परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है
प्रत्येक व्यक्ति की नजर में परमेश्वर का प्रबंधन एक बहुत अपरिचित चीज है, क्योंकि लोग परमेश्वर के प्रबंधन को मनुष्य से पूरी तरह असंबद्ध समझते हैं। वे सोचते हैं कि परमेश्वर का प्रबंधन केवल परमेश्वर का ही कार्य है और वह केवल उसी से संबंध रखता है—और इसलिए मनुष्य उसके प्रबंधन के प्रति उदासीन है। इस प्रकार, मानवजाति का उद्धार अस्पष्ट और अव्यक्त हो गया है, और अब केवल खोखली बयानबाजी है। हालाँकि मनुष्य उद्धार प्राप्त करने और अद्भुत मंजिल में प्रवेश पाने के लिए परमेश्वर का अनुसरण करता है, किंतु उसे इस बात की परवाह नहीं है कि परमेश्वर अपना कार्य किस प्रकार करता है। मनुष्य इस बात की परवाह नहीं करता कि परमेश्वर ने क्या योजना बनाई है, न ही वह इस बात की परवाह करता है कि अपने उद्धार के लिए उसे क्या भूमिका अदा करनी चाहिए। यह वास्तव में दुःखद है! मनुष्य का उद्धार परमेश्वर के प्रबंधन से अलग नहीं किया जा सकता, न ही उसे परमेश्वर की योजना से अलग किया जा सकता है। फिर भी मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के बारे में कुछ भी नहीं सोचता, और इस प्रकार वह परमेश्वर से और भी अधिक दूर होता जाता है। इससे निरंतर अधिक से अधिक वे लोग जो उद्धार के प्रश्न से घनिष्ठता से जुड़े मुद्दों से अनभिज्ञ हैं—जैसे कि सृष्टि क्या है, परमेश्वर में विश्वास क्या है, परमेश्वर की आराधना कैसे करें, इत्यादि—उसके अनुयायियों के समूह में शामिल हो गए हैं। इसलिए अब परमेश्वर के प्रबंधन पर चर्चा करना हमारे लिए जरूरी है, ताकि उसका प्रत्येक अनुयायी स्पष्ट रूप से यह समझ जाए कि उसका अनुसरण करने और उसमें विश्वास करने का क्या अर्थ है। ऐसा करने से प्रत्येक व्यक्ति को परमेश्वर का अनुसरण मात्र आशीष पाने, आपदाओं से बचने या दूसरों से अलग दिखने के लिए करने के बजाय ज्यादा सही तरह से उस मार्ग को चुनने में मदद मिलेगी, जिस पर उन्हें चलना चाहिए।
हालाँकि मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रबंधन गहरा है, पर यह मनुष्य की समझ से परे नहीं है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर का संपूर्ण कार्य उसके प्रबंधन और मनुष्य के उद्धार के कार्य से जुड़ा हुआ है, और मानवजाति के जीवन, रहन-सहन और मंजिल से संबंध रखता है। परमेश्वर मनुष्य के मध्य और उनपर जो कार्य करता है, उसे बहुत ही व्यावहारिक और अर्थपूर्ण कहा जा सकता है। वह मनुष्य द्वारा देखा और अनुभव किया जा सकता है, और वह कोई अमूर्त चीज नहीं है। यदि मनुष्य परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले समस्त कार्य को स्वीकार करने में अक्षम है, तो उसके कार्य का महत्व ही क्या है? और इस प्रकार का प्रबंधन मनुष्य को उद्धार की ओर कैसे ले जा सकता है? परमेश्वर का अनुसरण करने वाले बहुत सारे लोग केवल इस बात से मतलब रखते हैं कि आशीष कैसे प्राप्त किए जाएँ या आपदा को कैसे टाला जाए। जैसे ही परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन का उल्लेख किया जाता है, वे चुप हो जाते हैं और सारी रुचि खो देते हैं। उन्हें लगता है कि इस प्रकार के उबाऊ मुद्दों को समझने से उनके जीवन की प्रगति में कोई मदद नहीं मिलेगी और न ही कोई लाभ प्राप्त होगा। परिणामस्वरूप, भले ही उन्होंने परमेश्वर के प्रबंधन के बारे में जानकारी सुनी हो, वे इसके साथ अगंभीर तरीके से पेश आते हैं। वे इसे स्वीकारने योग्य कोई खजाना नहीं मानते, न ही इसे समझने के लिए अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने में इन लोगों का प्रयोजन बहुत सरल होता है और यह एक ही लक्ष्य के लिए होता है : आशीषित होना। ये लोग ऐसी किसी भी दूसरी चीज के लिए पूर्णतया उदासीन रहते हैं जो इस उद्देश्य से संबंध नहीं रखती। उनके लिए, परमेश्वर में विश्वास करने का सबसे वैध लक्ष्य आशीष प्राप्त करना है—यह उनकी आस्था का असली मूल्य है। यदि कोई चीज इस प्रयोजन को पूरा नहीं करती, तो चाहे जो भी हो वे उससे अप्रभावित रहते हैं। आज परमेश्वर में विश्वास करने वाले अधिकांश लोगों का यही हाल है। उनका प्रयोजन और इरादा न्यायोचित प्रतीत होते हैं, क्योंकि जब वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो वे परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते भी हैं, परमेश्वर के प्रति समर्पित भी होते हैं और अपना कर्तव्य भी निभाते हैं। वे अपनी जवानी न्योछावर कर देते हैं, परिवार और आजीविका त्याग देते हैं, यहाँ तक कि दौड़-धूप करने के लिए वर्षों अपने घर से दूर बिताते हैं। अपने परम प्रयोजन के लिए वे अपनी रुचियाँ बदल डालते हैं, अपने जीवन का दृष्टिकोण बदल देते हैं, यहाँ तक कि अपने अनुसरण की दिशा तक बदल देते हैं, किंतु परमेश्वर पर अपने विश्वास करने के प्रयोजन को नहीं बदल सकते। वे अपनी आकांक्षाओं के प्रबंधन के लिए दौड़-धूप करते हैं; चाहे मार्ग कितना भी दूर क्यों न हो, और मार्ग में कितनी भी कठिनाइयाँ, खतरे और अवरोध क्यों न आएँ, वे दृढ़ रहते हैं और मृत्यु से नहीं डरते। इस तरह से अपने आप को समर्पित रखने के लिए उन्हें कौन-सी ताकत बाध्य करती है? क्या यह उनकी अंतरात्मा है? क्या यह उनका महान और कुलीन चरित्र है? क्या यह बुराई की शक्तियों से बिल्कुल अंत तक लड़ने का उनका दृढ़ संकल्प है? क्या यह प्रतिफल की आकांक्षा के बिना परमेश्वर के लिए गवाही देने की जो आस्था उनके पास है, वह है? क्या यह परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए सब कुछ बेहिचक त्याग देने की उनकी लगन है? या यह विलासितापूर्ण व्यक्तिगत माँगें हमेशा त्यागने की उनकी समर्पित भावना है? ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए, जिसने कभी परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य को नहीं समझा, उसका इतना सारा हृदय का रक्त खपाने में सक्षम होना एक बहुत बड़ा चमत्कार है! फिलहाल, आओ इसकी चर्चा न करें कि इन लोगों ने कितना कुछ दिया है। किंतु उनका व्यवहार हमारे गहन-विश्लेषण के बहुत योग्य है। उनके साथ इतनी निकटता से जुड़े उन लाभों के अतिरिक्त, परमेश्वर को कभी नहीं समझने वाले लोगों द्वारा उसके लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाने का क्या कोई अन्य कारण हो सकता है? यहाँ हमें एक ऐसी समस्या का पता चलता है जिसे मनुष्य पहले पता नहीं लगा सका है : परमेश्वर के साथ मनुष्य का संबंध केवल नग्न स्वार्थ पर आधारित है। यह आशीष लेने वाले और देने वाले के मध्य का संबंध है। स्पष्ट रूप से कहें तो यह एक कर्मचारी और एक नियोक्ता के मध्य का संबंध है। कर्मचारी केवल नियोक्ता द्वारा दिए जाने वाले प्रतिफल प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम करता है। इस प्रकार के स्वार्थ आधारित संबंध में कोई आत्मीय स्नेह नहीं होता, केवल लेन-देन होता है। प्रेम करने या प्रेम पाने जैसी कोई बात नहीं होती, केवल दान और दया होती है। कोई समझ नहीं होती, केवल असहाय दबा हुआ आक्रोश और धोखा होता है। कोई अंतरंगता नहीं होती, केवल एक अगम खाई होती है। अब जबकि चीजें इस बिंदु तक आ गई हैं तो ऐसी राह को कौन उलट सकता है? और कितने लोग इस बात को वास्तव में समझने में सक्षम हैं कि यह संबंध कितना भयावह बन चुका है? मेरा मानना है कि जब लोग आशीष प्राप्त होने के आनंदपूर्ण वातावरण में निमग्न हो जाते हैं तो कोई यह कल्पना नहीं कर सकता कि परमेश्वर के साथ ऐसा संबंध कितना अटपटा और भद्दा है।
परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास के बारे में सबसे दुःखद बात यह है कि परमेश्वर के कार्य के बीच मनुष्य अपने खुद के उद्यम में जुटा रहता है, जबकि परमेश्वर के प्रबंधन पर कोई ध्यान नहीं देता। परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास की सबसे बड़ी असफलता यह है कि जब वह परमेश्वर के प्रति समर्पित होने और उसकी आराधना करने का अनुसरण करता है, उसी समय वह एक महत्वाकांक्षी मंजिल के अपने सपने का निर्माण कर रहा होता है और इस बात की साजिश रचता है कि सबसे बड़ा आशीष और सर्वोत्तम मंजिल कैसे हासिल की जाए। भले ही लोग समझते हैं कि वे कितने दीन-हीन, घृणास्पद और दयनीय हैं, फिर भी ऐसे कितने लोग अपनी आकांक्षाओं और आशाओं को आसानी से त्याग सकते हैं? और कौन अपने कदमों को रोकने और अपनी ओर से योजनाएँ बनाना बंद करने में सक्षम है? परमेश्वर को उन लोगों की ज़रूरत है, जो उसके प्रबंधन को पूरा करने के लिए उसके साथ निकटता से सहयोग करेंगे। उसे उन लोगों की जरूरत है जो उसके प्रति समर्पण करने की खातिर अपने पूरे तन-मन को उसके प्रबंधन के कार्य के प्रति समर्पित करेंगे। उसे ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो हर दिन उससे भीख माँगने के लिए अपने हाथ फैलाए रहते हैं और उनकी तो बिल्कुल भी जरूरत नहीं है जो उसके लिए खुद को थोड़ा-सा खपाते हैं और फिर उससे भुगतान अदायगी की माँग करने का इंतजार करते हैं। परमेश्वर उन लोगों से नफरत करता है जो तुच्छ योगदान करते हैं और फिर अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट हो जाते हैं। वह उन निष्ठुर लोगों से नफरत करता है जो उसके प्रबंधन-कार्य को अत्यधिक नापसंद करते हैं और केवल स्वर्ग जाने और आशीष प्राप्त करने के बारे में बात करना चाहते हैं। वह उन लोगों से और भी अधिक नफरत करता है जो उसके उद्धार के कार्य से प्राप्त अवसर का लाभ अपने फायदे के लिए उठाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन लोगों ने कभी इस बात की परवाह नहीं की है कि परमेश्वर अपने प्रबंधन के कार्य के माध्यम से क्या हासिल और प्राप्त करना चाहता है। उनकी रुचि केवल इस बात में होती है कि किस प्रकार वे परमेश्वर के कार्य द्वारा प्रदान किए गए अवसर का उपयोग आशीष प्राप्त करने के लिए कर सकते हैं। वे परमेश्वर के हृदय के प्रति बिल्कुल भी विचारशील नहीं हैं और पूरी तरह से अपने भविष्य और भाग्य में तल्लीन रहते हैं। जो लोग परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के प्रति विमुख होते हैं और जो इस बात में जरा-सी भी रुचि नहीं रखते कि परमेश्वर मानवजाति को कैसे बचाता है और उसके इरादे क्या हैं, वे सभी परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के दायरे से बाहर वही चीजें कर रहे हैं जिन्हें वे करना चाहते हैं। उनके क्रियाकलापों को परमेश्वर द्वारा न तो याद किया जाता है और न ही अनुमोदित किया जाता है, परमेश्वर द्वारा इन्हें मूल्यवान माना जाना तो दूर की बात है।
ब्रह्मांड और आकाश की विशालता में अनगिनत जीव रहते और प्रजनन करते हैं, एक अंतहीन चक्र में जीवन के नियम का पालन करते हैं, और एक अटल नियम का अनुसरण करते हैं। जो मर जाते हैं वे अपने साथ जीवित लोगों की कहानियाँ लेकर चले जाते हैं, और जो लोग जी रहे हैं वे खत्म हो चुके लोगों के उसी त्रासद इतिहास को दोहराते हैं। और इसलिए, मानवजाति यह पूछे बिना नहीं रह पाती : हम क्यों जीते हैं? और हमें मरना क्यों पड़ता है? इस संसार पर कौन शासन करता है? और इस मानवजाति को किसने बनाया? क्या मानवजाति को वास्तव में प्रकृति ने बनाया? क्या मानवजाति वास्तव में अपने भाग्य को नियंत्रित कर सकती है? ... ये वे सवाल हैं, जो मानवजाति ने हजारों वर्षों से अनवरत पूछे हैं। दुर्भाग्य से, जितना अधिक मनुष्य इन सवालों से ग्रस्त हुआ है, उसमें उतनी ही अधिक प्यास विज्ञान के लिए विकसित हुई है। विज्ञान देह की संक्षिप्त तृप्ति और अस्थायी आनंद प्रदान करता है, लेकिन वह मनुष्य को उसकी आत्मा के भीतर की तन्हाई, अकेलेपन, बमुश्किल छिपाए जा सकने वाले आतंक और लाचारी से मुक्त नहीं कर सकता है। मानवजाति केवल उसी वैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग करती है, जिसे वह अपनी खुली आँखों से देख सकती है और अपने मस्तिष्क से समझ सकती है, जिससे अपने हृदय को चेतनाशून्य कर सके। फिर भी यह वैज्ञानिक ज्ञान मानवजाति को रहस्यों की खोज करने से रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। मानवजाति यह नहीं जानती कि ब्रह्मांड और सभी चीजों का संप्रभु कौन है, और मानवजाति के प्रारंभ और भविष्य के बारे में तो वह बिल्कुल भी नहीं जानती। मानवजाति केवल इस व्यवस्था के बीच विवशतापूर्वक जीती है। इससे कोई बच नहीं सकता और इसे कोई बदल नहीं सकता, क्योंकि सभी चीजों के बीच और ब्रह्मांड के ऊपर अनंतकाल से लेकर अनंतकाल तक वह एक ही है, जो सभी चीजों पर अपनी संप्रभुता रखता है। वह एक ही है, जिसे मनुष्य द्वारा कभी देखा नहीं गया है, वह जिसे मनुष्य ने कभी नहीं जाना है, जिसके अस्तित्व पर मनुष्य ने कभी विश्वास नहीं किया है—फिर भी वह एक ही है, जिसने मनुष्य के पूर्वजों में साँस फूँकी और मानवजाति को जीवन प्रदान किया। वह एक ही है, जो मानवजाति के लिए आपूर्ति और इसका भरण-पोषण करता है और उसका अस्तित्व बनाए रखता है; और वह एक ही है, जिसने आज तक मानवजाति का मार्गदर्शन किया है। इससे भी अधिक, वह और केवल वह एक ही है, जिस पर मानवजाति अपने अस्तित्व के लिए निर्भर करती है। वह सभी चीजों पर और ब्रह्मांड के सभी जीवित प्राणियों पर संप्रभुता रखता है। वह चारों मौसमों को शासित करता है और वही है जो हवा, पाले, हिमपात और बारिश के बदलावों को नियंत्रित करता है। वह मानवजाति के लिए सूर्य का प्रकाश लाता है और रात्रि का सूत्रपात करता है। यह वही था, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी की व्यवस्था की, और मनुष्य को पहाड़, झीलें और नदियाँ और उनके भीतर के सभी जीव प्रदान किए। उसके कर्म सर्वव्यापी हैं, उसकी सामर्थ्य सर्वव्यापी है, उसकी बुद्धि सर्वव्यापी है, और उसका अधिकार सर्वव्यापी है। इन व्यवस्थाओं और नियमों में से प्रत्येक उसके कर्मों का मूर्त रूप है, प्रत्येक उसकी बुद्धिमत्ता और अधिकार का प्रकाशन है। कौन खुद को उसके प्रभुत्व से मुक्त कर सकता है? और कौन उसकी अभिकल्पनाओं से खुद को छुड़ा सकता है? सभी चीजें उसकी निगाह के नीचे मौजूद हैं, और इतना ही नहीं, सभी चीजें उसकी संप्रभुता के अधीन रहती हैं। उसके कर्म और सामर्थ्य मानवजाति के लिए इसे स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं छोड़ते कि वह वास्तव में मौजूद है, साथ ही इस तथ्य को भी कि वह सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है। उसके अतिरिक्त कुछ भी ब्रह्मांड पर शासन नहीं कर सकता और मानवजाति का निरंतर भरण-पोषण तो बिल्कुल नहीं कर सकता। चाहे तुम परमेश्वर के कर्मों को पहचानने में सक्षम हो या न हो, और चाहे तुम परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो या न करते हो, इसमें कोई शक नहीं कि तुम्हारा भाग्य परमेश्वर द्वारा नियत किया जाता है, और इसमें भी कोई शक नहीं कि परमेश्वर ही हमेशा वह एक रहेगा जो सभी चीजों पर अपनी संप्रभुता रखेगा। उसका अस्तित्व और अधिकार इस बात से निर्धारित नहीं होता कि वे मनुष्य द्वारा पहचाने और समझे जाते हैं या नहीं। केवल वही मनुष्य के अतीत, वर्तमान और भविष्य को जानता है, और केवल वही मानवजाति के भाग्य का निर्धारण कर सकता है। चाहे तुम इस तथ्य को स्वीकार करने में सक्षम हो या न हो, इसमें ज्यादा समय नहीं लगेगा, जब मानवजाति अपनी आँखों से यह सब देखेगी, और परमेश्वर जल्दी ही इस तथ्य को साकार करेगा। मनुष्य परमेश्वर की आँखों के सामने जीता है और मर जाता है। मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के लिए जीता है, और अपनी आँखें आखिरी बार इसी प्रबंधन के लिए बंद करता है। मनुष्य बार-बार आता और जाता रहता है, चक्र चलता रहता है। बिना किसी अपवाद के, यह सब परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी अभिकल्पना का हिस्सा है। परमेश्वर का प्रबंधन निरंतर अग्रसर है; यह कभी रुका नहीं है। वह मानवजाति को अपने अस्तित्व से अवगत कराएगा, अपनी संप्रभुता में विश्वास करवाएगा, अपने कर्मों का दर्शन करवाएगा, और अपने राज्य में वापस लौटा ले जाएगा। यही उसकी योजना है और वह कार्य है जिसका वह हजारों वर्षों से प्रबंधन कर रहा है।
संसार की उत्पत्ति के समय, परमेश्वर ने अपना प्रबंधन कार्य प्रारंभ किया और मनुष्य इस कार्य के केंद्र में है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर द्वारा सभी चीजों की सृष्टि मनुष्य के लिए ही है। चूँकि उसके प्रबंधन का कार्य हज़ारों सालों में फैला हुआ है, और वह केवल एक ही मिनट या सेकंड के अंतराल में या पलक झपकते या एक या दो सालों में पूरा नहीं होता, इसलिए उसे मनुष्य के अस्तित्व के लिए आवश्यक और अधिक चीजों का सृजन करना पड़ा, जैसे कि सूर्य, चंद्रमा, सभी प्रकार के जीव, भोजन और एक जीवित पर्यावरण। यह परमेश्वर के प्रबंधन का प्रारंभ था।
इसके बाद परमेश्वर ने मनुष्य को शैतान के हाथों में सौंप दिया, और मनुष्य शैतान की सत्ता के अधीन रहने लगा, जिसने धीरे-धीरे परमेश्वर के प्रथम युग के कार्य की शुरुआत की : व्यवस्था के युग की कहानी...। व्यवस्था के युग के दौरान कई हज़ार सालों में, मानवजाति व्यवस्था के युग के मार्गदर्शन की आदी हो गई और उसे हलके में लेने लगी। धीरे-धीरे मनुष्य परमेश्वर की देखभाल से दूर होता चला गया। और इसलिए, व्यवस्था का अनुसरण करते हुए लोग मूर्तिपूजा और बुरे कर्म भी करने लगे। वे यहोवा की सुरक्षा से वंचित थे और केवल मंदिर की वेदी के सामने अपना जीवनयापन कर रहे थे। वास्तव में, परमेश्वर का कार्य उन्हें बहुत पहले छोड़ चुका था, और हालाँकि इस्राएली अभी भी व्यवस्था से चिपके हुए थे और यहोवा का नाम लेते थे, यहाँ तक कि गर्व से विश्वास करते थे कि केवल वे ही यहोवा के लोग हैं और वे यहोवा के चुने हुए हैं, किंतु परमेश्वर की महिमा ने उन्हें चुपके से त्याग दिया था ...
जब परमेश्वर अपना कार्य करता है, तो वह हमेशा चुपचाप एक स्थान को छोड़ कर धीरे से दूसरे स्थान पर अपना नया कार्य प्रारंभ कर देता है। यह उन लोगों को मनगढ़ंत कहानी लगती है, जो सुन्न होते हैं। लोगों ने हमेशा पुरानी बातों को बाकी सभी बातों से ऊपर सँजोया है और नई, अपरिचित चीजों से शत्रुता बरती है या उन्हें विघ्न माना है। इसलिए, जो कुछ भी नया कार्य परमेश्वर करता है, प्रारंभ से बिल्कुल अंत तक, मनुष्य समस्त चीजों में अंतिम होता है, जो इसे जान पाता है।
जैसा कि हमेशा से होता आया है, व्यवस्था के युग में यहोवा के कार्य के बाद परमेश्वर ने दूसरे चरण का अपना कार्य प्रारंभ किया : देह धारण कर—दस, बीस साल के लिए मनुष्य के समान देह में आकर—विश्वासियों के बीच बोलते और अपना कार्य करते हुए उसने ऐसा किया। फिर भी बिना किसी अपवाद के, कोई भी यह बात नहीं जान पाया और प्रभु यीशु को सलीब पर लटकाए जाने और उसके पुनर्जीवित होने के बाद बहुत थोड़े-से लोगों ने ही माना कि वह देहधारी परमेश्वर था। समस्यापूर्ण ढंग से, पौलुस नाम का एक व्यक्ति प्रकट हुआ, जिसने परमेश्वर के साथ घातक शत्रुता पाल ली। यहाँ तक कि प्रहार किए जाने के बाद प्रेरित बनकर भी पौलुस ने अपनी पुरानी प्रकृति नहीं बदली और वह परमेश्वर का विरोध करने के पथ पर चलता रहा। पौलुस ने अपने कार्य-काल के दौरान कई धर्मपत्रियाँ लिखीं; दुर्भाग्य से, बाद की पीढ़ियों ने उन धर्मपत्रियों का परमेश्वर के वचनों के तौर पर आनंद लिया, यहाँ तक कि उन्हें नए नियम में शामिल भी कर लिया गया और ऐसे मिला दिया गया कि उनमें और परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन में अंतर न हो पाए। पवित्रशास्त्र के आगमन के बाद से यह बिल्कुल शर्मनाक बात है! और क्या यह एक ऐसी गलती नहीं थी जो मनुष्य की परम मूर्खता की वजह से हुई थी? वे नहीं के बराबर जानते थे कि अनुग्रह के युग में परमेश्वर के कार्य के अभिलेखों में मनुष्य की धर्मपत्रियाँ या आध्यात्मिक लेख परमेश्वर के कार्य और वचनों के रूप में शामिल नहीं होने चाहिए। परंतु यह विषयांतर है, इसलिए आओ, हम अपने मूल विषय पर लौटें। जैसे ही परमेश्वर के कार्य का दूसरा चरण पूरा हुआ—सलीब पर चढ़ाए जाने के बाद—मनुष्य को पाप से वापस पाने (अर्थात् मनुष्य को शैतान के हाथों से छुड़ाने) का परमेश्वर का कार्य संपन्न हो गया। और इसलिए, उस क्षण के बाद से, मानवजाति को केवल प्रभु यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करना था, और उसके पाप क्षमा कर दिए जाते। बस नाम के लिए कहें तो, मनुष्य के पाप अब उसके द्वारा उद्धार प्राप्त करने और परमेश्वर के सामने आने में बाधक नहीं रहे थे और न ही शैतान द्वारा मनुष्य को दोषी ठहराने का कारण रह गए थे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि स्वयं परमेश्वर ने व्यावहारिक कार्य किया था, उसने पापी देह की छवि बनकर उसका अनुभव किया था, और परमेश्वर स्वयं ही पापबलि था। इस प्रकार, मनुष्य सलीब से उतर गया, परमेश्वर के देह—इस पापी देह की छवि के जरिये छुड़ा और बचा लिया गया। और इसलिए, शैतान द्वारा बंदी बना लिए जाने के बाद, मनुष्य परमेश्वर के सामने उसका उद्धार स्वीकार करने के एक कदम और पास आ गया। बेशक, कार्य का यह चरण परमेश्वर का वह प्रबंधन था जो व्यवस्था के युग के प्रबंधन से अधिक गहन और अधिक विकसित था।
परमेश्वर का प्रबंधन ऐसा है : वह मनुष्य को शैतान के हवाले करता है—वह मनुष्य जो यह जानता ही नहीं कि परमेश्वर क्या है, सृष्टिकर्ता क्या है, परमेश्वर की आराधना कैसे करें या उसे परमेश्वर के प्रति समर्पण क्यों करना चाहिए—और वह शैतान को मनमाने ढंग से उसे भ्रष्ट करने देता है; कदम-दर-कदम, परमेश्वर तब मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस ले लेता है, जब तक कि मनुष्य पूरी तरह से परमेश्वर की आराधना नहीं करने लगता और शैतान को अस्वीकार नहीं कर देता। यही परमेश्वर का प्रबंधन है। यह किसी मिथक-कथा जैसा और समझने में मुश्किल लग सकता है। लोगों को यह किसी मिथक-कथा जैसा इसलिए लगता है, क्योंकि उन्हें इसका भान नहीं है कि पिछले हज़ारों सालों में मनुष्य के साथ कितना कुछ घटित हुआ है, और यह तो वे बिल्कुल भी नहीं जानते कि इस ब्रह्मांड और नभमंडल में कितनी कहानियाँ घट चुकी हैं। और इससे भी बढ़कर, ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अपनी नश्वर आँखों से उस अधिक अद्भुत, अधिक भय पैदा करने वाली दुनिया को नहीं देख सकते जो भौतिक दुनिया से परे मौजूद है। यह उन्हें समझ से बाहर लगता है क्योंकि उन्हें परमेश्वर द्वारा मानवजाति के उद्धार के महत्व या उसके प्रबंधन कार्य के महत्व की कोई समझ नहीं है और वे यह नहीं समझते कि परमेश्वर वास्तव में किस प्रकार की मानवजाति चाहता है। क्या वह ऐसी मानवजाति है जो शैतान द्वारा बिल्कुल भी भ्रष्ट न की गई हो, जैसे आदम और हव्वा थे? नहीं! परमेश्वर के प्रबंधन का उद्देश्य लोगों के एक ऐसे समूह को प्राप्त करना है, जो उसकी आराधना करे और उसके प्रति समर्पित हो। हालाँकि ये लोग शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं, परंतु वे अब शैतान को अपने पिता के रूप में नहीं देखते; इसके बजाय, वे शैतान के भयानक चेहरे को पहचानते हैं और उसे अस्वीकार करते हैं, और वे परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने के लिए उसके सामने आते हैं। वे जान जाते हैं कि कुरूप और पवित्र में क्या अंतर है, वे परमेश्वर की महानता और शैतान की बुराई को भी पहचान जाते हैं। इस प्रकार के मनुष्य अब शैतान की सेवा नहीं करेंगे, या शैतान की आराधना नहीं करेंगे, या शैतान को प्रतिष्ठापित नहीं करेंगे। इसका कारण यह है कि यह एक ऐसे लोगों का समूह है, जो सचमुच परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए गए हैं। यही परमेश्वर द्वारा मानवजाति का प्रबंधन करने के कार्य की महत्ता है। इस प्रबंधन कार्य के दौरान, मानवजाति शैतान की भ्रष्टता की पात्र है और साथ ही मानवजाति परमेश्वर के उद्धार की पात्र भी है; यह वह उत्पाद है जिसके लिए परमेश्वर और शैतान लड़ रहे हैं। जैसे-जैसे परमेश्वर अपना कार्य करता है, वह कदम-दर-कदम मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस प्राप्त कर रहा है और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के और भी करीब आता जाता है ...
और फिर राज्य का युग आया, जो कार्य का अधिक व्यावहारिक चरण है, और फिर भी जिसे स्वीकार करना मनुष्य के लिए सबसे कठिन भी है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जितना अधिक मनुष्य परमेश्वर के नज़दीक आता है, परमेश्वर की छड़ी उसके उतने ही करीब पहुँचती है और परमेश्वर का चेहरा उतनी ही अधिक स्पष्टता से मनुष्य के सामने प्रकट हो जाता है। मानवजाति के छुटकारे के बाद मनुष्य औपचारिक रूप से परमेश्वर के परिवार में लौट आता है। मनुष्य ने सोचा कि अब आनंद का समय आया है, किंतु परमेश्वर द्वारा उसे ऐसे पुरज़ोर आक्रमण का भागी बनाया जाता है, जैसा कभी किसी ने अनुमान नहीं लगाया होगा : होता यह है कि, यह एक बपतिस्मा है, जिसका परमेश्वर के लोगों को “आनंद” लेना है। इस प्रकार के व्यवहार के अंतर्गत, लोगों के पास ठहरकर स्वयं के बारे में यह सोचने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता, “मैं, कई सालों तक खोया हुआ वह मेमना हूँ, जिसे वापस पाने के लिए परमेश्वर ने कितना कुछ खर्च किया है, फिर परमेश्वर मुझसे ऐसा व्यवहार क्यों करता है? क्या यह परमेश्वर का मुझपर हँसने और मुझे उजागर करने का तरीका है? ...” वर्षों के अनुभवों के बाद, शोधन और ताड़ना के कष्टों से गुजरते हुए मनुष्य तपकर मजबूत हो गया है। वैसे तो मनुष्य बीते समय की “महिमा” और “रोमांस” खो चुका है, लेकिन अनजाने में ही वह स्व-आचरण के सिद्धांतों और इतने वर्षों से मानवजाति को बचाने में परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों को समझ गया है। धीरे-धीरे, मनुष्य अपनी बर्बरता से, इस बात से कि उसे काबू में करना कितना मुश्किल है, परमेश्वर के बारे में अपनी सभी गलतफहमियों से और परमेश्वर से उसने जो अत्यधिक माँगें की हैं उनसे नफरत करने लगता है। गुजरा समय वापस नहीं लाया जा सकता। बीती हुई घटनाएँ ऐसी यादें बन जाती हैं जिनके लिए मनुष्य पश्चात्ताप करता है और परमेश्वर के वचन और कोमल प्रेम मनुष्य के नए जीवन में प्रेरक शक्ति बन जाते हैं। मनुष्य के घाव दिन-ब-दिन भरते जाते हैं, उसका शरीर मजबूत होता जाता है और वह उठ खड़ा होता है और उसे सर्वशक्तिमान का चेहरा दिखाई देता है...। यह पता चलता है कि वह हमेशा मेरे पास में रहा है, मेरी देखभाल करता रहा है। उसकी मुस्कान और उसका सुंदर चेहरा अब भी कितना भाव जगाने वाला है, अब भी उसके दिल में अपनी सृजित मानवजाति के लिए अब भी बहुत चिंता समाई हुई है और उसके हाथ अब भी उतने ही गर्म और शक्तिशाली हैं जितने वे शुरुआत में थे। यह ऐसा है मानो मनुष्य अदन के बगीचे के समय में लौट आया हो, लेकिन अब मनुष्य साँप के प्रलोभनों को नहीं सुनता है और यहोवा के चेहरे से नहीं छिपता है। मनुष्य परमेश्वर के सामने आराधना में घुटने टेक देता है, परमेश्वर के मुस्कुराते चेहरे की तरफ देखता है और उसे अपना सबसे कीमती बलिदान अर्पण कर देता है—ओह! मेरे प्रभु, मेरे परमेश्वर!
परमेश्वर का प्रेम और उसकी दया उसके प्रबंधन कार्य के हर ब्योरे में व्याप्त रहती है और इसकी परवाह किए बिना कि चाहे लोग परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे समझ पाएँ या नहीं, वह जो कार्य पूरा करना चाहता है, उसे वह निरंतर दृढ़ता के साथ करता है। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर के प्रबंधन को लोग कितना समझते हैं, परमेश्वर के कार्य से मनुष्य को हुए लाभ और सहायता को हर कोई अनुभव कर सकता है। शायद आज तुमने परमेश्वर से कोई प्रेम या जीवन की आपूर्ति महसूस नहीं की है, लेकिन जब तक तुम परमेश्वर को नहीं छोड़ते और सत्य का अनुसरण करने के अपने संकल्प को नहीं छोड़ते, एक दिन ऐसा आएगा, जब परमेश्वर का मुस्काता मुखमंडल तुम पर प्रकट होगा। क्योंकि परमेश्वर के प्रबंधन कार्य का उद्देश्य शैतान की सत्ता के अधीन मौजूद लोगों को फिर से पाना है, न कि उन लोगों को त्याग देना, जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं।
23 सितंबर 2005