदलते जाते हैं जिसमें वह कार्य करता है, परंतु वे सब मनुष्य को परमेश्वर का अधिक गहरा ज्ञान, परमेश्वर में अधिक सच्चा और ठोस विश्वास प्रदान करते हैं। मनुष्य परमेश्वर में उसके समस्त कर्मों के कारण विश्वास करता है, क्योंकि वह इतना चमत्कारी, इतना महान है, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान और अथाह है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वर्तमान कार्य का ज्ञान)।
परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मेरा दिल बहुत रोशन हो गया। जब परमेश्वर अंत के दिनों का कार्य करता है, तो ऐसा नहीं है कि वह संकेत और चमत्कार नहीं दिखा सकता, बल्कि यह है कि इस अंतिम युग में, परमेश्वर अब उस तरह से कार्य नहीं करता है। परमेश्वर अब जो कर रहा है वह लोगों को पूर्ण और शुद्ध करने के लिए वचनों का उपयोग करने का कार्य है। अपने वचनों के माध्यम से, वह लोगों के शैतानी भ्रष्ट स्वभावों, लोगों के पुराने विचारों और परमेश्वर के बारे में लोगों की विभिन्न धार्मिक धारणाओं जैसी चीजों को उजागर करता है, जिससे लोग अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को त्याग सकें। यदि अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य अभी भी बीमारों को चंगा करने, राक्षसों को निकालने और संकेत और चमत्कार दिखाने के बारे में होता, जिससे लोग परमेश्वर को विशेष रूप से अलौकिक के रूप में देखते, तो लोगों के भ्रष्ट स्वभाव और परमेश्वर के प्रति उनका विद्रोह और प्रतिरोध आसानी से प्रकट नहीं होता और हम कभी भी अपने भ्रष्ट स्वभावों का एहसास नहीं कर पाते, शुद्ध और परिवर्तित होना तो दूर की बात है। ठीक मेरी तरह, अगर मेरी प्रार्थना के तुरंत बाद मेरे बच्चे की बीमारी ठीक हो जाती, तो मेरे मन में परमेश्वर को लेकर कोई धारणाएँ नहीं होतीं, न ही मुझे उस पर कोई संदेह होता, मैं सोचती कि मुझमें परमेश्वर के प्रति बहुत आस्था है और मैं सचमुच अनुसरण कर रही हूँ। लेकिन जब मेरे बच्चे की बीमारी ठीक नहीं हुई, तो मेरे मन में परमेश्वर को लेकर गलतफहमियाँ और धारणाएँ पैदा हो गईं, मैंने शिकायत की कि परमेश्वर मेरी प्रार्थनाएँ नहीं सुन रहा है और मैंने परमेश्वर पर संदेह भी किया। मैं प्रार्थना करना या सभाओं में जाना नहीं चाहती थी और मेरा शुरुआती उत्साह जल्दी ही खत्म हो गया। जब तथ्यों का सामना हुआ, तो मेरी भ्रष्टता, विद्रोहीपन और परमेश्वर के बारे में मेरी धारणाएँ पूरी तरह से बेनकाब हो गईं। तभी मुझे एहसास हुआ कि कोई कार्य परमेश्वर की ओर से है या नहीं, इसे आँकने का मेरा यह आधार कि संकेत और चमत्कार दिखाए जाते हैं या नहीं, बीमारियाँ ठीक की जाती हैं या नहीं और राक्षसों को निकाला जाता है या नहीं, एक भ्रामक दृष्टिकोण था। परमेश्वर हर युग में कार्य का एक चरण करता है और एक नए युग में नए कार्य की आवश्यकता होती है। अनुग्रह के युग में, प्रभु यीशु ने छुटकारे का कार्य किया, उसने बीमारों को चंगा किया, राक्षसों को निकाला और कुछ संकेत और चमत्कार दिखाए। लेकिन अब राज्य का युग है, अंतिम युग और परमेश्वर अपने वचनों के माध्यम से लोगों के न्याय और शुद्धिकरण का कार्य कर रहा है, इस प्रकार सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार वर्गीकृत कर रहा है, फिर अच्छे को पुरस्कृत और बुरे को दंडित कर रहा है और इस पुराने युग को समाप्त कर रहा है। यदि सर्वशक्तिमान परमेश्वर अभी भी प्रभु यीशु की तरह कार्य करता, संकेत और चमत्कार दिखाता, बीमारों को चंगा करता और राक्षसों को बाहर निकालता, तो क्या वह अपने कार्य को दोहरा नहीं रहा होता? तब युग कैसे समाप्त हो सकता था? इसके अलावा, बुरी आत्माएँ भी परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य की नकल कर सकती हैं, कोई कार्य परमेश्वर की ओर से है या नहीं, इसे अगर मैं इस आधार पर आँकती कि कि संकेत और चमत्कार दिखाए जाते हैं या नहीं, लोगों की बीमारियाँ ठीक होती हैं या नहीं, तो मैं शैतान और बुरी आत्माओं के काम को परमेश्वर का कार्य मान बैठती और मैं परमेश्वर की ईशनिंदा कर रही होती! नाम के लिए तो मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर लिया था, लेकिन मुझे परमेश्वर की कोई सच्ची समझ नहीं थी, मैं अभी भी परमेश्वर के नवीनतम कार्य को अनुग्रह के युग में भरपेट निवाले खाने की कोशिश के परिप्रेक्ष्य से देख रही थी। मैं बस नए जूतों में पुराने रास्ते पर चलने की कोशिश कर रही थी। इस तरह की आस्था को परमेश्वर की स्वीकृति नहीं मिलती। अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य का लक्ष्य लोगों को संकेतों और चमत्कारों के माध्यम से नहीं, बल्कि उसके वचनों के माध्यम से पूर्ण बनाना है। यह वास्तव में परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि है! यदि संकेत और चमत्कार दिखाए जाते, तो लोग उन्हें देखकर विश्वास कर लेते और कोई प्रतिरोध नहीं होता, लेकिन तब बकरियों और भेड़ों, जंगली बीज और गेहूँ, सच्चे विश्वासियों और झूठे विश्वासियों और अच्छे सेवकों और बुरे सेवकों के बीच भेद पहचानना कैसे संभव होता? परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाने, बेनकाब करने और हटाने का कार्य कैसे कर सकता था? अब सर्वशक्तिमान परमेश्वर लोगों को जीतने और उन्हें बचाने के लिए सत्य व्यक्त करके कार्य करता है, वह संकेत और चमत्कार नहीं दिखाता है। वह बस यही देखता है कि लोग सत्य स्वीकार सकते हैं या नहीं, इस तरह केवल वे लोग ही बचाए जा सकते हैं जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, जो दुष्ट शैतान के हैं, वे बेनकाब कर दिए जाएँगे और हटा दिए जाएँगे। मैं देखती हूँ कि परमेश्वर का कार्य जितना अधिक सामान्य और व्यावहारिक होता है, उसमें उतनी ही अधिक उसकी बुद्धि होती है। परमेश्वर का इस तरह से कार्य करने का तरीका वास्तव में अद्भुत है! यदि तथ्यों का खुलासा और परमेश्वर के वचनों का प्रकाशन न होता, तो मुझे कभी एहसास नहीं होता कि मैं अस्पष्टता और धारणाओं के साथ परमेश्वर में विश्वास कर रही थी, न ही मुझे यह एहसास होता कि मैं अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध और उसके खिलाफ विद्रोह कर रही थी, परमेश्वर के व्यावहारिक कार्य की कोई समझ हासिल करना तो दूर की बात थी। उस पल, मैंने अपने दिल में एक बड़ी राहत और मुक्ति महसूस की, अब मैं अपने बच्चे की बीमारी को दूर करने के लिए परमेश्वर से संकेत और चमत्कार दिखाने की बेतहाशा उम्मीद नहीं करती थी।
बाद में, मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े : “क्या अब तुम लोग समझते हो कि परमेश्वर पर विश्वास करना क्या होता है? क्या संकेत और चमत्कार देखना परमेश्वर पर विश्वास करना है? क्या इसका अर्थ स्वर्ग पर आरोहण करना है? परमेश्वर पर विश्वास जरा भी आसान नहीं है। उन धार्मिक अभ्यासों को निकाल दिया जाना चाहिए; रोगियों की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने का अनुसरण करना, प्रतीकों और चमत्कारों पर ध्यान केंद्रित करना और परमेश्वर के अनुग्रह, शांति और आनंद का अधिक लालच करना, देह के लिए संभावनाओं और आराम की तलाश करना—ये धार्मिक अभ्यास हैं, और ऐसे धार्मिक अभ्यास एक अस्पष्ट प्रकार का विश्वास हैं। आज परमेश्वर में वास्तविक विश्वास क्या है? यह परमेश्वर के वचन को अपनी जीवन वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना, और परमेश्वर का सच्चा प्यार प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के वचन से परमेश्वर को जानना है। स्पष्ट कहूँ तो : परमेश्वर में विश्वास इसलिए है, ताकि तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सको, उससे प्रेम कर सको, और वह कर्तव्य पूरा कर सको, जिसे एक सृजित प्राणी द्वारा पूरा किया जाना चाहिए। यही परमेश्वर पर विश्वास करने का लक्ष्य है। तुम्हें परमेश्वर की मनोहरता का और इस बात का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए कि परमेश्वर आदर के कितने योग्य है, कैसे अपने सृजित प्राणियों में परमेश्वर उद्धार का कार्य करता है और उन्हें पूर्ण बनाता है—ये परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास की एकदम अनिवार्य चीज़ें हैं। परमेश्वर पर विश्वास मुख्यतः देह-उन्मुख जीवन से परमेश्वर से प्रेम करने वाले जीवन में बदलना है; भ्रष्टता के भीतर जीने से परमेश्वर के वचनों के जीवन के भीतर जीना है; यह शैतान की सत्ता से बाहर आना और परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में जीना है; यह देह के प्रति समर्पण को नहीं, बल्कि परमेश्वर के प्रति समर्पण को प्राप्त करने में समर्थ होना है; यह परमेश्वर को तुम्हारा संपूर्ण हृदय प्राप्त करने और तुम्हें पूर्ण बनाने देना है, और तुम्हें भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से मुक्त करने देना है। परमेश्वर में विश्वास मुख्यतः इसलिए है, ताकि परमेश्वर का महान सामर्थ्य और महिमा तुममें प्रकट हो सके, ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चल सको, और परमेश्वर की योजना संपन्न कर सको, और शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही दे सको। परमेश्वर पर विश्वास संकेत और चमत्कार देखने की इच्छा के इर्द-गिर्द नहीं घूमना चाहिए, न ही यह तुम्हारी व्यक्तिगत देह के वास्ते होना चाहिए। यह परमेश्वर को जानने की कोशिश के लिए, और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने, और पतरस के समान मृत्यु तक परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम होने के लिए, होना चाहिए। यही परमेश्वर में विश्वास करने के मुख्य उद्देश्य हैं। ... यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में तुम सदैव संकेत और चमत्कार देखने का प्रयास कर रहे हो, तो परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का यह दृष्टिकोण गलत है। परमेश्वर पर विश्वास मुख्य रूप से परमेश्वर के वचन को जीवन वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना है। परमेश्वर का उद्देश्य उसके मुख से निकले वचनों को अभ्यास में लाने और उन्हें अपने भीतर पूरा करने से हासिल किया जाता है। परमेश्वर पर विश्वास करने में मनुष्य को परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में समर्थ होने, और परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण के लिए प्रयास करना चाहिए। यदि तुम बिना शिकायत किए परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हो, परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हो सकते हो, पतरस का आध्यात्मिक कद प्राप्त कर सकते हो, और परमेश्वर द्वारा कही गई पतरस की शैली ग्रहण कर सकते हो, तो यह तब होगा जब तुम परमेश्वर पर विश्वास में सफलता प्राप्त कर चुके होगे, और यह इस बात का द्योतक होगा कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए गए हो” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वचन से सब-कुछ पूरा हो जाता है)। परमेश्वर के वचनों से, मैंने आस्था के बारे में सही परिप्रेक्ष्य समझा। आस्था अनुग्रह और आशीषें पाने के लिए नहीं है, न ही यह देह के शांतिपूर्ण और सहज जीवन के लिए है। यह सच्ची आस्था नहीं है। परमेश्वर आशा करता है कि हम सत्य का अनुसरण कर सकते हैं, जब कुछ हो तो उसके वचनों के अनुसार जी सकते हैं और अपनी वास्तविक जीवनशैली का उपयोग परमेश्वर की गवाही देने और उसकी महिमा बढ़ाने के लिए कर सकते हैं। यही सच्ची आस्था है। मैं केवल अपने बच्चे की बीमारी के ठीक होने की उम्मीद पर ही ध्यान केंद्रित कर रही थी, मगर मुझे नहीं पता था कि परमेश्वर का इरादा क्या था या मुझे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में कैसे अडिग रहना था। मैं पूरी तरह से अपने भ्रष्ट स्वभाव में डूबी हुई थी, अपनी धारणाओं के आधार पर परमेश्वर की आलोचना कर रही थी और उसे सीमित कर रही थी, यहाँ तक कि परमेश्वर पर संदेह कर रही थी और उसके कार्य को नकार रही थी। मुझमें परमेश्वर के प्रति किस तरह से कोई ईमानदारी या समर्पण था? मुझमें सचमुच कोई गवाही नहीं थी! जब मेरा बच्चा बीमार था, तो परमेश्वर मेरे रवैये की भी पड़ताल कर रहा था, यह देख रहा था कि क्या मुझमें उसके प्रति सच्ची आस्था और समर्पण है। मुझे अपनी धारणाओं को एक तरफ रखना था और मेरे बच्चे की बीमारी के साथ चाहे कुछ भी हो, मैं इतनी नकारात्मक, कमजोर या परमेश्वर से भटकती नहीं रह सकती थी।
लेकिन संकल्प करना आसान होता है। सचमुच सत्य का अभ्यास करना कहीं ज्यादा मुश्किल है। एक दोपहर, जैसे ही हम सभा करने वाले थे, मेरे बच्चे को फिर से बुखार आ गया, मैंने अपने दिल में साफ तौर पर महसूस किया कि शैतान मुझे ललचाने की कोशिश कर रहा है और मुझे सभा छोड़ने पर मजबूर करने की कोशिश कर रहा है। मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “यदि तुम शैतान के सामने गवाही नहीं दे सकते, तो शैतान तुम पर हँसेगा, वह तुम्हें एक मजाक के रूप में, एक खिलौने के रूप में लेगा, वह बार-बार तुम्हें मूर्ख बनाएगा, और तुम्हें विक्षिप्त कर देगा” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है)। शैतान जानता था कि मुझे सबसे ज्यादा चिंता अपने बच्चे की है, इसलिए वह मुझे बाधित करने और सभा करने से रोकने के लिए मेरे बच्चे की बीमारी का इस्तेमाल करता रहा। अतीत में, मैं सत्य नहीं समझती थी और शैतान की साजिशों की असलियत नहीं देख पाती थी, हर बार जब सभा और मेरे बच्चे की बीमारी के बीच टकराव होता, तो मैं घबरा जाती और अपने बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाने के लिए तुरंत सभा छोड़ देती थी और शैतान के इशारों पर नाचती थी। जब मेरी सभा नहीं होती थी, तो मेरे बच्चे को बुखार नहीं आता था, लेकिन जैसे ही सभा होती, उसे बुखार आ जाता था। जितना मैंने इस बारे में सोचा, उतना ही यह स्पष्ट हो गया कि यह पूरी तरह से शैतान की साजिश थी, मैं जानती थी कि मैं अब और शैतान के बंधन और नियंत्रण में नहीं रह सकती। मैंने अपने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं नहीं चाहती कि शैतान अब और मुझे मूर्ख बनाए या सताए। मैं अपने भाई-बहनों के साथ सभा करना चाहती हूँ। कृपया मेरी मदद करो।” प्रार्थना करने के बाद, मेरा दिल थोड़ा शांत हो गया। मैंने अपने बेटे को देखा, उसका बुखार हल्का था और वह अच्छे मूड में लग रहा था, इसलिए मैंने उसे अपनी सास के पास छोड़ दिया, उसे कुछ बुखार की दवा देने के लिए कहा और मैं सभा में चली गई। मुझे आश्चर्य हुआ, सभा के बाद जब मैं वापस आई तो मैंने अपने बच्चे को खुशी-खुशी खिलौनों से खेलते हुए देखा। मेरी सास ने कहा कि बुखार बिना दवा के ही उतर गया था। मैं इतनी खुश और भावुक हुई कि मेरी आँखों से आँसू बह निकले। मैंने सोचा कि कैसे पहले मेरे बेटे का बुखार कभी खत्म नहीं होता था और कैसे हमें उसे ठीक करने के लिए नसों में इंजेक्शन लगवाने अस्पताल जाना पड़ता था, लेकिन इस बार, बुखार बिना किसी दवा के ही उतर गया। मुझे मुश्किल से विश्वास हो रहा था और मैं अपने दिल में लगातार परमेश्वर का धन्यवाद और उसकी स्तुति करती रही। इस अनुभव के जरिए मैं यह भी समझ गई कि भले ही शुरू में जब मेरा बच्चा बीमार था तो मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की थी, पर परमेश्वर ने मेरे बच्चे को ठीक नहीं किया और इसमें परमेश्वर की बुद्धि थी। उस समय, मेरा दिल परमेश्वर के प्रति धारणाओं, कल्पनाओं और सीमाओं से भरा हुआ था, मुझे अंत के दिनों में परमेश्वर के उस कार्य की कोई समझ नहीं थी जो उसके वचनों के माध्यम से लोगों को जीतता और उन्हें पूर्ण बनाता है, मैं शैतान के प्रलोभनों और बाधाओं के बारे में भी कोई भेद नहीं पहचानती थी। इसलिए परमेश्वर ने मुझे शुद्ध करने के लिए शैतान की बाधाओं और प्रलोभनों को आने दिया, ताकि मैं सत्य को समझ सकूँ और परमेश्वर को जान सकूँ। इस प्रक्रिया में, मैंने परमेश्वर के प्रति धारणाएँ, गलतफहमियाँ, शिकायतें और संदेह प्रकट किए, तब परमेश्वर ने मुझे प्रबुद्ध करने और मेरा मार्गदर्शन करने के लिए अपने वचनों का उपयोग किया, मेरी धारणाओं और भ्रष्टता को उजागर किया और उनका न्याय किया, जिससे मुझे अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य की सामान्य और व्यावहारिक प्रकृति को समझने में मदद मिली, अपने स्वयं के विद्रोह और प्रतिरोध को पहचानने में मदद मिली और साथ ही मुझे शैतान की साजिशों का भेद पहचानने में भी मदद मिली। अंततः, मैं अपनी धारणाओं को एक तरफ रखने, अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने और सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हुई। मैंने देखा कि इस तरह से कार्य करने वाला परमेश्वर वास्तव में सर्वशक्तिमान और व्यावहारिक है और अत्यंत बुद्धिमान है। इस अनुभव के माध्यम से, मैंने वास्तव में परमेश्वर के वचनों के अधिकार और सामर्थ्य को पहचाना, मैंने देखा कि परमेश्वर लोगों को जीतने, उन्हें पूर्ण बनाने और उनके दिलों को जीतने के लिए व्यावहारिक वचनों और व्यावहारिक कार्य का उपयोग करता है। अंत के दिनों में परमेश्वर का इस तरह से कार्य करना संकेत और चमत्कार दिखाने से कहीं अधिक सार्थक है। इससे मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया : “अंत के दिनों के कार्य में वचनों की शक्ति प्रकटीकरण और चमत्कार दिखाने से कहीं अधिक शक्तिमान है, और वचन का अधिकार चिह्नों और चमत्कारों के अधिकार से कहीं बढ़कर है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4))। ये वचन कितने वास्तविक हैं!
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों के दो और अंश पढ़े, जिनसे मुझे अपने भ्रष्ट स्वभाव की कुछ समझ मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “बहुत सारे लोग मुझ में सिर्फ इसलिए विश्वास करते हैं कि मैं उन्हें चंगा कर दूँ। बहुत सारे लोग मुझ में सिर्फ इसलिए विश्वास करते हैं कि मैं उनके शरीर से अशुद्ध आत्माओं को निकालने के लिए अपनी सामर्थ्य का इस्तेमाल करूँ और बहुत-से लोग मुझसे बस शांति और आनंद प्राप्त करने के लिए मुझमें विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझसे सिर्फ और अधिक भौतिक संपदा माँगने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझ में सिर्फ इसलिए विश्वास करते हैं कि इस जीवन को शांति से गुजार सकें और आने वाले संसार में सुरक्षित और हानिरहित रह सकें। बहुत-से लोग केवल नरक की पीड़ा से बचने के लिए और स्वर्ग के आशीष प्राप्त करने के लिए मुझ में विश्वास करते हैं। बहुत सारे लोग केवल अस्थायी आराम के लिए मुझ में विश्वास करते हैं, फिर भी आने वाले संसार में कुछ भी हासिल करने का प्रयास नहीं करते। जब मैं लोगों पर अपना क्रोध उतारता हूँ और कभी उनके पास रही सारी सुख-शांति छीन लेता हूँ, तो मनुष्य शंकालु हो जाता है। जब मैं मनुष्य को नरक का कष्ट देता हूँ और स्वर्ग के आशीष वापस ले लेता हूँ, वे क्रोध से भर जाते हैं। जब लोग मुझसे खुद को चंगा करने के लिए कहते हैं और मैं उन पर ध्यान नहीं देता और उनके प्रति घृणा महसूस करता हूँ तो वे मुझे छोड़कर चले जाते हैं, इलाज के अंधकारपूर्ण तरीके और जादू-टोने का मार्ग खोजने लगते हैं। जब मैं मनुष्य द्वारा मुझसे माँगी गई सारी चीजें वापस ले लेता हूँ, तो वे बिना कोई निशान छोड़े गायब हो जाते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि लोग मुझमें आस्था इसलिए रखते हैं क्योंकि मेरा अनुग्रह अत्यंत विपुल है, और क्योंकि बहुत अधिक लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम आस्था के बारे में क्या जानते हो?)। “तुम लोगों को समझना चाहिए कि तुम मुझ पर विश्वास क्यों करते हो; अगर तुम केवल मेरे शिक्षार्थी या मेरे रोगी बनना चाहते हो, या स्वर्ग में मेरे संतों में से एक बनना चाहते हो, तो फिर तुम्हारे द्वारा मेरा अनुसरण करना व्यर्थ होगा। इस तरह मेरा अनुसरण करना केवल ऊर्जा की बरबादी होगा; मुझमें इस प्रकार विश्वास रखना अपनी युवावस्था को गँवाते हुए केवल समय व्यर्थ बिताना होगा। और अंत में तुम लोगों को कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। क्या यह व्यर्थ में परिश्रम करना नहीं है? मैं बहुत पहले ही यहूदियों के बीच से चला गया था और मैं अब मनुष्यों का चिकित्सक या मनुष्यों की औषधि नहीं हूँ। अब मैं मनुष्य के लिए बोझ उठाने वाला जानवर नहीं हूँ, जिसे जब चाहे हाँक या काट दिया जाता है; बल्कि मैं मनुष्यों के बीच उनका न्याय करने और उन्हें ताड़ना देने आया हूँ, ताकि वे मुझे जान सकें। तुम्हें जानना चाहिए कि मैंने एक बार छुटकारे का काम किया था; मैं एक समय यीशु था, लेकिन मैं हमेशा के लिए यीशु नहीं रह सकता था, जैसे कि मैं एक बार यहोवा था, लेकिन बाद में यीशु बन गया। मैं मानव-जाति का परमेश्वर हूँ, सृष्टि का प्रभु हूँ, लेकिन मैं सदा के लिए यीशु और यहोवा बनकर नहीं रह सकता। मनुष्य की दृष्टि में मैं चिकित्सक बनकर रहा, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि परमेश्वर मानव-जाति के लिए मात्र एक चिकित्सक है। इसलिए अगर तुम मेरे प्रति अपने विश्वास में पुराने विचारों को थामे रहोगे, तो तुम कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाओगे। आज तुम चाहे मेरी कैसे भी प्रशंसा क्यों न करो : ‘परमेश्वर मनुष्य के लिए कितना प्यारा है; वह मुझे चंगा करता है और मुझे आशीष, शांति और आनंद देता है। मनुष्य के लिए परमेश्वर कितना अच्छा है; अगर हम उस पर मात्र विश्वास करते हैं, तो हमें धन-संपत्ति की चिंता करने की जरूरत नहीं है...,’ लेकिन मैं अपनी मूल योजना नहीं बिगाड़ सकता। अगर तुम आज मुझ पर विश्वास करोगे, तो तुम्हें केवल मेरी महिमा मिलेगी और अगर तुम मेरी गवाही देने योग्य जाओ, तो बाकी सभी चीजें गौण हो जाएँगी। यह तुम्हें स्पष्ट रूप से जान लेना चाहिए” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम आस्था के बारे में क्या जानते हो?)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए, मैंने अपनी आस्था में नीच इरादे देखे। जब मैं पहले प्रभु यीशु में विश्वास करती थी, तो मैंने प्रभु द्वारा दिए गए अनुग्रह, शांति और आनंद का लाभ उठाया और इसलिए मैंने सोचा कि मैं प्रभु में विश्वास करके सचमुच धन्य हूँ। लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर को पाने के बाद, मैंने देखा कि कैसे परमेश्वर लोगों को बचाने के लिए सत्य व्यक्त करता है और अंततः उन्हें स्वर्ग के राज्य में लाता है, इसलिए मैं अपने अनुसरण में और भी अधिक सक्रिय हो गई। हर दिन मैं परमेश्वर के वचन खाती-पीती और परमेश्वर से प्रार्थना करती थी, मैं सभाओं में कभी देर से नहीं पहुँचती थी, मैंने सुसमाचार का प्रचार किया और मेजबानी का कर्तव्य भी किया। मैंने यह सब परमेश्वर को खुश करने के लिए किया, यह सोचकर कि ऐसा करने से परमेश्वर मुझे और भी अधिक अनुग्रह और आशीषें देगा। मैंने देखा कि मैं सिर्फ आशीषें पाने की अपनी इच्छा को पूरा करने की मंशा से परमेश्वर का इस्तेमाल करने के लिए उसमें विश्वास कर रही थी। मुझे इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं थी कि परमेश्वर कौन-सा कार्य कर रहा है, न ही मुझे इस बात की चिंता थी कि परमेश्वर लोगों से क्या चाहता है, लोगों को उसके इरादों के अनुरूप होने और उसे संतुष्ट करने के लिए परमेश्वर में कैसे विश्वास करना चाहिए, किस तरह के लोग राज्य में प्रवेश कर सकते हैं, क्या मेरे विश्वास करने के तरीके को परमेश्वर की स्वीकृति मिलती है या परमेश्वर में आस्था का सही दृष्टिकोण क्या है। मैं इनमें से कुछ भी नहीं जानती थी, न ही मैंने कभी इनके बारे में सोचा था। मैं सभा करने और सुसमाचार का प्रचार करने के लिए केवल अपने उत्साह पर निर्भर थी, यह सोचकर कि इन कामों को करके मैं परमेश्वर को संतुष्ट कर रही हूँ और मुझे उसकी आशीषें मिलनी चाहिए। जब मेरे बच्चे का तेज बुखार कम नहीं हुआ, तो मैंने जिन अनुग्रह और आशीषों के लिए प्रार्थना की थी, वे कहीं नजर नहीं आईं, लेकिन मैंने सत्य की खोज नहीं की और न ही आत्म-चिंतन किया। इसके बजाय, मैंने अपने दिल में परमेश्वर पर संदेह किया और उसके कार्य को नकारा। मैंने देखा कि आशीषें पाने की मेरी इच्छा बहुत प्रबल थी। परमेश्वर सृष्टिकर्ता है और मैं एक सृजित प्राणी हूँ, इसलिए एक सृजित प्राणी के लिए परमेश्वर में विश्वास करना और अपना कर्तव्य निभाना पूरी तरह से स्वाभाविक और उचित है। मुझे परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, उससे अनुचित माँगें करना तो दूर की बात है। अब मैं सचमुच समझ गई कि मेरे बच्चे की बीमारी में परमेश्वर के नेक इरादे थे। इसने मुझे अपने शैतानी स्वभाव और आस्था के भ्रामक दृष्टिकोणों पर विचार करने और उन्हें समझने का मौका दिया। मुझे यह भी एहसास हुआ कि कोई कार्य वास्तव में परमेश्वर का है या नहीं, इसका मूल्यांकन इस पर आधारित नहीं होना चाहिए कि संकेत और चमत्कार दिखाए जाते हैं या नहीं, बीमारों को चंगा किया जाता है या नहीं, राक्षसों को निकाला जाता है या नहीं या अनुग्रह और आशीषें दी जाती हैं या नहीं, बल्कि इस पर आधारित होना चाहिए कि क्या सत्य व्यक्त किया जा सकता है, क्या यह कार्य लोगों को परमेश्वर के बारे में और अधिक समझने की ओर ले जा सकता है, क्या यह कार्य लोगों के शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को शुद्ध और परिवर्तित कर सकता है और क्या यह कार्य लोगों को बचा सकता है और उन्हें पूर्ण बना सकता है। यदि यह इन प्रभावों को प्राप्त कर सकता है, तो यह निश्चित रूप से परमेश्वर का कार्य है।
अपने बच्चे की बीमारी से गुजरते हुए, मुझे उसके कार्य की कुछ समझ मिली और मैंने अपनी आस्था में सही दृष्टिकोण और सही अनुसरण प्राप्त किया। यह मेरे लिए परमेश्वर का सच्चा उद्धार है और मेरे लिए उसका महान प्रेम है। यह प्रेम उन अनुग्रह और आशीषों से अनगिनत गुना बड़ा है जो मैंने पहले कभी माँगी थीं। मैंने तहे दिल से परमेश्वर का धन्यवाद किया! यह एहसास होने पर, मुझे अपनी आस्था में केवल अनुग्रह और आशीषें माँगने और सत्य का अनुसरण न करने के लिए शर्म आई और अपराध-बोध हुआ और इसलिए भी कि मैं सचमुच मूर्ख, अज्ञानी और अंधी थी! मुझे आशीषें पाने के अपने इरादों को छोड़ना होगा और अपनी आस्था में सही रास्ते पर चलना होगा।