78. अपने फैसले पर कोई पछतावा नहीं

जिनशिन, चीन

मैं 90 के दशक में पैदा हुई थी, मिडिल स्कूल में मुझे रोमांस ड्रामा की लत लग गई। जब भी मैं नायक और नायिका के बीच अटूट प्यार देखती, खासकर जब नायक नायिका का ख्याल रखता, तो मुझे ईर्ष्या होती और उम्मीद करती कि एक दिन मुझे भी ऐसा ही प्यार मिलेगा। मैं सोचती थी कि कोई ऐसा मिले जो मुझे प्यार करे और सुख-दुख में साथ निभाए, यही जीवन जीने का सबसे सुखद और सार्थक तरीका होगा।

अप्रैल 2009 में, परमेश्वर को पाने के कुछ ही समय बाद, मेरी मुलाकात वेनबिन से हुई। वह मुझसे चार साल बड़ा था, वह भोला-भाला, सच्चा, परिपक्व और स्थिर था और वह मेरे प्रति सचमुच विचारशील और मेरा ख्याल रखने वाला था। जब भी मैं उससे नाराज होती, तो वह हमेशा मुझे बर्दाश्त कर लेता था। आम तौर पर जब कुछ होता, तो वह पहले मेरी राय पूछता और हमेशा मेरी बात मान लेता और मेरे फैसलों का सम्मान करता था। मैं उसके साथ सहज महसूस करती थी। हमारे रिश्तेदार और दोस्त भी मुझसे ईर्ष्या करते थे, वे कहते थे कि वेनबिन हमेशा बहुत लिहाज करने वाला था और आजकल ऐसा इंसान मिलना मुश्किल है। मैं प्यार की मिठास में डूबी हुई थी और अक्सर इतना ध्यान रखने वाला प्रेमी पाकर खुद को भाग्यशाली मानती थी।

जैसे-जैसे मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े, मैं समझ गई कि देहधारण के माध्यम से अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य मानवजाति को बचाना और पूर्ण बनाना है, जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उसके न्याय को स्वीकार करते हैं और शुद्ध किए जाते हैं, उन्हें अगले युग में लाना है और यह मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण है। मेरे माता-पिता भी अक्सर मेरे साथ परमेश्वर में विश्वास करने के महत्व के बारे में संगति करते थे और मुझे इस अत्यंत दुर्लभ अवसर को संजोने की याद दिलाते थे। मैं वेनबिन को सुसमाचार सुनाना चाहती थी। यह कितनी खुशी की बात होगी अगर हम दोनों परमेश्वर में विश्वास कर सकें, एक साथ सत्य का अनुसरण कर सकें और अंत में बचाए जाकर एक साथ राज्य में प्रवेश कर सकें! इसलिए मैंने सावधानी से आस्था के प्रति उसका रवैया जानने की कोशिश की। वह परमेश्वर में विश्वास नहीं करता था और मानता था कि इंसान का भाग्य उसके अपने हाथों में होता है। उसने कहा, “हम जवान हैं और पैसे ही सब कुछ होने चाहिए।” उसने मुझसे यह भी कहा कि जब मेरे माता-पिता परमेश्वर में विश्वास करने की बात करें तो मैं उनकी न सुनूँ और यह कि इस दुनिया में कोई परमेश्वर नहीं है। उसकी ये बातें सुनकर मुझे बहुत असहज महसूस हुआ। मैंने तो पहले सोचा था कि हम दोनों परमेश्वर में विश्वास कर सकते हैं, लेकिन मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि वह नास्तिक निकलेगा। मैं क्या करूँ? मैंने देखा था कि कुछ भाई-बहनों को, जिनके परिवार परमेश्वर में विश्वास नहीं करते थे, उनके द्वारा बाधित किया और सताया गया था, जो बहुत पीड़ादायक था! ठीक मेरी चचेरी बहन की तरह—शादी से पहले वह अपने कर्तव्य करने और विभिन्न स्थानों पर सुसमाचार का प्रचार करने में सक्रिय थी, लेकिन शादी के बाद उसके नास्तिक पति ने उसकी आस्था को सताया और उसमें रुकावट डाली, हर दिन वे या तो बहस करते थे या लड़ते थे। बाद में मेरी चचेरी बहन सभाओं में भी शामिल नहीं हो पाती थी, अंत में उसे तलाक लेने के लिए मजबूर होना पड़ा और बच्चा पिता को दे दिया गया। जब भी वह अपने बच्चे के बारे में सोचती तो बहुत दुखी हो जाती थी। मैं ऐसी शादी या ऐसी पीड़ा नहीं सहना चाहती थी। वेनबिन परमेश्वर में विश्वास नहीं करता था, अगर शादी के बाद उसने मुझे सताया, तो क्या मैं अडिग रह पाऊँगी? कुछ समय के लिए मुझे समझ नहीं आया कि क्या करूँ। अपनी पीड़ा में मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मुझे उम्मीद नहीं थी कि वेनबिन नास्तिक होगा। इतने लंबे समय तक साथ रहने के बाद, मैं इस रिश्ते से भावनात्मक रूप से बहुत जुड़ चुकी हूँ। मैं इस रिश्ते को छोड़ने की सोच भी नहीं सकती थी। लेकिन अगर मैं उसके साथ रहती हूँ और वह मेरी आस्था के आड़े आता है क्योंकि हम अलग-अलग रास्तों पर हैं, तो मैं क्या करूँगी? परमेश्वर, मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, कृपया सही फैसला लेने में मेरा मार्गदर्शन कर।” आने वाले दिनों में, विवाह के मामले को कैसे सँभालना है, इस बारे में परमेश्वर के वचन पढ़ती रही और मुझे समझ आया कि जीवन-साथी चुनने में सिद्धांत होते हैं। समान विचारधारा वाले, अच्छी मानवता वाले और मेरी आस्था के आड़े न आने वाले किसी व्यक्ति को खोजना महत्वपूर्ण है। वेनबिन परमेश्वर में विश्वास नहीं करता था, हम समान विचारधारा वाले नहीं थे और न ही एक ही रास्ते पर थे, देर-सबेर हमारा रिश्ता टूट ही जाता। मैं जितनी अधिक भावनाएँ लगाती, बाद में मुझे उतनी ही अधिक पीड़ा महसूस होती। उस दौरान जब भी मैं इस बारे में सोचती, मेरा दिल दुखता था। मैं रिश्ता तोड़ने का विचार सहन नहीं कर सकती थी, लेकिन अगर हम साथ रहते, तो हम अलग-अलग रास्तों पर चल रहे होते। मेरा दिल बहुत उलझन में था, इसलिए मैंने परमेश्वर को अपनी पीड़ा और कठिनाइयाँ बताई और उससे मदद माँगी।

पता ही नहीं चला कि कब मार्च 2011 आ गया और वेनबिन का परिवार हमसे सगाई करने के लिए कह रहा था। मुझे एक फैसला लेना था। अपने दिल में, मैं साफ तौर पर जानती थी कि वेनबिन परमेश्वर में विश्वास नहीं करता और हम एक साथ अंत तक नहीं चल सकते, लेकिन फिर भी मुझे कुछ उम्मीद थी, मैं सोचती थी, “मैंने उसे कभी औपचारिक रूप से परमेश्वर के कार्य की गवाही नहीं दी है और मैं सत्य के प्रति उसके रवैये के बारे में पक्के तौर पर नहीं जानती। अगर वह परमेश्वर में विश्वास नहीं करता लेकिन मेरी आस्था में रुकावट भी नहीं डालता, तो हम फिर भी साथ रह सकते हैं।” इसलिए मैंने परमेश्वर में अपनी आस्था के बारे में उससे बात करने और यह देखने का फैसला किया कि वह कैसी प्रतिक्रिया देता है। मुझे उम्मीद नहीं थी कि जैसे ही उसने सुना कि मैं परमेश्वर में विश्वास करती हूँ, उसने गुस्से में अपनी मुट्ठी भींची और दीवार पर दे मारी। उसकी इस हरकत से मैं सन्न रह गई और जब तक मैं सँभली, तब तक उसके हाथ से खून बहने लगा था। जब मैंने देखा कि वह दीवार पर और मारने ही वाला है, मैंने जल्दी से उसका हाथ पकड़ लिया, लेकिन उसने जबरन छुड़ा लिया। जब मैंने उसका असामान्य व्यवहार और बहुत उदासीन भाव देखा, उसकी आँखों में नफरत भरी थी। तो वह मुझे एक अजनबी सा लगा और मैं डर गई, सोचने लगी, “क्या यह वही प्रेमी है जो पहले मेरी हर बात मानता था? जब उसने सुना कि मैं परमेश्वर में विश्वास करती हूँ तो उसका ऐसा रवैया क्यों है? मैं सिर्फ परमेश्वर में विश्वास करती हूँ और मैंने कुछ गलत तो नहीं किया। वह ऐसी प्रतिक्रिया क्यों दे रहा है?” मैं अपने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना करती रही, “परमेश्वर, अगर वह सच में मेरी आस्था में रुकावट डालता है, तो मैं उससे रिश्ता तोड़ने को तैयार हूँ। लेकिन मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और मैं हमारे इस दो साल के रिश्ते को नहीं छोड़ सकती। कृपया मुझे सही फैसला लेने की शक्ति दो।” प्रार्थना के बाद, मैंने परमेश्वर द्वारा अपनी रक्षा किए जाने का अनुभव साझा किया और मैंने अपना पक्ष साफ कर दिया। वह कुछ देर चुप रहा, फिर मेरी आस्था के आड़े न आने पर सहमत हो गया। हम इस बात पर सहमत हो गए कि अगर वह कभी मेरी आस्था के आड़े आया, तो हम अलग हो जाएँगे। यह सुनकर वह शुरू में तो चौंक गया, लेकिन फिर भी मान गया।

वेनबिन के भाई और भाभी की मानवता अच्छी थी और वे परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते थे, इसलिए मैंने उन्हें परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की गवाही दी। जब वेनबिन को पता चला, तो वह आग-बबूला हो गया, अपने परिवार के सामने उसने मुझसे चले जाने को कहा और कहा कि वह मुझे फिर कभी नहीं देखना चाहता। उसने मेरे सामने अपना फोन जोर से पटक दिया। मैंने उसे पहले कभी इतने गुस्से में नहीं देखा था। उसने नफरत भरी आवाज में कहा, “मैं तुम्हारी आस्था के आड़े नहीं आऊँगा, लेकिन मेरे परिवार के सामने प्रचार करने की कोशिश मत करना!” मेरी आस्था के प्रति उसका प्रतिरोध देखकर मैं चिंतित हो गई, सोचने लगी, “उसने कहा कि वह मेरी आस्था के आड़े नहीं आएगा, लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि वह नहीं जानता कि मैं सभाओं में जाती हूँ और कर्तव्य करती हूँ। अगर उसे पता चल गया, तो क्या वह मेरे रास्ते में आने की कोशिश करेगा? अगर वह ऐसा करता है, तो हमारी बहस होना तय है और हमारी शादी टूट सकती है। तब मुझे क्या करना चाहिए?” मेरा दिल उलझन से भर गया। अगर हमारा रिश्ता टूट गया, तो शायद मुझे फिर कभी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा जो मुझे इस तरह प्यार करे, फिर मेरे जीने का क्या मतलब रह जाएगा? लेकिन अगर हमारा रिश्ता नहीं टूटा, तो हम निश्चित रूप से बहस करते रहेंगे, फिर ऐसे जीवन में क्या खुशी हो सकती है? यह सोचते ही मेरा दिल ऐसे दुखता था मानो किसी ने छुरा घोंप दिया हो और मैं दुविधा में पड़ गई थी। बाद में, मुझे एहसास हुआ कि चीजों के बारे में हमारे कुछ दृष्टिकोणों में साफ अंतर था। उदाहरण के लिए, उसने कहा कि शादी के बाद हमें एक रेस्टोरेंट खोलना चाहिए, पैसे कमाकर कार, घर वगैरह खरीदना चाहिए। मैंने कहा, “एक इंसान कितना पैसा कमा सकता है यह तो स्वर्ग द्वारा ही नियत होता है और हमें बस जीने के लिए पर्याप्त पैसा चाहिए। पैसा जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करना और उसकी आराधना करना ही जीवन का सही मार्ग है।” उसने नाखुश होकर कहा, “अगर तुम पैसे नहीं कमाती तो जीने का क्या मतलब है? बिना पैसे के तुम खाओगी-पियोगी कैसे? तुम्हारी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है!” ऐसी बहसें अक्सर होती थीं और मैं बुरी तरह थक जाती थी। हर बार जब हमारी असहमति के कारण नाराजगी होती, तो मैं सोचती, “क्या यही वह खुशी है जो मैं चाहती थी? मैं खुश क्यों नहीं रह सकती? जीवन में अनुसरण करने के लिए सबसे सार्थक चीज क्या है? मैं अपने इस जीवन को बर्बाद होने से कैसे बचा सकती हूँ?” मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैंने शुरू में सोचा था कि वेनबिन के साथ रहने से खुशी मिलेगी और यही वह जीवन था जिसका मैंने हमेशा सपना देखा था, लेकिन चीजें वैसी नहीं हैं जैसा मैंने सोचा था। हम अलग-अलग रास्तों पर चलते हैं और हमारे बीच कोई समानता नहीं है, इसलिए मेरे दिल को कभी सुकून नहीं मिल सकता। हर दिन मुझे चुपके से तुम्हारे वचन पढ़ने पड़ते हैं और सभाओं में जाना पड़ता है, क्योंकि मुझे इन बातों पर बहस करने से डर लगता है। परमेश्वर, मैं बहुत पीड़ा में हूँ और मैं इन स्नेह-बंधनों से मुक्त होना चाहती हूँ, लेकिन अंदर ही अंदर, मैं इस रिश्ते को नहीं छोड़ सकती। कृपया मेरी मदद करो।”

बाद में, वेनबिन को कुछ शक हुआ। कई बार जब मैं बाहर से वापस आती, तो वह तरह-तरह के सवाल पूछता। पहले तो मैंने इस बारे में ज्यादा नहीं सोचा, फिर एक दिन, मैं जल्दी तैयार हो गई और सभा के लिए निकलने ही वाली थी। उसका हमेशा का नरम लहजा बदल गया और वह बहुत गंभीर दिखा। “सच-सच बताओ, क्या तुम फिर से सभा में जा रही हो?” मैंने कहा, “हाँ, जा रही हूँ। तो क्या हुआ? क्या तुमने नहीं कहा था कि तुम मुझे परमेश्वर में विश्वास करने से नहीं रोकोगे?” उसने कहा, “उस समय अगर मैं मना करता, तो तुम मुझसे रिश्ता तोड़ लेती। मैं और क्या कहता? मैंने सोचा था कि समय के साथ, परमेश्वर में विश्वास करने का तुम्हारा संकल्प कमजोर पड़ जाएगा और तुम विश्वास करना बंद कर दोगी। मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि पिछले छह महीनों में तुम और भी ज्यादा उत्साही हो जाओगी! मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता। तुम्हें मुझमें और अपनी आस्था में से किसी एक को चुनना होगा। अगर तुम मुझे चुनती हो, तो तुम्हें अपनी आस्था छोड़नी होगी!” मैं जानती थी कि अगर हम साथ रहे, तो लगातार बहसें होंगी और यह विवाद तो बस शुरुआत होगी। लेकिन अगर हमारा रिश्ता सच में टूट गया, तो भी मेरा मन नहीं मान रहा था और मैं इस रिश्ते को छोड़ना नहीं चाहती थी। लेकिन अगर मैंने वेनबिन के साथ रहना चुना, तो मुझे अपनी आस्था छोड़नी पड़ेगी। यह लोगों को पूर्ण बनाने के लिए परमेश्वर का महत्वपूर्ण क्षण था और मैं यह भी दृढ़ता से मानने लगी थी कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन ही सत्य, मार्ग और जीवन हैं और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करके मैंने अनुभव किया था कि कैसे परमेश्वर के वचन लोगों को शुद्ध कर सकते हैं, उनके भ्रष्ट स्वभावों को दूर कर सकते हैं, लोगों को उनके व्यवहार और स्व-आचरण में सही दिशा और मार्ग दिखा सकते हैं। परमेश्वर लोगों को जो सत्य देता है वह सचमुच अनमोल है, इसलिए अगर मैंने यह मौका गँवा दिया, तो यह जीवन भर का पछतावा होगा! मैं अपनी आस्था और विवाह के बीच कैसे चुनाव करूँ? मेरा दिल दो हिस्सों में बँट गया था और मैंने चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की। मैंने परमेश्वर के वचनों के एक अंश के बारे में सोचा जो मैंने एक सभा में पढ़ा था : “परमेश्वर द्वारा तुम लोगों पर किए गए कार्य के हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाजी होती है—इसके पीछे एक लड़ाई होती है। ... जब परमेश्वर और शैतान आध्यात्मिक क्षेत्र में लड़ाई करते हैं, तो तुम्हें परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करना चाहिए और किस प्रकार उसकी गवाही में अडिग रहना चाहिए? तुम्हें यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है, वह एक महान परीक्षण है और वह समय है जब परमेश्वर को तुम्हारी गवाही की आवश्यकता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि ऊपर से तो ऐसा लग रहा था कि वेनबिन मुझे परमेश्वर का अनुसरण करने से रोक रहा है, लेकिन असल में, पर्दे के पीछे से शैतान बाधा डाल रहा था। परमेश्वर और शैतान दोनों देख रहे थे कि मैं क्या चुनूँगी और मुझे परमेश्वर के लिए गवाही देनी थी। मैंने अपनी भावनाओं पर काबू पाया और शांति से कहा, “मैं परमेश्वर में विश्वास करना चुनती हूँ!” वेनबिन ने अपना रुख साफ कर दिया : वह मुझे परमेश्वर में विश्वास करने देने के बजाय रिश्ता तोड़ देगा। मैं बहुत हताश हो गई और बाद में, मैं फूट-फूट कर रो पड़ी। मैंने उम्मीद नहीं की थी कि इतने सालों के बाद, हमारा रिश्ता सच में इस मोड़ पर आ जाएगा। अपनी पीड़ा में, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा कि वह इस मामले में अपना इरादा समझने और अपनी गवाही में अडिग रहने में मेरी मदद करे।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तुम्हें सत्य के लिए कष्ट उठाने होंगे, तुम्हें सत्य के लिए खुद को बलिदान करना होगा, तुम्हें सत्य के लिए अपमान सहना होगा और तुम्हें और अधिक सत्य प्राप्त करने की खातिर और अधिक कष्ट सहना होगा। यही तुम्हें करना चाहिए। पारिवारिक सामंजस्य का आनंद लेने के लिए तुम्हें सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए और तुम्हें अस्थायी आनन्द के लिए जीवन भर की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए। तुम्हें उस सबका अनुसरण करना चाहिए जो खूबसूरत और अच्छा है और तुम्हें जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तुम ऐसा साधारण और सांसारिक जीवन जीते हो और आगे बढ़ने के लिए तुम्हारा कोई अनुसरण नहीं है तो क्या इससे तुम्हारा जीवन बर्बाद नहीं हो रहा है? ऐसे जीवन से तुम्हें क्या हासिल हो सकता है? तुम्हें एक सत्य के लिए देह के सभी सुखों का त्याग करना चाहिए, और थोड़े-से सुख के लिए सारे सत्यों का त्याग नहीं कर देना चाहिए। ऐसे लोगों में कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं होता!(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए, मैं समझ गई कि विवाह जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज नहीं है और परमेश्वर में विश्वास करना, सत्य पाना और परमेश्वर को जानना ही जीवन को सार्थक बनाता है। अंत के दिनों में, देहधारी परमेश्वर सत्य व्यक्त करने, लोगों का न्याय और शुद्धिकरण करने, उन्हें शैतान की शक्ति से बचाने और अनंत जीवन प्रदान करने के लिए मनुष्यों के बीच आया है। लेकिन मैंने केवल अस्थायी शारीरिक आनंद पर ध्यान केंद्रित किया। मैं सत्य और जीवन पाने के लिए कष्ट सहने और कीमत चुकाने को तैयार नहीं थी। इस तरह से जीकर मैं अंत में क्या हासिल कर सकती थी? जब महा विनाश आएगा, तो मुझे कौन बचा पाएगा? अतीत में, मैं सोचती थी कि विवाह सुंदर होता है और किसी ऐसे व्यक्ति के साथ अपना जीवन बिताना जो तुमसे प्यार करता है, जीवन को सार्थक बनाता है, लेकिन अब मुझे एहसास हुआ कि मैं बहुत भोली थी। वेनबिन और मैं अलग-अलग रास्तों पर थे। वेनबिन परमेश्वर में विश्वास नहीं करता था, वह विज्ञान की पूजा करता था और वह पैसे कमाने और एक श्रेष्ठतर जीवन जीने के तरीके खोजता था। जबकि मैं सिर्फ भोजन और वस्त्र से संतुष्ट रहने में विश्वास करती थी और यह मानती थी कि लोगों को सत्य का अनुसरण करना चाहिए और एक असली मनुष्य जैसा जीवन जीने की कोशिश करनी चाहिए, सृजित प्राणियों के कर्तव्य पूरे करने चाहिए और सृष्टिकर्ता की स्वीकृति पानी चाहिए। चीजों के बारे में हमारे दृष्टिकोण और हमारे अनुसरण के लक्ष्य पूरी तरह से अलग थे, इसलिए हमारे बीच कोई समानता नहीं थी। भले ही वह मेरे प्रति बहुत विचारशील और मेरा ख्याल रखने वाला था, फिर भी मैं अंदर से पीड़ित और दमित महसूस करती थी। उसके साथ रहते हुए, मुझे चुपके से सभाओं में जाना और परमेश्वर के वचन पढ़ने पड़ते थे, इस डर से कि वह मुझसे बहस करेगा और मैं अंदर से बेहद बाधित और थका हुआ महसूस करती थी। अगर मुझे जीवन भर ऐसे ही जीना पड़ा, तो यह बहुत पीड़ादायक होगा। परमेश्वर के वचनों ने मुझे समझाया कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीजें हैं कि व्यक्ति सत्य का अनुसरण करे, एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करे और सृष्टिकर्ता द्वारा दिए गए मिशन को पूरा करे। ऐसा व्यक्ति सृष्टिकर्ता की नजरों में अनमोल माना जाता है और एक सार्थक और मूल्यवान जीवन जीता है। ठीक पतरस की तरह, उसने अपना जीवन सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपना कर्तव्य पूरा करने पर केंद्रित किया और अंत में, उसे परमेश्वर की स्वीकृति मिली। यह समझने के बाद, मुझे और भी यकीन हो गया कि परमेश्वर में आस्था के मार्ग पर चलने को चुनना ही सही फैसला था। फिर मैंने सक्रिय रूप से अपने कर्तव्य करने वालों की श्रेणी में खुद को समर्पित कर दिया।

कुछ समय बाद, वेनबिन और उसके माता-पिता अचानक मेरे घर आए। वेनबिन ने आँखों में आँसू लिए कहा, “मैं इस रिश्ते को नहीं छोड़ सकता, लेकिन मैं तुम्हारी आस्था को स्वीकार नहीं कर सकता। मेरी खातिर क्या तुम अपनी आस्था नहीं छोड़ सकती? चलो एक साथ एक अच्छा जीवन जीते हैं।” उसके माता-पिता ने भी मुझसे अपनी आस्था छोड़ने का आग्रह किया। मुझे एहसास हुआ कि यह एक और चुनाव था जो मुझे करना था। मैं शांत हुई और सोचने लगी, “अगर वेनबिन सच में मुझसे प्यार करता है, तो उसे मेरी आस्था का समर्थन करना चाहिए। लेकिन वह तो मेरी आस्था का इतना विरोधी है—क्या यह सच्चा प्यार है? नहीं, मैं समझौता नहीं कर सकती।” इसलिए, मैंने शांति से अपना पक्ष रखा, “मैं परमेश्वर में विश्वास करना चुनती हूँ और मुझे अपने चुनाव पर कोई पछतावा नहीं है।” जाने से पहले, वेनबिन ने मुझसे पूछा कि मैंने उसे क्यों नहीं चुना और वह सोच रहा था कि क्या वह मेरे प्रति उतना अच्छा नहीं था। मैंने कहा, “नहीं, तुम मेरे प्रति अच्छे रहे हो। अतीत में, मैं सोचती थी कि विवाह जीवन का एक बड़ा हिस्सा है, लेकिन परमेश्वर को पाने के बाद, मैं समझ गई कि शादी करना जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज नहीं है। अगर मैंने तुम्हारे साथ रहने के लिए अपनी आस्था छोड़ दी, तो शारीरिक आनंद के साथ भले ही ऊपर से जीवन आसान और आनंदमय लगे, इस तरह से जीवन जीने का क्या मतलब होगा? क्या मैं एक चलती-फिरती लाश की तरह नहीं जी रही होऊँगी? क्या जीवन सिर्फ खाने-पीने, मौज-मस्ती करने और मरने का इंतजार करने के बारे में है? ऐसे जीवन का क्या मूल्य होगा? तुम शारीरिक आनंद और एक श्रेष्ठतर जीवन का अनुसरण करते हो, लेकिन ये वे चीजें नहीं हैं जो मैं चाहती हूँ। मैं एक सच्चा जीवन जीना चाहती हूँ, एक असली मनुष्य जैसा जीवन जीना चाहती हूँ और सृष्टिकर्ता की स्वीकृति पाना चाहती हूँ। हम अलग-अलग रास्तों पर चल रहे हैं और हम कभी भी एक ही मंजिल पर नहीं पहुँचेंगे।” यह सुनकर वेनबिन चुप हो गया और हमारा रिश्ता खत्म हो गया।

बाद में, मैंने इस पर विचार किया कि विवाह और आस्था के बीच चुनाव करते समय मैं इतनी संतप्त क्यों थी। मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश मिला : “वे घातक प्रभाव, जो हज़ारों वर्षो की ‘राष्ट्रवाद की बुलंद भावना’ ने मनुष्य के हृदय में गहरे छोड़े हैं, और साथ ही सामंती सोच, जिसके द्वारा लोग बिना किसी स्वतंत्रता के, बिना महत्वाकांक्षा या आगे बढ़ने की इच्छा के, बिना प्रगति की अभिलाषा के, बल्कि नकारात्मक और प्रतिगामी रहने और गुलाम मानसिकता से घिरे होने के कारण बँधे और जकड़े हुए हैं, इत्यादि—इन वस्तुगत कारकों ने मनुष्यजाति के वैचारिक दृष्टिकोण, आदर्शों, नैतिकता और स्वभाव पर अमिट रूप से गंदा और भद्दा प्रभाव छोड़ा है। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे मनुष्य आतंक की अँधेरी दुनिया में जी रहे हैं, और उनमें से कोई भी इस दुनिया के पार नहीं जाना चाहता, और उनमें से कोई भी किसी आदर्श दुनिया में जाने के बारे में नहीं सोचता; बल्कि, वे अपने जीवन की सामान्य स्थिति से संतुष्ट हैं, बच्चे पैदा करने और पालने-पोसने, उद्यम करने, पसीना बहाने, अपना रोजमर्रा का काम करने; एक आरामदायक और खुशहाल परिवार के सपने देखने, और दांपत्य प्रेम, नाती-पोतों, अपने अंतिम समय में आनंद के सपने देखने में दिन बिताते हैं और शांति से जीवन जीते हैं...। सैकड़ों-हजारों साल से अब तक लोग इसी तरह से अपना समय व्यर्थ गँवा रहे हैं, कोई पूर्ण जीवन का सृजन नहीं करता, सभी इस अँधेरी दुनिया में केवल एक-दूसरे की हत्या करने के लिए तत्पर हैं, प्रतिष्ठा और लाभ की दौड़ में और एक-दूसरे के प्रति षड्यंत्र करने में संलग्न हैं। किसने कब परमेश्वर के इरादे जानने की कोशिश की है? क्या किसी ने कभी परमेश्वर के कार्य पर ध्यान दिया है? एक लंबे अरसे से मानवता के सभी अंगों पर अंधकार के प्रभाव ने कब्ज़ा जमा लिया है और वही मानव-प्रकृति बन गए हैं, और इसलिए परमेश्वर के कार्य को करना काफी कठिन हो गया है, यहाँ तक कि जो परमेश्वर ने लोगों को आज सौंपा है, उस पर वे ध्यान भी देना नहीं चाहते(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (3))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि मेरे लिए विवाह और आस्था के बीच चुनाव करना इतना मुश्किल क्यों था। बचपन से ही टीवी ड्रामा के जरिए मेरे मन में यह बात बिठा दी गई थी, “जीवन अनमोल है, प्रेम उससे भी अधिक अनमोल है” और “प्रेम सर्वोपरि है।” इन विचारों ने मेरे मन को प्रभावित और विषाक्त कर दिया था। मैं सोचती थी कि जीवन में सबसे खुशी की बात यह है कि कोई ऐसा मिले जो तुमसे प्यार करे और तुम दोनों एक-दूसरे का सहारा बनकर साथ-साथ बूढ़े हो। खासकर जब मैं देखती कि नायक हर तरह से नायिकाओं का ख्याल रख रहे हैं, तो मुझे लगता कि वे बहुत खुश हैं और मैंने भ्रामक रूप से यह मान लिया था कि कोई ऐसा व्यक्ति मिलना जो तुमसे प्यार करे, इसका मतलब है कि तुमने अपना जीवन व्यर्थ नहीं जिया। वेनबिन को अपनी आस्था का इतना कड़ा विरोध करते देख और मुझे अपने और अपनी आस्था के बीच चुनाव करने के लिए कहते देख, मैं पीड़ा और उलझन की भावनाओं से भर गई और मैंने सोचा कि अगर मैं किसी ऐसे व्यक्ति के साथ अपना जीवन नहीं बिता सकती जो मुझसे प्यार करता है, तो मेरे जीवन का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। परमेश्वर के वचन खाने और पीने से, मैं आखिरकार समझ गई कि प्यार पाना ही एक सार्थक जीवन नहीं बनाता। ठीक वैसे ही, भले ही वेनबिन हमेशा मेरे प्रति विचारशील और मेरा ख्याल रखने वाला था, फिर भी मैं अक्सर खालीपन और बेबसी महसूस करती थी और परमेश्वर के वचन पढ़कर ही मेरे दिल को सुकून मिला। मुझे एहसास हुआ कि दिल का खालीपन भौतिक सुख या जीवन-साथी की देखभाल से नहीं भरा जा सकता। “प्रेम सर्वोपरि है” और “जीवन अनमोल है, प्रेम उससे भी अधिक अनमोल है” जैसे विचार लोगों को धोखा देने के लिए शैतान के दानवी शब्द हैं, शैतान हमें लुभाने और धोखा देने के लिए इनका इस्तेमाल करने की कोशिश करता है, ताकि हम आँख मूँदकर प्यार और शादी के पीछे भागें और इन चीजों को अनुसरण करने के लिए सही मानें और अंत में हम परमेश्वर से भटक जाएँ, उससे विश्वासघात करें और उद्धार का मौका गँवा दें। अगर परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन न होता, तो मैंने विवाह को चुना होता और सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर द्वारा बचाए जाने का मौका गँवा दिया होता। यह सोचकर, परमेश्वर का अनुसरण करने और उसमें विश्वास करने का मेरा संकल्प और भी दृढ़ हो गया।

वेनबिन के बार-बार मेरी आस्था के आड़े आने से, मैं धीरे-धीरे उसके सार की असलियत समझ गई। वेनबिन बाहर से नरम, मिलनसार और दोस्ताना लगता था, लेकिन वह एक नास्तिक था और जब भी वह मेरी आस्था के बारे में सुनता, तो वह गुस्सा हो जाता और उसकी आँखें लाल हो जाती थीं। उसके प्रकाशन शत्रुता से भरे थे और उसमें एक दानव का सार था। जैसा कि परमेश्वर ने कहा : “वे सभी जो विश्वास नहीं करते और वे भी जो सत्य का अभ्यास नहीं करते, राक्षस हैं!(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे)। एक सामान्य व्यक्ति भले ही आस्था को स्वीकार न करे, वह शत्रुतापूर्ण नहीं होगा। केवल दानव ही परमेश्वर से घृणा करते हैं और वेनबिन में सचमुच एक दानव का सार था। फिर मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “पति अपनी पत्नी से क्यों प्रेम करता है? पत्नी अपने पति से क्यों प्रेम करती है? बच्चे क्यों माता-पिता के प्रति कर्तव्यशील रहते हैं? और माता-पिता क्यों अपने बच्चों से अतिशय स्नेह करते हैं? लोग वास्तव में किस प्रकार की इच्छाएँ पालते हैं? क्या उनकी मंशा उनकी खुद की योजनाओं और स्वार्थी आकांक्षाओं को पूरा करने की नहीं है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे)। मैंने सोचा कि वेनबिन मेरे प्रति कैसे दयालु था, क्योंकि मैं दूसरी लड़कियों की तरह फिजूलखर्ची नहीं करती थी और न ही मुझमें कोई बुरी आदत थी। मैं उसके माता-पिता के साथ भी अच्छी थी, मैंने उसके परिवार के लिए कड़ी मेहनत की और काम करने से कभी जी नहीं चुराती थी। इन बातों का उसे फायदा था। लेकिन जब उसे पता चला कि मैं परमेश्वर में विश्वास करती हूँ, उसे चिंता हुई कि मैं उसके साथ मिलकर पैसे नहीं कमाऊँगी और चूँकि इससे उसके हितों पर असर पड़ता, वह विशेष रूप से नाराज और प्रतिरोधी हो गया। जब भी मैं आस्था का जिक्र करती, वह मेरी भावनाओं का जरा भी ख्याल किए बिना मुझे डाँटता और नीचा दिखाता था। मैंने अभी तक उससे शादी नहीं की थी और सच में उसके हितों पर कोई असर नहीं डाला था, फिर भी वह मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहा था। शादी के बाद, जब मैं अपने कर्तव्य के प्रति खुद को समर्पित कर देती, तो वह निश्चित रूप से मुझे और भी ज्यादा रोकता और सताता और शायद मुझसे तलाक भी ले लेता। किसी ऐसे व्यक्ति के साथ क्या खुशी हो सकती है जो निजी हितों को प्राथमिकता देता है और परमेश्वर से घृणा करता है?

वेनबिन से रिश्ता तोड़ने के बाद, मेरे दिल को बहुत सुकून मिला और मैं बिना किसी बाधा के परमेश्वर के वचन पढ़ सकती थी, सभाओं में जा सकती थी और अपने कर्तव्य कर सकती थी। मैंने सोचा कि कैसे इस अंतिम युग में परमेश्वर के प्रकटन की गवाह बन पाना, परमेश्वर के वचनों द्वारा शुद्ध और पूर्ण किए जाने को स्वीकार करना और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करना सचमुच एक बहुत बड़ा आशीष है और मेरा दिल मिठास और खुशी से भर गया। अब मैं पूरी तरह से अपनी आस्था और अपने कर्तव्य के प्रति खुद को समर्पित कर सकती हूँ। यह मेरे प्रति परमेश्वर का प्रेम और उद्धार है और मैं तहे दिल से परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ!

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