25. जब मुझे पता चला कि माँ को बाहर निकाला जाने वाला है
अगस्त 2021 में, कलीसिया शुद्धिकरण कार्य कर रही थी और अगुआ ने मुझसे मेरी माँ का मूल्यांकन लिखने को कहा। मुझे थोड़ी चिंता हो गई। मेरी माँ हाल ही में घर पर अलग-थलग की गई थी भले ही मैं नहीं जानती थी कि उसका कर्तव्य प्रदर्शन कैसा था, पर मैं जानती थी कि अलग-थलग किए जाने के बाद वह पैसे कमाने और ऐशो-आराम की जिंदगी जीने के बारे में सोचती रहती थी और उसके अनुसरण का नजरिया अविश्वासियों जैसा था, जो कुछ छद्म-विश्वासियों वाला व्यवहार दिखाता था। यह सोचकर कि मेरी माँ की जाँच चल रही है और उसे कलीसिया से बाहर निकाला जा सकता है, मैं बहुत दुविधा में थी। “मेरी माँ तीस साल से परमेश्वर में विश्वास करती है, लगातार रिश्तेदारों के उपहास और निंदा को सहती रही है और मेरे पिताजी अक्सर उसे मारते-पीटते और डाँटते हुए सताते थे, लेकिन उसने कभी परमेश्वर को नहीं छोड़ा। उसने मुझे भी आस्था में पाला-पोसा, मेरे पूर्णकालिक कर्तव्य निभाने के दौरान मेरा साथ दिया। वह हमेशा कलीसिया में अपना कर्तव्य भी करती रही है, हर दिन प्रार्थना करती और परमेश्वर के वचन पढ़ती है। हो सकता है कि हाल ही में उसकी अवस्था अच्छी नहीं रही हो और वह नकारात्मक और भ्रष्ट हो गई हो, लेकिन उसे परमेश्वर में ईमानदारी से विश्वास करने वालों में गिना जाना चाहिए, तो शायद वह बाहर निकाले जाने लायक नहीं है, है न?” जब मैं घर पहुँची तो मैं बस उसकी समस्याओं को बताना चाहती थी ताकि वह चिंतन कर सके, समझ हासिल कर सके और जल्दी से पश्चात्ताप करके बदल सके। मैंने अपनी माँ से पूछा कि उसे अलग-थलग क्यों किया गया था। उसने कहा कि पिछले साल अक्टूबर में उसने मेजबानी का कर्तव्य निभाना शुरू किया था, लेकिन जब वह एक नए घर में गई तो वहाँ कोई घरेलू सामान नहीं था, इसलिए उसने तीन पत्र लिखकर सामान्य मामलों की टीम से उन्हें लाने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने सामान नहीं पहुँचाया। तो मेरी माँ घर वापस चली गई और दस दिनों से ज्यादा वहीं रही। बाद में अगुआ ने उसकी कठोरता से काट-छाँट की, यह कहते हुए कि उसने अपना कर्तव्य छोड़ दिया था और वह गैर-जिम्मेदार थी। एक और मौके पर, मेरी माँ कुछ भाई-बहनों को घर बदलने में मदद कर रही थी और उसने एक गिरफ्तार बहन का स्कूटर उधार ले लिया। अगले दिन अगुआ ने मेरी माँ की काट-छाँट की, यह कहते हुए कि इससे जोखिम हो सकता है और उसने मेरी माँ से तुरंत छिप जाने को कहा। उस समय मेरी माँ ने बहुत प्रतिरोध किया और सीधे घर चली गई। उसके बाद अगुआ ने उसे कभी कोई कर्तव्य नहीं सौंपा। मेरी माँ ने यह भी कहा कि 2020 में वह पूरे समय अपना कर्तव्य करने के लिए घर से निकली थी, लेकिन सिर्फ दो दिन बाद अगुआ ने उसे वापस जाने के लिए कह दिया, यह कहते हुए कि अगर मेरे पिताजी ने पुलिस में उसकी रिपोर्ट कर दी तो भाई-बहन खतरे में पड़ सकते हैं। उसके घर वापस जाने के बाद अगुआ ने उसे तुरंत फिर से कोई कर्तव्य नहीं सौंपा। यह सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया, मैं सोचने लगी, “मेरी माँ ने खुद पहल करके बाहर आकर अपना कर्तव्य निभाया—अगुआ ने उसे क्यों रोका? यह तो उससे कर्तव्य करने का अधिकार छीनना और उसकी प्रेरणा को कुचलना है। अगर अगुआ और कार्यकर्ता सिद्धांतों को नहीं समझते और लापरवाही से मेरी माँ को बाहर निकाल देते हैं तो क्या वे एक अच्छे इंसान के साथ गलत नहीं कर रहे होंगे? यह तो बहुत अन्याय है! नहीं, मुझे इस मामले की तह तक जाना ही होगा—मैं अपनी माँ को अन्यायपूर्ण आरोपों का शिकार नहीं होने दे सकती।”
कुछ दिनों बाद मैं संयोग से कलीसिया की अगुआ से मिली तो मैंने उससे पूछा, “मेरी माँ के लिए बाहर आकर अपना कर्तव्य करना आसान नहीं था—तुमने उसे वापस क्यों भेज दिया? इस वजह से वह लंबे समय तक नकारात्मक अवस्था में रही।” अगुआ ने कहा कि इसकी मुख्य वजह यह थी कि मेरे पिताजी क्रूर मानवता वाले थे और अगर मेरी माँ घर पर नहीं होती तो वह पुलिस को बुला सकते थे, जिससे दूसरे भाई-बहन भी फँस सकते थे। उसने यह भी कहा कि मेरी माँ हमेशा अपने मन के मुताबिक काम करती थी और बहुत मनमौजी थी। जब वह सकारात्मक महसूस करती थी तो कुछ भी करने को तैयार रहती थी, लेकिन जब वह नकारात्मक होती थी तो चाहे कोई भी उसके साथ संगति करे या मदद करने की कोशिश करे, वह सुनती ही नहीं थी और अपना कर्तव्य छोड़ने पर उतारू हो जाती थी। वह अपने कर्तव्य के साथ जैसा मन करता वैसा व्यवहार करती और मनमर्जी से काम करती थी और ज्यादातर भाई-बहन उस पर भरोसा करने की हिम्मत नहीं करते थे। यह देखते हुए कि उसके घर छोड़कर कर्तव्य करने से फायदे से ज्यादा नुकसान था, उसे घर वापस भेजने की व्यवस्था की गई। अगुआ ने यह भी कहा, “जब वह मेजबानी का कर्तव्य कर रही थी और एक नए घर में गई, उसने देखा कि घर में कुछ घरेलू सामानों की कमी है, लेकिन वह अपना पैसा खर्च नहीं करना चाहती थी, इसलिए उसने सामान्य मामलों की टीम को पत्र लिखकर माँग की कि ये सामान एक दिन के भीतर पहुँचा दिए जाएँ। लेकिन इतना समय नहीं था और जब तक सामान्य मामलों की टीम को पत्र मिला, तब तक उसकी तय की हुई समय-सीमा बीत चुकी थी। फिर उसने भाई-बहनों के बारे में शिकायत की और अपना कर्तव्य भी छोड़ दिया, पंद्रह दिन के लिए घर चली गई। बाद में, कर्तव्य में गैर-जिम्मेदार होने के लिए उसकी काट-छाँट की गई और हालाँकि उसने मुँह से अपनी गलती मान ली, पर बाद में भी वह वैसी ही रही। एक और मौके पर, हालाँकि उसके पास अपना इलेक्ट्रिक स्कूटर था, फिर भी उसने एक गिरफ्तार बहन का स्कूटर चलाने की जिद की, जिससे एक जोखिम भरी स्थिति पैदा हो गई। जब बाद में भाई-बहनों ने उसकी काट-छाँट की तो वह भड़क गई और बोली, ‘जब मैं अच्छा काम करती हूँ तो तुम लोग सराहना नहीं करते, लेकिन जैसे ही मुझसे कोई चूक होती है, तुम मेरी काट-छाँट करने लगते हो। मैं अब और नहीं सह सकती! मैं अब यह कर्तव्य नहीं कर रही हूँ। मैं घर जा रही हूँ! भले ही मैं नरक में जाऊँ, अब और नहीं सहूँगी!’ पर्यवेक्षक और मैंने, दोनों ने उसके साथ संगति की, लेकिन उसने बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया और बस अपना सामान उठाकर चली गई।” अगुआ से यह सब सुनकर मैं चौंक गई। बातें वैसी नहीं थीं जैसी मेरी माँ ने कही थीं। मैंने उम्मीद नहीं की थी कि वह इतनी मनमौजी होगी और कलीसिया के काम में इतनी सारी विघ्न-बाधाएँ लाएगी। जाहिर है कि अगुआ समझना चाहती थी कि उसका हमेशा का व्यवहार कैसा था। मेरी माँ का छद्म-विश्वासी व्यवहार बहुत स्पष्ट था और मुझे डर था कि इस बार उसे शायद बाहर निकाल दिया जाएगा। अगर उसे सच में बाहर निकाल दिया गया तो उसकी आस्था की यात्रा समाप्त हो जाएगी और अंत में उसे विनाश में दंडित किया जाएगा। कितनी दयनीय बात है! यह सोचकर मुझे बहुत बुरा लगा। क्या मेरी माँ को सच में बाहर निकाले जाने की नौबत आ गई थी? मुझे लगा कि शायद अगर मैं उसके साथ फिर से संगति करूँ और वह पश्चात्ताप के संकेत दिखाए तो वह शायद अब भी कलीसिया में श्रम कर सकेगी। इसलिए मैंने अगुआ से पूछा, “मेरी माँ के व्यवहार को देखते हुए, क्या तुमने उसके साथ संगति में इन मसलों की प्रकृति और परिणामों को स्पष्ट रूप से समझाया? क्या तुमने परमेश्वर के वचनों से उसका गहन-विश्लेषण और उसे उजागर किया? अगर उसकी समझ खराब है, काबिलियत कम है या स्वभाव बहुत भ्रष्ट है तो उसे संगति और काट-छाँट की और भी ज्यादा जरूरत है।” यह सुनकर अगुआ ने कहा, “हमने उसके साथ संगति की, लेकिन उसने स्वीकार नहीं किया। तुम उसके साथ संगति करके देख सकती हो कि वह पश्चात्ताप और बदलाव का कोई संकेत दिखाती है या नहीं।”
घर पहुँचते ही मैंने जल्दी से अपनी माँ के साथ संगति की, कलीसिया में उसने जो कुछ भी किया था, उन सब पर एक-एक करके संगति और गहन-विश्लेषण किया। लेकिन उसने पश्चात्ताप करने या गलती मानने का कोई संकेत नहीं दिखाया और इसके बजाय वह दूसरों और खास मामलों पर ही ध्यान देती रही। उसने कहा, “सिर्फ मुझसे ही चिंतन करने के लिए क्यों कहा जा रहा है? क्या अगुआओं ने कोई गलती नहीं की है? सिर्फ उनकी बातें मत सुनो—हो सकता है वे भी सही न हों। कभी-कभी अगुआओं की व्यवस्थाएँ भी सिद्धांतों के खिलाफ होती हैं। वरना, परमेश्वर अब झूठे अगुआओं का भेद पहचानने के बारे में इतने सारे वचन क्यों व्यक्त करेगा? ऐसा इसलिए है क्योंकि इन दिनों बहुत सारे झूठे अगुआ हैं...।” यह देखकर कि मेरी माँ अभी भी सही-गलत पर बहस कर रही थी, मैं बेहद चिंतित और निराश हो गई। इसलिए मैंने उसे चेतावनी दी, “अगर तुम चिंतन और पश्चात्ताप नहीं करोगी तो तुम्हें बाहर निकाल दिया जाएगा!” यह सुनने के बाद मेरी माँ ने मुँह से तो कह दिया कि वह बदलने और पश्चात्ताप करने को तैयार है, लेकिन कुछ ही समय बाद उसने मुझसे कहा, “मुझे लगता है कि बेहतर होगा तुम एक नौकरी ढूँढ़ लो—तुम्हें अपनी आस्था को इतनी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। बहुत-से लोग हैं जो काम करते हैं और साथ-साथ अपने कर्तव्य भी निभाते हैं और वे भी तो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, है न? और पूर्णकालिक कर्तव्य करने वाले सभी लोगों में से एक के कम या ज्यादा होने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। तुम्हें अपने लिए एक रास्ता छोड़ना चाहिए और अपने भविष्य के बारे में सोचना चाहिए। मैं तुम्हारी माँ हूँ—मैं यह सब तुम्हारी भलाई के लिए कह रही हूँ। अगर तुम मेरी बात नहीं सुनोगी तो पछताओगी!” उसकी ये बातें सुनकर मुझे गुस्सा आया और चिंता हुई। अगले लगभग एक महीने तक, चाहे मैंने उसके साथ कितनी भी संगति की, उसने चिंतन किया ही नहीं, न ही खुद को पहचाना। इसके बजाय वह बहस करती रही और खुद को सही ठहराती रही, तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करती रही और अगुआओं और कार्यकर्ताओं की गलतियाँ निकालती रही। उसने मुझे सांसारिक चीजों का अनुसरण करने के लिए लुभाने की कोशिश की और उसने मुझे बार-बार सभाओं में जाने और अपना कर्तव्य करने से रोका। मैं उसके सार की असलियत जान गई थी—वह एक छद्म-विश्वासी थी।
मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “यदि विश्वासी अपनी बोली और आचरण में हमेशा ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो ऐसे लोग अविश्वासी से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये मूल रूप से राक्षस हैं” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी)। “क्या यह घृणित नहीं है कि कुछ लोग बाल की खाल निकालना पसंद करते हैं और जब भी उनके साथ कुछ घटित होता है तो ऐसे रास्ते पर चल पड़ते हैं जो अंततः कहीं नहीं पहुँचता? यह एक बड़ी समस्या है। साफ सोचवाले लोग ऐसी गलती नहीं करते, बेतुके लोग ही ऐसे होते हैं। वे हमेशा कल्पना करते हैं कि दूसरे लोग उनका जीना दूभर कर रहे हैं, उन्हें मुश्किलों में डाल रहे हैं, इसलिए वे हमेशा दूसरों से दुश्मनी मोल लेते हैं। क्या यह भटकाव नहीं है? सत्य को लेकर वे प्रयास नहीं करते, उनके साथ कुछ घटने पर वे बेकार की बातों में उलझना पसंद करते हैं, सफाई माँगते हैं, लाज बचाने की कोशिश करते हैं, और इन मामलों को सुलझाने के लिए वे हमेशा इंसानी हल ढूँढ़ते हैं। जीवन प्रवेश में यह सबसे बड़ी बाधा है। अगर तुम परमेश्वर में इस तरह विश्वास रखते हो, या इस तरह अभ्यास करते हो, तो कभी भी सत्य हासिल नहीं कर पाओगे, क्योंकि तुम कभी परमेश्वर के सामने नहीं आते। परमेश्वर ने तुम्हारे लिए जो कुछ इंतजाम कर रखा है वह प्राप्त करने के लिए तुम कभी परमेश्वर के सामने नहीं आते, न ही तुम इस सब से निपटने के लिए सत्य का प्रयोग करते हो, इसके बजाय तुम चीजों से निपटने के लिए इंसानी समाधानों का प्रयोग करते हो। इसलिए परमेश्वर की दृष्टि में तुम उससे बहुत दूर भटक गए हो। न सिर्फ तुम्हारा दिल उससे भटक गया है, तुम्हारा पूरा अस्तित्व उसकी मौजूदगी में नहीं जीता है। हमेशा जरूरत से ज्यादा विश्लेषण कर बाल की खाल निकालने वालों को परमेश्वर इसी नजर से देखता है। ... मैं तुम लोगों को बताता हूँ कि परमेश्वर के विश्वासी चाहे कोई भी कर्तव्य निभाएँ—वे बाहरी मामले सँभालते हों, या कोई ऐसा कर्तव्य निभाते हों जिनका संबंध परमेश्वर के घर में विभिन्न कार्यों या विशेषज्ञता के क्षेत्रों से हो—अगर वे अक्सर परमेश्वर के सामने नहीं आते, उसकी मौजूदगी में नहीं रहते, उसकी पड़ताल स्वीकारने की हिम्मत नहीं रखते, और वे परमेश्वर से सत्य नहीं तलाशते, तो वे छद्म-विश्वासी हैं, और अविश्वासियों से अलग नहीं हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अक्सर परमेश्वर के सामने जीने से ही उसके साथ एक सामान्य संबंध बनाया जा सकता है)। परमेश्वर कहता है कि अगर परमेश्वर को पाने के बाद भी किसी व्यक्ति की बातें और आचरण अविश्वासियों जैसे ही हैं और चाहे कुछ भी हो जाए, वे कभी परमेश्वर की ओर से आने वाली बातों को स्वीकार नहीं करते, वे लगातार लोगों और मसलों पर ध्यान देते हैं और वे कभी सत्य स्वीकार नहीं करते, तो ऐसा व्यक्ति एक छद्म-विश्वासी है। मैंने सोचा कि कैसे मेरी माँ ने कई सालों तक परमेश्वर में विश्वास किया, फिर भी उसने कभी परमेश्वर की ओर से आने वाली बातों को स्वीकार नहीं किया। वह सभाओं में शामिल होने और अपना कर्तव्य करने को तैयार होने का दावा करती थी, लेकिन यह कभी भी सच्चा नहीं था। जब भी उसके दैहिक हितों की बात आती, वह अपना कर्तव्य एक तरफ रख देती थी और चाहे भाई-बहनों ने उसके साथ कितनी भी बार संगति की हो, उसने उसमें से कुछ भी स्वीकार नहीं किया। अलग-थलग किए जाने के बाद भी उसने अपने मसलों पर चिंतन नहीं किया और इसके बजाय, वह तथ्यों को तोड़-मरोड़ती, अपनी सफाई में दलीलें देती और शिकायत करती थी। उसने इस तथ्य को मानने से इनकार कर दिया कि उसने गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा की थीं; वह लोगों और मामलों पर ध्यान देती, लोगों के पीछे पड़ जाती और अगुआओं और कार्यकर्ताओं की गलतियाँ पकड़ लेती थी। जब उसने देखा कि उसे आशीष पाने की कोई उम्मीद नहीं है, तो उसने धन-दौलत का जीवन जीना शुरू कर दिया और खाने-पीने, पहनने और मौज-मस्ती पर ध्यान देने लगी। उसने गलत धारणाएँ भी फैलाईं, नकारात्मकता फैलाई और मुझे सभाओं में जाने और अपना कर्तव्य करने से रोका और बाधा डाली। उसने मुझे अपनी तरह पैसे के लिए काम करने और सांसारिक रास्ते पर चलने के लिए लुभाने की कोशिश की। मैंने देखा कि मेरी माँ ने सालों तक परमेश्वर में विश्वास किया था लेकिन सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया और उसकी बातें, आचरण और नजरिया पूरी तरह से अविश्वासियों जैसा था; वह पूरी तरह से एक छद्म-विश्वासी थी। कलीसिया के शुद्धिकरण कार्य करने के साथ, मुझे उसके सारे व्यवहार को लिखकर अगुआओं को बताना चाहिए। लेकिन अगर मैंने ऐसा किया तो उसे निश्चित रूप से बाहर निकाल दिया जाएगा। मैंने सोचा कि कैसे बचपन में मेरा परिवार लड़कियों पर लड़कों को तरजीह देता था। मेरी दादी, चाची और चाचा, सभी मेरे प्रति उदासीन थे और मेरे पिताजी ने भी कभी मेरी परवाह नहीं की थी। वह हर दिन बस सिगरेट और शराब पीता था और जब उसका मिजाज खराब होता तो वह गाली-गलौज करता, लोगों को मारता और चीजें तोड़ता था। घर में बस मैं और मेरी माँ ही एक-दूसरे का सहारा थे। मेरी माँ ही मुझे परमेश्वर के सामने भी लाई और पूर्णकालिक कर्तव्य करने के लिए मुझे सहारा दिया। उसने मेरे लिए अपना बहुत-सा दिल का खून लगाया। अगर उसे पता चला कि मैंने उसके व्यवहार की रिपोर्ट कर दी है, तो क्या उसका दिल नहीं टूट जाएगा? क्या वह मुझसे सच में निराश नहीं हो जाएगी? मुझे लगा कि ऐसा करने का मतलब होगा कि मुझमें सच में जमीर की कमी है और मैं वाकई उसे निराश कर रही होऊँगी। यह सोचते ही मैं अपने आँसू और नहीं रोक सकी और मैं बहुत दुविधा और पीड़ा में थी। बार-बार सोचने के बाद मैंने अपनी माँ के छद्म-विश्वासी वाले व्यवहार की रिपोर्ट नहीं की और इस मामले को एक तरफ रख दिया।
लगभग एक महीने बाद, अगुआ ने एक बार फिर मुझसे मेरी माँ के व्यवहार के बारे में लिखने को कहा। मैं अभी भी थोड़ी परेशान थी, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उससे मार्गदर्शन माँगा, “परमेश्वर, कलीसिया मेरी माँ के छद्म-विश्वासी होने के बारे में जानकारी इकट्ठा कर रही है। वे चाहते हैं कि मैं उसके व्यवहार की रिपोर्ट करूँ, लेकिन मैं अभी भी थोड़ी अनिच्छुक हूँ, सोचती हूँ कि उसके व्यवहार की रिपोर्ट करने का मतलब होगा कि मैं बेजमीर हूँगी। मुझे नहीं पता कि इससे कैसे निपटना है—कृपया इस अवस्था से बाहर निकलने में मेरी मदद कर।” बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब परमेश्वर किसी पर कार्य करना आरंभ करता है, जब वह किसी को चुन लेता है, तो वह इस समाचार की घोषणा किसी के सामने नहीं करता, न ही वह इसकी घोषणा शैतान के सामने करता है, कोई भव्य हाव-भाव तो वह बिल्कुल भी नहीं दिखाता। वह बस बहुत शांति से, बहुत स्वाभाविक रूप से, जो जरूरी होता है, करता है। पहले, वह तुम्हारे लिए एक परिवार चुनता है; तुम्हारे परिवार की पृष्ठभूमि, तुम्हारे माता-पिता, तुम्हारे पूर्वज—यह सब परमेश्वर पहले से ही तय कर देता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर ये निर्णय किसी सनक के चलते नहीं लेता; बल्कि उसने यह कार्य बहुत पहले शुरू कर दिया था। जब परमेश्वर तुम्हारे लिए कोई परिवार चुन लेता है, तो फिर वह वो तिथि चुनता है, जब तुम्हारा जन्म होगा। फिर परमेश्वर तुम्हें जन्म लेते और रोते हुए संसार में आते देखता है। वह तुम्हारा जन्म देखता है, तुम्हें अपने पहले शब्द बोलते देखता है, तुम्हें चलना सीखते समय लड़खड़ाते और डगमगाते हुए अपने पहले कदम उठाते देखता है। पहले तुम एक कदम उठाते हो और फिर दूसरा कदम उठाते हो—और अब तुम दौड़ सकते हो, कूद सकते हो, बोल सकते हो, अपनी भावनाएँ व्यक्त कर सकते हो...। जैसे-जैसे लोग बड़े होते हैं, शैतान की निगाह उनमें से प्रत्येक पर जम जाती है, जैसे कोई बाघ अपने शिकार पर नजर रख रहा हो। लेकिन अपना कार्य करने में परमेश्वर कभी भी लोगों, घटनाओं या चीजों से उत्पन्न या स्थान या समय की सीमाओं के अधीन नहीं रहा; वह वही करता है जो उसे करना चाहिए और जो उसे करना है। बड़े होने की प्रक्रिया में तुम्हारे सामने ऐसी कई चीजें आ सकती हैं, जो तुम्हें पसंद न हों, और साथ ही बीमारी और कुंठा भी आ सकती हैं। लेकिन जैसे-जैसे तुम इस मार्ग पर चलते हो, तुम्हारा जीवन और भविष्य पूरी तरह से परमेश्वर की देखरेख के अधीन होता है। परमेश्वर तुम्हें तुम्हारे पूरे जीवन के लिए एक वास्तविक गारंटी देता है, क्योंकि वह तुम्हारी रक्षा और देखभाल करते हुए बिल्कुल तुम्हारी बगल में रहता है” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं समझ गई कि हम जिस परिवार में पैदा होते हैं, हमारी परवरिश और हमारी जीवन-स्थितियाँ, ये सभी परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत और व्यवस्थित की गई हैं। यह तथ्य कि मैं आज जीवित हूँ, परमेश्वर में विश्वास करने और कलीसिया में अपना कर्तव्य करने में सक्षम हूँ, पूरी तरह से परमेश्वर के मार्गदर्शन और सुरक्षा के कारण है। जब मेरी माँ ने मुझे जन्म दिया तो यह एक मुश्किल प्रसव था और स्थिति गंभीर थी। डॉक्टर ने मेरे पिताजी से पूछा कि माँ को बचाएँ या मुझे। मेरे पिताजी इतने डर गए थे कि उनके हाथ काँप रहे थे और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। तब मेरी माँ ने प्रभु यीशु से प्रार्थना की और यह परमेश्वर की सुरक्षा के कारण ही था कि मैं और मेरी माँ दोनों बच गए। साथ ही, जब मैं बच्ची थी तो मैं खेल रही थी और रेत लगी एक छड़ी अपनी आँख में मार ली। मेरी दाहिनी आँख से तुरंत दिखना बंद हो गया। मैं घबरा गई और सोचा कि मैं अंधी हो रही हूँ। मैं अपनी आँख मलती रही, लेकिन रेत नहीं निकाल सकी। अपनी चिंता में मैं बस अपने दिल में प्रभु यीशु को पुकार सकी। फिर मेरी आँख से लगातार आँसू बहते रहे और रेत धुल गई। अंत में, मेरी दाहिनी आँख की पुतली बाईं वाली की तुलना में बस थोड़ी धँस गई, लेकिन मेरी नजर अभी भी सामान्य थी। मैं सोचती थी कि मैं बस भाग्यशाली थी, लेकिन परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे आखिरकार एहसास हुआ कि यह परमेश्वर ही था जो पर्दे के पीछे मेरी निगरानी और सुरक्षा कर रहा था। ऐसा लगा कि मेरी माँ ने मुझे पालने में बहुत कष्ट उठाया और वह मुझे परमेश्वर के सामने भी लाई, लेकिन परमेश्वर के वचनों के अनुसार, जब मैं पैदा हुई, जिस तरह के माहौल में मैं पली-बढ़ी, जिन लोगों से मैं मिलूँगी, जिन चीजों का मैं अनुभव करूँगी और जब मैं परमेश्वर के घर में कर्तव्य करने आऊँगी, यह सब परमेश्वर के प्रभुत्व और आयोजनों के अधीन था। परमेश्वर हर कदम पर मेरा मार्गदर्शन कर रहा था। यह सोचकर मैं बहुत भावुक हो गई और मैंने सोचा, “परमेश्वर सच में महान है। उसका प्रेम कितना वास्तविक है!” लेकिन मुझे लगता रहा कि चूँकि मेरी माँ ने मुझे पालने में कठिनाई और थकावट सही, इसलिए मुझे उसका एहसानमंद होना चाहिए। इसलिए उसे कलीसिया में रखने के लिए, मैंने जानबूझकर उसके छद्म-विश्वासी होने के कई व्यवहारों को छिपाया, उसकी ढाल बनी और कलीसिया के काम की रक्षा नहीं की। यही सच में जमीर की कमी को दिखाता था!
मैंने यह भी पढ़ा कि परमेश्वर के वचन कहते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम का निर्धारण उनके कर्मों के सार के अनुसार होता है और इसका निर्धारण सदैव उचित तरीके से होता है। कोई भी दूसरे के पापों को नहीं ढो सकता; यहाँ तक कि कोई भी दूसरे के बदले दंड नहीं पा सकता। यह सुनिश्चित है। ... अंत में, धार्मिकता करने वाले धार्मिकता ही करते हैं और कुकर्मी, कुकर्मी हैं। अंततः धार्मिकता करने वालों को ही जीवित बचे रहने दिया जाएगा, जबकि बुरा करने वाले नष्ट हो जाएंगे। पवित्र, पवित्र हैं; वे गंदे नहीं हैं। गंदे, गंदे हैं और उनमें पवित्रता का एक भी अंश नहीं है। जो लोग नष्ट किए जाएँगे, वे सभी बुरे हैं और जो जीवित बचेंगे वे सभी धार्मिक हैं—भले ही बुरे लोगों की संतानें धार्मिक कर्म करें और भले ही किसी धार्मिक व्यक्ति के माता-पिता कुकर्म करें। एक विश्वासी पति और अविश्वासी पत्नी के बीच आंतरिक रूप से कोई संबंध नहीं होता और विश्वासी बच्चों और अविश्वासी माता-पिता के बीच कोई संबंध नहीं होता; ये दोनों तरह के लोग असंगत हैं। विश्राम में प्रवेश करने से पहले, लोगों में दैहिक, पारिवारिक स्नेह होता है, लेकिन एक बार जब वे विश्राम में प्रवेश कर जाते हैं, फिर दैहिक, पारिवारिक स्नेह जैसी कोई बात नहीं रह जाती” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे)। “समुद्र गरजेंगे, पहाड़ गिर जाएँगे, बड़ी-बड़ी नदियाँ विघटित हो जाएँगी, मनुष्य हमेशा के लिए बदल दिया जाएगा, सूरज मंद पड़ जाएगा, चाँद काला हो जाएगा, मनुष्य के पास शांति से जीने के लिए और दिन नहीं रहेंगे, भूमि पर शांति का और समय नहीं होगा, स्वर्ग फिर कभी शांत और निर्विघ्न नहीं रहेगा और अब और नहीं टिकेगा। सभी चीजें नई कर दी जाएँगी और फिर से अपना मूल रूप पा लेंगी। पृथ्वी पर सारे परिवार छिन्न-भिन्न कर दिए जाएँगे, और पृथ्वी पर सारे राष्ट्र अलग-थलग कर दिए जाएँगे; पति-पत्नी के बीच पुनर्मिलन के दिन चले जाएँगे, माँ-बेटा दोबारा आपस में नहीं मिलेंगे, न बाप-बेटी ही फिर कभी आपस में मिल पाएँगे। पृथ्वी पर जो कुछ भी हुआ करता था, वह सब मेरे द्वारा नष्ट कर दिया जाएगा। मैं लोगों को अपनी भावनाएँ अभिव्यक्त करने का अवसर नहीं देता, क्योंकि मैं दैहिक भावनाओं से रहित हूँ, और चरम सीमा तक लोगों की भावनाओं से घृणा करने लगा हूँ। लोगों के बीच की भावनाओं के कारण ही मुझे एक तरफ कर दिया गया है, और इस तरह मैं उनकी नजरों में ‘दूसरा’ बन गया हूँ; यह लोगों के बीच की भावनाओं के कारण ही है कि मैं भुला दिया गया हूँ; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह अपने ‘विवेक’ को पाने के अवसर का लाभ उठता है; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह हमेशा मेरी ताड़नाओं से विमुख रहता है; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह मुझे गलत और अन्यायी कहता है, और कहता है कि मैं चीजें सँभालने में मनुष्य की भावनाओं से बेपरवाह रहता हूँ। क्या पृथ्वी पर मेरे भी सगे-संबंधी हैं? किसने कभी, मेरी तरह, अपनी पूरी प्रबंधन-योजना के लिए बिना खाने या सोने के बारे में सोछे, दिन-रात काम किया है? मनुष्य की तुलना परमेश्वर से कैसे हो सकती है? मनुष्य परमेश्वर के साथ सुसंगत कैसे हो सकता है? परमेश्वर, जो कि सृजन करता है, उस मनुष्य की तरह का कैसे हो सकता है, जिसे सृजित किया गया है? मैं कैसे पृथ्वी पर मनुष्य के साथ हमेशा रह सकता हूँ और उसके साथ मिलकर कार्य कर सकता हूँ? मेरे हृदय के लिए चिंता कौन महसूस कर सकता है? क्या यह मनुष्य की प्रार्थना है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 28)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं परमेश्वर के कार्य की प्रवृत्ति को समझ गई। यह परमेश्वर का विरोध करने वाले सभी लोगों को उनसे अलग करना है जो सच में उस पर विश्वास करते हैं। जो सच में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे उसकी सुरक्षा और अनुग्रह पाएँगे, जबकि जो उसका प्रतिरोध करते हैं, वे शापित और दंडित होंगे। परमेश्वर हर व्यक्ति का परिणाम उसके आचरण और कर्मों के साथ-साथ उसके प्रकृति सार के आधार पर निर्धारित करता है और इसमें पक्षपात या सिफारिश जैसी कोई बात नहीं है। परमेश्वर के घर में सत्य के पास शक्ति है और कोई तरफदारी या पक्षपात नहीं है। अब जब परमेश्वर का कार्य अपने अंत के करीब है, सभी तरह के लोग एक-एक करके प्रकट किए जा रहे हैं। यह जंगली बीज को गेहूँ से अलग करने का समय है। यह परमेश्वर के गेहूँ फटकने का समय है। भले ही मेरा और मेरी माँ का खून का बहुत करीबी रिश्ता है, उसके अंतिम परिणाम का फैसला मैं नहीं कर सकती। प्रभु यीशु ने कहा था : “उस समय दो जन खेत में होंगे, एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा। दो स्त्रियाँ चक्की पीसती रहेंगी, एक ले ली जाएगी और दूसरी छोड़ दी जाएगी” (मत्ती 24:40-41)। मेरी माँ इस जीवन में किस तरह के कष्ट से गुजरती है और उसका अंतिम परिणाम और मंजिल क्या होगी, यह उसके अपने चुनावों पर निर्भर करता है और उस रास्ते से निर्धारित होता है जिस पर वह चलती है। चाहे मैंने उसके साथ कितनी भी संगति की हो या उसे कलीसिया में रखने की कोशिश की हो, उसका प्रकृति सार एक छद्म-विश्वासी का था और उसका कलीसिया में रहना केवल कलीसिया के जीवन में बाधा डालेगा, भाई-बहनों की अवस्थाओं को प्रभावित करेगा और देर-सबेर उसे प्रकट कर दिया जाएगा और हटा दिया जाएगा। मैंने स्नेह के चलते ही अपनी माँ के व्यवहार की रिपोर्ट करने से इनकार किया था। अपने कर्तव्य में मेरी माँ हमेशा लापरवाह और कामचोर थी और वह अक्सर बस अपना कर्तव्य छोड़ देती थी। जब भाई-बहन उसके साथ संगति करते थे तो वह मुँह से तो मान जाती थी, लेकिन बाद में भी मनमर्जी से काम करती थी, कलीसिया के हितों की कोई परवाह नहीं करती थी। जब अगुआ ने उसे उजागर किया और उसकी काट-छाँट की तो उसने कुतर्क किया और गुस्सा हो गई। जब उसे बरखास्त कर दिया गया, तो वह बिना रुके लोगों को परेशान किया, तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा और चिल्लाती रही कि उसके साथ अन्याय हुआ है। उसने कलीसिया में कोई सकारात्मक भूमिका नहीं निभाई और वह लगातार गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा करती रही और भाई-बहनों के कर्तव्यों के निर्वहन को प्रभावित करती रही। मेरी माँ ने कलीसिया में इतनी सारी गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा कीं और उसने जरा-सा भी सत्य स्वीकार नहीं किया। उसका छद्म-विश्वासी व्यवहार पहले ही बहुत स्पष्ट था और मैं अच्छी तरह जानती थी कि उसे बाहर निकाल दिया जाना चाहिए। लेकिन मैं फिर भी उसकी ढाल बनी रही और उसके व्यवहार की रिपोर्ट करने को तैयार नहीं थी। क्या मैं सिर्फ शैतान की ढाल नहीं बन रही थी और एक छद्म-विश्वासी को नहीं छिपा रही थी? स्नेह में जीने से मैं सही-गलत का भेद नहीं कर पा रही थी और पूरी तरह से तर्कहीन हो गई थी। क्या मैं परमेश्वर के विरोध में नहीं खड़ी थी? इसी समय मैंने आखिरकार अनुभव किया कि परमेश्वर मानवीय भावनाओं से इतनी घृणा क्यों करता है। परमेश्वर कहता है : “लोगों के बीच की भावनाओं के कारण ही मुझे एक तरफ कर दिया गया है, और इस तरह मैं उनकी नजरों में ‘दूसरा’ बन गया हूँ; यह लोगों के बीच की भावनाओं के कारण ही है कि मैं भुला दिया गया हूँ; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह अपने ‘विवेक’ को पाने के अवसर का लाभ उठता है; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह हमेशा मेरी ताड़नाओं से विमुख रहता है; यह मनुष्य की भावनाओं के कारण ही है कि वह मुझे गलत और अन्यायी कहता है।” यह सोचकर मैं सच में परमेश्वर की ऋणी महसूस करने लगी और मेरे दिल में परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास करने की तीव्र इच्छा हुई। मैं जानती थी कि मैं इस मामले में और संकोच नहीं कर सकती और इसलिए मैंने अपनी माँ के सारे व्यवहार की रिपोर्ट कर दी।
एक महीने बाद मैं घर लौटी और मेरी माँ ने मुझे भावहीन होकर बताया कि उसे कलीसिया से बाहर निकाल दिया गया है। फिर उसने मुझे दोष दिया, “मैंने तुमसे जो कुछ भी कहा, वह सब तुमने उन्हें क्यों बता दिया? तुम सच में एहसानफरामोश हो और तुममें कोई जमीर नहीं है। मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि तुम अपनी माँ से भी गद्दारी करोगी।” उसकी यह बात सुनकर मुझे बहुत दुख और पीड़ा हुई। मानो मैंने उसके साथ कुछ गलत किया हो और मुझे उसका सामना करने में शर्म आ रही थी। लेकिन थोड़ी देर बाद मैंने इस पर दोबारा गौर किया, “मैं अपनी माँ के आरोपों और शिकायतों से इतना क्यों डर रही हूँ? मैंने तो सिद्धांतों के अनुसार काम किया!” मुझे एहसास हुआ कि मैं एक बार फिर स्नेह के आगे बेबस हो रही थी, इसलिए मैंने चुपचाप अपने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, इस स्थिति में मेरे लिए अभ्यास करने का सही तरीका क्या है?” उस पल मुझे परमेश्वर के वचन का एक अंश याद आया : “परमेश्वर जिससे प्रेम करता है उससे प्रेम करो, और जिससे वह घृणा करता है उससे घृणा करो : यही वह सिद्धांत है, जिसका पालन किया जाना चाहिए” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे अंदर से सच में प्रबुद्ध महसूस कराया। मेरी माँ को इसलिए बाहर निकाला गया क्योंकि उसने बहुत-सी गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा कीं, सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया और कलीसिया में उसका कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं था। उसके व्यवहार की रिपोर्ट करके मैं उसके साथ कुछ भी गलत नहीं कर रही थी। बल्कि मैं सत्य का अभ्यास कर रही थी और सिद्धांत के अनुसार काम कर रही थी और मुझे दोषी महसूस करने की कोई जरूरत नहीं थी। मेरी माँ को बाहर निकाला जाना कलीसिया के सिद्धांतों पर आधारित था। वह अब न केवल पश्चात्ताप करने से इनकार कर रही थी, बल्कि ऐसी बातें भी कह रही थी। मुझे और भी यकीन हो गया कि उसका प्रकृति सार एक छद्म-विश्वासी का था। अगर ऐसा व्यक्ति कलीसिया में रहता है तो वह निश्चित रूप से भाई-बहनों के कलीसियाई जीवन में बाधा डालेगा और दूसरों को कोई लाभ नहीं पहुँचाएगा। उन्हें बाहर निकाल ही देना चाहिए! परमेश्वर कहता है कि जिससे वह प्रेम करता है, उससे प्रेम करो और जिससे वह घृणा करता है, उससे घृणा करो। मैंने सिद्धांतों के अनुसार काम करके कुछ भी गलत नहीं किया। यह सोचकर मुझे राहत मिली और मेरे मन में अब अपनी माँ के प्रति कोई कर्ज या अपराध-बोध की भावना नहीं रही।
अपनी माँ के बाहर निकाले जाने के अनुभव से गुजरने के बाद मैंने छद्म-विश्वासियों के व्यवहार का कुछ भेद पहचान लिया और मैंने देखा कि जब तुम लोगों के साथ स्नेह के आधार पर व्यवहार करते हो तो तुम्हारे कार्यों में सिद्धांतों की कमी होती है। मैं जान गई थी कि मैं अब और स्नेह के आधार पर काम नहीं कर सकती। परमेश्वर का धन्यवाद कि उसने मुझे यह सबक सीखने का मौका दिया!