19. मैं अब दौलत, शोहरत और लाभ के पीछे नहीं भागती
मैं एक गरीब परिवार में पली-बढ़ी थी, मेरे दस भाई-बहन थे। बचपन से ही मैं बहुत सारा पैसा कमाकर अपने परिवार को गरीबी से बाहर निकालना चाहती थी। खास तौर पर मैं तब प्रेरित हुई जब कॉलेज के दौरान, एक सहपाठी ने मुझे एक बिज़नेस सेमिनार में शामिल होने के लिए बुलाया, जिसमें वक्ताओं ने गरीब से अमीर बनने के अपने अनुभव साझा किए। मैं भी एक सफल बिज़नेसवुमन बनकर, ढेर सारा पैसा कमाना, अपना घर और कार खरीदना, और दुनिया घूमना चाहती थी। इस तरह जो लोग मुझे जानते थे, वे मुझे गरीब लड़की की मिसाल के रूप में देखते जिसने गरीबी से मुक्ति पा ली और मेरी प्रशंसा करते। ग्रेजुएशन के बाद मैं यूएई चली गई और एक कंपनी में रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम करने लगी। क्योंकि मेरी कमाई कम थी, मैं लगातार पार्ट-टाइम नौकरियों की तलाश में रहती थी। मैं अक्सर दिन में अपनी नौकरी करती और फिर रात में अपना साइड बिजनेस चलाती थी। मैंने कई तरह के निवेश करने की भी कोशिश की, लेकिन वे सभी असफल रहे और मेरा जीवन और भी कठिन हो गया। उस समय मैं काफी निराश महसूस कर रही थी, और मैं समझ नहीं पा रही थी : मैंने पैसा कमाने के लिए इतनी मेहनत की थी, तो मेरे साथ ऐसा क्यों होता रहा? मैं चाहे कितनी भी मेहनत करूँ या निवेश करूँ, मैं असफल क्यों होती रही? मैं पूरी तरह से थक चुकी थी।
फरवरी 2020 में, मैंने अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया। परमेश्वर के वचनों का एक अंश था जिसने मेरे दिल को छू लिया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मानवजाति के एक सदस्य और मसीह के समर्पित अनुयायियों के रूप में अपने मन और शरीर परमेश्वर के आदेश की पूर्ति करने के लिए समर्पित करना हम सभी की जिम्मेदारी और दायित्व है, क्योंकि हमारा संपूर्ण अस्तित्व परमेश्वर से आया है, और वह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण अस्तित्व में है। यदि हमारे मन और शरीर परमेश्वर के आदेश और मानवजाति के न्यायसंगत कार्य को समर्पित नहीं हैं, तो हमारी आत्माएँ उन लोगों के सामने शर्मिंदा महसूस करेंगी, जो परमेश्वर के आदेश के लिए शहीद हुए थे, और परमेश्वर के सामने तो और भी अधिक शर्मिंदा होंगी, जिसने हमें सब-कुछ प्रदान किया है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से मैं यह समझ गई कि सृजित प्राणी होने के नाते हमें एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करना चाहिए क्योंकि यह हमारी जिम्मेदारी और दायित्व है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने हमारे लिए सब कुछ व्यवस्थित किया है, जिसमें हमारा परिवार, माता-पिता और वह परिवेश शामिल है जिसमें हम बड़े होते हैं—यह सब बहुत पहले परमेश्वर द्वारा पूर्व-निर्धारित था और सृजित प्राणी होने के नाते हमें उनके प्रेम का प्रतिदान करना चाहिए। मैं परमेश्वर के वचनों से बहुत प्रभावित हुई और परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाने के लिए अपना कर्तव्य करना चाहती थी। लेकिन मैं इतना कम सत्य समझती थी कि मैं पैसे के प्रलोभन का विरोध नहीं कर सकी, और मेरा दिल लगातार पैसा कमाने पर केंद्रित था।
बाद में मैं रिसेप्शनिस्ट से मानव संसाधन सहायक बन गई, और मेरा वेतन भी बढ़ गया। लेकिन मैं बहुत खुश नहीं थी क्योंकि यह नौकरी मुझे अमीर नहीं बना सकती थी, और न ही इसकी वजह से लोग मेरी तारीफ करते। अगर मैं ऐसे ही चलती रही, तो अपने घर पर मकान कब बनवाऊँगी, अपने परिवार का जीवन कैसे सुधारूँगी, और उन्हें घुमाने कब ले जा पाऊँगी? इसलिए मुझे अधिक वेतन वाली नौकरी खोजने या अतिरिक्त काम करने की जरूरत थी। इसलिए मैंने और बायोडाटा भेजे। जल्द ही मैंने दूसरी कंपनी में बिक्री विभाग में एक प्रशासनिक सहायक के रूप में नई नौकरी शुरू की। मैं बहुत खुश थी क्योंकि एक निश्चित वेतन के अलावा कमीशन भी था, और जब तक मैं अच्छा प्रदर्शन करती, मुझे बोनस भी मिलता। मैंने सोचा, “आखिरकार मेरे पास और पैसे कमाने का मौका है, और एक बार जब मैं घर पर मकान बनवा लूँगी, तो वहाँ के लोग निश्चित रूप से मेरा आदर और प्रशंसा करेंगे।” क्योंकि यह एक नई नौकरी थी और मेरे पास कोई अनुभव नहीं था, इसलिए मुझे सीखने में बहुत समय लगाना था ताकि उतना कमा सकूँ जितना अधिक मैं चाहती थी। ज्यादा पैसे कमाने के लिए मैं अक्सर ओवरटाइम काम करती थी। उस दौरान मैं अपना सारा समय और ऊर्जा काम में लगाती थी। काम पर मैं अक्सर अनियमित समय पर खाती थी या खाना ही भूल जाती थी, खासकर जब मेरे प्रबंधक या सहकर्मियों को मुझसे कोई ज़रूरी काम करवाना होता, तो बीमार होने पर भी मुझे काम करना ही पड़ता था। उस समय मैं एक सुसमाचार कार्यकर्ता थी, लेकिन मैं काम में इतनी व्यस्त थी कि सुसमाचार का प्रचार नहीं कर पाती थी। घर आने के बाद भी मैं काम कर रही होती थी। जब अगुआ ने मुझे सभाओं की मेजबानी करने के लिए कहा तो मैं ज्यादातर मना कर देती क्योंकि मेरे पास परमेश्वर के वचनों पर विचार करने का समय नहीं था। ऊपर से, दिन भर काम करने के बाद मैं पहले ही थकी होती थी और मेजबानी करने की और ऊर्जा नहीं बचती थी; मैं बस आराम करना चाहती थी। उस दौरान सभाओं में अक्सर मेरा ध्यान नहीं लगता था, और अक्सर काम करते हुए ही ऑनलाइन सभाओं में शामिल हो जाती थी। कभी-कभी तो मैं सभाओं के दौरान सो भी जाती थी। क्योंकि मेरा ध्यान सिर्फ पैसा कमाने पर था, इसलिए मुझे सुसमाचार प्रचार में अच्छे नतीजे नहीं मिले। मुझे बहुत अपराध-बोध हुआ, मैंने सोचा, “मैं थकी या बीमार होने पर भी अपने काम में लगी रहने को तैयार थी, लेकिन मैंने अपना कर्तव्य बेमन से और लापरवाही से किया।” हालाँकि मुझे थोड़ी आत्म-ग्लानि हुई, लेकिन मैं खुद आसानी से माफ कर देती थी और सोचती थी, “मैं अभी भी सेल्स में नई हूँ, लेकिन एक बार जब मैं इसमें बेहतर हो जाऊँगी तो मेरे पास अपने कर्तव्य के लिए और समय होगा।” हालाँकि चीजें मेरी उम्मीद के मुताबिक नहीं हुईं। मैं काम से जितनी ज्यादा परिचित होती गई, मुझे उतने ही लंबे समय तक काम करना पड़ा। मेरे पास न केवल खाली समय नहीं बचा, बल्कि मैं और भी व्यस्त हो गई। मेरा दिल बेचैन होने लगा, क्योंकि मैं जानती थी कि एक सृजित प्राणी होने के नाते, मेरा कर्तव्य मेरा दायित्व और मेरी ज़िम्मेदारी है, और मुझे परमेश्वर के प्रेम को चुकाने के लिए अपना कर्तव्य ठीक से करना चाहिए। लेकिन, मैंने अपना कर्तव्य पूरा नहीं किया। साथ ही, मैं बहुत डरी हुई भी थी, क्योंकि मैं हमेशा सांसारिक चीजों के पीछे भाग रही थी—मेरा दिल परमेश्वर से और भी दूर होता जा रहा था। मुझे अपने कर्तव्य में पवित्रात्मा की अगुवाई महसूस नहीं हो रही थी, और मेरे सुसमाचार प्रचार में भी कोई फल नहीं मिल रहा था। मैंने अपने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना की, “सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मुझे लगता है कि मैं रास्ता भटक गई हूँ। मैं पवित्रात्मा के कार्य या आपके मार्गदर्शन को महसूस नहीं कर पा रही हूँ। कृपया मेरी मदद करें।”
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “क्या तुम लोगों में बहुतेरे ऐसे नहीं हैं, जो सही और गलत के बीच डगमगाए हैं? सकारात्मक और नकारात्मक, काले और सफेद, परिवार और परमेश्वर, संतानों और परमेश्वर, सद्भाव और बिगाड़, धन और गरीबी, रुतबा और मामूलीपन, समर्थन दिए जाने और ठुकरा दिए जाने इत्यादि के बीच सभी संघर्ष के दौरान तुम लोगों ने जो विकल्प चुने हैं उनके बारे में तुम लोग निश्चित ही अनजान नहीं हो! एक सौहार्दपूर्ण परिवार और टूटे हुए परिवार के बीच तुमने पहले को चुना और तुमने ऐसा बिना किसी संकोच के किया; धन-संपत्ति और कर्तव्य के बीच तुमने फिर से पहले को चुना, यहाँ तक कि तुममें किनारे पर वापस लौटने की इच्छा भी नहीं रही; विलासिता और निर्धनता के बीच तुमने पहले को चुना; अपने बच्चों, पत्नियों और पतियों या मेरे बीच तुमने पहले को चुना; और धारणाओं और सत्य के बीच तुमने अब भी पहले को चुना। तुम लोगों के तरह-तरह के बुरे कर्मों को देखते हुए मेरा विश्वास तुम पर से बिल्कुल उठ गया है, मैं बिल्कुल स्तब्ध हूँ। तुम्हारे हृदय अप्रत्याशित रूप से इतने कठोर हैं कि उन्हें कोमल नहीं बनाया जा सकता। सालों तक मैंने अपने हृदय का जो खून खपाया है, उससे मुझे आश्चर्यजनक रूप से तुम्हारे परित्याग और विवशता से अधिक कुछ नहीं मिला, लेकिन तुम लोगों के प्रति मेरी आशाएँ हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती ही जाती हैं, क्योंकि मेरा दिन सबके सामने पूरी तरह से खुला पड़ा रहा है। फिर भी अब तुम लोग अंधेरी और बुरी चीजों का पीछा कर रहे हो और उनसे अपनी पकड़ ढीली करने से इनकार करते हो। तो फिर तुम्हारा परिणाम क्या होगा? क्या तुम लोगों ने कभी इस पर सावधानी से विचार किया है? अगर तुम लोगों को फिर से चुनाव करने को कहा जाए, तो तुम्हारा क्या रुख रहेगा? क्या अब भी तुम लोग पहले को ही चुनोगे? क्या अब भी तुम लोग निराशा और दर्दनाक शोक से मेरा प्रतिदान करोगे? क्या अब भी तुम्हारे हृदयों में जरा-सी भी गर्मजोशी होगी? क्या तुम अब भी इस बात से अनभिज्ञ रहोगे कि मेरे हृदय को सुकून पहुँचाने के लिए तुम्हें क्या करना चाहिए? इस क्षण तुम्हारा चुनाव क्या है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम वास्तव में किसके प्रति वफादार हो?)। परमेश्वर जो उजागर करता है, वह मेरी वास्तविक दशा है। कई बार हम जानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत, क्या सकारात्मक बातें हैं और क्या नकारात्मक, लेकिन हम फिर भी इन्हीं गलत और नकारात्मक बातों को चुनते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने के बाद से ही, मैं जानती थी कि एक सृजित प्राणी होने के नाते, मुझे अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए, ज्यादा पैसा कमाने और बेहतर भौतिक जीवन का आनंद लेने के लिए, और इसलिए कि दूसरे मेरी प्रशंसा करें, मुझसे ईर्ष्या करें मैं दिन भर कड़ी मेहनत करती और बहुत समय और ऊर्जा खर्च करती थी। मैंने अपना कर्तव्य बिल्कुल भी पूरे मन से नहीं किया। शाम को काम के बाद, जब मुझे अपना समय कर्तव्य पर लगाना चाहिए था, तो मैं बस यही सोचती थी कि और पैसे कैसे कमाऊँ; सुसमाचार का प्रचार करने या अपना कर्तव्य निभाने का मेरा मन ही नहीं करता था। मैंने सोचा कि जब तक मैं अपना कर्तव्य कर रही हूँ, इतना ही काफी है, और मुझे इस बात की बिल्कुल भी परवाह नहीं थी कि मेरे कर्तव्य का कोई फल मिल रहा है या नहीं। मैंने देखा कि अपने कर्तव्य के प्रति मेरा रवैया बिल्कुल श्रद्धापूर्ण नहीं था। मैं परमेश्वर में विश्वास तो करती थी, लेकिन वासत्व में मैं उनका अनुसरण नहीं कर पा रही थी, मैं अभी भी सांसारिक चीजों को चुन रही थी और एक अविश्वासी की राह पर चल रही थी। परमेश्वर मुझे अभी भी अपना कर्तव्य निभाने का मौका दे रहा है, तो मुझे इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहिए और इसे सँजोना चाहिए, और अपना समय और ऊर्जा सत्य का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य पूरा करने में लगाना चाहिए। यही सबसे मूल्यवान और सार्थक है। उस समय से, मैंने सक्रिय रूप से सभाओं में भाग लेना शुरू कर दिया, और अब काम की व्यस्तता को अपने कर्तव्य के आड़े नहीं आने देती थी। पहले, मैं घर वापस आने के बाद ओवरटाइम काम करती थी, रात 11 बजे भी काम के सिलसिले में फोन उठाती थी, लेकिन अब, मैं रात 8 बजे के बाद कोई काम से जुड़े फोन नहीं उठाती और न ही संदेश देखती हूँ। साथ ही, मैं पहले शायद ही कभी प्रार्थना करती थी और नियमित रूप से आत्मिक भक्ति नहीं करती थी, लेकिन अब मैं परमेश्वर के वचन पढ़ने, भजन सुनने, और गवाही के वीडियो देखने के लिए जल्दी उठती हूँ। अपनी छुट्टी के दिन सुबह, मैं संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ताओं को सभाओं में बुलाती, और दोपहर में उनके साथ सभा करती। मैं अपने काम के ब्रेक का उपयोग भी जल्दी से अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए करती थी। इस तरह से अभ्यास करने पर, मेरे दिल में शांति और खुशी महसूस हुई।
कुछ ही समय बाद, एक दोस्त ने मुझे एक निवेश में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया, और वादा किया कि इस निवेश में शामिल होने से मुझे बहुत सारा पैसा मिलेगा, और मैं न केवल एक कार खरीद पाऊँगी, बल्कि एक घर भी बना सकती हूँ, और दूसरे देशों की यात्रा भी कर सकती हूँ। ये सब मेरे सपने थे! मैंने मन ही मन सोचा, “निवेश में तो बस पैसा लगाना है और हर महीने मुनाफा होगा, इसलिए इसका मेरे कर्तव्य पर कोई असर नहीं पड़ेगा।” इसलिए, मैंने और मेरी बहन ने निवेश में शामिल होने के लिए पाँच लाख पेसो खर्च किए। निवेश करने के बाद पहले दो महीनों तक हमें मुनाफा मिला, लेकिन तीसरे महीने उन्होंने मुनाफा देना बंद कर दिया, इसलिए हमने अपना पैसा वापस माँगा, लेकिन वे बहाने बनाते रहे और मना कर दिया। मुझे बहुत गुस्सा आया। मैं अपनी पूँजी वापस पाना चाहती थी, लेकिन मैंने चाहे कितनी भी कोशिश की, मैं उसे वापस नहीं पा सकी। मैं बहुत परेशान थी, क्योंकि यह वह पैसा था जो मैंने मकान बनाने के लिए घर भेजने को अलग रखा था। मैं बस जल्दी से निवेश में खोए हुए पैसे को वापस कमाने का कोई तरीका खोजना चाहती थी। इसलिए, मैं और भी कड़ी मेहनत और अक्सर ओवरटाइम करने लगी। लेकिन कंपनी में कुछ बदलावों की वजह से मेरी तनख्वाह देर से मिली। उस समय मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं बचे थे, और किराया देना या खाना खरीदना भी एक समस्या बन गया था। मेरा दिल इन्हीं बातों में उलझा था, और एक बार फिर, मैं अपने कर्तव्य को लेकर लापरवाह हो गई और उसे अनमने ढंग से करने लगी। मैं सिर्फ संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ताओं को सभाओं में बुलाती थी, लेकिन मैं वास्तव में उनकी समस्याओं को समझती या हल नहीं करती थी। मुझे एहसास हुआ कि अगर मैं ऐसे ही चलती रही, तो मेरी दशा और भी खराब होती जाएगी, और हो सकता है कि मैं पवित्रात्मा का कार्य खो दूँ और परमेश्वर द्वारा त्याग दी जाऊँ। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, पिछले तीन महीनों से, मैं अपने कर्तव्य से ज़्यादा अपने काम को प्राथमिकता देती रही हूँ। मेरा दिल पूरी तरह से ज़्यादा पैसे कमाने और अपने निवेश को वापस पाने में लगा रहा है। हे परमेश्वर, कृपया मुझे मत छोड़ना। कृपया मुझे राह दिखाएँ और वापस अपनी ओर सही रास्ते पर ले आएँ। मैं उन चीज़ों को छोड़ देना चाहती हूँ जो मेरे दिल को बाधित करती हैं और मुझे आपसे दूर ले जाती हैं।”
इसके बाद, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के हाथों से नियंत्रित होता है। तुम स्वयं को नियंत्रित करने में असमर्थ हो : भले ही मनुष्य अपनी ओर से भाग-दौड़ करता रहे और व्यस्त रहे के बावजूद मनुष्य स्वयं को नियंत्रित करने में अक्षम रहता है। यदि तुम अपने भविष्य की संभावनाओं को जान सकते, यदि तुम अपने भाग्य को नियंत्रित कर सकते, तो क्या तुम्हें तब भी एक सृजित प्राणी कहा जाता? संक्षेप में, परमेश्वर चाहे जैसे भी कार्य करे, उसका समस्त कार्य केवल मनुष्य के वास्ते होता है। यह वैसा ही जैसे स्वर्ग और पृथ्वी और उन सभी चीज़ों को परमेश्वर ने मनुष्य की सेवा करने के लिए सृजित किया : परमेश्वर ने मनुष्य के लिए चंद्रमा, सूर्य और तारे बनाए, उसने मनुष्य के लिए जानवर और पेड़-पौधे, बसंत, ग्रीष्म, शरद और शीत ऋतु इत्यादि बनाए—ये सब मनुष्य के अस्तित्व के वास्ते ही बनाए गए थे। और इसलिए, परमेश्वर मनुष्य को चाहे जैसे भी ताड़ित करता हो या चाहे जैसे भी उसका न्याय करता हो, यह सब मनुष्य के उद्धार के वास्ते ही है। यद्यपि वह मनुष्य को उसकी दैहिक आशाओं से वंचित कर देता है, पर यह मनुष्य को शुद्ध करने के वास्ते है, और मनुष्य का शुद्धिकरण मनुष्य के अस्तित्व के लिए किया जाता है। मनुष्य की मंज़िल सृजनकर्ता के हाथ में है, तो मनुष्य स्वयं को नियंत्रित कैसे कर सकता है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना)। परमेश्वर के वचनों से, मैं समझ गई कि इंसान का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है और इंसान अपना भाग्य नहीं बदल सकता। लोग अपने लक्ष्यों को पाने के लिए चाहे कितनी भी मेहनत करें, या वे कितने भी आरामदायक और सुंदर जीवन की लालसा रखें, वे उसे हासिल कर पाते हैं या नहीं, यह उनके बस में नहीं है। जैसा मेरे साथ था—मैं नौकरी बदलकर और निवेश करके ज़्यादा पैसे कमाना और अपने सपने पूरे करना चाहती थी, और एक उज्ज्वल भविष्य पाना चाहती थी। लेकिन मैंने ज़्यादा पैसे तो नहीं कमाए, उलटा मेरा निवेश असफल हो गया और मुझे बहुत नुकसान हुआ, और साथ ही बहुत समय और ऊर्जा भी बर्बाद हुई। मैं अपना कर्तव्य पूरा करने में असफल रही, और मेरा जीवन और भी खराब हो गया। इससे मुझे समझ आया कि कोई व्यक्ति अमीर है या गरीब, यह उसके जन्म से बहुत पहले ही पूर्वनिर्धारित कर दिया गया है। अगर परमेश्वर ने मेरे भाग्य में धन-दौलत पूर्व-निर्धारित नहीं किया है, अगर परमेश्वर ने मेरे भाग्य में धन-दौलत पूर्वनिर्धारित नहीं किया है,
बाद में, मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े और अपनी समस्याओं के बारे में और स्पष्टता पाई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “‘दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है’ यह शैतान का एक फ़लसफ़ा है। यह संपूर्ण मानवजाति में, हर मानव-समाज में प्रचलित है; तुम कह सकते हो, यह एक रुझान है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह हर एक व्यक्ति के हृदय में बैठा दिया गया है, जिन्होंने पहले तो इस कहावत को स्वीकार नहीं किया, किंतु फिर जब वे जीवन की वास्तविकताओं के संपर्क में आए, तो इसे मूक सहमति दे दी, और महसूस करना शुरू किया कि ये वचन वास्तव में सत्य हैं। क्या यह शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने की प्रक्रिया नहीं है? शायद लोगों के पास इस कहावत को लेकर समान मात्रा में अनुभवजन्य ज्ञान नहीं होता, बल्कि हर एक आदमी अपने आसपास घटित घटनाओं और अपने निजी अनुभवों के आधार पर इस कहावत की अलग-अलग रूप में व्याख्या करता है और इसे अलग-अलग मात्रा में स्वीकार करता है। क्या ऐसा नहीं है? चाहे इस कहावत के संबंध में किसी के पास कितना भी अनुभव हो, इसका किसी के हृदय पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है? तुम लोगों में से प्रत्येक को शामिल करते हुए, दुनिया के लोगों के स्वभाव के माध्यम से कोई चीज प्रकट होती है। यह क्या है? यह पैसे की उपासना है। क्या इसे किसी के हृदय में से निकालना कठिन है? यह बहुत कठिन है! ऐसा प्रतीत होता है कि शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना सचमुच गहन है! शैतान लोगों को प्रलोभन देने के लिए धन का उपयोग करता है, और उन्हें भ्रष्ट करके उनसे धन की आराधना करवाता है और भौतिक चीजों की पूजा करवाता है। और लोगों में धन की इस आराधना की अभिव्यक्ति कैसे होती है? क्या तुम लोगों को लगता है कि बिना पैसे के तुम लोग इस दुनिया में जीवित नहीं रह सकते, कि पैसे के बिना एक दिन जीना भी असंभव होगा? लोगों की हैसियत इस बात पर निर्भर करती है कि उनके पास कितना पैसा है, और वे उतना ही सम्मान पाते हैं। गरीबों की कमर शर्म से झुक जाती है, जबकि धनी अपनी ऊँची हैसियत का मज़ा लेते हैं। वे ऊँचे और गर्व से खड़े होते हैं, जोर से बोलते हैं और अहंकार से जीते हैं। यह कहावत और रुझान लोगों के लिए क्या लाता है? क्या यह सच नहीं है कि पैसे पाने के लिए लोग कुछ भी बलिदान कर सकते हैं? क्या अधिक पैसे की खोज में कई लोग अपनी गरिमा और ईमान का बलिदान नहीं कर देते? क्या कई लोग पैसे की खातिर अपना कर्तव्य निभाने और परमेश्वर का अनुसरण करने का अवसर नहीं गँवा देते? क्या सत्य प्राप्त करने और बचाए जाने का अवसर खोना लोगों का सबसे बड़ा नुकसान नहीं है? क्या मनुष्य को इस हद तक भ्रष्ट करने के लिए इस विधि और इस कहावत का उपयोग करने के कारण शैतान कुटिल नहीं है? क्या यह दुर्भावनापूर्ण चाल नहीं है?” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि “दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है,” यह एक शैतानी फलसफा है। शुरू में, मैं इस कहावत का भेद नहीं पहचानती थी, और मैं सिर्फ यह जानती थी कि पैसे के बिना, लोग अच्छा जीवन नहीं जी सकते या जो वे चाहते हैं वह नहीं पा सकते। अब इस बारे में सोचने पर, यह सचमुच शैतान का लोगों को भ्रष्ट करने का एक तरीका है। शैतान पैसे के माध्यम से लोगों को भ्रष्ट करता और लुभाता है, उन्हें यह विश्वास दिलाता है कि केवल पैसा होने से ही उनका सम्मान होगा, वे समाज में अपनी जगह बना पाएँगे और उन्हें आदर की नज़र से देखा जाएगा। मैं इन शैतानी फलसफों के अनुसार जीती थी और मुझमें पैसा कमाने की प्यास भरी थी। मैं एक निश्चित मासिक आय से संतुष्ट नहीं थी, इसलिए मैंने निवेश किया। मैंने सोचा कि इस तरह मैं और पैसे कमा सकती हूँ और अपने सपने पूरे कर सकती हूँ—एक घर बनाना, अपने परिवार के साथ घूमना, और ऐसा जीवन जीना जिसकी दूसरे प्रशंसा करें और आदर से देखें। पैसे और भौतिक सुख के पीछे भागने के लिए, मैं बार-बार अपने कर्तव्य को दरकिनार करती रही और मेरा दिल परमेश्वर से निरंतर दूर होता गया। मैं अंधकार में जी रही थी और पवित्रात्मा के कार्य को महसूस नहीं कर पा रही थी। अब मैं शैतान की योजनाओं और साजिशों को साफ-साफ देख सकती थी : वो लोगों को पैसे के जाल में फँसाता है, उनके दिलों को परमेश्वर से भटकाता है और उनसे विश्वासघात करवाता है, ताकि वे आखिर में उसके साथ नरक में डाल दिए जाएँ। मैंने यह भी देखा कि बहुत से अमीर लोग—हालाँकि वे विलासिता का जीवन जीते हैं और जो चाहें खरीद सकते हैं, जैसे सुंदर घर, महँगी कारें वगैरह, और वे बेफिक्र जीवन जीते हुए दिखते हैं—पर असल में खुश नहीं हैं। कुछ लंबे समय तक शराब और नशीली दवाओं के सेवन से होने वाली गंभीर बीमारियों से मर जाते हैं, और कोई भी धन-दौलत या रुतबा उनकी जान नहीं बचा सकता। दूसरे कई साल मेहनत करके अपना व्यवसाय खड़ा करते हैं, लेकिन फिर भी दिवालिया हो जाते हैं और गहरे कर्ज में डूब जाते हैं। कुछ लोग दबाव नहीं झेल पाते, लंबे समय तक अवसाद में चले जाते हैं और अंत में आत्महत्या कर लेते हैं। इसके बहुत सारे उदाहरण हैं। शैतान लोगों को लुभाने के लिए पैसे और विलासितापूर्ण जीवन का उपयोग करता है, जिससे लोग और भी ज़्यादा खोखला, बुरा और पतित जीवन जीते हैं। इन सबकी असलियत देखने के बाद, मैंने यह सोचना छोड़ दिया कि अपने निवेश के पैसे वापस कैसे पाऊँ, और मैं परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों के आगे समर्पण करने और अपना दिल अपने कर्तव्य में लगाने को तैयार हो गई।
2 जनवरी, 2024 को हमारी कंपनी में एक नया प्रबंधक आया और मेरा काम का बोझ बढ़ गया। अपने मूल काम के अलावा, मैं उसकी निजी सहायक भी बन गई। इससे मैं और भी व्यस्त हो गई, और मैं लगभग चौबीसों घंटे काम के लिए तैयार रहती थी। लेकिन इस बार, मैंने खुद से कहा कि चाहे कुछ भी हो, मैं इसका असर अपने कर्तव्य पर नहीं पड़ने दूँगी। बाद में, कलीसिया के एक पर्यवेक्षक ने पूछा कि क्या मैं सुसमाचार का प्रचार करने और गवाही देने का अभ्यास करने को तैयार हूँ और मैं सहमत हो गई। मैं सचमुच बहुत खुश थी और मुझे लगा कि यह परमेश्वर द्वारा मुझे दिया गया एक अवसर है। मैं इतने लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास करती थी, लेकिन मैं हमेशा पैसे के पीछे भागती रही और मैंने अपना कर्तव्य ठीक से नहीं किया, इसलिए इस बार, मैं इस मौके की सचमुच कद्र करूँगी। उस समय से, मैंने सुसमाचार का प्रचार करने में और अधिक समय समर्पित किया। लेकिन मेरा काम और भी व्यस्त होता गया, और रात को घर आने के बाद भी मैं रुक नहीं पाती थी। यहाँ तक कि मेरे प्रबंधक भी अक्सर मुझे फोन या मैसेज करते थे। कभी-कभी जब मैं किसी संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ताओं के साथ संगति कर रही होती थी, तब भी मेरे प्रबंधक या सहकर्मी मुझे फोन करते थे, जिससे मैं अपना मन शांत नहीं कर पाती थी। लेकिन मैं फिर से अपना कर्तव्य करने का मौका खोना नहीं चाहती थी, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह मेरी अगुवाई करें और मुझे शैतान के बंधनों से मुक्त होने की शक्ति दें। मुझे प्रभु यीशु के वचन याद आए : “यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा? या मनुष्य अपने प्राण के बदले क्या देगा?” (मत्ती 16:26)। प्रभु के वचनों से, मैं समझ गई कि भले ही मैं बहुत धन-दौलत हासिल कर लूँ और प्रतिष्ठा और रुतबा भी पा लूँ, लेकिन अगर मेरे पास परमेश्वर की सुरक्षा नहीं है और मैंने सत्य और जीवन नहीं पाया है, तो अंत में, मेरा परिणाम फिर भी विनाश ही होगा। इस दुनिया में, बहुत से अमीर लोगों के पास भरपूर भौतिक धन-दौलत है, लेकिन जब विनाश आते हैं, तो उनका पैसा उन्हें बिल्कुल नहीं बचा पाएगा, और अगर उनके भाग्य में मरना लिखा है तो वे मर ही जाएँगे। विनाशों के सामने पैसा और रुतबा बेकार हैं। फिर मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “इस दशा से खुद को मुक्त करने का सबसे सरल तरीका है जीने के अपने पुराने तरीके को अलविदा कहना; जीवन में अपने पुराने लक्ष्यों को अलविदा कहना; अपने पुराने जीने के तरीके, जीवन के दृष्टिकोण, अनुसरणों, इच्छाओं एवं आकांक्षाओं को सारांशित करना और उनका गहन-विश्लेषण करना; और उसके बाद मनुष्य के लिए परमेश्वर के इरादों और अपेक्षाओं के साथ उनकी तुलना करना और यह देखना कि क्या उनमें से कोई परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है, क्या उनमें से कोई परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप है, क्या उनमें से कोई जीवन के सही मूल्य प्रदान करता है, व्यक्ति को अधिकाधिक सत्य को समझने की दिशा में ले जाता है और व्यक्ति को मानवता के साथ और मनुष्य के समान जीने देता है। जब तुम लोगों द्वारा जीवन में अनुसरण किए जा रहे अपने विभिन्न लक्ष्यों और उनके जीने के विभिन्न तरीकों की बार-बार जाँच करोगे और इनका सावधानीपूर्वक गहन-विश्लेषण करोगे तो तुम यह पाओगे कि उनमें से एक भी सृष्टिकर्ता के उस मूल इरादे के अनुरूप नहीं है जिसके साथ उसने मानवजाति का सृजन किया था। ये सारी चीजें लोगों को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और उसकी देखभाल से दूर करती हैं; ये सभी ऐसे जाल हैं जो लोगों को भ्रष्ट बनने का कारण बनते हैं और उन्हें नरक में ले जाते हैं। इस बात को मान लेने के बाद तुम्हें जीवन के अपने पुराने दृष्टिकोण को त्याग देना चाहिए, विभिन्न जालों से दूर रहना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर को तुम्हारे जीवन का नियंत्रण करने देना चाहिए और इसके लिए व्यवस्थाएँ करने देना चाहिए, केवल परमेश्वर के आयोजनों और मार्गदर्शन के प्रति समर्पण करने का दृढ़ संकल्प करना चाहिए, खुद से कोई चुनाव नहीं करने चाहिए और एक ऐसा इंसान बनना चाहिए जो परमेश्वर की आराधना करता हो” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III)। परमेश्वर के वचनों से, मैं समझ गई कि मुझे जीने की अपनी पुरानी रीति को छोड़कर बाहर निकलना चाहिए, और परमेश्वर के इरादों और उसकी अपेक्षाओं के अनुसार जीना चाहिए। आत्मचिंतन कर मैंने देखा कि हालाँकि मैंने कई सालों से परमेश्वर में विश्वास किया था, लेकिन क्योंकि चीज़ों को लेकर मेरा नज़रिया नहीं बदला था, इसलिए मैं हमेशा बहुत सारा पैसा कमाना चाहती थी, और मैंने रुतबे और प्रसिद्धि का पीछा किया ताकि दूसरे मुझे ऊँची नज़र से देखें। मैं हमेशा काम में व्यस्त रहती थी, अपना कर्तव्य अनमने ढंग से और बिना किसी ज़िम्मेदारी के एहसास के करती थी, नतीजतन, मैंने पवित्रात्मा का कार्य खो दिया और खोखलेपन और अंधकार में जीती रही, मैंने सत्य का अभ्यास करने और अपना कर्तव्य निभाने के कई मौके गँवा दिए। दौलत, शोहरत और लाभ से मिलने वाला आनंद केवल अस्थायी था और यह मेरी जान नहीं बचा सकता था। केवल सत्य का अनुसरण करके ही मैं अपने भ्रष्ट स्वभाव को त्याग सकती थी और उद्धार पा सकती थी। इस दौरान, मैं अक्सर प्रार्थना करती थी और परमेश्वर से सही निर्णय लेने में मेरा मार्गदर्शन करने के लिए कहती थी।
6 फरवरी, 2024 को, मैंने अपने प्रबंधक को अपना त्याग-पत्र सौंप दिया। वह बहुत हैरान हुआ और उसने मेरे नौकरी छोड़ने का कारण पूछा, और यहाँ तक कहा कि वह मेरा इस्तीफा मंजूर नहीं करेगा। लेकिन मैंने दृढ़ता से कहा, “मुझे शाम को और अपनी छुट्टियों के दिन और भी ज़रूरी काम करने होते हैं, इसलिए मैं अब यह नौकरी जारी नहीं रख सकती।” आखिरकार, उसके पास सहमत होकर हस्ताक्षर करने के अलावा कोई चारा न रहा। 12 फरवरी को, मैंने कंपनी छोड़ दी। छोड़ने के बाद मुझे बहुत राहत महसूस हुई, जैसे मेरे दिल से कोई भारी बोझ उतर गया हो। मैंने सचमुच अपने अंदर खुशी और आनंद महसूस किया। 28 फरवरी, 2024 को, जिस नई नौकरी के लिए मैंने अर्ज़ी दी थी, उसमें मुझे रख लिया गया। वहाँ बेनिफिट्स अच्छे थे, और प्रबंधक ने छह महीने बाद वेतन बढ़ाने का वादा किया। यह नौकरी सचमुच बहुत आकर्षक थी। लेकिन मैंने सोचा कि यह नौकरी भी मेरी पिछली नौकरी की तरह ही व्यस्त होगी, और मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगी। मैंने परमेश्वर से सही चुनाव करने में मेरा मार्गदर्शन करने के लिए प्रार्थना की। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “सामान्य लोगों के रूप में और परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करने वाले लोगों के रूप में, राज्य में प्रवेश करना और परमेश्वर के लोग बनना तुम्हारा सच्चा भविष्य है और एक ऐसा जीवन है जो अत्यंत मूल्यवान और सार्थक है; कोई भी तुम लोगों से अधिक धन्य नहीं है। मैं यह क्यों कहता हूँ? क्योंकि जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, वे देह के लिए जीते हैं और वे शैतान के लिए जीते हैं, लेकिन आज तुम लोग परमेश्वर के लिए जीते हो और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने के लिए जीते हो। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि तुम्हारा जीवन सबसे सार्थक है। केवल इसी समूह के लोग, जिन्हें परमेश्वर द्वारा चुना गया है, सबसे सार्थक जीवन जीने में सक्षम हैं : पृथ्वी पर और कोई तुम्हारे जितना मूल्यवान और सार्थक जीवन जीने में सक्षम नहीं है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो)। परमेश्वर के वचनों से, मैं समझ गई कि सत्य का अनुसरण करना और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना ही जीवन को सच्चा मूल्य और अर्थ देता है, और एक सृजित प्राणी होने के नाते मुझे इसी का अनुसरण करना चाहिए। केवल वे ही जो सत्य का अनुसरण करते और उसे पाते हैं, परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के योग्य हैं, और वे ही वास्तव में धन्य हैं। लेकिन जो लोग लगातार पैसे, धन-दौलत, प्रसिद्धि और लाभ के पीछे भागते हैं, वे शैतान के प्रभाव में जी रहे हैं, और अंततः परमेश्वर द्वारा त्याग दिए जाएँगे। अगर मैं काम की खातिर फिर से अपना कर्तव्य छोड़ दूँ, तो मैं निश्चित रूप से फिर से अंधकार और खोखलेपन में जीने लगूँगी, और अंततः उद्धार पाने का अपना मौका बर्बाद कर दूँगी। इसलिए, मैंने वह नौकरी ठुकरा दी। इस तरह, मुझे अपना कर्तव्य निभाने के लिए और समय मिल सकेगा। छह महीने बाद, मुझे एक उपयुक्त नौकरी मिल गई। काम के घंटे मेरे कर्तव्य में बाधा नहीं डालते थे और कोई ओवरटाइम नहीं था। हालाँकि वेतन थोड़ा कम था, लेकिन मुझे मन में शांति महसूस हुई, क्योंकि अब मेरे पास अपना कर्तव्य निभाने का समय था। अब, मैं कलीसिया में अपना कर्तव्य निभा रही हूँ और मेरे पास सुसमाचार का प्रचार करने और अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य की गवाही देने का मौका है। यह सचमुच आशीष की बात है! मुझे एहसास हो गया है कि इंसान के जीने के लिए बस इतना ही काफी है कि उसका गुज़ारा चल जाए, और परमेश्वर का उद्धार पाने के लिए अपने कर्तव्यों को पूरा करना और सत्य का अनुसरण करना ही सबसे महत्वपूर्ण और मूल्यवान बातें हैं। परमेश्वर का धन्यवाद!